श्रा ऱमचररतम़नस

ऄयोध्य़क़ण्ड
ऽिताय सोप़न-मंगल़चरण
श्लोक :
* यसय़ंके च ऽिभ़ऽत भीधरसित़ देि़पग़ मसतके
भ़ले ब़लऽिधिगगले च गरलं यसयोरऽस व्य़लऱट् ।
सोऻयं भीऽतऽिभीषणः सिरिरः सि़गऽधपः सिगद़
शिगः सिगगतः ऽशिः शऽशऽनभः श्रा शंकरः प़ति म़म्॥1॥
भ़ि़थग:-ऽजनकी गोद में ऽहम़चलसित़ प़िगताजा, मसतक पर
गंग़जा, लल़ट पर ऽिताय़ क़ चन्द्रम़, कं ठ में हल़हल ऽिष
और िक्षःसथल पर सपगऱज शेषजा सिशोऽभत हैं, िे भसम से
ऽिभीऽषत, देित़ओं में श्रेष्ठ, सिेश्वर, संह़रकत़ग (य़ भक्तों के
प़पऩशक), सिगव्य़पक, कल्य़ण रूप, चन्द्रम़ के सम़न शिवर्िणग
श्रा शंकरजा सद़ मेरा रक्ष़ करें ॥1॥

* प्रसन्नत़ं य़ न गत़ऽभषेकतसतथ़ न मम्ले िनि़सदिःखतः।
मिख़म्बिजश्रा रघिनन्द्दनसय मे सद़सति स़ मंजिलमंगलप्रद़॥2॥
भ़ि़थग:-रघिकिल को अनंद देने ि़ले श्रा ऱमचन्द्रजा के
मिख़रविद की जो शोभ़ ऱज्य़ऽभषेक से (ऱज्य़ऽभषेक की ब़त
सिनकर) न तो प्रसन्नत़ को प्ऱप्त हुइ और न िनि़स के दिःख से
मऽलन हा हुइ, िह (मिखकमल की छऽब) मेरे ऽलए सद़ सिंदर
मंगलों की देने ि़ला हो॥2॥
* नाल़म्बिजश्य़मलकोमल़ंग सात़सम़रोऽपति़मभ़गम्।
प़णौ मह़स़यकच़रुच़पं नम़ऽम ऱमं रघििश
ं ऩथम्॥3॥
भ़ि़थग:-नाले कमल के सम़न श्य़म और कोमल ऽजनके ऄंग हैं,
श्रा सात़जा ऽजनके ि़म भ़ग में ऽिऱजम़न हैं और ऽजनके
ह़थों में (क्रमशः) ऄमोघ ब़ण और सिंदर धनिष है, ईन रघििंश
के सि़मा श्रा ऱमचन्द्रजा को मैं नमसक़र करत़ हूँ॥3॥
दोह़ :
* श्रा गिरु चरन सरोज रज ऽनज मनि मिकिरु सिध़रर।
बरनईूँ रघिबर ऽबमल जसि जो द़यकि फल च़रर॥
भ़ि़थग:-श्रा गिरुजा के चरण कमलों की रज से ऄपने मन रूपा
दपगण को स़फ करके मैं श्रा रघिऩथजा के ईस ऽनमगल यश क़

िणगन करत़ हूँ, जो च़रों फलों को (धमग, ऄथग, क़म, मोक्ष को)
देने ि़ल़ है।
चौप़इ :
* जब तें ऱमि ब्य़ऽह घर अए। ऽनत नि मंगल मोद बध़ए॥
भििन च़ररदस भीधर भ़रा। सिकुत मेघ बरषवह सिख ब़रा॥1॥
भ़ि़थग:-जब से श्रा ऱमचन्द्रजा ऽिि़ह करके घर अए, तब से
(ऄयोध्य़ में) ऽनत्य नए मंगल हो रहे हैं और अनंद के बध़िे
बज रहे हैं। चौदहों लोक रूपा बडे भ़रा पिगतों पर पिण्य रूपा
मेघ सिख रूपा जल बरस़ रहे हैं॥1॥
* ररऽध ऽसऽध संपऽत नदीं सिह़इ। ईमऽग ऄिध ऄंबऽि ध कहुूँ अइ॥
मऽनगन पिर नर ऩरर सिज़ता। सिऽच ऄमोल सिद
ं र सब भ़ूँता॥2॥
भ़ि़थग:-ऊऽि-ऽसऽि और सम्पऽि रूपा सिह़िना नददय़ूँ ईमडईमडकर ऄयोध्य़ रूपा समिर में अ ऽमलीं। नगर के स्त्रा-पिरुष
ऄच्छा ज़ऽत के मऽणयों के समीह हैं, जो सब प्रक़र से पऽित्र,
ऄमील्य और सिंदर हैं॥2॥
* कऽह न ज़आ कछि नगर ऽबभीता। जनि एतऽनऄ ऽबरं ऽच
करतीता॥
सब ऽबऽध सब पिर लोग सिख़रा। ऱमचंद मिख चंद ि ऽनह़रा॥3॥

भ़ि़थग:-नगर क़ ऐश्वयग कि छ कह़ नहीं ज़त़। ऐस़ ज़न पडत़
है, म़नो ब्रह्म़जा की क़रागरा बस आतना हा है। सब नगर
ऽनि़सा श्रा ऱमचन्द्रजा के मिखचन्द्र को देखकर सब प्रक़र से
सिखा हैं॥3॥
* मिददत म़ति सब सखीं सहेला। फऽलत ऽबलोदक मनोरथ बेला॥
ऱम रूपि गिन सालि सिभ़उ। प्रमिददत होआ देऽख सिऽन ऱउ॥4॥
भ़ि़थग:-सब म़त़एूँ और सखा-सहेऽलय़ूँ ऄपना मनोरथ रूपा बेल
को फला हुइ देखकर अनंददत हैं। श्रा ऱमचन्द्रजा के रूप, गिण,
शाल और सिभ़ि को देख-सिनकर ऱज़ दशरथजा बहुत हा
अनंददत होते हैं॥4॥

ऱम ऱज्य़ऽभषेक की तैय़रा, देित़ओं की व्य़कि लत़ तथ़
सरसिता से ईनकी प्ऱथगऩ
दोह़ :
* सब कें ईर ऄऽभल़षि ऄस कहवह मऩआ महेसि।
अप ऄछत जिबऱज पद ऱमऽह देई नरे सि॥1॥
भ़ि़थग:-सबके हृदय में ऐसा ऄऽभल़ष़ है और सब मह़देिजा
को मऩकर (प्ऱथगऩ करके ) कहते हैं दक ऱज़ ऄपने जाते जा
श्रा ऱमचन्द्रजा को यििऱज पद दे दें॥1॥
चौप़इ :
* एक समय सब सऽहत सम़ज़। ऱजसभ़ूँ रघिऱजि ऽबऱज़॥
सकल सिकुत मीरऽत नरऩह। ऱम सिजसि सिऽन ऄऽतऽह ईछ़ह॥1॥

भ़ि़थग:-एक समय रघिकिल के ऱज़ दशरथजा ऄपने स़रे सम़ज
सऽहत ऱजसभ़ में ऽिऱजम़न थे। मह़ऱज समसत पिण्यों की
मीर्तत हैं, ईन्द्हें श्रा ऱमचन्द्रजा क़ सिंदर यश सिनकर ऄत्यन्द्त
अनंद हो रह़ है॥1॥
* नुप सब रहवह कु प़ ऄऽभल़षें। लोकप करवह प्राऽत रुख
ऱखें॥िन ताऽन क़ल जग म़हीं। भीररभ़ग दसरथ सम ऩहीं॥2॥
भ़ि़थग:-सब ऱज़ ईनकी कु प़ च़हते हैं और लोकप़लगण ईनके
रुख को रखते हुए (ऄनिकील होकर) प्राऽत करते हैं। (पुथ्िा,
अक़श, प़त़ल) तानों भििनों में और (भीत, भऽिष्य, ितगम़न)
तानों क़लों में दशरथजा के सम़न बडभ़गा (और) कोइ नहीं
है॥2॥
* मंगलमील ऱमि सित ज़सी। जो कछि कऽहऄ थोर सबि त़सी॥
ऱयूँ सिभ़यूँ मिकिरु कर लान्द्ह़। बदनि ऽबलोदक मिकिटि सम
कीन्द्ह़॥3॥
भ़ि़थग:-मंगलों के मील श्रा ऱमचन्द्रजा ऽजनके पित्र हैं, ईनके
ऽलए जो कि छ कह़ ज़ए सब थोड़ है। ऱज़ ने सि़भ़ऽिक हा
ह़थ में दपगण ले ऽलय़ और ईसमें ऄपऩ मिूँह देखकर मिकिट को
साध़ दकय़॥3॥
* श्रिन समाप भए ऽसत के स़। मनहुूँ जरठपनि ऄस ईपदेस़॥

नुप जिबऱजि ऱम कहुूँ देह। जािन जनम ल़हु दकन लेह॥4॥
भ़ि़थग:-(देख़ दक) क़नों के प़स ब़ल सफे द हो गए हैं, म़नो
बिढ़़प़ ऐस़ ईपदेश कर रह़ है दक हे ऱजन्! श्रा ऱमचन्द्रजा
को यििऱज पद देकर ऄपने जािन और जन्द्म क़ ल़भ क्यों
नहीं लेते॥4॥
दोह़ :
* यह ऽबच़रु ईर अऽन नुप सिददनि सिऄिसरु प़आ।
प्रेम पिलदक तन मिददत मन गिरऽह सिऩयई ज़आ॥2॥
भ़ि़थग:-हृदय में यह ऽिच़र ल़कर (यििऱज पद देने क़ ऽनश्चय
कर) ऱज़ दशरथजा ने शिभ ददन और सिंदर समय प़कर, प्रेम
से पिलदकत शरार हो अनंदमग्न मन से ईसे गिरु िऽशष्ठजा को
ज़ सिऩय़॥2॥
चौप़इ :
* कहआ भिअलि सिऽनऄ मिऽनऩयक। भए ऱम सब ऽबऽध सब
ल़यक॥
सेिक सऽचि सकल पिरब़सा। जे हम़र ऄरर ऽमत्र ईद़सा॥1॥
भ़ि़थग:-ऱज़ ने कह़- हे मिऽनऱज! (कु पय़ यह ऽनिेदन) सिऽनए।
श्रा ऱमचन्द्रजा ऄब सब प्रक़र से सब योग्य हो गए हैं। सेिक,

मंत्रा, सब नगर ऽनि़सा और जो हम़रे शत्रि, ऽमत्र य़ ईद़सान
हैं-॥1॥
* सबऽह ऱमि ऽप्रय जेऽह ऽबऽध मोहा। प्रभि ऄसास जनि तनि धरर
सोहा॥
ऽबप्र सऽहत पररि़र गोस़ईं। करवह छोहु सब रौररऽह ऩईं॥2॥
भ़ि़थग:-सभा को श्रा ऱमचन्द्र िैसे हा ऽप्रय हैं, जैसे िे मिझको
हैं। (ईनके रूप में) अपक़ अशाि़गद हा म़नो शरार ध़रण
करके शोऽभत हो रह़ है। हे सि़मा! स़रे ब्ऱह्मण, पररि़र
सऽहत अपके हा सम़न ईन पर स्नेह करते हैं॥2॥
* जे गिर चरन रे नि ऽसर धरहीं। ते जनि सकल ऽबभि बस
करहीं॥
मोऽह सम यहु ऄनिभयई न दीजे

ऱम ऱज्य़ऽभषेक की तैय़रा, देित़ओं की व्य़कि लत़ तथ़
सरसिता से ईनकी प्ऱथगऩ
दोह़ :
* सब कें ईर ऄऽभल़षि ऄस कहवह मऩआ महेसि।
अप ऄछत जिबऱज पद ऱमऽह देई नरे सि॥1॥

भ़ि़थग:-सबके हृदय में ऐसा ऄऽभल़ष़ है और सब मह़देिजा
को मऩकर (प्ऱथगऩ करके ) कहते हैं दक ऱज़ ऄपने जाते जा
श्रा ऱमचन्द्रजा को यििऱज पद दे दें॥1॥
चौप़इ :
* एक समय सब सऽहत सम़ज़। ऱजसभ़ूँ रघिऱजि ऽबऱज़॥
सकल सिकुत मीरऽत नरऩह। ऱम सिजसि सिऽन ऄऽतऽह ईछ़ह॥1॥
भ़ि़थग:-एक समय रघिकिल के ऱज़ दशरथजा ऄपने स़रे सम़ज
सऽहत ऱजसभ़ में ऽिऱजम़न थे। मह़ऱज समसत पिण्यों की
मीर्तत हैं, ईन्द्हें श्रा ऱमचन्द्रजा क़ सिंदर यश सिनकर ऄत्यन्द्त
अनंद हो रह़ है॥1॥
* नुप सब रहवह कु प़ ऄऽभल़षें। लोकप करवह प्राऽत रुख
ऱखें॥िन ताऽन क़ल जग म़हीं। भीररभ़ग दसरथ सम ऩहीं॥2॥
भ़ि़थग:-सब ऱज़ ईनकी कु प़ च़हते हैं और लोकप़लगण ईनके
रुख को रखते हुए (ऄनिकील होकर) प्राऽत करते हैं। (पुथ्िा,
अक़श, प़त़ल) तानों भििनों में और (भीत, भऽिष्य, ितगम़न)
तानों क़लों में दशरथजा के सम़न बडभ़गा (और) कोइ नहीं
है॥2॥
* मंगलमील ऱमि सित ज़सी। जो कछि कऽहऄ थोर सबि त़सी॥

ऱयूँ सिभ़यूँ मिकिरु कर लान्द्ह़। बदनि ऽबलोदक मिकिटि सम
कीन्द्ह़॥3॥
भ़ि़थग:-मंगलों के मील श्रा ऱमचन्द्रजा ऽजनके पित्र हैं, ईनके
ऽलए जो कि छ कह़ ज़ए सब थोड़ है। ऱज़ ने सि़भ़ऽिक हा
ह़थ में दपगण ले ऽलय़ और ईसमें ऄपऩ मिूँह देखकर मिकिट को
साध़ दकय़॥3॥
* श्रिन समाप भए ऽसत के स़। मनहुूँ जरठपनि ऄस ईपदेस़॥
नुप जिबऱजि ऱम कहुूँ देह। जािन जनम ल़हु दकन लेह॥4॥
भ़ि़थग:-(देख़ दक) क़नों के प़स ब़ल सफे द हो गए हैं, म़नो
बिढ़़प़ ऐस़ ईपदेश कर रह़ है दक हे ऱजन्! श्रा ऱमचन्द्रजा
को यििऱज पद देकर ऄपने जािन और जन्द्म क़ ल़भ क्यों
नहीं लेते॥4॥
दोह़ :
* यह ऽबच़रु ईर अऽन नुप सिददनि सिऄिसरु प़आ।
प्रेम पिलदक तन मिददत मन गिरऽह सिऩयई ज़आ॥2॥
भ़ि़थग:-हृदय में यह ऽिच़र ल़कर (यििऱज पद देने क़ ऽनश्चय
कर) ऱज़ दशरथजा ने शिभ ददन और सिंदर समय प़कर, प्रेम
से पिलदकत शरार हो अनंदमग्न मन से ईसे गिरु िऽशष्ठजा को
ज़ सिऩय़॥2॥

चौप़इ :
* कहआ भिअलि सिऽनऄ मिऽनऩयक। भए ऱम सब ऽबऽध सब
ल़यक॥
सेिक सऽचि सकल पिरब़सा। जे हम़र ऄरर ऽमत्र ईद़सा॥1॥
भ़ि़थग:-ऱज़ ने कह़- हे मिऽनऱज! (कु पय़ यह ऽनिेदन) सिऽनए।
श्रा ऱमचन्द्रजा ऄब सब प्रक़र से सब योग्य हो गए हैं। सेिक,
मंत्रा, सब नगर ऽनि़सा और जो हम़रे शत्रि, ऽमत्र य़ ईद़सान
हैं-॥1॥
* सबऽह ऱमि ऽप्रय जेऽह ऽबऽध मोहा। प्रभि ऄसास जनि तनि धरर
सोहा॥
ऽबप्र सऽहत पररि़र गोस़ईं। करवह छोहु सब रौररऽह ऩईं॥2॥
भ़ि़थग:-सभा को श्रा ऱमचन्द्र िैसे हा ऽप्रय हैं, जैसे िे मिझको
हैं। (ईनके रूप में) अपक़ अशाि़गद हा म़नो शरार ध़रण
करके शोऽभत हो रह़ है। हे सि़मा! स़रे ब्ऱह्मण, पररि़र
सऽहत अपके हा सम़न ईन पर स्नेह करते हैं॥2॥
* जे गिर चरन रे नि ऽसर धरहीं। ते जनि सकल ऽबभि बस
करहीं॥
मोऽह सम यहु ऄनिभयई न दीजें। सबि प़यईूँ रज प़िऽन पीजें॥3॥

भ़ि़थग:-जो लोग गिरु के चरणों की रज को मसतक पर ध़रण
करते हैं, िे म़नो समसत ऐश्वयग को ऄपने िश में कर लेते हैं।
आसक़ ऄनिभि मेरे सम़न दीसरे दकसा ने नहीं दकय़। अपकी
पऽित्र चरण रज की पीज़ करके मैंने सब कि छ प़ ऽलय़॥3॥
* ऄब ऄऽभल़षि एकि मन मोरें । पीऽजऽह ऩथ ऄनिग्रह तोरें ॥
मिऽन प्रसन्न लऽख सहज सनेह। कहेई नरे स रज़यसि देह॥4॥
भ़ि़थग:-ऄब मेरे मन में एक हा ऄऽभल़ष़ है। हे ऩथ! िह भा
अप हा के ऄनिग्रह से पीरा होगा। ऱज़ क़ सहज प्रेम देखकर
मिऽन ने प्रसन्न होकर कह़- नरे श! अज्ञ़ दाऽजए (कऽहए, क्य़
ऄऽभल़ष़ है?)॥4॥
दोह़ :
* ऱजन ऱईर ऩमि जसि सब ऄऽभमत द़त़र।
फल ऄनिग़मा मऽहप मऽन मन ऄऽभल़षि तिम्ह़र॥3॥
भ़ि़थग:-हे ऱजन! अपक़ ऩम और यश हा सम्पीणग मनच़हा
िसतिओं को देने ि़ल़ है। हे ऱज़ओं के मिकिटमऽण! अपके मन
की ऄऽभल़ष़ फल क़ ऄनिगमन करता है (ऄथ़गत अपके आच्छ़
करने के पहले हा फल ईत्पन्न हो ज़त़ है)॥3॥
चौप़इ :

* सब ऽबऽध गिरु प्रसन्न ऽजयूँ ज़ना। बोलेई ऱई रहूँऽस मुद ि
ब़ना॥
ऩथ ऱमि कररऄवह जिबऱजी। कऽहऄ कु प़ करर कररऄ सम़जी॥1॥
भ़ि़थग:-ऄपने जा में गिरुजा को सब प्रक़र से प्रसन्न ज़नकर,
हर्तषत होकर ऱज़ कोमल ि़णा से बोले- हे ऩथ! श्रा ऱमचन्द्र
को यििऱज कीऽजए। कु प़ करके कऽहए (अज्ञ़ दाऽजए) तो
तैय़रा की ज़ए॥1॥
* मोऽह ऄछत यहु होआ ईछ़ह। लहवह लोग सब लोचन ल़ह॥
प्रभि प्रस़द ऽसि सबआ ऽनब़हीं। यह ल़लस़ एक मन म़हीं॥2॥
भ़ि़थग:-मेरे जाते जा यह अनंद ईत्सि हो ज़ए, (ऽजससे) सब
लोग ऄपने नेत्रों क़ ल़भ प्ऱप्त करें । प्रभि (अप) के प्रस़द से
ऽशिजा ने सब कि छ ऽनब़ह ददय़ (सब आच्छ़एूँ पीणग कर दीं),
के िल यहा एक ल़लस़ मन में रह गइ है॥2॥
* पिऽन न सोच तनि रहई दक ज़उ। जेवह न होआ प़छें
पऽछत़उ॥
सिऽन मिऽन दसरथ बचन सिह़ए। मंगल मोद मील मन भ़ए॥3॥
भ़ि़थग:-(आस ल़लस़ के पीणग हो ज़ने पर) दफर सोच नहीं,
शरार रहे य़ चल़ ज़ए, ऽजससे मिझे पाछे पछत़ि़ न हो।

दशरथजा के मंगल और अनंद के मील सिंदर िचन सिनकर मिऽन
मन में बहुत प्रसन्न हुए॥3॥
* सिनि नुप ज़सि ऽबमिख पऽछत़हीं। ज़सि भजन ऽबनि जरऽन न
ज़हीं॥
भयई तिम्ह़र तनय सोआ सि़मा। ऱमि पिनात प्रेम ऄनिग़मा॥4॥
भ़ि़थग:-(िऽशष्ठजा ने कह़-) हे ऱजन्! सिऽनए, ऽजनसे ऽिमिख
होकर लोग पछत़ते हैं और ऽजनके भजन ऽबऩ जा की जलन
नहीं ज़ता, िहा सि़मा (सिगलोक महेश्वर) श्रा ऱमजा अपके
पित्र हुए हैं, जो पऽित्र प्रेम के ऄनिग़मा हैं। (श्रा ऱमजा पऽित्र
प्रेम के पाछे-पाछे चलने ि़ले हैं, आसा से तो प्रेमिश अपके पित्र
हुए हैं।)॥4॥
दोह़ :
* बेऽग ऽबलंबि न कररऄ नुप स़ऽजऄ सबिआ सम़जि।
सिददन सिमंगलि तबवह जब ऱमि होवह जिबऱजि॥4॥
भ़ि़थग:-हे ऱजन्! ऄब देर न कीऽजए, शाघ्र सब स़म़न
सज़आए। शिभ ददन और सिंदर मंगल तभा है, जब श्रा
ऱमचन्द्रजा यििऱज हो ज़एूँ (ऄथ़गत ईनके ऄऽभषेक के ऽलए
सभा ददन शिभ और मंगलमय हैं)॥4॥

चौप़इ :
* मिददत महापऽत मंददर अए। सेिक सऽचि सिमंत्रि बोल़ए॥
कऽह जयजाि सास ऽतन्द्ह ऩए। भीप सिमंगल बचन सिऩए॥1॥
भ़ि़थग:-ऱज़ अनंददत होकर महल में अए और ईन्द्होंने सेिकों
को तथ़ मंत्रा सिमंत्र को बिलि़य़। ईन लोगों ने 'जय-जाि'
कहकर ऽसर नि़ए। तब ऱज़ ने सिंदर मंगलमय िचन (श्रा
ऱमजा को यििऱज पद देने क़ प्रसत़ि) सिऩए॥1॥
* जौं प़ूँचऽह मत ल़गै नाक़। करहु हरऽष ऽहयूँ ऱमऽह
टाक़॥2॥
भ़ि़थग:-(और कह़-) यदद पंचों को (अप सबको) यह मत ऄच्छ़
लगे, तो हृदय में हर्तषत होकर अप लोग श्रा ऱमचन्द्र क़
ऱजऽतलक कीऽजए॥2॥
* मंत्रा मिददत सिनत ऽप्रय ब़ना। ऄऽभमत ऽबरिूँ परे ई जनि
प़ना॥
ऽबनता सऽचि करवह कर जोरा। ऽजऄहु जगतपऽत बररस
करोरा॥3॥
भ़ि़थग:-आस ऽप्रय ि़णा को सिनते हा मंत्रा ऐसे अनंददत हुए
म़नो ईनके मनोरथ रूपा पौधे पर प़ना पड गय़ हो। मंत्रा

ह़थ जोडकर ऽिनता करते हैं दक हे जगत्पऽत! अप करोडों िषग
ऽजएूँ॥3॥
* जग मंगल भल क़जि ऽबच़ऱ। बेऽगऄ ऩथ न ल़आऄ ब़ऱ॥
नुपऽह मोदि सिऽन सऽचि सिभ़ष़। बढ़त बौंड जनि लहा
सिस़ख़॥4॥
भ़ि़थग:-अपने जगतभर क़ मंगल करने ि़ल़ भल़ क़म सोच़
है। हे ऩथ! शाघ्रत़ कीऽजए, देर न लग़आए। मंऽत्रयों की सिद
ं र
ि़णा सिनकर ऱज़ को ऐस़ अनंद हुअ म़नो बढ़ता हुइ बेल
सिंदर ड़ला क़ सह़ऱ प़ गइ हो॥4॥
दोह़ :
* कहेई भीप मिऽनऱज कर जोआ जोआ अयसि होआ।
ऱम ऱज ऄऽभषेक ऽहत बेऽग करहु सोआ सोआ॥5॥
भ़ि़थग:-ऱज़ ने कह़- श्रा ऱमचन्द्र के ऱज्य़ऽभषेक के ऽलए
मिऽनऱज िऽशष्ठजा की जो-जो अज्ञ़ हो, अप लोग िहा सब
तिरंत करें ॥5॥
चौप़इ :
* हरऽष मिनास कहेई मुद ि ब़ना। अनहु सकल सितारथ प़ना॥
औषध मील फी ल फल प़ऩ। कहे ऩम गऽन मंगल ऩऩ॥1॥

भ़ि़थग:-मिऽनऱज ने हर्तषत होकर कोमल ि़णा से कह़ दक
सम्पीणग श्रेष्ठ ताथों क़ जल ले अओ। दफर ईन्द्होंने औषऽध, मील,
फी ल, फल और पत्र अदद ऄनेकों म़ंगऽलक िसतिओं के ऩम
ऽगनकर बत़ए॥1॥
* च़मर चरम बसन बहु भ़ूँता। रोम प़ट पट ऄगऽनत ज़ता॥
मऽनगन मंगल बसति ऄनेक़। जो जग जोगि भीप ऄऽभषेक़॥2॥
भ़ि़थग:-चूँिर, मुगचमग, बहुत प्रक़र के िस्त्र, ऄसंख्यों ज़ऽतयों के
उना और रे शमा कपडे, (ऩऩ प्रक़र की) मऽणय़ूँ (रत्न) तथ़
और भा बहुत सा मंगल िसतिएूँ, जो जगत में ऱज्य़ऽभषेक के
योग्य होता हैं, (सबको मूँग़ने की ईन्द्होंने अज्ञ़ दा)॥2॥
* बेद ऽबददत कऽह सकल ऽबध़ऩ। कहेई रचहु पिर ऽबऽबध
ऽबत़ऩ॥
सफल रस़ल पीगफल के ऱ। रोपहु बाऽथन्द्ह पिर चहुूँ फे ऱ॥3॥
भ़ि़थग:-मिऽन ने िेदों में कह़ हुअ सब ऽिध़न बत़कर कह़नगर में बहुत से मंडप (चूँदोिे) सज़ओ। फलों समेत अम,
सिप़रा और के ले के िुक्ष नगर की गऽलयों में च़रों ओर रोप
दो॥3॥
* रचहु मंजि मऽन चौकें च़रू। कहहु बऩिन बेऽग बज़रू॥

पीजहु गनपऽत गिर कि लदेि़। सब ऽबऽध करहु भीऽमसिर सेि़॥4॥
भ़ि़थग:-सिंदर मऽणयों के मनोहर चौक पिरि़ओ और ब़ज़र को
तिरंत सज़ने के ऽलए कह दो। श्रा गणेशजा, गिरु और कि लदेित़
की पीज़ करो और भीदि
े ब्ऱह्मणों की सब प्रक़र से सेि़
करो॥4॥
दोह़ :
* ध्िज पत़क तोरन कलस सजहु तिरग रथ ऩग।
ऽसर धरर मिऽनबर बचन सबि ऽनज ऽनज क़जवह ल़ग॥6॥
भ़ि़थग:-ध्िज़, पत़क़, तोरण, कलश, घोडे, रथ और ह़था
सबको सज़ओ! मिऽन श्रेष्ठ िऽशष्ठजा के िचनों को ऽशरोध़यग
करके सब लोग ऄपने-ऄपने क़म में लग गए॥6॥
चौप़इ :
* जो मिनास जेऽह अयसि दान्द्ह़। सो तेवह क़जि प्रथम जनि
कीन्द्ह़॥
ऽबप्र स़धि सिर पीजत ऱज़। करत ऱम ऽहत मंगल क़ज़॥1॥
भ़ि़थग:-मिनाश्वर ने ऽजसको ऽजस क़म के ऽलए अज्ञ़ दा, ईसने
िह क़म (आतना शाघ्रत़ से कर ड़ल़ दक) म़नो पहले से हा

कर रख़ थ़। ऱज़ ब्ऱह्मण, स़धि और देित़ओं को पीज रहे हैं
और श्रा ऱमचन्द्रजा के ऽलए सब मंगल क़यग कर रहे हैं॥1॥
* सिनत ऱम ऄऽभषेक सिह़ि़। ब़ज गह़गह ऄिध बध़ि़॥
ऱम साय तन सगिन जऩए। फरकवह मंगल ऄंग सिह़ए॥2॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचन्द्रजा के ऱज्य़ऽभषेक की सिह़िना खबर सिनते
हा ऄिधभर में बडा धीम से बध़िे बजने लगे। श्रा ऱमचन्द्रजा
और सात़जा के शरार में भा शिभ शकि न सीऽचत हुए। ईनके
सिंदर मंगल ऄंग फडकने लगे॥2॥
* पिलदक सप्रेम परसपर कहहीं। भरत अगमनि सीचक ऄहहीं॥
भए बहुत ददन ऄऽत ऄिसेरा। सगिन प्रताऽत भेंट ऽप्रय के रा॥3॥
भ़ि़थग:-पिलदकत होकर िे दोनों प्रेम सऽहत एक-दीसरे से कहते हैं
दक ये सब शकि न भरत के अने की सीचऩ देने ि़ले हैं। (ईनको
म़म़ के घर गए) बहुत ददन हो गए, बहुत हा ऄिसेर अ रहा
है (ब़र-ब़र ईनसे ऽमलने की मन में अता है) शकि नों से ऽप्रय
(भरत) के ऽमलने क़ ऽिश्व़स होत़ है॥3॥
* भरत सररस ऽप्रय को जग म़हीं। आहआ सगिन फलि दीसर ऩहीं॥
ऱमऽह बंधि सोच ददन ऱता। ऄंडऽन्द्ह कमठ हृदय जेऽह भ़ूँता॥4॥

भ़ि़थग:-और भरत के सम़न जगत में (हमें) कौन प्य़ऱ है!
शकि न क़ बस, यहा फल है, दीसऱ नहीं। श्रा ऱमचन्द्रजा को
(ऄपने) भ़इ भरत क़ ददन-ऱत ऐस़ सोच रहत़ है जैस़ कछि ए
क़ हृदय ऄंडों में रहत़ है॥4॥
दोह़ :
* एऽह ऄिसर मंगलि परम सिऽन रहूँसेई रऽनि़सि।
सोभत लऽख ऽबधि बढ़त जनि ब़ररऽध बाऽच ऽबल़सि॥7॥
भ़ि़थग:-आसा समय यह परम मंगल सम़च़र सिनकर स़ऱ
रऽनि़स हर्तषत हो ईठ़। जैसे चन्द्रम़ को बढ़ते देखकर समिर में
लहरों क़ ऽिल़स (अनंद) सिशोऽभत होत़ है॥7॥
चौप़इ :
* प्रथम ज़आ ऽजन्द्ह बचन सिऩए। भीषन बसन भीरर ऽतन्द्ह प़ए॥
प्रेम पिलदक तन मन ऄनिऱगीं। मंगल कलस सजन सब ल़गीं॥1॥
भ़ि़थग:-सबसे पहले (रऽनि़स में) ज़कर ऽजन्द्होंने ये िचन
(सम़च़र) सिऩए, ईन्द्होंने बहुत से अभीषण और िस्त्र प़ए।
ऱऽनयों क़ शरार प्रेम से पिलदकत हो ईठ़ और मन प्रेम में मग्न
हो गय़। िे सब मंगल कलश सज़ने लगीं॥1॥
* चौकें च़रु सिऽमत्ऱूँ पीरा। मऽनमय ऽबऽबध भ़ूँऽत ऄऽत रूरा॥

अनूँद मगन ऱम महत़रा। ददए द़न बहु ऽबप्र हूँक़रा॥2॥
भ़ि़थग:-सिऽमत्ऱजा ने मऽणयों (रत्नों) के बहुत प्रक़र के ऄत्यन्द्त
सिंदर और मनोहर चौक पीरे। अनंद में मग्न हुइ श्रा ऱमचन्द्रजा
की म़त़ कौसल्य़जा ने ब्ऱह्मणों को बिल़कर बहुत द़न
ददए॥2॥
* पीजीं ग्ऱमदेऽब सिर ऩग़। कहेई बहोरर देन बऽलभ़ग़॥
जेऽह ऽबऽध होआ ऱम कल्य़नी। देहु दय़ करर सो बरद़नी॥3॥
भ़ि़थग:-ईन्द्होंने ग्ऱमदेऽियों, देित़ओं और ऩगों की पीज़ की
और दफर बऽल भेंट देने को कह़ (ऄथ़गत क़यग ऽसि होने पर
दफर पीज़ करने की मनौता म़ना) और प्ऱथगऩ की दक ऽजस
प्रक़र से श्रा ऱमचन्द्रजा क़ कल्य़ण हो, दय़ करके िहा
िरद़न दाऽजए॥3॥
*ग़िवह मंगल कोदकलबयनीं। ऽबधिबदनीं मुगस़िकनयनीं॥4॥
भ़ि़थग:-कोयल की सा माठा ि़णा ि़ला, चन्द्रम़ के सम़न मिख
ि़ला और ऽहरन के बच्चे के से नेत्रों ि़ला ऽस्त्रय़ूँ मंगलग़न
करने लगीं॥4॥
दोह़ :
* ऱम ऱज ऄऽभषेकि सिऽन ऽहयूँ हरषे नर ऩरर।

लगे सिमंगल सजन सब ऽबऽध ऄनिकील ऽबच़रर॥8॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचन्द्रजा क़ ऱज्य़ऽभषेक सिनकर सभा स्त्रा-पिरुष
हृदय में हर्तषत हो ईठे और ऽिध़त़ को ऄपने ऄनिकील समझकर
सब सिंदर मंगल स़ज सज़ने लगे॥8॥
चौप़इ :
* तब नरऩहूँ बऽसष्ठि बोल़ए। ऱमध़म ऽसख देन पठ़ए॥
गिर अगमनि सिनत रघिऩथ़। ि़र अआ पद ऩयई म़थ़॥1॥
भ़ि़थग:-तब ऱज़ ने िऽशष्ठजा को बिल़य़ और ऽशक्ष़
(समयोऽचत ईपदेश) देने के ऽलए श्रा ऱमचन्द्रजा के महल में
भेज़। गिरु क़ अगमन सिनते हा श्रा रघिऩथजा ने दरि़जे पर
अकर ईनके चरणों में मसतक नि़य़।1॥
* स़दर ऄरघ देआ घर अने। सोरह भ़ूँऽत पीऽज सनम़ने॥
गहे चरन ऽसय सऽहत बहोरा। बोले ऱमि कमल कर जोरा॥2॥
भ़ि़थग:-अदरपीिगक ऄर्घयग देकर ईन्द्हें घर में ल़ए और
षोडशोपच़र से पीज़ करके ईनक़ सम्म़न दकय़। दफर सात़जा
सऽहत ईनके चरण सपशग दकए और कमल के सम़न दोनों ह़थों
को जोडकर श्रा ऱमजा बोले-॥2॥
* सेिक सदन सि़ऽम अगमनी। मंगल मील ऄमंगल दमनी॥

तदऽप ईऽचत जनि बोऽल सप्राता। पठआऄ क़ज ऩथ ऄऽस
नाता॥3॥
भ़ि़थग:-यद्यऽप सेिक के घर सि़मा क़ पध़रऩ मंगलों क़ मील
और ऄमंगलों क़ ऩश करने ि़ल़ होत़ है, तथ़ऽप हे ऩथ!
ईऽचत तो यहा थ़ दक प्रेमपीिगक द़स को हा क़यग के ऽलए बिल़
भेजते, ऐसा हा नाऽत है॥3॥
* प्रभित़ तऽज प्रभि कीन्द्ह सनेह। भयई पिनात अजि यहु गेह॥
अयसि होआ सो करौं गोस़ईं। सेिकि लआह सि़ऽम सेिक़ईं॥4॥
भ़ि़थग:-परन्द्ति प्रभि (अप) ने प्रभित़ छोडकर (सियं यह़ूँ
पध़रकर) जो स्नेह दकय़, आससे अज यह घर पऽित्र हो गय़!
हे गोस़ईं! (ऄब) जो अज्ञ़ हो, मैं िहा करूूँ। सि़मा की सेि़
में हा सेिक क़ ल़भ है॥4॥
दोह़ :
* सिऽन सनेह स़ने बचन मिऽन रघिबरऽह प्रसंस।
ऱम कस न तिम्ह कहहु ऄस हंस बंस ऄितंस॥9॥
भ़ि़थग:-(श्रा ऱमचन्द्रजा के ) प्रेम में सने हुए िचनों को सिनकर
मिऽन िऽशष्ठजा ने श्रा रघिऩथजा की प्रशंस़ करते हुए कह़ दक
हे ऱम! भल़ अप ऐस़ क्यों न कहें। अप सीयि
ग ंश के भीषण जो
हैं॥9॥

चौप़इ :
* बरऽन ऱम गिन सालि सिभ़उ। बोले प्रेम पिलदक मिऽनऱउ॥
भीप सजेई ऄऽभषेक सम़जी। च़हत देन तिम्हऽह जिबऱजी॥1॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचन्द्रजा के गिण, शाल और सिभ़ि क़ बख़न
कर, मिऽनऱज प्रेम से पिलदकत होकर बोले- (हे ऱमचन्द्रजा!)
ऱज़ (दशरथजा) ने ऱज्य़ऽभषेक की तैय़रा की है। िे अपको
यििऱज पद देऩ च़हते हैं॥1॥
* ऱम करहु सब संजम अजी। जौं ऽबऽध कि सल ऽनब़है क़जी॥
गिरु ऽसख देआ ऱय पवह गयउ। ऱम हृदयूँ ऄस ऽबसमई
भयउ॥2॥
भ़ि़थग:-(आसऽलए) हे ऱमजा! अज अप (ईपि़स, हिन अदद
ऽिऽधपीिगक) सब संयम कीऽजए, ऽजससे ऽिध़त़ कि शलपीिगक आस
क़म को ऽनब़ह दें (सफल कर दें)। गिरुजा ऽशक्ष़ देकर ऱज़
दशरथजा के प़स चले गए। श्रा ऱमचन्द्रजा के हृदय में (यह
सिनकर) आस ब़त क़ खेद हुअ दक-॥2॥
* जनमे एक संग सब भ़इ। भोजन सयन के ऽल लररक़इ॥
करनबेध ईपबात ऽबअह़। संग संग सब भए ईछ़ह़॥3॥

भ़ि़थग:-हम सब भ़इ एक हा स़थ जन्द्मे, ख़ऩ, सोऩ,
लडकपन के खेल-की द, कनछेदन, यज्ञोपिात और ऽिि़ह अदद
ईत्सि सब स़थ-स़थ हा हुए॥3॥
* ऽबमल बंस यहु ऄनिऽचत एकी । बंधि ऽबह़आ बडेऽह ऄऽभषेकी॥
प्रभि सप्रेम पऽछत़ऽन सिह़इ। हरई भगत मन कै कि रटल़इ॥4॥
भ़ि़थग:-पर आस ऽनमगल िंश में यहा एक ऄनिऽचत ब़त हो रहा
है दक और सब भ़आयों को छोडकर ऱज्य़ऽभषेक एक बडे क़
हा (मेऱ हा) होत़ है। (तिलसाद़सजा कहते हैं दक) प्रभि श्रा
ऱमचन्द्रजा क़ यह सिंदर प्रेमपीणग पछत़ि़ भक्तों के मन की
कि रटलत़ को हरण करे ॥4॥
दोह़ :
*तेऽह ऄिसर अए लखन मगन प्रेम अनंद।
सनम़ने ऽप्रय बचन कऽह रघिकिल कै रि चंद॥10॥
भ़ि़थग:-ईसा समय प्रेम और अनंद में मग्न लक्ष्मणजा अए।
रघिकिल रूपा कि मिद के ऽखल़ने ि़ले चन्द्रम़ श्रा ऱमचन्द्रजा ने
ऽप्रय िचन कहकर ईनक़ सम्म़न दकय़॥10॥
चौप़इ :
* ब़जवह ब़जने ऽबऽबध ऽबध़ऩ। पिर प्रमोदि नवह ज़आ बख़ऩ॥

भरत अगमनि सकल मऩिवह। अिहुूँ बेऽग नयन फलि प़िवह॥1॥
भ़ि़थग:-बहुत प्रक़र के ब़जे बज रहे हैं। नगर के ऄऽतशय
अनंद क़ िणगन नहीं हो सकत़। सब लोग भरतजा क़ अगमन
मऩ रहे हैं और कह रहे हैं दक िे भा शाघ्र अिें और
(ऱज्य़ऽभषेक क़ ईत्सि देखकर) नेत्रों क़ फल प्ऱप्त करें ॥1॥
* ह़ट ब़ट घर गलीं ऄथ़ईं। कहवह परसपर लोग लोग़ईं॥
क़ऽल लगन भऽल के ऽतक ब़ऱ। पीऽजऽह ऽबऽध ऄऽभल़षि
हम़ऱ॥2॥
भ़ि़थग:-ब़ज़र, ऱसते, घर, गला और चबीतरों पर (जह़ूँ-तह़ूँ)
पिरुष और स्त्रा अपस में यहा कहते हैं दक कल िह शिभ लग्न
(मिहतग) दकतने समय है, जब ऽिध़त़ हम़रा ऄऽभल़ष़ पीरा
करें गे॥2॥
* कनक वसघ़सन साय समेत़। बैठवह ऱमि होआ ऽचत चेत़॥
सकल कहवह कब होआऽह क़ला। ऽबघन मऩिवह देि कि च़ला॥3॥
भ़ि़थग:-जब सात़जा सऽहत श्रा ऱमचन्द्रजा सििणग के वसह़सन
पर ऽिऱजेंगे और हम़ऱ मनचात़ होग़ (मनःक़मऩ पीरा
होगा)। आधर तो सब यह कह रहे हैं दक कल कब होग़, ईधर
कि चक्री देित़ ऽिघ्न मऩ रहे हैं॥3॥

* ऽतन्द्हऽह सोह़आ न ऄिध बध़ि़। चोरऽह चंददऽन ऱऽत न
भ़ि़॥
स़रद बोऽल ऽबनय सिर करहीं। ब़रवह ब़र प़य लै परहीं॥4॥
भ़ि़थग:-ईन्द्हें (देित़ओं को) ऄिध के बध़िे नहीं सिह़ते, जैसे
चोर को च़ूँदना ऱत नहीं भ़ता। सरसिताजा को बिल़कर देित़
ऽिनय कर रहे हैं और ब़र-ब़र ईनके पैरों को पकडकर ईन पर
ऽगरते हैं॥4॥
दोह़ :
* ऽबपऽत हम़रर ऽबलोदक बऽड म़ति कररऄ सोआ अजि।
ऱमि ज़वह बन ऱजि तऽज होआ सकल सिरक़जि॥11॥
भ़ि़थग:-(िे कहते हैं-) हे म़त़! हम़रा बडा ऽिपऽि को देखकर
अज िहा कीऽजए ऽजससे श्रा ऱमचन्द्रजा ऱज्य त्य़गकर िन को
चले ज़एूँ और देित़ओं क़ सब क़यग ऽसि हो॥11॥
चौप़इ :
* सिऽन सिर ऽबनय ठ़दढ़ पऽछत़ता। भआईूँ सरोज ऽबऽपन
ऽहमऱता॥
देऽख देि पिऽन कहवह ऽनहोरा। म़ति तोऽह नवह थोररई खोरा॥1॥

भ़ि़थग:-देित़ओं की ऽिनता सिनकर सरसिताजा खडा-खडा पछत़
रहा हैं दक (ह़य!) मैं कमलिन के ऽलए हेमंत ऊति की ऱत
हुइ। ईन्द्हें आस प्रक़र पछत़ते देखकर देित़ ऽिनय करके कहने
लगे- हे म़त़! आसमें अपको जऱ भा दोष न लगेग़॥1॥
* ऽबसमय हरष रऽहत रघिऱउ। तिम्ह ज़नहु सब ऱम प्रभ़उ॥
जाि करम बस सिख दिख भ़गा। ज़आऄ ऄिध देि ऽहत
ल़गा॥2॥
भ़ि़थग:-श्रा रघिऩथजा ऽिष़द और हषग से रऽहत हैं। अप तो
श्रा ऱमजा के सब प्रभ़ि को ज़नता हा हैं। जाि ऄपने कमगिश
हा सिख-दिःख क़ भ़गा होत़ है। ऄतएि देित़ओं के ऽहत के
ऽलए अप ऄयोध्य़ ज़आए॥2॥
* ब़र ब़र गऽह चरन सूँकोचा। चला ऽबच़रर ऽबबिध मऽत
पोचा॥
उूँच ऽनि़सि नाऽच करतीता। देऽख न सकवह पऱआ ऽबभीता॥3॥
भ़ि़थग:-ब़र-ब़र चरण पकडकर देित़ओं ने सरसिता को संकोच
में ड़ल ददय़। तब िे यह ऽिच़रकर चलीं दक देित़ओं की
बिऽि ओछा है। आनक़ ऽनि़स तो उूँच़ है, पर आनकी करना
नाचा है। ये दीसरे क़ ऐश्वयग नहीं देख सकते॥3॥
* अऽगल क़जि ऽबच़रर बहोरा। कररहवह च़ह कि सल कऽब
मोरा॥

हरऽष हृदयूँ दसरथ पिर अइ। जनि ग्रह दस़ दिसह दिखद़इ॥4॥
भ़ि़थग:-परन्द्ति अगे के क़म क़ ऽिच़र करके (श्रा ऱमजा के
िन ज़ने से ऱक्षसों क़ िध होग़, ऽजससे स़ऱ जगत सिखा हो
ज़एग़) चतिर कऽि (श्रा ऱमजा के िनि़स के चररत्रों क़ िणगन
करने के ऽलए) मेरा च़ह (क़मऩ) करें गे। ऐस़ ऽिच़र कर
सरसिता हृदय में हर्तषत होकर दशरथजा की पिरा ऄयोध्य़ में
अईं, म़नो दिःसह दिःख देने ि़ला कोइ ग्रहदश़ अइ हो॥4॥

सरसिता क़ मन्द्थऱ की बिऽि फे रऩ, कै के या-मन्द्थऱ संि़द, प्रज़
में खिशा
दोह़ :
* ऩमि मंथऱ मंदमऽत चेरा कै कआ के रर।
ऄजस पेट़रा त़ऽह करर गइ ऽगऱ मऽत फे रर॥12॥
भ़ि़थग:-मन्द्थऱ ऩम की कै के इ की एक मंदबिऽि द़सा था, ईसे
ऄपयश की ऽपट़रा बऩकर सरसिता ईसकी बिऽि को फे रकर
चला गईं॥12॥
चौप़इ :
* दाख मंथऱ नगरु बऩि़। मंजल
ि मंगल ब़ज बध़ि़॥
पीछेऽस लोगन्द्ह क़ह ईछ़ह। ऱम ऽतलकि सिऽन भ़ ईर द़ह॥1॥

भ़ि़थग:-मंथऱ ने देख़ दक नगर सज़य़ हुअ है। सिंदर मंगलमय
बध़िे बज रहे हैं। ईसने लोगों से पीछ़ दक कै स़ ईत्सि है?
(ईनसे) श्रा ऱमचन्द्रजा के ऱजऽतलक की ब़त सिनते हा ईसक़
हृदय जल ईठ़॥1॥
* करआ ऽबच़रु कि बिऽि कि ज़ता। होआ ऄक़जि किऽन ऽबऽध ऱता॥
देऽख ल़ऽग मधि कि रटल दकऱता। ऽजऽम गिूँ तकआ लेईूँ के ऽह
भ़ूँता॥2॥
भ़ि़थग:-िह दिबिगऽि, नाच ज़ऽत ि़ला द़सा ऽिच़र करने लगा
दक दकस प्रक़र से यह क़म ऱत हा ऱत में ऽबगड ज़ए, जैसे
कोइ कि रटल भालना शहद क़ छि़ लग़ देखकर घ़त लग़ता है
दक आसको दकस तरह से ईख़ड लीूँ॥2॥
* भरत म़ति पवह गआ ऽबलख़ना। क़ ऄनमऽन हऽस कह हूँऽस
ऱना॥
उतरु देआ न लेआ ईस़सी। ऩरर चररत करर ढ़रआ अूँसी॥3॥
भ़ि़थग:-िह ईद़स होकर भरतजा की म़त़ कै के या के प़स गइ।
ऱना कै के या ने हूँसकर कह़- ती ईद़स क्यों है? मंथऱ कि छ
ईिर नहीं देता, के िल लंबा स़ूँस ले रहा है और ऽत्रय़चररत्र
करके अूँसी ढरक़ रहा है॥3॥

* हूँऽस कह ऱऽन ग़लि बड तोरें । दान्द्ह लखन ऽसख ऄस मन
मोरें ॥
तबहुूँ न बोल चेरर बऽड प़ऽपऽन। छ़डआ सि़स क़रर जनि
स़ूँऽपऽन॥4॥
भ़ि़थग:-ऱना हूँसकर कहने लगा दक तेरे बडे ग़ल हैं (ती बहुत
बढ़-बढ़कर बोलने ि़ला है)। मेऱ मन कहत़ है दक लक्ष्मण ने
तिझे कि छ साख दा है (दण्ड ददय़ है)। तब भा िह मह़प़ऽपना
द़सा कि छ भा नहीं बोलता। ऐसा लंबा स़ूँस छोड रहा है, म़नो
क़ला ऩऽगन (फि फक़र छोड रहा) हो॥4॥
दोह़ :
* सभय ऱऽन कह कहऽस दकन कि सल ऱमि मऽहप़लि।
लखनि भरति ररपिदमनि सिऽन भ़ कि बरा ईर स़लि॥13॥
भ़ि़थग:-तब ऱना ने डरकर कह़- ऄरा! कहता क्यों नहीं? श्रा
ऱमचन्द्र, ऱज़, लक्ष्मण, भरत और शत्रिघ्न कि शल से तो हैं? यह
सिनकर कि बरा मंथऱ के हृदय में बडा हा पाड़ हुइ॥13॥
चौप़इ :
* कत ऽसख देआ हमऽह कोई म़इ। ग़लि करब के ऽह कर बलि
प़इ॥

ऱमऽह छ़ऽड कि सल के ऽह अजी। जेऽह जनेसि देआ जिबऱजी॥1॥
भ़ि़थग:-(िह कहने लगा-) हे म़इ! हमें कोइ क्यों साख देग़
और मैं दकसक़ बल प़कर ग़ल करूूँगा (बढ़-बढ़कर बोलीूँगा)।
ऱमचन्द्र को छोडकर अज और दकसकी कि शल है, ऽजन्द्हें ऱज़
यििऱज पद दे रहे हैं॥1॥
* भयई कौऽसलऽह ऽबऽध ऄऽत द़ऽहन। देखत गरब रहत ईर
ऩऽहन॥
देखहु कस न ज़आ सब सोभ़। जो ऄिलोदक मोर मनि छोभ़॥2॥
भ़ि़थग:-अज कौसल्य़ को ऽिध़त़ बहुत हा द़ऽहने (ऄनिकील)
हुए हैं, यह देखकर ईनके हृदय में गिग सम़त़ नहीं। तिम सियं
ज़कर सब शोभ़ क्यों नहीं देख लेतीं, ऽजसे देखकर मेरे मन में
क्षोभ हुअ है॥2॥
* पीति ऽबदेस न सोचि तिम्ह़रें । ज़नऽत हहु बस ऩहु हम़रें ॥
नाद बहुत ऽप्रय सेज तिऱइ। लखहु न भीप कपट चतिऱइ॥3॥
भ़ि़थग:-तिम्ह़ऱ पित्र परदेस में है, तिम्हें कि छ सोच नहीं। ज़नता
हो दक सि़मा हम़रे िश में हैं। तिम्हें तो तोशक-पलूँग पर पडेपडे नींद लेऩ हा बहुत प्य़ऱ लगत़ है, ऱज़ की कपटभरा
चतिऱइ तिम नहीं देखतीं॥3॥

*सिऽन ऽप्रय बचन मऽलन मनि ज़ना। झिकी ऱऽन ऄब रहु
ऄरग़ना॥
पिऽन ऄस कबहुूँ कहऽस घरफोरा। तब धरर जाभ कढ़़िईूँ
तोरा॥4॥
भ़ि़थग:-मन्द्थऱ के ऽप्रय िचन सिनकर, दकन्द्ति ईसको मन की
मैला ज़नकर ऱना झिककर (ड़ूँटकर) बोला- बस, ऄब चिप रह
घरफोडा कहीं की! जो दफर कभा ऐस़ कह़ तो तेरा जाभ
पकडकर ऽनकलि़ लीूँगा॥4॥
दोह़ :
* क़ने खोरे की बरे कि रटल कि च़ला ज़ऽन।
ऽतय ऽबसेऽष पिऽनचेरर कऽह भरतम़ति मिसिक़ऽन॥14॥
भ़ि़थग:-क़नों, लंगडों और कि बडों को कि रटल और कि च़ला
ज़नऩ च़ऽहए। ईनमें भा स्त्रा और ख़सकर द़सा! आतऩ कहकर
भरतजा की म़त़ कै के या मिसकि ऱ दीं॥14॥
चौप़इ :
* ऽप्रयब़ददऽन ऽसख दाऽन्द्हईूँ तोहा। सपनेहुूँ तो पर कोपि न
मोहा॥
सिददनि सिमंगल द़यकि सोइ। तोर कह़ फि र जेऽह ददन होइ॥1॥

भ़ि़थग:-(और दफर बोलीं-) हे ऽप्रय िचन कहने ि़ला मंथऱ!
मैंने तिझको यह साख दा है (ऽशक्ष़ के ऽलए आतना ब़त कहा
है)। मिझे तिझ पर सिप्न में भा क्रोध नहीं है। सिंदर मंगलद़यक
शिभ ददन िहा होग़, ऽजस ददन तेऱ कहऩ सत्य होग़ (ऄथ़गत
श्रा ऱम क़ ऱज्यऽतलक होग़)॥1॥
* जेठ सि़ऽम सेिक लघि भ़इ। यह ददनकर कि ल राऽत सिह़इ॥
ऱम ऽतलकि जौं स़ूँचेहुूँ क़ला। देईूँ म़गि मन भ़ित अला॥2॥
भ़ि़थग:-बड़ भ़इ सि़मा और छोट़ भ़इ सेिक होत़ है। यह
सीयगिंश की सिह़िना राऽत हा है। यदद सचमिच कल हा श्रा ऱम
क़ ऽतलक है, तो हे सखा! तेरे मन को ऄच्छा लगे िहा िसति
म़ूँग ले, मैं दीग
ूँ ा॥2॥
* कौसल्य़ सम सब महत़रा। ऱमऽह सहज सिभ़यूँ ऽपअरा॥
मो पर करवह सनेहु ऽबसेषा। मैं करर प्राऽत पराछ़ देखा॥3॥
भ़ि़थग:-ऱम को सहज सिभ़ि से सब म़त़एूँ कौसल्य़ के
सम़न हा प्य़रा हैं। मिझ पर तो िे ऽिशेष प्रेम करते हैं। मैंने
ईनकी प्राऽत की पराक्ष़ करके देख ला है॥3॥
* जौं ऽबऽध जनमि देआ करर छोह। होहुूँ ऱम ऽसय पीत पितोह॥
प्ऱन तें ऄऽधक ऱमि ऽप्रय मोरें । ऽतन्द्ह कें ऽतलक छोभि कस
तोरें ॥4॥

भ़ि़थग:-जो ऽिध़त़ कु प़ करके जन्द्म दें तो (यह भा दें दक) श्रा
ऱमचन्द्र पित्र और सात़ बह हों। श्रा ऱम मिझे प्ऱणों से भा
ऄऽधक ऽप्रय हैं। ईनके ऽतलक से (ईनके ऽतलक की ब़त सिनकर)
तिझे क्षोभ कै स़?॥4॥
दोह़ :
* भरत सपथ तोऽह सत्य कहु पररहरर कपट दिऱई।
हरष समय ऽबसमई करऽस क़रन मोऽह सिऩई॥15॥
भ़ि़थग:- तिझे भरत की सौगंध है, छल-कपट छोडकर सच-सच
कह। ती हषग के समय ऽिष़द कर रहा है, मिझे आसक़ क़रण
सिऩ॥15॥
चौप़इ :
* एकवह ब़र अस सब पीजा। ऄब कछि कहब जाभ करर दीजा॥
फोरै जोगि कप़रु ऄभ़ग़। भलेई कहत दिख रईरे ऽह ल़ग़॥1॥
भ़ि़थग:-(मंथऱ ने कह़-) स़रा अश़एूँ तो एक हा ब़र कहने
में पीरा हो गईं। ऄब तो दीसरा जाभ लग़कर कि छ कहूँगा। मेऱ
ऄभ़ग़ कप़ल तो फोडने हा योग्य है, जो ऄच्छा ब़त कहने
पर भा अपको दिःख होत़ है॥1॥
* कहवह झीरठ फि रर ब़त बऩइ। ते ऽप्रय तिम्हऽह करुआ मैं म़इ॥

हमहुूँ कहऽब ऄब ठकि रसोह़ता। ऩवह त मौन रहब ददनि
ऱता॥2॥
भ़ि़थग:-जो झीठा-सच्चा ब़तें बऩकर कहते हैं, हे म़इ! िे हा
तिम्हें ऽप्रय हैं और मैं कडिा लगता हूँ! ऄब मैं भा ठकि रसिह़ता
(मिूँह देखा) कह़ करूूँगा। नहीं तो ददन-ऱत चिप रहूँगा॥2॥
* करर कि रूप ऽबऽध परबस कीन्द्ह़। बि़ सो लिऽनऄ लऽहऄ जो
दान्द्ह़॥
कोई नुप होई हमऽह क़ ह़ना। चेरर छ़ऽड ऄब होब दक
ऱना॥3॥
भ़ि़थग:-ऽिध़त़ ने कि रूप बऩकर मिझे परिश कर ददय़! (दीसरे
को क्य़ दोष) जो बोय़ सो क़टता हूँ, ददय़ सो प़ता हूँ। कोइ
भा ऱज़ हो, हम़रा क्य़ ह़ऽन है? द़सा छोडकर क्य़ ऄब मैं
ऱना होउूँगा! (ऄथ़गत ऱना तो होने से रहा)॥3॥
* ज़रै जोगि सिभ़ई हम़ऱ। ऄनभल देऽख न ज़आ तिम्ह़ऱ॥
त़तें कछि क ब़त ऄनिस़रा। छऽमऄ देऽब बऽड चीक हम़रा॥4॥
भ़ि़थग:-हम़ऱ सिभ़ि तो जल़ने हा योग्य है, क्योंदक तिम्ह़ऱ
ऄऽहत मिझसे देख़ नहीं ज़त़, आसऽलए कि छ ब़त चल़इ था,
दकन्द्ति हे देिा! हम़रा बडा भील हुइ, क्षम़ करो॥4॥

दोह़ :
* गीढ़ कपट ऽप्रय बचन सिऽन ताय ऄधरबिऽध ऱऽन।
सिरम़य़ बस बैररऽनऽह सिहृद ज़ऽन पऽतअऽन॥16॥
भ़ि़थग:-अध़ररऽहत (ऄऽसथर) बिऽि की स्त्रा और देित़ओं की
म़य़ के िश में होने के क़रण रहसययिक्त कपट भरे ऽप्रय िचनों
को सिनकर ऱना कै के या ने बैररन मन्द्थऱ को ऄपना सिहृद्
(ऄहैतिक ऽहत करने ि़ला) ज़नकर ईसक़ ऽिश्व़स कर
ऽलय़॥16॥
चौप़इ :
* स़दर पिऽन पिऽन पीूँछऽत ओहा। सबरा ग़न मुगा जनि मोहा॥
तऽस मऽत दफरा ऄहआ जऽस भ़बा। रहसा चेरर घ़त जनि
फ़बा॥1॥
भ़ि़थग:-ब़र-ब़र ऱना ईससे अदर के स़थ पीछ रहा है, म़नो
भालना के ग़न से ऽहरना मोऽहत हो गइ हो। जैसा भ़िा
(होनह़र) है, िैसा हा बिऽि भा दफर गइ। द़सा ऄपऩ द़ूँि
लग़ ज़नकर हर्तषत हुइ॥1॥
* तिम्ह पीूँछहु मैं कहत डेऱईूँ । धरे हु मोर घरफोरा ऩउूँ॥
सऽज प्रताऽत बहुऽबऽध गदढ़ छोला। ऄिध स़ढ़स़ता तब
बोला॥2॥

भ़ि़थग:-तिम पीछता हो, दकन्द्ति मैं कहते डरता हूँ, क्योंदक तिमने
पहले हा मेऱ ऩम घरफोडा रख ददय़ है। बहुत तरह से गढ़छोलकर, खीब ऽिश्व़स जम़कर, तब िह ऄयोध्य़ की स़ढ़ स़ता
(शऽन की स़ढ़े स़ता िषग की दश़ रूपा मंथऱ) बोला-॥2॥
* ऽप्रय ऽसय ऱमि कह़ तिम्ह ऱना। ऱमऽह तिम्ह ऽप्रय सो फि रर
ब़ना॥
रह़ प्रथम ऄब ते ददन बाते। समई दफरें ररपि होवह ऽपराते॥3॥
भ़ि़थग:-हे ऱना! तिमने जो कह़ दक मिझे सात़-ऱम ऽप्रय हैं और
ऱम को तिम ऽप्रय हो, सो यह ब़त सच्चा है, परन्द्ति यह ब़त
पहले था, िे ददन ऄब बात गए। समय दफर ज़ने पर ऽमत्र भा
शत्रि हो ज़ते हैं॥3॥
* भ़नि कमल कि ल पोषऽनह़ऱ। ऽबनि जल ज़रर करआ सोआ
छ़ऱ॥
जरर तिम्ह़रर चह सिऽत ईख़रा। रूूँधहु करर ईप़ई बर
ब़रा॥4॥
भ़ि़थग:-सीयग कमल के कि ल क़ प़लन करने ि़ल़ है, पर ऽबऩ
जल के िहा सीयग ईनको (कमलों को) जल़कर भसम कर देत़ है।
सौत कौसल्य़ तिम्ह़रा जड ईख़डऩ च़हता है। ऄतः ईप़य

रूपा श्रेष्ठ ब़ड (घेऱ) लग़कर ईसे रूूँध दो (सिरऽक्षत कर
दो)॥4॥
दोह़ :
* तिम्हऽह न सोचि सोह़ग बल ऽनज बस ज़नहु ऱई।
मन मलान मिूँह माठ नुपि ऱईर सरल सिभ़ई॥17॥
भ़ि़थग:-तिमको ऄपने सिह़ग के (झीठे) बल पर कि छ भा सोच
नहीं है, ऱज़ को ऄपने िश में ज़नता हो, दकन्द्ति ऱज़ मन के
मैले और मिूँह के माठे हैं! और अपक़ साध़ सिभ़ि है (अप
कपट-चतिऱइ ज़नता हा नहीं)॥17॥
चौप़इ :
* चतिर गूँभार ऱम महत़रा। बाचि प़आ ऽनज ब़त सूँि़रा॥
पठए भरति भीप नऽनऄईरें । ऱम म़ति मत ज़नब रईरें ॥1॥
भ़ि़थग:-ऱम की म़त़ (कौसल्य़) बडा चतिर और गंभार है
(ईसकी थ़ह कोइ नहीं प़त़)। ईसने मौक़ प़कर ऄपना ब़त
बऩ ला। ऱज़ ने जो भरत को नऽनह़ल भेज ददय़, ईसमें अप
बस ऱम की म़त़ की हा सल़ह समऽझए!॥1॥
* सेिवह सकल सिऽत मोऽह नाकें । गरऽबत भरत म़ति बल पा
कें ॥

स़लि तिमर कौऽसलऽह म़इ। कपट चतिर नवह होइ जऩइ॥2॥
भ़ि़थग:-(कौसल्य़ समझता है दक) और सब सौतें तो मेरा ऄच्छा
तरह सेि़ करता हैं, एक भरत की म़ूँ पऽत के बल पर गर्तित
रहता है! आसा से हे म़इ! कौसल्य़ को तिम बहुत हा स़ल
(खटक) रहा हो, दकन्द्ति िह कपट करने में चतिर है, ऄतः ईसके
हृदय क़ भ़ि ज़नने में नहीं अत़ (िह ईसे चतिरत़ से ऽछप़ए
रखता है)॥2॥
* ऱजऽह तिम्ह पर प्रेमि ऽबसेषा। सिऽत सिभ़ई सकआ नवह देखा॥
रऽच प्रपंचि भीपऽह ऄपऩइ। ऱम ऽतलक ऽहत लगन धऱइ॥3॥
भ़ि़थग:-ऱज़ क़ तिम पर ऽिशेष प्रेम है। कौसल्य़ सौत के
सिभ़ि से ईसे देख नहीं सकता, आसऽलए ईसने ज़ल रचकर
ऱज़ को ऄपने िश में करके , (भरत की ऄनिपऽसथऽत में) ऱम के
ऱजऽतलक के ऽलए लग्न ऽनश्चय कऱ ऽलय़॥3॥
* यह कि ल ईऽचत ऱम कहुूँ टाक़। सबऽह सोह़आ मोऽह सिरठ
नाक़॥
अऽगऽल ब़त समिऽझ डरु मोहा। देई दैई दफरर सो फलि
ओहा॥4॥
भ़ि़थग:-ऱम को ऽतलक हो, यह कि ल (रघिकिल) के ईऽचत हा है
और यह ब़त सभा को सिह़ता है और मिझे तो बहुत हा ऄच्छा

लगता है, परन्द्ति मिझे तो अगे की ब़त ऽिच़रकर डर लगत़ है।
दैि ईलटकर आसक़ फल ईसा (कौसल्य़) को दे॥4॥
दोह़ :
* रऽच पऽच कोरटक कि रटलपन कीन्द्हऽे स कपट प्रबोधि।
कऽहऽस कथ़ सत सिऽत कै जेऽह ऽबऽध ब़ढ़ ऽबरोधि॥18॥
भ़ि़थग:-आस तरह करोडों कि रटलपन की ब़तें गढ़-छोलकर मन्द्थऱ
ने कै के या को ईलट़-साध़ समझ़ ददय़ और सैकडों सौतों की
कह़ऽनय़ूँ आस प्रक़र (बऩ-बऩकर) कहीं ऽजस प्रक़र ऽिरोध
बढ़े॥18॥
चौप़इ :
* भ़िा बस प्रताऽत ईर अइ। पीूँछ ऱऽन पिऽन सपथ देि़इ॥
क़ पीूँछहु तिम्ह ऄबहुूँ न ज़ऩ। ऽनज ऽहत ऄनऽहत पसि
पऽहच़ऩ॥1॥
भ़ि़थग:-होनह़र िश कै के या के मन में ऽिश्व़स हो गय़। ऱना
दफर सौगंध ददल़कर पीछने लगा। (मंथऱ बोला-) क्य़ पीछता
हो? ऄरे , तिमने ऄब भा नहीं समझ़? ऄपने भले-बिरे को (ऄथि़
ऽमत्र-शत्रि को) तो पशि भा पहच़न लेते हैं॥1॥
* भयई प़खि ददन सजत सम़जी। तिम्ह प़इ सिऽध मोऽह सन
अजी॥

ख़आऄ पऽहररऄ ऱज तिम्ह़रें । सत्य कहें नवह दोषि हम़रें ॥2॥
भ़ि़थग:-पीऱ पखि़ड़ बात गय़ स़म़न सजते और तिमने खबर
प़इ है अज मिझसे! मैं तिम्ह़रे ऱज में ख़ता-पहनता हूँ, आसऽलए
सच कहने में मिझे कोइ दोष नहीं है॥2॥
* जौं ऄसत्य कछि कहब बऩइ। तौ ऽबऽध देआऽह हमऽह सज़इ॥
ऱमऽह ऽतलक क़ऽल जौं भयउ। तिम्ह कहुूँ ऽबपऽत बाजि ऽबऽध
बयउ॥3॥
भ़ि़थग:-यदद मैं कि छ बऩकर झीठ कहता होउूँगा तो ऽिध़त़
मिझे दंड देग़। यदद कल ऱम को ऱजऽतलक हो गय़ तो (समझ
रखऩ दक) तिम्ह़रे ऽलए ऽिध़त़ ने ऽिपऽि क़ बाज बो
ददय़॥3॥
* रे ख खूँच़आ कहईूँ बलि भ़षा। भ़ऽमऽन भआहु दीध कआ म़खा॥
जौं सित सऽहत करहु सेिक़इ। तौ घर रहहु न अन ईप़इ॥4॥
भ़ि़थग:-मैं यह ब़त लकीर खींचकर बलपीिगक कहता हूँ, हे
भ़ऽमना! तिम तो ऄब दीध की मक्खा हो गइ! (जैसे दीध में पडा
हुइ मक्खा को लोग ऽनक़लकर फें क देते हैं, िैसे हा तिम्हें भा
लोग घर से ऽनक़ल ब़हर करें गे) जो पित्र सऽहत (कौसल्य़ की)
च़करा बज़ओगा तो घर में रह सकोगा, (ऄन्द्यथ़ घर में रहने
क़) दीसऱ ईप़य नहीं॥4॥

दोह़ :
* करीूँ ऽबनतऽह दान्द्ह दिखि तिम्हऽह कौऽसल़ूँ देब।
भरति बंददगुह सेआहवह लखनि ऱम के नेब॥19॥
भ़ि़थग:-करी ने ऽिनत़ को दिःख ददय़ थ़, तिम्हें कौसल्य़ देगा।
भरत क़ऱग़र क़ सेिन करें गे (जेल की हि़ ख़एूँगे) और
लक्ष्मण ऱम के ऩयब (सहक़रा) होंगे॥19॥
चौप़इ :
* कै कयसित़ सिनत कटि ब़ना। कऽह न सकआ कछि सहऽम
सिख़ना॥
तन पसेई कदला ऽजऽम क़ूँपा। कि बरीं दसन जाभ तब च़ूँपा॥1॥
भ़ि़थग:-कै के या मन्द्थऱ की कडिा ि़णा सिनते हा डरकर सीख
गइ, कि छ बोल नहीं सकता। शरार में पसाऩ हो अय़ और िह
के ले की तरह क़ूँपने लगा। तब कि बरा (मंथऱ) ने ऄपना जाभ
द़ूँतों तले दब़इ (ईसे भय हुअ दक कहीं भऽिष्य क़ ऄत्यन्द्त
डऱिऩ ऽचत्र सिनकर कै के या के हृदय की गऽत न रुक ज़ए,
ऽजससे ईलट़ स़ऱ क़म हा ऽबगड ज़ए)॥1॥
* कऽह कऽह कोरटक कपट कह़ना। धारजि धरहु प्रबोऽधऽस ऱना॥

दफऱ करमि ऽप्रय ल़ऽग कि च़ला। बदकऽह सऱहआ म़ऽन
मऱला॥2॥
भ़ि़थग:-दफर कपट की करोडों कह़ऽनय़ूँ कह-कहकर ईसने ऱना
को खीब समझ़य़ दक धारज रखो! कै के या क़ भ़ग्य पलट गय़,
ईसे कि च़ल प्य़रा लगा। िह बगिला को हंऽसना म़नकर (िैररन
को ऽहत म़नकर) ईसकी सऱहऩ करने लगा॥2॥
* सिनि मंथऱ ब़त फि रर तोरा। दऽहऽन अूँऽख ऽनत फरकआ मोरा॥
ददन प्रऽत देखईूँ ऱऽत कि सपने। कहईूँ न तोऽह मोह बस
ऄपने॥3॥
भ़ि़थग:-कै के या ने कह़- मन्द्थऱ! सिन, तेरा ब़त सत्य है। मेरा
द़ऽहना अूँख ऽनत्य फडक़ करता है। मैं प्रऽतददन ऱत को बिरे
सिप्न देखता हूँ, दकन्द्ति ऄपने ऄज्ञ़निश तिझसे कहता नहीं॥3॥
* क़ह करौं सऽख सीध सिभ़उ। द़ऽहन ब़म न ज़नईूँ क़उ॥4॥
भ़ि़थग:-सखा! क्य़ करूूँ, मेऱ तो साध़ सिभ़ि है। मैं द़य़ूँब़य़ूँ कि छ भा नहीं ज़नता॥4॥
दोह़ :
* ऄपनें चलत न अजि लऽग ऄनभल क़हुक कीन्द्ह।
के वह ऄघ एकऽह ब़र मोऽह दैऄूँ दिसह दिखि दान्द्ह॥20॥

भ़ि़थग:-ऄपना चलते (जह़ूँ तक मेऱ िश चल़) मैंने अज तक
कभा दकसा क़ बिऱ नहीं दकय़। दफर न ज़ने दकस प़प से दैि
ने मिझे एक हा स़थ यह दिःसह दिःख ददय़॥20॥
चौप़इ :
* नैहर जनमि भरब बरु ज़इ। ऽजऄत न करऽब सिऽत सेिक़इ॥
ऄरर बस दैई ऽजअित ज़हा। मरनि नाक तेऽह जािन च़हा॥1॥
भ़ि़थग:-मैं भले हा नैहर ज़कर िहीं जािन ऽबत़ दीग
ूँ ा, पर
जाते जा सौत की च़करा नहीं करूूँगा। दैि ऽजसको शत्रि के िश
में रखकर ऽजल़त़ है, ईसके ऽलए तो जाने की ऄपेक्ष़ मरऩ हा
ऄच्छ़ है॥1॥ दान बचन कह बहुऽबऽध ऱना। सिऽन कि बरीं
ऽतयम़य़ ठ़ना॥
* दान बचन कह बहुऽबऽध ऱना। सिऽन कि बरीं ऽतयम़य़ ठ़ना॥
ऄस कस कहहु म़ऽन मन उऩ। सिखि सोह़गि तिम्ह कहुूँ ददन
दीऩ॥2॥
भ़ि़थग:-ऱना ने बहुत प्रक़र के दान िचन कहे। ईन्द्हें सिनकर
कि बरा ने ऽत्रय़ चररत्र फै ल़य़। (िह बोला-) तिम मन में ग्ल़ऽन
म़नकर ऐस़ क्यों कह रहा हो, तिम्ह़ऱ सिख-सिह़ग ददन-ददन
दीऩ होग़॥2॥

* जेवह ऱईर ऄऽत ऄनभल त़क़। सोआ प़आऽह यहु फलि
पररप़क़॥
जब तें कि मत सिऩ मैं सि़ऽमऽन। भीख न ब़सर नींद न
ज़ऽमऽन॥3॥
भ़ि़थग:-ऽजसने तिम्ह़रा बिऱइ च़हा है, िहा पररण़म में यह
(बिऱइ रूप) फल प़एगा। हे सि़ऽमऽन! मैंने जब से यह कि मत
सिऩ है, तबसे मिझे न तो ददन में कि छ भीख लगता है और न
ऱत में नींद हा अता है॥3॥
* पीूँछेईूँ गिऽनन्द्ह रे ख ऽतन्द्ह ख़ूँचा। भरत भिअल होवह यह स़ूँचा॥
भ़ऽमऽन करहु त कहौं ईप़उ। है तिम्हरीं सेि़ बस ऱउ॥4॥
भ़ि़थग:-मैंने ज्योऽतऽषयों से पीछ़, तो ईन्द्होंने रे ख़ खींचकर
(गऽणत करके ऄथि़ ऽनश्चयपीिगक) कह़ दक भरत ऱज़ होंगे, यह
सत्य ब़त है। हे भ़ऽमऽन! तिम करो तो ईप़य मैं बत़उूँ। ऱज़
तिम्ह़रा सेि़ के िश में हैं हा॥4॥
दोह़ :
* परईूँ की प तिऄ बचन पर सकईूँ पीत पऽत त्य़ऽग।
कहऽस मोर दिखि देऽख बड कस न करब ऽहत ल़ऽग॥21॥

भ़ि़थग:-(कै के या ने कह़-) मैं तेरे कहने से कि एूँ में ऽगर सकता
हूँ, पित्र और पऽत को भा छोड सकता हूँ। जब ती मेऱ बड़
भ़रा दिःख देखकर कि छ कहता है, तो भल़ मैं ऄपने ऽहत के
ऽलए ईसे क्यों न करूूँगा॥21॥
चौप़इ :
* कि बरीं करर कबिला कै के इ। कपट छि रा ईर प़हन टेइ॥
लखआ ऩ ऱऽन ऽनकट दिखि कै सें। चरआ हररत ऽतन बऽलपसि
जैसें॥1॥
भ़ि़थग:-कि बरा ने कै के या को (सब तरह से) कबील करि़कर
(ऄथ़गत बऽल पशि बऩकर) कपट रूप छि रा को ऄपने (कठोर)
हृदय रूपा पत्थर पर टेय़ (ईसकी ध़र को तेज दकय़)। ऱना
कै के या ऄपने ऽनकट के (शाघ्र अने ि़ले) दिःख को कै से नहीं
देखता, जैसे बऽल क़ पशि हरा-हरा घ़स चरत़ है। (पर यह
नहीं ज़नत़ दक मौत ऽसर पर ऩच रहा है।)॥1॥
* सिनत ब़त मुद ि ऄंत कठोरा। देऽत मनहुूँ मधि म़हुर घोरा॥
कहआ चेरर सिऽध ऄहआ दक ऩहीं। सि़ऽमऽन कऽहहु कथ़ मोऽह
प़हीं॥2॥
भ़ि़थग:-मन्द्थऱ की ब़तें सिनने में तो कोमल हैं, पर पररण़म में
कठोर (भय़नक) हैं। म़नो िह शहद में घोलकर जहर ऽपल़

रहा हो। द़सा कहता है- हे सि़ऽमऽन! तिमने मिझको एक कथ़
कहा था, ईसकी य़द है दक नहीं?॥2॥
* दिआ बरद़न भीप सन थ़ता। म़गहु अजि जिड़िहु छ़ता॥
सितऽह ऱजि ऱमऽह बनब़सी। देहु लेहु सब सिऽत हुल़सी॥3॥
भ़ि़थग:-तिम्ह़रे दो िरद़न ऱज़ के प़स धरोहर हैं। अज ईन्द्हें
ऱज़ से म़ूँगकर ऄपना छ़ता ठं डा करो। पित्र को ऱज्य और
ऱम को िनि़स दो और सौत क़ स़ऱ अनंद तिम ले लो॥3॥
* भीपऽत ऱम सपथ जब करइ। तब म़गेहु जेवह बचनि न टरइ॥
होआ ऄक़जि अजि ऽनऽस बातें। बचनि मोर ऽप्रय म़नेहु जा तें॥4॥
भ़ि़थग:-जब ऱज़ ऱम की सौगंध ख़ लें, तब िर म़ूँगऩ,
ऽजससे िचन न टलने प़िे। अज की ऱत बात गइ, तो क़म
ऽबगड ज़एग़। मेरा ब़त को हृदय से ऽप्रय (य़ प्ऱणों से भा
प्य़रा) समझऩ॥4॥

कै के या क़ कोपभिन में ज़ऩ
दोह़ :
* बड कि घ़ति करर प़तदकऽन कहेऽस कोपगुहूँ ज़हु।
क़जि सूँि़रे हु सजग सबि सहस़ जऽन पऽतअहु॥22॥॥
भ़ि़थग:-प़ऽपना मन्द्थऱ ने बडा बिरा घ़त लग़कर कह़कोपभिन में ज़ओ। सब क़म बडा स़िध़ना से बऩऩ, ऱज़
पर सहस़ ऽिश्व़स न कर लेऩ (ईनकी ब़तों में न अ
ज़ऩ)॥22॥
चौप़इ :

* कि बररऽह ऱऽन प्ऱनऽप्रय ज़ना। ब़र ब़र बिऽि बख़ना॥
तोऽह सम ऽहत न मोर संस़ऱ। बहे ज़त कइ भआऽस ऄध़ऱ॥1॥
भ़ि़थग:-कि बरा को ऱना ने प्ऱणों के सम़न ऽप्रय समझकर ब़रब़र ईसकी बडा बिऽि क़ बख़न दकय़ और बोला- संस़र में
मेऱ तेरे सम़न ऽहतक़रा और कोइ नहीं है। ती मिझे बहा ज़ता
हुइ के ऽलए सह़ऱ हुइ है॥1॥
* जौं ऽबऽध पिरब मनोरथि क़ला। करौं तोऽह चख पीतरर अला॥
बहुऽबऽध चेररऽह अदरु देइ। कोपभिन गिना कै के इ॥2॥
भ़ि़थग:-यदद ऽिध़त़ कल मेऱ मनोरथ पीऱ कर दें तो हे सखा!
मैं तिझे अूँखों की पितला बऩ लीूँ। आस प्रक़र द़सा को बहुत
तरह से अदर देकर कै के या कोपभिन में चला गइ॥।2॥
* ऽबपऽत बाजि बरष़ ररति चेरा। भिआूँ भआ कि मऽत कै कइ के रा॥
प़आ कपट जलि ऄंकिर ज़म़। बर दोई दल दिख फल
पररऩम़॥3॥
भ़ि़थग:-ऽिपऽि (कलह) बाज है, द़सा िष़ग ऊति है, कै के या की
कि बिऽि (ईस बाज के बोने के ऽलए) जमान हो गइ। ईसमें कपट
रूपा जल प़कर ऄंकिर फी ट ऽनकल़। दोनों िरद़न ईस ऄंकिर के
दो पिे हैं और ऄंत में आसके दिःख रूपा फल होग़॥3॥

* कोप सम़जि स़ऽज सबि सोइ। ऱजि करत ऽनज कि मऽत ऽबगोइ॥
ऱईर नगर कोल़हलि होइ। यह कि च़ऽल कछि ज़न न कोइ॥4॥
भ़ि़थग:-कै के या कोप क़ सब स़ज सजकर (कोपभिन में) ज़
सोइ। ऱज्य करता हुइ िह ऄपना दिष्ट बिऽि से नष्ट हो गइ।
ऱजमहल और नगर में धीम-ध़म मच रहा है। आस कि च़ल को
कोइ कि छ नहीं ज़नत़॥4॥
दोह़ :
* प्रमिददत पिर नर ऩरर सब सजवह सिमंगलच़र।
एक प्रऽबसवह एक ऽनगगमवह भार भीप दरब़र॥23।
भ़ि़थग:-बडे हा अनऽन्द्दत होकर नगर के सब स्त्रा-पिरुष शिभ
मंगल़च़र के स़थ सज रहे हैं। कोइ भातर ज़त़ है, कोइ
ब़हर ऽनकलत़ है, ऱजि़र में बडा भाड हो रहा है॥23॥
चौप़इ :
* ब़ल सख़ सिऽन ऽहयूँ हरष़हीं। ऽमऽल दस प़ूँच ऱम पवह
ज़हीं॥
प्रभि अदरवह प्रेमि पऽहच़ना। पीूँछवह कि सल खेम मुद ि ब़ना॥1॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचन्द्रजा के ब़ल सख़ ऱजऽतलक क़ सम़च़र
सिनकर हृदय में हर्तषत होते हैं। िे दस-प़ूँच ऽमलकर श्रा

ऱमचन्द्रजा के प़स ज़ते हैं। प्रेम पहच़नकर प्रभि श्रा ऱमचन्द्रजा
ईनक़ अदर करते हैं और कोमल ि़णा से कि शल क्षेम पीछते
हैं॥1॥
* दफरवह भिन ऽप्रय अयसि प़इ। करत परसपर ऱम बड़इ॥
को रघिबार सररस संस़ऱ। सालि सनेहु ऽनब़हऽनह़ऱ॥2॥
भ़ि़थग:-ऄपने ऽप्रय सख़ श्रा ऱमचन्द्रजा की अज्ञ़ प़कर िे
अपस में एक-दीसरे से श्रा ऱमचन्द्रजा की बड़इ करते हुए घर
लौटते हैं और कहते हैं- संस़र में श्रा रघिऩथजा के सम़न शाल
और स्नेह को ऽनब़हने ि़ल़ कौन है?॥2॥
* जेवह-जेवह जोऽन करम बस वर्महीं। तहूँ तहूँ इसि देई यह
हमहीं॥
सेिक हम सि़मा ऽसयऩह। होई ऩत यह ओर ऽनब़ह॥3॥
भ़ि़थग:-भगि़न हमें यहा दें दक हम ऄपने कमगिश वर्मते हुए
ऽजस-ऽजस योऽन में जन्द्में, िह़ूँ-िह़ूँ (ईस-ईस योऽन में) हम तो
सेिक हों और सात़पऽत श्रा ऱमचन्द्रजा हम़रे सि़मा हों और
यह ऩत़ ऄन्द्त तक ऽनभ ज़ए॥
* ऄस ऄऽभल़षि नगर सब क़ह। कै कयसित़ हृदयूँ ऄऽत द़ह॥
को न कि संगऽत प़आ नस़इ। रहआ न नाच मतें चतिऱइ॥4॥

भ़ि़थग:-नगर में सबकी ऐसा हा ऄऽभल़ष़ है, परन्द्ति कै के या के
हृदय में बडा जलन हो रहा है। कि संगऽत प़कर कौन नष्ट नहीं
होत़। नाच के मत के ऄनिस़र चलने से चतिऱइ नहीं रह
ज़ता॥4॥
दोह़ :
* स़ूँझ समय स़नंद नुपि गयई कै कइ गेह।ूँ
गिनि ऽनठि रत़ ऽनकट दकय जनि धरर देह सनेह॥ूँ 24॥
भ़ि़थग:-संध्य़ के समय ऱज़ दशरथ अनंद के स़थ कै के या के
महल में गए। म़नो स़क्ष़त स्नेह हा शरार ध़रण कर ऽनष्ठि रत़
के प़स गय़ हो!॥24॥
चौप़इ :
* कोपभिन सिऽन सकि चेई ऱउ। भय बस ऄगहुड परआ न प़उ॥
सिरपऽत बसआ ब़हूँबल ज़कें । नरपऽत सकल रहवह रुख त़कें ॥1॥
भ़ि़थग:-कोप भिन क़ ऩम सिनकर ऱज़ सहम गए। डर के
म़रे ईनक़ प़ूँि अगे को नहीं पडत़। सियं देिऱज आन्द्र
ऽजनकी भिज़ओं के बल पर (ऱक्षसों से ऽनभगय होकर) बसत़ है
और सम्पीणग ऱज़ लोग ऽजनक़ रुख देखते रहते हैं॥1॥
* सो सिऽन ऽतय ररस गयई सिख़इ। देखहु क़म प्रत़प बड़इ॥

सील कि ऽलस ऄऽस ऄूँगिऽनह़रे । ते रऽतऩथ सिमन सर म़रे ॥2॥
भ़ि़थग:-िहा ऱज़ दशरथ स्त्रा क़ क्रोध सिनकर सीख गए।
क़मदेि क़ प्रत़प और मऽहम़ तो देऽखए। जो ऽत्रशील, िज्र और
तलि़र अदद की चोट ऄपने ऄंगों पर सहने ि़ले हैं, िे
रऽतऩथ क़मदेि के पिष्पब़ण से म़रे गए॥2॥
* सभय नरे सि ऽप्रय़ पवह गयउ। देऽख दस़ दिखि द़रुन भयउ॥
भीऽम सयन पटि मोट पिऱऩ। ददए ड़रर तन भीषन ऩऩ॥3॥
भ़ि़थग:-ऱज़ डरते-डरते ऄपना प्य़रा कै के या के प़स गए।
ईसकी दश़ देखकर ईन्द्हें बड़ हा दिःख हुअ। कै के या जमान पर
पडा है। पिऱऩ मोट़ कपड़ पहने हुए है। शरार के ऩऩ
अभीषणों को ईत़रकर फें क ददय़ है।
* कि मऽतऽह कऽस कि बेषत़ फ़बा। ऄनऄऽहि़ति सीच जनि भ़बा॥
ज़आ ऽनकट नुपि कह मुद ि ब़ना। प्ऱनऽप्रय़ के ऽह हेति ररस़ना॥4॥
भ़ि़थग:-ईस दिबिगऽि कै के या को यह कि िेषत़ (बिऱ िेष) कै सा फब
रहा है, म़नो भ़िा ऽिधि़पन की सीचऩ दे रहा हो। ऱज़
ईसके प़स ज़कर कोमल ि़णा से बोले- हे प्ऱणऽप्रये! दकसऽलए
ररस़इ (रूठा) हो?॥4॥

दशरथ-कै के या संि़द और दशरथ शोक, सिमन्द्त्र क़ महल में
ज़ऩ और िह़ूँ से लौटकर श्रा ऱमजा को महल में भेजऩ
छन्द्द :
* के ऽह हेति ऱऽन ररस़ऽन परसत प़ऽन पऽतऽह नेि़रइ।

म़नहुूँ सरोष भिऄंग भ़ऽमऽन ऽबषम भ़ूँऽत ऽनह़रइ॥
दोई ब़सऩ रसऩ दसन बर मरम ठ़हरु देखइ।
तिलसा नुपऽत भितब्यत़ बस क़म कौतिक लेखइ॥
भ़ि़थग:-'हे ऱना! दकसऽलए रूठा हो?' यह कहकर ऱज़ ईसे
ह़थ से सपशग करते हैं, तो िह ईनके ह़थ को (झटककर) हट़
देता है और ऐसे देखता है म़नो क्रोध में भरा हुइ ऩऽगन क्रीर
दुऽष्ट से देख रहा हो। दोनों (िरद़नों की) ि़सऩएूँ ईस ऩऽगन
की दो जाभें हैं और दोनों िरद़न द़ूँत हैं, िह क़टने के ऽलए
ममगसथ़न देख रहा है। तिलसाद़सजा कहते हैं दक ऱज़ दशरथ
होनह़र के िश में होकर आसे (आस प्रक़र ह़थ झटकने और
ऩऽगन की भ़ूँऽत देखने को) क़मदेि की क्रीड़ हा समझ रहे हैं।
सोरठ़ :
* ब़र ब़र कह ऱई सिमिऽख सिलोचऽन ऽपकबचऽन।
क़रन मोऽह सिऩई गजग़ऽमऽन ऽनज कोप कर॥25॥
भ़ि़थग:-ऱज़ ब़र-ब़र कह रहे हैं- हे सिमिखा! हे सिलोचना! हे
कोदकलबयना! हे गजग़ऽमना! मिझे ऄपने क्रोध क़ क़रण तो
सिऩ॥25॥
चौप़इ :

* ऄनऽहत तोर ऽप्रय़ के आूँ कीन्द्ह़। के ऽह दिआ ऽसर के ऽह जमि चह
लान्द्ह़॥
कहु के ऽह रं कऽह करौं नरे सी। कहु के ऽह नुपऽह ऽनक़सौं देसी॥1॥
भ़ि़थग:-हे ऽप्रये! दकसने तेऱ ऄऽनष्ट दकय़? दकसके दो ऽसर हैं?
यमऱज दकसको लेऩ (ऄपने लोक को ले ज़ऩ) च़हते हैं? कह,
दकस कं ग़ल को ऱज़ कर दीूँ य़ दकस ऱज़ को देश से ऽनक़ल
दी?
ूँ ॥1॥
* सकईूँ तोर ऄरर ऄमरई म़रा। क़ह कीट बपिरे नर ऩरा॥
ज़नऽस मोर सिभ़ई बरोरू। मनि ति अनन चंद चकोरू॥2॥
भ़ि़थग:-तेऱ शत्रि ऄमर (देित़) भा हो, तो मैं ईसे भा म़र
सकत़ हूँ। बेच़रे कीडे-मकोडे सराखे नर-ऩरा तो चाज हा क्य़
हैं। हे सिंदरा! ती तो मेऱ सिभ़ि ज़नता हा है दक मेऱ मन
सद़ तेरे मिख रूपा चन्द्रम़ क़ चकोर है॥2॥
* ऽप्रय़ प्ऱन सित सरबसि मोरें । पररजन प्रज़ सकल बस तोरें ॥
जौं कछि कहौं कपटि करर तोहा। भ़ऽमऽन ऱम सपथ सत
मोहा॥3॥
भ़ि़थग:-हे ऽप्रये! मेरा प्रज़, कि टम्बा, सिगसि (सम्पऽि), पित्र, यह़ूँ
तक दक मेरे प्ऱण भा, ये सब तेरे िश में (ऄधान) हैं। यदद मैं

तिझसे कि छ कपट करके कहत़ होउूँ तो हे भ़ऽमना! मिझे सौ ब़र
ऱम की सौगंध है॥3॥
* ऽबहऽस म़गि मनभ़िऽत ब़त़। भीषन सजऽह मनोहर ग़त़॥।
घरा कि घरा समिऽझ ऽजयूँ देखी। बेऽग ऽप्रय़ पररहरऽह कि बेषी॥4॥
भ़ि़थग:-ती हूँसकर (प्रसन्नत़पीिगक) ऄपना मनच़हा ब़त म़ूँग ले
और ऄपने मनोहर ऄंगों को अभीषणों से सज़। मौक़-बेमौक़ तो
मन में ऽिच़र कर देख। हे ऽप्रये! जल्दा आस बिरे िेष को त्य़ग
दे॥4॥
दोह़ :
* यह सिऽन मन गिऽन सपथ बऽड ऽबहऽस ईठा मऽतमंद।
भीषन सजऽत ऽबलोदकमुगि मनहुूँ दकऱऽतऽन फं द॥26॥
भ़ि़थग:-यह सिनकर और मन में ऱमजा की बडा सौंगंध को
ऽिच़रकर मंदबिऽि कै के या हूँसता हुइ ईठा और गहने पहनने
लगा, म़नो कोइ भालना मुग को देखकर फं द़ तैय़र कर रहा
हो!॥26॥
चौप़इ :
* पिऽन कह ऱई सिहृद ऽजयूँ ज़ना। प्रेम पिलदक मुद ि मंजिल
ब़ना॥

भ़ऽमऽन भयई तोर मनभ़ि़। घर घर नगर ऄनंद बध़ि़॥1॥
भ़ि़थग:-ऄपने जा में कै के या को सिहृद् ज़नकर ऱज़ दशरथजा
प्रेम से पिलदकत होकर कोमल और सिंदर ि़णा से दफर बोले- हे
भ़ऽमऽन! तेऱ मनचात़ हो गय़। नगर में घर-घर अनंद के
बध़िे बज रहे हैं॥1॥
* ऱमऽह देईूँ क़ऽल जिबऱजी। सजऽह सिलोचऽन मंगल स़जी॥
दलदक ईठे ई सिऽन हृदई कठोरू। जनि छि आ गयई प़क बरतोरू॥2॥
भ़ि़थग:-मैं कल हा ऱम को यििऱज पद दे रह़ हूँ, आसऽलए हे
सिनयना! ती मंगल स़ज सज। यह सिनते हा ईसक़ कठोर हृदय
दलक ईठ़ (फटने लग़)। म़नो पक़ हुअ ब़लतोड (फोड़) छी
गय़ हो॥2॥
* ऐऽसई पार ऽबहऽस तेवह गोइ। चोर ऩरर ऽजऽम प्रगरट न
रोइ॥
लखवह न भीप कपट चतिऱइ। कोरट कि रटल मऽन गिरू पढ़़इ॥3॥
भ़ि़थग:-ऐसा भ़रा पाड़ को भा ईसने हूँसकर ऽछप़ ऽलय़, जैसे
चोर की स्त्रा प्रकट होकर नहीं रोता (ऽजसमें ईसक़ भेद न खिल
ज़ए)। ऱज़ ईसकी कपट-चतिऱइ को नहीं लख रहे हैं, क्योंदक
िह करोडों कि रटलों की ऽशरोमऽण गिरु मंथऱ की पढ़़इ हुइ
है॥3॥

* जद्यऽप नाऽत ऽनपिन नरऩह। ऩररचररत जलऽनऽध ऄिग़ह॥
कपट सनेहु बढ़़इ बहोरा। बोला ऽबहऽस नयन मिहु मोरा॥4॥
भ़ि़थग:-यद्यऽप ऱज़ नाऽत में ऽनपिण हैं, परन्द्ति ऽत्रय़चररत्र
ऄथ़ह समिर है। दफर िह कपटयिक्त प्रेम बढ़़कर (उपर से प्रेम
ददख़कर) नेत्र और मिूँह मोडकर हूँसता हुइ बोला-॥4॥
दोह़ :
* म़गि म़गि पै कहहु ऽपय कबहुूँ न देहु न लेहु।
देन कहेहु बरद़न दिआ तेई प़ित संदहु
े ॥27॥
भ़ि़थग:-हे ऽप्रयतम! अप म़ूँग-म़ूँग तो कह़ करते हैं, पर देत-े
लेते कभा कि छ भा नहीं। अपने दो िरद़न देने को कह़ थ़,
ईनके भा ऽमलने में संदह
े है॥27॥
चौप़इ :
* ज़नेईूँ मरमि ऱई हूँऽस कहइ। तिम्हऽह कोह़ब परम ऽप्रय
ऄहइ॥
थ़ता ऱऽख न म़ऽगहु क़उ। ऽबसरर गयई मोऽह भोर
सिभ़उ॥1॥
भ़ि़थग:-ऱज़ ने हूँसकर कह़ दक ऄब मैं तिम्ह़ऱ ममग (मतलब)
समझ़। म़न करऩ तिम्हें परम ऽप्रय है। तिमने ईन िरों को

थ़ता (धरोहर) रखकर दफर कभा म़ूँग़ हा नहीं और मेऱ
भीलने क़ सिभ़ि होने से मिझे भा िह प्रसंग य़द नहीं रह़॥1॥
* झीठेहुूँ हमऽह दोषि जऽन देह। दिआ कै च़रर म़ऽग मकि लेह॥
रघिकिल राऽत सद़ चऽल अइ। प्ऱन ज़हुूँ परु बचनि न ज़इ॥2॥
भ़ि़थग:-मिझे झीठ-मीठ दोष मत दो। च़हे दो के बदले च़र म़ूँग
लो। रघिकिल में सद़ से यह राऽत चला अइ है दक प्ऱण भले
हा चले ज़एूँ, पर िचन नहीं ज़त़॥2॥
* नवह ऄसत्य सम प़तक पिंज़। ऽगरर सम होवह दक कोरटक
गिंज़॥
सत्यमील सब सिकुत सिह़ए। बेद पिऱन ऽबददत मनि ग़ए॥3॥
भ़ि़थग:-ऄसत्य के सम़न प़पों क़ समीह भा नहीं है। क्य़
करोडों घिूँघऽचय़ूँ ऽमलकर भा कहीं पह़ड के सम़न हो सकता
हैं। 'सत्य' हा समसत ईिम सिकुतों (पिण्यों) की जड है। यह ब़त
िेद-पिऱणों में प्रऽसि है और मनिजा ने भा यहा कह़ है॥3॥
* तेऽह पर ऱम सपथ करर अइ। सिकुत सनेह ऄिऽध रघिऱइ॥
ब़द दुढ़़आ कि मऽत हूँऽस बोला। कि मत कि ऽबहग कि लह जनि
खोला॥4॥
भ़ि़थग:-ईस पर मेरे ि़ऱ श्रा ऱमजा की शपथ करने में अ
गइ (मिूँह से ऽनकल पडा)। श्रा रघिऩथजा मेरे सिकुत (पिण्य) और

स्नेह की साम़ हैं। आस प्रक़र ब़त पक्की कऱके दिबिगऽि कै के या
हूँसकर बोला, म़नो ईसने कि मत (बिरे ऽिच़र) रूपा दिष्ट पक्षा
(ब़ज) (को छोडने के ऽलए ईस) की कि लहा (अूँखों पर की
टोपा) खोल दा॥4॥
दोह़ :
* भीप मनोरथ सिभग बनि सिख सिऽबहंग सम़जि।
ऽभऽल्लऽन ऽजऽम छ़डन चहऽत बचनि भयंकरु ब़जि॥28॥
भ़ि़थग:-ऱज़ क़ मनोरथ सिंदर िन है, सिख सिंदर पऽक्षयों क़
समिद़य है। ईस पर भालना की तरह कै के या ऄपऩ िचन रूपा
भयंकर ब़ज छोडऩ च़हता है॥28॥

म़सप़ऱयण, तेरहि़ूँ ऽिश्ऱम
चौप़इ :
* सिनहु प्ऱनऽप्रय भ़ित जा क़। देहु एक बर भरतऽह टाक़॥
म़गईूँ दीसर बर कर जोरा। पिरिहु ऩथ मनोरथ मोरा॥1॥
भ़ि़थग:-(िह बोला-) हे प्ऱण प्य़रे ! सिऽनए, मेरे मन को भ़ने
ि़ल़ एक िर तो दाऽजए, भरत को ऱजऽतलक और हे ऩथ!

