॥श्री हरर :॥

समाज के कु छ त्याग करने योग्य दोष :-

भली और बुरी–दोनों ही बातें

समाज में रहती हैं । कभी भली बढती है तो

कभी बुरी । पररवततन होता ही रहता है । यह ठीक नहीं कक पुरानी सभी बातें
बुरी ही होती है अथवा नयी सब बातें अच्छी ही होती हैं । अच्छी-बुरी दोनों में
ही हैं । मनुष्य को वववेक-ववचार तथा साहस के साथ बुरी का त्याग और अच्छी
का ग्रहण करना चावहये । जो मनुष्य वमथ्या आग्रह से ककसी बात पर अड़ जाता
है, उसका ववकास नहीं होता । यही हाल समाज का है ।हमारे वहन्दू समाज में भी
अच्छी-बुरी बातें हैं – जो अच्छी है उनके सम्बन्ध में तो कु छ कहना नहीं है; जो
बुरी है – किर चाहे वे नई हो या पुरानी – उन्ही पर ववचार करना है । यहााँ
संक्षेप में कु छ ऐसी बुराइयों पर ववचार ककया जाता है वजनका त्याग समाज के
वलए आध्यावत्मक, धार्ममक, नैवतक और आर्मथक सभी दृष्टी से परम आवश्यक है।
(१) - रहन-सहन

(२) - खान-पान

(३) - वेश-भूषा

(४) - रस्म-ररवाज

(५) - चररत्रगठन और स्वास्थ्य (६) - कु ववचारो का प्रचार
(७) - बहम और वमथ्या ववश्वास

(८) - व्यवहार-बतातव

(९) - व्यापार के नाम पर जुआ
(१) रहन-सहन
समय,वातावरण तथा वस्थवत के अनुसार रहन-सहन में पररवततन तो होता ही है,
परन्तु ऐसी कोई बात नहीं होनी चावहये जो घातक हो । इस समय हम देखते है
की समाज का रहन-सहन तीव्र गवत से पाश्चात्य ढंग का होता चला आ रहा है ।
पाश्चात्य रहन-सहन बहुत अवधक खचीला होने से हमारे वलए आर्मथक दृष्टी से तो

घातक है ही, हमारी सभ्यता और सदाचार के ववरुद्ध होने से आध्यावत्मक और
नैवतक पतन का भी हेतु है । उदहारण के वलए – जूता पहने घरो में घूमना, एक
साथ बैठ कर खाना, खाने में काटे-छु री का उपयों ग करना,टेबल-कु सी पर बैठ
कर खाना, जूवतयों के कई जोड़े रखना, रोज चबी-वमवश्रत साबुन लगाना, खानेपीने की चीजो में संयम न रखना, भोजन करके कु ल्ला न करना,मल-मूत्र त्याग के
बाद वमट्ठी के बदले साबुन से हाथ धोना या वबलकु ल ही न धोना, िै शन के पीछे
पागल रहना, बहुत आवधक कपड़ो का संग्रह करना, बार-बार पोशाक बदलना,
आकद-आकद इनका त्याग होना आवश्यक है ।
(२ ) खान-पान
खान-पान की पववत्रता और सयंम-आयत जावत के लोगो के जीवन का प्रधान अंग
है । आज इस पर बहुत ही कम ध्यान कदया जाता है । रे लों में देवखये–हर ककसी
का जूठा सोडावाटर, लेमन पीना और जूठा भोजन खाना आमतौर पर चलता है ।
इसमें अपववत्रता तो है ही, एक दुसरे की बीमारी के और गंदे ववचारो के परमाणु
एक-दुसरे -के अंदर प्रवेश कर जाते है । होटल,हलवाई की दूकान या चाट वाले के
खोमचे के सामने जुते पहने खड़े-खड़े खाना, हर ककसी के हाथ से खा लेना, मांसमध् का आहार करना,लहसुन-प्याज, अन्डो से युक्त वबस्कु ट, बाजारू चाय, तरहतरह के पानी, अपववत्र आइसक्रीम, और बरि आकद चीजे खाने-वपने में आज
बहुत ही कम वहचक रह गयी है । शोक की बात है की वनरावमषभोजी जावतओं
में भी डाक्टरी दवाओं के द्वारा और होटलों तथा पार्टटयों के संसगत दोष से अंडे
और मॉस-मध् का प्रचार हो रहा है । मॉस में प्रत्यक्ष हहसा होती है ।
मांसाहारीयों की बुवद्ध तामसी हो जाती है और स्वाभाव क्रूर बन जाता है ।
नाना प्रकार के रोग तो होते ही है ।
इसी प्रकार आजकल बाजार की वमठाईयों में भी बड़ा अनथत होने लगा है ।
असली घी वमलना तो मुवश्कल है ही । वेवजटेबल नकली घी भी असली नहीं
वमलता, उसमे भी वमलावट होनी शुरू हो गयी है । मावा, बेसन, मैदा, चीनी,

