1

2

श्रीरामचररतमानस
ककष्ककधाकाांड
मांगलाचरण
श्लोक :
* कु न्देन्दीवरसुन्दरावततबलौ तवज्ञानधामावुभौ
शोभाढ्यौ वरधतन्वनौ श्रुततनुतौ गोतवप्रवृन्दतप्रयौ।
मायामानुषरूतिणौ रघुवरौ सद्धममवमौ तहतौ
सीतान्वेषणतत्िरौ ितथगतौ भतिप्रदौ तौ तह नः ॥1॥
भावाथम:-कु न्दिुकि और नीलकमल के समान सुांदर गौर एवां श्यामवणम,
अत्यांत बलवान्, तवज्ञान के धाम, शोभा सांिन्न, श्रेष्ठ धनुधमर, वेदों के
द्वारा वतन्दत, गौ एवां ब्राह्मणों के समूह के तप्रय (अथवा प्रेमी), माया से
मनुकय रूि धारण ककए हुए, श्रेष्ठ धमम के तलए कवचस्वरूि, सबके
तहतकारी, श्री सीताजी की खोज में लगे हुए, ितथक रूि रघुकुल के श्रेष्ठ
श्री रामजी और श्री लक्ष्मणजी दोनों भाई तनश्चय ही हमें भतिप्रद हों
॥1॥
* ब्रह्माम्भोतधसमुद्भवां कतलमलप्रध्वांसनां चाव्ययां

3

श्रीमच्छम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरे सांशोतभतां सवमदा।
सांसारामयभेषजां सुखकरां श्रीजानकीजीवनां
धन्यास्ते कृ ततनः तिबतन्त सततां श्रीरामनामामृतम्॥2॥
भावाथम:-वे सुकृती (िुण्यात्मा िुरुष) धन्य हैं जो वेद रूिी समुद्र (के
मथने) से उत्िन्न हुए कतलयुग के मल को सवमथा नष्ट कर देने वाले,
अतवनाशी, भगवान श्री शांभु के सुांदर एवां श्रेष्ठ मुख रूिी चांद्रमा में सदा
शोभायमान, जन्म-मरण रूिी रोग के औषध, सबको सुख देने वाले और
श्री जानकीजी के जीवनस्वरूि श्री राम नाम रूिी अमृत का तनरां तर
िान करते रहते हैं॥2॥
सोरठा :
मुति जन्म मतह जातन ग्यान खान अघ हातन कर।
जहँ बस सांभु भवातन सो कासी सेइअ कस न ॥
भावाथम:-जहाँ श्री तशव-िावमती बसते हैं, उस काशी को मुति की
जन्मभूतम, ज्ञान की खान और िािों का नाश करने वाली जानकर
उसका सेवन क्यों न ककया जाए?
* जरत सकल सुर बृांद तबषम गरल जेष्ह िान ककय।
तेतह न भजतस मन मांद को कृ िाल सांकर सररस॥

4

भावाथम:-तजस भीषण हलाहल तवष से सब देवतागण जल रहे थे उसको
तजन्होंने स्वयां िान कर तलया, रे मन्द मन! तू उन शांकरजी को क्यों नहीं
भजता? उनके समान कृ िालु (और) कौन है?

श्री रामजी से हनुमानजी का तमलना और श्री राम-सुग्रीव की तमत्रता
चौिाई :
* आगें चले बहुरर रघुराया। ररकयमूक िबमत तनअराया॥
तहँ रह सतचव सतहत सुग्रीवा। आवत देतख अतुल बल सींवा॥1॥
भावाथम:-श्री रघुनाथजी किर आगे चले। ऋकयमूक िवमत तनकट आ गया।
वहाँ (ऋकयमूक िवमत िर) मांतत्रयों सतहत सुग्रीव रहते थे। अतुलनीय बल
की सीमा श्री रामचांद्रजी और लक्ष्मणजी को आते देखकर-॥1॥
* अतत सभीत कह सुनु हनुमाना। िुरुष जुगल बल रूि तनधाना॥
धरर बटु रूि देखु तैं जाई। कहेसु जातन तजयँ सयन बुझाई॥2॥
भावाथम:-सुग्रीव अत्यांत भयभीत होकर बोले- हे हनुमान्! सुनो, ये दोनों
िुरुष बल और रूि के तनधान हैं। तुम ब्रह्मचारी का रूि धारण करके

