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गायती महामं त और उसका अथर :
ॐ भूभर व
ु ः सवः ततसिवतुवररणे यं भगो देवसय धीमिह

िधयो यो नः पचोदयात्।

उस पाणसवरप, दःु खनाशक, सुखसवरप, शेष, तेजसवी, पापनाशक, देवसवरप परमातमा को हम अपनी
अंतःकरण मे धारण करे. वह परमातमा हमारी बुिद को सनमागर मे पेिरत करे. -ऋगवेद ३/६२/१०, सामवेद १४६२,
यजुवेद ३/३५, २२/९, ३०/२, ३६/३.

Gayatri Mantra and its meaning:
Om bhurbhuvaha swaha

tatsaviturvarenyam

bhargo devasya dhimahi

dhiyo yo naha prachodayat.
We embrace that supreme being, the effulgent divine sun, the ultimate life force, omnipresent
and omnipotent, the destroyer of all sins and sufferings and the bestower of bliss. May he inspire and
enlighten our intellect to follow righteous path. -Rigveda 3/62/10, Samveda 1462, Yajurveda 3/35,
22/9, 30/2, 36/3.

िशका ही नही िवदा भी - (कािनतधमी सािहतय पुस तकमाला - 15)

अनुक मिणका

1. पिरवतर न की पुक ार और गुह ार
2. सृज न िवदा के पाधयापक चािहए
3. यु ग चे तना का पचार िवसतार
4. नवसृज न की अनुप म अधयातम-साधना
5. वाणी दारा यु ग चे त ना का पसार-िवसतार
6. लोक-रं ज न के साथ जुड ा हु आ लोक-मं ग ल
7. तीथर याता का आदशर
8. आगामी दस वषर -अित महतवपूणर

पिरवतर न की पुक ार और गुह ार
एक भाषा-भाषी केत का िनवासी यिद दस
ू री भाषा बोलने वाले केत मे बसने जाए, तो सवर पथम उसे उस नये
केत की भाषा का अभयास करना पडेगा। वहाँ के रहन-सहन रीित-िरवाज िवचार, संसकृित आिद से पिरिचत होने की
आवशयकता पडेगी। यिद इसे सीखने-जानने की उपेका बरती जाए, तो पग-पग पर गूँगे, बहरे, अजनबी की तरह
परेशान होना पडेगा। ईसाई, पादरी पाय: योरोपीय देशो से आते है। अपने उदेशय को पूरा करने के िलए वे एिशयाअफीका आिद महादीपो मे जाकर बसते है और पमुख रप से िपछडे इलाको को अपना कायर केत चुनते है। इससे पूवर
उनहे वहाँ की भाषा, संसकृित, समसया आिद से पिरिचत होना पडता है, साथ ही यह भी जानना होता है िक उनके
साथ िकस पकार घुला-िमला जा सकता है। यिद इस पिकया को न अपनाया जाए और िकसी भी पादरी को वहाँ
भेज िदया जाए, तो वह उस अपिरिचत िसथित मे कोई सफलता अिजर त न कर सकेगा।
इककीसवी सदी एक पकार से ऐसी पिरिसथितयो वाली अविध या पिरिध है िजसमे पवेश करने वालो को
पुरानी आदते भुलानी और नए िसरे से नई जानकािरयाँ अिजर त करके वयवहार मे उतारनी पडेगी। इसके िबना गाडी
एक भी कदम आगे न चल सकेगी।
युग पिरवतर न मे मनुषयो की आकृित तो अब जैसी ही रहेगी, पर उनकी पकृित बदल जाएगी। पकृित से यहाँ
तातपयर -मानयता भावना, िवचारणा, इचछा और गितिविधयो का समुचचय है। यो पकृित शबद संसार को गितशील रखने
वाले पवाह को भी कहते है, पर यहाँ तातपयर मात गुण, कमर , सवभाव से है। पिरवतर न इनही मे होना है। उजवल भिवषय
की संभावना वाली भिवतवयता पूरी तरह इसी केद-िबंद ु पर िनभर र है। इसिलए भावी पिरवतर न की चचार करने वाले
पाय: यही कहते है िक अगले िदनो सवर साधारण की न सही, िवचारवानो की पकृित तो लगभग इतनी बदल जाएगी,
िजसे आमूलचूल हेर-फेर के रप मे देखा जा सके।
इन िदनो पसतुत असंखय िवपितयो का सबसे बडा िनिमत कारण एक ही है िक मनुषय अदरू दिशर ता की
वयािध से गसत है। उसे लगता है िक तातकािलक रसासवाद को ही सब कुछ मान िलया जाए। जो कुछ सोचा या िदया
जाए, उसे अपने आपे तक ही सीिमत रखा जाए। बहु त हु आ तो उनहे भी कुछ सहारा दे िदया जाए, िजनसे लाभ
िमलता है या िमलने वाला है। इसके अितिरक जो भी पाणी या पदाथर संसार मे शेष रहते है , उनका दोहन िकया
जाए। वैसा न बन पडे तो उपेिकत छोड िदया जाए। अनयानयो के पित भी अपना कुछ कतर वय या उतरदाियतव है , इसे
समझने या िकयािनवत करने की अिभरिच एक पकार से समाप जैसी ही हो गई है। योजनाएँ बनाने और पयास करने
के िलए एकमात सवाथर परता ही शेष रहती है। परमाथर तो मात मनोिवनोद जैसी चचार का िवषय रह जाता है। बहु त
हु आ तो आतम िवजापन के िलए उदारचेता होने का िढंढोरा िपटवा कर अपनी मलीनता पर तिनक सी पॉिलश पोत
ली।
आज की मानयता यही है। इसी आधार पर सोचा-िवचारा जाता है और जो कुछ करना होता है, उसका
ताना-बाना बुना जाता है। फलत: वही बन पडता है िजसे मानवी गिरमा के सवर था पितकूल कहा जा सके। आतम
केिदत सवाथर परायण वयिक, कमश: इतना िनषु र और कृपण हो जाता है िक अपनी उपलिबधयो मे से राई-रती भी
सतपयोजनो के िलए लगाने का मन नही करता। िनषु रता इतनी बढ जाती है िक दस
ू रो की पीडा एवं पतनोनमुख
िसथित मे सहारा देने के िलए राई-रती उतसाह भी नही उभरता। लोक लाज की िववशता से यदाकदा कभी ऐसा कुछ
करना पडे, तो उसके बदले भी ससती वाहवाही को अपेकाकृत कही अिधक माता मे लूट लेने का उदेशय रहता है।
िजससे बदला िमलने की आशा रहती है, उसी के साथ सदवयवहार का, सहायता का हाथ उठता है। यही है वह
मौिलक दषु पवृित, िजसने असंखयो छल पपंचो, अपराधो और अनथो ं को जनम िदया है। बढते-बढते वह िसथित अब
इस सतर तक पहु ँच गई है िक हर िकसी को अपनी छाया तक से डर लगने लगा है। लोकिहत का िढंढोरा पीटने वालो
के पित सहज आशंका बनी रहती है िक कही कुछ सवर नाशी अनथर का सरंजाम तो खडा नही कर िदया हैैै।
सेवा-सहायता की आशा मूधरनयो से की जानी चािहए, पर उनके पित और भी अिधक गहरा अिवशवास अपना
पिरचय देता है। पदषू ण उगलकर हवा मे जहर छोडते रहने वाले उदोगपित यो अभावगसतो के िलए पचुर पिरमाण मे
सुिवधा-साधन उतपन करने की दहु ाई देते है, पर वह संभावना पदे की ओट मे िछपा दी जाती है, िजसके कारण
िवषैली साँस लेने के कारण असंखयो को दबु र लता और रगणता के िशकार बनकर घुट-घुट कर मरना पडता है। यही
लोग है जो पेय जल मे िवषाक रसायन घोलते और पीने वाले के िलए अकाल मृतयु का संकट उतपन करते है। बडे
उदोगो के कारण िकतने छोटे शम-जीिवयो को बेकार-बेरोजगार रहना पडता है; उसके िवरद कोई मुँह भी नही खोल
पाता।

गुड
ं ागदी इसिलए िदन दन
ू ी रात चौगुनी गित से बढती है िक उनका संगिठत पितरोध कर सकने की
साहिसकता लगभग समाप हो गई है। मागर दशर न की, धमोपदेश की िजममेदारी िजन लोगो पर है, वे मात परावलंबन
का-भागयवाद का पितपादन करते है। शौयर -साहस जगाने मे उनका दरू का भी वासता नही रहता। परावलंबन के
पकधर उथले कमर काणड भर िसखाने की उनकी रीित-नीित चलती रहती है। जब इतने भर से उनहे पचुर पिरणाम मे
सममान सिहत सुिवधा-साधन िमल जाते है, तो उस िववेकशीलता को कयो जगाएँ , जो समथर होने पर उलटी उनही के
िवरद िवदोह खडा कर सकती है। कला ने कामुकता का बाना ओढकर अपने को अिधक लोकिपय बनाने का मागर
चुना है। संपनता ऐसे उतपादन करने मे लगी है, िजनमे सवर साधारण को आकषर क चकाचौध तो िदख पडती है, पर
अंतत: अिहत के अितिरक और कुछ हाथ नही लगता। जब मूधरनयो का दिषकोण यह है, तो सवर साधारण को उनका
अनुकरण करते हु ए िकतने गहरे गतर मे िगरना पडेगा, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।
संकेप मे यही है आज के पचलन की बानगी। नशेबाजी से लेकर बहु पजनन तक के कुपचलन इसी पिरिध मे
आते है। पदार पथा, जाितगत ऊँच-नीच मृतक भोज, दवु यर सन एवं अपराध इसी संकीणर -सवाथर परता की सडी कीचड मे
पनपे हु ए है, िजनके कारण हर िकसी को द ु:खी होकर समग पिरवतर न का आहान करना पड रहा है। बात सही भी है।
िवष वृक की जडे कटेैे, तो ही उन फलो का उतपादन रके, जो वयथा-वेदनाओं की भरमार करने मे ही काम आते है।
आज दसो िदशाएँ एक सवर से िकसी बडे पिरवतर न की पुकार और गुहार मचा रही है। िनयंता ने आशवासन
िदया है िक अगली एक शताबदी के भीतर महािवनाश का िवसतार समेट िलया जाएगा और उजवल भिवषय का
वातावरण बनेगा। इस पिरवतर न के िलए कुछ ऐसी ही तैयारी करनी होगी जैसे, एक भाषा के जानकार को िकसी अनय
भाषाई केत मे काम करने भेजा जाए। छोटे पिशकण तक जब िनषणात पिशकको की माँग करते है , तो युग पिरवतर न के
िलए तो ऐसे महािशलपी चािहए, जो नए युग और नए वातावरण का सृजन कर सके।

