सोऽहं – तनुजा ठाकुर द्वार सम्पा�द वषर - १ अंक - ८

सोऽहं

साधकत्त्ववृ�द्ध हेतु साप्ता�हक आध्याित्मक
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ब्लॉ – www.tanujathakur.com
|| श् गणेशाय नमः ||
|| श् गुरवे नमः||

लेख�के मुख् शीषर्:
१. सुवचन
२. साधना हे तु सैद्धां� जानकार�
३. प्रायो� साधनाके संदभर्म मागर्दशर
४. साधक�क� अनभ
ु ू�तयां
५. शंका समाधान
६. अ�नष् शिक्तस संबं�धत आध्याित् उपाय
७. साधक�द्वार आध्याित् उन्न� हे तु प्रय
८. गर
ु ुपू�णर् �वशेष
९. उपासना कायर
१०. वै�दक सनातन धमर्म ऐसा क्य ?

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सोऽहं – तनुजा ठाकुर द्वार सम्पा�द वषर - १ अंक - ८

१. सुवचन

अ. श्रीग उवाच :

खर� �वद्या वह ह , जो हम� ईश्वरसे एकर होने हेतु हमारा मागर्दशर्न कर ! आध�ु नक �व�ान

और �श�ाक� �भन्न शाखाय� मायासे संबिन्धत होतीह� और मा , सुख प्रािप्तका साधन म

है, यह ईश्वरसे ूर कर देती
ह | अतः इसका महत्त्व शून्य |

-

परम पूज्य ड. जयंत बालाजी आठवले |

-

परम पज
ू ्य ड. जयंत बालाजी आठवले

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सोऽहं – तनुजा ठाकुर द्वार सम्पा�द वषर - १ अंक - ८

भावाथर : �वद्याक� प�रभाषा ह, “सा �वद्या या मुक्त”, अथार्त जो हम� ईश्वरप्रािप्त हेतु मागर्दश, उसे
�वद्या कहते ह�| आधु�नक �व�ान एवं वतर्मान �श�ण पद्ध� तम� इस �वषयका लेश मात्र भी समावेश नह |
अतः इससे व्यिक्त भौ�तक सुखका साधन तो प्राप्त कर ले, वस्त-�नरपे� आनंदक� प्रािप्त ए
आध्याित्मक प्रग�त नह�ं कर , जो इस मनुष्य यो�नम� आनेका एक मुख्य उद्देश्य हो | अतः इसका
महत्त्व शून्य | आज भौ�तक सख
ु -साधनक� भरमार होते हुए भी अनेक व्या�धयां बढ़ रह�ंह� | व्यिष्ट एव
समिष्ट जीवनम� आध्याित्मक जीएवं मल
ू ्य�का पतन हो रहा ह ै और चारो

ओर‘त्रा�ह म’ क� िस्थ�त

�न�मर् हो रह� है | ध्यान रहे यह वसुंधर भोग-भ�ू म नह�ं, अ�पतु साधना-भ�ू म है; परं तु आधु�नक �व�ान और
वतर्मान धमर्�नरपे� �श पद्ध�तने इसे भ-भ�ू म बना �दया है | अतः �श�ाक� अपे�ा पन
ु ः �वद्य-अजर्न हेतु
सभीको प्वृत्त करना हो
|

आ.

शास् वचन :

नाहारं �चन्तये त् प्रा�ो धमर्मेकं �ह �चन्

आहारो �ह मनुष्याणां जन्मना सह जाय - चाणक्य नी�
अथर्: �ानी अपने आहारक� �चंता नह�ं करता, मात्र धमर्का �चंतन करता; क्य��क उसे पता होता है �क उसके
आहारका �नयोजन उसके जन्मके समय ह� हो जाता ह ै|

इ.

धमर्धार

वतर्मा समयम� तारक रू वाले मरु ल�धर श्रीकृष् नह�ं, अ�पतु मारक रूपवाल सदश
र चक्रधा भगवान श्
ु ्
कृष्णक साधना करने वाले एवं राष् और धमरक� र�ा करनेवाले तेजस्व धमर्योद साधक�क� आवश्यकत है !

– तनुजा ठाकुर

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सोऽहं – तनुजा ठाकुर द्वार सम्पा�द वषर - १ अंक - ८

ई. गीता सार
वासां�स जीणार्�न यथा �वहा
नवा�न गह
ृ ्णा�त नरोऽपरा�ण
तथा शर�रा�ण �वहाय जीणारन्यन्या�न संया�त नवा�न देह� श्री भगवदगीता – (२:२२ )
अथर् : जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र�को त्यागकर दूसरे नए वस्त्र�को ग्र, वैसे ह� जीवात्म, जीणर्शर�र�को
त्यागकर ूसरे नए शर�र�को प्रा
होती है |

भावाथर् : मनुष्यका यह शर�र नश्वर है और आत्मा अ�वनाशी | वास्त�वकता यह ह ै �क जीणर् शर, जो
साधनाके योग्य नह�ं रह पात, उसका नाश होना एक प्रकारसे ईश्वर�य वरदान है और पुनः नए -समान
नया शर�र लेकर जन्म लेन, साधना हेतु एक उत्तम माध्यम ह| परु ाने वस्त्रका त्याग जैसे हम स्वाभा�व
कर देते ह� और

हम� उसका मोह नह�ं होता, उसी प्रकारसे �कसीक� मृत्युका भी शोक करना उ�चत नह�ं क्य

यह उस जीवात्मक� आध्याित्मक प्रग�तके �लए सृिष्टद्वारा र�चत एक प् | अतः �ानी मतृ ्युपर शोक
नह�ं

करते, क्य��क शर�रम� िस्थत आत्मा अ�वनाशी है और जब तक जीवाक� मन, बु�द, वासना और

अहमका अंश रहता है, तब तक उसे ‘पुन�पर् जन्मम पुन�पर् म’ के चक्रम� बंधे रहना पड़ता ह| इस चक्रस
छुटकारा पाने हेतु साधना करनेक� आवश्यकता होती ह ै|

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सोऽहं – तनुजा ठाकुर द्वार सम्पा�द वषर - १ अंक - ८

२. साधना हे तु सैद्धां� जानकार�
वेद एवं मन्त्र�का उच्चारण सह� होना आवश्, अन्यथा हम� उनके अशुद्ध उच्चारणसे हम� कष्ट हो, मात्
नामजप हम �कसी भी प्रकार कर सकते, ऐसा क्य�?
पा�णनीय व्याकरणम� कहा गया ह :
अन�रं हतायुष्यं �वस्वरं व्या�धपी�डत।
अ�ता शस्त्रषरूपेण वज्रं पत�त मस
अथार्त व्यंजन वणर अशुद्ध उच्चार आयुका नाश होता है और स्वर वणर्के अशुद्ध उच्चारणसे रोग हो,
अशद्ध उच्चारणसे युक्त मं
रा अ�भमं�त्रत अ�त �सरपर वज्रपात सामान �गरता|

परन्तु नामजपके सन्दभर्म� पञ्चरत्रगम नामक धमर् शास्त्रम� कुछ इस प्रका
मख
ू � वद�त �वष्णाय बुधो वद�त �वष्णव|
नं इत्येव अथर्म् च द्वयोर�प समं फ||
अथार्तमख
ू र व्यिक्त अयोग्य उच्चा, �वष्णाय नमः कहता ह ै और बु�द्धमान व्यिक्त �वष्णवे नमः क,
परन्तु दोन�का हेतु नमन करना ह ै| अतः दोन�को समान फल �मलता है |
देसी भाषाम� इस�लए कहा गया है ‘रामनाम टेढो भला’ |
इस सन्दभर्म� एक अनुभू�त बताती हू| अक्टूबर१९९९ म� झारखण्डके बोकारो िजलेम� एक मं�दरम� साप्ता�ह
सत्संग �लया करती थी| एक �दन म� कह�ं जा रह� थी, एक अनपढ़ स्त्री राहम� मेर� दो प�हये वाहनको र
कर, अत्यंत भावपूणर् होकर बोल, "म� आपको कुछ बताना चाहती हूँ "|

