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गायती महामं त और उसका अथर :
ॐ भूभर व
ु ः सवः ततसिवतुवररणे यं भगो देवसय धीमिह

िधयो यो नः पचोदयात्।

उस पाणसवरप, दःु खनाशक, सुखसवरप, शेष, तेजसवी, पापनाशक, देवसवरप परमातमा को हम अपनी
अंतःकरण मे धारण करे. वह परमातमा हमारी बुिद को सनमागर मे पेिरत करे. -ऋगवेद ३/६२/१०, सामवेद १४६२,
यजुवेद ३/३५, २२/९, ३०/२, ३६/३.

Gayatri Mantra and its meaning:
Om bhurbhuvaha swaha

tatsaviturvarenyam

bhargo devasya dhimahi

dhiyo yo naha prachodayat.
We embrace that supreme being, the effulgent divine sun, the ultimate life force, omnipresent
and omnipotent, the destroyer of all sins and sufferings and the bestower of bliss. May he inspire and
enlighten our intellect to follow righteous path. -Rigveda 3/62/10, Samveda 1462, Yajurveda 3/35,
22/9, 30/2, 36/3.

जीवन दे व ता की साधना-आराधना - (कािनतधमी सािहतय पुस तकमाला - 19)

सार-सं के प

ईशवर छोटी-मोटी भेट-पूजाओं या गुणगान से पसन नही होता। ऐसी पकृित तो कुद लोगो की होती है। ईशवर
तो नयायिनष और िववेकवान है। वयिकतव मे आदशर वािदता का समावेश होने पर जो गिरमा उभरती है, उसी के
आधार पर वह पसन होता और अनुगह बरसाता है।
पतीक पूजा की अनेक िविधयाँ है, उन सभी का उदेशय एक ही है, मनुषय के िवकारो को हटाकर, संसकारो
को उभारकर, दैवी अनुगह के अनुकूल बनाना।
साधना से िसिद का िसदानत सवर मानय है। पशन है-साधना िकसकी की जाय? उतर है-जीवन को ही देवता
मानकर चला जाय। यह इस हाथ दे, उस हाथ ले का कम है। इसी आधार पर आतमसनतोष, लोक सममान और देव
अनुगह जैसे अमूलय अनुदान पाप होते है।

अनुक मिणका

1. अधयातम ततवजान का ममर जीवन साधना
2. ितिवध पयोगो का सं ग म-समागम
3. ितिवध भवबं ध न एवं उनसे मुि क
4. साथर क, सुल भ एवं समग साधना
5. वयावहािरक साधना के चार पक
6. जीवन साधना के सुि निशचत सूत
7. सापािहक और अदर वािषर क साधनाएँ
8. आराधना और जानयज

अधयातम ततवजान का ममर जीवन साधना

अित िनकट और अित दरू की उपेका करना मानव का सहज सवभाव है। यह उिक जीवन समपदा के हर केत
मे लागू होती है। जीवन हम हर घडी जीते है, पर न तो उसकी गिरमा समझते और न यह सोच पाते है िक इसके
सदपु योग से कया-कया िसिदयाँ उपलबध हो सकती है। पाणी जनम लेता और पेट पजनन की, पाकृितक उतेजनाओं
से िवकुबध होकर, िनवारह की जररते पूरी करते हु ए दम तोड देता है। ऐसे कण कदािचत ही कभी आते है, जब यह
सोचा जाता हो िक सषा की ितजोरी का सवोपिर उपहार मनुषय जीवन है। िजसे अनुगहपूवरक यह जीवन िदया गया
है, उससे यह आशा की गई है िक वह उसका शेषतम सदपु योग करेगा। अपनी अपूणरता पूरी करके तुचछ से महान
बनेगा, साथ ही िवशव उदान को कुशल माली की तरह सीचते-सँजोते यह िसद करेगा िक उसे सवाथर और परमाथर के
सही रप का जान है। सवाथर इसमे है िक पशु पवृितयो की कुसंसकािरता से पीछा छुडाये और सतपवृितयो की
आवशयक माता मे अवधारणा करते हु ए उस परीका मे उतीणर हो, जो धरोहर का सदपु योग कर सकने के रप मे
सामने पसतुत हु ई है। जो उसमे उतीणर होता है, वह देवमानव की कका मे पवेश करता है। अपना ही भला नही
करता, असंखयो को अपनी नाव मे िबठाकर पार करता है। ऐसो को ही अिभननदनीय, अनुकरणीय महामानव कहा
जाता है। तृिप, तुिष, शािनत के ितिवध आननद ऐसो को ही िमलते है।
मनुषय जीवन िदवय सता की एक बहु मूलय धरोहर है, िजसे सौपते समय उसकी सतपातता पर िवशवास िकया
जाता है। मनुषय के साथ यह पकपात नही है, वरन् ऊँचे अनुदान देने के िलये यह पयोग-परीकण है। अनय जीवधारी
शरीर भर की बात सोचते और िकया करते है , िकनतु मनुषय को सषा का उतरािधकारी युवराज होने के नाते
अनेकानेक कतर वय और उतरदाियतव िनभाने पडते है। उसी मे उसकी गिरमा और साथर कता है। यिद पेट पजनन
तक, लोभ-मोह तक उसकी गितिविधयाँ सीिमत रहे तो उसे नरपशु के अितिरक और कया कहा जायेगा? लोभ-मोह के
साथ अहंकार और जुड जाने पर तो बात और भी अिधक िबगडती है। महतवाकांकाओं की पूितर के िलये उभरी
अहंमनयता अनेक पकार के कुचक रचती और पतन-पराभव के गतर मे िगरती है। अहनता से पेिरत वयिक अनाचारी
बनता है और आकामक भी। ऐसी दशा मे उसका सवरप और भी भयंकर हो जाता है। दषु दरु ातमा एवं नर-िपशाच
सतर की आसुरी गितिविधयाँ अपनाता है। इस पकार मनुषय जीवन जहाँ शेष सौभागय का पतीक था, वहाँ वह दभ
ु ारगय
और दगु र ित का कारण ही बनता है। इसी को कहते है-वरदान को अिभशाप बना लेना। दोनो ही िदशाये हर िकसी के
िलये खुली है। जो इनमे से िजसे चाहता है, उसे चुन लेता है। मनुषय अपने भागय का िनमारता आप जो है।
साधको मे िभनता देखी जाती है। उनके िभन-िभन इष देव उपासय होते है। उनसे अनुगह अनुकमपा की
आशा की जाती है। और िविभन मनोकामनाये पूणर करने की अपेका रखी जाती है। इनमे से िकतने सफल होते है, इस
समबनध मे कुछ कहा नही जा सकता है। कयोिक पराधीनता की िसथित मे सवामी की इचछा पर सब कुछ िनभर र रहता
है। सेवक तो अनुनय-िवनय ही करता रह सकता है, िकनतु जीवन देवता के समबनध मे यह बात नही है। उसकी
अभयथर ना सही रप मे बन पडने पर वह सब कुछ इसी कलपवृक के नीचे पाप िकया जा सकता है , िजसकी कही
अनयत से पाने की आशा लगाई जाती है।
बहाणड का छोटा सा रप िपणड परमाणु है। जो बहाणड मे है वह सब कुुुछ पदाथर के सबसे छोटे घटक
परमाणु मे भी िवदमान है और सौर मणडल की समसत िकया-पिकया अपने मे धारण िकये हु ए है। इसे िवजानवेताओं
ने एक सवर से सवीकार िकया है। इसी पितपादन का दस
ू रा पक यह है िक परमसता बहाणडीय चेतना का छोटा
िकनतु समग पतीक जीव है। वेदानत दशर न के अनुसार पिरषकृत आतमा ही परमातमा है। ततवदशर न के अनुसार इसी
काय कलेवर मे समसत देवताओं का िनवास है। परबह की िदवय कमताओं का समसत वैभव जीवबह के पसुप
संसथानो मे समग रप से िवदमान है। यिद उनहे जगाया जा सके तो िवजात अतीिनदय कमताये और अिवजात िदवय
िवभूितयाँ जागत, सकम एवं िकयाशील हो सकती है। तपसवी, योगी, ऋिष, मनीिष, महामानव िसदपुरष ऐसी ही
िवभूितयो से समपन देखे गये है। तथय शाशवत और सनातन है। जो कभी हो चुका है, वह अब भी हो सकता है।
जीवन देवता की साधना से ही महा िसिदयाँ पाप होती है। कसतूरी के िहरण जैसी बात है। बाहर खोजने मे थकान
और खीझ ही हाथ लगती है। शािनत तब िमलती है , जब उस सुगनध का केनद अपनी ही नािभ मे होने का पता चलता
है। परमातमा के साथ समपकर सथािपत करने के िलये अनयत खोजबीन करने की योजना वयथर है। वह एक देशकाल
तक सीिमत नही है, कलेवरधारी भी नही। उसे अित िनकटवती केत मे देखना हो तो वह अपना अनत:करण ही हो
सकता है। समग जीवन इसी की पतयक अिभवयिक है।
गीताकार ने उस परबह को शदा मे ही समािहत बताया है और कहा है िक िजसकी जैसी शदा हो, वह वैसा
ही है; जो अपने को जैसा मानता है, वह वैसा ही बन जाता है। यिद अपने को तुचछ और हेय समझते रहा जायेगा तो

वयिकतव उसी ढाँचे मे ढल जायेगा। िजसने अपने अनदर मे महानता आरोिपत की है, उसे अपना अिसततव मानवी
गिरमा से ओत-पोत िदखाई पडेगा।
परमातमा सब कुछ करने मे समथर है। उसमे समसत िवभूितयाँ िवदमान है। इसी शासी वचन को यो भी कहा
जा सकता है िक उसका पतीक पितिनिध उतरािधकार युवराज भी, अपने सृजेता की िवशेषताओं से समपन है।
किठनाई तब पडती है जब आतमिवसमृित का अजानानधकार अपनी सघनता से वसतुिसथित को आचछािदत कर लेता
है। अँधेरे मे झाडी को भूत और रससी को साँप के रप मे देखा जाता है। िजधर भी कदम बढाया जाय उधर ही ठोकरे
लगती है, िकनतु यिद पकाश की वयवसथा बन जाये तो सब कुछ यथावत िदखाई पडेगा। आतमबोध को उस पकाश
की वयवसथा बन जाये तो सब कुछ यथावत िदखाई पडेगा। आतमबोध से उस पकाश का उदय माना जाता है, िजसमे
अपने सही सवरप का आभास भी िमलता है और सही मागर ढू ँढने मे भी िवलमब नही लगता।
भेडो के झुणड मे पले िसंह-शावक की कथा सवर िविदत है। अपने ईद-िगदर का वातावरण और पचलन मनुषय
को अपने समूह मे ही घसीट ले जाता है। पर जब आतमबोध होता है , तब पता चलता है िक आतमसता शुदोऽिसबुदोऽिस-िनरंजनोऽिस के िसदानत को अकरश: चिरताथर करती है। ‘‘मनुषय भटका हु आ देवता है’’ इस कथन मे
उसका सही िवशलेषण देखा जा सकता है। यिद भटकाव दरू हो जाये तो समझना चािहये िक समसत समसयाओं का
हल िनकल आया। समसत भवबनधनो से छुटकारा िमल गया। मोक और कुछ नही अपने समबनध मे जो अिचनतय
िचनतनवश भूल हो गई है, उससे ताण पा लेने का परम पुरषाथर है। मकडी अपने िलये जाला अपने भीतर का दव
िनकालकर सवयं ही बुनती है, सवयं ही उसमे उलझती और छटपटाती है, िकनतु देखा यह भी गया है िक जब उसे
उमंग उठती है तो उस जाले को समेट-बटोरकर सवयं ही िनगल भी जाती है। हेय जीवन सवकृत है। जैसा सोचा गया,
चाहा गया वैसी ही पिरिसथितयाँ बन गई।ं अब उसे बदलने का मन हो तो मानयताओं , आकांकाओं और गितिविधयो
को उलटने की देर है। िनकृष को उतकृष बनाया जा सकता है। कुद से महान् बना जा सकता है।
‘‘साधना से िसिद’’ का िसदानत सवर मानय है। देखना इतना भर है िक साधना िकसकी की जाय? अनयानय
इषदेवो के बारे मे कहा नही जा सकता िक उनका िनधारिरत सवरप और सवभाव वैसा है या नही, जैसा िक सोचा,
जाना गया है। इनमे सनदेह होने का कारण भी सपष है। समूची िवशव वयवसथा एक है। सूयर, चनद, पवन आिद
सावर भौम है। ईशवर भी सवर जनीन है, सवर वयापी भी। िफर उसके अनेक रप कैसे बने? अनेक आकार-पकार और गुणसवभाव का उसे कैसे देखा गया? मानयता यिद यथाथर है तो उसका सवरप सावर भौम होना चािहये। यिद वह
मतमतानतरो के कारण अनेक पकार का होता है, तो समझना चािहये िक यह मानयताओं की ही िचत-िविचत
अिभवयिकयाँ है। ऐसी दशा मे सतय तक कैसे पहु ँचा जाय? पशन का सही उतर यह है िक जीवन को ही जीिवत
जागत देवता माना जाये। उसके ऊपर चढे कषाय-कलमषो का पिरमाजर न करने का पयतन िकया जाये। अंगार पर
राख की परत जम जाने पर वह काला-कलूटा िदख पडता है, पर जब वह परत हटा दी जाती है तो भीतर िछपी अिग
सपष दीखने लगती है। साधना का उदेशय इन आवरण आचछादनो को हटा देना भर है। इसे पसुिप को जागरण मे
बदल देना भी कहा जा सकता है।
अधयातम िवजान के ततववेताओं ने अनेक पकार के साधना-उपचार बताये है। यिद गमभीरतापूवरक उनका
िवशलेषण-िववेचन िकया जाय तो पतीत होगा िक यह पतीक पूजा और कुछ नही। मात आतमपिरषकार का ही
बालबोध सतर का पितपादन है। पातता और पखरता का अिभवदरन ही योग और तप का लकय है। पातता एक
चुमबक है जो अपने उपयोग की वसतुओं-शिकयो को अपनी ओर सहज ही आकिषर त करती रहती है। मनुषय मे
िवकिसत हु ए देवतव का चुमबक संसार मे संवयाप शिकयो और पिरिसथितयो को अपनी ओर आकिषर त करता रहा है।
जलाशय गहरे होते है। सब ओर से पानी िसमटकर इक_ुा होने के िलये उनमे जा पहु ँचता है। समुद मे सभी निदयाँ
जा िमलती है। यह उसकी गहराई का ही पितफल है। पवर त की चोिटयो पर यिद शील की अिधकता से बफर जम भी
जाय तो वह गमी पडते ही िपघल जाता है और निदयो से होकर समुद मे पहु ँचकर रकता है। इसी को कहते है -पातता
पातता का अिभवदरन ही साधना का मूलभूत उदेशय है। ईशवर को न िकसी की मनुहार चािहये और न उपहार। वह
छोटी-मोटी भेट-पूजाओं से या सतवन गुणगान से पसन नही होता। ऐसी पकृित तो कुद लोगो की होती है। भगवान्
का ऐसा मानस नही। वह नयायिनष और िववेकवान है। वयिक मे उतकृष आदशर वािदता का समावेश होने पर जो
गिरमा उभरती है उसी के आधार पर वह पसन होता और अनुगह बरसाता है। उसे फुसलाने का पयास करने वालो
की बालकीडा िनराशा ही पदान करती है।
ऋिष ने पूछा-कसमै देवाय हिवषा िवधेम्’’ अथारत् ‘‘हम िकस देवता के िलये भजन करे’’ ? उसका सुिनिशचत
उतर है-आतमदेव के िलये। अपने आप को िचनतन, चिरत और वयवहार की कसौिटयो पर खरा िसद करना ही वह
िसथित है िजसे सौ टंच सोना कहते है। पेड पर फल फूल ऊपर से टपक कर नही लदते , वरन् जडे जमीन से जो रस

खीचती है उसी से वृक बढता है और फलता-फूलता है। जडे अपने अनदर है, जो समूचे वयिकतव को पभािवत करती
है। िजनके आधार पर आधयाितमक महानता और भौितक पगितशीलता के उभयपकीय लाभ िमलते है। यही
उपासना, साधना और आराधना का समिनवत सवरप है। यही वह साधना है िजसके आधार पर िसिदयाँ और
सफलताये सुिनिशचत बनती है। दस
ू रे के सामने हाथ पसारने, िगडिगडाने भर से पातता के अभाव मे कुछ पाप नही
होता। भले ही वह दानी परमेशवर ही कयो न हो! कहा गया है िक ईशवर केवल उनकी सहायता करता है, जो अपनी
सहायता आप करने को ततपर है। आतमपिरषकार, आतमशोधन यही जीवन साधना है। इसी को परम पुुुरषाथर कहा
गया है। िजनहोने इस लकय को समझा तो जानना चािहये िक उनहोने अधयातम ततवजान का रहसय और मागर हसतगत
कर िलया। चरम लकय तक पहु ँचने का राजमागर पा िलया।