5

जाकर देखो। अिने हृदय में उनकी यथाथम बात जानकर मुझे इशारे से
समझाकर कह देना॥2॥
* िठए बातल होष्ह मन मैला। भागौं तुरत तजौं यह सैला॥
तबप्र रूि धरर कति तहँ गयऊ। माथ नाइ िूछत अस भयऊ॥3॥
भावाथम:-यकद वे मन के मतलन बातल के भेजे हुए हों तो मैं तुरांत ही इस
िवमत को छोड़कर भाग जाऊँ (यह सुनकर) हनुमान्जी ब्राह्मण का रूि
धरकर वहाँ गए और मस्तक नवाकर इस प्रकार िूछने लगे-॥3॥
* को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा। छत्री रूि किरहु बन बीरा ॥
करठन भूतम कोमल िद गामी। कवन हेतु तबचरहु बन स्वामी॥4॥
भावाथम:-हे वीर! साँवले और गोरे शरीर वाले आि कौन हैं, जो क्षतत्रय
के रूि में वन में किर रहे हैं? हे स्वामी! कठोर भूतम िर कोमल चरणों
से चलने वाले आि ककस कारण वन में तवचर रहे हैं?॥4॥
* मृदल
ु मनोहर सुांदर गाता। सहत दुसह बन आति बाता ॥
की तुम्ह तीतन देव महँ कोऊ। नर नारायन की तुम्ह दोऊ॥5॥
भावाथम:-मन को हरण करने वाले आिके सुांदर, कोमल अांग हैं और आि
वन के दुःसह धूि और वायु को सह रहे हैं क्या आि ब्रह्मा, तवकणु, महेशइन तीन देवताओं में से कोई हैं या आि दोनों नर और नारायण हैं॥5॥

6

दोहा :
* जग कारन तारन भव भांजन धरनी भार।
की तुम्ह अतखल भुवन ितत लीन्ह मनुज अवतार॥1॥
भावाथम:-अथवा आि जगत् के मूल कारण और सांिूणम लोकों के स्वामी
स्वयां भगवान् हैं, तजन्होंने लोगों को भवसागर से िार उतारने तथा
िृथ्वी का भार नष्ट करने के तलए मनुकय रूि में अवतार तलया है?॥1॥
चौिाई :
* कोसलेस दसरथ के जाए। हम तितु बचन मातन बन आए॥
नाम राम लतछमन दोउ भाई। सांग नारर सुकुमारर सुहाई॥1॥
भावाथम:-(श्री रामचांद्रजी ने कहा-) हम कोसलराज दशरथजी के िुत्र हैं
और तिता का वचन मानकर वन आए हैं। हमारे राम-लक्ष्मण नाम हैं,
हम दोनों भाई हैं। हमारे साथ सुांदर सुकुमारी स्त्री थी॥1॥
* इहाँ हरी तनतसचर बैदह
े ी। तबप्र किरष्ह हम खोजत तेही॥
आिन चररत कहा हम गाई। कहहु तबप्र तनज कथा बुझाई॥2॥
भावाथम:-यहाँ (वन में) राक्षस ने (मेरी ित्नी) जानकी को हर तलया। हे
ब्राह्मण! हम उसे ही खोजते किरते हैं। हमने तो अिना चररत्र कह
सुनाया। अब हे ब्राह्मण! अिनी कथा समझाकर कतहए ॥2॥

7

* प्रभु ितहचातन िरे उ गतह चरना। सो सुख उमा जाइ नष्ह बरना॥
िुलककत तन मुख आव न बचना। देखत रुतचर बेष कै रचना॥3॥
भावाथम:-प्रभु को िहचानकर हनुमान्जी उनके चरण िकड़कर िृथ्वी िर
तगर िड़े (उन्होंने साष्टाांग दांडवत् प्रणाम ककया)। (तशवजी कहते हैं-) हे
िावमती! वह सुख वणमन नहीं ककया जा सकता। शरीर िुलककत है, मुख से
वचन नहीं तनकलता। वे प्रभु के सुांदर वेष की रचना देख रहे हैं!॥3॥
* िुतन धीरजु धरर अस्तुतत कीन्ही। हरष हृदयँ तनज नाथतह चीन्ही॥
मोर न्याउ मैं िूछा सा। । तुम्ह िूछहु कस नर की ना। ॥4॥
भावाथम:-किर धीरज धर कर स्तुतत की। अिने नाथ को िहचान लेने से
हृदय में हषम हो रहा है। (किर हनुमान्जी ने कहा-) हे स्वामी! मैंने जो
िूछा वह मेरा िूछना तो न्याय था, (वषों के बाद आिको देखा, वह भी
तिस्वी के वेष में और मेरी वानरी बुतद्ध इससे मैं तो आिको िहचान न
सका और अिनी िररतस्थतत के अनुसार मैंने आिसे िूछा), िरां तु आि
मनुकय की तरह कै से िूछ रहे हैं?॥4॥
* तव माया बस किरउँ भुलाना। ताते मैं नष्ह प्रभु ितहचाना॥5॥
भावाथम:-मैं तो आिकी माया के वश भूला किरता हँ इसी से मैंने अिने
स्वामी (आि) को नहीं िहचाना ॥5॥
दोहा :

