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गायती महामं त और उसका अथर :
ॐ भूभर व
ु ः सवः ततसिवतुवररणे यं भगो देवसय धीमिह

िधयो यो नः पचोदयात्।

उस पाणसवरप, दःु खनाशक, सुखसवरप, शेष, तेजसवी, पापनाशक, देवसवरप परमातमा को हम अपनी
अंतःकरण मे धारण करे. वह परमातमा हमारी बुिद को सनमागर मे पेिरत करे. -ऋगवेद ३/६२/१०, सामवेद १४६२,
यजुवेद ३/३५, २२/९, ३०/२, ३६/३.

Gayatri Mantra and its meaning:
Om bhurbhuvaha swaha

tatsaviturvarenyam

bhargo devasya dhimahi

dhiyo yo naha prachodayat.
We embrace that supreme being, the effulgent divine sun, the ultimate life force, omnipresent
and omnipotent, the destroyer of all sins and sufferings and the bestower of bliss. May he inspire and
enlighten our intellect to follow righteous path. -Rigveda 3/62/10, Samveda 1462, Yajurveda 3/35,
22/9, 30/2, 36/3.

मिहला जागृि त अिभयान - (कािनतधमी सािहतय पुस तकमाला - 18)

सार-सं के प
माता के रप मे, देवी के रप मे िवधाता की संरचना है- मातृशिक, मिहमाशिक। यह उसका
परमपूजय दैवी रप है। देवतव के पतीको मे सवर पथम सथान नारी का और दस
ू रा नर का है। भाव-संवेदना धमर -धारणा
और सेवा-साधना के रप मे उसी की विरषता को चिरताथर होते देखा जाता है।
मिहला शिक ने िपछले िदनो अनेकानेक तास देखे है। सामंतवादी अंधकार युग से उपजे अनथर ने सब कुछ
उलट-पुलट िदया है। उसे अबला समझा गया और कािमनी, रमणी, भोगया व दासी जैसी िसथित मे रहने को िववश
होना पडा। जो भाव पूजय रहना चािहए था, वही कुदिष के रप मे बदल गया, िकनतु अब पिरवतर न का तूफानी पवाह
इस आधी जनशिक को उबारने हेतु गित पकड चुका है। पिशचम के नारी-मुिक आं दोलन (िवमन िलब) से अलग यह
मिहला शिक के जागरण की पिकया दैवी चेतना दारा संचािलत है, पर बुिद की आकांका के अनुरप ही चल रही है।
महापिरवतर न की बेला मे जब सतयुग की वापसी की चचार हो रही है, तो गायती पिरवार ही नही, सारे िवशव मे इस
आधी जनशिक के उठ खडे होने एवं िवशव रंगमंच के हर दशय-पटल पर अपनी महती भूिमका िनभाते देखा जा
सकेगा। िशका एवं सवावलंबन रपी िविवध कायर कम के माधयम से मिहला-जागरण की, उसके पौरोिहतय से लेकर युग
नेतृतव सँभालने तक की, जो संभावनाएँ वयक की जा रही है, िमथया नही है।

अनुक मिणका

1. नारी का परमपूज य दै व ी रप
2. नारी-जीवन के द ुि दर न और द ुदर शा
3. पिरवतर न का तूफ ानी पवाह
4. नई शताबदी-नारी शताबदी
5. भारत अगणी था-अगणी रहे ग ा
6. ये बं ध न अब टू टने ही चािहए
7. समय की नबज पहचानी जाए
8. दामपतय की गिरमा भुल ाई न जाए
9. द ुि शचं त न हटाएँ -सृज न अपनाएँ
10. दो बडे कदम-िशका और सवावलं ब न
11. नारी-अवमूल यन को रोका जाए
12. एकता और समता का सुय ोग बने
13. पजनन पर तो रोक लगे ही

नारी का परमपूज य दे व ी रप
जीवसृिष की संरचना िजस आिदशिक महामाया दारा संपन होती है, उसे िवधाता भी कहते है और माता
भी। मातृशिक ने यिद पािणयो पर अनुकंपा न बरसाई होती, तो उसका अिसततव ही पकाश मे न आता। भू््रण की
आरंिभक िसथित एक सूकम िबंद ु मात होती है। माता की चेतना और काया उसमे पवेश करके पिरपकव बनने की
िसथित तक पहु ँचाती है। पसव-वेदना सहकर वही उसके बंधन खोलती और िवशव-उदान मे पवेश कर सकने की
िसथित उतपन करती है। असमथर -अिवकिसत िसथित मे माता ही एक अवलंबन होती है, जो सतनपान कराती और
पग-पग पर उसकी आवशयकताओं की पूितर करती है। यिद नारी के रप मे माता समय-समय पर िचत-िविचत पकार
के अनुगह न बरसाती तो मनुषय ही नही, िकसी भी जीवधारी की सता इस िवशव-बहाणड मे कही भी दिषगोचर न
होती, इसिलए उसी का जीवनदाियनी बहचेतना के रप मे अिभनंदन होता है। वेदमाता, देवमाता व िवशवमाता के रप
मे िजस ितपदा की पूजा-अचर ना की जाती है, पतयकत: उसे नारी ही कहा जा सकता है।
मनुषय के अितिरक पितभावान पािणयो मे देव-दानवो की गणना होती है। कथा है िक वे दोनो ही िदित और
अिदित से उतपन हु ए। सृजनशिक के रप मे इस संसार मे जो कुछ भी सशक, संपन, िवज और सुंदर है, उसकी
उतपित मे नारीततव की ही अहं भूिमका है, इसिलए उसकी िविशषता को अनेकानेक रपो मे शत-शत नमन िकया
जाता है। सरसवती, लकमी और काली के रप मे िवजान का तथा गायती-सािवती के रप मे जानचेतना के अनेकानेक
पको का िववेचन होता है।
देवतव के पतीको मे पथम सथान नारी का और दस
ं र
ू रा नर का है। लकमी-नारायण उमा-महेश शची-पुरद
सीता-राम राधे-शयाम जैसे देव-युगमो मे पथम नारी का और पशचात नर का उलेख होता है। माता का कलेवर और

संसकार बालक बनकर इस संसार मे पवेश पाता और पगित की िदशा मे कदम बढाता है। वह मानुषी दीख पडते हु ए
भी वसतुत: देवी है। उसके नाम के साथ पाय: देवी शबद जुडा भी रहता है। शेष एवं विरष उसी को मानना चािहए।
भाव-संवेदना धमर -धारणा और सेवा-साधना के रप मे उसी की विरषता को चिरताथर होते देखा जाता है।
पित से लेकर भाई और पुत तक को, उनकी रिच एवं माँग के अनुरप वही िविभन रपो से िनहाल करती है।
वयवहार मे उसे तुिष, तृिप और शांित के रप मे अनुभव िकया जाता है। आितमक केत मे वही भिक, शिक और समृिद
है। उसका कण-कण सरसता से ओत-पोत है। इनही रपो मे उसका वासतिवक पिरचय पाप िकया जा सकता है। नर
उसे पाकर धनय बना है और अनेकानेक कमताओं का पिरचय देने मे समथर हु आ है। इस अहैतुकी अनुकंपा के िलए
उसके रोम-रोम मे कृतजता, शदा और आराधना का भाव उमडते रहना चािहए। इस कामधेनु का जो िजतना अनुगह
पाप कर सकने मे सफल हु आ है उसने उसी अनुपात मे पितभा, संपदा, समथर ता और पगितशीलता जैसे वरदानो से
अपने को लाभािनवत िकया है। ततववेता अनािदकाल से नारी का ऐसा ही मूलयांकन करते रहे है और जन-जन को
उसकी अभयथर ना के िलए पेिरत करते रहे है। शिकपूजा का समसत िविध-िवधान इसी मंतवय को हदयंगम कराता है।
िवकासकेत मे पवेश करते हु ए हर िकसी को इसी के िविभन रपो की साधना करनी पडी है। शदा, पजा,
िनषा, कमता, दकता, कला, कुशलता और दरू दिशर ता के रप मे उसी महाशिक के सूकम सवरप का वरण िकया जाता
है। साधना से िसिद की परंपरा इसी आधार पर पकट होती रही है। संसार मे सभयता और समझदारी वाले िदनो मे
नारी को उसकी गौरव-गिरमा के अनुरप जन-जन का भाव-भरा सममान भी िमलता रहा है-तदनुरप सवर त सतयुगी
सुख-शांित का वातावरण भी दिषगोचर होता रहा है।

नारी-जीवन के द ुि दर न और द ुदर शा
कभी-कभी भटकाव के दिु दर न भी आते और अपनी पकृित के अनुरप अनेकानेक तास भी देते है।
मधयकालीन सामंतवादी अंधकार युग मे ऐसा कुछ अनथर उपजा िक सब कुछ उलट-पलट हो गया-िसर नीचे और पैर
ऊपर जैसे िविचत दशय देखने को िववश होना पडा, नारी की मूलसता और आतमा को एक पकार से भुला िदया गया,
उसे अबला समझा गया और कािमनी, रमणी, भोगया व कीतदासी जैसी िघनौनी िसथित मे रहने योगय ठहराया गया।
ितरसकृत, शोिषत, संतसत और पददिलत िसथित मे रखे जाने पर हर िवभूित को ददु र शागसत होना पडता है। वही नारी
के संदभर मे भी हु आ। पूजय भाव कुदिष के रप मे बदला और उसे वासना की आग मे झोककर कलपवृक को काला
कोयला बनाकर रख िदया गया।
मधयकाल मे नारी पर जो बीती, वह अतयाचारो की एक करण कथा है-उसे मनुषय और पशु की मधयवती
एक इकाई माना गया, मानवोिचत अिधकारो से वंिचत करके उसे िपंजडे मे बंद पकी की तरह घर की चहारदीवारी मे
कैद कर िदया गया, कनया का जनम दभ
ु ारगय का सूचक और पुत का जनम रतनवषार की तरह सौभागय का सूचक माना
जाने लगा, लडकी-लडको के बीच इतना भेदभाव और पकपात चल पडा िक दोनो के बीच िशका, दल
ु ार एवं सुिवधासाधनो की असाधारण नयूनािधकता देखी जाने लगी। अिभभावक तक जब ऐसे अनीित बरते तो िफर बाहर ही उसे
कौन शेय और सममान पदान करे-ससुराल पहु ँचते-पहु ँचते उसे रसोईदािरन, चौकीदािरन, धोिबन, सफाई करने वाली
और कामुकता-तृिप की साधन-सामगी के्े रप मे पयुक िकया जाता रहा, दस
ू रे दरजे की नागिरक ठहराया गया,
अनीित के िवरद मुँह खोलने तक पर पितबंध लग गया।
दोनो के िलए अलग-अलग आचार-संिहताएँ चली-सी के िलए पितवत अिनवायर और पुरष के िलए पतनीवत
का कोई अनुबंध नही, सी के िलए घूँघट आवशयक, पर पुरष के िलए खुले मुँह घूमने की छूट, िवधवा पर अनेक
पितबंध और िवधुर के िलए कई िववाह कर लेने की सवतंतता, िववाह मे दहेज की वसूली कम िमलने पर लडकी का
उतपीडन, जलदी बचचे न होने पर दस
ू रे िववाह की तैयारी, आिथर क दिष से सवर था अपंग तथा नागिरक अिधकारो से
वंिचत करने जैसी अनीितयो से नारी को पग-पग पर सताया जाने लगा, फलत: वह कमश: अपनी सभी िवशेषताएँ
गँवाती ही गई। िजनमे रप-सौदयर है, उनहे पसंद िकया जाता है। और जो औसत सतर की साधारण है , उनहे कुरप
ठहराकर िववाह के िलए वर ढू ँ ढना तक मुिशकल पड जाता है। और भी ऐसे िकतने ही पसंग है, िजन पर दिषपात
करने से पतीत होता है िक एक वगर ने दस
ू रे वगर पर िकतना पितबंध और अनाचार लादा है। नारी को पगित के िलए
िजस पगितशील वातावरण की आवशयकता है, उसके सभी दार बंद है।
भारत जैसे िपछडे देशो मे नारी की अपनी तरह की समसयाएँ है और तथाकिथत पगितशील कहे जाने वाले
संपन देशो मे दस
ू रे पकार की। संसार की आधी जनसंखया को ऐसी किठनाइयो का सामना करना पडता है, िजनहे
यिद आडे न आने िदया गया होता तो नारी सदा की भाँित अभी भी नर की असाधारण सहाियका रही होती, पर उस
दभ
ु ारगय को कया कहा जाए, िजसने आधी जनशिक को पकाघात-पीिडत की तरह अपंग और असाधय जैसी िसथित मे
मुशके कसकर सदा कराहते और कलपते रहने के िलए बाधय कर िदया है। बाँधने और दबोचने की नीित ने अपनी
पितिकया पकट करने से हाथ रोका नही है। बाँधने वाले को भी साथ-साथ अपने कुकृतयो का दंड भुगतने के िलए
बाधय कर िदया है-साथी को असमथर बनाकर रखने वालो को उसका भार भी वहन करना पडेगा। ऐसी कुछ सहदयता
कहाँ बन पडेगी, िजसमे एक और एक अंक समान पंिक मे रखे जाने पर ११ बन जाते है। एक को ऊपर व एक को
नीचे रखकर घटा देने पर तो शूनय ही शेष बचता है। िपछडेपन से गसत नर और नारी दोनो ही इन िदनो शूनय जैसी
दयनीय िसथित मे रहने के िलए बाधय हो रहे है।
पिरवतर न का तूफ ानी पवाह
सषा को औिचतय और संतुलन ही पसंद है। वह उदंडता को लंबे समय तक सहन नही करता। अवांछनीयता
लं्ंबे समय तक फलती-फूलती िसथित मे नही रह सकती। संवयाप संतुलन-वयवसथा अपने ढंग से, अपने समय पर,
अपने सुधारकम का पिरचय देती है। उसने सदा उलटे को उलटकर सीधा करने एवं सुवयवसथा को जीवंत रखने के
िलए पबल पयतन िकया है। अनीित की असुरता ने समय-समय पर िसर उठाया है, पर उसका आतंक सदा-सवर दा
िसथर नही रह सकता है। कुकुरमुते लंबी आयुषय लेकर नही जनमते। अनाडी-असंतुलन को कुछ ही समय मे
औिचतय के सामने हार माननी पडी है।