ितिवध पयोगो का सं ग म-समागम

गङा, यमुना, सरसवती के िमलन से तीथर राज ितवेणी संगम बनता है , बहा, िवषणु, महेश देवािधदेव है। इसी
पकार सरसवती, लकमी, काली, शिकयो की अिधषाती है। मृतयु लोक, पाताल और सवगर ये तीन लोक है। गायती के
तीन चरण है, िजनहे वेदमाता, देवमाता, िवशवमाता के नाम से जाना जाता है। जीवन सता के भी तीन पक है, िजनहे
िचनतन, चिरत और वयवहार कहते है। इनही को ईशवर, जीव, पकृित कहा गया है। तथय को और भी अिधक सपष
करना हो तो इनहे आतमा, शरीर और संसार कह सकते है। यह ितवगर ही हमे सवर त दिषगोचर होता है। उदव,
अिभवदरन और िवलयन के रप मे पकृित की अनेकानेक हलचले इसी आधार पर चलती रहती है।
जीवन तीन भागो मे बँटा हु आ है- (१) आतमा, (२) शरीर और (३) पदाथर समपकर। शरीर को सवसथ और
सुनदर बनाने का पयतन िकया जाता है। आतमा को पिरषकृत और सुसंसकृत बनाया जाता है तथा संसार मे से वैभव
और िवलास के सुिवधा-साधन सँजोये जाते है। पिरवार समेत समूचा समपकर केत भी इसी पिरिध मे आता है। जीवन
साधना का समग रप वह है िजसमे इन तीनो का सतर ऐसा बना रहे , िजससे पगित और शािनत की सुवयवसथा बनी
रहे।
इन तीनो मे पधान चेतना है, िजसे आतमा भी कह सकते है। दिषकोण इसी के सतर पर िविनिमर त होता है।
इचछाओं, भावनाओं मानयताओं का रझान िकस ओर हो, िदशाधारा और रीित-नीित कया अपनाई जाय, इसका
िनणर य अनत:करण ही करता है। उसी के अनुरप गुण, कमर , सवभाव बनते है। िकस िदशा मे चला जाय? कया िकया
जाय? इसके िनिमत संकलप उठना और पयतन बन पडना भी आितमक केत का िनधाररण है। इसीिलये आतमबल को
जीवन की सवोपिर समपदा एवं सफलता माना गया है। इसी के आधार पर संयमजनय सवासथय मे पगित होती है। मन
मे ओजस्, तेजस् और वचर सकारी पितभा चमकती है। बहु मुखी समपदाये इसी पर िनभर र है। इसिलये जीवन साधना
का अथर आितमक पगित होता है। वह िगरती-उठती है, तो समूचा जीवन िगरने-उठने लगता है। इसिलये जीवन
साधना को आतमोतकषर पधान मानना चािहये। उसी के आधार पर शरीर वयवसथा, साधन संचय और जन समपकर का
ढाँचा खडा करना चािहये। ऐसा करने पर तीनो ही केत सुवयविसथत बनते रहते है और जीवन को समग पगित,
सफलता या साथर कता के लकय तक पहु ँचाया जा सकता है।
आितमक पगित का सावर भौम उपाय एक ही है-िकयाकृतयो के माधयम से आतमिशकण। इसे पतीक पूजा भी
कह सकते है। मनुषय के मानस की बनावट ऐसी है िक वह िकनही जानकािरयो से अवगत तो हो जाता है , पर उसे
वयवहार मे उतारना िकया अभयास के िबना समभव नही होता। यह अभयास ही वे उपासना कृतय है , िजनहे
योगाभयास, तपशचयार, जप, धयान, पाणायाम, पतीक पूजा आिद के नाम से जाना जाता है। इनमे अङ-संचालन मन
का केनदीकरण एवं उपचार सामगी का पयोग ये तीनो ही आते है। अनेक धमर समपदायो मे पूजा िवधान अलग-अलग
पकार से है, तो भी उनका अिभपाय और उदेशय एक ही है-आतमिशकण भाव-संवेदनाओं का उनयन। यिद यह लकय
जुडा हु आ न होता तो उसका सवरप मात िचह पूजा जैसा लकीर पीटने जैसा रह जाता है। िनषपाण शरीर का मात
आकार तो बना रहता है, पर वह कुछ कर सकने मे समथर नही होता। इसी पकार ऐसे पूजा-कृतय िजसमे साधक की
भाव-संवेदना के उनयन का उदेशय पूरा न होता हो आतमिशकण और आितमक पगित का पयोजन पूरा न कर सकेगे।
इन िदनो यही चल रहा है। लोग मात पूजाकृतयो के िवधान भर िकसी पकार पूरे करते है और साथ भावसंवेदनाओं को जोडने का पयतन नही करते, आवशयकता तक नही समझते। फलत: उनमे संलग लोगो मे से
अिधकांश के जीवन मे िवकास के कोई लकण नही दीख पडते। कृतयो से देवता को पसन करके उनसे मन चाहे

वरदान माँगने की बात की कोई तुक नही। इसिलये उस बेतुकी पिकया का अभीष पिरणाम हो भी कैसे सकता है?
एक ही देवता के दो भक परसपर शतु भी हो सकते है। दोनो अपनी-अपनी मजी की याचना कर सकते है। ऐसी दशा
मे देवता असमंजस मे फँस सकता है िक िकसकी मनोकामना पूरी करे ? िकसकी न करे? िफर देवता पर भी
िरशवतखोर होने का चापलूसी पसनद सामनत जैसा सतर होने का आरोप लगता है। िकतने लोग है, जो पूजाकृतय
अपनाने के साथ इस गमभीरता मे उतरते है और यथाथर ता को समझने का पयतन करते है ? अनधी भेडचाल अपनाने
पर समय की बरबादी के अितिरक और कुछ हसतगत हो भी नही सकता।
हमे यथाथर ता समझनी चािहये और यह यथाथर वादी कम अपनाना चािहये िजससे आितमक पगित के लकय
तक पहु ँचा और उसके साथ अिविचछन रप से जुडी हु ई सवर तोमुखी पगित का लाभ उठाया जा सके।
शरीर पोषण के िलये तीन अिनवायर साधनो की आवशयकता होती है-१ आहार, (२) जल और (३) वायु।
ठीक इसी पकार आितमक पगित की आवशयकता पूरी करने के िलये तीन माधयम अपनाने होते है - १ उपासना, (२)
साधना और (३) आराधना। इन शबदो का और भी अिधक सपषीकरण इस पकार समझना चािहये।
उपासना का अथर है-िनकट बैठना। िकसके? ईशवर के। ईशवर िनराकार है। इसकी पितमा या छिव तो धयानधारणा की सुिवधा के िलये िविनिमर त की जाती है। मानवी अनत:करण के साथ उसकी घिनषता उतकृष िचनतन के
आदशर वादी भाव संवेदना के रप मे ही होती है। यही भिक का, ईशवर सािनधय का, ईशवर दशर न का वासतिवक रप
है। यिद साकार रप मे उसका िचनतन करना हो तो िकसी किलपत पितमा मे इनही िदवय संवेदनाओं के होने की
मानयता और उसके साथ अिविचछन जुडे होने के रप मे भी िकया जा सकता है। ऐसे महामानव िजनहोने आदशो ं का
पिरपालन और लोकमंगल के िलये समिपर त होने के रप मे अपने जीवन का उतसगर िकया, उनहे भी पतीक माना जा
सकता है? राम, कृषण, बुद, गाँधी आिद को भगवान् का अंशावतार कहा जा सकता है। उनहे इष मानकर उनके ढाँचे
मे ढलने का पयतन िकया जा सकता है। इस िनिमत िकया गया पूजा पयास उपासना कहा जा जायेगा।
दस
ू रा चरण है-साधना िजसका पूरा नाम है जीवन साधना। इसे चिरत िनमारण भी कहा जा सकता है। िचनतन
मे भाव-संवेदनाओं का समावेश तो उपासना केत मे चला जाता है, पर शरीरचयार की धारा-िवधा जीवन साधना मे
आती है। इसमे आहार-िवहार रहन-सहन संयम, कतर वयो का पिरपालन, सदगुणो का अिभवदरन दषु पवृितयो का
उनमूलन आिद आते है। संयमशील, अनुशािसत और सुवयविसथत िकया-कलाप अपनाना जीवन साधना कहा
जायेगा। िजस पकार जंगली पशु को सरकस का पिशिकत कलाकार बनाया जाता है। िजस पकार िकसान ऊबडखाबड जमीन को समतल करके उवर र बनाता है, िजस पकार माली सुिनयोिजत ढंग से अपना उदान लगाता है और
सुरमय बनाता है। उसी पकार जीवन का वैभव का शेषतम सदपु योग करने लगना जीवन साधना है। वयिकतव को
पिवत, पामािणक, पखर बनाने की पिकया जीवन साधना है। यह बन पडने पर ही आतमा मे परमातमा का अवतरण
समभव होता है। धुले हु ए कपडे की ही रँगाई ठीक तरह होती है। चिरतवान वयिक ही सचचे अथो ं मे भगवद् भक बनते
है। दैवी वरदान ऐसे ही लोगो पर बरसते है। सवगर , मुिक, िसिद, तुिष, तृिप, शािनत जैसी िदवय िवभूितयो से मात
चिरतवान ही समपन होते है उनमे सदावना, शालीनता, सुसंसकािरता के सभी लकण उभरे हु ए दीखते है। सामानय
िसथित मे रहते हु ए भी ऐसे ही लोग महामानव, देवमानव बनते है।
तीसरा चरण है-आराधना इसे अभयथर ना, अचर न भी कहते है। दस
ू रे शबदो मे इसी को पुणय परमाथर -लोकमंगल
जन-कलयाण आिद भी कहते है। यह संसार िवराट बह का साकार सवरप है। इसमे िनवास करने वाले पािणयो और
पदाथो ं का, पिरिसथितयो का सुिनयोजन करने मे संलग रहना आराधना है। सामािजक पाणी होने के नाते मनुषय
पकारानतर से सभी का ऋणी है। इसकी भरपाई करने के िलये उसे परमाथर परायण होना ही चािहये।
साधना, सवाधयाय, संयम और सेवा के चार आधार सवर तोमुखी पगित के िलये आवशयक माने गये है। जीवन
साधना मे सवाधयाय की, संयमशीलता की और लोकमंगल के िलये िनरनतर समयदान, अंशदान लगाते रहने की
आवशयकता पडती है। सेवा कायो ं के िलये समयदान, शमदान अिनवायर रप से आवशयक है। इसके िबना पुणय संचय
की बात बनती ही नही। संयम तो अपने शरीर, मन और सवभाव मे सवयं भी साधा जा सकता है , पर सेवाधमर अपनाने
के िलये समयदान के अितिरक साधनदान की भी आवशयकता पडती है। उपािजर त आजीिवका का सारा भाग पेट
पिरवार के िलये ही खचर नही करते रहना चािहये, वरन् उसका एक महतवपूणर अंश लोकमंगल के िलये भी िनयिमत
और िनिशचत रप से िनकालते रहना चािहये। उपासना, साधना और आराधना को; िचनतन, चिरत और वयवहार को
पिरषकृत करने की पिकया को िनतय कायर मे िनतय िनयम मे सिममिलत रखना चािहये। उनमे से िकसी एक को
यदाकदा कर लेने से काम नही चलता। भोजन, शम और शयन-ये तीनो ही िनतय करने पडते है। इनमे से िकसी को
यदाकदा नयूनािधक माता मे मनमजी से कर िलया जाया करे, तो उस असतवयसतता के रहते न तो सवासथय ठीक रह
सकता है और न वयविसथत उपकम चल सकता है। िफर िकसी पयोजन मे सफल हो सकना तो बन ही िकस पकार

पडे?
जीवन एक सुवयविसथत तथय है। वह न तो असत-वयसत है और न कभी कुछ करने, कभी न करने जैसा
मनमौजीपन। पशु-पकी तक एक िनयिमत पकृित वयवसथा के अनुरप जीवनयापन करते है। िफर मनुषय तो सृिष का
मुकुटमिण है। उसके ऊपर मात शरीर िनवारह का ही नही, कतर वयो और उतरदाियतव के पिरपालन का अनुशासन भी
है। उसे मानवी उदारता के अनुरप मयारदाये पालनी और वजर नाये छोडनी पडती है। इतना ही नही, वह पुणय परमाथर
भी िवशेष पुरषाथर के रप मे अपनाना पडता है, िजसके िलये सषा ने अपना अजस अनुदान देते हु ए आशा एवं
अपेका रखी है। इतना सब बन पडने पर ही उसे लकय की पािप होती है िजसे ईशवर की पािप या महानता की
उपलिबध कहा जाता है।
जीवन साधना नकद धमर है। इसके पितफल पाप करने के िलये लमबे समय की पतीका नही करनी पडती।
‘‘इस हाथ दे, उस हाथ ले’’ का नकद सौदा इस मागर पर चलते हु ए हर कदम पर फिलत होता रहता है। एक कदम
आगे बढने पर मंिजल की दरू ी उतनी फुट कम होती है, साथ ही जो िपछडापन था, वह पीछे छूटता है। इसी पकार
जीवन साधना यिद तथयपूणर, तकरसंगत और िववेकपूणर सतर पर की गई है तो इसका पितफल दो रप मे हाथो-हाथ
िमलता चलता है। एक संिचत पशु पवृितयो का अभयास छूटता है , वातावरण की गनदगी से ऊपर चढे कषाय-कलमष
घटते है। दस
ू रा लाभ यह होता है िक नरपशु से नरदेव बनने के िलये जो पगित करनी चािहये उसकी वयवसथा सही
रप से बन पडती है। सवयं को अनुभव होता है िक वयिकतव िनरनतर उचचसतरीय बन रहा है। उतकृषता और
आदशर वािदता की दोनो ही उपलिबधयाँ िनरनतर हसतगत हो रही है। यही है वह उपलिबध, िजसे जीवन की साथर कता,
सफलता एवं मनुषय मे देवतव का पतयक अवतरण कहते है। ततवजान की भाषा मे इसी को ईशवरपािप, भव बनधनो से
मुिक, परमिसिद अथवा सवगर सोपान मे पिविष कहा जाता है। इन सहज उपलिबधयो से वंिचत इसिलये रहना पडता
है िक न तो जीवन साधना का दशर न ठीक तरह समझा जाता है और न जानकारी के अभाव मे सही पयोग का
अभयास बन पडता है।
ितिवध भवबनधन एवं उनसे मुि क
साधना से तातपयर है-साध लेना, सधा लेना। पशु पिशकक यही करते है। अनगढ एवं उचछृंखल पशुओं को वे
एक रीित-नीित िसखाते है, उनको अभयसत बनाते है और उस िसथित तक पहु ँचाते है , िजसमे उस असंसकृत पाणी
को उपयोगी समझा जा सके। उसके बढे हु ए सतर का मूलयांकन हो सके। पालने वाला अपने को लाभािनवत हु आ
देख सके। िसखाने वाला भी अपने पयास की साथर कता देखते हु ए पसन हो सके।
देखा यह जाता है िक भक भगवान् को साधता है। उसको मूखर समझते हु ए उसकी गलितयाँ िनकालता है।
तरह-तरह के उलाहने देता है। साथ ही िगडिगडाकर, नाक रगडकर, खीसे िनपोरकर अपना-अपना अनुिचत उलू
सीधा करने के िलये जाल-जंजाल बुनता है। पशंसा के पुल बाँधता है। िछटपुट भेट चढाकर उसे फुसलाने का पयतन
करता है। समझा जाता है िक सामानय लोगो से वयावहािरक जगत मे आदान-पदान के आधार पर ही लेन-देन चलता
है, पर ईशवर या देवता ऐसे है िजनहे वाणी की वाचालता तथा शारीिरक-मानिसक उचक-मचक करने भर से वशवती
नही िकया जा सकता है। यह दाशर िनक भूल मनुषय को एक पकार से िछपा हु आ नािसतक बना देती है। पकट
नािसतक वे है जो पतयकवाद के आधार पर ईशवर की सता सपष दिषगोचर न होने पर उसकी मानयता से इंकार कर
देते है। दस
ू रे िछपे नािसतक वे है जो उससे पकपात की, मुफत मे लमबी-चौडी मनोकामनाओं की पूितर चाहते रहते है।
मनुषय िविध वयवसथा को तोडता-छोडता रहता है, पर ईशवर के िलये यह समभव नही िक अपनी बनाई कमर फल
वयवसथा का उलंघन करे या दस
ू रो को ऐसा करने के िलये उतसािहत करे। तथाकिथत भक लोग ऐसी ही आशाएँ
िकया करते है। अनतत: उनहे िनराश ही होना पडता है। इस िनराशा की खीज और थकान से वे या तो साधना-िवधान
को िमथया बताते है या ईशवर के िनषु र होने की मानयता बनाते है। कई पाखणडी कुछ भी हसतगत न होने पर भी
पवंचना रचते है और नकटा समपदाय की तरह अपनी िसिद-सफलता का बखान करते है। आज का आिसतकवाद
इसी िवडमबना मे फँसा हु आ है और वह लगभग नािसतकवाद के सतर पर जा पहु ँचा है।
आवशयकता है भािनतयो से िनकलने और यथाथर ता को अपनाने की। इस िदशा मे मानयताओं को अगगामी
बनाते हु ए हमे सोचना होगा िक जीवन साधना ही आधयाितमक सवसथता और बिलषता है। इसी के बदले पतयक
जीवन मे मरण की पतीका िकये िबना, सवगर , मुिक और िसिद का रसासवाद करते रहा जा सकता है। उन लाभो को
हसतगत िकया जा सकता है, िजनका उलेख अधयातम िवधा की महता बताते हु ए शासकारो ने िवसतारपूवरक िकया
है। सचचे सनतो-भको का इितहास भी िवदमान है। खोजने पर पतीत होता है िक पूजा-पाठ भले ही उनका नयूनािधक

