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॥ महामृयु
जय िवधान ॥
महामृ यज
ु प होते ह।
ंु य म ं के जप व उपासना के तरीके आवयकता के अन
काय उपासना के प म भी इस म ं का जप िकया जाता है। जप के िलए
अलग-अलग म ं & का 'योग होता है। म ं म िदए अ)र& क* स+ं या से इनम
िविवधता आती है। यह मं िनन 'कार से हैएका)री(1) मं 'ह-' ।
.य)री(3) मं 'ॐ जंू सः'।
चतरु ा)री(4) म ं 'ॐ वं जंू सः'।
नवा)री(9) मं 'ॐ जंू सः पालय पालय'।
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दशा)री(10) म ं 'ॐ जंू सः मां पालय पालय'।
(1वयं के िलए इस म ं का जप इसी तरह होगा जबिक िकसी अ3य 4यि5 के
िलए यह जप िकया जा रहा हो तो 'मां' के 1थान पर उस 4यि5 का नाम लेना
होगा)
वेदो5 मं - महामृ यंजु य का वेदो5 मं िननिलिखत है.यबकं यजामहे सगु ि3धं पिु 8वध9नम।् उवा9;किमव ब3धना3मृ योम9)
ु ीय
माऽमतृ ात् ॥
इस म ं म 32 श<द& का 'योग ह=आ है और इसी म ं म ॐ' लगा देने से 33
श<द हो जाते ह। इसे ' यि@शा)री या ततीस अ)री म ं कहते ह। Aी
विशBजी ने इन 33 श<द& के 33 देवता अथा9त् शि5याँ िनिDत क* ह जो िक
िननिलिखत ह।
इस मं म 8 वस,ु 11 ;E, 12 आिदय 1 'जापित तथा 1 वषट को माना है।
मं िवचार : इस मं म आए 'येक श<द को 1प8 करना अयंत आवयक है
Fय&िक श<द ही मं है और मं ही शि5 है। इस मं म आया 'येक श<द
अपने आप म एक संपणू 9 अथ9 िलए ह=ए होता है और देवािद का बोध कराता है।
श<द बोधक श<द बोधक ' ' Iवु वसु 'यम' अJवर वसु 'ब' सोम वसु 'कम'्
व;ण 'य' वायु 'ज' अिKन 'म' शि5 'हे' 'भास 'स'ु वीरभE 'ग' शभु 'ि3धम'
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िगरीश 'प'ु अजैक 'ि8' अिहब9Jु 3य 'व' िपनाक 'ध9' भवानी पित 'नम'् कापाली 'उ'
िदकपित 'वा9' 1थाणु ';' भग9 'क' धाता 'िम' अय9मा 'व' िम ािदय 'ब'
व;णािदय '3ध' अश
ं ु 'नात' भगािदय 'म'ृ िवव1वान 'यो' इEं ािदय 'म'ु
पषू ािद4य ')ी' पज93यािद4य 'य' व8ा 'मा' िवMणु 'ऽ' िद4य 'म'ृ 'जापित 'तात'
वषट
इसम जो अनेक बोधक बताए गए ह। ये बोधक देवताओ ं के नाम ह।
शद क शिश<द वही ह और उनक* शि5 िनन 'कार से हैश<द शि5 श<द शि5 ' ' .यबक, ि -शि5 तथा ि ने 'य' यम तथा यO 'म'
मगं ल 'ब' बालाक9 तेज 'कं' काली का कPयाणकारी बीज 'य' यम तथा यO 'जा'
जालधं रे श 'म' महाशि5 'हे' हािकनो 'स'ु सगु ि3ध तथा सरु 'ग'ं गणपित का बीज
'ध' धमू ावती का बीज 'म' महेश 'प'ु पQु डरीका) 'ि8' देह म ि1थत षटकोण 'व'
वािकनी 'ध9' धम9 'न'ं नदं ी 'उ' उमा 'वा9' िशव क* बाई ंशि5 ';' प तथा आँसू