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म�ने कहा, "क्य "? उसने बताया �क तीन मह�ने पहले एक �दन मं�दरके बाहर वह �कसीके घरके बतर्न नल पर
धो रह� थी और उसने नामजपके �वषयम� मझ
ु े सत्संग लेते हुएध्व�नप्र�के (माइक) माध्यमसे सुना था|
उसने अपने हाथ पैरक� ओर �दखाते हुए कहा, "चमर्रोगसे मेरा शर�र लगभगसड़ गया था और आपके बताये

जप करनेपर मेरा चमर् रोग ठ�क हो गय "| उसके शर�रपर चमर्रोगके हलके धब्, �नशानके रूपम� �दख रहे थे|
मझ
ु े यह सन
ु कर अत्यंत आनंद हु, क्य��क म� उससे कभी �मल� भी नह�ं थी और तब भी वह नामजप कर
रह� थी | म�ने यूँ ह� पुछा, "आप कौनसा जप कर रह� ह� "? उसने कहा, "श्री गुरुदेवे दत्ते” |
म� मस
� े कहा, "हां, नामजप सह� पद्ध�तसे नह�
ु ्कराने लगी तो उसने कह ! "क्या मुझसे कोई चूक हो गय "? मन
कर रह� और म�ने उन्ह�‘श्री गुरुदेव ’ जप करनेके �लए बताया और उसी समय उसे पांच बार दोहरानेके �लए
भी कहा | उसने आनंद पूवर्कअपने जपम� सध
ु ारकर, मझ
ु े कृत�तापूणर् नमस्कार कर चल� गय| म� वह�ँ खड़ी,

उपय्क्त श्लोकका स्म
रण कर मुस्कुराने| वह स्त्री अनपढ़ | अतः वह जप सह� प्रकारसे नह�ं कर प;
ुर
परन्तु हेतु शुद्ध | अतः उसे अनभ
ु �ू त हुई |
उस स्त्रीको अतृप्त �पतर�के कारण कष्ट था और उसी कारण उसे चमर्रोग हो , 'श्री गुरुदेव ', अथार्त
दत्तात्रेय देवताका जप करनेसे उसके �पतर�को �मल गयी और उसका कष्ट समाप्त हो गय| यद्य�प
उसने जपको सह� पद्ध�तसे नह�ं जपा तथा�प उसके भावके कारण उसे योग्य लाभ प्राप | अतः कहते ह�,
‘न पाप मारक है, न पुण्य तारक ह , मात्र भाव ह� तारक ’ |

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३. प्रायो� साधनाके संदभर्म मागर्दशर

सत्सं का महत्त

श्रवण भिक्तके माध्यमसे अध्यात्मम� प्रग� त करनेम� बहुत समय लग | य�द अध्यात्मम� शीघ्र प
करनी है, तो सत्संगम� बताये जानेवाले �वषयको कृ�तम�लाकर आत्मसात करनका प्रयास करना चा�ह| अतः
जब भी हम सत्संगम� जाते ह� तो एककॉपी और कलम अवश्य लेकर जाना चा�ह, िजससे �क सत्संगम� बताये
जानेवाले �वषयको हम �लख सक� और उसे अपने जीवनम� उतार सक� | अध्यात्म कृ�तका शास्त | अतः मात्
श्रवण करनेसे जीवनम� �वशेष अंतर नह�ं आत| अध्यात्म अन-सम्बन्धी �ान है और एक शास्त्| अतः
अध्यात्म सीखनेका सबसे सरल माध्यम, सत्संग म�जाना और वह भी �वद्याथ-समान बनकर | सत्संम�
जाते समय ध्यान रखना चा�हए क� य�द बच्चे छोटे ह� और वे अत्य�धक नटखट, तो उन्ह� सत्संगम� लेक
न जाएं, क्य��क इससेदूसरे क� एकाग्र भंग होती है | सत्संग धमर्�श�णका स्थल अतः वहांक� मयार्दाका
मान रखना प्रत्येक साधकका धमर्|
सत्संगम� शब्दकमहत्त मात्र दो प्र�तशत होता है और शब् महत्त ९८% होता है | ऐसेम� प्रारिम्
अवस्थाके साधको (३०-४०% के स्तरवाल साधक�को ) शब्दपर तो ध्यान देना ह� , साथ ह� जो शब्दाती
चैतन्य सत्संगम�न�मर् हो रहा है, उसपर भी ध्यान देना चा�हए और साधनाम� जो उन्नह�, (६०%
आध्याित्मक स्तरसे अ) उन्ह शब्दातीत चैतन्यपर अ�धक ध्यान देना चा�| य�द �कसी साधकम� भाव हो,
तो भाषाक� मयार्दा नह�ं रहती और सत्संगके शब्दातीत चैतन वह लाभ लेकर आनंदक� अनुभ�ू त प्राप्त कर
है | इस सन्दभर्म� एसा�धकाक� अनभ
ु �ू त बताती हूं |
जनवर� २०११ म� म� चेन्नईम� अंग्रेजी भाषातीन-�दवसीय सत्संग ले रह� थ, वहां एक व ृद्सा�धका सत्संगम�
बैठा करती थीं, उन्ह� अंग्रेजी भाषा समझम� नह�ं आती; परन्तु वे सत्संगम� प्र�त�दन आनंदपूवर्क बैठा
थीं | जब म�ने एक �दन �कसी साधकक� सहायतासे उनसे पूछा �क आप सत्संगम� क्य� बैठतह� ?

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क्याजो म� सत्संगम� बताती हूं वह आपको समझम� आती है ? उन्ह�ने बताया�क उन्ह� शब्द तो कुछ भ
समझम� नह�ं आते; परन्तु सत्संगम� उन्ह� म� दग
ु ार्के स्वका दशर्न होता है और आनंदक� अनुभू�त भी होती
है, इस�लए वे सत्संगम� बैठती ह�| सच्चाई यह ह ै�क उस सा�धकाका आध्याित् स्तर४५% है, जो सत्संके
सामू�हक साित्त्वकताके कार५०% से अ�धक हो जाता है एवं उनम� भाव भी अ�धक है | अतः वे शब्दातीत
आनंदका अनुभव कर पाती ह� और उन्ह� दे-दशर्न भी इसी कारणसे हुए| ऐसे ह� झारखण्डके गोड्डा िजलेम
तीन �दवसीय आध्याित् �श�वरम� एक चार वषर्का बालक कुमार रौनक ठाकुरआया करता था, वह तीन घंटे
आनंदपूवर् एवं तन्मयतासे बैठता था और सत्संगके दौरान नाम भी �लखता था | वह भी ‘ॐ ॐ नमो
भगवते वासदे
ु वाय ॐ’ का जप �लखा करता था (उसे उसके स्तरानुसार यह जप करनेके �लए बताया थ) | उस
बाल साधकको एक वाक्य भी ढंगसे �लखना नह�ं आता ह; परं तु बाल साधकका आध्याित् स्तर५० % होनेके
कारण उसे सत्संसे प्रापचैतन्यके कारण शब्दातीत आनंदक� अनुभू�त होती |

कुमार रौनक ठाकुर
अब हम यह देख�गे �क सत्संम� बौ�द्धक रूपसे �सखाये जाने वाले �वषय और शब्दातीत स्
प्र�े�पत चैतन्यका पूणर् लाभ लेनेके �लए हम क्या कर सकत|
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१. सत्संगम� जानेसे पूवर् ह� नमक पानीका उपाय क, िजससे सत्संगके चैतन्यको आप ग्रहण कर |
म�ने देखा है �क कुछ लोग�को अत्य�धकआध्याित् कष्ट होनेके कारण वे सत्संगम� आते ह� सोन

लगते ह� और इसी कारण वे सत्संगम�उपिस्थत रहनाटालते ह� | नमक-पानीका उपाय कर सत्संगम�
जानेसे मन एवं बु�दपर छाया आवरण नष्ट हो जाताहै एवं अध्यात्मका बौ�द्धक भाग ग्रहण ह ो|