रहा है, पर उनहोने जीवन साधना के केत मे पिरपूणर जागरकता बरती। इसमे वयिककम नही आने िदया। न आदशर की
अवजा की और न उपेका बरती। भाव-संवेदनाओं मे शदा, िवचार बुिद मे पजा और लोक वयवहार मे शालीन
सदावना की िनषा अपनाकर कोई भी सचचे अथो ं मे जीवन देवता का सचचा साधक बन सकता है। उसका उपहार,
वरदान भी उसे हाथोहाथ िमलता चला जाता है।
ऋिषयो, मनीिषयो, सनत-सुधारको और वातावरण मे ऊजार उभार देने वाले महामानवो की अनेकानेक
सािकयाँ िवशव इितहास मे भरी पडी है। इनमे से पतयेक को हर कसौटी पर जाँच -परखकर देखा जा सकता है िक
उनमे से हर एक को अपना वयिकतव उतकृषता की कसौटी पर खरा िसद करना पडा है। इससे कम मे िकसी को भी
न आतमा की पािप हो सकी न परमातमा की, न ऐसो का लोक बना, और न परलोक। पूजा को शृंगार माना जाता रहा
है। सवासथय वासतिवक सुनदरता है। ऊपर से सवसथ वयिक को वसाभूषणो से, पसाधन सामगी से सजाया भी जा
सकता है। इसे सोने मे सुगनध का संयोग बन पडा माना जा सकता है। जीवन साधना समग सवासथय बनाने जैसी
िवधा है। उसके ऊपर पूजा-पाठ का शृगं ार सजाया जाय तो शोभा और भी अिधक बढेगी। इसमे सुरिच तो है िकनतु
यह नही माना जाना चािहये िक मात शृंगार साधनो के सहारे िकसी जीणर -जजर र रगण या मृत शरीर को सुनदर बना
िदया जाय तो पयोजन सध सकता है। इससे तो उलटा उपहास ही बढता है। इसके िवपरीत यिद कोई हष-पुष
पहलवान मात लँगोट पहनकर अखाडे मे उतरता है तो भी उसकी शोभा बढ जाती है। ठीक इसी पकार जीवन को
सुसंसकृत बना लेने वाले यिद पूजा-अचर ना के िलये कम समय िनकाल पाते है तो भी काम चल जाता है।
अधयातम िवजान के साधको को अपने दिषकोण मे मौिलक पिरवतर न करना पडता है। उनहे सोचना होता है
िक मानव जीवन की बहु मूलय धरोहर का इस पकार उपयोग करना है, िजससे शरीर का िनवारह लोक वयवहार भी
चलता रहे, पर साथ ही आितमक अपूणरता को पूरी करने का चरम लकय भी पाप हो सके। ईशवर के दरबार मे
पहु ँचकर सीना तानकर यह कहा जा सके िक जो अमानत िजस पयोजन के िलये सौपी गई थी, उसे उसी हेतु सही
रप मे पयुक िकया गया।
इस मागर मे सबसे बडी रकावटे तीन है। इनही को रावण, कुमभकरण, मेघनाथ कहा गया है। यह दैवी भागवत
के मिहषासुर, मधुकैटभ, रकबीज है। ये पाय: साथ लगे रहते है और पीछा नही छोडते। इनही के कारण मनुषय पतन
और पराभव के गतर मे जा िगरता है। पशु, पेत और िपशाच की िजनदगी जीता है। नर-वानर और नर-पामर के रप मे
इनही के चंगुल मे फँसे हु ए लोगो को देखा जाता है। ये तीन है-लोभ मोह एवं अहंकार। वासना, तृषणा और कुतसा इनही
के कारण उतपन होती है।
लोक िवजय के िलये सादा जीवन उचच िवचार का िसदानत अपनाना पडता है। औसत नागिरक सतर के
िनवारह मे सनतोष करना पडता है। ईमानदारी और पिरशम की कमाई पर िनभर र रहना पडता है। लालची के िलये
अनीित अपनाये िबना तृषणा की पूितर कर सकना िकसी भी पकार समभव नही होता। जो वयिक िवलास मे अिधक
खचर करता है, वह पकारानतर से दस
ू रो को उतना ही अभावगसत रहने के िलये मजबूर करता है। इसीिलये शासकारो
ने पिरगह को पाप बताया है। िवलासी, संगही, अपवययी की भी ऐसी िननदा की गई है।
अिधक कमाया जा सकता है, पर उसमे से िनजी िनवारह मे सीिमत वयय करके शेष बचत क ुो िगरो को
उठाने, उठो को उछालने और सतपवृितयो के संवदरन मे लगाया जाना चािहये। राजा जनक जैसे उदाहरणो की कमी
नही। िमतवययी अनेक दवु यर सनो और अनाचारो से बचता है। ऐसी हिवश उसे सताती नही िजसके िलये अनाचार पर
उतार होना पडे। साधु-बाहणो की यही परमपरा रही है। सजजनो की शालीनता भी उसी आधार पर फलती-फूलती
रही है। जीवन साधना के उस पथम अवरोध ‘लोभ’ को िनयिनतत कराने वाला दिषकोण हर जीवन साधना के
साधक को अपनाना ही चािहये।
मोह वसतुओं से भी होता है और वयिकयो से भी। छोटे दायरे मे आतमीयता सीमाबद करना ही मोह है।
उसके रहते हदय की िवशालता चिरताथर ही नही होती। अपना शरीर और पिरवार ही सब कुछ िदखाई पडता है।
उनही के िलये मरने-खपने के कुचक मे फँसे रहना पडता है। ‘आतमवत् सवर भूतेष’ु और ‘वसुधव
ै कुटु मबकम्’ के दो
आतमवादी िसदानत है। इनमे से एक को भी ‘मोहगसत’ कायारिनवत नही कर सकता। इसिलये अपने मे सबको और
सबमे अपने को देखने की दिष िवकिसत करना जीवन साधना के िलये आवशयक माना गया है।
पिरवार छोटे से छोटा रखा जाय। पूवरवती अिभभावको, बडो और आिशतो के ऋणो को चुकाने की ही
वयवसथा नही बन पाती तो नये अितिथयो को कयो नयौत बुलाया जाय? समय की िवषमता को देखते हु ए अनावशयक
बचचे उतपन कर पिरवार का भार बढाना परले िसरे की भूल है। समान िवचारो का साथी-सहयोगी िमले तो िववाह
करने मे हजर नही, पर वह एक दस
ू रे की सहायता सेवा करते हु ए पगितपथ पर अगसर होने के िलये ही िकया जाना

चािहये। िजनहे सनतान की बहु त ललक हो, वे िनधर नो के बचचे पालने के िलये ले सकते है। पिरवार को सवावलमबी
और सुसंसकारी बनाना पयारप है। औलाद के िलये िवपुल समपदा उतरािधकार मे छोड मरने की भूल िकसी को नही
करनी चािहये। मुफत का माल िकसी को भी हजम नही होता। वह दबु र िु द और दगु र ुण ही उतपन करता है। सनतान पर
यह भार लदेगा तो उसका अपकार ही होगा।
पािरवािरक उतरदाियतवो को िनभाया जाना चािहये, पर उस कीचड मे इतनी गहराई तक नही फँसना चािहये
िक उबर सकना समभव न हो सके। मोह को भव बनधनो मे से पमुख माना गया है। उसी संकीणर दायरे मे जकडे हु ए
लोग, लोकमंगल का कतर वय पालन कर ही नही पाते। िजनहे सभी के पित पािरवािरकता का भाव अपनाने का अवसर
िमलता है, उनके िलये हर िकसी को आतमा मानने का, सभी की सेवा-सहायता करने का आननद िमलता है।
अहंकार मोटे अथो ं मे घमणड समझा जाता है। अकडना, उदत-अिशष वयवहार करना, कोधगसत रहना
अहंकार की िनशानी है। पर वसतुत: वह और भी अिधक सूकम और वयापक है। फैशन, सजधज, शृंगार, ठाठ-बाट
अपवयय, ससता बडपपन आिद अहंकार पिरवार के ही सदसय है। लोग शेखीखोरी के िलये ढे रो समय, शम और पैसा
खचर करते देखे जाते है। यह भी एक पकार का नशा है , िजसमे अपने को भले ही मजा आता हो, पर हर िवचारशील
को इसमे कुदता की, बचकानेपन की ही गनध आती है। इस िवडमबना के िलये िचत-िविचत पवंचनाये रचनी पडती है।
ईषयार, देष उतपन करने मे भी अहंता की ही पमुख भूिमका रहती है। कलह और िवगह पाय: उसी कारण उतपन होते
है। आदमी की िविशषता अपनी िवनयशीलता एवं दस
ू रो के सममान मे िनिहत है। उसी कसौटी पर िकसी की
सजजनता परखी जाती है। अहंकारी से उन सदगुणो मे से एक भी नही िनभ पाता। अहंभाव को आतमघाती शतु माना
गया है। ऐसे लोगो से आतमसाधना तो बन ही नही पाती। उन पर उदणडता व दस
ू रो को नीचा िदखाने का भूत सदैव
चढा रहता है और दस
ू रो को िगराने एवं नीचा िदखाने की ही ललक उठती रहती है। ऐसे लोग अपनी पशंसा और
दस
ू रो की िननदा करने मे ही लगे रहते है। इन पिरिसथितयो मे आतमोतकषर और आतमपिरषकार कैसे बन पडे?
लोभ, मोह और अहंकार के तीन भारी पतथर िजनहोने िसर पर लाद रखे है, उनके िलये जीवन साधना की
लमबी और ऊँची मंिजल पर चल सकना, चल पडना असमभव हो जाता है। भले ही कोई िकतना पूजा-पाठ कयो न
करता रहे! िजनहे तथयानवेषी बनना है, उनहे इन तीन शतुओं से अपना पीछा छुडाना ही चािहये।
हलकी वसतुएँ पानी पर तैरती है, िकनतु भारी होने पर वे डू ब जाती है। जो लोभ, मोह और अहंकार रपी
भारी पतथर अपनी पीठ पर लादे हु ए है, उनहे भवसागर मे डू बना ही पडेगा। िजनहे तरना, तैरना है, उनहे इन तीनो
भारो को उतारने का पयतन करना चािहये।
अनेकानेक दोष-दगु र ुणो कषाय-कलमषो का वगीकरण िवभाजन करने पर उनकी संखया हजारो हो सकती है ,
पर उनके मूल उदगम यही तीन लोभ, मोह और अहंकार है। इनही भव बनधनो से मनुषय के सथूल , सूकम और कारण
शरीर जकडे पडे है। इनका उनमूलन िकये िबना आतमा को उस सवतनतता का लाभ नही िमल सकता िजसे मोक
कहते है। इन तीनो पर कडी नजर रखी जाय। इनहे अपना संयक
ु शतु माना जाये। इनसे पीछा छुडाने के िलये हर
िदन िनयिमत रप से पयास जारी रखा जाये। एकदम तो सब कुछ सही हो जाना किठन है , पर उनहे िनतयपित
यथासमभव घटाते-हटाते चलने की पिकया जारी रखने पर सुधार कम मे सफलता िमलती ही चलती है और एक िदन
ऐसा भी आता है, जब इनसे पूरी तरह छुटकारा पाकर बनधन मुक हु आ जा सके।

साथर क, सुल भ एव समग साधना

पदाथर से शरीर और आतमा का महतव अिधक है। इसी पकार समृिद-समपनता का, पगित और योगयता का,
आितमक पखरता, पितभा का सतर भी कम से, एक से एक सीढी ऊँचाई का समझा जा सकता है। आनतिरक
आसथाएँ ही वे िवभूितयाँ है, जो वयिक के िचनतन, चिरत और वयवहार को पिरषकृत करती है। वयिकतव को पखर,
पामािणक एवं पितभावान् बनाती है। इसी आधार पर वे कमताएँ उभरती है , जो अनेकानेक सफलताओं की उदगम
सोत है।
आतमबल के आधार पर अनय सभी बल हसतगत िकये जा सकते है। इसी के आधार पर उपलिबधयो का
सदपु योग बन पडता है। पिरिसथितयो की पितकूलता रहने पर भी उनहे वयिकतव की उतकृषता के आधार पर अनुकूल