सृज न िवदा के पाधयापक चािहए

‘नव सृजन योजना’ महाकाल की योजना है। वह पूरी तो होनी ही है। उस पिरवतर न का आधार बनेगा
चिरतिनष, भाव-संवेदना युक वयिकतवो से। ऐसे वयिकतव बनाना िवदा का काम है, मात िशका उसके िलए पयारप नही।
मात िशका-साकरता तो मनुषय को िनपट सवाथी भी बना सकती है। उसमे िवदा का समावेश अिनवायर है। असतु,
नवयुग के अनुरप मन:िसथितयाँ एवं पिरिसथितयाँ उतपन करने के िलए बडी संखया मे ऐसे पाधयापको की
आवशयकता अनुभव हो रही है, िजनकी िशका भले ही सामानय हो, पर वे अपने चुब
ं कीय वयिकतव और चिरत से
िनकटवती केत को अपनी िविशषताओं से भर देने की िवदा के धनी हो।
नािवक के िलए आवशयक नही िक उसके पास सनातकोतर परीका पास करने का पमाण पत हो ही। मजबूत
कलाई और चौडे सीने वाला िहममत के सहारे उफनती नदी की छाती पर दनदनाता हु आ दौडता रहता है। अपने को,
अपने िनकट वालो को-नाव पर बैठी हु ई सवािरयो को इस पार से उस पार पहु ँचाने मे उसे देर नही लगती, वरन्
िहममत और सफलता को देखते हु ए गवर -गौरव अनुभव करता है।
िवदान, मनीषी और मूधरनय सवर त सममान पाते है। उनकी गिरमा और उपयोिगता से कोई इनकार नही कर
रहा है, वरन कहा यह भर जा रहा है िक ईमान और भगवान को भुला देने वाले आज के समुदाय को ऐसे उदारक
चािहए, जो गहरी कीचड मे फँसे जानवरो की खीच घसीट कर िकनारे तक पहु ँचा देने की साहिसकता का पिरचय दे
सके।
अगले िदनो नव-युग का आगमन आँ धी तूफान की तरह दौडता चला आ रहा है। उसमे होगा तो पथा
पचलनो का पिरवतर न भी, पर सबसे पमुख एवं मौिलक पिरवतर न एक ही होगा िक मनुषय को इककड बनकर नही रहने
िदया जाएगा। जंगली जानवरो मे कभी-कभी झुड
ं को छोडकर कोई उदंड अकेले रहने लगता है। वह सामूिहकता की
रीित-नीित भूल जाता है और बगावत पर उतर आता है। िकसी पर भी आँ खे बंद करके हमला बोल देता है। उसे
‘इककड’ कहते है।
इककड मनुषय, िजसके ऊपर संकीणर सवाथर परता का पेत-िपशाच हर समय चढा रहता है, उसे हर िकसी के
िलए खतरनाक ही समझना चािहए। समसत अपराधो और अनाचारो की जनमदाती संकीणर सवाथर परता ही है। आज

की अगिणत िवडमबनाओं, िवभीिषकाओं का यिद एकमात कारण ढू ँ ढना हो तो उसे एक ही रप मे मापा जा सकता हैतृषणा और अहमनयता। यिद इसमे कटौती की जा सके, तो समझना चािहए िक िसर पर लदा चटान जैसा भारी बोझ
हलका हु आ और मानवी गिरमा के अनुरप पगित कर सकने का पथ पशसत हु आ।
मनुषय की संरचना इस पकार हु ई है िक वह दो मुटी अनाज और दो गज कपडे के सहारे मजे मे गुजारा कर
सकता है। इतना जुटाने मे उसका दो घंटे का शम-समय पयारप होना चािहए। यह सुिवधा सृिष के अनय िकसी पाणी
को उपलबध नही है। उनहे िदन भर पेट भरने का जुगाड िबठाने मे दौडना पडता है। सुरका की दिष से भी उनहे
भयभीत रहना पडता है; पर मनुषय के सामने ऐसी कोई समसया नही है। िनजी िनवारह के अितिरक जो कुछ उसके
पास बच जाता है, वह आवशयकता पूितर के अितिरक सैकडो हजारो गुना अिधक है। इस बचत को पुणय-परमाथर के
िलए िनयोिजत करके ही संसार के िववेकवानो ने दैव मानव का सतर पाया है, अपना भला िकया है और असंखयो को
अपने कंधो पर िबठाकर पार उतारने का शेय संपािदत िकया है।
यिद इतनी मोटी बात िकसी की भाव-चेतना मे पवेश कर सके, वयवहार मे उतर सके तो समझना चािहए िक
उसे देव-मानव बनने का सौभागय हसतगत हो गया। उसे अवांछनीयता के पवाह-वातावरण को बदलने का अकूत बल
उपलबध हो गया। अनयथा सडन से उतपन होने वाले िवष कीटको दारा सवर त गंदगी फैलाने का खतरा सामने खडा
ही रहेगा।
नव-युग मे िशका-साकरता तो बढती ही रहेगी। वयिक समाज और सरकार ने उसे मानयता दे दी है , िफर वह
बढेगी कयो नही? कुछ ही िदन मे िनरकरता की कािलख से सभी लोग अपना मुँह धोकर साफ कर लेगे। पशन िवदा
का है। उसका न कही महतव समझा जा रहा है और न कोई आवशयकता ही। मानवी गिरमा को उपलबध करने के
िलए िकसी का मन नही। उतकृष आदशर वािदता और दरू दशी िववेकशीलता को बढाने -अपनाने के िलए कही ऐसे
पयतन नही चल रहे है, िजनहे आशा भरी दिष से देखा और संतोषजनक कहा जा सके।
इस आवशयकता की पूितर युग सृजेताओं को करनी पडेगी। आशा की गई है िक वे शािनतकुञ पिरवार से
िनकलेगे और अपने महान वयिकतव और कतृरतव से समूचे वातावरण मे नव जीवन का संचार करेगे। ऐसे
शेयािधकािरयो को अभयुदय की िदशा मे दो कदम अिनवायर रप से उठाने पडेगे; एक िनजी आवशयकताओं और
महतवाकाँकाओं को घटाना, इसे संयम कह सकते है, दस
ू रा िवदा-िवसतार के िलए तडपन भरा पुरषाथर उभारना, इसे
सेवा-साधना कह सकते है।
पथम चरण मे औसत नागिरक के िनवारह की कसौटी पर सवयं को खरा िसद करना होगा। यहाँ अिधक
उतपादन पर रोक नही है; पर िनजी खचो ं मे इतनी अिधक कटौती करनी चािहए िक उसे तपसवी जीवन न सही, सादा
जीवन उचच-िवचार सतर का तो समझा ही जा सके।
इतना पहला कदम उठा लेगा वह अनुभव करेगा िक उसके पास जो समय, शम, कौशल, मनोयोग ही नही,
साधनो का भी इतना बाहु लय है िक समय की महती पुकार को पूरा करने के िलए युग देवता के चरणो पर शदांजिल
के रप मे पसतुत करते हु ए असंखयो के िलए अनुकरणीय उदाहरण पसतुत कर सके।
इस संदभर मे न तो उचच िशका की आवशयकता है और न िवपुल संपनता की। उस चतुरता की भी
आवशयकता नही है जो लंबे चौडे भाषण देकर लोगो को बहका तो लेती है , पर िनजी वयिकतव खोखला होने के
कारण पभाव छोडने की दिष से शूनय ही रहता है। इन िदनो उपदेशको-वकाओं की हर केत मे एक पकार की आँ धी
जैसी आई हु ई है। ऊँची कुसी पर बैठने , गले मे माला पहनने और माइक को झकझोर कर रख देने के िलए हर कोई
पयासा िफरता है। एक को पमुखता िमलने पर उसके अनय साथी मुँह फुलाकर बैठ जाते है।
िनजी सुिवधाओं मे कटौती के पित जो लोग शदा सँजो लेगे, उनहे सचचे अथो ं मे संयमी, तपसवी, बैरागी कहा
जा सकेगा, भले ही वे घर पिरवार के बीच िमल-जुलकर सजजनोिचत जीवन िनवारह करते हो। उनके िलए यह िनतांत
सरल होगा िक अपना आदशर उपिसथत करते हु ए अनेको को अपेकाकृत ऊँचा उठाने , आगे बढाने का पोतसाहन दे
सके। युग अधयापको की इन िदनो जो भारी पुकार है, वे इसी वगर मे से िनकलेगे, िजनहोने अधयातम दशर न को इन
आधारभूत िसदांतो को िकसी सीमा तक अपना िलया होगा, जो आदशर पालन की दिष से दस
ू रो की अपेका अपना
सतर कुछ ऊँचा उठा सके होगे।

यु ग चे त ना का पचार िवसतार

संयम और सेवा के दो वत धारण कर लेने पर अधयातम सतर की कमर योग साधना बन पडती है। लोक िशकण
इसी के अंतगर त आता है। िवदा िवसतार यही है। इसी के माधयम से िचंतन केत पर छाई हु ई िवकृितयो का िनराकरण
िकया जाता है। यिद मनुषय सही सोचने और सही करने लगे, तो समझना चािहए िक उसके िलए देवतव अदशय न
रहेगा, अपनी आभा और ऊजार का पतयक पिरचय देने लगेगा। इसी तथय को धयान मे रखते हु ए ५ लाख पौढ
पिरपकवो तथा उनके साथ जुडे हु ए २० लाख गदराए पजा-पुतो की सृजन-सेना िविनिमर त होती है। इसमे से एक
लाख भूल-चूक के िलए छोड देने पर वे २४ लाख हर हालत मे हो ही जाते है।
संयम तप से अपने िनवारह तथा महतवाकाँकाओं मे कटौती करने पर, इतने सवलप साधनो से जीवनचयार बन
पडती है िक ततपरता और तनमयता अपनाने वाला हर वयिक समय, शम, मनोयोग और साधनो की ढे रो बचत कर
सकता है उस वक नव सृजन के िलए लगते रहते पर इतना कुछ बन पड सकता है िक महान पिरवतर न की संभावनाएँ
साकार होने मे िकसी पकार का संदेह न रहे।
हर पिरजन को नयूनतम दो घंटे का समय अपने केत मे युग-चेतना को वयापक बनाने के िलए लगाते रहने के
िलए कहा गया है। २४ लाख वयिकयो के दो-दो घंटे िमलकर ४८ लाख घंटे होते है। ६ घंटे का एक शम िदवस मान
िलया जाए तो आठ लाख वयिकयो के पूरे िदन के काम के बराबर हो जाते है। यह नवसृजन के िविवध पयोजनो मे
खपा सके, तो ऐसा उतसाहवधर क वातावरण बन पडेगा, िजसकी कलपना मात से पुलिकत कर देने वाला उतसाह
उमँगने लगे।
चौबीस लाख वयिक यिद नयूनतम रािश २० पैसा ही एकितत करने लगे , तो वह चार लाख अससी हजार
रपया पितिदन हो सकती है। इसे यिद सृजन िशलपी िवदा िवसतार के िलए अपने -अपने केत मे िमतवयियता एवं
सतकरतापूवरक लगाने लगे, तो उतने भर से अगिणत केतो की सृजन आवशयकताएँ सहज ही पूरी हो सकती है। तब न
सरकार से सहायता माँगने की आवशयकता पडेगी और न कही दरवाजे - दरवाजे चंदा करने की। अपने छोटे पिरवार
का छोटा अनुदान संयक
ु रप से इतना समथर हो सकता हैैै िक अपनी पहु ँच का कोई घर-गाँव नवयुग का अलख
िनतयपित सुनते रहने से वंिचत नही रहे और एक करोड वयिक नवचेतना से अनुपािणत हो सके।
दबु र ुिद से, भष िचंतन और दषु आचरण उभरता है। दबु र िु द को भी कपडे की तरह साबुन, पानी से धोया जा
सकता है। यह दोनो है- सवाधयाय और सतसंग। इसे दभ
ु ारगय ही कहना चािहए िक इन दोनो का नाम भर शेष है, पर
उसका वासतिवक और पाणवान सवरप न जाने कहाँ ितरोिहत हो गया है। िफर दस
ू री बात एक और है िक युग की
समसयाओं के अनुरप ही इन दोनो का िनधाररण होता है। युग चेतना, युग दषाओं के मानस से उभरती है। इसी पकार
सतसाहस भी उनही पाणवान वयिकतवो का काम देता है, जो न केवल पखर पितभा से संपन हो, वरन् सामियक
उलझनो के समाधान का भी वयावहािरक सवरप पसतुत करते है।
शािनतकुञ की युग िनमारण योजना दारा युग सािहतय इनही िदनो सृजा गया है, िजसका मूलय पाय: कागज
सयाही िजतना ही रखा गया है। कापीराइट भी िकसी का नही है। कोई भी छाप सकता है। इसी पकार सतसंग केैे
िलए भी एक सीिमत पिरिध की िवचारधारा िनधारिरत की गई है। पवचनो मे भी सीिमत िवचारो को गहराई तक उतार
देने पर ही बात बनती है, अनयथा सडको पर मजमा लगाने वाले भी कुछ न कुछ बकझक करते और भीड जमा कर
लेते है। ऐसी बकवास को सुनना भी भारी पडता है , कयोिक उससे उलटा और अिहतकर िचंतन भी गले बँध सकता
है।
सतसंग के दो पक है-एक गायन दस
ू रा पवचन। यो इन दोनो की आवशयकता पूरी करने वाली ससती
पुिसतकाएँ छाप दी गई है, पर िजनको और अिधक सरसता चािहए उनके िलए वीिडयो टेप तैयार कर िदए गए है।
इनमे सूत संचालक के पवचन, माता जी के गायन और देव कनयाओं के सहकीतर न सिममिलत है। एक टेप ऐसा भी है
िजसमे युग पिरवतर न के मूलभूत िसदांतो को संिकप एवं सरल सुबोध ढंग से समािवष कर िदया है। यह टेप
शािनतकुञ मे उपलबध है, िजनहे कोई भी अपने टेप िरकाडर र पर बजा कर एकितत लोगो के बीच युग पवका की, युग
गायक की भूिमका िनभा सकता हैैै। युग चेतना के पचार-िवसतार का यह भी एक सरल तरीका है।
िवदा िवसतार के िलए सािहतय और वाणी दोनो का उपयोग वयापक रप से िकया जाना है। जान रथ,
साइिकल याताएँ , सदाकय लेखन, झोला पुसतकालय, सतसंग , दीपयज आिद के माधयम से सृजनिशलपी हर केत मे