इन िदनो कुछ ऐसे ही पिरवतर न हो रहे है। सामंतशाही धराशायी हो गई। राजमुकुट धूिमल-धूसिरत हु ए दीख
पडते है। जमीदारी और साहू कारो के पचलन समाप हो गए। अब दास-दािसयो को पकडे और बेचे-खरीदे जाने का
पचलन कहाँ है? सैकडो रखैल कैद रखने वाले ‘हरम’ अब मुिशकल से कही ढू ँ ढे िमलते है। सती-पथा अब कहाँ है?
छूत-अछूत के बीच जैसा भेदभाव कुछ दशाबदी पहले चला था, अब उसमे िकतना अिधक पिरवतर न हो गया है।
आशचयर जनक पिरवतर नो की शंखला मे अब एक-एक करके अनेक किडयाँ जुडती चली जा रही है। राजकांितयो और
सामािजक कांितयो का िसलिसला अभी भी रका नही है। इसमे मानवीय पुरषाथर का भी अपना महतव जुडा रहा है ,
पर कुछ ही िदनो मे इतने केत मे इतनी बडी उलट-पलट हो जाने के पीछे सषा के अनुशासन को भी कम महतव नही
िदया जा सकता। तूफानी अंधडो मे रेत के टीले उडकर कही-से-कही जा पहु ँचते है, चकवातो के फेर मे पडे पते और
ितनके आकाश चूमते देखे जाते है, यह समथर के साथ असमथर के जुड जाने की पतयक पिरणित है।
इककीसवी सदी महापिरवतर नो की वेला है। इसके पूवर के बारह वषर युगसंिध के नाम से िनरिपत िकए गए है।
इस अविध मे सूकमजगत् की िविध-वयवसथा बहु त बडे पिरवतर नो की रपरेखा बना गई है और महतवाकाँकी योजनाएँ
िविनिमर त कर ली गई है। उसका लकय सतयुग की वापसी का रहा है। ऋिष-परमपराएँ देव-परमपराएँ और महामानवो
दारा अपनाए जाते रहे दिषकोण, पचलन और िनधाररण अगले ही िदनो िकयािनवत होने जा रहे है। लंबे िनशाकाल से
सवर त छाया हु आ अंधकार अब अपने समापन के अित िनकट है। उषाकाल का उदव हो रहा है और अरणोदय का
पिरचय िमल रहा है। इस पभातपवर मे बहु त कुछ बदलना, सुधरना और नए िसरे से नया िनमारण होना है। इसी संदभर
मे एक बडी योजना यह संपन होने जा रही है िक नारी का खोया वचर सव उसे नए िसरे से पाप होकर रहेगा। वह सवयं
उठे गी, अवांछनीयता के बंधनो से मुक होगी और ऐसा कुछ कर गुजरने मे समथर होगी, िजसमे उसके अपने समुदाय,
जनसमाज और समसत संसार को नयाय िमलने की संभावना बने और उजवल भिवषय की गितिविधयो को समुिचत
पोतसाहन िमले। इककीसवी सदी नारी सदी के नाम से पखयात होने जा रही है। उस वगर के उभरने से उसे अपने
महान् कतर वय का पिरचय देने का अवसर िमलेगा।
भूतकाल के नारीरतनो का समरण करके यह आशा बलवती होती है िक समय की पुनरावृित िकतनी सुखद
होगी? कंु ती के पाँच देव-पुत जनमे थे। मदालसा ने योगी पुतो को व गंगा ने वसुओं को जनम िदया था। सीता की गोदी
मे लव-कुश खेले थे और शकंु तला ने आशम मे रहकर चकवती भरत का इचछानुरप िनमारण िकया था। अनुसूया के
आँ गन मे बहा, िवषणु, महेश बालक बनकर खेले थे। उनही ने मंदािकनी को सवगर से िचतकूट मे उतारा था। अरंधती
आिद सपऋिषयो की धमर पितनयाँ उनकी तपशचयार को अिधकािधक सफल-समथर बनाने मे विरष साथी की भूिमका
िनभाती रही थी। शतरपा ने मनु की पितभा को िवकिसत करने मे असाधारण योगदान िदया था। इला अपने िपता के
आयोजनो मे पुरोिहत का पद सँभालती थी। वैिदक ऋचाओं के पकटीकरण मे ऋिषयो की तरह ही ऋिषकाओं ने
अपनी िवदता का पिरचय िदया था। दशरथ सपतनीक देवताओं की सहायता के िलए लडने गए थे।
मधयकाल मे रानी लकमीबाई ने मिहलाओं की िवशाल सेना खडी करके एक अनुपम उदाहरण पसतुत िकया
था। सवतंतता संगाम मे मिहला वगर ने िजतना समथर योगदान िदया था, उसे देखकर भारत ही नही, संसार भर के
मूधरनयो को चिकत रह जाना पडा था। उनमे से अनेक पितभाएँ ऐसी थी, जो िकसी भी िदगगज समझे जाने वाले पुरष
की तुलना मे कम नही थी। भारत का इितहास ऐसी मिहलाओं के वयिकतव और कतृरतव से भरा पडा है , िजस पर
दिषपात करने से पतीत होता है िक उस काल का मिहला-समुदाय िकतना समथर और यशसवी रहा होगा।
नई शताबदी-नारी शताबदी
अंधकार युग से उभरकर अनेक सतपवृितयो की तरह नारी भी अब नए िसरे से अपने वचर सव का पिरचय देने
के िलए ऊपर आ रही है। इसे कलपना या संभावना नही, वरन सुिनिशचत भिवतवयता ही समझना चािहए।
िवदेशो मे यह कम पहले से ही चल पडा है। समुनत देशो मे नारी का पवेश उन सभी केतो मे है , िजनमे िक
पुरष अपने पुरषाथर का पिरचय देते रहे है। अमेिरका, जापान, जमर नी, रस आिद की मिहलाएँ राजनीित से लेकर
वैजािनक और आिथर क केत मे कांितकारी कायर कर रही है। उनकी समाजसेवा भी ऐसी है, िजसके िलए मुक कंठ से
पशंसा की जा सकती है। मांटेसरी की िशका कांित, फलोरेस नाइिटंगेल का रेडकॉस आं दोलन, मैडम कयूरी के
वैजािनक अनुसंधान, मदर टेरस
े ा की दिरदो के पित करणा व मेरी सटोप का पिरवार-िनयोजन कायर कम ऐसी
उपलिबधयाँ है, िजनका िचरकाल तक भावभरा समरण होता रहेगा। राजनीित के केत मे इंिदरा गाँधी, गोलडामायर,
मागेरट
े थेचर, भंडार नायके, कोरा एकवीनो आिद का नाम हर िकसी की जबान पर रहा है। बेनजीर भुटो ने पािकसतान
मे हेरोइन तसकरो के िवरद अपने ढंग की जंग छे डी। जापान मे तो कमाल ही हु आ है। वहाँ की एक मिहला टाकोका

डोई ने जनमानस पर अपनी ऐसी छाप छोडी िक पहले टोिकयो असेबली के चुनाव मे तथा उसके बाद पूरे जापान के
चुनावो मे मिहला पधान पजातांितक पाटी को बहु मत िदलाकर ही छोडा। संसार भर मे मिहलाएँ अपने वचर सव के ऐसे
पमाण-पिरचय दे रही है, िजनहे देखते हु ए उन पर िकसी भी पकार िपछडेपन का आरोप नही लगाया जा सकता।
यह सब गत शताबदी मे संभव हु आ है। अब, इस उभार मे और अिधक उफान आने की पूरी-पूरी संभावना है।
इसके लकण भी पग-पग पर पमाणो के साथ सामने आ रहे है। उदाहरण के िलए भारत के एक छोटे पांत केरल को
िलया जा सकता है। वहाँ की लडिकयो ने िशका के केत मे अगगामी होकर भारत के अनय सभी केतो को पीछे छोड
िदया है। सकूल मे पवेश पाने के बाद गेजुएट होने से पूवर कोई पढाई बंद नही करती, वरन आगे भी अनेकानेक केतो मे
योगयता बढाने का कम यथावत् बनाए रखती है। मिहलाओं ने आगह पूवरक सरकार से यह कानून पास कराया है िक
२६-२७ वषर से कम की मिहला और २९ वषर से कम आयु का कोई पुरष शादी न कर सके। इन पयासो के तीन
सतपिरणाम सामने आए है-एक तो यह िक पगित-पथ मे पग-पग पर रोडा अटकाने वाली जनसंखया-वृिद संतोषजनक
ढंग से रक गई है। दस
ू रे, वहाँ के िशिकतो ने देश-िवदेश मे आजीिवका पाने मे आशचयर जनक सफलता पाई है। तीसरे ,
पदेश की समृिद मे संतोष जनक अिभवृिद हु ई है। फलत: सरकार ने जनता को खाद-पदाथो ं की कीमतो मे
असाधारण छूट दी है। अपराधो की संखया नाममात को रह गयी है। इन सभी बातो मे नारी समाज के िनजी उतसाह
ने पमुख भूिमका िनभाई है। यो पुरषो ने भी उनके मागर मे कोई बडा अवरोध खडा नही िकया है। केरल की एक
मिहला तो अमेिरकी नौसेना िवभाग मे बडे ऊँचे पद पर रही है।
यह गत शताबदी मे हु ई नारी-पगित की हलकी-सी झलक मात है। यिद िवशव भमण पर िनकला जाय तो
पतीत होगा िक अनेक देशो या केतो मे इस संदभर मे नया उतसाह उभरा है और नारी पगित को देखते हु ए यह िनषकषर
िनकलता है िक यह हवा आगे भी रकने वाली नही है और वह लकय पूरा होकर रहेगा, िजसमे नर और नारी एक
समान का उदोष िकया गया है।