बनाया जा सकता है। संसार के इितहास मे ऐसे अगिणत वयिक हु ए है, िजनकी पारिमभक पिरिसथितयाँ गई-गुजरी थी।
िनवारह के साधनो तक की कमी पडती थी, िफर पगित के सरंजाम जुट सकना और भी किठन, लगभग असमभव दीख
पडता था। इतने पर भी वे वयिकतव की पामािणकता के आधार पर सभी के िलये िवशवसत एवं आकषर क बन गये।
उनका चुमबकतव वयिकयो, साधनो और पिरिसथितयो को अनुकूल बनाता चला गया और वे अपने पुरषाथर के साथ
उस सदाव का तालमेल िबठाते हु ए िदन-िदन ऊँचे उठते चले गये और अनतत: सफलता के सवोचच िशखर तक जा
पहु ँचने मे समथर हु ए। ऐसे अवसरो पर वयिकतव की उतकृषता को ही शेय िदया जाता है। इस उपलिबध को ही
आतमबल का चमतकार कहते है।
इसके िवपरीत ऐसे भी अनेकानेक पसंग सामने आते रहते है, िजसमे सभी अनुकूलताएँ रहने पर भी लोग
अपनी दबु र िु द के कारण िदन-िदन घटते और िगरते चले गये। पूवरजो के कमाये धन को दवु यर सनो मे उडा िदया।
आलसय और पमाद मे गिसत रहकर अपनी कमताओं और समपदाओं को गलाते चले गये। कई अनाचार के मागर पर
चल पडे और दगु र ित भुगतने के िलये मजबूर हु ए। इसमे उनके मानस की गुण, कमर , सवभाव की िनकृषता ने अनेक
सुिवधाएँ रहते हु ए भी उनहे असुिवधा भरी पिरिसथितयो तक पहु ँचा िदया।
चेतना की शिक संसार की सबसे बडी शिक है। मनुषय ही, रेल, जहाज कारखाने आिद बनाता है। िवजान के
िनत नये आिवषकार करता है। यहाँ तक िक धमर और दशर न, आचार और िवचार भी उसी के रचे हु ए है। ईशवर की
साकार रप मे कलपना तथा सथापना करना भी उसी का बुिद-कौशल है। इस अनगढ धरातल को, सुिवधाओं,
सुनदरताओं, उपलिबधयो से भरापूरा बनाना भी मनुषय का ही काम है। यहाँ मनुषय शबद मे िकसी शरीर या वैभव को
नही समझा जाना चािहये। िवशेषताएँ चेतना के साथ जुडी होती है। इसे भी पयतन पूवरक उठाया या िगराया जा
सकता है। शरीर को बिलष या दबु र ल बना लेना पाय: मनुषय की अपनी, रीित-नीित पर िनभर र रहता है। समपन और
िवपन भी लोग अपनी हरकतो से ही बनते है। उठना और िगरना अपने हाथ की बात है। मनुषय को अपने भागय का
िनमारता आप कहा जाता है। यहाँ वयिक का मतलब आतमचेतना से ही समझा जाना चािहये। वही पगितशीलता का
उदगम है। इसी केत मे पतन-पराभव के िवषैले बीजांकुर भी जमे होते है। सदगुणी लोग अभावगसत पिरिसथितयो मे भी
सुख-शािनत का वातावरण बना लेते है। अनत: चेतना से समुनत होने पर समूचा वातावरण, समपकर केत सुख-शािनत
से भर जाता है। इसके िवपरीत िजनका मानस दोष-दगु र ुणो से भरा हु आ है, वे अचछी भली पिरिसथितयो मे भी दगु र ित
और अवगित का कठोर द ु:ख सहते है।
वैभव अिजर त करने के अनेक तरीके सीखे और िसखाये जाते है। शरीर को िनरोग रखने के िलये भी
वयायामशालाओं, सवासथय केनदो से लेकर असपतालो तक की अनेक वयवसथाये देखी जाती है। औदोिगक, वैजािनक,
शैकिणक, शासकीय पबनध भी अनेक है, पर ऐसी वयवसथाये कम ही कही दीख पडती है, िजनसे चेतना को पिरषकृत
एवं िवकिसत करने के िलये साथर क, समथर एवं बुिद-संगत सवोपयोगी आधार बन पडा हो।
पजायोग एक ऐसी ही िवधा है। इसे बोलचाल की भाषा मे जीवन साधना भी कहा जा सकता है। इसमे जप,
धयान, पाणायाम, संयम जैसे िवधानो की वयवसथा है। पर सब कुछ उतने तक ही सीिमत नही है। उपासना मे धयान
धारणा सतर के सभी कमर काणड आ जाते है। इसके साथ ही जीवन के हर केत मे मानवी गिरमा को उभारने और
रकावटे हटाने जैसे सभी पको को जोडकर रखा गया है। शरीरसंयम, समयसंयम, अथर संयम, िवचारसंयम इस धारा के
अलग न हो सकने वाले अंग है। दगु र ुणो के, कुसंसकारो के िनराकरण पर जहाँ जोर िदया गया है, वहाँ यह भी अिनवायर
माना गया है िक अब की अपेका अगले िदनो अिधक िववेकवान, चिरतवान और पुरषाथर परायण बनने के िलये
िचनतन तथा अभयास जारी रखा जाये। वासतव मे यह समगता ही जीवन साधना की िवशेषता है। साधक को कतर वय
केत मे धािमर कता, मानयता केत मे आतमपरायणता और अधयातम केत मे दरू दशी िववेकशीलता उतकृष आदशर वाद को
अपनाने के िलये कहा जाता है। इन सवर तोमुखी िदशाधाराओं मे समुिचत जागरकता बरतने पर ही वह लाभ िमलता
है, िजसे आतम पिरषकार के नाम से जाना जाता है। यह हर िकसी के िलये सरल, समभव और सवाभािवक भी है।
आतमपिरषकार के अनय उपाय भी हो सकते है। पर जहाँ तक पजा पिरवार के पयोगो का समबनध है , वहाँ यह
कहा जा सकता है िक वह अपेकाकृत अिधक सरल, तकरसंगत और वयविसथत है। इस सनदभर मे अनेक अभयासरत
अनुभिवयो की साकी भी सिममिलत है।
आितमक पगित का महतव समझा जाना चािहये। वयिक या राषर की उनित उसकी समपदा, िशका, कुशलता
आिद तक ही सीिमत नही होती। शालीनता समपन वयिकतव ही वह उदगम है िजसके आधार पर अनयानय पकार की
पगितयाँ तथा वयवसथाएँ अगणी बनती है, समथर ता का केनद िबनद ु यही है। इस एकाकी िवभूित के बल पर िकसी भी
उपयोगी िदशा मे अगसर हु आ जा सकता है। िकनतु यिद आतमबल का अभाव रहा तो संकीणर सवाथर परता ही छाई
रहेगी और उसके रहते कोई ऐसा पयोजन सध न सकेगा िजसे आदशर वादी एवं लोकोपयोगी भी कहा जा सके। यहाँ

वह उिक पूरी तरह िफट बैठती है, िजसमे कहा गया है िक ‘‘एकै साधे सब सधे, सब साधे सब जाय’’
अनेक पकार की समृिदयो और िवशेषताओं से लदा हु आ वयिक अपने कौशल के बलबूते समपदा बटोर
सकता है। ससती वाहवाही भी लूट सकता है। पर जब कभी मानवी गिरमा की कसौटी पर कसा जायेगा तो वह खोटा
ही िसद होगा। खोटा िसकका अपने अिसततव से िकसी को भम मे डाले रह सकता है, पर उस सुिनिशचत पगित का
अिधकारी नही बन सकता िजसे ‘महामानव’ के नाम से जाना जाता है। िजसके िलये सभय, सुसंसकृत, सजजन,
समुनत जैसे शबदो का पयोग होता है।
सनत परमपरा के अनेकानेक महान ऋिषयो, लोकसेिवयो एवं युगिनर्मारताओं से जो पबल पुरषाथर बन पडे,
उनमे आनतिरक उतकृषता ही पमुख कारण रही। उसी के आधार पर वे िनजी जीवन मे आतमसनतोष, लोक सममान
और दैवी अनुगह की िनरनतर वषार होती अनुभव करते है। अपने वयिकतव, कतृरतव के रप मे ऐसा अनुकरणीय
उदाहरण पीछे वालो के िलये छोड जाते है, िजनका अनुकरण करते हु ए िगरो को उठाने और उठो को उछालने जैसे
अवसर हसतगत होते रहे। यही है जीवन की लकयपूितर एवं एकमात साथर कता। पजायोग की जीवन साधना इसी महती
पयोजन की पूितर करती है।

वयावहािरक साधना के चार पक
जान और कमर के संयोग से ही पगितपथ पर चल सकना, सफलता वरण करने की िसथित तक पहु ँचना
समभव होता है। अधयातम िवजान मे भी ततवदशर न का सही सवरप समझने के उपरानत दस
ू रा चरण यही रहता है िक
उसे िकयािनवत करने की, पूजा-अचर ना की िविध वयवसथा ठीक बने। अधयातम का ततवदशर न, आतमपिरषकार और
आतमिवकास को दो शबदो मे सिनिहत समझा जा सकता है। उपासना पक की पतीक पूजा का तातपयर है-िकया एवं
साधनो के सहारे आतमिशकण की आवशयकता पूरी करना। कोई भी कमर काणड उसकी भावनाओं को हदयंगम िकये
िबना पूणर नही हो सकता। मात कमर काणड को जाद ू का खेल समझते हु ए बडी सफलता की आशा नही की जा
सकती। िकयाये जब िजसको िजस माता मे पभािवत करेगी, वह उसी माता मे सतपिरणाम पाप कर सकने मे सफल
होगा।
सवर जनीन सुलभ साधना का सवरप पसतुत करते हु ए इन पृषो पर पजायोग नाम से वह िवधान पसतुत िकया
जा रहा है, िजसके सहारे अभीष उदेशय की पूितर मे अनयानय उपाय-उपचारो की अपेका अिधक सरलतापूवरक कम
समय मे अिधक सफलता िमल सकती है।
पजायोग की दो संधयाये अतयिधक सरल और अतयिधक महतवपूणर है। एक सबेरे आँ ख खुलते ही िबसतर पर
पडे-पडे पनदह िमनट ‘‘हर िदन नया जनम’’ की भावना करने का उपकम है। दस
ू रा राित को सोते समय यह अनुभव
करना िक शयन एक पकार का दैिनक मरण है। जनम और मरण यही दो जीवन सता के ओर-छोर है। इनहे सही रखा
जाये तो मधयवती भाग सरलतापूवरक समपन हो जाता है। बीजारोपण और फसल काटना, यही दो कृिष कायर के
पमुख अंग है। शेष तो लमबे समय तक चलने वाली िकसान की सामानय िकया-पिकया है। उसे तो सामानय बुिद और
सामानय अभयास से भी चलाया जा सकता है। जागित को पात:काल की संधया और शयन को राित की संधया कहा
जा सकता है। दो बार संधयाये सूयोदय और सूयारसत के समय वाली मानी जाती है। पर उसके साथ जुडी
आधयाितमक साधना पात:काल आँ ख खुलते समय और राित को सोने, आँ ख बनद होने के समय की जा सकती है।
पजायोग की पथम साधना को आतमबोध कहते है। आँ ख खुलते ही यह भावना करनी चािहये िक आज
अपना नया जनम हु आ। एक िदन ही जीना है। राित को मरण की गोद मे चले जाना है। इस अविध का सवोतम
उपयोग करना ही जीवन साधना का महान लकय है। यही अपना परीका कम है और उसी मे भिवषय की सारी
समभावना सिनिहत है।
मनुषय जनम जीवधारी के िलये सबसे बडा सौभागय है। इसका सदपु योग बन पडना ही िकसी की उचचसतरीय
बुिदमता का पमाण-पिरचय है। उठते ही यह िवचार करना चािहये िक आज के एक िदन को समपूणर जीवन माना जाये
िजनके िलये इसे िदया गया है। इस आधार पर िदनभर की िदनचयार इसी समय िनधारिरत की जाये। िचनतन, चिरत,
और वयवहार की वह रपरेखा िविनिमर त की जाये िजसे सतकरतापूवरक पूरी करने पर यह माना जा सके िक आज का
िदन एक बहु मूलय जनम पूरी तरह साथर क हु आ। इस िचनतन के सभी पको पर िवचार करने मे िजतना अिधक समय

लगे उतना कम है, पर इसे िनतयपित, िनयिमत रप से करते रहने पर पनदह िमनट भी पयारप हो सकते है। एक िदन
की छूटी बात को अगले िदन पूरा िकया जा सकता है।
दस
ू री संधया रात को सोते समय पूरी की जाती है, उसमे यह माना जाना चािहये िक अब मृतयु की गोद मे
जाया जा रहा है। भगवान् के दरबार मे जवाब देना होगा िक आज के समय का, एक िदन के जीवन का िकस पकार
सदपु योग बन पडा? इसके िलये िदनभर के समययापनपरक िकया-कलापो और िवचारो के उतार-चढावो की समीका
की जानी चािहये। उसके उदेशय और सतर को िनषपक होकर परखना चािहये तथा देखना चािहये िक िकतना उिचत
बन पडा और िकतना उसमे भूल या िवकृित होती रही। जो सही हु आ उसके िलये अपनी पशंसा की जाये और जहाँ
जो भूल हु ई हो उसकी भरपाई अगले िदन करने की बात सोची जाये। पाप का पायिशचत शासकारो ने यही माना है
िक उसकी कितपूितर की जाये। आज का िदन जो गुजर गया, उसे लौटाया तो नही जा सकता, पर यह हो सकता है
िक उसका पायिशचत अगले िदन िकया जाये। अगले िदन के िकया कलाप मे आज की कमी को पूरा करने की बात
भी जोड ली जाये। इस पकार कुछ भार तो अवशय बढेगा, पर उसके पिरमाजर न का और कोई उपाय भी तो नही है।
मृतयु अवशयमभावी है। लोग उसे भूल जाते है और बाल कीडा की तरह महतवहीन कायो ं मे जीवन िबता देते
है। यिद यह धयान रखा जाये िक चौरासी लाख योिनयो मे भमण करने के उपरानत जो अलभय हसतगत हु आ है, उसे
इस पकार वयतीत िकया जाये िजससे भिवषय उजवल बने। देवमानव सतर तक पहु ँचाने की आशा बँधे। दस
ू रो को
अनुकरण की पेरणा िमले। सषा को, दाियतव िनवारह की पामािणकता का पिरचय पाकर पसनता हो। पदोनित का
सुयोग इस आधार पर उपलबध हो।
राित को िजस पकार िनिशचंततापूवरक सोया जाता है, उसी पकार मरणोतर काल से लेकर पुनजर नम की
मधयाविध मे भी ऐसी ही शािनत रह सकती है। इसकी तैयारी इनही िदनो करनी चािहये। हँसी-खुशी से िदन बीतता हो
तो राित को गहरी नीद आती है। िदन यिद शािनतपूवरक गुजारा जाये -शेषता के साथ जुडा रहे तो मरणोतर िवशाम
काल मे नरक नही भुगतान पडेगा। सवगर जैसी शािनत का रसासवादन िमलता रहेगा। इस पिकया को ततव बोध कहा
गया है।
पजायोग के दो और चरण है िजनको िदन मे पूरा िकया जाता है। इनमे एक है-भजन दस
ू रा-मनन भजन के
िलये िनतय कमर से िनवृत होकर िनयत पूजा सथान पर पालथी मारकर बैठा जाता है। शरीर, मन और वाणी की शुिद
के िलये जल दारा पिवतीकरण, िसंचन, आचमन िकया जाता है। देव पितमा के रप मे गायती की छिव अथवा धूप ,
दीप मे से कोई पतीक सथािपत करके इसे इष, आराधय माना जाता है। धूप, दीप, नैवेद, जल, अकत, पुषप मे से जो
उपलबध हो उससे उसका पूजन िकया जाता है। पूजन मे पयुक वसतुओं की तरह अपने जीवन मे उन िवशेषताओं
को उतपन करने की भावना की जाती है जो इन उपचार, साधनो मे पाई जाती है। चनदन समीपवितर यो मे सुगनध
भरता है। दीपक अपने पभाव केत मे जानरपी पकाश फैलाता है। पुषप हँसता है और िखलता रहता है। जल
शीतलता का पतीक बनकर रहता है। अकत, नैवेद के पीछे समयदान, अंशदान परमाथर पयोजन के िलये िनकाले
जाने की भावना है। इषदेव को सतपवृित का समुचचय माना जाये। इन मानयताओं के आधार पर देव पूजन समग बन
पडता है।
अब जप और धयान की बारी आती है। दोनो एक साथ चल सकते है। गायती जप मानिसक हो तो भी ठीक
है। िजतनी देर करने का िनशचय हो उसका िहसाब माला या घडी के सहारे िकया जाता है। िजनहे गायती की अपेका
कोई अनय मंत रिचकर होवे उसे अपना सकते है। ॐकार भी सावर भौम सतर की जप मानयता बन सकता है।
जप के साथ पात:काल के उदीयमान सविणर म सूयर का धयान िकया जाय। भावना करनी चािहये िक अपना
खुला शरीर सूयर के सममुख बैठा है। इष की सूुूकम िकरणे अपने सथूल, सूकम और कारण-तीनो शरीरो मे पवेश कर
रही है। िकरणे, ऊजार और आभा की पतीक है। ऊजार अथारत् शिक, आभा अथारत् पकाश पजा। दोनो का समनवय
तीनो शरीरो मे पवेश करके उनहे पभािवत करता है-ऐसी भावना की जानी चािहये। पतयक शरीर मे सवासथय और
संयम, सूकम शरीर मिसतषक मे िववेक और साहस, कारण शरीर अथारत् अनत:करण मे शदा, सदावना सूयर िकरणो के
रप मे पवेश करके अिसततव की समग सता को अनुपािणत कर रही है। यह धयान धारणा और मंत जप साथ-साथ
िनयत िनधारिरत समय तक चालू रखे जाये और अनत मे पूणारहुित मे सूयर के सममुख जलरपी अघयर िदया जाये।
इसका तातपयर है-परमसता के सममुख जलरपी आतमसता का समपर ण। भजन भावना इतनी ही है। यिद िनयत
सथान पर बैठ सकना समभव नही, सफर मे चलने जैसी िसथित हो तो वह सारे कृतय मानिसक रप से िबना िकसी
वसतु की सहायता के भी िकये जा सकते है।
पजायोग साधना का चौथा चरण है-मनन यह मधयाहोतर कभी भी, कही भी िकया जा सकता है। समय