साथ ह� आवरण कम रहनेके कारण सत्संका चैतन्य भी अ�धकमात्म� ग्रहण होता ह
२. सत्संगम� बैठनेसेदो घंटे पूवरसे ह� अपने आराध्यसेप्राथर्ना किजससे �क आप सत्संगके चैतन्यक
ग्रहण कसक� |
३. सत्संग आरम्भ होनेसे पूवर् गणेशजी जो बु�द्धके देवता है उन्मां सरस्वत जो �वद्याक� देवी ह�
उनसे प्राथर्कर� �क हमारे मन एवं ब�ु द्धपर जो भी आवरण हो वह नष्ट हो और सत्संगको ह,
बु�द्ध एवं चैतन्यकेरपर ग्रहण कर उसे अपने जीवनम� उतार सक|
४. सत्संगके दौरान भी नामजप एवं प्राथर्नाम� �नरंतरता बनाय� |
५. वतर्मान समयम� अ�नष्ट शिक्तय�का कष्ट अत्य�धक बढ़ गया है ऐसेम� य�द सत्संगम� बै
पश्चातकुछ शार��रक कष्ट हो रहा हो तो एकाग्रतापूवर्क नामजप और प्राथर्ना कर� और वहांसे उठ
बैठ� ह� रह� , इससे थोड़े समय पश्चात आपके कष्ट कम हो जाय�ग| फरवर� २०११ म� म� �दल्ल�म� एक
घरम� सत्संग ले रह� थ, तो सत्संगम� बैठे एक साधकको कष्ट होने ल | उन्ह� थरथराहट होने लग,
पसीना आने लगा और लगा �क सत्संगसे उठकर भागजाएं; परं तु वे नामजप और प्राथर्नाकेपर बैठे
रहे |

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अगले �दन उन्ह�ने पाया�क उनक� पंद्रह वषर् पुराने चमर्रोगसे प्रभा�वत ८०% सध
ु ार था और अगले तीन
�दनम� उनका चमर्रोग �बलकुल ह� समाप्त हो ग, िजसम� �पछले पंद्रह वष�से खुजल� होती थी खून
�नकला करता था | उन्ह�एिक्जम था | वास्त�वकता यह थी �कउस साधकको अ�नष्ट शिक्तय�का कष्ट |
सत्संगके चैतन्यसउन्ह�कष्ट देने वाल� शिक्तको ग�त �मल ग, और उन्ह� उस कष्टसे मुिक्त �मल ग|
यह सत्संगकामाहात्म्य | इसी प्रकार जबम� बक्सरम� सत्संग ले रह� थी तो सत्संग समाप्त होनेके
तीन साधकने बताया �क सत्संगसे पूवर् उन अत्य�धकशार��रक पीड़ा थी, जो सत्संग समाप्त होनेपर पूणर्
ठ�क हो गया |

नामजपका महत्व५ प्र�तशत है और सत्संगका महत३०% प्र�तशत ह|

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४. साधक�क� अनुभू�तयां

म� िजस गांवम� रहती हूं उसी गांवके एक साधक श्री अ�भषेक ठाकुरक� अनुभू�तयां देख�ग|

१. (अ) २०.३.२०१० हमारे गाँवके काल� मं�दरम� ध्व�नप्र�ेपक यं (माइक) �लए �वष्णु धामसे(तनज
ु ा द�द�के
�नवास स्था) stabilizer ( वोल्टेजिस्थरत प्रा करनेका यन् ) लेकर मं�दर जा रहा था तो उस
‘स्टे�बलाइज’से वैसी ह� सग
ं आ रह� थी, जैसी द�द�के कमरेसे आती है ।
ु ध
(आ) वषर्२०१० म� प्र�त�दन गांवम� एक फलकपर �हंदुओंके प्रबोधन हेतु एक सुवचन �लखा करत | उसे द�द�
समय-समयपर �लखवाती थीं और एक स्थानपर उन्ह�ने स्वयं भी कुछ सुवचन �लखे थ| �दनांक ३०.०४.२०१०
को जब उस कॉपीको खोला, तो उसम� कुछ पन्न�पर द�द�ने स्वयं कुछ मुद्दे �लख, उससे शिक्तदायक सुगंध
आ रह� थी जब�क पूरे कापीसे दूसरे प्रकारक� सुगंध आ रह� थी । वकॉपी ‘�वष्णु धा’ म� ह� रखते थे, परं तु

कई �दन�से मेरे घरम� रखी थी । (यहां शिक्तदायक सुगं, मारक गंध है और अन्य स्थानसे तारक गंध आ रह
थी, व्यिक-�वशेष, काल-�वशेष, स्था-�वशेष, ईश्वरके तारक एवं मारक गंध हमारे र�ण हेतु प्र�े�पत होता )
(इ) द�द�के कुछ रुपए फट गए थ, उसे प�रव�तर् करना था । वे एक प्लािस्टक थैल�म� थे । म� रुपएको

संभालकर एक अभ्यास पुिस्तकाम� रख उसे एक थैलेम� डालकर गोड(शहर) गया और पो�लथीनको अपने घरम�
दूसर� पुिस्तकाम� रख �दया । जब म� गोड्डासे आया तो मेरे सभी पुस्तक�से वैसा ह� सुगंध आने लगा जै
द�द�के घरसे आता है और उस थैलेम� रखे सारे सामानसे भी वैसा ह� सग
ं आ रह� थी ।
ु ध
अनभ

ु �ू तका �वश्लेष : ६० % आध्याित्मक स्तरसे अ�धक वाले अध्यात/ साधक/संत से दैवी सग
ु ध
�नकलती है; परं तु यह शास्त्र इस साधकको पता नह�ं |
२. �दनांक २४.०५.२०१० के �दन मं�दरम� द�द�ने प्रवचनम� बता

, देवी-देवतापर प्लािस्टकके फूल नह�ं अपर

करना चा�हए , क्य��क वह मृतवत और ताम�सक होता ह ै ।

म� घर आया और अपनी दाद�से पूजाघरम� देवी मांको चढ़े, प्लािस्टकके फूल पूजा घरसे हटानेके �लए कहा त
वे बोल�ं, “ये सब मझ
ु से नह�ं होगा” ।

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मझ

क�“आपक� जैसी इच्छा हो वैसे होने द� “ दो �दन
ु े अत्य�धक दुख हु; परं तु म�ने मां दग
ु ार्को प्ाथर्ना
पश्चात मेर� दाद�के स्वप्नम� मां दुगार् आयीं और बो“तुम मझ
ु े प्र�त�दन ताजे फूल�क� माला बनाकर चढा
और प्लािस्टकक� माला उतार ” । तत्पश्चात दाद�ने वैसा ह� करना आरंभकर �दया औरम�ने -ह�-मन मां
दग
ु ारके प्र कृत�ता व्यक्त क�
अनुभ�ू तका �वश्लेष : सत्संग या प्रवचनम� बताए गए मुद्देको कृ�तम� लानेको साधकत्व क, परं तु प�रवारम�
तनाव �नमार्णक, �कसी मद्देको कृ�तम� लानेका प्रयास नह�ं करना चा�हए और सब ईश्व
रेच्छापर छोड़

चा�हए | अ�भषेकने ऐसा ह� �कया इस�लए ईश्वरने उनक� सहायताक�|
३.

�दनांक १८.०४.२०१०

को मेर� पर��ा खड़गपरु म� थी । म� कभी खड़गपरु नह�ं गया था । मेर� पर��ा सबह

९:०० बजेसे थी, और म� ८:१० पर खड़गपुर पहुंचा । पर��ा-क�द्र भी ढूंढना था । मुझे लग�क अब म� पर��ा

नह�ं दे पाउं गा, तभी मझ
ु े द�द�क� बात याद आ गयी �क �कसी भी प�रिस्थ�तम� आनंदम� रहन साधकत्वके

ल�ण ह� और नामजप करने लगा । म�ने नामजपम� �नरं तरता बनाई रखी, प�रणामस्वरूपम� पर��ा क�द्रपर
�मनट पहले पहुंचा ।
अनुभ�ू तका �वश्लेष : प्रत्येक प�रिस्थ�तम� आनं�दत रहनेके प्रयासको साधना कहते ह� और िजस साधक
गढ
ू रहस्यको जा, प्रत्येक प�रिस्थ�तम� आनंदम� रहना सीख , उसके �लए साधना पथपर अग्रसर होन
सहज हो जाता है |
४.