भारत अगणी था-अगणी रहे ग ा
भारत को इस िदशा मे अभी बहु त कुछ करना है। िजस देश की संघिमता और आमपाली अपने सुिवधासाधनो को लात मारकर िवशव के कलयाण के िलए िनकल पडी थी और संसार भर मे बौद मठो की सथापना एवं
संगठन मे असाधारण रप से सफल हु ई थी, उसी देश मे इन िदनो नारी का िपछडापन अभी भी बुरी तरह छाया हु आ
है। देहाती केतो मे तो उसकी िशका और सामािजक िसथित दयनीय सतर की देखी जा सकती है, िफर भी समय का
पिरवतर न इस िपछडे केत मे भी चमतकार पसतुत करने के िलए किटबद हो रहा है और पगितशीलता की नई उमंगे
उभर रही है।
भारत मे पंचायती राज सथािपत होने की भूिमका बनाई गई है, साथ ही चुने हु ए पंचो मे नारी को तीस
पितशत अनुपात से चुने जाने की घोषणा हु ई है। आशा की गई है िक वह अनुपात पांतीय और राषरीय सतर पर भी
ऊँची मानयता पाप करेगा। जनजाितयो के आरकण की तरह अनय महतवपूणर भागो और पदो पर भी उनका समुिचत
धयान रखा जाएगा। समय की इस माँग को िकसी के दारा भी झुठलाया नही जा सकता।
बात भले ही शासकीय केतो मे पवेश पाने से आरंभ हो, पर यह पगितकम उतने छोटे केत तक ही सीिमत
होकर नही रह सकता। यह पतीक मात है िक उनकी उपयोिगता समझी जाने लगी। और समुिचत सममान िमलने की
पथा चल पडी है। सुधारने-संभालने के िलए अभी अगिणत केत खाली पडे है। उनहे सुवयविसथत करने की िजममेदारी
नारी के कंधो पर अनायास ही बढती चली आ रही है। सहकार का महतव समझ मे आने लगा है िक टाँग पकडकर
पीछे घसीटने का भौडा खेल हर िकसी के िलए हर दिष से हािनकारक और कषदायक ही हो सकता है।
अगले िदनो नारी सवाभािवक रप से अिधक समथर , कुशल और सुसंसकृत बनने जा रही है। यह उसके
नवजीवन का सविणर म काल है। वषार ऋतु आए और हिरयाली का महतव दीख न पडे , यह हो ही नही सकता। वसंत
का अवतरण हो और पेड-पादपो पर रंग-िबरंगे फूल न िखले, यह हो ही नही सकता, पभात उगे और अंधकार एवं
िनसतबधता का माहौल बना रहे, यह अनहोनी होती दीख पडे, इसकी आशंका िकसके मन मे रहेगी? नारी युग की
अिधषाती, धरती की देवी अपनी गिरमा िसकोडे-समेटे और दबाए-दबोचे बैठी रहे, यह िवपनता कयो, कैसे और कब
तक बनी रह सकती है? समथर ता के साथ-साथ समझदारी भी बढती है और वह अदशय के मागर दशर न मे अभयुदय की
िदशा मे चल पडे, तो उसके दारा उतपन होने वाले चमतकारो से वंिचत ही बने रहना िकस कारण रका रह सकेगा?
नारी के अनुदान कभी भी हलके सतर के नही रहे। उसने धिरती के, ऊजार के, वषार के व पाणवायु के सदश
अपनी िवभूित-वषार से संसार के कण-कण को सरस, सुंदर एवं समुनत बनाया है। करणा, दया, सेवा उसका समपर ण
और उसकी अनुकंपा ही है, जो इस संसार को सुरमय और सुसंसकृत रखे रह पा रही है। अगले िदनो तो उसे अपनी
महता का पिरचय और भी बढ-चढकर देना है। पितकूलता को अनुकूलता मे, पतन को उतथान मे और समसयाओं
का समाधान पसतुत करना अगले िदनो उसी का अगगमय अनुदान होगा।
यह सब कुछ अनायास ही नही हो जाएगा। िनयित चाहे कुछ भी कयो न हो, पर उनके िलए पुरषाथर तो
करना ही पडता है। बुद और गाँधी जैसी देवातमाएँ िवशव-कलयाण के िलए अवतिरत हु ई थी, पर यह लकय अनायास
ही पूरा नही हो गया, उनहे सवयं तथा उनके सहयोिगयो को िनधारिरत लकय तक पहु ँचने के िलए तयाग और साहस भरे
पयतन करने पडे थे। हनुमान और अजुरन महापतापी बनने के िलए जनमे थे। उनहे दैवी अनुगह भी िवपुल पिरमाणो मे
पाप था, पर यह भुलाया नही जा सकता िक उनहे अपने सािथयो सिहत, असाधारण पुरषाथर का पिरचय देना पडा
था-अनायास तो सामने थाली मे रखे भोजन को अपने आप मुँह मे पवेश करते और पेट मे पडकर कुधा-िनवारण
करते नही देखा गया-िफर युग-अवतरण के िलए संभािवत नारी-पुनरतथान भी अपना उिचत मूलय माँगे तो उसमे
आशचयर ही कया है?
पतयकत: तो िशका-सवावलंबन पिरवार-पोषण व कला-कौशल जैसे केतो मे नारी का सहयोग करने भर से
काम चल रहा है। इन कामो मे िवचारवानो से लेकर सरकार तक का सहयोग िमल रहा है। वे नौकिरयो मे भी पवेश
कर रही है। इन लकयो को पगित का नाम भी िमल रहा है। इतने पर भी एक भारी किठनाई अभी भी आ रही है , जो
मानयताओं और पथाओं के रप मे अदशय होते हु ए भी इतना अनथर कर रही है िक उसकी तुलना मे दशयमान
िवकास कायो ं मे होने वाले लाभो को नगणय ही कहा जा सकता है।
ये बं ध न अब टू टने ही चािहए

लोकमानस मे नारी के पित इतनी भांितयाँ, इतनी मूढ मानयताएँ जड पकड गई है िक उनहे ऐसे कुहासे का
पकोप कह सकते है, िजसमे हाथ-को-हाथ नही सूझता। दबु र िु द, समझदारी जैसी लगती है। पिरवतर न इसी केत मे लाये
जाने की आवशयकता है-मानयताओं के अनुरप िचंतन-पवाह चल पडता है, तदनुरप िकया-कलाप और पचलनवयवहार का कम सवत: बन पडता है। िजन िदनो नारी की वरीयता िशरोधायर की जाती थी, और उसे मानुषी कलेवर
मे देवी की मानयता दी जाती थी, तब वह अपनी कमताओं को उभारने और समूची मानव जाित का बहु िवध िहतसाधन करने मे समथर रहती थी। पिरवारो को नररतनो की खदान बना देने का शेय उसी के िजममे आता था। पर जब
उसे उस उचच पद से हटाकर मात पालतू पशु के समतुलय समझा जाने लगा, तो सवाभािवक ही था िक वह अशक,
असुरिकत और पराधीनता के गतर मे अिधकािधक गहराई तक िगरती चली गई।
इन िदनो नारी के पित जो दिषकोण है, उसमे अिभभावक उसे पराये घर का कूडा मानकर उपेका करते और
लडको की तुलना मे कही अिधक िनचले दरजे का पकपात बरतते है। पित की दिष मे वह कामुकता की आग को
बुझाने का एक खरीदा गया माधयम है। उसे कािमनी, रमणी और भोगया के रप मे ही िनरखा, परखा और संतान का
असह भार वहन करने के िलए बाधय िकया जाता है। ससुराल के समूचे पिरवार की दिष मे वह मात ऐसी दासी है ,
िजसे िदन-रात काम मे जुटे रहने और बदले मे िकसी अिधकार या सममान पाने के िलए अनिधकृत मान िलया जाता
है। सपष है, इन बाधय पिरिसथितयो मे रहकर कोई भी मौिलक पितभा को गँवाता ही चला जा सकता है। यही इन
िदनो उसकी िनयित बन गई है। हेय मानिसकता ने ही उसकी विरषता का अपहरण िकया और िफर से न करने के
िलए माँग करने तक मे असह-असमथर बना िदया है। ऐसी दशा मे उसकी उपयोिगता और पितभा का हास होते जाना
सवाभािवक ही है। आधी जनसंखया को ऐसी दयनीय िसथित मे पटक देने पर पुरष भी मात घाटा ही सह सकता है।
समसत संसार को उनके गिरमाजनय अनेकानेक लाभो से वंिचत रहना पड रहा है, िवशेषत: भारत जैसे िपछडे देश के
लोगो के िलए तो यह घाटा िनरंतर उठाते रहना बहु त ही भारी पडता है।
नयाय और औिचतय को उपलबध करने के िलए माँग ही नही, संघषर करने वाले इस युग मे नारी की
यथािसथित बनी रहे, यह हो नही सकता। समय ने अनेक पसंगो मे अनेक सतर के पिरवतर न करने के िलए बाधय कर
िदया है। वह पवाह नारी को यथािसथित मे यथावत् पडे नही रहने दे सकता है। इस पिरवतर न और उतथान की एक
छोटी झलक-झाँकी नारी के अिधकारो को कानूनी िसथित पदान करने से आरमभ हु ई है और उसने सामािजक केत मे
उिचत नयाय िमलने की संभावना का संकेत िदया है। पंचायत चुनाव मे उनके िलए ३० पितशत सथान सुरिकत िकए
गए है। यह सतर पांतीय केदीय शासन सभाओं मे भी पाप होगा। इस आधार पर उमडे हु ए उतसाह ने नर और नारी,
दोनो को पभािवत िकया है। नारी सोचती है, उसे हर दिष से शािसत ही बनी रहने की िववशता को कयो वहन करना
चािहए? जब शासन मे भागीदार बनने के िलए उसे अवसर िमला है, उसे वह गँवाए कयो? और भिवषय मे अपने वगर को
उचचािधकार िदलाने का, सवागत करने का मानस कयो न बनाए? पिरवार के पुरष भी सोचते है िक हमारा कोई
सदसय यिद शासन मे भागीदार बनता है, तो उस आधार पर पूरे पिरवार का सममान और अिधकार बढेगा ही। असतु,
जहाँ सममान-लाभ का पयोग आता है, वहाँ सहज सहमित हो जाती है। वतर मान सुधारो का सवर त सवागत ही िकया
गया है और पयास चल पडा है िक नािरयो को अिधक सुयोगय बनाया जाए तािक वे जनसाधारण की दिष मे
महतवपूणर मानी जाएँ और उनहे मतदान मे भी सफलता िमले।
समय की नबज पहचानी जाए
वसतुत: महाकाल का यह पथम आशवासन है, िजसके पीछे िपछडो को ऊँचा उठाकर समता का धरातल
बनाने के िलए वचनबद रहने का दैवी शिकयो ने आशवासन िदलाया है। लोकमानस भी समय की पचंड धारा के
िवपरीत बने रहने का देर तक दरु ागह नही करता रह सकता। तूफान मजबूत पेडो को भी उखाड फेकता है। घटाटोप
वषार मे छपपरो से लेकर झोपडो तक को बहते देखा जाता है। पानी का दबाव बडे-बडे बाँधो मे भी दरार डालने और
उनहे बहा ले जाने का दशय पसतुत करता है। यह महाकाल की हु क
ं ार ही है, िजसने नारी को िपछडे केत से हाथ
पकडकर आगे बढने के िलए धकेला और घसीटा है। अब यह भी िनिशचत है िक नारी-िशका का दुत गित से िवसतार
होगा। िशका और वयवसथा मे पुरष का ही एकािधकार नही रहेगा। नारी-िशका की पिरवार-पिरकरो से लेकर शासकीय
िशका-िवभाग तक मे समुिचत वयवसथा बनानी होगी। नारी-िशका मात नौकरी िदलाने मे काम आने भर का जाद ू,
फुलझडी बनकर समाप नही हो जाएगी, वरन उसके साथ-साथ समानता और एकता को हर केत मे समान अवसर
पाने, िदलाने की िविध-वयवसथा भी जुडी रहेगी। इस कायर को अधयापक, अधयािपकाएँ करे, नही तो हर िदशा मे
उमडती हु ई पगितशीलता यह कराकर रहेगी िक नारी अपना महतव, मूलय, अिधकार और भिवषय समझे,
अनीितमूलक बंधनो को तोडे और उस िसथित मे रहे, िजससे िक सवतंत वातावरण मे साँस लेने का अवसर िमले।