युग चेतना का िवसतार करने के िलए किटबद होकर जुट पडे- ऐसा माहौल बन रहा है। िनधारिरत सीिमत समयदान के
अंतगर त ही यह कायर करते रहना संभव है।
झोला पुसतकालय की पिकया कुछ िदनो से सफलतापूवरक चल रही है। कंधे पर लटके झोले मे युग सािहतय
भर कर अपने पिरचय केत के िशिकतो को घर बैठे, िबना मूलय देते रहना और पढ लेने पर खुद ही जाकर उसे वािपस
ले आना। ऐसे पढने वालो को यह भी कहा जाता है िक वे इन पुसतको को संबद अिशिकत लोगो को सुनाते रहने की
िजममेदारी भी उठाएँ । इस पिकया मे युग चेतना से िशिकतो और अिशिकतो को समान रप से अवगत अनुपािणत होने
का अवसर िमलता है। पढा चुकने पर यही सािहतय घरेलू पुसतकालय के रप मे बदल जाता है और पिरवार की
सथायी िनिध बनकर एक पकार का चेतना पुंज बना रहता है। हर महीने नई पुसतके खरीदते और भंडार बढाते रहने
की आवशयकता उसी रािश से पूरी हो जाती है, जो हर िदन दस या बीस पैसे िजतना सदजान िवसतार पयोजन के
िलए पिरजन सवेचछापूवरक िनकालते रहते है। यह सवाधयाय की छोटी, िकंतु सशक पिकया हु ई।
दस
ू रा पक है-सतसंग इसके िलए पजा केद मे सापािहक सतसंग चलते है। उनमे सहगान कीतर न , युगसािहतय
पठन के आधार पर पवचन चलता रहता है। साथ ही थोडी सी अगरबितयाँ जलाकर कुछ दीपक थाली मे रख कर
दीप यज की पुणय पिकया भी संपन हो जाती है। कही-कही सापािहक सतसंग के सथान पर यह पबंध िकया गया है
िक गृह सवामी का जनम िदवस िजस िदन हो, उस िदन अपने सवजन संबंिधयो की उपिसथित मे एक छोटा समारोह
कर िलया जाए।
दीवारो पर आदशर वाकयो का िलखना एवं अलमािरयो, िकवाडो, फनीचरो, अटैची आिद पर सटीकर िचपकाना
अपने ढंग का एक अनोखा कायर है, जो उधर से गुजरने या देखने वाले, हर िकसी का धयान अपनी ओर आकिषर त
करता है और पढने वाले के मिसतषक मे एक िबजली-सी कौधा देता है। यह कायर यिद गली-मुहलो मे भली पकार कर
िलया गया है, तो समझना चािहए यह बोलती दीवारे राहगीरो को ऐसा कुछ िनरंतर िसखाती समझाती रहेगी, िजनहे
आदशर वादी पेरणाओं से ओत-पोत कहा जा सके।

नव सृज न की अनुप म अधयातम-साधना

दशयमान सथूल शरीर के अितिरक अदशय सतर के दो शरीर और भी है , िजनहे सूकम शरीर और कारण शरीर
कहते है। सूकम मे दरू दिशर ता का और कारण मे भाव-संवेदना का िनवास है। इन केतो को उनकी आवशयकताएँ
उपलबध होती रहे, तो आरोगय संतुलन उनमे भी बना रहेगा। इन पर पभाव तो सवाधयाय सतसंग का भी पडता है, पर
यिद िनधारिरत साधन उपचार भी अपनाए जा सके तो और भी अचछा। इनका समावेश रहने से उपरोक दोनो केनदो
मे पगित की और भी अिधक संभावना रहती है। सूकम शरीर के िलए जप और कारण शरीर के िलए धयान पिकया
का, अनुभवी साधना िवजािनयो ने िनधाररण िकया है।
जप पयोजन के िलए अनेक मत−मतानतरो के अपने-अपने िनयम और िनधाररण है, पर यिद सावर भौम सतर
पर िनरीकण-परीकण िकया जाए, तो गायती महामंत सावर जनीन सतर का बैठता है। उसकी जप-पुनरावृित करने पर
वयिकयो मे संयिमत सतर की पितभा उभरती है, साथ ही अदशय वातावरण मे भी पेरणापद ततवो का बाहु लय बन
पडता है। नयूनतम १०८ मंतो की एक माला जप ली जाय, तो अंतराल मे जान जैसी सफूितर का अनुभव होता है।
अिधक िजससे िजतना बन पडे, उतना ही अिधक लाभदायक रहेगा। अचछा तो यही है िक िनतय कमर से, सनानािद से
िनवृत होकर शुद सथान पर बैठकर जल और अिग की साकी मे उसे संपन िकया जाए। पूजा की चौकी पर छोटा
जल कलश और अगरबती जलाकर वातावरण को अिधक अनुकूल बना िलया जाए, पर िजनके िलए ऐसी सवचछता
अपनाने मे किठनाई पडती हो, वे िबना सनान िकए भी मौन मानिसक जप कर सकते है। एक माला जपने मे पाय:
पाँच िमनट लगते है। इतना समय िनकालते रहना िकनही उतसाही शदालुओं के िलए किठन नही पडना चािहए। इस
पयास के आधार पर सूकम शरीर मे पाई जाने वाली चौबीस गंिथयाँ जागृत होती है और उस आधार पर गुण , कमर ,
सवभाव का पिरषकार होता है। मेधा िनखरती और पितभा उभरती है।
कारण शरीर की गहराई तक पहु ँचने के िलए धयान-धारणा अपनाने की आवशयकता पडती है। यो कई लोग
अपने-अपने इष देवो का भी धयान करते है। पर आप अनुभवी जनो के पितपादन और िनजी पयोग से यह जाना जा
सकता है िक पात:कालीन सूयर का धयान सवोतम है। बन पडे तो पात: के उदीयमान सूयर के पतयक दशर न भी िकए

जा सकते है और जल अघयर भी चढाया जा सकता है; पर िजनहे िनयत समय पर िकसी बडी अडचन के कारण
पतयक दशर न न बन पडे, तो वे मानिसक धयान भी उसी सतर का कर सकते है।
पभात कालीन अरणाभ सिवता का धयान-दशर न करने के साथ-साथ यह धारणा भी करनी चािहए, िक िदवय
केद से िन:सृत होने वाली िकरणे साधक के पतयक शरीर मे-सूकम शरीर मेैे और कारण शरीर मे पवेश क र रही है।
उन तीनो ही संसथानो मे पकाश भर रही है। साथ ही ऊजार, उषणता और आभा सतर की तेजिसवता का समावेश कर
रही है। सथूल शरीर मे ओजस्, सूकम शरीर मे तेजस् और कारण शरीर मेैे वचर स् का उभार आ रहा है। अपने रोमरोम मेैे कण-कण मे, सिवता की ऊजार-आभा ओत-पोत हो रही है। वयिकतव ओजसवी, मनसवी और तपसवी बन
रहा है। सिवता और साधक, आग और ईध
ं न की तरह परसपर एकीभूत हो रहे है। आदान-पदान का, समपर ण और
अनुगह का उपकम अनवरत रप से चल रहा है। यह दैिनक साधना है , यह िजनसे िजतनी शदा और ततपरता के
साथ बन पडे, वे इसे िनतय कमर के एक अिविचछन अंग के रप मे करते रहेैे।
यह युग संिध की वेला है। इककीसवी सदी के आगमन से पूवर तक बीसवी सदी चलेगी। यह अंितम चरण
िकतनी ही उथल-पुथल से भरा हु आ होगा। इसमे पसव पीडा जैसी अनुभूित भी हो सकती है और नवजात िशशु के
आगमन का उतसाहवधर क समाचार भी िमल सकता है। जनम और मरण के आिद और अंत वाले अवसर भी ऐसी ही
उथल-पुथल भरे होते है।
राित का समापन और पभात का आगमन संधयाकाल कहलाता है। उसमे साधारण िकया-पिकया की अपेका
हर िकसी को कुछ नये सतर का िकया-कलाप अपनाना पडता है। युग संिध मे भी शािनतकुञ की एक बारह वषीय
योजना बनी है। इसमे दस वषर बीत चुके। दो वषर शेष है। इस अविध मे एक आधयाितमक सामूिहक महाअनुषान चल
रहा है-हर िदन २४ करोड गायती जप करने का। दस
ू रो के िलए यह लकय िहमालय जैसा भारी पतीत हो सकता है ;
पर अपने २४ लाख पिरजन यिद एक माला गायती जप और सिवता के धयान मे पाँच-दस िमनट लगाते रहेैे तो
इतने भर से संकिलपत साधना भली पकार पूरी होती रहेगी।
पचार-िवसतार का कम तेजी से चल रहा है। इस साधना की पूणारहुितयाँ १९९५ तथा २००० मे होगी,
िजनमे नयूनतम एक करोड वयिक सिममिलत होगे। इन सबको, इस पथम चरण की पूैूणारहुित करके अगले नये
सोपान मे और भी अिधक शदा-संवेदना के , उतसाह एवं साहस के साथ पवेश करना होगा। इसिलए दो पूणारहुितयो
के आयोजन की योजना बनी है। यिद इतने लोगो का एकतीकरण एक जगह न बन सका, तो उसे िमशन दारा
संचािलत २४ सौ पजा केैेदो मे िवभािजत भी िकया जा सकता है। पूणारहुित की इस िवशालता का लकय यथावत
रहेगा; पर उसे एक या अनेक सथानो पर संपन करने की बात अवसर आने पर पिरिसथितयो के अनुरप ही िनिशचत
होगी।
सामूिहकता की शिक से सभी पिरिचत है। भवय भवन, असंखय ईटं ो से िमलकर बनते है। अनेक धागे
िमलकर कपडा बनता है। ितनको को बटकर मजबूत रससे बनते है। सैिनको का समुदाय िमलकर समथर सेना का रप
धारण करता है। मधुमिकखयाँ िमल-जुलकर ही छता बनाती और शहद जमा करती है। देवताओं की संयक
ु शिक से
देवी दगु ार का अवतरण संभव हु आ था। ऋिष रक से घडा भर जाने पर उससे असुर िनकंिदनी सीता का उदव हु आ
था। अणुओं से िमलकर यह दशय जगत िविनिमर त हु आ है। नव-युग के अवतरण मे भी बुद के पिरवाजको एवं गाँधी के
सतयागिहयो जैसा संगठन अभीष होगा।
युग संिध महा पुरशचरण को, नव युग की जान गंगा को धरती पर अवतिरत करने वाली सिममिलत सतर की
भगीरथ साधना कहा जा सकता है। उसे लघु से िवभु बनाने मे मतसयावतार जैसी भूिमका भी तो िनबाहनी है। इसिलए
देव मानवो को एक छत-छाया मे एकितत करना भी अिनवायर हो गया है। इस संदभर मे सन् ५८ मे एक सहस कंु डी
गायती महायज का पथम पयोग गायती तपोभूिम, मथुरा मे हो चुका है। युग िनमारण योजना की सुिवसतृत रप-रेखा
उसी अवसर पर बनी थी और तब से लेकर अब तक की अविध मे उसने नैितक, बौिदक और सामािजक केतो मे
आशचयर जनक समझी जाने वाली िकया-पिकया संपन की है। एक जोरदार धकका भर इंजन देता है, तो िडबबे उसी
ठोकर के कारण दरू तक पटरी पर दौडते चले जाते है। अभी सन् १९९० से २००० तक पाय: दस वषर मे इतनी
समथर ता अिजर त कर ली जाएगी िक पूणारहुित के रप मे मारी गई जोरदार ठोकर इककीसवी सदी के उजवल भिवषय
का पतयक दशर न एवं अनुभव करा सके।