दीसऱ िर भा मैं ह़थ जोडकर म़ूँगता हूँ, मेऱ मनोरथ पीऱ
कीऽजए-॥1॥
* त़पस बेष ऽबसेऽष ईद़सा। चौदह बररस ऱमि बनब़सा॥
सिऽन मुद ि बचन भीप ऽहयूँ सोकी । सऽस कर छि ऄत ऽबकल ऽजऽम
कोकी ॥2॥
भ़ि़थग:-तपऽसियों के िेष में ऽिशेष ईद़सान भ़ि से (ऱज्य
और कि टि म्ब अदद की ओर से भलाभ़ूँऽत ईद़सान होकर ऽिरक्त
मिऽनयों की भ़ूँऽत) ऱम चौदह िषग तक िन में ऽनि़स करें ।
कै के या के कोमल (ऽिनययिक्त) िचन सिनकर ऱज़ के हृदय में
ऐस़ शोक हुअ जैसे चन्द्रम़ की दकरणों के सपशग से चकि़
ऽिकल हो ज़त़ है॥2॥
* गयई सहऽम नवह कछि कऽह अि़। जनि सच़न बन झपटेई
ल़ि़॥
ऽबबरन भयई ऽनपट नरप़ली। द़ऽमऽन हनेई मनहुूँ तरु त़ली॥3॥
भ़ि़थग:-ऱज़ सहम गए, ईनसे कि छ कहते न बऩ म़नो ब़ज
िन में बटेर पर झपट़ हो। ऱज़ क़ रं ग ऽबलकि ल ईड गय़,
म़नो त़ड के पेड को ऽबजला ने म़ऱ हो (जैसे त़ड के पेड
पर ऽबजला ऽगरने से िह झिलसकर बदरं ग़ हो ज़त़ है, िहा
ह़ल ऱज़ क़ हुअ)॥3॥

* म़थें ह़थ मीदद दोई लोचन। तनि धरर सोचि ल़ग जनि सोचन॥
मोर मनोरथि सिरतरु फी ल़। फरत कररऽन ऽजऽम हतेई समील़॥4॥
भ़ि़थग:-म़थे पर ह़थ रखकर, दोनों नेत्र बंद करके ऱज़ ऐसे
सोच करने लगे, म़नो स़क्ष़त् सोच हा शरार ध़रण कर सोच
कर रह़ हो। (िे सोचते हैं- ह़य!) मेऱ मनोरथ रूपा कल्पिुक्ष
फी ल चिक़ थ़, परन्द्ति फलते समय कै के या ने हऽथना की तरह
ईसे जड समेत ईख़डकर नष्ट कर ड़ल़॥4॥
* ऄिध ईज़रर कीऽन्द्ह कै के ईं। दाऽन्द्हऽस ऄचल ऽबपऽत कै नेईं॥5॥
भ़ि़थग:-कै के या ने ऄयोध्य़ को ईज़ड कर ददय़ और ऽिपऽि की
ऄचल (सिदढ़ु ) नींि ड़ल दा॥5॥
दोह़ :
* किनें ऄिसर क़ भयई गयईूँ ऩरर ऽबसि़स।
जोग ऽसऽि फल समय ऽजऽम जऽतऽह ऄऽबद्य़ ऩस॥29॥
भ़ि़थग:-दकस ऄिसर पर क्य़ हो गय़! स्त्रा क़ ऽिश्व़स करके
मैं िैसे हा म़ऱ गय़, जैसे योग की ऽसऽि रूपा फल ऽमलने के
समय योगा को ऄऽिद्य़ नष्ट कर देता है॥29॥
चौप़इ :

* एऽह ऽबऽध ऱई मनवह मन झ़ूँख़। देऽख कि भ़ूँऽत कि मऽत मन
म़ख़॥
भरति दक ऱईर पीत न होंहा। अनेहु मोल बेस़ऽह दक मोहा॥1॥
भ़ि़थग:-आस प्रक़र ऱज़ मन हा मन झींख रहे हैं। ऱज़ क़
ऐस़ बिऱ ह़ल देखकर दिबिगऽि कै के या मन में बिरा तरह से
क्रोऽधत हुइ। (और बोला-) क्य़ भरत अपके पित्र नहीं हैं? क्य़
मिझे अप द़म देकर खराद ल़ए हैं? (क्य़ मैं अपकी ऽिि़ऽहत़
पत्ना नहीं हूँ?)॥1॥
* जो सिऽन सरु ऄस ल़ग तिम्ह़रें । क़हे न बोलहु बचनि सूँभ़रें ॥
देहु ईतरु ऄनि करहु दक ऩहीं। सत्यसंध तिम्ह रघिकिल म़हीं॥2॥
भ़ि़थग:-जो मेऱ िचन सिनते हा अपको ब़ण स़ लग़ तो अप
सोच-समझकर ब़त क्यों नहीं कहते? ईिर दाऽजए- ह़ूँ कीऽजए,
नहीं तो ऩहीं कर दाऽजए। अप रघििंश में सत्य प्रऽतज्ञ़ ि़ले
(प्रऽसि) हैं!॥2॥
* देन कहेहु ऄब जऽन बरु देह। तजहु सत्य जग ऄपजसि लेह॥
सत्य सऱऽह कहेहु बरु देऩ। ज़नेहु लेआऽह म़ऽग चबेऩ॥3॥
भ़ि़थग:-अपने हा िर देने को कह़ थ़, ऄब भले हा न दाऽजए।
सत्य को छोड दाऽजए और जगत में ऄपयश लाऽजए। सत्य की

बडा सऱहऩ करके िर देने को कह़ थ़। समझ़ थ़ दक यह
चबेऩ हा म़ूँग लेगा!॥3॥
* ऽसऽब दधाऽच बऽल जो कछि भ़ष़। तनि धनि तजेई बचन पनि
ऱख़॥
ऄऽत कटि बचन कहऽत कै के इ। म़नहुूँ लोन जरे पर देइ॥4॥
भ़ि़थग:-ऱज़ ऽशऽब, दधाऽच और बऽल ने जो कि छ कह़, शरार
और धन त्य़गकर भा ईन्द्होंने ऄपने िचन की प्रऽतज्ञ़ को
ऽनब़ह़। कै के या बहुत हा कड़ुिे िचन कह रहा है, म़नो जले
पर नमक ऽछडक रहा हो॥4॥
दोह़ :
* धरम धिरंधर धार धरर नयन ईघ़रे ऱयूँ।
ऽसरु धिऽन लाऽन्द्ह ईस़स ऄऽस म़रे ऽस मोऽह कि ठ़यूँ॥30॥
भ़ि़थग:-धमग की धिरा को ध़रण करने ि़ले ऱज़ दशरथ ने
धारज धरकर नेत्र खोले और ऽसर धिनकर तथ़ लंबा स़ूँस लेकर
आस प्रक़र कह़ दक आसने मिझे बडे कि ठौर म़ऱ (ऐसा करठन
पररऽसथऽत ईत्पन्न कर दा, ऽजससे बच ऽनकलऩ करठन हो
गय़)॥30॥
चौप़इ :

* अगें दाऽख जरत ऽसर भ़रा। मनहुूँ रोष तरि़रर ईघ़रा॥
मीरठ कि बिऽि ध़र ऽनठि ऱइ। धरा की बरीं स़न बऩइ॥1॥
भ़ि़थग:-प्रचंड क्रोध से जलता हुइ कै के या स़मने आस प्रक़र
ददख़इ पडा, म़नो क्रोध रूपा तलि़र नंगा (म्य़न से ब़हर)
खडा हो। कि बिऽि ईस तलि़र की मीठ है, ऽनष्ठि रत़ ध़र है और
िह कि बरा (मंथऱ) रूपा स़न पर धरकर तेज की हुइ है॥1॥
* लखा महाप कऱल कठोऱ। सत्य दक जािनि लेआऽह मोऱ॥
बोले ऱई करठन करर छ़ता। ब़ना सऽबनय त़सि सोह़ता॥2॥
भ़ि़थग:-ऱज़ ने देख़ दक यह (तलि़र) बडा हा भय़नक और
कठोर है (और सोच़-) क्य़ सत्य हा यह मेऱ जािन लेगा?
ऱज़ ऄपना छ़ता कडा करके , बहुत हा नम्रत़ के स़थ ईसे
(कै के या को) ऽप्रय लगने ि़ला ि़णा बोले-॥2॥
* ऽप्रय़ बचन कस कहऽस कि भ़ूँता। भार प्रताऽत प्राऽत करर
ह़ूँता॥
मोरें भरति ऱमि दिआ अूँखा। सत्य कहईूँ करर संकरु स़खा॥3॥
भ़ि़थग:-हे ऽप्रये! हे भारु! ऽिश्व़स और प्रेम को नष्ट करके ऐसे
बिरा तरह के िचन कै से कह रहा हो। मेरे तो भरत और

ऱमचन्द्र दो अूँखें (ऄथ़गत एक से) हैं, यह मैं शंकरजा की स़क्षा
देकर सत्य कहत़ हूँ॥3॥
* ऄिऽस दीति मैं पठआब प्ऱत़। ऐहवह बेऽग सिनत दोई वऱ्त़॥
सिददन सोऽध सबि स़जि सज़इ। देईूँ भरत कहुूँ ऱजि बज़इ॥4॥
भ़ि़थग:-मैं ऄिश्य सबेरे हा दीत भेजीूँग़। दोनों भ़इ (भरत-शत्रिघ्न)
सिनते हा तिरंत अ ज़एूँगे। ऄच्छ़ ददन (शिभ मिहतग) शोधि़कर,
सब तैय़रा करके डंक़ बज़कर मैं भरत को ऱज्य दे दीग
ूँ ़॥4॥
दोह़ :
* लोभि न ऱमऽह ऱजि कर बहुत भरत पर प्राऽत।
मैं बड छोट ऽबच़रर ऽजयूँ करत रहेईूँ नुपनाऽत॥31॥
भ़ि़थग:-ऱम को ऱज्य क़ लोभ नहीं है और भरत पर ईनक़
बड़ हा प्रेम है। मैं हा ऄपने मन में बडे-छोटे क़ ऽिच़र करके
ऱजनाऽत क़ प़लन कर रह़ थ़ (बडे को ऱजऽतलक देने ज़
रह़ थ़)॥31॥
चौप़इ :
* ऱम सपथ सत कहईूँ सिभ़उ। ऱमम़ति कछि कहेई न क़उ॥
मैं सबि कीन्द्ह तोऽह ऽबनि पीूँछें। तेऽह तें परे ई मनोरथि छी छें॥1॥

भ़ि़थग:-ऱम की सौ ब़र सौगंध ख़कर मैं सिभ़ि से हा कहत़
हूँ दक ऱम की म़त़ (कौसल्य़) ने (आस ऽिषय में) मिझसे कभा
कि छ नहीं कह़। ऄिश्य हा मैंने तिमसे ऽबऩ पीछे यह सब दकय़।
आसा से मेऱ मनोरथ ख़ला गय़॥1॥
* ररस पररहरु ऄब मंगल स़जी। कछि ददन गएूँ भरत जिबऱजी॥
एकऽह ब़त मोऽह दिखि ल़ग़। बर दीसर ऄसमंजस म़ग़॥2॥
भ़ि़थग:-ऄब क्रोध छोड दे और मंगल स़ज सज। कि छ हा ददनों
ब़द भरत यििऱज हो ज़एूँगे। एक हा ब़त क़ मिझे दिःख लग़
दक तीने दीसऱ िरद़न बडा ऄडचन क़ म़ूँग़॥2॥
* ऄजहूँ हृदय जरत तेऽह अूँच़। ररस पररह़स दक स़ूँचेहुूँ
स़ूँच़॥
कहु तऽज रोषि ऱम ऄपऱधी। सबि कोई कहआ ऱमि सिरठ स़धी॥3॥
भ़ि़थग:-ईसकी अूँच से ऄब भा मेऱ हृदय जल रह़ है। यह
ददल्लगा में, क्रोध में ऄथि़ सचमिच हा (ि़सति में) सच्च़ है?
क्रोध को त्य़गकर ऱम क़ ऄपऱध तो बत़। सब कोइ तो कहते
हैं दक ऱम बडे हा स़धि हैं॥3॥
* तिहूँ सऱहऽस करऽस सनेह। ऄब सिऽन मोऽह भयई संदह
े ॥
ज़सि सिभ़ई ऄररऽह ऄनीकील़। सो दकऽम कररऽह म़ति
प्रऽतकी ल़॥4॥

भ़ि़थग:-ती सियं भा ऱम की सऱहऩ करता और ईन पर स्नेह
दकय़ करता था। ऄब यह सिनकर मिझे संदह
े हो गय़ है (दक
तिम्ह़रा प्रशंस़ और स्नेह कहीं झीठे तो न थे?) ऽजसक़ सिभ़ि
शत्रि को भा ऄनीकल है, िह म़त़ के प्रऽतकी ल अचरण क्यों कर
करे ग़?॥4॥
दोह़ :
* ऽप्रय़ ह़स ररस पररहरऽह म़गि ऽबच़रर ऽबबेकि।
जेवह देखौं ऄब नयन भरर भरत ऱज ऄऽभषेकि॥32॥
भ़ि़थग:-हे ऽप्रये! हूँसा और क्रोध छोड दे और ऽििेक (ईऽचतऄनिऽचत) ऽिच़रकर िर म़ूँग, ऽजससे ऄब मैं नेत्र भरकर भरत
क़ ऱज्य़ऽभषेक देख सकीूँ ॥32॥
चौप़इ :
* ऽजऐ मान बरु ब़रर ऽबहाऩ। मऽन ऽबनि फऽनकि ऽजऐ दिख
दाऩ॥
कहईूँ सिभ़ई न छलि मन म़हीं। जािनि मोर ऱम ऽबनि ऩहीं॥1॥
भ़ि़थग:-मछला च़हे ऽबऩ प़ना के जाता रहे और स़ूँप भा
च़हे ऽबऩ मऽण के दान-दिःखा होकर जात़ रहे, परन्द्ति मैं

सिभ़ि से हा कहत़ हूँ, मन में (जऱ भा) छल रखकर नहीं दक
मेऱ जािन ऱम के ऽबऩ नहीं है॥1॥
* समिऽझ देखि ऽजयूँ ऽप्रय़ प्रबाऩ। जािनि ऱम दरस अधाऩ॥
सिऽन मुद ि बचन कि मऽत ऄऽत जरइ। मनहुूँ ऄनल अहुऽत घुत
परइ॥2॥
भ़ि़थग:-हे चतिर ऽप्रये! जा में समझ देख, मेऱ जािन श्रा ऱम
के दशगन के ऄधान है। ऱज़ के कोमल िचन सिनकर दिबिगऽि
कै के या ऄत्यन्द्त जल रहा है। म़नो ऄऽग्न में घा की अहुऽतय़ूँ पड
रहा हैं॥2॥
* कहआ करहु दकन कोरट ईप़य़। आह़ूँ न ल़ऽगऽह ऱईरर म़य़॥
देहु दक लेहु ऄजसि करर ऩहीं। मोऽह न बहुत प्रपंच सोह़हीं॥3॥
भ़ि़थग:-(कै के या कहता है-) अप करोडों ईप़य क्यों न करें , यह़ूँ
अपकी म़य़ (च़लब़जा) नहीं लगेगा। य़ तो मैंने जो म़ूँग़ है
सो दाऽजए, नहीं तो 'ऩहीं' करके ऄपयश लाऽजए। मिझे बहुत
प्रपंच (बखेडे) नहीं सिह़ते॥3॥
* ऱमि स़धि तिम्ह स़धि सय़ने। ऱमम़ति भऽल सब पऽहच़ने॥
जस कौऽसल़ूँ मोर भल त़क़। तस फलि ईन्द्हऽह देईूँ करर
स़क़॥4॥

भ़ि़थग:-ऱम स़धि हैं, अप सय़ने स़धि हैं और ऱम की म़त़
भा भला है, मैंने सबको पहच़न ऽलय़ है। कौसल्य़ ने मेऱ
जैस़ भल़ च़ह़ है, मैं भा स़क़ करके (य़द रखने योग्य) ईन्द्हें
िैस़ हा फल दीग
ूँ ा॥4॥
दोह़ :
* होत प्ऱत मिऽनबेष धरर जौं न ऱमि बन ज़वह।
मोर मरनि ऱईर ऄजस नुप समिऽझऄ मन म़वह॥33॥
भ़ि़थग:-(सबेऱ होते हा मिऽन क़ िेष ध़रण कर यदद ऱम िन
को नहीं ज़ते, तो हे ऱजन्! मन में (ऽनश्चय) समझ लाऽजए दक
मेऱ मरऩ होग़ और अपक़ ऄपयश!॥33॥
चौप़इ :
* ऄस कऽह कि रटल भइ ईरठ ठ़ढ़ा। म़नहुूँ रोष तरं ऽगऽन ब़ढ़ा॥
प़प पह़र प्रगट भआ सोइ। भरा क्रोध जल ज़आ न जोइ॥1॥
भ़ि़थग:-ऐस़ कहकर कि रटल कै के या ईठ खडा हुइ, म़नो क्रोध
की नदा ईमडा हो। िह नदा प़प रूपा पह़ड से प्रकट हुइ है
और क्रोध रूपा जल से भरा है, (ऐसा भय़नक है दक) देखा
नहीं ज़ता!॥1॥

* दोई बर की ल करठन हठ ध़ऱ। भिूँर की बरा बचन प्रच़ऱ॥
ढ़हत भीपरूप तरु मील़। चला ऽबपऽत ब़ररऽध ऄनीकील़॥2॥
भ़ि़थग:-दोनों िरद़न ईस नदा के दो दकऩरे हैं, कै के या क़
करठन हठ हा ईसकी (ताव्र) ध़ऱ है और कि बरा (मंथऱ) के
िचनों की प्रेरण़ हा भूँिर है। (िह क्रोध रूपा नदा) ऱज़
दशरथ रूपा िुक्ष को जड-मील से ढह़ता हुइ ऽिपऽि रूपा समिर
की ओर (साधा) चला है॥2॥
* लखा नरे स ब़त फि रर स़ूँचा। ऽतय ऽमस माचि सास पर
ऩचा॥
गऽह पद ऽबनय कीन्द्ह बैठ़रा। जऽन ददनकर कि ल होऽस
कि ठ़रा॥3॥
भ़ि़थग:-ऱज़ ने समझ ऽलय़ दक ब़त सचमिच (ि़सति में)
सच्चा है, स्त्रा के बह़ने मेरा मुत्यि हा ऽसर पर ऩच रहा है।
(तदनन्द्तर ऱज़ ने कै के या के ) चरण पकडकर ईसे ऽबठ़कर
ऽिनता की दक ती सीयगकिल (रूपा िुक्ष) के ऽलए कि ल्ह़डा मत
बन॥3॥
* म़गि म़थ ऄबहीं देईूँ तोहा। ऱम ऽबरहूँ जऽन म़रऽस मोहा॥
ऱखि ऱम कहुूँ जेऽह तेऽह भ़ूँता। ऩवह त जररऽह जनम भरर
छ़ता॥4॥

भ़ि़थग:-ती मेऱ मसतक म़ूँग ले, मैं तिझे ऄभा दे दी।ूँ पर ऱम के
ऽिरह में मिझे मत म़र। ऽजस दकसा प्रक़र से हो ती ऱम को
रख ले। नहीं तो जन्द्मभर तेरा छ़ता जलेगा॥4॥
दोह़ :
* देखा ब्य़ऽध ऄस़ध नुपि परे ई धरऽन धिऽन म़थ।
कहत परम अरत बचन ऱम ऱम रघिऩथ॥34॥
भ़ि़थग:-ऱज़ ने देख़ दक रोग ऄस़ध्य है, तब िे ऄत्यन्द्त
अतगि़णा से 'ह़ ऱम! ह़ ऱम! ह़ रघिऩथ!' कहते हुए ऽसर
पाटकर जमान पर ऽगर पडे॥34॥
चौप़इ :
* ब्य़कि ल ऱई ऽसऽथल सब ग़त़। कररऽन कलपतरु मनहुूँ
ऽनप़त़॥
कं ठि सीख मिख अि न ब़ना। जनि प़ठानि दान ऽबनि प़ना॥1॥
भ़ि़थग:-ऱज़ व्य़कि ल हो गए, ईनक़ स़ऱ शरार ऽशऽथल पड
गय़, म़नो हऽथना ने कल्पिुक्ष को ईख़ड फें क़ हो। कं ठ सीख
गय़, मिख से ब़त नहीं ऽनकलता, म़नो प़ना के ऽबऩ पऽहऩ
ऩमक मछला तडप रहा हो॥1॥

* पिऽन कह कटि कठोर कै के इ। मनहुूँ घ़य महुूँ म़हुर देइ॥
जौं ऄंतहुूँ ऄस करतबि रहेउ। म़गि म़गि तिम्ह के वह बल कहेउ॥2॥
भ़ि़थग:-कै के या दफर कडिे और कठोर िचन बोला, म़नो घ़ि
में जहर भर रहा हो। (कहता है-) जो ऄंत में ऐस़ हा करऩ
थ़, तो अपने 'म़ूँग, म़ूँग' दकस बल पर कह़ थ़?॥2॥
* दिआ दक होआ एक समय भिअल़। हूँसब ठठ़आ फि ल़ईब ग़ल़॥
द़ऽन कह़ईब ऄरु कु पऩइ। होआ दक खेम कि सल रौत़इ॥3॥
भ़ि़थग:-हे ऱज़! ठह़क़ म़रकर हूँसऩ और ग़ल फि ल़ऩ- क्य़
ये दोनों एक स़थ हो सकते हैं? द़ना भा कह़ऩ और कं जीसा
भा करऩ। क्य़ रजपीता में क्षेम-कि शल भा रह सकता है?(लड़इ
में बह़दिरा भा ददख़िें और कहीं चोट भा न लगे!)॥3॥
* छ़डहु बचनि दक धारजि धरह। जऽन ऄबल़ ऽजऽम करुऩ
करह॥
तनि ऽतय तनय ध़मि धनि धरना। सत्यसंध कहुूँ तुन सम
बरना॥4॥
भ़ि़थग:-य़ तो िचन (प्रऽतज्ञ़) हा छोड दाऽजए य़ धैयग ध़रण
कीऽजए। यों ऄसह़य स्त्रा की भ़ूँऽत रोआए-पारटए नहीं। सत्यव्रता

के ऽलए तो शरार, स्त्रा, पित्र, घर, धन और पुथ्िा- सब ऽतनके
के बऱबर कहे गए हैं॥4॥
दोह़ :
* मरम बचन सिऽन ऱई कह कहु कछि दोषि न तोर।
ल़गेई तोऽह ऽपस़च ऽजऽम क़लि कह़ित मोर॥35॥
भ़ि़थग:-कै के या के ममगभेदा िचन सिनकर ऱज़ ने कह़ दक ती
जो च़हे कह, तेऱ कि छ भा दोष नहीं है। मेऱ क़ल तिझे म़नो
ऽपश़च होकर लग गय़ है, िहा तिझसे यह सब कहल़ रह़
है॥35॥
चौप़इ :
* चहत न भरत भीपतऽह भोरें । ऽबऽध बस कि मऽत बसा ऽजय
तोरें ॥
सो सबि मोर प़प पररऩमी। भयई कि ठ़हर जेवह ऽबऽध ब़मी॥
भ़ि़थग:-भरत तो भीलकर भा ऱजपद नहीं च़हते। होनह़रिश
तेरे हा जा में कि मऽत अ बसा। यह सब मेरे प़पों क़ पररण़म
है, ऽजससे कि समय (बेमौके ) में ऽिध़त़ ऽिपरात हो गय़॥1॥
* सिबस बऽसऽह दफरर ऄिध सिह़इ। सब गिन ध़म ऱम प्रभित़इ॥
कररहवह भ़आ सकल सेिक़इ। होआऽह ऽतहुूँ पिर ऱम बड़इ॥2॥

भ़ि़थग:- (तेरा ईज़डा हुइ) यह सिद
ं र ऄयोध्य़ दफर भलाभ़ूँऽत
बसेगा और समसत गिणों के ध़म श्रा ऱम की प्रभित़ भा होगा।
सब भ़इ ईनकी सेि़ करें गे और तानों लोकों में श्रा ऱम की
बड़इ होगा॥2॥
* तोर कलंकि मोर पऽछत़उ। मिएहुूँ न ऽमरटऽह न ज़आऽह क़उ॥
ऄब तोऽह नाक ल़ग करु सोइ। लोचन ओट बैठि मिहु गोइ॥3॥
भ़ि़थग:-के िल तेऱ कलंक और मेऱ पछत़ि़ मरने पर भा नहीं
ऽमटेग़, यह दकसा तरह नहीं ज़एग़। ऄब तिझे जो ऄच्छ़ लगे
िहा कर। मिूँह ऽछप़कर मेरा अूँखों की ओट ज़ बैठ (ऄथ़गत मेरे
स़मने से हट ज़, मिझे मिूँह न ददख़)॥3॥
* जब लऽग ऽजऔं कहईूँ कर जोरा। तब लऽग जऽन कछि कहऽस
बहोरा॥
दफरर पऽछतैहऽस ऄंत ऄभ़गा। म़रऽस ग़आ नह़रू ल़गा॥4॥
भ़ि़थग:-मैं ह़थ जोडकर कहत़ हूँ दक जब तक मैं जात़ रहूँ,
तब तक दफर कि छ न कहऩ (ऄथ़गत मिझसे न बोलऩ)। ऄरा
ऄभ़ऽगना! दफर ती ऄन्द्त में पछत़एगा जो ती नह़रू (त़ूँत) के
ऽलए ग़य को म़र रहा है॥4॥
दोह़ :
* परे ई ऱई कऽह कोरट ऽबऽध क़हे करऽस ऽनद़नि।

कपट सय़ऽन न कहऽत कछि ज़गऽत मनहुूँ मस़नि॥36॥
भ़ि़थग:-ऱज़ करोडों प्रक़र से (बहुत तरह से) समझ़कर (और
यह कहकर) दक ती क्यों सिगऩश कर रहा है, पुथ्िा पर ऽगर
पडे। पर कपट करने में चतिर कै के या कि छ बोलता नहीं, म़नो
(मौन होकर) मस़न जग़ रहा हो (श्मश़न में बैठकर प्रेतमंत्र
ऽसि कर रहा हो)॥36॥
चौप़इ :
* ऱम ऱम रट ऽबकल भिअली। जनि ऽबनि पंख ऽबहंग बेह़ली॥
हृदयूँ मऩि भोरु जऽन होइ। ऱमऽह ज़आ कहै जऽन कोइ॥1॥
भ़ि़थग:-ऱज़ 'ऱम-ऱम' रट रहे हैं और ऐसे व्य़कि ल हैं, जैसे
कोइ पक्षा पंख के ऽबऩ बेह़ल हो। िे ऄपने हृदय में मऩते हैं
दक सबेऱ न हो और कोइ ज़कर श्रा ऱमचन्द्रजा से यह ब़त
न कहे॥1॥
* ईदई करहु जऽन रऽब रघिकिल गिर। ऄिध ऽबलोदक सील होआऽह
ईर॥
भीप प्राऽत कै कआ करठऩइ। ईभय ऄिऽध ऽबऽध रचा बऩइ॥2॥
भ़ि़थग:-हे रघिकिल के गिरु (बडेरे, मीलपिरुष) सीयग भगि़न्! अप
ऄपऩ ईदय न करें । ऄयोध्य़ को (बेह़ल) देखकर अपके हृदय
में बडा पाड़ होगा। ऱज़ की प्राऽत और कै के या की ऽनष्ठि रत़

दोनों को ब्रह्म़ ने साम़ तक रचकर बऩय़ है (ऄथ़गत ऱज़
प्रेम की साम़ है और कै के या ऽनष्ठि रत़ की)॥2॥
* ऽबलपत नुपऽह भयई ऽभनिस़ऱ। बाऩ बेनि संख धिऽन ि़ऱ॥
पढ़वह भ़ट गिन ग़िवह ग़यक। सिनत नुपऽह जनि ल़गवह
स़यक॥3॥
भ़ि़थग:-ऽिल़प करते-करते हा ऱज़ को सबेऱ हो गय़! ऱज
ि़र पर िाण़, ब़ूँसिरा और शंख की ध्िऽन होने लगा। भ़ट
लोग ऽिरुद़िला पढ़ रहे हैं और गिैये गिणों क़ ग़न कर रहे
हैं। सिनने पर ऱज़ को िे ब़ण जैसे लगते हैं॥3॥
* मंगल सकल सोह़वह न कै सें। सहग़ऽमऽनऽह ऽबभीषन जैसें॥
तेऽह ऽनऽस नाद परा नवह क़ह। ऱम दरस ल़लस़ ईछ़ह॥4॥
भ़ि़थग:-ऱज़ को ये सब मंगल स़ज कै से नहीं सिह़ रहे हैं, जैसे
पऽत के स़थ सता होने ि़ला स्त्रा को अभीषण! श्रा ऱमचन्द्रजा
के दशगन की ल़लस़ और ईत्स़ह के क़रण ईस ऱऽत्र में दकसा
को भा नींद नहीं अइ॥4॥
दोह़ :
* ि़र भार सेिक सऽचि कहवह ईददत रऽब देऽख।
ज़गेई ऄजहुूँ न ऄिधपऽत क़रनि किनि ऽबसेऽष॥37॥

भ़ि़थग:-ऱजि़र पर मंऽत्रयों और सेिकों की भाड लगा है। िे
सब सीयग को ईदय हुअ देखकर कहते हैं दक ऐस़ कौन स़
ऽिशेष क़रण है दक ऄिधपऽत दशरथजा ऄभा तक नहीं
ज़गे?॥37॥
चौप़इ :
* पऽछले पहर भीपि ऽनत ज़ग़। अजि हमऽह बड ऄचरजि ल़ग़॥
ज़हु सिमंत्र जग़िहु ज़इ। कीऽजऄ क़जि रज़यसि प़इ॥1॥
भ़ि़थग:-ऱज़ ऽनत्य हा ऱत के ऽपछले पहर ज़ग ज़य़ करते
हैं, दकन्द्ति अज हमें बड़ अश्चयग हो रह़ है। हे सिमत्र
ं ! ज़ओ,
ज़कर ऱज़ को जग़ओ। ईनकी अज्ञ़ प़कर हम सब क़म
करें ॥1॥
* गए सिमंत्रि तब ऱईर म़हीं। देऽख भय़िन ज़त डेऱहीं॥
ध़आ ख़इ जनि ज़आ न हेऱ। म़नहुूँ ऽबपऽत ऽबष़द बसेऱ॥2॥
भ़ि़थग:-तब सिमंत्र ऱिले (ऱजमहल) में गए, पर महल को
भय़नक देखकर िे ज़ते हुए डर रहे हैं। (ऐस़ लगत़ है) म़नो
दौडकर क़ट ख़एग़, ईसकी ओर देख़ भा नहीं ज़त़। म़नो
ऽिपऽि और ऽिष़द ने िह़ूँ डेऱ ड़ल रख़ हो॥2॥
* पीछें कोई न उतरु देइ। गए जेवह भिन भीप कै के इ॥

कऽह जयजाि बैठ ऽसरु ऩइ। देऽख भीप गऽत गयई सिख़इ॥3॥
भ़ि़थग:-पीछने पर कोइ जि़ब नहीं देत़। िे ईस महल में गए,
जह़ूँ ऱज़ और कै के या थे 'जय जाि' कहकर ऽसर नि़कर
(िंदऩ करके ) बैठे और ऱज़ की दश़ देखकर तो िे सीख हा
गए॥3॥
* सोच ऽबकल ऽबबरन मऽह परे उ। म़नहु कमल मीलि पररहरे उ॥
सऽचई सभात सकआ नवह पीूँछा। बोला ऄसिभ भरा सिभ छी ूँछा॥4॥
भ़ि़थग:-(देख़ दक-) ऱज़ सोच से व्य़कि ल हैं, चेहरे क़ रं ग ईड
गय़ है। जमान पर ऐसे पडे हैं, म़नो कमल जड छोडकर (जड
से ईखडकर) (मिझ़गय़) पड़ हो। मंत्रा म़रे डर के कि छ पीछ नहीं
सकते। तब ऄशिभ से भरा हुइ और शिभ से ऽिहान कै के या
बोला-॥4॥
दोह़ :
* परा न ऱजऽह नाद ऽनऽस हेति ज़न जगदासि।
ऱमि ऱमि ररट भोरु दकय कहआ ऩ मरमि महासि॥38॥
भ़ि़थग:-ऱज़ को ऱतभर नींद नहीं अइ, आसक़ क़रण
जगदाश्वर हा ज़नें। आन्द्होंने 'ऱम ऱम' रटकर सबेऱ कर ददय़,
परन्द्ति आसक़ भेद ऱज़ कि छ भा नहीं बतल़ते॥38॥

चौप़इ :
* अनहु ऱमऽह बेऽग बोल़इ। सम़च़र तब पीूँछेहु अइ॥
चलेई सिमंत्रि ऱय रुख ज़ना। लखा कि च़ऽल कीऽन्द्ह कछि ऱना॥1॥
भ़ि़थग:-तिम जल्दा ऱम को बिल़ ल़ओ। तब अकर सम़च़र
पीछऩ। ऱज़ क़ रुख ज़नकर सिमत्र
ं जा चले, समझ गए दक
ऱना ने कि छ कि च़ल की है॥1॥
* सोच ऽबकल मग परआ न प़उ। ऱमऽह बोऽल कऽहऽह क़
ऱउ॥
ईर धरर धारजि गयई दिअरें । पीूँछवह सकल देऽख मनि म़रें ॥2॥
भ़ि़थग:-सिमंत्र सोच से व्य़कि ल हैं, ऱसते पर पैर नहीं पडत़
(अगे बढ़़ नहीं ज़त़), (सोचते हैं-) ऱमजा को बिल़कर ऱज़
क्य़ कहेंग?
े दकसा तरह हृदय में धारज धरकर िे ि़र पर गए।
सब लोग ईनको मन म़रे (ईद़स) देखकर पीछने लगे॥2॥
* सम़ध़नि करर सो सबहा क़। गयई जह़ूँ ददनकर कि ल टाक़॥
ऱम सिमंत्रऽह अित देख़। अदरु कीन्द्ह ऽपत़ सम लेख़॥3॥
भ़ि़थग:-सब लोगों क़ सम़ध़न करके (दकसा तरह समझ़बिझ़कर) सिमंत्र िह़ूँ गए, जह़ूँ सीयक
ग ि ल के ऽतलक श्रा ऱमचन्द्रजा

थे। श्रा ऱमचन्द्रजा ने सिमंत्र को अते देख़ तो ऽपत़ के सम़न
समझकर ईनक़ अदर दकय़॥3॥
* ऽनरऽख बदनि कऽह भीप रज़इ। रघिकिलदापऽह चलेई लेि़इ॥
ऱमि कि भ़ूँऽत सऽचि सूँग ज़हीं। देऽख लोग जहूँ तहूँ
ऽबलख़हीं॥4॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचन्द्रजा के मिख को देखकर और ऱज़ की अज्ञ़
सिऩकर िे रघिकिल के दापक श्रा ऱमचन्द्रजा को (ऄपने स़थ)
ऽलि़ चले। श्रा ऱमचन्द्रजा मंत्रा के स़थ बिरा तरह से (ऽबऩ
दकसा लि़जमे के ) ज़ रहे हैं, यह देखकर लोग जह़ूँ-तह़ूँ
ऽिष़द कर रहे हैं॥4॥
दोह़ :
* ज़आ दाख रघिबंसमऽन नरपऽत ऽनपट कि स़जि।
सहऽम परे ई लऽख वसऽघऽनऽह मनहुूँ बुि गजऱजि॥39॥
भ़ि़थग:-रघििंशमऽण श्रा ऱमचन्द्रजा ने ज़कर देख़ दक ऱज़
ऄत्यन्द्त हा बिरा ह़लत में पडे हैं, म़नो वसहना को देखकर कोइ
बीढ़़ गजऱज सहमकर ऽगर पड़ हो॥39॥
चौप़इ :
* सीखवह ऄधर जरआ सबि ऄंगी। मनहुूँ दान मऽनहान भिऄंगी॥

सरुष समाप दाऽख कै के इ। म़नहुूँ माचि घरीं गऽन लेइ॥1॥
भ़ि़थग:-ऱज़ के होठ सीख रहे हैं और स़ऱ शरार जल रह़ है,
म़नो मऽण के ऽबऩ स़ूँप दिःखा हो रह़ हो। प़स हा क्रोध से
भरा कै के या को देख़, म़नो (स़क्ष़त) मुत्यि हा बैठा (ऱज़ के
जािन की ऄंऽतम) घऽडय़ूँ ऽगन रहा हो॥1॥

श्रा ऱम-कै के या संि़द
* करुऩमय मुद ि ऱम सिभ़उ। प्रथम दाख दिखि सिऩ न क़उ॥
तदऽप धार धरर समई ऽबच़रा। पीछ
ूँ ा मधिर बचन महत़रा॥2॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचन्द्रजा क़ सिभ़ि कोमल और करुण़मय है।
ईन्द्होंने (ऄपने जािन में) पहला ब़र यह दिःख देख़, आससे पहले
कभा ईन्द्होंने दिःख सिऩ भा न थ़। तो भा समय क़ ऽिच़र
करके हृदय में धारज धरकर ईन्द्होंने माठे िचनों से म़त़ कै के या
से पीछ़-॥2॥
* मोऽह कहु म़ति त़त दिख क़रन। कररऄ जतन जेवह होआ
ऽनि़रन॥
सिनहु ऱम सबि क़रनि एह। ऱजऽह तिम्ह पर बहुत सनेह॥3॥
भ़ि़थग:-हे म़त़! मिझे ऽपत़जा के दिःख क़ क़रण कहो, त़दक
ईसक़ ऽनि़रण हो (दिःख दीर हो) िह यत्न दकय़ ज़ए। (कै के या
ने कह़-) हे ऱम! सिनो, स़ऱ क़रण यहा है दक ऱज़ क़ तिम
पर बहुत स्नेह है॥3॥
* देन कहेऽन्द्ह मोऽह दिआ बरद़ऩ। म़गेईूँ जो कछि मोऽह
सोह़ऩ॥

सो सिऽन भयई भीप ईर सोची। छ़ऽड न सकवह तिम्ह़र
सूँकोची॥4॥
भ़ि़थग:-आन्द्होंने मिझे दो िरद़न देने को कह़ थ़। मिझे जो कि छ
ऄच्छ़ लग़, िहा मैंने म़ूँग़। ईसे सिनकर ऱज़ के हृदय में
सोच हो गय़, क्योंदक ये तिम्ह़ऱ संकोच नहीं छोड सकते॥4॥
दोह़ :
* सित सनेहु आत बचनि ईत संकट परे ई नरे सि।
सकहु त अयसि धरहु ऽसर मेटहु करठन कलेसि॥40॥
भ़ि़थग:-आधर तो पित्र क़ स्नेह है और ईधर िचन (प्रऽतज्ञ़),
ऱज़ आसा धमगसक
ं ट में पड गए हैं। यदद तिम कर सकते हो, तो
ऱज़ की अज्ञ़ ऽशरोध़यग करो और आनके करठन क्लेश को
ऽमट़ओ॥40॥
चौप़इ :
* ऽनधरक बैरठ कहआ कटि ब़ना। सिनत करठनत़ ऄऽत ऄकि ल़ना॥
जाभ कम़न बचन सर ऩऩ। मनहुूँ मऽहप मुद ि लच्छ सम़ऩ॥1॥
भ़ि़थग:-कै के या बेधडक बैठा ऐसा कडिा ि़णा कह रहा है, ऽजसे
सिनकर सियं कठोरत़ भा ऄत्यन्द्त व्य़कि ल हो ईठा। जाभ धनिष

है, िचन बहुत से तार हैं और म़नो ऱज़ हा कोमल ऽनश़ने के
सम़न हैं॥1॥
* जनि कठोरपनि धरें सरारू। ऽसखआ धनिषऽबद्य़ बर बारू॥
सबि प्रसंगि रघिपऽतऽह सिऩइ। बैरठ मनहुूँ तनि धरर ऽनठि ऱइ॥2॥
भ़ि़थग:-(आस स़रे स़ज-सम़न के स़थ) म़नो सियं कठोरपन
श्रेष्ठ िार क़ शरार ध़रण करके धनिष ऽिद्य़ साख रह़ है। श्रा
रघिऩथजा को सब ह़ल सिऩकर िह ऐसे बैठा है, म़नो
ऽनष्ठि रत़ हा शरार ध़रण दकए हुए हो॥2॥
* मन मिसिक़आ भ़निकिल भ़नी। ऱमि सहज अनंद ऽनध़नी॥
बोले बचन ऽबगत सब दीषन। मुद ि मंजिल जनि ब़ग ऽबभीषन॥3॥
भ़ि़थग:-सीयगकिल के सीय,ग सि़भ़ऽिक हा अनंदऽनध़न श्रा
ऱमचन्द्रजा मन में मिसकि ऱकर सब दीषणों से रऽहत ऐसे कोमल
और सिंदर िचन बोले जो म़नो ि़णा के भीषण हा थे-॥3॥
* सिनि जनना सोआ सिति बडभ़गा। जो ऽपति म़ति बचन ऄनिऱगा॥
तनय म़ति ऽपति तोषऽनह़ऱ। दिलभ
ग जनऽन सकल संस़ऱ॥4॥
भ़ि़थग:-हे म़त़! सिनो, िहा पित्र बडभ़गा है, जो ऽपत़-म़त़ के
िचनों क़ ऄनिऱगा (प़लन करने ि़ल़) है। (अज्ञ़ प़लन ि़ऱ)

म़त़-ऽपत़ को संतिष्ट करने ि़ल़ पित्र, हे जनना! स़रे संस़र में
दिलगभ है॥4॥
दोह़ :
* मिऽनगन ऽमलनि ऽबसेऽष बन सबऽह भ़ूँऽत ऽहत मोर।
तेऽह महूँ ऽपति अयसि बहुरर संमत जनना तोर॥41॥
भ़ि़थग:-िन में ऽिशेष रूप से मिऽनयों क़ ऽमल़प होग़, ऽजसमें
मेऱ सभा प्रक़र से कल्य़ण है। ईसमें भा, दफर ऽपत़जा की
अज्ञ़ और हे जनना! तिम्ह़रा सम्मऽत है,॥41॥
चौप़इ :
* भरति प्ऱनऽप्रय प़िवह ऱजी। ऽबऽध सब ऽबऽध मोऽह सनमिख
अजी॥
जौं न ज़ईूँ बन ऐसेहु क़ज़। प्रथम गऽनऄ मोऽह मीढ़
सम़ज़॥1॥
भ़ि़थग:-और प्ऱण ऽप्रय भरत ऱज्य प़िेंग।े (आन सभा ब़तों को
देखकर यह प्रतात होत़ है दक) अज ऽिध़त़ सब प्रक़र से मिझे
सम्मिख हैं (मेरे ऄनिकील हैं)। यदद ऐसे क़म के ऽलए भा मैं िन
को न ज़उूँ तो मीखों के सम़ज में सबसे पहले मेरा ऽगनता
करना च़ऽहए॥1॥

* सेिवह ऄरूँ डि कलपतरु त्य़गा। पररहरर ऄमुत लेवह ऽबषि म़गा॥
तेई न प़आ ऄस समई चिक़हीं। देखि ऽबच़रर म़ति मन म़हीं॥2॥
भ़ि़थग:-जो कल्पिुक्ष को छोडकर रें ड की सेि़ करते हैं और
ऄमुत त्य़ग कर ऽिष म़ूँग लेते हैं, हे म़त़! तिम मन में ऽिच़र
कर देखो, िे (मह़मीखग) भा ऐस़ मौक़ प़कर कभा न चीकेंगे॥2॥
* ऄंब एक दिखि मोऽह ऽबसेषा। ऽनपट ऽबकल नरऩयकि देखा॥
थोररवह ब़त ऽपतऽह दिख भ़रा। होऽत प्रताऽत न मोऽह
महत़रा॥3॥
भ़ि़थग:-हे म़त़! मिझे एक हा दिःख ऽिशेष रूप से हो रह़ है,
िह मह़ऱज को ऄत्यन्द्त व्य़कि ल देखकर। आस थोडा सा ब़त के
ऽलए हा ऽपत़जा को आतऩ भ़रा दिःख हो, हे म़त़! मिझे आस
ब़त पर ऽिश्व़स नहीं होत़॥3॥
* ऱई धार गिन ईदऽध ऄग़धी। भ़ मोऽह तें कछि बड ऄपऱधी॥
ज़तें मोऽह न कहत कछि ऱउ। मोरर सपथ तोऽह कहु
सऽतभ़उ॥4॥
भ़ि़थग:-क्योंदक मह़ऱज तो बडे हा धार और गिणों के ऄथ़ह
समिर हैं। ऄिश्य हा मिझसे कोइ बड़ ऄपऱध हो गय़ है,

ऽजसके क़रण मह़ऱज मिझसे कि छ नहीं कहते। तिम्हें मेरा सौगंध
है, म़त़! तिम सच-सच कहो॥4॥
दोह़ :
* सहज सकल रघिबर बचन कि मऽत कि रटल करर ज़न।
चलआ जोंक जल बक्रगऽत जद्यऽप सऽललि सम़न॥42॥
भ़ि़थग:-रघिकिल में श्रेष्ठ श्रा ऱमचन्द्रजा के सिभ़ि से हा साधे
िचनों को दिबिगऽि कै के या टेढ़़ हा करके ज़न रहा है, जैसे
यद्यऽप जल सम़न हा होत़ है, परन्द्ति जोंक ईसमें टेढ़ा च़ल से
हा चलता है॥42॥
चौप़इ :
* रहसा ऱऽन ऱम रुख प़इ। बोला कपट सनेहु जऩइ॥
सपथ तिम्ह़र भरत कै अऩ। हेति न दीसर मैं कछि ज़ऩ॥1॥
भ़ि़थग:-ऱना कै के या श्रा ऱमचन्द्रजा क़ रुख प़कर हर्तषत हो
गइ और कपटपीणग स्नेह ददख़कर बोला- तिम्ह़रा शपथ और भरत
की सौगंध है, मिझे ऱज़ के दिःख क़ दीसऱ कि छ भा क़रण
ऽिददत नहीं है॥1॥
* तिम्ह ऄपऱध जोगि नवह त़त़। जनना जनक बंधि सिखद़त़॥

ऱम सत्य सबि जो कछि कहह। तिम्ह ऽपति म़ति बचन रत
ऄहह॥2॥
भ़ि़थग:-हे त़त! तिम ऄपऱध के योग्य नहीं हो (तिमसे म़त़ऽपत़ क़ ऄपऱध बन पडे यह संभि नहीं)। तिम तो म़त़-ऽपत़
और भ़आयों को सिख देने ि़ले हो। हे ऱम! तिम जो कि छ कह
रहे हो, सब सत्य है। तिम ऽपत़-म़त़ के िचनों (के प़लन) में
तत्पर हो॥2॥
*ऽपतऽह बिझ़आ कहहु बऽल सोइ। चौथेंपन जेवह ऄजसि न होइ॥
तिम्ह सम सिऄन सिकुत जेवह दान्द्ह।े ईऽचत न त़सि ऽनऱदरु
कीन्द्ह॥े 3॥
भ़ि़थग:-मैं तिम्ह़रा बऽलह़रा ज़ता हूँ, तिम ऽपत़ को समझ़कर
िहा ब़त कहो, ऽजससे चौथेपन (बिढ़़पे) में आनक़ ऄपयश न
हो। ऽजस पिण्य ने आनको तिम जैसे पित्र ददए हैं, ईसक़ ऽनऱदर
करऩ ईऽचत नहीं॥3॥
* ल़गवह कि मिख बचन सिभ कै से। मगहूँ गय़ददक तारथ जैसे॥
ऱमऽह म़ति बचन सब भ़ए। ऽजऽम सिरसरर गत सऽलल
सिह़ए॥4॥
भ़ि़थग:-कै के या के बिरे मिख में ये शिभ िचन कै से लगते हैं जैसे
मगध देश में गय़ अददक ताथग! श्रा ऱमचन्द्रजा को म़त़

कै के या के सब िचन ऐसे ऄच्छे लगे जैसे गंग़जा में ज़कर
(ऄच्छे-बिरे सभा प्रक़र के ) जल शिभ, सिंदर हो ज़ते हैं॥4॥

श्रा ऱम-दशरथ संि़द, ऄिधि़ऽसयों क़ ऽिष़द, कै के या को
समझ़ऩ
दोह़ :

* गआ मिरुछ़ ऱमऽह सिऽमरर नुप दफरर करिट लान्द्ह।
सऽचि ऱम अगमन कऽह ऽबनय समय सम कीन्द्ह॥43॥
भ़ि़थग:-आतने में ऱज़ की मीछ़ग दीर हुइ, ईन्द्होंने ऱम क़ समरण
करके ('ऱम! ऱम!' कहकर) दफरकर करिट ला। मंत्रा ने श्रा
ऱमचन्द्रजा क़ अऩ कहकर समय़निकील ऽिनता की॥43॥
चौप़इ :
* ऄिऽनप ऄकऽन ऱमि पगि ध़रे । धरर धारजि तब नयन ईघ़रे ॥
सऽचिूँ सूँभ़रर ऱई बैठ़रे । चरन परत नुप ऱमि ऽनह़रे ॥1॥
भ़ि़थग:-जब ऱज़ ने सिऩ दक श्रा ऱमचन्द्र पध़रे हैं तो ईन्द्होंने
धारज धरके नेत्र खोले। मंत्रा ने संभ़लकर ऱज़ को बैठ़य़।
ऱज़ ने श्रा ऱमचन्द्रजा को ऄपने चरणों में पडते (प्रण़म करते)
देख़॥1॥
* ऽलए सनेह ऽबकल ईर ल़इ। गै मऽन मनहुूँ फऽनक दफरर प़इ॥
ऱमऽह ऽचतआ रहेई नरऩह। चल़ ऽबलोचन ब़रर प्रब़ह॥2॥
भ़ि़थग:-स्नेह से ऽिकल ऱज़ ने ऱमजा को हृदय से लग़ ऽलय़।
म़नो स़ूँप ने ऄपना खोइ हुइ मऽण दफर से प़ ला हो। ऱज़
दशरथजा श्रा ऱमजा को देखते हा रह गए। ईनके नेत्रों से
अूँसिओं की ध़ऱ बह चला॥2॥

* सोक ऽबबस कछि कहै न प़ऱ। हृदयूँ लग़ित ब़रवह ब़ऱ॥
ऽबऽधऽह मऩि ऱई मन म़हीं। जेवह रघिऩथ न क़नन ज़हीं॥3॥
भ़ि़थग:-शोक के ऽिशेष िश होने के क़रण ऱज़ कि छ कह नहीं
सकते। िे ब़र-ब़र श्रा ऱमचन्द्रजा को हृदय से लग़ते हैं और
मन में ब्रह्म़जा को मऩते हैं दक ऽजससे श्रा ऱघिऩथजा िन को
न ज़एूँ॥3॥
* सिऽमरर महेसऽह कहआ ऽनहोरा। ऽबनता सिनहु सद़ऽसि मोरा॥
असितोष तिम्ह ऄिढर द़ना। अरऽत हरहु दान जनि ज़ना॥4॥
भ़ि़थग:-दफर मह़देिजा क़ समरण करके ईनसे ऽनहोऱ करते
हुए कहते हैं- हे सद़ऽशि! अप मेरा ऽिनता सिऽनए। अप
अशितोष (शाघ्र प्रसन्न होने ि़ले) और ऄिढरद़ना (मिूँहम़ूँग़ दे
ड़लने ि़ले) हैं। ऄतः मिझे ऄपऩ दान सेिक ज़नकर मेरे दिःख
को दीर कीऽजए॥4॥
दोह़ :
* तिम्ह प्रेरक सब के हृदयूँ सो मऽत ऱमऽह देहु।
बचनि मोर तऽज रहवह घर पररहरर सालि सनेहु॥44॥
भ़ि़थग:-अप प्रेरक रूप से सबके हृदय में हैं। अप श्रा ऱमचन्द्र
को ऐसा बिऽि दाऽजए, ऽजससे िे मेरे िचन को त्य़गकर और
शाल-स्नेह को छोडकर घर हा में रह ज़एूँ॥44॥

चौप़इ :
* ऄजसि होई जग सिजसि नस़उ। नरक परौं बरु सिरपिरु ज़उ॥
सब दिख दिसह सह़िहु मोहा। लोचन ओट ऱमि जऽन होंहा॥1॥
भ़ि़थग:-जगत में च़हे ऄपयश हो और सियश नष्ट हो ज़ए। च़हे
(नय़ प़प होने से) मैं नरक में ऽगरूूँ, ऄथि़ सिगग चल़ ज़ए
(पीिग पिण्यों के फलसिरूप ऽमलने ि़ल़ सिगग च़हे मिझे न ऽमले)।
और भा सब प्रक़र के दिःसह दिःख अप मिझसे सहन कऱ लें।
पर श्रा ऱमचन्द्र मेरा अूँखों की ओट न हों॥1॥
* ऄस मन गिनआ ऱई नवह बोल़। पापर प़त सररस मनि डोल़॥
रघिपऽत ऽपतऽह प्रेमबस ज़ना। पिऽन कछि कऽहऽह म़ति
ऄनिम़ना॥2॥
भ़ि़थग:-ऱज़ मन हा मन आस प्रक़र ऽिच़र कर रहे हैं, बोलते
नहीं। ईनक़ मन पापल के पिे की तरह डोल रह़ है। श्रा
रघिऩथजा ने ऽपत़ को प्रेम के िश ज़नकर और यह ऄनिम़न
करके दक म़त़ दफर कि छ कहेगा (तो ऽपत़जा को दिःख
होग़)॥2॥
* देस क़ल ऄिसर ऄनिस़रा। बोले बचन ऽबनात ऽबच़रा॥
त़त कहईूँ कछि करईूँ दढठ़इ। ऄनिऽचति छमब ज़ऽन लररक़इ॥3॥

भ़ि़थग:-देश, क़ल और ऄिसर के ऄनिकील ऽिच़र कर ऽिनात
िचन कहे- हे त़त! मैं कि छ कहत़ हूँ, यह दढठ़इ करत़ हूँ। आस
ऄनौऽचत्य को मेरा ब़ल्य़िसथ़ समझकर क्षम़ कीऽजएग़॥3॥
* ऄऽत लघि ब़त ल़ऽग दिखि प़ि़। क़हुूँ न मोऽह कऽह प्रथम
जऩि़॥
देऽख गोस़आूँ ऽह पीऽूँ छईूँ म़त़। सिऽन प्रसंगि भए सातल ग़त़॥4॥
भ़ि़थग:-आस ऄत्यन्द्त तिच्छ ब़त के ऽलए अपने आतऩ दिःख
प़य़। मिझे दकसा ने पहले कहकर यह ब़त नहीं जऩइ। सि़मा
(अप) को आस दश़ में देखकर मैंने म़त़ से पीछ़। ईनसे स़ऱ
प्रसंग सिनकर मेरे सब ऄंग शातल हो गए (मिझे बडा प्रसन्नत़
हुइ)॥4॥
दोह़ :
* मंगल समय सनेह बस सोच पररहररऄ त़त।
अयसि देआऄ हरऽष ऽहयूँ कऽह पिलके प्रभि ग़त॥45॥
भ़ि़थग:-हे ऽपत़जा! आस मंगल के समय स्नेहिश होकर सोच
करऩ छोड दाऽजए और हृदय में प्रसन्न होकर मिझे अज्ञ़
दाऽजए। यह कहते हुए प्रभि श्रा ऱमचन्द्रजा सि़ांग पिलदकत हो
गए॥45॥
चौप़इ :

* धन्द्य जनमि जगतातल त़सी। ऽपतऽह प्रमोदि चररत सिऽन ज़सी॥
च़रर पद़रथ करतल त़कें । ऽप्रय ऽपति म़ति प्ऱन सम ज़कें ॥1॥
भ़ि़थग:-(ईन्द्होंने दफर कह़-) आस पुथ्िातल पर ईसक़ जन्द्म धन्द्य
है, ऽजसके चररत्र सिनकर ऽपत़ को परम अनंद हो, ऽजसको
म़त़-ऽपत़ प्ऱणों के सम़न ऽप्रय हैं, च़रों पद़थग (ऄथग, धमग,
क़म, मोक्ष) ईसके करतलगत (मिट्ठा में) रहते हैं॥1॥
* अयसि प़ऽल जनम फलि प़इ। ऐहईूँ बेऽगवह होई रज़इ॥
ऽबद़ म़ति सन अिईूँ म़गा। चऽलहईूँ बनऽह बहुरर पग
ल़गा॥2॥
भ़ि़थग:-अपकी अज्ञ़ प़लन करके और जन्द्म क़ फल प़कर मैं
जल्दा हा लौट अउूँग़, ऄतः कु पय़ अज्ञ़ दाऽजए। म़त़ से
ऽिद़ म़ूँग अत़ हूँ। दफर अपके पैर लगकर (प्रण़म करके ) िन
को चलीूँग़॥2॥
* ऄस कऽह ऱम गिनि तब कीन्द्ह़। भीप सोक बस ईतरु न
दान्द्ह़॥
नगर ब्य़ऽप गआ ब़त सिताछा। छि ऄत चढ़ा जनि सब तन
बाछा॥3॥
भ़ि़थग:-ऐस़ कहकर तब श्रा ऱमचन्द्रजा िह़ूँ से चल ददए।
ऱज़ ने शोकिश कोइ ईिर नहीं ददय़। िह बहुत हा ताखा

(ऄऽप्रय) ब़त नगर भर में आतना जल्दा फै ल गइ, म़नो डंक
म़रते हा ऽबच्छी क़ ऽिष स़रे शरार में चढ़ गय़ हो॥3॥
* सिऽन भए ऽबकल सकल नर ऩरा। बेऽल ऽबटप ऽजऽम देऽख
दि़रा॥
जो जहूँ सिनआ धिनआ ऽसरु सोइ। बड ऽबष़दि नवह धारजि होइ॥4॥
भ़ि़थग:-आस ब़त को सिनकर सब स्त्रा-पिरुष ऐसे व्य़कि ल हो गए
जैसे द़ि़नल (िन में अग लगा) देखकर बेल और िुक्ष मिरझ़
ज़ते हैं। जो जह़ूँ सिनत़ है, िह िहीं ऽसर धिनने (पाटने) लगत़
है! बड़ ऽिष़द है, दकसा को धारज नहीं बूँधत़॥4॥
दोह़ :
* मिख सिख़वह लोचन स्रिवह सोकि न हृदयूँ सम़आ।
मनहुूँ करुन रस कटकइ ईतरा ऄिध बज़आ॥46॥
भ़ि़थग:-सबके मिख सीखे ज़ते हैं, अूँखों से अूँसी बहते हैं, शोक
हृदय में नहीं सम़त़। म़नो करुण़ रस की सेऩ ऄिध पर
डंक़ बज़कर ईतर अइ हो॥46॥
चौप़इ :
* ऽमलेऽह म़झ ऽबऽध ब़त बेग़रा। जहूँ तहूँ देवह कै कआऽह ग़रा॥
एऽह प़ऽपऽनऽह बीऽझ क़ परे उ। छ़आ भिन पर प़िकि धरे उ॥1॥

भ़ि़थग:-सब मेल ऽमल गए थे (सब संयोग ठाक हो गए थे),
आतने में हा ऽिध़त़ ने ब़त ऽबग़ड दा! जह़ूँ-तह़ूँ लोग कै के या
को ग़ला दे रहे हैं! आस प़ऽपन को क्य़ सीझ पड़ जो आसने
छ़ए घर पर अग रख दा॥1॥
* ऽनज कर नयन क़दढ़ चह दाख़। ड़रर सिध़ ऽबषि च़हत
चाख़॥
कि रटल कठोर कि बिऽि ऄभ़गा। भआ रघिबंस बेनि बन अगा॥2॥
भ़ि़थग:-यह ऄपने ह़थ से ऄपना अूँखों को ऽनक़लकर (अूँखों
के ऽबऩ हा) देखऩ च़हता है और ऄमुत फें ककर ऽिष चखऩ
च़हता है! यह कि रटल, कठोर, दिबिगऽि और ऄभ़ऽगना कै के या
रघििंश रूपा ब़ूँस के िन के ऽलए ऄऽग्न हो गइ!॥2॥
* प़लि बैरठ पेड़ु एवह क़ट़। सिख महुूँ सोक ठ़टि धरर ठ़ट़॥
सद़ ऱमि एऽह प्ऱन सम़ऩ। क़रन किन कि रटलपनि ठ़ऩ॥3॥
भ़ि़थग:-पिे पर बैठकर आसने पेड को क़ट ड़ल़। सिख में शोक
क़ ठ़ट ठटकर रख ददय़! श्रा ऱमचन्द्रजा आसे सद़ प्ऱणों के
सम़न ऽप्रय थे। दफर भा न ज़ने दकस क़रण आसने यह
कि रटलत़ ठ़ना॥3॥
* सत्य कहवह कऽब ऩरर सिभ़उ। सब ऽबऽध ऄगहु ऄग़ध
दिऱउ॥

ऽनज प्रऽतवबबि बरुकि गऽह ज़इ। ज़ऽन न ज़आ ऩरर गऽत
भ़इ॥4॥
भ़ि़थग:-कऽि सत्य हा कहते हैं दक स्त्रा क़ सिभ़ि सब प्रक़र
से पकड में न अने योग्य, ऄथ़ह और भेदभऱ होत़ है। ऄपना
परछ़हीं भले हा पकड ज़ए, पर भ़इ! ऽस्त्रयों की गऽत (च़ल)
नहीं ज़ना ज़ता॥4॥
दोह़ :
* क़ह न प़िकि ज़रर सक क़ न समिर सम़आ।
क़ न करै ऄबल़ प्रबल के ऽह जग क़लि न ख़आ॥47॥
भ़ि़थग:-अग क्य़ नहीं जल़ सकता! समिर में क्य़ नहीं सम़
सकत़! ऄबल़ कह़ने ि़ला प्रबल स्त्रा (ज़ऽत) क्य़ नहीं कर
सकता! और जगत में क़ल दकसको नहीं ख़त़!॥47॥
चौप़इ :
* क़ सिऩआ ऽबऽध क़ह सिऩि़। क़ देख़आ चह क़ह देख़ि़॥
एक कहवह भल भीप न कीन्द्ह़। बरु ऽबच़रर नवह कि मऽतऽह
दान्द्ह़॥1॥
भ़ि़थग:-ऽिध़त़ ने क्य़ सिऩकर क्य़ सिऩ ददय़ और क्य़
ददख़कर ऄब िह क्य़ ददख़ऩ च़हत़ है! एक कहते हैं दक

ऱज़ ने ऄच्छ़ नहीं दकय़, दिबिगऽि कै के या को ऽिच़रकर िर
नहीं ददय़॥1॥
* जो हरठ भयई सकल दिख भ़जनि। ऄबल़ ऽबबस ग्य़नि गिनि ग़
जनि॥
एक धरम परऽमऽत पऽहच़ने। नुपऽह दोसि नवह देवह सय़ने॥2॥
भ़ि़थग:-जो हठ करके (कै के या की ब़त को पीऱ करने में ऄडे
रहकर) सियं सब दिःखों के प़त्र हो गए। स्त्रा के ऽिशेष िश
होने के क़रण म़नो ईनक़ ज्ञ़न और गिण ज़त़ रह़। एक
(दीसरे ) जो धमग की मय़गद़ को ज़नते हैं और सय़ने हैं, िे
ऱज़ को दोष नहीं देते॥2॥
* ऽसऽब दधाऽच हररचंद कह़ना। एक एक सन कहवह बख़ना॥
एक भरत कर संमत कहहीं। एक ईद़स भ़यूँ सिऽन रहहीं॥3॥
भ़ि़थग:-िे ऽशऽब, दधाऽच और हररश्चन्द्र की कथ़ एक-दीसरे से
बख़नकर कहते हैं। कोइ एक आसमें भरतजा की सम्मऽत बत़ते
हैं। कोइ एक सिनकर ईद़सान भ़ि से रह ज़ते हैं (कि छ बोलते
नहीं)॥3॥
* क़न मीदद कर रद गऽह जाह़। एक कहवह यह ब़त ऄलाह़॥
सिकुत ज़वह ऄस कहत तिम्ह़रे । ऱमि भरत कहुूँ प्ऱनऽपअरे ॥4॥

भ़ि़थग:-कोइ ह़थों से क़न मीूँदकर और जाभ को द़ूँतों तले
दब़कर कहते हैं दक यह ब़त झीठ है, ऐसा ब़त कहने से
तिम्ह़रे पिण्य नष्ट हो ज़एूँगे। भरतजा को तो श्रा ऱमचन्द्रजा
प्ऱणों के सम़न प्य़रे हैं॥4॥
दोह़ :
* चंद ि चिै बरु ऄनल कन सिध़ होआ ऽबषतील।
सपनेहुूँ कबहुूँ न करवह दकछि भरति ऱम प्रऽतकी ल॥48॥
भ़ि़थग:-चन्द्रम़ च़हे (शातल दकरणों की जगह) अग की
ऽचनग़ररय़ूँ बरस़ने लगे और ऄमुत च़हे ऽिष के सम़न हो
ज़ए, परन्द्ति भरतजा सिप्न में भा कभा श्रा ऱमचन्द्रजा के ऽिरुि
कि छ नहीं करें गे॥48॥
चौप़इ :
* एक ऽबध़तऽह दीषनि देहीं। सिध़ देख़आ दान्द्ह ऽबषि जेहीं॥
खरभरु नगर सोचि सब क़ह। दिसह द़हु ईर ऽमट़ ईछ़ह॥1॥
भ़ि़थग:-कोइ एक ऽिध़त़ को दोष देते हैं, ऽजसने ऄमुत
ददख़कर ऽिष दे ददय़। नगर भर में खलबला मच गइ, सब
दकसा को सोच हो गय़। हृदय में दिःसह जलन हो गइ, अनंदईत्स़ह ऽमट गय़॥1॥

* ऽबप्रबधी कि लम़न्द्य जठे रा। जे ऽप्रय परम कै कइ के रा॥
लगीं देन ऽसख सालि सऱहा। बचन ब़नसम ल़गवह त़हीं॥2॥
भ़ि़थग:-ब्ऱह्मणों की ऽस्त्रय़ूँ, कि ल की म़ननाय बडा-बीढ़ा और जो
कै के या की परम ऽप्रय थीं, िे ईसके शाल की सऱहऩ करके ईसे
साख देने लगीं। पर ईसको ईनके िचन ब़ण के सम़न लगते
हैं॥2॥
* भरति न मोऽह ऽप्रय ऱम सम़ऩ। सद़ कहहु यहु सबि जगि
ज़ऩ॥
करहु ऱम पर सहज सनेह। के वह ऄपऱध अजि बनि देह॥3॥
भ़ि़थग:-(िे कहता हैं-) तिम तो सद़ कह़ करता थीं दक श्रा
ऱमचंर के सम़न मिझको भरत भा प्य़रे नहीं हैं, आस ब़त को
स़ऱ जगत् ज़नत़ है। श्रा ऱमचंरजा पर तो तिम सि़भ़ऽिक
हा स्नेह करता रहा हो। अज दकस ऄपऱध से ईन्द्हें िन देता
हो?॥3॥
* कबहुूँ न दकयहु सिऽत अरे सी। प्राऽत प्रताऽत ज़न सबि देसी॥
कौसल्य़ूँ ऄब क़ह ऽबग़ऱ। तिम्ह जेऽह ल़ऽग बज्र पिर प़ऱ॥4॥
भ़ि़थग:-तिमने कभा सौऽतय़ड़ह नहीं दकय़। स़ऱ देश तिम्ह़रे
प्रेम और ऽिश्व़स को ज़नत़ है। ऄब कौसल्य़ ने तिम्ह़ऱ कौन

स़ ऽबग़ड कर ददय़, ऽजसके क़रण तिमने स़रे नगर पर िज्र
ऽगऱ ददय़॥4॥
दोह़ :
* साय दक ऽपय सूँगि पररहररऽह लखनि करऽहहवह ध़म।
ऱजि दक भीूँजब भरत पिर नुपि दक ऽजआऽह ऽबनि ऱम॥49॥
भ़ि़थग:-क्य़ सात़जा ऄपने पऽत (श्रा ऱमचंरजा) क़ स़थ छोड
देंगा? क्य़ लक्ष्मणजा श्रा ऱमचंरजा के ऽबऩ घर रह सकें गे?
क्य़ भरतजा श्रा ऱमचंरजा के ऽबऩ ऄयोध्य़पिरा क़ ऱज्य
भोग सकें गे? और क्य़ ऱज़ श्रा ऱमचंरजा के ऽबऩ जाऽित रह
सकें गे? (ऄथ़गत् न सात़जा यह़ूँ रहेंगा, न लक्ष्मणजा रहेंग,े न
भरतजा ऱज्य करें गे और न ऱज़ हा जाऽित रहेंग,े सब ईज़ड
हो ज़एग़।)॥49॥
चौप़इ :
* ऄस ऽबच़रर ईर छ़डहु कोह। सोक कलंक कोरठ जऽन होह॥
भरतऽह ऄिऽस देहु जिबऱजी। क़नन क़ह ऱम कर क़जी॥1॥
भ़ि़थग:-हृदय में ऐस़ ऽिच़र कर क्रोध छोड दो, शोक और
कलंक की कोठा मत बनो। भरत को ऄिश्य यििऱजपद दो, पर
श्रा ऱमचंरजा क़ िन में क्य़ क़म है?॥1॥

* ऩऽहन ऱमि ऱज के भीखे। धरम धिरान ऽबषय रस रूखे॥
गिर गुह बसहुूँ ऱमि तऽज गेह। नुप सन ऄस बरु दीसर लेह॥2॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचंरजा ऱज्य के भीखे नहीं हैं। िे धमग की धिरा
को ध़रण करने ि़ले और ऽिषय रस से रूखे हैं (ऄथ़गत् ईनमें
ऽिषय़सऽक्त है हा नहीं), आसऽलए तिम यह शंक़ न करो दक श्रा
ऱमजा िन न गए तो भरत के ऱज्य में ऽिघ्न करें गे, आतने पर
भा मन न म़ने तो) तिम ऱज़ से दीसऱ ऐस़ (यह) िर ले लो
दक श्रा ऱम घर छोडकर गिरु के घर रहें॥2॥
* जौं नवह लऽगहहु कहें हम़रे । नवह ल़ऽगऽह कछि ह़थ तिम्ह़रे ॥
जौं पररह़स कीऽन्द्ह कछि होइ। तौ कऽह प्रगट जऩिहु सोइ॥3॥
भ़ि़थग:-जो तिम हम़रे कहने पर न चलोगा तो तिम्ह़रे ह़थ
कि छ भा न लगेग़। यदद तिमने कि छ हूँसा की हो तो ईसे प्रकट
में कहकर जऩ दो (दक मैंने ददल्लगा की है)॥3॥
* ऱम सररस सित क़नन जोगी। क़ह कऽहऽह सिऽन तिम्ह कहुूँ
लोगी॥
ईठहु बेऽग सोआ करहु ईप़इ। जेऽह ऽबऽध सोकि कलंकि नस़इ॥4॥

भ़ि़थग:-ऱम सराख़ पित्र क्य़ िन के योग्य है? यह सिनकर
लोग तिम्हें क्य़ कहेंगे! जल्दा ईठो और िहा ईप़य करो ऽजस
ईप़य से आस शोक और कलंक क़ ऩश हो॥4॥
छंद :
* जेऽह भ़ूँऽत सोकि कलंकि ज़आ ईप़य करर कि ल प़लहा।
हरठ फे रु ऱमऽह ज़त बन जऽन ब़त दीसरर च़लहा॥
ऽजऽम भ़नि ऽबनि ददनि प्ऱन ऽबनि तनि चंद ऽबनि ऽजऽम ज़ऽमना।
ऽतऽम ऄिध तिलसाद़स प्रभि ऽबन समिऽझ धौं ऽजयूँ भ़मना॥
भ़ि़थग:-ऽजस तरह (नगरभर क़) शोक और (तिम्ह़ऱ) कलंक
ऽमटे, िहा ईप़य करके कि ल की रक्ष़ कर। िन ज़ते हुए श्रा
ऱमजा को हठ करके लौट़ ले, दीसरा कोइ ब़त न चल़।
तिलसाद़सजा कहते हैं- जैसे सीयग के ऽबऩ ददन, प्ऱण के ऽबऩ
शरार और चंरम़ के ऽबऩ ऱत (ऽनजीि तथ़ शोभ़हान हो
ज़ता है), िैसे हा श्रा ऱमचंरजा के ऽबऩ ऄयोध्य़ हो ज़एगा,
हे भ़ऽमना! ती ऄपने हृदय में आस ब़त को समझ (ऽिच़रकर
देख) तो सहा।
सोरठ़ :
* सऽखन्द्ह ऽसख़िनि दान्द्ह सिनत मधिर पररऩम ऽहत।
तेआूँ कछि क़न न कीन्द्ह कि रटल प्रबोधा की बरा॥50॥

भ़ि़थग:-आस प्रक़र सऽखयों ने ऐसा साख दा जो सिनने में माठा
और पररण़म में ऽहतक़रा था। पर कि रटल़ कि बरा की ऽसख़इपढ़़इ हुइ कै के या ने आस पर जऱ भा क़न नहीं ददय़॥50॥
चौप़इ :
* ईतरु न देआ दिसह ररस रूखा। मुऽगन्द्ह ऽचति जनि ब़ऽघऽन
भीखा॥
ब्य़ऽध ऄस़ऽध ज़ऽन ऽतन्द्ह त्य़गा। चलीं कहत मऽतमंद
ऄभ़गा॥1॥
भ़ि़थग:-कै के या कोइ ईिर नहीं देता, िह दिःसह क्रोध के म़रे
रूखा (बेमिरव्ित) हो रहा है। ऐसे देखता है म़नो भीखा ब़ऽघन
हररऽनयों को देख रहा हो। तब सऽखयों ने रोग को ऄस़ध्य
समझकर ईसे छोड ददय़। सब ईसको मंदबिऽि, ऄभ़ऽगना कहता
हुइ चल दीं॥1॥
* ऱजि करत यह दैऄूँ ऽबगोइ। कीन्द्हऽे स ऄस जस करआ न कोइ॥
एऽह ऽबऽध ऽबलपवह पिर नर ऩरीं। देवह कि च़ऽलऽह कोरटक
ग़रीं॥2॥
भ़ि़थग:-ऱज्य करते हुए आस कै के या को दैि ने नष्ट कर ददय़।
आसने जैस़ कि छ दकय़, िैस़ कोइ भा न करे ग़! नगर के सब

स्त्रा-पिरुष आस प्रक़र ऽिल़प कर रहे हैं और ईस कि च़ला कै के या
को करोडों ग़ऽलय़ूँ दे रहे हैं॥2॥
* जरवह ऽबषम जर लेवह ईस़स़। किऽन ऱम ऽबनि जािन
अस़॥
ऽबपिल ऽबयोग प्रज़ ऄकि ल़ना। जनि जलचर गन सीखत प़ना॥3॥
भ़ि़थग:-लोग ऽिषम ज्िर (भय़नक दिःख की अग) से जल रहे
हैं। लंबा स़ूँसें लेते हुए िे कहते हैं दक श्रा ऱमचंरजा के ऽबऩ
जाने की कौन अश़ है। मह़न् ऽियोग (की अशंक़) से प्रज़
ऐसा व्य़कि ल हो गइ है म़नो प़ना सीखने के समय जलचर
जािों क़ समिद़य व्य़कि ल हो!॥3

,

श्रा ऱम-कौसल्य़ संि़द
* ऄऽत ऽबष़द बस लोग लोग़ईं। गए म़ति पवह ऱमि गोस़ईं॥
मिख प्रसन्न ऽचत चौगिन च़उ। ऽमट़ सोचि जऽन ऱखै ऱउ॥4॥
भ़ि़थग:-सभा पिरुष और ऽस्त्रय़ूँ ऄत्यंत ऽिष़द के िश हो रहे हैं।
सि़मा श्रा ऱमचंरजा म़त़ कौसल्य़ के प़स गए। ईनक़ मिख
प्रसन्न है और ऽचि में चौगिऩ च़ि (ईत्स़ह) है। यह सोच ऽमट
गय़ है दक ऱज़ कहीं रख न लें। (श्रा ऱमजा को ऱजऽतलक
की ब़त सिनकर ऽिष़द हुअ थ़ दक सब भ़आयों को छोडकर
बडे भ़इ मिझको हा ऱजऽतलक क्यों होत़ है। ऄब म़त़ कै के या
की अज्ञ़ और ऽपत़ की मौन सम्मऽत प़कर िह सोच ऽमट
गय़।)॥4॥
दोह़ :
* नि गयंद ि रघिबार मनि ऱजि ऄल़न सम़न।
छी ट ज़ऽन बन गिनि सिऽन ईर ऄनंद ि ऄऽधक़न॥51॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचंरजा क़ मन नए पकडे हुए ह़था के सम़न
और ऱजऽतलक ईस ह़था के ब़ूँधने की क़ूँटेद़र लोहे की बेडा

के सम़न है। 'िन ज़ऩ है' यह सिनकर, ऄपने को बंधन से छी ट़
ज़नकर, ईनके हृदय में अनंद बढ़ गय़ है॥51॥
चौप़इ :
* रघिकिलऽतलक जोरर दोई ह़थ़। मिददत म़ति पद ऩयई म़थ़॥
दाऽन्द्ह ऄसास ल़आ ईर लान्द्ह।े भीषन बसन ऽनछ़िरर कीन्द्ह॥े 1॥
भ़ि़थग:-रघिकिल ऽतलक श्रा ऱमचंरजा ने दोनों ह़थ जोडकर
अनंद के स़थ म़त़ के चरणों में ऽसर नि़य़। म़त़ ने
अशाि़गद ददय़, ऄपने हृदय से लग़ ऽलय़ और ईन पर गहने
तथ़ कपडे ऽनछ़िर दकए॥1॥
* ब़र-ब़र मिख चिंबऽत म़त़। नयन नेह जलि पिलदकत ग़त़॥
गोद ऱऽख पिऽन हृदयूँ लग़ए। स्रित प्रेमरस पयद सिह़ए॥2॥
भ़ि़थग:-म़त़ ब़र-ब़र श्रा ऱमचंरजा क़ मिख चीम रहा हैं।
नेत्रों में प्रेम क़ जल भर अय़ है और सब ऄंग पिलदकत हो
गए हैं। श्रा ऱम को ऄपना गोद में बैठ़कर दफर हृदय से लग़
ऽलय़। सिंदर सतन प्रेमरस (दीध) बह़ने लगे॥2॥
* प्रेमि प्रमोदि न कछि कऽह ज़इ। रं क धनद पदबा जनि प़इ॥
स़दर सिंदर बदनि ऽनह़रा। बोला मधिर बचन महत़रा॥3॥

भ़ि़थग:-ईनक़ प्रेम और मह़न् अनंद कि छ कह़ नहीं ज़त़।
म़नो कं ग़ल ने कि बेर क़ पद प़ ऽलय़ हो। बडे अदर के स़थ
सिंदर मिख देखकर म़त़ मधिर िचन बोलीं-॥3॥
* कहहु त़त जनना बऽलह़रा। कबवह लगन मिद मंगलक़रा॥
सिकुत साल सिख सािूँ सिह़इ। जनम ल़भ कआ ऄिऽध ऄघ़इ॥4॥
भ़ि़थग:-हे त़त! म़त़ बऽलह़रा ज़ता है, कहो, िह अनंदमंगलक़रा लग्न कब है, जो मेरे पिण्य, शाल और सिख की सिद
ं र
साम़ है और जन्द्म लेने के ल़भ की पीणगतम ऄिऽध है,॥4॥
दोह़ :
* जेऽह च़हत नर ऩरर सब ऄऽत अरत एऽह भ़ूँऽत।
ऽजऽम च़तक च़तदक तुऽषत बुऽष्ट सरद ररति सि़ऽत॥52॥
भ़ि़थग:-तथ़ ऽजस (लग्न) को सभा स्त्रा-पिरुष ऄत्यंत व्य़कि लत़ से
आस प्रक़र च़हते हैं ऽजस प्रक़र प्य़स से च़तक और च़तकी
शरद् ऊति के सि़ऽत नक्षत्र की िष़ग को च़हते हैं॥52॥
चौप़इ :
* त़त ज़ईूँ बऽल बेऽग ऩह़ह। जो मन भ़ि मधिर कछि ख़ह॥
ऽपति समाप तब ज़एहु भैअ। भआ बऽड ब़र ज़आ बऽल मैअ॥1॥

भ़ि़थग:-हे त़त! मैं बलैय़ लेता हूँ, तिम जल्दा नह़ लो और जो
मन भ़िे, कि छ ऽमठ़इ ख़ लो। भैय़! तब ऽपत़ के प़स ज़ऩ।
बहुत देर हो गइ है, म़त़ बऽलह़रा ज़ता है॥1॥
* म़ति बचन सिऽन ऄऽत ऄनिकील़। जनि सनेह सिरतरु के फी ल़॥
सिख मकरं द भरे ऽश्रयमील़। ऽनरऽख ऱम मनि भिूँरु न भील़॥2॥
भ़ि़थग:-म़त़ के ऄत्यंत ऄनिकील िचन सिनकर- जो म़नो स्नेह
रूपा कल्पिुक्ष के फी ल थे, जो सिख रूपा मकरन्द्द (पिष्परस) से
भरे थे और श्रा (ऱजलक्ष्मा) के मील थे- ऐसे िचन रूपा फी लों
को देकर श्रा ऱमचंरजा क़ मन रूपा भौंऱ ईन पर नहीं
भील़॥2॥
* धरम धिरान धरम गऽत ज़ना। कहेई म़ति सन ऄऽत मुद ि
ब़ना॥
ऽपत़ूँ दान्द्ह मोऽह क़नन ऱजी। जहूँ सब भ़ूँऽत मोर बड
क़जी॥3॥
भ़ि़थग:-धमगधिराण श्रा ऱमचंरजा ने धमग की गऽत को ज़नकर
म़त़ से ऄत्यंत कोमल ि़णा से कह़- हे म़त़! ऽपत़जा ने
मिझको िन क़ ऱज्य ददय़ है, जह़ूँ सब प्रक़र से मेऱ बड़
क़म बनने ि़ल़ है॥3॥
* अयसि देऽह मिददत मन म़त़। जेवह मिद मंगल क़नन ज़त़॥

जऽन सनेह बस डरपऽस भोरें । अनूँद ि ऄंब ऄनिग्रह तोरें ॥4॥
भ़ि़थग:-हे म़त़! ती प्रसन्न मन से मिझे अज्ञ़ दे, ऽजससे मेरा
िन य़त्ऱ में अनंद-मंगल हो। मेरे स्नेहिश भीलकर भा डरऩ
नहीं। हे म़त़! तेरा कु प़ से अनंद हा होग़॥4॥
दोह़ :
* बरष च़ररदस ऽबऽपन बऽस करर ऽपति बचन प्रम़न।
अआ प़य पिऽन देऽखहईूँ मनि जऽन करऽस मल़न॥53॥
भ़ि़थग:-चौदह िषग िन में रहकर, ऽपत़जा के िचन को
प्रम़ऽणत (सत्य) कर, दफर लौटकर तेरे चरणों क़ दशगन करूूँग़,
ती मन को म्ल़न (दिःखा) न कर॥53॥
चौप़इ :
* बचन ऽबनात मधिर रघिबर के । सर सम लगे म़ति ईर करके ॥
सहऽम सीऽख सिऽन सातऽल ब़ना। ऽजऽम जि़स परें प़िस
प़ना॥1॥
भ़ि़थग:-रघिकिल में श्रेष्ठ श्रा ऱमजा के ये बहुत हा नम्र और माठे
िचन म़त़ के हृदय में ब़ण के सम़न लगे और कसकने लगे।
ईस शातल ि़णा को सिनकर कौसल्य़ िैसे हा सहमकर सीख गईं
जैसे बरस़त क़ प़ना पडने से जि़स़ सीख ज़त़ है॥1॥

* कऽह न ज़आ कछि हृदय ऽबष़दी। मनहुूँ मुगा सिऽन के हरर ऩदी॥
नयन सजल तन थर थर क़ूँपा। म़जऽह ख़आ मान जनि
म़पा॥2॥
भ़ि़थग:-हृदय क़ ऽिष़द कि छ कह़ नहीं ज़त़। म़नो वसह की
गजगऩ सिनकर ऽहरना ऽिकल हो गइ हो। नेत्रों में जल भर
अय़, शरार थर-थर क़ूँपने लग़। म़नो मछला म़ूँज़ (पहला
िष़ग क़ फे न) ख़कर बदहि़स हो गइ हो!॥2॥
* धरर धारजि सित बदनि ऽनह़रा। गदगद बचन कहऽत महत़रा॥
त़त ऽपतऽह तिम्ह प्ऱनऽपअरे । देऽख मिददत ऽनत चररत तिम्ह़रे ॥3॥
भ़ि़थग:-धारज धरकर, पित्र क़ मिख देखकर म़त़ गदगद िचन
कहने लगीं- हे त़त! तिम तो ऽपत़ को प्ऱणों के सम़न ऽप्रय हो।
तिम्ह़रे चररत्रों को देखकर िे ऽनत्य प्रसन्न होते थे॥3॥
* ऱजि देन कहुूँ सिभ ददन स़ध़। कहेई ज़न बन के वह ऄपऱध़॥
त़त सिऩिहु मोऽह ऽनद़नी। को ददनकर कि ल भयई कु स़नी॥4॥
भ़ि़थग:-ऱज्य देने के ऽलए ईन्द्होंने हा शिभ ददन शोधि़य़ थ़।
दफर ऄब दकस ऄपऱध से िन ज़ने को कह़? हे त़त! मिझे
आसक़ क़रण सिऩओ! सीयगिंश (रूपा िन) को जल़ने के ऽलए
ऄऽग्न कौन हो गय़?॥4॥

दोह़ :
* ऽनरऽख ऱम रुख सऽचिसित क़रनि कहेई बिझ़आ।
सिऽन प्रसंगि रऽह मीक ऽजऽम दस़ बरऽन नवह ज़आ॥54॥
भ़ि़थग:- तब श्रा ऱमचन्द्रजा क़ रुख देखकर मन्द्त्रा के पित्र ने
सब क़रण समझ़कर कह़। ईस प्रसंग को सिनकर िे गीूँगा जैसा
(चिप) रह गईं, ईनकी दश़ क़ िणगन नहीं दकय़ ज़
सकत़॥54॥
चौप़इ :
* ऱऽख न सकआ न कऽह सक ज़ह। दिहूँ भ़ूँऽत ईर द़रुन द़ह॥
ऽलखत सिध़कर ग़ ऽलऽख ऱह। ऽबऽध गऽत ब़म सद़ सब
क़ह॥1॥
भ़ि़थग:-न रख हा सकता हैं, न यह कह सकता हैं दक िन चले
ज़ओ। दोनों हा प्रक़र से हृदय में बड़ भ़रा संत़प हो रह़
है। (मन में सोचता हैं दक देखो-) ऽिध़त़ की च़ल सद़ सबके
ऽलए टेढ़ा होता है। ऽलखने लगे चन्द्रम़ और ऽलख़ गय़
ऱहु॥1॥
* धरम सनेह ईभयूँ मऽत घेरा। भआ गऽत स़ूँप छि छि ंदरर के रा॥
ऱखईूँ सितऽह करईूँ ऄनिरोधी। धरमि ज़आ ऄरु बंधि ऽबरोधी॥2॥

भ़ि़थग:-धमग और स्नेह दोनों ने कौसल्य़जा की बिऽि को घेर
ऽलय़। ईनकी दश़ स़ूँप-छछी ूँदर की सा हो गइ। िे सोचने लगीं
दक यदद मैं ऄनिरोध (हठ) करके पित्र को रख लेता हूँ तो धमग
ज़त़ है और भ़आयों में ऽिरोध होत़ है,॥2॥
* कहईूँ ज़न बन तौ बऽड ह़ना। संकट सोच ऽबबस भआ ऱना॥
बहुरर समिऽझ ऽतय धरमि सय़ना। ऱमि भरति दोई सित सम
ज़ना॥3॥
भ़ि़थग:-और यदद िन ज़ने को कहता हूँ तो बडा ह़ऽन होता
है। आस प्रक़र के धमगसंकट में पडकर ऱना ऽिशेष रूप से सोच
के िश हो गईं। दफर बिऽिमता कौसल्य़जा स्त्रा धमग (प़ऽतव्रत
धमग) को समझकर और ऱम तथ़ भरत दोनों पित्रों को सम़न
ज़नकर-॥3॥
* सरल सिभ़ई ऱम महत़रा। बोला बचन धार धरर भ़रा॥
त़त ज़ईूँ बऽल कीन्द्हहु
े नाक़। ऽपति अयसि सब धरमक टाक़॥4॥
भ़ि़थग:-सरल सिभ़ि ि़ला श्रा ऱमचन्द्रजा की म़त़ बड़
धारज धरकर िचन बोलीं- हे त़त! मैं बऽलह़रा ज़ता हूँ, तिमने
ऄच्छ़ दकय़। ऽपत़ की अज्ञ़ क़ प़लन करऩ हा सब धमों
क़ ऽशरोमऽण धमग है॥4॥
दोह़ :

* ऱजि देन कऽहदान्द्ह बनि मोऽह न सो दिख लेसि।
तिम्ह ऽबनि भरतऽह भीपऽतऽह प्रजऽह प्रचंड कलेसि॥55॥
भ़ि़थग:-ऱज्य देने को कहकर िन दे ददय़, ईसक़ मिझे लेशम़त्र
भा दिःख नहीं है। (दिःख तो आस ब़त क़ है दक) तिम्ह़रे ऽबऩ
भरत को, मह़ऱज को और प्रज़ को बड़ भ़रा क्लेश
होग़॥55॥
चौप़इ :
* जौं के िल ऽपति अयसि त़त़। तौ जऽन ज़हु ज़ऽन बऽड म़त़॥
जौं ऽपति म़ति कहेई बन ज़ऩ। तौ क़नन सत ऄिध
सम़ऩ॥1॥
भ़ि़थग:-हे त़त! यदद के िल ऽपत़जा की हा अज्ञ़, हो तो म़त़
को (ऽपत़ से) बडा ज़नकर िन को मत ज़ओ, दकन्द्ति यदद
ऽपत़-म़त़ दोनों ने िन ज़ने को कह़ हो, तो िन तिम्ह़रे ऽलए
सैकडों ऄयोध्य़ के सम़न है॥1॥
* ऽपति बनदेि म़ति बनदेिा। खग मुग चरन सरोरुह सेिा॥
ऄंतहुूँ ईऽचत नुपऽह बनब़सी। बय ऽबलोदक ऽहयूँ होआ हऱूँसी॥2॥
भ़ि़थग:-िन के देित़ तिम्ह़रे ऽपत़ होंगे और िनदेऽिय़ूँ म़त़
होंगा। िह़ूँ के पशि-पक्षा तिम्ह़रे चरणकमलों के सेिक होंगे।

ऱज़ के ऽलए ऄंत में तो िनि़स करऩ ईऽचत हा है। के िल
तिम्ह़रा (सिकिम़र) ऄिसथ़ देखकर हृदय में दिःख होत़ है॥2॥
* बडभ़गा बनि ऄिध ऄभ़गा। जो रघिबंसऽतलक तिम्ह त्य़गा॥
जौं सित कहौं संग मोऽह लेह। तिम्हरे हृदयूँ होआ संदह
े ॥3॥
भ़ि़थग:-हे रघििंश के ऽतलक! िन बड़ भ़ग्यि़न है और यह
ऄिध ऄभ़ग़ है, ऽजसे तिमने त्य़ग ददय़। हे पित्र! यदद मैं कहूँ
दक मिझे भा स़थ ले चलो तो तिम्ह़रे हृदय में संदह
े होग़ (दक
म़त़ आसा बह़ने मिझे रोकऩ च़हता हैं)॥3॥
* पीत परम ऽप्रय तिम्ह सबहा के । प्ऱन प्ऱन के जािन जा के ॥
ते तिम्ह कहहु म़ति बन ज़उूँ। मैं सिऽन बचन बैरठ पऽछत़उूँ॥4॥
भ़ि़थग:-हे पित्र! तिम सभा के परम ऽप्रय हो। प्ऱणों के प्ऱण और
हृदय के जािन हो। िहा (प्ऱण़ध़र) तिम कहते हो दक म़त़! मैं
िन को ज़उूँ और मैं तिम्ह़रे िचनों को सिनकर बैठा पछत़ता
हूँ!॥4॥
दोह़ :
* यह ऽबच़रर नवह करईूँ हठ झीठ सनेहु बढ़़आ।
म़ऽन म़ति कर ऩत बऽल सिरऽत ऽबसरर जऽन ज़आ॥56॥

भ़ि़थग:-यह सोचकर झीठ़ स्नेह बढ़़कर मैं हठ नहीं करता! बेट़!
मैं बलैय़ लेता हूँ, म़त़ क़ ऩत़ म़नकर मेरा सिध भील न
ज़ऩ॥56॥
चौप़इ :
* देि ऽपतर सब तिम्हऽह गोस़ईं। ऱखहुूँ पलक नयन की ऩईं॥
ऄिऽध ऄंबि ऽप्रय पररजन माऩ। तिम्ह करुऩकर धरम धिराऩ॥1॥
भ़ि़थग:-हे गोस़ईं! सब देि और ऽपतर तिम्ह़रा िैसा हा रक्ष़
करें , जैसे पलकें अूँखों की रक्ष़ करता हैं। तिम्ह़रे िनि़स की
ऄिऽध (चौदह िषग) जल है, ऽप्रयजन और कि टि म्बा मछला हैं। तिम
दय़ की ख़न और धमग की धिरा को ध़रण करने ि़ले हो॥1॥
* ऄस ऽबच़रर सोआ करहु ईप़इ। सबऽह ऽजऄत जेवह भेंटहु
अइ॥
ज़हु सिखेन बनऽह बऽल ज़उूँ। करर ऄऩथ जन पररजन ग़उूँ॥2॥
भ़ि़थग:-ऐस़ ऽिच़रकर िहा ईप़य करऩ, ऽजसमें सबके जाते
जा तिम अ ऽमलो। मैं बऽलह़रा ज़ता हूँ, तिम सेिकों, पररि़र
ि़लों और नगर भर को ऄऩथ करके सिखपीिगक िन को
ज़ओ॥2॥
* सब कर अजि सिकुत फल बात़। भयई कऱल क़लि ऽबपरात़॥

बहुऽबऽध ऽबलऽप चरन लपट़ना। परम ऄभ़ऽगऽन अपिऽह
ज़ना॥3॥
भ़ि़थग:-अज सबके पिण्यों क़ फल पीऱ हो गय़। करठन क़ल
हम़रे ऽिपरात हो गय़। (आस प्रक़र) बहुत ऽिल़प करके और
ऄपने को परम ऄभ़ऽगना ज़नकर म़त़ श्रा ऱमचन्द्रजा के
चरणों में ऽलपट गईं॥3॥
* द़रुन दिसह द़हु ईर ब्य़प़। बरऽन न ज़वह ऽबल़प कल़प़॥
ऱम ईठ़आ म़ति ईर ल़इ। कऽह मुद ि बचन बहुरर समिझ़इ॥4॥
भ़ि़थग:-हृदय में भय़नक दिःसह संत़प छ़ गय़। ईस समय के
बहुऽिध ऽिल़प क़ िणगन नहीं दकय़ ज़ सकत़। श्रा ऱमचन्द्रजा
ने म़त़ को ईठ़कर हृदय से लग़ ऽलय़ और दफर कोमल
िचन कहकर ईन्द्हें समझ़य़॥4॥
दोह़ :
* सम़च़र तेऽह समय सिऽन साय ईठा ऄकि ल़आ।
ज़आ स़सि पद कमल जिग बंदद बैरठ ऽसरु ऩआ॥57॥
भ़ि़थग:-ईसा समय यह सम़च़र सिनकर सात़जा ऄकि ल़ ईठीं
और स़स के प़स ज़कर ईनके दोनों चरणकमलों की िंदऩ कर
ऽसर नाच़ करके बैठ गईं॥57॥
चौप़इ :

* दाऽन्द्ह ऄसास स़सि मुद ि ब़ना। ऄऽत सिकिम़रर देऽख ऄकि ल़ना॥
बैरठ नऽमत मिख सोचऽत सात़। रूप ऱऽस पऽत प्रेम पिनात़॥1॥
भ़ि़थग:-स़स ने कोमल ि़णा से अशाि़गद ददय़। िे सात़जा
को ऄत्यन्द्त सिकिम़रा देखकर व्य़कि ल हो ईठीं। रूप की ऱऽश
और पऽत के स़थ पऽित्र प्रेम करने ि़ला सात़जा नाच़ मिख
दकए बैठा सोच रहा हैं॥1॥
* चलन चहत बन जािनऩथी। के ऽह सिकुता सन होआऽह स़थी॥
की तनि प्ऱन दक के िल प्ऱऩ। ऽबऽध करतबि कछि ज़आ न
ज़ऩ॥2॥
भ़ि़थग:-जािनऩथ (प्ऱणऩथ) िन को चलऩ च़हते हैं। देखें
दकस पिण्यि़न से ईनक़ स़थ होग़- शरार और प्ऱण दोनों
स़थ ज़एूँगे य़ के िल प्ऱण हा से आनक़ स़थ होग़? ऽिध़त़
की करना कि छ ज़ना नहीं ज़ता॥2॥
* च़रु चरन नख लेखऽत धरना। नीपिर मिखर मधिर कऽब बरना॥
मनहुूँ प्रेम बस ऽबनता करहीं। हमऽह साय पद जऽन
पररहरहीं॥3॥
भ़ि़थग:-सात़जा ऄपने सिंदर चरणों के नखों से धरता कि रे द रहा
हैं। ऐस़ करते समय नीपिरों क़ जो मधिर शब्द हो रह़ है, कऽि
ईसक़ आस प्रक़र िणगन करते हैं दक म़नो प्रेम के िश होकर

नीपिर यह ऽिनता कर रहे हैं दक सात़जा के चरण कभा हम़ऱ
त्य़ग न करें ॥3॥
* मंजि ऽबलोचन मोचऽत ब़रा। बोला देऽख ऱम महत़रा॥
त़त सिनहु ऽसय ऄऽत सिकिम़रा। स़स ससिर पररजनऽह
ऽपअरा॥4॥
भ़ि़थग:-सात़जा सिंदर नेत्रों से जल बह़ रहा हैं। ईनकी यह
दश़ देखकर श्रा ऱमजा की म़त़ कौसल्य़जा बोलीं- हे त़त!
सिनो, सात़ ऄत्यन्द्त हा सिकिम़रा हैं तथ़ स़स, ससिर और
कि टि म्बा सभा को प्य़रा हैं॥4॥
दोह़ :
* ऽपत़ जनक भीप़ल मऽन ससिर भ़निकिल भ़नि।
पऽत रऽबकि ल कै रि ऽबऽपन ऽबधि गिन रूप ऽनध़नि॥58॥
भ़ि़थग:-आनके ऽपत़ जनकजा ऱज़ओं के ऽशरोमऽण हैं, ससिर
सीयगकिल के सीयग हैं और पऽत सीयगकिल रूपा कि मिदिन को ऽखल़ने
ि़ले चन्द्रम़ तथ़ गिण और रूप के भंड़र हैं॥58॥
* मैं पिऽन पित्रबधी ऽप्रय प़इ। रूप ऱऽस गिन साल सिह़इ॥
नयन पितरर करर प्राऽत बढ़़इ। ऱखेईूँ प्ऱन ज़नदकवह ल़इ॥1॥

भ़ि़थग:-दफर मैंने रूप की ऱऽश, सिंदर गिण और शालि़ला
प्य़रा पित्रिधी प़इ है। मैंने आन (ज़नकी) को अूँखों की पितला
बऩकर आनसे प्रेम बढ़़य़ है और ऄपने प्ऱण आनमें लग़ रखे
हैं॥1॥
* कलपबेऽल ऽजऽम बहुऽबऽध ल़ला। सींऽच सनेह सऽलल
प्रऽतप़ला॥
फी लत फलत भयई ऽबऽध ब़म़। ज़ऽन न ज़आ क़ह
पररऩम़॥2॥
भ़ि़थग:-आन्द्हें कल्पलत़ के सम़न मैंने बहुत तरह से बडे ल़डच़ि के स़थ स्नेह रूपा जल से सींचकर प़ल़ है। ऄब आस लत़
के फी लने-फलने के समय ऽिध़त़ ि़म हो गए। कि छ ज़ऩ नहीं
ज़त़ दक आसक़ क्य़ पररण़म होग़॥2॥
* पलूँग पाठ तऽज गोद वहडोऱ। ऽसयूँ न दान्द्ह पगि ऄिऽन
कठोऱ॥
ऽजऄनमीरर ऽजऽम जोगित रहईूँ । दाप ब़ऽत नवह ट़रन कहउूँ॥3॥
भ़ि़थग:-सात़ ने पयांकपुष्ठ (पलंग के उपर), गोद और वहडोले
को छोडकर कठोर पुथ्िा पर कभा पैर नहीं रख़। मैं सद़
संजािना जडा के सम़न (स़िध़ना से) आनकी रखि़ला करता
रहा हूँ। कभा दापक की बिा हट़ने को भा नहीं कहता॥3॥

* सोआ ऽसय चलन चहऽत बन स़थ़। अयसि क़ह होआ
रघिऩथ़॥
चंद दकरन रस रऽसक चकोरा। रऽब रुखनयन सकआ दकऽम
जोरा॥4॥
भ़ि़थग:-िहा सात़ ऄब तिम्ह़रे स़थ िन चलऩ च़हता है। हे
रघिऩथ! ईसे क्य़ अज्ञ़ होता है? चन्द्रम़ की दकरणों क़ रस
(ऄमुत) च़हने ि़ला चकोरा सीयग की ओर अूँख दकस तरह
ऽमल़ सकता है॥4॥
दोह़ :
* करर के हरर ऽनऽसचर चरवह दिष्ट जंति बन भीरर।
ऽबष ब़रटक़ूँ दक सोह सित सिभग सजािऽन मीरर॥59॥
भ़ि़थग:-ह़था, वसह, ऱक्षस अदद ऄनेक दिष्ट जाि-जन्द्ति िन में
ऽिचरते रहते हैं। हे पित्र! क्य़ ऽिष की ि़रटक़ में सिंदर
संजािना बीटा शोभ़ प़ सकता है?॥59॥
चौप़इ :
* बन ऽहत कोल दकऱत दकसोरा। रचीं ऽबरं ऽच ऽबषय सिख
भोरा॥
प़हन कु ऽम ऽजऽम करठन सिभ़उ। ऽतन्द्हऽह कलेसि न क़नन
क़उ॥1॥