कहना न होगा िक यही लकय युगचेतना ने भी अपनाया है तथा नर और नारी एक समान का उदोष िनिखल आकाश
मे गुज
ं ायमान िकया है। असहाय रहने और अनुिचत दबाव के नीचे िववश रहने की पिरिसथितयाँ समाप समझनी
चािहए। वे अब बदलकर ही रहने वाली है-कनया जनम पर न िकसी को िवलाप करते देखा जाएगा और न पुत -जनम
पर कही कोई बधाई बजाएगा। जो कुछ होगा, वह दोनो के िलए समान होगा। अगर अपने घर की लडकी पराये घर का
कूडा है तो दस
ू रे घरो का कूडा अपने घर मे भी तो बहू के रप मे गृहलकमी की भूिमका िनभाने की, आने की तैयारी मे
संलग है। िफर भेदभाव िकस बात का? लडकी और लडके मे अंतर िकसिलए? दोनो के मूलयांकन मे नयाय-तुला की
डंडी मारने की मानयता िकस िलए?
नारी की पराधीनता का एक रप यह है िक उसे परदे मे , िपंजडे मे बंदीगृह की कोठरी मे ही कैद रहना
चािहए। इस मानयता को अपनाकर नारी को असहाय, अनुभवहीन और अनुगामी ही बताया जाता रहा है। अबला की
िसथित मे पहँ्ुचने पर वह अब आकांताओं का साहसपूवरक मुकाबला कर सकने की भी िहममत गँवा बैठी है, आडे
समय मे अपना और अपने बचचो का पेट पाल सकने तक की िसथित मे नही रही है। वयवसाय चलाना और ऊँचे पद
का दाियतव िनभाना तो दरू , औसतन पािरवािरक वयवसथा से संबंिधत अनेक कायो ं मे , हाट-बाजार असपताल तथा
अनय िकसी िवभाग का सहयोग पाने के िलए जाने मे भी िझझक-संकोच से डरी रहकर मूक-बिधर होने जैसा पिरचय
देती है। इस पकार की िववशता उतपन करने के िलए जो भी ततव िजममेदार होगे , उनहे पशचाताप पूवरक अपने कदम
पीछे हटाने पडेगे। पिरवार-पिरकर के बीच नर और नारी िबना िकसी भय व संकोच के जीवन-यापन करते रह सकते
है, तो िफर बडे पिरवार-समाज मे आवशयक कामो के िलए आने-जाने मे िकसी संरकक को ही साथ लेकर जाना कयो
अिनवायर होना चािहए?
िववाह की बात तय करने मे अिभभावको की मरजी ही कयो चले ? यिद लडकी को भी लडको के समान ही
सुयोगय बनाने के िलए अिधक समय तक िशका-दीका पाप करने का औिचतय हो, तो िफर उसे बाल-िववाह के बंधनो
मे बाँधकर घसीटते हु ए िकसी भी दस
ू रे िपंजडे मे सथानांतिरत िकए जाने का कया औिचतय हो सकता है? िववाह के
बाद योगयता-संवदरन के अवसर पूरी तरह समाप कयो हो जाने चािहए? अिभभावको के घर लडकी ने िजतनी योगयता
और सममान अिजर त िकया है, उससे आगे की पगित का कम जारी रखने का उतरदाियतव ससुराल वालो को कयो
नही िनभाना चािहए? िववािहत होने के बाद पगित के सभी अवसर िछन जाने और मात कीतदासी की भूिमका िनभाते
रहने तक ही उसे कयो बाधय रखा जाना चािहए? ये पशन ऐसे है, िजनका उिचत उतर हर िवचारशील को, हर
नयायिनष को व हर दरू दशी को छाती पर हाथ रखकर देना चािहए और सोचना चािहए िक यिद उनहे इस पकार
बाधय रहने के िलए िववश िकया जाता, तो िकतनी वयथा-वेदना सहनी पडती। अिधकांश बािलकाओं दारा िववाह के
बाद अपना शारीिरक और मानिसक सवासथय गँवा बैठना भी इसीिलए देखा जाता है िक उनहे्े आजनम कैदी-जीवन
जीकर िकस पकार िदन गुजारते रहने के अितिरक और कोई भिवषय िदखाई नही देता।

दामपतय की गिरमा भुल ाई न जाए

िजस पित के साथ िववाह के रप मे गंिथ-बंधन और पािणगहण संसकार संपन हु आ है, उसका सहज
उतरदाियतव बनता है िक पतनी को कम-से कम अपनी योगयता के सतर तक पहु ँचाने के िलए पाणपण से पयतन करे
ही। यिद उसकी ओर से उपेका बरती जाती है, तो उसके िववाह को अपहरण के अितिरक और कया कहा जाएगा?
िववाह से कामुकता की आग बुझाने का कानूनी अिधकार भले ही िमल जाता है, पर नैितकता के कठोर
अनुबंध इस िदशा मे उदासीनता न बरतने के िलए िफर भी बाधय करते रहते है। कामाचार का सीधा पितफल है संतानोतपादन िकसी जमाने मे जब पशु चराने और लकडी बीनने का काम बचपन मे ही बालको को सौप िदया जाता
था, तब वे पिरवार के िलए आिथर क रप से भार नही बनते थे, पर अब तो उनका सभयजनो की तरह लालन-पालन
करना, उनके िलए िशका-दीका की वयवसथा बनाना, खेलने आिद के िलए घरो मे खुले सथान होना आिद ऐसे िकतने
ही नए पशन संतानोतपादन के साथ जुडे है, िजनका इस घोर महँगाई के जमाने मे िनभा सकना एक पकार से
दसु साहस जैसा ही है। अंधो की तरह कामुकता के केत मे िबना पिरणाम सोचे उडाने भरने लगना एक पकार से अपनी
आिथर क िसथित पर व पतनी के सवासथय पर, बचचो के भिवषय पर कुठाराघात करने के समान है। नया आगंतुक
संयक
ु पिरवार के सदसयो की सुिवधाओं मे कटौती करता है। िवपन पिरिसथितयो मे पला हु आ बालक अपने िलए,
अिभभावको के िलए और समसत संसार के िलए अिभशाप बनकर ही रह सकता है। इन तथयो के िवपरीत िववाह
होने के िदन से ही पतीका की जाने लगती है िक संतानोतपादन का समय आने मे देर न लगे। ऐसी मानयताओं को

अदरू दिशर ता और घोर पितगािमता के अितिरक और कया कहा जाए?
िववाह तब होना चािहए, जब दोनो एक-दस
ू रे को सहमत कर सकने और आगे बढाने के िलए समुिचत
योगदान दे सकने की िसथित पर िवचार कर चुके हो। यिद िववाह से पूवर ऐसा नही बन पडा हो, तो िकसी भी दमपित
को संतानोतपादन की नई और भारी-भरकम िजममेदारी सँभालने से पहले ही उस कमी की पूितर कर लेनी चािहए।
िजतना समय, धन और मनोयोग संतान के िलए लगाया जाता है, उतना कषसहन यिद पित-पतनी एक-दस
ू रे के

दाियतव के िलए करते रहे तो उसे हर दिष से कही अिधक बुिदमतापूण माना जाएगा। पगित-कम आजीवन चलता
रह सके और इसके िलए पित-पतनी एक-दस
ू रे के िलए पूरी तरह समिपर त रहे, यह मानवीय गिरमा को शोभायमान
रखने वाली नीितमता है। इसमे सबसे बडी बाधा सवचछं द यौनाचार की है, िजसके फलसवरप दोनो एक-दस
ू रे को
शारीिरक तथा मानिसक रप से रगण बनाते है और बेवजह असाधारण भार वहन की अनीित अपनाते है, जो नही ही
अपनाई जानी चािहए।
िवकृत मानयताओं मे एक अित भयंकर अनौिचतय यह घुसा है िक कामुकता के कुचक मे शरीर और िचंतन
क ्ो बेतरह उलझा िलया जाए तथा बडे होने पर भी अपनी कमताओं को बचचो के फुलझडी जलाने के िखलवाड
की तरह नष करके मनचलेपन का पिरचय िदया, हािन-लाभ पर कुछ भी िवचार न िकया जाए। कामुकता की
शारीिरक कित की चचार तो बहचयर -िववेचना के संबंध मे होती भी रहती है। िफर यह िकसी को समरण भी नही आता
िक अशलील िचंतन से मानिसक कमताओं का िकस पकार सवर नाश होता है तथा इस दिु शचंतन मे उलझा हु आ
मिसतषक कुछ उचचसतरीय िचंतन कर सकने और बौिदक पितभा के पदशर न मे सकम ही नही रहता।
नशेबाजी की कुटेव के उपरांत आतमघात के िलए पेिरत करने वाली कामुकता ही है। इसी ने नारी के पित
पूजयभाव रखने और उसके उतकषर मे सहायता दे सकने वाली सदाशयता को बुरी तरह िछन-िभन िकया है। इस
िदशा मे बढते हु ए उतसाह की उडान को रोका न गया तो उससे नारी पर तो वजपात होता ही रहेगा, बचेगा वह भी
नही, िजसने इस िदशा मे उतसाह िदखाया और सरंजाम जुटाया है। जीवनी शिक को िनचोडकर नाली मे बहा देना,
इतना अबुिदमतापूणर है िक उसमे असाधारण अिभरिच लेने वाले को आतमघाती के अितिरक और कुछ नही कहा
जा सकता।
नर और नारी के बीच भाई-भाई जैसा व बहन-बहन जैसा सहयोगी िरशता रहना चािहए। संतानोतपादन की
जब अिनवायर आवशयकता सूझ पडे, तभी उस खौलते पानी मे हाथ डालना चािहए। िवशव एवं समाज की िसथित को
देखते हु ए सपष होता है िक इन िदनो तो बढती जनसंखया का अिभशाप ही अकेला ऐसा है , िजससे हर केत मे इतनी
समसयाएँ , किठनाइयाँ और िवपितयाँ बढती जाती है, िजनके कारण संतुलन बैठाने के िलए पगित के कोई भी पयास
संतोषजनक रीित से सफल हो नही पा रहे है। अचछा होता, यिद अपना, साथी का, पिरवार का व समाज की िसथित
का पयर वेकण करते हु ए बीसवी सदी के इन अंितम वषो ं मे तो पजनन को एक पकार से पूणर िवराम दे िदया जाए और
इककीसवी सदी के िलए वैसी िसथित बनाई जाए, िजससे िवभीिषकाओं से जूझने की अपेका पगित का सरंजाम जुटाने
के िलए उपलबध साधनो को लगा सकना संभव हो सके। कामुकता के पित असाधारण उतसाह कभी कमय रहा होगा,
पर अब तो उस दिु शचंतन को यथावत् अपनाए रहने पर खतरे-ही-खतरे है- आितशबाजी के खेल खेलने की तरह उस
रझान पर भी समय रहते अंकुश पाप कर िलया जाए। नारी-उतकषर के संदभर मे तो इस पिरमाजर न को एक महती
आवशयकता की तरह ही हर िकसी को हदयंगम करना चािहए। िसयाँ इस कोलहू मे िपसने से बचने की राहत पाने पर
अपनी उन कमताओं को कायारिनवत कर सकेगी, िजनके आधार पर उनकी नवयुग मे महती भूिमका हो सकती है।
नर-नारी के बीच अशलीलता की गंध नही आने देनी चािहए, वरन उस सघन सहकािरता को िवकिसत करना चािहए,
िजससे आतमीयता, आदशर वािदता और पारसपिरक सेवा-साधना का सुयोग बन सकता है। सामथयो ं को बचाकर उनहे
लोकिहत के कायो ं मे लगाया जा सकता है, िजनकी िक इस नवयुग के अवतरण मे असाधारण आवशयकता है।
द ुि शचं त न हटाएँ -सृज न अपनाएँ