8

*एकु मैं मांद मोहबस कु रटल हृदय अग्यान।
िुतन प्रभु मोतह तबसारे उ दीनबांधु भगवान॥2॥
भावाथम:-एक तो मैं यों ही मांद हँ, दूसरे मोह के वश में हँ, तीसरे हृदय
का कु रटल और अज्ञान हँ, किर हे दीनबांधु भगवान्! प्रभु (आि) ने भी
मुझे भुला कदया!॥2॥
चौिाई :
* जदति नाथ बहु अवगुन मोरें । सेवक प्रभुतह िरै जतन भोरें ॥
नाथ जीव तव मायाँ मोहा। सो तनस्तरइ तुम्हारे ष्ह छोहा॥1॥
भावाथम:-एहे नाथ! यद्यति मुझ में बहुत से अवगुण हैं, तथाति सेवक
स्वामी की तवस्मृतत में न िड़े (आि उसे न भूल जाएँ)। हे नाथ! जीव
आिकी माया से मोतहत है। वह आि ही की कृ िा से तनस्तार िा सकता
है॥1॥
* ता िर मैं रघुबीर दोहाई। जानउँ नष्ह कछु भजन उिाई॥
सेवक सुत ितत मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु िोसें॥2॥
भावाथम:-उस िर हे रघुवीर! मैं आिकी दुहाई (शिथ) करके कहता हँ कक
मैं भजन-साधन कु छ नहीं जानता। सेवक स्वामी के और िुत्र माता के
भरोसे तनष्श्चत रहता है। प्रभु को सेवक का िालन-िोषण करते ही
बनता है (करना ही िड़ता है)॥2॥

9

* अस कतह िरे उ चरन अकु लाई। तनज तनु प्रगरट प्रीतत उर छाई॥
तब रघुितत उठाई उर लावा। तनज लोचन जल सींतच जुड़ावा॥3॥
भावाथम:-ऐसा कहकर हनुमान्जी अकु लाकर प्रभु के चरणों िर तगर िड़े,
उन्होंने अिना असली शरीर प्रकट कर कदया। उनके हृदय में प्रेम छा
गया। तब श्री रघुनाथजी ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा तलया और अिने
नेत्रों के जल से सींचकर शीतल ककया॥3॥
* सुनु कति तजयँ मानतस जतन ऊना। तैं मम तप्रय लतछमन ते दूना॥
समदरसी मोतह कह सब कोऊ। सेवक तप्रय अनन्य गतत सोऊ॥4॥
भावाथम:-(किर कहा-) हे कति! सुनो, मन में ग्लातन मत मानना (मन
छोटा न करना)। तुम मुझे लक्ष्मण से भी दूने तप्रय हो। सब कोई मुझे
समदशी कहते हैं (मेरे तलए न कोई तप्रय है न अतप्रय) िर मुझको सेवक
तप्रय है, क्योंकक वह अनन्यगतत होता है (मुझे छोड़कर उसको कोई
दूसरा सहारा नहीं होता)॥4॥
दोहा :
* सो अनन्य जाकें अतस मतत न टरइ हनुमांत।
मैं सेवक सचराचर रूि स्वातम भगवांत॥3॥

10

भावाथम:-और हे हनुमान्! अनन्य वही है तजसकी ऐसी बुतद्ध कभी नहीं
टलती कक मैं सेवक हँ और यह चराचर (जड़-चेतन) जगत् मेरे स्वामी
भगवान् का रूि है॥3॥
चौिाई :
* देतख िवनसुत ितत अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला॥
नाथ सैल िर कतिितत रहई। सो सुग्रीव दास तव अहई॥1॥
भावाथम:-स्वामी को अनुकूल (प्रसन्न) देखकर िवन कु मार हनुमान्जी के
हृदय में हषम छा गया और उनके सब दुःख जाते रहे। (उन्होंने कहा-) हे
नाथ! इस िवमत िर वानरराज सुग्रीव रहते हैं, वह आिका दास है॥1॥
* तेतह सन नाथ मयत्री कीजे। दीन जातन तेतह अभय करीजे॥
सो सीता कर खोज कराइतह। जहँ तहँ मरकट कोरट िठाइतह॥2॥
भावाथम:-हे नाथ! उससे तमत्रता कीतजए और उसे दीन जानकर तनभमय
कर दीतजए। वह सीताजी की खोज करवाएगा और जहाँ-तहाँ करोड़ों
वानरों को भेजेगा॥2॥
* एतह तबतध सकल कथा समुझाई। तलए दुऔ जन िीरठ चढाई॥
जब सुग्रीवँ राम कहुँ देखा। अततसय जन्म धन्य करर लेखा॥3॥

11

भावाथम:-इस प्रकार सब बातें समझाकर हनुमान्जी ने (श्री राम-लक्ष्मण)
दोनों जनों को िीठ िर चढा तलया। जब सुग्रीव ने श्री रामचांद्रजी को
देखा तो अिने जन्म को अत्यांत धन्य समझा॥3॥
* सादर तमलेउ नाइ िद माथा। भेंटेउ अनुज सतहत रघुनाथा॥
कति कर मन तबचार एतह रीती। कररहष्ह तबतध मो सन ए प्रीती॥4॥
भावाथम:-सुग्रीव चरणों में मस्तक नवाकर आदर सतहत तमले। श्री
रघुनाथजी भी छोटे भाई सतहत उनसे गले लगकर तमले। सुग्रीव मन में
इस प्रकार सोच रहे हैं कक हे तवधाता! क्या ये मुझसे प्रीतत करें गे?॥4॥