भ़ि़थग:-िन के ऽलए तो ब्रह्म़जा ने ऽिषय सिख को न ज़नने
ि़ला कोल और भालों की लडदकयों को रच़ है, ऽजनक़ पत्थर
के कीडे जैस़ कठोर सिभ़ि है। ईन्द्हें िन में कभा क्लेश नहीं
होत़॥1॥
* कै त़पस ऽतय क़नन जोगी। ऽजन्द्ह तप हेति तज़ सब भोगी॥
ऽसय बन बऽसऽह त़त के ऽह भ़ूँता। ऽचत्रऽलऽखत कऽप देऽख
डेऱता॥2॥
भ़ि़थग:-ऄथि़ तपऽसियों की ऽस्त्रय़ूँ िन में रहने योग्य हैं,
ऽजन्द्होंने तपसय़ के ऽलए सब भोग तज ददए हैं। हे पित्र! जो
तसिार के बंदर को देखकर डर ज़ता हैं, िे सात़ िन में दकस
तरह रह सकें गा?॥2॥
* सिरसर सिभग बनज बन च़रा। ड़बर जोगि दक हंसकि म़रा॥
ऄस ऽबच़रर जस अयसि होइ। मैं ऽसख देईूँ ज़नदकऽह सोइ॥3॥
भ़ि़थग:-देिसरोिर के कमल िन में ऽिचरण करने ि़ला हंऽसना
क्य़ गडैयों (तलैयों) में रहने के योग्य है? ऐस़ ऽिच़र कर
जैसा तिम्ह़रा अज्ञ़ हो, मैं ज़नकी को िैसा हा ऽशक्ष़ दी॥
ूँ 3॥
* जौं ऽसय भिन रहै कह ऄंब़। मोऽह कहूँ होआ बहुत ऄिलंब़॥
सिऽन रघिबार म़ति ऽप्रय ब़ना। साल सनेह सिध़ूँ जनि स़ना॥4॥

भ़ि़थग:-म़त़ कहता हैं- यदद सात़ घर में रहें तो मिझको बहुत
सह़ऱ हो ज़ए। श्रा ऱमचन्द्रजा ने म़त़ की ऽप्रय ि़णा
सिनकर, जो म़नो शाल और स्नेह रूपा ऄमुत से सना हुइ
था,॥4॥
दोह़ :
* कऽह ऽप्रय बचन ऽबबेकमय कीऽन्द्ह म़ति पररतोष।
लगे प्रबोधन ज़नदकऽह प्रगरट ऽबऽपन गिन दोष॥60॥
भ़ि़थग:-ऽििेकमय ऽप्रय िचन कहकर म़त़ को संतिष्ट दकय़।
दफर िन के गिण-दोष प्रकट करके िे ज़नकीजा को समझ़ने
लगे॥60॥

म़सप़ऱयण, चौदहि़ूँ ऽिश्ऱम
,

श्रा सात़-ऱम संि़द
चौप़इ :
* म़ति समाप कहत सकि च़हीं। बोले समई समिऽझ मन म़हीं॥
ऱजकि म़रर ऽसख़िनि सिनह। अन भ़ूँऽत ऽजयूँ जऽन कछि गिनह॥1॥
भ़ि़थग:-म़त़ के स़मने सात़जा से कि छ कहने में सकि च़ते हैं।
पर मन में यह समझकर दक यह समय ऐस़ हा है, िे बोले- हे
ऱजकि म़रा! मेरा ऽसख़िन सिनो। मन में कि छ दीसरा तरह न
समझ लेऩ॥1॥
* अपन मोर नाक जौं चहह। बचनि हम़र म़ऽन गुह रहह॥
अयसि मोर स़सि सेिक़इ। सब ऽबऽध भ़ऽमऽन भिन भल़इ॥2॥

भ़ि़थग:-जो ऄपऩ और मेऱ भल़ च़हता हो, तो मेऱ िचन
म़नकर घर रहो। हे भ़ऽमना! मेरा अज्ञ़ क़ प़लन होग़, स़स
की सेि़ बन पडेगा। घर रहने में सभा प्रक़र से भल़इ है॥2॥
* एऽह ते ऄऽधक धरमि नवह दीज़। स़दर स़सि ससिर पद पीज़॥
जब जब म़ति कररऽह सिऽध मोरा। होआऽह प्रेम ऽबकल मऽत
भोरा॥3॥
भ़ि़थग:-अदरपीिगक स़स-ससिर के चरणों की पीज़ (सेि़) करने
से बढ़कर दीसऱ कोइ धमग नहीं है। जब-जब म़त़ मिझे य़द
करें गा और प्रेम से व्य़कि ल होने के क़रण ईनकी बिऽि भोला हो
ज़एगा (िे ऄपने-अपको भील ज़एूँगा)॥3॥
* तब तब तिम्ह कऽह कथ़ पिऱना। सिंदरर समिझ़एहु मुद ि ब़ना॥
कहईूँ सिभ़यूँ सपथ सत मोहा। सिमिऽख म़ति ऽहत ऱखईूँ
तोहा॥4॥
भ़ि़थग:-हे सिंदरा! तब-तब तिम कोमल ि़णा से पिऱना कथ़एूँ
कह-कहकर आन्द्हें समझ़ऩ। हे सिमऽि ख! मिझे सैकडों सौगंध हैं, मैं
यह सिभ़ि से हा कहत़ हूँ दक मैं तिम्हें के िल म़त़ के ऽलए
हा घर पर रखत़ हूँ॥4॥
दोह़ :
* गिर श्रिऽत संमत धरम फलि प़आऄ ऽबनवह कलेस।

हठ बस सब संकट सहे ग़लि नहुष नरे स॥61॥
भ़ि़थग:-(मेरा अज्ञ़ म़नकर घर पर रहने से) गिरु और िेद के
ि़ऱ सम्मत धमग (के अचरण) क़ फल तिम्हें ऽबऩ हा क्लेश के
ऽमल ज़त़ है, दकन्द्ति हठ के िश होकर ग़लि मिऽन और ऱज़
नहुष अदद सब ने संकट हा सहे॥61॥
चौप़इ :
* मैं पिऽन करर प्रि़न ऽपति ब़ना। बेऽग दफरब सिनि सिमिऽख
सय़ना॥
ददिस ज़त नवह ल़ऽगऽह ब़ऱ। सिद
ं रर ऽसखिनि सिनहु हम़ऱ॥1॥
भ़ि़थग:-हे सिमिऽख! हे सय़ना! सिनो, मैं भा ऽपत़ के िचन को
सत्य करके शाघ्र हा लौटीूँग़। ददन ज़ते देर नहीं लगेगा। हे
सिंदरा! हम़रा यह साख सिनो!॥1॥
* जौं हठ करहु प्रेम बस ब़म़। तौ तिम्ह दिखि प़ईब पररऩम़॥
क़ननि करठन भयंकरु भ़रा। घोर घ़मि ऽहम ब़रर बय़रा॥2॥
भ़ि़थग:-हे ि़म़! यदद प्रेमिश हठ करोगा, तो तिम पररण़म में
दिःख प़ओगा। िन बड़ करठन (क्लेशद़यक) और भय़नक है।
िह़ूँ की धीप, ज़ड़, िष़ग और हि़ सभा बडे भय़नक हैं॥2॥
* कि स कं टक मग क़ूँकर ऩऩ। चलब पय़देवह ऽबनि पदत्ऱऩ॥

चरन कमल मुद ि मंजि तिम्ह़रे । म़रग ऄगम भीऽमधर भ़रे ॥3॥
भ़ि़थग:-ऱसते में कि श, क़ूँटे और बहुत से कं कड हैं। ईन पर
ऽबऩ जीते के पैदल हा चलऩ होग़। तिम्ह़रे चरणकमल कोमल
और सिंदर हैं और ऱसते में बडे-बडे दिगगम पिगत हैं॥3॥
* कं दर खोह नदीं नद ऩरे । ऄगम ऄग़ध न ज़वह ऽनह़रे ॥
भ़लि ब़घ बुक के हरर ऩग़। करवह ऩद सिऽन धारजि भ़ग़॥4॥
भ़ि़थग:-पिगतों की गिफ़एूँ, खोह (दरे ), नददय़ूँ, नद और ऩले
ऐसे ऄगम्य और गहरे हैं दक ईनकी ओर देख़ तक नहीं ज़त़।
राछ, ब़घ, भेऽडये, वसह और ह़था ऐसे (भय़नक) शब्द करते हैं
दक ईन्द्हें सिनकर धारज भ़ग ज़त़ है॥4॥
दोह़ :
* भीऽम सयन बलकल बसन ऄसनि कं द फल मील।
ते दक सद़ सब ददन ऽमलवह सबिआ समय ऄनिकील॥62॥
भ़ि़थग:-जमान पर सोऩ, पेडों की छ़ल के िस्त्र पहनऩ और
कं द, मील, फल क़ भोजन करऩ होग़। और िे भा क्य़ सद़
सब ददन ऽमलेंग?
े सब कि छ ऄपने-ऄपने समय के ऄनिकील हा
ऽमल सके ग़॥62॥

चौप़इ :
* नर ऄह़र रजनाचर चरहीं। कपट बेष ऽबऽध कोरटक करहीं॥
ल़गआ ऄऽत पह़र कर प़ना। ऽबऽपन ऽबपऽत नवह ज़आ
बख़ना॥1॥
भ़ि़थग:-मनिष्यों को ख़ने ि़ले ऽनश़चर (ऱक्षस) दफरते रहते हैं।
िे करोडों प्रक़र के कपट रूप ध़रण कर लेते हैं। पह़ड क़
प़ना बहुत हा लगत़ है। िन की ऽिपऽि बख़ना नहीं ज़
सकता॥1॥
* ब्य़ल कऱल ऽबहग बन घोऱ। ऽनऽसचर ऽनकर ऩरर नर
चोऱ॥
डरपवह धार गहन सिऽध अएूँ। मुगलोचऽन तिम्ह भारु सिभ़एूँ॥2॥
भ़ि़थग:-िन में भाषण सपग, भय़नक पक्षा और स्त्रा-पिरुषों को
चिऱने ि़ले ऱक्षसों के झिंड के झिड
ं रहते हैं। िन की (भयंकरत़)
य़द अने म़त्र से धार पिरुष भा डर ज़ते हैं। दफर हे
मुगलोचऽन! तिम तो सिभ़ि से हा डरपोक हो!॥2॥
* हंसगिऽन तिम्ह नवह बन जोगी। सिऽन ऄपजसि मोऽह देआऽह
लोगी॥
म़नस सऽलल सिध़ूँ प्रऽतप़ला। ऽजऄआ दक लिन पयोऽध
मऱला॥3॥

भ़ि़थग:-हे हंसगमना! तिम िन के योग्य नहीं हो। तिम्ह़रे िन
ज़ने की ब़त सिनकर लोग मिझे ऄपयश देंगे (बिऱ कहेंगे)।
म़नसरोिर के ऄमुत के सम़न जल से प़ला हुइ हंऽसना कहीं
ख़रे समिर में जा सकता है॥3॥
* नि रस़ल बन ऽबहरनसाल़। सोह दक कोदकल ऽबऽपन
कराल़॥
रहहु भिन ऄस हृदयूँ ऽबच़रा। चंदबदऽन दिखि क़नन भ़रा॥4॥
भ़ि़थग:-निान अम के िन में ऽिह़र करने ि़ला कोयल क्य़
कराल के जंगल में शोभ़ प़ता है? हे चन्द्रमिखा! हृदय में ऐस़
ऽिच़रकर तिम घर हा पर रहो। िन में बड़ कष्ट है॥4॥
दोह़ :
* सहज सिहृद गिर सि़ऽम ऽसख जो न करआ ऽसर म़ऽन।
सो पऽछत़आ ऄघ़आ ईर ऄिऽस होआ ऽहत ह़ऽन॥63॥
भ़ि़थग:-सि़भ़ऽिक हा ऽहत च़हने ि़ले गिरु और सि़मा की
साख को जो ऽसर चढ़़कर नहीं म़नत़, िह हृदय में भरपेट
पछत़त़ है और ईसके ऽहत की ह़ऽन ऄिश्य होता है॥63॥
चौप़इ :
* सिऽन मुद ि बचन मनोहर ऽपय के । लोचन लऽलत भरे जल ऽसय
के ॥

सातल ऽसख द़हक भआ कै सें। चकआऽह सरद चंद ऽनऽस जैसें॥1॥
भ़ि़थग:-ऽप्रयतम के कोमल तथ़ मनोहर िचन सिनकर सात़जा
के सिंदर नेत्र जल से भर गए। श्रा ऱमजा की यह शातल साख
ईनको कै सा जल़ने ि़ला हुइ, जैसे चकिा को शरद ऊति की
च़ूँदना ऱत होता है॥1॥
* ईतरु न अि ऽबकल बैदह
े ा। तजन चहत सिऽच सि़ऽम सनेहा॥
बरबस रोदक ऽबलोचन ब़रा। धरर धारजि ईर ऄिऽनकि म़रा॥2॥
भ़ि़थग:-ज़नकीजा से कि छ ईिर देते नहीं बनत़, िे यह सोचकर
व्य़कि ल हो ईठीं दक मेरे पऽित्र और प्रेमा सि़मा मिझे छोड
ज़ऩ च़हते हैं। नेत्रों के जल (अूँसिओं) को जबदगसता रोककर िे
पुथ्िा की कन्द्य़ सात़जा हृदय में धारज धरकर,॥2॥
* ल़ऽग स़सि पग कह कर जोरा। छमऽब देऽब बऽड ऄऽबनय
मोरा।
दाऽन्द्ह प्ऱनपऽत मोऽह ऽसख सोइ। जेऽह ऽबऽध मोर परम ऽहत
होइ॥3॥
भ़ि़थग:-स़स के पैर लगकर, ह़थ जोडकर कहने लगीं- हे देऽि!
मेरा आस बडा भ़रा दढठ़इ को क्षम़ कीऽजए। मिझे प्ऱणपऽत ने
िहा ऽशक्ष़ दा है, ऽजससे मेऱ परम ऽहत हो॥3॥

* मैं पिऽन समिऽझ दाऽख मन म़हीं। ऽपय ऽबयोग सम दिखि जग
ऩहीं॥4॥
भ़ि़थग:-परन्द्ति मैंने मन में समझकर देख ऽलय़ दक पऽत के
ऽियोग के सम़न जगत में कोइ दिःख नहीं है॥4॥
दोह़ :
* प्ऱनऩथ करुऩयतन सिंदर सिखद सिज़न।
तिम्ह ऽबनि रघिकिल कि मिद ऽबधि सिरपिर नरक सम़न॥64॥
भ़ि़थग:-हे प्ऱणऩथ! हे दय़ के ध़म! हे सिंदर! हे सिखों के देने
ि़ले! हे सिज़न! हे रघिकिल रूपा कि मिद के ऽखल़ने ि़ले चन्द्रम़!
अपके ऽबऩ सिगग भा मेरे ऽलए नरक के सम़न है॥64॥
चौप़इ :
* म़ति ऽपत़ भऽगना ऽप्रय भ़इ। ऽप्रय पररि़रु सिहृदय समिद़इ॥
स़सि ससिर गिर सजन सह़इ। सित सिंदर सिसाल सिखद़इ॥1॥
भ़ि़थग:-म़त़, ऽपत़, बऽहन, प्य़ऱ भ़इ, प्य़ऱ पररि़र, ऽमत्रों
क़ समिद़य, स़स, ससिर, गिरु, सिजन (बन्द्ध-ि ब़ंधि), सह़यक
और सिंदर, सिशाल और सिख देने ि़ल़ पित्र-॥1॥
* जहूँ लऽगऩथ नेह ऄरु ऩते। ऽपय ऽबनि ऽतयऽह तरऽनहु ते
त़ते॥

तनि धनि ध़मि धरऽन पिर ऱजी। पऽत ऽबहान सबि सोक सम़जी॥2॥
भ़ि़थग:-हे ऩथ! जह़ूँ तक स्नेह और ऩते हैं, पऽत के ऽबऩ स्त्रा
को सीयग से भा बढ़कर तप़ने ि़ले हैं। शरार, धन, घर, पुथ्िा,
नगर और ऱज्य, पऽत के ऽबऩ स्त्रा के ऽलए यह सब शोक क़
सम़ज है॥2॥
* भोग रोगसम भीषन भ़रू। जम ज़तऩ सररस संस़रू॥
प्ऱनऩथ तिम्ह ऽबनि जग म़हीं। मो कहुूँ सिखद कतहुूँ कछि
ऩहीं॥3॥
भ़ि़थग:-भोग रोग के सम़न हैं, गहने भ़र रूप हैं और संस़र
यम य़तऩ (नरक की पाड़) के सम़न है। हे प्ऱणऩथ! अपके
ऽबऩ जगत में मिझे कहीं कि छ भा सिखद़या नहीं है॥3॥
* ऽजय ऽबनि देह नदा ऽबनि ब़रा। तैऽसऄ ऩथ पिरुष ऽबनि ऩरा॥
ऩथ सकल सिख स़थ तिम्ह़रें । सरद ऽबमल ऽबधि बदनि
ऽनह़रें ॥4॥
भ़ि़थग:-जैसे ऽबऩ जाि के देह और ऽबऩ जल के नदा, िैसे हा
हे ऩथ! ऽबऩ पिरुष के स्त्रा है। हे ऩथ! अपके स़थ रहकर
अपक़ शरद्-(पीर्तणम़) के ऽनमगल चन्द्रम़ के सम़न मिख देखने से
मिझे समसत सिख प्ऱप्त होंगे॥4॥

दोह़ :
* खग मुग पररजन नगरु बनि बलकल ऽबमल दिकील।
ऩथ स़थ सिरसदन सम परनस़ल सिख मील॥65॥
भ़ि़थग:-हे ऩथ! अपके स़थ पक्षा और पशि हा मेरे कि टि म्बा
होंगे, िन हा नगर और िुक्षों की छ़ल हा ऽनमगल िस्त्र होंगे
और पणगकिटा (पिों की बना झोपडा) हा सिगग के सम़न सिखों
की मील होगा॥65॥
चौप़इ :
* बनदेबीं बनदेि ईद़ऱ। कररहवह स़सि ससिर सम स़ऱ॥
कि स दकसलय स़थरा सिह़इ। प्रभि सूँग मंजि मनोज तिऱइ॥1॥
भ़ि़थग:-ईद़र हृदय के िनदेिा और िनदेित़ हा स़स-ससिर के
सम़न मेरा स़र-संभ़र करें गे और कि श़ और पिों की सिंदर
स़थरा (ऽबछौऩ) हा प्रभि के स़थ क़मदेि की मनोहर तोशक
के सम़न होगा॥1॥
* कं द मील फल ऄऽमऄ ऄह़रू। ऄिध सौध सत सररस पह़रू॥
ऽछनि-ऽछनि प्रभि पद कमल ऽबलोकी। रऽहहईूँ मिददत ददिस ऽजऽम
कोकी॥2॥

भ़ि़थग:-कन्द्द, मील और फल हा ऄमुत के सम़न अह़र होंगे
और (िन के ) पह़ड हा ऄयोध्य़ के सैकडों ऱजमहलों के सम़न
होंगे। क्षण-क्षण में प्रभि के चरण कमलों को देख-देखकर मैं ऐसा
अनंददत रहूँगा जैसे ददन में चकिा रहता है॥2॥
* बन दिख ऩथ कहे बहुतेरे। भय ऽबष़द पररत़प घनेरे॥
प्रभि ऽबयोग लिलेस सम़ऩ। सब ऽमऽल होवह न कु प़ऽनध़ऩ॥3॥
भ़ि़थग:-हे ऩथ! अपने िन के बहुत से दिःख और बहुत से भय,
ऽिष़द और सन्द्त़प कहे, परन्द्ति हे कु प़ऽनध़न! िे सब ऽमलकर
भा प्रभि (अप) के ऽियोग (से होने ि़ले दिःख) के लिलेश के
सम़न भा नहीं हो सकते॥3॥
* ऄस ऽजयूँ ज़ऽन सिज़न ऽसरोमऽन। लेआऄ संग मोऽह छ़ऽडऄ
जऽन॥
ऽबनता बहुत करौं क़ सि़मा। करुऩमय ईर ऄंतरज़मा॥4॥
भ़ि़थग:-ऐस़ जा में ज़नकर, हे सिज़न ऽशरोमऽण! अप मिझे
स़थ ले लाऽजए, यह़ूँ न छोऽडए। हे सि़मा! मैं ऄऽधक क्य़
ऽिनता करूूँ? अप करुण़मय हैं और सबके हृदय के ऄंदर की
ज़नने ि़ले हैं॥4॥
दोह़ :

* ऱऽखऄ ऄिध जो ऄिऽध लऽग रहत न जऽनऄवह प्ऱन।
दानबंधि सिंदर सिखद साल सनेह ऽनध़न॥66॥
भ़ि़थग:-हे दानबन्द्धि! हे सिंदर! हे सिख देने ि़ले! हे शाल और
प्रेम के भंड़र! यदद ऄिऽध (चौदह िषग) तक मिझे ऄयोध्य़ में
रखते हैं, तो ज़न लाऽजए दक मेरे प्ऱण नहीं रहेंगे॥66॥
चौप़इ :
* मोऽह मग चलत न होआऽह ह़रा। ऽछनि ऽछनि चरन सरोज
ऽनह़रा॥
सबऽह भ़ूँऽत ऽपय सेि़ कररहौं। म़रग जऽनत सकल श्रम
हररहौं॥1॥
भ़ि़थग:-क्षण-क्षण में अपके चरण कमलों को देखते रहने से मिझे
म़गग चलने में थक़िट न होगा। हे ऽप्रयतम! मैं सभा प्रक़र से
अपकी सेि़ करूूँगा और म़गग चलने से होने ि़ला स़रा
थक़िट को दीर कर दीग
ूँ ा॥1॥
* प़य पख़रर बैरठ तरु छ़हीं। कररहईूँ ब़ई मिददत मन म़हीं॥
श्रम कन सऽहत सय़म तनि देखें। कहूँ दिख समई प्ऱनपऽत
पेखें॥2॥
भ़ि़थग:-अपके पैर धोकर, पेडों की छ़य़ में बैठकर, मन में
प्रसन्न होकर हि़ करूूँगा (पंख़ झलीूँगा)। पसाने की बीूँदों सऽहत

श्य़म शरार को देखकर प्ऱणपऽत के दशगन करते हुए दिःख के
ऽलए मिझे ऄिक़श हा कह़ूँ रहेग़॥2॥
* सम मऽह तुन तरुपल्लि ड़सा। प़य पलोरटऽह सब ऽनऽस
द़सा॥
ब़र ब़र मुद ि मीरऽत जोहा। ल़ऽगऽह त़त बय़रर न मोहा॥3॥
भ़ि़थग:-समतल भीऽम पर घ़स और पेडों के पिे ऽबछ़कर यह
द़सा ऱतभर अपके चरण दब़िेगा। ब़र-ब़र अपकी कोमल
मीर्तत को देखकर मिझको गरम हि़ भा न लगेगा॥3॥
* को प्रभि सूँग मोऽह ऽचतिऽनह़ऱ। वसघबधिऽह ऽजऽम ससक
ऽसअऱ॥
मैं सिकिम़रर ऩथ बन जोगी। तिम्हऽह ईऽचत तप मो कहुूँ भोगी॥4॥
भ़ि़थग:-प्रभि के स़थ (रहते) मेरा ओर (अूँख ईठ़कर) देखने
ि़ल़ कौन है (ऄथ़गत कोइ नहीं देख सकत़)! जैसे वसह की स्त्रा
(वसहना) को खरगोश और ऽसय़र नहीं देख सकते। मैं सिकिम़रा
हूँ और ऩथ िन के योग्य हैं? अपको तो तपसय़ ईऽचत है और
मिझको ऽिषय भोग?॥4॥
दोह़ :
* ऐसेई बचन कठोर सिऽन जौं न हृदई ऽबलग़न।
तौ प्रभि ऽबषम ऽबयोग दिख सऽहहवह प़िूँर प्ऱन॥67॥

भ़ि़थग:-ऐसे कठोर िचन सिनकर भा जब मेऱ हृदय न फट़ तो,
हे प्रभि! (म़लीम होत़ है) ये प़मर प्ऱण अपके ऽियोग क़
भाषण दिःख सहेंग॥
े 67॥
चौप़इ :
* ऄस कऽह साय ऽबकल भआ भ़रा। बचन ऽबयोगि न सकी
सूँभ़रा॥
देऽख दस़ रघिपऽत ऽजयूँ ज़ऩ। हरठ ऱखें नवह ऱऽखऽह प्ऱऩ॥1॥
भ़ि़थग:-ऐस़ कहकर सात़जा बहुत हा व्य़कि ल हो गईं। िे िचन
के ऽियोग को भा न सम्ह़ल सकीं। (ऄथ़गत शरार से ऽियोग की
ब़त तो ऄलग रहा, िचन से भा ऽियोग की ब़त सिनकर िे
ऄत्यन्द्त ऽिकल हो गईं।) ईनकी यह दश़ देखकर श्रा रघिऩथजा
ने ऄपने जा में ज़न ऽलय़ दक हठपीिगक आन्द्हें यह़ूँ रखने से ये
प्ऱणों को न रखेंगा॥1॥
* कहेई कु प़ल भ़निकिलऩथ़। पररहरर सोचि चलहु बन स़थ़॥
नवह ऽबष़द कर ऄिसरु अजी। बेऽग करहु बन गिन सम़जी॥2॥
भ़ि़थग:-तब कु प़लि, सीयगकिल के सि़मा श्रा ऱमचन्द्रजा ने कह़
दक सोच छोडकर मेरे स़थ िन को चलो। अज ऽिष़द करने
क़ ऄिसर नहीं है। तिरंत िनगमन की तैय़रा करो॥2॥

श्रा ऱम-कौसल्य़-सात़ संि़द
* कऽह ऽप्रय बचन ऽप्रय़ समिझ़इ। लगे म़ति पद अऽसष प़इ॥
बेऽग प्रज़ दिख मेटब अइ। जनना ऽनठि र ऽबसरर जऽन ज़इ॥3॥

भ़ि़थग:-श्रा ऱमचन्द्रजा ने ऽप्रय िचन कहकर ऽप्रयतम़ सात़जा
को समझ़य़। दफर म़त़ के पैरों लगकर अशाि़गद प्ऱप्त दकय़।
(म़त़ ने कह़-) बेट़! जल्दा लौटकर प्रज़ के दिःख को ऽमट़ऩ
और यह ऽनठि र म़त़ तिम्हें भील न ज़ए!॥3॥
* दफररऽह दस़ ऽबऽध बहुरर दक मोरा। देऽखहईूँ नयन मनोहर
जोरा।
सिददन सिघरा त़त कब होआऽह। जनना ऽजऄत बदन ऽबधि
जोआऽह॥4॥
भ़ि़थग:-हे ऽिध़त़! क्य़ मेरा दश़ भा दफर पलटेगा? क्य़
ऄपने नेत्रों से मैं आस मनोहर जोडा को दफर देख प़उूँगा? हे
पित्र! िह सिंदर ददन और शिभ घडा कब होगा जब तिम्ह़रा
जनना जाते जा तिम्ह़ऱ च़ूँद स़ मिखड़ दफर देखग
े ा!॥4॥
दोह़ :
* बहुरर बच्छ कऽह ल़लि कऽह रघिपऽत रघिबर त़त।
कबवह बोल़आ लग़आ ऽहयूँ हरऽष ऽनरऽखहईूँ ग़त॥68॥
भ़ि़थग:-हे त़त! 'ित्स' कहकर, 'ल़ल' कहकर, 'रघिपऽत' कहकर,
'रघििर' कहकर, मैं दफर कब तिम्हें बिल़कर हृदय से लग़उूँगा
और हर्तषत होकर तिम्ह़रे ऄंगों को देखीूँगा!॥68॥
चौप़इ :

* लऽख सनेह क़तरर महत़रा। बचनि न अि ऽबकल भआ भ़रा॥
ऱम प्रबोधि कीन्द्ह ऽबऽध ऩऩ। समई सनेहु न ज़आ बख़ऩ॥1॥
भ़ि़थग:-यह देखकर दक म़त़ स्नेह के म़रे ऄधार हो गइ हैं
और आतना ऄऽधक व्य़कि ल हैं दक मिूँह से िचन नहीं ऽनकलत़।
श्रा ऱमचन्द्रजा ने ऄनेक प्रक़र से ईन्द्हें समझ़य़। िह समय
और स्नेह िणगन नहीं दकय़ ज़ सकत़॥1॥
* तब ज़नकी स़सि पग ल़गा। सिऽनऄ म़य मैं परम ऄभ़गा॥
सेि़ समय दैऄूँ बनि दान्द्ह़। मोर मनोरथि सफल न कीन्द्ह़॥2॥
भ़ि़थग:-तब ज़नकीजा स़स के प़ूँि लगीं और बोलीं- हे म़त़!
सिऽनए, मैं बडा हा ऄभ़ऽगना हूँ। अपकी सेि़ करने के समय
दैि ने मिझे िनि़स दे ददय़। मेऱ मनोरथ सफल न दकय़॥2॥
* तजब छोभि जऽन छ़ऽडऄ छोह। करमि करठन कछि दोसि न
मोह॥
सिऽनऽसय बचन स़सि ऄकि ल़ना। दस़ किऽन ऽबऽध कहौं
बख़ना॥3॥
भ़ि़थग:-अप क्षोभ क़ त्य़ग कर दें, परन्द्ति कु प़ न छोऽडएग़।
कमग की गऽत करठन है, मिझे भा कि छ दोष नहीं है। सात़जा के

िचन सिनकर स़स व्य़कि ल हो गईं। ईनकी दश़ को मैं दकस
प्रक़र बख़न कर कहूँ!॥3॥
* ब़रवह ब़र ल़आ ईर लान्द्हा। धरर धारजि ऽसख अऽसष दान्द्हा॥
ऄचल होई ऄऽहि़ति तिम्ह़ऱ। जब लऽग गंग जमिन जल
ध़ऱ॥4॥
भ़ि़थग:-ईन्द्होंने सात़जा को ब़र-ब़र हृदय से लग़य़ और
धारज धरकर ऽशक्ष़ दा और अशाि़गद ददय़ दक जब तक
गंग़जा और यमिऩजा में जल की ध़ऱ बहे, तब तक तिम्ह़ऱ
सिह़ग ऄचल रहे॥4॥
दोह़ :
* सातऽह स़सि असास ऽसख दाऽन्द्ह ऄनेक प्रक़र।
चला ऩआ पद पदिम ऽसरु ऄऽत ऽहत ब़रवह ब़र॥69॥
भ़ि़थग:-सात़जा को स़स ने ऄनेकों प्रक़र से अशाि़गद और
ऽशक्ष़एूँ दीं और िे (सात़जा) बडे हा प्रेम से ब़र-ब़र
चरणकमलों में ऽसर नि़कर चलीं॥69॥

श्रा ऱम-लक्ष्मण संि़द
चौप़इ :
* सम़च़र जब लऽछमन प़ए। ब्य़कि ल ऽबलख बदन ईरठ ध़ए॥
कं प पिलक तन नयन सनाऱ। गहे चरन ऄऽत प्रेम ऄधाऱ॥1॥
भ़ि़थग:-जब लक्ष्मणजा ने सम़च़र प़ए, तब िे व्य़कि ल होकर
ईद़स मिूँह ईठ दौडे। शरार क़ूँप रह़ है, रोम़ंच हो रह़ है,

नेत्र अूँसिओं से भरे हैं। प्रेम से ऄत्यन्द्त ऄधार होकर ईन्द्होंने श्रा
ऱमजा के चरण पकड ऽलए॥1॥
* कऽह न सकत कछि ऽचतित ठ़ढ़े। मानि दान जनि जल तें
क़ढ़े॥
सोचि हृदयूँ ऽबऽध क़ होऽनह़ऱ। सबि सिखि सिकुति ऽसऱन
हम़ऱ॥2॥
भ़ि़थग:-िे कि छ कह नहीं सकते, खडे-खडे देख रहे हैं। (ऐसे दान
हो रहे हैं) म़नो जल से ऽनक़ले ज़ने पर मछला दान हो रहा
हो। हृदय में यह सोच है दक हे ऽिध़त़! क्य़ होने ि़ल़ है?
क्य़ हम़ऱ सब सिख और पिण्य पीऱ हो गय़?॥2॥
* मो कहुूँ क़ह कहब रघिऩथ़। रऽखहवह भिन दक लेहवह
स़थ़॥
ऱम ऽबलोदक बंधि कर जोरें । देह गेहसब सन तुनि तोरें ॥3॥
भ़ि़थग:-मिझको श्रा रघिऩथजा क्य़ कहेंगे? घर पर रखेंगे य़
स़थ ले चलेंग?
े श्रा ऱमचन्द्रजा ने भ़इ लक्ष्मण को ह़थ जोडे
और शरार तथ़ घर सभा से ऩत़ तोडे हुए खडे देख़॥3॥
* बोले बचनि ऱम नय ऩगर। साल सनेह सरल सिख स़गर॥
त़त प्रेम बस जऽन कदऱह। समिऽझ हृदयूँ पररऩम ईछ़ह॥4॥

भ़ि़थग:-तब नाऽत में ऽनपिण और शाल, स्नेह, सरलत़ और सिख
के समिर श्रा ऱमचन्द्रजा िचन बोले- हे त़त! पररण़म में होने
ि़ले अनंद को हृदय में समझकर तिम प्रेमिश ऄधार मत
होओ॥4॥
दोह़ :
* म़ति ऽपत़ गिरु सि़ऽम ऽसख ऽसर धरर करवह सिभ़यूँ।
लहेई ल़भि ऽतन्द्ह जनम कर नतरु जनमि जग ज़यूँ॥70॥
भ़ि़थग:-जो लोग म़त़, ऽपत़, गिरु और सि़मा की ऽशक्ष़ को
सि़भ़ऽिक हा ऽसर चढ़़कर ईसक़ प़लन करते हैं, ईन्द्होंने हा
जन्द्म लेने क़ ल़भ प़य़ है, नहीं तो जगत में जन्द्म व्यथग हा
है॥70॥
चौप़इ :
* ऄस ऽजयूँ ज़ऽन सिनहु ऽसख भ़इ। करहु म़ति ऽपति पद
सेिक़इ॥
भिन भरति ररपिसद
ी नि ऩहीं। ऱई बुि मम दिखि मन म़हीं॥1॥
भ़ि़थग:-हे भ़इ! हृदय में ऐस़ ज़नकर मेरा साख सिनो और
म़त़-ऽपत़ के चरणों की सेि़ करो। भरत और शत्रिघ्न घर पर
नहीं हैं, मह़ऱज िुि हैं और ईनके मन में मेऱ दिःख है॥1॥

* मैं बन ज़ईूँ तिम्हऽह लेआ स़थ़। होआ सबऽह ऽबऽध ऄिध
ऄऩथ़॥
गिरु ऽपति म़ति प्रज़ पररि़रू। सब कहुूँ परआ दिसह दिख भ़रू॥2॥
भ़ि़थग:-आस ऄिसथ़ में मैं तिमको स़थ लेकर िन ज़उूँ तो
ऄयोध्य़ सभा प्रक़र से ऄऩथ हो ज़एगा। गिरु, ऽपत़, म़त़,
प्रज़ और पररि़र सभा पर दिःख क़ दिःसह भ़र अ पडेग़॥2॥
* रहहु करहु सब कर पररतोषी। नतरु त़त होआऽह बड दोषी॥
ज़सि ऱज ऽप्रय प्रज़ दिख़रा। सो नुपि ऄिऽस नरक ऄऽधक़रा॥3॥
भ़ि़थग:-ऄतः तिम यहीं रहो और सबक़ संतोष करते रहो। नहीं
तो हे त़त! बड़ दोष होग़। ऽजसके ऱज्य में प्य़रा प्रज़ दिःखा
रहता है, िह ऱज़ ऄिश्य हा नरक क़ ऄऽधक़रा होत़ है॥3॥
* रहहु त़त ऄऽस नाऽत ऽबच़रा। सिनत लखनि भए ब्य़कि ल
भ़रा॥
ऽसऄरें बचन सीऽख गए कै सें। परसत तिऽहन त़मरसि जैसें॥4॥
भ़ि़थग:-हे त़त! ऐसा नाऽत ऽिच़रकर तिम घर रह ज़ओ। यह
सिनते हा लक्ष्मणजा बहुत हा व्य़कि ल हो गए! आन शातल िचनों
से िे कै से सीख गए, जैसे प़ले के सपशग से कमल सीख ज़त़
है!॥4॥

दोह़ :
* ईतरु न अित प्रेम बस गहे चरन ऄकि ल़आ।
ऩथ द़सि मैं सि़ऽम तिम्ह तजहु त क़ह बस़आ॥71॥
भ़ि़थग:-प्रेमिश लक्ष्मणजा से कि छ ईिर देते नहीं बनत़। ईन्द्होंने
व्य़कि ल होकर श्रा ऱमजा के चरण पकड ऽलए और कह़- हे
ऩथ! मैं द़स हूँ और अप सि़मा हैं, ऄतः अप मिझे छोड हा
दें तो मेऱ क्य़ िश है?॥71॥
चौप़इ :
* दाऽन्द्ह मोऽह ऽसख नादक गोस़ईं। ल़ऽग ऄगम ऄपना कदऱईं॥
नरबर धार धरम धिर ध़रा। ऽनगम नाऽत कहुूँ ते ऄऽधक़रा॥1॥
भ़ि़थग:-हे सि़मा! अपने मिझे साख तो बडा ऄच्छा दा है, पर
मिझे ऄपना क़यरत़ से िह मेरे ऽलए ऄगम (पहुूँच के ब़हर)
लगा। श़स्त्र और नाऽत के तो िे हा श्रेष्ठ पिरुष ऄऽधक़रा हैं, जो
धार हैं और धमग की धिरा को ध़रण करने ि़ले हैं॥1॥
* मैं ऽससि प्रभि सनेहूँ प्रऽतप़ल़। मंदरु मेरु दक लेवह मऱल़॥
गिर ऽपति म़ति न ज़नईूँ क़ह। कहईूँ सिभ़ई ऩथ पऽतअह॥2॥
भ़ि़थग:-मैं तो प्रभि (अप) के स्नेह में पल़ हुअ छोट़ बच्च़ हूँ!
कहीं हंस भा मंदऱचल य़ सिमेरु पिगत को ईठ़ सकते हैं! हे

ऩथ! सिभ़ि से हा कहत़ हूँ, अप ऽिश्व़स करें , मैं अपको
छोडकर गिरु, ऽपत़, म़त़ दकसा को भा नहीं ज़नत़॥2॥
* जहूँ लऽग जगत सनेह सग़इ। प्राऽत प्रताऽत ऽनगम ऽनजि ग़इ॥
मोरें सबआ एक तिम्ह सि़मा। दानबंधि ईर ऄंतरज़मा॥3॥
भ़ि़थग:-जगत में जह़ूँ तक स्नेह क़ संबंध, प्रेम और ऽिश्व़स है,
ऽजनको सियं िेद ने ग़य़ है- हे सि़मा! हे दानबन्द्ध!ि हे सबके
हृदय के ऄंदर की ज़नने ि़ले! मेरे तो िे सब कि छ के िल अप
हा हैं॥3॥
* धरम नाऽत ईपदेऽसऄ त़हा। कीरऽत भीऽत सिगऽत ऽप्रय ज़हा॥
मन क्रम बचन चरन रत होइ। कु प़वसधि पररहररऄ दक सोइ॥4॥
भ़ि़थग:-धमग और नाऽत क़ ईपदेश तो ईसको करऩ च़ऽहए,
ऽजसे कीर्तत, ऽिभीऽत (ऐश्वयग) य़ सद्गऽत प्य़रा हो, दकन्द्ति जो
मन, िचन और कमग से चरणों में हा प्रेम रखत़ हो, हे
कु प़ऽसन्द्धि! क्य़ िह भा त्य़गने के योग्य है?॥4॥
दोह़ :
* करुऩवसधि सिबध
ं ि के सिऽन मुद ि बचन ऽबनात।
समिझ़ए ईर ल़आ प्रभि ज़ऽन सनेहूँ सभात॥72॥

भ़ि़थग:- दय़ के समिर श्रा ऱमचन्द्रजा ने भले भ़इ के कोमल
और नम्रत़यिक्त िचन सिनकर और ईन्द्हें स्नेह के क़रण डरे हुए
ज़नकर, हृदय से लग़कर समझ़य़॥72॥
चौप़इ :
* म़गहु ऽबद़ म़ति सन ज़इ। अिहु बेऽग चलहु बन भ़इ॥
मिददत भए सिऽन रघिबर ब़ना। भयई ल़भ बड गआ बऽड
ह़ना॥1॥
भ़ि़थग:-(और कह़-) हे भ़इ! ज़कर म़त़ से ऽिद़ म़ूँग अओ
और जल्दा िन को चलो! रघिकिल में श्रेष्ठ श्रा ऱमजा की ि़णा
सिनकर लक्ष्मणजा अनंददत हो गए। बडा ह़ऽन दीर हो गइ और
बड़ ल़भ हुअ!॥1।

श्रा लक्ष्मण-सिऽमत्ऱ संि़द
* हरऽषत हृदयूँ म़ति पवह अए। मनहुूँ ऄंध दफरर लोचन प़ए॥
ज़आ जनऽन पग ऩयई म़थ़। मनि रघिनंदन ज़नदक स़थ़॥2॥
भ़ि़थग:-िे हर्तषत हृदय से म़त़ सिऽमत्ऱजा के प़स अए, म़नो
ऄंध़ दफर से नेत्र प़ गय़ हो। ईन्द्होंने ज़कर म़त़ के चरणों
में मसतक नि़य़, दकन्द्ति ईनक़ मन रघिकिल को अनंद देने ि़ले
श्रा ऱमजा और ज़नकीजा के स़थ थ़॥2॥
* पीूँछे म़ति मऽलन मन देखा। लखन कहा सब कथ़ ऽबसेषा।
गइ सहऽम सिऽन बचन कठोऱ। मुगा देऽख दि जनि चहुूँ ओऱ॥3॥
भ़ि़थग:-म़त़ ने ईद़स मन देखकर ईनसे (क़रण) पीछ़।
लक्ष्मणजा ने सब कथ़ ऽिसत़र से कह सिऩइ। सिऽमत्ऱजा कठोर

िचनों को सिनकर ऐसा सहम गईं जैसे ऽहरना च़रों ओर िन में
अग लगा देखकर सहम ज़ता है॥3॥
* लखन लखेई भ़ ऄनरथ अजी। एवह सनेह सब करब ऄक़जी॥
म़गत ऽबद़ सभय सकि च़हीं। ज़आ संग ऽबऽध कऽहऽह दक
ऩहीं॥4॥
भ़ि़थग:-लक्ष्मण ने देख़ दक अज (ऄब) ऄनथग हुअ। ये स्नेह िश
क़म ऽबग़ड देंगा! आसऽलए िे ऽिद़ म़ूँगते हुए डर के म़रे
सकि च़ते हैं (और मन हा मन सोचते हैं) दक हे ऽिध़त़! म़त़
स़थ ज़ने को कहेंगा य़ नहीं॥4॥
दोह़ :
* समिऽझ सिऽमत्ऱूँ ऱम ऽसय रूपि सिसालि सिभ़ई।
नुप सनेहु लऽख धिनेई ऽसरु प़ऽपऽन दान्द्ह कि द़ई॥73॥
भ़ि़थग:-सिऽमत्ऱजा ने श्रा ऱमजा और श्रा सात़जा के रूप, सिंदर
शाल और सिभ़ि को समझकर और ईन पर ऱज़ क़ प्रेम
देखकर ऄपऩ ऽसर धिऩ (पाट़) और कह़ दक प़ऽपना कै के या ने
बिरा तरह घ़त लग़य़॥73॥
चौप़इ :
* धारजि धरे ई कि ऄिसर ज़ना। सहज सिहृद बोला मुद ि ब़ना॥

त़त तिम्ह़रर म़ति बैदह
े ा। ऽपत़ ऱमि सब भ़ूँऽत सनेहा॥1॥
भ़ि़थग:-परन्द्ति कि समय ज़नकर धैयग ध़रण दकय़ और सिभ़ि से
हा ऽहत च़हने ि़ला सिऽमत्ऱजा कोमल ि़णा से बोलीं- हे त़त!
ज़नकीजा तिम्ह़रा म़त़ हैं और सब प्रक़र से स्नेह करने ि़ले
श्रा ऱमचन्द्रजा तिम्ह़रे ऽपत़ हैं!॥1॥
* ऄिध तह़ूँ जहूँ ऱम ऽनि़सी। तहूँआूँ ददिसि जहूँ भ़नि प्रक़सी॥
जौं पै साय ऱमि बन ज़हीं। ऄिध तिम्ह़र क़जि कछि ऩहीं॥2॥
भ़ि़थग:-जह़ूँ श्रा ऱमजा क़ ऽनि़स हो िहीं ऄयोध्य़ है। जह़ूँ
सीयग क़ प्रक़श हो िहीं ददन है। यदद ऽनश्चय हा सात़-ऱम िन
को ज़ते हैं, तो ऄयोध्य़ में तिम्ह़ऱ कि छ भा क़म नहीं है॥2॥
* गिर ऽपति म़ति बंधि सिर स़ईं। सेआऄवह सकल प्ऱन की ऩईं॥
ऱमि प्ऱनऽप्रय जािन जा के । सि़रथ रऽहत सख़ सबहा के ॥3॥
भ़ि़थग:-गिरु, ऽपत़, म़त़, भ़इ, देित़ और सि़मा, आन सबकी
सेि़ प्ऱण के सम़न करना च़ऽहए। दफर श्रा ऱमचन्द्रजा तो
प्ऱणों के भा ऽप्रय हैं, हृदय के भा जािन हैं और सभा के
सि़थगरऽहत सख़ हैं॥3॥
* पीजनाय ऽप्रय परम जह़ूँ तें। सब म़ऽनऄवह ऱम के ऩतें॥
ऄस ऽजयूँ ज़ऽन संग बन ज़ह। लेहु त़त जग जािन ल़ह॥4॥

भ़ि़थग:-जगत में जह़ूँ तक पीजनाय और परम ऽप्रय लोग हैं, िे
सब ऱमजा के ऩते से हा (पीजनाय और परम ऽप्रय) म़नने
योग्य हैं। हृदय में ऐस़ ज़नकर, हे त़त! ईनके स़थ िन ज़ओ
और जगत में जाने क़ ल़भ ईठ़ओ!॥4॥
दोह़ :
* भीरर भ़ग भ़जनि भयहु मोऽह समेत बऽल ज़ईूँ ।
जौं तिम्हरें मन छ़ऽड छलि कीन्द्ह ऱम पद ठ़ईूँ ॥74॥
भ़ि़थग:-मैं बऽलह़रा ज़ता हूँ, (हे पित्र!) मेरे समेत तिम बडे हा
सौभ़ग्य के प़त्र हुए, जो तिम्ह़रे ऽचि ने छल छोडकर श्रा ऱम
के चरणों में सथ़न प्ऱप्त दकय़ है॥74॥
चौप़इ :
* पित्रिता जिबता जग सोइ। रघिपऽत भगति ज़सि सिति होइ॥
नतरु ब़ूँझ भऽल ब़दद ऽबअना। ऱम ऽबमिख सित तें ऽहत
ज़ना॥1॥
भ़ि़थग:-संस़र में िहा यििता स्त्रा पित्रिता है, ऽजसक़ पित्र श्रा
रघिऩथजा क़ भक्त हो। नहीं तो जो ऱम से ऽिमिख पित्र से
ऄपऩ ऽहत ज़नता है, िह तो ब़ूँझ हा ऄच्छा। पशि की भ़ूँऽत
ईसक़ ब्य़ऩ (पित्र प्रसि करऩ) व्यथग हा है॥1॥

* तिम्हरे वह भ़ग ऱमि बन ज़हीं। दीसर हेति त़त कछि ऩहीं॥
सकल सिकुत कर बड फलि एह। ऱम साय पद सहज सनेह॥2॥
भ़ि़थग:-तिम्ह़रे हा भ़ग्य से श्रा ऱमजा िन को ज़ रहे हैं। हे
त़त! दीसऱ कोइ क़रण नहीं है। सम्पीणग पिण्यों क़ सबसे बड़
फल यहा है दक श्रा सात़ऱमजा के चरणों में सि़भ़ऽिक प्रेम
हो॥2॥
* ऱगि रोषि आररष़ मदि मोह। जऽन सपनेहुूँ आन्द्ह के बस होह॥
सकल प्रक़र ऽबक़र ऽबह़इ। मन क्रम बचन करे हु सेिक़इ॥3॥
भ़ि़थग:-ऱग, रोष, इष़ग, मद और मोह- आनके िश सिप्न में भा
मत होऩ। सब प्रक़र के ऽिक़रों क़ त्य़ग कर मन, िचन और
कमग से श्रा सात़ऱमजा की सेि़ करऩ॥3॥
* तिम्ह कहुूँ बन सब भ़ूँऽत सिप़सी। सूँग ऽपति म़ति ऱमि ऽसय
ज़सी॥
जेवह न ऱमि बन लहवह कलेस।ी सित सोआ करे हु आहआ ईपदेसी॥4॥
भ़ि़थग:-तिमको िन में सब प्रक़र से अऱम है, ऽजसके स़थ श्रा
ऱमजा और सात़जा रूप ऽपत़-म़त़ हैं। हे पित्र! तिम िहा
करऩ ऽजससे श्रा ऱमचन्द्रजा िन में क्लेश न प़िें, मेऱ यहा
ईपदेश है॥4॥

छन्द्द :
* ईपदेसि यहु जेवह त़त तिम्हरे ऱम ऽसय सिख प़िहीं।
ऽपति म़ति ऽप्रय पररि़र पिर सिख सिरऽत बन ऽबसऱिहीं॥
तिलसा प्रभिऽह ऽसख देआ अयसि दान्द्ह पिऽन अऽसष दइ।
रऽत होई ऄऽबरल ऄमल ऽसय रघिबार पद ऽनत-ऽनत नइ॥
भ़ि़थग:-हे त़त! मेऱ यहा ईपदेश है (ऄथ़गत तिम िहा करऩ),
ऽजससे िन में तिम्ह़रे क़रण श्रा ऱमजा और सात़जा सिख प़िें
और ऽपत़, म़त़, ऽप्रय पररि़र तथ़ नगर के सिखों की य़द
भील ज़एूँ। तिलसाद़सजा कहते हैं दक सिऽमत्ऱजा ने आस प्रक़र
हम़रे प्रभि (श्रा लक्ष्मणजा) को ऽशक्ष़ देकर (िन ज़ने की) अज्ञ़
दा और दफर यह अशाि़गद ददय़ दक श्रा सात़जा और श्रा
रघििारजा के चरणों में तिम्ह़ऱ ऽनमगल (ऽनष्क़म और ऄनन्द्य)
एिं प्रग़ढ़ प्रेम ऽनत-ऽनत नय़ हो!
सोरठ़ :
* म़ति चरन ऽसरु ऩआ चले तिरत संदकत हृदयूँ।
ब़गिर ऽबषम तोऱआ मनहुूँ भ़ग मुगि भ़ग बस॥75॥
भ़ि़थग:-म़त़ के चरणों में ऽसर नि़कर, हृदय में डरते हुए (दक
ऄब भा कोइ ऽिघ्न न अ ज़ए) लक्ष्मणजा तिरंत आस तरह चल

ददए जैसे सौभ़ग्यिश कोइ ऽहरन करठन फं दे को तिड़कर भ़ग
ऽनकल़ हो॥75॥
चौप़इ :
* गए लखनि जहूँ ज़नदकऩथी। भे मन मिददत प़आ ऽप्रय स़थी॥
बंदद ऱम ऽसय चरन सिह़ए। चले संग नुपमंददर अए॥1॥
भ़ि़थग:-लक्ष्मणजा िह़ूँ गए जह़ूँ श्रा ज़नकीऩथजा थे और ऽप्रय
क़ स़थ प़कर मन में बडे हा प्रसन्न हुए। श्रा ऱमजा और
सात़जा के सिंदर चरणों की िंदऩ करके िे ईनके स़थ चले
और ऱजभिन में अए॥1॥
* कहवह परसपर पिर नर ऩरा। भऽल बऩआ ऽबऽध ब़त
ऽबग़रा॥
तन कु स मन दिखि बदन मलाने। ऽबकल मनहुूँ म़खा मधि
छाने॥2॥
भ़ि़थग:-नगर के स्त्रा-पिरुष अपस में कह रहे हैं दक ऽिध़त़ ने
खीब बऩकर ब़त ऽबग़डा! ईनके शरार दिबले, मन दिःखा और
मिख ईद़स हो रहे हैं। िे ऐसे व्य़कि ल हैं, जैसे शहद छान ऽलए
ज़ने पर शहद की मऽक्खय़ूँ व्य़कि ल हों॥2॥
* कर माजवह ऽसरु धिऽन पऽछत़हीं। जनि ऽबनि पंख ऽबहग
ऄकि ल़हीं॥

भआ बऽड भार भीप दरब़ऱ। बरऽन न ज़आ ऽबष़दि ऄप़ऱ॥3॥
भ़ि़थग:-सब ह़थ मल रहे हैं और ऽसर धिनकर (पाटकर) पछत़
रहे हैं। म़नो ऽबऩ पंख के पक्षा व्य़कि ल हो रहे हों। ऱजि़र
पर बडा भाड हो रहा है। ऄप़र ऽिष़द क़ िणगन नहीं दकय़
ज़ सकत़॥3॥

श्रा ऱमजा, लक्ष्मणजा, सात़जा क़ मह़ऱज दशरथ के प़स
ऽिद़ म़ूँगने ज़ऩ, दशरथजा क़ सात़जा को समझ़ऩ
* सऽचिूँ ईठ़आ ऱई बैठ़रे । कऽह ऽप्रय बचन ऱमि पगि ध़रे ॥
ऽसय समेत दोई तनय ऽनह़रा। ब्य़कि ल भयई भीऽमपऽत भ़रा॥4॥
भ़ि़थग:-'श्रा ऱमजा पध़रे हैं', ये ऽप्रय िचन कहकर मंत्रा ने
ऱज़ को ईठ़कर बैठ़य़। सात़ सऽहत दोनों पित्रों को (िन के
ऽलए तैय़र) देखकर ऱज़ बहुत व्य़कि ल हुए॥4॥
दोह़ :
* साय सऽहत सित सिभग दोई देऽख देऽख ऄकि ल़आ।
ब़रवह ब़र सनेह बस ऱई लेआ ईर ल़आ॥76॥
भ़ि़थग:-सात़ सऽहत दोनों सिंदर पित्रों को देख-देखकर ऱज़
ऄकि ल़ते हैं और स्नेह िश ब़रं ब़र ईन्द्हें हृदय से लग़ लेते
हैं॥76॥
चौप़इ :
* सकआ न बोऽल ऽबकल नरऩह। सोक जऽनत ईर द़रुन द़ह॥
ऩआ सासि पद ऄऽत ऄनिऱग़। ईरठ रघिबार ऽबद़ तब म़ग़॥1॥

भ़ि़थग:-ऱज़ व्य़कि ल हैं, बोल नहीं सकते। हृदय में शोक से
ईत्पन्न हुअ भय़नक सन्द्त़प है। तब रघिकिल के िार श्रा
ऱमचन्द्रजा ने ऄत्यन्द्त प्रेम से चरणों में ऽसर नि़कर ईठकर
ऽिद़ म़ूँगा-॥1॥
* ऽपति ऄसास अयसि मोऽह दाजै। हरष समय ऽबसमई कत
कीजै॥
त़त दकएूँ ऽप्रय प्रेम प्रम़दी। जसि जग ज़आ होआ ऄपब़दी॥2॥
भ़ि़थग:-हे ऽपत़जा! मिझे अशाि़गद और अज्ञ़ दाऽजए। हषग के
समय अप शोक क्यों कर रहे हैं? हे त़त! ऽप्रय के प्रेमिश
प्रम़द (कतगव्यकमग में त्रिरट) करने से जगत में यश ज़त़ रहेग़
और वनद़ होगा॥2॥
* सिऽन सनेह बस ईरठ नरऩह़ूँ। बैठ़रे रघिपऽत गऽह ब़ह़ूँ॥
सिनहु त़त तिम्ह कहुूँ मिऽन कहहीं। ऱमि चऱचर ऩयक ऄहहीं॥3॥
भ़ि़थग:-यह सिनकर स्नेहिश ऱज़ ने ईठकर श्रा रघिऩथजा की
ब़ूँह पकडकर ईन्द्हें बैठ़ ऽलय़ और कह़- हे त़त! सिनो, तिम्ह़रे
ऽलए मिऽन लोग कहते हैं दक श्रा ऱम चऱचर के सि़मा हैं॥3॥
* सिभ ऄरु ऄसिभ करम ऄनिह़रा। इसि देआ फलि हृदयूँ ऽबच़रा॥

करआ जो करम प़ि फल सोइ। ऽनगम नाऽत ऄऽस कह सबि
कोइ॥4॥
भ़ि़थग:-शिभ और ऄशिभ कमों के ऄनिस़र इश्वर हृदय में
ऽिच़रकर फल देत़ है, जो कमग करत़ है, िहा फल प़त़ है।
ऐसा िेद की नाऽत है, यह सब कोइ कहते हैं॥4॥
दोह़ :
*औरु करै ऄपऱधि कोई और प़ि फल भोगि।
ऄऽत ऽबऽचत्र भगिंत गऽत को जग ज़नै जोगि॥77॥
भ़ि़थग:-(दकन्द्ति आस ऄिसर पर तो आसके ऽिपरात हो रह़ है,)
ऄपऱध तो कोइ और हा करे और ईसके फल क़ भोग कोइ
और हा प़िे। भगि़न की लाल़ बडा हा ऽिऽचत्र है, ईसे ज़नने
योग्य जगत में कौन है?॥77॥
चौप़इ :
* ऱयूँ ऱम ऱखन ऽहत ल़गा। बहुत ईप़य दकए छलि त्य़गा॥
लखा ऱम रुख रहत न ज़ने। धरम धिरंधर धार सय़ने॥1॥
भ़ि़थग:-ऱज़ ने आस प्रक़र श्रा ऱमचन्द्रजा को रखने के ऽलए
छल छोडकर बहुत से ईप़य दकए, पर जब ईन्द्होंने धमगधिरंधर,

धार और बिऽिम़न श्रा ऱमजा क़ रुख देख ऽलय़ और िे रहते
हुए न ज़न पडे,॥1॥
* तब नुप साय ल़आ ईर लान्द्हा। ऄऽत ऽहत बहुत भ़ूँऽत ऽसख
दान्द्हा॥
कऽह बन के दिख दिसह सिऩए। स़सि ससिर ऽपति सिख
समिझ़ए॥2॥
भ़ि़थग:-तब ऱज़ ने सात़जा को हृदय से लग़ ऽलय़ और बडे
प्रेम से बहुत प्रक़र की ऽशक्ष़ दा। िन के दिःसह दिःख कहकर
सिऩए। दफर स़स, ससिर तथ़ ऽपत़ के (प़स रहने के ) सिखों को
समझ़य़॥2॥
* ऽसय मनि ऱम चरन ऄनिऱग़। घरुन सिगमि बनि ऽबषमि न
ल़ग़॥
औरई सबवह साय समिझ़इ। कऽह कऽह ऽबऽपन ऽबपऽत
ऄऽधक़इ॥3॥
भ़ि़थग:-परन्द्ति सात़जा क़ मन श्रा ऱमचन्द्रजा के चरणों में
ऄनिरक्त थ़, आसऽलए ईन्द्हें घर ऄच्छ़ नहीं लग़ और न िन
भय़नक लग़। दफर और सब लोगों ने भा िन में ऽिपऽियों की
ऄऽधकत़ बत़-बत़कर सात़जा को समझ़य़॥3॥
* सऽचि ऩरर गिर ऩरर सय़ना। सऽहत सनेह कहवह मुद ि ब़ना॥

तिम्ह कहुूँ तौ न दान्द्ह बनब़सी। करहु जो कहवह ससिर गिर
स़सी॥4॥
भ़ि़थग:-मंत्रा सिमत्र
ं जा की पत्ना और गिरु िऽशष्ठजा की स्त्रा
ऄरुं धताजा तथ़ और भा चतिर ऽस्त्रय़ूँ स्नेह के स़थ कोमल ि़णा
से कहता हैं दक तिमको तो (ऱज़ ने) िनि़स ददय़ नहीं है,
आसऽलए जो ससिर, गिरु और स़स कहें, तिम तो िहा करो॥4॥
दोह़ :
* ऽसख सातऽल ऽहत मधिर मुद ि सिऽन सातऽह न सोह़ऽन।
सरद चंद चंददऽन लगत जनि चकइ ऄकि ल़ऽन॥78॥
भ़ि़थग:-यह शातल, ऽहतक़रा, मधिर और कोमल साख सिनने पर
सात़जा को ऄच्छा नहीं लगा। (िे आस प्रक़र व्य़कि ल हो गईं)
म़नो शरद ऊति के चन्द्रम़ की च़ूँदना लगते हा चकइ व्य़कि ल
हो ईठा हो॥78॥
चौप़इ :
* साय सकि च बस ईतरु न देइ। सो सिऽन तमदक ईठा कै के इ॥
मिऽन पट भीषन भ़जन अना। अगें धरर बोला मुद ि ब़ना॥1॥
भ़ि़थग:-सात़जा संकोचिश ईिर नहीं देतीं। आन ब़तों को
सिनकर कै के या तमककर ईठा। ईसने मिऽनयों के िस्त्र, अभीषण

(म़ल़, मेखल़ अदद) और बतगन (कमण्डलि अदद) ल़कर श्रा
ऱमचन्द्रजा के अगे रख ददए और कोमल ि़णा से कह़-॥1॥
* नुपऽह प्ऱनऽप्रय तिम्ह रघिबाऱ। साल सनेह न छ़ऽडऽह भाऱ॥
सिकुति सिजसि परलोकि नस़उ। तिम्हऽह ज़न बन कऽहऽह न
क़उ॥2॥
भ़ि़थग:-हे रघििार! ऱज़ को तिम प्ऱणों के सम़न ऽप्रय हो।
भारु (प्रेमिश दिबल
ग हृदय के ) ऱज़ शाल और स्नेह नहीं छोडेंगे!
पिण्य, सिंदर यश और परलोक च़हे नष्ट हे ज़ए, पर तिम्हें िन
ज़ने को िे कभा न कहेंगे॥2॥
* ऄस ऽबच़रर सोआ करहु जो भ़ि़। ऱम जनऽन ऽसख सिऽन
सिखि प़ि़॥
भीपऽह बचन ब़नसम ल़गे। करवह न प्ऱन पय़न ऄभ़गे॥3॥
भ़ि़थग:-ऐस़ ऽिच़रकर जो तिम्हें ऄच्छ़ लगे िहा करो। म़त़
की साख सिनकर श्रा ऱमचन्द्रजा ने (बड़) सिख प़य़, परन्द्ति
ऱज़ को ये िचन ब़ण के सम़न लगे। (िे सोचने लगे) ऄब भा
ऄभ़गे प्ऱण (क्यों) नहीं ऽनकलते!॥3॥
* लोग ऽबकल मिरुऽछत नरऩह। क़ह कररऄ कछि सीझ न क़ह॥
ऱमि तिरत मिऽन बेषि बऩइ। चले जनक जनऽनऽह ऽसरु ऩइ॥4॥

भ़ि़थग:-ऱज़ मीर्तछत हो गए, लोग व्य़कि ल हैं। दकसा को कि छ
सीझ नहीं पडत़ दक क्य़ करें । श्रा ऱमचन्द्रजा तिरंत मिऽन क़
िेष बऩकर और म़त़-ऽपत़ को ऽसर नि़कर चल ददए॥4॥

श्रा ऱम-सात़-लक्ष्मण क़ िन गमन और नगर ऽनि़ऽसयों को
सोए छोडकर अगे बढ़ऩ

दोह़ :
* सऽज बन स़जि सम़जि सबि बऽनत़ बंधि समेत।
बंदद ऽबप्र गिर चरन प्रभि चले करर सबऽह ऄचेत॥79॥
भ़ि़थग:-िन क़ सब स़ज-स़म़न सजकर (िन के ऽलए अिश्यक
िसतिओं को स़थ लेकर) श्रा ऱमचन्द्रजा स्त्रा (श्रा सात़जा) और
भ़इ (लक्ष्मणजा) सऽहत, ब्ऱह्मण और गिरु के चरणों की िंदऩ
करके सबको ऄचेत करके चले॥79॥
चौप़इ :
* ऽनकऽस बऽसष्ठ ि़र भए ठ़ढ़े। देखे लोग ऽबरह दि द़ढ़े॥
कऽह ऽप्रय बचन सकल समिझ़ए। ऽबप्र बुंद रघिबार बोल़ए॥1॥
भ़ि़थग:-ऱजमहल से ऽनकलकर श्रा ऱमचन्द्रजा िऽशष्ठजा के
दरि़जे पर ज़ खडे हुए और देख़ दक सब लोग ऽिरह की
ऄऽग्न में जल रहे हैं। ईन्द्होंने ऽप्रय िचन कहकर सबको समझ़य़,
दफर श्रा ऱमचन्द्रजा ने ब्ऱह्मणों की मंडला को बिल़य़॥1॥
* गिर सन कऽह बरष़सन दान्द्ह।े अदर द़न ऽबनय बस कीन्द्ह॥े
ज़चक द़न म़न संतोषे। मात पिनात प्रेम पररतोषे॥2॥
भ़ि़थग:-गिरुजा से कहकर ईन सबको िष़गशन (िषगभर क़
भोजन) ददए और अदर, द़न तथ़ ऽिनय से ईन्द्हें िश में कर

ऽलय़। दफर य़चकों को द़न और म़न देकर संतिष्ट दकय़ तथ़
ऽमत्रों को पऽित्र प्रेम से प्रसन्न दकय़॥2॥
* द़सीं द़स बोल़आ बहोरा। गिरऽह सौंऽप बोले कर जोरा॥
सब कै स़र सूँभ़र गोस़ईं। करऽब जनक जनना की ऩईं॥3॥
भ़ि़थग:-दफर द़स-द़ऽसयों को बिल़कर ईन्द्हें गिरुजा को सौंपकर,
ह़थ जोडकर बोले- हे गिस़ईं! आन सबकी म़त़-ऽपत़ के सम़न
स़र-संभ़र (देख-रे ख) करते रऽहएग़॥3॥
* ब़रवह ब़र जोरर जिग प़ना। कहत ऱमि सब सन मुद ि ब़ना॥
सोआ सब भ़ूँऽत मोर ऽहतक़रा। जेऽह तें रहै भिअल सिख़रा॥4॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचन्द्रजा ब़र-ब़र दोनों ह़थ जोडकर सबसे
कोमल ि़णा कहते हैं दक मेऱ सब प्रक़र से ऽहतक़रा ऽमत्र
िहा होग़, ऽजसकी चेष्ट़ से मह़ऱज सिखा रहें॥4॥
दोह़ :
* म़ति सकल मोरे ऽबरहूँ जेवह न होवह दिख दान।
सोआ ईप़ई तिम्ह करे हु सब पिर जन परम प्रबान॥80॥
भ़ि़थग:-हे परम चतिर पिरि़सा सज्जनों! अप लोग सब िहा
ईप़ए कीऽजएग़, ऽजससे मेरा सब म़त़एूँ मेरे ऽिरह के दिःख से
दिःखा न हों॥80॥

चौप़इ :
* एऽह ऽबऽध ऱम सबऽह समिझ़ि़। गिर पद पदिम हरऽष ऽसरु
ऩि़॥
गनपऽत गौरर ऽगरासि मऩइ। चले ऄसास प़आ रघिऱइ॥1॥
भ़ि़थग:-आस प्रक़र श्रा ऱमजा ने सबको समझ़य़ और हर्तषत
होकर गिरुजा के चरणकमलों में ऽसर नि़य़। दफर गणेशजा,
प़िगताजा और कै ल़सपऽत मह़देिजा को मऩकर तथ़ अशाि़गद
प़कर श्रा रघिऩथजा चले॥1॥
* ऱम चलत ऄऽत भयई ऽबष़दी। सिऽन न ज़आ पिर अरत ऩदी॥
कि सगिन लंक ऄिध ऄऽत सोकी । हरष ऽबष़द ऽबबस सिरलोकी ॥2॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमजा के चलते हा बड़ भ़रा ऽिष़द हो गय़।
नगर क़ अतगऩद (ह़ह़कर) सिऩ नहीं ज़त़। लंक़ में बिरे
शकि न होने लगे, ऄयोध्य़ में ऄत्यन्द्त शोक छ़ गय़ और देिलोक
में सब हषग और ऽिष़द दोनों के िश में गए। (हषग आस ब़त क़
थ़ दक ऄब ऱक्षसों क़ ऩश होग़ और ऽिष़द ऄयोध्य़ि़ऽसयों
के शोक के क़रण थ़)॥2॥
* गआ मिरुछ़ तब भीपऽत ज़गे। बोऽल सिमंत्रि कहन ऄस ल़गे॥
ऱमि चले बन प्ऱन न ज़हीं। के ऽह सिख ल़ऽग रहत तन
म़हीं॥3॥

भ़ि़थग:-मीछ़ग दीर हुइ, तब ऱज़ ज़गे और सिमंत्र को बिल़कर
ऐस़ कहने लगे- श्रा ऱम िन को चले गए, पर मेरे प्ऱण नहीं
ज़ रहे हैं। न ज़ने ये दकस सिख के ऽलए शरार में रटक रहे
हैं॥3॥
* एऽह तें किन ब्यथ़ बलि़ऩ। जो दिखि प़आ तजवह तनि प्ऱऩ॥
पिऽन धरर धार कहआ नरऩह। लै रथि संग सख़ तिम्ह ज़ह॥4॥
भ़ि़थग:-आससे ऄऽधक बलिता और कौन सा व्यथ़ होगा, ऽजस
दिःख को प़कर प्ऱण शरार को छोडेंगे। दफर धारज धरकर ऱज़
ने कह़- हे सख़! तिम रथ लेकर श्रा ऱम के स़थ ज़ओ॥4॥
दोह़ :
* सिरठ सिकिम़र कि म़र दोई जनकसित़ सिकिम़रर।
रथ चढ़़आ देखऱआ बनि दफरे हु गएूँ ददन च़रर॥81॥
भ़ि़थग:-ऄत्यन्द्त सिकिम़र दोनों कि म़रों को और सिकिम़रा ज़नकी
को रथ में चढ़़कर, िन ददखल़कर च़र ददन के ब़द लौट
अऩ॥81॥
चौप़इ :
* जौं नवह दफरवह धार दोई भ़इ। सत्यसंध दुढ़ब्रत रघिऱइ॥

तौ तिम्ह ऽबनय करे हु कर जोरा। फे ररऄ प्रभि
ऽमऽथलेसदकसोरा॥1॥॥
भ़ि़थग:-यदद धैयि
ग ़न दोनों भ़इ न लौटें- क्योंदक श्रा रघिऩथजा
प्रण के सच्चे और दुढ़त़ से ऽनयम क़ प़लन करने ि़ले हैं- तो
तिम ह़थ जोडकर ऽिनता करऩ दक हे प्रभो! जनककि म़रा
सात़जा को तो लौट़ दाऽजए॥1॥
* जब ऽसय क़नन देऽख डेऱइ। कहेहु मोरर ऽसख ऄिसरु प़इ॥
स़सि ससिर ऄस कहेई सूँदस
े ।ी पिऽत्र दफररऄ बन बहुत कलेसी॥2॥
भ़ि़थग:-जब सात़ िन को देखकर डरें , तब मौक़ प़कर मेरा
यह साख ईनसे कहऩ दक तिम्ह़रे स़स और ससिर ने ऐस़ संदश

कह़ है दक हे पित्रा! तिम लौट चलो, िन में बहुत क्लेश हैं॥2॥
* ऽपतिगुह कबहुूँ कबहुूँ ससिऱरा। रहेहु जह़ूँ रुऽच होआ तिम्ह़रा॥
एऽह ऽबऽध करे हु ईप़य कदंब़। दफरआ त होआ प्ऱन ऄिलंब़॥3॥
भ़ि़थग:-कभा ऽपत़ के घर, कभा ससिऱल, जह़ूँ तिम्ह़रा आच्छ़
हो, िहीं रहऩ। आस प्रक़र तिम बहुत से ईप़य करऩ। यदद
सात़जा लौट अईं तो मेरे प्ऱणों को सह़ऱ हो ज़एग़॥3॥
* ऩवह त मोर मरनि पररऩम़। कछि न बस़आ भएूँ ऽबऽध
ब़म़॥

ऄस कऽह मिरुऽछ पऱ मऽह ऱउ। ऱमि लखनि ऽसय अऽन
देख़उ॥4॥
भ़ि़थग:-(नहीं तो ऄंत में मेऱ मरण हा होग़। ऽिध़त़ के
ऽिपरात होने पर कि छ िश नहीं चलत़। ह़! ऱम, लक्ष्मण और
सात़ को ल़कर ददख़ओ। ऐस़ कहकर ऱज़ मीर्तछत होकर पुथ्िा
पर ऽगर पडे॥4॥
दोह़ :
* प़आ रज़यसि ऩआ ऽसरु रथि ऄऽत बेग बऩआ।
गयई जह़ूँ ब़हेर नगर साय सऽहत दोई भ़आ॥82॥
भ़ि़थग:-सिमंत्रजा ऱज़ की अज्ञ़ प़कर, ऽसर नि़कर और बहुत
जल्दा रथ जिडि़कर िह़ूँ गए, जह़ूँ नगर के ब़हर सात़जा
सऽहत दोनों भ़इ थे॥82॥
चौप़इ :
* तब सिमंत्र नुप बचन सिऩए। करर ऽबनता रथ ऱमि चढ़़ए॥
चदढ़ रथ साय सऽहत दोई भ़इ। चले हृदयूँ ऄिधऽह ऽसरु
ऩइ॥1॥
भ़ि़थग:-तब (िह़ूँ पहुूँचकर) सिमंत्र ने ऱज़ के िचन श्रा
ऱमचन्द्रजा को सिऩए और ऽिनता करके ईनको रथ पर चढ़़य़।

सात़जा सऽहत दोनों भ़इ रथ पर चढ़कर हृदय में ऄयोध्य़ को
ऽसर नि़कर चले॥1॥
* चलत ऱमि लऽख ऄिध ऄऩथ़। ऽबकल लोग सब ल़गे स़थ़॥
कु प़वसधि बहुऽबऽध समिझ़िवह। दफरवह प्रेम बस पिऽन दफरर
अिवह॥2॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचन्द्रजा को ज़ते हुए और ऄयोध्य़ को ऄऩथ
(होते हुए) देखकर सब लोग व्य़कि ल होकर ईनके स़थ हो ऽलए।
कु प़ के समिर श्रा ऱमजा ईन्द्हें बहुत तरह से समझ़ते हैं, तो िे
(ऄयोध्य़ की ओर) लौट ज़ते हैं, परन्द्ति प्रेमिश दफर लौट अते
हैं॥2॥
* ल़गऽत ऄिध भय़िऽन भ़रा। म़नहुूँ क़लऱऽत ऄूँऽधअरा॥
घोर जंति सम पिर नर ऩरा। डरपवह एकऽह एक ऽनह़रा॥3॥
भ़ि़थग:-ऄयोध्य़पिरा बडा डऱिना लग रहा है, म़नो
ऄंधक़रमया क़लऱऽत्र हा हो। नगर के नर-ऩरा भय़नक
जन्द्तिओं के सम़न एक-दीसरे को देखकर डर रहे हैं॥3॥
* घर मस़न पररजन जनि भीत़। सित ऽहत मात मनहुूँ जमदीत़॥
ब़गन्द्ह ऽबटप बेऽल कि ऽम्हल़हीं। सररत सरोिर देऽख न ज़हीं॥4॥

भ़ि़थग:-घर श्मश़न, कि टि म्बा भीत-प्रेत और पित्र, ऽहतैषा और
ऽमत्र म़नो यमऱज के दीत हैं। बगाचों में िुक्ष और बेलें कि म्हल़
रहा हैं। नदा और त़ल़ब ऐसे भय़नक लगते हैं दक ईनकी ओर
देख़ भा नहीं ज़त़॥4॥
दोह़ :
* हय गय कोरटन्द्ह के ऽलमुग पिरपसि च़तक मोर।
ऽपक रथ़ंग सिक स़ररक़ स़रस हंस चकोर॥83॥
भ़ि़थग:-करोडों घोडे, ह़था, खेलने के ऽलए प़ले हुए ऽहरन,
नगर के (ग़य, बैल, बकरा अदद) पशि, पपाहे, मोर, कोयल,
चकिे, तोते, मैऩ, स़रस, हंस और चकोर-॥83॥
चौप़इ :
* ऱम ऽबयोग ऽबकल सब ठ़ढ़े। जहूँ तहूँ मनहुूँ ऽचत्र ऽलऽख
क़ढ़े॥
नगरु सफल बनि गहबर भ़रा। खग मुग ऽबपिल सकल नर
ऩरा॥1॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमजा के ऽियोग में सभा व्य़कि ल हुए जह़ूँ-तह़ूँ
(ऐसे चिपच़प ऽसथर होकर) खडे हैं, म़नो तसिारों में ऽलखकर
बऩए हुए हैं। नगर म़नो फलों से पररपीणग बड़ भ़रा सघन
िन थ़। नगर ऽनि़सा सब स्त्रा-पिरुष बहुत से पशि-पक्षा थे।

(ऄथ़गत ऄिधपिरा ऄथग, धमग, क़म, मोक्ष च़रों फलों को देने
ि़ला नगरा था और सब स्त्रा-पिरुष सिख से ईन फलों को प्ऱप्त
करते थे।)॥1॥
* ऽबऽध कै कइ दकऱऽतऽन कीन्द्हा। जेवह दि दिसह दसहुूँ ददऽस
दान्द्हा॥
सऽह न सके रघिबर ऽबरह़गा। चले लोग सब ब्य़कि ल भ़गा॥2॥
भ़ि़थग:-ऽिध़त़ ने कै के या को भालना बऩय़, ऽजसने दसों
ददश़ओं में दिःसह द़ि़ऽग्न (भय़नक अग) लग़ दा। श्रा
ऱमचन्द्रजा के ऽिरह की आस ऄऽग्न को लोग सह न सके । सब
लोग व्य़कि ल होकर भ़ग चले॥2॥
* सबवह ऽबच़रु कीन्द्ह मन म़हीं। ऱम लखन ऽसय ऽबनि सिखि
ऩहीं॥
जह़ूँ ऱमि तहूँ सबिआ सम़जी। ऽबनि रघिबार ऄिध नवह क़जी॥3॥
भ़ि़थग:-सबने मन में ऽिच़र कर ऽलय़ दक श्रा ऱमजा,
लक्ष्मणजा और सात़जा के ऽबऩ सिख नहीं है। जह़ूँ श्रा ऱमजा
रहेंगे, िहीं स़ऱ सम़ज रहेग़। श्रा ऱमचन्द्रजा के ऽबऩ
ऄयोध्य़ में हम लोगों क़ कि छ क़म नहीं है॥3॥
* चले स़थ ऄस मंत्रि दुढ़़इ। सिर दिलगभ सिख सदन ऽबह़इ॥

ऱम चरन पंकज ऽप्रय ऽजन्द्हहा। ऽबषय भोग बस करवह दक
ऽतन्द्हहा॥4॥
भ़ि़थग:-ऐस़ ऽिच़र दुढ़ करके देित़ओं को भा दिलगभ सिखों से
पीणग घरों को छोडकर सब श्रा ऱमचन्द्रजा के स़थ चले पडे।
ऽजनको श्रा ऱमजा के चरणकमल प्य़रे हैं, ईन्द्हें क्य़ कभा
ऽिषय भोग िश में कर सकते हैं॥4॥
दोह़ :
* ब़लक बुि ऽबह़आ गुहूँ लगे लोग सब स़थ।
तमस़ तार ऽनि़सि दकय प्रथम ददिस रघिऩथ॥84॥
भ़ि़थग:-बच्चों और बीढ़ों को घरों में छोडकर सब लोग स़थ हो
ऽलए। पहले ददन श्रा रघिऩथजा ने तमस़ नदा के तार पर
ऽनि़स दकय़॥84॥
चौप़इ :
* रघिपऽत प्रज़ प्रेमबस देखा। सदय हृदयूँ दिखि भयई ऽबसेषा॥
करुऩमय रघिऩथ गोस़ूँइ। बेऽग प़आऄवह पार पऱइ॥1॥
भ़ि़थग:-प्रज़ को प्रेमिश देखकर श्रा रघिऩथजा के दय़लि हृदय
में बड़ दिःख हुअ। प्रभि श्रा रघिऩथजा करुण़मय हैं। पऱइ पाड़
को िे तिरंत प़ ज़ते हैं (ऄथ़गत दीसरे क़ दिःख देखकर िे तिरंत
सियं दिःऽखत हो ज़ते हैं)॥1॥

* कऽह सप्रेम मुद ि बचन सिह़ए। बहुऽबऽध ऱम लोग समिझ़ए॥
दकए धरम ईपदेस घनेरे। लोग प्रेम बस दफरवह न फे रे ॥2॥
भ़ि़थग:-प्रेमयिक्त कोमल और सिंदर िचन कहकर श्रा ऱमजा ने
बहुत प्रक़र से लोगों को समझ़य़ और बहुतेरे धमग संबंधा
ईपदेश ददए, परन्द्ति प्रेमिश लोग लौट़ए लौटते नहीं॥2॥
* सालि सनेहु छ़ऽड नवह ज़इ। ऄसमंजस बस भे रघिऱइ॥
लोग सोग श्रम बस गए सोइ। कछि क देिम़य़ूँ मऽत मोइ॥3॥
भ़ि़थग:-शाल और स्नेह छोड़ नहीं ज़त़। श्रा रघिऩथजा
ऄसमंजस के ऄधान हो गए (दिऽिध़ में पड गए)। शोक और
पररश्रम (थक़िट) के म़रे लोग सो गए और कि छ देित़ओं की
म़य़ से भा ईनकी बिऽि मोऽहत हो गइ॥3॥
* जबवह ज़म जिग ज़ऽमऽन बाता। ऱम सऽचि सन कहेई
सप्राता॥
खोज म़रर रथि ह़ूँकहु त़त़। अन ईप़यूँ बऽनऽह नवह ब़त़॥4॥
भ़ि़थग:-जब दो पहर बात गइ, तब श्रा ऱमचन्द्रजा ने प्रेमपीिगक
मंत्रा सिमंत्र से कह़- हे त़त! रथ के खोज म़रकर (ऄथ़गत
पऽहयों के ऽचह्नों से ददश़ क़ पत़ न चले आस प्रक़र) रथ को
ह़ूँदकए। और दकसा ईप़य से ब़त नहीं बनेगा॥4॥
दोह़ :

* ऱम लखन ऽसय ज़न चदढ़ संभि चरन ऽसरु ऩआ।
सऽचिूँ चल़यई तिरत रथि आत ईत खोज दिऱआ॥85॥
भ़ि़थग:-शंकरजा के चरणों में ऽसर नि़कर श्रा ऱमजा,
लक्ष्मणजा और सात़जा रथ पर सि़र हुए। मंत्रा ने तिरंत हा
रथ को आधर-ईधर खोज ऽछप़कर चल़ ददय़॥85॥
चौप़इ :
* ज़गे सकल लोग भएूँ भोरू। गे रघिऩथ भयई ऄऽत सोरू॥
रथ कर खोज कतहुूँ नवह प़िवह। ऱम ऱम कऽह चहुूँ ददऽस
ध़िवह॥1॥
भ़ि़थग:-सबेऱ होते हा सब लोग ज़गे, तो बड़ शोर मच़ दक
रघिऩथजा चले गए। कहीं रथ क़ खोज नहीं प़ते, सब 'ह़
ऱम! ह़ ऱम!' पिक़रते हुए च़रों ओर दौड रहे हैं॥1॥
* मनहुूँ ब़ररऽनऽध बीड जह़जी। भयई ऽबकल बड बऽनक सम़जी॥
एकऽह एक देवह ईपदेसी। तजे ऱम हम ज़ऽन कलेस॥
ी 2॥
भ़ि़थग:-म़नो समिर में जह़ज डी ब गय़ हो, ऽजससे व्य़प़ररयों
क़ समिद़य बहुत हा व्य़कि ल हो ईठ़ हो। िे एक-दीसरे को

ईपदेश देते हैं दक श्रा ऱमचन्द्रजा ने, हम लोगों को क्लेश होग़,
यह ज़नकर छोड ददय़ है॥2॥
* वनदवह अपि सऱहवह माऩ। ऽधग जािनि रघिबार ऽबहाऩ॥
जौं पै ऽप्रय ऽबयोगि ऽबऽध कीन्द्ह़। तौ कस मरनि न म़गें
दान्द्ह़॥3॥
भ़ि़थग:-िे लोग ऄपना वनद़ करते हैं और मछऽलयों की
सऱहऩ करते हैं। (कहते हैं-) श्रा ऱमचन्द्रजा के ऽबऩ हम़रे
जाने को ऽधक्क़र है। ऽिध़त़ ने यदद प्य़रे क़ ऽियोग हा रच़,
तो दफर ईसने म़ूँगने पर मुत्यि क्यों नहीं दा!॥3॥
* एऽह ऽबऽध करत प्रल़प कल़प़। अए ऄिध भरे पररत़प़॥
ऽबषम ऽबयोगि न ज़आ बख़ऩ। ऄिऽध अस सब ऱखवह
प्ऱऩ॥4॥
भ़ि़थग:-आस प्रक़र बहुत से प्रल़प करते हुए िे संत़प से भरे
हुए ऄयोध्य़जा में अए। ईन लोगों के ऽिषम ऽियोग की दश़
क़ िणगन नहीं दकय़ ज़ सकत़। (चौदह स़ल की) ऄिऽध की
अश़ से हा िे प्ऱणों को रख रहे हैं॥4॥
दोह़ :
* ऱम दरस ऽहत नेम ब्रत लगे करन नर ऩरर।

मनहुूँ कोक कोकी कमल दान ऽबहान तम़रर॥86॥
भ़ि़थग:-(सब) स्त्रा-पिरुष श्रा ऱमचन्द्रजा के दशगन के ऽलए ऽनयम
और व्रत करने लगे और ऐसे दिःखा हो गए जैसे चकि़, चकिा
और कमल सीयग के ऽबऩ दान हो ज़ते हैं॥86॥
चौप़इ :
* सात़ सऽचि सऽहत दोई भ़इ। सुंगबेरपिर पहुूँचे ज़इ॥
ईतरे ऱम देिसरर देखा। कीन्द्ह दंडित हरषि ऽबसेषा॥1॥
भ़ि़थग:-सात़जा और मंत्रा सऽहत दोनों भ़इ श्रुंगिेरपिर ज़
पहुूँचे। िह़ूँ गंग़जा को देखकर श्रा ऱमजा रथ से ईतर पडे और
बडे हषग के स़थ ईन्द्होंने दण्डित की॥1॥
* लखन सऽचिूँ ऽसयूँ दकए प्रऩम़। सबऽह सऽहत सिखि प़यई
ऱम़॥
गंग सकल मिद मंगल मील़। सब सिख करऽन हरऽन सब सील़॥2॥
भ़ि़थग:-लक्ष्मणजा, सिमंत्र और सात़जा ने भा प्रण़म दकय़।
सबके स़थ श्रा ऱमचन्द्रजा ने सिख प़य़। गंग़जा समसत अनंदमंगलों की मील हैं। िे सब सिखों को करने ि़ला और सब
पाड़ओं को हरने ि़ला हैं॥2॥
* कऽह कऽह कोरटक कथ़ प्रसंग़। ऱमि ऽबलोकवह गंग तरं ग़॥

सऽचिऽह ऄनिजऽह ऽप्रयऽह सिऩइ। ऽबबिध नदा मऽहम़
ऄऽधक़इ॥3॥
भ़ि़थग:-ऄनेक कथ़ प्रसंग कहते हुए श्रा ऱमजा गंग़जा की
तरं गों को देख रहे हैं। ईन्द्होंने मंत्रा को, छोटे भ़इ लक्ष्मणजा को
और ऽप्रय़ सात़जा को देिनदा गंग़जा की बडा मऽहम़
सिऩइ॥3॥
* मज्जनि कीन्द्ह पंथ श्रम गयउ। सिऽच जलि ऽपऄत मिददत मन
भयउ॥
सिऽमरत ज़ऽह ऽमटआ श्रम भ़रू। तेऽह श्रम यह लौदकक
ब्यिह़रू॥4॥
भ़ि़थग:-आसके ब़द सबने स्ऩन दकय़, ऽजससे म़गग क़ स़ऱ श्रम
(थक़िट) दीर हो गय़ और पऽित्र जल पाते हा मन प्रसन्न हो
गय़। ऽजनके समरण म़त्र से (ब़र-ब़र जन्द्म ने और मरने क़)
मह़न श्रम ऽमट ज़त़ है, ईनको 'श्रम' होऩ- यह के िल लौदकक
व्यिह़र (नरलाल़) है॥4॥

श्रा ऱम क़ श्रुंगिेरपिर पहुूँचऩ, ऽनष़द के ि़ऱ सेि़
दोह़ :
* सिि सऽच्चद़नंदमय कं द भ़निकिल के ति।
चररतकरत नर ऄनिहरत संसुऽत स़गर सेति॥87॥
भ़ि़थग:-शिि (प्रकु ऽतजन्द्य ऽत्रगिणों से रऽहत, म़य़तात ददव्य
मंगलऽिग्रह) सऽच्चद़नंद-कन्द्द सिरूप सीयग कि ल के ध्िज़ रूप
भगि़न श्रा ऱमचन्द्रजा मनिष्यों के सदुश ऐसे चररत्र करते हैं,
जो संस़र रूपा समिर के प़र ईतरने के ऽलए पिल के सम़न
हैं॥87॥

चौप़इ :
* यह सिऽध गिहूँ ऽनष़द जब प़इ। मिददत ऽलए ऽप्रय बंधि
बोल़इ॥
ऽलए फल मील भेंट भरर भ़ऱ। ऽमलन चलेई ऽहयूँ हरषि
ऄप़ऱ॥1॥
भ़ि़थग:-जब ऽनष़दऱज गिह ने यह खबर प़इ, तब अनंददत
होकर ईसने ऄपने ऽप्रयजनों और भ़इ-बंधिओं को बिल़ ऽलय़ और
भेंट देने के ऽलए फल, मील (कन्द्द) लेकर और ईन्द्हें भ़रों
(बहूँऽगयों) में भरकर ऽमलने के ऽलए चल़। ईसके हृदय में हषग
क़ प़र नहीं थ़॥1॥
* करर दंडित भेंट धरर अगें। प्रभिऽह ऽबलोकत ऄऽत ऄनिऱगें॥
सहज सनेह ऽबबस रघिऱइ। पीूँछा कि सल ऽनकट बैठ़इ॥2॥
भ़ि़थग:-दण्डित करके भेंट स़मने रखकर िह ऄत्यन्द्त प्रेम से
प्रभि को देखने लग़। श्रा रघिऩथजा ने सि़भ़ऽिक स्नेह के िश
होकर ईसे ऄपने प़स बैठ़कर कि शल पीछा॥2॥
* ऩथ कि सल पद पंकज देखें। भयईूँ भ़गभ़जन जन लेखें॥
देि धरऽन धनि ध़मि तिम्ह़ऱ। मैं जनि नाचि सऽहत पररि़ऱ॥3॥
भ़ि़थग:-ऽनष़दऱज ने ईिर ददय़- हे ऩथ! अपके चरणकमल के
दशगन से हा कि शल है (अपके चरण़रऽिन्द्दों के दशगन कर) अज

मैं भ़ग्यि़न पिरुषों की ऽगनता में अ गय़। हे देि! यह पुथ्िा,
धन और घर सब अपक़ है। मैं तो पररि़र सऽहत अपक़ नाच
सेिक हूँ॥3॥
* कु प़ कररऄ पिर ध़ररऄ प़उ। थ़ऽपय जनि सबि लोगि ऽसह़उ॥
कहेहु सत्य सबि सख़ सिज़ऩ। मोऽह दान्द्ह ऽपति अयसि अऩ॥4॥
भ़ि़थग:-ऄब कु प़ करके पिर (श्रुंगिेरपिर) में पध़ररए और आस
द़स की प्रऽतष्ठ़ बढ़़आए, ऽजससे सब लोग मेरे भ़ग्य की बड़इ
करें । श्रा ऱमचन्द्रजा ने कह़- हे सिज़न सख़! तिमने जो कि छ
कह़ सब सत्य है, परन्द्ति ऽपत़जा ने मिझको और हा अज्ञ़ दा
है॥4॥
दोह़ :
* बरष च़ररदस ब़सि बन मिऽन ब्रत बेषि ऄह़रु।
ग्ऱम ब़सि नवह ईऽचत सिऽन गिहऽह भयई दिखि भ़रु॥88॥
भ़ि़थग:-(ईनकी अज्ञ़निस़र) मिझे चौदह िषग तक मिऽनयों क़ व्रत
और िेष ध़रण कर और मिऽनयों के योग्य अह़र करते हुए िन
में हा बसऩ है, ग़ूँि के भातर ऽनि़स करऩ ईऽचत नहीं है।
यह सिनकर गिह को बड़ दिःख हुअ॥88॥
चौप़इ :

* ऱम लखन ऽसय रूप ऽनह़रा। कहवह सप्रेम ग्ऱम नर ऩरा॥
ते ऽपति म़ति कहहु सऽख कै से। ऽजन्द्ह पठए बन ब़लक ऐसे॥1॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमजा, लक्ष्मणजा और सात़जा के रूप को देखकर
ग़ूँि के स्त्रा-पिरुष प्रेम के स़थ चच़ग करते हैं। (कोइ कहता है-)
हे सखा! कहो तो, िे म़त़-ऽपत़ कै से हैं, ऽजन्द्होंने ऐसे (सिंदर
सिकिम़र) ब़लकों को िन में भेज ददय़ है॥1॥
* एक कहवह भल भीपऽत कीन्द्ह़। लोयन ल़हु हमऽह ऽबऽध
दान्द्ह़॥
तब ऽनष़दपऽत ईर ऄनिम़ऩ। तरु वससिप़ मनोहर ज़ऩ॥2॥
भ़ि़थग:-कोइ एक कहते हैं- ऱज़ ने ऄच्छ़ हा दकय़, आसा
बह़ने हमें भा ब्रह्म़ ने नेत्रों क़ ल़भ ददय़। तब ऽनष़द ऱज
ने हृदय में ऄनिम़न दकय़, तो ऄशोक के पेड को (ईनके ठहरने
के ऽलए) मनोहर समझ़॥2॥
* लै रघिऩथवह ठ़ईूँ देख़ि़। कहेई ऱम सब भ़ूँऽत सिह़ि़॥
पिरजन करर जोह़रु घर अए। रघिबर संध्य़ करन ऽसध़ए॥3॥
भ़ि़थग:-ईसने श्रा रघिऩथजा को ले ज़कर िह सथ़न ददख़य़।
श्रा ऱमचन्द्रजा ने (देखकर) कह़ दक यह सब प्रक़र से सिंदर है।

पिरि़सा लोग जोह़र (िंदऩ) करके ऄपने-ऄपने घर लौटे और
श्रा ऱमचन्द्रजा संध्य़ करने पध़रे ॥3॥
* गिहूँ सूँि़रर स़ूँथरा डस़इ। कि स दकसलयमय मुदल
ि सिह़इ॥
सिऽच फल मील मधिर मुद ि ज़ना। दोऩ भरर भरर ऱखेऽस
प़ना॥4॥
भ़ि़थग:-गिह ने (आसा बाच) कि श और कोमल पिों की कोमल
और सिंदर स़थरा सज़कर ऽबछ़ दा और पऽित्र, माठे और
कोमल देख-देखकर दोनों में भर-भरकर फल-मील और प़ना रख
ददय़ (ऄथि़ ऄपने ह़थ से फल-मील दोनों में भर-भरकर रख
ददए)॥4॥
दोह़ :
* ऽसय सिमंत्र वऱ्त़ सऽहत कं द मील फल ख़आ।
सयन कीन्द्ह रघिबस
ं मऽन प़य पलोटत भ़आ॥89॥
भ़ि़थग:-सात़जा, सिमंत्रजा और भ़इ लक्ष्मणजा सऽहत कन्द्द-मीलफल ख़कर रघिकिल मऽण श्रा ऱमचन्द्रजा लेट गए। भ़इ
लक्ष्मणजा ईनके पैर दब़ने लगे॥89॥
चौप़इ :
* ईठे लखनि प्रभि सोित ज़ना। कऽह सऽचिऽह सोिन मुद ि ब़ना॥

कछि क दीरर सऽज ब़न सऱसन। ज़गन लगे बैरठ बाऱसन॥1॥
भ़ि़थग:-दफर प्रभि श्रा ऱमचन्द्रजा को सोते ज़नकर लक्ष्मणजा
ईठे और कोमल ि़णा से मंत्रा सिमंत्रजा को सोने के ऽलए
कहकर िह़ूँ से कि छ दीर पर धनिष-ब़ण से सजकर, िाऱसन से
बैठकर ज़गने (पहऱ देने) लगे॥1॥
* गिहूँ बोल़आ प़हरू प्रताता। ठ़िूँ ठ़िूँ ऱखे ऄऽत प्राता॥
अपि लखन पवह बैठेई ज़इ। करट भ़था सर च़प चढ़़इ॥2॥
भ़ि़थग:-गिह ने ऽिश्व़सप़त्र पहरे द़रों को बिल़कर ऄत्यन्द्त प्रेम से
जगह-जगह ऽनयिक्त कर ददय़ और अप कमर में तरकस ब़ूँधकर
तथ़ धनिष पर ब़ण चढ़़कर लक्ष्मणजा के प़स ज़ बैठ़॥2॥
* सोित प्रभिऽह ऽनह़रर ऽनष़दी। भयई प्रेम बस हृदयूँ ऽबष़दी॥
तनि पिलदकत जलि लोचन बहइ। बचन सप्रेम लखन सन कहइ॥3॥
भ़ि़थग:-प्रभि को जमान पर सोते देखकर प्रेम िश ऽनष़द ऱज
के हृदय में ऽिष़द हो अय़। ईसक़ शरार पिलदकत हो गय़
और नेत्रों से (प्रेम़श्रिओं क़) जल बहने लग़। िह प्रेम सऽहत
लक्ष्मणजा से िचन कहने लग़-॥3॥
* भीपऽत भिन सिभ़यूँ सिह़ि़। सिरपऽत सदनि न पटतर प़ि़॥
मऽनमय रऽचत च़रु चौब़रे । जनि रऽतपऽत ऽनज ह़थ सूँि़रे ॥4॥

भ़ि़थग:-मह़ऱज दशरथजा क़ महल तो सिभ़ि से हा सिंदर है,
आन्द्रभिन भा ऽजसकी सम़नत़ नहीं प़ सकत़। ईसमें सिंदर
मऽणयों के रचे चौब़रे (छत के उपर बूँगले) हैं, ऽजन्द्हें म़नो
रऽत के पऽत क़मदेि ने ऄपने हा ह़थों सज़कर बऩय़ है॥4॥
दोह़ :
* सिऽच सिऽबऽचत्र सिभोगमय सिमन सिगंध सिब़स।
पलूँग मंजि मऽन दाप जहूँ सब ऽबऽध सकल सिप़स॥90॥
भ़ि़थग:- जो पऽित्र, बडे हा ऽिलक्षण, सिंदर भोग पद़थों से पीणग
और फी लों की सिगंध से सिि़ऽसत हैं, जह़ूँ सिंदर पलूँग और
मऽणयों के दापक हैं तथ़ सब प्रक़र क़ पीऱ अऱम है,॥90॥
चौप़इ :
* ऽबऽबध बसन ईपध़न तिऱईं। छार फे न मुद ि ऽबसद सिह़ईं॥
तहूँ ऽसय ऱमि सयन ऽनऽस करहीं। ऽनज छऽब रऽत मनोज मदि
हरहीं॥1॥
भ़ि़थग:-जह़ूँ (ओढ़ने-ऽबछ़ने के ) ऄनेकों िस्त्र, तदकए और गद्दे हैं,
जो दीध के फे न के सम़न कोमल, ऽनमगल (ईज्ज्िल) और सिंदर हैं,
िह़ूँ (ईन चौब़रों में) श्रा सात़जा और श्रा ऱमचन्द्रजा ऱत को

सोय़ करते थे और ऄपना शोभ़ से रऽत और क़मदेि के गिग
को हरण करते थे॥1॥
* ते ऽसय ऱमि स़थरीं सोए। श्रऽमत बसन ऽबनि ज़वह न जोए॥
म़ति ऽपत़ पररजन पिरब़सा। सख़ सिसाल द़स ऄरु द़सा॥2॥
भ़ि़थग:-िहा श्रा सात़ और श्रा ऱमजा अज घ़स-फी स की
स़थरा पर थके हुए ऽबऩ िस्त्र के हा सोए हैं। ऐसा दश़ में िे
देखे नहीं ज़ते। म़त़, ऽपत़, कि टि म्बा, पिरि़सा (प्रज़), ऽमत्र,
ऄच्छे शाल-सिभ़ि के द़स और द़ऽसय़ूँ-॥2॥
* जोगिवह ऽजन्द्हऽह प्ऱन की ऩईं। मऽह सोित तेआ ऱम
गोस़ईं॥
ऽपत़ जनक जग ऽबददत प्रभ़उ। ससिर सिरेस सख़ रघिऱउ॥3॥
भ़ि़थग:-सब ऽजनकी ऄपने प्ऱणों की तरह स़र-संभ़र करते थे,
िहा प्रभि श्रा ऱमचन्द्रजा अज पुथ्िा पर सो रहे हैं। ऽजनके
ऽपत़ जनकजा हैं, ऽजनक़ प्रभ़ि जगत में प्रऽसि है, ऽजनके
ससिर आन्द्र के ऽमत्र रघिऱज दशरथजा हैं,॥3॥
* ऱमचंद ि पऽत सो बैदह
े ा। सोित मऽह ऽबऽध ब़म न के हा॥
ऽसय रघिबार दक क़नन जोगी। करम प्रध़न सत्य कह लोगी॥4॥