'क' कPयाणी 'व' व;ण 'बं' बदं ी देवी 'ध' धदं ा देवी 'म'ृ मृ यज
ंु य 'यो' िनयेश
')ी' )ेमंकरी 'य' यम तथा यO 'मा' माँग तथा म3 ेश 'म'ृ मृ यजंु य 'तात' चरण&
म 1पश9

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तांिक बीजो मंॐ भःू भवु ः 1वः। ॐ .यबकं यजामहे सगु ि3धं पिु 8वध9नम।् उवा9;किमव
ब3धना3मृ योम9)
ु ीय माऽमतृ ात।् 1वः भवु ः भःू ॐ ॥
सज
ं ीवनी म ं अथा9त् सज
ं ीवनी िवXा-ॐ Y- जंू सः। ॐ भभू व9 ः 1वः। ॐ
.यबकं यजामहे सगु ि3धं पिु 8वध9नम।् उवा9;किमव ब3धना3ं मृ योम9)
ु ीय
माऽमतृ ात।् 1वः भवु ः भःू ॐ। सः जंू Y- ॐ ।
महामृ यंजु य का 'भावशाली मं ॐ Y- जंू सः। ॐ भःू भवु ः 1वः। ॐ .यबकं यजामहे सगु ि3धं पिु 8वध9नम।्
उवा9;किमव ब3धना3मृ योम9)
ु ीय माऽमतृ ात।् 1वः भवु ः भःू ॐ। सः जंू Y- ॐ ॥
महामृ यज
ंु य म ं जाप म सावधािनयाँ
महामृ यज
ंु य म ं का जप करना परम फलदायी है। लेिकन इस म ं के जप म
कुछ सावधािनयाँ रखना चािहए िजससे िक इसका सपं णू 9 लाभ 'ा\ हो सके
और िकसी भी 'कार के अिन8 क* संभावना न रहे।
अतः जप से पवू 9 िनन बात& का Jयान रखना चािहए1. जो भी मं जपना हो उसका जप उ]चारण क* श^
ु ता से कर ।
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2. एक िनिDत स+ं या म जप कर । पवू 9 िदवस म जपे गए म ं & से, आगामी िदन&
म कम म ं & का जप न कर । यिद चाह तो अिधक जप सकते ह।
3. म ं का उ]चारण होठ& से बाहर नह` आना चािहए। यिद अaयास न हो तो
धीमे 1वर म जप कर ।
4. जप काल म धपू -दीप जलते रहना चािहए।
5. ;Eा) क* माला पर ही जप कर ।
6. माला को गोमख
ु ी म रख। जब तक जप क* सं+या पणू 9 न हो, माला को
गोमख
ु ी से बाहर न िनकाल।
7. जप काल म िशवजी क* 'ितमा, त1वीर, िशविलंग या महामृ यंजु य यं
पास म रखना अिनवाय9 है।
8. महामृ यंजु य के सभी जप कुशा के आसन के ऊपर बैठकर कर ।
9. जप काल म दKु ध िमले जल से िशवजी का अिभषेक करते रह या िशविलंग
पर चढ़ाते रह।
10. महामृ यज
ु करके ही कर ।
ंु य म ं के सभी 'योग पवू 9 िदशा क* तरफ मख
11. िजस 1थान पर जपािद का शभु ारंभ हो, वह` पर आगामी िदन& म भी जप
करना चािहए।
12. जपकाल म Jयान परू ी तरह म ं म ही रहना चािहए, मन को इधर-उधरन
भटकाएँ।
13. जपकाल म आल1य व उबासी को न आने द।
14. िमdया बात न कर ।
15. जपकाल म @ी सेवन न कर ।
16. जपकाल म मासं ाहार याग द।
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कब कर महामृ यज
ंु य म ं जाप?