संत जानेशवर अपने बहन-भाइयो के साथ लोक मंगल के िलए कायर केत मे उतरे थे। दरू दिशर यो और ऋिषयो
ने िमल-जुलकर िबना कामुकता के फेर मे्े पडे इतने अिधक महतवपूणर कायर िकए थे िक उनकी संयक
ु कमता ने
संसार को कृत-कृतय कर िदया। लोकनायक जयपकाश नारायण, आचायर कृपलानी एवं जापान के गाँधी कागावा जैसे
महामानवो ने एक और एक िमलकर गयारह बनने की संभावना पूरी तरह जानने के उपरांत ही िववाह िकए थे और
उसके साथ उचचसतरीय आदशो ं को जुडा रखकर िववाह शबद को साथर क बनाया था। इन िदनो भी ऐसे ही आदशर
िववाह अपनाए जा सके, तो पारसपिरक सघन सहयोग को जीवंत रखने एवं अनेकानेक किठनाइयाँ सरल करने और

सवर तोमुखी पगित के संदभर मे एक-से-एक बडे काम करने के िलए सामने पडे है। इसे संयोग ही कहना चािहए िक इन
िदनो िवकासोनमुखी सेवा-साधना और अवांछनीयताओं से जूझने वाली संघषर शीलता के दोहरे पराकम िदखाने की
अिनवायर आवशयकता पड रही है। अचछा हो िक इन िदनो ऐसी युगम आतमाएँ -पित-पतनी िमलकर संयक
ु पयासो मे
भागीदार बनकर िववाह-संसथा को साथर क करे। धयान रखने योगय बात यही है िक संतानोतपादन मे पवृत होने के
उपरांत कोई वयिक या दमपित मात लोभ-मोह के िनिवड जंजाल मे ऐसी बुरी तरह फँस जाता है िक िफर आदशो ं के
िनवारह मे कुछ कहने योगय पुरषाथर कर सकना संभव ही नही रहता।
यो अितशय वयसत और पितबंिधत मिहलाएँ भी अपनी िशका, सवावलंबन तथा योगयता की अिभवृिद मे तथा
अपने पिरवार मे पगितशीलता के बीज बोने -उगाने मे कुछ तो कर ही सकती है-िजनके साथ िनकटवती वासता रहता
है, उनहे शमशीलता, िमतवयियता, िशषता, सुवयवसथा, उदार सहकािरता जैसे सदगुणो से संपन रहने के िलए उतसाह
उतपन कर सकती है। पिरवार के सदसयो को एक हद तक संयम, पगितशीलता का पकधर बनाने के िलए पयतनरत
रह सकती है, कुरीितयो और मूढ मानयताओं को अपने छोटे केत मे से खर-पतवार की तरह उखाड फेकने के िलए
कुछ-न-कुछ तो कर ही सकती है; मिहला-संगठनो मे सिममिलत होने के िलए उतकंठा बनाए रह सकती है।
िजन नािरयो के बंधन ढीले है, उतरदाियतव हलके है और िशका का नयूनािधक सौभागय पाप है, उनके िलए
तो युगधमर यही बन जाता है िक वे बचे समय मे आरामतलबी, खुदगजी और संबंिधयो के मोह-माया से थोडा-बहु त
उबरे और उस समय की बचत से अपने संपकर-केत को पगित-पथ पर अगसर करने के िलए अपने बडे-चढे अनुदान
पसतुत करे। संपन पिरवारो मे नौकर -चाकर काम करते है। उनहे समय िमल जाता है। बडे पिरवारो मे यिद उदार
संवेदना जगाई जा सके, तो पिरवार पीछे एक-दो मिहलाओं का समय सेवा कायो ं के िलए लगाते रहने का पबंध हो
सकता है। नौकरी करने वाली मिहलाएँ अिधकांश समय घर से बाहर रहती है और उनके िहससे का काम घर के
अनय लोग िमल-जुलकर संपन कर लेते है। नारी-उतकषर की आवशयकता को ईशवर की नौकरी मान िलया जाए और
उनहे उस पयोजन के िलए िनिशचंततापूवरक काम करने के िलए पिरवार के अनय सदसय योगदान दे सके, तो इतने भर
से बडा काम हो सकता है। अधयािपकाओं जैसी नौकरी िजनहे उपलबध है, वे अपनी छाताओं और उनके पिरवारो के
साथ संपकर साधकर ऐसा बहु त कुछ कर सकती है, जो पगितशीलता का पकधर हो। सेवािनवृत मिहलाएँ तो तफरी मे
समय काटने की अपेका पसतुत नवजागरण-अिभयान मे्े अपनी भागीदारी सिममिलत कर ही सकती है। िवधवाएँ व
पिरतयकाएँ तो अपने खाली समय मे दभ
ु ारगय का रोना रोने की अपेका समय की महती माँग को पूरा करने मे संलग
रहकर कुयोग को सुखद संयोग मे बदल सकती है। िकतनी ही लडिकयो को भारी दहेज के साधन न जुट पाने के
कारण अिववािहत रहने के िलए िववश होना पडता है। ऐसी मिहलाएँ िदन काटने के िलए नौकरी के िलए भटके या
िकनही संबंिधयो की सहायता-अनुकंपा पर आिशत रहे, उसकी अपेका यह कही अचछा है िक मिहला-जागरण की
ईशवरीय माँग की सहयोिगनी बनकर दभ
ु ारगय को सौभागय मे बदले और समय की माँग पूरी करने मे अपने समय व शम
का िनयोजन करके उपलबध मानवीय जीवन को अपनी साहिसकता के बल पर साथर क करे।

दो बडे कदम-िशका और सवावलं ब न

नारी-उतथान के िलए सवर पथम आवशयकता िशका- संवदरन की है। मधयवगीय पिरवारो की लडिकयाँ तो सकूल जाने
लगती है, पर घर-गृहसथी वाली पौढ मिहलाओं के िलए वैसा सुयोग ही नही बन पडता। इस आवशयकता की पूितर के
िलए वेतनभोगी अधयािपकाएँ जुटाने की अपेका सही समाधान यही हो सकता है िक िशिकत मिहलाएँ अपने घरपिरवार के कायो ं मे से िकसी पकार समय बचाकर अपने समीपवती केत मे पौढ-पाठशालाओं को चलाने के िलए
भरसक पयतन करे, दस
ू री िशिकत मिहलाओं को पोतसािहत करके उनहे इस कायर मे लगाएँ , वयोवृद अनय िशिकतो
को भी खाली समय उनके साथ लगने के िलए पेिरत करे। पगित के िलए िशका की अिनवायर आवशयकता समझी
जानी चािहए। पयतन यह होना चािहए िक िकसी भी आयु की, िकसी भी िसथित मे रहने वाली मिहलाओं मे से पतयेक
को साकर बनने का अवसर िमले। अकरजान होते ही उनहे ऐसी सरल पुसतके िमलनी चािहए, जो वयिकतव िनखारने
का, पिरवार को सुदढ बनाने का तथा अपने समुदाय को हर दिष से समुनत बनाने का मागर दशर न दे सके । इसे दभ
ु ारगय
ही कहना चािहए िक अपने देश के लेखको व पकाशको क ्ा धयान इस ओर नही गया। इस कमी की पूितर के िलए
जनसतर की सवेचछा सेवी संसथाओं को आगे आना चािहए और अपने देश की मिहलाओं को िजस सतर से रहना पड
रहा है, उससे ऊँचा उठाने वाले सािहतय की कमी को पूरा करना चािहए। इस िनिमत वहाँ मिहला-पुसतकालय भी
चले, जहाँ उनकी िशका का िकसी पकार कोई छोटा-बडा पयतन बन पडना संभव हो सकता हो ।

िशका के साथ ही दस
ू रा चरण सवावलंबन की िदशा मे उठना चािहए। सथानीय पिरिसथितयो के अनुरप कोई-न-कोई
कुटीर उदोग हर केत मे चल सकते है। उनहे ढू ँ ढा और सहकािरता के आधार पर चलाया जा सके तो कचचा माल
िमलने और तैयार माल बेचने का कायर सथानीय सहकारी सिमितयो दारा संपन हो सकता है। आवशयक नही िक
गरीबो दारा ही पयास अपनाया जाए, सवावलंबन एक ऐसी पवृित है, िजसे हर वयिक दारा अपनाया जाना चािहए।
नारी का अवमूलयन इसी कारण हु आ है िक गृहकायो ं मे िदन-रात लगी रहने पर भी पतयकत: वे कुछ कमाई करती
िदखाई नही पडती। इस िसथित के समाधान के िलए जापान की तरह अपने देश मे भी पयतन होने चािहए, जहाँ
कुटीर उदोगो के िलए हर केत मे िकसी-न-िकसी पकार की सुिवधा उपलबध है। िसयाँ कुछ कमाने लगे या कोई अनय
पशंसा योगय कायर करने पर उतरे, तो घर के पुरषो को उसमे हेठी लगती है और वे उसका िवरोध तक करते है। इस
िवचार-िवकृित से िनपटने के िलए आवशयक है िक गरीब-अमीर सभी घरो मे कुटीर उदोग जैसे सवावलंबन के उपायो
का पचलन िकया जाए। नयूनतम शाक-वािटका तो हर घर मे लगाई ही जा सकती है। िसयो को भी आिथर क
सवावलंबन की आवशयकता है। उनकी भी िनजी आजीिवका होनी चािहए, तािक उनहे परावलंबन का दबाव हर घडी
सहना न पडे और वे भी सवेचछानुसार कुछ-न-कुछ पगित-पिकया के िलए सुिवधा-साधन जुटा सके।