�दनांक २१.०४.२०१० के �दन कोलकाताम� म�

, मेर� छोट� मां और मेर� बहन, तीन� बाजार जानेवाले थे |

अचानक मन प�रव�तर्त हो गया और हम नह�ं गए । कुछ �मनट पश्चात जहां हम जानेवाले , लगातार दो
बम ब्लास्ट हुआ और वहां उपिस्थत एक व्यिक्तक� मृत्यु हो गयी । तब मुझे समझम�क हमारा बाजार
जानेका �नयोजन क्य� प�रव�तर्त हो गया
अनभ
ु �ू तका �वश्लेषण: ‘न मे भक्: प्रणश्’ अथार्त भक्तवत्सल परमेश्वर साधकका र�ण करते ह�|
हमने मात्र भक्त बननेका प्रयास करना चा|
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श्री अ�भषेक ठाक

५.. वषर्२०१० म� जब द�द�ने जब मझ
ु े कुछ ग्रंथ पढ़नेके �लए �द, तो उसे पढ़नेके बाद मेरे मनम� प्रश्न आ

लगे, परं तु म� जो भी प्रश्न सोचकर सत्संगम� जात, वह द�द�से पूछनेसे पहले ह� द�द� उत्तर दे देती थी ।
ऐसा लगता था �क जैसे म� क्या सोच रहा हू, उन्ह� सब पता ह ै । - अ�भषेक

अनुभ�ू तका �वश्लेष : जब ईश्वरको �कसी अध्यात्म�वदके माध्यमसे �कसी जीवात्माका मागर्दशर्न करन
है, तो वे मागर्दशर्कको माध्यम बनाकर साधकको अनुभू�त देते ह� और मागर्दशर्क �वश्वमन और �वश् य�द
एकरूप ह, तो उन्ह� सामनेवालेके �वचार सहज ह� समझ आते ह�|

कुछ समय पूवर् ईश्वरने सुझाया �क मुझे एक साप्ता�हक आध्याित्मक प�त्रककरना
चा�हए और कुछ सप्ताह पश्चात ईश्वरने ऐसा करनेके �लए क्य�, यह कुछ साधक�क�
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अनभ
ु �ू तयां पढ़नेके पश्चात �ात हुआ| इसी संदभर्म� आगराक� श्रीमजूह� चौहानक�
�नम्न�ल�खत अनुभू�त देख�गे|
“प्रत्येक सप्ताह यह सो‘सोहम’ प�त्रका पढ़ना आरंभ करती हूं �क कुछ मागर्दशर्न �मल

और जब भी पढ़ती हूँ तो लगता है �क यह मात्र मेरे �लए ह� �लखा जा रहा ह|

एक बार मेरे अत्य�धक प्रयास करने पर भी सुबहके समय नामजप नह�ं हो पा रहा, मनम�
आया �क द�द�को मेल कर �लखूँ �क म� चार बजे नह�ं उठ पाती हूं | ऐसा करनेके �लए क्या
करू , ऐसा क्य� हो रहा ह ै? द�द�को पत्र भेज यह पूछनेसे पहले ह‘सोहम’ के माध्यमसे मेरे
प्रश्नका उत्तर �मल |
म� जब भी नमक पानीका उपाय करती थी, तब मेर� तीन-वष�य �ब�टया भी आकर उसी पानीम�
अपना पैर डालदेती थी | म�ने सोचा �क द�द�से पूछुंगी �क वह ऐसा कर सकती है क्या? म�
नमक पानीम� १५ �मनटसे

अ�धकदेर तक पैर डाल कर रखती थी और सोचती थी शायद इससे

अ�धक लाभ होगा; ऐसा करते समय यहभी �वचार आता था �क द�द�से एक बार पूछ लंग
ु ी,
�कन्तु पूछना भूल जाती थी| इन दोन� प्रश्न�का उत‘सोहम’ म� स्पष्ट रूपसे �लखा पा|
मुझे ऐसा लगता है जैसे द�द� प्रत्येक पल मेर� बात� सुनती रहती ह� और मेरा मागर्दशर्न
रहती ह�” | - जूह� चौहान

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सोऽहं – तनुजा ठाकुर द्वार सम्पा�द वषर - १ अंक - ८

५. शंका समाधान

क्या �पतर पु�त्रय�को भी कष्ट देते?
प�रवारम� िजस �कसी सदस्यम� साधनाक� अत्य�धक �मता होती , �पतर उसे सवर्प्रथम कष्ट द
उनसे अपने सदग�तक� अपे�ा रखते ह�, �पतर�को पुत्रसे अ�धक अपे�ा होती , यह सत्य ह |
�वशेषकर प्रथम पुत्र और पुत्र�म� जब सबसे तेज उनसे, परन्तु य�द पुत्री अत्यंत साित्त या
घरम� पुत्र नह�हो, तो �पतर पुत्रीको कष्ट देते | उनके �लए साधना करने वाले जीव एवं उसके साथ
उनका लेन-देन महत्वपूणर् घटक होता ह| अतः पुत्को भी “श्री गुरुदेव ”का जप अवश्य ह� करना
चा�हए, िजससे उनका भी �पतर�के कष्ट होनेसे पूवर् ह� उनका र�ण ह| जैसे जब म�ने अपने गांवम�
सत्संगलेना आरम्भ�कया, तो हमारे कुलके अनेक �पतर सत्संगके साधम� , िजनम� कुछ मेरे कुलके

सम्बन्धी भह�, उन साधक�म� प्रकट होकर मुझसे ग�मांगने लगे | ध्याम� रख�, सत्संग य�द भावपूणर
पद्ध�तस�कया जाये, तो उसके माध्यमसे हमपरआध्याित् उपाय(ह��लंग) होता है और कई बार
अ�नष्ट शिक्तसे पी�ड़त साधकको सत्संगका चैतन्य सहन नह�ं और वे प्रकट हो जाते | उनम�
�वद्यमान अ�नष्ट शिक्त पहोते ह�, उधम मचाती ह� या ग�त मांगने लगती ह� | जब कुछ अ�नष्ट
शिक्तयां साधकम� प्रकट होकर सदग�त मांगने ल, म�ने उनसे कहा �क आप अपने पुत्रके पाजाएं
और उनसे ग�त मांगे तो वे कहने लगीं �क आजकल पुत्र हम� पानी तो देता नह�ं , ग�त क्यादेगा ?
�पत ृप�म� �पतर�को पत
ु द्वार जल, �तल-तपर्ण�कया जाना चा�हए, ऐसा शास्त्र�म� �लखा |

मात्र आ

पाश्चात्य संस्कृ�तके अन्धानुकरणके कारण अनेक पधमार्चर और अपने �पतर�के प्र�त कतर्व्
�वसरने लगे ह� और �पत-ृ कमर्को कुछ पुरुष तो ढ�ग तक मानने लगे, इस सीमा तक उनक� अधोग�त
हो गयी है | ऐसे पुरुष�को�पत ृ श्रा� करते ह� और उनके घर अनेक कष्ट होने लगते ह� और कुछ
पीढ़� उपरांत उनका कुल नाश होता है |

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सोऽहं – तनुजा ठाकुर द्वार सम्पा�द वषर - १ अंक - ८

६. अ�नष् शिक्तस संबं�धत आध्याित् उपाय
धमर् प्रसारक� सेवाके दौरान अनेक साधक�ने बताया �क उनके घरके मु�खया या ज्येष्ठ संत
जी�वकोपाजर्नम अडचने आ रह� ह�, लगातार धन-हा�न हो रह� है या धन आनेपर भी वह �टकता
नह�ं या धन होनेपर भी कानूनी कारवाई चलनेके कारण उसका लाभ नह�ं उठा पाते या नौकर�म�

प्रोन्न�त नह�ं ह, नौकर� नह�ं लगती या नौकर�म� िस्थरता नह�ं रहती|

ऐसे कष्ट अनेक कारण�से हो सकते ह ; परं तु मुख्यतः प्रा, �पत ृ दोष या अ�नष्ट शिक्तया

ऐसे कष्टके �लए उत्तरदायी होतेह | �कसीके जीवनम� इस प्रकारके कष्ट क्य� हो रह , इसका

कारण कोई संत ह� बता सकते ह� ; परं तु हम खरे संत�को कोई कहां ढूंढने जाये यह प्रश्न मन
उभरता है | अतः ऐसेम� �नम्न�ल�खत उपाय कर देख�|

१. अपने कुलदेवताक� आराधना कर� य�द कुलदेवताका नाम और मूल स्थान पता हो तो कमसे
कम वषर्म� एक बार उस स्थानपर सप�रवार अवश्य जाएं और कुलाचारका पालन क|

२. कुलदेवताको प्र�त�दन पूजा करते समय उनका ध्या , उन्ह� धू , द�प , गंध , पषु ्प और
नैवेद्य अपर्ण कर|

३. य�द घरम� उपय्क्त आ�थर्क कष्
, तो अपने कुलदेवताका नामजप कमसे कम तीन
ुर

माला पूजा करते समय अवश्य कर� | य�द नाम पता न हो तो ‘श्री कुलदेवतायै न ’ जप�

(एक माला अथार्त१०८ बार जप करना) और अपने इष्टका रूप मनम� ध्यानम� र
कुलदेवता हमारे भौ�तक और आध्याित्मक प्रग�तके उत्तरदायी देवत|

|

४. ऐसा देखनेम� आया है �क य�द �कसीके प्रारब्धम� धन योग हो और य�द घरम� �पतृदोष हो
भी �पतर उन्ह� धनसे संबिन्धत कष्ट दे ह�, या धन हा�न करवाते

�नवारण हेतु �नम्न�ल�खत उपाय कर�|

* दत्तात्रेय देवताके �चत्र या मू�तर्क� प्र�त�दन प|

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ह� | अतः �पत ृदोष

सोऽहं – तनुजा ठाकुर द्वार सम्पा�द वषर - १ अंक - ८

* �कसी ब्राहको प्रत् मास अपने घरके मु�खयाक� मतृ ्य �त�थपर और �त�थक� जानकार� न

होनेपर, अमावस्याक �दन भोजन करवाएं, यह संभव न हो, तो ब्राहको भोजन हेतु कुछ पैसे प्रत्

मह�ने उस �त�थपर द� | (इस �त�थपर द�रद्रको भोजन करानेसे �पतृ दोष �नवारणम� कोई सहायत

नह�ं �मलती |)
* छह घंटे �नय�मत “श् गुरुदे दत्” का जप कर� |
* दत्तात् देवतासे भावपूणर प्राथर कुछ इस प्रक कर� --“हे दत्तात् देवता, जो भी �पतर मेरे प�रवारके परु
ु वगर्क जी�वकोपाजर्नके मागर्म� अडचण �नमार्ण
रहे ह�, उनसे आप हमारा र�ण कर� और हमारे अडचनका �नराकरण कर�, हमारे प�रवारके
सभी सदस्य�क चार� ओर अभेद् सुर�ा कवच �नमार् होने द� | अपनी कृपादृिष हमपर बनाए रख�, हम
आपके शरणागत ह�” | यह प्राथर नामजपके साथ-साथ आप �दनम� िजतनी अ�धक बार कर सकते ह�, कर� |
* घरम� �पतर�के �चत दृिष्टके सामनेसे या पूजा घरसे हटा द| उसे या तो �वसिजर् कर� , या
अलमार�म� एक श्वेत वस्त्रम� बांधकर र, श्राद्धके �दन य�द �नकालना , तो �नकाल सकते
ह�|
* अ�धकसे अ�धक लोग�को दत्तात्रे जप एवं �पत-ृ दोष �नवारण हेतु सारे मुद्दे बताए|
* घरम� काले रं गके वस्त् प्रय, यथासंभव न कर� , सनातन धमर्म काले रं गके वस्त् श�न-दोष
�नवारण हेतु या मकर संक्रां के �दन पहननेके अलावा उस वस्का प्रय साधारण व्यिक्त �लए �नषेध
�कया गया है |

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सोऽहं – तनुजा ठाकुर द्वार सम्पा�द वषर - १ अंक - ८

* �पत ृप�म� ब्राह भोजन कराएं |
* �पत ृप�म� प्र�त�द७२ माला ‘श्री गुरुदेव ’जप कर�
* �पत ृप�म� घरके पुरुषने �पतर�को प्र�त�दन-�तल तपर्णक, श्राद्ध करना चा�|
* संत कायर या धमर्कायर् यथाशिक् तन-मन-धनसे योगदान कर� |
५. य�द घरम� अ�नष्ट शिक्तके कष्ट ह� तो भी धन नाश या धनम� वृ�द्ध नह�ं

| इस हेतु

घरम� �नय�मत वास्तु शु�द्ध
| इस हेतु �वस्तृत जानकार� हेतु इस �लंकपर जाएं
http://www.tanujathakur.com/?p=1789
६. योग्य प्रकारसे व्यिष्ट और समिष्ट स, ईश्वर�य कृपा प्राप्त करनेका प कर�

|

|

७. ‘संतोषं परम ् सख
ु ं ’ इस �सद्धान्त अनुसार ईश्वरने िजतना �दय , उसके �लए उन्ह� कृत�ता
व्यक्त करते हुए जीवन यापन करनेसे भी ल�मी प्रसन्न होत|

८. ध्यान रह , ल�मी �कसीके भी घर मात्४० वषर् रहती ह� और तत्पश्च८० वषर्के �लए वह

वहांसे चल� जाती ह�, और पुनः ८० वषर् पश्चात आतीह| य�द कोई इस चक्रसे बचना चाहत
है, तो अपने धनको शुद्ध रख| इस संदभर्म� स्कन्दपुराणम� एक श्लोक अत्यंत प्रेरणा|
न्यासयोपािजर
�वत्तस्
दशमांशेन धीमत: ।
कतर्व्यो
�व�नयोगश्च ईश्वदप्रीत्यशथर
च ।। - स्कं दपुरा

अथार्त धमर्के मागर्का अनुसर, अिजर्त धन भी तभी शुद्ध होता, जब उसका दस प्र�तशत भा
ईश्वर�य काय, धमर-कायर् या सं-कायर्म� अपर्ण �कया गया ह|

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सोऽहं – तनुजा ठाकुर द्वार सम्पा�द वषर - १ अंक - ८

ल�मीक� कृपा हमारे घर एवं कुलपर सदैव रहे ऐसी हमार� इच्छा ह, तो अपनी आयका दशांश

ईश्वर�य कायर्म� प्र�तमाह अवश्य अपर्ण करना | इससे �पतर और अ�नष्ट शिक्तद्वारा होनेवा
धनहा�नसे हम सरलतासे बच सकते ह�, साथ ह� घरम� रोग और शोकके प्रमाण घट जातेह| संत
परमेश्वरके सगुण रूप होते | अतः संत�के कायर्म� धन अपर्ण करनेसे हमारा सं�चत घटता , अथार्त
पाप और पण
ु ्यका वह भाग जो हम� अगले जन्म� म� भोगना , वह नष्ट होता ह ै और हम ईश्वर�
कृपाके पात्र बनतेह| जैसा �क स्कन्द पुराणम� �लखा है �क ईश्वर�य कायर्म� धन अपर्ण करनेस