महामृ यज
ंु य म ं जपने से अकाल मृ यु तो टलती ही है, आरोKयता क* भी
'ाि\ होती है। 1नान करते समय शरीर पर लोटे से पानी डालते व5 इस म ं का
जप करने से 1वा1dय-लाभ होता है।
दधू म िनहारते ह=ए इस मं का जप िकया जाए और िफर वह दधू पी िलया जाए
तो यौवन क* सरु )ा म भी सहायता िमलती है। साथ ही इस म ं का जप करने
से बह=त सी बाधाएँ दरू होती ह, अतः इस मं का यथासंभव जप करना चािहए।
िननिलिखत ि1थितय& म इस मं का जाप कराया जाता है(1) fयोितष के अनसु ार यिद ज3म, मास, गोचर और दशा, अतं द9शा,
1थल
ू दशा आिद म gहपीड़ा होने का योग है।
(2) िकसी महारोग से कोई पीिड़त होने पर।
(3) जमीन-जायदाद के बँटबारे क* सभं ावना हो।
(4) हैजा-iलेग आिद महामारी से लोग मर रहे ह&।
(5) राfय या सपं दा के जाने का अदं श
े ा हो।
(6) धन-हािन हो रही हो।
(7) मेलापक म नाड़ीदोष, षडा8क आिद आता हो।
(8) राजभय हो।
(9) मन धािम9क कायj से िवमख
ु हो गया हो।
(10) राMk का िवभाजन हो गया हो।
(11) मनMु य& म पर1पर घोर Fलेश हो रहा हो।
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(12) ि दोषवश रोग हो रहे ह&।
महामृ यज
ंु य जप म ं
महामृ यज
ंु य म ं का जप करना परम फलदायी है। महामृ यजंु य म ं के जप व
उपासना के तरीके आवयकता के अन
ु प होते ह। काय उपासना के प म
भी इस म ं का जप िकया जाता है। जप के िलए अलग-अलग म ं & का 'योग
होता है। यहाँ हमने आपक* सिु वधा के िलए सं1कृत म जप िविध, िविभ3न यं मं , जप म सावधािनयाँ, 1तो आिद उपल<ध कराए ह। इस 'कार आप यहाँ
इस अदभ् तु जप के बारे म िव1ततृ जानकारी 'ा\ कर सकते ह।
|| महामृ यंजु य जपिविध ||
कृतिनयिmयो जपकता9 1वासने पागं मख
ु उदहमख
ु ो वा उपिवय
धतृ ;Eा)भ1मि पQु nः । आचय । 'ाणानायाय। देशकालौ संक*य9 मम वा
यOमान1य अमक
ु कामनािस^यथ9 Aीमहामृ यंजु य मं 1य अमक
ु सं+यापoरिमतं
जपमहक
ं oरMये वा कारियMये।
॥ इित 'ायिहकसक
ं Pपः॥
ॐ नमो भगवते वासदु वे ाय ॐ गरु वे नमः। ॐ गणपतये नमः। ॐ इ8देवतायै
नमः। इित नवा यथो5िविधना भतू शिु ^ं 'ाण 'ितBां च कुया9त।्
भूतशुिः
िविनयोगः ॐ तसदXेयािद मम अमक
ु 'योगिस^यथ9 भतू शिु ^ं 'ाण 'ितBां
च कoरMये। ॐ आधारशि5 कमलासनायनमः। इयासनं सपfू य। पdृ वीित
मं 1य। मे;पBृ ऋिष;, सतु लं छंदः कूमq देवता, आसने िविनयोगः।
आसनः ॐ पिृ dव वया धतृ ा लोका देिव वं िवMणनु ा धतृ ा। वं च धारय माँ
देिव पिव ं कु; चासनम।् ग3धपMु पािदना पdृ व` सपfू य कमलासने भतू शिु ^ं
कुया9त।् अ3य कामनाभेदने । अ3यासनेऽिप कुया9त।्
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पादािदजानपु यrतं पdृ वी1थानं त]चतरु @ं पीतवण9 stदैवतं विमित बीजय5
ु ं
Jयायेत।् जा3वािदना िभपय93तमस1थानं त]चा^9चEं ाकारं शFु लवण9
पuलािं छतं िवMणदु वै तं लिमित बीजय5
ु ं Jयायेत।्
नाaयािदकंठपय93तमिKन1थानं ि कोणाकारं र5वण9 1वि1तकलाि3छतं ;Eदैवतं
रिमित बीजय5
ु ं Jयायेत।् कQठािद भपू य93तं वाय1ु थानं षट्कोणाकारं
षड्िबंदल