सुग्रीव का दुःख सुनाना, बातल वध की प्रततज्ञा, श्री रामजी का तमत्र
लक्षण वणमन
दोहा :
* तब हनुमांत उभय कदतस की सब कथा सुनाइ।
िावक साखी देइ करर जोरी प्रीतत दृढाइ॥4॥
भावाथम:-तब हनुमान्जी ने दोनों ओर की सब कथा सुनाकर अति को
साक्षी देकर िरस्िर दृढ करके प्रीतत जोड़ दी (अथामत् अति की साक्षी
देकर प्रततज्ञािूवमक उनकी मैत्री करवा दी)॥4॥
चौिाई :

12

* कीतन्ह प्रीतत कछु बीच न राखा। लतछमन राम चररत् सब भाषा॥
कह सुग्रीव नयन भरर बारी। तमतलतह नाथ तमतथलेसकु मारी॥1॥
भावाथम:-दोनों ने (हृदय से) प्रीतत की, कु छ भी अांतर नहीं रखा। तब
लक्ष्मणजी ने श्री रामचांद्रजी का सारा इततहास कहा। सुग्रीव ने नेत्रों में
जल भरकर कहा- हे नाथ! तमतथलेशकु मारी जानकीजी तमल
जाएँगी॥1॥
* मांतत्रन्ह सतहत इहाँ एक बारा। बैठ रहेउँ मैं करत तबचारा॥
गगन िांथ देखी मैं जाता। िरबस िरी बहुत तबलिाता॥2॥
भावाथम:-मैं एक बार यहाँ मांतत्रयों के साथ बैठा हुआ कु छ तवचार कर
रहा था। तब मैंने िराए (शत्रु) के वश में िड़ी बहुत तवलाि करती हुई
सीताजी को आकाश मागम से जाते देखा था॥2॥
* राम राम हा राम िुकारी। हमतह देतख दीन्हेउ िट डारी॥
मागा राम तुरत तेष्ह दीन्हा। िट उर लाइ सोच अतत कीन्हा॥3॥
भावाथम:-हमें देखकर उन्होंने 'राम! राम! हा राम!' िुकारकर वस्त्र तगरा
कदया था। श्री रामजी ने उसे माँगा, तब सुग्रीव ने तुरांत ही दे कदया। वस्त्र
को हृदय से लगाकर रामचांद्रजी ने बहुत ही सोच ककया॥3॥
* कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। तजहु सोच मन आनहु धीरा॥

13

सब प्रकार कररहउँ सेवकाई। जेतह तबतध तमतलतह जानकी आई॥4॥
भावाथम:-सुग्रीव ने कहा- हे रघुवीर! सुतनए। सोच छोड़ दीतजए और मन
में धीरज लाइए। मैं सब प्रकार से आिकी सेवा करूँगा, तजस उिाय से
जानकीजी आकर आिको तमलें॥4॥
दोहा :
* सखा बचन सुतन हरषे कृ िाष्सधु बलसींव।
कारन कवन बसहु बन मोतह कहहु सुग्रीव॥5॥
भावाथम:-कृ िा के समुद्र और बल की सीमा श्री रामजी सखा सुग्रीव के
वचन सुनकर हर्षषत हुए। (और बोले-) हे सुग्रीव! मुझे बताओ, तुम वन
में ककस कारण रहते हो?॥5॥
चौिाई :
* नाथ बातल अरु मैं द्वौ भाइ। प्रीतत रही कछु बरतन न जाई॥
मयसुत मायावी तेतह नाऊँ। आवा सो प्रभु हमरें गाऊँ॥1॥
भावाथम:-(सुग्रीव ने कहा-) हे नाथ! बातल और मैं दो भाई हैं, हम दोनों
में ऐसी प्रीतत थी कक वणमन नहीं की जा सकती। हे प्रभो! मय दानव का
एक िुत्र था, उसका नाम मायावी था। एक बार वह हमारे गाँव में
आया॥1॥

14

* अधम रातत िुर द्वार िुकारा। बाली ररिु बल सहै न िारा॥
धावा बातल देतख सो भागा। मैं िुतन गयउँ बांधु सँग लागा॥2॥
भावाथम:-उसने आधी रात को नगर के िाटक िर आकर िुकारा
(ललकारा)। बातल शत्रु के बल (ललकार) को सह नहीं सका। वह दौड़ा,
उसे देखकर मायावी भागा। मैं भी भाई के सांग लगा चला गया॥2॥
* तगररबर गुहाँ िैठ सो जाई। तब बालीं मोतह कहा बुझाई॥
िररखेसु मोतह एक िखवारा। नष्ह आवौं तब जानेसु मारा॥3॥
भावाथम:-वह मायावी एक िवमत की गुिा में जा घुसा। तब बातल ने मुझे
समझाकर कहा- तुम एक िखवाड़े (िांद्रह कदन) तक मेरी बाट देखना।
यकद मैं उतने कदनों में न आऊँ तो जान लेना कक मैं मारा गया॥3॥
* मास कदवस तहँ रहेउँ खरारी। तनसरी रुतधर धार तहँ भारी॥
बातल हतेतस मोतह माररतह आई। तसला देइ तहँ चलेउँ िराई॥4॥
भावाथम:-हे खरारर! मैं वहाँ महीने भर तक रहा। वहाँ (उस गुिा में से)
रि की बड़ी भारी धारा तनकली। तब (मैंने समझा कक) उसने बातल को
मार डाला, अब आकर मुझे मारे गा, इसतलए मैं वहाँ (गुिा के द्वार िर)
एक तशला लगाकर भाग आया॥4॥
* मांतत्रन्ह िुर देखा तबनु सा। । दीन्हेउ मोतह राज बररआ। ॥