वाणी दारा यु ग चे त ना का पसार-िवसतार

इन िदनो जन साधारण के सोचने का तरीका लोभ-मोह और अहंकार के साथ बुरी तरह जुड गया है। चल
रहे ढरे को अभयास मे इस कदर उतार िलया गया है िक अवांछनीय होने पर भी उसका मोह छोडे नही छूटता। इस
िसथित को पूरी तरह उलटना पडेगा और िकया-कलापो मे, िवचारणा-आकांकाओं मे इतना हेरफेर करना पडेगा, िजसे
सवतंत िचंतन एवं नव िनधाररण की संजा दी जा सके। अपना सो अचछा, पराया सो बुरा की मानयता सही नही है।
सतय के दशर न जहाँ से भी होते है, वही से उसका चयन करना चािहए। औिचतय को अंगीकृत करने मे हमे राजहंस की
तरह नीर-कीर िववेैक
े की नीित अपनानी चािहए। िवचारकांित का सवरप भी यही है।
िवचारो को पभािवत करने वाली दो पिकयाएँ सवर साधारण की जानकारी मे है। एक वाणी दस
ू री लेखनी।
इसमे से पहली दारा सतसंग संपन होता है, दस
ू री सवाधयाय का सरंजाम जुटाती है। वाणी का लाभ िशिकत-अिशिकत
दोनो ही समान रप से उठा लेते है। लेखनी को अिशिकत लोग पढ नही पाते , पर सुन वे भी लेते है। इन दोनो को
छै नी-हथौडा मानकर, हमे कठोर पतथर जैसी िनषु र सवाथर परता को युग के अनुरप आकार मे गढना चािहए। वाणी
और लेखनी को पचंड अस-शस मानकर हमे संवयाप असुरता से लडने के िलए सीना तानकर जूझने के िलए युद
केत मे उतरना चािहए।
यो सतसंग के नाम पर सडा-गला कूडा-कचरा लोगो के िसरो पर थोपा जाता रहता है; पर उपयोिगता की
कसौटी पर कसकर उसकी साथर कता तभी सवीकार करनी चािहए, जब वह आज की समसयाओं का आदशर वादी एवं
वयावहािरक समाधान पसतुत कर रहा हो। सवाधयाय के संबध
ं मे भी इसी कसौटी का पयोग होना चािहए। आवशयक
नही िक वह िकसी पुराने वयिक दारा, पुरानी भाषा मे िलखी गयी हो। जो पुराना, सो सच-यह मानयता ऐसी नही है
िजसे आँ खे बंद करके, नाक मूँदते हु ए गले उतार ही िलया जाए। कोई बूढा भी सनकी हो सकता है और कोई िकशोर
भी समझदारी की बात कह सकता है। कया अंगीकार करे? उसका एक ही उतर हो सकता है िक िजसमेैे औिचतय
का गहरा पुट हो, िजसमे समाधान के तकर, तथय, उदाहरण और पमाण इस अनुपात मे िवदमान हो िक सीधे गले
उतर चले और उतकृषता की पकधर हलचल उतपन कर सके । लेखनी और वाणी का युग चेतना से जुडा हु आ पयोग
हमे इन िदनो इसी सतर पर करना चािहए।
वाणी का सवर िविदत उपयोग वयाखयान, पवचनो के रप मे ही होता आया है, िकं तु उसके िलए यह आवशयक
पडता है िक अिधक लोगो का बडा समुदाय एक जगह एकितत हो और उसका सवरप सभा-समारोह जैसा न सही,
कम से कम िवचार गोषी जैसा तो बन ही जाए। किठनाई यह है िक ऐसा सरंजाम जुटाना इन िदनो अित-आडंबर भरा
और संकीणर हो गया है। जानने वाले जानते है िक रैिलयाँ िनकालने वालो और बडे सममेलन बुलाने वालो को िकतने
पापड बेलने पडते है और िकतनी बडी रािश खचर नी पडती है। िफर अिधक बडी भीड का जमाव वहाँ भी मेले -ठे ले
जैैैसा बनकर रह जाता है। धविन िवसतारको से सुनने वालो के मनो मे भी कोई तीखी पेरणा नही उभरती, िजससे
कुछ आदशर वादी उमंग उभरने की आशा की जा सके।
पुराने जमाने मे लाउडसपीकर नही थे, इसिलए िवशाल भीड जमा करने वाले समारोहो की कलपना भी नही
की जा सकती थी। उन िदनो छोटे आकार के कथा पवचनो से काम चलाया जाता था। हमे उसी पुरातन परंपरा पर
लौटना पडेगा। छोटे देहातो के गली- मुहलो मे िबखरे हु ए जन समुदाय को नुककड सभाओं जैसी पिकया अपनाकर
काम चलाना होगा। चुनावो मे खडे होने वाले भी यही तरीका अपनाते है।
पहाड खुद चलकर अपने घर न आए तो दस
ू रा तरीका यही शेष रहता है िक खुद चलकर पहाड की तलहटी
या चोटी तक पहु ँचा जाए। पसुप जनमानस को उनीदी खुमारी से जगाने -झकझोरने के िलए सवयं ही भाग-दौड करने
का औिचतय है। उस पयोजन के िलए पजा पुराण की कथा मुहले -मुहले करने का एक सफल पयोग िपछले लंबे समय
से चल रहा है। अब पवर -तयौहारो पर छुटी का िदन भी इसके िलए उपयुक समझा गया है िक उस बहाने लोगो को
एकितत करके, हर पवो ं के साथ जुडी हु ई पगितशीलता को उभारा और जनमानस को आवशयक पिरवतर न के िलए
पोतसािहत िकया जाए। मेले और पदशर िनयाँ भी इस पयोजन के िलए कारगर हो सकती है।
एक िनतांत अिभनव पयोग इन िदनो और आिवषकृत िकया गया है। साइिकल के पिहयो वाला जानरथ इस
पकार का बनाया जाए, िजसमे बैटरी, टेपिरकाडर र और लाउडसपीकर लगे हु ए हो। उसमे मुैुफत पढाने या बेचने के
िलए युग सािहतय भी पसतुत रहे। इसे गली मुहलो, हाट बाजारो मे घुमाया जाए। युग चेतना से पिरपूणर संगीत बजता
रहे, पवचन चलता रहे। अिधक जानने के उतसुको को युग सािहतय पढने के िलए पोतसािहत िकया जाता रहे। इस
पकार पकार पभात फेिरयाँ िनकालने, मुहले-मुहले अलख जगाने, नुककड सभाएँ जुटाने का बहु मख
ु ी कायर कम िदनभर

चलता रह सकता है। इसे घुमाने के िलए कोई साधारण समझ का आदमी भी काम करता रह सकता है। आवशयक
नही िक वह वका, गायक, पचारक सतर का ही हो। थोडी समझदारी भर हो, तो जानरथ को बारी-बारी से मुहले-मुहले
घुमाते हु ए िकसी बडे बाजार-शहर के कोने-कोने मे भी युग संदेश पहु ँचाने का कायर चल सकता है।
इसी योजना के दो छोटे संसकरण भी बने है। इनमे से एक है, साधारण साइिकल पर उपरोक पचार सामगी
िफट कर दी जाए। उससे सवारी का काम भी िलया जा सकता है और अिधक िवसतृत कायर केत मे काम िकया जा
सकता है। दस
ू रा है एक छोटी अटैची-उपकरण सतर का, इसमे भी उपरोक सभी पचार सामगी िफट है। इसे िकसी भी
घर, मुहले, पाकर, मंिदर घाट आिद लोगो के इकटे होते रहने वाले सथान पर लगाया और नवयुग का संदेश , गायनो
और भाषणो के माधयम से सुनाया जा सकता है।
उपरोक तीनो पचार वाहनो मे ऐसी बैटरी लगी है, िजसे िदन भर काम मे लाया जा सकता है और रात को
िबजली से, चाजर र के माधयम से िफर नए िसरे से काम करने योगय बनाया जा सकता है। इन तीनो की आधारभूत
लागत भी इतनी है, िजसे कोई साधारण िसथित का वयिक भी आसानी से वहन कर सके। छोटा उपकरण पाय: एक
हजार का, साइिकल वाला दो हजार का और चार पिहयो वाला मंिदरनुमा उपकरण तीन-साढे तीन हजार बन जाता
है। साइिकल या जानरथ पहले से पास हो तो उसका मूलय कम हो जाता है।
जहाँ इनमे से कोई उपकरण न बन पडे, वहाँ खंजरी, मजीरा के सहारे एक या दो वयिक पचार कायर करते रह
सकते है। उसमे लागत बीस पचचीस रपये भर आती है और उस माधयम से जहाँ भी दस-बीस आदमी इकटे हो, वहाँ
अपना युग पितपादन आसानी से आरंभ िकया जा सकता हैैै।