आटा, मसाले, तेल आकद चीजे भी शुद्ध नहीं वमलती। हलवाई लोग तो दो पैसे के
लोभ से नकली चीजे बरतते ही है । समाज के स्वास्थ्य का ध्यान न दुकानदारों
को है,न हलवाईयों को । होता भी कै से ? जब बुरा बतलाने वाली ही बुरी चीजो
का लोभवश प्रसार करते है, तब बुरी बातो से कोई कै से परहेज रख सकता है ?
आज तो लोग आप ही अपनी हावन करने को तैयार है । यही तो मोह की मवहमा
है ।
(३) - वेश-भूषा
अन्याय से कमाये हुए पैसो का, अपववत्र तामसी वस्तुओं से बना हुआ,
अपववत्र हाथो से बनाया हुआ, हहसा और मादकताओं से युक्त, ववशेष खचीला,
अस्वास्थ्यकर पदाथो से युक्त,सडा हुआ, व्यसनरूप, अपववत्र और उविस्ट भोजन
धमत, बुवद्ध, धन, वहन्दू-सभ्यता और स्वास्थ्य सभी के वलये हावनकर होता है । इस
ववषय पर सबको सोचना चावहए ।

वेश-भूषा सादा, कम खचीला, सुरुवच उत्पन्न करने वाला, पववत्र और संयम
बढाने होना चाहीये ।आजकल ज्यो-ज्यो िै शन बढ़ रहा है, त्यों-त्यों खचत भी बढ़
रहा है । सादा मोटा वस्त्र ककसी को पसंद नहीं। जो खादी पहनते है उनमे भी एक
तरह की बनावट आने लगी है । वस्त्रों में पववत्रता होनी चावहये । ववदेशी और
मीलों के बने वस्त्रों में चबी की मााँड लगती है, यह बात सभी जानते है । देश की
हाथ की कारीगरी मीलों की प्रवतयों वगताओं में नष्ट होती है ।इससे गरीब मारे
जाते है, इसवलए मीलके बने वस्त्र नहीं पहनने चावहये । ववदेशी वस्त्रों का
व्यवहार तो देश की दररद्रता का प्रधान कारण है ही । रे शमी वस्त्र जीववत कीड़ो
को उबाल कर उनसे वनकाले हुए सूत से बनता है, वह भी अपववत्र और हहसायुक्त
है ।
वस्त्रों में सबसे उत्तम हाथ से काते हुए सूत की हाथ से बनी खादी है । परन्तु
इसमें भी िै शन नहीं आना चावहये ।खादी हमारे संयम और स्वल्प व्यय के वलए
है–िै शन और किजूलखची के वलए नहीं । खादी में िै शन और किजूलखची आ