भ़ि़थग:-और पऽत श्रा ऱमचन्द्रजा हैं, िहा ज़नकीजा अज
जमान पर सो रहा हैं। ऽिध़त़ दकसको प्रऽतकी ल नहीं होत़!
सात़जा और श्रा ऱमचन्द्रजा क्य़ िन के योग्य हैं? लोग सच
कहते हैं दक कमग (भ़ग्य) हा प्रध़न है॥4॥
दोह़ :
* कै कयनंददऽन मंदमऽत करठन कि रटलपन कीन्द्ह।
जेवह रघिनंदन ज़नदकऽह सिख ऄिसर दिखि दान्द्ह॥91॥
भ़ि़थग:-कै कयऱज की लडकी नाच बिऽि कै के या ने बडा हा
कि रटलत़ की, ऽजसने रघिनंदन श्रा ऱमजा और ज़नकीजा को
सिख के समय दिःख ददय़॥91॥
चौप़इ :
* भआ ददनकर कि ल ऽबटप कि ठ़रा। कि मऽत कीन्द्ह सब ऽबसि
दिख़रा॥
भयई ऽबष़दि ऽनष़दऽह भ़रा। ऱम साय मऽह सयन ऽनह़रा॥1॥
भ़ि़थग:-िह सीयगकिल रूपा िुक्ष के ऽलए कि ल्ह़डा हो गइ। ईस
कि बिऽि ने सम्पीणग ऽिश्व को दिःखा कर ददय़। श्रा ऱम-सात़ को
जमान पर सोते हुए देखकर ऽनष़द को बड़ दिःख हुअ॥1॥

लक्ष्मण-ऽनष़द संि़द, श्रा ऱम-सात़ से सिमन्द्त्र क़ संि़द, सिमंत्र
क़ लौटऩ
* बोले लखन मधिर मुद ि ब़ना। ग्य़न ऽबऱग भगऽत रस स़ना॥

क़हु न कोई सिख दिख कर द़त़। ऽनज कु त करम भोग सबि
वऱ्त़॥2॥
भ़ि़थग:-तब लक्ष्मणजा ज्ञ़न, िैऱग्य और भऽक्त के रस से सना
हुइ माठा और कोमल ि़णा बोले- हे भ़इ! कोइ दकसा को सिखदिःख क़ देने ि़ल़ नहीं है। सब ऄपने हा दकए हुए कमों क़
फल भोगते हैं॥2॥
* जोग ऽबयोग भोग भल मंद़। ऽहत ऄनऽहत मध्यम वर्म फं द़॥
जनमि मरनि जहूँ लऽग जग ज़ली। संपऽत ऽबपऽत करमि ऄरु
क़ली॥3॥
भ़ि़थग:-संयोग (ऽमलऩ), ऽियोग (ऽबछि डऩ), भले-बिरे भोग, शत्रि,
ऽमत्र और ईद़सान- ये सभा वर्म के फं दे हैं। जन्द्म-मुत्यि, सम्पऽिऽिपऽि, कमग और क़ल- जह़ूँ तक जगत के जंज़ल हैं,॥3॥
* दरऽन ध़मि धनि पिर पररि़रू। सरगि नरकि जहूँ लऽग ब्यिह़रू॥
देऽखऄ सिऽनऄ गिऽनऄ मन म़हीं। मोह मील परम़रथि ऩहीं॥4॥
भ़ि़थग:-धरता, घर, धन, नगर, पररि़र, सिगग और नरक अदद
जह़ूँ तक व्यिह़र हैं, जो देखने, सिनने और मन के ऄंदर
ऽिच़रने में अते हैं, आन सबक़ मील मोह (ऄज्ञ़न) हा है।
परम़थगतः ये नहीं हैं॥4॥

दोह़ :
* सपनें होआ ऽभख़रर नुपि रं कि ऩकपऽत होआ।
ज़गें ल़भि न ह़ऽन कछि ऽतऽम प्रपंच ऽजयूँ जोआ॥92॥
भ़ि़थग:-जैसे सिप्न में ऱज़ ऽभख़रा हो ज़ए य़ कं ग़ल सिगग
क़ सि़मा आन्द्र हो ज़ए, तो ज़गने पर ल़भ य़ ह़ऽन कि छ भा
नहीं है, िैसे हा आस दुश्य-प्रपंच को हृदय से देखऩ च़ऽहए॥92॥
चौप़इ :
* ऄस ऽबच़रर नवह कीऽजऄ रोसी। क़हुऽह ब़दद न देआऄ दोसी॥
मोह ऽनस़ूँ सबि सोिऽनह़ऱ। देऽखऄ सपन ऄनेक प्रक़ऱ॥1॥
भ़ि़थग:-ऐस़ ऽिच़रकर क्रोध नहीं करऩ च़ऽहए और न दकसा
को व्यथग दोष हा देऩ च़ऽहए। सब लोग मोह रूपा ऱऽत्र में
सोने ि़ले हैं और सोते हुए ईन्द्हें ऄनेकों प्रक़र के सिप्न ददख़इ
देते हैं॥1॥
* एवह जग ज़ऽमऽन ज़गवह जोगा। परम़रथा प्रपंच ऽबयोगा॥
ज़ऽनऄ तबवह जाि जग ज़ग़। जब सब ऽबषय ऽबल़स
ऽबऱग़॥2॥
भ़ि़थग:-आस जगत रूपा ऱऽत्र में योगा लोग ज़गते हैं, जो
परम़थी हैं और प्रपंच (म़ऽयक जगत) से छी टे हुए हैं। जगत में

जाि को ज़ग़ हुअ तभा ज़नऩ च़ऽहए, जब सम्पीणग भोगऽिल़सों से िैऱग्य हो ज़ए॥2॥
* होआ ऽबबेकि मोह वर्म भ़ग़। तब रघिऩथ चरन ऄनिऱग़॥
सख़ परम परम़रथि एह। मन क्रम बचन ऱम पद नेह॥3॥
भ़ि़थग:-ऽििेक होने पर मोह रूपा वर्म भ़ग ज़त़ है, तब
(ऄज्ञ़न क़ ऩश होने पर) श्रा रघिऩथजा के चरणों में प्रेम
होत़ है। हे सख़! मन, िचन और कमग से श्रा ऱमजा के चरणों
में प्रेम होऩ, यहा सिगश्रेष्ठ परम़थग (पिरुष़थग) है॥3॥
* ऱम ब्रह्म परम़रथ रूप़। ऄऽबगत ऄलख ऄऩदद ऄनीप़॥
सकल ऽबक़र रऽहत गतभेद़। कऽह ऽनत नेऽत ऽनरूपवह बेद़॥4॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमजा परम़थगसिरूप (परमिसति) परब्रह्म हैं। िे
ऄऽिगत (ज़नने में न अने ि़ले) ऄलख (सथील दुऽष्ट से देखने में
न अने ि़ले), ऄऩदद (अददरऽहत), ऄनिपम (ईपम़रऽहत) सब
ऽिक़रों से रहऽत और भेद शीन्द्य हैं, िेद ऽजनक़ ऽनत्य 'नेऽतनेऽत' कहकर ऽनरूपण करते हैं॥4॥
दोह़ :
* भगत भीऽम भीसिर सिरऽभ सिर ऽहत ल़ऽग कु प़ल।

करत चररत धरर मनिज तनि सिनत ऽमटवह जग ज़ल॥93॥
भ़ि़थग:-िहा कु प़लि श्रा ऱमचन्द्रजा भक्त, भीऽम, ब्ऱह्मण, गो और
देित़ओं के ऽहत के ऽलए मनिष्य शरार ध़रण करके लाल़एूँ
करते हैं, ऽजनके सिनने से जगत के जंज़ल ऽमट ज़ते हैं॥93॥

म़सप़ऱयण, पंरहि़ूँ ऽिश्ऱम
चौप़इ :
* सख़ समिऽझ ऄस पररहरर मोह। ऽसय रघिबार चरन रत होह॥
कहत ऱम गिन भ़ ऽभनिस़ऱ। ज़गे जग मंगल सिखद़ऱ॥1॥
भ़ि़थग:-हे सख़! ऐस़ समझ, मोह को त्य़गकर श्रा सात़ऱमजा
के चरणों में प्रेम करो। आस प्रक़र श्रा ऱमचन्द्रजा के गिण कहतेकहते सबेऱ हो गय़! तब जगत क़ मंगल करने ि़ले और ईसे
सिख देने ि़ले श्रा ऱमजा ज़गे॥1॥
* सकल सौच करर ऱम नह़ि़। सिऽच सिज़न बट छार मग़ि़॥
ऄनिज सऽहत ऽसर जट़ बऩए। देऽख सिमंत्र नयन जल छ़ए॥
भ़ि़थग:-शौच के सब क़यग करके (ऽनत्य) पऽित्र और सिज़न श्रा
ऱमचन्द्रजा ने स्ऩन दकय़। दफर बड क़ दीध मूँग़य़ और छोटे

भ़इ लक्ष्मणजा सऽहत ईस दीध से ऽसर पर जट़एूँ बऩईं। यह
देखकर सिमंत्रजा के नेत्रों में जल छ़ गय़॥2॥
* हृदयूँ द़हु ऄऽत बदन मलाऩ। कह कर जोर बचन ऄऽत
दाऩ॥
ऩथ कहेई ऄस कोसलऩथ़। लै रथि ज़हु ऱम कें स़थ़॥3॥
भ़ि़थग:-ईनक़ हृदय ऄत्यंत जलने लग़, मिूँह मऽलन (ईद़स) हो
गय़। िे ह़थ जोडकर ऄत्यंत दान िचन बोले- हे ऩथ! मिझे
कौसलऩथ दशरथजा ने ऐसा अज्ञ़ दा था दक तिम रथ लेकर
श्रा ऱमजा के स़थ ज़ओ,॥3॥
* बनि देख़आ सिरसरर ऄन्द्हि़इ। अनेहु फे रर बेऽग दोई भ़इ॥
लखनि ऱमि ऽसय अनेहु फे रा। संसय सकल सूँकोच ऽनबेरा॥4॥
भ़ि़थग:-िन ददख़कर, गंग़ स्ऩन कऱकर दोनों भ़आयों को तिरंत
लौट़ ल़ऩ। सब संशय और संकोच को दीर करके लक्ष्मण, ऱम,
सात़ को दफऱ ल़ऩ॥4॥
दोह़ :
* नुप ऄस कहेई गोस़आूँ जस कहआ करौं बऽल सोआ।
करर ऽबनता प़यन्द्ह परे ई दान्द्ह ब़ल ऽजऽम रोआ॥94॥

भ़ि़थग:- मह़ऱज ने ऐस़ कह़ थ़, ऄब प्रभि जैस़ कहें, मैं िहा
करूूँ, मैं अपकी बऽलह़रा हूँ। आस प्रक़र से ऽिनता करके िे श्रा
ऱमचन्द्रजा के चरणों में ऽगर पडे और ब़लक की तरह रो
ददए॥94॥
चौप़इ :
* त़त कु प़ करर कीऽजऄ सोइ। ज़तें ऄिध ऄऩथ न होइ॥
मंऽत्रऽह ऱम ईठ़आ प्रबोध़। त़त धरम मति तिम्ह सबि सोध़॥1॥
भ़ि़थग:-(और कह़ -) हे त़त ! कु प़ करके िहा कीऽजए ऽजससे
ऄयोध्य़ ऄऩथ न हो श्रा ऱमजा ने मंत्रा को ईठ़कर धैयग
बूँध़ते हुए समझ़य़ दक हे त़त ! अपने तो धमग के सभा
ऽसि़ंतों को छ़न ड़ल़ है॥1॥
* ऽसऽब दधाच हररचंद नरे स़। सहे धरम ऽहत कोरट कलेस़॥
रं ऽतदेि बऽल भीप सिज़ऩ। धरमि धरे ई सऽह संकट ऩऩ॥2॥
भ़ि़थग:-ऽशऽब, दधाऽच और ऱज़ हररश्चन्द्र ने धमग के ऽलए
करोडों (ऄनेकों) कष्ट सहे थे। बिऽिम़न ऱज़ रऽन्द्तदेि और बऽल
बहुत से संकट सहकर भा धमग को पकडे रहे (ईन्द्होंने धमग क़
पररत्य़ग नहीं दकय़)॥2॥
* धरमि न दीसर सत्य सम़ऩ। अगम ऽनगम पिऱन बख़ऩ॥

मैं सोआ धरमि सिलभ करर प़ि़। तजें ऽतहूँ पिर ऄपजसि छ़ि़॥3॥
भ़ि़थग:-िेद, श़स्त्र और पिऱणों में कह़ गय़ है दक सत्य के
सम़न दीसऱ धमग नहीं है। मैंने ईस धमग को सहज हा प़ ऽलय़
है। आस (सत्य रूपा धमग) क़ त्य़ग करने से तानों लोकों में
ऄपयश छ़ ज़एग़॥3॥
* संभ़ऽित कहुूँ ऄपजस ल़ह। मरन कोरट सम द़रुन द़ह॥
तिम्ह सन त़त बहुत क़ कहईूँ । ददएूँ ईतरु दफरर प़तकि
लहउूँ॥4॥
भ़ि़थग:-प्रऽतऽष्ठत पिरुष के ऽलए ऄपयश की प्ऱऽप्त करोडों मुत्यि के
सम़न भाषण संत़प देने ि़ला है। हे त़त! मैं अप से ऄऽधक
क्य़ कहूँ! लौटकर ईिर देने में भा प़प क़ भ़गा होत़ हूँ॥4॥
दोह़ :
* ऽपति पद गऽह कऽह कोरट नऽत ऽबनय करब कर जोरर।
वचत़ किऽनहु ब़त कै त़त कररऄ जऽन मोरर॥95॥
भ़ि़थग:-अप ज़कर ऽपत़जा के चरण पकडकर करोडों नमसक़र
के स़थ हा ह़थ जोडकर ऽबनता कररएग़ दक हे त़त! अप
मेरा दकसा ब़त की ऽचन्द्त़ न करें ॥95॥
चौप़इ :

* तिम्ह पिऽन ऽपति सम ऄऽत ऽहत मोरें । ऽबनता करईूँ त़त कर
जोरें ॥
सब ऽबऽध सोआ करतब्य तिम्ह़रें । दिख न प़ि ऽपति सोच
हम़रें ॥1॥
भ़ि़थग:-अप भा ऽपत़ के सम़न हा मेरे बडे ऽहतैषा हैं। हे
त़त! मैं ह़थ जोडकर अप से ऽिनता करत़ हूँ दक अपक़ भा
सब प्रक़र से िहा कतगव्य है, ऽजसमें ऽपत़जा हम लोगों के सोच
में दिःख न प़िें॥1॥
* सिऽन रघिऩथ सऽचि संब़दी। भयई सपररजन ऽबकल ऽनष़दी॥
पिऽन कछि लखन कहा कटि ब़ना। प्रभि बरजे बड ऄनिऽचत
ज़ना॥2॥
भ़ि़थग:-श्रा रघिऩथजा और सिमंत्र क़ यह संि़द सिनकर
ऽनष़दऱज कि टि ऽम्बयों सऽहत व्य़कि ल हो गय़। दफर लक्ष्मणजा ने
कि छ कडिा ब़त कहा। प्रभि श्रा ऱमचन्द्रजा ने ईसे बहुत हा
ऄनिऽचत ज़नकर ईनको मऩ दकय़॥2॥
* सकि ऽच ऱम ऽनज सपथ देि़इ। लखन सूँदस
े ि कऽहऄ जऽन
ज़इ॥
कह सिमंत्रि पिऽन भीप सूँदस
े ी। सऽह न सदकऽह ऽसय ऽबऽपन
कलेसी॥3॥

भ़ि़थग:-श्रा ऱमचन्द्रजा ने सकि च़कर, ऄपना सौगंध ददल़कर
सिमंत्रजा से कह़ दक अप ज़कर लक्ष्मण क़ यह संदश
े न
कऽहएग़। सिमंत्र ने दफर ऱज़ क़ संदश
े कह़ दक सात़ िन के
क्लेश न सह सकें गा॥3॥
* जेऽह ऽबऽध ऄिध अि दफरर साय़। होआ रघिबरऽह तिम्हऽह
करनाय़॥
नतरु ऽनपट ऄिलंब ऽबहाऩ। मैं न ऽजऄब ऽजऽम जल ऽबनि
माऩ॥4॥
भ़ि़थग:-ऄतएि ऽजस तरह सात़ ऄयोध्य़ को लौट अिें, तिमको
और श्रा ऱमचन्द्र को िहा ईप़य करऩ च़ऽहए। नहीं तो मैं
ऽबल्कि ल हा ऽबऩ सह़रे क़ होकर िैसे हा नहीं जाउूँग़ जैसे
ऽबऩ जल के मछला नहीं जाता॥4॥
दोह़ :
* मआकें ससिरें सकल सिख जबवह जह़ूँ मनि म़न।
तहूँ तब रऽहऽह सिखेन ऽसय जब लऽग ऽबपऽत ऽबह़न॥96॥
भ़ि़थग:-सात़ के म़यके (ऽपत़ के घर) और ससिऱल में सब
सिख हैं। जब तक यह ऽिपऽि दीर नहीं होता, तब तक िे जब
जह़ूँ जा च़हें, िहीं सिख से रहेंगा॥96॥
चौप़इ :

* ऽबनता भीप कीन्द्ह जेऽह भ़ूँता। अरऽत प्राऽत न सो कऽह
ज़ता॥
ऽपति सूँदस
े ि सिऽन कु प़ऽनध़ऩ। ऽसयऽह दान्द्ह ऽसख कोरट
ऽबध़ऩ॥1॥
भ़ि़थग:-ऱज़ ने ऽजस तरह (ऽजस दानत़ और प्रेम से) ऽिनता
की है, िह दानत़ और प्रेम कह़ नहीं ज़ सकत़। कु प़ऽनध़न
श्रा ऱमचन्द्रजा ने ऽपत़ क़ संदश
े सिनकर सात़जा को करोडों
(ऄनेकों) प्रक़र से साख दा॥1॥
* स़सि ससिर गिर ऽप्रय पररि़रू। दफरहु त सब कर ऽमटै
खभ़रू॥
सिऽन पऽत बचन कहऽत बैदह
े ा। सिनहु प्ऱनपऽत परम सनेहा॥2॥
भ़ि़थग:-(ईन्द्होंने कह़-) जो तिम घर लौट ज़ओ, तो स़स, ससिर,
गिरु, ऽप्रयजन एिं कि टि म्बा सबकी ऽचन्द्त़ ऽमट ज़ए। पऽत के
िचन सिनकर ज़नकीजा कहता हैं- हे प्ऱणपऽत! हे परम स्नेहा!
सिऽनए॥2॥
* प्रभि करुऩमय परम ऽबबेकी। तनि तऽज रहऽत छ़ूँह दकऽम
छेंकी॥
प्रभ़ ज़आ कहूँ भ़नि ऽबह़इ। कहूँ चंदरक़ चंद ि तऽज ज़इ॥3॥

भ़ि़थग:-हे प्रभो! अप करुण़मय और परम ज्ञ़ना हैं। (कु प़ करके
ऽिच़र तो कीऽजए) शरार को छोडकर छ़य़ ऄलग कै से रोकी
रह सकता है? सीयग की प्रभ़ सीयग को छोडकर कह़ूँ ज़ सकता
है? और च़ूँदना चन्द्रम़ को त्य़गकर कह़ूँ ज़ सकता है?॥3॥
* पऽतऽह प्रेममय ऽबनय सिऩइ। कहऽत सऽचि सन ऽगऱ सिह़इ॥
तिम्ह ऽपति ससिर सररस ऽहतक़रा। ईतरु देईूँ दफरर ऄनिऽचत
भ़रा॥4॥
भ़ि़थग:-आस प्रक़र पऽत को प्रेममया ऽिनता सिऩकर सात़जा
मंत्रा से सिह़िना ि़णा कहने लगीं- अप मेरे ऽपत़जा और
ससिरजा के सम़न मेऱ ऽहत करने ि़ले हैं। अपको मैं बदले में
ईिर देता हूँ, यह बहुत हा ऄनिऽचत है॥4॥
दोह़ :
* अरऽत बस सनमिख भआईूँ ऽबलगि न म़नब त़त।
अरजसित पद कमल ऽबनि ब़दद जह़ूँ लऽग ऩत॥97॥
भ़ि़थग:-दकन्द्ति हे त़त! मैं अिग होकर हा अपके सम्मिख हुइ हूँ,
अप बिऱ न म़ऽनएग़। अयगपित्र (सि़मा) के चरणकमलों के
ऽबऩ जगत में जह़ूँ तक ऩते हैं, सभा मेरे ऽलए व्यथग हैं॥97॥
चौप़इ :

* ऽपति बैभि ऽबल़स मैं डाठ़। नुप मऽन मिकिट ऽमऽलत पद
पाठ़॥
सिखऽनध़न ऄस ऽपति गुह मोरें । ऽपय ऽबहान मन भ़ि न
भोरें ॥1॥
भ़ि़थग:-मैंने ऽपत़जा के ऐश्वयग की छट़ देखा है, ऽजनके चरण
रखने की चौकी से सिगऽशरोमऽण ऱज़ओं के मिकिट ऽमलते हैं
(ऄथ़गत बडे-बडे ऱज़ ऽजनके चरणों में प्रण़म करते हैं) ऐसे
ऽपत़ क़ घर भा, जो सब प्रक़र के सिखों क़ भंड़र है, पऽत
के ऽबऩ मेरे मन को भीलकर भा नहीं भ़त़॥1॥
* ससिर चक्किआ कोसल ऱउ। भििन च़ररदस प्रगट प्रभ़उ॥
अगें होआ जेऽह सिरपऽत लेइ। ऄरध वसघ़सन असनि देइ॥2॥
भ़ि़थग:-मेरे ससिर कोसलऱज चक्रिती सम्ऱट हैं, ऽजनक़ प्रभ़ि
चौदहों लोकों में प्रकट है, आन्द्र भा अगे होकर ऽजनक़ सि़गत
करत़ है और ऄपने अधे वसह़सन पर बैठने के ऽलए सथ़न देत़
है,॥2॥
* ससिरु एत़दुस ऄिध ऽनि़सी। ऽप्रय पररि़रु म़ति सम स़सी॥
ऽबनि रघिपऽत पद पदिम पऱग़। मोऽह के ई सपनेहुूँ सिखद न
ल़ग़॥3॥

भ़ि़थग:-ऐसे (ऐश्वयग और प्रभ़िश़ला) ससिर, (ईनकी ऱजध़ना)
ऄयोध्य़ क़ ऽनि़स, ऽप्रय कि टि म्बा और म़त़ के सम़न स़सिएूँये कोइ भा श्रा रघिऩथजा के चरण कमलों की रज के ऽबऩ
मिझे सिप्न में भा सिखद़यक नहीं लगते॥3॥
* ऄगम पंथ बनभीऽम पह़ऱ। करर के हरर सर सररत ऄप़ऱ॥
कोल दकऱत कि रं ग ऽबहंग़। मोऽह सब सिखद प्ऱनपऽत संग़॥4॥
भ़ि़थग:-दिगगम ऱसते, जंगला धरता, पह़ड, ह़था, वसह, ऄथ़ह
त़ल़ब एिं नददय़ूँ, कोल, भाल, ऽहरन और पक्षा- प्ऱणपऽत (श्रा
रघिऩथजा) के स़थ रहते ये सभा मिझे सिख देने ि़ले होंगे॥4॥
दोह़ :
* स़सि ससिर सन मोरर हुूँऽत ऽबनय करऽब परर प़यूँ।
मोर सोचि जऽन कररऄ कछि मैं बन सिखा सिभ़यूँ॥98॥
भ़ि़थग:-ऄतः स़स और ससिर के प़ूँि पडकर, मेरा ओर से
ऽिनता कीऽजएग़ दक िे मेऱ कि छ भा सोच न करें , मैं िन में
सिभ़ि से हा सिखा हूँ॥98॥
चौप़इ :
* प्ऱनऩथ ऽप्रय देिर स़थ़। बार धिरान धरें धनि भ़थ़॥

नवह मग श्रमि वर्मि दिख मन मोरें । मोऽह लऽग सोचि कररऄ जऽन
भोरें ॥1॥
भ़ि़थग:-िारों में ऄग्रगण्य तथ़ धनिष और (ब़णों से भरे ) तरकश
ध़रण दकए मेरे प्ऱणऩथ और प्य़रे देिर स़थ हैं। आससे मिझे
न ऱसते की थक़िट है, न वर्म है और न मेरे मन में कोइ
दिःख हा है। अप मेरे ऽलए भीलकर भा सोच न करें ॥1॥
* सिऽन सिमंत्रि ऽसय सातऽल ब़ना। भयई ऽबकल जनि फऽन मऽन
ह़ना॥
नयन सीझ नवह सिनआ न क़ऩ। कऽह न सकआ कछि ऄऽत
ऄकि ल़ऩ॥2॥
भ़ि़थग:-सिमंत्र सात़जा की शातल ि़णा सिनकर ऐसे व्य़कि ल हो
गए जैसे स़ूँप मऽण खो ज़ने पर। नेत्रों से कि छ सीझत़ नहीं,
क़नों से सिऩइ नहीं देत़। िे बहुत व्य़कि ल हो गए, कि छ कह
नहीं सकते॥2॥
* ऱम प्रबोधि कीन्द्ह बहु भ़ूँता। तदऽप होऽत नवह सातऽल छ़ता॥
जतन ऄनेक स़थ ऽहत कीन्द्ह।े ईऽचत ईतर रघिनंदन दान्द्ह॥े 3॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचन्द्रजा ने ईनक़ बहुत प्रक़र से सम़ध़न
दकय़। तो भा ईनकी छ़ता ठं डा न हुइ। स़थ चलने के ऽलए

मंत्रा ने ऄनेकों यत्न दकए (यिऽक्तय़ूँ पेश कीं), पर रघिनंदन श्रा
ऱमजा (ईन सब यिऽक्तयों क़) यथोऽचत ईिर देते गए॥3॥
* मेरट ज़आ नवह ऱम रज़इ। करठन करम गऽत कछि न बस़इ॥
ऱम लखन ऽसय पद ऽसरु ऩइ। दफरे ई बऽनक ऽजऽम मीर
गि़ूँइ॥4॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमजा की अज्ञ़ मेटा नहीं ज़ सकता। कमग की
गऽत करठन है, ईस पर कि छ भा िश नहीं चलत़। श्रा ऱम,
लक्ष्मण और सात़जा के चरणों में ऽसर नि़कर सिमत्र
ं आस तरह
लौटे जैसे कोइ व्य़प़रा ऄपऩ मीलधन (पीूँजा) गूँि़कर लौटे॥4॥
दोह़ :
* रथि ह़ूँकेई हय ऱम तन हेरर हेरर ऽहऽहऩवह।
देऽख ऽनष़द ऽबष़द बस धिनवह सास पऽछत़वह॥99॥
भ़ि़थग:-सिमंत्र ने रथ को ह़ूँक़, घोडे श्रा ऱमचन्द्रजा की ओर
देख-देखकर ऽहनऽहऩते हैं। यह देखकर ऽनष़द लोग ऽिष़द के
िश होकर ऽसर धिन-धिनकर (पाट-पाटकर) पछत़ते हैं॥99॥

के िट क़ प्रेम और गंग़ प़र ज़ऩ
चौप़इ :
* ज़सि ऽबयोग ऽबकल पसि ऐसें। प्रज़ म़ति ऽपति ऽजआहवह कै सें॥
बरबस ऱम सिमंत्रि पठ़ए। सिरसरर तार अपि तब अए॥1॥
भ़ि़थग:-ऽजनके ऽियोग में पशि आस प्रक़र व्य़कि ल हैं, ईनके
ऽियोग में प्रज़, म़त़ और ऽपत़ कै से जाते रहेंगे? श्रा

ऱमचन्द्रजा ने जबदगसता सिमंत्र को लौट़य़। तब अप गंग़जा के
तार पर अए॥1॥
* म़गा ऩि न के िटि अऩ। कहआ तिम्ह़र मरमि मैं ज़ऩ॥
चरन कमल रज कहुूँ सबि कहइ। म़निष करऽन मीरर कछि
ऄहइ॥2॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱम ने के िट से ऩि म़ूँगा, पर िह ल़त़ नहीं।
िह कहने लग़- मैंने तिम्ह़ऱ ममग (भेद) ज़न ऽलय़। तिम्ह़रे
चरण कमलों की धील के ऽलए सब लोग कहते हैं दक िह मनिष्य
बऩ देने ि़ला कोइ जडा है,॥2॥
* छि ऄत ऽसल़ भआ ऩरर सिह़इ। प़हन तें न क़ठ करठऩइ॥
तरऽनई मिऽन घररना होआ ज़इ। ब़ट परआ मोरर ऩि ईड़इ॥3॥
भ़ि़थग:-ऽजसके छी ते हा पत्थर की ऽशल़ सिंदरा स्त्रा हो गइ
(मेरा ऩि तो क़ठ की है)। क़ठ पत्थर से कठोर तो होत़
नहीं। मेरा ऩि भा मिऽन की स्त्रा हो ज़एगा और आस प्रक़र
मेरा ऩि ईड ज़एगा, मैं लिट ज़उूँग़ (ऄथि़ ऱसत़ रुक
ज़एग़, ऽजससे अप प़र न हो सकें गे और मेरा रोजा म़रा
ज़एगा) (मेरा कम़ने-ख़ने की ऱह हा म़रा ज़एगा)॥3॥
* एवह प्रऽतप़लईूँ सबि पररि़रू। नवह ज़नईूँ कछि ऄईर कब़रू॥

जौं प्रभि प़र ऄिऽस ग़ चहह। मोऽह पद पदिम पख़रन
कहह॥4॥
भ़ि़थग:-मैं तो आसा ऩि से स़रे पररि़र क़ प़लन-पोषण
करत़ हूँ। दीसऱ कोइ धंध़ नहीं ज़नत़। हे प्रभि! यदद तिम
ऄिश्य हा प़र ज़ऩ च़हते हो तो मिझे पहले ऄपने चरणकमल
पख़रने (धो लेने) के ऽलए कह दो॥4॥
छन्द्द :
* पद कमल धोआ चढ़़आ ऩि न ऩथ ईतऱइ चहौं।
मोऽह ऱम ऱईरर अन दसरथसपथ सब स़चा कहौं॥
बरु तार म़रहुूँ लखनि पै जब लऽग न प़य पख़ररहौं।
तब लऽग न तिलसाद़स ऩथ कु प़ल प़रु ईत़ररहौं॥
भ़ि़थग:-हे ऩथ! मैं चरण कमल धोकर अप लोगों को ऩि पर
चढ़़ लीूँग़, मैं अपसे कि छ ईतऱइ नहीं च़हत़। हे ऱम! मिझे
अपकी दिह़इ और दशरथजा की सौगंध है, मैं सब सच-सच
कहत़ हूँ। लक्ष्मण भले हा मिझे तार म़रें , पर जब तक मैं पैरों
को पख़र न लीूँग़, तब तक हे तिलसाद़स के ऩथ! हे कु प़लि!
मैं प़र नहीं ईत़रूूँग़।
सोरठ़ :
* सिऽन के िट के बैन प्रेम लपेटे ऄटपटे।

ऽबहसे करुऩऐन ऽचतआ ज़नकी लखन तन॥100॥
भ़ि़थग:-के िट के प्रेम में लपेटे हुए ऄटपटे िचन सिनकर
करुण़ध़म श्रा ऱमचन्द्रजा ज़नकीजा और लक्ष्मणजा की ओर
देखकर हूँसे॥100॥
चौप़इ :
* कु प़वसधि बोले मिसिक़इ। सोआ करु जेवह ति ऩि न ज़इ॥
बेऽग अनि जलप़य पख़रू। होत ऽबलंबि ईत़रऽह प़रू॥1॥
भ़ि़थग:-कु प़ के समिर श्रा ऱमचन्द्रजा के िट से मिसकि ऱकर बोले
भ़इ! ती िहा कर ऽजससे तेरा ऩि न ज़ए। जल्दा प़ना ल़
और पैर धो ले। देर हो रहा है, प़र ईत़र दे॥1॥
* ज़सि ऩम सिऽमरत एक ब़ऱ। ईतरवह नर भिवसधि ऄप़ऱ॥
सोआ कु प़लि के िटऽह ऽनहोऱ। जेवह जगि दकय ऽतहु पगहु ते
थोऱ॥2॥
भ़ि़थग:-एक ब़र ऽजनक़ ऩम समरण करते हा मनिष्य ऄप़र
भिस़गर के प़र ईतर ज़ते हैं और ऽजन्द्होंने (ि़मऩित़र में)
जगत को तान पग से भा छोट़ कर ददय़ थ़ (दो हा पग में
ऽत्रलोकी को ऩप ऽलय़ थ़), िहा कु प़लि श्रा ऱमचन्द्रजा
(गंग़जा से प़र ईत़रने के ऽलए) के िट क़ ऽनहोऱ कर रहे
हैं!॥2॥

* पद नख ऽनरऽख देिसरर हरषा। सिऽन प्रभि बचन मोहूँ मऽत
करषा॥
के िट ऱम रज़यसि प़ि़। प़ऽन कठित़ भरर लेआ अि़॥3॥
भ़ि़थग:-प्रभि के आन िचनों को सिनकर गंग़जा की बिऽि मोह से
वखच गइ था (दक ये स़क्ष़त भगि़न होकर भा प़र ईत़रने के
ऽलए के िट क़ ऽनहोऱ कै से कर रहे हैं), परन्द्ति (समाप अने पर
ऄपना ईत्पऽि के सथ़न) पदनखों को देखते हा (ईन्द्हें पहच़नकर)
देिनदा गंग़जा हर्तषत हो गईं। (िे समझ गईं दक भगि़न
नरलाल़ कर रहे हैं, आससे ईनक़ मोह नष्ट हो गय़ और आन
चरणों क़ सपशग प्ऱप्त करके मैं धन्द्य होउूँगा, यह ऽिच़रकर िे
हर्तषत हो गईं।) के िट श्रा ऱमचन्द्रजा की अज्ञ़ प़कर कठौते में
भरकर जल ले अय़॥3॥
* ऄऽत अनंद ईमऽग ऄनिऱग़। चरन सरोज पख़रन ल़ग़॥
बरऽष सिमन सिर सकल ऽसह़हीं। एऽह सम पिन्द्यपिंज कोई
ऩहीं॥4॥
भ़ि़थग:-ऄत्यन्द्त अनंद और प्रेम में ईमंगकर िह भगि़न के
चरणकमल धोने लग़। सब देित़ फी ल बरस़कर ऽसह़ने लगे दक
आसके सम़न पिण्य की ऱऽश कोइ नहीं है॥4॥
दोह़ :

* पद पख़रर जलि प़न करर अपि सऽहत पररि़र।
ऽपतर प़रु करर प्रभिऽह पिऽन मिददत गयई लेआ प़र॥101॥
भ़ि़थग:-चरणों को धोकर और स़रे पररि़र सऽहत सियं ईस
जल (चरणोदक) को पाकर पहले (ईस मह़न पिण्य के ि़ऱ)
ऄपने ऽपतरों को भिस़गर से प़र कर दफर अनंदपीिगक प्रभि श्रा
ऱमचन्द्रजा को गंग़जा के प़र ले गय़॥101॥
चौप़इ :
* ईतरर ठ़ढ़ भए सिरसरर रे त़। साय ऱमिगिह लखन समेत़॥
के िट ईतरर दंडित कीन्द्ह़। प्रभिऽह सकि च एऽह नवह कछि
दान्द्ह़॥1॥
भ़ि़थग:-ऽनष़दऱज और लक्ष्मणजा सऽहत श्रा सात़जा और श्रा
ऱमचन्द्रजा (ऩि से) ईतरकर गंग़जा की रे त (ब़ली) में खडे हो
गए। तब के िट ने ईतरकर दण्डित की। (ईसको दण्डित करते
देखकर) प्रभि को संकोच हुअ दक आसको कि छ ददय़ नहीं॥1॥
* ऽपय ऽहय की ऽसय ज़नऽनह़रा। मऽन मिदरा मन मिददत
ईत़रा॥
कहेई कु प़ल लेऽह ईतऱइ। के िट चरन गहे ऄकि ल़इ॥2॥
भ़ि़थग:-पऽत के हृदय की ज़नने ि़ला सात़जा ने अनंद भरे
मन से ऄपना रत्न जऽऺडत ऄूँगीठा (ऄूँगिला से) ईत़रा। कु प़लि श्रा

ऱमचन्द्रजा ने के िट से कह़, ऩि की ईतऱइ लो। के िट ने
व्य़कि ल होकर चरण पकड ऽलए॥2॥
* ऩथ अजि मैं क़ह न प़ि़। ऽमटे दोष दिख द़ररद द़ि़॥
बहुत क़ल मैं कीऽन्द्ह मजीरा। अजि दान्द्ह ऽबऽध बऽन भऽल
भीरा॥3॥
भ़ि़थग:-(ईसने कह़-) हे ऩथ! अज मैंने क्य़ नहीं प़य़! मेरे
दोष, दिःख और दरररत़ की अग अज बिझ गइ है। मैंने बहुत
समय तक मजदीरा की। ऽिध़त़ ने अज बहुत ऄच्छा भरपीर
मजदीरा दे दा॥3॥
* ऄब कछि ऩथ न च़ऽहऄ मोरें । दान दय़ल ऄनिग्रह तोरें ॥
दफरता ब़र मोऽह जो देब़। सो प्रस़दि मैं ऽसर धरर लेब़॥4॥
भ़ि़थग:-हे ऩथ! हे दानदय़ल! अपकी कु प़ से ऄब मिझे कि छ
नहीं च़ऽहए। लौटता ब़र अप मिझे जो कि छ देंगे, िह प्रस़द मैं
ऽसर चढ़़कर लीूँग़॥4॥
दोह़ :
* बहुत कीन्द्ह प्रभि लखन ऽसयूँ नवह कछि के िटि लेआ।
ऽबद़ कीन्द्ह करुऩयतन भगऽत ऽबमल बरु देआ॥102॥

भ़ि़थग:- प्रभि श्रा ऱमजा, लक्ष्मणजा और सात़जा ने बहुत
अग्रह (य़ यत्न) दकय़, पर के िट कि छ नहीं लेत़। तब करुण़ के
ध़म भगि़न श्रा ऱमचन्द्रजा ने ऽनमगल भऽक्त क़ िरद़न देकर
ईसे ऽिद़ दकय़॥102॥
चौप़इ :
* तब मज्जनि करर रघिकिलऩथ़। पीऽज प़रऽथि ऩयई म़थ़॥
ऽसयूँ सिरसररऽह कहेई कर जोरा। म़ति मनोरथ पिरईऽब मोरा॥1॥
भ़ि़थग:-दफर रघिकिल के सि़मा श्रा ऱमचन्द्रजा ने स्ऩन करके
प़र्तथि पीज़ की और ऽशिजा को ऽसर नि़य़। सात़जा ने ह़थ
जोडकर गंग़जा से कह़- हे म़त़! मेऱ मनोरथ पीऱ
कीऽजएग़॥1॥
* पऽत देिर सूँग कि सल बहोरा। अआ करौं जेवह पीज़ तोरा॥
सिऽन ऽसय ऽबनय प्रेम रस स़ना। भआ तब ऽबमल ब़रर बर
ब़ना॥2॥
भ़ि़थग:-ऽजससे मैं पऽत और देिर के स़थ कि शलत़पीिगक लौट
अकर तिम्ह़रा पीज़ करूूँ। सात़जा की प्रेम रस में सना हुइ
ऽिनता सिनकर तब गंग़जा के ऽनमगल जल में से श्रेष्ठ ि़णा हुइ॥2॥
* सिनि रघिबार ऽप्रय़ बैदह
े ा। तब प्रभ़ई जग ऽबददत न के हा॥

लोकप होवह ऽबलोकत तोरें । तोऽह सेिवह सब ऽसऽध कर
जोरें ॥3॥
भ़ि़थग:-हे रघििार की ऽप्रयतम़ ज़नकी! सिनो, तिम्ह़ऱ प्रभ़ि
जगत में दकसे नहीं म़लीम है? तिम्ह़रे (कु प़ दुऽष्ट से) देखते हा
लोग लोकप़ल हो ज़ते हैं। सब ऽसऽिय़ूँ ह़थ जोडे तिम्ह़रा
सेि़ करता हैं॥3॥
* तिम्ह जो हमऽह बऽड ऽबनय सिऩइ। कु प़ कीऽन्द्ह मोऽह दाऽन्द्ह
बड़इ॥
तदऽप देऽब मैं देऽब ऄसास़। सफल होन ऽहत ऽनज ब़गास़॥4॥
भ़ि़थग:-तिमने जो मिझको बडा ऽिनता सिऩइ, यह तो मिझ पर
कु प़ की और मिझे बड़इ दा है। तो भा हे देिा! मैं ऄपना
ि़णा सफल होने के ऽलए तिम्हें अशाि़गद दीग
ूँ ा॥4॥
दोह़ :
* प्ऱनऩथ देिर सऽहत कि सल कोसल़ अआ।
पीऽजऽह सब मनक़मऩ सिजसि रऽहऽह जग छ़आ॥103॥
भ़ि़थग:-तिम ऄपने प्ऱणऩथ और देिर सऽहत कि शलपीिगक
ऄयोध्य़ लौटोगा। तिम्ह़रा स़रा मनःक़मऩएूँ पीरा होंगा और
तिम्ह़ऱ सिंदर यश जगतभर में छ़ ज़एग़॥103॥

चौप़इ :
* गंग बचन सिऽन मंगल मील़। मिददत साय सिरसरर ऄनिकील़॥
तब प्रभि गिहऽह कहेई घर ज़ह। सिनत सीख मिखि भ़ ईर द़ह॥1॥
भ़ि़थग:-मंगल के मील गंग़जा के िचन सिनकर और देिनदा को
ऄनिकील देखकर सात़जा अनंददत हुईं। तब प्रभि श्रा ऱमचन्द्रजा
ने ऽनष़दऱज गिह से कह़ दक भैय़! ऄब तिम घर ज़ओ! यह
सिनते हा ईसक़ मिूँह सीख गय़ और हृदय में द़ह ईत्पन्न हो
गय़॥1॥
* दान बचन गिह कह कर जोरा। ऽबनय सिनहु रघिकिलमऽन मोरा॥
ऩथ स़थ रऽह पंथि देख़इ। करर ददन च़रर चरन सेिक़इ॥2॥
भ़ि़थग:-गिह ह़थ जोडकर दान िचन बोल़- हे रघिकिल
ऽशरोमऽण! मेरा ऽिनता सिऽनए। मैं ऩथ (अप) के स़थ रहकर,
ऱसत़ ददख़कर, च़र (कि छ) ददन चरणों की सेि़ करके -॥2॥
* जेवह बन ज़आ रहब रघिऱइ। परनकि टा मैं करऽब सिह़इ॥
तब मोऽह कहूँ जऽस देब रज़इ। सोआ कररहईूँ रघिबार दोह़इ॥3॥
भ़ि़थग:-हे रघिऱज! ऽजस िन में अप ज़कर रहेंगे, िह़ूँ मैं सिद
ं र
पणगकिटा (पिों की कि रटय़) बऩ दीग
ूँ ़। तब मिझे अप जैसा अज्ञ़
देंगे, मिझे रघििार (अप) की दिह़इ है, मैं िैस़ हा करूूँग़॥3॥

* सहज सनेह ऱम लऽख त़सी। संग लान्द्ह गिह हृदयूँ हुल़सी॥
पिऽन गिहूँ ग्य़ऽत बोऽल सब लान्द्ह।े करर पररतोषि ऽबद़ तब
कीन्द्ह॥े 4॥
भ़ि़थग:-ईसके सि़भ़ऽिक प्रेम को देखकर श्रा ऱमचन्द्रजा ने
ईसको स़थ ले ऽलय़, आससे गिह के हृदय में बड़ अनंद हुअ।
दफर गिह (ऽनष़दऱज) ने ऄपना ज़ऽत के लोगों को बिल़ ऽलय़
और ईनक़ संतोष कऱके तब ईनको ऽिद़ दकय़॥4॥

प्रय़ग पहुूँचऩ, भरि़ज संि़द, यमिऩतार ऽनि़ऽसयों क़ प्रेम
दोह़ :
* तब गनपऽत ऽसि सिऽमरर प्रभि ऩआ सिरसररऽह म़थ।
सख़ ऄनिज ऽसय सऽहत बन गिनि कीन्द्ह रघिऩथ॥104॥
भ़ि़थग:-तब प्रभि श्रा रघिऩथजा गणेशजा और ऽशिजा क़ समरण
करके तथ़ गंग़जा को मसतक नि़कर सख़ ऽनष़दऱज, छोटे
भ़इ लक्ष्मणजा और सात़जा सऽहत िन को चले॥104॥
चौप़इ :
* तेऽह ददन भयई ऽबटप तर ब़सी। लखन सख़ूँ सब कीन्द्ह
सिप़सी॥
प्ऱत प्ऱतकु त करर रघिऱइ। तारथऱजि दाख प्रभि ज़इ॥1॥
भ़ि़थग:-ईस ददन पेड के नाचे ऽनि़स हुअ। लक्ष्मणजा और
सख़ गिह ने (ऽिश्ऱम की) सब सिव्यिसथ़ कर दा। प्रभि श्रा
ऱमचन्द्रजा ने सबेरे प्ऱतःक़ल की सब दक्रय़एूँ करके ज़कर
ताथों के ऱज़ प्रय़ग के दशगन दकए॥1॥

* सऽचि सत्य श्रि़ ऽप्रय ऩरा। म़धि सररस माति ऽहतक़रा॥
च़रर पद़रथ भऱ भूँड़रू। पिन्द्य प्रदेस देस ऄऽत च़रू॥2॥
भ़ि़थग:-ईस ऱज़ क़ सत्य मंत्रा है, श्रि़ प्य़रा स्त्रा है और
श्रा िेणाम़धिजा सराखे ऽहतक़रा ऽमत्र हैं। च़र पद़थों (धमग,
ऄथग, क़म और मोक्ष) से भंड़र भऱ है और िह पिण्यमय प्ऱंत
हा ईस ऱज़ क़ सिंदर देश है॥2॥
* छेत्रि ऄगम गढ़़ु ग़ढ़ सिह़ि़। सपनेहुूँ नवह प्रऽतपऽच्छन्द्ह प़ि़॥
सेन सकल तारथ बर बाऱ। कलिष ऄनाक दलन रनधाऱ॥3॥
भ़ि़थग:-प्रय़ग क्षेत्र हा दिगगम, मजबीत और सिंदर गढ़ (दकल़) है,
ऽजसको सिप्न में भा (प़प रूपा) शत्रि नहीं प़ सके हैं। संपीणग
ताथग हा ईसके श्रेष्ठ िार सैऽनक हैं, जो प़प की सेऩ को कि चल
ड़लने ि़ले और बडे रणधार हैं॥3॥
* संगमि वसह़सनि सिरठ सोह़। छत्रि ऄखयबटि मिऽन मनि मोह़॥
चिूँर जमिन ऄरु गंग तरं ग़। देऽख होवह दिख द़ररद भंग़॥4॥
भ़ि़थग:-((गंग़, यमिऩ और सरसिता क़) संगम हा ईसक़
ऄत्यन्द्त सिशोऽभत वसह़सन है। ऄक्षयिट छत्र है, जो मिऽनयों के
भा मन को मोऽहत कर लेत़ है। यमिऩजा और गंग़जा की तरं गें

ईसके (श्य़म और श्वेत) चूँिर हैं, ऽजनको देखकर हा दिःख और
दरररत़ नष्ट हो ज़ता है॥4॥
दोह़ :
* सेिवह सिकुता स़धि सिऽच प़िवह सब मनक़म।
बंदा बेद पिऱन गन कहवह ऽबमल गिन ग्ऱम॥105॥
भ़ि़थग:-पिण्य़त्म़, पऽित्र स़धि ईसकी सेि़ करते हैं और सब
मनोरथ प़ते हैं। िेद और पिऱणों के समीह भ़ट हैं, जो ईसके
ऽनमगल गिणगणों क़ बख़न करते हैं॥105॥
चौप़इ :
* को कऽह सकआ प्रय़ग प्रभ़उ। कलिष पिंज किं जर मुगऱउ॥
ऄस तारथपऽत देऽख सिह़ि़। सिख स़गर रघिबर सिखि प़ि़॥1॥
भ़ि़थग:-प़पों के समीह रूपा ह़था के म़रने के ऽलए वसह रूप
प्रय़गऱज क़ प्रभ़ि (महत्ि-म़ह़त्म्य) कौन कह सकत़ है। ऐसे
सिह़िने ताथगऱज क़ दशगन कर सिख के समिर रघिकिल श्रेष्ठ श्रा
ऱमजा ने भा सिख प़य़॥1॥
* कऽह ऽसय लखनऽह सखऽह सिऩइ। श्रा मिख तारथऱज बड़इ॥
करर प्रऩमि देखत बन ब़ग़। कहत मह़तम ऄऽत ऄनिऱग़॥2॥

भ़ि़थग:-ईन्द्होंने ऄपने श्रामिख से सात़जा, लक्ष्मणजा और सख़
गिह को ताथगऱज की मऽहम़ कहकर सिऩइ। तदनन्द्तर प्रण़म
करके , िन और बगाचों को देखते हुए और बडे प्रेम से म़ह़त्म्य
कहते हुए-॥2॥
* एऽह ऽबऽध अआ ऽबलोकी बेना। सिऽमरत सकल सिमंगल देना॥
मिददत नह़आ कीऽन्द्ह ऽसि सेि़। पीऽज जथ़ऽबऽध तारथ देि़॥3॥
भ़ि़थग:-आस प्रक़र श्रा ऱम ने अकर ऽत्रिेणा क़ दशगन दकय़,
जो समरण करने से हा सब सिद
ं र मंगलों को देने ि़ला है। दफर
अनंदपीिगक (ऽत्रिेणा में) स्ऩन करके ऽशिजा की सेि़ (पीज़) की
और ऽिऽधपीिगक ताथग देित़ओं क़ पीजन दकय़॥3॥
* तब प्रभि भरि़ज पवह अए। करत दंडित मिऽन ईर ल़ए॥
मिऽन मन मोद न कछि कऽह ज़इ। ब्रह्म़नंद ऱऽस जनि प़इ॥4॥
भ़ि़थग:-(स्ऩन, पीजन अदद सब करके ) तब प्रभि श्रा ऱमजा
भरि़जजा के प़स अए। ईन्द्हें दण्डित करते हुए हा मिऽन ने
हृदय से लग़ ऽलय़। मिऽन के मन क़ अनंद कि छ कह़ नहीं
ज़त़। म़नो ईन्द्हें ब्रह्म़नन्द्द की ऱऽश ऽमल गइ हो॥4॥
दोह़ :
* दाऽन्द्ह ऄसास मिनास ईर ऄऽत ऄनंद ि ऄस ज़ऽन।

लोचन गोचर सिकुत फल मनहुूँ दकए ऽबऽध अऽन॥106॥
भ़ि़थग:-मिनाश्वर भरि़जजा ने अशाि़गद ददय़। ईनके हृदय में
ऐस़ ज़नकर ऄत्यन्द्त अनंद हुअ दक अज ऽिध़त़ ने (श्रा
सात़जा और लक्ष्मणजा सऽहत प्रभि श्रा ऱमचन्द्रजा के दशगन
कऱकर) म़नो हम़रे सम्पीणग पिण्यों के फल को ल़कर अूँखों के
स़मने कर ददय़॥106॥
चौप़इ :
* कि सल प्रस्न करर असन दान्द्ह।े पीऽज प्रेम पररपीरन कीन्द्ह॥े
कं द मील फल ऄंकिर नाके । ददए अऽन मिऽन मनहुूँ ऄमा के ॥1॥
भ़ि़थग:-कि शल पीछकर मिऽनऱज ने ईनको असन ददए और प्रेम
सऽहत पीजन करके ईन्द्हें संतिष्ट कर ददय़। दफर म़नो ऄमुत के
हा बने हों, ऐसे ऄच्छे-ऄच्छे कन्द्द, मील, फल और ऄंकिर ल़कर
ददए॥1॥
* साय लखन जन सऽहत सिह़ए। ऄऽत रुऽच ऱम मील फल
ख़ए॥
भए ऽबगतश्रम ऱमि सिख़रे । भरि़ज मुद ि बचन ईच़रे ॥2॥
भ़ि़थग:-सात़जा, लक्ष्मणजा और सेिक गिह सऽहत श्रा
ऱमचन्द्रजा ने ईन सिंदर मील-फलों को बडा रुऽच के स़थ ख़य़।

थक़िट दीर होने से श्रा ऱमचन्द्रजा सिखा हो गए। तब
भरि़जजा ने ईनसे कोमल िचन कहे-॥2॥
* अजि सफल तपि तारथ त्य़गी। अजि सिफल जप जोग ऽबऱगी॥
सफल सकल सिभ स़धन स़जी। ऱम तिम्हऽह ऄिलोकत अजी॥3॥
भ़ि़थग:-हे ऱम! अपक़ दशगन करते हा अज मेऱ तप, ताथग
सेिन और त्य़ग सफल हो गय़। अज मेऱ जप, योग और
िैऱग्य सफल हो गय़ और अज मेरे सम्पीणग शिभ स़धनों क़
समिद़य भा सफल हो गय़॥3॥
* ल़भ ऄिऽध सिख ऄिऽध न दीजा। तिम्हरें दरस अस सब पीजा॥
ऄब करर कु प़ देहु बर एह। ऽनज पद सरऽसज सहज सनेह॥4॥
भ़ि़थग:-ल़भ की साम़ और सिख की साम़ (प्रभि के दशगन को
छोडकर) दीसरा कि छ भा नहीं है। अपके दशगन से मेरा सब
अश़एूँ पीणग हो गईं। ऄब कु प़ करके यह िरद़न दाऽजए दक
अपके चरण कमलों में मेऱ सि़भ़ऽिक प्रेम हो॥4॥
दोह़ :
* करम बचन मन छ़ऽड छलि जब लऽग जनि न तिम्ह़र।
तब लऽग सिखि सपनेहुूँ नहीं दकएूँ कोरट ईपच़र॥107॥

भ़ि़थग:- जब तक कमग, िचन और मन से छल छोडकर मनिष्य
अपक़ द़स नहीं हो ज़त़, तब तक करोडों ईप़य करने से
भा, सिप्न में भा िह सिख नहीं प़त़॥107॥
चौप़इ :
* सिऽन मिऽन बचन ऱमि सकि च़ने। भ़ि भगऽत अनंद ऄघ़ने॥
तब रघिबर मिऽन सिजसि सिह़ि़। कोरट भ़ूँऽत कऽह सबऽह
सिऩि़॥1॥
भ़ि़थग:-मिऽन के िचन सिनकर, ईनकी भ़ि-भऽक्त के क़रण
अनंद से तुप्त हुए भगि़न श्रा ऱमचन्द्रजा (लाल़ की दुऽष्ट से)
सकि च़ गए। तब (ऄपने ऐश्वयग को ऽछप़ते हुए) श्रा ऱमचन्द्रजा
ने भरि़ज मिऽन क़ सिंदर सियश करोडों (ऄनेकों) प्रक़र से
कहकर सबको सिऩय़॥1॥
* सो बड सो सब गिन गन गेह। जेऽह मिनास तिम्ह अदर देह॥
मिऽन रघिबार परसपर निहीं। बचन ऄगोचर सिखि ऄनिभिहीं॥2॥
भ़ि़थग:-(ईन्द्होंने कह़-) हे मिनाश्वर! ऽजसको अप अदर दें, िहा
बड़ है और िहा सब गिण समीहों क़ घर है। आस प्रक़र श्रा
ऱमजा और मिऽन भरि़जजा दोनों परसपर ऽिनम्र हो रहे हैं और
ऄऽनिगचनाय सिख क़ ऄनिभि कर रहे हैं॥2॥

* यह सिऽध प़आ प्रय़ग ऽनि़सा। बटि त़पस मिऽन ऽसि ईद़सा॥
भरि़ज अश्रम सब अए। देखन दसरथ सिऄन सिह़ए॥3॥
भ़ि़थग:-यह (श्रा ऱम, लक्ष्मण और सात़जा के अने की) खबर
प़कर प्रय़ग ऽनि़सा ब्रह्मच़रा, तपसिा, मिऽन, ऽसि और ईद़सा
सब श्रा दशरथजा के सिंदर पित्रों को देखने के ऽलए भरि़जजा के
अश्रम पर अए॥3॥
* ऱम प्रऩम कीन्द्ह सब क़ह। मिददत भए लऽह लोयन ल़ह॥
देवह ऄसास परम सिखि प़इ। दफरे सऱहत सिंदरत़इ॥4॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचन्द्रजा ने सब दकसा को प्रण़म दकय़। नेत्रों क़
ल़भ प़कर सब अनंददत हो गए और परम सिख प़कर
अशाि़गद देने लगे। श्रा ऱमजा के सौंदयग की सऱहऩ करते हुए
िे लौटे॥4॥
दोह़ :
* ऱम कीन्द्ह ऽबश्ऱम ऽनऽस प्ऱत प्रय़ग नह़आ।
चले सऽहतऽसय लखन जन मिददत मिऽनऽह ऽसरु ऩआ॥108॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमजा ने ऱत को िहीं ऽिश्ऱम दकय़ और
प्ऱतःक़ल प्रय़गऱज क़ स्ऩन करके और प्रसन्नत़ के स़थ मिऽन

को ऽसर नि़कर श्रा सात़जा, लक्ष्मणजा और सेिक गिह के स़थ
िे चले॥108॥
चौप़इ :
* ऱम सप्रेम कहेई मिऽन प़हीं। ऩथ कऽहऄ हम के ऽह मग
ज़हीं॥
मिऽन मन ऽबहऽस ऱम सन कहहीं। सिगम सकल मग तिम्ह कहुूँ
ऄहहीं॥1॥
भ़ि़थग:-(चलते समय) बडे प्रेम से श्रा ऱमजा ने मिऽन से कह़हे ऩथ! बत़आए हम दकस म़गग से ज़एूँ। मिऽन मन में हूँसकर
श्रा ऱमजा से कहते हैं दक अपके ऽलए सभा म़गग सिगम हैं॥1॥
* स़थ ल़ऽग मिऽन ऽसष्य बोल़ए। सिऽन मन मिददत पच़सक
अए॥
सबऽन्द्ह ऱम पर प्रेम ऄप़ऱ। सकल कहवह मगि दाख हम़ऱ॥2॥
भ़ि़थग:-दफर ईनके स़थ के ऽलए मिऽन ने ऽशष्यों को बिल़य़।
(स़थ ज़ने की ब़त) सिनते हा ऽचि में हर्तषत हो कोइ पच़स
ऽशष्य अ गए। सभा क़ श्रा ऱमजा पर ऄप़र प्रेम है। सभा
कहते हैं दक म़गग हम़ऱ देख़ हुअ है॥2॥
* मिऽन बटि च़रर संग तब दान्द्ह।े ऽजन्द्ह बहु जनम सिकुत सब
कीन्द्ह॥े

करर प्रऩमि ररऽष अयसि प़इ। प्रमिददत हृदयूँ चले रघिऱइ॥3॥
भ़ि़थग:-तब मिऽन ने (चिनकर) च़र ब्रह्मच़ररयों को स़थ कर
ददय़, ऽजन्द्होंने बहुत जन्द्मों तक सब सिकुत (पिण्य) दकए थे। श्रा
रघिऩथजा प्रण़म कर और ऊऽष की अज्ञ़ प़कर हृदय में बडे
हा अनंददत होकर चले॥3॥
* ग्ऱम ऽनकट जब ऽनकसवह ज़इ। देखवह दरसि ऩरर नर ध़इ॥
होवह सऩथ जनम फलि प़इ। दफरवह दिऽखत मनि संग पठ़इ॥4॥
भ़ि़थग:-जब िे दकसा ग़ूँि के प़स होकर ऽनकलते हैं, तब स्त्रापिरुष दौडकर ईनके रूप को देखने लगते हैं। जन्द्म क़ फल
प़कर िे (सद़ के ऄऩथ) सऩथ हो ज़ते हैं और मन को ऩथ
के स़थ भेजकर (शरार से स़थ न रहने के क़रण) दिःखा होकर
लौट अते हैं॥4॥
दोह़ :
* ऽबद़ दकए बटि ऽबनय करर दफरे प़आ मन क़म।
ईतरर नह़ए जमिन जल जो सरार सम सय़म॥109॥
भ़ि़थग:-तदनन्द्तर श्रा ऱमजा ने ऽिनता करके च़रों ब्रह्मच़ररयों
को ऽिद़ दकय़, िे मनच़हा िसति (ऄनन्द्य भऽक्त) प़कर लौटे।
यमिऩजा के प़र ईतरकर सबने यमिऩजा के जल में स्ऩन दकय़,

जो श्रा ऱमचन्द्रजा के शरार के सम़न हा श्य़म रं ग क़
थ़॥109॥
चौप़इ :
* सिनत तारब़सा नर ऩरा। ध़ए ऽनज ऽनज क़ज ऽबस़रा॥
लखन ऱम ऽसय सिंदरत़इ। देऽख करवह ऽनज भ़ग्य बड़इ॥1॥
भ़ि़थग:-यमिऩजा के दकऩरे पर रहने ि़ले स्त्रा-पिरुष (यह
सिनकर दक ऽनष़द के स़थ दो परम सिंदर सिकिम़र नियििक और
एक परम सिंदरा स्त्रा अ रहा है) सब ऄपऩ-ऄपऩ क़म भीलकर
दौडे और लक्ष्मणजा, श्रा ऱमजा और सात़जा क़ सौंदयग देखकर
ऄपने भ़ग्य की बड़इ करने लगे॥1॥
* ऄऽत ल़लस़ बसवह मन म़हीं। ऩईूँ ग़ईूँ बीझत सकि च़हीं॥
जे ऽतन्द्ह महुूँ बयऽबररध सय़ने। ऽतन्द्ह करर जिगऽि त ऱमि
पऽहच़ने॥2॥
भ़ि़थग:-ईनके मन में (पररचय ज़नने की) बहुत सा ल़लस़एूँ
भरा हैं। पर िे ऩम-ग़ूँि पीछते सकि च़ते हैं। ईन लोगों में जो
ियोिुि और चतिर थे, ईन्द्होंने यिऽक्त से श्रा ऱमचन्द्रजा को
पहच़न ऽलय़॥2॥
* सकल कथ़ ऽतन्द्ह सबऽह सिऩइ। बनऽह चले ऽपति अयसि प़इ॥

सिऽन सऽबष़द सकल पऽछत़हीं। ऱना ऱयूँ कीन्द्ह भल ऩहीं॥3॥
भ़ि़थग:-ईन्द्होंने सब कथ़ सब लोगों को सिऩइ दक ऽपत़ की
अज्ञ़ प़कर ये िन को चले हैं। यह सिनकर सब लोग दिःऽखत
हो पछत़ रहे हैं दक ऱना और ऱज़ ने ऄच्छ़ नहीं दकय़॥3॥

त़पस प्रकरण
* तेऽह ऄिसर एक त़पसि अि़। तेजपिंज लघिबयस सिह़ि़॥
कऽब ऄलऽखत गऽत बेषि ऽबऱगा। मन क्रम बचन ऱम
ऄनिऱगा॥4॥
भ़ि़थग:-ईसा ऄिसर पर िह़ूँ एक तपसिा अय़, जो तेज क़
पिंज, छोटा ऄिसथ़ क़ और सिंदर थ़। ईसकी गऽत कऽि नहीं
ज़नते (ऄथि़ िह कऽि थ़ जो ऄपऩ पररचय नहीं देऩ
च़हत़)। िह िैऱगा के िेष में थ़ और मन, िचन तथ़ कमग से
श्रा ऱमचन्द्रजा क़ प्रेमा थ़॥4॥
दोह़ :
* सजल नयन तन पिलदक ऽनज आष्टदेई पऽहच़ऽन।
परे ई दंड ऽजऽम धरऽनतल दस़ न ज़आ बख़ऽन॥110॥
भ़ि़थग:-ऄपने आष्टदेि को पहच़नकर ईसके नेत्रों में जल भर
अय़ और शरार पिलदकत हो गय़। िह दण्ड की भ़ूँऽत पुथ्िा
पर ऽगर पड़, ईसकी (प्रेम ऽिह्िल) दश़ क़ िणगन नहीं दकय़
ज़ सकत़॥110॥
चौप़इ :
* ऱम सप्रेम पिलदक ईर ल़ि़। परम रं क जनि प़रसि प़ि़॥

मनहुूँ प्रेमि परम़रथि दोउ। ऽमलत धरें तन कह सबि कोउ॥1॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमजा ने प्रेमपीिगक पिलदकत होकर ईसको हृदय से
लग़ ऽलय़। (ईसे आतऩ अनंद हुअ) म़नो कोइ मह़दरररा
मनिष्य प़रस प़ गय़ हो। सब कोइ (देखने ि़ले) कहने लगे दक
म़नो प्रेम और परम़थग (परम तत्ि) दोनों शरार ध़रण करके
ऽमल रहे हैं॥1॥
* बहुरर लखन प़यन्द्ह सोआ ल़ग़। लान्द्ह ईठ़आ ईमऽग ऄनिऱग़॥
पिऽन ऽसय चरन धीरर धरर सास़। जनऽन ज़ऽन ऽससि दाऽन्द्ह
ऄसास़॥2॥
भ़ि़थग:-दफर िह लक्ष्मणजा के चरणों लग़। ईन्द्होंने प्रेम से
ईमंगकर ईसको ईठ़ ऽलय़। दफर ईसने सात़जा की चरण धीऽल
को ऄपने ऽसर पर ध़रण दकय़। म़त़ सात़जा ने भा ईसको
ऄपऩ बच्च़ ज़नकर अशाि़गद ददय़॥2॥
* कीन्द्ह ऽनष़द दंडित तेहा। ऽमलेई मिददत लऽख ऱम सनेहा॥
ऽपऄत नयन पिट रूपि ऽपयिष़। मिददत सिऄसनि प़आ ऽजऽम
भीख़॥3॥
भ़ि़थग:-दफर ऽनष़दऱज ने ईसको दण्डित की। श्रा ऱमचन्द्रजा
क़ प्रेमा ज़नकर िह ईस (ऽनष़द) से अनंददत होकर ऽमल़।
िह तपसिा ऄपने नेत्र रूपा दोनों से श्रा ऱमजा की सौंदयग सिध़

क़ प़न करने लग़ और ऐस़ अनंददत हुअ जैसे कोइ भीख़
अदमा सिंदर भोजन प़कर अनंददत होत़ है॥3॥
* ते ऽपति म़ति कहहु सऽख कै से। ऽजन्द्ह पठए बन ब़लक ऐसे॥
ऱम लखन ऽसय रूपि ऽनह़रा। होवह सनेह ऽबकल नर ऩरा॥4॥
भ़ि़थग:-(आधर ग़ूँि की ऽस्त्रय़ूँ कह रहा हैं) हे सखा! कहो तो,
िे म़त़-ऽपत़ कै से हैं, ऽजन्द्होंने ऐसे (सिंदर सिकिम़र) ब़लकों को
िन में भेज ददय़ है। श्रा ऱमजा, लक्ष्मणजा और सात़जा के
रूप को देखकर सब स्त्रा-पिरुष स्नेह से व्य़कि ल हो ज़ते हैं॥4॥

यमिऩ को प्रण़म, िनि़ऽसयों क़ प्रेम
दोह़ :
* तब रघिबार ऄनेक ऽबऽध सखऽह ऽसख़िनि दान्द्ह।।
ऱम रज़यसि सास धरर भिन गिनि तेआूँ कीन्द्ह॥111॥
भ़ि़थग:-तब श्रा ऱमचन्द्रजा ने सख़ गिह को ऄनेकों तरह से
(घर लौट ज़ने के ऽलए) समझ़य़। श्रा ऱमचन्द्रजा की अज्ञ़
को ऽसर चढ़़कर ईसने ऄपने घर को गमन दकय़॥111॥
चौप़इ :
* पिऽन ऽसयूँ ऱम लखन कर जोरा। जमिनऽह कीन्द्ह प्रऩमि
बहोरा॥
चले ससाय मिददत दोई भ़इ। रऽबतनिज़ कआ करत बड़इ॥1॥
भ़ि़थग:-दफर सात़जा, श्रा ऱमजा और लक्ष्मणजा ने ह़थ
जोडकर यमिऩजा को पिनः प्रण़म दकय़ और सीयगकन्द्य़ यमिऩजा

की बड़इ करते हुए सात़जा सऽहत दोनों भ़इ प्रसन्नत़पीिगक
अगे चले॥1॥
* पऽथक ऄनेक ऽमलवह मग ज़त़। कहवह सप्रेम देऽख दोई
वऱ्त़॥
ऱज लखन सब ऄंग तिम्ह़रें । देऽख सोचि ऄऽत हृदय हम़रें ॥2॥
भ़ि़थग:-ऱसते में ज़ते हुए ईन्द्हें ऄनेकों य़त्रा ऽमलते हैं। िे दोनों
भ़आयों को देखकर ईनसे प्रेमपीिगक कहते हैं दक तिम्ह़रे सब ऄंगों
में ऱज ऽचह्न देखकर हम़रे हृदय में बड़ सोच होत़ है॥2॥
* म़रग चलहु पय़देऽह प़एूँ। ज्योऽतषि झीठ हम़रें भ़एूँ॥
ऄगमि पंथि ऽगरर क़नन भ़रा। तेऽह महूँ स़थ ऩरर सिकिम़रा॥3॥
भ़ि़थग:-(ऐसे ऱजऽचह्नों के होते हुए भा) तिम लोग ऱसते में
पैदल हा चल रहे हो, आससे हम़रा समझ में अत़ है दक
ज्योऽतष श़स्त्र झीठ़ हा है। भ़रा जंगल और बडे-बडे पह़डों क़
दिगगम ऱसत़ है। ऽतस पर तिम्ह़रे स़थ सिकिम़रा स्त्रा है॥3॥
* करर के हरर बन ज़आ न जोइ। हम सूँग चलवह जो अयसि
होइ॥
ज़ब जह़ूँ लऽग तहूँ पहुूँच़इ। दफरब बहोरर तिम्हऽह ऽसरु
ऩइ॥4॥

भ़ि़थग:-ह़था और वसहों से भऱ यह भय़नक िन देख़ तक
नहीं ज़त़। यदद अज्ञ़ हो तो हम स़थ चलें। अप जह़ूँ तक
ज़एूँगे, िह़ूँ तक पहुूँच़कर, दफर अपको प्रण़म करके हम लौट
अिेंगे॥4॥
दोह़ :
* एऽह ऽबऽध पीूँछवह प्रेम बस पिलक ग़त जलि नैन।
कु प़वसधि फे रवह ऽतन्द्हऽह कऽह ऽबनात मुद ि बैन॥112॥
भ़ि़थग:-आस प्रक़र िे य़त्रा प्रेमिश पिलदकत शरार हो और नेत्रों
में (प्रेम़श्रिओं क़) जल भरकर पीछते हैं, दकन्द्ति कु प़ के समिर श्रा
ऱमचन्द्रजा कोमल ऽिनययिक्त िचन कहकर ईन्द्हें लौट़ देते
हैं॥112॥
चौप़इ :
* जे पिर ग़ूँि बसवह मग म़हीं। ऽतन्द्हऽह ऩग सिर नगर
ऽसह़हीं॥
के ऽह सिकुतीं के ऽह घरीं बस़ए। धन्द्य पिन्द्यमय परम सिह़ए॥1॥
भ़ि़थग:-जो ग़ूँि और पिरिे ऱसते में बसे हैं, ऩगों और देित़ओं
के नगर ईनको देखकर प्रशंस़ पीिक
ग इष़ग करते और ललच़ते
हुए कहते हैं दक दकस पिण्यि़न् ने दकस शिभ घडा में आनको

बस़य़ थ़, जो अज ये आतने धन्द्य और पिण्यमय तथ़ परम
सिंदर हो रहे हैं॥1॥
* जहूँ जहूँ ऱम चरन चऽल ज़हीं। ऽतन्द्ह सम़न ऄमऱिऽत
ऩहीं॥
पिन्द्यपिंज मग ऽनकट ऽनि़सा। ऽतन्द्हऽह सऱहवह सिरपिरब़सा॥2॥
भ़ि़थग:-जह़ूँ-जह़ूँ श्रा ऱमचन्द्रजा के चरण चले ज़ते हैं, ईनके
सम़न आन्द्र की पिरा ऄमऱिता भा नहीं है। ऱसते के समाप
बसने ि़ले भा बडे पिण्य़त्म़ हैं- सिगग में रहने ि़ले देित़ भा
ईनकी सऱहऩ करते हैं-॥2॥
* जे भरर नयन ऽबलोकवह ऱमऽह। सात़ लखन सऽहत
घनसय़मऽह॥
जे सर सररत ऱम ऄिग़हवह। ऽतन्द्हऽह देि सर सररत
सऱहवह॥3॥
भ़ि़थग:-जो नेत्र भरकर सात़जा और लक्ष्मणजा सऽहत घनश्य़म
श्रा ऱमजा के दशगन करते हैं, ऽजन त़ल़बों और नददयों में श्रा
ऱमजा स्ऩन कर लेते हैं, देिसरोिर और देिनददय़ूँ भा ईनकी
बड़इ करता हैं॥3॥
* जेऽह तरु तर प्रभि बैठवह ज़इ। करवह कलपतरु त़सि बड़इ॥

परऽस ऱम पद पदिम पऱग़। म़नऽत भीऽम भीरर ऽनज भ़ग़॥4॥
भ़ि़थग:-ऽजस िुक्ष के नाचे प्रभि ज़ बैठते हैं, कल्पिुक्ष भा ईसकी
बड़इ करते हैं। श्रा ऱमचन्द्रजा के चरणकमलों की रज क़ सपशग
करके पुथ्िा ऄपऩ बड़ सौभ़ग्य म़नता है॥4॥
दोह़ :
* छ़ूँह करवह घन ऽबबिधगन बरषवह सिमन ऽसह़वह।
देखत ऽगरर बन ऽबहग मुग ऱमि चले मग ज़वह॥113॥
भ़ि़थग:-ऱसते में ब़दल छ़य़ करते हैं और देित़ फी ल बरस़ते
और ऽसह़ते हैं। पिगत, िन और पशि-पऽक्षयों को देखते हुए श्रा
ऱमजा ऱसते में चले ज़ रहे हैं॥113॥
चौप़इ :
* सात़ लखन सऽहत रघिऱइ। ग़ूँि ऽनकट जब ऽनकसवह ज़इ॥
सिऽन सब ब़ल बुि नर ऩरा। चलवह तिरत गुह क़जि
ऽबस़रा॥1॥
भ़ि़थग:-सात़जा और लक्ष्मणजा सऽहत श्रा रघिऩथजा जब दकसा
ग़ूँि के प़स ज़ ऽनकलते हैं, तब ईनक़ अऩ सिनते हा ब़लकबीढ़े, स्त्रा-पिरुष सब ऄपने घर और क़म-क़ज को भीलकर तिरंत
ईन्द्हें देखने के ऽलए चल देते हैं॥1॥

* ऱम लखन ऽसय रूप ऽनह़रा। प़आ नयन फलि होवह सिख़रा॥
सजल ऽबलोचन पिलक सराऱ। सब भए मगन देऽख दोई
बाऱ॥2॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱम, लक्ष्मण और सात़जा क़ रूप देखकर, नेत्रों
क़ (परम) फल प़कर िे सिखा होते हैं। दोनों भ़आयों को
देखकर सब प्रेम़नन्द्द में मग्न हो गए। ईनके नेत्रों में जल भर
अय़ और शरार पिलदकत हो गए॥2॥
* बरऽन न ज़आ दस़ ऽतन्द्ह के रा। लऽह जनि रं कन्द्ह सिरमऽन ढेरा॥
एकन्द्ह एक बोऽल ऽसख देहीं। लोचन ल़हु लेहु छन एहीं॥3॥
भ़ि़थग:-ईनकी दश़ िणगन नहीं की ज़ता। म़नो दरररों ने
ऽचन्द्त़मऽण की ढेरा प़ ला हो। िे एक-एक को पिक़रकर साख
देते हैं दक आसा क्षण नेत्रों क़ ल़भ ले लो॥3॥
* ऱमऽह देऽख एक ऄनिऱगे। ऽचतित चले ज़वह सूँग ल़गे॥
एक नयन मग छऽब ईर अना। होवह ऽसऽथल तन मन बर
ब़ना॥4॥
भ़ि़थग:-कोइ श्रा ऱमचन्द्रजा को देखकर ऐसे ऄनिऱग में भर गए
हैं दक िे ईन्द्हें देखते हुए ईनके स़थ लगे चले ज़ रहे हैं। कोइ
नेत्र म़गग से ईनकी छऽब को हृदय में ल़कर शरार, मन और

श्रेष्ठ ि़णा से ऽशऽथल हो ज़ते हैं (ऄथ़गत् ईनके शरार, मन और
ि़णा क़ व्यिह़र बंद हो ज़त़ है)॥4॥
दोह़ :
* एक देऽख बट छ़ूँह भऽल ड़ऽस मुदल
ि तुन प़त।
कहवह गि़ूँआऄ ऽछनिकि श्रमि गिनब ऄबवहदक प्ऱत॥114॥
भ़ि़थग:-कोइ बड की सिंदर छ़य़ देखकर, िह़ूँ नरम घ़स और
पिे ऽबछ़कर कहते हैं दक क्षण भर यह़ूँ बैठकर थक़िट ऽमट़
लाऽजए। दफर च़हे ऄभा चले ज़आएग़, च़हे सबेरे॥114॥
चौप़इ :
* एक कलस भरर अनवह प़ना। ऄूँचआऄ ऩथ कहवह मुद ि ब़ना॥
सिऽन ऽप्रय बचन प्राऽत ऄऽत देखा। ऱम कु प़ल सिसाल
ऽबसेषा॥1॥
भ़ि़थग:-कोइ घड़ भरकर प़ना ले अते हैं और कोमल ि़णा से
कहते हैं- ऩथ! अचमन तो कर लाऽजए। ईनके प्य़रे िचन
सिनकर और ईनक़ ऄत्यन्द्त प्रेम देखकर दय़लि और परम सिशाल
श्रा ऱमचन्द्रजा ने-॥1॥
* ज़ना श्रऽमत साय मन म़हीं। घररक ऽबलंबि कीन्द्ह बट छ़हीं॥
मिददत ऩरर नर देखवह सोभ़। रूप ऄनीप नयन मनि लोभ़॥2॥

भ़ि़थग:-मन में सात़जा को थकी हुइ ज़नकर घडा भर बड की
छ़य़ में ऽिश्ऱम दकय़। स्त्रा-पिरुष अनंददत होकर शोभ़ देखते
हैं। ऄनिपम रूप ने ईनके नेत्र और मनों को लिभ़ ऽलय़ है॥2॥
* एकटक सब सोहवह चहुूँ ओऱ। ऱमचन्द्र मिख चंद चकोऱ॥
तरुन तम़ल बरन तनि सोह़। देखत कोरट मदन मनि मोह़॥3॥
भ़ि़थग:-सब लोग टकटकी लग़ए श्रा ऱमचन्द्रजा के मिख चन्द्र
को चकोर की तरह (तन्द्मय होकर) देखते हुए च़रों ओर
सिशोऽभत हो रहे हैं। श्रा ऱमजा क़ निान तम़ल िुक्ष के रं ग
क़ (श्य़म) शरार ऄत्यन्द्त शोभ़ दे रह़ है, ऽजसे देखते हा
करोडों क़मदेिों के मन मोऽहत हो ज़ते हैं॥3॥
* द़ऽमऽन बरन लखन सिरठ नाके । नख ऽसख सिभग भ़िते जा
के ॥
मिऽन पट करटन्द्ह कसें तीनाऱ। सोहवह कर कमलऽन धनि ताऱ॥4॥
भ़ि़थग:-ऽबजला के से रं ग के लक्ष्मणजा बहुत हा भले म़लीम
होते हैं। िे नख से ऽशख़ तक सिंदर हैं और मन को बहुत भ़ते
हैं। दोनों मिऽनयों के (िल्कल अदद) िस्त्र पहने हैं और कमर में
तरकस कसे हुए हैं। कमल के सम़न ह़थों में धनिष-ब़ण शोऽभत
हो रहे हैं॥4॥
दोह़ :

* जट़ मिकिट सासऽन सिभग ईर भिज नयन ऽबस़ल।
सरद परब ऽबधि बदन बर लसत सिेद कन ज़ल॥115॥
भ़ि़थग:-ईनके ऽसरों पर सिंदर जट़ओं के मिकिट हैं, िक्षः सथल,
भिज़ और नेत्र ऽिश़ल हैं और शरद पीर्तणम़ के चन्द्रम़ के
सम़न सिंदर मिखों पर पसाने की बीूँदों क़ समीह शोऽभत हो रह़
है॥115॥
चौप़इ :
* बरऽन न ज़आ मनोहर जोरा। सोभ़ बहुत थोरर मऽत मोरा॥
ऱम लखन ऽसय सिंदरत़इ। सब ऽचतिवह ऽचत मन मऽत
ल़इ॥1॥
भ़ि़थग:-ईस मनोहर जोडा क़ िणगन नहीं दकय़ ज़ सकत़,
क्योंदक शोभ़ बहुत ऄऽधक है और मेरा बिऽि थोडा है। श्रा ऱम,
लक्ष्मण और सात़जा की सिंदरत़ को सब लोग मन, ऽचि और
बिऽि तानों को लग़कर देख रहे हैं॥1॥
* थके ऩरर नर प्रेम ऽपअसे। मनहुूँ मुगा मुग देऽख ददअ से॥
साय समाप ग्ऱमऽतय ज़हीं। पीूँछत ऄऽत सनेहूँ सकि च़हीं॥2॥
भ़ि़थग:-प्रेम के प्य़से (िे ग़ूँिों के ) स्त्रा-पिरुष (आनके सौंदयगम़धियग की छट़ देखकर) ऐसे थदकत रह गए जैसे दापक को

देखकर ऽहरना और ऽहरन (ऽनसतब्ध रह ज़ते हैं)! ग़ूँिों की
ऽस्त्रय़ूँ सात़जा के प़स ज़ता हैं, परन्द्ति ऄत्यन्द्त स्नेह के क़रण
पीछते सकि च़ता हैं॥2॥
* ब़र ब़र सब ल़गवह प़एूँ। कहवह बचन मुद ि सरल सिभ़एूँ॥
ऱजकि म़रर ऽबनय हम करहीं। ऽतय सिभ़यूँ कछि पीूँछत डरहीं॥3॥
भ़ि़थग:-ब़र-ब़र सब ईनके प़ूँि लगतीं और सहज हा साधे-स़दे
कोमल िचन कहता हैं- हे ऱजकि म़रा! हम ऽिनता करता (कि छ
ऽनिेदन करऩ च़हता) हैं, परन्द्ति स्त्रा सिभ़ि के क़रण कि छ
पीछते हुए डरता हैं॥3॥
* सि़ऽमऽन ऄऽबनय छमऽब हम़रा। ऽबलगि न म़नब ज़ऽन
गि़ूँरा॥
ऱजकि ऄूँर दोई सहज सलोने। आन्द्ह तें लहा दिऽत मरकत सोने॥4॥
भ़ि़थग:-हे सि़ऽमना! हम़रा दढठ़इ क्षम़ कीऽजएग़ और हमको
गूँि़रा ज़नकर बिऱ न म़ऽनएग़। ये दोनों ऱजकि म़र सिभ़ि से
हा ल़िण्यमय (परम सिंदर) हैं। मरकतमऽण (पन्ने) और सििणग ने
क़ंऽत आन्द्हीं से प़इ है (ऄथ़गत मरकतमऽण में और सिणग में जो
हररत और सिणग िणग की अभ़ है, िह आनकी हररत़भ नाल
और सिणग क़ऽन्द्त के एक कण के बऱबर भा नहीं है।)॥4॥
दोह़ :

* सय़मल गौर दकसोर बर सिंदर सिषम़ ऐन।
सरद सबगराऩथ मिखि सरद सरोरुह नैन॥116॥
भ़ि़थग:-श्य़म और गौर िणग है, सिंदर दकशोर ऄिसथ़ है, दोनों
हा परम सिंदर और शोभ़ के ध़म हैं। शरद पीर्तणम़ के चन्द्रम़
के सम़न आनके मिख और शरद ऊति के कमल के सम़न आनके
नेत्र हैं॥116॥

म़सप़ऱयण, सोलहि़ूँ ऽिश्ऱम
नि़ह्नप़ऱयण, चौथ़ ऽिश्ऱम
चौप़इ :
* कोरट मनोज लज़िऽनह़रे । सिमिऽख कहहु को अवह तिम्ह़रे ॥
सिऽन सनेहमय मंजिल ब़ना। सकि चा ऽसय मन महुूँ मिसिक़ना॥1॥
भ़ि़थग:-हे सिमिऽख! कहो तो ऄपना सिंदरत़ से करोडों क़मदेिों
को लज़ने ि़ले ये तिम्ह़रे कौन हैं? ईनकी ऐसा प्रेममया सिंदर
ि़णा सिनकर सात़जा सकि च़ गईं और मन हा मन मिसकि ऱईं॥1॥
* ऽतन्द्हऽह ऽबलोदक ऽबलोकऽत धरना। दिहुूँ सकोच सकि चऽत
बरबरना॥

सकि ऽच सप्रेम ब़ल मुग नयना। बोला मधिर बचन ऽपकबयना॥2॥
भ़ि़थग:-ईिम (गौर) िणगि़ला सात़जा ईनको देखकर
(संकोचिश) पुथ्िा की ओर देखता हैं। िे दोनों ओर के संकोच
से सकि च़ रहा हैं (ऄथ़गत न बत़ने में ग्ऱम की ऽस्त्रयों को दिःख
होने क़ संकोच है और बत़ने में लज्ज़ रूप संकोच)। ऽहरन के
बच्चे के सदुश नेत्र ि़ला और कोदकल की सा ि़णा ि़ला
सात़जा सकि च़कर प्रेम सऽहत मधिर िचन बोलीं-॥2॥
* सहज सिभ़य सिभग तन गोरे । ऩमि लखनि लघि देिर मोरे ॥
बहुरर बदनि ऽबधि ऄंचल ढ़ूँकी। ऽपय तन ऽचतआ भौंह करर
ब़ूँकी॥3॥
भ़ि़थग:-ये जो सहज सिभ़ि, सिंदर और गोरे शरार के हैं,
ईनक़ ऩम लक्ष्मण है, ये मेरे छोटे देिर हैं। दफर सात़जा ने
(लज्ज़िश) ऄपने चन्द्रमिख को अूँचल से ढूँककर और ऽप्रयतम
(श्रा ऱमजा) की ओर ऽनह़रकर भौंहें टेढ़ा करके ,॥3॥
* खंजन मंजि ऽतराछे नयनऽन। ऽनज पऽत कहेई ऽतन्द्हऽह ऽसयूँ
सयनऽन॥
भईं मिददत सब ग्ऱमबधीटीं। रं कन्द्ह ऱय ऱऽस जनि लीटीं॥4॥
भ़ि़थग:-खंजन पक्षा के से सिंदर नेत्रों को ऽतरछ़ करके सात़जा
ने आश़रे से ईन्द्हें कह़ दक ये (श्रा ऱमचन्द्रजा) मेरे पऽत हैं। यह

ज़नकर ग़ूँि की सब यििता ऽस्त्रय़ूँ आस प्रक़र अनंददत हुईं,
म़नो कं ग़लों ने धन की ऱऽशय़ूँ लीट ला हों॥4॥
दोह़ :
* ऄऽत सप्रेम ऽसय प़ूँय परर बहुऽबऽध देवह ऄसास।
सद़ सोह़ऽगऽन होहु तिम्ह जब लऽग मऽह ऄऽह सास॥117
भ़ि़थग:-िे ऄत्यन्द्त प्रेम से सात़जा के पैरों पडकर बहुत प्रक़र
से अशाष देता हैं (शिभ क़मऩ करता हैं), दक जब तक शेषजा
के ऽसर पर पुथ्िा रहे, तब तक तिम सद़ सिह़ऽगना बना
रहो,॥117॥
चौप़इ :
* प़रबता सम पऽतऽप्रय होह। देऽब न हम पर छ़डब छोह॥
पिऽन पिऽन ऽबनय कररऄ कर जोरा। जौं एऽह म़रग दफररऄ
बहोरा॥1॥
भ़ि़थग:-और प़िगताजा के सम़न ऄपने पऽत की प्य़रा होओ। हे
देिा! हम पर कु प़ न छोडऩ (बऩए रखऩ)। हम ब़र-ब़र
ह़थ जोडकर ऽिनता करता हैं, ऽजसमें अप दफर आसा ऱसते
लौटें,॥1॥
* दरसनि देब ज़ऽन ऽनज द़सा। लखीं सायूँ सब प्रेम ऽपअसा॥

मधिर बचन कऽह कऽह पररतोषीं। जनि कि मिददनीं कौमिदीं पोषीं॥2॥
भ़ि़थग:-और हमें ऄपना द़सा ज़नकर दशगन दें। सात़जा ने ईन
सबको प्रेम की प्य़सा देख़ और मधिर िचन कह-कहकर ईनक़
भलाभ़ूँऽत संतोष दकय़। म़नो च़ूँदना ने कि मिददऽनयों को
ऽखल़कर पिष्ट कर ददय़ हो॥2॥
* तबवह लखन रघिबर रुख ज़ना। पीूँछेई मगि लोगऽन्द्ह मुद ि
ब़ना॥
सिनत ऩरर नर भए दिख़रा। पिलदकत ग़त ऽबलोचन ब़रा॥3॥
भ़ि़थग:-ईसा समय श्रा ऱमचन्द्रजा क़ रुख ज़नकर लक्ष्मणजा
ने कोमल ि़णा से लोगों से ऱसत़ पीछ़। यह सिनते हा स्त्रापिरुष दिःखा हो गए। ईनके शरार पिलदकत हो गए और नेत्रों में
(ऽियोग की सम्भ़िऩ से प्रेम क़) जल भर अय़॥3॥
* ऽमट़ मोदि मन भए मलाने। ऽबऽध ऽनऽध दान्द्ह लेत जनि छाने॥
समिऽझ करम गऽत धारजि कीन्द्ह़। सोऽध सिगम मगि ऽतन्द्ह कऽह
दान्द्ह़॥4॥
भ़ि़थग:-ईनक़ अनंद ऽमट गय़ और मन ऐसे ईद़स हो गए
म़नो ऽिध़त़ दा हुइ सम्पऽि छाने लेत़ हो। कमग की गऽत
समझकर ईन्द्होंने धैयग ध़रण दकय़ और ऄच्छा तरह ऽनणगय करके
सिगम म़गग बतल़ ददय़॥4॥
दोह़ :

* लखन ज़नकी सऽहत तब गिनि कीन्द्ह रघिऩथ।
फे रे सब ऽप्रय बचन कऽह ऽलए ल़आ मन स़थ॥118॥
भ़ि़थग:-तब लक्ष्मणजा और ज़नकीजा सऽहत श्रा रघिऩथजा ने
गमन दकय़ और सब लोगों को ऽप्रय िचन कहकर लौट़य़,
दकन्द्ति ईनके मनों को ऄपने स़थ हा लग़ ऽलय़॥118॥
चौप़इ :
* दफरत ऩरर नर ऄऽत पऽछत़हीं। दैऄऽह दोषि देवह मन म़हीं॥
सऽहत ऽबष़द परसपर कहहीं। ऽबऽध करतब ईलटे सब ऄहहीं॥1॥
भ़ि़थग:-लौटते हुए िे स्त्रा-पिरुष बहुत हा पछत़ते हैं और मन
हा मन दैि को दोष देते हैं। परसपर (बडे हा) ऽिष़द के स़थ
कहते हैं दक ऽिध़त़ के सभा क़म ईलटे हैं॥1॥
* ऽनपट ऽनरं किस ऽनठि र ऽनसंकी। जेवह सऽस कीन्द्ह सरुज सकलंकी॥
रूख कलपतरु स़गरु ख़ऱ। तेवह पठए बन ऱजकि म़ऱ॥2॥
भ़ि़थग:-िह ऽिध़त़ ऽबल्कि ल ऽनरं किश (सितंत्र), ऽनदगय और ऽनडर
है, ऽजसने चन्द्रम़ को रोगा (घटने-बढ़ने ि़ल़) और कलंकी
बऩय़, कल्पिुक्ष को पेड और समिर को ख़ऱ बऩय़। ईसा ने
आन ऱजकि म़रों को िन में भेज़ है॥2॥

* जौं पै आन्द्हवह दान्द्ह बनब़सी। कीन्द्ह ब़दद ऽबऽध भोग ऽबल़सी॥
ए ऽबचरवह मग ऽबनि पदत्ऱऩ। रचे ब़दद ऽबऽध ब़हन ऩऩ॥3॥
भ़ि़थग:-जब ऽिध़त़ ने आनको िनि़स ददय़ है, तब ईसने
भोग-ऽिल़स व्यथग हा बऩए। जब ये ऽबऩ जीते के (नंगे हा
पैरों) ऱसते में चल रहे हैं, तब ऽिध़त़ ने ऄनेकों ि़हन
(सि़ररय़ूँ) व्यथग हा रचे॥3॥
* ए मऽह परवह ड़ऽस कि स प़त़। सिभग सेज कत सुजत
ऽबध़त़॥
तरुबर ब़स आन्द्हऽह ऽबऽध दान्द्ह़। धिल ध़म रऽच रऽच श्रमि
कीन्द्ह़॥4॥
भ़ि़थग:-जब ये कि श और पिे ऽबछ़कर जमान पर हा पडे रहते
हैं, तब ऽिध़त़ सिंदर सेज (पलंग और ऽबछौने) दकसऽलए बऩत़
है? ऽिध़त़ ने जब आनको बडे-बडे पेडों (के नाचे) क़ ऽनि़स
ददय़, तब ईज्ज्िल महलों को बऩ-बऩकर ईसने व्यथग हा
पररश्रम दकय़॥4॥
दोह़ :
* जौं ए मिऽन पट धर जरटल सिंदर सिरठ सिकिम़र।
ऽबऽबध भ़ूँऽत भीषन बसन ब़दद दकए करत़र॥119॥

भ़ि़थग:-जो ये सिद
ं र और ऄत्यन्द्त सिकिम़र होकर मिऽनयों के
(िल्कल) िस्त्र पहनते और जट़ ध़रण करते हैं, तो दफर करत़र
(ऽिध़त़) ने भ़ूँऽत-भ़ूँऽत के गहने और कपडे िुथ़ हा
बऩए॥119॥
चौप़इ :
* जौं ए कं दमील फल ख़हीं। ब़दद सिध़दद ऄसन जग म़हीं॥
एक कहवह ए सहज सिह़ए। अपि प्रगट भए ऽबऽध न बऩए॥1॥
भ़ि़थग:-जो ये कन्द्द, मील, फल ख़ते हैं, तो जगत में ऄमुत
अदद भोजन व्यथग हा हैं। कोइ एक कहते हैं- ये सिभ़ि से हा
सिंदर हैं (आनक़ सौंदयग-म़धियग ऽनत्य और सि़भ़ऽिक है)। ये
ऄपने-अप प्रकट हुए हैं, ब्रह्म़ के बऩए नहीं हैं॥1॥
* जहूँ लऽगबेद कहा ऽबऽध करना। श्रिन नयन मन गोचर
बरना॥
देखहु खोऽज भिऄन दस च़रा। कहूँ ऄस पिरुष कह़ूँ ऄऽस
ऩरा॥2॥
भ़ि़थग:-हम़रे क़नों, नेत्रों और मन के ि़ऱ ऄनिभि में अने
ि़ला ऽिध़त़ की करना को जह़ूँ तक िेदों ने िणगन करके कह़
है, िह़ूँ तक चौदहों लोकों में ढी ूँढ देखो, ऐसे पिरुष और ऐसा
ऽस्त्रय़ूँ कह़ूँ हैं? (कहीं भा नहीं हैं, आसा से ऽसि है दक ये

ऽिध़त़ के चौदहों लोकों से ऄलग हैं और ऄपना मऽहम़ से हा
अप ऽनर्तमत हुए हैं)॥2॥
* आन्द्हऽह देऽख ऽबऽध मनि ऄनिऱग़। पटतर जोग बऩिै ल़ग़॥
कीन्द्ह बहुत श्रम ऐक न अए। तेवह आररष़ बन अऽन दिऱए॥3॥
भ़ि़थग:-आन्द्हें देखकर ऽिध़त़ क़ मन ऄनिरक्त (मिग्ध) हो गय़,
तब िह भा आन्द्हीं की ईपम़ के योग्य दीसरे स्त्रा-पिरुष बऩने
लग़। ईसने बहुत पररश्रम दकय़, परन्द्ति कोइ ईसकी ऄटकल में
हा नहीं अए (पीरे नहीं ईतरे )। आसा इष़ग के म़रे ईसने आनको
जंगल में ल़कर ऽछप़ ददय़ है॥3॥
* एक कहवह हम बहुत न ज़नवह। अपिऽह परम धन्द्य करर
म़नवह॥
ते पिऽन पिन्द्यपिंज हम लेखे। जे देखवह देऽखहवह ऽजन्द्ह देखे॥4॥
भ़ि़थग:-कोइ एक कहते हैं- हम बहुत नहीं ज़नते। ह़ूँ, ऄपने को
परम धन्द्य ऄिश्य म़नते हैं (जो आनके दशगन कर रहे हैं) और
हम़रा समझ में िे भा बडे पिण्यि़न हैं, ऽजन्द्होंने आनको देख़ है,
जो देख रहे हैं और जो देखेंगे॥4॥
दोह़ :
* एऽह ऽबऽध कऽह कऽह बचन ऽप्रय लेवह नयन भरर नार।

दकऽम चऽलहवह म़रग ऄगम सिरठ सिकिम़र सरार॥120॥
भ़ि़थग:-आस प्रक़र ऽप्रय िचन कह-कहकर सब नेत्रों में (प्रेम़श्रिओं
क़) जल भर लेते हैं और कहते हैं दक ये ऄत्यन्द्त सिकिम़र शरार
ि़ले दिगगम (करठन) म़गग में कै से चलेंगे॥120॥
चौप़इ :
* ऩरर सनेह ऽबकल बस होहीं। चकईं स़ूँझ समय जनि सोहीं॥
मुद ि पद कमल करठन मगि ज़ना। गहबरर हृदयूँ कहवह बर
ब़ना॥1॥
भ़ि़थग:-ऽस्त्रय़ूँ स्नेहिश ऽिकल हो ज़ता हैं। म़नो संध्य़ के
समय चकिा (भ़िा ऽियोग की पाड़ से) सोह रहा हो। (दिःखा
हो रहा हो)। आनके चरणकमलों को कोमल तथ़ म़गग को कठोर
ज़नकर िे व्यऽथत हृदय से ईिम ि़णा कहता हैं-॥1॥
* परसत मुदल
ि चरन ऄरुऩरे । सकि चऽत मऽह ऽजऽम हृदय हम़रे ॥
जौं जगदास आन्द्हऽह बनि दान्द्ह़। कस न सिमनमय म़रगि
कीन्द्ह़॥2॥
भ़ि़थग:-आनके कोमल और ल़ल-ल़ल चरणों (तलिों) को छी ते हा
पुथ्िा िैसे हा सकि च़ ज़ता है, जैसे हम़रे हृदय सकि च़ रहे हैं।
जगदाश्वर ने यदद आन्द्हें िनि़स हा ददय़, तो स़रे ऱसते को
पिष्पमय क्यों नहीं बऩ ददय़?॥2॥

* जौं म़ग़ प़आऄ ऽबऽध प़हीं। ए रऽखऄवह सऽख अूँऽखन्द्ह
म़हीं॥
जे नर ऩरर न ऄिसर अए। ऽतन्द्ह ऽसय ऱमि न देखन प़ए॥3॥
भ़ि़थग:-यदद ब्रह्म़ से म़ूँगे ऽमले तो हे सखा! (हम तो ईनसे
म़ूँगकर) आन्द्हें ऄपना अूँखों में हा रखें! जो स्त्रा-पिरुष आस ऄिसर
पर नहीं अए, िे श्रा सात़ऱमजा को नहीं देख सके ॥3॥
* सिऽन सिरूपि बीझवह ऄकि ल़इ। ऄब लऽग गए कह़ूँ लऽग भ़इ॥
समरथ ध़आ ऽबलोकवह ज़इ। प्रमिददत दफरवह जनमफलि प़इ॥4॥
भ़ि़थग:-ईनके सौंदयग को सिनकर िे व्य़कि ल होकर पीछते हैं दक
भ़इ! ऄब तक िे कह़ूँ तक गए होंगे? और जो समथग हैं, िे
दौडते हुए ज़कर ईनके दशगन कर लेते हैं और जन्द्म क़ परम
फल प़कर, ऽिशेष अनंददत होकर लौटते हैं॥4॥
दोह़ :
* ऄबल़ ब़लक बुि जन कर माजवह पऽछत़वह।
होवह प्रेमबस लोग आऽम ऱमि जह़ूँ जहूँ ज़वह॥121॥
भ़ि़थग:-(गभगिता, प्रसीत़ अदद) ऄबल़ ऽस्त्रय़ूँ, बच्चे और बीढ़े
(दशगन न प़ने से) ह़थ मलते और पछत़ते हैं। आस प्रक़र जह़ूँ-