ु ं Jयायेत।्
ु ाि3छतं कृMणवण9मीvर दैवतं यिमित बीजय5
भमू Jयािदstर3Iपय93त माकाश1थानं वwृ ाकारं Jवजलािं छतं सदािशवदैवतं
हिमित बीजय5
ु ं Jयायेत।् एवं 1वशरीरे पचं महाभतू ािन Jयावा 'िवलापनं
कुया9त।् यXथा-पdृ वीमiस।ु अपोऽKनौअिKनवायौ वायमु ाकाशे। आकाशं
त3मा ाऽहक
ृ ासंOक श<द st1वपायो
ं ारमहदािमकायाँ मातक
xPलेखा^9भतू ायाँ 'कृिw मायायाँ 'िवलापयािम, तथा ि िवयाँ मायाँ च
िनयश^
ु ब^
ु म5
ु 1वभावे 1वाम'काश पसयOानाँन3तान3दल)णे परकारणे
परमाथ9भतू े परstिण 'िवलापयािम।त]च िनयश^
ु ब^
ु म5
ु 1वभावं
सि]चदान3द1वपं पoरपणू 9 stैवाहम1मीित भावयेत।् एवं Jयावा
यथो51वपात् ॐ कारामककात् परstणः सकाशात् xPलेखा^9भतू ा
सव9म ं मयी मातक
ृ ासिं Oका श<द stािमका महदह् क
ं ारािदप3चत3मा ािदसम1त 'पचं कारणभतू ा 'कृितपा माया रfजसु प9वत् िववw9पेण
'ादभु 9तू ा इित Jयावा। त1या मायायाः सकाशात् आकाशमु प3नम,्
आकाशाyास;ु , वायोरिKनः, अKनेरापः, अदaयः पdृ वी समजायत इित Jयावा।
तेaयः पचं महाभतू aे यः सकाशात् 1वशरीरं तेजः पजंु ामकं
प;ु षाथ9साधनदेवयोKयमु प3निमित Jयावा। ति1मन् देहे सवा9मकं सव9Oं
सव9शि5संय5
ु सम1तदेवतामयं सि]चदानंद1वपं stामपेणान'ु िव8िमित
भावयेत् ॥
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॥ इित भतू शिु ^ः ॥
|| अथ "ाण-"ित$ा ||
िविनयोगःअ1य Aी'ाण'ितBाम ं 1य stािवMण;ु Eा ऋषयः ऋKयजःु सामािन
छ3दािं स, परा 'ाणशि5दzवता, ॐ बीजम,् Y` शि5ः, m- क*लकं 'ाण'ितBापने िविनयोगः। डं. कं खं गं घं नमो वा{विKनजलभू यामने xदयाय नमः।
ञं चं छं जं झं श<द 1पश9 परसग3धामने िशरसे 1वाहा। णं टं ठं डं ढं Aी वड़
नयनिजा€ाणामने िशखायै वषट्। नं तं थं धं दं वाFपािणपादपायपू 1थामने
कवचाय ह=म।् मं पं फं भं बं व54यादानगमनिवसगा9न3दामने ने याय वौषट्।
शं यं रं लं हं षं )ं सं बिु ^मानाऽहक
ं ार-िचwामने अाय फट्। एवं कर3यासं
कृवा ततो नािभतः पादपय93तम् आँ नमः। xदयतो नािभपय93तं Y` नमः। म^
ू ा9
िyxदयपय93तं m- नमः। ततो xदयकमले 3यसेत।् यं वगामने नमः वायक
ु ोणे। रं
र5ामने नमः अिKनकोणे। लं मासं ामने नमः पवू z । वं मेदसामने नमः पिDमे ।
शं अ1dयामने नमः नैऋये। ओषं ं शm
ु ामने नमः उwरे । सं 'ाणामने नमः
दि)णे। हे जीवामने नमः मJये एवं हदयकमले।
अथ Jयानमर5ाभाि1थपोतोPलसद;णसरोजाङ
ि€ढा करा<जैः पाशं

कोदQडिम)दू भवमथगणु मiयड़ कुशं पचं बाणान।् िवƒाणसFृ कपालं
ि नयनलिसता पीनव)ो;हाढया देवी बालाक9 वणां भवतश
ु ु भकरो 'ाणशि5ः
परा नः ॥
॥ इित 'ाण-'ितBा ॥

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जप ~
** अथ महामृयुंजय जपिविध संक'प **
त सJं योपासनािदिनयकमा9न3तरं भतू शिु ^ं 'ाण 'ितBां च कृवा
'ितOासक
ु मासे
ं Pप कुया9त ॐ तसदXेयािद सव9म]ु चाय9 मासोwमे मासे अमक
अमक
ु प)े अमक
ु ितथौ अमक
ु वासरे अमक
ु गो ो अमक
ु शमा9/वमा9/ग\ु ा मम
शरीरे fवरािद-रोगिनविृ wपवू 9कमायरु ारोKयलाभाथr वा धनप ु यश
सौ+यािदिककामनािस^यथ9 Aीमहामृ यजंु यदेव 'ीिमकामनया