लोक-रं ज न के साथ जुड ा हु आ लोक-मं ग ल

युग चेतना का सवरप िनधाररण, उसका लेखन पकाशन शािनतकुञ, हिरदार और युग िनमारण योजना मथुरा
दारा छोटे साधनो से चल रहा है। िफर भी वह अपनी गुणवता के कारण िनरंतर लोकिपय हो रहा है। मूलय इतना
ससता रखा गया है िक इस सतर के पकाशनो की पंिक मे उसे एक कीितर मान सतर का कहा जा सकता है। इसे
वयावसाियक पकाशन वाले दिषकोण से सवर था पृथक रखा गया है। लगभग कागज, छपाई िजतना ही इनका मूलय
रखा गया है; तािक ईसाई िमशनो दारा छपने और पचािरत िकए जाने वाले सतर से समता की जा सके।
इन िदनो जो करना, िलखना और पितपादन पसतुत करना शेष है, वह इतना सुिवसतृत है िक युग-मनीिषयो
की कई सुिनयोिजत मंडिलयाँ खप सकती है। पकाशन के िलए इतना बडा तंत चािहए, िजतना िक िवशालकाय कलकारखाने मे लगता है। केतीय भाषाओं मे से िकतनी ही ऐसी है, िजनने संसार के िवशाल भागो पर अपना वचर सव जमा
रखा है। इन केतो मे युग िचंतन, उन पिरिसथितयो के साथ जोडते हु ए पसतुत िकया जाना है, िजनसे उनकी जीवन
पदित और िवचार शंखला जुडी हु ई है। इनको माधयम बनाना हो, तो मौिलक आदशो ं को यथावत रखते हु ए भी
उनका वयावहािरक सवरप इस पकार पसतुत करना पडेगा, जो उन समुदायो की वतर मान मानयताओं के साथ
तालमेल िबठाते हु ैएु पगित का वयावहािरक सवरप पसतुत कर सके।
ईसाई धमर की एक छोटी सीमा है, पर उसने अपनी िवचार-धारा को वयापक बनाने के िलए बाइिबल से लेकर
छोटी पुिसतकाओं तक को संसार की पाय: सभी भाषाओं मे करोडो की संखया मे छापा और उपयुक वयिकयो तक
पहु ँचाया है। यही कारण है िक उस िवचारधारा से पभािवत होकर संसार के पाय: एक ितहाई मनुषयो ने उस धमर मे
पवेश पा िलया है।
सामयवादी देशो ने भी अपने सीिमत केत मे ही नही, संसार की अनेक भाषाओं मे अपने मंतवय को पकािशत
िकया है। सरकारे अपनी-अपनी नीितयो का सपषीकरण करने के िलए पचार पकाशन पर एक बडी रािश खचर कर रही
है। यह न तो अकारण है और न अनावशयक। अब लोक मानस इतना समथर हो गया है िक उसे साथ िलए िबना
बहु संखयक लोगो का समथर न पाप करना संभव ही नही रहा है। युग पिरवतर न पिकया उपरोक सभी केतो से बढकर है।
उसका सीधा संबंध संसार के ६०० करोड मनुषयो के साथ जुडता है। यिद िवशाल समुदाय मे नवयुग के पित
उतसुकता, शदा एवं पयतनपरायणता उतपन न की जा सकी, तो िपछडापन िचरकाल तक अपनी हथकिडयाँ, बेिडयाँ
कसे ही रहेगा।

दभ
ु ारगय से संसार मे अभी एकता-समता को अपनाने के िलए अिधक उतसाह नही उपजा है। इस संदभर मे
भाषाओं की िभनता कोढ मे खाज की तरह है। कोई एक भाषा ऐसी नही िजसका अवलंबन लेकर िवशव मानव तक
उजवल भिवषय के संदेश एवं आलोक को पहु ँचाया जा सकना संभव हो सके। ऐसी दशा मे िविभन भाषा-भाषी केतो के
िलए उनही के अनुरप भाषाओं का आशय लेकर, उसी सतर का पकाशन आवशयक हो जाता है।
अब लोक चेतना को िदशा देने के िलए कुछ और सशक माधयम अपनी पचंड शिक का पिरचय देने लगे है।
इनमे से एक है िसनेमा-िफलम वयवसाय। इसी का दस
ू रा छोटा भाई अभी और जनमा है, वह है वीिडयो। इनके दारा
दशय और शवय दोनो माधयमो ने लोक चेतना को असाधारण रप से पभािवत िकया है। इनकी पहु ँच सािहतय केत से
कम नही रही, वरन वे और भी अिधक बढ गई है। इनका लाभ संसार की एक ितहाई िशिकत जनता ही नही उठाती,
वरन शेष दो ितहाई अिशिकत जनता भी संपकर मे आती और पभाव गहण करती है।
सरकारो के कबजे मे दरू दशर न और रेिडयो दोनो आ गए है। वे अपने मतलब की जानकािरयाँ तो जनता तक
पहु ँचाते ही है, साथ ही ऐसा बहु त कुछ घुला-िमला देते है, जो कामुकता जैसी दषु पवृितयो को मनोरंजन का नाम देकर
दशर को के गले उतार देता है। यह दोनो समथर साधन युग चेतना के अनुरप चल सकते है, इसकी आशा तो िफलहाल
नही की जा सकती है, पर इनके और भी दस
ू रे सुलभ संसकरण इस िसथित मे है िक उनका उपयोग जन सतर के
समथर संगठनो दारा िकया जा सके।
टेप और टेप िरकाडर र दारा रेिडयो की एक छोटी सीमा तक आवशयकता पूरी की जा सकती है। िफलमे बनाने
वाले यिद कुछ साहस करे, तो वे भी िवचार कांित की महती आवशयकता मे अपना कुछ कहने लायक योगदान दे
सकते है। िफर उसका छोटा भाई वीिडयो भी अब इस योगय हो सकता है िक अपने दबु ले पैरो और पंखो दारा िकसी
पकार िघसटते-िघसटते जन समुदाय के एक बडे भाग तक अपना पभाव पहु ँचा सके। यिद संभव हो तो समथर वयिक
इन दोनो माधयमो को भी इतना सरल और ससता बना सकता है िक जन-जन तक उनकी पहु ँच हो सके और समय
की माँग को पूरा करने मे वे दोनो कुछ कहने लायक बडी भूिमका िनभा सके। गामोफोन िरकाडर र उदोग और सलाइड
पोजेकटर अब समय से पीछे पड गए है, पर जहाँ तक पचार माधयमो का संबंध है, वहाँ उनको भी िपछडे केतो मे और
िपछडे समुदायो मे अपनी भूिमका िनभाते रहने मे अभी भी उपयोगी बनाया जा सकता है।
कभी जनशिक के सहारे चलने वाले पचार पयोजन भी गाँव-गाँव पहु ँचते और लोक रंजन के साथ-साथ लोक
मंगल का काम भी अचछी तरह करते थे। उनसे आजीिवका भी िमल जाती थी और लोक रंजन के साथ-साथ
लोकमंगल का पचार कायर भी बहु त हद तक हो जाता था, पर बढती हु ई यांितक सभयता के कारण उनका आधार
लडखडा गया है।
राम लीला, रास लीला, नौटंकी, संगीत मंडिलयो, कठपुतिलयो आिद के दारा कुछ समय पूवर तक बडा काम
होता रहता था और हजारो लोगो को आजीिवका िमलती थी, पर अब गामोदोगो की तरह उनहे भी उपेका का भाजन
बनना पड रहा है। एक पकार से उनका अिसततव ही िमटता जा रहा है। गाँवो मे लगने वाली हाटे अपने थोडे से
उदोगो को असाधारण रप से पोतसािहत िकया करती थी, पर इन िदनो की पिरिसथितयो को देखते हु ए कुछ कहा
नही जा सकता है िक इन सब का भिवषय कया है ? िफर भी यिद गितशील पितभाएँ कुछ पयतन करे, तो यह भी हो
सकता है िक वे माधयम, कुछ सुधरे हु ए रप से िनवारह करने लगे।
बडे माधयम िजनके हाथ नही है, वे भी अपने संपकर केत मे िवचार िविनमय का कोई न कोई रासता िनकाल
सकते है। नाटक, अिभनय, लोक नृतय आिद की सही वयवसथा न बन पडे, तो इतना तो हो ही सकता है िक अपने से
छोटो को िकससे-कहािनयाँ सुनाकर, आदशर जनो के जीवन चिरत सुनाकर, उन पर गीत बनाकर, खंजरी जैसे छोटे
वादो के सहारे उनहे जगह-जगह सुनाते रहने का कम अपनाया जाए। आठवे दजे का िवदाथी छोटे दजे के छातो को
बहु त कुछ पढाने-िसखाने की सहायता तो कर ही सकता है। बडो को न सही छोटो को आदशर वादी पेरणाएँ देते रहने
की दिष से तो हम सभी उपयोगी िसद हो ही सकते है।

तीथर याता का आदशर
दिकण अफीका से जब गाँधी जी भारत लौटे और उनहोने देश सेवा मे लगने की इचछा वयक की, तो गोखले
जी ने उनहे पथम परामशर िदया िक पहले एक बार समूचे देश की याता कर लेैे और यह जाने िक लोगो की