15

बाली तातह मारर गृह आवा। देतख मोतह तजयँ भेद बढावा॥5॥
भावाथम:-मांतत्रयों ने नगर को तबना स्वामी (राजा) का देखा, तो मुझको
जबदमस्ती राज्य दे कदया। बातल उसे मारकर घर आ गया। मुझे
(राजष्सहासन िर) देखकर उसने जी में भेद बढाया (बहुत ही तवरोध
माना)। (उसने समझा कक यह राज्य के लोभ से ही गुिा के द्वार िर
तशला दे आया था, तजससे मैं बाहर न तनकल सकूँ और यहाँ आकर राजा
बन बैठा)॥5॥
* ररिु सम मोतह मारे तस अतत भारी। हरर लीन्हतस सबमसु अरु नारी॥
ताकें भय रघुबीर कृ िाला सकल भुवन मैं किरे उँ तबहाला॥6॥
भावाथम:-उसने मुझे शत्रु के समान बहुत अतधक मारा और मेरा सवमस्व
तथा मेरी स्त्री को भी छीन तलया। हे कृ िालु रघुवीर! मैं उसके भय से
समस्त लोकों में बेहाल होकर किरता रहा॥6॥
* इहाँ साि बस आवत नाहीं। तदति सभीत रहउँ मन माहीं॥
सुन सेवक दुःख दीनदयाला िरकक उठीं द्वै भुजा तबसाला॥7॥
भावाथम:-वह शाि के कारण यहाँ नहीं आता, तो भी मैं मन में भयभीत
रहता हँ। सेवक का दुःख सुनकर दीनों िर दया करने वाले श्री
रघुनाथजी की दोनों तवशाल भुजाएँ िड़क उठीं॥7॥
दोहा :

16

* सुनु सुग्रीव माररहउँ बातलतह एकष्ह बान।
ब्रह्म रुद्र सरनागत गएँ न उबररष्ह प्रान॥6॥
भावाथम:-(उन्होंने कहा-) हे सुग्रीव! सुनो, मैं एक ही बाण से बातल को
मार डालूँगा। ब्रह्मा और रुद्र की शरण में जाने िर भी उसके प्राण न
बचेंगे॥6॥
चौिाई :
* जे न तमत्र दुख होष्ह दुखारी। ततन्हतह तबलोकत िातक भारी॥
तनज दुख तगरर सम रज करर जाना। तमत्रक दुख रज मेरु समाना॥1॥
भावाथम:-जो लोग तमत्र के दुःख से दुःखी नहीं होते, उन्हें देखने से ही
बड़ा िाि लगता है। अिने िवमत के समान दुःख को धूल के समान और
तमत्र के धूल के समान दुःख को सुमरु
े (बड़े भारी िवमत) के समान
जाने॥1॥
* तजन्ह कें अतस मतत सहज न आई। ते सठ कत हरठ करत तमताई॥
कु िथ तनवारर सुिथ
ां चलावा। गुन प्रगटै अवगुनतन्ह दुरावा॥2॥
भावाथम:-तजन्हें स्वभाव से ही ऐसी बुतद्ध प्राप्त नहीं है, वे मूखम हठ करके
क्यों ककसी से तमत्रता करते हैं? तमत्र का धमम है कक वह तमत्र को बुरे
मागम से रोककर अच्छे मागम िर चलावे। उसके गुण प्रकट करे और
अवगुणों को तछिावे॥2॥

17

* देत लेत मन सांक न धरई। बल अनुमान सदा तहत करई॥
तबितत काल कर सतगुन नेहा। श्रुतत कह सांत तमत्र गुन एहा॥3॥
भावाथम:-देने-लेने में मन में शांका न रखे। अिने बल के अनुसार सदा तहत
ही करता रहे। तविति के समय तो सदा सौगुना स्नेह करे । वेद कहते हैं
कक सांत (श्रेष्ठ) तमत्र के गुण (लक्षण) ये हैं॥3॥
* आगें कह मृद ु बचन बनाई। िाछें अनतहत मन कु रटलाई॥
जाकर त चत अतह गतत सम भाई। अस कु तमत्र िररहरे ष्ह भलाई॥4॥
भावाथम:-जो सामने तो बना-बनाकर कोमल वचन कहता है और िीठिीछे बुराई करता है तथा मन में कु रटलता रखता है- हे भाई! (इस तरह)
तजसका मन साँि की चाल के समान टेढा है, ऐसे कु तमत्र को तो त्यागने
में ही भलाई है॥4॥
* सेवक सठ नृि कृ िन कु नारी। किटी तमत्र सूल सम चारी॥
सखा सोच त्यागहु बल मोरें । सब तबतध घटब काज मैं तोरें ॥5॥
भावाथम:-मूखम सेवक, कां जूस राजा, कु लटा स्त्री और किटी तमत्र- ये चारों
शूल के समान िीड़ा देने वाले हैं। हे सखा! मेरे बल िर अब तुम ष्चता
छोड़ दो। मैं सब प्रकार से तुम्हारे काम आऊँगा (तुम्हारी सहायता
करूँगा)॥5॥