जाएगी तो इसमें भी अपववत्रता आ जाएगी । मीलके बने हुए वस्त्रों की अपेक्षा
तो मीलके सूत से हाथ-करघे पर बने वस्त्र उत्तम है; क्योंकक उसके बुनाइ के पैसे
गरीबो के घर में जाते है और उसमे चबी भी नहीं लगती ।
वस्त्रयों के गहनों में भी िै शन का जोर है । आजकल असली सोने के सादे गहने
प्राय: नहीं बनाये जाते । हलके सोने के और मोतीयों के िै शनेबल गहने बनाये
जाते है, वजसमे मजदूरी ज्यादा लगती है, बनवाते समय वमलावट का अवधक डर
रहता है और जरुरत पढने पर बेचने के समय बहुत ही कम कीमत वमलती है ।
पहले वस्त्रयों के गहने ठोस सोने के होते थे, जो ववपवत के समय काम आते थे ।
अब वह बात प्राय: चली गयी । इसी प्रकार कपड़ो में िै शन आ जाने से कपडे ऐसे
बनते है, जो पुराने होने पर ककसी काम के नहीं आते और उनमे लगी हुई जरी,
वसतारे , कलाबत्तू आकद के ववशेष दाम वमलते है । ऐसे कपड़ो के बनवाने में जो
अपार समय और धन व्यथत जाता है सो तो जाता ही है ।
नये पढ़े-वलखे बाबुओं और लड़ककयों में तो इतना िै शन आ गया है कक वे खचत के
मारे तंग रहने पर भी वेश-भूषा में खचत कम नहीं कर सकते । साथ ही शरीर की
बनावट और सौंदयत-वृवद्ध की चीजे – साबुन, तेल, िु लेल, इत्र, एशेंस, क्रीम,
लैवेंडर, सेंट, पाउडर आकद इतने बरते जाने लगे है और उनमे एक-एक व्यवक्त के
पीछे इतने पैसे लगते है कक उतने पैसो से एक गरीब गृहस्थी का काम चल सकता
है । इन चीजो के व्यवहार से आदत वबगड़ती है, अपववत्रता आती है और स्वास्थ्य
भी वबगड़ता है । धमत की दृवष्ट से तो ये सब चीजे त्याज्य है ही । एक बात और है ,
सौदयत की भावना में वछपी काम-भावना रहती है ।जो स्त्री-पुरुष अपने को सुन्दर
कदखलाना चाहते है वे कामभाव का ववस्तार बल, बुवद्ध और वीयत के नाश के
द्वारा अपना और समाज का बड़ा अपकार करते है ।
(४) रस्म-ररवाज
रस्म-ररवाजो में सुधार चाहनेवाली सभाओं के द्वारा जहााँ एक और एक बुरी प्रथा
वमटती है तो उसकी जगह दो दूसरी नयी आ जाती है । जब तक हमारा मन नहीं
सुधर जाता तब तक सभाओं के प्रस्ताव से कु छ नहीं हो सकता । खचत घटाने के