पिरिसथितयाँ कया है। गाँधी जी सहमत हो गये । दौरे पर िनकले और देश के िपछडेपन का दशय देखकर मन मे एक
कसक लेकर वापस लौटे। कुछ मिहलाओं क ैो आधी धोती पहन कर नहाते और दस
ू रा पला सुखा कर पहनते
देखा, तो वे उस गरीबी पर दिवत हो उठे और उसी िदन से उनने आधी धोती पहनने और ओढने का वत िलया।
खुशहाली के वातावरण मे रहने और चैन की िजंदगी िबताने वालो को यह पता ही नही िक देशवासी िकस
िसथित मे रह रहे है और पडोिसयो के पित िजममेदारी िनभाने का कया अथर होता है ? यह जानकारी देशाटन से ही
पतयक अनुभव मे आती है ।
‘‘िपकिनक’’ मन हलका करने का एक अचछा मनोरंजन माना जाता है। सभय समुदाय के लोग इसे अतयनत
पभावशाली और साथर क िवनोद मानते है। पयर टन के िलए सरकारी महकमे भी अपने कमर चािरयो को, िवदािथर योअधयापको को छुटी देते है; तािक वे नई ताजगी लेकर वापस लौट सके और भिवषय मे अिधक उतसाहपूवरक काम कर
सके।
पुरातन काल मे उस पिकया के साथ धािमर कता भी जोड दी जाती थी। जो जतथे पवास पर िनकलते , वे
रासते मे नारे लगाते, गीत गाते और दीवालो पर आदशर वाकय िलखते जाते थे। जहाँ ठहरने का िनधाररण होता था,
वहाँ पूवर सूचना िभजवा दी जाती थी तािक सथानीय लोग एकितत होकर तीथर याितयो मे से जो वका, गायक धमर सेवी
होते थे, उनके पवचन सुनकर अपनी जीवन शैली मे आवशयक पिरवतर न, सुधार कर सके।
तीथर याताएँ वाहनो से नही होती थी, उनके िलए पैदल ही चलना पडता था। अभी भी बज-चौरासी कोस,
पयाग की पाँच-कोसी पिरकमा, नमर दा पिरकमा आिद के िलए पैदल ही िनकलते है, तािक याती अनुभव संपादन,
पारसपिरक पिरचय एवं सवासथय संवधर न की ितिवध पिकया से लाभािनवत हो सके । अब पैदल चलने और कंधे पर
आवशयक सामान लादकर चलने का पचलन नही रहा, तो साइिकल का इसतेमाल िकया जा सकता है। वह भी पैरो
की शिक से चलती है, पर समय बचत करती है, जन संपकर भी संभव बनाती है।
इन िदनो लोग रेल-मोटरो मे दौड लगाते, िकसी देवता की पितमा का दशर न करते और जलाशयो मे डु बकी
लगाकर वापस लौट आते है। बडे मंिदर देखने का िवशेष आकषर ण रहता है, जो पाय: बडे नगरो मे ही िविनिमर त होते
है, जबिक असली भारत देहातो मे रहता है। वही की समसयाएँ देश की समसयाएँ है। वही की पगित से देश के
पगितशील होने की आशा की जाती है। इसिलए तीथर याताएँ पैदल की जाती थी। कम समय खाली होने पर
तीथर याती अपने आस-पास का ही पवास कम बना लेते थे। उसी मागर मे आने वाले छोटे-बडे देवालयो, नदी, सरोवरो
पुरातन वृको, उदानो का दशर न करके अपनी धमर िजजासा पूरी करते थे।
िजनके पास अिधक समय होता था, वे मँझोले तीथो ं मे चलते रहने वाले धमर -सममेलनो मे योजनाबद
पिशकण और साथ ही जुडे हु ए साधना कम को भी संपन कर लेते थे। छोटे -बडेैे देवालय पाय: हर गाँव मे होते थे।
उनमे इतनी जगह भी सुरिकत रहती थी िक तीथर याितयो की कई टोिलयाँ आए, तो वहाँ सुखपूवरक िनवास कर सके;
सथानीय लोग उन तक पहु ँचकर अपनी िजजासा का समाधान कर सके।
देवालयो मे दान-दिकणा एवंैं अन शदालु लोग पहु ँचाते रहते थे। उससे सथानीय कायर कतार , पुजारी का
िनवारह तो चल ही जाता था, तीथर याितयो को भी बनाने-खाने की कचची सामगी िमल जाती थी। इस आधार पर
छोटे-बडे सभी केतो को तीथर -याितयो दारा दी गई पेरणाओं का लाभ िमलता रहता था।
बडे मंिदर पाय: बडे शहरो मे ही बने हु ए है। वहाँ रेल, मोटरो से दौडे जाने, िघच-िपच बढाने, धकके खाने से
िकस पकार धमर -लाभ िमल सकता है, यह समझ से बाहर की बात है। िजसके साथ धमर -पचार जुडा हु आ न हो,
उसके दारा िकसे, िकस पकार धमर लाभ िमलेगा? जहाँ कमबद साधनाएँ , िशकण, सतसंग की वयवसथा न हो, उन
देवालय केतो मे कया िकसी को कुछ लाभ िमलेगा?
गंगाजल की काँवर कंधे पर रखकर अपने िनकटवती िशवालय पर चढाने और रासते को पैदल पार करते हु ए
मागर मे पेरक भजन गाते चलने का िरवाज अभी भी बहु त जगह है। इस आधार पर पुरातन परंपरा के पीछे सिनिहत
उदेशयो का तो समरण आता ही है। यह कम पितमाएँ झाँकते िफरने, डु बकी लगाते िफरने और पात-कुपातो से जेब
कटाते िफरने की अपेका कही अिधक उदेशयपूणर है।
शािनतकुञ को तीथर केनद मानकर िविभन शाखा केनदो से साइिकल टोिलयाँ चलती रहती है। रासते की
दीवारो पर आदशर वाकय िलखते, िमल-जुलकर गीत गाते, लाउडसपीकरो का पयोग करते, िवशाम सथलो पर सतसंग

समपन करती हु ई, वहाँ पहु ँचती रहती है। िजनसे दरू की याता नही बन पडती, वे अपने समीप ही पाय: एक सपाह का
कायर कम बना लेते है और उस पिरिध मे नव युग के अनुरप नव जीवन का संचार करते है।
अचल तीथर वे है, जो ईटं , चूने, सीमेट जैसे जड पदाथो ं से बने होते है; अपनी जगह िसथर रहते है। लोगो को
उनके दशर -सपशर के िलए जाना पडता है। उनकी मिहमा-गिरमा तो है, पर उनसे अिधक नही, जो जीवंत होते, चलतेिफरते और पाण-चेतना िबखेरने गली-मुहलो मे घर-दारो पर िबना बुलाए ही जा पहु ँचते है। िकसी जमाने मे साधु
बाहण, वानपसथ, पिरवाजक इसी पयोजन को लेकर िनरंतर भमण करते रहते थे और जन-जीवन मे आदशो ं की
पितषापना का शंख बजाते थे। अब लगता है उसका पचलन उठ गया। जडता ने अब अहंकार मे, आलसय-पमाद के
रप मे ऐसी रीित-नीित अपना ली है, िजसमे घर बैठे ही पचुर माता मे सममान, सुिवधा और साधन उपलबध होते रहे।
पतीत होता है िक अचल देवालयो की तुलना मे िजन चल देवालयो का पुणय-पताप असंखय गुना माना जाता है,
उसका किलयुगी पभाव से अिसततव ही उठ गया।
इसे िफर से जीिवत-जागत करने की आवशयकता है, अनयथा िजनमे लंबी दरू ी पार करने और पैसा खचर ने
की सामथयर नही है, वे तीथो ं की धमर -धारणा से वंिचत ही रह जाएँ गे।
िपछले लेखो मे बताया जा चुका है िक वकाओं, गायको के सतर वाले पिरवाजको का अभाव देखते हु ए समय
की माँग पूरी करने के िलए शािनतकुञ ने कुछ नए उपकरण इनही िदनो बनाए है , जो उपरोक आवशयकताओं की पूितर
कर सके। इनके सहारे कोई भी िशिकत-अिशिकत अपने आप को चल तीथर बना सकता है और हाट-बाजारो मे गलीकूचो मे, पाको ं-सडको भीड भरे केतो मे अलख जगाते रहने का िनरंतर कायर कर सकता है। साधु -बाहणो का लगभग
अभाव हो जाने की िसथित मे नैिषक साधको दारा, इन यंतो के सहारे भी सचल-साथर क तीथर याताओं की
आवशयकता पूरी की जा सकती है।
आगामी दस वषर -अित महतवपूणर

पाचीन काल मे सतयुग का वातावरण अनायास ही नही बना रहा था। उसके िलए ऋिषकलप महामानव िवदा
िवसतार के दाियतव को पूरी ततपरता से सँभालते थे। आशमो, तीथो ं, आरणयको, गुरकुलो, मंिदरो जैसे सथानो एवं
कथा-सतसंगो तीथर -याताओं घर-घर अलख जगाने जैसी िवधाओं के माधयम से जन-जन को शेष मानवीय मूलयो से
िवभूिषत िकया जाता था। अधयातम िवदा का अिवरल पवाह हर केत मे बहता रहता था िजसके कारण हर वयिक
आदशो ं को अपनाने तथा उस िदशा मे कुछ कर गुजरने के िलए हु लसता रहता था।
अंतराल मे सदावनाएँ लहराती हो, तो कोई कारण नही िक पाण-चेतना मे उलास भरी उमंगे न उभरे और
उस आकषर ण से पकृित का अनुगह अजस रप से न बरसे, वातावरण मे सुख-शांित के ततव उछलते-उफनते दीख न
पडेगे। सतयुग इनही पिरिसथितयो का नाम था। उसका सृजन उतकृषता की पकधर मन:िसथित ही िकया करती थी।
अगले िदनो सतयुग की वापसी के सरंजाम पूरी तरह संभािवत हो रहे है। उनमे भी पूवरवती सौमय-संपदाओं
का समुिचत समावेश होने जा रहा है। असतु, यह भी सवाभािवक है िक वैसा ही जनमानस बने और उसके िलए
पुरोिहत वगर मे सिममिलत समझे जाने वाले, जनमानस के पिरषकार मे संलग देव-मानवो का एक सशक और बडा वगर ,
िनयंता की िनयित को िशरोधायर करते हु ए आगे आये। उसके िलए जीवंतो और जीिवतो के मन-मानस मे समुद मंथनसतर का हदयमंथन चल रहा है। िवचार-पिरवतर न और दैवी-आहान को सुनने-समझने एवं अपनाने के िलए पवाह बह
रहा है। इन िदनो ऐसे भँवर-चकवात इतनी तेजी से उभर रहे है, िजनहे देखकर समय की पबलता का अनुमान कोई
भी कर सकता है। महाकाल जब करवटे बदलता है, तो ऐसी उलट-पुलट बन पडती है, िजसे देखकर दाँतो तले
अँगुली दबानी पडे। इन िदनो ऐसा ही कुछ हो रहा है-होने वाला है।
समय चक के अंतगर त यो पुनजीवन भी होता रहता है। पर पुनजारगृित के दशय तो आये िदन देखने को िमलते
ही रहते है। रात आते ही लोग सो जाते है और पात:काल नयी सफूितर लेकर सभी उतसाहपूवरक उठ खडे होते है।
पतझड मे पेड ठू ँ ठ बन जाते है, पर बसंत आते ही उनहे नयी किलयो एवं नये फूलो से लदा हु आ देखा जा सकता है।
कुयोग जैसा किलयुग िवगत शतािबदयो मे अपनी िवनाश-लीला िदखाता रहा है। अंत तो उसका होना ही था, हो भी
रहा है। सतयुग की वापसी का इंतजार दसो िदशाएँ उतसुकतापूवरक कर रही है।
युग संिध काल बारह वषर मे ऐसा ही ताना-बाना बुन रहा है। उसने अपना घोसला शािनतकुञ मे बनाया है।