नारी-अवमूल यन को रोका जाए

बचचो के पेट मे रखने के िलए तो नारी-समाज ही िववश है, पर अब यह माँग संसार भर मे उठ रही है िक
उनके पालन-पोषण मे िपता की भी उपयुक भागीदारी होनी चािहए और उनहे भी दल
ु ार देने, खेल िखलाने, समसयाओं
को िनपटाने तथा सुसंसकारी बनाने मे अपना समय िनयिमत रप से लगाना चािहए, भले ही वह आिथर क अथवा
िकसी और दिष से िकतने ही मूलयवान कयो न हो! अभी कुछ ही महीनो पूवर सवीडन सरकार तथा समाज ने यह
िनधाररण िकया है िक िजस पकार मिहलाओं को पसूित के अवसर पर नौकिरयो से छुटी लेनी पडती है, उसी पकार
पुरष भी बचचो के पालन-पोषण मे्े अपनी सहभागी सतर की िजममेदारी उठाएँ और छुटी लेकर बचचो के साथ रहे।
‘‘पुरषो दारा इस पर आपित की गई िक इससे उनके अनुभव मे कमी पडने से पदोनित रकेगी तथा पितसपदारओं मे
बैठकर ऊँचा पद पाने मे असमथर रहेगे ।’’ यह ऐतराज इस आधार पर रद कर िदया गया िक यही तकर मिहलाएँ भी
तो दे सकती है। उनहे भी तो घाटा उठाना और कष सहना पडता है। संतानोतपादन मे पुरष भी उतना ही उतसाह
िदखाता है तो िफर इस कृतय के फिलताथो ं से िनपटने मे कयो अपनी िजममेदारी से पला छुडाकर भागने का पयतन
करना चािहए? कानून पास हो जाने से अब उसका दबाव पुरषो पर भी पडेगा। अब तक दंड भुगतने के िलए अकेले
नारी को ही बाधय िकया जाता रहा है, अब पुरषो को भी नफे मे ही नही, नुकसान मे भी सहभागी रहने के िलए बाधय
होना पडेगा। आरंभ भले ही सवीडन से हु आ हो, पर उसका िवसतार सभी जगह होगा। सूरज भले पवर त िशखर पर से
उगता िदखाई पडे, पर उसका पकाश कमश: समसत संसार पर हो जाएगा। जापान मे राजनीितक केत मे मिहलाओं के
उतसाहपूवरक बाजी मारने का पभाव भारत पर पडा है और उनहे ३० पितशत सथान सुरिकत करा लेने का अवसर
िमला है। अब यह पचलन आगे बढेगा और मिहलाओं को हेय मानने , तास देने, व असमानता के भेदभाव बरतने का
पचलन कमश: संसार के सभी भागो से हटता चला जाएगा, भले ही इससे इिचछत लाभ उठाने के िलए कई तकर
पसतुत करते रहने वालो को कुडकुडाते ही कयो न रहना पडे , उनका िवरोध िनयित के अिभनव िनमारण के सामने
िटक न सकेगा।
जो होकर ही रहना है, उसके साथ टकराने की अपेका लाभ इसी मे है िक समय से पूवर समझौता करके
अपनी सदाशयता की कुछ पहचान तो छोड ही दी जाए। अंगेजो ने बदलते समय को भाँप िलया था, इसिलए उलटी
लाते खाकर खदेडे जाने का कटु पसंग उपिसथत नही होने िदया और समझौते की नीित अपनाकर िवदाई के िदनो
कटु ता के सथान पर सदावना सिहत वापस गए। असतु भारत अभी तक सवेचछापूवरक राषरमणडल का सदसय बना
हु आ है।
हिरजनो-आिदवािसयो को आरकण एवं िवशेष सुिवधाएँ देकर समय रहते समानता का अिधकार सवीकार कर
िलया गया है। गलितयो का पायिशचत हो रहा है। यिद इस सदावना का पिरचय न िदया गया होता, तो िनशचय ही
संसार मे बह रही िवकास की हवा उनहे उतेिजत िकए िबना न रहती । जो पिरवतर न इन िदनो अचछे वातावरण मे हो
रहा है, उसी के िलए दरु ागह पर अडे रहने से अपेकाकृत कही अिधक घाटे का सामना करना पडता। मिहलाओं के
पित भी पुरष वगर दारा समय रहते नयायोिचत अिधकारो की माँग को मानयता दे दी जाती है तो इसमे दोनो पक नफे
मे रहेगे, अनयथा िवगह की टकराव भरी िसथित आने तक बात बढ जाए, तो िफर भूल सुधारने मे देर लग जाएगी।
संसार मे ऐसे भी बहु त केत है, जहाँ नारी-पधान समाज-वयवसथा चल रही है। वहाँ समूचे अिधकार मिहलाओं के ही

हाथ मे रहते है। नर को तो अपनी िववशता के कारण उनका आजाकारी-अनुवती मात बनकर रहना पडता है। अचछा
हो िक ऐसा आमूल-चूल पिरवतर न का सामना अपने समाज को न करना पडे। िपछली शताबदी मे अगिणत
राजनीितक, सामािजक एवं बौिदक कांितयाँ हु ई है। उनमे जीती तो यथाथर ता और नयाय-िनषा ही है, पर वह उथलपुथल ऐसे घटनाकमो का इितहास अपने पीछे छोड गई है, िजनको समरण करके रोमांच हो आता है। घृणा-देष के
भाव अभी तक भी िवचारवानो के कान मे यथावत् बने हु ए है और परािजतो के पित सहानुभूित होने की अपेका
ितरसकार भरी पितिकया ही वयक की जाती रहती है। वैसे दिु दर न हम सबको न देखने पडे्े, इसी मे समझदारी है।
समता और एकता का अटल पिरवतर न िकसी के रोके रकने वाला तो है नही, अिधक-से-अिधक इतना हो सकता है
िक भिवतवयता को चिरताथर होने मे समय लगे।
नारी समसया के पीछे अनीितमूलक दभ
ु ारवनाओं का अहंकारी मानस ही पमुख बाधा बना हु आ है। यिद
औिचतय को अपना िलया जाए और लाभ-हािन का सही आकलन कर िलया जाए, तो पतीत होगा िक संघषर मे
उलझने की अपेका सहयोग की नीित अपनाना अिधक शेयसकर है। उठने मे सहायता देकर एहसान जताने और
कृतजता भरी सदावना उपलबध करने मे लाभ-ही-लाभ है। इस लाभ को इन िदनो के सुअवसर पर उठाया न जा
सका, तो समय िनकल जाने पर अपेकाकृत कही अिधक घाटा सहन करना पडेगा। समता और एकता के िसदांत
संसार भर के दख
ु ी समाज को अपना िलए जाने के िलए बाधय कर रहे है। यह हो ही नही सकता िक आधी
जनसंखया नारी को उस महान पिरवतर न से िवलग रखने के कोई पयतन देर तक सफल होते रहे । सामंतवाद चला
गया। अब सामािजक सामंतवाद की िवदाई की वेला भी आ ही पहु ँची है। उसे वापस नही लौटाया जा सकता।
उपयुक यही होगा िक भारत के िजस अिहंसक सतयागह का समथर न देश की पूरी जनता ने िकया और
असंभव दीखने वाले नागपाश से छूटने मे सफलता पाप कर ली, अब उसी का उतरादर सामािजक कांित के रप मे
उभरना चािहए। नयाय को मानयता िदलाने मे भी उसी रीित-नीित को अपनाया जाए, जो सतयागह के िदनो समूचे देश
मे ही नही, संसार भर मे उभर आई थी। नारी-मुिक आं दोलन पाशचातय देशो मे कटु ता भरे वातावरण मे संघषर और
पितशोध के रप मे उभर रहा है। अचछा हो िक वे टकराव से बचे और समझौतावादी उदारता अपनाने भर से किठन
दीखने वाला मोरचा सुलह-सफाई के वातावरण मे ही िनपट जाए।
इसके िलए मात भांितयो का िनराकरण ही वह कायर है, िजससे कायाकलप जैसा सुखद-सुयोग सहज ही
हसतगत हो सकता है। यह सवीकार कर ही िलया जाना चािहए िक नर और नारी, दोनो एक ही िसकके के दो पहलू है।
एकता और सदावना के वातावरण मे ही उनके बीच सहकािरता िवकिसत हो सकती है और अकुणण बनी रह सकती
है। लडके-लडकी के बीच, कनया और वधू के बीच बरता जाने वाला पकपातपूणर भेदभाव अब पूरी तरह समाप हो ही
जाना चािहए। दोनो को दो हाथ, दो पैर, दो आँ ख और दो कान की तरह परसपर सहयोगी और समान महतव पाने के
अिधकारी मानकर चलने मे ही समझदारी है।

एकता और समता का सुय ोग बने

पित और पतनी मे से कोई िकसी का दास और सवामी नही। दोनो की िसथित भाई-भाई के बीच अथवा
बहन-बहन के बीच चलने वाली सदावना और सहकािरता की रहनी चािहए। मैती इसी आधार पर िसथर रहती और
फलती-फूलती है िक अपने लाभ का धयान कम और साथी के िहत सधने का धयान जयादा रखा जाए। इतना भर
पिरवतर न कर लेने से हमारी पािरवािरक और सामािजक िसथित मे इतना बडा पिरवतर न उभर आएगा, िजसकी
सराहना करते-करते सौभागय का अनायास अवतरण होने जैसा उलास अनुभव िकया जा सके।
अमृत के बीच िवष घोलने वाली कामुकता की कुदिष को हटाया-िमटाया जा सके, तो हमारे शारीिरक,
मानिसक, सामािजक और नैितक सवासथय मे इतना बडा अंतर हो सकता है, िजसे नवजीवन के पुनरतथान की संजा
दी जा सके। इन िदनो संधयाकाल है। इस पुणय वेला मे यौनाचार जैसे हेय कायर िनिषद है। सूयर गहण या चंदगहण की
घिडयो मे सभी िववेकशील संयम बरतते और उन घिडयो को शेष पुणय कृतय के िलए सुरिकत रखते है। युगसंिध का
यह समय भी ऐसा ही है, िजसमे पजनन-कृतय को तो िवराम िमलना ही चािहए। कुसमय के गभारधारण जब फिलत
होकर धरती पर आते है, तो उनमे अनेक िवकृितयाँ पाई जाती है। युगसंधया की वेला नारी के पुनरतथान के िलए
भाव भरे वत करने के िलए है। इसी समय मे पजनन का उतसाह ठंडा न होने िदया गया तो उसके अनावशयक तामझाम मे बहु त कुछ जलेगा-सुलगेगा जबिक इन िदनो संसार का पमुख संकट बहु पजनन ही बना हु आ है। यिद इन

िदनो उसे रोक िदया जाए, तो वह िसथित िफर वापस आ सकती है, िजसमे सतयुग मे समसत धरती पर मात कुछ
करोड मनुषय रहते और दैवी जीवन जीते थे।
नर और नारी , िजतना भारी दाियतव यौनाचार मे िनरत होकर वहन करते है, वह सामानय नही असामानय है।
नारी अपना सवासथय और अवकाश पूरी तरह गँवा बैठती है। नर को इस दषु पवृित के िलए पाय: बीस वषर की सजा
झेलनी पडती है। इतने िदनो उसे मात बढे हु ए पिरवार की अनेकानेक आवशयकताओं की पूितर के िलए अपना समसत
कौशल िवसिजर त करना पडता है। इसी तथय को धयान मे रखते हु ए , िजनहे जीवन मे कुछ महतवपूणर कायर करने है, वे
नए उतपादन से बचते है और िवशव-पिरवार के वतर मान सदसयो को ही अपना समझकर उनके अभयुदय हेतु ठीक वैसे
ही पयतन िनषापूवरक करते रहते है, जैसे िक िवरासत छोडकर अपने पजनन की िजममेदारी िनभाने मे खरचना पडता
है।
पजनन पर तो रोक लगे ही
इन िदनो यह आवशयकता कई कारणो से कई गुनी बढ गई है। एक तो इसिलए िक बीसवी सदी के अंतकाल
मे सूकमजगत सृजन और समापन के संदभर मे अतयंत उलझा रहेगा। उसके दषु पभाव इन िदनो की उतपित पर पडे
िबना रह नही सकते। उसके कारण अनेक तास सहने की अपेका यह कही अचछा है िक इककीसवी सदी के अंत तक
पजनन रोका जाए और इककीसवी सदी मे अवतिरत होने वाली िदवय आतमाओं से अपनी वंश -परंपरा को धनय होने
का लाभ उसी पकार पाप िकया जाए, िजस पकार िक तपसवी अपनी संयम-साधना का पितफल िसिदयो और
िवभूितयो के रप मे पाप करते रहे है।
दस
ू रा कारण यह है िक इन िदनो हर नर-नारी के िलए महाकाल का आमंतण और युगधमर का िनमंतण यह है
िक नारी-पुनरतथान के िलए सवर तोभावेन समिपर त हो और पीिढयो से चलते आ रहे अनाचार का पायिशचत करते हु ए
पूवरजो की भूलो का पिरमाजर न करे। देश, समाज को ऊँचा उठाने के िलए कोई समय ऐसा भी आता है, िजसकी
कीमत सामानय िदनो की तुलना मे अनेक गुनी अिधक होती है। युदकाल मे कई बार देश के हर समथर को सेना मे
अिनवायर त: भरती िकया जाता है। समझा जाना चािहए िक ईशवर के ततवावधान मे हर समथर के िलए आधी
जनसंखया को ताण िदए जाने, उसको पाचीन परंपरा मे पुन: सुसिजजत करने की ठीक वेला यही है। उसमे लोभ-मोह
की, िवशेषत: काम-कौतुक की उपेका की जा सके, तो हर िकसी को अपने-अपने ढंग से थोडा-बहु त अचछा करने का
ऐसा आधार बन सकता है, िजसकी भूिर-भूिर पशंसा की जा सके और अपना समाज िफर िवशव का सवर तोमुखी
नेतृतव कर सके। यह बुदकाल मे उभरे पिरवाजको-पिरवािजकाओं के िनकल पडने जैसा समय है। इसी आधार पर
आधी दिु नया के कलयाण की शेय-साधना बन पड सकती है।
तीसरी बात यह है िक संसार पर अणुयद
ु , पदषू ण व सवाथर -संघषर की ही तरह जनसंखया-वृिद की िवभीिषका
भी सवर नाशी घटनाओं की तरह छाई हु ई है। यह संकट न टला तो समझना चािहए िक िविभन केतो मे चल रहे पगित
के उपायो मे से एक भी सफल न हो सके गा और िवनाशकारी संभावनाओं का दौर िदन-पितिदन अिधक भयावह
होता चला जाएगा। कम-से-कम युगसंिध के इन िदनो मे तो इस संदभर मे िवराम लग सके, तो संसार भर की संसकृित
को साँस लेने का अवसर िमल सकता है।
उपयुरक तथयो के अितिरक एक और भी चौथी बडी बात है िक इन िदनो नारी-कलयाण िजसे दस
ू रे शबदो मे
िवशव -कलयाण कहा जा सकता है, उसके िलए अभीष अवकाश िमल सकता है। यिद उठती आयु का उलास देश रका की सैनय सेवा मे लगाने की तरह िनयोिजत िकया जा सके, तो समझना चािहए िक नवसृजन की बहु मख
ु ी
संभावनाओं का दार खुल ही गया है।
िहमालय से भारत की पमुख निदयाँ िनकलती और देश भर की जल की आवशयकता की अिधकांश पूितर
करती है। समझना चािहए िक चेतना-केत का िहमालय इन िदनो शािनतकुञ से सारे िवशव मे अपने ढंग की बहु मख
ु ी
पिकयाओं का सूत-संचालन कर रहा है। उनही मे एक महान पयोजन है -नारी-जागरण इसके िलए पचार-पसार की
महान पिरवतर न पसतुत करने वाली पिकया तो चल ही रही है। वयावहािरक मागर दशर न के िलए एक-एक महीने के नौनौ िदन के पिशकण -सत भी चलते है। इनमे पवेश पाने वाले नए सतर पर चेतना-पेरणा शिक लेकर लौटते है, साथ
ही वह मागर दशर न भी पाप करते रहते है, िजसके अनुसार अपनी िसथित से तालमेल बैठाते हु ए वह परामशर -पथ
अपनाया जा सके, जो सवाथर दिष से भी उतना ही आवशयक और महतवपूणर है।