वलये सभाओं में बड़ी पुकार मची । खचत कु छ घटा भी, परन्तु नये-नये इतने
ररवाज बढ़ गए की खचत की रकम पहले की अपेक्षा बहुत अवधक बढ़ गयी । दहेज़
की प्रथा बड़ी भयंकर है, इस बात को सभी मानते है । धारा-सभाओं में इस प्रथा
को बंद करने के वलए वबल भी पेश होते है । चारो और से पुकार भी कािी होती
है, परन्तु यह प्रथा ज्यो-की-त्यों –नहीं-नहीं-बढे हुए रूप में वततमान है और इसका
ववस्तार अभी जरा भी रूका भी नहीं है । साधारण वस्थवत के गृहस्थ के वलए तो
एक कन्या का वववाह करना मृत्यु की पीड़ा भोगने के बराबर-सा है । आजकल
मोल-तौल होते है । दहेज़ का इकरार तो पहले हो चुकता है, तब कही सम्बन्ध
होता है । दहेज़ के दुुःख से व्यवथत माता-वपताओं की मानवसक पीड़ा को देखकर
बहुत सी सहृदया कु माररयों ने आत्महत्या करके समाज के इस बूचडखाने पर
अपनी बवलयााँ चढ़ा दी है । इतना होने पर भी यह पाप अभी तक बढ़ता ही जा
रहा है । सुना था – दहेज़ के ड़र से राजपूतो में कन्याओं को जीते-जी मार कदया
जाता था । अब भी बहुत-से समाजों में जो कन्या का वतरस्कार होता है, उसके
जीवन का मूल्य नहीं समझा जाता, बीमार होने पर उसका उवचत ईलाज नहीं
कराया जाता, यहााँ तक की कन्या का जन्म होते ही कई माता-वपता तो रोने
लगते है, दहेज़ की पीड़ा ही इसका प्रधान करना है ।इस समय धमतभीरु साहसी
सज्जनों की आवशयकता है जो लोभ छोड़ कर अपने लडको के वववाह में दहेज़
लेने से इनकार कर दे, या कम-से-कम लेवे । लड़के वालो के स्वाथतत्याग से ही यह
पाप रुके गा । अन्यथा यकद चलता रहा तो समाज की बड़ी भीषण वस्थवत होनी
सम्भव है ।
वववाह वगैरह में शास्त्रीय प्रसंगों को कायम रखते हुए जहााँ तक हो सके कम-सेकम रस्मे रखनी चावहये और वे भी ऐसी, जो सुरुवच और सदाचार उत्त्पन्न करने
वाली हो, कम खचत की हो और ऐसी हो जो साधारण गृहस्थो के द्वारा भी
आसानी से उत्त्पन्न की जा सके ।अवश्य देने के वस्त्र और अलंकार भी ऐसे हो,
वजनमे व्यथत धन-व्यय न हुआ हो; सौ रूपये की चीज, ककसी भी समय अस्सीनब्बे रूपये कीमत हो तो दे ही दे । दस-बीस प्रवतशत से अवधक घाटा हो तो,

ऐसा गहना चढाना तो जान-बुझ कर आभाव और दुुःख को वनमंत्रण देना है ।
इसके साथ ही संख्या में भी चीजे जयादा न हो और िै शन से बची हुई हो ।
वववाह आकद में वेश्याओं के नाच, िू लवाडी,आवतशबाजी,भडु ओं के स्वांग, गंदे
मजाक, वस्त्रओं के गंदे गाने, वसनेमा, नाटक, जुआ,शराब आकद तो सवतथा बंद
होने ही चावहये । जहााँ तक हो – गांजा, भांग, वसगरे ट,तम्बाकू , बीडी आकद
मादक वस्तुओं की तथा सोडावाटर बित की मेहमानदारी भी नहीं होनी चावहये
। बारावतयों की संख्या थोड़ी होनी चावहये और उनके स्वागत में कम-से-कम खचत
हो,सादगी और सदाचार की रक्षा हो, ऐसा प्रयत्न स्वयं बारावतयों को करना
चावहये । लड़कीवालों के घर जाकर उससे अनाप-शनाप मांग करना और न
वमलने पर नाराज़ होना एक तरह का कमीनापन ही है ।
गुजरात और महाराष्ट्र में वववाह के अवसर पर हरी-कीततन की बड़ी सुन्दर प्रथा है
। हररकीततन में एक कीततनकार होते है, जो ककसी भक्त चररत्र को गा-गा कर
सुनाते है – बीच-बीच में नामकीततन भी होता रहता है । सुन्दर मधुर स्वर के
वाद्यों के सहयों ग होने से कीततन सभी के वलए रुवचकर और मनोरं जक भी होता
है और उससे बहुत अच्छी वशक्षा भी वमलती है । उत्तर और पवश्चम भारत के धनी
लोग उपयुक्त कु प्रथाओं को छोड़ कर इस प्रथा को अपनावे तो बड़ा अच्छा है ।
लड़ककओं के वववाह भी आजकल बहुत बड़ी उम्र में होने लगे है । बाल-वववाह से
बड़ी हावन हुई है, परन्तु लड़की को युवती बना कर वववाह करना बहुत हावनकर
है । शास्त्रीय मयातदा के अनुसार रजोदशतन होने के बाद वववाह करना अधमत तो है
ही, आजकल के वबगड़े हुए समाज में तब तक चररत्र का पववत्र रहना भी
असंभव-सा ही है । युवती-वववाह के कारण कु मारी अवस्था में आजकल
व्यवभचार की मात्र वजस तीव्र गवत से बढ़ रही है, उसे देखते भववष्य बहुत ही
भयानक मालूम होता है । यही हाल स्कू ली लड़कों का है । अतैव लड़की का
वववाह रजोदशतन से पूवत और लड़के का अठारह वषत की आयु में कर देना उवचत
जान पड़ता है । अवश्य ही स्त्री-पुरुष का संयों ग तो स्त्री के रजोदशतन के बाद ही
होना चावहये । नहीं तो धमत की हावन के अवतररक्त वहस्टीररया, क्षय (तपेकदक)
और प्रदर आकद की भयंकर बीमाररयााँ होकर उनका जीवन नष्ट प्राय हो जाता है।