जह़ूँ श्रा ऱमचन्द्रजा ज़ते हैं, िह़ूँ-िह़ूँ लोग प्रेम के िश में हो
ज़ते हैं॥121॥
चौप़इ :
* ग़ूँि ग़ूँि ऄस होआ ऄनंद।ी देऽख भ़निकिल कै रि चंद॥ी
जे कछि सम़च़र सिऽन प़िवह। ते नुप ऱऽनऽह दोसि लग़िवह॥1॥
भ़ि़थग:-सीयगकिल रूपा कि मिददना को प्रफि ऽल्लत करने ि़ले चन्द्रम़
सिरूप श्रा ऱमचन्द्रजा के दशगन कर ग़ूँि-ग़ूँि में ऐस़ हा अनंद
हो रह़ है, जो लोग (िनि़स ददए ज़ने क़) कि छ भा सम़च़र
सिन प़ते हैं, िे ऱज़-ऱना (दशरथ-कै के या) को दोष लग़ते
हैं॥1॥
* कहवह एक ऄऽत भल नरऩह। दान्द्ह हमऽह जोआ लोचन ल़ह॥
कहवह परसपर लोग लोग़ईं। ब़तें सरल सनेह सिह़ईं॥2॥
भ़ि़थग:-कोइ एक कहते हैं दक ऱज़ बहुत हा ऄच्छे हैं, ऽजन्द्होंने
हमें ऄपने नेत्रों क़ ल़भ ददय़। स्त्रा-पिरुष सभा अपस में साधा,
स्नेहभरा सिंदर ब़तें कह रहे हैं॥2॥
* ते ऽपति म़ति धन्द्य ऽजन्द्ह ज़ए। धन्द्य सो नगरु जह़ूँ तें अए॥
धन्द्य सो देसि सैलि बन ग़उूँ। जहूँ-जहूँ ज़वह धन्द्य सोआ ठ़उूँ॥3॥

भ़ि़थग:-(कहते हैं-) िे म़त़-ऽपत़ धन्द्य हैं, ऽजन्द्होंने आन्द्हें जन्द्म
ददय़। िह नगर धन्द्य है, जह़ूँ से ये अए हैं। िह देश, पिगत,
िन और ग़ूँि धन्द्य है और िहा सथ़न धन्द्य है, जह़ूँ-जह़ूँ ये
ज़ते हैं॥3॥
* सिखि प़यई ऽबरं ऽच रऽच तेहा। ए जेऽह के सब भ़ूँऽत सनेहा॥
ऱम लखन पऽथ कथ़ सिह़इ। रहा सकल मग क़नन छ़इ॥4॥
भ़ि़थग:-ब्रह्म़ ने ईसा को रचकर सिख प़य़ है, ऽजसके ये (श्रा
ऱमचन्द्रजा) सब प्रक़र से स्नेहा हैं। पऽथक रूप श्रा ऱम-लक्ष्मण
की सिंदर कथ़ स़रे ऱसते और जंगल में छ़ गइ है॥4॥
दोह़ :
* एऽह ऽबऽध रघिकिल कमल रऽब मग लोगन्द्ह सिख देत।
ज़वह चले देखत ऽबऽपन ऽसय सौऽमऽत्र समेत॥122॥
भ़ि़थग:-रघिकिल रूपा कमल को ऽखल़ने ि़ले सीयग श्रा
ऱमचन्द्रजा आस प्रक़र म़गग के लोगों को सिख देते हुए सात़जा
और लक्ष्मणजा सऽहत िन को देखते हुए चले ज़ रहे हैं॥122॥
चौप़इ :
* अगें ऱमि लखनि बने प़छें। त़पस बेष ऽबऱजत क़छें॥

ईभय बाच ऽसय सोहऽत कै सें। ब्रह्म जाि ऽबच म़य़ जैसें॥1॥
भ़ि़थग:-अगे श्रा ऱमजा हैं, पाछे लक्ष्मणजा सिशोऽभत हैं।
तपऽसियों के िेष बऩए दोनों बडा हा शोभ़ प़ रहे हैं। दोनों
के बाच में सात़जा कै सा सिशोऽभत हो रहा हैं, जैसे ब्रह्म और
जाि के बाच में म़य़!॥1॥
* बहुरर कहईूँ छऽब जऽस मन बसइ। जनि मधि मदन मध्य रऽत
लसइ॥
ईपम़ बहुरर कहईूँ ऽजयूँ जोहा। जनि बिध ऽबधि ऽबच रोऽहऽन
सोहा॥2॥
भ़ि़थग:-दफर जैसा छऽब मेरे मन में बस रहा है, ईसको कहत़
हूँ- म़नो िसंत ऊति और क़मदेि के बाच में रऽत (क़मेदि की
स्त्रा) शोऽभत हो। दफर ऄपने हृदय में खोजकर ईपम़ कहत़ हूँ
दक म़नो बिध (चंरम़ के पित्र) और चन्द्रम़ के बाच में रोऽहणा
(चन्द्रम़ की स्त्रा) सोह रहा हो॥2॥
* प्रभि पद रे ख बाच ऽबच सात़। धरऽत चरन मग चलऽत
सभात़॥
साय ऱम पद ऄंक बऱएूँ। लखन चलवह मगि द़ऽहन ल़एूँ॥3॥
भ़ि़थग:-प्रभि श्रा ऱमचन्द्रजा के (जमान पर ऄंदकत होने ि़ले
दोनों) चरण ऽचह्नों के बाच-बाच में पैर रखता हुइ सात़जा

(कहीं भगि़न के चरण ऽचह्नों पर पैर न रटक ज़ए आस ब़त
से) डरता हुईं म़गग में चल रहा हैं और लक्ष्मणजा (मय़गद़ की
रक्ष़ के ऽलए) सात़जा और श्रा ऱमचन्द्रजा दोनों के चरण
ऽचह्नों को बच़ते हुए द़ऽहने रखकर ऱसत़ चल रहे हैं॥3॥
* ऱम लखन ऽसय प्राऽत सिह़इ। बचन ऄगोचर दकऽम कऽह
ज़इ॥
खग मुग मगन देऽख छऽब होहीं। ऽलए चोरर ऽचत ऱम
बटोहीं॥4॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमजा, लक्ष्मणजा और सात़जा की सिद
ं र प्राऽत
ि़णा क़ ऽिषय नहीं है (ऄथ़गत ऄऽनिगचनाय है), ऄतः िह कै से
कहा ज़ सकता है? पक्षा और पशि भा ईस छऽब को देखकर
(प्रेम़नंद में) मग्न हो ज़ते हैं। पऽथक रूप श्रा ऱमचन्द्रजा ने
ईनके भा ऽचि चिऱ ऽलए हैं॥4॥
दोह़ :
* ऽजन्द्ह ऽजन्द्ह देखे पऽथक ऽप्रय ऽसय समेत दोई भ़आ।
भि मगि ऄगमि ऄनंद ि तेआ ऽबनि श्रम रहे ऽसऱआ॥123॥
भ़ि़थग:-प्य़रे पऽथक सात़जा सऽहत दोनों भ़आयों को ऽजन-ऽजन
लोगों ने देख़, ईन्द्होंने भि क़ ऄगम म़गग (जन्द्म-मुत्यि रूपा
संस़र में भटकने क़ भय़नक म़गग) ऽबऩ हा पररश्रम अनंद के

स़थ तय कर ऽलय़ (ऄथ़गत िे अि़गमन के चक्र से सहज हा
छी टकर मिक्त हो गए)॥123॥
चौप़इ :
* ऄजहुूँ ज़सि ईर सपनेहुूँ क़उ। बसहुूँ लखनि ऽसय ऱमि बट़उ॥
ऱम ध़म पथ प़आऽह सोइ। जो पथ प़ि कबहु मिऽन कोइ॥1॥
भ़ि़थग:-अज भा ऽजसके हृदय में सिप्न में भा कभा लक्ष्मण,
सात़, ऱम तानों बटोहा अ बसें, तो िह भा श्रा ऱमजा के
परमध़म के ईस म़गग को प़ ज़एग़, ऽजस म़गग को कभा कोइ
ऽबरले हा मिऽन प़ते हैं॥1॥
* तब रघिबार श्रऽमत ऽसय ज़ना। देऽख ऽनकट बटि सातल प़ना॥
तहूँ बऽस कं द मील फल ख़इ। प्ऱत नह़आ चले रघिऱइ॥2॥
भ़ि़थग:-तब श्रा ऱमचन्द्रजा सात़जा को थकी हुइ ज़नकर और
समाप हा एक बड क़ िुक्ष और ठं ड़ प़ना देखकर ईस ददन
िहीं ठहर गए। कन्द्द, मील, फल ख़कर (ऱत भर िह़ूँ रहकर)
प्ऱतःक़ल स्ऩन करके श्रा रघिऩथजा अगे चले॥2॥

श्रा ऱम-ि़ल्मादक संि़द
* देखत बन सर सैल सिह़ए। ब़लमादक अश्रम प्रभि अए॥
ऱम दाख मिऽन ब़सि सिह़िन। सिंदर ऽगरर क़ननि जलि प़िन॥3॥
भ़ि़थग:-सिंदर िन, त़ल़ब और पिगत देखते हुए प्रभि श्रा
ऱमचन्द्रजा ि़ल्मादकजा के अश्रम में अए। श्रा ऱमचन्द्रजा ने

देख़ दक मिऽन क़ ऽनि़स सथ़न बहुत सिंदर है, जह़ूँ सिंदर
पिगत, िन और पऽित्र जल है॥3॥
* सरऽन सरोज ऽबटप बन फी ले। गिज
ं त मंजि मधिप रस भीले॥
खग मुग ऽबपिल कोल़हल करहीं। ऽबरऽहत बैर मिददत मन
चरहीं॥4॥
भ़ि़थग:-सरोिरों में कमल और िनों में िुक्ष फी ल रहे हैं और
मकरन्द्द रस में मसत हुए भौंरे सिंदर गिंज़र कर रहे हैं। बहुत से
पक्षा और पशि कोल़हल कर रहे हैं और िैर से रऽहत होकर
प्रसन्न मन से ऽिचर रहे हैं॥4॥
दोह़ :
* सिऽच सिंदर अश्रमि ऽनरऽख हरषे ऱऽजिनेन।
सिऽन रघिबर अगमनि मिऽन अगें अयई लेन॥124॥
भ़ि़थग:-पऽित्र और सिंदर अश्रम को देखकर कमल नयन श्रा
ऱमचन्द्रजा हर्तषत हुए। रघि श्रेष्ठ श्रा ऱमजा क़ अगमन सिनकर
मिऽन ि़ल्मादकजा ईन्द्हें लेने के ऽलए अगे अए॥124॥
चौप़इ :
* मिऽन कहुूँ ऱम दंडित कीन्द्ह़। अऽसरब़दि ऽबप्रबर दान्द्ह़॥
देऽख ऱम छऽब नयन जिड़ने। करर सनम़नि अश्रमवह अने॥1॥

भ़ि़थग:-श्रा ऱमचन्द्रजा ने मिऽन को दण्डित दकय़। ऽिप्र श्रेष्ठ
मिऽन ने ईन्द्हें अशाि़गद ददय़। श्रा ऱमचन्द्रजा की छऽब देखकर
मिऽन के नेत्र शातल हो गए। सम्म़नपीिगक मिऽन ईन्द्हें अश्रम मंंं
ले अए॥1॥
* मिऽनबर ऄऽतऽथ प्ऱनऽप्रय प़ए। कं द मील फल मधिर मूँग़ए॥
ऽसय सौऽमऽत्र ऱम फल ख़ए। तब मिऽन अश्रम ददए सिह़ए॥2॥
भ़ि़थग:-श्रेष्ठ मिऽन ि़ल्मादकजा ने प्ऱणऽप्रय ऄऽतऽथयों को प़कर
ईनके ऽलए मधिर कं द, मील और फल मूँगि़ए। श्रा सात़जा,
लक्ष्मणजा और ऱमचन्द्रजा ने फलों को ख़य़। तब मिऽन ने
ईनको (ऽिश्ऱम करने के ऽलए) सिंदर सथ़न बतल़ ददए॥2॥
* ब़लमादक मन अनूँद ि भ़रा। मंगल मीरऽत नयन ऽनह़रा॥
तब कर कमल जोरर रघिऱइ। बोले बचन श्रिन सिखद़इ॥3॥
भ़ि़थग:-(मिऽन श्रा ऱमजा के प़स बैठे हैं और ईनकी) मंगल
मीर्तत को नेत्रों से देखकर ि़ल्मादकजा के मन में बड़ भ़रा
अनंद हो रह़ है। तब श्रा रघिऩथजा कमलसदुश ह़थों को
जोडकर, क़नों को सिख देने ि़ले मधिर िचन बोले-॥3॥
* तिम्ह ऽत्रक़ल दरसा मिऽनऩथ़। ऽबसि बदर ऽजऽम तिम्हरें ह़थ़

ऄस कऽह प्रभि सब कथ़ बख़ना। जेऽह जेऽह भ़ूँऽत दान्द्ह बनि
ऱना॥4॥
भ़ि़थग:-हे मिऽनऩथ! अप ऽत्रक़लदशी हैं। सम्पीणग ऽिश्व अपके
ऽलए हथेला पर रखे हुए बेर के सम़न है। प्रभि श्रा ऱमचन्द्रजा
ने ऐस़ कहकर दफर ऽजस-ऽजस प्रक़र से ऱना कै के या ने
िनि़स ददय़, िह सब कथ़ ऽिसत़र से सिऩइ॥4॥
दोह़ :
* त़त बचन पिऽन म़ति ऽहत भ़आ भरत ऄस ऱई।
मो कहुूँ दरस तिम्ह़र प्रभि सबि मम पिन्द्य प्रभ़ई॥125॥
भ़ि़थग:-(और कह़-) हे प्रभो! ऽपत़ की अज्ञ़ (क़ प़लन),
म़त़ क़ ऽहत और भरत जैसे (स्नेहा एिं धम़गत्म़) भ़इ क़
ऱज़ होऩ और दफर मिझे अपके दशगन होऩ, यह सब मेरे
पिण्यों क़ प्रभ़ि है॥125॥
चौप़इ :
* देऽख प़य मिऽनऱय तिम्ह़रे । भए सिकुत सब सिफल हम़रे ॥॥
ऄब जहूँ ऱईर अयसि होइ। मिऽन ईदबेगि न प़िै कोइ॥1॥
भ़ि़थग:-हे मिऽनऱज! अपके चरणों क़ दशगन करने से अज
हम़रे सब पिण्य सफल हो गए (हमें स़रे पिण्यों क़ फल ऽमल

गय़)। ऄब जह़ूँ अपकी अज्ञ़ हो और जह़ूँ कोइ भा मिऽन
ईिेग को प्ऱप्त न हो-॥1॥
* मिऽन त़पस ऽजन्द्ह तें दिखि लहहीं। ते नरे स ऽबनि प़िक दहहीं॥
मंगल मील ऽबप्र पररतोषी। दहआ कोरट कि ल भीसिर रोषी॥2॥
भ़ि़थग:-क्योंदक ऽजनसे मिऽन और तपसिा दिःख प़ते हैं, िे ऱज़
ऽबऩ ऄऽग्न के हा (ऄपने दिष्ट कमों से हा) जलकर भसम हो
ज़ते हैं। ब्ऱह्मणों क़ संतोष सब मंगलों की जड है और भीदि

ब्ऱह्मणों क़ क्रोध करोडों कि लों को भसम कर देत़ है॥2॥
* ऄस ऽजयूँ ज़ऽन कऽहऄ सोआ ठ़उूँ। ऽसय सौऽमऽत्र सऽहत जहूँ
ज़उूँ॥
तहूँ रऽच रुऽचर परन तुन स़ल़। ब़सि करौं कछि क़ल
कु प़ल़॥3॥
भ़ि़थग:-ऐस़ हृदय में समझकर- िह सथ़न बतल़आए जह़ूँ मैं
लक्ष्मण और सात़ सऽहत ज़उूँ और िह़ूँ सिंदर पिों और घ़स
की कि टा बऩकर, हे दय़लि! कि छ समय ऽनि़स करूूँ॥3॥
* सहज सरल सिऽन रघिबर ब़ना। स़धि स़धि बोले मिऽन ग्य़ना॥
कस न कहहु ऄस रघिकिलके ती। तिम्ह प़लक संतत श्रिऽत सेती॥4॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमजा की सहज हा सरल ि़णा सिनकर ज्ञ़ना मिऽन
ि़ल्मादक बोले- धन्द्य! धन्द्य! हे रघिकिल के ध्िज़सिरूप! अप

ऐस़ क्यों न कहेंगे? अप सदैि िेद की मय़गद़ क़ प़लन
(रक्षण) करते हैं॥4॥
छन्द्द :
* श्रिऽत सेति प़लक ऱम तिम्ह जगदास म़य़ ज़नकी।
जो सुजऽत जगि प़लऽत हरऽत रुख प़आ कु प़ऽनध़न की॥
जो सहससासि ऄहासि मऽहधरु लखनि सचऱचर धना।
सिर क़ज धरर नरऱज तनि चले दलन खल ऽनऽसचर ऄना॥
भ़ि़थग:-हे ऱम! अप िेद की मय़गद़ के रक्षक जगदाश्वर हैं और
ज़नकीजा (अपकी सिरूप भीत़) म़य़ हैं, जो कु प़ के भंड़र
अपक़ रुख प़कर जगत क़ सुजन, प़लन और संह़र करता हैं।
जो हज़र मसतक ि़ले सपों के सि़मा और पुथ्िा को ऄपने
ऽसर पर ध़रण करने ि़ले हैं, िहा चऱचर के सि़मा शेषजा
लक्ष्मण हैं। देित़ओं के क़यग के ऽलए अप ऱज़ क़ शरार
ध़रण करके दिष्ट ऱक्षसों की सेऩ क़ ऩश करने के ऽलए चले
हैं।
सोरठ़ :
* ऱम सरूप तिम्ह़र बचन ऄगोचर बिऽिपर।
ऄऽबगत ऄकथ ऄप़र नेऽत नेऽत ऽनत ऽनगम कह।126॥

भ़ि़थग:-हे ऱम! अपक़ सिरूप ि़णा के ऄगोचर, बिऽि से परे ,
ऄव्यक्त, ऄकथनाय और ऄप़र है। िेद ऽनरं तर ईसक़ 'नेऽत-नेऽत'
कहकर िणगन करते हैं॥126॥
चौप़इ :
* जगि पेखन तिम्ह देखऽनह़रे । ऽबऽध हरर संभि नच़िऽनह़रे ॥
तेई न ज़नवह मरमि तिम्ह़ऱ। औरु तिम्हऽह को ज़नऽनह़ऱ॥1॥
भ़ि़थग:-हे ऱम! जगत दुश्य है, अप ईसके देखने ि़ले हैं। अप
ब्रह्म़, ऽिष्णि और शंकर को भा नच़ने ि़ले हैं। जब िे भा
अपके ममग को नहीं ज़नते, तब और कौन अपको ज़नने ि़ल़
है?॥1॥
* सोआ ज़नआ जेऽह देहु जऩइ। ज़नत तिम्हऽह तिम्हआ होआ ज़इ॥
तिम्हररऽह कु प़ूँ तिम्हऽह रघिनंदन। ज़नवह भगत भगत ईर
चंदन॥2॥
भ़ि़थग:-िहा अपको ज़नत़ है, ऽजसे अप जऩ देते हैं और
ज़नते हा िह अपक़ हा सिरूप बन ज़त़ है। हे रघिनंदन! हे
भक्तों के हृदय को शातल करने ि़ले चंदन! अपकी हा कु प़ से
भक्त अपको ज़न प़ते हैं॥2॥
* ऽचद़नंदमय देह तिम्ह़रा। ऽबगत ऽबक़र ज़न ऄऽधक़रा॥

नर तनि धरे हु संत सिर क़ज़। कहहु करहु जस प्ऱकु त ऱज़॥3॥
भ़ि़थग:-अपकी देह ऽचद़नन्द्दमय है (यह प्रकु ऽतजन्द्य पंच
मह़भीतों की बना हुइ कमग बंधनयिक्त, ऽत्रदेह ऽिऽशष्ट म़ऽयक नहीं
है) और (ईत्पऽि-ऩश, िुऽि-क्षय अदद) सब ऽिक़रों से रऽहत है,
आस रहसय को ऄऽधक़रा पिरुष हा ज़नते हैं। अपने देित़ और
संतों के क़यग के ऽलए (ददव्य) नर शरार ध़रण दकय़ है और
प्ऱकु त (प्रकु ऽत के तत्िों से ऽनर्तमत देह ि़ले, स़ध़रण) ऱज़ओं
की तरह से कहते और करते हैं॥3॥
* ऱम देऽख सिऽन चररत तिम्ह़रे । जड मोहवह बिध होवह सिख़रे ॥
तिम्ह जो कहहु करहु सबि स़ूँच़। जस क़ऽछऄ तस च़ऽहऄ
ऩच़॥4॥
भ़ि़थग:-हे ऱम! अपके चररत्रों को देख और सिनकर मीखग लोग
तो मोह को प्ऱप्त होते हैं और ज्ञ़नाजन सिखा होते हैं। अप जो
कि छ कहते, करते हैं, िह सब सत्य (ईऽचत) हा है, क्योंदक जैस़
सि़ूँग भरे िैस़ हा ऩचऩ भा तो च़ऽहए (आस समय अप
मनिष्य रूप में हैं, ऄतः मनिष्योऽचत व्यिह़र करऩ ठाक हा
है।)॥4॥
दोह़ :
* पीूँछेहु मोऽह दक रहौं कहूँ मैं पीूँछत सकि च़ईूँ ।

जहूँ न होहु तहूँ देहु कऽह तिम्हऽह देख़िौं ठ़ईूँ ॥127॥
भ़ि़थग:-अपने मिझसे पीछ़ दक मैं कह़ूँ रहूँ? परन्द्ति मैं यह पीछते
सकि च़त़ हूँ दक जह़ूँ अप न हों, िह सथ़न बत़ दाऽजए। तब
मैं अपके रहने के ऽलए सथ़न ददख़उूँ॥127॥
चौप़इ :
* सिऽन मिऽन बचन प्रेम रस स़ने। सकि ऽच ऱम मन महुूँ
मिसिक़ने॥
ब़लमादक हूँऽस कहवह बहोरा। ब़ना मधिर ऄऽमऄ रस बोरा॥1॥
भ़ि़थग:-मिऽन के प्रेमरस से सने हुए िचन सिनकर श्रा ऱमचन्द्रजा
रहसय खिल ज़ने के डर से सकि च़कर मन में मिसकि ऱए।
ि़ल्मादकजा हूँसकर दफर ऄमुत रस में डि बोइ हुइ माठा ि़णा
बोले-॥1॥
* सिनहु ऱम ऄब कहईूँ ऽनके त़। जह़ूँ बसहु ऽसय लखन समेत़॥
ऽजन्द्ह के श्रिन समिर सम़ऩ। कथ़ तिम्ह़रर सिभग सरर
ऩऩ॥2॥
भ़ि़थग:-हे ऱमजा! सिऽनए, ऄब मैं िे सथ़न बत़त़ हूँ, जह़ूँ
अप, सात़जा और लक्ष्मणजा समेत ऽनि़स कीऽजए। ऽजनके क़न

समिर की भ़ूँऽत अपकी सिंदर कथ़ रूपा ऄनेक सिंदर नददयों से॥2॥
* भरवह ऽनरं तर होवह न पीरे। ऽतन्द्ह के ऽहय तिम्ह कहुूँ गिह रूरे ॥
लोचन च़तक ऽजन्द्ह करर ऱखे। रहवह दरस जलधर
ऄऽभल़षे॥3॥
भ़ि़थग:-ऽनरं तर भरते रहते हैं, परन्द्ति कभा पीरे (तुप्त) नहीं होते,
ईनके हृदय अपके ऽलए सिंदर घर हैं और ऽजन्द्होंने ऄपने नेत्रों
को च़तक बऩ रख़ है, जो अपके दशगन रूपा मेघ के ऽलए
सद़ ल़ल़ऽयत रहते हैं,॥3॥
* ऽनदरवह सररत वसधि सर भ़रा। रूप वबदि जल होवह सिख़रा॥
ऽतन्द्ह कें हृदय सदन सिखद़यक। बसहु बंधि ऽसय सह
रघिऩयक॥4॥
भ़ि़थग:-तथ़ जो भ़रा-भ़रा नददयों, समिरों और झालों क़
ऽनऱदर करते हैं और अपके सौंदयग (रूपा मेघ) की एक बीूँद जल
से सिखा हो ज़ते हैं (ऄथ़गत अपके ददव्य सऽच्चद़नन्द्दमय सिरूप
के दकसा एक ऄंग की जऱ सा भा झ़ूँकी के स़मने सथील, सीक्ष्म
और क़रण तानों जगत के ऄथ़गत पुथ्िा, सिगग और ब्रह्मलोक
तक के सौंदयग क़ ऽतरसक़र करते हैं), हे रघिऩथजा! ईन लोगों

के हृदय रूपा सिखद़या भिनों में अप भ़इ लक्ष्मणजा और
सात़जा सऽहत ऽनि़स कीऽजए॥4॥
दोह़ :
* जसि तिम्ह़र म़नस ऽबमल हंऽसऽन जाह़ ज़सि।
मिकत़हल गिन गन चिनआ ऱम बसहु ऽहयूँ त़सि॥128॥
भ़ि़थग:-अपके यश रूपा ऽनमगल म़नसरोिर में ऽजसकी जाभ
हंऽसना बना हुइ अपके गिण समीह रूपा मोऽतयों को चिगता
रहता है, हे ऱमजा! अप ईसके हृदय में बऽसए॥128॥
चौप़इ :
* प्रभि प्रस़द सिऽच सिभग सिब़स़। स़दर ज़सि लहआ ऽनत ऩस़॥
तिम्हऽह ऽनबेददत भोजन करहीं। प्रभि प्रस़द पट भीषन धरहीं॥1॥
भ़ि़थग:-ऽजसकी ऩऽसक़ प्रभि (अप) के पऽित्र और सिगंऽधत
(पिष्प़दद) सिंदर प्रस़द को ऽनत्य अदर के स़थ ग्रहण करता
(सीूँघता) है और जो अपको ऄपगण करके भोजन करते हैं और
अपके प्रस़द रूप हा िस्त्ऱभीषण ध़रण करते हैं,॥1॥
* सास निवह सिर गिरु ऽिज देखा। प्राऽत सऽहत करर ऽबनय
ऽबसेषा॥
कर ऽनत करवह ऱम पद पीज़। ऱम भरोस हृदयूँ नवह दीज़॥2॥

भ़ि़थग:-ऽजनके मसतक देित़, गिरु और ब्ऱह्मणों को देखकर बडा
नम्रत़ के स़थ प्रेम सऽहत झिक ज़ते हैं, ऽजनके ह़थ ऽनत्य श्रा
ऱमचन्द्रजा (अप) के चरणों की पीज़ करते हैं और ऽजनके हृदय
में श्रा ऱमचन्द्रजा (अप) क़ हा भरोस़ है, दीसऱ नहीं,॥2॥
* चरन ऱम तारथ चऽल ज़हीं। ऱम बसहु ऽतन्द्ह के मन म़हीं॥
मंत्रऱजि ऽनत जपवह तिम्ह़ऱ। पीजवह तिम्हऽह सऽहत पररि़ऱ॥3॥
भ़ि़थग:-तथ़ ऽजनके चरण श्रा ऱमचन्द्रजा (अप) के ताथों में
चलकर ज़ते हैं, हे ऱमजा! अप ईनके मन में ऽनि़स कीऽजए।
जो ऽनत्य अपके (ऱम ऩम रूप) मंत्रऱज को जपते हैं और
पररि़र (पररकर) सऽहत अपकी पीज़ करते हैं॥3॥
* तरपन होम करवह ऽबऽध ऩऩ। ऽबप्र जेि़ूँआ देवह बहु द़ऩ॥
तिम्ह तें ऄऽधक गिरऽह ऽजयूँ ज़ना। सकल भ़यूँ सेिवह
सनम़ना॥4॥
भ़ि़थग:-जो ऄनेक प्रक़र से तपगण और हिन करते हैं तथ़
ब्ऱह्मणों को भोजन कऱकर बहुत द़न देते हैं तथ़ जो गिरु को
हृदय में अपसे भा ऄऽधक (बड़) ज़नकर सिगभ़ि से सम्म़न
करके ईनकी सेि़ करते हैं,॥4॥
दोह़ :
* सबि करर म़गवह एक फलि ऱम चरन रऽत होई।

ऽतन्द्ह कें मन मंददर बसहु ऽसय रघिनंदन दोई॥129॥
भ़ि़थग:-और ये सब कमग करके सबक़ एक म़त्र यहा फल
म़ूँगते हैं दक श्रा ऱमचन्द्रजा के चरणों में हम़रा प्राऽत हो, ईन
लोगों के मन रूपा मंददरों में सात़जा और रघिकिल को अनंददत
करने ि़ले अप दोनों बऽसए॥129॥
चौप़इ :
* क़म कोह मद म़न न मोह़। लोभ न छोभ न ऱग न रोह़॥
ऽजन्द्ह कें कपट दंभ नवह म़य़। ऽतन्द्ह कें हृदय बसहु
रघिऱय़॥1॥
भ़ि़थग:-ऽजनके न तो क़म, क्रोध, मद, ऄऽभम़न और मोह हैं,
न लोभ है, न क्षोभ है, न ऱग है, न िेष है और न कपट,
दम्भ और म़य़ हा है- हे रघिऱज! अप ईनके हृदय में ऽनि़स
कीऽजए॥1॥
* सब के ऽप्रय सब के ऽहतक़रा। दिख सिख सररस प्रसंस़ ग़रा॥
कहवह सत्य ऽप्रय बचन ऽबच़रा। ज़गत सोित सरन तिम्ह़रा॥2॥
भ़ि़थग:-जो सबके ऽप्रय और सबक़ ऽहत करने ि़ले हैं, ऽजन्द्हें
दिःख और सिख तथ़ प्रशंस़ (बड़इ) और ग़ला (वनद़) सम़न

है, जो ऽिच़रकर सत्य और ऽप्रय िचन बोलते हैं तथ़ जो
ज़गते-सोते अपकी हा शरण हैं,॥2॥
* तिम्हऽह छ़ऽड गऽत दीसरर ऩहीं। ऱम बसहु ऽतन्द्ह के मन
म़हीं॥
जनना सम ज़नवह परऩरा। धनि पऱि ऽबष तें ऽबष भ़रा॥3॥
भ़ि़थग:-और अपको छोडकर ऽजनके दीसरे कोइ गऽत (अश्रय)
नहीं है, हे ऱमजा! अप ईनके मन में बऽसए। जो पऱइ स्त्रा को
जन्द्म देने ि़ला म़त़ के सम़न ज़नते हैं और पऱय़ धन ऽजन्द्हें
ऽिष से भा भ़रा ऽिष है,॥3॥
* जे हरषवह पर संपऽत देखा। दिऽखत होवह पर ऽबपऽत ऽबसेषा॥
ऽजन्द्हऽह ऱम तिम्ह प्ऱन ऽपअरे । ऽतन्द्ह के मन सिभ सदन
तिम्ह़रे ॥4॥
भ़ि़थग:-जो दीसरे की सम्पऽि देखकर हर्तषत होते हैं और दीसरे
की ऽिपऽि देखकर ऽिशेष रूप से दिःखा होते हैं और हे ऱमजा!
ऽजन्द्हें अप प्ऱणों के सम़न प्य़रे हैं, ईनके मन अपके रहने
योग्य शिभ भिन हैं॥4॥
दोह़ :
* सि़ऽम सख़ ऽपति म़ति गिर ऽजन्द्ह के सब तिम्ह त़त।

मन मंददर ऽतन्द्ह कें बसहु साय सऽहत दोई वऱ्त॥130॥
भ़ि़थग:-हे त़त! ऽजनके सि़मा, सख़, ऽपत़, म़त़ और गिरु सब
कि छ अप हा हैं, ईनके मन रूपा मंददर में सात़ सऽहत अप
दोनों भ़इ ऽनि़स कीऽजए॥130॥
चौप़इ :
* ऄिगिन तऽज सब के गिन गहहीं। ऽबप्र धेनि ऽहत संकट सहहीं॥
नाऽत ऽनपिन ऽजन्द्ह कआ जग लाक़। घर तिम्ह़र ऽतन्द्ह कर मनि
नाक़॥1॥
भ़ि़थग:-जो ऄिगिणों को छोडकर सबके गिणों को ग्रहण करते हैं,
ब्ऱह्मण और गो के ऽलए संकट सहते हैं, नाऽत-ऽनपिणत़ में
ऽजनकी जगत में मय़गद़ है, ईनक़ सिंदर मन अपक़ घर है॥1॥
* गिन तिम्ह़र समिझआ ऽनज दोस़। जेऽह सब भ़ूँऽत तिम्ह़र
भरोस़॥
ऱम भगत ऽप्रय ल़गवह जेहा। तेऽह ईर बसहु सऽहत बैदह
े ा॥2॥
भ़ि़थग:-जो गिणों को अपक़ और दोषों को ऄपऩ समझत़ है,
ऽजसे सब प्रक़र से अपक़ हा भरोस़ है और ऱम भक्त ऽजसे
प्य़रे लगते हैं, ईसके हृदय में अप सात़ सऽहत ऽनि़स
कीऽजए॥2॥

* ज़ऽत प़ूँऽत धनि धरमि बड़इ। ऽप्रय पररि़र सदन सिखद़इ॥
सब तऽज तिम्हऽह रहआ ईर ल़इ। तेऽह के हृदयूँ रहहु रघिऱइ॥3॥
भ़ि़थग:-ज़ऽत, प़ूँऽत, धन, धमग, बड़इ, प्य़ऱ पररि़र और सिख
देने ि़ल़ घर, सबको छोडकर जो के िल अपको हा हृदय में
ध़रण दकए रहत़ है, हे रघिऩथजा! अप ईसके हृदय में
रऽहए॥3॥
* सरगि नरकि ऄपबरगि सम़ऩ। जहूँ तहूँ देख धरें धनि ब़ऩ॥
करम बचन मन ऱईर चेऱ। ऱम करहु तेऽह कें ईर डेऱ॥4॥
भ़ि़थग:-सिगग, नरक और मोक्ष ऽजसकी दुऽष्ट में सम़न हैं, क्योंदक
िह जह़ूँ-तह़ूँ (सब जगह) के िल धनिष-ब़ण ध़रण दकए अपको
हा देखत़ है और जो कमग से, िचन से और मन से अपक़
द़स है, हे ऱमजा! अप ईसके हृदय में डेऱ कीऽजए॥4॥
दोह़ :
* ज़ऽह न च़ऽहऄ कबहुूँ कछि तिम्ह सन सहज सनेहु।
बसहु ऽनरं तर त़सि मन सो ऱईर ऽनज गेहु॥131॥

भ़ि़थग:-ऽजसको कभा कि छ भा नहीं च़ऽहए और ऽजसक़ अपसे
सि़भ़ऽिक प्रेम है, अप ईसके मन में ऽनरं तर ऽनि़स कीऽजए,
िह अपक़ ऄपऩ घर है॥131॥
चौप़इ :
* एऽह ऽबऽध मिऽनबर भिन देख़ए। बचन सप्रेम ऱम मन भ़ए॥
कह मिऽन सिनहु भ़निकिलऩयक। अश्रम कहईूँ समय सिखद़यक॥1॥
भ़ि़थग:-आस प्रक़र मिऽन श्रेष्ठ ि़ल्मादकजा ने श्रा ऱमचन्द्रजा को
घर ददख़ए। ईनके प्रेमपीणग िचन श्रा ऱमजा के मन को ऄच्छे
लगे। दफर मिऽन ने कह़- हे सीयगकिल के सि़मा! सिऽनए, ऄब मैं
आस समय के ऽलए सिखद़यक अश्रम कहत़ हूँ (ऽनि़स सथ़न
बतल़त़ हूँ)॥1॥
* ऽचत्रकी ट ऽगरर करहु ऽनि़सी। तहूँ तिम्ह़र सब भ़ूँऽत सिप़सी॥
सैलि सिह़िन क़नन च़रू। करर के हरर मुग ऽबहग ऽबह़रू॥2॥
भ़ि़थग:-अप ऽचत्रकी ट पिगत पर ऽनि़स कीऽजए, िह़ूँ अपके
ऽलए सब प्रक़र की सिऽिध़ है। सिह़िऩ पिगत है और सिंदर िन
है। िह ह़था, वसह, ऽहरन और पऽक्षयों क़ ऽिह़र सथल है॥2॥
* नदा पिनात पिऱन बख़ना। ऄऽत्रऽप्रय़ ऽनज तप बल अना॥
सिरसरर ध़र ऩईूँ मंद़दकऽन। जो सब प़तक पोतक ड़दकऽन॥3॥

भ़ि़थग:-िह़ूँ पऽित्र नदा है, ऽजसकी पिऱणों ने प्रशंस़ की है
और ऽजसको ऄऽत्र ऊऽष की पत्ना ऄनसिय़जा ऄपने तपोबल से
ल़इ थीं। िह गंग़जा की ध़ऱ है, ईसक़ मंद़दकना ऩम है।
िह सब प़प रूपा ब़लकों को ख़ ड़लने के ऽलए ड़दकना
(ड़यन) रूप है॥3॥
* ऄऽत्र अदद मिऽनबर बहु बसहीं। करवह जोग जप तप तन
कसहीं॥
चलहु सफल श्रम सब कर करह। ऱम देहु गौरि ऽगररबरह॥4॥
भ़ि़थग:-ऄऽत्र अदद बहुत से श्रेष्ठ मिऽन िह़ूँ ऽनि़स करते हैं, जो
योग, जप और तप करते हुए शरार को कसते हैं। हे ऱमजा!
चऽलए, सबके पररश्रम को सफल कीऽजए और पिगत श्रेष्ठ ऽचत्रकी ट
को भा गौरि दाऽजए॥4॥

ऽचत्रकी ट में ऽनि़स, कोल-भालों के ि़ऱ सेि़
दोह़ :
* ऽचत्रकी ट मऽहम़ ऄऽमत कहा मह़मिऽन ग़आ।
अआ नह़ए सररत बर ऽसय समेत दोई भ़आ॥132॥
भ़ि़थग:-मह़मिऽन ि़ल्मादकजा ने ऽचत्रकी ट की ऄपररऽमत मऽहम़
बख़न कर कहा। तब सात़जा सऽहत दोनों भ़आयों ने अकर
श्रेष्ठ नदा मंद़दकना में स्ऩन दकय़॥132॥
चौप़इ :
* रघिबर कहेई लखन भल घ़टी । करहु कतहुूँ ऄब ठ़हर ठ़टी ॥

लखन दाख पय ईतर कऱऱ। चहुूँ ददऽस दफरे ई धनिष ऽजऽम
ऩऱ॥1॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचन्द्रजा ने कह़- लक्ष्मण! बड़ ऄच्छ़ घ़ट है।
ऄब यहीं कहीं ठहरने की व्यिसथ़ करो। तब लक्ष्मणजा ने
पयऽसिना नदा के ईिर के उूँचे दकऩरे को देख़ (और कह़ दक) आसके च़रों ओर धनिष के जैस़ एक ऩल़ दफऱ हुअ है॥।1॥
* नदा पनच सर सम दम द़ऩ। सकल कलिष कऽल स़ईज
ऩऩ॥
ऽचत्रकी ट जनि ऄचल ऄहेरा। चिकआ न घ़त म़र मिठभेरा॥2॥
भ़ि़थग:-नदा (मंद़दकना) ईस धनिष की प्रत्यंच़ (डोरा) है और
शम, दम, द़न ब़ण हैं। कऽलयिग के समसत प़प ईसके ऄनेक
वहसक पशि (रूप ऽनश़ने) हैं। ऽचत्रकी ट हा म़नो ऄचल ऽशक़रा
है, ऽजसक़ ऽनश़ऩ कभा चीकत़ नहीं और जो स़मने से म़रत़
है॥2॥
* ऄस कऽह लखन ठ़ईूँ देखऱि़। थलि ऽबलोदक रघिबर सिखि
प़ि़॥
रमेई ऱम मनि देिन्द्ह ज़ऩ। चले सऽहत सिर थपऽत प्रध़ऩ॥3॥
भ़ि़थग:-ऐस़ कहकर लक्ष्मणजा ने सथ़न ददख़य़। सथ़न को
देखकर श्रा ऱमचन्द्रजा ने सिख प़य़। जब देित़ओं ने ज़ऩ दक

श्रा ऱमचन्द्रजा क़ मन यह़ूँ रम गय़, तब िे देित़ओं के
प्रध़न थिइ (मक़न बऩने ि़ले) ऽिश्वकम़ग को स़थ लेकर
चले॥3॥
* कोल दकऱत बेष सब अए। रचे परन तुन सदन सिह़ए॥
बरऽन न ज़वह मंजि दिआ स़ल़। एक लऽलत लघि एक
ऽबस़ल़॥4॥
भ़ि़थग:-सब देित़ कोल-भालों के िेष में अए और ईन्द्होंने
(ददव्य) पिों और घ़सों के सिंदर घर बऩ ददए। दो ऐसा सिंदर
कि रटय़ बऩईं ऽजनक़ िणगन नहीं हो सकत़। ईनमें एक बडा
सिंदर छोटा सा था और दीसरा बडा था॥4॥
दोह़ :
* लखन ज़नकी सऽहत प्रभि ऱजत रुऽचर ऽनके त।
सोह मदनि मिऽन बेष जनि रऽत ररतिऱज समेत॥133॥
भ़ि़थग:-लक्ष्मणजा और ज़नकीजा सऽहत प्रभि श्रा ऱमचन्द्रजा
सिंदर घ़स-पिों के घर में शोभ़यम़न हैं। म़नो क़मदेि मिऽन
क़ िेष ध़रण करके पत्ना रऽत और िसंत ऊति के स़थ
सिशोऽभत हो॥133॥

म़सप़ऱयण, सत्रहि़ूँ ऽिश्ऱम

चौप़इ :
* ऄमर ऩग ककनर ददऽसप़ल़। ऽचत्रकी ट अए तेऽह क़ल़॥
ऱम प्रऩमि कीन्द्ह सब क़ह। मिददत देि लऽह लोचन ल़ह॥1॥
भ़ि़थग:-ईस समय देित़, ऩग, दकन्नर और ददक्प़ल ऽचत्रकी ट में
अए और श्रा ऱमचन्द्रजा ने सब दकसा को प्रण़म दकय़। देित़
नेत्रों क़ ल़भ प़कर अनंददत हुए॥1॥
* बरऽष सिमन कह देि सम़जी। ऩथ सऩथ भए हम अजी॥
करर ऽबनता दिख दिसह सिऩए। हरऽषत ऽनज ऽनज सदन
ऽसध़ए॥2॥
भ़ि़थग:-फी लों की िष़ग करके देि सम़ज ने कह़- हे ऩथ! अज
(अपक़ दशगन प़कर) हम सऩथ हो गए। दफर ऽिनता करके
ईन्द्होंने ऄपने दिःसह दिःख सिऩए और (दिःखों के ऩश क़
अश्व़सन प़कर) हर्तषत होकर ऄपने-ऄपने सथ़नों को चले
गए॥2॥
* ऽचत्रकी ट रघिनंदनि छ़ए। सम़च़र सिऽन सिऽन मिऽन अए॥
अित देऽख मिददत मिऽनबुंद़। कीन्द्ह दंडित रघिकिल चंद़॥3॥

भ़ि़थग:-श्रा रघिऩथजा ऽचत्रकी ट में अ बसे हैं, यह सम़च़र सिनसिनकर बहुत से मिऽन अए। रघिकिल के चन्द्रम़ श्रा ऱमचन्द्रजा ने
मिददत हुइ मिऽन मंडला को अते देखकर दंडित प्रण़म दकय़॥3॥
* मिऽन रघिबरऽह ल़आ ईर लेहीं। सिफल होन ऽहत अऽसष देहीं॥
ऽसय सौऽमऽत्र ऱम छऽब देखवह। स़धन सकल सफल करर
लेखवह॥4॥
भ़ि़थग:-मिऽनगण श्रा ऱमजा को हृदय से लग़ लेते हैं और
सफल होने के ऽलए अशाि़गद देते हैं। िे सात़जा, लक्ष्मणजा
और श्रा ऱमचन्द्रजा की छऽब देखते हैं और ऄपने स़रे स़धनों
को सफल हुअ समझते हैं॥4॥
दोह़ :
* जथ़जोग सनम़ऽन प्रभि ऽबद़ दकए मिऽनबुंद।
करवह जोग जप ज़ग तप ऽनज अश्रमऽन्द्ह सिछंद॥134॥
भ़ि़थग:-प्रभि श्रा ऱमचन्द्रजा ने यथ़योग्य सम्म़न करके मिऽन
मंडला को ऽिद़ दकय़। (श्रा ऱमचन्द्रजा के अ ज़ने से) िे सब
ऄपने-ऄपने अश्रमों में ऄब सितंत्रत़ के स़थ योग, जप, यज्ञ
और तप करने लगे॥134॥
चौप़इ :

* यह सिऽध कोल दकऱतन्द्ह प़इ। हरषे जनि नि ऽनऽध घर अइ॥
कं द मील फल भरर भरर दोऩ। चले रं क जनि लीटन सोऩ॥1॥
भ़ि़थग:-यह (श्रा ऱमजा के अगमन क़) सम़च़र जब कोलभालों ने प़य़, तो िे ऐसे हर्तषत हुए म़नो निों ऽनऽधय़ूँ ईनके
घर हा पर अ गइ हों। िे दोनों में कं द, मील, फल भर-भरकर
चले, म़नो दररर सोऩ लीटने चले हों॥1॥
* ऽतन्द्ह महूँ ऽजन्द्ह देखे दोई वऱ्त़। ऄपर ऽतन्द्हऽह पीूँछवह मगि
ज़त़॥
कहत सिनत रघिबार ऽनक़इ। अआ सबऽन्द्ह देखे रघिऱइ॥2॥
भ़ि़थग:-ईनमें से जो दोनों भ़आयों को (पहले) देख चिके थे,
ईनसे दीसरे लोग ऱसते में ज़ते हुए पीछते हैं। आस प्रक़र श्रा
ऱमचन्द्रजा की सिद
ं रत़ कहते-सिनते सबने अकर श्रा रघिऩथजा
के दशगन दकए॥2॥
* करवह जोह़रु भेंट धरर अगे। प्रभिऽह ऽबलोकवह ऄऽत ऄनिऱगे॥
ऽचत्र ऽलखे जनि जहूँ तहूँ ठ़ढ़े। पिलक सरार नयन जल ब़ढ़े॥3॥
भ़ि़थग:-भेंट अगे रखकर िे लोग जोह़र करते हैं और ऄत्यन्द्त
ऄनिऱग के स़थ प्रभि को देखते हैं। िे मिग्ध हुए जह़ूँ के तह़ूँ

म़नो ऽचत्र ऽलखे से खडे हैं। ईनके शरार पिलदकत हैं और नेत्रों
में प्रेम़श्रिओं के जल की ब़ढ़ अ रहा है॥3॥
* ऱम सनेह मगन सब ज़ने। कऽह ऽप्रय बचन सकल सनम़ने॥
प्रभिऽह जोह़रर बहोरर बहोरा। बचन ऽबनात कहवहकर जोरा॥4॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमजा ने ईन सबको प्रेम में मग्न ज़ऩ और ऽप्रय
िचन कहकर सबक़ सम्म़न दकय़। िे ब़र-ब़र प्रभि श्रा
ऱमचन्द्रजा को जोह़र करते हुए ह़थ जोडकर ऽिनात िचन
कहते हैं-॥4॥
दोह़ :
* ऄब हम ऩथ सऩथ सब भए देऽख प्रभि प़य।
भ़ग हम़रें अगमनि ऱईर कोसलऱय॥135॥
भ़ि़थग:-हे ऩथ! प्रभि (अप) के चरणों क़ दशगन प़कर ऄब हम
सब सऩथ हो गए। हे कोसलऱज! हम़रे हा भ़ग्य से अपक़
यह़ूँ शिभ़गमन हुअ है॥135॥
चौप़इ :
* धन्द्य भीऽम बन पंथ पह़ऱ। जहूँ जहूँ ऩथ प़ई तिम्ह ध़ऱ॥
धन्द्य ऽबहग मुग क़ननच़रा। सफल जनम भए तिम्हऽह
ऽनह़रा॥1॥

भ़ि़थग:-हे ऩथ! जह़ूँ-जह़ूँ अपने ऄपने चरण रखे हैं, िे पुथ्िा,
िन, म़गग और पह़ड धन्द्य हैं, िे िन में ऽिचरने ि़ले पक्षा
और पशि धन्द्य हैं, जो अपको देखकर सफल जन्द्म हो गए॥1॥
* हम सब धन्द्य सऽहत पररि़ऱ। दाख दरसि भरर नयन
तिम्ह़ऱ॥
कीन्द्ह ब़सि भल ठ़ईूँ ऽबच़रा। आह़ूँ सकल ररति रहब सिख़रा॥2॥
भ़ि़थग:-हम सब भा ऄपने पररि़र सऽहत धन्द्य हैं, ऽजन्द्होंने नेत्र
भरकर अपक़ दशगन दकय़। अपने बडा ऄच्छा जगह ऽिच़रकर
ऽनि़स दकय़ है। यह़ूँ सभा ऊतिओं में अप सिखा रऽहएग़॥2॥
* हम सब भ़ूँऽत करब सेिक़इ। करर के हरर ऄऽह ब़घ बऱइ॥
बन बेहड ऽगरर कं दर खोह़। सब हम़र प्रभि पग पग जोह़॥3॥
भ़ि़थग:-हम लोग सब प्रक़र से ह़था, वसह, सपग और ब़घों से
बच़कर अपकी सेि़ करें गे। हे प्रभो! यह़ूँ के बाहड िन, पह़ड,
गिफ़एूँ और खोह (दरे ) सब पग-पग हम़रे देखे हुए हैं॥3॥
* तहूँ तहूँ तिम्हऽह ऄहेर खेल़ईब। सर ऽनरझर जलठ़ईूँ देख़ईब॥
हम सेिक पररि़र समेत़। ऩथ न सकि चब अयसि देत़॥4॥

भ़ि़थग:-हम िह़ूँ-िह़ूँ (ईन-ईन सथ़नों में) अपको ऽशक़र
ऽखल़एूँगे और त़ल़ब, झरने अदद जल़शयों को ददख़एूँगे। हम
कि टि म्ब समेत अपके सेिक हैं। हे ऩथ! आसऽलए हमें अज्ञ़ देने में
संकोच न कीऽजए॥4॥
दोह़ :
* बेद बचन मिऽन मन ऄगम ते प्रभि करुऩ ऐन।
बचन दकऱतन्द्ह के सिनत ऽजऽम ऽपति ब़लक बैन॥136॥
भ़ि़थग:-जो िेदों के िचन और मिऽनयों के मन को भा ऄगम हैं,
िे करुण़ के ध़म प्रभि श्रा ऱमचन्द्रजा भालों के िचन आस तरह
सिन रहे हैं, जैसे ऽपत़ ब़लकों के िचन सिनत़ है॥136॥
चौप़इ :
* ऱमऽह के िल प्रेमि ऽपअऱ। ज़ऽन लेई जो ज़न ऽनह़ऱ॥
ऱम सकल बनचर तब तोषे। कऽह मुद ि बचन प्रेम पररपोषे॥1॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचन्द्रजा को के िल प्रेम प्य़ऱ है, जो ज़नने
ि़ल़ हो (ज़नऩ च़हत़ हो), िह ज़न ले। तब श्रा ऱमचन्द्रजा
ने प्रेम से पररपिष्ट हुए (प्रेमपीणग) कोमल िचन कहकर ईन सब
िन में ऽिचरण करने ि़ले लोगों को संतिष्ट दकय़॥1॥
* ऽबद़ दकए ऽसर ऩआ ऽसध़ए। प्रभि गिन कहत सिनत घर अए॥

एऽह ऽबऽध ऽसय समेत दोई भ़इ। बसवह ऽबऽपन सिर मिऽन
सिखद़इ॥2॥
भ़ि़थग:-दफर ईनको ऽिद़ दकय़। िे ऽसर नि़कर चले और प्रभि
के गिण कहते-सिनते घर अए। आस प्रक़र देित़ और मिऽनयों को
सिख देने ि़ले दोनों भ़इ सात़जा समेत िन में ऽनि़स करने
लगे॥2॥
* जब तें अआ रहे रघिऩयकि । तब तें भयई बनि मंगलद़यकि ॥
फी लवह फलवह ऽबटप ऽबऽध ऩऩ। मंजि बऽलत बर बेऽल
ऽबत़ऩ॥3॥
भ़ि़थग:-जब से श्रा रघिऩथजा िन में अकर रहे तब से िन
मंगलद़यक हो गय़। ऄनेक प्रक़र के िुक्ष फी लते और फलते हैं
और ईन पर ऽलपटा हुइ सिद
ं र बेलों के मंडप तने हैं॥3॥
* सिरतरु सररस सिभ़यूँ सिह़ए। मनहुूँ ऽबबिध बन पररहरर अए॥
गिंज मंजितर मधिकर श्रेना। ऽत्रऽबध बय़रर बहआ सिख देना॥4॥
भ़ि़थग:-िे कल्पिुक्ष के सम़न सि़भ़ऽिक हा सिंदर हैं। म़नो िे
देित़ओं के िन (नंदन िन) को छोडकर अए हों। भौंरों की
पंऽक्तय़ूँ बहुत हा सिंदर गिंज़र करता हैं और सिख देने ि़ला
शातल, मंद, सिगंऽधत हि़ चलता रहता है॥4॥
दोह़ :

* नालकं ठ कलकं ठ सिक च़तक चक्क चकोर।
भ़ूँऽत भ़ूँऽत बोलवह ऽबहग श्रिन सिखद ऽचत चोर॥137॥
भ़ि़थग:-नालकं ठ, कोयल, तोते, पपाहे, चकिे और चकोर अदद
पक्षा क़नों को सिख देने ि़ला और ऽचि को चिऱने ि़ला तरहतरह की बोऽलय़ूँ बोलते हैं॥137॥
चौप़इ :
* करर के हरर कऽप कोल कि रं ग़। ऽबगतबैर ऽबचरवह सब संग़॥
दफरत ऄहेर ऱम छऽब देखा। होवह मिददत मुग बुंद ऽबसेषा॥1॥
भ़ि़थग:-ह़था, वसह, बंदर, सीऄर और ऽहरन, ये सब िैर छोडकर
स़थ-स़थ ऽिचरते हैं। ऽशक़र के ऽलए दफरते हुए श्रा
ऱमचन्द्रजा की छऽब को देखकर पशिओं के समीह ऽिशेष अनंददत
होते हैं॥1॥
* ऽबबिध ऽबऽपन जहूँ लऽग जग म़हीं। देऽख ऱमबनि सकल
ऽसह़हीं॥
सिरसरर सरसआ ददनकर कन्द्य़। मेकलसित़ गोद़िरर धन्द्य़॥2॥
भ़ि़थग:-जगत में जह़ूँ तक (ऽजतने) देित़ओं के िन हैं, सब श्रा
ऱमजा के िन को देखकर ऽसह़ते हैं, गंग़, सरसिता, सीयगकिम़रा
यमिऩ, नमगद़, गोद़िरा अदद धन्द्य (पिण्यमया) नददय़ूँ,॥2॥

* सब सर वसधि नदीं नद ऩऩ। मंद़दकऽन कर करवह बख़ऩ॥
ईदय ऄसत ऽगरर ऄरु कै ल़सी। मंदर मेरु सकल सिरब़सी॥3॥
भ़ि़थग:-स़रे त़ल़ब, समिर, नदा और ऄनेकों नद सब मंद़दकना
की बड़इ करते हैं। ईदय़चल, ऄसत़चल, कै ल़स, मंदऱचल और
सिमेरु अदद सब, जो देित़ओं के रहने के सथ़न हैं,॥3॥
* सैल ऽहम़चल अददक जेते। ऽचत्रकी ट जसि ग़िवह तेते॥
वबऽध मिददत मन सिखि न सम़इ। श्रम ऽबनि ऽबपिल बड़इ
प़इ॥4॥
भ़ि़थग:-और ऽहम़लय अदद ऽजतने पिगत हैं, सभा ऽचत्रकी ट क़
यश ग़ते हैं। ऽिन्द्ध्य़चल बड़ अनंददत है, ईसके मन में सिख
सम़त़ नहीं, क्योंदक ईसने ऽबऩ पररश्रम हा बहुत बडा बड़इ
प़ ला है॥4॥
दोह़ :
* ऽचत्रकी ट के ऽबहग मुग बेऽल ऽबटप तुन ज़ऽत।
पिन्द्य पिंज सब धन्द्य ऄस कहवह देि ददन ऱऽत॥138॥

भ़ि़थग:-ऽचत्रकी ट के पक्षा, पशि, बेल, िुक्ष, तुण-ऄंकिऱदद की सभा
ज़ऽतय़ूँ पिण्य की ऱऽश हैं और धन्द्य हैं- देित़ ददन-ऱत ऐस़
कहते हैं॥138॥
चौप़इ :
* नयनिंत रघिबरऽह ऽबलोकी। प़आ जनम फल होवह ऽबसोकी॥
परऽस चरन रज ऄचर सिख़रा। भए परम पद के ऄऽधक़रा॥1॥
भ़ि़थग:-अूँखों ि़ले जाि श्रा ऱमचन्द्रजा को देखकर जन्द्म क़
फल प़कर शोकरऽहत हो ज़ते हैं और ऄचर (पिगत, िुक्ष, भीऽम,
नदा अदद) भगि़न की चरण रज क़ सपशग प़कर सिखा होते
हैं। यों सभा परम पद (मोक्ष) के ऄऽधक़रा हो गए॥1॥
* सो बनि सैलि सिभ़यूँ सिह़िन। मंगलमय ऄऽत प़िन प़िन॥
मऽहम़ कऽहऄ किऽन ऽबऽध त़सी। सिखस़गर जहूँ कीन्द्ह
ऽनि़सी॥2॥
भ़ि़थग:-िह िन और पिगत सि़भ़ऽिक हा सिंदर, मंगलमय और
ऄत्यन्द्त पऽित्रों को भा पऽित्र करने ि़ल़ है। ईसकी मऽहम़
दकस प्रक़र कहा ज़ए, जह़ूँ सिख के समिर श्रा ऱमजा ने
ऽनि़स दकय़ है॥2॥

* पय पयोऽध तऽज ऄिध ऽबह़इ। जहूँ ऽसय लखनि ऱमि रहे
अइ॥
कऽह न सकवह सिषम़ जऽस क़नन। जौं सत सहस होवह
सहस़नन॥3॥
भ़ि़थग:-क्षार स़गर को त्य़गकर और ऄयोध्य़ को छोडकर जह़ूँ
सात़जा, लक्ष्मणजा और श्रा ऱमचन्द्रजा अकर रहे, ईस िन की
जैसा परम शोभ़ है, ईसको हज़र मिख ि़ले जो ल़ख शेषजा
हों तो िे भा नहीं कह सकते॥3॥
* सो मैं बरऽन कहौं ऽबऽध के हीं। ड़बर कमठ दक मंदर लेहीं॥
सेिवह लखनि करम मन ब़ना। ज़आ न सालि सनेहु बख़ना॥4॥
भ़ि़थग:-ईसे भल़, मैं दकस प्रक़र से िणगन करके कह सकत़ हूँ।
कहीं पोखरे क़ (क्षिर) कछि अ भा मंदऱचल ईठ़ सकत़ है?
लक्ष्मणजा मन, िचन और कमग से श्रा ऱमचन्द्रजा की सेि़ करते
हैं। ईनके शाल और स्नेह क़ िणगन नहीं दकय़ ज़ सकत़॥4॥
दोह़ :
* ऽछनि ऽछनि लऽख ऽसय ऱम पद ज़ऽन अपि पर नेहु।
करत न सपनेहुूँ लखनि ऽचति बंधि म़ति ऽपति गेहु॥139॥

भ़ि़थग:-क्षण-क्षण पर श्रा सात़-ऱमजा के चरणों को देखकर
और ऄपने उपर ईनक़ स्नेह ज़नकर लक्ष्मणजा सिप्न में भा
भ़आयों, म़त़-ऽपत़ और घर की य़द नहीं करते॥139॥
चौप़इ :
* ऱम संग ऽसय रहऽत सिख़रा। पिर पररजन गुह सिरऽत ऽबस़रा॥
ऽछनि ऽछनि ऽपय ऽबधि बदनि ऽनह़रा। प्रमिददत मनहुूँ चकोर
कि म़रा॥1॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचन्द्रजा के स़थ सात़जा ऄयोध्य़पिरा, कि टि म्ब के
लोग और घर की य़द भीलकर बहुत हा सिखा रहता हैं। क्षणक्षण पर पऽत श्रा ऱमचन्द्रजा के चन्द्रम़ के सम़न मिख को
देखकर िे िैसे हा परम प्रसन्न रहता हैं, जैसे चकोर कि म़रा
(चकोरा) चन्द्रम़ को देखकर !॥1॥
* ऩह नेहु ऽनत बढ़त ऽबलोकी। हरऽषत रहऽत ददिस ऽजऽम
कोकी॥
ऽसय मनि ऱम चरन ऄनिऱग़। ऄिध सहस सम बनि ऽप्रय
ल़ग़॥2॥
भ़ि़थग:-सि़मा क़ प्रेम ऄपने प्रऽत ऽनत्य बढ़त़ हुअ देखकर
सात़जा ऐसा हर्तषत रहता हैं, जैसे ददन में चकिा! सात़जा क़

मन श्रा ऱमचन्द्रजा के चरणों में ऄनिरक्त है, आससे ईनको िन
हज़रों ऄिध के सम़न ऽप्रय लगत़ है॥2॥
* परनकि टा ऽप्रय ऽप्रयतम संग़। ऽप्रय पररि़रु कि रं ग ऽबहंग़॥
स़सि ससिर सम मिऽनऽतय मिऽनबर। ऄसनि ऄऽमऄ सम कं द मील
फर॥3॥
भ़ि़थग:-ऽप्रयतम (श्रा ऱमचन्द्रजा) के स़थ पणगकिटा प्य़रा लगता
है। मुग और पक्षा प्य़रे कि टि ऽम्बयों के सम़न लगते हैं। मिऽनयों
की ऽस्त्रय़ूँ स़स के सम़न, श्रेष्ठ मिऽन ससिर के सम़न और कं दमील-फलों क़ अह़र ईनको ऄमुत के सम़न लगत़ है॥3॥
* ऩथ स़थ स़ूँथरा सिह़इ। मयन सयन सय सम सिखद़इ॥
लोकप होवह ऽबलोकत ज़सी। तेऽह दक मोऽह सक ऽबषय
ऽबल़सी॥4॥
भ़ि़थग:-सि़मा के स़थ सिंदर स़थरा (कि श और पिों की सेज)
सैकडों क़मदेि की सेजों के सम़न सिख देने ि़ला है। ऽजनके
(कु प़पीिगक) देखने म़त्र से जाि लोकप़ल हो ज़ते हैं, ईनको
कहीं भोग-ऽिल़स मोऽहत कर सकते हैं!॥4॥
दोह़ :
* सिऽमरत ऱमऽह तजवह जन तुन सम ऽबषय ऽबल़सि।

ऱमऽप्रय़ जग जनऽन ऽसय कछि न अचरजि त़सि॥140॥
भ़ि़थग:-ऽजन श्रा ऱमचन्द्रजा क़ समरण करने से हा भक्तजन
तम़म भोग-ऽिल़स को ऽतनके के सम़न त्य़ग देते हैं, ईन श्रा
ऱमचन्द्रजा की ऽप्रय पत्ना और जगत की म़त़ सात़जा के ऽलए
यह (भोग-ऽिल़स क़ त्य़ग) कि छ भा अश्चयग नहीं है॥140॥
चौप़इ :
* साय लखन जेऽह ऽबऽध सिखि लहहीं। सोआ रघिऩथ करवह सोआ
कहहीं॥
कहवह पिऱतन कथ़ कह़ना। सिनवह लखनि ऽसय ऄऽत सिखि
म़ना॥1॥
भ़ि़थग:-सात़जा और लक्ष्मणजा को ऽजस प्रक़र सिख ऽमले, श्रा
रघिऩथजा िहा करते और िहा कहते हैं। भगि़न प्ऱचान कथ़एूँ
और कह़ऽनय़ूँ कहते हैं और लक्ष्मणजा तथ़ सात़जा ऄत्यन्द्त
सिख म़नकर सिनते हैं॥1॥
* जब जब ऱमि ऄिध सिऽध करहीं। तब तब ब़रर ऽबलोचन
भरहीं॥
सिऽमरर म़ति ऽपति पररजन भ़इ। भरत सनेहु सालि सेिक़इ॥2॥
भ़ि़थग:-जब-जब श्रा ऱमचन्द्रजा ऄयोध्य़ की य़द करते हैं, तबतब ईनके नेत्रों में जल भर अत़ है। म़त़-ऽपत़, कि टि ऽम्बयों और

भ़आयों तथ़ भरत के प्रेम, शाल और सेि़भ़ि को य़द करके ॥2॥
* कु प़वसधि प्रभि होवह दिख़रा। धारजि धरवह कि समई ऽबच़रा॥
लऽख ऽसय लखनि ऽबकल होआ ज़हीं। ऽजऽम पिरुषऽह ऄनिसर
पररछ़हीं॥3॥
भ़ि़थग:-कु प़ के समिर प्रभि श्रा ऱमचन्द्रजा दिःखा हो ज़ते हैं,
दकन्द्ति दफर कि समय समझकर धारज ध़रण कर लेते हैं। श्रा
ऱमचन्द्रजा को दिःखा देखकर सात़जा और लक्ष्मणजा भा
व्य़कि ल हो ज़ते हैं, जैसे दकसा मनिष्य की परछ़हीं ईस मनिष्य
के सम़न हा चेष्ट़ करता है॥3॥
* ऽप्रय़ बंधि गऽत लऽख रघिनंदनि। धार कु प़ल भगत ईर चंदनि॥
लगे कहन कछि कथ़ पिनात़। सिऽन सिखि लहवह लखनि ऄरु
सात़॥4॥
भ़ि़थग:-तब धार, कु प़लि और भक्तों के हृदयों को शातल करने
के ऽलए चंदन रूप रघिकिल को अनंददत करने ि़ले श्रा
ऱमचन्द्रजा प्य़रा पत्ना और भ़इ लक्ष्मण की दश़ देखकर कि छ
पऽित्र कथ़एूँ कहने लगते हैं, ऽजन्द्हें सिनकर लक्ष्मणजा और
सात़जा सिख प्ऱप्त करते हैं॥4॥
दोह़ :

* ऱमि लखन सात़ सऽहत सोहत परन ऽनके त।
ऽजऽम ब़सि बस ऄमरपिर सचा जयंत समेत॥141॥
भ़ि़थग:-लक्ष्मणजा और सात़जा सऽहत श्रा ऱमचन्द्रजा पणगकिटा
में ऐसे सिशोऽभत हैं, जैसे ऄमऱिता में आन्द्र ऄपना पत्ना शचा
और पित्र जयंत सऽहत बसत़ है॥141॥
चौप़इ :
* जोगिवह प्रभिऽसय लखनऽह कै सें। पलक ऽबलोचन गोलक जैसें॥
सेिवह लखनि साय रघिबारऽह। ऽजऽम ऄऽबबेकी पिरुष सरारऽह॥1॥
भ़ि़थग:-प्रभि श्रा ऱमचन्द्रजा सात़जा और लक्ष्मणजा की कै सा
सूँभ़ल रखते हैं, जैसे पलकें नेत्रों के गोलकों की। आधर लक्ष्मणजा
श्रा सात़जा और श्रा ऱमचन्द्रजा की (ऄथि़ लक्ष्मणजा और
सात़जा श्रा ऱमचन्द्रजा की) ऐसा सेि़ करते हैं, जैसे ऄज्ञ़ना
मनिष्य शरार की करते हैं॥1॥
* एऽह ऽबऽध प्रभि बन बसवह सिख़रा। खग मुग सिर त़पस
ऽहतक़रा॥
कहेईूँ ऱम बन गिनि सिह़ि़। सिनहु सिमंत्र ऄिध ऽजऽम अि़॥2॥
भ़ि़थग:-पक्षा, पशि, देित़ और तपऽसियों के ऽहतक़रा प्रभि आस
प्रक़र सिखपीिगक िन में ऽनि़स कर रहे हैं। तिलसाद़सजा कहते

हैं- मैंने श्रा ऱमचन्द्रजा क़ सिंदर िनगमन कह़। ऄब ऽजस तरह
सिमन्द्त्र ऄयोध्य़ में अए िह (कथ़) सिनो॥2॥
* दफरे ई ऽनष़दि प्रभिऽह पहुूँच़इ। सऽचि सऽहत रथ देखेऽस अइ॥
मंत्रा ऽबकल ऽबलोदक ऽनष़दी। कऽह न ज़आ जस भयई
ऽबष़दी॥3॥
भ़ि़थग:-प्रभि श्रा ऱमचन्द्रजा को पहुूँच़कर जब ऽनष़दऱज लौट़,
तब अकर ईसने रथ को मंत्रा (सिमंत्र) सऽहत देख़। मंत्रा को
व्य़कि ल देखकर ऽनष़द को जैस़ दिःख हुअ, िह कह़ नहीं
ज़त़॥3॥
* ऱम ऱम ऽसय लखन पिक़रा। परे ई धरऽनतल ब्य़कि ल भ़रा॥
देऽख दऽखन ददऽस हय ऽहऽहऩहीं। जनि ऽबनि पंख ऽबहग
ऄकि ल़हीं॥4॥
भ़ि़थग:-(ऽनष़द को ऄके ले अय़ देखकर) सिमंत्र ह़ ऱम! ह़
ऱम! ह़ साते! ह़ लक्ष्मण! पिक़रते हुए, बहुत व्य़कि ल होकर
धरता पर ऽगर पडे। (रथ के ) घोडे दऽक्षण ददश़ की ओर (ऽजधर
श्रा ऱमचन्द्रजा गए थे) देख-देखकर ऽहनऽहऩते हैं। म़नो ऽबऩ
पंख के पक्षा व्य़कि ल हो रहे हों॥4॥
दोह़ :
* नवह तुन चरवह न ऽपऄवह जलि मोचवह लोचन ब़रर।

ब्य़कि ल भए ऽनष़द सब रघिबर ब़ऽज ऽनह़रर॥142॥
भ़ि़थग:-िे न तो घ़स चरते हैं, न प़ना पाते हैं। के िल अूँखों
से जल बह़ रहे हैं। श्रा ऱमचन्द्रजा के घोडों को आस दश़ में
देखकर सब ऽनष़द व्य़कि ल हो गए॥142॥
चौप़इ :
* धरर धारजि तब कहआ ऽनष़दी। ऄब सिमंत्र पररहरहु ऽबष़दी॥
तिम्ह पंऽडत परम़रथ ग्य़त़। धरहु धार लऽख ऽबमिख
ऽबध़त़॥1॥
भ़ि़थग:-तब धारज धरकर ऽनष़दऱज कहने लग़- हे सिमंत्रजा!
ऄब ऽिष़द को छोऽडए। अप पंऽडत और परम़थग के ज़नने
ि़ले हैं। ऽिध़त़ को प्रऽतकी ल ज़नकर धैयग ध़रण कीऽजए॥1॥
* ऽबऽबऽध कथ़ कऽह कऽह मुद ि ब़ना। रथ बैठ़रे ई बरबस अना॥
सोक ऽसऽथल रथि सकआ न ह़ूँकी। रघिबर ऽबरह पार ईर
ब़ूँकी॥2॥
भ़ि़थग:-कोमल ि़णा से भ़ूँऽत-भ़ूँऽत की कथ़एूँ कहकर ऽनष़द
ने जबदगसता ल़कर सिमंत्र को रथ पर बैठ़य़, परन्द्ति शोक के
म़रे िे आतने ऽशऽथल हो गए दक रथ को ह़ूँक नहीं सकते।
ईनके हृदय में श्रा ऱमचन्द्रजा के ऽिरह की बडा ताव्र िेदऩ
है॥2॥

* चरफऱवह मग चलवह न घोरे । बन मुग मनहुूँ अऽन रथ जोरे ॥
ऄढ़़ुदक परवह दफरर हेरवह पाछें। ऱम ऽबयोऽग ऽबकल दिख
ताछें॥3॥
भ़ि़थग:-घोडे तडफड़ते हैं और (ठाक) ऱसते पर नहीं चलते।
म़नो जंगला पशि ल़कर रथ में जोत ददए गए हों। िे श्रा
ऱमचन्द्रजा के ऽियोगा घोडे कभा ठोकर ख़कर ऽगर पडते हैं,
कभा घीमकर पाछे की ओर देखने लगते हैं। िे ताक्ष्ण दिःख से
व्य़कि ल हैं॥3॥
*जो कह ऱमि लखनि बैदह
े ा। वहकरर वहकरर ऽहत हेरवह तेहा॥
ब़ऽज ऽबरह गऽत कऽह दकऽम ज़ता। ऽबनि मऽन फऽनक ऽबकल
जेवह भ़ूँता॥4॥
भ़ि़थग:-जो कोइ ऱम, लक्ष्मण य़ ज़नकी क़ ऩम ले लेत़ है,
घोडे ऽहकर-ऽहकरकर ईसकी ओर प्य़र से देखने लगते हैं। घोडों
की ऽिरह दश़ कै से कहा ज़ सकता है? िे ऐसे व्य़कि ल हैं, जैसे
मऽण के ऽबऩ स़ूँप व्य़कि ल होत़ है॥4॥

सिमन्द्त्र क़ ऄयोध्य़ को लौटऩ और सिगत्र शोक देखऩ
दोह़ :
* भयई ऽनष़दि ऽबष़दबस देखत सऽचि तिरंग।
बोऽल सिसेिक च़रर तब ददए स़रथा संग॥143॥
भ़ि़थग:-मंत्रा और घोडों की यह दश़ देखकर ऽनष़दऱज ऽिष़द
के िश हो गय़। तब ईसने ऄपने च़र ईिम सेिक बिल़कर
स़रथा के स़थ कर ददए॥143॥
चौप़इ :

* गिह स़रऽथऽह दफरे ई पहुूँच़इ। ऽबरहु ऽबष़दि बरऽन नवह ज़इ॥
चले ऄिध लेआ रथऽह ऽनष़द़। होवह छनवह छन मगन
ऽबष़द़॥1॥
भ़ि़थग:-ऽनष़दऱज गिह स़रथा (सिमंत्रजा) को पहुूँच़कर (ऽिद़
करके ) लौट़। ईसके ऽिरह और दिःख क़ िणगन नहीं दकय़ ज़
सकत़। िे च़रों ऽनष़द रथ लेकर ऄिध को चले। (सिमंत्र और
घोडों को देख-देखकर) िे भा क्षण-क्षणभर ऽिष़द में डी बे ज़ते
थे॥1॥
* सोच सिमंत्र ऽबकल दिख दाऩ। ऽधग जािन रघिबार ऽबहाऩ॥
रऽहऽह न ऄंतहुूँ ऄधम सरारू। जसि न लहेई ऽबछि रत रघिबारू॥2॥
भ़ि़थग:-व्य़कि ल और दिःख से दान हुए सिमंत्रजा सोचते हैं दक
श्रा रघििार के ऽबऩ जाऩ ऽधक्क़र है। अऽखर यह ऄधम शरार
रहेग़ तो है हा नहीं। ऄभा श्रा ऱमचन्द्रजा के ऽबछि डते हा
छी टकर आसने यश (क्यों) नहीं ले ऽलय़॥2॥
* भए ऄजस ऄघ भ़जन प्ऱऩ। किन हेति नवह करत पय़ऩ॥
ऄहह मंद मनि ऄिसर चीक़। ऄजहुूँ न हृदय होत दिआ टी क़॥3॥
भ़ि़थग:-ये प्ऱण ऄपयश और प़प के भ़ूँडे हो गए। ऄब ये दकस
क़रण की च नहीं करते (ऽनकलते नहीं)? ह़य! नाच मन (बड़

ऄच्छ़) मौक़ चीक गय़। ऄब भा तो हृदय के दो टि कडे नहीं हो
ज़ते!॥3॥
* माऽज ह़थ ऽसरु धिऽन पऽछत़इ। मनहुूँ कु पन धन ऱऽस गि़ूँइ॥
ऽबररद ब़ूँऽध बर बारु कह़इ। चलेई समर जनि सिभट पऱइ॥4॥
भ़ि़थग:-सिमंत्र ह़थ मल-मलकर और ऽसर पाट-पाटकर पछत़ते
हैं। म़नो कोइ कं जीस धन क़ खज़ऩ खो बैठ़ हो। िे आस
प्रक़र चले म़नो कोइ बड़ योि़ िार क़ ब़ऩ पहनकर और
ईिम शीरिार कहल़कर यिि से भ़ग चल़ हो!॥4॥
दोह़ :
* ऽबप्र ऽबबेकी बेदऽबद संमत स़धि सिज़ऽत।
ऽजऽम धोखें मदप़न कर सऽचि सोच तेऽह भ़ूँऽत॥144॥
भ़ि़थग:-जैसे कोइ ऽििेकशाल, िेद क़ ज्ञ़त़, स़धिसम्मत
अचरणों ि़ल़ और ईिम ज़ऽत क़ (कि लान) ब्ऱह्मण धोखे से
मददऱ पा ले और पाछे पछत़िे, ईसा प्रक़र मंत्रा सिमंत्र सोच
कर रहे (पछत़ रहे) हैं॥144॥
चौप़इ :
* ऽजऽम कि लान ऽतय स़धि सय़ना। पऽतदेित़ करम मन ब़ना॥
रहै करम बस पररहरर ऩह। सऽचि हृदयूँ ऽतऽम द़रुन द़ह॥1॥

भ़ि़थग:-जैसे दकसा ईिम कि लि़ला, स़धि सि़भ़ि की, समझद़र
और मन, िचन, कमग से पऽत को हा देित़ म़नने ि़ला
पऽतव्रत़ स्त्रा को भ़ग्यिश पऽत को छोडकर (पऽत से ऄलग)
रहऩ पडे, ईस समय ईसके हृदय में जैसे भय़नक संत़प होत़
है, िैसे हा मंत्रा के हृदय में हो रह़ है॥1॥
* लोचन सजल डारठ भआ थोरा। सिनआ न श्रिन ऽबकल मऽत
भोरा॥
सीखवह ऄधर ल़ऽग मिहूँ ल़टा। ऽजई न ज़आ ईर ऄिऽध
कप़टा॥2॥
भ़ि़थग:-नेत्रों में जल भऱ है, दुऽष्ट मंद हो गइ है। क़नों से
सिऩइ नहीं पडत़, व्य़कि ल हुइ बिऽि बेरठक़ने हो रहा है। होठ
सीख रहे हैं, मिूँह में ल़टा लग गइ है, दकन्द्ति (ये सब मुत्यि के
लक्षण हो ज़ने पर भा) प्ऱण नहीं ऽनकलते, क्योंदक हृदय में
ऄिऽध रूपा दकि़ड लगे हैं (ऄथ़गत चौदह िषग बात ज़ने पर
भगि़न दफर ऽमलेंगे, यहा अश़ रुक़िट ड़ल रहा है)॥2॥
* ऽबबरन भयई न ज़आ ऽनह़रा। म़रे ऽस मनहुूँ ऽपत़ महत़रा॥
ह़ऽन गल़ऽन ऽबपिल मन ब्य़पा। जमपिर पंथ सोच ऽजऽम
प़पा॥3॥

भ़ि़थग:-सिमंत्रजा के मिख क़ रं ग बदल गय़ है, जो देख़ नहीं
ज़त़। ऐस़ म़लीम होत़ है म़नो आन्द्होंने म़त़-ऽपत़ को म़र
ड़ल़ हो। ईनके मन में ऱमऽियोग रूपा ह़ऽन की मह़न ग्ल़ऽन
(पाड़) छ़ रहा है, जैसे कोइ प़पा मनिष्य नरक को ज़त़ हुअ
ऱसते में सोच कर रह़ हो॥3॥
* बचनि न अि हृदयूँ पऽछत़इ। ऄिध क़ह मैं देखब ज़इ॥
ऱम रऽहत रथ देऽखऽह जोइ। सकि ऽचऽह मोऽह ऽबलोकत सोइ॥4॥
भ़ि़थग:-मिूँह से िचन नहीं ऽनकलते। हृदय में पछत़ते हैं दक मैं
ऄयोध्य़ में ज़कर क्य़ देखीूँग़? श्रा ऱमचन्द्रजा से शीन्द्य रथ को
जो भा देखेग़, िहा मिझे देखने में संकोच करे ग़ (ऄथ़गत मेऱ
मिूँह नहीं देखऩ च़हेग़)॥4॥
दोह़ :
* ध़आ पीूँऽछहवह मोऽह जब ऽबकल नगर नर ऩरर।
ईतरु देब मैं सबऽह तब हृदयूँ बज्रि बैठ़रर॥145॥
भ़ि़थग:-नगर के सब व्य़कि ल स्त्रा-पिरुष जब दौडकर मिझसे पीछेंग,े
तब मैं हृदय पर िज्र रखकर सबको ईिर दीग
ूँ ़॥145॥
चौप़इ :

* पिऽछहवह दान दिऽखत सब म़त़। कहब क़ह मैं ऽतन्द्हऽह
ऽबध़त़।
पीऽछऽह जबवह लखन महत़रा। कऽहहईूँ किन सूँदस
े सिख़रा॥1॥
भ़ि़थग:-जब दान-दिःखा सब म़त़एूँ पीछेंगा, तब हे ऽिध़त़! मैं
ईन्द्हें क्य़ कहूँग़? जब लक्ष्मणजा की म़त़ मिझसे पीछेंगा, तब मैं
ईन्द्हें कौन स़ सिखद़या सूँदस
े ़ कहूँग़?॥1॥
* ऱम जनऽन जब अआऽह ध़इ। सिऽमरर बच्छि ऽजऽम धेनि लि़इ॥
पीूँछत ईतरु देब मैं तेहा। गे बनि ऱम लखनि बैदह
े ा॥2॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमजा की म़त़ जब आस प्रक़र दौडा अिेंगा जैसे
नइ ब्य़या हुइ गौ बछडे को य़द करके दौडा अता है, तब
ईनके पीछने पर मैं ईन्द्हें यह ईिर दीग
ूँ ़ दक श्रा ऱम, लक्ष्मण,
सात़ िन को चले गए!॥2॥
* जोइ पीूँऽछऽह तेऽह उतरु देब़। ज़आ ऄिध ऄब यहु सिखि लेब़॥
पीूँऽछऽह जबवह ऱई दिख दाऩ। ऽजिनि ज़सि रघिऩथ ऄधाऩ॥3॥
भ़ि़थग:-जो भा पीछेग़ ईसे यहा ईिर देऩ पडेग़! ह़य!
ऄयोध्य़ ज़कर ऄब मिझे यहा सिख लेऩ है! जब दिःख से दान
मह़ऱज, ऽजनक़ जािन श्रा रघिऩथजा के (दशगन के ) हा ऄधान
है, मिझसे पीछेंग,े ॥3॥

* देहईूँ ईतरु कौनि मिहु ल़इ। अयईूँ कि सल कि ऄूँर पहुूँच़इ॥
सिनत लखन ऽसय ऱम सूँदस
े ।ी तुन ऽजऽम तनि पररहररऽह
नरे सी॥4॥
भ़ि़थग:-तब मैं कौन स़ मिूँह लेकर ईन्द्हें ईिर दीग
ूँ ़ दक मैं
ऱजकि म़रों को कि शल पीिगक पहुूँच़ अय़ हूँ! लक्ष्मण, सात़ और
श्राऱम क़ सम़च़र सिनते हा मह़ऱज ऽतनके की तरह शरार
को त्य़ग देंगे॥4॥
दोह़ :
* हृदई न ऽबदरे ई पंक ऽजऽम ऽबछि रत प्रातमि नारु।
ज़नत हौं मोऽह दान्द्ह ऽबऽध यहु ज़तऩ सरारु॥146॥
भ़ि़थग:-ऽप्रयतम (श्रा ऱमजा) रूपा जल के ऽबछि डते हा मेऱ
हृदय कीचड की तरह फट नहीं गय़, आससे मैं ज़नत़ हूँ दक
ऽिध़त़ ने मिझे यह 'य़तऩ शरार' हा ददय़ है (जो प़पा जािों
को नरक भोगने के ऽलए ऽमलत़ है)॥146॥
चौप़इ :
* एऽह ऽबऽध करत पंथ पऽछत़ि़। तमस़ तार तिरत रथि अि़॥
ऽबद़ दकए करर ऽबनय ऽनष़द़। दफरे प़यूँ परर ऽबकल
ऽबष़द़॥1॥

भ़ि़थग:-सिमंत्र आस प्रक़र म़गग में पछत़ि़ कर रहे थे, आतने में
हा रथ तिरंत तमस़ नदा के तट पर अ पहुूँच़। मंत्रा ने ऽिनय
करके च़रों ऽनष़दों को ऽिद़ दकय़। िे ऽिष़द से व्य़कि ल होते
हुए सिमंत्र के पैरों पडकर लौटे॥1॥
* पैठत नगर सऽचि सकि च़इ। जनि म़रे ऽस गिर ब़ूँभन ग़इ॥
बैरठ ऽबटप तर ददिसि गि़ूँि़। स़ूँझ समय तब ऄिसरु प़ि़॥2॥
भ़ि़थग:-नगर में प्रिेश करते मंत्रा (ग्ल़ऽन के क़रण) ऐसे
सकि च़ते हैं, म़नो गिरु, ब्ऱह्मण य़ गौ को म़रकर अए हों।
स़ऱ ददन एक पेड के नाचे बैठकर ऽबत़य़। जब संध्य़ हुइ तब
मौक़ ऽमल़॥2॥
* ऄिध प्रबेसि कीन्द्ह ऄूँऽधअरें । पैठ भिन रथि ऱऽख दिअरें ॥
ऽजन्द्ह ऽजन्द्ह सम़च़र सिऽन प़ए। भीप ि़र रथि देखन अए॥3॥
भ़ि़थग:-ऄूँधेऱ होने पर ईन्द्होंने ऄयोध्य़ में प्रिेश दकय़ और रथ
को दरि़जे पर खड़ करके िे (चिपके से) महल में घिसे। ऽजनऽजन लोगों ने यह सम़च़र सिऩ प़य़, िे सभा रथ देखने को
ऱजि़र पर अए॥3॥
* रथि पऽहच़ऽन ऽबकल लऽख घोरे । गरवह ग़त ऽजऽम अतप
ओरे ॥

नगर ऩरर नर ब्य़कि ल कै सें। ऽनघटत नार मानगन जैसें॥4॥
भ़ि़थग:-रथ को पहच़नकर और घोडों को व्य़कि ल देखकर ईनके
शरार ऐसे गले ज़ रहे हैं (क्षाण हो रहे हैं) जैसे घ़म में ओले!
नगर के स्त्रा-पिरुष कै से व्य़कि ल हैं, जैसे जल के घटने पर
मछऽलय़ूँ (व्य़कि ल होता हैं)॥4॥
दोह़ :
* सऽचि अगमनि सिनत सबि ऽबकल भयई रऽनि़सि।
भिनि भयंकरु ल़ग तेऽह म़नहुूँ प्रेत ऽनि़सि॥147॥
भ़ि़थग:-मंत्रा क़ (ऄके ले हा) अऩ सिनकर स़ऱ रऽनि़स
व्य़कि ल हो गय़। ऱजमहल ईनको ऐस़ भय़नक लग़ म़नो
प्रेतों क़ ऽनि़स सथ़न (श्मश़न) हो॥147॥
चौप़इ :
* ऄऽत अरऽत सब पीूँछवह ऱना। ईतरु न अि ऽबकल भआ
ब़ना॥
सिनआ न श्रिन नयन नवह सीझ़। कहहु कह़ूँ नुपि तेऽह तेऽह
बीझ़॥1॥
भ़ि़थग:-ऄत्यन्द्त अतग होकर सब ऱऽनय़ूँ पीछता हैं, पर सिमंत्र को
कि छ ईिर नहीं अत़, ईनकी ि़णा ऽिकल हो गइ (रुक गइ) है।
न क़नों से सिऩइ पडत़ है और न अूँखों से कि छ सीझत़ है। िे

जो भा स़मने अत़ है ईस-ईससे पीछते हैं कहो, ऱज़ कह़ूँ हैं
?॥1॥
* द़ऽसन्द्ह दाख सऽचि ऽबकल़इ। कौसल्य़ गुहूँ गईं लि़इ॥
ज़आ सिमंत्र दाख कस ऱज़। ऄऽमऄ रऽहत जनि चंद ि ऽबऱज़॥2॥
भ़ि़थग:-द़ऽसय़ूँ मंत्रा को व्य़कि ल देखकर ईन्द्हें कौसल्य़जा के
महल में ऽलि़ गईं। सिमंत्र ने ज़कर िह़ूँ ऱज़ को कै स़ (बैठे)
देख़ म़नो ऽबऩ ऄमुत क़ चन्द्रम़ हो॥2॥
* असन सयन ऽबभीषन हाऩ। परे ई भीऽमतल ऽनपट मलाऩ॥
लेआ ईस़सि सोच एऽह भ़ूँता। सिरपिर तें जनि खूँसई
े जज़ता॥3॥
भ़ि़थग:-ऱज़ असन, शय्य़ और अभीषणों से रऽहत ऽबलकि ल
मऽलन (ईद़स) पुथ्िा पर पडे हुए हैं। िे लंबा स़ूँसें लेकर आस
प्रक़र सोच करते हैं, म़नो ऱज़ यय़ऽत सिगग से ऽगरकर सोच
कर रहे हों॥3॥
* लेत सोच भरर ऽछनि ऽछनि छ़ता। जनि जरर पंख परे ई संप़ता॥
ऱम ऱम कह ऱम सनेहा। पिऽन कह ऱम लखन बैदह
े ा॥4॥
भ़ि़थग:-ऱज़ क्षण-क्षण में सोच से छ़ता भर लेते हैं। ऐसा
ऽिकल दश़ है म़नो (गाध ऱज जट़यि क़ भ़इ) सम्प़ता पंखों
के जल ज़ने पर ऽगर पड़ हो। ऱज़ (ब़र-ब़र) 'ऱम, ऱम' 'ह़

स्नेहा (प्य़रे ) ऱम!' कहते हैं, दफर 'ह़ ऱम, ह़ लक्ष्मण, ह़
ज़नकी' ऐस़ कहने लगते हैं॥4॥

दशरथ-सिमन्द्त्र संि़द, दशरथ मरण

दोह़ :
* देऽख सऽचिूँ जय जाि कऽह कीन्द्हई
े दंड प्रऩमि।
सिनत ईठे ई ब्य़कि ल नुपऽत कहु सिमंत्र कहूँ ऱमि॥148॥
भ़ि़थग:-मंत्रा ने देखकर 'जयजाि' कहकर दण्डित् प्रण़म दकय़।
सिनते हा ऱज़ व्य़कि ल होकर ईठे और बोले- सिमत्र
ं ! कहो, ऱम
कह़ूँ हैं ?॥148॥
चौप़इ :
* भीप सिमंत्रि लान्द्ह ईर ल़इ। बीडत कछि ऄध़र जनि प़इ॥
सऽहत सनेह ऽनकट बैठ़रा। पीूँछत ऱई नयन भरर ब़रा॥1॥
भ़ि़थग:-ऱज़ ने सिमंत्र को हृदय से लग़ ऽलय़। म़नो डी बते हुए
अदमा को कि छ सह़ऱ ऽमल गय़ हो। मंत्रा को स्नेह के स़थ
प़स बैठ़कर नेत्रों में जल भरकर ऱज़ पीछने लगे-॥1॥
* ऱम कि सल कहु सख़ सनेहा। कहूँ रघिऩथि लखनि बैदह
े ा॥
अने फे रर दक बनऽह ऽसध़ए। सिनत सऽचि लोचन जल छ़ए॥2॥
भ़ि़थग:-हे मेरे प्रेमा सख़! श्रा ऱम की कि शल कहो। बत़ओ, श्रा
ऱम, लक्ष्मण और ज़नकी कह़ूँ हैं? ईन्द्हें लौट़ ल़ए हो दक िे

िन को चले गए? यह सिनते हा मंत्रा के नेत्रों में जल भर
अय़॥2॥
* सोक ऽबकल पिऽन पीूँछ नरे स।ी कहु ऽसय ऱम लखन संदस
े ी॥
ऱम रूप गिन साल सिभ़उ। सिऽमरर सिऽमरर ईर सोचत ऱउ॥3॥
भ़ि़थग:-शोक से व्य़कि ल होकर ऱज़ दफर पीछने लगे- सात़,
ऱम और लक्ष्मण क़ संदस
े ़ तो कहो। श्रा ऱमचन्द्रजा के रूप,
गिण, शाल और सिभ़ि को य़द कर-करके ऱज़ हृदय में सोच
करते हैं॥3॥
* ऱई सिऩआ दान्द्ह बनब़सी। सिऽन मन भयई न हरषि हऱूँसी॥
सो सित ऽबछि रत गए न प्ऱऩ। को प़पा बड मोऽह सम़ऩ॥4॥
भ़ि़थग:-(और कहते हैं-) मैंने ऱज़ होने की ब़त सिऩकर
िनि़स दे ददय़, यह सिनकर भा ऽजस (ऱम) के मन में हषग
और ऽिष़द नहीं हुअ, ऐसे पित्र के ऽबछि डने पर भा मेरे प्ऱण
नहीं गए, तब मेरे सम़न बड़ प़पा कौन होग़ ?॥4॥
दोह़ :
* सख़ ऱमि ऽसय लखनि जहूँ तह़ूँ मोऽह पहुूँच़ई।
ऩवह त च़हत चलन ऄब प्ऱन कहईूँ सऽतभ़ई॥149॥

भ़ि़थग:-हे सख़! श्रा ऱम, ज़नकी और लक्ष्मण जह़ूँ हैं, मिझे
भा िहीं पहुूँच़ दो। नहीं तो मैं सत्य भ़ि से कहत़ हूँ दक मेरे
प्ऱण ऄब चलऩ हा च़हते हैं॥149॥
चौप़इ :
* पिऽन पिऽन पीूँछत मंऽत्रऽह ऱउ। ऽप्रयतम सिऄन सूँदस
े सिऩउ॥
करऽह सख़ सोआ बेऽग ईप़उ। ऱमि लखनि ऽसय नयन देख़उ॥1॥
भ़ि़थग:-ऱज़ ब़र-ब़र मंत्रा से पीछते हैं- मेरे ऽप्रयतम पित्रों क़
संदस
े ़ सिऩओ। हे सख़! तिम तिरंत िहा ईप़य करो ऽजससे श्रा
ऱम, लक्ष्मण और सात़ को मिझे अूँखों ददख़ दो॥1॥
* सऽचि धार धरर कह मुद ि ब़ना। मह़ऱज तिम्ह पंऽडत ग्य़ना॥
बार सिधार धिरंधर देि़। स़धि सम़जि सद़ तिम्ह सेि़॥2॥
भ़ि़थग:-मंत्रा धारज धरकर कोमल ि़णा बोले- मह़ऱज! अप
पंऽडत और ज्ञ़ना हैं। हे देि! अप शीरिार तथ़ ईिम धैयगि़न
पिरुषों में श्रेष्ठ हैं। अपने सद़ स़धिओं के सम़ज की सेि़ की
है॥2॥
* जनम मरन सब दिख सिख भोग़। ह़ऽन ल़भि ऽप्रय ऽमलन
ऽबयोग़॥
क़ल करम बस होवह गोस़ईं। बरबस ऱऽत ददिस की ऩईं॥3॥

भ़ि़थग:-जन्द्म-मरण, सिख-दिःख के भोग, ह़ऽन-ल़भ, प्य़रों क़
ऽमलऩ-ऽबछि डऩ, ये सब हे सि़मा! क़ल और कमग के ऄधान
ऱत और ददन की तरह बरबस होते रहते हैं॥3॥
* सिख हरषवह जड दिख ऽबलख़हीं। दोई सम धार धरवह मन
म़हीं॥
धारज धरहु ऽबबेकि ऽबच़रा। छ़ऽडऄ सोच सकल ऽहतक़रा॥4॥
भ़ि़थग:-मीखग लोग सिख में हर्तषत होते और दिःख में रोते हैं, पर
धार पिरुष ऄपने मन में दोनों को सम़न समझते हैं। हे सबके
ऽहतक़रा (रक्षक)! अप ऽििेक ऽिच़रकर धारज धररए और शोक
क़ पररत्य़ग कीऽजए॥4॥
दोह़ :
* प्रथम ब़सि तमस़ भयई दीसर सिरसरर तार।
न्द्ह़आ रहे जलप़नि करर ऽसय समेत दोई बार॥150॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमजा क़ पहल़ ऽनि़स (मिक़म) तमस़ के तट
पर हुअ, दीसऱ गंग़तार पर। सात़जा सऽहत दोनों भ़इ ईस
ददन स्ऩन करके जल पाकर हा रहे॥150॥
चौप़इ :
* के िट कीऽन्द्ह बहुत सेिक़इ। सो ज़ऽमऽन वसगरौर गि़ूँइ॥

होत प्ऱत बट छारु मग़ि़। जट़ मिकिट ऽनज सास बऩि़॥1॥
भ़ि़थग:-के िट (ऽनष़दऱज) ने बहुत सेि़ की। िह ऱत वसगरौर
(श्रुंगिेरपिर) में हा ऽबत़इ। दीसरे ददन सबेऱ होते हा बड क़
दीध मूँगि़य़ और ईससे श्रा ऱम-लक्ष्मण ने ऄपने ऽसरों पर
जट़ओं के मिकिट बऩए॥1॥
* ऱम सख़ूँ तब ऩि मग़इ। ऽप्रय़ चढ़़इ चढ़े रघिऱइ॥
लखन ब़न धनि धरे बऩइ। अपि चढ़े प्रभि अयसि प़इ॥2॥
भ़ि़थग:-तब श्रा ऱमचन्द्रजा के सख़ ऽनष़दऱज ने ऩि
मूँगि़इ। पहले ऽप्रय़ सात़जा को ईस पर चढ़़कर दफर श्रा
रघिऩथजा चढ़े। दफर लक्ष्मणजा ने धनिष-ब़ण सज़कर रखे और
प्रभि श्रा ऱमचन्द्रजा की अज्ञ़ प़कर सियं चढ़े॥2॥
* ऽबकल ऽबलोदक मोऽह रघिबाऱ। बोले मधिर बचन धरर धाऱ॥
त़त प्रऩमि त़त सन कहेह। ब़र ब़र पद पंकज गहेह॥3॥
भ़ि़थग:-मिझे व्य़कि ल देखकर श्रा ऱमचन्द्रजा धारज धरकर मधिर
िचन बोले- हे त़त! ऽपत़जा से मेऱ प्रण़म कहऩ और मेरा
ओर से ब़र-ब़र ईनके चरण कमल पकडऩ॥3॥
* करऽब प़यूँ परर ऽबनय बहोरा। त़त कररऄ जऽन वचत़ मोरा॥
बन मग मंगल कि सल हम़रें । कु प़ ऄनिग्रह पिन्द्य तिम्ह़रें ॥4॥

भ़ि़थग:-दफर प़ूँि पकडकर ऽिनता करऩ दक हे ऽपत़जा! अप
मेरा वचत़ न कीऽजए। अपकी कु प़, ऄनिग्रह और पिण्य से िन
में और म़गग में हम़ऱ कि शल-मंगल होग़॥4॥
छन्द्द :
* तिम्हरें ऄनिग्रह त़त क़नन ज़त सब सिखि प़आहौं।
प्रऽतप़ऽल अयसि कि सल देखन प़य पिऽन दफरर अआहौं॥
जननीं सकल पररतोऽष परर परर प़यूँ करर ऽबनता घना।
तिलसा करहु सोआ जतनि जेवह कि सला रहवह कोसलधना॥
भ़ि़थग:-हे ऽपत़जा! अपके ऄनिग्रह से मैं िन ज़ते हुए सब
प्रक़र क़ सिख प़उूँग़। अज्ञ़ क़ भलाभ़ूँऽत प़लन करके चरणों
क़ दशगन करने कि शल पीिगक दफर लौट अउूँग़। सब म़त़ओं के
पैरों पड-पडकर ईनक़ सम़ध़न करके और ईनसे बहुत ऽिनता
करके तिलसाद़स कहते हैं- तिम िहा प्रयत्न करऩ, ऽजसमें
कोसलपऽत ऽपत़जा कि शल रहें।
सोरठ़ :
* गिर सन कहब सूँदस
े ि ब़र ब़र पद पदिम गऽह।
करब सोआ ईपदेसि जेवह न सोच मोऽह ऄिधपऽत॥151॥

भ़ि़थग:-ब़र-ब़र चरण कमलों को पकडकर गिरु िऽशष्ठजा से
मेऱ संदस
े ़ कहऩ दक िे िहा ईपदेश दें, ऽजससे ऄिधपऽत
ऽपत़जा मेऱ सोच न करें ॥151॥
चौप़इ :
* पिरजन पररजन सकल ऽनहोरा। त़त सिऩएहु ऽबनता मोरा॥
सोआ सब भ़ूँऽत मोर ऽहतक़रा। ज़तें रह नरऩहु सिख़रा॥1॥
भ़ि़थग:-हे त़त! सब पिरि़ऽसयों और कि टि ऽम्बयों से ऽनहोऱ
(ऄनिरोध) करके मेरा ऽिनता सिऩऩ दक िहा मनिष्य मेऱ सब
प्रक़र से ऽहतक़रा है, ऽजसकी चेष्ट़ से मह़ऱज सिखा रहें॥1॥
* कहब सूँदस
े ि भरत के अएूँ। नाऽत न तऽजऄ ऱजपदि प़एूँ॥
प़लेहु प्रजऽह करम मन ब़ना। सेएहु म़ति सकल सम ज़ना॥2॥
भ़ि़थग:-भरत के अने पर ईनको मेऱ संदस
े ़ कहऩ दक ऱज़
क़ पद प़ ज़ने पर नाऽत न छोड देऩ, कमग, िचन और मन
से प्रज़ क़ प़लन करऩ और सब म़त़ओं को सम़न ज़नकर
ईनकी सेि़ करऩ॥2॥
* ओर ऽनब़हेहु भ़यप भ़इ। करर ऽपति म़ति सिजन सेिक़इ॥
त़त भ़ूँऽत तेऽह ऱखब ऱउ। सोच मोर जेवह करै न क़उ॥3॥