िजनके अंतरतम मे इन िदनो नारी-उतथान की सेवा-साधना और तपशचयार करने का मन हो, वे उपयुक िदशा
पाने के िलए शािनतकुञ, हिरदार से संपकर कर सकते है और िनरंतर चलने वाले सतो मे से िकसी मे पवेश पाने के
िलए आवेदन कर सकते है।
िजनहे इसी युगसंिध-अविध मे िववाह-बंधन मे बँधना आवशयक हो गया हो, वे कम-से-कम इतना तो करे ही
िक दहेज-जेवर और धूम-धाम से सवर था रिहत संबंध करे। ऐसा सुयोग अपने यहाँ न बन पा रहा हो तो उसके िलए वे
शािनतकुञ आकर िववाह कर ले, िबना िकसी पकार का खरच िकए िववाह संपन करा ले। िजनके बचचे है , उनसे यह
पितजाएँ कराई जाएँ िक वे कम-से-कम अपने लडको की तो खचीली शािदयाँ करेगे ही नही। नारी-उतकषर के िलए यह
आं दोलन भी अिनवायर रप से आवशयक है। युग की आवशयकता और कायर की महता समझते हु ए हर भावनाशीलपितभावान को नारी-जागरण की िदशा मे कुछ न-कुछ ठोस पयास करने ही चािहए।
पसतुत पुसतक को जयादा से जयादा पचार-पसार कर अिधक से अिधक लोगो तक पहु ँचाने एवं पढने के िलए
पोतसािहत करने का अनुरोध है।
- पकाशक
* १९८८-९० तक िलखी पुसतके (कािनतधमी सािहतय पुसतकमाला) पू० गुरदेव के जीवन का सार है- सारे जीवन
का लेखा-जोखा है। १९४० से अब तक के सािहतय का सार है। इनहे लागत मूलय पर छपवाकर पचािरत पसािरत
करने की सभी को छूट है। कोई कापीराइट नही है। पयुक आँ कडे उस समय के अनुसार है। इनहे वतर मान के अनुरप
संशोिधत कर लेना चािहए।

कािनतधमी सािहतय-यु ग सािहतय महता

कािनतधमी सािहतय-युग सािहतय नाम से िवखयात यह पुसतकमाला युगदषा-युगसृजेता पजापुरष पं. शीराम
शमार आचायर जी दारा १९८९-९० मे महापयाण के एक वषर पूवर की अविध मे एक ही पवाह मे िलखी गयी है। पाय:
२० छोटी -छोटी पुिसतकाओं मे पसतुत इस सािहतय के िवषय मे सवयं हमारे आराधय प.पू. गुरदेव पं. शीराम शमार
आचायर जी का कहना था- ‘‘हमारे िवचार, कािनत के बीज है। ये थोडे भी दिु नयाँ मे फैल गए, तो अगले िदनो धमाका
कर देगे। सारे िवशव का नकशा बदल देगे।..... मेरे अभी तक के सारे सािहतय का सार है।..... सारे जीवन का लेखाजोखा है।..... जीवन और िचंतन को बदलने के सूत है इनमे।..... हमारे उतरािधकािरयो के िलए वसीयत है।..... अभी
तक का सािहतय पढ पाओ या न पढ पाओ, इसे जरर पढना। इनहे समझे िबना भगवान के इस िमशन को न तो तुम
समझ सकते हो, न ही िकसी को समझा सकते हो।..... पतयेक कायर कतार को िनयिमत रप से इसे पढना और जीवन
मे उतारना युग-िनमारण के िलए जररी है। तभी अगले चरण मे वे पवेश कर सकेगे। ..... यह इस युग की गीता है। एक
बार पढने से न समझ आए तो सौ बार पढना और सौ लोगो को पढाना। उनसे भी कहना िक आगे वे १०० लोगो को
पढाएँ । हम िलखे तो असर न हो, ऐसा हो ही नही सकता। जैसे अजुरन का मोह गीता से भंग हु आ था, वैसे ही तुमहारा
मोह इस युग-गीता से भंग होगा।..... मेरे जीवन भर के सािहतय इस शरीर के वजन से भी जयादा भारी है। मेरे जीवन
भर के सािहतय को तराजू के एक पलडे पर रखे और कािनतधमी सािहतय को दस
ू रे पलडे पर, तो इनका वजन जयादा
होगा।..... महाकाल ने सवयं मेरी उँ गिलयाँ पकडकर ये सािहतय िलखवाया है।..... इनहे लागत मूलय पर छपवाकर
पचािरत-पसािरत शबदश:-अकरश: करने की सभी को छूट है, कोई कापीराइट नही है। ..... मेरे जान शरीर को मेरे
कािनतधमी सािहतय के रप मे जन-जन तक पहु ँचाने का पयास करे।’’

ॐ ‘‘बेटे ! कािनतधमी सािहतय मेरे अब तक के सभी सािहतय का मकखन है। मेरे अब तक का सािहतय पढ पाओ या

न पढ पाओ, इसे जरर पढना। इनहे समझे िबना िमशन को न तो तुम समझ सकते हो, न ही िकसी को समझा सकते
हो।’’.....
ॐ ‘‘बेटे ! ये इस युग की युगगीता है। एक बार पढने से न समझ आये तो सौ बार पढना। जैसे अजुरन का मोह गीता
से भंग हु आ था, वैसे ही तुमहारा मोह इस युगगीता से भंग होगा।
ॐ ‘‘हमारे िवचार बडे पैने है, तीखे है। हमारी सारी शिक हमारे िवचारो मे समािहत है। दिु नया को हम पलट देने का
जो दावा करते है, वह िसिदयो से नही, अपने सशक िवचारो से करते है। आप इन िवचारो को फैलाने मे हमारी
सहायता कीिजए। हमको आगे बढने दीिजए, समपकर बनाने दीिजए।’’.....
ॐ ‘‘मेरे जीवन भर का सािहतय शरीर के वजन से जयादा भारी है। यिद इसे तराजू के एक पलडे पर रखे और
कािनतधमी सािहतय को (युग सािहतय को) एक पलडे पर, तो इनका वजन जयादा होगा।
ॐ ‘‘आवशयकता और समय के अनुरप गायती महािवजान मैने िलखा था। अब इसे अलमारी मे बनद करके रख दो।
अब केवल इनही (कािनतधमी सािहतय को-युग सािहतय को) िकताबो को पढना। समय आने पर उसे भी पढना।
महाकाल ने सवयं मेरी उँ गिलयाँ पकडकर ये सािहतय िलखवाया है।’’.....
ॐ ‘‘ये उतरािधकािरयो के िलए वसीयत है। जीवन को-िचनतन को बदलने के सूत है इसमे। गुर पूिणर मा से अब तक
पीडा िलखी है, पढो।’’ .....
ॐ ‘‘हमारे िवचार, कांित के बीज है, जो जरा भी दिु नया मे फैल गए, तो अगले िदनो धमाका करेगे। तुम हमारा काम
करो, हम तुमहारा काम करेगे।’’.....
ॐ १९८८-९० तक िलखी पुसतके जीवन का सार है- सारे जीवन का लेखा-जोखा है १९४० से अब तक के
सािहतय का सार है।’’.....
ॐ ‘‘जैसे शवण कुमार ने अपने माता-िपता को सभी तीथो ं की याता कराई, वैसे ही आप भी हमे (िवचार रप मे कािनतधमी सािहतय के रप मे) संसार भर के तीथर पतयेक गाँव, पतयेक घर मे ले चले।’’.....
ॐ ‘‘बेटे, गायती महािवजान एक तरफ रख दो, पजापुराण एक तरफ रख दो। केवल इन िकताबो को पढना-पढाना व
गीता की तरह िनतय पाठ करना।’’.....
ॐ ‘‘ये गायती महािवजान के बेटे-बेिटयाँ है, ये (इशारा कर के) पजापुराण के बेटे-बेिटयाँ है। बेटे, (पुरानो से) तुम सभी
इस सािहतय को बार-बार पढना। सौ बार पढना। और सौ लोगो को पढवाना। दिु नया की सभी समसयाओं का
समाधान इस सािहतय मे है।’’.....
ॐ ‘‘हमारे िवचार कांित के बीज है। इनहे लागत मूलय पर छपवाकर पचािरत पसािरत करने की सभी को छूट है।
कोई कापीराइट नही है।’’.....
ॐ ‘‘अब तक िलखे सभी सािहतय को तराजू के एक पलडे पर रखे और इन पुसतको को दस
ू री पर, तो इनका वजन
जयादा भारी पडेगा।’’.....
ॐ शािनतकुञ अब कािनतकुञ हो गया है। यहाँ सब कुछ उलटा-पुलटा है। सातो ऋिषयो का अनकूट है।’’.....
ॐ ‘‘बेटे, ये २० िकताबे सौ बार पढना और कम से कम १०० लोगो को पढाना और वो भी सौ लोगो को पढाएँ । हम
िलखे तो असर न हो, ऐसा न होगा।’’.....
ॐ ‘‘आज तक हमने सूप िपलाया, अब कािनतधमी के रप मे भोजन करो।’’.....
ॐ ‘‘पतयेक कायर कतार को िनयिमत रप से इसे पढना और जीवन मे उतारना युग-िनमारण के िलए जररी है। तभी
अगले चरण मे वे पवेश कर सकेगे। ’’.....
ॐ वसंत पंचमी १९९० को वं. माताजी से - ‘‘मेरा जान शरीर ही िजनदा रहेगा। जान शरीर का पकाश जन-जन के

बीच मे पहु ँचना ही चािहए और आप सबसे किहयेगा - सब बचचो से किहयेगा िक मेरे जान शरीर को- मेरे कािनतधमी
सािहतय के रप मे जन-जन तक पहु ँचाने का पयास करे।’’.....