18

सुग्रीव का वैराग्य
* कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। बातल महाबल अतत रनधीरा॥
दुद
ां तु भ अतस्थ ताल देखराए। तबनु प्रयास रघुनाथ ढहाए॥6॥
भावाथम:-सुग्रीव ने कहा- हे रघुवीर! सुतनए, बातल महान् बलवान् और
अत्यांत रणधीर है। किर सुग्रीव ने श्री रामजी को दुद
ां तु भ राक्षस की
हतियाँ व ताल के वृक्ष कदखलाए। श्री रघुनाथजी ने उन्हें तबना ही
िररश्रम के (आसानी से) ढहा कदया।
* देतख अतमत बल बाढी प्रीती। बातल बधब इन्ह भइ िरतीती॥
बार-बार नावइ िद सीसा। प्रभुतह जातन मन हरष किीसा॥7॥
भावाथम:-श्री रामजी का अिररतमत बल देखकर सुग्रीव की प्रीतत बढ गई
और उन्हें तवश्वास हो गया कक ये बातल का वध अवश्य करें गे। वे बारबार चरणों में तसर नवाने लगे। प्रभु को िहचानकर सुग्रीव मन में हर्षषत
हो रहे थे॥7॥
* उिजा ग्यान बचन तब बोला। नाथ कृ िाँ मन भयउ अलोला॥
सुख सांितत िररवार बड़ाई। सब िररहरर कररहउँ सेवकाई॥8॥
भावाथम:-जब ज्ञान उत्िन्न हुआ तब वे ये वचन बोले कक हे नाथ! आिकी
कृ िा से अब मेरा मन तस्थर हो गया। सुख, सांिति, िररवार और बड़ाई
(बड़प्िन) सबको त्यागकर मैं आिकी सेवा ही करूँगा॥8॥

19

* ए सब राम भगतत के बाधक। कहष्ह सांत तव िद अवराधक॥
सत्रु तमत्र सुख, दुख जग माहीं। मायाकृ त िरमारथ नाहीं॥9॥
भावाथम:-क्योंकक आिके चरणों की आराधना करने वाले सांत कहते हैं कक
ये सब (सुख-सांिति आकद) राम भति के तवरोधी हैं। जगत् में तजतने भी
शत्रु-तमत्र और सुख-दुःख (आकद द्वांद्व) हैं, सब के सब मायारतचत हैं,
िरमाथमतः (वास्तव में) नहीं हैं॥9॥
* बातल िरम तहत जासु प्रसादा। तमलेहु राम तुम्ह समन तबषादा॥
सिनें जेतह सन होइ लराई। जागें समुझत मन सकु चाई॥10॥
भावाथम:-हे श्री रामजी! बातल तो मेरा िरम तहतकारी है, तजसकी कृ िा
से शोक का नाश करने वाले आि मुझे तमले और तजसके साथ अब स्वप्न
में भी लड़ाई हो तो जागने िर उसे समझकर मन में सांकोच होगा (कक
स्वप्न में भी मैं उससे क्यों लड़ा)॥10॥
* अब प्रभु कृ िा करहु एतह भाँतत। सब ततज भजनु करौं कदन राती॥
सुतन तबराग सांजुत कति बानी। बोले तबहँतस रामु धनुिानी॥11॥
भावाथम:-हे प्रभो अब तो इस प्रकार कृ िा कीतजए कक सब छोड़कर कदनरात मैं आिका भजन ही करूँ। सुग्रीव की वैराग्ययुि वाणी सुनकर
(उसके क्षतणक वैराग्य को देखकर) हाथ में धनुष धारण करने वाले श्री
रामजी मुस्कु राकर बोले- ॥11॥

20

* जो कछु कहेहु सत्य सब सोई। सखा बचन मम मृषा न होई॥
नट मरकट इव सबतह नचावत। रामु खगेस बेद अस गावत॥12॥
भावाथम:-तुमने जो कु छ कहा है, वह सभी सत्य है, िरां तु हे सखा! मेरा
वचन तमथ्या नहीं होता (अथामत् बातल मारा जाएगा और तुम्हें राज्य
तमलेगा)। (काकभुशुतण्डजी कहते हैं कक-) हे ितक्षयों के राजा गरुड़! नट
(मदारी) के बांदर की तरह श्री रामजी सबको नचाते हैं, वेद ऐसा कहते
हैं॥12॥
* लै सुग्रीव सांग रघुनाथा। चले चाि सायक गतह हाथा॥
तब रघुितत सुग्रीव िठावा। गजेतस जाइ तनकट बल िावा॥13॥
भावाथम:-तदनन्तर सुग्रीव को साथ लेकर और हाथों में धनुष-बाण
धारण करके श्री रघुनाथजी चले। तब श्री रघुनाथजी ने सुग्रीव को बातल
के िास भेजा। वह श्री रामजी का बल िाकर बातल के तनकट जाकर
गरजा॥13॥
* सुनत बातल क्रोधातुर धावा। गतह कर चरन नारर समुझावा॥
सुनु ितत तजन्हतह तमलेउ सुग्रीवा। ते द्वौ बांधु तेज बल सींवा॥14॥
भावाथम:-बातल सुनते ही क्रोध में भरकर वेग से दौड़ा। उसकी स्त्री तारा
ने चरण िकड़कर उसे समझाया कक हे नाथ! सुतनए, सुग्रीव तजनसे तमले
हैं वे दोनों भाई तेज और बल की सीमा हैं॥14॥