घर में ककसी की मृत्यु हो जाने पर श्राद्धभोज और बंधुभोज की प्राचीन प्रथा है ।
यह वास्तव में कोई दूवषत प्रथा नहीं है, परन्तु वनदोष प्रथा भी जब देश, काल
और पात्र के अनुकूल नहीं होती तो वह दूवषत हो जाती है । वजस समय खाद्य
पदाथत बहुत सस्ते थे और गृहस्थ के दूसरे खचत कम थे, उस समय की बात दूसरी
थी । अब तो बहुधा यह देखा जाता है कक इस प्रथा की रक्षा के वलए ब्राह्मणभोजन और बन्धुभोजन में साधारण मध्यववत गृहस्थो के स्त्री-धन और घर-मकान
और जगह-जमीन तक वबक जाते है ।पररणाम यह होता है कक पुरे पररवार सभी
लोगो के जीवन दुुःख:पूणत हो जाते है । इस प्रथा में शास्त्रोक्त ब्राह्मण-भोजन तो
अवश्य करना चावहये, परन्तु कु टु वम्बयों को छोड़ कर बंधू-भोजन की कोई
आवश्यकता नहीं है ।
वववाह और औसर आकद पर पूरे देश-से कु टु वम्बयों का जो आना है इसकी भी
कमी करनी चावहए; क्योंकक इसमें भी ववशेष धन व्यय होता है तथा लोगो को
आने-जाने में हैरानी भी बहुत आती है ।
बड़े शहरो में बड़े आदवमयों के यहााँ वववाहों में आजकल वबजली का
खचत,मेहमानदारी का खचत और उपरी आड़म्बर का खचत इतना बढ़ गया है कक
गरीब गृहस्थो के यहााँ उतने खचत में कई वववाह हो सकते हैं । मान-सम्मान, कीर्मत
और पोजीशन का वमथ्या मोह,मूढ़ता और हठधमी ही इन सारे रस्म-ररवाजों के
चलते रहने में प्रधान कारण है । अत एव इन सबको छोड़ कर साहस के साथ
ऐसे रस्मो का त्याग कर देना चावहये ।
(५) चररत्रगठन और स्वास्थ्य
असंयम,अमयातकदत खान-पान और गंदे सावहत्य आकद के कारण समाज के चररत्र
और स्वास्थ्य का बुरी तरह से ह्रास हो रहा है । बीडी-वसगरे ट पीना, कदनभर
पान खाते रहना, कदन में पांच-सात बार चाय पीना, भांग, तम्बाकू , गांजा, चरस
आकद का व्यवहार करना, उतेजक पदाथो का सेवन करना, ववज्ञापनी बाजीकरण
दवाएं खाना, वमचत-मसाले, चाट और वमठाइयााँ खाना, कु रुवच उत्पन्न करने वाली