शुद्ध होता | अतः जब हम भावनावश �कसी अनाथालयम� या �कसी द�रद्रको देतेह� या पाठशाला य
रुग्णालय बनवाते, तो हम� पुण्य �मलता ह ै और उसे भोगनेके �लए हम� पुनः जन्म लेना पड़ता ह|
साधकको यह प्रयास करना चा�हए �क न ह� नए पापक और न ह� नए पुण्यकम �नमार्ण ह,
क्य��क अध्यात्मशास्त्र , पापको “पापात्मक पा” और पुण्यको“पुण्यात्मक प” माना गया है,
अथार्त दोन� ह� बे�ड़यां ह, एक लोहे और दूसर� सोनेक� | अतः धनके त्यागका सरलसा शास्त्र जान|
िजसम� त्यागक� प्रवृित्त नह�, उसे भावनावश द�रद्र, अनाथको, �भखार�को दान देनेका प्रयास करन
चा�हए | जो इस प्रकारक� त्यागकर रहा, उसे अगले चरणम� जाना चा�हए और संत�को �नरपे�
भावसे दान करना चा�हए | संतको हमारे धनक� आवश्यकता नह�ं होत, उनके घर अष्ट महा�स�द्ध
खेलती ह�, अतः वे हमारा अंश मात्र धन स्वीका, हमे कृताथर् करते ह,

इस भावसे संतको धन

अपर्ण करना चा�हए| ‘तेरा तुझको अपर्’, यह भाव रख संत�को (अपने गुरुक) प्र�त माह यथासंभ
धनका त्याग करना चा�हए और जब यह त्या१० % से ५५% पहुंच जाता है, तभी ह� कोई उच्च
को�टके संत हम� �शष्यके रूपम� स्वीकार करते |

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सोऽहं – तनुजा ठाकुर द्वार सम्पा�द वषर - १ अंक - ८

७. साधक�द्वार आध्याित् उन्न� हे तु प्रय

श्रीमती अनीता देवीने शार��रक सेवा कर दो वषर्१% प्र�तशत आध्याित्मक प्रग|

हमारे गांवके उपे��त पड़े काल� मं�दरम� प्र�त�दन आरतीक� सेवा नवंब२००९ से आरं भ कराई

| जन

२०१० से एक स्त्री सा� , श्रीमती अनीता देवीने स्वतः ह� प्र�त�दन पूरे मं�दरके प्रांगणम� झाड़ू लगान

�कया | झाड़ू लगानेक� सेवा करते समय उन्ह� अत्य�धक शार��रक कष्ट होने लगा और उस कष्टके �नवारण ह

म� कभी-कभी उनके ऊपर आध्याित्मक उपाय �कया करती थ | उन्ह� तीव्र अ�नष्ट शिक्तय�का क , कष्टक�
तीव्रता इतनी अ�धक है �क उनसे लगातार नामजप भी नह�ं हो पाता ह | ऐसा होनेपर भी उन्ह�ने आज तक
अपनी सेवाम� �नरं तरता बनाए रखी है | जनवर� २०१२ म� ईश्वरने बताया �क उनक�१% आध्याित्मक प्र

हो गयी | इस सा�धकाके पास ईश्वरको अपर्ण करनेके �लए न धन है न बु ; परं तु इन्ह�ने शर�रद्वारा सेवा,
अथार्त शूद्र वणर्क� साध, आध्याित्मक प्रग�|

श्रीमती अनीता दे
अध्यात्मम� इतने कम समयमएक प्र�तशत प्रग�त करना साधारण बात नह�ं| वस्तुतः य�द कोई
व्यिक्त पू-पाठ, व्-त्योहा, मं�दर दशर्, स्त्-पठन इत्या�द पूर� लगनसे करता ,ह तब एक जन्मम�
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सोऽहं – तनुजा ठाकुर द्वार सम्पा�द वषर - १ अंक - ८

१% आध्याित्मक प्रग�त कर लेता| इसीसे आप समझ सकते ह� �क उनके ऊपर गुरुकृपाका प्रव
�कतना अ�धक है !
जब कोई

साधक बु�द्ध अपर्, धमर् प्रसारक� सेवा करता है तो उसे ब्राह्मण वणर्क� सेवा,

चाहे उस साधकका जन्म �कसी भी जा�तम� हुआ ह; जब कोई धमर् र�णाथर् प्राण अपर्ण करनेक� तै
रखता है, या �ात्वृित्तसे अधमर् या
-ग्ला�न रोकता ह, उसे ��त्रय वणर्क� साधना कहते; और जब

कोई संत-कायर् या धम-कायर् हेतु धनका त्याग करता , तो उसे वैश्-वणर्क� साधना कहते ह�| ईश्वरसे
पूणर् एकरूपता हेतु हमारे पास जो भी , उसे अपर्णक, साधना करनेको वणार्नुसार साधना कहते ह�|
जैसे य�द �कसीक� बु�द्ध ती�ण और साित्वक, तो धमर-प्रसारक� सेवाके स, य�द उसके पास धन
हो, तो उसे भी अपर्ण करना और स्थूल शर�रसे भी सेवा कर, जैसे आश्रमक� स्वच्छता , भोजन
बनाना इत्या�द या प्रसार कायर्म� /सत्संगके स्थानको स्वच्छ , फलक लगाना प्रसार हेतु घर जाकर पत्रक बांटना इत्य, यह सब सेवा करनेसे ह� शीघ्र आध्याित्मक प्रग�त ह ो| सं�ेपम�
तन, मन, बु�द, बु�द्ध और प्राण जो भ, उसे अपर्णक, प्रयास करना ह� खर� साधना ह|

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सोऽहं – तनुजा ठाकुर द्वार सम्पा�द वषर - १ अंक - ८

८. गुरुपू�णर् �वशेष
गरुबुध्यात्म
नो नान्यत् सत्यं सत्यं व|

तल्लभाथ� प्रयत्नस्तु कश् मनी�ष�भः ||
अथर्:

गरु
तत्त्व आत्मतत्त्वसे �भन्न नह�| �बना �कसी संशय के, यह सत्य ह ै| अतः �ानी पुरुषने

गरु
ु से आत्म�ान पानेके �लए पुरुषाथर् करने चा|

गुरु संस्मरण भा- १
सदगरुक
मात स्थू देह समझनक
े � भूल न कर� , वे सवर्, सवर्शिक्तम एवं सवर्व्या होते ह�, और

अपनी इस �वशेषताका प�रचय वे अपने �शष्यक उसक� पात्र एवं श्रद्धान अनुभू�तके माध्यमस देते ह� |
१९९७ म� परम पूज् गुरुदेवक प्र दशर्नक पश्चा उन्ह�न अनेक अनुभू�तयां प्रदानक, कुछ अनुभू�तयां

आपके सम� प्रस्तु, सदगर
ु क� सवर्�त-रूप �दव् गण
ु का वणर् कर, उनके प्र अपनी कृत�ता व्यक
करना चाहूं गी | य�द मेरे इस संस्मरणको पढ़करआपक� गुरुक प्र श्र एवं भाव बढानेम� सहायता हो या

आपको भी अपने गुरके इस �दव् गुणका माहात्म समझम� आये, तो समझुंगी �क मेर� यह सेवा मेरे श्रीगुर
चरण� तक पहुंच गयी | धमर-प्रसार सेवाके मध्यम� अन सम्प्रदा कुछ गुर भक्त�स �मलनेपर ऐसा भान

हुआ �क कुछ गर
ु अपने �शष्यक शास् बतानेके स्थानप अनभ
ु ू�त देकर उस अनभ
ु ू�तके माध्यमस अध्यातशास् एवं

गुर-तत्त्व �वशेषता समझानेका कायर करते ह� | आशा करती हूं इस लेखके �भन्न

शृंखलाके माध्यमस आपको भी अपने श्रीगुर �दव् संस्मर हो जाय�गे और आप गुरुभावक सागरम� डूब
जाय�गे |

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सोऽहं – तनुजा ठाकुर द्वार सम्पा�द वषर - १ अंक - ८

मेरे सवर् गुरुन मेरे जीवनम� प्रव करनेसे पूवर ह� मेर� साधना कैसे आरम् करायी और और स्थू-रूपम
उनका मेरे जीवनम� प्रव कैसे हुआ, सवर्प् यह बताती हूं |
१.