कायर केत तो उनका दुतगामी गरड पकी की तरह दसो िदशाओं मे फैलना िनधारिरत है। इस घोसले मे एक से एक
बढकर अंडे-बचचे उगने, िवकिसत होने और िनिखल आकाश मे पंिकबद उडकर एक सुहावना दशय उतपन करने
वाले है।
वसंत सन् 1990 से लेकर सन् 2000 तक के दस वषो ं मेैे युग चेतना को वहन करने वाले समथर पकधर
िविनिमर त एवं कायर रत होने जा रहे है। पारंिभक िनशचय यह है िक एक वषर मे एक लाख को ढू ँ ढा और पकाया जाय।
सथान की कमी इस कायर मे पधान बाधा थी। आसुरी शिकयाँ सदा से सतपयोजन मे अडचन उतपन करने मे चूकती
नही है। उनही का पकोप इन िदनो भी काम करता दीख पड रहा है, िफर भी गित रके नही, ऐसा उपाय िनकाल िलया
गया है। पाचीन काल मे ऋिषयो की पाठशालाएँ वृको की नीचे , घास-फूस की कुिटयो मे चलाई जाती रही, तो कोई
कारण नही िक इन िदनो वह कायर टीन शेडो मे न चल सके। मँहगी भूिम और इमारती सामान की दिसयो गुनी मँहगाई
को देखते हु ए शािनतकुञ की वतर मान इमारत को ही तीन मंिजल बना िदया गया है। जहाँ कही काम के योगय जमीन
थी, वहाँ टीन शेड खडे कर िदये गये है और ऐसी वयवसथा बना दी गयी है िक एक वषर मेैे एक लाख युग िशिलपयो
का िशकण िकसी पकार चल जाया करेगा।
सथान कम और लकय बडा होने के कारण िशकण सतो को िसकोड कर पाँच िदवसीय बना िदया गया है।
पढने-पढाने मे तो लंबा समय चािहए; पर पाण-पतयावतर न तो थोडे समय मे भी हो सकता है। देविषर नारद कही भी
ढाई घडी से अिधक नही रकते थे; पर इतने मे ही िजस पर भी हाथ रखते थे , उसी को चैतनय कर देते थे।
िवशवािमत ने राम -लकमण को थोडे ही समय मे बला-अितबला िवदाएँ िसखा दी थी। इस दिष से अिभनव 5 िदवसीय
सत-शंखला भी काम चलाऊ पिरणाम पसतुत कर ही सकती है।
एक वषर मेैे एक लाख अथारत्-दस वषर मे दस लाख की िशकण योजना है। साथ ही जो पिशकण पाप करे, उन
सबके िजममे यह दाियतव सौपा गया है िक वे समय दान का कम िनधारिरत गित से चलाते रहे और दस नये अपने
जैसे अपने केत मे लोकसेवी उतपन करे। इस पकार दस वषो ं मे वे दस लाख न रहकर एक करोड की सीमा तक पहु ँच
जायेगे। आशा की गयी है, नैिषको का यह वगर इंजन के रप मे अगिणत िडबबो को अपने साथ घसीटता ले चलेगा
और वह पिरकर इतना बडा हो जाएगा िक सतयुग की वापसी का आधार बन सके। यह िवतान इतने िवसतार मे तन
सके िक िजसकी छत-छाया मे पयारप माता मे नव सृजन के कणर धार आवशयक आशय पाप कर सके।
कहा जा चुका है िक युगसाधना की पूणारहुित अब सन् 1995 और सन् 2000 के दो खंडो मे होगी। इनहे एक
सथान पर न करके 24 सौ िनजी पजापीठो और 24 हजार िबना िनजी इमारतो वाले पजाकेदो मे संपन िकया जाएगा।
हर केद मे सौ से लेकर हजार वेदी वाले दीप यज संपन होगे। इस पकार उनकी संखया भी एक लाख से अिधक हो
जाएगी। एक लाख वेदी के गायती यज और एक करोड साधको की संखया मे चलने वाले 24 करोड जप का यह
महापुरशचरण सिममिलत रप से इतना िवशालकाय होगा िक अब तक के धमारनुषानो मे से इसे अभूतपूवर और सतयुग
की वापसी के पुणय पवर के आगमन का िवशववयापी उदोष कहा जा सके। आशा की गयी है िक इस आयोजन के
संपकर मे आने वालो की संखया भी करोडो-अरबो तक पहु ँचेगी। उनका अपना बदलाव और संपकर केत मे उतपन होने
वाला पिरवतर न इतना सशक होगा िक उस सिममिलत शिक के सहारे नवयुग का अवतरण सवर था साथर क बन पडे
और हम सब इककीसवी सदी के गंगावतरण का-मतसयावतार का-पतयक दशर न अपने ही समय मे कर सकने मे समथर
हो सके।
जो पिरजन इस दल
ु र भ समय का महतव समझ रहे है, वे एक कण भी नष िकए िबना सवयं को अगदत
ू ो की
भूिमका मे पवृत करने को ततपर हो रहे है। नव सृजन की यह बेला अपनी झोली मे असीम शिकयाँ और असाधारण
सौभागय भरे हु ए है। सतपातो को वे अनुदान देने के िलए समय आतुर हो रहा है। इस अवसर का लाभ लेने के िलए
आगे बढकर साहस िदखाने वालो के अिभनंदन-पिशकण के िलए शािनतकुञ पूरी तरह ततपर है।

पसतुत पुसतक को जयादा से जयादा पचार-पसार कर अिधक से अिधक लोगो तक पहु ँचाने एवं पढने के िलए
पोतसािहत करने का अनुरोध है।
- पकाशक

* १९८८-९० तक िलखी पुसतके (कािनतधमी सािहतय पुसतकमाला) पू० गुरदेव के जीवन का सार है- सारे जीवन
का लेखा-जोखा है। १९४० से अब तक के सािहतय का सार है। इनहे लागत मूलय पर छपवाकर पचािरत पसािरत
करने की सभी को छूट है। कोई कापीराइट नही है। पयुक आँ कडे उस समय के अनुसार है। इनहे वतर मान के अनुरप
संशोिधत कर लेना चािहए।

कािनतधमी सािहतय-यु ग सािहतय महता

कािनतधमी सािहतय-युग सािहतय नाम से िवखयात यह पुसतकमाला युगदषा-युगसृजेता पजापुरष पं. शीराम
शमार आचायर जी दारा १९८९-९० मे महापयाण के एक वषर पूवर की अविध मे एक ही पवाह मे िलखी गयी है। पाय:
२० छोटी -छोटी पुिसतकाओं मे पसतुत इस सािहतय के िवषय मे सवयं हमारे आराधय प.पू. गुरदेव पं. शीराम शमार
आचायर जी का कहना था- ‘‘हमारे िवचार, कािनत के बीज है। ये थोडे भी दिु नयाँ मे फैल गए, तो अगले िदनो धमाका
कर देगे। सारे िवशव का नकशा बदल देगे।..... मेरे अभी तक के सारे सािहतय का सार है।..... सारे जीवन का लेखाजोखा है।..... जीवन और िचंतन को बदलने के सूत है इनमे।..... हमारे उतरािधकािरयो के िलए वसीयत है।..... अभी
तक का सािहतय पढ पाओ या न पढ पाओ, इसे जरर पढना। इनहे समझे िबना भगवान के इस िमशन को न तो तुम
समझ सकते हो, न ही िकसी को समझा सकते हो।..... पतयेक कायर कतार को िनयिमत रप से इसे पढना और जीवन
मे उतारना युग-िनमारण के िलए जररी है। तभी अगले चरण मे वे पवेश कर सकेगे। ..... यह इस युग की गीता है। एक
बार पढने से न समझ आए तो सौ बार पढना और सौ लोगो को पढाना। उनसे भी कहना िक आगे वे १०० लोगो को
पढाएँ । हम िलखे तो असर न हो, ऐसा हो ही नही सकता। जैसे अजुरन का मोह गीता से भंग हु आ था, वैसे ही तुमहारा
मोह इस युग-गीता से भंग होगा।..... मेरे जीवन भर के सािहतय इस शरीर के वजन से भी जयादा भारी है। मेरे जीवन
भर के सािहतय को तराजू के एक पलडे पर रखे और कािनतधमी सािहतय को दस
ू रे पलडे पर, तो इनका वजन जयादा
होगा।..... महाकाल ने सवयं मेरी उँ गिलयाँ पकडकर ये सािहतय िलखवाया है।..... इनहे लागत मूलय पर छपवाकर
पचािरत-पसािरत शबदश:-अकरश: करने की सभी को छूट है, कोई कापीराइट नही है। ..... मेरे जान शरीर को मेरे
कािनतधमी सािहतय के रप मे जन-जन तक पहु ँचाने का पयास करे।’’

ॐ ‘‘बेटे ! कािनतधमी सािहतय मेरे अब तक के सभी सािहतय का मकखन है। मेरे अब तक का सािहतय पढ पाओ या
न पढ पाओ, इसे जरर पढना। इनहे समझे िबना िमशन को न तो तुम समझ सकते हो, न ही िकसी को समझा सकते
हो।’’.....
ॐ ‘‘बेटे ! ये इस युग की युगगीता है। एक बार पढने से न समझ आये तो सौ बार पढना। जैसे अजुरन का मोह गीता
से भंग हु आ था, वैसे ही तुमहारा मोह इस युगगीता से भंग होगा।
ॐ ‘‘हमारे िवचार बडे पैने है, तीखे है। हमारी सारी शिक हमारे िवचारो मे समािहत है। दिु नया को हम पलट देने का
जो दावा करते है, वह िसिदयो से नही, अपने सशक िवचारो से करते है। आप इन िवचारो को फैलाने मे हमारी
सहायता कीिजए। हमको आगे बढने दीिजए, समपकर बनाने दीिजए।’’.....
ॐ ‘‘मेरे जीवन भर का सािहतय शरीर के वजन से जयादा भारी है। यिद इसे तराजू के एक पलडे पर रखे और
कािनतधमी सािहतय को (युग सािहतय को) एक पलडे पर, तो इनका वजन जयादा होगा।
ॐ ‘‘आवशयकता और समय के अनुरप गायती महािवजान मैने िलखा था। अब इसे अलमारी मे बनद करके रख दो।
अब केवल इनही (कािनतधमी सािहतय को-युग सािहतय को) िकताबो को पढना। समय आने पर उसे भी पढना।
महाकाल ने सवयं मेरी उँ गिलयाँ पकडकर ये सािहतय िलखवाया है।’’.....

ॐ ‘‘ये उतरािधकािरयो के िलए वसीयत है। जीवन को-िचनतन को बदलने के सूत है इसमे। गुर पूिणर मा से अब तक
पीडा िलखी है, पढो।’’ .....
ॐ ‘‘हमारे िवचार, कांित के बीज है, जो जरा भी दिु नया मे फैल गए, तो अगले िदनो धमाका करेगे। तुम हमारा काम
करो, हम तुमहारा काम करेगे।’’.....
ॐ १९८८-९० तक िलखी पुसतके जीवन का सार है- सारे जीवन का लेखा-जोखा है १९४० से अब तक के
सािहतय का सार है।’’.....
ॐ ‘‘जैसे शवण कुमार ने अपने माता-िपता को सभी तीथो ं की याता कराई, वैसे ही आप भी हमे (िवचार रप मे कािनतधमी सािहतय के रप मे) संसार भर के तीथर पतयेक गाँव, पतयेक घर मे ले चले।’’.....
ॐ ‘‘बेटे, गायती महािवजान एक तरफ रख दो, पजापुराण एक तरफ रख दो। केवल इन िकताबो को पढना-पढाना व
गीता की तरह िनतय पाठ करना।’’.....
ॐ ‘‘ये गायती महािवजान के बेटे-बेिटयाँ है, ये (इशारा कर के) पजापुराण के बेटे-बेिटयाँ है। बेटे, (पुरानो से) तुम सभी
इस सािहतय को बार-बार पढना। सौ बार पढना। और सौ लोगो को पढवाना। दिु नया की सभी समसयाओं का
समाधान इस सािहतय मे है।’’.....
ॐ ‘‘हमारे िवचार कांित के बीज है। इनहे लागत मूलय पर छपवाकर पचािरत पसािरत करने की सभी को छूट है।
कोई कापीराइट नही है।’’.....
ॐ ‘‘अब तक िलखे सभी सािहतय को तराजू के एक पलडे पर रखे और इन पुसतको को दस
ू री पर, तो इनका वजन
जयादा भारी पडेगा।’’.....
ॐ शािनतकुञ अब कािनतकुञ हो गया है। यहाँ सब कुछ उलटा-पुलटा है। सातो ऋिषयो का अनकूट है।’’.....
ॐ ‘‘बेटे, ये २० िकताबे सौ बार पढना और कम से कम १०० लोगो को पढाना और वो भी सौ लोगो को पढाएँ । हम
िलखे तो असर न हो, ऐसा न होगा।’’.....
ॐ ‘‘आज तक हमने सूप िपलाया, अब कािनतधमी के रप मे भोजन करो।’’.....
ॐ ‘‘पतयेक कायर कतार को िनयिमत रप से इसे पढना और जीवन मे उतारना युग-िनमारण के िलए जररी है। तभी
अगले चरण मे वे पवेश कर सकेगे। ’’.....
ॐ वसंत पंचमी १९९० को वं. माताजी से - ‘‘मेरा जान शरीर ही िजनदा रहेगा। जान शरीर का पकाश जन-जन के
बीच मे पहु ँचना ही चािहए और आप सबसे किहयेगा - सब बचचो से किहयेगा िक मेरे जान शरीर को- मेरे कािनतधमी
सािहतय के रप मे जन-जन तक पहु ँचाने का पयास करे।’’.....