21

* कोसलेस सुत लतछमन रामा। कालहु जीतत सकष्ह सांग्रामा॥15॥
भावाथम:-वे कोसलाधीश दशरथजी के िुत्र राम और लक्ष्मण सांग्राम में
काल को भी जीत सकते हैं॥15॥

बातल-सुग्रीव युद्ध, बातल उद्धार, तारा का तवलाि
दोहा :
* कह बाली सुनु भीरु तप्रय समदरसी रघुनाथ।
जौं कदातच मोतह मारष्ह तौ िुतन होउँ सनाथ॥7॥
भावाथम:-बातल ने कहा- हे भीरु! (डरिोक) तप्रये! सुनो, श्री रघुनाथजी
समदशी हैं। जो कदातचत् वे मुझे मारें गे ही तो मैं सनाथ हो जाऊँगा
(िरमिद िा जाऊँगा)॥7॥
चौिाई :
* अस कतह चला महा अतभमानी। तृन समान सुग्रीवतह जानी॥
तभरे उभौ बाली अतत तजाम। मुरठका मारर महाधुतन गजाम॥1॥

22

भावाथम:-ऐसा कहकर वह महान् अतभमानी बातल सुग्रीव को ततनके के
समान जानकर चला। दोनों तभड़ गए। बातल ने सुग्रीव को बहुत
धमकाया और घूँसा मारकर बड़े जोर से गरजा॥1॥
* तब सुग्रीव तबकल होइ भागा। मुतष्ट प्रहार बज्र सम लागा॥
मैं जो कहा रघुबीर कृ िाला। बांधु न होइ मोर यह काला॥2॥
भावाथम:-तब सुग्रीव व्याकु ल होकर भागा। घूँसे की चोट उसे वज्र के
समान लगी (सुग्रीव ने आकर कहा-) हे कृ िालु रघुवीर! मैंने आिसे िहले
ही कहा था कक बातल मेरा भाई नहीं है, काल है॥2॥
* एक रूि तुम्ह भ्राता दोऊ तेतह भ्रम तें नष्ह मारे उँ सोऊ॥
कर िरसा सुग्रीव सरीरा। तनु भा कु तलस गई सब िीरा॥3॥
भावाथम:-(श्री रामजी ने कहा-) तुम दोनों भाइयों का एक सा ही रूि है।
इसी भ्रम से मैंने उसको नहीं मारा। किर श्री रामजी ने सुग्रीव के शरीर
को हाथ से स्िशम ककया, तजससे उसका शरीर वज्र के समान हो गया
और सारी िीड़ा जाती रही॥3॥
* मेली कां ठ सुमन कै माला। िठवा िुतन बल देइ तबसाला॥
िुतन नाना तबतध भई लराई। तबटि ओट देखष्ह रघुराई॥4॥

23

भावाथम:-तब श्री रामजी ने सुग्रीव के गले में िू लों की माला डाल दी
और किर उसे बड़ा भारी बल देकर भेजा। दोनों में िुनः अनेक प्रकार से
युद्ध हुआ। श्री रघुनाथजी वृक्ष की आड़ से देख रहे थे॥4॥
दोहा :
* बहु छल बल सुग्रीव कर तहयँ हारा भय मातन।
मारा बातल राम तब हृदय माझ सर तातन॥8॥
भावाथम:-सुग्रीव ने बहुत से छल-बल ककए, ककतु (अांत में) भय मानकर
हृदय से हार गया। तब श्री रामजी ने तानकर बातल के हृदय में बाण
मारा॥8॥
चौिाई :
* िरा तबकल मतह सर के लागें। िुतन उरठ बैठ देतख प्रभु आगे॥
स्याम गात तसर जटा बनाएँ। अरुन नयन सर चाि चढाएँ॥1॥
भावाथम:-बाण के लगते ही बातल व्याकु ल होकर िृथ्वी िर तगर िड़ा,
ककतु प्रभु श्री रामचांद्रजी को आगे देखकर वह किर उठ बैठा। भगवान् का
श्याम शरीर है, तसर िर जटा बनाए हैं, लाल नेत्र हैं, बाण तलए हैं और
धनुष चढाए हैं॥1॥
* िुतन िुतन तचतइ चरन तचत दीन्हा। सुिल जन्म माना प्रभु चीन्हा॥
हृदयँ प्रीतत मुख बचन कठोरा। बोला तचतइ राम की ओरा॥2॥