यथासं+यापoरिमतं महामृ यंजु यजपमहं कoरMये।
िविनयोग अ1य Aी महामृ यंजु यमं 1य विशB ऋिषः, अन8ु =iछ3दः Aी
.यबक;Eो देवता, Aी बीजम,् Y` शि5ः, मम अनीBसह„ियथz जपे िविनयोगः।
अथ यMयािद3यासः ॐ विसBऋषये नमः िशरिस। अनBु = छ3दसे नमो मख
ु ।े Aी
.यबक;E देवतायै नमो xिद। Aी बीजाय नमोग…
ु ।े Y` श5ये नमोः पादयोः।
॥ इित यMयािद3यासः ॥
अथ कर3यासः
ॐ Y` जंू सः ॐ भभू व9ु ः 1वः .यबकं ॐ नमो भगवते ;Eायं शल
ू पाणये 1वाहा
अगं Bु ाaयं नमः।
ॐ Y` जंू सः ॐ भभू व9ु ः 1वः यजामहे ॐ नमो भगवते ;Eाय अमतृ मतू य9 े माँ
जीवय तज9नीaयाँ नमः।
ॐ Y- जंू सः ॐ भभू व9ु ः 1वः सगु ि3धपिु 8व^9नम् ओ ं नमो भगवते ;Eाय
च3Eिशरसे जिटने 1वाहा मJयामाaयाँ वषट्।
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ॐ Y- जंू सः ॐ भभू व9ु ः 1वः उवा9;किमव ब3धनात् ॐ नमो भगवते ;Eाय
ि परु ा3तकाय हां Y` अनािमकाaयाँ ह=म।्
ॐ Y- जंू सः ॐ भभू व9ु ः 1वः मृ योम9)
ु ीय ॐ नमो भगवते ;Eाय ि लोचनाय
ऋKयजःु सामम3 ाय किनिBकाaयाँ वौषट्।
ॐ Y- जंू सः ॐ भभू व9ु ः 1वः मामतृ ाम् ॐ नमो भगवते ;Eाय अिKनवयाय
fवल fवल माँ र) र) अघारा@ाय करतलकरपBृ ाaयाँ फट् ।
॥ इित कर3यासः ॥
अथागं 3यासः
ॐ Y- ॐ जंू सः ॐ भभू व9ु ः 1वः .यबकं ॐ नमो भगवते ;Eाय शल
ू पाणये
1वाहा xदयाय नमः।
ॐ Y- ओ ं जंू सः ॐ भभू व9ु ः 1वः यजामहे ॐ नमो भगवते ;Eाय अमतृ मतू य9 े
माँ जीवय िशरसे 1वाहा।
ॐ Y- ॐ जंू सः ॐ भभू व9ु ः 1वः सगु ि3धपिु 8व^9नम् ॐ नमो भगवते ;Eाय
चEं िशरसे जिटने 1वाहा िशखायै वषट्।
ॐ Y- ॐ जंू सः ॐ भभू व9ु ः 1वः उवा9;किमव ब3धनात् ॐ नमो भगवते ;Eाय
ि परु ातं काय Yां Yां कवचाय ह=म।्
ॐ Y- ॐ जंू सः ॐ भभू व9ु ः 1वः मृ याम9)
ु ीय ॐ नमो भगवते ;Eाय
ि लोचनाय ऋKयजु साममं याय ने याय वौषट्।
ॐ Y- ॐ जंू सः ॐ भभू व9ु ः 1वः मामतृ ात् ॐ नमो भगवते ;Eाय अिKन याय
fवल fवल माँ र) र) अघोरा@ाय फट्।
॥ इयंग3यासः ॥
अथा)र3यासः .यं नमः दि)णचरणाgे। बं नमः, कं नमः, यं नमः, जां नमः
दि)णचरणसि3धचतMु के षु । मं नमः वामचरणाgे । ह नमः, संु नमः, गं नमः, िधं
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नम, वामचरणसि3धचतMु के षु । पंु नमः, ग…
ु ।े ि8ं नमः, आधारे । वं नमः, जठरे । ^r
नमः, xदये। नं नमः, कQठे । उं नमः, दि)णकराgे। वां नमः, ;ं नमः, कं नमः, िमं
नमः, दि)णकरसि3धचतMु के ष।ु वं नमः, बामकराgे। बं नमः, धं नमः, नां नमः, मंृ
नमः वामकरसि3धचतMु के ष।ु य& नमः, वदने। मंु नमः, ओBयोः। )` नमः,
€ाणयोः। यं नमः, †शोः। माँ नमः Aवणयोः । मंृ नमः ƒवोः । तां नमः, िशरिस।
॥ इय)र3यास ॥ अथ पद3यासः .यबकं शरिस। यजामहे ƒवु ोः। सगु ि3धं †शोः
। पिु 8वध9नं मख
ु ।े उवा9;कं कQठे । िमव xदये। ब3धनात् उदरे । मृ योः ग…
ु े । म)
ु य
उवj: । माँ जा3वोः । अमतृ ात् पादयोः।
॥ इित पद3यास ॥
मृ यंजु यJयानम् ह1ताaयाँ कलशyयामतृ सैराiलावय3तं िशरो,
yाaयाँ तौ दधतं मगृ ा)वलये yाaयाँ वह3तं परम् ।
अक