गन्दी कहावनयों और उपन्यास-नाटकों का पढना,श्रृंगार के काव्य और
कोकशास्त्रादी के नाम से प्रचवलत पुस्तकों को पढना, गंदे समाचारपत्र पढना,
अश्लील वचत्रों को देखना, पुरुषों

का वस्त्रयों में और वस्त्रयों का पुरुषों

में

अमयातकदत आना-जाना वसनेमा देखना । श्रृंगारी गाने सुनना और प्रमादी,
ववषयी, व्यवभचारी तथा नावस्तक पुरुषों का संग करना आकद कई दोष समाज में
आ गए है । कु छ पुराने थे, कु छ नये – सभ्यता के नाम पर – आ घुसे है, जो
समाज रूप शरीर में घुन की तरह लगकर उसका सवतनाश कर रहे है । कामसम्बन्धी सावहत्य पढना,श्रृंगार-रस के काव्यों तथा नाटक-उपन्यासों का अध्ययन
करना,वसनेमा देखना, वसनेमा में युवक-युववतयों के श्रृंगार के अवभनय करना
और वन:संकोच एक साथ रहना तो आजकल सभ्यता का एक वनदोष अंग माना
जाता है । कला के नाम पर ककतना अनथत हो जाये, सभी क्षम्य है ।
लड़कपन से ही बालक-बावलकाओं

का िै शन से रहना, चररत्रहीन नौकर-

नौकरावनयों के संसगत में रहना,श्रृंगार की पुस्तके पढना, श्रृंगार करना,वसनेमा
देखना, स्कू ल-कालेज में लड़के -लडककयों का एक साथ पढना, कॉलेज-जीवन में
असंयमपूणत छात्रावासों में रहना आकद बातें चररत्रनाश में प्रधान कारण होती हैं
और आज के युग में इन्ही का ववस्तार देखा जाता है । दुुःख तो यह है कक ऐसा
करना आज समाज की उन्नवत के लक्षणों के अंतगतत आ गया है ।
रात-भर जागना, प्रात:काल से लेकर कदन के नौ-दस बजे तक सोना, चाहे सो
खाना, ऐश-आराम की सामवग्रयााँ जुटाने और उनका उपभोग करने में ही लगे
रहना, ववलावसता और अमीरी को जीवन का अंग मानना, भद्दी-भद्दी कदल्लवगयााँ
करना, के शो और जूतों को सजाने में ही घंटो वबता देना, दांत से नख छीलते
रहना, ईश्वर और धमत का मखौल उडाना, संत-महात्माओं की हनदा करना,
शास्त्रों और शास्त्रवनमातता ऋवष-मुवनयों का अनादर करना, संध्या-प्राथतना करने
का नाम भी न लेना, माता-वपता को कभी भूलकर भी प्रणाम न करना, के वल