भ़ि़थग:-और हे भ़इ! ऽपत़, म़त़ और सिजनों की सेि़ करके
भ़इपन को ऄंत तक ऽनब़हऩ। हे त़त! ऱज़ (ऽपत़जा) को
ईसा प्रक़र से रखऩ ऽजससे िे कभा (दकसा तरह भा) मेऱ
सोच न करें ॥3॥
* लखन कहे कछि बचन कठोऱ। बरऽज ऱम पिऽन मोऽह ऽनहोऱ॥
ब़र ब़र ऽनज सपथ देि़इ। कहऽब न त़त लखन ल़ररक़इ॥4॥
भ़ि़थग:-लक्ष्मणजा ने कि छ कठोर िचन कहे, दकन्द्ति श्रा ऱमजा ने
ईन्द्हें बरजकर दफर मिझसे ऄनिरोध दकय़ और ब़र-ब़र ऄपना
सौगंध ददल़इ (और कह़) हे त़त! लक्ष्मण क़ लडकपन िह़ूँ न
कहऩ॥4॥
दोह़ :
* कऽह प्रऩमि कछि कहन ऽलय ऽसय भआ ऽसऽथल सनेह।
थदकत बचन लोचन सजल पिलक पल्लऽित देह॥152॥
भ़ि़थग:-प्रण़म कर सात़जा भा कि छ कहने लगा थीं, परन्द्ति
स्नेहिश िे ऽशऽथल हो गईं। ईनकी ि़णा रुक गइ, नेत्रों में जल
भर अय़ और शरार रोम़ंच से व्य़प्त हो गय़॥152॥
चौप़इ :
* तेऽह ऄिसर रघिबर रुख प़इ। के िट प़रऽह ऩि चल़इ॥

रघिकिलऽतलक चले एऽह भ़ूँता। देखईूँ ठ़ढ़ कि ऽलस धरर छ़ता॥1॥
भ़ि़थग:-ईसा समय श्रा ऱमचन्द्रजा क़ रुख प़कर के िट ने प़र
ज़ने के ऽलए ऩि चल़ दा। आस प्रक़र रघििंश ऽतलक श्रा
ऱमचन्द्रजा चल ददए और मैं छ़ता पर िज्र रखकर खड़-खड़
देखत़ रह़॥1॥
* मैं अपन दकऽम कहौं कलेस।ी ऽजऄत दफरे ईूँ लेआ ऱम सूँदस
े ी॥
ऄस कऽह सऽचि बचन रऽह गयउ। ह़ऽन गल़ऽन सोच बस
भयउ॥2॥
भ़ि़थग:-मैं ऄपने क्लेश को कै से कहूँ, जो श्रा ऱमजा क़ यह
संदस
े ़ लेकर जात़ हा लौट अय़! ऐस़ कहकर मंत्रा की ि़णा
रुक गइ (िे चिप हो गए) और िे ह़ऽन की ग्ल़ऽन और सोच के
िश हो गए॥2॥
* सीत बचन सिनतवह नरऩह। परे ई धरऽन ईर द़रुन द़ह॥
तलफत ऽबषम मोह मन म़प़। म़ज़ मनहुूँ मान कहुूँ ब्य़प़॥3॥
भ़ि़थग:-स़रथा सिमंत्र के िचन सिनते हा ऱज़ पुथ्िा पर ऽगर
पडे, ईनके हृदय में भय़नक जलन होने लगा। िे तडपने लगे,
ईनक़ मन भाषण मोह से व्य़कि ल हो गय़। म़नो मछला को
म़ूँज़ व्य़प गय़ हो (पहला िष़ग क़ जल लग गय़ हो)॥3॥

* करर ऽबल़प सब रोिवह ऱना। मह़ ऽबपऽत दकऽम ज़आ
बख़ना॥
सिऽन ऽबल़प दिखह दिखि ल़ग़। धारजह कर धारजि भ़ग़॥4॥
भ़ि़थग:-सब ऱऽनय़ूँ ऽिल़प करके रो रहा हैं। ईस मह़न
ऽिपऽि क़ कै से िणगन दकय़ ज़ए? ईस समय के ऽिल़प को
सिनकर दिःख को भा दिःख लग़ और धारज क़ भा धारज भ़ग
गय़!॥4॥
दोह़ :
* भयई कोल़हलि ऄिध ऄऽत सिऽन नुप ऱईर सोरु।
ऽबपिल ऽबहग बन परे ई ऽनऽस म़नहुूँ कि ऽलस कठोरु॥153॥
भ़ि़थग:-ऱज़ के ऱिले (रऽनि़स) में (रोने क़) शोर सिनकर
ऄयोध्य़ भर में बड़ भ़रा कि हऱम मच गय़! (ऐस़ ज़न पडत़
थ़) म़नो पऽक्षयों के ऽिश़ल िन में ऱत के समय कठोर िज्र
ऽगऱ हो॥153॥
चौप़इ :
* प्ऱन कं ठगत भयई भिअली। मऽन ऽबहान जनि ब्य़कि ल ब्य़ली॥
आं रीं सकल ऽबकल भआूँ भ़रा। जनि सर सरऽसज बनि ऽबनि
ब़रा॥1॥

भ़ि़थग:-ऱज़ के प्ऱण कं ठ में अ गए। म़नो मऽण के ऽबऩ
स़ूँप व्य़कि ल (मरण़सन्न) हो गय़ हो। आऽन्द्रय़ूँ सब बहुत हा
ऽिकल हो गईं, म़नो ऽबऩ जल के त़ल़ब में कमलों क़ िन
मिरझ़ गय़ हो॥1॥
* कौसल्य़ूँ नुपि दाख मल़ऩ। रऽबकि ल रऽब ऄूँथयई ऽजयूँ ज़ऩ॥
ईर धरर धार ऱम महत़रा। बोला बचन समय ऄनिस़रा॥2॥
भ़ि़थग:-कौसल्य़जा ने ऱज़ को बहुत दिःखा देखकर ऄपने हृदय
में ज़न ऽलय़ दक ऄब सीयगकिल क़ सीयग ऄसत हो चल़! तब श्रा
ऱमचन्द्रजा की म़त़ कौसल्य़ हृदय में धारज धरकर समय के
ऄनिकील िचन बोलीं-॥2॥
* ऩथ समिऽझ मन कररऄ ऽबच़रू। ऱम ऽबयोग पयोऽध ऄप़रू॥
करनध़र तिम्ह ऄिध जह़जी। चढ़ेई सकल ऽप्रय पऽथक सम़जी॥3॥
भ़ि़थग:-हे ऩथ! अप मन में समझ कर ऽिच़र कीऽजए दक श्रा
ऱमचन्द्र क़ ऽियोग ऄप़र समिर है। ऄयोध्य़ जह़ज है और
अप ईसके कणगध़र (खेने ि़ले) हैं। सब ऽप्रयजन (कि टि म्बा और
प्रज़) हा य़ऽत्रयों क़ सम़ज है, जो आस जह़ज पर चढ़़ हुअ
है॥3॥
* धारजि धररऄ त प़आऄ प़रू। ऩवह त बीऽडऽह सबि पररि़रू॥

जौं ऽजयूँ धररऄ ऽबनय ऽपय मोरा। ऱमि लखनि ऽसय ऽमलवह
बहोरा॥4॥
भ़ि़थग:-अप धारज धररएग़, तो सब प़र पहुूँच ज़एूँगे। नहीं
तो स़ऱ पररि़र डी ब ज़एग़। हे ऽप्रय सि़मा! यदद मेरा ऽिनता
हृदय में ध़रण कीऽजएग़ तो श्रा ऱम, लक्ष्मण, सात़ दफर अ
ऽमलेंगे॥4॥
दोह़ :
* ऽप्रय़ बचन मुद ि सिनत नुपि ऽचतयई अूँऽख ईघ़रर।
तलफत मान मलान जनि सींचत सातल ब़रर॥154॥
भ़ि़थग:-ऽप्रय पत्ना कौसल्य़ के कोमल िचन सिनते हुए ऱज़ ने
अूँखें खोलकर देख़! म़नो तडपता हुइ दान मछला पर कोइ
शातल जल ऽछडक रह़ हो॥154॥
चौप़इ :
* धरर धारजि ईरठ बैठ भिअली। कहु सिमंत्र कहूँ ऱम कु प़ली॥
कह़ूँ लखनि कहूँ ऱमि सनेहा। कहूँ ऽप्रय पित्रबधी बैदह
े ा॥1॥
भ़ि़थग:-धारज धरकर ऱज़ ईठ बैठे और बोले- सिमंत्र! कहो,
कु प़लि श्रा ऱम कह़ूँ हैं? लक्ष्मण कह़ूँ हैं? स्नेहा ऱम कह़ूँ हैं?
और मेरा प्य़रा बह ज़नकी कह़ूँ है?॥1॥

* ऽबलपत ऱई ऽबकल बहु भ़ूँता। भआ जिग सररस ऽसऱऽत न
ऱता॥
त़पस ऄंध स़प सिऽध अइ। कौसल्यऽह सब कथ़ सिऩइ॥2॥
भ़ि़थग:-ऱज़ व्य़कि ल होकर बहुत प्रक़र से ऽिल़प कर रहे हैं।
िह ऱत यिग के सम़न बडा हो गइ, बातता हा नहीं। ऱज़ को
ऄंधे तपसिा (श्रिणकि म़र के ऽपत़) के श़प की य़द अ गइ।
ईन्द्होंने सब कथ़ कौसल्य़ को कह सिऩइ॥2॥
* भयई ऽबकल बरनत आऽतह़स़। ऱम रऽहत ऽधग जािन अस़॥
सो तनि ऱऽख करब मैं क़ह़। जेवह न प्रेम पनि मोर ऽनब़ह़॥3॥
भ़ि़थग:-ईस आऽतह़स क़ िणगन करते-करते ऱज़ व्य़कि ल हो गए
और कहने लगे दक श्रा ऱम के ऽबऩ जाने की अश़ को ऽधक्क़र
है। मैं ईस शरार को रखकर क्य़ करूूँग़, ऽजसने मेऱ प्रेम क़
प्रण नहीं ऽनब़ह़?॥3॥
* ह़ रघिनंदन प्ऱन ऽपराते। तिम्ह ऽबनि ऽजऄत बहुत ददन बाते॥
ह़ ज़नकी लखन ह़ रघिबर। ह़ ऽपति ऽहत ऽचत च़तक
जलधर॥4॥
भ़ि़थग:-ह़ रघिकिल को अनंद देने ि़ले मेरे प्ऱण प्य़रे ऱम!
तिम्ह़रे ऽबऩ जाते हुए मिझे बहुत ददन बात गए। ह़ ज़नकी,

लक्ष्मण! ह़ रघििार! ह़ ऽपत़ के ऽचि रूपा च़तक के ऽहत
करने ि़ले मेघ!॥4॥
दोह़ :
* ऱम ऱम कऽह ऱम कऽह ऱम ऱम कऽह ऱम।
तनि पररहरर रघिबर ऽबरहूँ ऱई गयई सिरध़म॥155॥
भ़ि़थग:-ऱम-ऱम कहकर, दफर ऱम कहकर, दफर ऱम-ऱम
कहकर और दफर ऱम कहकर ऱज़ श्रा ऱम के ऽिरह में शरार
त्य़ग कर सिरलोक को ऽसध़र गए॥155॥
चौप़इ :
* ऽजऄन मरन फलि दसरथ प़ि़। ऄंड ऄनेक ऄमल जसि छ़ि़॥
ऽजऄत ऱम ऽबधि बदनि ऽनह़ऱ। ऱम ऽबरह करर मरनि
सूँि़ऱ॥1॥
भ़ि़थग:-जाने और मरने क़ फल तो दशरथजा ने हा प़य़,
ऽजनक़ ऽनमगल यश ऄनेकों ब्रह्म़ंडों में छ़ गय़। जाते जा तो
श्रा ऱमचन्द्रजा के चन्द्रम़ के सम़न मिख को देख़ और श्रा ऱम
के ऽिरह को ऽनऽमि बऩकर ऄपऩ मरण सिध़र ऽलय़॥1॥
* सोक ऽबकल सब रोिवह ऱना। रूपि सालि बलि तेजि बख़ना॥
करवह ऽबल़प ऄनेक प्रक़ऱ। परवह भीऽमतल ब़रवह ब़ऱ॥2॥

भ़ि़थग:-सब ऱऽनय़ूँ शोक के म़रे व्य़कि ल होकर रो रहा हैं। िे
ऱज़ के रूप, शाल, बल और तेज क़ बख़न कर-करके ऄनेकों
प्रक़र से ऽिल़प कर रहा हैं और ब़र-ब़र धरता पर ऽगर-ऽगर
पडता हैं॥2॥
* ऽबलपवह ऽबकल द़स ऄरु द़सा। घर घर रुदनि करवह
पिरब़सा॥
ऄूँथयई अजि भ़निकिल भ़नी। धरम ऄिऽध गिन रूप ऽनध़नी॥3॥
भ़ि़थग:-द़स-द़सागण व्य़कि ल होकर ऽिल़प कर रहे हैं और
नगर ऽनि़सा घर-घर रो रहे हैं। कहते हैं दक अज धमग की
साम़, गिण और रूप के भंड़र सीयगकिल के सीयग ऄसत हो
गए?॥3॥
* ग़रीं सकल कै कआऽह देहीं। नयन ऽबहान कीन्द्ह जग जेहीं॥
एऽह ऽबऽध ऽबलपत रै ऽन ऽबह़ना। अए सकल मह़मिऽन
ग्य़ना॥4॥
भ़ि़थग:-सब कै के या को ग़ऽलय़ूँ देते हैं, ऽजसने संस़र भर को
ऽबऩ नेत्रों क़ (ऄंध़) कर ददय़! आस प्रक़र ऽिल़प करते ऱत
बात गइ। प्ऱतःक़ल सब बडे-बडे ज्ञ़ना मिऽन अए॥4॥

मिऽन िऽशष्ठ क़ भरतजा को बिल़ने के ऽलए दीत भेजऩ
दोह़ :
* तब बऽसष्ठ मिऽन समय सम कऽह ऄनेक आऽतह़स।
सोक नेि़रे ई सबऽह कर ऽनज ऽबग्य़न प्रक़स॥156॥
भ़ि़थग:-तब िऽशष्ठ मिऽन ने समय के ऄनिकील ऄनेक आऽतह़स
कहकर ऄपने ऽिज्ञ़न के प्रक़श से सबक़ शोक दीर दकय़॥156॥

चौप़इ :
* तेल ऩिूँ भरर नुप तनि ऱख़। दीत बोल़आ बहुरर ऄस भ़ष़॥
ध़िहु बेऽग भरत पवह ज़ह। नुप सिऽध कतहुूँ कहहु जऽन
क़ह॥1॥
भ़ि़थग:-िऽशष्ठजा ने ऩि में तेल भरि़कर ऱज़ के शरार को
ईसमें रखि़ ददय़। दफर दीतों को बिलि़कर ईनसे ऐस़ कह़तिम लोग जल्दा दौडकर भरत के प़स ज़ओ। ऱज़ की मुत्यि क़
सम़च़र कहीं दकसा से न कहऩ॥1॥
* एतनेआ कहेहु भरत सन ज़इ। गिर बोल़आ पठयई दोई भ़इ॥
सिऽन मिऽन अयसि ध़िन ध़ए। चले बेग बर ब़ऽज लज़ए॥2॥
भ़ि़थग:-ज़कर भरत से आतऩ हा कहऩ दक दोनों भ़आयों को
गिरुजा ने बिलि़ भेज़ है। मिऽन की अज्ञ़ सिनकर ध़िन (दीत)
दौडे। िे ऄपने िेग से ईिम घोडों को भा लज़ते हुए चले॥2॥
* ऄनरथि ऄिध ऄरं भेई जब तें। कि सगिन होवह भरत कहुूँ तब तें॥
देखवह ऱऽत भय़नक सपऩ। ज़ऽग करवह कटि कोरट कलपऩ॥3॥
भ़ि़थग:-जब से ऄयोध्य़ में ऄनथग प्ऱरं भ हुअ, तभा से भरतजा
को ऄपशकि न होने लगे। िे ऱत को भयंकर सिप्न देखते थे और
ज़गने पर (ईन सिप्नों के क़रण) करोडों (ऄनेकों) तरह की बिराबिरा कल्पऩएूँ दकय़ करते थे॥3॥

* ऽबप्र जेि़ूँआ देवह ददन द़ऩ। ऽसि ऄऽभषेक करवह ऽबऽध
ऩऩ॥
म़गवह हृदयूँ महेस मऩइ। कि सल म़ति ऽपति पररजन भ़इ॥4॥
भ़ि़थग:-(ऄऽनष्टश़ऽन्द्त के ऽलए) िे प्रऽतददन ब्ऱह्मणों को भोजन
कऱकर द़न देते थे। ऄनेकों ऽिऽधयों से रुऱऽभषेक करते थे।
मह़देिजा को हृदय में मऩकर ईनसे म़त़-ऽपत़, कि टि म्बा और
भ़आयों क़ कि शल-क्षेम म़ूँगते थे॥4॥
दोह़ :
* एऽह ऽबऽध सोचत भरत मन ध़िन पहुूँचे अआ।
गिर ऄनिस़सन श्रिन सिऽन चले गनेसि मऩइ॥157॥
भ़ि़थग:-भरतजा आस प्रक़र मन में वचत़ कर रहे थे दक दीत अ
पहुूँचे। गिरुजा की अज्ञ़ क़नों से सिनते हा िे गणेशजा को
मऩकर चल पडे।157॥
चौप़इ :
* चले समार बेग हय ह़ूँके। ऩघत सररत सैल बन ब़ूँके॥
हृदयूँ सोचि बड कछि न सोह़इ। ऄस ज़नवह ऽजयूँ ज़ईूँ
ईड़इ॥1॥

भ़ि़थग:-हि़ के सम़न िेग ि़ले घोडों को ह़ूँकते हुए िे ऽिकट
नदा, पह़ड तथ़ जंगलों को ल़ूँघते हुए चले। ईनके हृदय में
बड़ सोच थ़, कि छ सिह़त़ न थ़। मन में ऐस़ सोचते थे दक
ईडकर पहुूँच ज़उूँ॥1॥
* एक ऽनमेष बरष सम ज़इ। एऽह ऽबऽध भरत नगर ऽनऄऱइ॥
ऄसगिन होवह नगर पैठ़ऱ। रटवह कि भ़ूँऽत कि खेत कऱऱ॥2॥
भ़ि़थग:-एक-एक ऽनमेष िषग के सम़न बात रह़ थ़। आस प्रक़र
भरतजा नगर के ऽनकट पहुूँचे। नगर में प्रिेश करते समय
ऄपशकि न होने लगे। कौए बिरा जगह बैठकर बिरा तरह से क़ूँिक़ूँि कर रहे हैं॥2॥
* खर ऽसअर बोलवह प्रऽतकी ल़। सिऽन सिऽन होआ भरत मन
सील़॥
श्राहत सर सररत़ बन ब़ग़। नगरु ऽबसेऽष भय़िनि ल़ग़॥3॥
भ़ि़थग:-गदहे और ऽसय़र ऽिपरात बोल रहे हैं। यह सिन-सिनकर
भरत के मन में बडा पाड़ हो रहा है। त़ल़ब, नदा, िन,
बगाचे सब शोभ़हान हो रहे हैं। नगर बहुत हा भय़नक लग
रह़ है॥3॥
* खग मुग हय गय ज़वह न जोए। ऱम ऽबयोग कि रोग ऽबगोए॥

नगर ऩरर नर ऽनपट दिख़रा। मनहुूँ सबऽन्द्ह सब संपऽत ह़रा॥4॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमजा के ऽियोग रूपा बिरे रोग से सत़ए हुए
पक्षा-पशि, घोडे-ह़था (ऐसे दिःखा हो रहे हैं दक) देखे नहीं ज़ते।
नगर के स्त्रा-पिरुष ऄत्यन्द्त दिःखा हो रहे हैं। म़नो सब ऄपना
स़रा सम्पऽि ह़र बैठे हों॥4॥
* पिरजन ऽमलवह न कहवह कछि गिूँऽह जोह़रवह ज़वह।
भरत कि सल पीऽूँ छ न सकवह भय ऽबष़द मन म़वह॥158॥
भ़ि़थग:-नगर के लोग ऽमलते हैं, पर कि छ कहते नहीं, गौं से
(चिपके से) जोह़र (िंदऩ) करके चले ज़ते हैं। भरतजा भा
दकसा से कि शल नहीं पीछ सकते, क्योंदक ईनके मन में भय और
ऽिष़द छ़ रह़ है॥158॥

श्रा भरत-शत्रिघ्न क़ अगमन और शोक
* ह़ट ब़ट नवह ज़आ ऽनह़रा। जनि पिर दहूँ ददऽस ल़ऽग
दि़रा॥
अित सित सिऽन कै कयनंददऽन। हरषा रऽबकि ल जलरुह चंददऽन॥1॥
भ़ि़थग:-ब़ज़र और ऱसते देखे नहीं ज़ते। म़नो नगर में दसों
ददश़ओं में द़ि़ऽग्न लगा है! पित्र को अते सिनकर सीयगकिल रूपा
कमल के ऽलए च़ूँदना रूपा कै के या (बडा) हर्तषत हुइ॥1॥
* सऽज अरता मिददत ईरठ ध़इ। ि़रे वह भेंरट भिन लेआ अइ॥
भरत दिऽखत पररि़रु ऽनह़ऱ॥ म़नहुूँ तिऽहन बनज बनि म़ऱ॥2॥
भ़ि़थग:-िह अरता सज़कर अनंद में भरकर ईठ दौडा और
दरि़जे पर हा ऽमलकर भरत-शत्रिघ्न को महल में ले अइ। भरत

ने स़रे पररि़र को दिःखा देख़। म़नो कमलों के िन को प़ल़
म़र गय़ हो॥2॥
* कै के इ हरऽषत एऽह भ़ूँता। मनहुूँ मिददत दि ल़आ दकऱता॥
सिऽतह ससोच देऽख मनि म़रें । पीूँछऽत नैहर कि सल हम़रें ॥3॥
भ़ि़थग:-एक कै के या हा आस तरह हर्तषत ददखता है म़नो भालना
जंगल में अग लग़कर अनंद में भर रहा हो। पित्र को सोच िश
और मन म़रे (बहुत ईद़स) देखकर िह पीछने लगा- हम़रे नैहर
में कि शल तो है?॥3॥
* सकल कि सल कऽह भरत सिऩइ। पीूँछा ऽनज कि ल कि सल भल़इ॥
कहु कहूँ त़त कह़ूँ सब म़त़। कहूँ ऽसय ऱम लखन ऽप्रय
वऱ्त़॥4॥
भ़ि़थग:-भरतजा ने सब कि शल कह सिऩइ। दफर ऄपने कि ल की
कि शल-क्षेम पीछा। (भरतजा ने कह़-) कहो, ऽपत़जा कह़ूँ हैं?
मेरा सब म़त़एूँ कह़ूँ हैं? सात़जा और मेरे प्य़रे भ़इ ऱमलक्ष्मण कह़ूँ हैं?॥4॥
दोह़ :
* सिऽन सित बचन सनेहमय कपट नार भरर नैन।
भरत श्रिन मन सील सम प़ऽपऽन बोला बैन॥159॥

भ़ि़थग:-पित्र के स्नेहमय िचन सिनकर नेत्रों में कपट क़ जल
भरकर प़ऽपना कै के या भरत के क़नों में और मन में शील के
सम़न चिभने ि़ले िचन बोला-॥159॥
चौप़इ :
* त़त ब़त मैं सकल सूँि़रा। भै मंथऱ सह़य ऽबच़रा॥
कछि क क़ज ऽबऽध बाच ऽबग़रे ई। भीपऽत सिरपऽत पिर पगि
ध़रे ई॥1॥
भ़ि़थग:-हे त़त! मैंने स़रा ब़त बऩ ला था। बेच़रा मंथऱ
सह़यक हुइ। पर ऽिध़त़ ने बाच में जऱ स़ क़म ऽबग़ड
ददय़। िह यह दक ऱज़ देिलोक को पध़र गए॥1॥
* सिनत भरति भए ऽबबस ऽबष़द़। जनि सहमेई करर के हरर
ऩद़॥
त़त त़त ह़ त़त पिक़रा। परे भीऽमतल ब्य़कि ल भ़रा॥2॥
भ़ि़थग:-भरत यह सिनते हा ऽिष़द के म़रे ऽििश (बेह़ल) हो
गए। म़नो वसह की गजगऩ सिनकर ह़था सहम गय़ हो। िे
'त़त! त़त! ह़ त़त!' पिक़रते हुए ऄत्यन्द्त व्य़कि ल होकर जमान
पर ऽगर पडे॥2॥
* चलत न देखन प़यईूँ तोहा। त़त न ऱमऽह सौंपेहु मोहा॥
बहुरर धार धरर ईठे सूँभ़रा। कहु ऽपति मरन हेति महत़रा॥3॥

भ़ि़थग:-(और ऽिल़प करने लगे दक) हे त़त! मैं अपको (सिगग
के ऽलए) चलते समय देख भा न सक़। (ह़य!) अप मिझे श्रा
ऱमजा को सौंप भा नहीं गए! दफर धारज धरकर िे सम्हलकर
ईठे और बोले- म़त़! ऽपत़ के मरने क़ क़रण तो बत़ओ॥3॥
* सिऽन सित बचन कहऽत कै के इ। मरमि प़ूँऽछ जनि म़हुर देइ॥
अददहु तें सब अपऽन करना। कि रटल कठोर मिददत मन बरना॥4॥
भ़ि़थग:-पित्र क़ िचन सिनकर कै के या कहने लगा। म़नो ममग
सथ़न को प़छकर (च़की से चारकर) ईसमें जहर भर रहा हो।
कि रटल और कठोर कै के या ने ऄपना सब करना शिरू से (अऽखर
तक बडे) प्रसन्न मन से सिऩ दा॥4॥
दोह़ :
* भरतऽह ऽबसरे ई ऽपति मरन सिनत ऱम बन गौनि।
हेति ऄपनपई ज़ऽन ऽजयूँ थदकत रहे धरर मौनि॥160॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचन्द्रजा क़ िन ज़ऩ सिनकर भरतजा को ऽपत़
क़ मरण भील गय़ और हृदय में आस स़रे ऄनथग क़ क़रण
ऄपने को हा ज़नकर िे मौन होकर सतऽम्भत रह गए (ऄथ़गत
ईनकी बोला बंद हो गइ और िे सन्न रह गए)॥160॥
* ऽबकल ऽबलोदक सितऽह समिझ़िऽत। मनहुूँ जरे पर लोनि
लग़िऽत॥

त़त ऱई नवह सोचै जोगी। ऽबढ़आ सिकुत जसि कीन्द्हई
े भोगी॥1॥
भ़ि़थग:-पित्र को व्य़कि ल देखकर कै के या समझ़ने लगा। म़नो
जले पर नमक लग़ रहा हो। (िह बोला-) हे त़त! ऱज़ सोच
करने योग्य नहीं हैं। ईन्द्होंने पिण्य और यश कम़कर ईसक़
पय़गप्त भोग दकय़॥1॥
* जाित सकल जनम फल प़ए। ऄंत ऄमरपऽत सदन ऽसध़ए॥
ऄस ऄनिम़ऽन सोच पररहरह। सऽहत सम़ज ऱज पिर करह॥2॥
भ़ि़थग:-जािनक़ल में हा ईन्द्होंने जन्द्म लेने के सम्पीणग फल प़
ऽलए और ऄंत में िे आन्द्रलोक को चले गए। ऐस़ ऽिच़रकर
सोच छोड दो और सम़ज सऽहत नगर क़ ऱज्य करो॥2॥
* सिऽन सिरठ सहमेई ऱजकि म़रू। प़कें छत जनि ल़ग ऄूँग़रू॥
धारज धरर भरर लेवह ईस़स़। प़ऽपऽन सबऽह भ़ूँऽत कि ल
ऩस़॥3॥
भ़ि़थग:-ऱजकि म़र भरतजा यह सिनकर बहुत हा सहम गए।
म़नो पके घ़ि पर ऄूँग़र छी गय़ हो। ईन्द्होंने धारज धरकर
बडा लम्बा स़ूँस लेते हुए कह़- प़ऽपना! तीने सभा तरह से कि ल
क़ ऩश कर ददय़॥3॥
* जौं पै कि रुऽच रहा ऄऽत तोहा। जनमत क़हे न म़रे मोहा॥
पेड क़रट तैं प़लई सींच़। मान ऽजऄन ऽनऽत ब़रर ईलाच़॥4॥

भ़ि़थग:-ह़य! यदद तेरा ऐसा हा ऄत्यन्द्त बिरा रुऽच (दिष्ट आच्छ़)
था, तो तीने जन्द्मते हा मिझे म़र क्यों नहीं ड़ल़? तीने पेड को
क़टकर पिे को सींच़ है और मछला के जाने के ऽलए प़ना
को ईलाच ड़ल़! (ऄथ़गत मेऱ ऽहत करने ज़कर ईलट़ तीने मेऱ
ऄऽहत कर ड़ल़)॥4॥
दोह़ :
* हंसबंसि दसरथि जनकि ऱम लखन से भ़आ।
जनना तीूँ जनना भइ ऽबऽध सन कछि न बस़आ॥161॥
भ़ि़थग:-मिझे सीयि
ग ंश (स़ िंश), दशरथजा (सराखे) ऽपत़ और
ऱम-लक्ष्मण से भ़इ ऽमले। पर हे जनना! मिझे जन्द्म देने ि़ला
म़त़ ती हुइ! (क्य़ दकय़ ज़ए!) ऽिध़त़ से कि छ भा िश नहीं
चलत़॥161॥
चौप़इ :
* जब मैं कि मऽत कि मत ऽजयूँ ठयउ। खंड खंड होआ हृदई न
गयउ॥
बर म़गत मन भआ नवह पाऱ। गरर न जाह मिूँह परे ई न
कीऱ॥1॥
भ़ि़थग:-ऄरा कि मऽत! जब तीने हृदय में यह बिऱ ऽिच़र (ऽनश्चय)
ठ़ऩ, ईसा समय तेरे हृदय के टि कडे-टि कडे (क्यों) न हो गए?

िरद़न म़ूँगते समय तेरे मन में कि छ भा पाड़ नहीं हुइ? तेरा
जाभ गल नहीं गइ? तेरे मिूँह में कीडे नहीं पड गए?॥1॥
* भीपूँ प्रताऽत तोरर दकऽम कीन्द्हा। मरन क़ल ऽबऽध मऽत हरर
लान्द्हा॥
ऽबऽधहुूँ न ऩरर हृदय गऽत ज़ना। सकल कपट ऄघ ऄिगिन
ख़ना॥2॥
भ़ि़थग:-ऱज़ ने तेऱ ऽिश्व़स कै से कर ऽलय़? (ज़न पडत़ है,)
ऽिध़त़ ने मरने के समय ईनकी बिऽि हर ला था। ऽस्त्रयों के
हृदय की गऽत (च़ल) ऽिध़त़ भा नहीं ज़न सके । िह सम्पीणग
कपट, प़प और ऄिगिणों की ख़न है॥2॥
* सरल सिसाल धरम रत ऱउ। सो दकऽम ज़नै ताय सिभ़उ॥
ऄस को जाि जंति जग म़हीं। जेऽह रघिऩथ प्ऱनऽप्रय ऩहीं॥3॥
भ़ि़थग:-दफर ऱज़ तो साधे, सिशाल और धमगपऱयण थे। िे
भल़, स्त्रा सिभ़ि को कै से ज़नते? ऄरे , जगत के जाि-जन्द्तिओं
में ऐस़ कौन है, ऽजसे श्रा रघिऩथजा प्ऱणों के सम़न प्य़रे नहीं
हैं॥3॥
* भे ऄऽत ऄऽहत ऱमि तेई तोहीं। को ती ऄहऽस सत्य कहु
मोहा॥

जो हऽस सो हऽस मिूँह मऽस ल़इ। अूँऽख ओट ईरठ बैठऽह
ज़इ॥4॥
भ़ि़थग:-िे श्रा ऱमजा भा तिझे ऄऽहत हो गए (िैरा लगे)! ती
कौन है? मिझे सच-सच कह! ती जो है, सो है, ऄब मिूँह में
सय़हा पोतकर (मिूँह क़ल़ करके ) ईठकर मेरा अूँखों की ओट में
ज़ बैठ॥4॥
दोह़ :
* ऱम ऽबरोधा हृदय तें प्रगट कीन्द्ह ऽबऽध मोऽह।
मो सम़न को प़तकी ब़दद कहईूँ कछि तोऽह॥162॥
भ़ि़थग:-ऽिध़त़ ने मिझे श्रा ऱमजा से ऽिरोध करने ि़ले (तेरे)
हृदय से ईत्पन्न दकय़ (ऄथि़ ऽिध़त़ ने मिझे हृदय से ऱम क़
ऽिरोधा ज़ऽहर कर ददय़।) मेरे बऱबर प़पा दीसऱ कौन है? मैं
व्यथग हा तिझे कि छ कहत़ हूँ॥162॥
चौप़इ :
* सिऽन सत्रिघन
ि म़ति कि रटल़इ। जरवह ग़त ररस कछि न बस़इ॥
तेऽह ऄिसर कि बरा तहूँ अइ। बसन ऽबभीषन ऽबऽबध बऩइ॥1॥

भ़ि़थग:-म़त़ की कि रटलत़ सिनकर शत्रिघ्नजा के सब ऄंग क्रोध से
जल रहे हैं, पर कि छ िश नहीं चलत़। ईसा समय भ़ूँऽत-भ़ूँऽत
के कपडों और गहनों से सजकर कि बरा (मंथऱ) िह़ूँ अइ॥1॥
* लऽख ररस भरे ई लखन लघि भ़इ। बरत ऄनल घुत अहुऽत
प़इ॥
हुमऽग ल़त तदक की बर म़ऱ। परर मिूँह भर मऽह करत
पिक़ऱ॥2॥
भ़ि़थग:-ईसे (सजा) देखकर लक्ष्मण के छोटे भ़इ शत्रिघ्नजा क्रोध
में भर गए। म़नो जलता हुइ अग को घा की अहुऽत ऽमल गइ
हो। ईन्द्होंने जोर से तककर की बड पर एक ल़त जम़ दा। िह
ऽचल्ल़ता हुइ मिूँह के बल जमान पर ऽगर पडा॥2॥
* की बर टी टेई फी ट कप़रू। दऽलत दसन मिख रुऽधर प्रच़रू॥
अह दआऄ मैं क़ह नस़ि़। करत नाक फलि ऄनआस प़ि़॥3॥
भ़ि़थग:-ईसक़ की बड टी ट गय़, कप़ल फी ट गय़, द़ूँत टी ट गए
और मिूँह से खीन बहने लग़। (िह कऱहता हुइ बोला-) ह़य
दैि! मैंने क्य़ ऽबग़ड़? जो भल़ करते बिऱ फल प़य़॥3॥
* सिऽन ररपिहन लऽख नख ऽसख खोटा। लगे घसाटन धरर धरर
झोंटा॥
भरत दय़ऽनऽध दाऽन्द्ह छि ड़इ। कौसल्य़ पवह गे दोई भ़इ॥4॥

भ़ि़थग:-ईसकी यह ब़त सिनकर और ईसे नख से ऽशख़ तक दिष्ट
ज़नकर शत्रिघ्नजा झोंट़ पकड-पकडकर ईसे घसाटने लगे। तब
दय़ऽनऽध भरतजा ने ईसको छि ड़ ददय़ और दोनों भ़इ (तिरंत)
कौसल्य़जा के प़स गए॥4॥

भरत-कौसल्य़ संि़द और दशरथजा की ऄन्द्त्येऽष्ट दक्रय़
दोह़ :
* मऽलन बसन ऽबबरन ऽबकल कु स शरार दिख भ़र।
कनक कलप बर बेऽल बन म़नहुूँ हना तिस़र॥163॥
भ़ि़थग:-कौसल्य़जा मैले िस्त्र पहने हैं, चेहरे क़ रं ग बदल़ हुअ
है, व्य़कि ल हो रहा हैं, दिःख के बोझ से शरार सीख गय़ है।
ऐसा ददख रहा हैं म़नो सोने की सिंदर कल्पलत़ को िन में
प़ल़ म़र गय़ हो॥163॥
चौप़इ :
* भरतऽह देऽख म़ति ईरठ ध़इ। मिरुऽचत ऄिऽन परा झआूँ अइ॥
देखत भरति ऽबकल भए भ़रा। परे चरन तन दस़ ऽबस़रा॥1॥
भ़ि़थग:-भरत को देखते हा म़त़ कौसल्य़जा ईठ दौडीं। पर
चक्कर अ ज़ने से मीर्तच्छत होकर पुथ्िा पर ऽगर पडीं। यह देखते
हा भरतजा बडे व्य़कि ल हो गए और शरार की सिध भिल़कर
चरणों में ऽगर पडे॥1॥
* म़ति त़त कहूँ देऽह देख़इ। कहूँ ऽसय ऱमि लखनि दोई भ़इ॥
कै कआ कत जनमा जग म़झ़। जौं जनऽम त भआ क़हे न
ब़ूँझ़॥2॥

भ़ि़थग:-(दफर बोले-) म़त़! ऽपत़जा कह़ूँ हैं? ईन्द्हें ददख़ दें।
सात़जा तथ़ मेरे दोनों भ़इ श्रा ऱम-लक्ष्मण कह़ूँ हैं? (ईन्द्हें
ददख़ दें।) कै के या जगत में क्यों जनमा! और यदद जनमा हा तो
दफर ब़ूँझ क्यों न हुइ?-॥2॥
* कि ल कलंकि जेवह जनमेई मोहा। ऄपजस भ़जन ऽप्रयजन रोहा॥
को ऽतभििन मोऽह सररस ऄभ़गा। गऽत ऄऽस तोरर म़तिजेऽह
ल़गा॥3॥
भ़ि़थग:-ऽजसने कि ल के कलंक, ऄपयश के भ़ूँडे और ऽप्रयजनों के
रोहा मिझ जैसे पित्र को ईत्पन्न दकय़। तानों लोकों में मेरे सम़न
ऄभ़ग़ कौन है? ऽजसके क़रण हे म़त़! तेरा यह दश़ हुइ!॥3॥
* ऽपति सिरपिर बन रघिबर के ती। मैं के िल सब ऄनरथ हेती॥
ऽधग मोऽह भयईूँ बेनि बन अगा। दिसह द़ह दिख दीषन भ़गा॥4॥
भ़ि़थग:-ऽपत़जा सिगग में हैं और श्रा ऱमजा िन में हैं। के ति के
सम़न के िल मैं हा आन सब ऄनथों क़ क़रण हूँ। मिझे ऽधक्क़र
है! मैं ब़ूँस के िन में अग ईत्पन्न हुअ और करठन द़ह, दिःख
और दोषों क़ भ़गा बऩ॥4॥
दोह़ :
* म़ति भरत के बचन मुद ि सिऽन पिऽन ईठा सूँभ़रर।

ऽलए ईठ़आ लग़आ ईर लोचन मोचऽत ब़रर॥164॥
भ़ि़थग:-भरतजा के कोमल िचन सिनकर म़त़ कौसल्य़जा दफर
सूँभलकर ईठीं। ईन्द्होंने भरत को ईठ़कर छ़ता से लग़ ऽलय़
और नेत्रों से अूँसी बह़ने लगीं॥164॥
चौप़इ :
* सरल सिभ़य म़यूँ ऽहयूँ ल़ए। ऄऽत ऽहत मनहुूँ ऱम दफरर
अए॥
भेंटेई बहुरर लखन लघि भ़इ। सोकि सनेहु न हृदयूँ सम़इ॥1॥
भ़ि़थग:-सरल सिभ़ि ि़ला म़त़ ने बडे प्रेम से भरतजा को
छ़ता से लग़ ऽलय़, म़नो श्रा ऱमजा हा लौटकर अ गए हों।
दफर लक्ष्मणजा के छोटे भ़इ शत्रिघ्न को हृदय से लग़य़। शोक
और स्नेह हृदय में सम़त़ नहीं है॥1॥
* देऽख सिभ़ई कहत सबि कोइ। ऱम म़ति ऄस क़हे न होइ॥
म़त़ूँ भरति गोद बैठ़रे । अूँसि पोवछ मुद ि बचन ईच़रे ॥2॥
भ़ि़थग:-कौसल्य़जा क़ सिभ़ि देखकर सब कोइ कह रहे हैं- श्रा
ऱम की म़त़ क़ ऐस़ सिभ़ि क्यों न हो। म़त़ ने भरतजा
को गोद में बैठ़ ऽलय़ और ईनके अूँसी पोंछकर कोमल िचन
बोलीं-॥2॥
* ऄजहुूँ बच्छ बऽल धारज धरह। कि समई समिऽझ सोक पररहरह॥

जऽन म़नहु ऽहयूँ ह़ऽन गल़ना। क़ल करम गऽत ऄघरटत
ज़ना॥3॥
भ़ि़थग:-हे ित्स! मैं बलैय़ लेता हूँ। तिम ऄब भा धारज धरो।
बिऱ समय ज़नकर शोक त्य़ग दो। क़ल और कमग की गऽत
ऄऽमट ज़नकर हृदय में ह़ऽन और ग्ल़ऽन मत म़नो॥3॥
* क़हुऽह दोसि देहु जऽन त़त़। भ़ मोऽह सब ऽबऽध ब़म
ऽबध़त़॥
जो एतेहुूँ दिख मोऽह ऽजअि़। ऄजहुूँ को ज़नआ क़ तेऽह
भ़ि़॥4॥
भ़ि़थग:-हे त़त! दकसा को दोष मत दो। ऽिध़त़ मेरे ऽंलए
सब प्रक़र से ईलट़ हो गय़ है, जो आतने दिःख पर भा मिझे
ऽजल़ रह़ है। ऄब भा कौन ज़नत़ है, ईसे क्य़ भ़ रह़
है?॥4॥
दोह़ :
* ऽपति अयस भीषन बसन त़त तजे रघिबार।
ऽबसमई हरषि न हृदयूँ कछि पऽहरे बलकल चार॥165॥
भ़ि़थग:-हे त़त! ऽपत़ की अज्ञ़ से श्रा रघििार ने भीषण-िस्त्र
त्य़ग ददए और िल्कल िस्त्र पहन ऽलए। ईनके हृदय में न कि छ
ऽिष़द थ़, न हषग!॥165॥

चौप़इ :
* मिख प्रसन्न मन रं ग न रोषी। सब कर सब ऽबऽध करर
पररतोषी॥
चले ऽबऽपन सिऽन ऽसय सूँग ल़गा। रहआ न ऱम चरन
ऄनिऱगा॥1॥
भ़ि़थग:-ईनक़ मिख प्रसन्न थ़, मन में न असऽक्त था, न रोष
(िेष)। सबक़ सब तरह से संतोष कऱकर िे िन को चले। यह
सिनकर सात़ भा ईनके स़थ लग गईं। श्राऱम के चरणों की
ऄनिऱऽगणा िे दकसा तरह न रहीं॥1॥
* सिनतवह लखनि चले ईरठ स़थ़। रहवह न जतन दकए
रघिऩथ़॥
तब रघिपऽत सबहा ऽसरु ऩइ। चले संग ऽसय ऄरु लघि भ़इ॥2॥
भ़ि़थग:-सिनते हा लक्ष्मण भा स़थ हा ईठ चले। श्रा रघिऩथ ने
ईन्द्हें रोकने के बहुत यत्न दकए, पर िे न रहे। तब श्रा
रघिऩथजा सबको ऽसर नि़कर सात़ और छोटे भ़इ लक्ष्मण को
स़थ लेकर चले गए॥2॥
* ऱमि लखनि ऽसय बनऽह ऽसध़ए। गआईूँ न संग न प्ऱन पठ़ए॥
यहु सबि भ़ आन्द्ह अूँऽखन्द्ह अगें। तई न तज़ तनि जाि
ऄभ़गें॥3॥

भ़ि़थग:-श्रा ऱम, लक्ष्मण और सात़ िन को चले गए। मैं न तो
स़थ हा गइ और न मैंने ऄपने प्ऱण हा ईनके स़थ भेजे। यह
सब आन्द्हीं अूँखों के स़मने हुअ, तो भा ऄभ़गे जाि ने शरार
नहीं छोड़॥3॥
* मोऽह न ल़ज ऽनज नेहु ऽनह़रा। ऱम सररस सित मैं महत़रा॥
ऽजऐ मरै भल भीपऽत ज़ऩ। मोर हृदय सत कि ऽलस सम़ऩ॥4॥
भ़ि़थग:-ऄपने स्नेह की ओर देखकर मिझे ल़ज नहीं अता; ऱम
सराखे पित्र की मैं म़त़! जाऩ और मरऩ तो ऱज़ ने खीब
ज़ऩ। मेऱ हृदय तो सैकडों िज्रों के सम़न कठोर है॥4॥
दोह़ :
* कौसल्य़ के बचन सिऽन भरत सऽहत रऽनि़सि।
ब्य़कि ल ऽबलपत ऱजगुह म़नहुूँ सोक नेि़सि ॥166॥
भ़ि़थग:-कौसल्य़जा के िचनों को सिनकर भरत सऽहत स़ऱ
रऽनि़स व्य़कि ल होकर ऽिल़प करने लग़। ऱजमहल म़नो शोक
क़ ऽनि़स बन गय़॥166॥
चौप़इ :
* ऽबलपवह ऽबकल भरत दोई भ़इ। कौसल्य़ूँ ऽलए हृदयूँ लग़इ॥
भ़ूँऽत ऄनेक भरति समिझ़ए। कऽह ऽबबेकमय बचन सिऩए॥1॥

भ़ि़थग:-भरत, शत्रिघ्न दोनों भ़इ ऽिकल होकर ऽिल़प करने लगे।
तब कौसल्य़जा ने ईनको हृदय से लग़ ऽलय़। ऄनेकों प्रक़र से
भरतजा को समझ़य़ और बहुत सा ऽििेकभरा ब़तें ईन्द्हें कहकर
सिऩईं॥1॥
* भरतहुूँ म़ति सकल समिझ़ईं। कऽह पिऱन श्रिऽत कथ़ सिह़ईं॥
छल ऽबहान सिऽच सरल सिब़ना। बोले भरत जोरर जिग प़ना॥2॥
भ़ि़थग:-भरतजा ने भा सब म़त़ओं को पिऱण और िेदों की
सिंदर कथ़एूँ कहकर समझ़य़। दोनों ह़थ जोडकर भरतजा
छलरऽहत, पऽित्र और साधा सिंदर ि़णा बोले-॥2॥
* जे ऄघ म़ति ऽपत़ सित म़रें । ग़आ गोठ मऽहसिर पिर ज़रें ॥
जे ऄघ ऽतय ब़लक बध कीन्द्ह।ें मात महापऽत म़हुर दान्द्ह॥ें 3॥
भ़ि़थग:-जो प़प म़त़-ऽपत़ और पित्र के म़रने से होते हैं और
जो गोश़ल़ और ब्ऱह्मणों के नगर जल़ने से होते हैं, जो प़प
स्त्रा और ब़लक की हत्य़ करने से होते हैं और जो ऽमत्र और
ऱज़ को जहर देने से होते हैं-॥3॥
* जे प़तक ईपप़तक ऄहहीं। करम बचन मन भि कऽब कहहीं॥
ते प़तक मोऽह होहुूँ ऽबध़त़। जौं यहु होआ मोर मत म़त़॥4॥

भ़ि़थग:-कमग, िचन और मन से होने ि़ले ऽजतने प़तक एिं
ईपप़तक (बडे-छोटे प़प) हैं, ऽजनको कऽि लोग कहते हैं, हे
ऽिध़त़! यदद आस क़म में मेऱ मत हो, तो हे म़त़! िे सब
प़प मिझे लगें॥4॥
दोह़ :
* जे पररहरर हरर हर चरन भजवह भीतगन घोर।
तेऽह कआ गऽत मोऽह देई ऽबऽध जौं जनना मत मोर॥167॥
भ़ि़थग:-जो लोग श्रा हरर और श्रा शंकरजा के चरणों को
छोडकर भय़नक भीत-प्रेतों को भजते हैं, हे म़त़! यदद आसमें
मेऱ मत हो तो ऽिध़त़ मिझे ईनकी गऽत दे॥167॥
चौप़इ :
* बेचवह बेद ि धरमि दिऽह लेहीं। ऽपसिन पऱय प़प कऽह देहीं॥
कपटा कि रटल कलहऽप्रय क्रोधा। बेद ऽबदीषक ऽबसि ऽबरोधा॥1॥
भ़ि़थग:-जो लोग िेदों को बेचते हैं, धमग को दिह लेते हैं,
चिगलखोर हैं, दीसरों के प़पों को कह देते हैं, जो कपटा, कि रटल,
कलहऽप्रय और क्रोधा हैं तथ़ जो िेदों की वनद़ करने ि़ले और
ऽिश्वभर के ऽिरोधा हैं,॥1॥

* लोभा लंपट लोलिपच़ऱ। जे त़कवह परधनि परद़ऱ॥
प़िौं मैं ऽतन्द्ह कै गऽत घोऱ। जौं जनना यहु संमत मोऱ॥2॥
भ़ि़थग:-जो लोभा, लम्पट और ल़लऽचयों क़ अचरण करने
ि़ले हैं, जो पऱए धन और पऱइ स्त्रा की त़क में रहते हैं, हे
जनना! यदद आस क़म में मेरा सम्मऽत हो तो मैं ईनकी भय़नक
गऽत को प़उूँ॥2॥
* जे नवह स़धिसग
ं ऄनिऱगे। परम़रथ पथ ऽबमिख ऄभ़गे॥
जे न भजवह हरर नर तनि प़इ। ऽजन्द्हऽह न हरर हर सिजसि
सोह़इ॥3॥
भ़ि़थग:-ऽजनक़ सत्संग में प्रेम नहीं है, जो ऄभ़गे परम़थग के
म़गग से ऽिमिख हैं, जो मनिष्य शरार प़कर श्रा हरर क़ भजन
नहीं करते, ऽजनको हरर-हर (भगि़न ऽिष्णि और शंकरजा) क़
सियश नहीं सिह़त़,॥3॥
* तऽज श्रिऽतपंथि ब़म पथ चलहीं। बंचक ऽबरऽच बेष जगि
छलहीं॥
ऽतन्द्ह कै गऽत मोऽह संकर देउ। जनना जौं यहु ज़नौं भेउ॥4॥
भ़ि़थग:-जो िेद म़गग को छोडकर ि़म (िेद प्रऽतकी ल) म़गग पर
चलते हैं, जो ठग हैं और िेष बऩकर जगत को छलते हैं, हे

म़त़! यदद मैं आस भेद को ज़नत़ भा होउूँ तो शंकरजा मिझे
ईन लोगों की गऽत दें॥4॥
दोह़ :
* म़ति भरत के बचन सिऽन स़ूँचे सरल सिभ़यूँ।
कहऽत ऱम ऽप्रय त़त तिम्ह सद़ बचन मन क़यूँ॥168॥
भ़ि़थग:-म़त़ कौसल्य़जा भरतजा के सि़भ़ऽिक हा सच्चे और
सरल िचनों को सिनकर कहने लगीं- हे त़त! तिम तो मन, िचन
और शरार से सद़ हा श्रा ऱमचन्द्र के प्य़रे हो॥168॥
चौप़इ :
* ऱम प्ऱनहु तें प्ऱन तिम्ह़रे । तिम्ह रघिपऽतऽह प्ऱनहु तें प्य़रे ॥
ऽबधि ऽबष चिै स्रिै ऽहमि अगा। होआ ब़ररचर ब़रर ऽबऱगा॥1॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱम तिम्ह़रे प्ऱणों से भा बढ़कर प्ऱण (ऽप्रय) हैं और
तिम भा श्रा रघिऩथ को प्ऱणों से भा ऄऽधक प्य़रे हो। चन्द्रम़
च़हे ऽिष चिअने लगे और प़ल़ अग बरस़ने लगे, जलचर
जाि जल से ऽिरक्त हो ज़ए,॥1॥
* भएूँ ग्य़नि बरु ऽमटै न मोह। तिम्ह ऱमऽह प्रऽतकी ल न होह॥
मत तिम्ह़र यहु जो जग कहहीं। सो सपनेहुूँ सिख सिगऽत न
लहहीं॥2॥

भ़ि़थग:-और ज्ञ़न हो ज़ने पर भा च़हे मोह न ऽमटे, पर तिम
श्रा ऱमचन्द्र के प्रऽतकी ल कभा नहीं हो सकते। आसमें तिम्ह़रा
सम्मऽत है, जगत में जो कोइ ऐस़ कहते हैं, िे सिप्न में भा सिख
और शिभ गऽत नहीं प़िेंग॥
े 2॥
* ऄस कऽह म़ति भरति ऽहएूँ ल़ए। थन पय स्रिवह नयन जल
छ़ए॥
करत ऽबल़प बहुत एऽह भ़ूँता। बैठेवह बाऽत गइ सब ऱता॥3॥
भ़ि़थग:-ऐस़ कहकर म़त़ कौसल्य़ ने भरतजा को हृदय से
लग़ ऽलय़। ईनके सतनों से दीध बहने लग़ और नेत्रों में
(प्रेम़श्रिओं क़) जल छ़ गय़। आस प्रक़र बहुत ऽिल़प करते हुए
स़रा ऱत बैठे हा बैठे बात गइ॥3॥
* ब़मदेई बऽसष्ठ तब अए। सऽचि मह़जन सकल बोल़ए॥
मिऽन बहु भ़ूँऽत भरत ईपदेस।े कऽह परम़रथ बचन सिदस
े े॥4॥
भ़ि़थग:-तब ि़मदेिजा और िऽशष्ठजा अए। ईन्द्होंने सब मंऽत्रयों
तथ़ मह़जनों को बिल़य़। दफर मिऽन िऽशष्ठजा ने परम़थग के
सिंदर समय़निकील िचन कहकर बहुत प्रक़र से भरतजा को
ईपदेश ददय़॥4॥

िऽशष्ठ-भरत संि़द, श्रा ऱमजा को ल़ने के ऽलए ऽचत्रकी ट ज़ने
की तैय़रा
दोह़ :
* त़त हृदयूँ धारजि धरहु करहु जो ऄिसर अजि।
ईठे भरत गिर बचन सिऽन करन कहेई सबि स़जि॥169॥

भ़ि़थग:-(िऽशष्ठजा ने कह़-) हे त़त! हृदय में धारज धरो और
अज ऽजस क़यग के करने क़ ऄिसर है, ईसे करो। गिरुजा के
िचन सिनकर भरतजा ईठे और ईन्द्होंने सब तैय़रा करने के ऽलए
कह़॥169॥
चौप़इ :
* नुपतनि बेद ऽबददत ऄन्द्हि़ि़। परम ऽबऽचत्र ऽबम़नि बऩि़॥
ग़ऽह पदभरत म़ति सब ऱखा। रहीं ऱऽन दरसन ऄऽभल़षा॥1॥
भ़ि़थग:-िेदों में बत़इ हुइ ऽिऽध से ऱज़ की देह को स्ऩन
कऱय़ गय़ और परम ऽिऽचत्र ऽिम़न बऩय़ गय़। भरतजा ने
सब म़त़ओं को चरण पकडकर रख़ (ऄथ़गत प्ऱथगऩ करके
ईनको सता होने से रोक ऽलय़)। िे ऱऽनय़ूँ भा (श्रा ऱम के )
दशगन की ऄऽभल़ष़ से रह गईं॥1॥
* चंदन ऄगर भ़र बहु अए। ऄऽमत ऄनेक सिगंध सिह़ए॥
सरजि तार रऽच ऽचत़ बऩइ। जनि सिरपिर सोप़न सिह़इ॥2॥
भ़ि़थग:-चंदन और ऄगर के तथ़ और भा ऄनेकों प्रक़र के
ऄप़र (कपीर, गिग्गिल, के सर अदद) सिगंध रव्यों के बहुत से बोझ
अए। सरयीजा के तट पर सिंदर ऽचत़ रचकर बऩइ गइ, (जो
ऐसा म़लीम होता था) म़नो सिगग की सिंदर साढ़ा हो॥2॥

* एऽह ऽबऽध द़ह दक्रय़ सब कीन्द्हा। ऽबऽधित न्द्ह़आ ऽतल़ंजिऽल
दान्द्हा॥
सोऽध सिमुऽत सब बेद पिऱऩ। कीन्द्ह भरत दसग़त ऽबध़ऩ॥3॥
भ़ि़थग:-आस प्रक़र सब द़ह दक्रय़ की गइ और सबने ऽिऽधपीिगक
स्ऩन करके ऽतल़ंजऽल दा। दफर िेद, समुऽत और पिऱण सबक़
मत ऽनश्चय करके ईसके ऄनिस़र भरतजा ने ऽपत़ क़ दशग़त्र
ऽिध़न (दस ददनों के कु त्य) दकय़॥3॥
* जहूँ जस मिऽनबर अयसि दान्द्ह़। तहूँ तस सहस भ़ूँऽत सबि
कीन्द्ह़॥
भए ऽबसिि ददए सब द़ऩ। धेनि ब़ऽज गज ब़हन ऩऩ॥4॥
भ़ि़थग:-मिऽन श्रेष्ठ िऽशष्ठजा ने जह़ूँ जैसा अज्ञ़ दा, िह़ूँ
भरतजा ने सब िैस़ हा हज़रों प्रक़र से दकय़। शिि हो ज़ने
पर (ऽिऽधपीिगक) सब द़न ददए। ग़यें तथ़ घोडे, ह़था अदद
ऄनेक प्रक़र की सि़ररय़ूँ,॥4॥
दोह़ :
* वसघ़सन भीषन बसन ऄन्न धरऽन धन ध़म।
ददए भरत लऽह भीऽमसिर भे पररपीरन क़म॥170॥

भ़ि़थग:-वसह़सन, गहने, कपडे, ऄन्न, पुथ्िा, धन और मक़न
भरतजा ने ददए, भीदि
े ब्ऱह्मण द़न प़कर पररपीणगक़म हो गए
(ऄथ़गत ईनकी स़रा मनोक़मऩएूँ ऄच्छा तरह से पीरा हो
गईं)॥170॥
चौप़इ :
* ऽपति ऽहत भरत कीऽन्द्ह जऽस करना। सो मिख ल़ख ज़आ नवह
बरना॥
सिददनि सोऽध मिऽनबर तब अए। सऽचि मह़जन सकल
बोल़ए॥1॥
भ़ि़थग:-ऽपत़जा के ऽलए भरतजा ने जैसा करना की िह ल़खों
मिखों से भा िणगन नहीं की ज़ सकता। तब शिभ ददन शोधकर
श्रेष्ठ मिऽन िऽशष्ठजा अए और ईन्द्होंने मंऽत्रयों तथ़ सब मह़जनों
को बिलि़य़॥1॥
* बैठे ऱजसभ़ूँ सब ज़इ। पठए बोऽल भरत दोई भ़इ॥
भरति बऽसष्ठ ऽनकट बैठ़रे । नाऽत धरममय बचन ईच़रे ॥2॥
भ़ि़थग:-सब लोग ऱजसभ़ में ज़कर बैठ गए। तब मिऽन ने
भरतजा तथ़ शत्रिघ्नजा दोनों भ़आयों को बिलि़ भेज़। भरतजा
को िऽशष्ठजा ने ऄपने प़स बैठ़ ऽलय़ और नाऽत तथ़ धमग से
भरे हुए िचन कहे॥2॥

* प्रथम कथ़ सब मिऽनबर बरना। कै कआ कि रटल कीऽन्द्ह जऽस
करना॥
भीप धरमिब्रति सत्य सऱह़। जेवह तनि पररहरर प्रेमि ऽनब़ह़॥3॥
भ़ि़थग:-पहले तो कै के या ने जैसा कि रटल करना की था, श्रेष्ठ
मिऽन ने िह स़रा कथ़ कहा। दफर ऱज़ के धमगव्रत और सत्य
की सऱहऩ की, ऽजन्द्होंने शरार त्य़ग कर प्रेम को ऽनब़ह़॥3॥
* कहत ऱम गिन साल सिभ़उ। सजल नयन पिलके ई मिऽनऱउ॥
बहुरर लखन ऽसय प्राऽत बख़ना। सोक सनेह मगन मिऽन
ग्य़ना॥4॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचन्द्रजा के गिण, शाल और सिभ़ि क़ िणगन
करते-करते तो मिऽनऱज के नेत्रों में जल भर अय़ और िे शरार
से पिलदकत हो गए। दफर लक्ष्मणजा और सात़जा के प्रेम की
बड़इ करते हुए ज्ञ़ना मिऽन शोक और स्नेह में मग्न हो गए॥4॥
दोह़ :
* सिनहु भरत भ़िा प्रबल ऽबलऽख कहेई मिऽनऩथ।
ह़ऽन ल़भि जािनि मरनि जसि ऄपजसि ऽबऽध ह़थ॥171॥

भ़ि़थग:-मिऽनऩथ ने ऽबलखकर (दिःखा होकर) कह़- हे भरत!
सिनो, भ़िा (होनह़र) बडा बलि़न है। ह़ऽन-ल़भ, जािन-मरण
और यश-ऄपयश, ये सब ऽिध़त़ के ह़थ हैं॥171॥
चौप़इ :
* ऄस ऽबच़रर के ऽह देआऄ दोसी। ब्यरथ क़ऽह पर कीऽजऄ रोसी॥
त़त ऽबच़रु करहु मन म़हीं। सोच जोगि दसरथि नुपि ऩहीं॥1॥
भ़ि़थग:-ऐस़ ऽिच़र कर दकसे दोष ददय़ ज़ए? और व्यथग दकस
पर क्रोध दकय़ ज़ए? हे त़त! मन में ऽिच़र करो। ऱज़
दशरथ सोच करने के योग्य नहीं हैं॥1॥
* सोऽचऄ ऽबप्र जो बेद ऽबहाऩ। तऽज ऽनज धरमि ऽबषय
लयलाऩ॥
सोऽचऄ नुपऽत जो नाऽत न ज़ऩ। जेऽह न प्रज़ ऽप्रय प्ऱन
सम़ऩ॥2॥
भ़ि़थग:-सोच ईस ब्ऱह्मण क़ करऩ च़ऽहए, जो िेद नहीं
ज़नत़ और जो ऄपऩ धमग छोडकर ऽिषय भोग में हा लान
रहत़ है। ईस ऱज़ क़ सोच करऩ च़ऽहए, जो नाऽत नहीं
ज़नत़ और ऽजसको प्रज़ प्ऱणों के सम़न प्य़रा नहीं है॥2॥

* सोऽचऄ बयसि कु पन धनि़नी। जो न ऄऽतऽथ ऽसि भगऽत
सिज़नी॥
सोऽचऄ सीर ि ऽबप्र ऄिम़ना। मिखर म़नऽप्रय ग्य़न गिम़ना॥3॥
भ़ि़थग:-ईस िैश्य क़ सोच करऩ च़ऽहए, जो धनि़न होकर
भा कं जीस है और जो ऄऽतऽथ सत्क़र तथ़ ऽशिजा की भऽक्त
करने में कि शल नहीं है। ईस शीर क़ सोच करऩ च़ऽहए, जो
ब्ऱह्मणों क़ ऄपम़न करने ि़ल़, बहुत बोलने ि़ल़, म़न-बड़इ
च़हने ि़ल़ और ज्ञ़न क़ घमंड रखने ि़ल़ है॥3॥
* सोऽचऄ पिऽन पऽत बंचक ऩरा। कि रटल कलहऽप्रय आच्छ़च़रा॥
सोऽचऄ बटि ऽनज ब्रति पररहरइ। जो नवह गिर अयसि ऄनिसरइ॥4॥
भ़ि़थग:-पिनः ईस स्त्रा क़ सोच करऩ च़ऽहए जो पऽत को
छलने ि़ला, कि रटल, कलहऽप्रय और सिेच्छ़ च़ररणा है। ईस
ब्रह्मच़रा क़ सोच करऩ च़ऽहए, जो ऄपने ब्रह्मचयग व्रत को
छोड देत़ है और गिरु की अज्ञ़ के ऄनिस़र नहीं चलत़॥4॥
दोह़ :
* सोऽचऄ गुहा जो मोह बस करआ करम पथ त्य़ग।
सोऽचऄ जता प्रपंच रत ऽबगत ऽबबेक ऽबऱग॥172॥

भ़ि़थग:-ईस गुहसथ क़ सोच करऩ च़ऽहए, जो मोहिश कमग
म़गग क़ त्य़ग कर देत़ है, ईस संन्द्य़सा क़ सोच करऩ
च़ऽहए, जो दिऽनय़ के प्रपंच में फूँ स़ हुअ और ज्ञ़न-िैऱग्य से
हान है॥172॥
चौप़इ :
* बैख़नस सोआ सोचै जोगी। तपि ऽबह़आ जेऽह भ़िआ भोगी॥
सोऽचऄ ऽपसिन ऄक़रन क्रोधा। जनऽन जनक गिर बंधि ऽबरोधा॥1॥
भ़ि़थग:-ि़नप्रसथ िहा सोच करने योग्य है, ऽजसको तपसय़
छोडकर भोग ऄच्छे लगते हैं। सोच ईसक़ करऩ च़ऽहए जो
चिगलखोर है, ऽबऩ हा क़रण क्रोध करने ि़ल़ है तथ़ म़त़,
ऽपत़, गिरु एिं भ़इ-बंधिओं के स़थ ऽिरोध रखने ि़ल़ है॥1॥
* सब ऽबऽध सोऽचऄ पर ऄपक़रा। ऽनज तनि पोषक ऽनरदय
भ़रा॥
सोचनाय सबहीं ऽबऽध सोइ। जो न छ़ऽड छलि हरर जन होइ॥2॥
भ़ि़थग:-सब प्रक़र से ईसक़ सोच करऩ च़ऽहए, जो दीसरों क़
ऄऽनष्ट करत़ है, ऄपने हा शरार क़ पोषण करत़ है और बड़
भ़रा ऽनदगया है और िह तो सभा प्रक़र से सोच करने योग्य
है, जो छल छोडकर हरर क़ भक्त नहीं होत़॥2॥

* सोचनाय नवह कोसलऱउ। भििन च़ररदस प्रगट प्रभ़उ॥
भयई न ऄहआ न ऄब होऽनह़ऱ। भीप भरत जस ऽपत़
तिम्ह़ऱ॥3॥
भ़ि़थग:-कोसलऱज दशरथजा सोच करने योग्य नहीं हैं, ऽजनक़
प्रभ़ि चौदहों लोकों में प्रकट है। हे भरत! तिम्ह़रे ऽपत़ जैस़
ऱज़ तो न हुअ, न है और न ऄब होने क़ हा है॥3॥
* ऽबऽध हरर हरु सिरपऽत ददऽसऩथ़। बरनवह सब दसरथ गिन
ग़थ़॥4॥
भ़ि़थग:-हब्रह्म़, ऽिष्णि, ऽशि, आन्द्र और ददक्प़ल सभा दशरथजा
के गिणों की कथ़एूँ कह़ करते हैं॥4॥
दोह़ :
* कहहु त़त के ऽह भ़ूँऽत कोई कररऽह बड़इ त़सि।
ऱम लखन तिम्ह सत्रिहन सररस सिऄन सिऽच ज़सि॥173॥
भ़ि़थग:-हे त़त! कहो, ईनकी बड़इ कोइ दकस प्रक़र करे ग़,
ऽजनके श्रा ऱम, लक्ष्मण, तिम और शत्रिघ्न-सराखे पऽित्र पित्र
हैं?॥173॥
चौप़इ :

* सब प्रक़र भीपऽत बडभ़गा। ब़दद ऽबष़दि कररऄ तेऽह ल़गा॥
यह सिऽन समिऽझ सोचि पररहरह। ऽसर धरर ऱज रज़यसि
करह॥1॥
भ़ि़थग:-ऱज़ सब प्रक़र से बडभ़गा थे। ईनके ऽलए ऽिष़द
करऩ व्यथग है। यह सिन और समझकर सोच त्य़ग दो और
ऱज़ की अज्ञ़ ऽसर चढ़़कर तदनिस़र करो॥1॥
* ऱयूँ ऱजपदि तिम्ह कहुूँ दान्द्ह़। ऽपत़ बचनि फि र च़ऽहऄ
कीन्द्ह़॥
तजे ऱमि जेवह बचनऽह ल़गा। तनि पररहरे ई ऱम ऽबरह़गा॥2॥
भ़ि़थग:-ऱज़ ने ऱज पद तिमको ददय़ है। ऽपत़ क़ िचन तिम्हें
सत्य करऩ च़ऽहए, ऽजन्द्होंने िचन के ऽलए हा श्रा ऱमचन्द्रजा
को त्य़ग ददय़ और ऱमऽिरह की ऄऽग्न में ऄपने शरार की
अहुऽत दे दा॥2॥
* नुपऽह बचन ऽप्रय नवह ऽप्रय प्ऱऩ। करहु त़त ऽपति बचन
प्रि़ऩ॥
करहु सास धरर भीप रज़इ। हआ तिम्ह कहूँ सब भ़ूँऽत भल़इ॥3॥
भ़ि़थग:-ऱज़ को िचन ऽप्रय थे, प्ऱण ऽप्रय नहीं थे, आसऽलए हे
त़त! ऽपत़ के िचनों को प्रम़ण (सत्य) करो! ऱज़ की अज्ञ़
ऽसर चढ़़कर प़लन करो, आसमें तिम्ह़रा सब तरह भल़इ है॥3॥

* परसिऱम ऽपति ऄग्य़ ऱखा। म़रा म़ति लोक सब स़खा॥
तनय जज़ऽतऽह जौबनि दयउ। ऽपति ऄग्य़ूँ ऄघ ऄजसि न
भयउ॥4॥
भ़ि़थग:-परशिऱमजा ने ऽपत़ की अज्ञ़ रखा और म़त़ को म़र
ड़ल़, सब लोक आस ब़त के स़क्षा हैं। ऱज़ यय़ऽत के पित्र ने
ऽपत़ को ऄपना जि़ना दे दा। ऽपत़ की अज्ञ़ प़लन करने से
ईन्द्हें प़प और ऄपयश नहीं हुअ॥4॥
दोह़ :
* ऄनिऽचत ईऽचत ऽबच़रु तऽज ते प़लवह ऽपति बैन।
ते भ़जन सिख सिजस के बसवह ऄमरपऽत ऐन॥174॥
भ़ि़थग:-जो ऄनिऽचत और ईऽचत क़ ऽिच़र छोडकर ऽपत़ के
िचनों क़ प़लन करते हैं, िे (यह़ूँ) सिख और सियश के प़त्र
होकर ऄंत में आन्द्रपिरा (सिगग) में ऽनि़स करते हैं॥174॥
चौप़इ :
* ऄिऽस नरे स बचन फि र करह। प़लहु प्रज़ सोकि पररहरह॥
सिरपिर नुपि प़आऽह पररतोषी। तिम्ह कहुूँ सिकुति सिजसि नवह दोषी॥1॥

भ़ि़थग:-ऱज़ क़ िचन ऄिश्य सत्य करो। शोक त्य़ग दो और
प्रज़ क़ प़लन करो। ऐस़ करने से सिगग में ऱज़ संतोष प़िेंगे
और तिम को पिण्य और सिंदर यश ऽमलेग़, दोष नहीं लगेग़॥1॥
* बेद ऽबददत संमत सबहा क़। जेऽह ऽपति देआ सो प़िआ टाक़॥
करहु ऱजि पररहरहु गल़ना। म़नहु मोर बचन ऽहत ज़ना॥2॥
भ़ि़थग:-यह िेद में प्रऽसि है और (समुऽत-पिऱण़दद) सभा श़स्त्रों
के ि़ऱ सम्मत है दक ऽपत़ ऽजसको दे िहा ऱजऽतलक प़त़ है,
आसऽलए तिम ऱज्य करो, ग्ल़ऽन क़ त्य़ग कर दो। मेरे िचन
को ऽहत समझकर म़नो॥2॥
* सिऽन सिखि लहब ऱम बैदह
े ीं। ऄनिऽचत कहब न पंऽडत के हीं॥
कौसल्य़दद सकल महत़रीं। तेई प्रज़ सिख होवह सिख़रीं॥3॥
भ़ि़थग:-आस ब़त को सिनकर श्रा ऱमचन्द्रजा और ज़नकीजा सिख
प़िेंगे और कोइ पंऽडत आसे ऄनिऽचत नहीं कहेग़। कौसल्य़जा
अदद तिम्ह़रा सब म़त़एूँ भा प्रज़ के सिख से सिखा होंगा॥
* परम तिम्ह़र ऱम कर ज़ऽनऽह। सो सब ऽबऽध तिम्ह सन भल
म़ऽनऽह॥
सौंपेहु ऱजि ऱम के अएूँ। सेि़ करे हु सनेह सिह़एूँ॥4॥

भ़ि़थग:-जो तिम्ह़रे और श्रा ऱमचन्द्रजा के श्रेष्ठ संबध
ं को ज़न
लेग़, िह सभा प्रक़र से तिमसे भल़ म़नेग़। श्रा ऱमचन्द्रजा के
लौट अने पर ऱज्य ईन्द्हें सौंप देऩ और सिंदर स्नेह से ईनकी
सेि़ करऩ॥4॥
दोह़ :
* कीऽजऄ गिर अयसि ऄिऽस कहवह सऽचि कर जोरर।
रघिपऽत अएूँ ईऽचत जस तस तब करब बहोरर॥175॥
भ़ि़थग:-मंत्रा ह़थ जोडकर कह रहे हैं- गिरुजा की अज्ञ़ क़
ऄिश्य हा प़लन कीऽजए। श्रा रघिऩथजा के लौट अने पर जैस़
ईऽचत हो, तब दफर िैस़ हा कीऽजएग़॥175॥
चौप़इ :
* कौसल्य़ धरर धारजि कहइ। पीत पथ्य गिर अयसि ऄहइ॥
सो अदररऄ कररऄ ऽहत म़ना। तऽजऄ ऽबष़दि क़ल गऽत
ज़ना॥1॥
भ़ि़थग:-कौसल्य़जा भा धारज धरकर कह रहा हैं- हे पित्र!
गिरुजा की अज्ञ़ पथ्य रूप है। ईसक़ अदर करऩ च़ऽहए और
ऽहत म़नकर ईसक़ प़लन करऩ च़ऽहए। क़ल की गऽत को
ज़नकर ऽिष़द क़ त्य़ग कर देऩ च़ऽहए॥1॥
* बन रघिपऽत सिरपऽत नरऩह। तिम्ह एऽह भ़ूँऽत त़त कदऱह॥

पररजन प्रज़ सऽचि सब ऄंब़। तिम्हहीं सित सब कहूँ
ऄिलंब़॥2॥
भ़ि़थग:-श्रा रघिऩथजा िन में हैं, मह़ऱज सिगग क़ ऱज्य करने
चले गए और हे त़त! तिम आस प्रक़र क़तर हो रहे हो। हे
पित्र! कि टि म्ब, प्रज़, मंत्रा और सब म़त़ओं के , सबके एक तिम हा
सह़रे हो॥2॥
* लऽख ऽबऽध ब़म क़लि करठऩइ। धारजि धरहु म़ति बऽल ज़इ॥
ऽसर धरर गिर अयसि ऄनिसरह। प्रज़ प़ऽल पररजन दिखि हरह॥3॥
भ़ि़थग:-ऽिध़त़ को प्रऽतकी ल और क़ल को कठोर देखकर धारज
धरो, म़त़ तिम्ह़रा बऽलह़रा ज़ता है। गिरु की अज्ञ़ को ऽसर
चढ़़कर ईसा के ऄनिस़र क़यग करो और प्रज़ क़ प़लन कर
कि टि ऽम्बयों क़ दिःख हरो॥3॥
* गिरु के बचन सऽचि ऄऽभनंदनि। सिने भरत ऽहय ऽहत जनि
चंदनि॥
सिना बहोरर म़ति मुद ि ब़ना। साल सनेह सरल रस स़ना॥4॥
भ़ि़थग:-भरतजा ने गिरु के िचनों और मंऽत्रयों के ऄऽभनंदन
(ऄनिमोदन) को सिऩ, जो ईनके हृदय के ऽलए म़नो चंदन के

सम़न (शातल) थे। दफर ईन्द्होंने शाल, स्नेह और सरलत़ के रस
में सना हुइ म़त़ कौसल्य़ की कोमल ि़णा सिना॥4॥
छंद :
* स़ना सरल रस म़ति ब़ना सिऽन भरति ब्य़कि ल भए।
लोचन सरोरुह स्रित सींचत ऽबरह ईर ऄंकिर नए॥
सो दस़ देखत समय तेऽह ऽबसरा सबऽह सिऽध देह की।
तिलसा सऱहत सकल स़दर सािूँ सहज सनेह की॥
भ़ि़थग:-सरलत़ के रस में सना हुइ म़त़ की ि़णा सिनकर
भरतजा व्य़कि ल हो गए। ईनके नेत्र कमल जल (अूँसी) बह़कर
हृदय के ऽिरह रूपा निान ऄंकिर को सींचने लगे। (नेत्रों के
अूँसिओं ने ईनके ऽियोग-दिःख को बहुत हा बढ़़कर ईन्द्हें ऄत्यन्द्त
व्य़कि ल कर ददय़।) ईनकी िह दश़ देखकर ईस समय सबको
ऄपने शरार की सिध भील गइ। तिलसाद़सजा कहते हैंसि़भ़ऽिक प्रेम की साम़ श्रा भरतजा की सब लोग अदरपीिगक
सऱहऩ करने लगे।
सोरठ़ :
* भरति कमल कर जोरर धार धिरंधर धार धरर।
बचन ऄऽमऄूँ जनि बोरर देत ईऽचत ईिर सबऽह॥176॥

भ़ि़थग:-धैयग की धिरा को ध़रण करने ि़ले भरतजा धारज
धरकर, कमल के सम़न ह़थों को जोडकर, िचनों को म़नो
ऄमुत में डि ब़कर सबको ईऽचत ईिर देने लगे-॥176॥

म़सप़ऱयण, ऄठ़रहि़ूँ ऽिश्ऱम
चौप़इ :
* मोऽह ईपदेसि दान्द्ह गिरु नाक़। प्रज़ सऽचि संमत सबहा क़॥
म़ति ईऽचत धरर अयसि दान्द्ह़। ऄिऽस सास धरर च़हईूँ
कीन्द्ह़॥1॥
भ़ि़थग:-गिरुजा ने मिझे सिंदर ईपदेश ददय़। (दफर) प्रज़, मंत्रा
अदद सभा को यहा सम्मत है। म़त़ ने भा ईऽचत समझकर हा
अज्ञ़ दा है और मैं भा ऄिश्य ईसको ऽसर चढ़़कर िैस़ हा
करऩ च़हत़ हूँ॥1॥
* गिर ऽपति म़ति सि़ऽम ऽहत ब़ना। सिऽन मन मिददत कररऄ
भऽल ज़ना॥
ईऽचत दक ऄनिऽचत दकएूँ ऽबच़रू। धरमि ज़आ ऽसर प़तक
भ़रू॥2॥

भ़ि़थग:-(क्योंदक) गिरु, ऽपत़, म़त़, सि़मा और सिहृद् (ऽमत्र) की
ि़णा सिनकर प्रसन्न मन से ईसे ऄच्छा समझकर करऩ (म़नऩ)
च़ऽहए। ईऽचत-ऄनिऽचत क़ ऽिच़र करने से धमग ज़त़ है और
ऽसर पर प़प क़ भ़र चढ़त़ है॥2॥
* तिम्ह तौ देहु सरल ऽसख सोइ। जो अचरत मोर भल होइ॥
जद्यऽप यह समिझत हईूँ नाकें । तदऽप होत पररतोष न जा कें ॥3॥
भ़ि़थग:-अप तो मिझे िहा सरल ऽशक्ष़ दे रहे हैं, ऽजसके
अचरण करने में मेऱ भल़ हो। यद्यऽप मैं आस ब़त को
भलाभ़ूँऽत समझत़ हूँ, तथ़ऽप मेरे हृदय को संतोष नहीं
होत़॥3॥
* ऄब तिम्ह ऽबनय मोरर सिऽन लेह। मोऽह ऄनिहरत ऽसख़िनि
देह॥
उतरु देईूँ छमब ऄपऱधी। दिऽखत दोष गिन गनवह न स़धी॥4॥
भ़ि़थग:-ऄब अप लोग मेरा ऽिनता सिन लाऽजए और मेरा
योग्यत़ के ऄनिस़र मिझे ऽशक्ष़ दाऽजए। मैं ईिर दे रह़ हूँ, यह
ऄपऱध क्षम़ कीऽजए। स़धि पिरुष दिःखा मनिष्य के दोष-गिणों को
नहीं ऽगनते।
दोह़ :
* ऽपति सिरपिर ऽसय ऱमि बन करन कहहु मोऽह ऱजि।

एऽह तें ज़नहु मोर ऽहत कै अपन बड क़जि॥177॥
भ़ि़थग:-ऽपत़जा सिगग में हैं, श्रा सात़ऱमजा िन में हैं और मिझे
अप ऱज्य करने के ऽलए कह रहे हैं। आसमें अप मेऱ कल्य़ण
समझते हैं य़ ऄपऩ कोइ बड़ क़म (होने की अश़ रखते
हैं)?॥177॥
चौप़इ :
* ऽहत हम़र ऽसयपऽत सेिक़ईं। सो हरर लान्द्ह म़ति कि रटल़ईं॥
मैं ऄनिम़ऽन दाख मन म़हीं। अन ईप़यूँ मोर ऽहत ऩहीं॥1॥
भ़ि़थग:-मेऱ कल्य़ण तो सात़पऽत श्रा ऱमजा की च़करा में है,
सो ईसे म़त़ की कि रटलत़ ने छान ऽलय़। मैंने ऄपने मन में
ऄनिम़न करके देख ऽलय़ है दक दीसरे दकसा ईप़य से मेऱ
कल्य़ण नहीं है॥1॥
* सोक सम़जि ऱजि के ऽह लेख।ें लखन ऱम ऽसय ऽबनि पद देखें॥
ब़दद बसन ऽबनि भीषन भ़रू। ब़दद ऽबरऽत ऽबनि ब्रह्मऽबच़रू॥2॥
भ़ि़थग:-यह शोक क़ समिद़य ऱज्य लक्ष्मण, श्रा ऱमचंरजा और
सात़जा के चरणों को देखे ऽबऩ दकस ऽगनता में है (आसक़ क्य़
मील्य है)? जैसे कपडों के ऽबऩ गहनों क़ बोझ व्यथग है। िैऱग्य
के ऽबऩ ब्रह्मऽिच़र व्यथग है॥2॥

* सरुज सरार ब़दद बहु भोग़। ऽबनि हररभगऽत ज़यूँ जप
जोग़॥
ज़यूँ जाि ऽबनि देह सिह़इ। ब़दद मोर सबि ऽबनि रघिऱइ॥3॥
भ़ि़थग:-रोगा शरार के ऽलए ऩऩ प्रक़र के भोग व्यथग हैं। श्रा
हरर की भऽक्त के ऽबऩ जप और योग व्यथग हैं। जाि के ऽबऩ
सिंदर देह व्यथग है, िैसे हा श्रा रघिऩथजा के ऽबऩ मेऱ सब
कि छ व्यथग है॥3॥
* ज़ईूँ ऱम पवह अयसि देह। एक़वह अूँक मोर ऽहत एह॥
मोऽह नुप करर भल अपन चहह। सोई सनेह जडत़ बस
कहह॥4॥
भ़ि़थग:-मिझे अज्ञ़ दाऽजए, मैं श्रा ऱमजा के प़स ज़उूँ! एक
हा अूँक (ऽनश्चयपीिगक) मेऱ ऽहत आसा में है। और मिझे ऱज़
बऩकर अप ऄपऩ भल़ च़हते हैं, यह भा अप स्नेह की
जडत़ (मोह) के िश होकर हा कह रहे हैं॥4॥
दोह़ :
* कै के इ सिऄ कि रटलमऽत ऱम ऽबमिख गतल़ज।
तिम्ह च़हत सिखि मोहबस मोऽह से ऄधम कें ऱज॥178॥

भ़ि़थग:-कै के या के पित्र, कि रटलबिऽि, ऱमऽिमिख और ऽनलगज्ज मिझ
से ऄधम के ऱज्य से अप मोह के िश होकर हा सिख च़हते
हैं॥178॥
चौप़इ :
* कहईूँ स़ूँचि सब सिऽन पऽतअह। च़ऽहऄ धरमसाल नरऩह॥
मोऽह ऱजि हरठ देआहहु जबहीं। रस़ रस़तल ज़आऽह तबहीं॥1॥
भ़ि़थग:-मैं सत्य कहत़ हूँ, अप सब सिनकर ऽिश्व़स करें ,
धमगशाल को हा ऱज़ होऩ च़ऽहए। अप मिझे हठ करके ज्यों
हा ऱज्य देंग,े त्यों हा पुथ्िा प़त़ल में धूँस ज़एगा॥1॥
* मोऽह सम़न को प़प ऽनि़सी। जेऽह लऽग साय ऱम बनब़सी॥
ऱयूँ ऱम कहुूँ क़ननि दान्द्ह़। ऽबछि रत गमनि ऄमरपिर कीन्द्ह़॥2॥
भ़ि़थग:-मेरे सम़न प़पों क़ घर कौन होग़, ऽजसके क़रण
सात़जा और श्रा ऱमजा क़ िनि़स हुअ? ऱज़ ने श्रा ऱमजा
को िन ददय़ और ईनके ऽबछि डते हा सियं सिगग को गमन
दकय़॥2॥
* मैं सठि सब ऄनरथ कर हेत।ी बैठ ब़त सब सिनईूँ सचेती॥
ऽबन रघिबार ऽबलोदक ऄब़सी। रहे प्ऱन सऽह जग ईपह़सी॥3॥

भ़ि़थग:-और मैं दिष्ट, जो ऄनथों क़ क़रण हूँ, होश-हि़स में
बैठ़ सब ब़तें सिन रह़ हूँ। श्रा रघिऩथजा से रऽहत घर को
देखकर और जगत् क़ ईपह़स सहकर भा ये प्ऱण बने हुए
हैं॥3॥
* ऱम पिनात ऽबषय रस रूखे। लोलिप भीऽम भोग के भीखे॥
कहूँ लऽग कहौं हृदय करठऩइ। ऽनदरर कि ऽलसि जेवह लहा
बड़इ॥4॥
भ़ि़थग:-(आसक़ यहा क़रण है दक ये प्ऱण) श्रा ऱम रूपा पऽित्र
ऽिषय रस में असक्त नहीं हैं। ये ल़लचा भीऽम और भोगों के हा
भीखे हैं। मैं ऄपने हृदय की कठोरत़ कह़ूँ तक कहूँ? ऽजसने िज्र
क़ भा ऽतरसक़र करके बड़इ प़इ है॥4॥
दोह़ :
* क़रन तें क़रजि करठन होआ दोसि नवह मोर।
कि ऽलस ऄऽसथ तें ईपल तें लोह कऱल कठोर॥179॥
भ़ि़थग:-क़रण से क़यग करठन होत़ हा है, आसमें मेऱ दोष
नहीं। हड्डा से िज्र और पत्थर से लोह़ भय़नक और कठोर
होत़ है॥179॥
चौप़इ :

* कै के इ भि तनि ऄनिऱगे। प़िूँर प्ऱन ऄघ़आ ऄभ़गे॥
जौं ऽप्रय ऽबरहूँ प्ऱन ऽप्रय ल़गे। देखब सिनब बहुत ऄब अगे॥1॥
भ़ि़थग:-कै के या से ईत्पन्न देह में प्रेम करने ि़ले ये प़मर प्ऱण
भरपेट (पीरा तरह से) ऄभ़गे हैं। जब ऽप्रय के ऽियोग में भा
मिझे प्ऱण ऽप्रय लग रहे हैं, तब ऄभा अगे मैं और भा बहुत
कि छ देख-ीूँ सिनीूँग़॥1॥
* लखन ऱम ऽसय कहुूँ बनि दान्द्ह़। पठआ ऄमरपिर पऽत ऽहत
कीन्द्ह़॥
लान्द्ह ऽबधिपन ऄपजसि अपी। दान्द्हई
े प्रजऽह सोकि संत़पी॥2॥
भ़ि़थग:-लक्ष्मण, श्रा ऱमजा और सात़जा को तो िन ददय़,
सिगग भेजकर पऽत क़ कल्य़ण दकय़, सियं ऽिधि़पन और
ऄपयश ऽलय़, प्रज़ को शोक और संत़प ददय़,॥2॥
* मोऽह दान्द्ह सिखि सिजसि सिऱजी। कीन्द्ह कै कईं सब कर क़जी॥
ऐऽह तें मोर क़ह ऄब नाक़। तेऽह पर देन कहहु तिम्ह टाक़॥3॥
भ़ि़थग:-और मिझे सिख, सिंदर यश और ईिम ऱज्य ददय़! कै के या
ने सभा क़ क़म बऩ ददय़! आससे ऄच्छ़ ऄब मेरे ऽलए और
क्य़ होग़? ईस पर भा अप लोग मिझे ऱजऽतलक देने को
कहते हैं!॥3॥

* कै कआ जठर जनऽम जग म़हीं। यह मोऽह कहूँ कछि ऄनिऽचत
ऩहीं॥
मोरर ब़त सब ऽबऽधवह बऩइ। प्रज़ प़ूँच कत करहु सह़इ॥4॥
भ़ि़थग:-कै कया के पेट से जगत् में जन्द्म लेकर यह मेरे ऽलए
कि छ भा ऄनिऽचत नहीं है। मेरा सब ब़त तो ऽिध़त़ ने हा बऩ
दा है। (दफर) ईसमें प्रज़ और पंच (अप लोग) क्यों सह़यत़
कर रहे हैं?॥4॥
दोह़ :
* ग्रह ग्रहात पिऽन ब़त बस तेऽह पिऽन बाछा म़र।
तेऽह ऽपअआऄ ब़रुना कहहु क़ह ईपच़र॥180॥
भ़ि़थग:-ऽजसे कि ग्रह लगे हों (ऄथि़ जो ऽपश़चग्रसत हो), दफर
जो ि़यिरोग से पाऽडत हो और ईसा को दफर ऽबच्छी डंक म़र
दे, ईसको यदद मददऱ ऽपल़इ ज़ए, तो कऽहए यह कै स़ आल़ज
है!॥180॥
चौप़इ :
* कै कआ सिऄन जोगि जग जोइ। चतिर ऽबरं ऽच दान्द्ह मोऽह सोइ॥
दसरथ तनय ऱम लघि भ़इ। दाऽन्द्ह मोऽह ऽबऽध ब़दद बड़इ॥1॥

भ़ि़थग:-कै के या के लडके के ऽलए संस़र में जो कि छ योग्य थ़,
चतिर ऽिध़त़ ने मिझे िहा ददय़। पर 'दशरथजा क़ पित्र' और
'ऱम क़ छोट़ भ़इ' होने की बड़इ मिझे ऽिध़त़ ने व्यथग हा
दा॥1॥
* तिम्ह सब कहहु कढ़़िन टाक़। ऱय रज़यसि सब कहूँ नाक़॥
ईतरु देईूँ के ऽह ऽबऽध के ऽह के हा। कहहु सिखेन जथ़ रुऽच
जेहा॥2॥
भ़ि़थग:-अप सब लोग भा मिझे टाक़ कढ़़ने के ऽलए कह रहे
हैं! ऱज़ की अज्ञ़ सभा के ऽलए ऄच्छा है। मैं दकस-दकस को
दकस-दकस प्रक़र से ईिर दी?
ूँ ऽजसकी जैसा रुऽच हो, अप लोग
सिखपीिगक िहा कहें॥2॥
* मोऽह कि म़ति समेत ऽबह़इ। कहहु कऽहऽह के कीन्द्ह भल़इ॥
मो ऽबनि को सचऱचर म़हीं। जेऽह ऽसय ऱमि प्ऱनऽप्रय ऩहीं॥3॥
भ़ि़थग:-मेरा कि म़त़ कै के या समेत मिझे छोडकर, कऽहए और
कौन कहेग़ दक यह क़म ऄच्छ़ दकय़ गय़? जड-चेतन जगत्
में मेरे ऽसि़ और कौन है, ऽजसको श्रा सात़-ऱमजा प्ऱणों के
सम़न प्य़रे न हों॥3॥
* परम ह़ऽन सब कहूँ बड ल़ह। ऄददनि मोर नवह दीषन क़ह॥

संसय साल प्रेम बस ऄहह। सबिआ ईऽचत सब जो कछि कहह॥4॥
भ़ि़थग:-जो परम ह़ऽन है, ईसा में सबको बड़ ल़भ ददख रह़
है। मेऱ बिऱ ददन है दकसा क़ दोष नहीं। अप सब जो कि छ
कहते हैं सो सब ईऽचत हा है, क्योंदक अप लोग संशय, शाल
और प्रेम के िश हैं॥4॥
दोह़ :
* ऱम म़ति सिरठ सरलऽचत मो पर प्रेमि ऽबसेऽष।
कहआ सिभ़य सनेह बस मोरर दानत़ देऽख॥181॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचंरजा की म़त़ बहुत हा सरल हृदय हैं और
मिझ पर ईनक़ ऽिशेष प्रेम है, आसऽलए मेरा दानत़ देखकर िे
सि़भ़ऽिक स्नेहिश हा ऐस़ कह रहा हैं॥181॥
चौप़इ :
* गिर ऽबबेक स़गर जगि ज़ऩ। ऽजन्द्हऽह ऽबसि कर बदर
सम़ऩ॥
मो कहूँ ऽतलक स़ज सज सोउ। भएूँ ऽबऽध ऽबमिख ऽबमिख सबि
कोउ॥1॥
भ़ि़थग:-गिरुजा ज्ञ़न के समिर हैं, आस ब़त को स़ऱ जगत्
ज़नत़ है, ऽजसके ऽलए ऽिश्व हथेला पर रखे हुए बेर के सम़न

है, िे भा मेरे ऽलए ऱजऽतलक क़ स़ज सज रहे हैं। सत्य है,
ऽिध़त़ के ऽिपरात होने पर सब कोइ ऽिपरात हो ज़ते हैं॥1॥
* पररहरर ऱमि साय जग म़हीं। कोई न कऽहऽह मोर मत
ऩहीं॥
सो मैं सिनब सहब सिखि म़ना। ऄंतहुूँ कीच तह़ूँ जहूँ प़ना॥2॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचंरजा और सात़जा को छोडकर जगत् में कोइ
यह नहीं कहेग़ दक आस ऄनथग में मेरा सम्मऽत नहीं है। मैं ईसे
सिखपीिगक सिनीूँग़ और सहूँग़, क्योंदक जह़ूँ प़ना होत़ है, िह़ूँ
ऄन्द्त में कीचड होत़ हा है॥2॥
* डरु न मोऽह जग कऽहऽह दक पोची। परलोकहु कर ऩऽहन
सोची॥
एकआ ईर बस दिसह दि़रा। मोऽह लऽग भे ऽसय ऱमि दिख़रा॥3॥
भ़ि़थग:-मिझे आसक़ डर नहीं है दक जगत् मिझे बिऱ कहेग़ और
न मिझे परलोक क़ हा सोच है। मेरे हृदय में तो बस, एक हा
दिःसह द़ि़नल धधक रह़ है दक मेरे क़रण श्रा सात़-ऱमजा
दिःखा हुए॥3॥
* जािन ल़हु लखन भल प़ि़। सबि तऽज ऱम चरन मनि
ल़ि़॥

मोर जनम रघिबर बन ल़गा। झीठ क़ह पऽछत़ईूँ ऄभ़गा॥4॥
भ़ि़थग:-जािन क़ ईिम ल़भ तो लक्ष्मण ने प़य़, ऽजन्द्होंने सब
कि छ तजकर श्रा ऱमजा के चरणों में मन लग़य़। मेऱ जन्द्म तो
श्रा ऱमजा के िनि़स के ऽलए हा हुअ थ़। मैं ऄभ़ग़ झीठ-मीठ
क्य़ पछत़त़ हूँ?॥4॥
दोह़ :
* अपऽन द़रुन दानत़ कहईूँ सबऽह ऽसरु ऩआ।
देखें ऽबनि रघिऩथ पद ऽजय कै जरऽन न ज़आ॥182॥
भ़ि़थग:-सबको ऽसर झिक़कर मैं ऄपना द़रुण दानत़ कहत़ हूँ।
श्रा रघिऩथजा के चरणों के दशगन दकए ऽबऩ मेरे जा की जलन
न ज़एगा॥182॥
चौप़इ :
* अन ईप़ई मोऽह नवह सीझ़। को ऽजय कै रघिबर ऽबनि बीझ़॥
एकवह अूँक आहआ मन म़हीं। प्ऱतक़ल चऽलहईूँ प्रभि प़हीं॥1॥
भ़ि़थग:-मिझे दीसऱ कोइ ईप़य नहीं सीझत़। श्रा ऱम के ऽबऩ
मेरे हृदय की ब़त कौन ज़न सकत़ है? मन में एक हा अूँक
(ऽनश्चयपीिगक) यहा है दक प्ऱतः क़ल श्रा ऱमजा के प़स चल
दीग
ूँ ़॥1॥

* जद्यऽप मैं ऄनभल ऄपऱधा। भै मोऽह क़रन सकल ईप़धा॥
तदऽप सरन सनमिख मोऽह देखा। छऽम सब कररहवह कु प़
ऽबसेषा॥2॥
भ़ि़थग:-यद्यऽप मैं बिऱ हूँ और ऄपऱधा हूँ और मेरे हा क़रण
यह सब ईपरि हुअ है, तथ़ऽप श्रा ऱमजा मिझे शरण में
सम्मिख अय़ हुअ देखकर सब ऄपऱध क्षम़ करके मिझ पर
ऽिशेष कु प़ करें ग॥
े 2॥
* साल सकि च सिरठ सरल सिभ़उ। कु प़ सनेह सदन रघिऱउ॥
ऄररहुक ऄनभल कीन्द्ह न ऱम़। मैं ऽससि सेिक जद्यऽप ब़म़॥3॥
भ़ि़थग:-श्रा रघिऩथजा शाल, संकोच, ऄत्यन्द्त सरल सिभ़ि,
कु प़ और स्नेह के घर हैं। श्रा ऱमजा ने कभा शत्रि क़ भा
ऄऽनष्ट नहीं दकय़। मैं यद्यऽप टेढ़़ हूँ, पर हूँ तो ईनक़ बच्च़
और गिल़म हा॥3॥
*तिम्ह पै प़ूँच मोर भल म़ना। अयसि अऽसष देहु सिब़ना॥
जेवह सिऽन ऽबनय मोऽह जनि ज़ना। अिवह बहुरर ऱमि
रजध़ना॥4॥
भ़ि़थग:-अप पंच (सब) लोग भा आसा में मेऱ कल्य़ण म़नकर
सिंदर ि़णा से अज्ञ़ और अशाि़गद दाऽजए, ऽजसमें मेरा ऽिनता

सिनकर और मिझे ऄपऩ द़स ज़नकर श्रा ऱमचन्द्रजा ऱजध़ना
को लौट अिें॥4॥
दोह़ :
* जद्यऽप जनमि कि म़ति तें मैं सठि सद़ सदोस।
अपन ज़ऽन न त्य़ऽगहवह मोऽह रघिबार भरोस॥183॥
भ़ि़थग:-यद्यऽप मेऱ जन्द्म कि म़त़ से हुअ है और मैं दिष्ट तथ़
सद़ दोषयिक्त भा हूँ, तो भा मिझे श्रा ऱमजा क़ भरोस़ है दक
िे मिझे ऄपऩ ज़नकर त्य़गेंगे नहीं॥183॥
चौप़इ :
* भरत बचन सब कहूँ ऽप्रय ल़गे। ऱम सनेह सिध़ूँ जनि प़गे॥
लोग ऽबयोग ऽबषम ऽबष द़गे। मंत्र सबाज सिनत जनि ज़गे॥1॥
भ़ि़थग:-भरतजा के िचन सबको प्य़रे लगे। म़नो िे श्रा ऱमजा
के प्रेमरूपा ऄमुत में पगे हुए थे। श्रा ऱमऽियोग रूपा भाषण
ऽिष से सब लोग जले हुए थे। िे म़नो बाज सऽहत मंत्र को
सिनते हा ज़ग ईठे ॥1॥
* म़ति सऽचि गिर पिर नर ऩरा। सकल सनेहूँ ऽबकल भए
भ़रा॥
भरतऽह कहवह सऱऽह सऱहा। ऱम प्रेम मीरऽत तनि अहा॥2॥

भ़ि़थग:-म़त़, मंत्रा, गिरु, नगर के स्त्रा-पिरुष सभा स्नेह के क़रण
बहुत हा व्य़कि ल हो गए। सब भरतजा को सऱह-सऱहकर कहते
हैं दक अपक़ शरार श्रा ऱमप्रेम की स़क्ष़त मीर्तत हा है॥2॥
* त़त भरत ऄस क़हे न कहह। प्ऱन सम़न ऱम ऽप्रय ऄहह॥
जो प़िूँरु ऄपना जडत़ईं। तिम्हऽह सिग़आ म़ति कि रटल़ईं॥3॥
भ़ि़थग:-हे त़त भरत! अप ऐस़ क्यों न कहें। श्रा ऱमजा को
अप प्ऱणों के सम़न प्य़रे हैं। जो नाच ऄपना मीखगत़ से
अपकी म़त़ कै के या की कि रटलत़ को लेकर अप पर सन्द्दह

करे ग़,॥3॥
* सो सठि कोरटक पिरुष समेत़। बऽसऽह कलप सत नरक
ऽनके त़॥
ऄऽह ऄघ ऄिगिन नवह मऽन गहइ। हरआ गरल दिख द़ररद
दहइ॥4॥
भ़ि़थग:-िह दिष्ट करोडों पिरखों सऽहत सौ कल्पों तक नरक के
घर में ऽनि़स करे ग़। स़ूँप के प़प और ऄिगिण को मऽण नहीं
ग्रहण करता, बऽल्क िह ऽिष को हर लेता है और दिःख तथ़
दरररत़ को भसम कर देता है॥4॥
दोह़ :
* ऄिऽस चऽलऄ बन ऱमि जहूँ भरत मंत्रि भल कीन्द्ह।