श्रीगुरु�दया आध्याित्मक माता�पता एवं साधना हेतु पूरक वातावर

बचपनसे ह� हमारे घरका वातावरण आध्याित् था | अतः माता �पताके माध्यमस मेर� साधना होती

रह� | घरका वातावरण आश्-समान था, अथार् आने-जाने वाले अ�त�थय�का तांता लगा रहता था | सभी
अ�त�थय�का प्र-पूवर् आदर सत्का �कया जाता था, सारे व्-त्यौहा अत्य�ध �व�ध-�वधान पूवर् �कये
जाते थे, जब प�रवारके सब सदस् बैठते थे, तो आध्याित् वातार्ला ह� अ�धकतर होता था, िजसमे धमर्ग्रंथ
दृिष्टक एवं प्रे कथाएं माता-�पता बताया करते थे |
फलस्वर, आश्रम रहनेम� मुझे कभी क�ठनाई नह�ं हुई | माता-�पता और दाद�-मां अत्य�धक

आध्याित् एवं संस्कार होनेके कारण अध्यातके बहुतसे दृिष्टक उनसे सीखे या यूं कहूं , मेरे श्रीगुर

उनके माध्यमस �सखाये | हमारे माता-�पताके संपकर्म आनेवाले व्यिक कुछ �ण�म� ह� उनके हो जाते थे, उनसे
मन
� े प्रेमभ यह गण
ु सीखा | त्यागक व ृित् माता-�पताम� कूट-कूट कर भर� थी, अतः त्यागक व ृित् भी सहज
ह� आत्मसा हो गयी |
२.

माता-�पताके पश्चात छोटा भाई बना मेरे अगला मागर्दशर

बचपनसे माता-�पताके द्वार �सखाये गए श्लो-पठन एवं नामजप �कया करती थी | १९९० से

ह� ईश्व, धमर और अध्यातको जानने और समझनेक� तीव तड़प �नमार् होने लगी | मेर� �व�धवत साधना
तब आरम् हुई, जब जल
ु ाई १९९४ म� छोटे भाईने नामजप, ध्या और गर
ु चरण�के मानस पाद्-पूजनके बारेम�
बताया था l तबसे म� �नय�मत रूपस सब कुछ स्वय प्रे� होकर करती रह� l दो वष�म� उसक� बताई साधनासे

मुझे अनेक व्यावहा�र और आध्याित् अनुभू�तयां हुई, इस कारण म� मन-ह�-मन उसे गुर-रूपम देखने लगी
l

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सोऽहं – तनुजा ठाकुर द्वार सम्पा�द वषर - १ अंक - ८

१९९६ म� जब मेर� उससे मुंबईम� भेट हुई, तब म�ने कृत�ताके भावसे उसके चरण-स्पश भी �कये और उससे

कहा - "अब मुझे पहलेक� तरह आनंद नह�ं �मलता, इसके �लए म� क्य करू ? म�ने तम
ु ्ह अपना गर
ु माना है, अतः
साधनाम� मेरे आगेका मागर्दशर करो” l भाईने बड़ी ह� सहजतासे कहा - "द�द�, मेरा और तुम्हार योगमागर
�भन् है, म� हठयोगी हूं और तुम भिक्तमाग हो, म� तेरा गुर नह�ं l तुम्हार गुर कोई और ह�' l इतना कहकर वह
चला गया l (मेरा यह छोटा भाई , लोग�को योग �सखाता है और ईश्व कृपासे इसने अनेक साधक�को साधनाके

पथपर अग्र भी �कया है l )उसक� यह बात सुन, जैसे मेरे पैर�के नीचेक� जमीन �खसक गयी हो, म� यह सब
सुनकर अत्य�धक �वच�ल हो गयी और सोचने लगी �क इस मायानगर� (मुंबई)म� सदगुरुक कहां ढूंढूं l

मेरा अंतमर् सदगुरुक �लए तड़पने लगा, समझम� नह�ं आ रहा था �क अपनी व्यथ �कसे बताऊं, बहुत

रोने क� इच्छ हो रह� थी l
३.

सद्गुरुसे सा�ात्

कुछ वषर पूवर इसी छोटे भाईने कुछ आध्याित् ग्र पढने हेतु �दए थे, बचपनसे ह� मेर� �ान प्रािप्

�वशेष रू� होनेके कारण, ग्रंथ प मेर� सबसे बड़ी रू� थी l उसके �दए सारे ग्र म�ने अत्य�धक ध्यान
अभ्या �कये थे, उसम� कुछ ग्र स्वाम रामकृष् परमहं सजीक� सीखके बारे म� भी थे l म�ने उन ग्रंथ� भी

सू�मतासे अभ्या �कया था | मेरे भाईद्वार मेरे गुरुक ढूंढनेवाल� घटनाके तीन-चार �दनके उपरान्, एक �दन

मेरा ध्या एक ग्रन् ओर गया, िजसमे मुखपृष्ठप स्वाम रामकृष् परमहं सजीका �चत था l म�ने उस

ग्रन् हाथम� लेकर स्वामीजीक अपनी सार� व्यथ सुनायी और फूट-फूट कर गरुक
पानेक� इच्छास रोने लगी l

मुझे लगा जैसे य�द कुछ �दन�म� मुझे सदगुर न �मले तो �निश्च ह� मेरे प्र �नकल जाय�गे l

मन
� े उनके �चत्र देखकर कहा "आप कहते है �क संतका अिस्तत कभी समाप् नह�ं होता, संत सदैव इस
संसारम� व्याप रहते ह�, तो अब आप ह� मुझे मेरे सदगुरुस सा�ात्का कराएं अन्यथ म� समझुंगी �क आपक�
वाणी �मथ्य है, और मुझे आप जैसे परमहं स स्तरक सदगुर चा�हए, जो मुझे �न�वर्कल समा�धक� अनुभू�त दे
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सोऽहं – तनुजा ठाकुर द्वार सम्पा�द वषर - १ अंक - ८

सके", इतना कहकर म� रोने लगी और बहुत देर तक रोती रह� l स्वामीजीस इस प्रक बात करनेके �लए आज भी
म� उनसे �मा मांगती रहती हूं l

इस घटनाको दो सप्ता भी नह�ं हुए ह�गे �क एक �दन जब म� अपने कायार्लयस वा�पस आ रह� थी, तब

अचानक बा�रश होने लगी l म� बा�रशसे छुपनेके �लए सड़क पारकर एक मं�दरम� चल� गयी, वहां म�ने एक फलक
अथार् बैनर देखा, वह ‘सनातन संस्थ’ का बैनर था, िजसमे उस मं�दरम� होने वाले सत्संगक जानकार� थी,
परन्त उस बैनरम� जो �लखा था, उसने मुझे अत्य�ध आकृष् �कया और वह था - 'अच्छ साधक कैसे बन� और
शंका समाधान' l मेरे मनम� अनेक शंकाएं थी और एक अच्छ साधक भी बनना चाहती थी l अतः म�ने उस

सत्संगम जानेका �नश्च �कया और इस प्रक उस सत्संगक माध्यमस मुझे कुछ �दन�के उपरान् मेरे श्रीगुर
सा�ात्का हुआ l

आज भी मुझे यह� लगता है �क स्वाम स्वाम रामकृष् परमहं सजीने मेर� प्राथर सुनकर, मुझे मेरे

श्रीगुर सा�ात्का करवाया --- और सच भी यह� है l संतके दो रू होते ह� l एक है उनका सगुण-रू, अथार्
उनक� देह और दूसरा - उनका �नग्
ुर -रू, अथार् उनके अन्दरक ईश्वर� तत्त, जो इस ब्रह्माण सदा

व्याप रहता है l मेरा मागर-दशर् स्वामीजीक �नग्
ुर रूपन �कया और इसम� दो राय नह�ं l (आगामी ग्रंथ गु
संस्मरणसे उद्ध)