कािनतधमी सािहतय की पुस तके :

1 इककीसवी सदी बनाम उजवल भिवषय-भाग १
2 इककीसवी सदी बनाम उजवल भिवषय-भाग २
3 युग की माँग पितभा पिरषकार-भाग १
4 युग की माँग पितभा पिरषकार-भाग २
5 सतयुग की वापसी
6 पिरवतर न के महान कण
7 जीवन साधना के सविणर म सूत
8 महाकाल का पितभाओं को आमंतण
9 पजावतार की िवसतार पिकया
10 नवसृजन के िनिमत महाकाल की तैयारी
11 समसयाएँ आज की समाधान कल के
12 मन: िसथित बदले तो पिरिसथित बदले
13 सषा का परम पसाद-पखर पजा
14 आद शिक गायती की समथर साधना
15 िशका ही नही िवदा भी
16 संजीवनी िवदा का िवसतार
17 भाव संवेदनाओं की गंगोती
18 मिहला जागृित अिभयान
19 जीवन देवता की साधना-आराधना
20 समयदान ही युग धमर
21 नवयुग का मतसयावतार

22 इककीसवी सदी का गंगावतरण

अपने अं ग अवयवो से
(परम पूजय गुरदेव दारा सूकमीकरण से पहले माचर 1984 मे लोकसेवी कायर कतार-समयदानी-समिपर त िशषयो
को िदया गया महतवपूणर िनदेश। यह पतक सवयं परमपूजय गुरदेव ने सभी को िवतिरत करते हु ए इसे पितिदन पढने
और जीवन मे उतारने का आगह िकया था।)

यह मनोभाव हमारी तीन उँ गिलयाँ िमलकर िलख रही है। पर िकसी को यह नही समझना चािहए िक जो
योजना बन रही है और कायारिनवत हो रही है, उसे पसतुत कलम, कागज या उँ गिलयाँ ही पूरा करेगी। करने की
िजममेदारी आप लोगो की, हमारे नैिषक कायर कतारओं की है।
इस िवशालकाय योजना मे पेरणा ऊपर वाले ने दी है। कोई िदवय सता बता या िलखा रही है। मिसतषक और
हदय का हर कण-कण, जरार-जरार उसे िलख रहा है। िलख ही नही रहा है , वरन् इसे पूरा कराने का ताना-बाना भी बुन
रहा है। योजना की पूितर मे न जाने िकतनो का-िकतने पकार का मनोयोग और शम, समय, साधन आिद का िकतना
भाग होगा। मात िलखने वाली उँ गिलयाँ न रहे या कागज, कलम चुक जाये, तो भी कायर रकेगा नही; कयोिक रक का
पतयेक कण और मिसतषक का पतयेक अणु उसके पीछे काम कर रहा है। इतना ही नही, वह दैवी सता भी सतत
सिकय है, जो आँ खो से न तो देखी जा सकती है और न िदखाई जा सकती है।
योजना बडी है। उतनी ही बडी, िजतना िक बडा उसका नाम है- ‘युग पिरवतर न’। इसके िलए अनेक विरषो
का महान् योगदान लगना है। उसका शेय संयोगवश िकसी को भी कयो न िमले।
पसतुत योजना को कई बार पढे। इस दिष से िक उसमे सबसे बडा योगदान उनही का होगा, जो इन िदनो
हमारे कलेवर के अंग-अवयव बनकर रह रहे है। आप सबकी समिनवत शिक का नाम ही वह वयिक है , जो इन पंिकयो
को िलख रहा है।
कायर कैसे पूरा होगा? इतने साधन कहाँ से आएँ गे? इसकी िचनता आप न करे। िजसने करने के िलए कहा है ,
वही उसके साधन भी जुटायेगा। आप तो िसफर एक बात सोचे िक अिधकािधक शम व समपर ण करने मे एक दस
ू रे मे
कौन अगणी रहा?
साधन, योगयता, िशका आिद की दिष से हनुमान् उस समुदाय मे अिकंचन थे। उनका भूतकाल भगोडे सुगीव
की नौकरी करने मे बीता था, पर जब महती शिक के साथ सचचे मन और पूणर समपर ण के साथ लग गए, तो लंका
दहन, समुद छलांगने और पवर त उखाडने का, राम, लकमण को कंधे पर िबठाये िफरने का शेय उनहे ही िमला। आप
लोगो मे से पतयेक से एक ही आशा और अपेका है िक कोई भी पिरजन हनुमान् से कम सतर का न हो। अपने कतृरतव
मे कोई भी अिभन सहचर पीछे न रहे।
काम कया करना पडेगा? यह िनदेश और परामशर आप लोगो को समय-समय पर िमलता रहेगा। काम बदलते
भी रहेगे और बनते-िबगडते भी रहेगे। आप लोग तो िसफर एक बात समरण रखे िक िजस समपर ण भाव को लेकर घर
से चले थे, पहले लेकर आए थे (हमसे जुडे थे), उसमे िदनो िदन बढोतरी होती रहे। कही राई-रती भी कमी न पडने
पाये।
कायर की िवशालता को समझे। लकय तक िनशाना न पहु ँचे, तो भी वह उस सथान तक अवशय पहु ँचेगा, िजसे
अदत
ु , अनुपम, असाधारण और ऐितहािसक कहा जा सके। इसके िलए बडे साधन चािहए, सो ठीक है। उसका भार
िदवय सता पर छोडे। आप तो इतना ही करे िक आपके शम, समय, गुण-कमर , सवभाव मे कही भी कोई तुिट न रहे।
िवशाम की बात न सोचे, अहिनर श एक ही बात मन मे रहे िक हम इस पसतुतीकरण मे पूणररपेण खपकर िकतना
योगदान दे सकते है? िकतना आगे रह सकते है? िकतना भार उठा सकते है? सवयं को अिधकािधक िवनम, दस
ू रो को
बडा माने। सवयंसेवक बनने मे गौरव अनुभव करे। इसी मे आपका बडपपन है।
अपनी थकान और सुिवधा की बात न सोचे। जो कर गुजरे, उसका अहंकार न करे, वरन् इतना ही सोचे िक
हमारा िचंतन, मनोयोग एवं शम िकतनी अिधक ऊँची भूिमका िनभा सका? िकतनी बडी छलाँग लगा सका? यही
आपकी अिग परीका है। इसी मे आपका गौरव और समपर ण की साथर कता है। अपने सािथयो की शदा व कमता घटने
न दे। उसे िदन दन
ू ी-रात चौगुनी करते रहे।

समरण रखे िक िमशन का काम अगले िदनो बहु त बढेगा। अब से कई गुना अिधक। इसके िलए आपकी
ततपरता ऐसी होनी चािहए, िजसे ऊँचे से ऊँचे दजे की कहा जा सके। आपका अनतराल िजसका लेखा-जोखा लेते
हु ए अपने को कृत-कृतय अनुभव करे। हम फूले न समाएँ और पेरक सता आपको इतना घिनष बनाए, िजतना की
राम पंचायत मे छठे हनुमान् भी घुस पडे थे।
कहने का सारांश इतना ही है, आप िनतय अपनी अनतरातमा से पूछे िक जो हम कर सकते थे , उसमे कही
राई-रती तुिट तो नही रही? आलसय-पमाद को कही चुपके से आपके िकया-कलापो मे घुस पडने का अवसर तो नही
िमल गया? अनुशासन मे वयितरेक तो नही हु आ? अपने कृतयो को दस
ू रे से अिधक समझने की अहंता कही छद रप
मे आप पर सवार तो नही हो गयी?
यह िवराट् योजना पूरी होकर रहेगी। देखना इतना भर है िक इस अिग परीका की वेला मे आपका शरीर, मन
और वयवहार कही गडबडाया तो नही। ऊँचे काम सदा ऊँचे वयिकतव करते है। कोई लमबाई से ऊँचा नही होता, शम,
मनोयोग, तयाग और िनरहंकािरता ही िकसी को ऊँचा बनाती है। अगला कायर कम ऊँचा है। आपकी ऊँचाई उससे कम
न पडने पाए, यह एक ही आशा, अपेका और िवशवास आप लोगो पर रखकर कदम बढ रहे है। आप मे से कोई इस
िवषम वेला मे िपछडने न पाए, िजसके िलए बाद मे पशचाताप करना पडे।
-पं ० शीराम शमार आचायर , माचर
1984

हमारा यु ग -िनमारण सतसं क लप
(युग-िनमारण का सतसंकलप िनतय दहु राना चािहए। सवाधयाय से पहले इसे एक बार भावनापूवरक पढना और
तब सवाधयाय आरंभ करना चािहए। सतसंगो और िवचार गोिषयो मे इसे पढा और दहु राया जाना चािहए। इस
सतसंकलप का पढा जाना हमारे िनतय-िनयमो का एक अंग रहना चािहए तथा सोते समय इसी आधार पर
आतमिनरीकण का कायर कम िनयिमत रप से चलाना चािहए। )

1.

हम ईशवर को सवर वयापी, नयायकारी मानकर उसके अनुशासन को अपने जीवन मे उतारेगे।

2.

शरीर को भगवान् का मंिदर समझकर आतम-संयम और िनयिमतता दारा आरोगय की रका करेगे।

3.

मन को कुिवचारो और दभ
ु ारवनाओं से बचाए रखने के िलए सवाधयाय एवं सतसंग की वयवसथा रखे रहेगे।

4.

इंिदय-संयम अथर -संयम समय-संयम और िवचार-संयम का सतत अभयास करेगे।

5.

अपने आपको समाज का एक अिभन अंग मानेगे और सबके िहत मे अपना िहत समझेगे।

6.

मयारदाओं को पालेगे, वजर नाओं से बचेगे, नागिरक कतर वयो का पालन करेगे और समाजिनष बने रहेगे।

7.

समझदारी, ईमानदारी, िजममेदारी और बहादरु ी को जीवन का एक अिविचछन अंग मानेगे।

8.

चारो ओर मधुरता, सवचछता, सादगी एवं सजजनता का वातावरण उतपन करेगे।

9.

अनीित से पाप सफलता की अपेका नीित पर चलते हु ए असफलता को िशरोधायर करेगे।

10.
मनुषय के मूलयांकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योगयताओं एवं िवभूितयो को नही, उसके सिदचारो और
सतकमो ं को मानेगे।

11.

दस
ू रो के साथ वह वयवहार न करेगे, जो हमे अपने िलए पसनद नही।

12.

नर-नारी परसपर पिवत दिष रखेगे।

13.
संसार मे सतपवृितयो के पुणय पसार के िलए अपने समय, पभाव, जान, पुरषाथर एवं धन का एक अंश
िनयिमत रप से लगाते रहेगे।
14.

परमपराओं की तुलना मे िववेक को महतव देगे।

15.

सजजनो को संगिठत करने, अनीित से लोहा लेने और नवसृजन की गितिविधयो मे पूरी रिच लेगे।

16.
राषरीय एकता एवं समता के पित िनषावान् रहेगे। जाित, िलंग, भाषा, पानत, समपदाय आिद के कारण परसपर
कोई भेदभाव न बरतेगे।
17.
मनुषय अपने भागय का िनमारता आप है, इस िवशवास के आधार पर हमारी मानयता है िक हम उतकृष बनेगे
और दस
ू रो को शेष बनायेगे, तो युग अवशय बदलेगा।
18.

हम बदलेगे-युग बदलेगा, हम सुधरेगे-युग सुधरेगा इस तथय पर हमारा पिरपूणर िवशवास है।

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