पनदह िमनट हो, तो भी काम चल जायेगा। इसमे अपनी वतर मान िसथित की समीका की जाती है और आदशो ं के
मापदणड से जाँच-पडताल करने पर जो कमी पतीत हो, उसे पूरा करने की योजना बनानी पडती है। यही मनन है।
इसके िलये एकानत सथान ढू ँ ढना चािहये। आँ खे बनद करके अनतमुरखी होना और आतमसता के समबनध मे पिरमाजर न
पिरषकार की उभयपकीय योजना बनानी चािहये। इसमे आज के िदन को पधान माना जाये। पात: से मधयाह तक जो
सोचा और िकया गया हो, उसे आदशो ं के मापदणड से जाँचना चािहये और उस समय से लेकर सोते समय तक जो
कुछ करना हो उसकी भावनातमक योजना बनानी चािहये, तािक िदन के पूवारदर की तुलना मे उतरादर और भी अचछा
बन पडे।
आतमसमीका के चार मापदंड है- १ इिनदयसंयम, (२) समयसंयम, (३) अथर संयम, (४) िवचारसंयम। देखना
चािहये िक इन चारो मे कही कोई वयितकम तो नही हो रहा है? जीभ सवाद के नाम पर अभकय भकण तो नही करने
लगी? वाणी से असंसकृत वातारलाप तो नही होता? कामुकता की पवृित कही कुदिष से तो नही उभर रही? असंयम से
शरीर और मिसतषक खोखला तो नही हो रहा? शारीिरक और मानिसक सवसथता बनाये रखने के िलये इिनदयिनगह
अमोघ उपाय है।
समय संयम का अथर है-एक-एक कण का सदपु योग। आलसय-पमाद मे, दवु यर सनो मे दगु र ुणो के कुचक मे
फँसकर समय का एक अंश भी बरबाद न होने पाये। इसकी सुरका और सदपु योग पर पूरी-पूरी जागरकता बरती
जानी चािहये। समय ही जीवन है। िजसने समय का सदपु योग िकया समझो िक उसने जीवन का पिरपूणर लाभ उठा
िलया।
तीसरा संयम है-अथर संयम पैसा ईमानदारी और पिरशमपूवरक कमाया जाये। मुफतखोरी और बेईमानी का
आशय न िलया जाये। औसत भारतीय सतर का जीवन िजया जाये। ‘‘सादा जीवन उचच िवचार’’ की नीित अपनाई
जाये। िवलास पदशर न की मूखरता मे कुछ भी खचर न होने िदया जाये। कुरीितयो के नाम पर भी बरबादी न चले। बचत
का एक बडा अंश परमाथर पयोजन मे लगा सकने और पुणय की पूँजी जमा करने का शेय उनही को िमलता है, जो
िववेकपूवरक औिचतय का धयान रखते हु ए खचर करते है।
चौथा संयम है-िवचारसंयम मिसतषक मे हर घडी िवचार उठते रहते है, कलपनाये चलती रहती है। ये अनगर ल,
असत-वयसत एवं अनैितक सतर के न हो, इसके िलये िववेक को एक चौकीदार की तरह िनयुक कर देना चािहये।
उसका काम हो कुिवचारो को सिदचारो की टककर मारकर परासत करना। अनगढ िवचारो के सथान पर रचनातमक
िचनतन का िसलिसला चलाना। िवचार मनुषय की सबसे बडी शिक है। वही कमर के रप मे पिरणत होती और
पिरिसथित बनकर सामने आती है। जीवन को कलपवृक बनाने का शेय रचनातमक िवचारो का ही होता है। इस तथय
को भली पकार समझते हु ए िचनतन को मात रचनातमक एवं उचचसतरीय िवचारो मे ही संलग रखना चािहये।
साधना, सवाधयाय, संयम, सेवा के चार पुरषाथो ं मेुे जीवन की पगित एवं सफलता बन पडती है। इसिलये
िदनचयार मे उन चारो के िलये समुिचत सथान रहे, उसकी जाँच-पडताल आतमसमीका के समय मे िनरनतर करनी
चािहये। आतमसमीका, आतमसुधार, आतम-िनमारण और आतमिवकास की चतुिदर क् पिकया को अगगामी बनाने के िलये
मधयानतर काल की मनन साधना करनी चािहये। इसे आतमदशर न समझा जाना चािहये जो थोडी िवकिसत अवसथा मे
ईशवर दशर न के रप मे फिलत होता है।
जीवन साधना के सुि निशचत सूत -

उपासना पक के चार चरण िपछले पृषो पर बताये जा चुके है- (१) पात:काल आँ ख खुलते ही नया जनम,
(२) राित को सोते समय िनतय मरण, (३) िनतय कमर से िनवृत होने के बाद जप धयान वाला भजन, (४) मधयाह के
बाद मनन के कम मे अपनी िसथित का िववेचन और उदातीकरण। कुछ िदन के अभयास से इन चारो को िदनचयार का
अिविचछन अंग बना लेना सरल समभव हो जाता है।
इषदेव के साथ अननय आतमीयता सथािपत कर लेना, उसके ढाँचे मे ढलने का पयतन करना, यही सचची
भगवदिक है। दैत को अदैत मे बदलना इसी आधार पर बन पडता है। सतपवृितयो के समुचचय परमातमा के साथ
िलपटने की वासतिवकता को इसी आधार पर परखा जा सकता है। जीवन कम मे शालीनता, सदाव, उदारता, सेवासंवेदना जैसी उमंगे अनतराल मे उठती है या नही। आग के समपकर मे आकर ईध
ं न भी अिग बन जाता है। ईशवर भक

मे अपने इषदेव की अनुरपता उभरनी चािहये। इस कसौटी पर हर िकसी की भिक भावना िकतनी यथाथर ता हैइसकी जाँच-परख की जा सकती है। भगवान का अनुगह भी इसी आधार पर जाँचा जाता है। जहाँ सूयर की िकरणे
पडेगी वहाँ गमी और रोशनी अवशय दिषगोचर होगी। ईशवर का सािनधय िनिशचत रप से भकजनो मे पामािणकता
और पखरता की िवभूितयाँ अवतिरत करता है। इस आधार पर उसका िचनतन, चिरत और वयवहार उतकृष
आदशर वािदता की हर कसौटी पर खरा उतरता चला जाता है। सचची और झूठी भिक की परीका हाथोहाथ पाप होती
चलती है। यह पतीत होता रहता है िक समथर सता का अनुगह हाथोहाथ पाप होने की मानयता पर उपासना खरी
उतरी या नही।
आतमोतकषर की दस
ू रा अवलमबन है-साधना साधना अथारत् जीवन साधना। साधना अथारत् असतवयसतता को
सुवयवसथा मे बदलना। इसके िलये दो पयास िनरनतर जारी रखने पडते है-एक अभयसत दषु पवृितयो को बारीकी से
देखना, समझना और उनहे उखाडने के िलये अनवरत पयतनशील-संघषर शील रहना। दस
ू रा कायर है-मानवी गिरमा के
अनुरप िजन सतपवृितयो की अभी कमी मालूम पडती है, उनकी आवशयकता, उपयोिगता को समझते हु ए, उसके
िलये अनुकूलता सतर का मानस बनाना। यह उभयपकीय कम जीवन के पतयेक केत मे वयवहत होते चले तो समझना
चािहये िक जीवन साधना साधने का सरंजाम जुटा।
माना िक कायर समयसाधय और शमसाधय है, िफर भी वह असमभव नही है। कछुआ धीमी गित से चलकर
भी बाजी जीत गया था। असफल तो वे खरगोश होते है जो किणक उतसाह िदखाने के उपरानत मन बदल लेते और
इधर-उधर भटकते है। िसथरता, ततपरता और तनमयता हर पसंग मे सफलता का शेष माधयम बनती है। जीवन
साधना के िलये भी िकया गया पयतन सफल होकर ही रहता है।
िकसान अपने खेत मे खरपतवार उखाडता रहता है। कंकड- पतथर बीनता रहता है, इसे पिरशोधन कहा जा
सकता है। जानवरो, पिकयो से खेत की रखवाली करना भी इसी सतर का कायर है। कीटनाशक दवाओं का पयोग भी
इसी उदेशय की पूितर के िलये है। खेत मे खाद-पानी लगाना पडता है। यह पिरपोषण पक है। िनराई-गुडाई का एक
उदेशय यह भी है िक जमीन पोली बनी रहे। जडो मे धूप, हवा की पहु ँच बनी रहे। फसल को उगाने का यही तरीका है।
जीवन को सुिवकिसत करना भी एक पकार का कृिष का कायर है। इसके िलये भी इसी नीित को अपनाना होता है।
शरीर मे मल, मूत, पसीना, कफ आिद के दारा सफाई होती है। सनान का उदेशय भी यही है। सफाई से
समबिनधत अनेक उपकम भी इसीिलये चलते है िक िवषाणुओं का आकमण न होने पाये। सदी-गमी से बचने के िलये
अनेक पयतन भी इसी उदेशय से िकये जाते है िक हािन पहु ँचाने वाले ततवो से िनपटा जाता रहे। जीवन भी एक शरीर
है, उसे िगराने के िलये पग-पग पर अनेकानेक संकट, पलोभन, दबाव उपिसथत होते रहते है। उनसे िनपटने के िलये
सतकरता न बरती जाये तो बात कैसे बने? चोर-उचकको ठगो, उदणडो की उपेका न होती रहे, तो वे असाधारण कित
पहु ँचाये िबना न रहेगे।
दषु पवृितयाँ जनम-जनमानतरो से संिचत पशु-पवृितयो के रप मे सवभाव के साथ गुँथी रहती है। िफर
िनकटवती लोग िजस राह पर चलते और िजस सतर की गितिविधयाँ अपनाते है, वे भी पभािवत करती है और अपने
साथ चलने के िलये ललचाती है। जो कुछ बहु त जनो दारा िकया जाता दीखता है, अनुकरणिपय सवभाव भी उसकी
नकल बनाने लगता है। इतना िववेक तो िकनही िवरलो मे ही पाया जाता है िक वे उिचत-अनुिचत का िवचार करे,
दरू वती पिरणामो का अनुमान लगाये और सनमागर पर चलने के िलये िबना सािथयो की पतीका िकये एकाकी चल
पडने का साहस जुटाये। आमतौर से लोग पचिलत ढरे पर चलते देख गये है। पते और धूिलकण हवा के रख के
साथ उडने लगते है। िदशाबोध उनहे कहाँ होता है ? यही िसथित लोकमानस के समबनध मे भी कही जा सकती है।
नीर-कीर की िववेक बुिद तो कम दीख पडने वाले राजहंसो मे ही होती है। अनय पकी तो ऐसे ही कूडा-कचरा और
कीडे-मकोडे खाते देखे गये है।
िकसी वसतु को पाप कर लेना एक बात है और उसका सदपु योग बन पडना सवर था दस
ू री। सवासथय सभी को
िमला है, पर उसे बनाये रखने मे समथर िवरले ही होते है। अिधकांश तो असंयम अपनाते और उसे बरबाद ही करते
है। बुिद का सदपु योग किठन है, चतुर कहे जाने वाले लोग भी उसे कहाँ कर पाते है ? धन कमाते तो सभी है, पर
उसका आधा चौथाई भाग भी सदपु योग मे नही लगता। उसे िजन कामो मे िजस तरह खरचा जाता है, उससे खरचने
वालो की, उनके समपकर मे आने वालो की तथा सवर साधारण की बरबादी ही होती है। पभाव का उपयोग पाय: िगराने,
दबाने, भटकाने मे ही होता रहता है। इसे समझदार कहे जाने वाले मनुषय की नासमझी ही कहा जायेगा। यह वयािध
सवर साधारण को बुरी तरह गिसत िकये हु ए है। इसी को कहते है राजमागर छोडकर मृगतृषणा मे, भूल-भुलय
ै ो मे
भटकना। जीवन समपदा के समबनध मे भी यही बात है। जनम से मरणपयर नत पेट पजनन जैसी सामियक बातो मे ही
आयुषय बीत जाता है। आवारागदी मे िदन कट जाता है।

हर वयिक की मन:िसथित पिरिसथित अलग होती है। यही बात दगु र ुणो और सदगुणो की नयूनािधकता के
समबनध मे भी है। िकसे अपने मे कया सुधार करना चािहये और िकन नई सतपवृितयो का संवदरन गुण , कमर , सवभाव
के केत मे करना है? यह आतम-समीका के आधार पर सही िवशलेषण होने के उपरानत ही समभव है। इसके िलये कोई
एक िनधाररण नही हो सकता है। यह कायर हर िकसी को सवयं करना होता है। दस
ू रो को तो थोडा-बहु त परामशर ही
काम दे सकता है। िनतय-िनरनतर हर कोई िकसी के साथ रहता नही। िफर रोग का कारण और िनदान जानते हु ए
उपचार का िनधाररण कोई अनय िकस पकार कर सके? थोडे समय तक समपकर मे आने वाला केवल उतनी ही बात
जान सकता है, िजतनी िक िमलन काल मे उभरकर सामने आती है। यह सवर था अधूरी रहती है। इसिलये अनयानयो
के परामशर पर पूरी तरह िनभर र नही रहा जा सकता। यह कायर सवयं अपने को ही करना पडता है। इसमे भी एक
किठनाई यह है िक मानिसक संरचना के अनुसार हर वयिक अपने को िनदोष मानता है, साथ ही सवर गुण समपन भी
समझता रहता है। यह िसथित सुधार और िवकास दोनो मे बाधक है? जब तक कमी का आभास न हो तब तक
उसकी पूितर का तारतमय कैसे बने? असतु, आतमिवकास के मागर पर चलने वाले, जीवन साधना के मागर पर अगसर
होने के इचछुक पतयेक वयिक को चािहये िक िनषपकता की मनोभूिम िवकिसत की जाये। खासतौर से अपने समबनध
मे उतना ही तीखापन होना चािहये िजतना िक आमतौर से दस
ू रो के दोष-दगु र ुण ढू ँ ढने मे हर िकसी का रहता है।
आरोप लगाने और लांिछत करने मे हर िकसी को पवीण पाया जाता है। इस सहज वृित को ठीक उलटा करने से
आतमसमीका की वह पाथिमक आवशयकता पूरी होती है, िजसके िबना वयिकतव का िनखार पाय: असमभव ही बना
रहता है। वह न बन पडे तो िकसी को भी महानता अपनाने और पगित के उचच िशखर तक पहु ँच सकने का अवसर
िमल ही नही सकता।
कया करे? पशन के उतर मे एक पूरक पशन यह उतपन होता है िक कया नही हो रहा है? और ऐसे कया
अनुपयुक हो रहा है, िजसे नही सोचा या नही िकया जाना चािहये था। िकनही सुिवकिसत और सुसंसकृत बनने वालो
के िनजी दिषकोण, सवभाव और िदशा िनधाररण को समझते हु ये यह देखा जाना चािहये िक वैसा कुछ अपने से बन
पड रहा है या नही? यिद नही बन पड रहा है तो उनका कारण और िनवारण कया हो सकता है ? इस पकार के
िनधाररण जीवन साधना के साधको के िलये अिनवायर रप से आवशयक है। जो अपनी तुिटयो की उपेका करता रहता
है, जो अगले िदनो अिधक पखर और अिधक पामािणक बनने की बात नही सोच सकता, उस पकार की योजना
बनाकर उनके िलये किटबद होने की ततपरता नही िदखा सकता, उसके समबनध मे यह आशा नही की जा सकती
िक वह िकसी ऐसी िसथित मे पहु ँच सकेगा िजसमे अपने गवर -गौरव अनुभव करने का अवसर िमल सके। साथ ही
दस
ू रो का सहयोग, सममान पाकर अिधक ऊँची िसथित तक पहु ँच सकना समभव हो सके।
साधक के िलये आलसय, पमाद, असंयम, अपवयय एवं उनमत और असत-वयसत रहना पमुख दोष है।
अिचनतय िचनतन और अकमो ं को अपनाना पतन-पराभव के यही दो कारण है। संकीणर सवाथर परता मे अपने को जकडे
रहने वाले अपनी और दस
ू रो की दिष मे िगर जाते है। उतकृषता और आदशर वािदता से िरशता तोड लेने पर लोग
समझते है िक इस आधार पर नफे मे रहा जा सकेगा। पर बात यह है िक ऐसो को सवर साधारण की उपेका सहनी
पडती है और असहयोग की िशकायत बनी रहती है। अपना िचनतन, चिरत, सवभाव और वयवहार यिद ओछे पन से
गिसत हो तो उसे उसी पकार धो डालने का पयतन करना चािहये जैसे िक कीचड से सन जाने पर उस गनदगी को
धोने का अिवलमब पयतन िकया जाता है। गनदगी से सने िफरना िकसी के िलये भी अपमान की बात है। इसी पकार
मानवी गिरमा से अलंकृत होने पर भी कुदताओं और िनकृषताओं का पिरचय देना न केवल दभ
ु ारगय सूचक है, वरन
साथ मे यह अिभशाप भी जुडता है िक कोई महतवपूणर, उतसाहवदरक और अिभननदनीय पगित कर सकने का आधार
कभी हाथ ही नही आता। पेट भरने और पिरवार के िलये मरते -खपते रहना िकसी भी गिरमाशील के िलये पयारप नही
हो सकता। इस नीित को तो पशु-पकी और कीट-पतंग ही अपनाते रहते है और मौत के िदन िकसी पकार पूरे कर
लेुेते है। यिद मनुषय भी इसी कुचक मे िपसता और दस
ू रो को पीसता रहे , तो समझना चािहये िक उसने मनुषय
जनम जैसी देव दल
ु र भ समपदा को कौडी मोल गँवा िदया।
िनतय आतमिवशलेषण, सुधार, सतपवृितयो के अिभवदरन का कम यिद जारी रखा जाये तो पगित के लकय
उपलबध कराने की िदशा मे अपने कम से बढ चलना समभव हो जाता है। इिनदयसंयम, समयसंयम, अथर संयम और
िवचारसंयम को वयवहािरक जीवन की तपशचयार माना गया है। तप से समपित और समपित से िसिद पाप होने का
तथय सवर िविदत है। दषु पवृितयो से अपने को बचाते रहने की संयमशीलता िकसी को भी सशक बना सकने मे समथर
हो सकती है। यह राजमागर अपनाकर कोई भी समुनत होते हु ए अपने आप को देख सकता है।
समझदारी, ईमानदारी, िजममेदारी और बहादरु ी के चार सदगुण यिद अपने वयिकतव के अंग बनाये जा सके ,
उनहे पुणय परमाथर सतर का माना जा सके तो अपना आपा देखते-देखते इस सतर का बन जाता है िक अपने सुख