ं 3य1तकरyयामतृ घटं कै लासकातं ं िशवं,
1व]छाभोगतं नवे3दमु क
ु ु टाभातं ि ने भजे ॥
मृ यज
ंु य महादेव ािह माँ शरणागतम,् ज3ममृ यजु रारोगैः पीिड़त कम9ब3धनैः ॥
तावक1व‡त'ाण1वि]चwोऽहं सदा मडृ ,
इित िवOाiय देवेशं जपे3मृ यज
ंु य मनमु ् ॥
अथ बृह(म(ः
ॐ Y- जंू सः ॐ भःू भवु ः 1वः। .यबकं यजामहे सगु ि3धपिु 8वध9नम।्
उ4वा9;किमव ब3धना3मृ योम9)
ु ीय मामतृ ात।् 1वः भवु ः भू ॐ। सः जंू Y- ॐ ॥
समप9ण एतद यथासं+यं जिपवा पनु 3या9सं कृवा जपं भग3महामृ यंजु यदेवताय
समप9येत।

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ग…
ु ाितग…
ु गोपता व गहृ ाणा1मकृतं जपम।्
िसि^भ9वतु मे देव व'सादा3महेvर ॥
॥ इित महामृ यज
ंु य जपिविधः ॥
Mrityunjaya Mantra
Tryambhakam Yajamahe
Sugandhim Pushtivardhanam
Urvarukamiva Bandhanan
Mrityor Mokshiya Maamritat
(Rg Veda 7th Mandala, 59th Chapter)
Aum –
Wherever Aum is used in Vedas, it is used to indicate the
Universe. According to Mandukya Upanishad (my
interpretation of it), Aum is equivalent to the model of
universe, as it is known today.
Tryambakam Tryambakam indicates the three forces that come out of
Amba.
Amba
Nasadiya suktam says at the night of universe, when
everything has been consumed into vyom, amba forms
and shines blissfully. The process by which amba splits,
fuses and originates the natural forces is explained in
Nasadiya Suktam. It says the aim of this is to continuously
evolve into species of higher intelligence.

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The place from which the natural forces originate (the
place of fusion between constituents of Amba) is often
referred to as dyuloka in Vedas and Upanishads. Thus
dyuloka is said to be held or supported by Amba.
According to Aitreya Upanishad from Amba which came
first, the natural forces that originate are marichi, maram
and Apa. Hence Marichi, Maram and Apa are said to be
residing in dyuloka, originating from the fusion of
constituents of Amba. Nasadiya Suktam also says what
constitutes this fusion is not known.
Marichi
Marichi is a term used in connection with a particle as well
as a field. It is used to denote a field of light, in particular
that of a mirage. It is also used to denote a shining speck
of a particle. Aitreya Upanishad says Marichi forms the
Space.
Hence Marichi means field or Quanta of a field that forms
the space. Space is visualized here as a field (or
combination of fields ..?) that originate from Amba. A
Quanta is a manifestation of the field at a particular point,
which occurs when the field manifests itself on matter.