शरीर का आराम चाहना, मेहनत का काम करने से जी चुराना और लजाना,
थोड़ी देर में हो जाने लायक काम में अवधक समय वबता देना,कततव्य कमत में
आलस्य करना और व्यथत के कामों में समय नष्ट कर देना आकद दोष जहााँ
समाज में फ़ै ल रहे हों, वह चररत्र-वनमातण, स्वास्थ्य-लाभ, धमत और आत्मोन्नवत
की संभावना कै से हो सकती है ? इन सब दोषों को छोड़कर समाज संयम और
सदाचार के पथ पर चले इसके वलए सबको प्रयत्न करना चावहये । इन बातों के
दोष बतलाने चावहये और स्वयं वैसा आचरण करके आदशत स्थावपत करना
चावहये । के वल वाणी से कहना छोड़कर यकद लोग स्वयं करना शुरु कर दे तो
बहुत जल्दी कामयाबी हो सकती है ।
(६) कु ववचारो का प्रचार
ईश्वर नहीं है, ईश्वर को मानना ढोंग है, ईश्वर भवक्त मूखतता है, शास्त्र और पुराणों
के रचवयता दंभ और पाखण्ड के प्रचारक थे, मुवक्त या भगवत्प्रावि के वल कल्पना
है,खान-पान में छू आछू त और ककसी वनयम की आवश्यकता नहीं, वणत भेद जन्म
और कमत से नहीं, के वल कमत से है,शास्त्र न मानने में कोई हावन नहीं है, पूवत पुरुष
आज के सामान उन्नत नहीं थे, जगत की क्रमश: उन्नवत हो रही है, अवतार उन्नत
ववचार के महात्माओं का ही नामांतर है, माता-वपता की आज्ञा मानना आवश्यक
नहीं है, स्त्री को पवत के त्याग का और नवीन पवत-वनवातचन का अवधकार होना
चावहये, स्त्री-पुरुषों का सभी क्षेत्रो में समान कायत होना चावहए, परलोकपुनजतन्म ककसने देखे हैं,पाप-पुण्य और नरक-स्वगातदी के वल कल्पना है,ऋवषमुवनगण स्वाथी थे, ब्राह्मणों ने स्वाथतसाधन के वनवमत ही ग्रंथो की रचना की,
पुरुषजाती ने वस्त्रयों को पद-दवलत बनाये रखने के वलये ही पवतव्रत और सतीत्व
की मवहमा गई है, देवतावाद कल्पना है,उि वणों ने नीच वणों के साथ सदा
अत्याचार ही ककया है, वववाहके पूवत लड़के -लड़ककयों का अश्लील रहन-सहन
व्यावभचार नहीं है, सबको अपने-अपने मन के अनुसार सब कु छ करने का
अवधकार है – आकद ऐसी-ऐसी बातें आजकल इस ढंग से िै लायी जा रही है कक

भोले-भोले नर-नारी ईश्वर में अववश्वासी होकर धमत, कमत और सदाचार का त्याग
कर रहे है । इसी और सभी ववचार शील पुरुषों को ध्यान देना चावहये ।
(७) बहम और वमथ्या ववश्वास
इसी के साथ-साथ यह भी सत्य है कक समाज में अभीतक नाना प्रकार के वमथ्या
ववश्वास और बहम िै ले हुए है । भूत-प्रेत-योंनी हैं, परन्तु वहमी नर-नारी तो
बात-बात में भूत-प्रेत की आशंका करते है – वहस्टीररया की बीमारी हुई तो प्रेतबाधा, मृगी या उन्माद हो गया तो प्रेत का संन्देह और न मालूम कहााँ-कहााँ बहम
भरे है, इसवलये ठग और धूततलोग –झाड़-िूाँ क, टोना, जादू, जंत्र और तंत्र-मन्त्र के
नाम पर – नाना प्रकार के लोगो को ठगते हैं । पीर पूजा, कब्र पूजा,तावजयों के
नीचे से बिो को वनकालना, गाजीवमयााँ की मनौती आकद पाखंड इसी बहम के
आधार पर चल रहे हैं । इन वमथ्या ववश्वास को हटाने के वलए भी समाज के
समझदार लोगो को प्रयत्न करना चावहये ।

(८) व्यवहार-बतातव
प्राय: मावलक लोग नेक नौकरों और मजदूरों के साथ भी अच्छा व्यवहार नहीं
करते । उन्हें पेट भरने लायक वेतन नहीं देते, बात-बात पर अपमान और
वतरस्कार करते है । नौकर और मजदूर भले मावलकों को भी कोसते हैं और
उनका बुरा चाहते हैं । भाई अपने भाई के साथ दुव्यतव्हार करते हैं । वपता अपने
पुत्र के साथ अच्छा बतातव नहीं करता । पुत्र माता-वपता का अपमान करता है ।
सास अपनी पुत्रवधू को गाली बकती है तो अवधकारारुढ पुत्रवधू अपनी सास को
कष्ट पहुचाती है । ननद-भौजाई में कलह रहती है । माता अपनी ही संतान – पुत्र
और कन्या के साथ भेदयुक्त बतातव करती है । जमींदार ककसान को लूट लेना
चाहता है, ककसान जमींदारो को बुरा ताकते हैं । राजा अपनी प्रजा का मान,धन
और अवधकार छीनने पर उतारू हैं तो प्रजा राजा का सवतस्वांत देखना चाहती है
। ब्राह्मण शूद्रों का अपमान करते हैं तो शुद्र ब्राह्मणों को कोसते हैं। पडोसी-पडोसी
में भी दुव्यतवहार और कलह है । जगत में इस दुव्यतवहार और कलह के कारण दुुःख
का प्रवाह बह चला है । प्राय: सभी एक दुसरे से शंककत और भीत है । यह दशा
बड़ी ही भयावनी है । इस पर भी ववचार करके इसका सुधार करना चावहये ।