कािनतधमी सािहतय की पुस तके :

1 इककीसवी सदी बनाम उजवल भिवषय-भाग १
2 इककीसवी सदी बनाम उजवल भिवषय-भाग २

3 युग की माँग पितभा पिरषकार-भाग १
4 युग की माँग पितभा पिरषकार-भाग २
5 सतयुग की वापसी
6 पिरवतर न के महान कण
7 जीवन साधना के सविणर म सूत
8 महाकाल का पितभाओं को आमंतण
9 पजावतार की िवसतार पिकया
10 नवसृजन के िनिमत महाकाल की तैयारी
11 समसयाएँ आज की समाधान कल के
12 मन: िसथित बदले तो पिरिसथित बदले
13 सषा का परम पसाद-पखर पजा
14 आद शिक गायती की समथर साधना
15 िशका ही नही िवदा भी
16 संजीवनी िवदा का िवसतार
17 भाव संवेदनाओं की गंगोती
18 मिहला जागृित अिभयान
19 जीवन देवता की साधना-आराधना
20 समयदान ही युग धमर
21 नवयुग का मतसयावतार
22 इककीसवी सदी का गंगावतरण

अपने अं ग अवयवो से
(परम पूजय गुरदेव दारा सूकमीकरण से पहले माचर 1984 मे लोकसेवी कायर कतार-समयदानी-समिपर त िशषयो
को िदया गया महतवपूणर िनदेश। यह पतक सवयं परमपूजय गुरदेव ने सभी को िवतिरत करते हु ए इसे पितिदन पढने
और जीवन मे उतारने का आगह िकया था।)

यह मनोभाव हमारी तीन उँ गिलयाँ िमलकर िलख रही है। पर िकसी को यह नही समझना चािहए िक जो
योजना बन रही है और कायारिनवत हो रही है, उसे पसतुत कलम, कागज या उँ गिलयाँ ही पूरा करेगी। करने की
िजममेदारी आप लोगो की, हमारे नैिषक कायर कतारओं की है।
इस िवशालकाय योजना मे पेरणा ऊपर वाले ने दी है। कोई िदवय सता बता या िलखा रही है। मिसतषक और
हदय का हर कण-कण, जरार-जरार उसे िलख रहा है। िलख ही नही रहा है , वरन् इसे पूरा कराने का ताना-बाना भी बुन
रहा है। योजना की पूितर मे न जाने िकतनो का-िकतने पकार का मनोयोग और शम, समय, साधन आिद का िकतना
भाग होगा। मात िलखने वाली उँ गिलयाँ न रहे या कागज, कलम चुक जाये, तो भी कायर रकेगा नही; कयोिक रक का
पतयेक कण और मिसतषक का पतयेक अणु उसके पीछे काम कर रहा है। इतना ही नही, वह दैवी सता भी सतत
सिकय है, जो आँ खो से न तो देखी जा सकती है और न िदखाई जा सकती है।
योजना बडी है। उतनी ही बडी, िजतना िक बडा उसका नाम है- ‘युग पिरवतर न’। इसके िलए अनेक विरषो
का महान् योगदान लगना है। उसका शेय संयोगवश िकसी को भी कयो न िमले।
पसतुत योजना को कई बार पढे। इस दिष से िक उसमे सबसे बडा योगदान उनही का होगा, जो इन िदनो
हमारे कलेवर के अंग-अवयव बनकर रह रहे है। आप सबकी समिनवत शिक का नाम ही वह वयिक है , जो इन पंिकयो
को िलख रहा है।
कायर कैसे पूरा होगा? इतने साधन कहाँ से आएँ गे? इसकी िचनता आप न करे। िजसने करने के िलए कहा है ,
वही उसके साधन भी जुटायेगा। आप तो िसफर एक बात सोचे िक अिधकािधक शम व समपर ण करने मे एक दस
ू रे मे
कौन अगणी रहा?
साधन, योगयता, िशका आिद की दिष से हनुमान् उस समुदाय मे अिकंचन थे। उनका भूतकाल भगोडे सुगीव
की नौकरी करने मे बीता था, पर जब महती शिक के साथ सचचे मन और पूणर समपर ण के साथ लग गए, तो लंका
दहन, समुद छलांगने और पवर त उखाडने का, राम, लकमण को कंधे पर िबठाये िफरने का शेय उनहे ही िमला। आप
लोगो मे से पतयेक से एक ही आशा और अपेका है िक कोई भी पिरजन हनुमान् से कम सतर का न हो। अपने कतृरतव
मे कोई भी अिभन सहचर पीछे न रहे।
काम कया करना पडेगा? यह िनदेश और परामशर आप लोगो को समय-समय पर िमलता रहेगा। काम बदलते
भी रहेगे और बनते-िबगडते भी रहेगे। आप लोग तो िसफर एक बात समरण रखे िक िजस समपर ण भाव को लेकर घर
से चले थे, पहले लेकर आए थे (हमसे जुडे थे), उसमे िदनो िदन बढोतरी होती रहे। कही राई-रती भी कमी न पडने
पाये।
कायर की िवशालता को समझे। लकय तक िनशाना न पहु ँचे, तो भी वह उस सथान तक अवशय पहु ँचेगा, िजसे
अदत
ु , अनुपम, असाधारण और ऐितहािसक कहा जा सके। इसके िलए बडे साधन चािहए, सो ठीक है। उसका भार
िदवय सता पर छोडे। आप तो इतना ही करे िक आपके शम, समय, गुण-कमर , सवभाव मे कही भी कोई तुिट न रहे।
िवशाम की बात न सोचे, अहिनर श एक ही बात मन मे रहे िक हम इस पसतुतीकरण मे पूणररपेण खपकर िकतना
योगदान दे सकते है? िकतना आगे रह सकते है? िकतना भार उठा सकते है? सवयं को अिधकािधक िवनम, दस
ू रो को
बडा माने। सवयंसेवक बनने मे गौरव अनुभव करे। इसी मे आपका बडपपन है।
अपनी थकान और सुिवधा की बात न सोचे। जो कर गुजरे, उसका अहंकार न करे, वरन् इतना ही सोचे िक
हमारा िचंतन, मनोयोग एवं शम िकतनी अिधक ऊँची भूिमका िनभा सका? िकतनी बडी छलाँग लगा सका? यही
आपकी अिग परीका है। इसी मे आपका गौरव और समपर ण की साथर कता है। अपने सािथयो की शदा व कमता घटने
न दे। उसे िदन दन
ू ी-रात चौगुनी करते रहे।

समरण रखे िक िमशन का काम अगले िदनो बहु त बढेगा। अब से कई गुना अिधक। इसके िलए आपकी
ततपरता ऐसी होनी चािहए, िजसे ऊँचे से ऊँचे दजे की कहा जा सके। आपका अनतराल िजसका लेखा-जोखा लेते
हु ए अपने को कृत-कृतय अनुभव करे। हम फूले न समाएँ और पेरक सता आपको इतना घिनष बनाए, िजतना की
राम पंचायत मे छठे हनुमान् भी घुस पडे थे।
कहने का सारांश इतना ही है, आप िनतय अपनी अनतरातमा से पूछे िक जो हम कर सकते थे , उसमे कही
राई-रती तुिट तो नही रही? आलसय-पमाद को कही चुपके से आपके िकया-कलापो मे घुस पडने का अवसर तो नही
िमल गया? अनुशासन मे वयितरेक तो नही हु आ? अपने कृतयो को दस
ू रे से अिधक समझने की अहंता कही छद रप
मे आप पर सवार तो नही हो गयी?
यह िवराट् योजना पूरी होकर रहेगी। देखना इतना भर है िक इस अिग परीका की वेला मे आपका शरीर, मन
और वयवहार कही गडबडाया तो नही। ऊँचे काम सदा ऊँचे वयिकतव करते है। कोई लमबाई से ऊँचा नही होता, शम,
मनोयोग, तयाग और िनरहंकािरता ही िकसी को ऊँचा बनाती है। अगला कायर कम ऊँचा है। आपकी ऊँचाई उससे कम
न पडने पाए, यह एक ही आशा, अपेका और िवशवास आप लोगो पर रखकर कदम बढ रहे है। आप मे से कोई इस
िवषम वेला मे िपछडने न पाए, िजसके िलए बाद मे पशचाताप करना पडे।
-पं ० शीराम शमार आचायर , माचर
1984

हमारा यु ग -िनमारण सतसं क लप
(युग-िनमारण का सतसंकलप िनतय दहु राना चािहए। सवाधयाय से पहले इसे एक बार भावनापूवरक पढना और
तब सवाधयाय आरंभ करना चािहए। सतसंगो और िवचार गोिषयो मे इसे पढा और दहु राया जाना चािहए। इस
सतसंकलप का पढा जाना हमारे िनतय-िनयमो का एक अंग रहना चािहए तथा सोते समय इसी आधार पर
आतमिनरीकण का कायर कम िनयिमत रप से चलाना चािहए। )

1.

हम ईशवर को सवर वयापी, नयायकारी मानकर उसके अनुशासन को अपने जीवन मे उतारेगे।

2.

शरीर को भगवान् का मंिदर समझकर आतम-संयम और िनयिमतता दारा आरोगय की रका करेगे।

3.

मन को कुिवचारो और दभ
ु ारवनाओं से बचाए रखने के िलए सवाधयाय एवं सतसंग की वयवसथा रखे रहेगे।

4.

इंिदय-संयम अथर -संयम समय-संयम और िवचार-संयम का सतत अभयास करेगे।

5.

अपने आपको समाज का एक अिभन अंग मानेगे और सबके िहत मे अपना िहत समझेगे।

6.

मयारदाओं को पालेगे, वजर नाओं से बचेगे, नागिरक कतर वयो का पालन करेगे और समाजिनष बने रहेगे।

7.

समझदारी, ईमानदारी, िजममेदारी और बहादरु ी को जीवन का एक अिविचछन अंग मानेगे।

8.

चारो ओर मधुरता, सवचछता, सादगी एवं सजजनता का वातावरण उतपन करेगे।

9.

अनीित से पाप सफलता की अपेका नीित पर चलते हु ए असफलता को िशरोधायर करेगे।

10.
मनुषय के मूलयांकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योगयताओं एवं िवभूितयो को नही, उसके सिदचारो और
सतकमो ं को मानेगे।

11.

दस
ू रो के साथ वह वयवहार न करेगे, जो हमे अपने िलए पसनद नही।

12.

नर-नारी परसपर पिवत दिष रखेगे।

13.
संसार मे सतपवृितयो के पुणय पसार के िलए अपने समय, पभाव, जान, पुरषाथर एवं धन का एक अंश
िनयिमत रप से लगाते रहेगे।
14.

परमपराओं की तुलना मे िववेक को महतव देगे।

15.

सजजनो को संगिठत करने, अनीित से लोहा लेने और नवसृजन की गितिविधयो मे पूरी रिच लेगे।

16.
राषरीय एकता एवं समता के पित िनषावान् रहेगे। जाित, िलंग, भाषा, पानत, समपदाय आिद के कारण परसपर
कोई भेदभाव न बरतेगे।
17.
मनुषय अपने भागय का िनमारता आप है, इस िवशवास के आधार पर हमारी मानयता है िक हम उतकृष बनेगे
और दस
ू रो को शेष बनायेगे, तो युग अवशय बदलेगा।
18.

हम बदलेगे-युग बदलेगा, हम सुधरेगे-युग सुधरेगा इस तथय पर हमारा पिरपूणर िवशवास है।

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