सोक वसधि बीडत सबऽह तिम्ह ऄिलंबनि दान्द्ह॥184॥
भ़ि़थग:-हे भरतजा! िन को ऄिश्य चऽलए, जह़ूँ श्रा ऱमजा हैं,
अपने बहुत ऄच्छा सल़ह ऽिच़रा। शोक समिर में डी बते हुए सब
लोगों को अपने (बड़) सह़ऱ दे ददय़॥184॥
चौप़इ :
* भ़ सब कें मन मोदि न थोऱ। जनि घन धिऽन सिऽन च़तक
मोऱ॥
चलत प्ऱत लऽख ऽनरनई नाके । भरति प्ऱनऽप्रय भे सबहा के ॥1॥
भ़ि़थग:-सबके मन में कम अनंद नहीं हुअ (ऄथ़गत बहुत हा
अनंद हुअ)! म़नो मेघों की गजगऩ सिनकर च़तक और मोर
अनंददत हो रहे हों। (दीसरे ददन) प्ऱतःक़ल चलने क़ सिंदर
ऽनणगय देखकर भरतजा सभा को प्ऱणऽप्रय हो गए॥1॥
* मिऽनऽह बंदद भरतऽह ऽसरु ऩइ। चले सकल घर ऽबद़ कऱइ॥
धन्द्य भरत जािनि जग म़हीं। सालि सनेहु सऱहत ज़हीं॥2॥
भ़ि़थग:-मिऽन िऽशष्ठजा की िंदऩ करके और भरतजा को ऽसर
नि़कर, सब लोग ऽिद़ लेकर ऄपने-ऄपने घर को चले। जगत
में भरतजा क़ जािन धन्द्य है, आस प्रक़र कहते हुए िे ईनके
शाल और स्नेह की सऱहऩ करते ज़ते हैं॥2॥

* कहवह परसपर भ़ बड क़जी। सकल चलै कर स़जवह स़जी॥
जेऽह ऱखवह रहु घर रखि़रा। सो ज़नआ जनि गरदऽन म़रा॥3॥
भ़ि़थग:-अपस में कहते हैं, बड़ क़म हुअ। सभा चलने की
तैय़रा करने लगे। ऽजसको भा घर की रखि़ला के ऽलए रहो,
ऐस़ कहकर रखते हैं, िहा समझत़ है म़नो मेरा गदगन म़रा
गइ॥3॥
* कोई कह रहन कऽहऄ नवह क़ह। को न चहआ जग जािन
ल़ह॥4॥
भ़ि़थग:-कोइ-कोइ कहते हैं- रहने के ऽलए दकसा को भा मत
कहो, जगत में जािन क़ ल़भ कौन नहीं च़हत़?॥4॥

ऄयोध्य़ि़ऽसयों सऽहत श्रा भरत-शत्रिघ्न अदद क़ िनगमन
दोह़ :
* जरई सो संपऽत सदन सिखि सिहृद म़ति ऽपति भ़आ।
सनमिख होत जो ऱम पद करै न सहस सह़आ॥185॥
भ़ि़थग:-िह सम्पऽि, घर, सिख, ऽमत्र, म़त़, ऽपत़, भ़इ जल
ज़ए जो श्रा ऱमजा के चरणों के सम्मिख होने में हूँसते हुए
(प्रसन्नत़पीिगक) सह़यत़ न करे ॥185॥
चौप़इ :
* घर घर स़जवह ब़हन ऩऩ। हरषि हृदयूँ परभ़त पय़ऩ॥
भरत ज़आ घर कीन्द्ह ऽबच़रू। नगरु ब़ऽज गज भिन भूँड़रू॥1॥

भ़ि़थग:-घर-घर लोग ऄनेकों प्रक़र की सि़ररय़ूँ सज़ रहे हैं।
हृदय में (बड़) हषग है दक सबेरे चलऩ है। भरतजा ने घर
ज़कर ऽिच़र दकय़ दक नगर घोडे, ह़था, महल-खज़ऩ अदद॥1॥
* संपऽत सब रघिपऽत कै अहा। जौं ऽबनि जतन चलौं तऽज
त़हा॥
तौ पररऩम न मोरर भल़इ। प़प ऽसरोमऽन स़आूँ दोह़इ॥2॥
भ़ि़थग:-स़रा सम्पऽि श्रा रघिऩथजा की है। यदद ईसकी (रक्ष़
की) व्यिसथ़ दकए ऽबऩ ईसे ऐसे हा छोडकर चल दीूँ, तो
पररण़म में मेरा भल़इ नहीं है, क्योंदक सि़मा क़ रोह सब
प़पों में ऽशरोमऽण (श्रेष्ठ) है॥2॥
* करआ सि़ऽम ऽहत सेिकि सोइ। दीषन कोरट देआ दकन कोइ॥
ऄस ऽबच़रर सिऽच सेिक बोले। जे सपनेहुूँ ऽनज धरम न
डोले॥3॥
भ़ि़थग:-सेिक िहा है, जो सि़मा क़ ऽहत करे , च़हे कोइ
करोडों दोष क्यों न दे। भरतजा ने ऐस़ ऽिच़रकर ऐसे
ऽिश्व़सप़त्र सेिकों को बिल़य़, जो कभा सिप्न में भा ऄपने धमग
से नहीं ऽडगे थे॥3॥

* कऽह सबि मरमि धरमि भल भ़ष़। जो जेऽह ल़यक सो तेवह
ऱख़॥
करर सबि जतनि ऱऽख रखि़रे । ऱम म़ति पवह भरति ऽसध़रे ॥4॥
भ़ि़थग:-भरतजा ने ईनको सब भेद समझ़कर दफर ईिम धमग
बतल़य़ और जो ऽजस योग्य थ़, ईसे ईसा क़म पर ऽनयिक्त
कर ददय़। सब व्यिसथ़ करके , रक्षकों को रखकर भरतजा ऱम
म़त़ कौसल्य़जा के प़स गए॥4॥
दोह़ :
* अरत जनना ज़ऽन सब भरत सनेह सिज़न।
कहेई बऩिन प़लकीं सजन सिख़सन ज़न॥186॥
भ़ि़थग:-स्नेह के सिज़न (प्रेम के तत्ि को ज़नने ि़ले) भरतजा ने
सब म़त़ओं को अतग (दिःखा) ज़नकर ईनके ऽलए प़लदकय़ूँ
तैय़र करने तथ़ सिख़सन य़न (सिखप़ल) सज़ने के ऽलए
कह़॥186॥
चौप़इ :
* चक्क चदक्क ऽजऽम पिर नर ऩरा। चहत प्ऱत ईर अरत भ़रा॥
ज़गत सब ऽनऽस भयई ऽबह़ऩ। भरत बोल़ए सऽचि
सिज़ऩ॥1॥

भ़ि़थग:-नगर के नर-ऩरा चकिे-चकिा की भ़ूँऽत हृदय में
ऄत्यन्द्त अतग होकर प्ऱतःक़ल क़ होऩ च़हते हैं। स़रा ऱत
ज़गते-ज़गते सबेऱ हो गय़। तब भरतजा ने चतिर मंऽत्रयों को
बिलि़य़॥1॥
* कहेई लेहु सबि ऽतलक सम़जी। बनवह देब मिऽन ऱमऽह ऱजी॥
बेऽग चलहु सिऽन सऽचि जोह़रे । तिरत तिरग रथ ऩग सूँि़रे ॥2॥
भ़ि़थग:-और कह़- ऽतलक क़ सब स़म़न ले चलो। िन में हा
मिऽन िऽशष्ठजा श्रा ऱमचन्द्रजा को ऱज्य देंग,े जल्दा चलो। यह
सिनकर मंऽत्रयों ने िंदऩ की और तिरंत घोडे, रथ और ह़था
सजि़ ददए॥2॥
* ऄरुं धता ऄरु ऄऽगऽन सम़उ। रथ चदढ़ चले प्रथम मिऽनऱउ॥
ऽबप्र बुद
ं चदढ़ ब़हन ऩऩ। चले सकल तप तेज ऽनध़ऩ॥3॥
भ़ि़थग:-सबसे पहले मिऽनऱज िऽशष्ठजा ऄरुं धता और ऄऽग्नहोत्र
की सब स़मग्रा सऽहत रथ पर सि़र होकर चले। दफर ब्ऱह्मणों
के समीह, जो सब के सब तपसय़ और तेज के भंड़र थे, ऄनेकों
सि़ररयों पर चढ़कर चले॥3॥
* नगर लोग सब सऽज सऽज ज़ऩ। ऽचत्रकी ट कहूँ कीन्द्ह पय़ऩ॥

ऽसऽबक़ सिभग न ज़वह बख़ना। चदढ़ चदढ़ चलत भईं सब
ऱना॥4॥
भ़ि़थग:-नगर के सब लोग रथों को सज़-सज़कर ऽचत्रकी ट को
चल पडे। ऽजनक़ िणगन नहीं हो सकत़, ऐसा सिंदर प़लदकयों
पर चढ़-चढ़कर सब ऱऽनय़ूँ चलीं॥4॥
दोह़ :
* सौंऽप नगर सिऽच सेिकऽन स़दर सकल चल़आ।
सिऽमरर ऱम ऽसय चरन तब चले भरत दोई भ़आ॥187॥
भ़ि़थग:-ऽिश्व़सप़त्र सेिकों को नगर सौंपकर और सबको
अदरपीिगक रि़ऩ करके , तब श्रा सात़-ऱमजा के चरणों को
समरण करके भरत-शत्रिघ्न दोनों भ़इ चले॥187॥
चौप़इ :
* ऱम दरस बस सब नर ऩरा। जनि करर कररऽन चले तदक
ब़रा॥
बन ऽसय ऱमि समिऽझ मन म़हीं। स़निज भरत पय़देवह
ज़हीं॥1॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचन्द्रजा के दशगन के िश में हुए (दशगन की
ऄनन्द्य ल़लस़ से) सब नर-ऩरा ऐसे चले म़नो प्य़से ह़थाहऽथना जल को तककर (बडा तेजा से ब़िले से हुए) ज़ रहे

हों। श्रा सात़जा-ऱमजा (सब सिखों को छोडकर) िन में हैं, मन
में ऐस़ ऽिच़र करके छोटे भ़इ शत्रिघ्नजा सऽहत भरतजा पैदल
हा चले ज़ रहे हैं॥1॥
*देऽख सनेहु लोग ऄनिऱगे। ईतरर चले हय गय रथ त्य़गे॥
ज़आ समाप ऱऽख ऽनज डोला। ऱम म़ति मुद ि ब़ना बोला॥2॥
भ़ि़थग:-ईनक़ स्नेह देखकर लोग प्रेम में मग्न हो गए और सब
घोडे, ह़था, रथों को छोडकर ईनसे ईतरकर पैदल चलने लगे।
तब श्रा ऱमचन्द्रजा की म़त़ कौसल्य़जा भरत के प़स ज़कर
और ऄपना प़लकी ईनके समाप खडा करके कोमल ि़णा से
बोलीं-॥2॥
* त़त चढ़हु रथ बऽल महत़रा। होआऽह ऽप्रय पररि़रु दिख़रा॥
तिम्हरें चलत चऽलऽह सबि लोगी। सकल सोक कु स नवह मग
जोगी॥3॥
भ़ि़थग:-हे बेट़! म़त़ बलैय़ लेता है, तिम रथ पर चढ़ ज़ओ।
नहीं तो स़ऱ पररि़र दिःखा हो ज़एग़। तिम्ह़रे पैदल चलने से
सभा लोग पैदल चलेंगे। शोक के म़रे सब दिबले हो रहे हैं,
पैदल ऱसते के (पैदल चलने के ) योग्य नहीं हैं॥3॥
* ऽसर धरर बचन चरन ऽसरु ऩइ। रथ चदढ़ चलत भए दोई
भ़इ॥

तमस़ प्रथम ददिस करर ब़सी। दीसर गोमऽत तार ऽनि़सी॥4॥
भ़ि़थग:-म़त़ की अज्ञ़ को ऽसर चढ़़कर और ईनके चरणों में
ऽसर नि़कर दोनों भ़इ रथ पर चढ़कर चलने लगे। पहले ददन
तमस़ पर ि़स (मिक़म) करके दीसऱ मिक़म गोमता के तार पर
दकय़॥4॥
दोह़ :
* पय ऄह़र फल ऄसन एक ऽनऽस भोजन एक लोग।
करत ऱम ऽहत नेम ब्रत पररहरर भीषन भोग॥188॥
भ़ि़थग:-कोइ दीध हा पाते, कोइ फल़ह़र करते और कि छ लोग
ऱत को एक हा ब़र भोजन करते हैं। भीषण और भोग-ऽिल़स
को छोडकर सब लोग श्रा ऱमचन्द्रजा के ऽलए ऽनयम और व्रत
करते हैं॥188॥

ऽनष़द की शंक़ और स़िध़ना
चौप़इ :
* सइ तार बऽस चले ऽबह़ने। सुंगबेरपिर सब ऽनऄऱने॥
सम़च़र सब सिने ऽनष़द़। हृदयूँ ऽबच़र करआ सऽबष़द़॥1॥
भ़ि़थग:-ऱत भर सइ नदा के तार पर ऽनि़स करके सबेरे िह़ूँ
से चल ददए और सब श्रुंगिेरपिर के समाप ज़ पहुूँच।े ऽनष़दऱज
ने सब सम़च़र सिने, तो िह दिःखा होकर हृदय में ऽिच़र करने
लग़-॥1॥
* क़रन किन भरति बन ज़हीं। है कछि कपट भ़ई मन म़हीं॥
जौं पै ऽजयूँ न होऽत कि रटल़इ। तौ कत लान्द्ह संग कटक़इ॥2॥

भ़ि़थग:-क्य़ क़रण है जो भरत िन को ज़ रहे हैं, मन में कि छ
कपट भ़ि ऄिश्य है। यदद मन में कि रटलत़ न होता, तो स़थ
में सेऩ क्यों ले चले हैं॥2॥
* ज़नवह स़निज ऱमऽह म़रा। करईूँ ऄकं टक ऱजि सिख़रा॥
भरत न ऱजनाऽत ईर अना। तब कलंकि ऄब जािन ह़ना॥3॥
भ़ि़थग:-समझते हैं दक छोटे भ़इ लक्ष्मण सऽहत श्रा ऱम को
म़रकर सिख से ऽनष्कण्टक ऱज्य करूूँग़। भरत ने हृदय में
ऱजनाऽत को सथ़न नहीं ददय़ (ऱजनाऽत क़ ऽिच़र नहीं
दकय़)। तब (पहले) तो कलंक हा लग़ थ़, ऄब तो जािन से
हा ह़थ धोऩ पडेग़॥3॥
* सकल सिऱसिर जिरवह जिझ़ऱ। ऱमऽह समर न जातऽनह़ऱ॥
क़ अचरजि भरति ऄस करहीं। नवह ऽबष बेऽल ऄऽमऄ फल
फरहीं॥4॥
भ़ि़थग:-सम्पीणग देित़ और दैत्य िार जिट ज़एूँ, तो भा श्रा
ऱमजा को रण में जातने ि़ल़ कोइ नहीं है। भरत जो ऐस़
कर रहे हैं, आसमें अश्चयग हा क्य़ है? ऽिष की बेलें ऄमुतफल
कभा नहीं फलतीं!॥4॥
दोह़ :

* ऄस ऽबच़रर गिहूँ ग्य़ऽत सन कहेई सजग सब होहु।
हथि़ूँसहु बोरहु तरऽन कीऽजऄ घ़ट़रोहु॥189॥
भ़ि़थग:-ऐस़ ऽिच़रकर गिह (ऽनष़दऱज) ने ऄपना ज़ऽत ि़लों
से कह़ दक सब लोग स़िध़न हो ज़ओ। ऩिों को ह़थ में
(कब्जे में) कर लो और दफर ईन्द्हें डि ब़ दो तथ़ सब घ़टों को
रोक दो॥189॥
चौप़इ :
* होहु सूँजोआल रोकहु घ़ट़। ठ़टहु सकल मरै के ठ़ट़॥
सनमिख लोह भरत सन लेउूँ। ऽजऄत न सिरसरर ईतरन देउूँ॥1॥
भ़ि़थग:-सिसऽज्जत होकर घ़टों को रोक लो और सब लोग मरने
के स़ज सज़ लो (ऄथ़गत भरत से यिि में लडकर मरने के ऽलए
तैय़र हो ज़ओ)। मैं भरत से स़मने (मैद़न में) लोह़ लीूँग़
(मिठभेड करूूँग़) और जाते जा ईन्द्हें गंग़ प़र न ईतरने
दीग
ूँ ़॥1॥
* समर मरनि पिऽन सिरसरर ताऱ। ऱम क़जि छनभंगि सराऱ॥
भरत भ़आ नुपि मैं जन नाची। बडें भ़ग ऄऽस प़आऄ माची॥2॥
भ़ि़थग:-यिि में मरण, दफर गंग़जा क़ तट, श्रा ऱमजा क़
क़म और क्षणभंगरि शरार (जो च़हे जब ऩश हो ज़ए), भरत

श्रा ऱमजा के भ़इ और ऱज़ (ईनके ह़थ से मरऩ) और मैं
नाच सेिक- बडे भ़ग्य से ऐसा मुत्यि ऽमलता है॥2॥
* सि़ऽम क़ज कररहईूँ रन ऱरा। जस धिऽलहईूँ भििन दस
च़रा॥
तजईूँ प्ऱन रघिऩथ ऽनहोरें । दिहूँ ह़थ मिद मोदक मोरें ॥3॥
भ़ि़थग:-मैं सि़मा के क़म के ऽलए रण में लड़इ करूूँग़ और
चौदहों लोकों को ऄपने यश से ईज्ज्िल कर दीग
ूँ ़। श्रा रघिऩथजा
के ऽनऽमि प्ऱण त्य़ग दीग
ूँ ़। मेरे तो दोनों हा ह़थों में अनंद के
लड्डी हैं (ऄथ़गत जात गय़ तो ऱम सेिक क़ यश प्ऱप्त करूूँग़
और म़ऱ गय़ तो श्रा ऱमजा की ऽनत्य सेि़ प्ऱप्त करूूँग़)॥3॥
* स़धि सम़ज न ज़कर लेख़। ऱम भगत महुूँ ज़सि न रे ख़॥
ज़यूँ ऽजऄत जग सो मऽह भ़रू। जनना जौबन ऽबटप कि ठ़रू॥4॥
भ़ि़थग:-स़धिओं के सम़ज में ऽजसकी ऽगनता नहीं और श्रा
ऱमजा के भक्तों में ऽजसक़ सथ़न नहीं, िह जगत में पुथ्िा क़
भ़र होकर व्यथग हा जात़ है। िह म़त़ के यौिन रूपा िुक्ष के
क़टने के ऽलए कि ल्ह़ड़ म़त्र है॥4॥
दोह़ :
* ऽबगत ऽबष़द ऽनष़दपऽत सबऽह बढ़़आ ईछ़हु।
सिऽमरर ऱम म़गेई तिरत तरकस धनिष सऩहु॥190॥

भ़ि़थग:-(आस प्रक़र श्रा ऱमजा के ऽलए प्ऱण समपगण क़ ऽनश्चय
करके ) ऽनष़दऱज ऽिष़द से रऽहत हो गय़ और सबक़ ईत्स़ह
बढ़़कर तथ़ श्रा ऱमचन्द्रजा क़ समरण करके ईसने तिरंत हा
तरकस, धनिष और किच म़ूँग़॥190॥
चौप़इ :
* बेगहु भ़आहु सजहु सूँजोउ। सिऽन रज़आ कदऱआ न कोउ॥
भलेवह ऩथ सब कहवह सहरष़। एकवह एक बढ़़िआ करष़॥1॥
भ़ि़थग:-(ईसने कह़-) हे भ़आयों! जल्दा करो और सब स़म़न
सज़ओ। मेरा अज्ञ़ सिनकर कोइ मन में क़यरत़ न ल़िे। सब
हषग के स़थ बोल ईठे - हे ऩथ! बहुत ऄच्छ़ और अपस में
एक-दीसरे क़ जोश बढ़़ने लगे॥1॥
* चले ऽनष़द जोह़रर जोह़रा। सीर सकल रन रूचआ ऱरा॥
सिऽमरर ऱम पद पंकज पनहीं। भ़थीं ब़ूँऽध चढ़़आऽन्द्ह धनहीं॥2॥
भ़ि़थग:-ऽनष़दऱज को जोह़र कर-करके सब ऽनष़द चले। सभा
बडे शीरिार हैं और संग्ऱम में लडऩ ईन्द्हें बहुत ऄच्छ़ लगत़
है। श्रा ऱमचन्द्रजा के चरणकमलों की जीऽतयों क़ समरण करके
ईन्द्होंने भ़ऽथय़ूँ (छोटे-छोटे तरकस) ब़ूँधकर धनिऽहयों (छोटे-छोटे
धनिषों) पर प्रत्यंच़ चढ़़इ॥2॥
* ऄूँगरा पऽहरर कीूँ ऽड ऽसर धरहीं। फरस़ ब़ूँस सेल सम करहीं॥

एक कि सल ऄऽत ओडन ख़ूँडे। की दवह गगन मनहुूँ ऽछऽत छ़ूँडे॥3॥
भ़ि़थग:-किच पहनकर ऽसर पर लोहे क़ टोप रखते हैं और
फरसे, भ़ले तथ़ बरछों को साध़ कर रहे हैं (सिध़र रहे हैं)।
कोइ तलि़र के ि़र रोकने में ऄत्यन्द्त हा कि शल है। िे ऐसे
ईमंग में भरे हैं, म़नो धरता छोडकर अक़श में की द (ईछल)
रहे हों॥3॥
* ऽनज ऽनज स़जि सम़जि बऩइ। गिह ऱईतऽह जोह़रे ज़इ॥
देऽख सिभट सब ल़यक ज़ने। लै लै ऩम सकल सनम़ने॥4॥
भ़ि़थग:-ऄपऩ-ऄपऩ स़ज-सम़ज (लड़इ क़ स़म़न और दल)
बऩकर ईन्द्होंने ज़कर ऽनष़दऱज गिह को जोह़र की।
ऽनष़दऱज ने सिंदर योि़ओं को देखकर, सबको सियोग्य ज़ऩ
और ऩम ले-लेकर सबक़ सम्म़न दकय़॥4॥
दोह़ :
* भ़आहु ल़िहु धोख जऽन अजि क़ज बड मोऽह।
सिऽन सरोष बोले सिभट बार ऄधार न होऽह॥191॥
भ़ि़थग:-(ईसने कह़-) हे भ़आयों! धोख़ न ल़ऩ (ऄथ़गत मरने
से न घबड़ऩ), अज मेऱ बड़ भ़रा क़म है। यह सिनकर सब

योि़ बडे जोश के स़थ बोल ईठे - हे िार! ऄधार मत
हो॥191॥
चौप़इ :
* ऱम प्रत़प ऩथ बल तोरे । करवह कटकि ऽबनि भट ऽबनि घोरे ॥
जािन प़ई न प़छें धरहीं। रुं ड मिड
ं मय मेददऽन करहीं॥1॥
भ़ि़थग:-हे ऩथ! श्रा ऱमचन्द्रजा के प्रत़प से और अपके बल से
हम लोग भरत की सेऩ को ऽबऩ िार और ऽबऩ घोडे की कर
देंगे (एक-एक िार और एक-एक घोडे को म़र ड़लेंगे)। जाते जा
पाछे प़ूँि न रखेंगे। पुथ्िा को रुण्ड-मिण्डमया कर देंगे (ऽसरों
और धडों से छ़ देंगे)॥1॥
* दाख ऽनष़दऩथ भल टोली। कहेई बज़ई जिझ़उ ढोली॥
एतऩ कहत छींक भआ ब़ूँए। कहेई सगिऽनऄन्द्ह खेत सिह़ए॥2॥
भ़ि़थग:-ऽनष़दऱज ने िारों क़ बदढ़य़ दल देखकर कह़- जिझ़रू
(लड़इ क़) ढोल बज़ओ। आतऩ कहते हा ब़ईं ओर छींक हुइ।
शकि न ऽिच़रने ि़लों ने कह़ दक खेत सिंदर हैं (जात होगा)॥2॥
* बीढ़़ु एकि कह सगिन ऽबच़रा। भरतऽह ऽमऽलऄ न होआऽह ऱरा॥
ऱमऽह भरति मऩिन ज़हीं। सगिन कहआ ऄस ऽबग्रहु ऩहीं॥3॥

भ़ि़थग:-एक बीढ़े ने शकि न ऽिच़रकर कह़- भरत से ऽमल
लाऽजए, ईनसे लड़इ नहीं होगा। भरत श्रा ऱमचन्द्रजा को
मऩने ज़ रहे हैं। शकि न ऐस़ कह रह़ है दक ऽिरोध नहीं
है॥3॥
* सिऽन गिह कहआ नाक कह बीढ़़। सहस़ करर पऽछत़वह ऽबमीढ़़॥
भरत सिभ़ई सालि ऽबनि बीझ।ें बऽड ऽहत ह़ऽन ज़ऽन ऽबनि
जीझें॥4॥
भ़ि़थग:-यह सिनकर ऽनष़दऱज गिहने कह़- बीढ़़ ठाक कह रह़
है। जल्दा में (ऽबऩ ऽिच़रे ) कोइ क़म करके मीखग लोग पछत़ते
हैं। भरतजा क़ शाल सिभ़ि ऽबऩ समझे और ऽबऩ ज़ने यिि
करने में ऽहत की बहुत बडा ह़ऽन है॥4॥
दोह़ :
* गहहु घ़ट भट सऽमरट सब लेईूँ मरम ऽमऽल ज़आ।
बीऽझ ऽमत्र ऄरर मध्य गऽत तस तब कररहईूँ अआ॥192॥
भ़ि़थग:-ऄतएि हे िारों! तिम लोग आकट्ठे होकर सब घ़टों को
रोक लो, मैं ज़कर भरतजा से ऽमलकर ईनक़ भेद लेत़ हूँ।
ईनक़ भ़ि ऽमत्र क़ है य़ शत्रि क़ य़ ईद़सान क़, यह
ज़नकर तब अकर िैस़ (ईसा के ऄनिस़र) प्रबंध करूूँग़॥192॥
चौप़इ :

* लखब सनेहु सिभ़यूँ सिह़एूँ। बैरु प्राऽत नवह दिरआूँ दिऱएूँ॥
ऄस कऽह भेंट सूँजोिन ल़गे। कं द मील फल खग मुग म़गे॥1॥
भ़ि़थग:-ईनके सिंदर सिभ़ि से मैं ईनके स्नेह को पहच़न लीूँग़।
िैर और प्रेम ऽछप़ने से नहीं ऽछपते। ऐस़ कहकर िह भेंट क़
स़म़न सज़ने लग़। ईसने कं द, मील, फल, पक्षा और ऽहरन
मूँगि़ए॥1॥
* मान पान प़ठान पिऱने। भरर भरर भ़र कह़रन्द्ह अने॥
ऽमलन स़जि सऽज ऽमलन ऽसध़ए। मंगल मील सगिन सिभ प़ए॥2॥
भ़ि़थग:-कह़र लोग पिऱना और मोटा पऽहऩ ऩमक मछऽलयों
के भ़र भर-भरकर ल़ए। भेंट क़ स़म़न सज़कर ऽमलने के
ऽलए चले तो मंगलद़यक शिभ-शकि न ऽमले॥2॥
* देऽख दीरर तें कऽह ऽनज ऩमी। कीन्द्ह मिनासऽह दंड प्रऩमी॥
ज़ऽन ऱमऽप्रय दाऽन्द्ह ऄसास़। भरतऽह कहेई बिझ़आ मिनास़॥3॥
भ़ि़थग:-ऽनष़दऱज ने मिऽनऱज िऽशष्ठजा को देखकर ऄपऩ ऩम
बतल़कर दीर हा से दण्डित प्रण़म दकय़। मिनाश्वर िऽशष्ठजा ने
ईसको ऱम क़ प्य़ऱ ज़नकर अशाि़गद ददय़ और भरतजा को
समझ़कर कह़ (दक यह श्रा ऱमजा क़ ऽमत्र है)॥3॥
* ऱम सख़ सिऽन संदनि त्य़ग़। चले ईचरर ईमगत ऄनिऱग़॥

ग़ईूँ ज़ऽत गिहूँ ऩईूँ सिऩइ। कीन्द्ह जोह़रु म़थ मऽह ल़इ॥4॥
भ़ि़थग:-यह श्रा ऱम क़ ऽमत्र है, आतऩ सिनते हा भरतजा ने
रथ त्य़ग ददय़। िे रथ से ईतरकर प्रेम में ईमूँगते हुए चले।
ऽनष़दऱज गिह ने ऄपऩ ग़ूँि, ज़ऽत और ऩम सिऩकर पुथ्िा
पर म़थ़ टेककर जोह़र की॥4॥

भरत-ऽनष़द ऽमलन और संि़द और भरतजा क़ तथ़
नगरि़ऽसयों क़ प्रेम
दोह़ :
* करत दंडित देऽख तेऽह भरत लान्द्ह ईर ल़आ।
मनहुूँ लखन सन भेंट भआ प्रेमि न हृदयूँ सम़आ॥193॥
भ़ि़थग:-दण्डित करते देखकर भरतजा ने ईठ़कर ईसको छ़ता
से लग़ ऽलय़। हृदय में प्रेम सम़त़ नहीं है, म़नो सियं
लक्ष्मणजा से भेंट हो गइ हो॥193॥
चौप़इ :
* भेंटत भरति त़ऽह ऄऽत प्राता। लोग ऽसह़वह प्रेम कै राता॥
धन्द्य धन्द्य धिऽन मंगल मील़। सिर सऱऽह तेऽह बररसवह फी ल़॥1॥
भ़ि़थग:-भरतजा गिह को ऄत्यन्द्त प्रेम से गले लग़ रहे हैं। प्रेम
की राऽत को सब लोग ऽसह़ रहे हैं (इष़गपीिगक प्रशंस़ कर रहे
हैं)। मंगल की मील 'धन्द्य-धन्द्य' की ध्िऽन करके देित़ ईसकी
सऱहऩ करते हुए फी ल बरस़ रहे हैं॥1॥
* लोक बेद सब भ़ूँऽतवह नाच़। ज़सि छ़ूँह छि आ लेआऄ सींच़॥

तेऽह भरर ऄंक ऱम लघि वऱ्त़। ऽमलत पिलक पररपीररत
ग़त़॥2॥
भ़ि़थग:-(िे कहते हैं-) जो लोक और िेद दोनों में सब प्रक़र से
नाच़ म़ऩ ज़त़ है, ऽजसकी छ़य़ के छी ज़ने से भा स्ऩन
करऩ होत़ है, ईसा ऽनष़द से ऄूँकि़र भरकर (हृदय से
ऽचपट़कर) श्रा ऱमचन्द्रजा के छोटे भ़इ भरतजा (अनंद और
प्रेमिश) शरार में पिलक़िला से पररपीणग हो ऽमल रहे हैं॥2॥
* ऱम ऱम कऽह जे जमिह़हीं। ऽतन्द्हऽह न प़प पिंज समिह़हीं॥
यह तौ ऱम ल़आ ईर लान्द्ह़। कि ल समेत जगि प़िन कीन्द्ह़॥3॥
भ़ि़थग:-जो लोग ऱम-ऱम कहकर जूँभ़इ लेते हैं (ऄथ़गत अलसय
से भा ऽजनके मिूँह से ऱम-ऩम क़ ईच्च़रण हो ज़त़ है), प़पों
के समीह (कोइ भा प़प) ईनके स़मने नहीं अते। दफर आस गिह
को तो सियं श्रा ऱमचन्द्रजा ने हृदय से लग़ ऽलय़ और कि ल
समेत आसे जगत्प़िन (जगत को पऽित्र करने ि़ल़) बऩ
ददय़॥3॥
* करमऩस जलि सिरसरर परइ। तेऽह को कहहु सास नवह धरे इ॥
ईलट़ ऩमि जपत जगि ज़ऩ। ब़लमादक भए ब्रह्म सम़ऩ॥4॥
भ़ि़थग:-कमगऩश़ नदा क़ जल गंग़जा में पड ज़त़ है (ऽमल
ज़त़ है), तब कऽहए, ईसे कौन ऽसर पर ध़रण नहीं करत़?

जगत ज़नत़ है दक ईलट़ ऩम (मऱ-मऱ) जपते-जपते
ि़ल्मादकजा ब्रह्म के सम़न हो गए॥4॥
दोह़ :
* सिपच सबर खस जमन जड प़िूँर कोल दकऱत।
ऱमि कहत प़िन परम होत भििन ऽबख्य़त॥194॥
भ़ि़थग:-मीखग और प़मर च़ण्ड़ल, शबर, खस, यिन, कोल और
दकऱत भा ऱम-ऩम कहते हा परम पऽित्र और ऽत्रभििन में
ऽिख्य़त हो ज़ते हैं॥194॥
चौप़इ :
* नवह ऄऽचररजि जिग जिग चऽल अइ। के ऽह न दाऽन्द्ह रघिबार
बड़इ॥
ऱम ऩम मऽहम़ सिर कहहीं। सिऽन सिऽन ऄिध लोग सिखि
लहहीं॥1॥
भ़ि़थग:-आसमें कोइ अश्चयग नहीं है, यिग-यिग़न्द्तर से यहा राऽत
चला अ रहा है। श्रा रघिऩथजा ने दकसको बड़इ नहीं दा? आस
प्रक़र देित़ ऱम ऩम की मऽहम़ कह रहे हैं और ईसे सिनसिनकर ऄयोध्य़ के लोग सिख प़ रहे हैं॥1॥
* ऱमसखऽह ऽमऽल भरत सप्रेम़। पीूँछा कि सल सिमंगल खेम़॥

देऽख भरत कर सालि सनेह। भ़ ऽनष़द तेऽह समय ऽबदेह॥2॥
भ़ि़थग:-ऱम सख़ ऽनष़दऱज से प्रेम के स़थ ऽमलकर भरतजा
ने कि शल, मंगल और क्षेम पीछा। भरतजा क़ शाल और प्रेम
देखकर ऽनष़द ईस समय ऽिदेह हो गय़ (प्रेममिग्ध होकर देह की
सिध भील गय़)॥2॥
* सकि च सनेहु मोदि मन ब़ढ़़। भरतऽह ऽचतित एकटक ठ़ढ़़॥
धरर धारजि पद बंदद बहोरा। ऽबनय सप्रेम करत कर जोरा॥3॥
भ़ि़थग:-ईसके मन में संकोच, प्रेम और अनंद आतऩ बढ़ गय़
दक िह खड़-खड़ टकटकी लग़ए भरतजा को देखत़ रह़। दफर
धारज धरकर भरतजा के चरणों की िंदऩ करके प्रेम के स़थ
ह़थ जोडकर ऽिनता करने लग़-॥3॥
* कि सल मील पद पंकज पेखा। मैं ऽतहुूँ क़ल कि सल ऽनज लेखा॥
ऄब प्रभि परम ऄनिग्रह तोरें । सऽहत कोरट कि ल मंगल मोरें ॥4॥
भ़ि़थग:-हे प्रभो! कि शल के मील अपके चरण कमलों के दशगन कर
मैंने तानों क़लों में ऄपऩ कि शल ज़न ऽलय़। ऄब अपके परम
ऄनिग्रह से करोडों कि लों (पादढ़यों) सऽहत मेऱ मंगल (कल्य़ण)
हो गय़॥4॥
दोह़ :

* समिऽझ मोरर करतीऽत कि लि प्रभि मऽहम़ ऽजयूँ जोआ।
जो न भजआ रघिबार पद जग ऽबऽध बंऽचत सोआ॥195॥
भ़ि़थग:-मेरा करतीत और कि ल को समझकर और प्रभि श्रा
ऱमचन्द्रजा की मऽहम़ को मन में देख (ऽिच़र) कर (ऄथ़गत
कह़ूँ तो मैं नाच ज़ऽत और नाच कमग करने ि़ल़ जाि, और
कह़ूँ ऄनन्द्तकोरट ब्रह्म़ण्डों के सि़मा भगि़न श्रा ऱमचन्द्रजा!
पर ईन्द्होंने मिझ जैसे नाच को भा ऄपना ऄहैतिकी कु प़ िश
ऄपऩ ऽलय़- यह समझकर) जो रघििार श्रा ऱमजा के चरणों
क़ भजन नहीं करत़, िह जगत में ऽिध़त़ के ि़ऱ ठग़ गय़
है॥195॥
चौप़इ :
* कपटा क़यर कि मऽत कि ज़ता। लोक बेद ब़हेर सब भ़ूँता॥
ऱम कीन्द्ह अपन जबहा तें। भयईूँ भििन भीषन तबहा तें॥1॥
भ़ि़थग:-मैं कपटा, क़यर, कि बिऽि और कि ज़ऽत हूँ और लोक-िेद
दोनों से सब प्रक़र से ब़हर हूँ। पर जब से श्रा ऱमचन्द्रजा ने
मिझे ऄपऩय़ है, तभा से मैं ऽिश्व क़ भीषण हो गय़॥1॥
ऽिताय सोप़न
* देऽख प्राऽत सिऽन ऽबनय सिह़इ। ऽमलेई बहोरर भरत लघि भ़इ॥

कऽह ऽनष़द ऽनज ऩम सिब़नीं। स़दर सकल जोह़रीं ऱनीं॥2॥
भ़ि़थग:-ऽनष़द ऱज की प्राऽत को देखकर और सिंदर ऽिनय
सिनकर दफर भरतजा के छोटे भ़इ शत्रिघ्नजा ईससे ऽमले। दफर
ऽनष़द ने ऄपऩ ऩम ले-लेकर सिंदर (नम्र और मधिर) ि़णा से
सब ऱऽनयों को अदरपीिगक जोह़र की॥2॥
* ज़ऽन लखन सम देवह ऄसास़। ऽजऄहु सिखा सय ल़ख
बरास़॥
ऽनरऽख ऽनष़दि नगर नर ऩरा। भए सिखा जनि लखनि ऽनह़रा॥3॥
भ़ि़थग:-ऱऽनय़ूँ ईसे लक्ष्मणजा के सम़न समझकर अशाि़गद
देता हैं दक तिम सौ ल़ख िषों तक सिख पीिगक ऽजओ। नगर के
स्त्रा-पिरुष ऽनष़द को देखकर ऐसे सिखा हुए, म़नो लक्ष्मणजा को
देख रहे हों॥3॥
* कहवह लहेई एवह जािन ल़ह। भेंटेई ऱमभर भरर ब़ह॥
सिऽन ऽनष़दि ऽनज भ़ग बड़इ। प्रमिददत मन लआ चलेई
लेि़इ॥4॥
भ़ि़थग:-सब कहते हैं दक जािन क़ ल़भ तो आसा ने प़य़ है,
ऽजसे कल्य़ण सिरूप श्रा ऱमचन्द्रजा ने भिज़ओं में ब़ूँधकर गले
लग़य़ है। ऽनष़द ऄपने भ़ग्य की बड़इ सिनकर मन में परम
अनंददत हो सबको ऄपने स़थ ऽलि़ ले चल़॥4॥

दोह़ :
* सनक़रे सेिक सकल चले सि़ऽम रुख प़आ।
घर तरु तर सर ब़ग बन ब़स बऩएऽन्द्ह ज़आ॥196॥
भ़ि़थग:-ईसने ऄपने सब सेिकों को आश़रे से कह ददय़। िे
सि़मा क़ रुख प़कर चले और ईन्द्होंने घरों में, िुक्षों के नाचे,
त़ल़बों पर तथ़ बगाचों और जंगलों में ठहरने के ऽलए सथ़न
बऩ ददए॥196॥
चौप़इ :
* सुंगबेरपिर भरत दाख जब। भे सनेहूँ सब ऄंग ऽसऽथल तब॥
सोहत ददएूँ ऽनष़दऽह ल़गी। जनि तनि धरें ऽबनय ऄनिऱगी॥1॥
भ़ि़थग:-भरतजा ने जब श्रुंगिेरपिर को देख़, तब ईनके सब ऄंग
प्रेम के क़रण ऽशऽथल हो गए। िे ऽनष़द को ल़ग ददए (ऄथ़गत
ईसके कं धे पर ह़थ रखे चलते हुए) ऐसे शोभ़ दे रहे हैं, म़नो
ऽिनय और प्रेम शरार ध़रण दकए हुए हों॥1॥
* एऽह ऽबऽध भरत सेनि सबि संग़। दाऽख ज़आ जग प़िऽन
गंग़॥
ऱमघ़ट कहूँ कीन्द्ह प्रऩमी। भ़ मनि मगनि ऽमले जनि ऱमी॥2॥

भ़ि़थग:-आस प्रक़र भरतजा ने सब सेऩ को स़थ में ऽलए हुए
जगत को पऽित्र करने ि़ला गंग़जा के दशगन दकए। श्रा ऱमघ़ट
को (जह़ूँ श्रा ऱमजा ने स्ऩन संध्य़ की था) प्रण़म दकय़।
ईनक़ मन आतऩ अनंदमग्न हो गय़, म़नो ईन्द्हें सियं श्रा
ऱमजा ऽमल गए हों॥2॥
* करवह प्रऩम नगर नर ऩरा। मिददत ब्रह्ममय ब़रर ऽनह़रा॥
करर मज्जनि म़गवह कर जोरा। ऱमचन्द्र पद प्राऽत न थोरा॥3॥
भ़ि़थग:-नगर के नर-ऩरा प्रण़म कर रहे हैं और गंग़जा के
ब्रह्म रूप जल को देख-देखकर अनंददत हो रहे हैं। गंग़जा में
स्ऩन कर ह़थ जोडकर सब यहा िर म़ूँगते हैं दक श्रा
ऱमचन्द्रजा के चरणों में हम़ऱ प्रेम कम न हो (ऄथ़गत बहुत
ऄऽधक हो)॥3॥
* भरत कहेई सिरसरर ति रे न।ी सकल सिखद सेिक सिरधेनी॥
जोरर प़ऽन बर म़गईूँ एह। साय ऱम पद सहज सनेह॥4॥
भ़ि़थग:-भरतजा ने कह़- हे गंगे! अपकी रज सबको सिख देने
ि़ला तथ़ सेिक के ऽलए तो क़मधेनि हा है। मैं ह़थ जोडकर
यहा िरद़न म़ूँगत़ हूँ दक श्रा सात़-ऱमजा के चरणों में मेऱ
सि़भ़ऽिक प्रेम हो॥4॥
दोह़ :

* एऽह ऽबऽध मज्जनि भरति करर गिर ऄनिस़सन प़आ।
म़ति नह़नीं ज़ऽन सब डेऱ चले लि़आ॥197॥
भ़ि़थग:-आस प्रक़र भरतजा स्ऩन कर और गिरुजा की अज्ञ़
प़कर तथ़ यह ज़नकर दक सब म़त़एूँ स्ऩन कर चिकी हैं, डेऱ
ईठ़ ले चले॥197॥
चौप़इ :
* जहूँ तहूँ लोगन्द्ह डेऱ कीन्द्ह़। भरत सोधि सबहा कर लान्द्ह़॥
सिर सेि़ करर अयसि प़इ। ऱम म़ति पवह गे दोई भ़इ॥1॥
भ़ि़थग:-लोगों ने जह़ूँ-तह़ूँ डेऱ ड़ल ददय़। भरतजा ने सभा क़
पत़ लग़य़ (दक सब लोग अकर अऱम से रटक गए हैं य़
नहीं)। दफर देि पीजन करके अज्ञ़ प़कर दोनों भ़इ श्रा
ऱमचन्द्रजा की म़त़ कौसल्य़जा के प़स गए॥1॥
* चरन च़ूँऽप कऽह कऽह मुद ि ब़ना। जननीं सकल भरत
सनम़ना॥
भ़आऽह सौंऽप म़ति सेिक़इ। अपि ऽनष़दऽह लान्द्ह बोल़इ॥2॥
भ़ि़थग:-चरण दब़कर और कोमल िचन कह-कहकर भरतजा ने
सब म़त़ओं क़ सत्क़र दकय़। दफर भ़इ शत्रिघ्न को म़त़ओं की
सेि़ सौंपकर अपने ऽनष़द को बिल़ ऽलय़॥2॥

* चले सख़ कर सों कर जोरें । ऽसऽथल सरारु सनेह न थोरें ॥
पीूँछत सखऽह सो ठ़ईूँ देख़उ। नेकि नयन मन जरऽन जिड़उ॥3॥
भ़ि़थग:-सख़ ऽनष़द ऱज के ह़थ से ह़थ ऽमल़ए हुए भरतजा
चले। प्रेम कि छ थोड़ नहीं है (ऄथ़गत बहुत ऄऽधक प्रेम है),
ऽजससे ईनक़ शरार ऽशऽथल हो रह़ है। भरतजा सख़ से पीछते
हैं दक मिझे िह सथ़न ददखल़ओ और नेत्र और मन की जलन
कि छ ठं डा करो-॥3॥
* जहूँ ऽसय ऱमि लखनि ऽनऽस सोए। कहत भरे जल लोचन
कोए॥
भरत बचन सिऽन भयई ऽबष़दी। तिरत तह़ूँ लआ गयई ऽनष़दी॥4॥
भ़ि़थग:-जह़ूँ सात़जा, श्रा ऱमजा और लक्ष्मण ऱत को सोए
थे। ऐस़ कहते हा ईनके नेत्रों के कोयों में (प्रेम़श्रिओं क़) जल
भर अय़। भरतजा के िचन सिनकर ऽनष़द को बड़ ऽिष़द
हुअ। िह तिरंत हा ईन्द्हें िह़ूँ ले गय़॥4॥
दोह़ :
* जहूँ वससिप़ पिनात तर रघिबर दकय ऽबश्ऱमि।
ऄऽत सनेहूँ स़दर भरत कीन्द्हई
े दंड प्रऩमि॥198॥

भ़ि़थग:-जह़ूँ पऽित्र ऄशोक के िुक्ष के नाचे श्रा ऱमजा ने
ऽिश्ऱम दकय़ थ़। भरतजा ने िह़ूँ ऄत्यन्द्त प्रेम से अदरपीिगक
दण्डित प्रण़म दकय़॥198॥
चौप़इ :
* कि स स़ूँथरा ऽनह़रर सिह़इ। कीन्द्ह प्रऩमि प्रदऽच्छन ज़इ॥
चरन देख रज अूँऽखन्द्ह ल़इ। बनआ न कहत प्राऽत ऄऽधक़इ॥1॥
भ़ि़थग:-कि शों की सिंदर स़थरा देखकर ईसकी प्रदऽक्षण़ करके
प्रण़म दकय़। श्रा ऱमचन्द्रजा के चरण ऽचह्नों की रज अूँखों में
लग़इ। (ईस समय के ) प्रेम की ऄऽधकत़ कहते नहीं बनता॥1॥
* कनक वबदि दिआ च़ररक देख।े ऱखे सास साय सम लेखे॥
सजल ऽबलोचन हृदयूँ गल़ना। कहत सख़ सन बचन सिब़ना॥2॥
भ़ि़थग:-भरतजा ने दो-च़र सिणगऽबन्द्द ि (सोने के कण य़ त़रे
अदद जो सात़जा के गहने-कपडों से ऽगर पडे थे) देखे तो
ईनको सात़जा के सम़न समझकर ऽसर पर रख ऽलय़। ईनके
नेत्र (प्रेम़श्रि के ) जल से भरे हैं और हृदय में ग्ल़ऽन भरा है। िे
सख़ से सिंदर ि़णा में ये िचन बोले-॥2॥
* श्राहत साय ऽबरहूँ दिऽतहाऩ। जथ़ ऄिध नर ऩरर ऽबलाऩ॥
ऽपत़ जनक देईूँ पटतर के हा। करतल भोगि जोगि जग जेहा॥3॥

भ़ि़थग:-ये सिणग के कण य़ त़रे भा सात़जा के ऽिरह से ऐसे
श्राहत (शोभ़हान) एिं क़ऽन्द्तहान हो रहे हैं, जैसे (ऱम ऽियोग
में) ऄयोध्य़ के नर-ऩरा ऽिलान (शोक के क़रण क्षाण) हो रहे
हैं। ऽजन सात़जा के ऽपत़ ऱज़ जनक हैं, आस जगत में भोग
और योग दोनों हा ऽजनकी मिट्ठा में हैं, ईन जनकजा को मैं
दकसकी ईपम़ दी?
ूँ ॥3॥
* ससिर भ़निकिल भ़नि भिअली। जेऽह ऽसह़त ऄमऱिऽतप़ली॥
प्ऱनऩथि रघिऩथ गोस़ईं। जो बड होत सो ऱम बड़ईं॥4॥
भ़ि़थग:-सीयगकिल के सीयग ऱज़ दशरथजा ऽजनके ससिर हैं, ऽजनको
ऄमऱिता के सि़मा आन्द्र भा ऽसह़ते थे। (इष़गपि
ी गक ईनके जैस़
ऐश्वयग और प्रत़प प़ऩ च़हते थे) और प्रभि श्रा रघिऩथजा
ऽजनके प्ऱणऩथ हैं, जो आतने बडे हैं दक जो कोइ भा बड़
होत़ है, िह श्रा ऱमचन्द्रजा की (दा हुइ) बड़इ से हा होत़
है॥4॥
दोह़ :
* पऽत देित़ सिताय मऽन साय स़ूँथरा देऽख।
ऽबहरत हृदई न हहरर हर पऽब तें करठन ऽबसेऽष॥199॥

भ़ि़थग:-ईन श्रेष्ठ पऽतव्रत़ ऽस्त्रयों में ऽशरोमऽण सात़जा की
स़थरा (कि श शय्य़) देखकर मेऱ हृदय हहऱकर (दहलकर) फट
नहीं ज़त़, हे शंकर! यह िज्र से भा ऄऽधक कठोर है!॥199॥
चौप़इ :
* ल़लन जोगि लखन लघि लोने। भे न भ़आ ऄस ऄहवह न होने॥
पिरजन ऽप्रय ऽपति म़ति दिल़रे । ऽसय रघिबारऽह प्ऱनऽपअरे ॥1॥
भ़ि़थग:-मेरे छोटे भ़इ लक्ष्मण बहुत हा सिंदर और प्य़र करने
योग्य हैं। ऐसे भ़इ न तो दकसा के हुए, न हैं, न होने के हा
हैं। जो लक्ष्मण ऄिध के लोगों को प्य़रे , म़त़-ऽपत़ के दिल़रे
और श्रा सात़-ऱमजा के प्ऱण प्य़रे हैं,॥1॥
* मुद ि मीरऽत सिकिम़र सिभ़उ। त़त ब़ई तन ल़ग न क़ई॥
ते बन सहवह ऽबपऽत सब भ़ूँता। ऽनदरे कोरट कि ऽलस एवह
छ़ता॥2॥
भ़ि़थग:-ऽजनकी कोमल मीर्तत और सिकिम़र सिभ़ि है, ऽजनके
शरार में कभा गरम हि़ भा नहीं लगा, िे िन में सब प्रक़र
की ऽिपऽिय़ूँ सह रहे हैं। (ह़य!) आस मेरा छ़ता ने (कठोरत़
में) करोडों िज्रों क़ भा ऽनऱदर कर ददय़ (नहीं तो यह कभा
की फट गइ होता)॥2॥

* ऱम जनऽम जगि कीन्द्ह ईज़गर। रूप साल सिख सब गिन
स़गर॥
पिरजन पररजन गिरु ऽपति म़त़। ऱम सिभ़ई सबऽह सिखद़त़॥3॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचंरजा ने जन्द्म (ऄित़र) लेकर जगत् को
प्रक़ऽशत (परम सिशोऽभत) कर ददय़। िे रूप, शाल, सिख और
समसत गिणों के समिर हैं। पिरि़सा, कि टि म्बा, गिरु, ऽपत़-म़त़
सभा को श्रा ऱमजा क़ सिभ़ि सिख देने ि़ल़ है॥3॥
* बैररई ऱम बड़इ करहीं। बोलऽन ऽमलऽन ऽबनय मन हरहीं॥
स़रद कोरट कोरट सत सेष़। करर न सकवह प्रभि गिन गन
लेख़॥4॥
भ़ि़थग:-शत्रि भा श्रा ऱमजा की बड़इ करते हैं। बोल-च़ल,
ऽमलने के ढंग और ऽिनय से िे मन को हर लेते हैं। करोडों
सरसिता और ऄरबों शेषजा भा प्रभि श्रा ऱमचंरजा के गिण
समीहों की ऽगनता नहीं कर सकते॥4॥
दोह़ :
* सिखसिरूप रघिबंसमऽन मंगल मोद ऽनध़न।
ते सोित कि स ड़ऽस मऽह ऽबऽध गऽत ऄऽत बलि़न॥200॥

भ़ि़थग:-जो सिख सिरूप रघििश
ं ऽशरोमऽण श्रा ऱमचंरजा मंगल
और अनंद के भंड़र हैं, िे पुथ्िा पर कि श़ ऽबछ़कर सोते हैं।
ऽिध़त़ की गऽत बडा हा बलि़न है॥200॥
चौप़इ :
* ऱम सिऩ दिखि क़न न क़उ। जािनतरु ऽजऽम जोगिआ ऱई॥
पलक नयन फऽन मऽन जेऽह भ़ूँता। जोगिवह जनऽन सकल ददन
ऱता॥1॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचंरजा ने क़नों से भा कभा दिःख क़ ऩम नहीं
सिऩ। मह़ऱज सियं जािन िुक्ष की तरह ईनकी स़र-सूँभ़ल
दकय़ करते थे। सब म़त़एूँ भा ऱत-ददन ईनकी ऐसा स़रसूँभ़ल करता थीं, जैसे पलक नेत्रों और स़ूँप ऄपना मऽण की
करते हैं॥1॥
* ते ऄब दफरत ऽबऽपन पदच़रा। कं द मील फल फी ल ऄह़रा॥
ऽधग कै कइ ऄमंगल मील़। भआऽस प्ऱन ऽप्रयतम प्रऽतकी ल़॥2॥
भ़ि़थग:-िहा श्रा ऱमचंरजा ऄब जंगलों में पैदल दफरते हैं और
कं द-मील तथ़ फल-फी लों क़ भोजन करते हैं। ऄमंगल की मील
कै के या ऽधक्क़र है, जो ऄपने प्ऱणऽप्रयतम पऽत से भा प्रऽतकी ल हो
गइ॥2॥

* मैं ऽधग ऽधग ऄघ ईदऽध ऄभ़गा। सबि ईतप़ति भयई जेऽह
ल़गा॥
कि ल कलंकि करर सुजेई ऽबध़त़ूँ। स़आूँ दोह मोऽह कीन्द्ह कि म़त़ूँ॥3॥
भ़ि़थग:-मिझे प़पों के समिर और ऄभ़गे को ऽधक्क़र है, ऽधक्क़र
है, ऽजसके क़रण ये सब ईत्प़त हुए। ऽिध़त़ ने मिझे कि ल क़
कलंक बऩकर पैद़ दकय़ और कि म़त़ ने मिझे सि़मा रोहा बऩ
ददय़॥3॥
* सिऽन सप्रेम समिझ़ि ऽनष़दी। ऩथ कररऄ कत ब़दद ऽबष़दी॥
ऱम तिम्हऽह ऽप्रय तिम्ह ऽप्रय ऱमऽह। यह ऽनरजोसि दोसि ऽबऽध
ब़मऽह॥4॥
भ़ि़थग:-यह सिनकर ऽनष़दऱज प्रेमपीिगक समझ़ने लग़- हे ऩथ!
अप व्यथग ऽिष़द दकसऽलए करते हैं? श्रा ऱमचंरजा अपको
प्य़रे हैं और अप श्रा ऱमचंरजा को प्य़रे हैं। यहा ऽनचोड
(ऽनऽश्चत ऽसि़ंत) है, दोष तो प्रऽतकी ल ऽिध़त़ को है॥4॥
छंद- :
* ऽबऽध ब़म की करना करठन जेवह म़ति कीन्द्हा ब़िरा।
तेऽह ऱऽत पिऽन पिऽन करवह प्रभि स़दर सरहऩ ऱिरा॥
तिलसा न तिम्ह सो ऱम प्रातमि कहति हौं सौंहे दकएूँ।

पररऩम मंगल ज़ऽन ऄपने अऽनए धारजि ऽहएूँ॥
भ़ि़थग:-प्रऽतकी ल ऽिध़त़ की करना बडा कठोर है, ऽजसने म़त़
कै के या को ब़िला बऩ ददय़ (ईसकी मऽत फे र दा)। ईस ऱत
को प्रभि श्रा ऱमचंरजा ब़र-ब़र अदरपीिगक अपकी बडा
सऱहऩ करते थे। तिलसाद़सजा कहते हैं- (ऽनष़दऱज कहत़ है
दक-) श्रा ऱमचंरजा को अपके सम़न ऄऽतशय ऽप्रय और कोइ
नहीं है, मैं सौगंध ख़कर कहत़ हूँ। पररण़म में मंगल होग़,
यह ज़नकर अप ऄपने हृदय में धैयग ध़रण कीऽजए।
सोरठ़ :
* ऄंतरज़मा ऱमि सकि च सप्रेम कु प़यतन।
चऽलऄ कररऄ ऽबश्ऱमि यह ऽबच़रर दुढ़ अऽन मन॥201॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचंरजा ऄंतय़गमा तथ़ संकोच, प्रेम और कु प़ के
ध़म हैं, यह ऽिच़र कर और मन में दुढ़त़ ल़कर चऽलए और
ऽिश्ऱम कीऽजए॥201॥
चौप़इ :
* सख़ बचन सिऽन ईर धरर धाऱ। ब़स चले सिऽमरत रघिबाऱ॥
यह सिऽध प़आ नगर नर ऩरा। चले ऽबलोकन अरत भ़रा॥1॥
भ़ि़थग:-सख़ के िचन सिनकर, हृदय में धारज धरकर श्रा
ऱमचंरजा क़ समरण करते हुए भरतजा डेरे को चले। नगर के

स़रे स्त्रा-पिरुष यह (श्रा ऱमजा के ठहरने के सथ़न क़) सम़च़र
प़कर बडे अतिर होकर ईस सथ़न को देखने चले॥1॥
* परदऽखऩ करर करवह प्रऩम़। देवह कै कआऽह खोरर ऽनक़म़।
भरर भरर ब़रर ऽबलोचन लेंहीं। ब़म ऽबध़तऽह दीषन देहीं॥2॥
भ़ि़थग:-िे ईस सथ़न की पररक्रम़ करके प्रण़म करते हैं और
कै के या को बहुत दोष देते हैं। नेत्रों में जल भर-भर लेते हैं और
प्रऽतकी ल ऽिध़त़ को दीषण देते हैं॥2॥
* एक सऱहवह भरत सनेह। कोई कह नुपऽत ऽनब़हेई नेह॥
वनदवह अपि सऱऽह ऽनष़दऽह। को कऽह सकआ ऽबमोह
ऽबष़दऽह॥3॥
भ़ि़थग:-कोइ भरतजा के स्नेह की सऱहऩ करते हैं और कोइ
कहते हैं दक ऱज़ ने ऄपऩ प्रेम खीब ऽनब़ह़। सब ऄपना वनद़
करके ऽनष़द की प्रशंस़ करते हैं। ईस समय के ऽिमोह और
ऽिष़द को कौन कह सकत़ है?॥3॥
* ऐऽह ऽबऽध ऱऽत लोगि सबि ज़ग़। भ़ ऽभनिस़र गिद़ऱ ल़ग़॥
गिरऽह सिऩिूँ चढ़़आ सिह़ईं। नईं ऩि सब म़ति चढ़़ईं॥4॥
भ़ि़थग:-आस प्रक़र ऱतभर सब लोग ज़गते रहे। सबेऱ होते हा
खेि़ लग़। सिंदर ऩि पर गिरुजा को चढ़़कर दफर नइ ऩि पर
सब म़त़ओं को चढ़़य़॥4॥

* दंड च़रर महूँ भ़ सबि प़ऱ। ईतरर भरत तब सबऽह
सूँभ़ऱ॥5॥
भ़ि़थग:-च़र घडा में सब गंग़जा के प़र ईतर गए। तब
भरतजा ने ईतरकर सबको सूँभ़ल़॥5॥
दोह़ :
* प्ऱतदक्रय़ करर म़ति पद बंदद गिरऽह ऽसरु ऩआ।
अगें दकए ऽनष़द गन दान्द्हई
े कटकि चल़आ॥202॥
भ़ि़थग:-प्ऱतःक़ल की दक्रय़ओं को करके म़त़ के चरणों की
िंदऩ कर और गिरुजा को ऽसर नि़कर भरतजा ने ऽिष़द गणों
को (ऱसत़ ददखल़ने के ऽलए) अगे कर ऽलय़ और सेऩ चल़
दा॥202॥141॥
चौप़इ :
* दकयई ऽनष़दऩथि ऄगिअईं। म़ति प़लकीं सकल चल़ईं॥
स़थ बोल़आ भ़आ लघि दान्द्ह़। ऽबप्रन्द्ह सऽहत गिनि गिर
कीन्द्ह़॥1॥
भ़ि़थग:-ऽनष़दऱज को अगे करके पाछे सब म़त़ओं की
प़लदकय़ूँ चल़ईं। छोटे भ़इ शत्रिघ्नजा को बिल़कर ईनके स़थ
कर ददय़। दफर ब्ऱह्मणों सऽहत गिरुजा ने गमन दकय़॥1॥

* अपि सिरसररऽह कीन्द्ह प्रऩमी। सिऽमरे लखन सऽहत ऽसय ऱमी॥
गिने भरत पय़देवह प़ए। कोतल संग ज़वह डोररअए॥2॥
भ़ि़थग:-तदनन्द्तर अप (भरतजा) ने गंग़जा को प्रण़म दकय़
और लक्ष्मण सऽहत श्रा सात़-ऱमजा क़ समरण दकय़। भरतजा
पैदल हा चले। ईनके स़थ कोतल (ऽबऩ सि़र के ) घोडे
ब़गडोर से बूँधे हुए चले ज़ रहे हैं॥2॥
* कहवह सिसेिक ब़रवह ब़ऱ। होआऄ ऩथ ऄसि ऄसि़ऱ॥
ऱमि पय़देऽह प़यूँ ऽसध़ए। हम कहूँ रथ गज ब़ऽज बऩए॥3॥
भ़ि़थग:-ईिम सेिक ब़र-ब़र कहते हैं दक हे ऩथ! अप घोडे
पर सि़र हो लाऽजए। (भरतजा जि़ब देते हैं दक) श्रा
ऱमचंरजा तो पैदल हा गए और हम़रे ऽलए रथ, ह़था और
घोडे बऩए गए हैं॥3॥
* ऽसर भर ज़ईूँ ईऽचत ऄस मोऱ। सब तें सेिक धरमि कठोऱ॥
देऽख भरत गऽत सिऽन मुद ि ब़ना। सब सेिक गन गरवह
गल़ना॥4॥
भ़ि़थग:-मिझे ईऽचत तो ऐस़ है दक मैं ऽसर के बल चलकर
ज़उूँ। सेिक क़ धमग सबसे करठन होत़ है। भरतजा की दश़
देखकर और कोमल ि़णा सिनकर सब सेिकगण ग्ल़ऽन के म़रे
गले ज़ रहे हैं॥4॥

भरतजा क़ प्रय़ग ज़ऩ और भरत-भरि़ज संि़द
दोह़ :
* भरत तासरे पहर कहूँ कीन्द्ह प्रबेसि प्रय़ग।
कहत ऱम ऽसय ऱम ऽसय ईमऽग ईमऽग ऄनिऱग॥203॥

भ़ि़थग:-प्रेम में ईमूँग-ईमूँगकर सात़ऱम-सात़ऱम कहते हुए
भरतजा ने तासरे पहर प्रय़ग में प्रिेश दकय़॥203॥
चौप़इ :
* झलक़ झलकत प़यन्द्ह कै सें। पंकज कोस ओस कन जैसें॥
भरत पय़देवह अए अजी। भयई दिऽखत सिऽन सकल सम़जी॥1॥
भ़ि़थग:-ईनके चरणों में छ़ले कै से चमकते हैं, जैसे कमल की
कला पर ओस की बीूँदें चमकता हों। भरतजा अज पैदल हा
चलकर अए हैं, यह सम़च़र सिनकर स़ऱ सम़ज दिःखा हो
गय़॥1॥
* खबरर लान्द्ह सब लोग नह़ए। कीन्द्ह प्रऩमि ऽत्रबेऽनवह अए॥
सऽबऽध ऽसत़ऽसत नार नह़ने। ददए द़न मऽहसिर सनम़ने॥2॥
भ़ि़थग:-जब भरतजा ने यह पत़ प़ ऽलय़ दक सब लोग स्ऩन
कर चिके, तब ऽत्रिेणा पर अकर ईन्द्हें प्रण़म दकय़। दफर
ऽिऽधपीिगक (गंग़-यमिऩ के ) श्वेत और श्य़म जल में स्ऩन दकय़
और द़न देकर ब्ऱह्मणों क़ सम्म़न दकय़॥2॥
* देखत सय़मल धिल हलोरे । पिलदक सरार भरत कर जोरे ॥
सकल क़म प्रद तारथऱउ। बेद ऽबददत जग प्रगट प्रभ़उ॥3॥

भ़ि़थग:-श्य़म और सफे द (यमिऩजा और गंग़जा की) लहरों को
देखकर भरतजा क़ शरार पिलदकत हो ईठ़ और ईन्द्होंने ह़थ
जोडकर कह़- हे ताथगऱज! अप समसत क़मऩओं को पीणग करने
ि़ले हैं। अपक़ प्रभ़ि िेदों में प्रऽसि और संस़र में प्रकट
है॥3॥
* म़गईूँ भाख त्य़ऽग ऽनज धरमी। अरत क़ह न करआ कि करमी॥
ऄस ऽजयूँ ज़ऽन सिज़न सिद़ना। सफल करवह जग ज़चक
ब़ना॥4॥
भ़ि़थग:-मैं ऄपऩ धमग (न म़ूँगने क़ क्षऽत्रय धमग) त्य़गकर अप
से भाख म़ूँगत़ हूँ। अिग मनिष्य कौन स़ कि कमग नहीं करत़?
ऐस़ हृदय में ज़नकर सिज़न ईिम द़ना जगत् में म़ूँगने ि़ले
की ि़णा को सफल दकय़ करते हैं (ऄथ़गत् िह जो म़ूँगत़ है,
सो दे देते हैं)॥4॥
दोह़ :
* ऄरथ न धरम न क़म रुऽच गऽत न चहईूँ ऽनरब़न।
जनम-जनम रऽत ऱम पद यह बरद़नि न अन॥204॥
भ़ि़थग:-मिझे न ऄथग की रुऽच (आच्छ़) है, न धमग की, न क़म
की और न मैं मोक्ष हा च़हत़ हूँ। जन्द्म-जन्द्म में मेऱ श्रा

ऱमजा के चरणों में प्रेम हो, बस, यहा िरद़न म़ूँगत़ हूँ,
दीसऱ कि छ नहीं॥204॥
चौप़इ :
* ज़नहुूँ ऱमि कि रटल करर मोहा। लोग कहई गिर स़ऽहब रोहा॥
सात़ ऱम चरन रऽत मोरें । ऄनिददन बढ़ई ऄनिग्रह तोरें ॥1॥
भ़ि़थग:-सियं श्रा ऱमचंरजा भा भले हा मिझे कि रटल समझें और
लोग मिझे गिरुरोहा तथ़ सि़मा रोहा भले हा कहें, पर श्रा
सात़-ऱमजा के चरणों में मेऱ प्रेम अपकी कु प़ से ददन-ददन
बढ़त़ हा रहे॥1॥
* जलदि जनम भरर सिरऽत ऽबस़रई। ज़चत जलि पऽब प़हन
ड़रई॥
च़तकि ररटन घटें घरट ज़इ। बढ़ें प्रेमि सब भ़ूँऽत भल़इ॥2॥
भ़ि़थग:-मेघ च़हे जन्द्मभर च़तक की सिध भिल़ दे और जल
म़ूँगने पर िह च़हे िज्र और पत्थर (ओले) हा ऽगऱिे, पर
च़तक की रटन घटने से तो ईसकी ब़त हा घट ज़एगा
(प्रऽतष्ठ़ हा नष्ट हो ज़एगा)। ईसकी तो प्रेम बढ़ने में हा सब
तरह से भल़इ है॥2॥
* कनकवह ब़न चढ़आ ऽजऽम द़हें। ऽतऽम ऽप्रयतम पद नेम
ऽनब़हें॥

भरत बचन सिऽन म़झ ऽत्रबेना। भआ मुद ि ब़ऽन सिमग
ं ल देना॥3॥
भ़ि़थग:-जैसे तप़ने से सोने पर अब (चमक) अ ज़ता है, िैसे
हा ऽप्रयतम के चरणों में प्रेम क़ ऽनयम ऽनब़हने से प्रेमा सेिक
क़ गौरि बढ़ ज़त़ है। भरतजा के िचन सिनकर बाच ऽत्रिेणा
में से सिंदर मंगल देने ि़ला कोमल ि़णा हुइ॥3॥
* त़त भरत तिम्ह सब ऽबऽध स़धी। ऱम चरन ऄनिऱग ऄग़धी॥
ब़दद गल़ऽन करहु मन म़हीं। तिम्ह सम ऱमऽह कोई ऽप्रय
ऩहीं॥4॥
भ़ि़थग:-हे त़त भरत! तिम सब प्रक़र से स़धि हो। श्रा
ऱमचंरजा के चरणों में तिम्ह़ऱ ऄथ़ह प्रेम है। तिम व्यथग हा मन
में ग्ल़ऽन कर रहे हो। श्रा ऱमचंरजा को तिम्ह़रे सम़न ऽप्रय
कोइ नहीं है॥4॥
दोह़ :
* तनि पिलके ई ऽहयूँ हरषि सिऽन बेऽन बचन ऄनिकील।
भरत धन्द्य कऽह धन्द्य सिर हरऽषत बरषवह फी ल॥205॥
भ़ि़थग:-ऽत्रिेणाजा के ऄनिकील िचन सिनकर भरतजा क़ शरार
पिलदकत हो गय़, हृदय में हषग छ़ गय़। भरतजा धन्द्य हैं,
कहकर देित़ हर्तषत होकर फी ल बरस़ने लगे॥205॥
चौप़इ :

* प्रमिददत तारथऱज ऽनि़सा। बैख़नस बटि गुहा ईद़सा॥
कहवह परसपर ऽमऽल दस प़ूँच़। भरत सनेहु सालि सिऽच
स़ूँच़॥1॥
भ़ि़थग:-ताथगऱज प्रय़ग में रहने ि़ले िनप्रसथ, ब्रह्मच़रा, गुहसथ
और ईद़सान (संन्द्य़सा) सब बहुत हा अनंददत हैं और दस-प़ूँच
ऽमलकर अपस में कहते हैं दक भरतजा क़ प्रेम और शाल
पऽित्र और सच्च़ है॥1॥
* सिनत ऱम गिन ग्ऱम सिह़ए। भरि़ज मिऽनबर पवह अए॥
दंड प्रऩमि करत मिऽन देख।े मीरऽतमंत भ़ग्य ऽनज लेखे॥2॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचन्द्रजा के सिंदर गिण समीहों को सिनते हुए िे
मिऽनश्रेष्ठ भरि़जजा के प़स अए। मिऽन ने भरतजा को दण्डित
प्रण़म करते देख़ और ईन्द्हें ऄपऩ मीर्ततम़न सौभ़ग्य समझ़॥2॥
* ध़आ ईठ़आ ल़आ ईर लान्द्ह।े दाऽन्द्ह ऄसास कु त़रथ कीन्द्ह॥े
असनि दान्द्ह ऩआ ऽसरु बैठे। चहत सकि च गुहूँ जनि भऽज पैठे॥3॥
भ़ि़थग:-ईन्द्होंने दौडकर भरतजा को ईठ़कर हृदय से लग़ ऽलय़
और अशाि़गद देकर कु त़थग दकय़। मिऽन ने ईन्द्हें असन ददय़। िे
ऽसर नि़कर आस तरह बैठे म़नो भ़गकर संकोच के घर में घिस
ज़ऩ च़हते हैं॥3॥

* मिऽन पीूँछब कछि यह बड सोची। बोले ररऽष लऽख सालि
सूँकोची॥
सिनहु भरत हम सब सिऽध प़इ। ऽबऽध करतब पर दकछि न
बस़इ॥4॥
भ़ि़थग:-ईनके मन में यह बड़ सोच है दक मिऽन कि छ पीछेंगे (तो
मैं क्य़ ईिर दीग
ूँ ़)। भरतजा के शाल और संकोच को देखकर
ऊऽष बोले- भरत! सिनो, हम सब खबर प़ चिके हैं। ऽिध़त़ के
कतगव्य पर कि छ िश नहीं चलत़॥4॥
दोह़ :
* तिम्ह गल़ऽन ऽजयूँ जऽन करहु समिऽझ म़ति करतीऽत।
त़त कै कआऽह दोसि नवह गइ ऽगऱ मऽत धीऽत॥206॥
भ़ि़थग:-म़त़ की करतीत को समझकर (य़द करके ) तिम हृदय में
ग्ल़ऽन मत करो। हे त़त! कै के या क़ कोइ दोष नहीं है, ईसकी
बिऽि तो सरसिता ऽबग़ड गइ था॥206॥
चौप़इ :
* यहई कहत भल कऽहऽह न कोउ। लोकि बेद ि बिध संमत दोउ॥
त़त तिम्ह़र ऽबमल जसि ग़इ। प़आऽह लोकई बेद ि बड़इ॥1॥

भ़ि़थग:-यह कहते भा कोइ भल़ न कहेग़, क्योंदक लोक और
िेद दोनों हा ऽिि़नों को म़न्द्य है, दकन्द्ति हे त़त! तिम्ह़ऱ
ऽनमगल यश ग़कर तो लोक और िेद दोनों बड़इ प़िेंगे॥1॥
* लोक बेद संमत सबि कहइ। जेऽह ऽपति देआ ऱजि सो लहइ॥
ऱई सत्यब्रत तिम्हऽह बोल़इ। देत ऱजि सिखि धरमि बड़इ॥2॥
भ़ि़थग:-यह लोक और िेद दोनों को म़न्द्य है और सब यहा
कहते हैं दक ऽपत़ ऽजसको ऱज्य दे िहा प़त़ है। ऱज़
सत्यव्रता थे, तिमको बिल़कर ऱज्य देते, तो सिख ऽमलत़, धमग
रहत़ और बड़इ होता॥2॥
* ऱम गिनि बन ऄनरथ मील़। जो सिऽन सकल ऽबसि भआ
सील़॥
सो भ़िा बस ऱऽन ऄय़ना। करर कि च़ऽल ऄंतहुूँ पऽछत़ना॥3॥
भ़ि़थग:-स़रे ऄनथग की जड तो श्रा ऱमचन्द्रजा क़ िनगमन है,
ऽजसे सिनकर समसत संस़र को पाड़ हुइ। िह श्रा ऱम क़
िनगमन भा भ़िािश हुअ। बेसमझ ऱना तो भ़िािश कि च़ल
करके ऄंत में पछत़इ॥3॥
* तहूँईूँ तिम्ह़र ऄलप ऄपऱधी। कहै सो ऄधम ऄय़न ऄस़धी॥
करतेहु ऱजि त तिम्हऽह ऩ दोषी। ऱमऽह होत सिनत संतोषी॥4॥

भ़ि़थग:-ईसमें भा तिम्ह़ऱ कोइ तऽनक स़ भा ऄपऱध कहे, तो
िह ऄधम, ऄज्ञ़ना और ऄस़धि है। यदद तिम ऱज्य करते तो भा
तिम्हें दोष न होत़। सिनकर श्रा ऱमचन्द्रजा को भा संतोष हा
होत़॥4॥
दोह़ :
* ऄब ऄऽत कीन्द्हहु
े भरत भल तिम्हऽह ईऽचत मत एहु।
सकल सिमंगल मील जग रघिबर चरन सनेहु॥207॥
भ़ि़थग:-हे भरत! ऄब तो तिमने बहुत हा ऄच्छ़ दकय़, यहा मत
तिम्ह़रे ऽलए ईऽचत थ़। श्रा ऱमचन्द्रजा के चरणों में प्रेम होऩ
हा संस़र में समसत सिंदर मंगलों क़ मील है॥207॥
चौप़इ :
* सो तिम्ह़र धनि जािनि प्ऱऩ। भीररभ़ग को तिम्हऽह सम़ऩ॥
यह तिम्ह़र अचरजि न त़त़। दसरथ सिऄन ऱम ऽप्रय वऱ्त़॥1॥
भ़ि़थग:-सो िह (श्रा ऱमचन्द्रजा के चरणों क़ प्रेम) तो तिम्ह़ऱ
धन, जािन और प्ऱण हा है, तिम्ह़रे सम़न बडभ़गा कौन है?
हे त़त! तिम्ह़रे ऽलए यह अश्चयग की ब़त नहीं है, क्योंदक तिम
दशरथजा के पित्र और श्रा ऱमचन्द्रजा के प्य़रे भ़इ हो॥1॥
* सिनहु भरत रघिबर मन म़हीं। पेम प़त्रि तिम्ह सम कोई ऩहीं॥

लखन ऱम सातऽह ऄऽत प्राता। ऽनऽस सब तिम्हऽह सऱहत
बाता॥2॥
भ़ि़थग:-हे भरत! सिनो, श्रा ऱमचन्द्र के मन में तिम्ह़रे सम़न
प्रेम प़त्र दीसऱ कोइ नहीं है। लक्ष्मणजा, श्रा ऱमजा और
सात़जा तानों की स़रा ऱत ईस ददन ऄत्यन्द्त प्रेम के स़थ
तिम्ह़रा सऱहऩ करते हा बाता॥2॥
* ज़ऩ मरमि नह़त प्रय़ग़। मगन होवह तिम्हरें ऄनिऱग़॥
तिम्ह पर ऄस सनेहु रघिबर कें । सिख जािन जग जस जड नर
कें ॥3॥
भ़ि़थग:-प्रय़गऱज में जब िे स्ऩन कर रहे थे, ईस समय मैंने
ईनक़ यह ममग ज़ऩ। िे तिम्ह़रे प्रेम में मग्न हो रहे थे। तिम
पर श्रा ऱमचन्द्रजा क़ ऐस़ हा (ऄग़ध) स्नेह है, जैस़ मीखग
(ऽिषय़सक्त) मनिष्य क़ संस़र में सिखमय जािन पर होत़
है॥3॥
* यह न ऄऽधक रघिबार बड़इ। प्रनत कि टिंब प़ल रघिऱइ॥
तिम्ह तौ भरत मोर मत एह। धरें देह जनि ऱम सनेह॥4॥
भ़ि़थग:-यह श्रा रघिऩथजा की बहुत बड़इ नहीं है, क्योंदक श्रा
रघिऩथजा तो शरण़गत के कि टि म्ब भर को प़लने ि़ले हैं। हे

भरत! मेऱ यह मत है दक तिम तो म़नो शरारध़रा श्रा ऱमजा
के प्रेम हा हो॥4॥
दोह़ :
* तिम्ह कहूँ भरत कलंक यह हम सब कहूँ ईपदेस।ि
ऱम भगऽत रस ऽसऽि ऽहत भ़ यह समई गनेसि॥208॥
भ़ि़थग:-हे भरत! तिम्ह़रे ऽलए (तिम्ह़रा समझ में) यह कलंक है,
पर हम सबके ऽलए तो ईपदेश है। श्रा ऱमभऽक्त रूपा रस की
ऽसऽि के ऽलए यह समय गणेश (बड़ शिभ) हुअ है॥208॥
चौप़इ :
* नि ऽबधि ऽबमल त़त जसि तोऱ। रघिबर कककर कि मिद चकोऱ॥
ईददत सद़ ऄूँथआऽह कबहूँ ऩ। घरटऽह न जग नभ ददन ददन
दीऩ॥1॥
भ़ि़थग:-हे त़त! तिम्ह़ऱ यश ऽनमगल निान चन्द्रम़ है और श्रा
ऱमचन्द्रजा के द़स कि मिद और चकोर हैं (िह चन्द्रम़ तो
प्रऽतददन ऄसत होत़ और घटत़ है, ऽजससे कि मिद और चकोर को
दिःख होत़ है), परन्द्ति यह तिम्ह़ऱ यश रूपा चन्द्रम़ सद़ ईदय
रहेग़, कभा ऄसत होग़ हा नहीं! जगत रूपा अक़श में यह
घटेग़ नहीं, िरन ददन-ददन दीऩ होग़॥1॥

* कोक ऽतलोक प्राऽत ऄऽत कररहा। प्रभि प्रत़प रऽब छऽबऽह न
हररहा॥
ऽनऽस ददन सिखद सद़ सब क़ह। ग्रऽसऽह न कै कआ करतबि
ऱह॥2॥
भ़ि़थग:-त्रैलोक्य रूपा चकि़ आस यश रूपा चन्द्रम़ पर ऄत्यन्द्त
प्रेम करे ग़ और प्रभि श्रा ऱमचन्द्रजा क़ प्रत़प रूपा सीयग आसकी
छऽब को हरण नहीं करे ग़। यह चन्द्रम़ ऱत-ददन सद़ सब
दकसा को सिख देने ि़ल़ होग़। कै के या क़ कि कमग रूपा ऱहु आसे
ग्ऱस नहीं करे ग़॥2॥
* पीरन ऱम सिपम
े ऽपयीष़। गिर ऄिम़न दोष नवह दीष़॥
ऱम भगत ऄब ऄऽमऄूँ ऄघ़हूँ। कीन्द्हहु
े सिलभ सिध़ बसिध़हूँ॥3॥
भ़ि़थग:-यह चन्द्रम़ श्रा ऱमचन्द्रजा के सिंदर प्रेम रूपा ऄमुत से
पीणग है। यह गिरु के ऄपम़न रूपा दोष से दीऽषत नहीं है। तिमने
आस यश रूपा चन्द्रम़ की सुऽष्ट करके पुथ्िा पर भा ऄमुत को
सिलभ कर ददय़। ऄब श्रा ऱमजा के भक्त आस ऄमुत से तुप्त हो
लें॥3॥
* भीप भगारथ सिरसरर अना। सिऽमरत सकल सिमंगल ख़ना॥
दसरथ गिन गन बरऽन न ज़हीं। ऄऽधकि कह़ जेऽह सम जग
ऩहीं॥4॥

भ़ि़थग:-ऱज़ भगारथ गंग़जा को ल़ए, ऽजन (गंग़जा) क़
समरण हा सम्पीणग सिंदर मंगलों की ख़न है। दशरथजा के गिण
समीहों क़ तो िणगन हा नहीं दकय़ ज़ सकत़, ऄऽधक क्य़,
ऽजनकी बऱबरा क़ जगत में कोइ नहीं है॥4॥
दोह़ :
* ज़सि सनेह सकोच बस ऱम प्रगट भए अइ।
जे हर ऽहय नयनऽन कबहुूँ ऽनरखे नहीं ऄघ़आ॥209॥
भ़ि़थग:-ऽजनके प्रेम और संकोच (शाल) के िश में होकर सियं
(सऽच्चद़नंदघन) भगि़न श्रा ऱम अकर प्रकट हुए, ऽजन्द्हें श्रा
मह़देिजा ऄपने हृदय के नेत्रों से कभा ऄघ़कर नहीं देख प़ए
(ऄथ़गत ऽजनक़ सिरूप हृदय में देखते-देखते ऽशिजा कभा तुप्त
नहीं हुए)॥209॥
चौप़इ :
* कीरऽत ऽबधि तिम्ह कीन्द्ह ऄनीप़। जहूँ बस ऱम पेम मुगरूप़॥
त़त गल़ऽन करहु ऽजयूँ ज़एूँ। डरहु दरररऽह प़रसि प़एूँ॥1॥
भ़ि़थग:-(परन्द्ति ईनसे भा बढ़कर) तिमने कीर्तत रूपा ऄनिपम
चंरम़ को ईत्पन्न दकय़, ऽजसमें श्रा ऱम प्रेम हा ऽहरन के
(ऽचह्न के ) रूप में बसत़ है। हे त़त! तिम व्यथग हा हृदय में

ग्ल़ऽन कर रहे हो। प़रस प़कर भा तिम दरररत़ से डर रहे
हो!॥1॥
* सिनहु भरत हम झीठ न कहहीं। ईद़सान त़पस बन रहहीं॥
सब स़धन कर सिफल सिह़ि़। लखन ऱम ऽसय दरसनि प़ि़॥2॥
भ़ि़थग:-हे भरत! सिनो, हम झीठ नहीं कहते। हम ईद़सान हैं
(दकसा क़ पक्ष नहीं करते), तपसिा हैं (दकसा की मिह
ूँ देखा नहीं
कहते) और िन में रहते हैं (दकसा से कि छ प्रयोजन नहीं रखते)।
सब स़धनों क़ ईिम फल हमें लक्ष्मणजा, श्रा ऱमजा और
सात़जा क़ दशगन प्ऱप्त हुअ॥2॥
* तेऽह फल कर फलि दरस तिम्ह़ऱ। सऽहत प्रय़ग सिभ़ग
हम़ऱ॥
भरत धन्द्य तिम्ह जसि जगि जयउ। कऽह ऄस प्रेम मगन मिऽन
भयउ॥3॥
भ़ि़थग:-(सात़-लक्ष्मण सऽहत श्रा ऱमदशगन रूप) ईस मह़न फल
क़ परम फल यह तिम्ह़ऱ दशगन है! प्रय़गऱज समेत हम़ऱ
बड़ भ़ग्य है। हे भरत! तिम धन्द्य हो, तिमने ऄपने यश से जगत
को जात ऽलय़ है। ऐस़ कहकर मिऽन प्रेम में मग्न हो गए॥3॥
* सिऽन मिऽन बचन सभ़सद हरषे। स़धि सऱऽह सिमन सिर बरषे॥

धन्द्य धन्द्य धिऽन गगन प्रय़ग़। सिऽन सिऽन भरति मगन ऄनिऱग़॥4
भ़ि़थग:-भरि़ज मिऽन के िचन सिनकर सभ़सद् हर्तषत हो गए।
'स़धि-स़धि' कहकर सऱहऩ करते हुए देित़ओं ने फी ल बरस़ए।
अक़श में और प्रय़गऱज में 'धन्द्य, धन्द्य' की ध्िऽन सिन-सिनकर
भरतजा प्रेम में मग्न हो रहे हैं॥4॥
दोह़ :
* पिलक ग़त ऽहयूँ ऱमि ऽसय सजल सरोरुह नैन।
करर प्रऩमि मिऽन मंडऽलऽह बोले गदगद बैन॥210॥
भ़ि़थग:-भरतजा क़ शरार पिलदकत है, हृदय में श्रा सात़-ऱमजा
हैं और कमल के सम़न नेत्र (प्रेम़श्रि के ) जल से भरे हैं। िे
मिऽनयों की मंडला को प्रण़म करके गद्गद िचन बोले-॥210॥
चौप़इ :
* मिऽन सम़जि ऄरु तारथऱजी। स़ूँऽचहुूँ सपथ ऄघ़आ ऄक़जी॥
एवह थल जौं दकछि कऽहऄ बऩइ। एऽह सम ऄऽधक न ऄघ
ऄधम़इ॥1॥
भ़ि़थग:-मिऽनयों क़ सम़ज है और दफर ताथगऱज है। यह़ूँ सच्चा
सौगंध ख़ने से भा भरपीर ह़ऽन होता है। आस सथ़न में यदद

कि छ बऩकर कह़ ज़ए, तो आसके सम़न कोइ बड़ प़प और
नाचत़ न होगा॥1॥
* तिम्ह सबगग्य कहईूँ सऽतभ़उ। ईर ऄंतरज़मा रघिऱउ॥
मोऽह न म़ति करतब कर सोची। नवह दिखि ऽजयूँ जगि ज़ऽनऽह
पोची॥2॥
भ़ि़थग:-मैं सच्चे भ़ि से कहत़ हूँ। अप सिगज्ञ हैं और श्रा
रघिऩथजा हृदय के भातर की ज़नने ि़ले हैं (मैं कि छ भा
ऄसत्य कहूँग़ तो अपसे और ईनसे ऽछप़ नहीं रह सकत़)। मिझे
म़त़ कै के या की करना क़ कि छ भा सोच नहीं है और न मेरे
मन में आसा ब़त क़ दिःख है दक जगत मिझे नाच समझेग़॥2॥
* ऩऽहन डरु ऽबगररऽह परलोकी । ऽपतहु मरन कर मोऽह न
सोकी ॥
सिकुत सिजस भरर भिऄन सिह़ए। लऽछमन ऱम सररस सित
प़ए॥3॥
भ़ि़थग:-न यहा डर है दक मेऱ परलोक ऽबगड ज़एग़ और न
ऽपत़जा के मरने क़ हा मिझे शोक है, क्योंदक ईनक़ सिंदर पिण्य
और सियश ऽिश्व भर में सिशोऽभत है। ईन्द्होंने श्रा ऱम-लक्ष्मण
सराखे पित्र प़ए॥3॥
* ऱम ऽबरहूँ तऽज तनि छनभंगी। भीप सोच कर किन प्रसंगी॥

ऱम लखन ऽसय ऽबनि पग पनहीं। करर मिऽन बेष दफरवह बन
बनहीं॥4॥
भ़ि़थग:-दफर ऽजन्द्होंने श्रा ऱमचन्द्रजा के ऽिरह में ऄपने
क्षणभंगिर शरार को त्य़ग ददय़, ऐसे ऱज़ के ऽलए सोच करने
क़ कौन प्रसंग है? (सोच आसा ब़त क़ है दक) श्रा ऱमजा,
लक्ष्मणजा और सात़जा पैरों में ऽबऩ जीता के मिऽनयों क़ िेष
बऩए िन-िन में दफरते हैं॥4॥
दोह़ :
* ऄऽजन बसन फल ऄसन मऽह सयन ड़ऽस कि स प़त।
बऽस तरु तर ऽनत सहत ऽहम अतप बरष़ ब़त॥211॥
भ़ि़थग:-िे िल्कल िस्त्र पहनते हैं, फलों क़ भोजन करते हैं,
पुथ्िा पर कि श और पिे ऽबछ़कर सोते हैं और िुक्षों के नाचे
ऽनि़स करके ऽनत्य सदी, गमी, िष़ग और हि़ सहते हैं। 211॥
चौप़इ :
* एऽह दिख द़हूँ दहआ ददन छ़ता। भीख न ब़सर नाद न ऱता॥
एऽह कि रोग कर औषधि ऩहीं। सोधेईूँ सकल ऽबसि मन म़हीं॥1॥
भ़ि़थग:-आसा दिःख की जलन से ऽनरं तर मेरा छ़ता जलता रहता
है। मिझे न ददन में भीख लगता है, न ऱत को नींद अता है।

मैंने मन हा मन समसत ऽिश्व को खोज ड़ल़, पर आस कि रोग
की औषध कहीं नहीं है॥1॥
* म़ति कि मत बढ़इ ऄघ मील़। तेवह हम़र ऽहत कीन्द्ह बूँसील़॥
कऽल कि क़ठ कर कीन्द्ह कि जंत्री। ग़ऽड ऄिऽध पदढ़ करठन
कि मंत्री॥2॥
भ़ि़थग:-म़त़ क़ कि मत (बिऱ ऽिच़र) प़पों क़ मील बढ़इ है।
ईसने हम़रे ऽहत क़ बसील़ बऩय़। ईससे कलह रूपा कि क़ठ
क़ कि यंत्र बऩय़ और चौदह िषग की ऄिऽध रूपा करठन कि मंत्र
पढ़कर ईस यंत्र को ग़ड ददय़। (यह़ूँ म़त़ क़ कि ऽिच़र बढ़इ
है, भरत को ऱज्य बसील़ है, ऱम क़ िनि़स कि यंत्र है और
चौदह िषग की ऄिऽध कि मंत्र है)॥2॥
* मोऽह लऽग यहु कि ठ़टि तेवह ठ़ट़। घ़लेऽस सब जगि
ब़रहब़ट़॥
ऽमटआ कि जोगि ऱम दफरर अएूँ। बसआ ऄिध नवह अन ईप़एूँ॥3॥
भ़ि़थग:-मेरे ऽलए ईसने यह स़ऱ कि ठ़ट (बिऱ स़ज) रच़ और
स़रे जगत को ब़रहब़ट (ऽछन्न-ऽभन्न) करके नष्ट कर ड़ल़। यह
कि योग श्रा ऱमचन्द्रजा के लौट अने पर हा ऽमट सकत़ है और
तभा ऄयोध्य़ बस सकता है, दीसरे दकसा ईप़य से नहीं॥3॥

* भरत बचन सिऽन मिऽन सिखि प़इ। सबवह कीऽन्द्ह बहु भ़ूँऽत
बड़इ॥
त़त करहु जऽन सोचि ऽबसेषा। सब दिखि ऽमरटऽह ऱम पग
देखा॥4॥
भ़ि़थग:-भरतजा के िचन सिनकर मिऽन ने सिख प़य़ और सभा
ने ईनकी बहुत प्रक़र से बड़इ की। (मिऽन ने कह़-) हे त़त!
ऄऽधक सोच मत करो। श्रा ऱमचन्द्रजा के चरणों क़ दशगन करते
हा स़ऱ दिःख ऽमट ज़एग़॥4॥

भरि़ज ि़ऱ भरत क़ सत्क़र
दोह़ :
* करर प्रबोधि मिऽनबर कहेई ऄऽतऽथ पेमऽप्रय होहु।
कं द मील फल फी ल हम देवह लेहु करर छोहु॥212॥
भ़ि़थग:-आस प्रक़र मिऽनश्रेष्ठ भरि़जजा ने ईनक़ सम़ध़न करके
कह़- ऄब अप लोग हम़रे प्रेम ऽप्रय ऄऽतऽथ बऽनए और कु प़
करके कं द-मील, फल-फी ल जो कि छ हम दें, सिाक़र कीऽजए॥212॥
चौप़इ :
* सिऽन मिऽन बचन भरत ऽहयूँ सोची। भयई कि ऄिसर करठन
सूँकोची॥
ज़ऽन गिरुआ गिर ऽगऱ बहोरा। चरन बंदद बोले कर जोरा॥1॥
भ़ि़थग:-मिऽन के िचन सिनकर भरत के हृदय में सोच हुअ दक
यह बेमौके बड़ बेढब संकोच अ पड़! दफर गिरुजनों की ि़णा
को महत्िपीणग (अदरणाय) समझकर, चरणों की िंदऩ करके ह़थ
जोडकर बोले-॥1॥

* ऽसर धरर अयसि कररऄ तिम्ह़ऱ। परम धरम यहु ऩथ
हम़ऱ॥
भरत बचन मिऽनबर मन भ़ए। सिऽच सेिक ऽसष ऽनकट
बोल़ए॥2॥
भ़ि़थग:-हे ऩथ! अपकी अज्ञ़ को ऽसर चढ़़कर ईसक़ प़लन
करऩ, यह हम़ऱ परम धमग है। भरतजा के ये िचन मिऽनश्रेष्ठ
के मन को ऄच्छे लगे। ईन्द्होंने ऽिश्व़सप़त्र सेिकों और ऽशष्यों
को प़स बिल़य़॥2॥
* च़ऽहऄ कीऽन्द्ह भरत पहुऩइ। कं द मील फल अनहु ज़इ।
भलेवह ऩथ कऽह ऽतन्द्ह ऽसर ऩए। प्रमिददत ऽनज ऽनज क़ज
ऽसध़ए॥3॥
भ़ि़थग:-(और कह़ दक) भरत की पहुऩइ करना च़ऽहए। ज़कर
कं द, मील और फल ल़ओ। ईन्द्होंने 'हे ऩथ! बहुत ऄच्छ़' कहकर
ऽसर नि़य़ और तब िे बडे अनंददत होकर ऄपने-ऄपने क़म
को चल ददए॥3॥
* मिऽनऽह सोच प़हुन बड नेित़। तऽस पीज़ च़ऽहऄ जस
देित़॥
सिऽन ररऽध ऽसऽध ऄऽनम़ददक अईं। अयसि होआ सो करवह
गोस़ईं॥4॥

भ़ि़थग:-मिऽन को वचत़ हुइ दक हमने बहुत बडे मेहम़न को
न्द्योत़ है। ऄब जैस़ देित़ हो, िैसा हा ईसकी पीज़ भा होना
च़ऽहए। यह सिनकर ऊऽिय़ूँ और ऄऽणम़दद ऽसऽिय़ूँ अ गईं
(और बोलीं-) हे गोस़ईं! जो अपकी अज्ञ़ हो सो हम करें ॥4॥
दोह़ :
* ऱम ऽबरह ब्य़कि ल भरति स़निज सऽहत सम़ज।
पहुऩइ करर हरहु श्रम कह़ मिददत मिऽनऱज॥213॥
भ़ि़थग:-मिऽनऱज ने प्रसन्न होकर कह़- छोटे भ़इ शत्रिघ्न और
सम़ज सऽहत भरतजा श्रा ऱमचन्द्रजा के ऽिरह में व्य़कि ल हैं,
आनकी पहुऩइ (अऽतथ्य सत्क़र) करके आनके श्रम को दीर
करो॥213॥
चौप़इ :
* ररऽध ऽसऽध ऽसर धरर मिऽनबर ब़ना। बडभ़ऽगऽन अपिऽह
ऄनिम़ना॥
कहवह परसपर ऽसऽध समिद़इ। ऄतिऽलत ऄऽतऽथ ऱम लघि
भ़इ॥1॥
भ़ि़थग:-ऊऽि-ऽसऽि ने मिऽनऱज की अज्ञ़ को ऽसर चढ़़कर
ऄपने को बडभ़ऽगना समझ़। सब ऽसऽिय़ूँ अपस में कहने

लगीं- श्रा ऱमचन्द्रजा के छोटे भ़इ भरत ऐसे ऄऽतऽथ हैं,
ऽजनकी तिलऩ में कोइ नहीं अ सकत़॥1॥
* मिऽन पद बंदद कररऄ सोआ अजी। होआ सिखा सब ऱज सम़जी॥
ऄस कऽह रचेई रुऽचर गुह ऩऩ। जेऽह ऽबलोदक ऽबलख़वह
ऽबम़ऩ॥2॥
भ़ि़थग:-ऄतः मिऽन के चरणों की िंदऩ करके अज िहा करऩ
च़ऽहए, ऽजससे स़ऱ ऱज-सम़ज सिखा हो। ऐस़ कहकर ईन्द्होंने
बहुत से सिंदर घर बऩए, ऽजन्द्हें देखकर ऽिम़न भा ऽिलखते हैं
(लज़ ज़ते हैं)॥2॥
* भोग ऽबभीऽत भीरर भरर ऱखे। देखत ऽजन्द्हऽह ऄमर ऄऽभल़षे॥
द़सीं द़स स़जि सब लान्द्ह।ें जोगित रहवह मनऽह मनि दान्द्ह॥ें 3॥
भ़ि़थग:-ईन घरों में बहुत से भोग (आऽन्द्रयों के ऽिषय) और
ऐश्वयग (ठ़ट-ब़ट) क़ स़म़न भरकर रख ददय़, ऽजन्द्हें देखकर
देित़ भा ललच़ गए। द़सा-द़स सब प्रक़र की स़मग्रा ऽलए
हुए मन लग़कर ईनके मनों को देखते रहते हैं (ऄथ़गत ईनके
मन की रुऽच के ऄनिस़र करते रहते हैं)॥3॥
* सब सम़जि सऽज ऽसऽध पल म़हीं। जे सिख सिरपिर सपनेहुूँ
ऩहीं॥

प्रथमवह ब़स ददए सब के हा। सिंदर सिखद जथ़ रुऽच जेहा॥4॥
भ़ि़थग:-जो सिख के स़म़न सिगग में भा सिप्न में भा नहीं हैं,
ऐसे सब स़म़न ऽसऽियों ने पल भर में सज़ ददए। पहले तो
ईन्द्होंने सब दकसा को, ऽजसकी जैसा रुऽच था, िैसे हा, सिंदर
सिखद़यक ऽनि़स सथ़न ददए॥4॥
दोह़ :
* बहुरर सपररजन भरत कहुूँ ररऽष ऄस अयसि दान्द्ह।
ऽबऽध ऽबसमय द़यकि ऽबभि मिऽनबर तपबल कीन्द्ह॥214॥
भ़ि़थग:-और दफर कि टि म्ब सऽहत भरतजा को ददए, क्योंदक ऊऽष
भरि़जजा ने ऐसा हा अज्ञ़ दे रखा था। (भरतजा च़हते थे दक
ईनके सब संऽगयों को अऱम ऽमले, आसऽलए ईनके मन की ब़त
ज़नकर मिऽन ने पहले ईन लोगों को सथ़न देकर पाछे सपररि़र
भरतजा को सथ़न देने के ऽलए अज्ञ़ दा था।) मिऽन श्रेष्ठ ने
तपोबल से ब्रह्म़ को भा चदकत कर देने ि़ल़ िैभि रच
ददय़॥214॥
चौप़इ :
* मिऽन प्रभ़ई जब भरत ऽबलोक़। सब लघि लगे लोकपऽत
लोक़॥

सिख सम़जि नवह ज़आ बख़ना। देखत ऽबरऽत ऽबस़रवह
ग्य़ना॥1॥
भ़ि़थग:-जब भरतजा ने मिऽन के प्रभ़ि को देख़, तो ईसके
स़मने ईन्द्हें (आन्द्र, िरुण, यम, कि बेर अदद) सभा लोकप़लों के
लोक तिच्छ ज़न पडे। सिख की स़मग्रा क़ िणगन नहीं हो
सकत़, ऽजसे देखकर ज्ञ़ना लोग भा िैऱग्य भील ज़ते हैं॥1॥
* असन सयन सिबसन ऽबत़ऩ। बन ब़रटक़ ऽबहग मुग ऩऩ॥
सिरऽभ फी ल फल ऄऽमऄ सम़ऩ। ऽबमल जल़सय ऽबऽबध
ऽबध़ऩ॥2॥
भ़ि़थग:-असन, सेज, सिंदर िस्त्र, चूँदोिे, िन, बगाचे, भ़ूँऽत-भ़ूँऽत
के पक्षा और पशि, सिगंऽधत फी ल और ऄमुत के सम़न सि़ददष्ट
फल, ऄनेकों प्रक़र के (त़ल़ब, कि एूँ, ब़िला अदद) ऽनमगल
जल़शय,॥2॥
* ऄसन प़न सिऽच ऄऽमऄ ऄमा से। देऽख लोग सकि च़त जमा
से॥
सिर सिरभा सिरतरु सबहा कें । लऽख ऄऽभल़षि सिरेस सचा कें ॥3॥
भ़ि़थग:-तथ़ ऄमुत के भा ऄमुत-सराखे पऽित्र ख़न-प़न के
पद़थग थे, ऽजन्द्हें देखकर सब लोग संयमा पिरुषों (ऽिरक्त मिऽनयों)