25

सोऽहं – तनुजा ठाकुर द्वार सम्पा�द वषर - १ अंक - ८

9. उपासना कायर
धमर्यात्राक� साप्ता�हक रूपर
२७.५.२०१-३.६.२०१२ -

बंगलुरु और होसुर

बंगलुरुम � होनेवाले प्रवचनक� जानका
�दनांक – 1 जून 2012
समय – संध्या7.00 – 8.30
स्थल– श्री अष्ट ल�मी मं�,
इ�टना नीला अपाटर ्म �ट्,
सं�पगे नगर बंगलुरु-560100

�दनांक – 2 जून 2012
समय – संध्या6.00 – 7.30
स्थल– श्री व�कटरमण देवस्था,
श्री अनंत न, बंगलुरु-560100
26

सोऽहं – तनुजा ठाकुर द्वार सम्पा�द वषर - १ अंक - ८

कणार्वती(अहमदाबाद) म� प्रथम सावर्ज�नक प्रवचनको �मला उत्तम प!
�दनांक २०.५.२०१२ को

कणार्वत(अहमदाबाद) के समुत्कषर् भवनम� एक �दवसीय आध्याित्मक �श

सम्पन्न हु| इस कायर्क्रमके �नयोजन एवम आयोजनम� यहांके दो साधक श्री ���तज धानक एव
सतीश कुलकण�का �वशेष योगदान रहा | साथ ह� यहांके स्थानीय साधक श्री मुक्तेश �संह ,
कश्यप शाह एवं राज�द्र जगतापने भी अपना योगदान �द|
प्रवचनके �ण�च:

कायर्क्रम समयपर आरंभ हुआ यद्य�प यहांके स्थानीय साधकके �लए सब कुछ न ; परन्तु

साधक�ने अपनी �नयोजनकुशलता और भावका आधार लेकर प�रपूणर् सेवा करनेका प्रयास �क|

समुत्कषर् भवनके अ�धकार� एवं उनके कायर्कतार्ओंने भी कायर्क्रमको सफल बनानेके �लए य
प्रयास �क| ‘उपासना’ के उद्देश्य जाननेके पश्चात उन्ह�ने कायर्क्रम स्थलके �लए �नधार्�र
कम �लए |

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सोऽहं – तनुजा ठाकुर द्वार सम्पा�द वषर - १ अंक - ८


उपिस्थत िज�ासुओंम� पुरुष�क� संख्या स्त्रीय�से दोगुन|

प्रवचन समापनके पश्चात िज�ासुओंने शंका समाधानम� �वशेष रु�च �दखाई और साधना ह

पूरक प्रश्न पू|

अमर�काके साधक श्री अ�भनव मेहताने वहांसे ह� अपने �मत्र एवं प�रवारवाल�को सू� , उन्ह�

प्रवचनम� उपिस्थत रहनेक� प्रेरण | उन्ह�ने अमर�काम� प्रसारके �५०-५० तीन� औ�डयो सीडी भी
अपनी मांके माध्यमसे खर�द�|

यद्य�प राजकोटके साधक श्री अशोक गनात्रा थोड़े अस् , �फर भी उन्ह�न कश्मीरसे सीधे

राजकोट अपने घर न जाकर, सीधे कायर्क्रम स्थलपर पहुंचकर सेव|

���तज धानकक� पत्
ु को कायर्क्रमसे आठ �दन पहले दुघर्टनाम� अत्य�धक च

उन्ह�ने अपने साधकत्वका प�रचय देते ह, प्रसार कायर्म� �नरंतरता बनरखी |

श्री ���तज धानक एवं सतीश कुलकण�न ‘सोहम’ प�त्रका पढ़कर उसके मुद्दे प्रत्य�म�

लानेके अत्य�धक सुंदर प्रयास �|

क� |

, परं तु

दोन� साधकक� पत्नीने भी मेरे पूरे प्रवासके दौरान भावपूणर् स

राज�द्र जगत , जो सतीश कुलकण�के �मत् ह�, उन्ह�ने भी प्रसार कायर्म� अपना योगदान �

और अनेक लोग�को प्रवचनके पत्रक बा|

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सोऽहं – तनुजा ठाकुर द्वार सम्पा�द वषर - १ अंक - ८

१०. वै�दक सनातन धमर्म ऐसा क्य ?
अ. �कसीसे �मलनेपर हस्तांदोलन(ह�डशेक) न कर, हाथ जोडकर नमस्कार करना इष्ट क् है ?
१. जब दो जीव हस्तांदोलन करते ह, तब उनके हाथ�से प्र�े�पत राज-तामसी तरं ग� हाथ�क� दोन�
अंज�ु लय�म� संपषु ्ट होती ह� । उनके शर�रम� इन कष्टदायक तरंग�के वहनका प�रणाम मनपर होता है
२. य�द हस्तांदोलन करनेवाला अ�नष्ट शिक्तसे पी�डत, तो दूसरा जीव भी उससे प्रभा�वत हो सकत
है, इस�लए साित्त्वकताका संवधर्न करनेवाल� नमस्कार जैसी कृ�आचरणम� लाएं । इससे जीवको
�व�शष् कमर् हेतु ईश्वरका चैतन्यमय बल तथा ईश्वरक� आशीवार्दरूपी-शिक्त प्राप्त होती ह
३. हस्तांदोलन करना पाश्चात्य संस्कृ�त है । हस्तांदोलनक�, अथार् त् पाश्चात्य संस्कृ�तका पुर ।
नमस्का, अथार् त् भारतीय संस्कृ�तका पुरस्कार । स्वयं भारतीय संस्कृ�तका पुरदेकर, भावी पीढ�को
भी यह सीख द� ।

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सोऽहं – तनुजा ठाकुर द्वार सम्पा�द वषर - १ अंक - ८

आ. �कसीसे भ�ट होनेपर नमस्कार कैसे कर�?
�कसीसे भ� ट हो, तो एक-दूसरेके सामने खडे होकर, दोन� हाथ�क� उं ग�लय�को जोड़� । अंगूठे छातीसे कुछ

अंतरपर ह� । इस प्रकार कुछ झुककर नमस्कार कर� । इस प्रकार नमस्कार करनेसे जीवम� नम
संवधर्न होता ह, व ब्रह्मांडक� साित-तरं ग� जीवक� उं ग�लय�से शर�रम� संक्र�मत होतीह� । दूसरे को इस प्रकार नमस्कार करनेसे दोन�क� ओर आशीवार्दयुक्त तरंग�का प्र�ेपण हो
इ. नमस्कारम � क्या कर� व क्या न क?
* नमस्कार करते समय नेत्र�को बंद रख
* नमस्कार करते समय पादत्राण धारण न कर
* एक हाथसे नमस्कार न कर�
* नमस्कार करते समय हाथम� कोई वस्तु न हो
* नमस्कार करते समय पुरुष �सर न ढक� व िस्त्रय�को �सर ढकना चा�
• भारतीय संस्कृ�त अनुसार नमस्कारके लाभ क्या ?

• दे वताको नमन करनेक� योग्य पद्ध�त व उसका आधारभूत शास्त्र क?

वयोवृद्ध�को नमस्कार क्य� करना चा?

• मत
ृ व्यिक्त नमस्का क्य करना चा�हए ?

• �ववाहोपरांत प�त व पत्नीक एक साथ नमस्का क्य करना चा�हए ?
उपय्क्त प्रश्न�के
उत्तर और इस संदभर्म� और जानकार�के :
ुर

‘सनातन संस्थ’ द्वारा प्रका�शत ग“नमस्कार करनेक� योग्य पद’’
ग्रंथ पानेके �लए संपकर् क– www.sanatan@sanatan.org
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सोऽहं – तनुजा ठाकुर द्वार सम्पा�द वषर - १ अंक - ८

आप इस �लंकपर भी भ� ट देकर इस �वषयके बारे म�

और जानकार� प्राप्त कर सकते

http://www.hindujagruti.org/hinduism/knowledge/category/namaskar

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