(९) व्यापार के नाम पर जुआ
जीवन अवधक खचीला तथा आड़म्बर पूणत हो जाने से धन की लालसा समाज में
बहुत बढ़ गयी है ।धन एक साथ प्रचुर मात्रा में प्राि होने के वलए सटटा
(Speculation) ही एकमात्र साधन सूझता है, इसी से आजकल रुई, पाट,
हैवसयन, सोना,चांदीआकद पदाथो का सटटा-िाटका खूब चलता है । माल
वडलीवर न लेकर जहााँ के वल भाव पटाया जाता हो, वह सब एक प्रकार का
जुआ ही है । वषात का सौदा, आकाँ िरक(आखर, दड़ा) लगाना-खाना, बाजी लगा
कर तास, चौपड़,शतरं ज आकद खेलना,घुड दौड़ पर बाजी लगाना, लाटरी
डालना, वचट्ठी खेला करना आकद जुए तो प्रवसद्ध ही है। इस व्यसन में पडकर लोग
बबातद हो जाते है । घाटा लगने पर बाप-दादो की जगह-जमीन,घर, वस्त्रओं के
गहने आकद चीजे बंधक रखकर तबाह हो जाते है और रात-कदन हचता के मारे
जलते रहते है ।कही-कही तो आत्महत्या तक कर बैठते है । निा होने पर व्यथत
खचत आकद बढकर पतन के कारण बन जाते है । इस व्यसन की अवधकता बुवद्ध,
स्वास्थ्य, समाज और धमत के वलए भी घातक होती है । बड़े –बड़े लोग इसके िे र
में पढ़ कर बबातद हो चुके है ।इतना ही नहीं, इससे लोक-परलोक दोनों भ्रष्ट होते
है, इसवलए शास्त्रकारों ने सजीव और वनजीव पदाथो को लेकर ककसी प्रकार भी
जुआ खेलना बड़ा भरी पाप और राज्य के वलए घातक बतलाया है । भगवान् मनु
ने तो जुआररयों को देश से वनकाल देने आकद की आज्ञा दी है ।
इसवलए अपना वहत चाहने वाले पुरुषों को इस ववनाशकारी दुव्यतसन से सवतथा
बचना चावहए ।
उपयुक्त वववेचन वततमान समय की थोड़ी-सी-कु ररवतयों , किजूलखची और
दुव्यतसनो का एक साधारण कदग्दशतन मात्र है । इसके अवतररक्त देश, समाज और
जाती में भी जो-जो हावनकर घटक और पतनकारक दुव्यतसन, किजूलखची एवं
बुरी प्रथाये प्रचवलत है, उनको हटाने के वलए भी सब लोगो को वववेकपूवतक
तत्परता

के

साथ

प्रयत्न

करना

चावहए।

नारायण

नारायण

नारायण

नारायण

–नारायण

जयदयाल गोयन्दका, तत्व-हचतामवण, कोड ६८३, गीताप्रेस गोरखपुर

कृ पा करके इस लेख को पढ़ें और दूसरों को पढ़ने के वलए कहें तथा
जीवन में उतरने का प्रयत्न करें । राम राम