बाँटने और दस
ू रो के द :ु ख बँटा लेने की उदार मनोदशा िविनिमर त होने लगे। जीवन साधना इसी आधार पर सधती है।
मनुषय जनम को साथर क इनही आधारो को अपनाकर बनाया जा सकता है।

सापािहक और अदर वािषर क साधनाएँ

मोटर के पिहयो मे भरी हवा धीरे-धीरे कम होने लगती है। उसमे थोडे समय के बाद नई हवा भरनी पडती है।
रेल मे कोयला-पानी चुकता है तो दबु ारा भरना पडता है। पेट खाली होता है तो नई खुराक लेनी पडती है। जीवन का
एक सा ढरार नीरस बन जाता है, तब उसमे नई सफूितर संचािरत करने के िलये नया पयास करना पडता है। पवर तयौहार इसीिलये बने है िक एक नया उतसाह उभरे और उस आधार पर िमली सफूितर से आगे का िकया-कलाप
अिधक अचछी तरह चले। रिववार की छुटी मनाने के पीछे भी नई ताजगी पाप करना और अगले सपाह काम आने के
िलये नई शिक अिजर त करना है। संसथाओं के िवशेष समारोह भी इसी दिष से िकये जाते है िक उस पिरकर मे आई
सुसती का िनराकरण िकया जा सके। पकृित भी ऐसा ही करती रहती है। घनघोर वषार और िखलिखलाती वसनत ऋतु
ऐसी ही नवीनता भर जाती है। िववाह और िनजी पुरषाथर की कमाई इन दो आरमभो को भी मनुषय सदा समरण
रखता है उनमे उतसाहवदरक नवीनता है।
जीवन साधना का दैिनक कृतय बताया जा चुका है। उठते आतमबोध, सोते ततवबोध। पथम पहर भजन,
तीसरे पहर मनन, ये चार िवधाये िनतयकमो ं मे सिममिलत रहने लगे तो धमर , अथर , काम, मोक के चारो आधार बन
पडते है। चार पाये की चारपाई होती है और चार दीवारो की इमारत। चार िदशाये , चार वणर , चार आशमो ,
अनत:करण चतुषय पिसद है। पजायोग की दैिनक साधना मे उपरोक चार आधारो का सनतुिलत समनवय है। उन
सभी मे कमर काणड घटा हु आ है और भाव िचनतन बढा हु आ। इससे लमबे कमर काणडो की उलझन मे उदेशय से भटक
जाने की आशंका नही रहती । भावना और आकांका सही बनी रहने पर बुिद दारा िनधाररण सही होते रहते है।
सवभाव और कमर -कौशल का कम भी सही चलता रहता है। िनतयकमर की िनयिमतता सवभाव का अंग बनती है और
िफर जीवन कम उसी ढाँचे मे ढलता चला जाता है।
जीवन साधना के दो िवशेष पवर है- एक सापािहक दस
ू रा अदर वािषर क। सापािहक वत आमतौर से लोग
रिववार, गुरवार को रखते है। पर पिरिसथितयो के कारण यिद कोई अनय िदन सुिवधाजनक पडता है तो उसे भी
अपनाया जा सकता है। अदरवािषर क मे आिशवन और चैत की दो नवराितयाँ आती है। इनमे साधना नौ िदन की करनी
पडती है। इन दो पवो ं की िवशेष उपासना को भी अपने िनधाररण मे सिममिलत रखने से बीच मे जो अनुतसाह की
िगरावट आने लगती है, उसका िनराकरण होता रहता है। इनके आधार पर जो िवशेष शिक उपािजर त होती है, उससे
िशिथलता आने का अवसाद िनपटता रहता है।
सापािहक िवशेष साधना मे चार िवशेष िनयम िवधान अपनाने पडते है। ये है - १ उपवास, (२) बहचयर , (३)
मौन तथा (४) पाण संचय। इनमे से कुछ ऐसे है िजनके िलये मात संयम ही अपनाना पडता है। दो के िलये कुछ कृतय
िवशेष करने पडते है। िजहा और जननेिनदय, यही दो दसो इिनदयो मे पबल है। इनहे साधने से इिनदयसंयम सध जाता
है। यह पथम चरण पूरा हु आ तो समझना चािहये िक अगले मनोिनगह मे कुछ िवशेष किठनाई न रह जायेगी।
िजहा का असंयम अितमाता मे अभकय भकण के िलये उकसाती है। कटु , असतय, अनगर ल और असत् भाषण
भी उसी के दारा बन पडता है। इसिलये एक ही िजहा को रसना और वाणी इन दो इिनदयो के नाम से जाना जाता है।
िजहा की साधना के िलये असवाद का वत लेना पडता है। नमक, मसाले, शककर, खटाई आिद के सवाद िजहा को
चटोरा बनाते है। साितवक और सुपाचय पदाथो ं की उपेका करते है। तले , भुने, तेज मसालो वाले, मीठे पदाथो ं मे जो
िचत-िविचत सवाद िमलते है, उनके िलये जीभ ललचाती रहती है। इस आधार पर अभकय ही रिचकर लगता है।
ललक मे अिधक माता उदरसथ कर ली जाती है, फलत: पेट खराब रहने लगता है। सडन से रक िवषैला होता है और
दिू षत रक अनेकानेक बीमािरयो का िनिमत कारण बनता है। इस पकार िजहा की िवकृितयाँ जहाँ सुनने वालो को
पतन के िवकोभ के गतर मे धकेलती है, वहाँ अपनी सवसथयता पर भी कुठाराघात करती है। इन दोनो िवपितयो से
बचाने मे िजहा का संयम एक तप साधना का पयोजन पूरा करता है। िनतय न बन पडे तो सपाह मे एक िदन तो िजहा
को िवशाम देना ही चािहये, तािक वह अपने उपरोक दगु र ुणो से उबरने का पयतन कर सके।
उपवास पेट का सापािहक िवशाम है। इससे छह िदन की िवसंगितयो का सनतुलन बन जाता है और आगे के

िलये सही मागर अपनाने का अवसर िमलता है। जल लेकर उपवास न बन पडे तो शाको का रस या फलो का रस
िलया जा सकता। दध
ू , छाछ पर भी रहा जा सकता है। इतना भी न बन पडे तो एक समय का िनराहार तो करना ही
चािहये। मौन पूरे िदन का न सही िकसी उिचत समय दो घंटे का तो कर ही लेना चािहये। इस िचह पूजा से भी दोनो
पयोजनो का उदेशय समरण बना रहता है और भिवषय मे िजन मयारदाओं का पालन िकया जाता है, उस पर धयान
केिनदत बना रहता है। सापािहक िवशेष साधना मे िजहा पर िनयनतण सथािपत करना पथम चरण है।
िदतीय आधार है-बहचयर िनयत िदन शारीिरक बहचयर तो पालन करना ही चािहये। यौनाचार से तो दरू ही
रहना चािहये, साथ ही मानिसक बहचयर अपनाने के िलये यह आवशयक है िक कुदिष का, अशलील कलपनाओं का
िनराकरण िकया जाये। नर नारी को देवी के रप मे और नारी नर को देवता के रप मे देखे तथा शदा भरे भाव मन
पर जमाये। भाई-बहन िपता-पुती माता-सनतान की दिष से ही दोनो पक एक दस
ू रे के िलये पिवत भावनाये उगाये।
यहाँ तक िक पित-पतनी भी एक दस
ू रे के पित अदारग की उचचसतरीय आतमीयता संजोये। अशलीलता को अनाचार
का एक अंग माने और उस पकार के दिु शचनतन को पास न फटकने दे। समपूणर बहचयर तभी सधता है, जब
शरीरसंयम के साथ-साथ मानिसक शदा का भी समनवय रखा जाय। इससे मनोबल बढता है और कामुकता के साथ
जुडने वाली अनेकानेक दभ
ु ारवनाओं से सहज छुटकारा िमलता है। सपाह मे हर िदन इस लकय पर भावनाये केिनदत
रखी जाय तो उसका पभाव भी अगले छह िदनो तक बना रहेगा।
तीसरा सापािहक अभयास है-पाण संचय। एकानत मे नेत बनद करके अनतमुरखी होना चािहये और धयान
करना चािहये िक समसत िवशव मे पचणड पाण चेतना भरी हु ई है। आमिनतत आकिषर त करने पर वह िकसी को भी
पचुर पिरमाण मे कभी भी उपलबध हो सकती है। इसकी िविध पाणायाम है। पाणायाम के अनेक िविध-िवधान है। पर
उनमे से सवर सुलभ यह है िक मेरदणड को सीधा रखकर बैठा जाये। आँ खे बनद रहे। दोनो हाथ घुटनो पर। शरीर को
िसथर और मन को शानत रखा जाय।
साँस खीचते समय भावना की जाये िक िवशववयापी पाण चेतना िखंचती हु ई नािसका मागर से समपूणर शरीर मे
पवेश कर रही है। उसे जीवकोष पूरी तरह अपने शरीर मे धारण कर रहे है। पाण पखरता से अपना शरीर, मन और
अनत:करण ओतपोत हो रहा है। साँस खीचने के समय इनही भावनाओं को पिरपकव करते रहा जाये। साँस छोडते
समय यह िवचार िकया जाये िक शारीिरक और मानिसक केतो मे घुसे हु ये िवकार साँस के साथ बाहर िनकल रहे है
और उनके वापस लौटने का दार बनद हो रहा है। इस बिहषकरण के साथ अनुभव होना चािहये िक भरे हु ए
अवांछनीय ततव हट रहे है और समूचा वयिकतव हलकापन अनुभव कर रहा है। पखरता और पामािणकता की िसथित
बन रही है।
चौथा सापािहक अभयास मौन वाणी की साधना है। मौन दो घणटे से कम का नही होना चािहये। मौनकाल मे
पाण संचय की साधना साथ-साथ चलती रह सकती है। इस िनधारिरत कृतय के अितिरक दैिनक साधना, सवाधयाय,
संयम सेवा के चारो उपकमो मे से जो िजतना बन सके उसके िलये उतना करने का पयास करना चािहये। सेवा कायो ं
के िलये पतयक अवसर सामने हो तो इसके बदले आिथर क अंशदान की दैिनक पितजा के अितिरक कुछ अिधक
अनुदान बढाने का पयतन करना चािहए। यह रािश सदजान संवदरन के जान यज के िनिमत लगनी चािहये। पीिडतो
की सहायता के िलये हर अवसर पर कुछ न कुछ करते रहना सामानय कम मे भी सिममिलत रखना चािहये। जानयज
तो उचचसतरीय बहयज है, िजसके साथ पािणमात का कलयाण जुडा हु आ है। सापािहक साधना का िदन ऐसे ही शेष
सतकमो ं मे लगाना चािहये।
अदर वािषर क साधनाये आिशवन और चैत की नवराितयो मे नौ-नौ िदन के िलये की जाती है। इन िदनो गायती
मंत के २४ हजार जप की परमपरा पुरातन काल से चली आती है। उसका िनवारह सभी आसथावान साधको को
करना चािहये। िबना जाित या िलंगभेद के इसे कोई भी अधयातम पेमी िन:संकोच कर सकता है। कुछ कमी रह जाने
पर भी इस साितवक साधना मे िकसी पकार के अिनष की आशंका नही करना चािहए। नौ िदनो मे पितिदन २७
माला गायती मंत के जप कर लेने से २४ हजार िनधारिरत जप संखया पूरी हो जाती है। अंितम िदन कम से कम २४
आहु ितयो का अिगहोत करना चािहए। अंितम िदन अवकाश न हो तो हवन िकसी अगले िदन िकया जा सकता है।
अनुषानो मे कुछ िनयमो का पालन करना पडता है - (१) उपवास अिधक न बन पडे तो एक समय का
भोजन या असवाद वत का िनवारह तो करना ही चािहए। (२) बहचयर पालन - यौनाचार एवं अशलील िचंतन का
िनयमन। (३) अपनी शारीिरक सेवाएँ यथासंभव सवयं ही करना। (४) िहंसायुक चमडे के उपकरणो का पयोग न
करना। पलंग की अपेका तखत या जमीन पर सोना। इन सब िनयमो का उदेशय यह है िक नौ िदन तक िवलासी या
असत-वयसत िनरंकुश जीवन न िजया जाए। उसमे तप संयम की िविध वयवसथा का अिधकािधक समावेश िकया जाए।
नौ िदन का अभयास अगले छह महीने तक अपने आप पर छाया रहे और यह धयान बने रहे िक संयमशील जीवन ही