Probably this quanta gives rise to mass of the particle. As I
dig deep into Aitreya Upanishad, there could be some
answers there. Currently this is an assumption.
This Marichi is often referred to as the first world that
came in Vedas and Upanishads.
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Maram
Maram means subjected to change or transformation. In
other words, something that is of mortal form. Anything
where change or transformation is perceivable explicitly, it
is called mara or of mortal form. All objects of mara form
die or change perceivably.
All gross substances that are built up of particles of matter
are of mara form. Hence mara could be interpreted as
matter that has a form and is subjected to change and
death.
Aitreya Upanishad says Earth was made of Mara, which
means that it is of mortal form and it will die someday. All
such stars, rocks and planets which came second are
often referred to as the second world.
Apa
After all of them came the third world that is Apa. Aitreya
Upanishad says Apa is the one that rose out of the
discharge of the virile Semen of Amba.
Probably it is some kind of primitive biological being that
evolved life subsequently. This world of biological living
beings is described as the third world. If my interpretation
is true and holds good in the scrutiny of scholars, it is
fascinating and perplexing to think that such biological
being is possible even in such environments and
temperatures.

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Also Nasadiya Suktam talks about such a virile semen
(the sperm of the semen or we can call egg of the semen)
situated in a peaking mountain structure of the Amba.
The three forces of Amba
Simplistically put, the first world of Marichi is the world of
physics. The second world of Maram is the world of
Chemistry. The third world of Apa is the world of biology.
Thus Triambakam indicates the three forces that originate
from Amba.
The Fourth one: Guiding force of Purusha
Aitreya Upanishad also describes the fourth one, Purusha,
as the guardian or the guiding force of marichi, maram and
Apa. According to Aitreya, such a Purusha does not
interact with any of these and stands apart from any of
these, but guides/protects them in their evolution. It is said
to have been released from the agitations of Amba and is
present everywhere.
Purusha could be the dark-matter that is formed along with
mara (evolution of matter which I mapped to chemistry),
marichi (quanta of energy that forms various sub-atomic
forces which I map to physics) and Apah (evolution of life
which I map to biology) and guides their evolution further.
YajamaheYaj – on its own offers, sacrificially
Amahe – grants, gives
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Yajamahe means sacrificially grants, sacrificially offers
Sugandhim Pushivardhanam
Sugandhim - Ever spreading Pure
Pushti – nourishes
vardhanam – grows
Ever spreading pure Growth and nourishment
urvArukamurVarukam-iva – Like Cucumber plant
Bandhanan – binding, dependent
Mrtyor – death
Moksya – to liberate
Mamritat – (from) mortality
Summary
The Three forces of amba sacrificially offer ever spreading
pure growth and nourishment to the Universe like a
cucumber plant (that spreads in all directions), dependent
on death to liberate from mortality (to provide immortality).
Commentary
The key thing is 'Death' is a way to achieve immortality.
Death returns the seeds of life back to Universe. Death
gives rise to newer and advanced froms of life and is the
basis of evolution. This law of immortality applies all things
that are mortal. Thus through death, immortality is
achieved for living beings.

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The Universe grows like a cucumber plant nourished by
the three forces of Amba, which are forces of physics,
chemistry and biology. Like a Cucumber fruit that carries
the seed of Cucumber, life (which is a manifestation of
Apa) is carried by Prthvi (Earth) and its beings. Indeed the
'concept' of life is applicable to all matter and beings which
are mortal. Hence every matter including Earth, every
being including the most primitive undergo death to remain
immortal and evolving.
When a cucumber dies (or when it is eaten/consumed), its
seeds get spread in all directions and gives rise to more
lives. Prithvi or Earth (which has life or Apa in it) could be
viewed as a fruit of Cucumber and when it dies, the seeds
of it are carried over to other planets and probably life
spreads and thrives there. When a being dies, it facilitates
the evolution of its progeny by not competing for the same
resources, while at the same time handing over its lessons
of evolution to the progeny.
Death returns the seeds of life back to Earth, which gives
rise to newer, advanced and more adapting forms of life.
Thus Maha Mrtyunjaya Mantra teaches us to see death as
a way to be immortal, rather than cringe in fear about
death. Death is not about mortality, but becoming immortal
through evolution is the basic concept of this mantra.

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