की भ़ूँऽत सकि च़ रहे हैं। सभा के डेरों में (मनोि़ंऽछत िसति देने
ि़ले) क़मधेनि और कल्पिुक्ष हैं, ऽजन्द्हें देखकर आन्द्र और आन्द्ऱणा
को भा ऄऽभल़ष़ होता है (ईनक़ भा मन ललच़ ज़त़ है)॥3॥
* ररति बसंत बह ऽत्रऽबध बय़रा। सब कहूँ सिलभ पद़रथ च़रा॥
स्रक चंदन बऽनत़ददक भोग़। देऽख हरष ऽबसमय बस लोग़॥4॥
भ़ि़थग:-िसन्द्त ऊति है। शातल, मंद, सिगंध तान प्रक़र की हि़
बह रहा है। सभा को (धमग, ऄथग, क़म और मोक्ष) च़रों पद़थग
सिलभ हैं। म़ल़, चंदन, स्त्रा अदद भोगों को देखकर सब लोग
हषग और ऽिष़द के िश हो रहे हैं। (हषग तो भोग स़मऽग्रयों को
और मिऽन के तप प्रभ़ि को देखकर होत़ है और ऽिष़द आस
ब़त से होत़ है दक श्रा ऱम के ऽियोग में ऽनयम-व्रत से रहने
ि़ले हम लोग भोग-ऽिल़स में क्यों अ फूँ से, कहीं आनमें असक्त
होकर हम़ऱ मन ऽनयम-व्रतों को न त्य़ग दे)॥4॥
दोह़ :
* संपऽत चकइ भरति चक मिऽन अयस खेलि़र।
तेऽह ऽनऽस अश्रम वपजऱूँ ऱखे भ़ ऽभनिस़र॥215॥
भ़ि़थग:-सम्पऽि (भोग-ऽिल़स की स़मग्रा) चकिा है और
भरतजा चकि़ हैं और मिऽन की अज्ञ़ खेल है, ऽजसने ईस ऱत
को अश्रम रूपा वपजडे में दोनों को बंद कर रख़ और ऐसे हा

सबेऱ हो गय़। (जैसे दकसा बहेऽलए के ि़ऱ एक वपजडे में रखे
ज़ने पर भा चकिा-चकिे क़ ऱत को संयोग नहीं होत़, िैसे
हा भरि़जजा की अज्ञ़ से ऱत भर भोग स़मऽग्रयों के स़थ
रहने पर भा भरतजा ने मन से भा ईनक़ सपशग तक नहीं
दकय़।)॥215॥

म़सप़ऱयण, ईन्नासि़ूँ ऽिश्ऱम
चौप़इ :
* कीन्द्ह ऽनमज्जनि तारथऱज़। ऩइ मिऽनऽह ऽसरु सऽहत सम़ज़।
ररऽष अयसि ऄसास ऽसर ऱखा। करर दंडित ऽबनय बहु
भ़षा॥1॥
भ़ि़थग:-(प्ऱतःक़ल) भरतजा ने ताथगऱज में स्ऩन दकय़ और
सम़ज सऽहत मिऽन को ऽसर नि़कर और ऊऽष की अज्ञ़ तथ़
अशाि़गद को ऽसर चढ़़कर दण्डित् करके बहुत ऽिनता की॥1॥
* पथ गऽत कि सल स़थ सब लान्द्ह।ें चले ऽचत्रकी टवह ऽचति दान्द्ह॥ें
ऱमसख़ कर दान्द्हें ल़गी। चलत देह धरर जनि ऄनिऱगी॥2॥
भ़ि़थग:-तदनन्द्तर ऱसते की पहच़न रखने ि़ले लोगों (कि शल
पथप्रदशगकों) के स़थ सब लोगों को ऽलए हुए भरतजा ऽत्रकी ट में
ऽचि लग़ए चले। भरतजा ऱमसख़ गिह के ह़थ में ह़थ ददए

हुए ऐसे ज़ रहे हैं, म़नो स़क्ष़त् प्रेम हा शरार ध़रण दकए
हुए हो॥2॥
* नवह पद त्ऱन सास नवह छ़य़। पेमि नेमि ब्रति धरमि ऄम़य़॥
लखन ऱम ऽसय पंथ कह़ना। पीूँछत सखऽह कहत मुद ि ब़ना॥3॥
भ़ि़थग:-न तो ईनके पैरों में जीते हैं और न ऽसर पर छ़य़ है,
ईनक़ प्रेम ऽनयम, व्रत और धमग ऽनष्कपट (सच्च़) है। िे सख़
ऽनष़दऱज से लक्ष्मणजा, श्रा ऱमचंरजा और सात़जा के ऱसते
की ब़तें पीछते हैं और िह कोमल ि़णा से कहत़ है॥3॥
* ऱम ब़स थल ऽबटप ऽबलोकें । ईर ऄनिऱग रहत नवह रोकें ॥
देऽख दस़ सिर बररसवह फी ल़। भआ मुद ि मऽह मगि मंगल मील़॥4॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचंरजा के ठहरने की जगहों और िुक्षों को
देखकर ईनके हृदय में प्रेम रोके नहीं रुकत़। भरतजा की यह
दश़ देखकर देित़ फी ल बरस़ने लगे। पुथ्िा कोमल हो गइ और
म़गग मंगल क़ मील बन गय़॥4॥
दोह़ :
* दकएूँ ज़वह छ़य़ जलद सिखद बहआ बर ब़त।
तस मगि भयई न ऱम कहूँ जस भ़ भरतऽह ज़त॥216॥

भ़ि़थग:-ब़दल छ़य़ दकए ज़ रहे हैं, सिख देने ि़ला सिंदर हि़
बह रहा है। भरतजा के ज़ते समय म़गग जैस़ सिखद़यक हुअ,
िैस़ श्रा ऱमचंरजा को भा नहीं हुअ थ़॥216॥
चौप़इ :
* जड चेतन मग जाि घनेरे। जे ऽचतए प्रभि ऽजन्द्ह प्रभि हेरे॥
ते सब भए परम पद जोगी। भरत दरस मेट़ भि रोगी॥1॥
भ़ि़थग:-ऱसते में ऄसंख्य जड-चेतन जाि थे। ईनमें से ऽजनको
प्रभि श्रा ऱमचंरजा ने देख़, ऄथि़ ऽजन्द्होंने प्रभि श्रा ऱमचंरजा
को देख़, िे सब (ईसा समय) परमपद के ऄऽधक़रा हो गए,
परन्द्ति ऄब भरतजा के दशगन ने तो ईनक़ भि (जन्द्म-मरण) रूपा
रोग ऽमट़ हा ददय़। (श्रा ऱमदशगन से तो िे परमपद के
ऄऽधक़रा हा हुए थे, परन्द्ति भरत दशगन से ईन्द्हें िह परमपद
प्ऱप्त हो गय़)॥1॥
* यह बऽड ब़त भरत कआ ऩहीं। सिऽमरत ऽजनऽह ऱमि मन
म़हीं॥
ब़रक ऱम कहत जग जेउ। होत तरन त़रन नर तेउ॥2॥
भ़ि़थग:-भरतजा के ऽलए यह कोइ बडा ब़त नहीं है, ऽजन्द्हें श्रा
ऱमजा सियं ऄपने मन में समरण करते रहते हैं। जगत् में जो

भा मनिष्य एक ब़र 'ऱम' कह लेते हैं, िे भा तरने-त़रने ि़ले
हो ज़ते हैं॥2॥
* भरति ऱम ऽप्रय पिऽन लघि वऱ्त़। कस न होआ मगि मंगलद़त़॥
ऽसि स़धि मिऽनबर ऄस कहहीं। भरतऽह ऽनरऽख हरषि ऽहयूँ
लहहीं॥3॥
भ़ि़थग:-दफर भरतजा तो श्रा ऱमचंरजा के प्य़रे तथ़ ईनके
छोटे भ़इ ठहरे । तब भल़ ईनके ऽलए म़गग मंगल (सिख) द़यक
कै से न हो? ऽसि, स़धि और श्रेष्ठ मिऽन ऐस़ कह रहे हैं और
भरतजा को देखकर हृदय में हषग ल़भ करते हैं॥3॥

आं र-बुहसपऽत संि़द
* देऽख प्रभ़ई सिरेसऽह सोची। जगि भल भलेऽह पोच कहुूँ पोची॥
गिर सन कहेई कररऄ प्रभि सोइ। ऱमऽह भरतऽह भेंट न होइ॥4॥
भ़ि़थग:-भरतजा के (आस प्रेम के ) प्रभ़ि को देखकर देिऱज आन्द्र
को सोच हो गय़ (दक कहीं आनके प्रेमिश श्रा ऱमजा लौट न
ज़एूँ और हम़ऱ बऩ-बऩय़ क़म ऽबगड ज़ए)। संस़र भले के
ऽलए भल़ और बिरे के ऽलए बिऱ है (मनिष्य जैस़ अप होत़ है
जगत् ईसे िैस़ हा ददखत़ है)। ईसने गिरु बुहसपऽतजा से कह़हे प्रभो! िहा ईप़य कीऽजए ऽजससे श्रा ऱमचंरजा और भरतजा
की भेंट हा न हो॥4॥
दोह़ :
* ऱमि सूँकोचा प्रेम बस भरत सप्रेम पयोऽध।
बना ब़त बेगरन चहऽत कररऄ जतनि छलि सोऽध॥217॥

भ़ि़थग:-श्रा ऱमचंरजा संकोचा और प्रेम के िश हैं और भरतजा
प्रेम के समिर हैं। बना-बऩइ ब़त ऽबगडऩ च़हता है, आसऽलए
कि छ छल ढी ूँढकर आसक़ ईप़य कीऽजए॥217॥
चौप़इ :
* बचन सिनत सिरगिरु मिसिक़ने। सहसनयन ऽबनि लोचन ज़ने॥
म़य़पऽत सेिक सन म़य़। करआ त ईलरट परआ सिरऱय़॥1॥
भ़ि़थग:-आं र के िचन सिनते हा देिगिरु बुहसपऽतजा मिसकि ऱए।
ईन्द्होंने हज़र नेत्रों ि़ले आं र को (ज्ञ़न रूपा) नेत्रोंरऽहत (मीखग)
समझ़ और कह़- हे देिऱज! म़य़ के सि़मा श्रा ऱमचंरजा के
सेिक के स़थ कोइ म़य़ करत़ है तो िह ईलटकर ऄपने हा
उपर अ पडता है॥1॥
* तब दकछि कीन्द्ह ऱम रुख ज़ना। ऄब कि च़ऽल करर होआऽह
ह़ना।
सिनि सिरेस रघिऩथ सिभ़उ। ऽनज ऄपऱध ररस़वह न क़उ॥2॥
भ़ि़थग:-ईस समय (ऽपछला ब़र) तो श्रा ऱमचंरजा क़ रुख
ज़नकर कि छ दकय़ थ़, परन्द्ति आस समय कि च़ल करने से ह़ऽन
हा होगा। हे देिऱज! श्रा रघिऩथजा क़ सिभ़ि सिनो, िे ऄपने
प्रऽत दकए हुए ऄपऱध से कभा रुष्ट नहीं होते॥2॥
* जो ऄपऱधि भगत कर करइ। ऱम रोष प़िक सो जरइ॥

लोकहुूँ बेद ऽबददत आऽतह़स़। यह मऽहम़ ज़नवह दिरब़स़॥3॥
भ़ि़थग:-पर जो कोइ ईनके भक्त क़ ऄपऱध करत़ है, िह श्रा
ऱम की क्रोध़ऽग्न में जल ज़त़ है। लोक और िेद दोनों में
आऽतह़स (कथ़) प्रऽसि है। आस मऽहम़ को दिि़गस़जा ज़नते
हैं॥3॥
* भरत सररस को ऱम सनेहा। जगि जप ऱम ऱमि जप जेहा॥4॥
भ़ि़थग:-स़ऱ जगत् श्रा ऱम को जपत़ है, िे श्रा ऱमजा
ऽजनको जपते हैं, ईन भरतजा के सम़न श्रा ऱमचंरजा क़ प्रेमा
कौन होग़?॥4॥
दोह़ :
* मनहुूँ न अऽनऄ ऄमरपऽत रघिबर भगत ऄक़जि।
ऄजसि लोक परलोक दिख ददन ददन सोक सम़जि॥218॥
भ़ि़थग:-हे देिऱज! रघिकिलश्रेष्ठ श्रा ऱमचंरजा के भक्त क़ क़म
ऽबग़डने की ब़त मन में भा न ल़आए। ऐस़ करने से लोक में
ऄपयश और परलोक में दिःख होग़ और शोक क़ स़म़न
ददनोंददन बढ़त़ हा चल़ ज़एग़॥218॥
चौप़इ :
* सिनि सिरेस ईपदेसि हम़ऱ। ऱमऽह सेिकि परम ऽपअऱ॥

म़नत सिखि सेिक सेिक़ईं। सेिक बैर बैरु ऄऽधक़ईं॥1॥
भ़ि़थग:-हे देिऱज! हम़ऱ ईपदेश सिनो। श्रा ऱमजा को ऄपऩ
सेिक परम ऽप्रय है। िे ऄपने सेिक की सेि़ से सिख म़नते हैं
और सेिक के स़थ िैर करने से बड़ भ़रा िैर म़नते हैं॥1॥
* जद्यऽप सम नवह ऱग न रोषी। गहवह न प़प पीनि गिन दोषी॥
करम प्रध़न ऽबसि करर ऱख़। जो जस करआ सो तस फलि
च़ख़॥2॥
भ़ि़थग:-यद्यऽप िे सम हैं- ईनमें न ऱग है, न रोष है और न
िे दकसा क़ प़प-पिण्य और गिण-दोष हा ग्रहण करते हैं। ईन्द्होंने
ऽिश्व में कमग को हा प्रध़न कर रख़ है। जो जैस़ करत़ है,
िह िैस़ हा फल भोगत़ है॥2॥
* तदऽप करवह सम ऽबषम ऽबह़ऱ। भगत ऄभगत हृदय
ऄनिस़ऱ॥
ऄगनि ऄलेप ऄम़न एकरस। ऱमि सगिन भए भगत प्रेम बस॥3॥
भ़ि़थग:-तथ़ऽप िे भक्त और ऄभक्त के हृदय के ऄनिस़र सम
और ऽिषम व्यिह़र करते हैं (भक्त को प्रेम से गले लग़ लेते हैं
और ऄभक्त को म़रकर त़र देते हैं)। गिणरऽहत, ऽनलेप,
म़नरऽहत और सद़ एकरस भगि़न् श्रा ऱम भक्त के प्रेमिश
हा सगिण हुए हैं॥3॥

* ऱम सद़ सेिक रुऽच ऱखा। बेद पिऱन स़धि सिर स़खा॥
ऄस ऽजयूँ ज़ऽन तजहु कि रटल़इ। करहु भरत पद प्राऽत सिह़इ॥4॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमजा सद़ ऄपने सेिकों (भक्तों) की रुऽच रखते
अए हैं। िेद, पिऱण, स़धि और देित़ आसके स़क्षा हैं। ऐस़
हृदय में ज़नकर कि रटलत़ छोड दो और भरतजा के चरणों में
सिंदर प्राऽत करो॥4॥
दोह़ :
* ऱम भगत परऽहत ऽनरत पर दिख दिखा दय़ल।
भगत ऽसरोमऽन भरत तें जऽन डरपहु सिरप़ल॥219॥
भ़ि़थग:-हे देिऱज आं र! श्रा ऱमचंरजा के भक्त सद़ दीसरों के
ऽहत में लगे रहते हैं, िे दीसरों के दिःख से दिःखा और दय़लि
होते हैं। दफर भरतजा तो भक्तों के ऽशरोमऽण हैं, ईनसे ऽबलकि ल
न डरो॥219॥
चौप़इ :
* सत्यसंध प्रभि सिर ऽहतक़रा। भरत ऱम अयस ऄनिस़रा॥
सि़रथ ऽबबस ऽबकल तिम्ह होह। भरत दोसि नवह ऱईर मोह॥1॥
भ़ि़थग:-प्रभि श्रा ऱमचंरजा सत्यप्रऽतज्ञ और देित़ओं क़ ऽहत
करने ि़ले हैं और भरतजा श्रा ऱमजा की अज्ञ़ के ऄनिस़र

चलने ि़ले हैं। तिम व्यथग हा सि़थग के ऽिशेष िश होकर व्य़कि ल
हो रहे हो। आसमें भरतजा क़ कोइ दोष नहीं, तिम्ह़ऱ हा मोह
है॥1॥
* सिऽन सिरबर सिरगिर बर ब़ना। भ़ प्रमोदि मन ऽमटा गल़ना॥
बरऽष प्रसीन हरऽष सिरऱउ। लगे सऱहन भरत सिभ़उ॥2॥
भ़ि़थग:-देिगिरु बुहसपऽतजा की श्रेष्ठ ि़णा सिनकर आं र के मन में
बड़ अनंद हुअ और ईनकी वचत़ ऽमट गइ। तब हर्तषत होकर
देिऱज फी ल बरस़कर भरतजा के सिभ़ि की सऱहऩ करने
लगे॥2॥

भरतजा ऽचत्रकी ट के म़गग में
* एऽह ऽबऽध भरत चले मग ज़हीं। दस़ देऽख मिऽन ऽसि
ऽसह़हीं॥
जबऽह ऱमि कऽह लेवह ईस़स़। ईमगत प्रेमि मनहुूँ चहु प़स़॥3॥
भ़ि़थग:-आस प्रक़र भरतजा म़गग में चले ज़ रहे हैं। ईनकी
(प्रेममया) दश़ देखकर मिऽन और ऽसि लोग भा ऽसह़ते हैं।
भरतजा जब भा 'ऱम' कहकर लंबा स़ूँस लेते हैं, तभा म़नो
च़रों ओर प्रेम ईमड पडत़ है॥3॥
* रिवह बचन सिऽन कि ऽलस पष़ऩ। पिरजन पेमि न ज़आ
बख़ऩ॥
बाच ब़स करर जमिनवह अए। ऽनरऽख नारु लोचन जल छ़ए॥4॥
भ़ि़थग:-ईनके (प्रेम और दानत़ से पीणग) िचनों को सिनकर िज्र
और पत्थर भा ऽपघल ज़ते हैं। ऄयोध्य़ि़ऽसयों क़ प्रेम कहते
नहीं बनत़। बाच में ऽनि़स (मिक़म) करके भरतजा यमिऩजा के

तट पर अए। यमिऩजा क़ जल देखकर ईनके नेत्रों में जल भर
अय़॥4॥
दोह़ :
* रघिबर बरन ऽबलोदक बर ब़रर समेत सम़ज।
होत मगन ब़ररऽध ऽबरह चढ़े ऽबबेक जह़ज॥220॥
भ़ि़थग:-श्रा रघिऩथजा के (श्य़म) रं ग क़ सिंदर जल देखकर
स़रे सम़ज सऽहत भरतजा (प्रेम ऽिह्िल होकर) श्रा ऱमजा के
ऽिरह रूपा समिर में डी बते-डी बते ऽििेक रूपा जह़ज पर चढ़ गए
(ऄथ़गत् यमिऩजा क़ श्य़मिणग जल देखकर सब लोग श्य़मिणग
भगि़न के प्रेम में ऽिह्िल हो गए और ईन्द्हें न प़कर ऽिरह
व्यथ़ से पाऽडत हो गए, तब भरतजा को यह ध्य़न अय़ दक
जल्दा चलकर ईनके स़क्ष़त् दशगन करें गे, आस ऽििेक से िे दफर
ईत्स़ऽहत हो गए)॥220॥
चौप़इ :
* जमिन तार तेऽह ददन करर ब़सी। भयई समय सम सबऽह
सिप़सी॥
ऱऽतवह घ़ट घ़ट की तरना। अईं ऄगऽनत ज़वह न बरना॥1॥
भ़ि़थग:-ईस ददन यमिऩजा के दकऩरे ऽनि़स दकय़। समय़निस़र
सबके ऽलए (ख़न-प़न अदद की) सिंदर व्यिसथ़ हुइ (ऽनष़दऱज

क़ संकेत प़कर) ऱत हा ऱत में घ़ट-घ़ट की ऄगऽणत ऩिें
िह़ूँ अ गईं, ऽजनक़ िणगन नहीं दकय़ ज़ सकत़॥1॥
* प्ऱत प़र भए एकऽह खेि़ूँ। तोषे ऱमसख़ की सेि़ूँ॥
चले नह़आ नददऽह ऽसर ऩइ। स़थ ऽनष़दऩथ दोई भ़इ॥2॥
भ़ि़थग:-सबेरे एक हा खेिे में सब लोग प़र हो गए और श्रा
ऱमचंरजा के सख़ ऽनष़दऱज की आस सेि़ से संतष्ट
ि हुए। दफर
स्ऩन करके और नदा को ऽसर नि़कर ऽनष़दऱज के स़थ दोनों
भ़इ चले॥2॥
* अगें मिऽनबर ब़हन अछें। ऱजसम़ज ज़आ सबि प़छें॥
तेऽह प़छें दोई बंधि पय़दें। भीषन बसन बेष सिरठ स़दें॥3॥
भ़ि़थग:-अगे ऄच्छा-ऄच्छा सि़ररयों पर श्रेष्ठ मिऽन हैं, ईनके
पाछे स़ऱ ऱजसम़ज ज़ रह़ है। ईसके पाछे दोनों भ़इ बहुत
स़दे भीषण-िस्त्र और िेष से पैदल चल रहे हैं॥3॥
* सेिक सिहृद सऽचिसित स़थ़। सिऽमरत लखनि साय रघिऩथ़॥
जहूँ जहूँ ऱम ब़स ऽबश्ऱम़। तहूँ तहूँ करवह सप्रेम प्रऩम़॥4॥
भ़ि़थग:-सेिक, ऽमत्र और मंत्रा के पित्र ईनके स़थ हैं। लक्ष्मण,
सात़जा और श्रा रघिऩथजा क़ समरण करते ज़ रहे हैं। जह़ूँ-

जह़ूँ श्रा ऱमजा ने ऽनि़स और ऽिश्ऱम दकय़ थ़, िह़ूँ-िह़ूँ िे
प्रेमसऽहत प्रण़म करते हैं॥4॥
दोह़ :
* मगब़सा नर ऩरर सिऽन ध़म क़म तऽज ध़आ।
देऽख सरूप सनेह सब मिददत जनम फलि प़आ॥221॥
भ़ि़थग:-म़गग में रहने ि़ले स्त्रा-पिरुष यह सिनकर घर और क़मक़ज छोडकर दौड पडते हैं और ईनके रूप (सौंदयग) और प्रेम
को देखकर िे सब जन्द्म लेने क़ फल प़कर अनंददत होते
हैं॥221॥
चौप़इ :
* कहवह सप्रेम एक एक प़हीं। ऱमि लखनि सऽख होवह दक
ऩहीं॥
बय बपि बरन रूपि सोआ अला। सालि सनेहु सररस सम च़ला॥1॥
भ़ि़थग:-ग़ूँिों की ऽस्त्रय़ूँ एक-दीसरे से प्रेमपीिगक कहता हैं- सखा!
ये ऱम-लक्ष्मण हैं दक नहीं? हे सखा! आनकी ऄिसथ़, शरार और
रं ग-रूप तो िहा है। शाल, स्नेह ईन्द्हीं के सदुश है और च़ल भा
ईन्द्हीं के सम़न है॥1॥
* बेषि न सो सऽख साय न संग़। अगें ऄना चला चतिरंग़॥

नवह प्रसन्न मिख म़नस खेद़। सऽख संदहु
े होआ एवह भेद़॥2॥
भ़ि़थग:-परन्द्ति सखा! आनक़ न तो िह िेष (िल्कल िस्त्रध़रा
मिऽनिेष) है, न सात़जा हा संग हैं और आनके अगे चतिरंऽगणा
सेऩ चला ज़ रहा है। दफर आनके मिख प्रसन्न नहीं हैं, आनके मन
में खेद है। हे सखा! आसा भेद के क़रण संदह
े होत़ है॥2॥
* त़सि तरक ऽतयगन मन म़ना। कहवह सकल तेऽह सम न
सय़ना॥
तेऽह सऱऽह ब़ना फि रर पीजा। बोला मधिर बचन ऽतय दीजा॥3॥
भ़ि़थग:-ईसक़ तकग (यिऽक्त) ऄन्द्य ऽस्त्रयों के मन भ़य़। सब
कहता हैं दक आसके सम़न सय़ना (चतिर) कोइ नहीं है। ईसकी
सऱहऩ करके और 'तेरा ि़णा सत्य है' आस प्रक़र ईसक़
सम्म़न करके दीसरा स्त्रा माठे िचन बोला॥3॥
* कऽह सप्रेम बस कथ़प्रसंग।ी जेऽह ऽबऽध ऱम ऱज रस भंगी॥
भरतऽह बहुरर सऱहन ल़गा। साल सनेह सिभ़य सिभ़गा॥4॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमजा के ऱजऽतलक क़ अनंद ऽजस प्रक़र से भंग
हुअ थ़, िह सब कथ़प्रसंग प्रेमपीिगक कहकर दफर िह भ़ग्यिता
स्त्रा श्रा भरतजा के शाल, स्नेह और सिभ़ि की सऱहऩ करने
लगा॥4॥

दोह़ :
* चलत पय़दें ख़त फल ऽपत़ दान्द्ह तऽज ऱजि।
ज़त मऩिन रघिबरऽह भरत सररस को अजि॥222॥
भ़ि़थग:-(िह बोला-) देखो, ये भरतजा ऽपत़ के ददए हुए ऱज्य
को त्य़गकर पैदल चलते और फल़ह़र करते हुए श्रा ऱमजा को
मऩने के ऽलए ज़ रहे हैं। आनके सम़न अज कौन है?॥222॥।
चौप़इ :
* भ़यप भगऽत भरत अचरनी। कहत सिनत दिख दीषन हरनी॥
जो दकछि कहब थोर सऽख सोइ। ऱम बंधि ऄस क़हे न होइ॥1॥
भ़ि़थग:-भरतजा क़ भ़इपऩ, भऽक्त और आनके अचरण कहने
और सिनने से दिःख और दोषों के हरने ि़ले हैं। हे सखा! ईनके
संबंध में जो कि छ भा कह़ ज़ए, िह थोड़ है। श्रा ऱमचंरजा
के भ़इ ऐसे क्यों न हों॥1॥
* हम सब स़निज भरतऽह देखें। भआन्द्ह धन्द्य जिबता जन लेखें॥
सिऽन गिन देऽख दस़ पऽछत़हीं। कै कआ जनऽन जोगि सिति ऩहीं॥2॥
भ़ि़थग:-छोटे भ़इ शत्रिघ्न सऽहत भरतजा को देखकर हम सब भा
अज धन्द्य (बडभ़ऽगना) ऽस्त्रयों की ऽगनता में अ गईं। आस
प्रक़र भरतजा के गिण सिनकर और ईनकी दश़ देखकर ऽस्त्रय़ूँ

पछत़ता हैं और कहता हैं- यह पित्र कै कया जैसा म़त़ के योग्य
नहीं है॥2॥
* कोई कह दीषनि ऱऽनऽह ऩऽहन। ऽबऽध सबि कीन्द्ह हमऽह जो
द़ऽहन॥
कहूँ हम लोक बेद ऽबऽध हाना। लघि ऽतय कि ल करतीऽत
मलाना॥3॥
भ़ि़थग:-कोइ कहता है- आसमें ऱना क़ भा दोष नहीं है। यह
सब ऽिध़त़ ने हा दकय़ है, जो हम़रे ऄनिकील है। कह़ूँ तो हम
लोक और िेद दोनों की ऽिऽध (मय़गद़) से हान, कि ल और
करतीत दोनों से मऽलन तिच्छ ऽस्त्रय़ूँ,॥3॥
* बसवह कि देस कि ग़ूँि कि ब़म़। कहूँ यह दरसि पिन्द्य पररऩम़॥
ऄस ऄनंद ि ऄऽचररजि प्रऽत ग्ऱम़। जनि मरुभीऽम कलपतरु
ज़म़॥4॥
भ़ि़थग:-जो बिरे देश (जंगला प्ऱन्द्त) और बिरे ग़ूँि में बसता हैं
और (ऽस्त्रयों में भा) नाच ऽस्त्रय़ूँ हैं! और कह़ूँ यह मह़न् पिण्यों
क़ पररण़मसिरूप आनक़ दशगन! ऐस़ हा अनंद और अश्चयग
ग़ूँि-ग़ूँि में हो रह़ है। म़नो मरुभीऽम में कल्पिुक्ष ईग गय़
हो॥4॥
दोह़ :

* भरत दरसि देखत खिलेई मग लोगन्द्ह कर भ़गि।
जनि वसघलब़ऽसन्द्ह भयई ऽबऽध बस सिलभ प्रय़गि॥223॥
भ़ि़थग:-भरतजा क़ सिरूप देखते हा ऱसते में रहने ि़ले लोगों
के भ़ग्य खिल गए! म़नो दैियोग से वसहलिाप के बसने ि़लों
को ताथगऱज प्रय़ग सिलभ हो गय़ हो!॥223॥
चौप़इ :
* ऽनज गिन सऽहत ऱम गिन ग़थ़। सिनत ज़वह सिऽमरत
रघिऩथ़॥
तारथ मिऽन अश्रम सिरध़म़। ऽनरऽख ऽनमज्जवह करवह प्रऩम़॥1॥
भ़ि़थग:-(आस प्रक़र) ऄपने गिणों सऽहत श्रा ऱमचंरजा के गिणों
की कथ़ सिनते और श्रा रघिऩथजा को समरण करते हुए भरतजा
चले ज़ रहे हैं। िे ताथग देखकर स्ऩन और मिऽनयों के अश्रम
तथ़ देित़ओं के मंददर देखकर प्रण़म करते हैं॥1॥
* मनहीं मन म़गवह बरु एह। साय ऱम पद पदिम सनेह॥
ऽमलवह दकऱत कोल बनब़सा। बैख़नस बटि जता ईद़सा॥2॥
भ़ि़थग:-और मन हा मन यह िरद़न म़ूँगते हैं दक श्रा सात़ऱमजा के चरण कमलों में प्रेम हो। म़गग में भाल, कोल अदद

िनि़सा तथ़ ि़नप्रसथ, ब्रह्मच़रा, संन्द्य़सा और ऽिरक्त ऽमलते
हैं॥2॥
* करर प्रऩमि पीछ
ूँ वह जेऽह तेहा। के ऽह बन लखनि ऱमि बैदह
े ा॥
ते प्रभि सम़च़र सब कहहीं। भरतऽह देऽख जनम फलि लहहीं॥3॥
भ़ि़थग:-ईनमें से ऽजस-ऽतस से प्रण़म करके पीछते हैं दक
लक्ष्मणजा, श्रा ऱमजा और ज़नकीजा दकस िन में हैं? िे प्रभि
के सब सम़च़र कहते हैं और भरतजा को देखकर जन्द्म क़ फल
प़ते हैं॥3॥
* जे जन कहवह कि सल हम देखे। ते ऽप्रय ऱम लखन सम लेखे॥
एऽह ऽबऽध बीझत सबऽह सिब़ना। सिनत ऱम बनब़स कह़ना॥4॥
भ़ि़थग:-जो लोग कहते हैं दक हमने ईनको कि शलपीिगक देख़ है,
ईनको ये श्रा ऱम-लक्ष्मण के सम़न हा प्य़रे म़नते हैं। आस
प्रक़र सबसे सिंदर ि़णा से पीछते और श्रा ऱमजा के िनि़स
की कह़ना सिनते ज़ते हैं॥4॥
दोह़ :
* तेऽह ब़सर बऽस प्ऱतहीं चले सिऽमरर रघिऩथ।
ऱम दरस की ल़लस़ भरत सररस सब स़थ॥224॥

भ़ि़थग:-ईस ददन िहीं ठहरकर दीसरे ददन प्ऱतःक़ल हा श्रा
रघिऩथजा क़ समरण करके चले। स़थ के सब लोगों को भा
भरतजा के सम़न हा श्रा ऱमजा के दशगन की ल़लस़ (लगा
हुइ) है॥224॥
चौप़इ :
* मंगल सगिन होवह सब क़ह। फरकवह सिखद ऽबलोचन ब़ह॥
भरतऽह सऽहत सम़ज ईछ़ह। ऽमऽलहवह ऱमि ऽमरटऽह दिख
द़ह॥1॥
भ़ि़थग:-सबको मंगलसीचक शकि न हो रहे हैं। सिख देने ि़ले
(पिरुषों के द़ऽहने और ऽस्त्रयों के ब़एूँ) नेत्र और भिज़एूँ फडक
रहा हैं। सम़ज सऽहत भरतजा को ईत्स़ह हो रह़ है दक श्रा
ऱमचंरजा ऽमलेंगे और दिःख क़ द़ह ऽमट ज़एग़॥1॥
* करत मनोरथ जस ऽजयूँ ज़के । ज़वह सनेह सिऱूँ सब छ़के ।
ऽसऽथल ऄंग पग मग डऽग डोलवह। ऽबहबल बचन प्रेम बस
बोलवह॥2॥
भ़ि़थग:-ऽजसके जा में जैस़ है, िह िैस़ हा मनोरथ करत़ है।
सब स्नेहा रूपा मददऱ से छके (प्रेम में मति़ले हुए) चले ज़
रहे हैं। ऄंग ऽशऽथल हैं, ऱसते में पैर डगमग़ रहे हैं और प्रेमिश
ऽिह्िल िचन बोल रहे हैं॥2॥

* ऱमसख़ूँ तेऽह समय देख़ि़। सैल ऽसरोमऽन सहज सिह़ि़॥
ज़सि समाप सररत पय ताऱ। साय समेत बसवह दोई बाऱ॥3॥
भ़ि़थग:-ऱमसख़ ऽनष़दऱज ने ईसा समय सि़भ़ऽिक हा
सिह़िऩ पिगतऽशरोमऽण क़मदऽगरर ददखल़य़, ऽजसके ऽनकट हा
पयऽसिना नदा के तट पर सात़जा समेत दोनों भ़इ ऽनि़स
करते हैं॥3॥
* देऽख करवह सब दंड प्रऩम़। कऽह जय ज़नदक जािन ऱम़॥
प्रेम मगन ऄस ऱज सम़जी। जनि दफरर ऄिध चले रघिऱजी॥4॥
भ़ि़थग:-सब लोग ईस पिगत को देखकर 'ज़नकी जािन श्रा
ऱमचंरजा की जय हो।' ऐस़ कहकर दण्डित प्रण़म करते हैं।
ऱजसम़ज प्रेम में ऐस़ मग्न है म़नो श्रा रघिऩथजा ऄयोध्य़ को
लौट चले हों॥4॥
दोह़ :
* भरत प्रेमि तेऽह समय जस तस कऽह सकआ न सेषि।
कऽबऽह ऄगम ऽजऽम ब्रह्मसिखि ऄह मम मऽलन जनेष॥
ि 225॥

भ़ि़थग:-भरतजा क़ ईस समय जैस़ प्रेम थ़, िैस़ शेषजा भा
नहीं कह सकते। कऽि के ऽलए तो िह िैस़ हा ऄगम है, जैस़
ऄहंत़ और ममत़ से मऽलन मनिष्यों के ऽलए ब्रह्म़नंद!॥225॥
चौप़इ :
* सकल सनेह ऽसऽथल रघिबर कें । गए कोस दिआ ददनकर ढरकें ॥
जलि थलि देऽख बसे ऽनऽस बातें। कीन्द्ह गिन रघिऩथ ऽपरातें॥1॥
भ़ि़थग:-सब लोग श्रा ऱमचंरजा के प्रेम के म़रे ऽशऽथल होने के
क़रण सीय़गसत होने तक (ददनभर में) दो हा कोस चल प़ए
और जल-सथल क़ सिप़स देखकर ऱत को िहीं (ऽबऩ ख़ए-पाए
हा) रह गए। ऱत बातने पर श्रा रघिऩथजा के प्रेमा भरतजा ने
अगे गमन दकय़॥1॥

श्रा सात़जा क़ सिप्न, श्रा ऱमजा को कोल-दकऱतों ि़ऱ
भरतजा के अगमन की सीचऩ, ऱमजा क़ शोक, लक्ष्मणजा क़
क्रोध
* ईह़ूँ ऱमि रजना ऄिसेष़। ज़गे सायूँ सपन ऄस देख़॥
सऽहत सम़ज भरत जनि अए। ऩथ ऽबयोग त़प तन त़ए॥2॥
भ़ि़थग:-ईधर श्रा ऱमचंरजा ऱत शेष रहते हा ज़गे। ऱत को
सात़जा ने ऐस़ सिप्न देख़ (ऽजसे िे श्रा ऱमचंरजा को सिऩने
लगीं) म़नो सम़ज सऽहत भरतजा यह़ूँ अए हैं। प्रभि के ऽियोग
की ऄऽग्न से ईनक़ शरार संतप्त है॥2॥
* सकल मऽलन मन दान दिख़रा। देखीं स़सि अन ऄनिह़रा॥

सिऽन ऽसय सपन भरे जल लोचन। भए सोचबस सोच
ऽबमोचन॥3॥
भ़ि़थग:-सभा लोग मन में ईद़स, दान और दिःखा हैं। स़सिओं
को दीसरा हा सीरत में देख़। सात़जा क़ सिप्न सिनकर श्रा
ऱमचंरजा के नेत्रों में जल भर गय़ और सबको सोच से छि ड़
देने ि़ले प्रभि सियं (लाल़ से) सोच के िश हो गए॥3॥
* लखन सपन यह नाक न होइ। करठन कि च़ह सिऩआऽह कोइ॥
ऄस कऽह बंधि समेत नह़ने पीऽज पिऱरर स़धि सनम़ने॥4॥
भ़ि़थग:-(और बोले-) लक्ष्मण! यह सिप्न ऄच्छ़ नहीं है। कोइ
भाषण कि सम़च़र (बहुत हा बिरा खबर) सिऩिेग़। ऐस़ कहकर
ईन्द्होंने भ़इ सऽहत स्ऩन दकय़ और ऽत्रपिऱरा मह़देिजा क़
पीजन करके स़धिओं क़ सम्म़न दकय़॥4॥
छंद :
* सनम़ऽन सिर मिऽन बंदद बैठे ईतर ददऽस देखत भए।
नभ धीरर खग मुग भीरर भ़गे ऽबकल प्रभि अश्रम गए॥
तिलसा ईठे ऄिलोदक क़रनि क़ह ऽचत सचदकत रहे।
सब सम़च़र दकऱत कोलऽन्द्ह अआ तेऽह ऄिसर कहे॥
भ़ि़थग:-देित़ओं क़ सम्म़न (पीजन) और मिऽनयों की िंदऩ
करके श्रा ऱमचंरजा बैठ गए और ईिर ददश़ की ओर देखने

लगे। अक़श में धील छ़ रहा है, बहुत से पक्षा और पशि
व्य़कि ल होकर भ़गे हुए प्रभि के अश्रम को अ रहे हैं।
तिलसाद़सजा कहते हैं दक प्रभि श्रा ऱमचंरजा यह देखकर ईठे
और सोचने लगे दक क्य़ क़रण है? िे ऽचि में अश्चयगयिक्त हो
गए। ईसा समय कोल-भालों ने अकर सब सम़च़र कहे।
सोरठ़ :
* सिनत सिमंगल बैन मन प्रमोद तन पिलक भर।
सरद सरोरुह नैन तिलसा भरे सनेह जल॥226॥
भ़ि़थग:-तिलसाद़सजा कहते हैं दक सिंदर मंगल िचन सिनते हा
श्रा ऱमचंरजा के मन में बड़ अनंद हुअ। शरार में पिलक़िला
छ़ गइ और शरद् ऊति के कमल के सम़न नेत्र प्रेम़श्रिओं से भर
गए॥226॥
चौप़इ :
* बहुरर सोचबस भे ऽसयरिनी। क़रन किन भरत अगिनी॥
एक अआ ऄस कह़ बहोरा। सेन संग चतिरंग न थोरा॥1॥
भ़ि़थग:-सात़पऽत श्रा ऱमचंरजा पिनः सोच के िश हो गए दक
भरत के अने क़ क्य़ क़रण है? दफर एक ने अकर ऐस़ कह़
दक ईनके स़थ में बडा भ़रा चतिरंऽगणा सेऩ भा है॥1॥

* सो सिऽन ऱमऽह भ़ ऄऽत सोची। आत ऽपति बच आत बंधि
सकोची॥
भरत सिभ़ई समिऽझ मन म़हीं। प्रभि ऽचत ऽहत ऽथऽत प़ित
ऩहीं॥2॥
भ़ि़थग:-यह सिनकर श्रा ऱमचंरजा को ऄत्यंत सोच हुअ। आधर
तो ऽपत़ के िचन और ईधर भ़इ भरतजा क़ संकोच! भरतजा
के सिभ़ि को मन में समझकर तो प्रभि श्रा ऱमचंरजा ऽचि को
ठहऱने के ऽलए कोइ सथ़न हा नहीं प़ते हैं॥2॥
* सम़ध़न तब भ़ यह ज़ने। भरति कहे महुूँ स़धि सय़ने॥
लखन लखेई प्रभि हृदयूँ खभ़रू। कहत समय सम नाऽत
ऽबच़रू॥3॥
भ़ि़थग:-तब यह ज़नकर सम़ध़न हो गय़ दक भरत स़धि और
सय़ने हैं तथ़ मेरे कहने में (अज्ञ़क़रा) हैं। लक्ष्मणजा ने देख़
दक प्रभि श्रा ऱमजा के हृदय में वचत़ है तो िे समय के
ऄनिस़र ऄपऩ नाऽतयिक्त ऽिच़र कहने लगे-॥3॥
* ऽबनि पीछें कछि कहईूँ गोस़ईं। सेिकि समयूँ न ढाठ दढठ़ईं॥
तिम्ह सबगग्य ऽसरोमऽन सि़मा। अपऽन समिऽझ कहईूँ ऄनिग़मा॥4॥
भ़ि़थग:-हे सि़मा! अपके ऽबऩ हा पीछे मैं कि छ कहत़ हूँ, सेिक
समय पर दढठ़इ करने से ढाठ नहीं समझ़ ज़त़ (ऄथ़गत् अप

पीछें तब मैं कहूँ, ऐस़ ऄिसर नहीं है, आसऽलए यह मेऱ कहऩ
दढठ़इ नहीं होग़)। हे सि़मा! अप सिगज्ञों में ऽशरोमऽण हैं (सब
ज़नते हा हैं)। मैं सेिक तो ऄपना समझ की ब़त कहत़ हूँ॥4॥
दोह़ :
* ऩथ सिहृद सिरठ सरल ऽचत साल सनेह ऽनध़न।
सब पर प्राऽत प्रताऽत ऽजयूँ ज़ऽनऄ अपि सम़न॥227॥
भ़ि़थग:-हे ऩथ! अप परम सिहृद् (ऽबऩ हा क़रण परम ऽहत
करने ि़ले), सरल हृदय तथ़ शाल और स्नेह के भंड़र हैं,
अपक़ सभा पर प्रेम और ऽिश्व़स है, और ऄपने हृदय में
सबको ऄपने हा सम़न ज़नते हैं॥227॥
चौप़इ :
* ऽबषइ जाि प़आ प्रभित़इ। मीढ़ मोह बस होवह जऩइ॥
भरति नाऽत रत स़धि सिज़ऩ। प्रभि पद प्रेमि सकल जगि ज़ऩ॥1॥
भ़ि़थग:-परं ति मीढ़ ऽिषया जाि प्रभित़ प़कर मोहिश ऄपने
ऄसला सिरूप को प्रकट कर देते हैं। भरत नाऽतपऱयण, स़धि
और चतिर हैं तथ़ प्रभि (अप) के चरणों में ईनक़ प्रेम है, आस
ब़त को स़ऱ जगत् ज़नत़ है॥1॥
* तेउ अजि ऱम पदि प़इ। चले धरम मरज़द मेट़इ॥

कि रटल कि बंधि कि ऄिसरु त़की। ज़ऽन ऱम बनब़स एक़की॥2॥
भ़ि़थग:-िे भरतजा अज श्रा ऱमजा (अप) क़ पद (वसह़सन
य़ ऄऽधक़र) प़कर धमग की मय़गद़ को ऽमट़कर चले हैं। कि रटल
खोटे भ़इ भरत कि समय देखकर और यह ज़नकर दक ऱमजा
(अप) िनि़स में ऄके ले (ऄसह़य) हैं,॥2॥
* करर कि मंत्रि मन स़ऽज सम़जी। अए करै ऄकं टक ऱजी॥
कोरट प्रक़र कलऽप कि रटल़इ। अए दल बटोरर दोई भ़इ॥3॥
भ़ि़थग:-ऄपने मन में बिऱ ऽिच़र करके , सम़ज जोडकर ऱज्यों
को ऽनष्कण्टक करने के ऽलए यह़ूँ अए हैं। करोडों (ऄनेकों)
प्रक़र की कि रटलत़एूँ रचकर सेऩ बटोरकर दोनों भ़इ अए
हैं॥3॥
* जौं ऽजयूँ होऽत न कपट कि च़ला। के ऽह सोह़ऽत रथ ब़ऽज
गज़ला॥
भरतऽह दोसि देआ को ज़एूँ। जग बौऱआ ऱज पदि प़एूँ॥4॥
भ़ि़थग:-यदद आनके हृदय में कपट और कि च़ल न होता, तो रथ,
घोडे और ह़ऽथयों की कत़र (ऐसे समय) दकसे सिह़ता? परन्द्ति
भरत को हा व्यथग कौन दोष दे? ऱजपद प़ ज़ने पर स़ऱ
जगत् हा प़गल (मति़ल़) हो ज़त़ है॥4॥

दोह़ :
* सऽस गिर ऽतय ग़मा नघिषि चढ़ेई भीऽमसिर ज़न।
लोक बेद तें ऽबमिख भ़ ऄधम न बेन सम़न॥228॥
भ़ि़थग:-चंरम़ गिरुपत्ना ग़मा हुअ, ऱज़ नहुष ब्ऱह्मणों की
प़लकी पर चढ़़ और ऱज़ िेन के सम़न नाच तो कोइ नहीं
होग़, जो लोक और िेद दोनों से ऽिमिख हो गय़॥228॥
चौप़इ :
* सहसब़हु सिरऩथि ऽत्रसंकी। के ऽह न ऱजमद दान्द्ह कलंकी॥
भरत कीन्द्ह यह ईऽचत ईप़उ। ररपि ररन रं च न ऱखब क़ई॥1॥
भ़ि़थग:-सहस्रब़हु, देिऱज आं र और ऽत्रशंकि अदद दकसको
ऱजमद ने कलंक नहीं ददय़? भरत ने यह ईप़य ईऽचत हा
दकय़ है, क्योंदक शत्रि और ऊण को कभा जऱ भा शेष नहीं
रखऩ च़ऽहए॥1॥
* एक कीऽन्द्ह नवह भरत भल़इ। ऽनदरे ऱमि ज़ऽन ऄसह़इ॥
समिऽझ पररऽह सोई अजि ऽबसेषा। समर सरोष ऱम मिखि
पेखा॥2॥

भ़ि़थग:-ह़ूँ, भरत ने एक ब़त ऄच्छा नहीं की, जो ऱमजा
(अप) को ऄसह़य ज़नकर ईनक़ ऽनऱदर दकय़! पर अज
संग्ऱम में श्रा ऱमजा (अप) क़ क्रोधपीणग मिख देखकर यह ब़त
भा ईनकी समझ में ऽिशेष रूप से अ ज़एगा (ऄथ़गत् आस
ऽनऱदर क़ फल भा िे ऄच्छा तरह प़ ज़एूँगे)॥2॥
* एतऩ कहत नाऽत रस भील़। रन रस ऽबटपि पिलक ऽमस
फी ल़॥
प्रभि पद बंदद सास रज ऱखा। बोले सत्य सहज बलि भ़षा॥3॥
भ़ि़थग:-आतऩ कहते हा लक्ष्मणजा नाऽतरस भील गए और
यििरस रूपा िुक्ष पिलक़िला के बह़ने से फी ल ईठ़ (ऄथ़गत्
नाऽत की ब़त कहते-कहते ईनके शरार में िार रस छ़ गय़)।
िे प्रभि श्रा ऱमचंरजा के चरणों की िंदऩ करके , चरण रज को
ऽसर पर रखकर सच्च़ और सि़भ़ऽिक बल कहते हुए बोले॥3॥
* ऄनिऽचत ऩथ न म़नब मोऱ। भरत हमऽह ईपच़र न थोऱ॥
कहूँ लऽग सऽहऄ रऽहऄ मनि म़रें । ऩथ स़थ धनि ह़थ हम़रें ॥4॥
भ़ि़थग:-हे ऩथ! मेऱ कहऩ ऄनिऽचत न म़ऽनएग़। भरत ने हमें
कम नहीं प्रच़ऱ है (हम़रे स़थ कम छेडछ़ड नहीं की है)।
अऽखर कह़ूँ तक सह़ ज़ए और मन म़रे रह़ ज़ए, जब
सि़मा हम़रे स़थ हैं और धनिष हम़रे ह़थ में है!॥4॥

दोह़ :
* छऽत्र ज़ऽत रघिकिल जनमि ऱम ऄनिग जगि ज़न।
ल़तहुूँ म़रें चढ़ऽत ऽसर नाच को धीरर सम़न॥229॥
भ़ि़थग:-क्षऽत्रय ज़ऽत, रघिकिल में जन्द्म और दफर मैं श्रा ऱमजा
(अप) क़ ऄनिग़मा (सेिक) हूँ, यह जगत् ज़नत़ है। (दफर
भल़ कै से सह़ ज़ए?) धील के सम़न नाच कौन है, परन्द्ति िह
भा ल़त म़रने पर ऽसर हा चढ़ता है॥229॥
चौप़इ :
* ईरठ कर जोरर रज़यसि म़ग़। मनहुूँ बार रस सोित ज़ग़॥
ब़ूँऽध जट़ ऽसर कऽस करट भ़थ़। स़ऽज सऱसनि स़यकि
ह़थ़॥1॥
भ़ि़थग:-यों कहकर लक्ष्मणजा ने ईठकर, ह़थ जोडकर अज्ञ़
म़ूँगा। म़नो िार रस सोते से ज़ग ईठ़ हो। ऽसर पर जट़
ब़ूँधकर कमर में तरकस कस ऽलय़ और धनिष को सज़कर तथ़
ब़ण को ह़थ में लेकर कह़-॥1॥
* अजि ऱम सेिक जसि लेउूँ। भरतऽह समर ऽसख़िन देउूँ॥
ऱम ऽनऱदर कर फलि प़इ। सोिहुूँ समर सेज दोई भ़इ॥2॥

भ़ि़थग:-अज मैं श्रा ऱम (अप) क़ सेिक होने क़ यश लीूँ और
भरत को संग्ऱम में ऽशक्ष़ दी।ूँ श्रा ऱमचंरजा (अप) के ऽनऱदर
क़ फल प़कर दोनों भ़इ (भरत-शत्रिघ्न) रण शय्य़ पर सोिें॥2॥
* अआ बऩ भल सकल सम़जी। प्रगट करईूँ ररस प़ऽछल अजी॥
ऽजऽम करर ऽनकर दलआ मुगऱजी। लेआ लपेरट लि़ ऽजऽम
ब़जी॥3॥
भ़ि़थग:-ऄच्छ़ हुअ जो स़ऱ सम़ज अकर एकत्र हो गय़।
अज मैं ऽपछल़ सब क्रोध प्रकट करूूँग़। जैसे वसह ह़ऽथयों के
झिंड को कि चल ड़लत़ है और ब़ज जैसे लिे को लपेट में ले
लेत़ है॥3॥
* तैसेवह भरतऽह सेन समेत़। स़निज ऽनदरर ऽनप़तईूँ खेत़॥
जौं सह़य कर संकरु अइ। तौ म़रईूँ रन ऱम दोह़इ॥4॥
भ़ि़थग:-िैसे हा भरत को सेऩ समेत और छोटे भ़इ सऽहत
ऽतरसक़र करके मैद़न में पछ़डीूँग़। यदद शंकरजा भा अकर
ईनकी सह़यत़ करें , तो भा, मिझे ऱमजा की सौगंध है, मैं ईन्द्हें
यिि में (ऄिश्य) म़र ड़लीूँग़ (छोडीूँग़ नहीं)॥4॥
दोह़ :
* ऄऽत सरोष म़खे लखनि लऽख सिऽन सपथ प्रि़न।
सभय लोक सब लोकपऽत च़हत भभरर भग़न॥230॥

भ़ि़थग:-लक्ष्मणजा को ऄत्यंत क्रोध से तमतम़य़ हुअ देखकर
और ईनकी प्ऱम़ऽणक (सत्य) सौगंध सिनकर सब लोग भयभात
हो ज़ते हैं और लोकप़ल घबड़कर भ़गऩ च़हते हैं॥230।
चौप़इ :
* जगि भय मगन गगन भआ ब़ना। लखन ब़हुबलि ऽबपिल
बख़ना॥
त़त प्रत़प प्रभ़ई तिम्ह़ऱ। को कऽह सकआ को ज़नऽनह़ऱ॥1॥
भ़ि़थग:-स़ऱ जगत् भय में डी ब गय़। तब लक्ष्मणजा के ऄप़र
ब़हुबल की प्रशंस़ करता हुइ अक़शि़णा हुइ- हे त़त! तिम्ह़रे
प्रत़प और प्रभ़ि को कौन कह सकत़ है और कौन ज़न सकत़
है?॥1॥
* ऄनिऽचत ईऽचत क़जि दकछि होउ। समिऽझ कररऄ भल कह सबि
कोउ।
सहस़ करर प़छे पऽछत़हीं। कहवह बेद बिध ते बिध ऩहीं॥2॥
भ़ि़थग:-परन्द्ति कोइ भा क़म हो, ईसे ऄनिऽचत-ईऽचत खीब
समझ-बीझकर दकय़ ज़ए तो सब कोइ ऄच्छ़ कहते हैं। िेद और
ऽिि़न कहते हैं दक जो ऽबऩ ऽिच़रे जल्दा में दकसा क़म को
करके पाछे पछत़ते हैं, िे बिऽिम़न् नहीं हैं॥2॥

श्रा ऱमजा क़ लक्ष्मणजा को समझ़ऩ एिं भरतजा की मऽहम़
कहऩ
* सिऽन सिर बचन लखन सकि च़ने। ऱम सायूँ स़दर सनम़ने॥
कहा त़त तिम्ह नाऽत सिह़इ। सब तें करठन ऱजमदि भ़इ॥3॥

भ़ि़थग:-देिि़णा सिनकर लक्ष्मणजा सकि च़ गए। श्रा ऱमचंरजा
और सात़जा ने ईनक़ अदर के स़थ सम्म़न दकय़ (और कह़) हे त़त! तिमने बडा सिंदर नाऽत कहा। हे भ़इ! ऱज्य क़ मद
सबसे करठन मद है॥3॥
* जो ऄचिूँत नुप म़तवह तेइ। ऩऽहन स़धिसभ़ जेवह सेइ॥
सिनह लखन भल भरत सरास़। ऽबऽध प्रपंच महूँ सिऩ न
दास़॥4॥
भ़ि़थग:-ऽजन्द्होंने स़धिओं की सभ़ क़ सेिन (सत्संग) नहीं दकय़,
िे हा ऱज़ ऱजमद रूपा मददऱ क़ अचमन करते हा (पाते
हा) मति़ले हो ज़ते हैं। हे लक्ष्मण! सिनो, भरत सराख़ ईिम
पिरुष ब्रह्म़ की सुऽष्ट में न तो कहीं सिऩ गय़ है, न देख़ हा
गय़ है॥4॥
दोह़ :
* भरतऽह होआ न ऱजमदि ऽबऽध हरर हर पद प़आ।
कबहुूँ दक क़ूँजा साकरऽन छारवसधि ऽबनस़आ॥231॥
भ़ि़थग:-(ऄयोध्य़ के ऱज्य की तो ब़त हा क्य़ है) ब्रह्म़,
ऽिष्णि और मह़देि क़ पद प़कर भा भरत को ऱज्य क़ मद
नहीं होने क़! क्य़ कभा क़ूँजा की बीूँदों से क्षारसमिर नष्ट हो
सकत़ (फट सकत़) है?॥231॥

चौप़इ :
* ऽतऽमरु तरुन तरऽनऽह मकि ऽगलइ। गगनि मगन मकि मेघवह
ऽमलइ॥
गोपद जल बीडवह घटजोना। सहज छम़ बरु छ़डै छोना॥1॥
भ़ि़थग:-ऄन्द्धक़र च़हे तरुण (मध्य़ह्न के ) सीयग को ऽनगल ज़ए।
अक़श च़हे ब़दलों में सम़कर ऽमल ज़ए। गो के खिर आतने
जल में ऄगसत्यजा डी ब ज़एूँ और पुथ्िा च़हे ऄपना सि़भ़ऽिक
क्षम़ (सहनशालत़) को छोड दे॥1॥
* मसक फीूँ क मकि मेरु ईड़इ। होआ न नुपमदि भरतऽह भ़इ॥
लखन तिम्ह़र सपथ ऽपति अऩ। सिऽच सिबंधि नवह भरत
सम़ऩ॥2॥
भ़ि़थग:-मच्छर की फीूँ क से च़हे सिमेरु ईड ज़ए, परन्द्ति हे भ़इ!
भरत को ऱजमद कभा नहीं हो सकत़। हे लक्ष्मण! मैं तिम्ह़रा
शपथ और ऽपत़जा की सौगंध ख़कर कहत़ हूँ, भरत के सम़न
पऽित्र और ईिम भ़इ संस़र में नहीं है॥2॥
* सगिनि खारु ऄिगिन जलि त़त़। ऽमलआ रचआ परपंचि ऽबध़त़॥
भरति हंस रऽबबंस तड़ग़। जनऽम कीन्द्ह गिन दोष ऽबभ़ग़॥3॥

भ़ि़थग:-हे त़त! गिरु रूपा दीध और ऄिगिण रूपा जल को
ऽमल़कर ऽिध़त़ आस दुश्य प्रपंच (जगत्) को रचत़ है, परन्द्ति
भरत ने सीयि
ग ंश रूपा त़ल़ब में हंस रूप जन्द्म लेकर गिण और
दोष क़ ऽिभ़ग कर ददय़ (दोनों को ऄलग-ऄलग कर ददय़)॥3॥
* गऽह गिन पय तऽज ऄिगिण ब़रा। ऽनज जस जगत कीऽन्द्ह
ईऽजअरा॥
कहत भरत गिन सालि सिभ़उ। पेम पयोऽध मगन रघिऱउ॥4॥
भ़ि़थग:-गिणरूपा दीध को ग्रहण कर और ऄिगिण रूपा जल को
त्य़गकर भरत ने ऄपने यश से जगत् में ईऽजय़ल़ कर ददय़ है।
भरतजा के गिण, शाल और सिभ़ि को कहते-कहते श्रा
रघिऩथजा प्रेमसमिर में मग्न हो गए॥4॥
दोह़ :
* सिऽन रघिबर ब़ना ऽबबिध देऽख भरत पर हेति।
सकल सऱहत ऱम सो प्रभि को कु प़ऽनके ति॥232॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचंरजा की ि़णा सिनकर और भरतजा पर ईनक़
प्रेम देखकर समसत देित़ ईनकी सऱहऩ करने लगे (और कहने
लगे) दक श्रा ऱमचंरजा के सम़न कु प़ के ध़म प्रभि और कौन
है?॥232॥
चौप़इ :

* जौं न होत जग जनम भरत को। सकल धरम धिर धरऽन धरत
को॥
कऽब कि ल ऄगम भरत गिन ग़थ़। को ज़नआ तिम्ह ऽबनि
रघिऩथ़॥1॥
भ़ि़थग:-यदद जगत् में भरत क़ जन्द्म न होत़, तो पुथ्िा पर
संपीणग धमों की धिरा को कौन ध़रण करत़? हे रघिऩथजा!
कऽिकि ल के ऽलए ऄगम (ईनकी कल्पऩ से ऄतात) भरतजा के
गिणों की कथ़ अपके ऽसि़ और कौन ज़न सकत़ है?॥1॥

भरतजा क़ मन्द्द़दकना स्ऩन, ऽचत्रकी ट में पहुूँचऩ, भरत़दद
सबक़ परसपर ऽमल़प, ऽपत़ क़ शोक और श्ऱि
* लखन ऱम ऽसयूँ सिऽन सिर ब़ना। ऄऽत सिखि लहेई न ज़आ
बख़ना॥
आह़ूँ भरति सब सऽहत सह़ए। मंद़दकनीं पिनात नह़ए॥2॥
भ़ि़थग:-लक्ष्मणजा, श्रा ऱमचंरजा और सात़जा ने देित़ओं की
ि़णा सिनकर ऄत्यंत सिख प़य़, जो िणगन नहीं दकय़ ज़
सकत़। यह़ूँ भरतजा ने स़रे सम़ज के स़थ पऽित्र मंद़दकना में
स्ऩन दकय़॥2॥
* सररत समाप ऱऽख सब लोग़। म़ऽग म़ति गिर सऽचि
ऽनयोग़॥
चले भरति जहूँ ऽसय रघिऱइ। स़थ ऽनष़दऩथि लघि भ़इ॥3॥
भ़ि़थग:-दफर सबको नदा के समाप ठहऱकर तथ़ म़त़, गिरु
और मंत्रा की अज्ञ़ म

भरतजा क़ मन्द्द़दकना स्ऩन, ऽचत्रकी ट में पहुूँचऩ, भरत़दद
सबक़ परसपर ऽमल़प, ऽपत़ क़ शोक और श्ऱि
* लखन ऱम ऽसयूँ सिऽन सिर ब़ना। ऄऽत सिखि लहेई न ज़आ
बख़ना॥
आह़ूँ भरति सब सऽहत सह़ए। मंद़दकनीं पिनात नह़ए॥2॥
भ़ि़थग:-लक्ष्मणजा, श्रा ऱमचंरजा और सात़जा ने देित़ओं की
ि़णा सिनकर ऄत्यंत सिख प़य़, जो िणगन नहीं दकय़ ज़
सकत़। यह़ूँ भरतजा ने स़रे सम़ज के स़थ पऽित्र मंद़दकना में
स्ऩन दकय़॥2॥
* सररत समाप ऱऽख सब लोग़। म़ऽग म़ति गिर सऽचि
ऽनयोग़॥
चले भरति जहूँ ऽसय रघिऱइ। स़थ ऽनष़दऩथि लघि भ़इ॥3॥
भ़ि़थग:-दफर सबको नदा के समाप ठहऱकर तथ़ म़त़, गिरु
और मंत्रा की अज्ञ़ म़ूँगकर ऽनष़दऱज और शत्रिघ्न को स़थ
लेकर भरतजा िह़ूँ चले जह़ूँ श्रा सात़जा और श्रा रघिऩथजा
थे॥3॥।
* समिऽझ म़ति करतब सकि च़हीं। करत कि तरक कोरट मन म़हीं॥

ऱमि लखनि ऽसय सिऽन मम ऩउूँ। ईरठ जऽन ऄनत ज़वह तऽज
ठ़उूँ॥4॥
भ़ि़थग:-भरतजा ऄपना म़त़ कै के या की करना को समझकर
(य़द करके ) सकि च़ते हैं और मन में करोडों (ऄनेकों) कि तकग
करते हैं (सोचते हैं) श्रा ऱम, लक्ष्मण और सात़जा मेऱ ऩम
सिनकर सथ़न छोडकर कहीं दीसरा जगह ईठकर न चले ज़एूँ॥4॥
दोह़ :
* म़ति मते महुूँ म़ऽन मोऽह जो कछि करवह सो थोर।
ऄघ ऄिगिन छऽम अदरवह समिऽझ अपना ओर॥233॥
भ़ि़थग:-मिझे म़त़ के मत में म़नकर िे जो कि छ भा करें सो
थोड़ है, पर िे ऄपना ओर समझकर (ऄपने ऽिरद और संबंध
को देखकर) मेरे प़पों और ऄिगिणों को क्षम़ करके मेऱ अदर
हा करें गे॥233॥
चौप़इ :
* जौं पररहरवह मऽलन मनि ज़ना। जौं सनम़नवह सेिकि म़ना॥
मोरें सरन ऱमऽह की पनहा। ऱम सिसि़ऽम दोसि सब जनहा॥1॥
भ़ि़थग:-च़हे मऽलन मन ज़नकर मिझे त्य़ग दें, च़हे ऄपऩ
सेिक म़नकर मेऱ सम्म़न करें , (कि छ भा करें ), मेरे तो श्रा

ऱमचंरजा की जीऽतय़ूँ हा शरण हैं। श्रा ऱमचंरजा तो ऄच्छे
सि़मा हैं, दोष तो सब द़स क़ हा है॥1॥
* जग जग भ़जन च़तक माऩ। नेम पेम ऽनज ऽनपिन नबाऩ॥
ऄस मन गिनत चले मग ज़त़। सकि च सनेहूँ ऽसऽथल सब
ग़त़॥2॥
भ़ि़थग:-जगत् में यश के प़त्र तो च़तक और मछला हा हैं, जो
ऄपने नेम और प्रेम को सद़ नय़ बऩए रखने में ऽनपिण हैं।
ऐस़ मन में सोचते हुए भरतजा म़गग में चले ज़ते हैं। ईनके
सब ऄंग संकोच और प्रेम से ऽशऽथल हो रहे हैं॥2॥
* फे रऽत मनहुूँ म़ति कु त खोरा। चलत भगऽत बल धारज धोरा॥
जब समिझत रघिऩथ सिभ़उ। तब पथ परत ईत़आल प़उ॥3॥
भ़ि़थग:-म़त़ की हुइ बिऱइ म़नो ईन्द्हें लौट़ता है, पर धारज
की धिरा को ध़रण करने ि़ले भरतजा भऽक्त के बल से चले
ज़ते हैं। जब श्रा रघिऩथजा के सिभ़ि को समझते (समरण
करते) हैं तब म़गग में ईनके पैर जल्दा-जल्दा पडने लगते हैं॥3॥
* भरत दस़ तेऽह ऄिसर कै सा। जल प्रब़हूँ जल ऄऽल गऽत
जैसा॥
देऽख भरत कर सोचि सनेह। भ़ ऽनष़द तेऽह समयूँ ऽबदेह॥4॥

भ़ि़थग:-ईस समय भरत की दश़ कै सा है? जैसा जल के प्रि़ह
में जल के भौंरे की गऽत होता है। भरतजा क़ सोच और प्रेम
देखकर ईस समय ऽनष़द ऽिदेह हो गय़ (देह की सिध-बिध भील
गय़)॥4॥
दोह़ :
* लगे होन मंगल सगिन सिऽन गिऽन कहत ऽनष़दि।
ऽमरटऽह सोचि होआऽह हरषि पिऽन पररऩम ऽबष़दि॥234॥
भ़ि़थग:-मंगल शकि न होने लगे। ईन्द्हें सिनकर और ऽिच़रकर
ऽनष़द कहने लग़- सोच ऽमटेग़, हषग होग़, पर दफर ऄन्द्त में
दिःख होग़॥234॥
चौप़इ :
* सेिक बचन सत्य सब ज़ने। अश्रम ऽनकट ज़आ ऽनऄऱने॥
भरत दाख बन सैल सम़जी। मिददत छि ऽधत जनि प़आ सिऩजी॥1॥
भ़ि़थग:-भरतजा ने सेिक (गिह) के सब िचन सत्य ज़ने और िे
अश्रम के समाप ज़ पहुूँचे। िह़ूँ के िन और पिगतों के समीह
को देख़ तो भरतजा आतने अनंददत हुए म़नो कोइ भीख़ ऄच्छ़
ऄन्न (भोजन) प़ गय़ हो॥1॥
* इऽत भाऽत जनि प्रज़ दिख़रा। ऽत्रऽबध त़प पाऽडत ग्रह म़रा॥

ज़आ सिऱज सिदस
े सिख़रा। होवह भरत गऽत तेऽह ऄनिह़रा॥2॥
भ़ि़थग:-जैसे *इऽत के भय से दिःखा हुइ और तानों (अध्य़ऽत्मक,
अऽधदैऽिक और अऽधभौऽतक) त़पों तथ़ क्रीर ग्रहों और
मह़म़ररयों से पाऽडत प्रज़ दकसा ईिम देश और ईिम ऱज्य
में ज़कर सिखा हो ज़ए, भरतजा की गऽत (दश़) ठाक ईसा
प्रक़र हो रहा है॥2॥ (*ऄऽधक जल बरसऩ, न बरसऩ, चीहों
क़ ईत्प़त, रटऽड्डय़ूँ, तोते और दीसरे ऱज़ की चढ़़इ- खेतों में
ब़ध़ देने ि़ले आन छह ईपरिों को 'इऽत' कहते हैं)।
* ऱम ब़स बन संपऽत वऱ्ज़। सिखा प्रज़ जनि प़आ सिऱज़॥
सऽचि ऽबऱगि ऽबबेकि नरे सी। ऽबऽपन सिह़िन प़िन देसी॥3॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमचंरजा के ऽनि़स से िन की सम्पऽि ऐसा
सिशोऽभत है म़नो ऄच्छे ऱज़ को प़कर प्रज़ सिखा हो।
सिह़िऩ िन हा पऽित्र देश है। ऽििेक ईसक़ ऱज़ है और
िैऱग्य मंत्रा है॥3॥
* भट जम ऽनयम सैल रजध़ना। स़ंऽत सिमऽत सिऽच सिंदर ऱना॥
सकल ऄंग संपन्न सिऱउ। ऱम चरन अऽश्रत ऽचत च़उ॥4॥
भ़ि़थग:-यम (ऄवहस़, सत्य, ऄसतेय, ब्रह्मचयग और ऄपररग्रह) तथ़
ऽनयम (शौच, संतोष, तप, सि़ध्य़य और इश्वर प्रऽणध़न) योि़

हैं। पिगत ऱजध़ना है, श़ंऽत तथ़ सिबिऽि दो सिंदर पऽित्र
ऱऽनय़ूँ हैं। िह श्रेष्ठ ऱज़ ऱज्य के सब ऄंगों से पीणग है और
श्रा ऱमचंरजा के चरणों के अऽश्रत रहने से ईसके ऽचि में च़ि
(अनंद य़ ईत्स़ह) है॥4॥ (सि़मा, अमत्य, सिहृद, कोष, ऱष्ट्र,
दिगग और सेऩ- ऱज्य के स़त ऄंग हैं।)
दोह़ :
* जाऽत मोह मऽहप़लि दल सऽहत ऽबबेक भिअलि।
करत ऄकं टक ऱजि पिरूँ सिख संपद़ सिक़लि॥235॥
भ़ि़थग:-मोह रूपा ऱज़ को सेऩ सऽहत जातकर ऽििेक रूपा
ऱज़ ऽनष्कण्टक ऱज्य कर रह़ है। ईसके नगर में सिख, सम्पऽि
और सिक़ल ितगम़न है॥235॥
चौप़इ :
* बन प्रदेस मिऽन ब़स घनेरे। जनि पिर नगर ग़ईूँ गन खेरे॥
ऽबपिल ऽबऽचत्र ऽबहग मुग ऩऩ। प्रज़ सम़जि न ज़आ
बख़ऩ॥1॥
भ़ि़थग:-िन रूपा प्ऱंतों में जो मिऽनयों के बहुत से ऽनि़स सथ़न
हैं, िहा म़नो शहरों, नगरों, ग़ूँिों और खेडों क़ समीह है।
बहुत से ऽिऽचत्र पक्षा और ऄनेकों पशि हा म़नो प्रज़ओं क़
सम़ज है, ऽजसक़ िणगन नहीं दकय़ ज़ सकत़॥1॥

* खगह़ करर हरर ब़घ बऱह़। देऽख मऽहष बुष स़जि सऱह़॥
बयरु ऽबह़आ चरवह एक संग़। जहूँ तहूँ मनहुूँ सेन चतिरंग़॥2॥
भ़ि़थग:-गैंड़, ह़था, वसह, ब़घ, सीऄर, भैंसे और बैलों को
देखकर ऱज़ के स़ज को सऱहते हा बनत़ है। ये सब अपस
क़ िैर छोडकर जह़ूँ-तह़ूँ एक स़थ ऽिचरते हैं। यहा म़नो
चतिरंऽगणा सेऩ है॥2॥
* झरऩ झरवह मि गज ग़जवह। मनहुूँ ऽनस़न ऽबऽबऽध ऽबऽध
ब़जवह॥
चक चकोर च़तक सिक ऽपक गन। की जत मंजि मऱल मिददत
मन॥3॥
भ़ि़थग:-प़ना के झरने झर रहे हैं और मति़ले ह़था वचघ़ड
रहे हैं। म़नो िह़ूँ ऄनेकों प्रक़र के नग़डे बज रहे हैं। चकि़,
चकोर, पपाह़, तोत़ तथ़ कोयलों के समीह और सिद
ं र हंस
प्रसन्न मन से की ज रहे हैं॥3॥
* ऄऽलगन ग़ित ऩचत मोऱ। जनि सिऱज मंगल चहु ओऱ॥
बेऽल ऽबटप तुन सफल सफी ल़। सब सम़जि मिद मंगल मील़॥4॥
भ़ि़थग:-भौंरों के समीह गिंज़र कर रहे हैं और मोर ऩच रहे हैं।
म़नो ईस ऄच्छे ऱज्य में च़रों ओर मंगल हो रह़ है। बेल,

िुक्ष, तुण सब फल और फी लों से यिक्त हैं। स़ऱ सम़ज अनंद
और मंगल क़ मील बन रह़ है॥4॥
दोह़ :
* ऱम सैल सोभ़ ऽनरऽख भरत हृदयूँ ऄऽत पेमि।
त़पस तप फलि प़आ ऽजऽम सिखा ऽसऱनें नेमि॥236॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमजा के पिगत की शोभ़ देखकर भरतजा के हृदय
में ऄत्यंत प्रेम हुअ। जैसे तपसिा ऽनयम की सम़ऽप्त होने पर
तपसय़ क़ फल प़कर सिखा होत़ है॥236॥

म़सप़ऱयण, बासि़ूँ ऽिश्ऱम
नि़ह्नप़ऱयण, प़ूँचि़ूँ ऽिश्ऱम
चौप़इ :
* तब के िट उूँचे चदढ़ ध़इ। कहेई भरत सन भिज़ ईठ़इ॥
ऩथ देऽखऄवह ऽबटप ऽबस़ल़। प़करर जंबि रस़ल तम़ल़॥1॥
भ़ि़थग:-तब के िट दौडकर उूँचे चढ़ गय़ और भिज़ ईठ़कर
भरजा से कहने लग़- हे ऩथ! ये जो प़कर, ज़मिन, अम और
तम़ल के ऽिश़ल िुक्ष ददख़इ देते हैं,॥1॥

* ऽजन्द्ह तरुबरन्द्ह मध्य बटि सोह़। मंजि ऽबस़ल देऽख मनि मोह़॥
नाल सघन पल्लि फल ल़ल़। ऄऽबरल छ़हूँ सिखद सब
क़ल़॥2॥
भ़ि़थग:-ऽजन श्रेष्ठ िुक्षों के बाच में एक सिंदर ऽिश़ल बड क़
िुक्ष सिशोऽभत है, ऽजसको देखकर मन मोऽहत हो ज़त़ है,
ईसके पिे नाले और सघन हैं और ईसमें ल़ल फल लगे हैं।
ईसकी घना छ़य़ सब ऊतिओं में सिख देने ि़ला है॥2॥
* म़नहुूँ ऽतऽमर ऄरुनमय ऱसा। ऽबरचा ऽबऽध सूँकेऽल सिषम़
सा॥
ए तरु सररत समाप गोस़ूँइ। रघिबर परनकि टा जहूँ छ़इ॥3॥
भ़ि़थग:-म़नो ब्रह्म़जा ने परम शोभ़ को एकत्र करके ऄंधक़र
और ल़ऽलम़मया ऱऽश सा रच दा है। हे गिस़ईं! ये िुक्ष नदा
के समाप हैं, जह़ूँ श्रा ऱम की पणगकिटा छ़इ है॥3॥
* तिलसा तरुबर ऽबऽबध सिह़ए। कहुूँ कहुूँ ऽसयूँ कहुूँ लखन
लग़ए॥
बट छ़य़ूँ बेददक़ बऩइ। ऽसयूँ ऽनज प़ऽन सरोज सिह़इ॥4॥
भ़ि़थग:-िह़ूँ तिलसाजा के बहुत से सिंदर िुक्ष सिशोऽभत हैं, जो
कहीं-कहीं सात़जा ने और कहीं लक्ष्मणजा ने लग़ए हैं। आसा

बड की छ़य़ में सात़जा ने ऄपने करकमलों से सिद
ं र िेदा
बऩइ है॥4॥
दोह़ :
* जह़ूँ बैरठ मिऽनगन सऽहत ऽनत ऽसय ऱमि सिज़न।
सिनवह कथ़ आऽतह़स सब अगम ऽनगम पिऱन॥237॥
भ़ि़थग:-जह़ूँ सिज़न श्रा सात़-ऱमजा मिऽनयों के िुन्द्द समेत
बैठकर ऽनत्य श़स्त्र, िेद और पिऱणों के सब कथ़-आऽतह़स सिनते
हैं॥237॥
चौप़इ :
* सख़ बचन सिऽन ऽबटप ऽनह़रा। ईमगे भरत ऽबलोचन ब़रा॥
करत प्रऩम चले दोई भ़इ। कहत प्राऽत स़रद सकि च़इ॥1॥
भ़ि़थग:-सख़ के िचन सिनकर और िुक्षों को देखकर भरतजा के
नेत्रों में जल ईमड अय़। दोनों भ़इ प्रण़म करते हुए चले।
ईनके प्रेम क़ िणगन करने में सरसिताजा भा सकि च़ता हैं॥1॥
* हरषवह ऽनरऽख ऱम पद ऄंक़। म़नहुूँ प़रसि प़यई रं क़॥
रज ऽसर धरर ऽहयूँ नयनऽन्द्ह ल़िवह। रघिबर ऽमलन सररस सिख
प़िवह॥2॥

भ़ि़थग:-श्रा ऱमचन्द्रजा के चरणऽचह्न देखकर दोनों भ़इ ऐसे
हर्तषत होते हैं, म़नो दररर प़रस प़ गय़ हो। िह़ूँ की रज को
मसतक पर रखकर हृदय में और नेत्रों में लग़ते हैं और श्रा
रघिऩथजा के ऽमलने के सम़न सिख प़ते हैं॥2॥
* देऽख भरत गऽत ऄकथ ऄताि़। प्रेम मगन मुग खग जड
जाि़॥
सखऽह सनेह ऽबबस मग भील़। कऽह सिपंथ सिर बरषवह फी ल़॥3॥
भ़ि़थग:-भरतजा की ऄत्यन्द्त ऄऽनिगचनाय दश़ देखकर िन के
पशि, पक्षा और जड (िुक्ष़दद) जाि प्रेम में मग्न हो गए। प्रेम के
ऽिशेष िश होने से सख़ ऽनष़दऱज को भा ऱसत़ भील गय़।
तब देित़ सिंदर ऱसत़ बतल़कर फी ल बरस़ने लगे॥3॥
* ऽनरऽख ऽसि स़धक ऄनिऱगे। सहज सनेहु सऱहन ल़गे॥
होत न भीतल भ़ई भरत को। ऄचर सचर चर ऄचर करत
को॥4॥
भ़ि़थग:-भरत के प्रेम की आस ऽसथऽत को देखकर ऽसि और
स़धक लोग भा ऄनिऱग से भर गए और ईनके सि़भ़ऽिक प्रेम
की प्रशंस़ करने लगे दक यदद आस पुथ्िा तल पर भरत क़
जन्द्म (ऄथि़ प्रेम) न होत़, तो जड को चेतन और चेतन को
जड कौन करत़?॥4॥

दोह़ :
* पेम ऄऽमऄ मंदरु ऽबरहु भरति पयोऽध गूँभार।
मऽथ प्रगटेई सिर स़धि ऽहत कु प़वसधि रघिबार॥238॥
भ़ि़थग:-प्रेम ऄमुत है, ऽिरह मंदऱचल पिगत है, भरतजा गहरे
समिर हैं। कु प़ के समिर श्रा ऱमचन्द्रजा ने देित़ और स़धिओं के
ऽहत के ऽलए सियं (आस भरत रूपा गहरे समिर को ऄपने ऽिरह
रूपा मंदऱचल से) मथकर यह प्रेम रूपा ऄमुत प्रकट दकय़
है॥238॥
चौप़इ :
* सख़ समेत मनोहर जोट़। लखेई न लखन सघन बन ओट़॥
भरत दाख प्रभि अश्रमि प़िन। सकल सिमंगल सदनि सिह़िन॥1॥
भ़ि़थग:-सख़ ऽनष़दऱज सऽहत आस मनोहर जोडा को सघन िन
की अड के क़रण लक्ष्मणजा नहीं देख प़ए। भरतजा ने प्रभि श्रा
ऱमचन्द्रजा के समसत सिमंगलों के ध़म और सिद
ं र पऽित्र अश्रम
को देख़॥1॥
* करत प्रबेस ऽमटे दिख द़ि़। जनि जोगीं परम़रथि प़ि़॥
देखे भरत लखन प्रभि अगे। पीूँछे बचन कहत ऄनिऱगे॥2॥

भ़ि़थग:-अश्रम में प्रिेश करते हा भरतजा क़ दिःख और द़ह
(जलन) ऽमट गय़, म़नो योगा को परम़थग (परमतत्ि) की प्ऱऽप्त
हो गइ हो। भरतजा ने देख़ दक लक्ष्मणजा प्रभि के अगे खडे हैं
और पीछे हुए िचन प्रेमपीिगक कह रहे हैं (पीछा हुइ ब़त क़
प्रेमपीिगक ईिर दे रहे हैं)॥2॥
* सास जट़ करट मिऽन पट ब़ूँध।ें तीन कसें कर सरु धनि क़ूँधें॥
बेदा पर मिऽन स़धि सम़जी। साय सऽहत ऱजत रघिऱजी॥3॥
भ़ि़थग:-ऽसर पर जट़ है, कमर में मिऽनयों क़ (िल्कल) िस्त्र
ब़ूँधे हैं और ईसा में तरकस कसे हैं। ह़थ में ब़ण तथ़ कं धे
पर धनिष है, िेदा पर मिऽन तथ़ स़धिओं क़ समिद़य बैठ़ है
और सात़जा सऽहत श्रा रघिऩथजा ऽिऱजम़न हैं॥3॥
* बलकल बसन जरटल तनि सय़म़। जनि मिऽनबेष कीन्द्ह रऽत
क़म़॥
कर कमलऽन धनि स़यकि फे रत। ऽजय की जरऽन हरत हूँऽस
हेरत॥4॥
भ़ि़थग:-श्रा ऱमजा के िल्कल िस्त्र हैं, जट़ ध़रण दकए हैं,
श्य़म शरार है। (सात़-ऱमजा ऐसे लगते हैं) म़नो रऽत और
क़मदेि ने मिऽन क़ िेष ध़रण दकय़ हो। श्रा ऱमजा ऄपने
करकमलों से धनिष-ब़ण फे र रहे हैं और हूँसकर देखते हा जा
की जलन हर लेते हैं (ऄथ़गत ऽजसकी ओर भा एक ब़र हूँसकर

देख लेते हैं, ईसा को परम अनंद और श़ंऽत ऽमल ज़ता
है।)॥4॥
दोह़ :
* लसत मंजि मिऽन मंडला मध्य साय रघिचंद।ि
ग्य़न सभ़ूँ जनि तनि धरें भगऽत सऽच्चद़नंद॥ि 239॥
भ़ि़थग:-सिंदर मिऽन मंडला के बाच में सात़जा और रघिकिलचंर
श्रा ऱमचन्द्रजा ऐसे सिशोऽभत हो रहे हैं म़नो ज्ञ़न की सभ़ में
स़क्ष़त् भऽक्त और सऽच्चद़नंद शरार ध़रण करके ऽिऱजम़न
हैं॥239॥
चौप़इ :
* स़निज सख़ समेत मगन मन। ऽबसरे हरष सोक सिख दिख
गन॥
प़ऽह ऩथ कऽह प़ऽह गोस़ईं। भीतल परे लकि ट की ऩईं॥1॥
भ़ि़थग:-छोटे भ़इ शत्रिघ्न और सख़ ऽनष़दऱज समेत भरतजा
क़ मन (प्रेम में) मग्न हो रह़ है। हषग-शोक, सिख-दिःख अदद सब
भील गए। हे ऩथ! रक्ष़ कीऽजए, हे गिस़ईं! रक्ष़ कीऽजए' ऐस़
कहकर िे पुथ्िा पर दण्ड की तरह ऽगर पडे॥1॥
* बचन सप्रेम लखन पऽहच़ने। करत प्रऩमि भरत ऽजयूँ ज़ने॥

बंधि सनेह सरस एऽह ओऱ। ईत स़ऽहब सेि़ बस जोऱ॥2॥
भ़ि़थग:-प्रेमभरे िचनों से लक्ष्मणजा ने पहच़न ऽलय़ और मन
में ज़न ऽलय़ दक भरतजा प्रण़म कर रहे हैं। (िे श्रा ऱमजा
की ओर मिूँह दकए खडे थे, भरतजा पाठ पाछे थे, आससे ईन्द्होंने
देख़ नहीं।) ऄब आस ओर तो भ़इ भरतजा क़ सरस प्रेम और
ईधर सि़मा श्रा ऱमचन्द्रजा की सेि़ की प्रबल परिशत़॥2॥
* ऽमऽल न ज़आ नवह गिदरत बनइ। सिकऽब लखन मन की गऽत
भनइ॥
रहे ऱऽख सेि़ पर भ़रू। चढ़ा चंग जनि खैंच खेल़रू॥3॥
भ़ि़थग:-न तो (क्षणभर के ऽलए भा सेि़ से पुथक होकर) ऽमलते
हा बनत़ है और न (प्रेमिश) छोडते (ईपेक्ष़ करते) हा। कोइ
श्रेष्ठ कऽि हा लक्ष्मणजा के ऽचि की आस गऽत (दिऽिध़) क़
िणगन कर सकत़ है। िे सेि़ पर भ़र रखकर रह गए (सेि़ को
हा ऽिशेष महत्िपीणग समझकर ईसा में लगे रहे) म़नो चढ़ा हुइ
पतंग को ऽखल़डा (पतंग ईड़ने ि़ल़) खींच रह़ हो॥3॥
* कहत सप्रेम ऩआ मऽह म़थ़। भरत प्रऩम करत रघिऩथ़॥
ईठे ऱमि सिऽन पेम ऄधाऱ। कहुूँ पट कहुूँ ऽनषंग धनि ताऱ॥4॥
भ़ि़थग:-लक्ष्मणजा ने प्रेम सऽहत पुथ्िा पर मसतक नि़कर कह़हे रघिऩथजा! भरतजा प्रण़म कर रहे हैं। यह सिनते हा श्रा

रघिऩथजा प्रेम में ऄधार होकर ईठे । कहीं िस्त्र ऽगऱ, कहीं
तरकस, कहीं धनिष और कहीं ब़ण॥4॥
दोह़ :
* बरबस ऽलए ईठ़आ ईर ल़ए कु प़ऽनध़न।
भरत ऱम की ऽमलऽन लऽख ऽबसरे सबऽह ऄप़न॥240॥
भ़ि़थग:-कु प़ ऽनध़न श्रा ऱमचन्द्रजा ने ईनको जबरदसता ईठ़कर
हृदय से लग़ ऽलय़! भरतजा और श्रा ऱमजा के ऽमलन की
राऽत को देखकर सबको ऄपना सिध भील गइ॥240॥
चौप़इ :
* ऽमलऽन प्राऽत दकऽम ज़आ बख़ना। कऽबकि ल ऄगम करम मन
ब़ना॥
परम प्रेम पीरन दोई भ़इ। मन बिऽध ऽचत ऄहऽमऽत ऽबसऱइ॥1॥
भ़ि़थग:-ऽमलन की प्राऽत कै से बख़ना ज़ए? िह तो कऽिकि ल के
ऽलए कमग, मन, ि़णा तानों से ऄगम है। दोनों भ़इ (भरतजा
और श्रा ऱमजा) मन, बिऽि, ऽचि और ऄहंक़र को भिल़कर
परम प्रेम से पीणग हो रहे हैं॥1॥
* कहहु सिपेम प्रगट को करइ। के ऽह छ़य़ कऽब मऽत ऄनिसरइ॥

कऽबऽह ऄरथ अखर बलि स़ूँच़। ऄनिहरर त़ल गऽतऽह नटि
ऩच़॥2॥
भ़ि़थग:-कऽहए, ईस श्रेष्ठ प्रेम को कौन प्रकट करे ? कऽि की बिऽि
दकसकी छ़य़ क़ ऄनिसरण करे ? कऽि को तो ऄक्षर और ऄथग
क़ हा सच्च़ बल है। नट त़ल की गऽत के ऄनिस़र हा ऩचत़
है!॥2॥
* ऄगम सनेह भरत रघिबर को। जहूँ न ज़आ मनि ऽबऽध हरर हर
को॥
सो मैं कि मऽत कहौं के ऽह भ़ूँऽत। ब़ज सिऱग दक ग़ूँडर त़ूँता॥3॥
भ़ि़थग:-भरतजा और श्रा रघिऩथजा क़ प्रेम ऄगम्य है, जह़ूँ
ब्रह्म़, ऽिष्णि और मह़देि क़ भा मन नहीं ज़ सकत़। ईस प्रेम
को मैं कि बिऽि दकस प्रक़र कहूँ! भल़, *ग़ूँडर की त़ूँत से भा
कहीं सिंदर ऱग बज सकत़ है?॥3॥ (*त़ल़बों और झालों में
एक तरह की घ़स होता है, ईसे ग़ूँडर कहते हैं।)
* ऽमलऽन ऽबलोदक भरत रघिबर की। सिरगन सभय धकधकी
धरकी॥
समिझ़ए सिरगिरु जड ज़गे। बरऽष प्रसीन प्रसंसन ल़गे॥4॥

भ़ि़थग:-भरतजा और श्रा ऱमचन्द्रजा के ऽमलने क़ ढंग देखकर
देित़ भयभात हो गए, ईनकी धिकधिकी धडकने लगा। देि गिरु
बुहसपऽतजा ने समझ़य़, तब कहीं िे मीखग चेते और फी ल
बरस़कर प्रशंस़ करने लगे॥4॥
दोह़ :
* ऽमऽल सपेम ररपिसीदनऽह के िटि भेंटेई ऱम।
भीरर भ़यूँ भेंटे भरत लऽछमन करत प्रऩम॥241॥
भ़ि़थग:-दफर श्रा ऱमजा प्रेम के स़थ शत्रिघ्न से ऽमलकर तब
के िट (ऽनष़दऱज) से ऽमले। प्रण़म करते हुए लक्ष्मणजा से
भरतजा बडे हा प्रेम से ऽमले॥241॥
चौप़इ :
* भेंटेई लखन ललदक लघि भ़इ। बहुरर ऽनष़दि लान्द्ह ईर ल़इ॥
पिऽन मिऽनगन दिहुूँ भ़आन्द्ह बंदे। ऄऽभमत अऽसष प़आ ऄनंद॥
े 1॥
भ़ि़थग:-तब लक्ष्मणजा ललककर (बडा ईमंग के स़थ) छोटे भ़इ
शत्रिघ्न से ऽमले। दफर ईन्द्होंने ऽनष़दऱज को हृदय से लग़
ऽलय़। दफर भरत-शत्रिघ्न दोनों भ़आयों ने (ईपऽसथत) मिऽनयों को
प्रण़म दकय़ और आऽच्छत अशाि़गद प़कर िे अनंददत हुए॥1॥
* स़निज भरत ईमऽग ऄनिऱग़। धरर ऽसर ऽसय पद पदिम
पऱग़॥

पिऽन पिऽन करत प्रऩम ईठ़ए। ऽसर कर कमल परऽस बैठ़ए॥2॥
भ़ि़थग:-छोटे भ़इ शत्रिघ्न सऽहत भरतजा प्रेम में ईमूँगकर
सात़जा के चरण कमलों की रज ऽसर पर ध़रण कर ब़र-ब़र
प्रण़म करने लगे। सात़जा ने ईन्द्हें ईठ़कर ईनके ऽसर को ऄपने
करकमल से सपशग कर (ऽसर पर ह़थ फे रकर) ईन दोनों को
बैठ़य़॥2॥
* सायूँ ऄसास दाऽन्द्ह मन म़हीं। मनग सनेहूँ देह सिऽध ऩहीं॥
सब ऽबऽध स़निकील लऽख सात़। भे ऽनसोच ईर ऄपडर बात़॥3॥
भ़ि़थग:-सात़जा ने मन हा मन अशाि़गद ददय़, क्योंदक िे स्नेह
में मग्न हैं, ईन्द्हें देह की सिध-बिध नहीं है। सात़जा को सब
प्रक़र से ऄपने ऄनिकील देखकर भरतजा सोचरऽहत हो गए और
ईनके हृदय क़ कऽल्पत भय ज़त़ रह़॥3॥
* कोई दकछि कहइ न कोई दकछि पीूँछ़। प्रेम भऱ मन ऽनज गऽत
छी ूँछ़॥
तेऽह ऄिसर के िटि धारजि धरर। जोरर प़ऽन ऽबनित प्रऩमि
करर॥4॥
भ़ि़थग:-ईस समय न तो कोइ कि छ कहत़ है, न कोइ कि छ
पीछत़ है! मन प्रेम से पररपीणग है, िह ऄपना गऽत से ख़ला है
(ऄथ़गत संकल्प-ऽिकल्प और च़ंचल्य से शीन्द्य है)। ईस ऄिसर

पर के िट (ऽनष़दऱज) धारज धर और ह़थ जोडकर प्रण़म
करके ऽिनता करने लग़-॥4॥
दोह़ :
* ऩथ स़थ मिऽनऩथ के म़ति सकल पिर लोग।
सेिक सेनप सऽचि सब अए ऽबकल ऽबयोग॥242॥
भ़ि़थग:-हे ऩथ! मिऽनऩथ िऽशष्ठजा के स़थ सब म़त़एूँ,
नगरि़सा, सेिक, सेऩपऽत, मंत्रा- सब अपके ऽियोग से व्य़कि ल
होकर अए हैं॥242॥
चौप़इ :
* सालवसधि सिऽन गिर अगिनी। ऽसय समाप ऱखे ररपिदिनी॥
चले सबेग ऱमि तेऽह क़ल़। धार धरम धिर दानदय़ल़॥1॥
भ़ि़थग:-गिरु क़ अगमन सिनकर शाल के समिर श्रा ऱमचन्द्रजा
ने सात़जा के प़स शत्रिघ्नजा को रख ददय़ और िे परम धार,
धमगधिरंधर, दानदय़लि श्रा ऱमचन्द्रजा ईसा समय िेग के स़थ
चल पडे॥1॥
* गिरऽह देऽख स़निज ऄनिऱगे। दंड प्रऩम करन प्रभि ल़गे॥
मिऽनबर ध़आ ऽलए ईर ल़इ। प्रेम ईमऽग भेंटे दोई भ़इ॥2॥

भ़ि़थग:-गिरुजा के दशगन करके लक्ष्मणजा सऽहत प्रभि श्रा
ऱमचन्द्रजा प्रेम में भर गए और दण्डित प्रण़म करने लगे।
मिऽनश्रेष्ठ िऽशष्ठजा ने दौडकर ईन्द्हें हृदय से लग़ ऽलय़ और प्रेम
में ईमूँगकर िे दोनों भ़आयों से ऽमले॥2॥
* प्रेम पिलदक के िट कऽह ऩमी। कीन्द्ह दीरर तें दंड प्रऩमी॥
ऱम सख़ ररऽष बरबस भेंट़। जनि मऽह लिठत सनेह समेट़॥3॥
भ़ि़थग:-दफर प्रेम से पिलदकत होकर के िट (ऽनष़दऱज) ने ऄपऩ
ऩम लेकर दीर से हा िऽशष्ठजा को दण्डित प्रण़म दकय़। ऊऽष
िऽशष्ठजा ने ऱमसख़ ज़नकर ईसको जबदगसता हृदय से लग़
ऽलय़। म़नो जमान पर लोटते हुए प्रेम को समेट ऽलय़ हो॥3॥
* रघिपऽत भगऽत सिमंगल मील़। नभ सऱऽह सिर बररसवह फी ल़॥
एऽह सम ऽनपट नाच कोई ऩहीं। बड बऽसष्ठ सम को जग
म़हीं॥4॥
भ़ि़थग:-श्रा रघिऩथजा की भऽक्त सिद
ं र मंगलों क़ मील है, आस
प्रक़र कहकर सऱहऩ करते हुए देित़ अक़श से फी ल बरस़ने
लगे। िे कहने लगे- जगत में आसके सम़न सिगथ़ नाच कोइ नहीं
और िऽशष्ठजा के सम़न बड़ कौन है?॥4॥
दोह़ :
* जेऽह लऽख लखनहु तें ऄऽधक ऽमले मिददत मिऽनऱई।

सो सात़पऽत भजन को प्रगट प्रत़प प्रभ़ई॥243॥
भ़ि़थग:-ऽजस (ऽनष़द) को देखकर मिऽनऱज िऽशष्ठजा लक्ष्मणजा
से भा ऄऽधक ईससे अनंददत होकर ऽमले। यह सब सात़पऽत श्रा
ऱमचन्द्रजा के भजन क़ प्रत्यक्ष प्रत़प और प्रभ़ि है॥243॥
चौप़इ :
* अरत लोग ऱम सबि ज़ऩ। करुऩकर सिज़न भगि़ऩ॥
जो जेऽह भ़यूँ रह़ ऄऽभल़षा। तेऽह तेऽह कै तऽस तऽस रुख
ऱखा॥1॥
भ़ि़थग:-दय़ की ख़न, सिज़न भगि़न श्रा ऱमजा ने सब लोगों
को दिःखा (ऽमलने के ऽलए व्य़कि ल) ज़ऩ। तब जो ऽजस भ़ि से
ऽमलने क़ ऄऽभल़षा थ़, ईस-ईस क़ ईस-ईस प्रक़र क़ रुख
रखते हुए (ईसकी रुऽच के ऄनिस़र)॥1॥
* स़निज ऽमऽल पल महुूँ सब क़ह। कीन्द्ह दीरर दिखि द़रुन द़ह॥
यह बऽड ब़त ऱम कै ऩहीं। ऽजऽम घट कोरट एक रऽब
छ़हीं॥2॥
भ़ि़थग:-ईन्द्होंने लक्ष्मणजा सऽहत पल भर में सब दकसा से
ऽमलकर ईनके दिःख और करठन संत़प को दीर कर ददय़। श्रा
ऱमचन्द्रजा के ऽलए यह कोइ बडा ब़त नहीं है। जैसे करोडों

घडों में एक हा सीयग की (पुथक-पुथक) छ़य़ (प्रऽतऽबम्ब) एक
स़थ हा ददखता है॥2॥
* ऽमऽल के िटऽह ईमऽग ऄनिऱग़। पिरजन सकल सऱहवह भ़ग़॥
देखीं ऱम दिऽखत महत़रीं। जनि सिबेऽल ऄिलीं ऽहम म़रीं॥3॥
भ़ि़थग:-समसत पिरि़सा प्रेम में ईमूँगकर के िट से ऽमलकर
(ईसके ) भ़ग्य की सऱहऩ करते हैं। श्रा ऱमचन्द्रजा ने सब
म़त़ओं को दिःखा देख़। म़नो सिंदर लत़ओं की पंऽक्तयों को
प़ल़ म़र गय़ हो॥3॥
*प्रथम ऱम भेंटा कै के इ। सरल सिभ़यूँ भगऽत मऽत भेइ॥
पग परर कीन्द्ह प्रबोधि बहोरा। क़ल करम ऽबऽध ऽसर धरर
खोरा॥4॥
भ़ि़थग:-सबसे पहले ऱमजा कै के या से ऽमले और ऄपने सरल
सिभ़ि तथ़ भऽक्त से ईसकी बिऽि को तर कर ददय़। दफर
चरणों में ऽगरकर क़ल, कमग और ऽिध़त़ के ऽसर दोष मढ़कर,
श्रा ऱमजा ने ईनको स़न्द्त्िऩ दा॥4॥
दोह़ :
* भेटीं रघिबर म़ति सब करर प्रबोधि पररतोषि।
ऄंब इस अधान जगि क़हु न देआऄ दोषि॥244॥

भ़ि़थग:-दफर श्रा रघिऩथजा सब म़त़ओं से ऽमले। ईन्द्होंने सबको
समझ़-बिझ़कर संतोष कऱय़ दक हे म़त़! जगत इश्वर के
ऄधान है। दकसा को भा दोष नहीं देऩ च़ऽहए॥244॥
* गिरऽतय पद बंदे दिहु भ़ईं। सऽहत ऽबप्रऽतय जे सूँग अईं॥
गंग गौररसम सब सनम़नीं। देवह ऄसास मिददत मुद ि ब़नीं॥1॥
भ़ि़थग:-दफर दोनों भ़आयों ने ब्ऱह्मणों की ऽस्त्रयों सऽहत- जो
भरतजा के स़थ अइ थीं, गिरुजा की पत्ना ऄरुं