आतमकलयाण तथा लोकमंगल की दहु री भूिमका संपन करता है। इसिलए जीवनचयार को इसी िदशाधारा के साथ
जोडना चािहए।
अनुषान के अंत मे पूणारहुित के रप मे पाचीन परंपरा बहभोज की है। उपयुक बाहण न िमल सकने के
कारण इन िदनो वह कृतय नौ कनयाओं को भोजन करा देने के रप मे भी पूरा िकया जाता है। कनयाये िकसी भी वणर
की हो सकती है। इस पावधान मे नारी को देवी सवरप मे मानयता देने की भावना सिनिहत है। कनयाये तो
बहचािरणी होने के कारण और भी अिधक पिवत मानी जाती है।
बहभोज का दस
ू रा पचिलत रप िवतरण भी है। यो पसाद मे कोई मीठी वसतुएँ थोडी-थोडी माता मे बाँटने
का भी िनयम है। इसमे अिधक लोगो तक अपने अनुदान का लाभ पहु ँचाना उदेशय है, भले ही वह थोडी-थोडी माता
मे ही कयो न हो! एक का पेट भर देने की अपेका सौ का मुँह मीठा कर देना इसिलए अचछा माना जाता है िक इसमे
देने वाले तथा लेने वालो को उस धमर पयोजन के िवसतार की मिहमा समझने और वयापक बनाने की आवशयकता
का अनुभव होता है।
यह कायर िमषान िवतरण की अपेका ससता युग सािहतय िवतरण करने के रप मे अभीष उदेशय की पूितर कर
सकता है। ‘‘युग िनमारण का सतसंकलप’’ नामक अित ससती पुिसतका इस पयोजन के िलये अिधक उपयुक बैठती
है। ऐसी ही अनय छोटी पुिसतकाएँ भी युग िनमारण योजना दारा पकािशत हु ई है िजनहे बाँटा या लागत से कम मूलय मे
बेचने का पयोग िकया जा सकता है। नवरात अनुषानो मे यह बहभोज की सतसािहतय के रप मे पसाद िवतरण की
पिकया भी जुडी रहनी चािहये।
सथानीय साधक िमल-जुलकर एक सथान पर नौ िदन की साधना करे। अनत मे सामूिहक यज करे। सहभोज
का पबनध रखे, साथ ही कथा-पवचन कीतर न उदोधन का कम बनाये रह सके तो उस सामूिहक आयोजन से सोने मे
सुगनध जैसा उपकम बन पडता है।
आराधना और जानयज
शारीिरक सवसथता के तीन िचनह है (१) खुलकर भूख,
(२) गहरी नीद, (३) काम करने के िलये
सफूितर । आितमक समथर ता के भी तीन िचह है -(१) िचनतन मे उतकृषता का समावेश, (२) चिरत मे िनषा और, (३)
वयवहार मे पुणय परमाथर के पुरषाथर की पचुरता। इनही को उपासना, साधना और आराधना कहते है। आितमक पगित
का लकण है, मनुषय मे देवतव का अिभवदरन। देवता देने वाले को कहते है। दस
ू रे शबदो मे इसे धमर धारणा या सेवा
साधना भी कह सकते है। वयिकतव मे शालीनता उभरेगी तो िनिशचत रप से सेवा की ललक उठे गी। सेवा साधना से
गुण, कमर , सवभाव मे सदाशयता भरती है। इसे यो भी कह सकते है िक जब शालीनता उभरेगी तो परमाथर रत हु ए िबना
रहा नही जा सकेगा। पृथवी पर मनुषय शरीर मे िनवास करने वाले देवताओं को ‘भूसुर’ कहते है। यह साधु और
बाहण वगर के िलये पयुक होता है। बाहण एक सीिमत केत मे परमाथर रत रहते है और साधु पिरवाजक के रप मेुे
सतपवृित संवदरन का उदेशय लेकर जहाँ आवशयकता है, वहाँ पहु ँचते रहते है। उनकी गितिविधयाँ पवन की तरह पाण
पवाह िबखेरती है। बादलो की तरह बरसकर हरीितमा उतपन करती है। आितमक पगित से कोई लाभािनवत हु आ या
नही, इसकी पहचान इनही दो कसौिटयो पर होती है िक िचनतन और चिरत मे मानवी गिरमा के अनुरप उतकृषता
दिषगोचर होती है या नही। साथ ही परमाथर परायणता की ललक कायारिनवत होती है या नही।
मोटेतौर पर दान पुणय को परमाथर कहते है। पर इनमे िवचारशीलता का गहरा पुट आवशयक है। दघ
ु र टनागसत,
आकिसमक संकटो मे फँसे हु ओं को तातकािलक सहायता आवशयक होती है। इसी पकार अपंग, असमथो ं को भी
िनवारह िमलना चािहए। इसके अितिरक अभावगसतो, िपछडे हु ओं को ऐसी परोक सहायता की जानी चािहये िजसके
सहारे वे सवावलमबी बन सके। उनहे शम िदया जाये , साथ ही शम का इतना मूलय भी, िजससे मानवोिचत िनवारह
समभव हो सके। गाँधीजी ने खादी को इसी दिष से महतव िदया था िक उसे अपनाने पर बेकारो को काम िमलता है।
अनय कुटीर उदोग भी इसी शेणी मे आते है। बेरोजगारी दरू करने के साधन खडे करे पकारानतर से अभावगसतो की
सहायता की है। मुफतखोरी का बढावा देना दान नही है। इससे िनठलेपन की आदत पडती है। पमाद और वयसन
पनपते है। लेने वाले को हीनता की अनुभूित होती है और देने वाले का अहंकार बढता है। यह दोनो ही पवृितयाँ दोनो
ही पको के िलये अिहतकर है इसिलये औिचतय और सही पिरणाम को दिष मे रखते हु ए दान िकया जाना चािहये।
अनयथा दान के नाम पर धन का दर
ु पयोग ही होता है और उससे सवावलमबन का उतसाह घटता है।
दोनो मे सवोपिर जान दान को माना जाता है। इसे बहयज भी कहते है। सदावनाये और सतपवृितयाँ िजन
पयतनो से बढ सके उसी को सचचा परमाथर कहना चािहये। सत् िचनतन के अभाव मे ही लोग अनेको दगु र ुण अपनाते

और पतन-पराभव के गतर मे िगरते है। यिद सही िचनतन कर सकने का पथ पशसत हो सके तो समझना चािहये िक
सवर -समथर मनुषय को अपनी समसयाये आप हल करने का मागर िमल गया। अपंगो, असमथो ं या दघ
ु र टनागसतो को

छोडकर कोई ऐसा नही है जो सही िचनतन करने का मागर िमल जाने पर ऊँचा उठ न सक, आगे न बढ सके, अपनी
समसयाओं को आप हल न कर सके। इसिलये आितमक पगित के िलये पधानता यही नीित अपनानी चािहये िक
लोकमानस के पिरषकार के िलये, सतपवृित संवदरन के िलये अपनी योगयता और पिरिसथित के अनुसार भरसक
पयतन िकया जाये।
समय की अपनी समसयाये हु आ करती है और पिरिसथितयो के अनुरप उनके समाधान भी खोजने पडते है।
पाचीन कथा, पुराणो और धमर शासो से युगधमर का िनरपण नही हो सकता उसके िलये आज के पवाह पचलन और
वातावरण को धयान मे रखना होगा। इस हेतु युग मनीिषयो को ही सदा से मानयता िमलती रही है। इन िदनो भी इसी
पिकया को अपनाना होगा। इसके िलये युग चेतना का आशय लेना होगा। युग मनीिषयो के पितपादनो पर धयान देना
होगा। सदजान संवदरन का सही तरीका यही हो सकता है। साकरता की तरह ऐसे सदजान संवदरन की भी
आवशयकता है जो वयिक और समाज के सममुख उपिसथत समसयाओं के सनदभर मे समाधान-कारक िसद हो सके।
आतमोतकषर के िलये आराधना का सेवा साधना का उपाय इसी आधार पर खोजना होगा। लोकमानस का पिरषकार
और सतपवृित संवदरन को सवोचच सतर का आधार मानते हु ए बौिदक, नैितक और सामािजक केतो मे युगधमर की
पितषापना की जानी चािहये।
कहा जाता है िक िवचारकािनत की, जान की साधना मे सभी दरू दशी िववेकवानो को लगना चािहये। इसी
िनिमत, लेखनी, वाणी तथा दशय, शवय आधारो का ऐसा पयोग करना चािहये िजससे सवर साधारण को युगधमर
पहचानने और कायारिनवत करने की पेरणा िमल सके। सवर जनीन और सावर भौम जानयज ही आज का सवर शेष परमाथर
है। इसकी उपेका करके, ससती वाहवाही पाने के िलये कुछ भी देते, बखेरते और कहते, िलखते रहने से कुछ
वासतिवक पयोजन िसद होने वाला नही है।
इस चेतना को पखर पजविलत करने के िलये युग सािहतय की पाथिमक आवशयकता है। उसी के आधार पर
पढने-पढाने सुनने-सुनाने की बात बनती है। िशिकतो को पढाया और अिशिकतो को सुनाया जाये, तो लोक पवाह को
सही िदशा दी जा सकती है। इसके िलये पजायुग के साधको को झोला पुसतकालय चलाने के िलये अपना समय और
पैसा लगाना चािहये। सतसािहतय खरीदना सभी के िलये किठन है , िवशेषतया ऐसे समय मे जबिक लोगो को भौितक
सवाथर साधनो के अितिरक और कुछ सूझता नही। आदशो ं की बात सुनने -पढने की अिभरिच है ही नही। ऐसे समय
मे युग सािहतय पढाने, वापस लेने के िलये िशिकतो के घर जाया जाये , उनहे पढने योगय सामगी दी जाती और वापसी
ली जाती रहे, तो इतने से सामानय कायर से जानयज का महतवपूणर पयोजन हर केत मे पूरा होने लगेगा। अिशिकतो को
सुनाने की बात भी इसी के साथ जोडकर रखनी चािहये।
िवचारगोिषयो, सभा सममेलनो, कथा पवचनो का अपना महतव है। इसे सतसंग कहा जा सकता है। लेखनी
और वाणी के माधयम से यह दोनो कायर िकसी न िकसी रप मे हर कही चलते रह सकते है। अपना उदाहरण पसतुत
करना सबसे अिधक पभावोतपादक होता है। लोग समझने लगे है िक आदशो ं की बात िसफर कहने -सुनने के िलये
होती है। उनहे वयावहािरक जीवन मे नही उतारा जा सकता। इस भािनत का िनराकरण इसी पकार हो सकता है िक
जानयज के अधवयुर िवचारकािनत के पसतोता जो कहते है-दस
ू रो से जो कराने की अपेका है, उसे सवयं अपने वयवहार
मे उतारकर िदखाये। अपने को समझाना, ढालना दस
ू रो को सुधारने की अपेका अिधक सरल है। उपदेषाओं को
आितमक पगित के आराधनारत होने वालो की, अपनी कथनी और करनी एक करके िदखानी चािहये।
आदशर वादी लोकिशकण के िलये इस पकार की आवशयकता अिनवायर रप से रहती है। िफर भी यह
आवशयक नही िक पूणरता पाप करने तक हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहा जाये। छठी कका का िवदाथी पाँचवी कका
वाले की तो कुछ न कुछ सहायता कर ही सकता है। अपने से कम योगयता एवं िसथित वालो को मागर दशर न करने मे
कोई भी समथर एवं सफल हो सकता है।
इन िदनो उपरोक पयोजन यंतो की सहायता से भी बहु त कुछ हो सकता है। पाचीन काल मे पुसतके हाथ से
िलखी जाती थी पर अब तो वे पेस से मशीनो से छपती है। इसी पकार दशय और शवय के माधयम भी अनेको सुलभ
है। उसका पयोग जान का िवसतार करने के िलये िकया जा सकता है। टेप िरकाडर र मे लाउडसपीकर लगाकर संगीत
और पवचन के रप मे होने वाली गोिषयो की आवशयकता पूरी की जा सकती है। सलाइड पोजेकटर (पकाश िचत
यंत) कम लागत का और लोकरंजन के साथ लोकमंगल का पयोजन पूरा करने वाला उपकरण है। वीिडयो कैसेट इस
िनिमत बनाये और जहाँ टी०वी० है, वहाँ िदखाये जा सकते है। टेप पलेयर पर टेप सुनाये जा सकते है।

संगीत टोिलयाँ जहाँ भी थोडे वयिक एकितत हो, वही अपना पचार कायर आरमभ कर सकती है। लाउड
सपीकरो पर िरकाडर या टेप बजाये जा सकते है। इस सनदभर मे दीपयजो की आयोजन पिकया अतीव ससती, सुगम
और सफल िसद होती है। इस माधयम से कमर काणड के माधयम से आतमिनमारण, मधयाहकाल के मिहला सममेलन मे
पिरवार िनमारण और राित के कायर कम मे समाज िनमारण की सुधार पिकया और संसथापन िवदा का समावेश िकया
जा सकता है।
पिरवार मे राित के समय कथा-कहािनयाँ कहने के अपने लाभ है। इस पयोजन के िलये पजा पुराण जैसे गनथ
अभीष आवशयकता-पूितर कर सकते है। परसपर िवचार-िविनमय वाद-िववाद पितयोिगता, किवता सममेलन भी कम
उपयोगी नही है। हर वयिक सवयं किवता तो नही कर या कह सकता है , पर दस
ू रो की बनाई हु ई पेरणापद किवताएँ
सुनाने की वयवसथा तो कही भी हो सकती है। िचत पदशर िनयाँ भी जहाँ समभव हो, इस पयोजन की पूितर मे सहायक
हो सकती है।
खोजने पर ऐसे अनेको सूत हाथ लग सकते है जो जानयज की, िवचारकािनत की, सतपवृित संवदरन की,
दषु पवृित उनमूलन के िलये कौन, कया िकस पकार कुछ कर सकता है? इसकी खोज-बीन करते रहने पर हर जगह हर
िकसी को कोई न कोई मागर िमल सकता है। ढू ँ ढने वाले अदशय परमातमा तक को पाप कर लेते है, िफर जानयज की
पिकया को अगगामी बनाने के िलये मागर न िमले, ऐसी कोई बात नही है। आवशयकता है-उसका महतव समझने की,
उस पर धयान देने की।
उपासना से भावना का, जीवन साधना से वयिकतव का और आराधना से िकयाशीलता का पिरषकार और
िवकास होता है। आराधना उदार सेवा साधना से ही सधती है। सेवा कायो ं मे सामानयत: वे सेवाये है िजनसे लोगो को
सुिवधाएँ िमलती है। शेषतर सेवा वह है िजससे िकसी की पीडा का, अभावो का िनवारण होता है। शेषतम सेवा वह है
िजससे वयिक पतन से हटकर उनित की ओर मोडा जा सके। सुिवधा बढाने और पीडा दरू करने की सेवा तो कोई
आतमचेतना समपन ही कर सकता है। यह सेवा भौितक समपदा से नही, दैवी समपदा से की जाती है। दैवी समपदा देने
से घटती नही बढती है। इसिलये भी वह सवर सुलभ और शेष मानी जाती है।
सनत और ऋिष सतर के वयिक पतन िनवारण की सेवा को पधानता देते रहे है। इसीिलये वे संसार मे पूजय
बने। िजनकी सेवा की गई वे भी महान बने। सेवा की यह सवर शेष धारा जानयज के माधयम से कोई भी अपना सकता
है। सवयं लाभ पा सकता है और अगिणत वयिकयो को लाभ पहु ँचाकर पुणय का भागीदार बन सकता है।

पसतुत पुसतक को जयादा से जयादा पचार-पसार कर अिधक से अिधक लोगो तक पहु ँचाने एवं पढने के िलए
पोतसािहत करने का अनुरोध है।
- पकाशक

* १९८८-९० तक िलखी पुसतके (कािनतधमी सािहतय पुसतकमाला) पू० गुरदेव के जीवन का सार है- सारे जीवन
का लेखा-जोखा है। १९४० से अब तक के सािहतय का सार है। इनहे लागत मूलय पर छपवाकर पचािरत पसािरत
करने की सभी को छूट है। कोई कापीराइट नही है। पयुक आँ कडे उस समय के अनुसार है। इनहे वतर मान के अनुरप
संशोिधत कर लेना चािहए।

कािनतधमी सािहतय-यु ग सािहतय महता

कािनतधमी सािहतय-युग सािहतय नाम से िवखयात यह पुसतकमाला युगदषा-युगसृजेता पजापुरष पं. शीराम
शमार आचायर जी दारा १९८९-९० मे महापयाण के एक वषर पूवर की अविध मे एक ही पवाह मे िलखी गयी है। पाय:
२० छोटी -छोटी पुिसतकाओं मे पसतुत इस सािहतय के िवषय मे सवयं हमारे आराधय प.पू. गुरदेव पं. शीराम शमार
आचायर जी का कहना था- ‘‘हमारे िवचार, कािनत के बीज है। ये थोडे भी दिु नयाँ मे फैल गए, तो अगले िदनो धमाका
कर देगे। सारे िवशव का नकशा बदल देगे।..... मेरे अभी तक के सारे सािहतय का सार है।..... सारे जीवन का लेखाजोखा है।..... जीवन और िचंतन को बदलने के सूत है इनमे।..... हमारे उतरािधकािरयो के िलए वसीयत है।..... अभी
तक का सािहतय पढ पाओ या न पढ पाओ, इसे जरर पढना। इनहे समझे िबना भगवान के इस िमशन को न तो तुम
समझ सकते हो, न ही िकसी को समझा सकते हो।..... पतयेक कायर कतार को िनयिमत रप से इसे पढना और जीवन
मे उतारना युग-िनमारण के िलए जररी है। तभी अगले चरण मे वे पवेश कर सकेगे। ..... यह इस युग की गीता है। एक
बार पढने से न समझ आए तो सौ बार पढना और सौ लोगो को पढाना। उनसे भी कहना िक आगे वे १०० लोगो को
पढाएँ । हम िलखे तो असर न हो, ऐसा हो ही नही सकता। जैसे अजुरन का मोह गीता से भंग हु आ था, वैसे ही तुमहारा
मोह इस युग-गीता से भंग होगा।..... मेरे जीवन भर के सािहतय इस शरीर के वजन से भी जयादा भारी है। मेरे जीवन
भर के सािहतय को तराजू के एक पलडे पर रखे और कािनतधमी सािहतय को दस
ू रे पलडे पर, तो इनका वजन जयादा
होगा।..... महाकाल ने सवयं मेरी उँ गिलयाँ पकडकर ये सािहतय िलखवाया है।..... इनहे लागत मूलय पर छपवाकर
पचािरत-पसािरत शबदश:-अकरश: करने की सभी को छूट है, कोई कापीराइट नही है। ..... मेरे जान शरीर को मेरे
कािनतधमी सािहतय के रप मे जन-जन तक पहु ँचाने का पयास करे।’’

ॐ ‘‘बेटे ! कािनतधमी सािहतय मेरे अब तक के सभी सािहतय का मकखन है। मेरे अब तक का सािहतय पढ पाओ या
न पढ पाओ, इसे जरर पढना। इनहे समझे िबना िमशन को न तो तुम समझ सकते हो, न ही िकसी को समझा सकते
हो।’’.....
ॐ ‘‘बेटे ! ये इस युग की युगगीता है। एक बार पढने से न समझ आये तो सौ बार पढना। जैसे अजुरन का मोह गीता
से भंग हु आ था, वैसे ही तुमहारा मोह इस युगगीता से भंग होगा।
ॐ ‘‘हमारे िवचार बडे पैने है, तीखे है। हमारी सारी शिक हमारे िवचारो मे समािहत है। दिु नया को हम पलट देने का
जो दावा करते है, वह िसिदयो से नही, अपने सशक िवचारो से करते है। आप इन िवचारो को फैलाने मे हमारी
सहायता कीिजए। हमको आगे बढने दीिजए, समपकर बनाने दीिजए।’’.....
ॐ ‘‘मेरे जीवन भर का सािहतय शरीर के वजन से जयादा भारी है। यिद इसे तराजू के एक पलडे पर रखे और
कािनतधमी सािहतय को (युग सािहतय को) एक पलडे पर, तो इनका वजन जयादा होगा।
ॐ ‘‘आवशयकता और समय के अनुरप गायती महािवजान मैने िलखा था। अब इसे अलमारी मे बनद करके रख दो।
अब केवल इनही (कािनतधमी सािहतय को-युग सािहतय को) िकताबो को पढना। समय आने पर उसे भी पढना।
महाकाल ने सवयं मेरी उँ गिलयाँ पकडकर ये सािहतय िलखवाया है।’’.....
ॐ ‘‘ये उतरािधकािरयो के िलए वसीयत है। जीवन को-िचनतन को बदलने के सूत है इसमे। गुर पूिणर मा से अब तक
पीडा िलखी है, पढो।’’ .....
ॐ ‘‘हमारे िवचार, कांित के बीज है, जो जरा भी दिु नया मे फैल गए, तो अगले िदनो धमाका करेगे। तुम हमारा काम
करो, हम तुमहारा काम करेगे।’’.....
ॐ १९८८-९० तक िलखी पुसतके जीवन का सार है- सारे जीवन का लेखा-जोखा है १९४० से अब तक के
सािहतय का सार है।’’.....
ॐ ‘‘जैसे शवण कुमार ने अपने माता-िपता को सभी तीथो ं की याता कराई, वैसे ही आप भी हमे (िवचार रप मे -

कािनतधमी सािहतय के रप मे) संसार भर के तीथर पतयेक गाँव, पतयेक घर मे ले चले।’’.....
ॐ ‘‘बेटे, गायती महािवजान एक तरफ रख दो, पजापुराण एक तरफ रख दो। केवल इन िकताबो को पढना-पढाना व
गीता की तरह िनतय पाठ करना।’’.....
ॐ ‘‘ये गायती महािवजान के बेटे-बेिटयाँ है, ये (इशारा कर के) पजापुराण के बेटे-बेिटयाँ है। बेटे, (पुरानो से) तुम सभी
इस सािहतय को बार-बार पढना। सौ बार पढना। और सौ लोगो को पढवाना। दिु नया की सभी समसयाओं का
समाधान इस सािहतय मे है।’’.....
ॐ ‘‘हमारे िवचार कांित के बीज है। इनहे लागत मूलय पर छपवाकर पचािरत पसािरत करने की सभी को छूट है।
कोई कापीराइट नही है।’’.....
ॐ ‘‘अब तक िलखे सभी सािहतय को तराजू के एक पलडे पर रखे और इन पुसतको को दस
ू री पर, तो इनका वजन
जयादा भारी पडेगा।’’.....
ॐ शािनतकुञ अब कािनतकुञ हो गया है। यहाँ सब कुछ उलटा-पुलटा है। सातो ऋिषयो का अनकूट है।’’.....
ॐ ‘‘बेटे, ये २० िकताबे सौ बार पढना और कम से कम १०० लोगो को पढाना और वो भी सौ लोगो को पढाएँ । हम
िलखे तो असर न हो, ऐसा न होगा।’’.....
ॐ ‘‘आज तक हमने सूप िपलाया, अब कािनतधमी के रप मे भोजन करो।’’.....
ॐ ‘‘पतयेक कायर कतार को िनयिमत रप से इसे पढना और जीवन मे उतारना युग-िनमारण के िलए जररी है। तभी
अगले चरण मे वे पवेश कर सकेगे। ’’.....
ॐ वसंत पंचमी १९९० को वं. माताजी से - ‘‘मेरा जान शरीर ही िजनदा रहेगा। जान शरीर का पकाश जन-जन के
बीच मे पहु ँचना ही चािहए और आप सबसे किहयेगा - सब बचचो से किहयेगा िक मेरे जान शरीर को- मेरे कािनतधमी
सािहतय के रप मे जन-जन तक पहु ँचाने का पयास करे।’’.....

कािनतधमी सािहतय की पुस तके :

1 इककीसवी सदी बनाम उजवल भिवषय-भाग १
2 इककीसवी सदी बनाम उजवल भिवषय-भाग २
3 युग की माँग पितभा पिरषकार-भाग १
4 युग की माँग पितभा पिरषकार-भाग २
5 सतयुग की वापसी
6 पिरवतर न के महान कण
7 जीवन साधना के सविणर म सूत
8 महाकाल का पितभाओं को आमंतण

9 पजावतार की िवसतार पिकया
10 नवसृजन के िनिमत महाकाल की तैयारी
11 समसयाएँ आज की समाधान कल के
12 मन: िसथित बदले तो पिरिसथित बदले
13 सषा का परम पसाद-पखर पजा
14 आद शिक गायती की समथर साधना
15 िशका ही नही िवदा भी
16 संजीवनी िवदा का िवसतार
17 भाव संवेदनाओं की गंगोती
18 मिहला जागृित अिभयान
19 जीवन देवता की साधना-आराधना
20 समयदान ही युग धमर
21 नवयुग का मतसयावतार
22 इककीसवी सदी का गंगावतरण

अपने अं ग अवयवो से
(परम पूजय गुरदेव दारा सूकमीकरण से पहले माचर 1984 मे लोकसेवी कायर कतार-समयदानी-समिपर त िशषयो
को िदया गया महतवपूणर िनदेश। यह पतक सवयं परमपूजय गुरदेव ने सभी को िवतिरत करते हु ए इसे पितिदन पढने
और जीवन मे उतारने का आगह िकया था।)

यह मनोभाव हमारी तीन उँ गिलयाँ िमलकर िलख रही है। पर िकसी को यह नही समझना चािहए िक जो
योजना बन रही है और कायारिनवत हो रही है, उसे पसतुत कलम, कागज या उँ गिलयाँ ही पूरा करेगी। करने की
िजममेदारी आप लोगो की, हमारे नैिषक कायर कतारओं की है।
इस िवशालकाय योजना मे पेरणा ऊपर वाले ने दी है। कोई िदवय सता बता या िलखा रही है। मिसतषक और
हदय का हर कण-कण, जरार-जरार उसे िलख रहा है। िलख ही नही रहा है , वरन् इसे पूरा कराने का ताना-बाना भी बुन
रहा है। योजना की पूितर मे न जाने िकतनो का-िकतने पकार का मनोयोग और शम, समय, साधन आिद का िकतना
भाग होगा। मात िलखने वाली उँ गिलयाँ न रहे या कागज, कलम चुक जाये, तो भी कायर रकेगा नही; कयोिक रक का
पतयेक कण और मिसतषक का पतयेक अणु उसके पीछे काम कर रहा है। इतना ही नही, वह दैवी सता भी सतत
सिकय है, जो आँ खो से न तो देखी जा सकती है और न िदखाई जा सकती है।
योजना बडी है। उतनी ही बडी, िजतना िक बडा उसका नाम है- ‘युग पिरवतर न’। इसके िलए अनेक विरषो
का महान् योगदान लगना है। उसका शेय संयोगवश िकसी को भी कयो न िमले।
पसतुत योजना को कई बार पढे। इस दिष से िक उसमे सबसे बडा योगदान उनही का होगा, जो इन िदनो
हमारे कलेवर के अंग-अवयव बनकर रह रहे है। आप सबकी समिनवत शिक का नाम ही वह वयिक है , जो इन पंिकयो
को िलख रहा है।
कायर कैसे पूरा होगा? इतने साधन कहाँ से आएँ गे? इसकी िचनता आप न करे। िजसने करने के िलए कहा है ,
वही उसके साधन भी जुटायेगा। आप तो िसफर एक बात सोचे िक अिधकािधक शम व समपर ण करने मे एक दस
ू रे मे
कौन अगणी रहा?
साधन, योगयता, िशका आिद की दिष से हनुमान् उस समुदाय मे अिकंचन थे। उनका भूतकाल भगोडे सुगीव
की नौकरी करने मे बीता था, पर जब महती शिक के साथ सचचे मन और पूणर समपर ण के साथ लग गए, तो लंका
दहन, समुद छलांगने और पवर त उखाडने का, राम, लकमण को कंधे पर िबठाये िफरने का शेय उनहे ही िमला। आप
लोगो मे से पतयेक से एक ही आशा और अपेका है िक कोई भी पिरजन हनुमान् से कम सतर का न हो। अपने कतृरतव
मे कोई भी अिभन सहचर पीछे न रहे।
काम कया करना पडेगा? यह िनदेश और परामशर आप लोगो को समय-समय पर िमलता रहेगा। काम बदलते
भी रहेगे और बनते-िबगडते भी रहेगे। आप लोग तो िसफर एक बात समरण रखे िक िजस समपर ण भाव को लेकर घर
से चले थे, पहले लेकर आए थे (हमसे जुडे थे), उसमे िदनो िदन बढोतरी होती रहे। कही राई-रती भी कमी न पडने
पाये।
कायर की िवशालता को समझे। लकय तक िनशाना न पहु ँचे, तो भी वह उस सथान तक अवशय पहु ँचेगा, िजसे
अदत
ु , अनुपम, असाधारण और ऐितहािसक कहा जा सके। इसके िलए बडे साधन चािहए, सो ठीक है। उसका भार
िदवय सता पर छोडे। आप तो इतना ही करे िक आपके शम, समय, गुण-कमर , सवभाव मे कही भी कोई तुिट न रहे।
िवशाम की बात न सोचे, अहिनर श एक ही बात मन मे रहे िक हम इस पसतुतीकरण मे पूणररपेण खपकर िकतना
योगदान दे सकते है? िकतना आगे रह सकते है? िकतना भार उठा सकते है? सवयं को अिधकािधक िवनम, दस
ू रो को
बडा माने। सवयंसेवक बनने मे गौरव अनुभव करे। इसी मे आपका बडपपन है।
अपनी थकान और सुिवधा की बात न सोचे। जो कर गुजरे, उसका अहंकार न करे, वरन् इतना ही सोचे िक
हमारा िचंतन, मनोयोग एवं शम िकतनी अिधक ऊँची भूिमका िनभा सका? िकतनी बडी छलाँग लगा सका? यही
आपकी अिग परीका है। इसी मे आपका गौरव और समपर ण की साथर कता है। अपने सािथयो की शदा व कमता घटने
न दे। उसे िदन दन
ू ी-रात चौगुनी करते रहे।

समरण रखे िक िमशन का काम अगले िदनो बहु त बढेगा। अब से कई गुना अिधक। इसके िलए आपकी
ततपरता ऐसी होनी चािहए, िजसे ऊँचे से ऊँचे दजे की कहा जा सके। आपका अनतराल िजसका लेखा-जोखा लेते
हु ए अपने को कृत-कृतय अनुभव करे। हम फूले न समाएँ और पेरक सता आपको इतना घिनष बनाए, िजतना की
राम पंचायत मे छठे हनुमान् भी घुस पडे थे।
कहने का सारांश इतना ही है, आप िनतय अपनी अनतरातमा से पूछे िक जो हम कर सकते थे , उसमे कही
राई-रती तुिट तो नही रही? आलसय-पमाद को कही चुपके से आपके िकया-कलापो मे घुस पडने का अवसर तो नही
िमल गया? अनुशासन मे वयितरेक तो नही हु आ? अपने कृतयो को दस
ू रे से अिधक समझने की अहंता कही छद रप
मे आप पर सवार तो नही हो गयी?
यह िवराट् योजना पूरी होकर रहेगी। देखना इतना भर है िक इस अिग परीका की वेला मे आपका शरीर, मन
और वयवहार कही गडबडाया तो नही। ऊँचे काम सदा ऊँचे वयिकतव करते है। कोई लमबाई से ऊँचा नही होता, शम,
मनोयोग, तयाग और िनरहंकािरता ही िकसी को ऊँचा बनाती है। अगला कायर कम ऊँचा है। आपकी ऊँचाई उससे कम
न पडने पाए, यह एक ही आशा, अपेका और िवशवास आप लोगो पर रखकर कदम बढ रहे है। आप मे से कोई इस
िवषम वेला मे िपछडने न पाए, िजसके िलए बाद मे पशचाताप करना पडे।
-पं ० शीराम शमार आचायर , माचर
1984

हमारा यु ग -िनमारण सतसं क लप
(युग-िनमारण का सतसंकलप िनतय दहु राना चािहए। सवाधयाय से पहले इसे एक बार भावनापूवरक पढना और
तब सवाधयाय आरंभ करना चािहए। सतसंगो और िवचार गोिषयो मे इसे पढा और दहु राया जाना चािहए। इस
सतसंकलप का पढा जाना हमारे िनतय-िनयमो का एक अंग रहना चािहए तथा सोते समय इसी आधार पर
आतमिनरीकण का कायर कम िनयिमत रप से चलाना चािहए। )

1.

हम ईशवर को सवर वयापी, नयायकारी मानकर उसके अनुशासन को अपने जीवन मे उतारेगे।

2.

शरीर को भगवान् का मंिदर समझकर आतम-संयम और िनयिमतता दारा आरोगय की रका करेगे।

3.

मन को कुिवचारो और दभ
ु ारवनाओं से बचाए रखने के िलए सवाधयाय एवं सतसंग की वयवसथा रखे रहेगे।

4.

इंिदय-संयम अथर -संयम समय-संयम और िवचार-संयम का सतत अभयास करेगे।

5.

अपने आपको समाज का एक अिभन अंग मानेगे और सबके िहत मे अपना िहत समझेगे।

6.

मयारदाओं को पालेगे, वजर नाओं से बचेगे, नागिरक कतर वयो का पालन करेगे और समाजिनष बने रहेगे।

7.

समझदारी, ईमानदारी, िजममेदारी और बहादरु ी को जीवन का एक अिविचछन अंग मानेगे।

8.

चारो ओर मधुरता, सवचछता, सादगी एवं सजजनता का वातावरण उतपन करेगे।

9.

अनीित से पाप सफलता की अपेका नीित पर चलते हु ए असफलता को िशरोधायर करेगे।

10.
मनुषय के मूलयांकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योगयताओं एवं िवभूितयो को नही, उसके सिदचारो और
सतकमो ं को मानेगे।

11.

दस
ू रो के साथ वह वयवहार न करेगे, जो हमे अपने िलए पसनद नही।

12.

नर-नारी परसपर पिवत दिष रखेगे।

13.
संसार मे सतपवृितयो के पुणय पसार के िलए अपने समय, पभाव, जान, पुरषाथर एवं धन का एक अंश
िनयिमत रप से लगाते रहेगे।
14.

परमपराओं की तुलना मे िववेक को महतव देगे।

15.

सजजनो को संगिठत करने, अनीित से लोहा लेने और नवसृजन की गितिविधयो मे पूरी रिच लेगे।

16.
राषरीय एकता एवं समता के पित िनषावान् रहेगे। जाित, िलंग, भाषा, पानत, समपदाय आिद के कारण परसपर
कोई भेदभाव न बरतेगे।
17.
मनुषय अपने भागय का िनमारता आप है, इस िवशवास के आधार पर हमारी मानयता है िक हम उतकृष बनेगे
और दस
ू रो को शेष बनायेगे, तो युग अवशय बदलेगा।
18.

हम बदलेगे-युग बदलेगा, हम सुधरेगे-युग सुधरेगा इस तथय पर हमारा पिरपूणर िवशवास है।

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