24

भावाथम:-बातल ने बार-बार भगवान् की ओर देखकर तचि को उनके
चरणों में लगा कदया। प्रभु को िहचानकर उसने अिना जन्म सिल
माना। उसके हृदय में प्रीतत थी, िर मुख में कठोर वचन थे। वह श्री
रामजी की ओर देखकर बोला- ॥2॥
* धमम हेतु अवतरे हु गोसा। । मारे हु मोतह ब्याध की ना। ॥
मैं बैरी सुग्रीव तिआरा। अवगुन कवन नाथ मोतह मारा॥3॥
भावाथम:-हे गोसा। । आिने धमम की रक्षा के तलए अवतार तलया है और
मुझे व्याध की तरह (तछिकर) मारा? मैं बैरी और सुग्रीव प्यारा? हे
नाथ! ककस दोष से आिने मुझे मारा?॥3॥
* अनुज बधू भतगनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी॥
इन्हतह कु दृतष्ट तबलोकइ जोई। तातह बधें कछु िाि न होई॥4॥
भावाथम:-(श्री रामजी ने कहा-) हे मूख!म सुन, छोटे भाई की स्त्री, बतहन,
िुत्र की स्त्री और कन्या- ये चारों समान हैं। इनको जो कोई बुरी दृतष्ट से
देखता है, उसे मारने में कु छ भी िाि नहीं होता॥4॥
* मूढ तोतह अततसय अतभमाना। नारर तसखावन करतस न काना॥
मम भुज बल आतश्रत तेतह जानी। मारा चहतस अधम अतभमानी॥5॥

25

भावाथम:-हे मूढ! तुझे अत्यांत अतभमान है। तूने अिनी स्त्री की सीख िर
भी कान (ध्यान) नहीं कदया। सुग्रीव को मेरी भुजाओं के बल का आतश्रत
जानकर भी अरे अधम अतभमानी! तूने उसको मारना चाहा॥5॥
दोहा :
* सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरर।
प्रभु अजहँ मैं िािी अांतकाल गतत तोरर॥9॥
भावाथम:-(बातल ने कहा-) हे श्री रामजी! सुतनए, स्वामी (आि) से मेरी
चतुराई नहीं चल सकती। हे प्रभो! अांतकाल में आिकी गतत (शरण)
िाकर मैं अब भी िािी ही रहा?॥9॥
चौिाई :
* सुनत राम अतत कोमल बानी। बातल सीस िरसेउ तनज िानी॥
अचल करौं तनु राखहु प्राना। बातल कहा सुनु कृ िातनधाना॥1॥
भावाथम:-बातल की अत्यांत कोमल वाणी सुनकर श्री रामजी ने उसके तसर
को अिने हाथ से स्िशम ककया (और कहा-) मैं तुम्हारे शरीर को अचल
कर दू,ँ तुम प्राणों को रखो। बातल ने कहा- हे कृ िातनधान! सुतनए॥1॥
* जन्म जन्म मुतन जतनु कराहीं। अांत राम कतह आवत नाहीं॥
जासु नाम बल सांकर कासी। देत सबतह सम गतत अतबनासी॥2॥

26

भावाथम:-मुतनगण जन्म-जन्म में (प्रत्येक जन्म में) (अनेकों प्रकार का)
साधन करते रहते हैं। किर भी अांतकाल में उन्हें 'राम' नहीं कह आता
(उनके मुख से राम नाम नहीं तनकलता)। तजनके नाम के बल से शांकरजी
काशी में सबको समान रूि से अतवनातशनी गतत (मुति) देते हैं॥2॥
* मम लोचन गोचर सोई आवा। बहुरर कक प्रभु अस बतनतह बनावा॥3॥
भावाथम:-वह श्री रामजी स्वयां मेरे नेत्रों के सामने आ गए हैं। हे प्रभो!
ऐसा सांयोग क्या किर कभी बन िड़ेगा॥3॥
छांद :
* सो नयन गोचर जासु गुन तनत नेतत कतह श्रुतत गावहीं।
तजतत िवन मन गो तनरस करर मुतन ध्यान कबहुँक िावहीं॥
मोतह जातन अतत अतभमान बस प्रभु कहेउ राखु सरीरही।
अस कवन सठ हरठ कारट सुरतरु बारर कररतह बबूरही॥1॥
भावाथम:-श्रुततयाँ 'नेतत-नेतत' कहकर तनरां तर तजनका गुणगान करती
रहती हैं तथा प्राण और मन को जीतकर एवां इां कद्रयों को (तवषयों के रस
से सवमथा) नीरस बनाकर मुतनगण ध्यान में तजनकी कभी क्वतचत् ही
झलक िाते हैं, वे ही प्रभु (आि) साक्षात् मेरे सामने प्रकट हैं। आिने मुझे
अत्यांत अतभमानवश जानकर यह कहा कक तुम शरीर रख लो, िरां तु
ऐसा मूखम कौन होगा जो हठिूवमक कल्िवृक्ष को काटकर उससे बबूर के

27

बाड़ लगाएगा (अथामत् िूणमकाम बना देने वाले आिको छोड़कर आिसे
इस नश्वर शरीर की रक्षा चाहेगा?)॥1॥
* अब नाथ करर करुना तबलोकहु देहु जो बर मागऊँ।
जेतह जोतन जन्मौं कमम बस तहँ राम िद अनुरागऊँ॥
यह तनय मम सम तबनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीतजये।
गतह बाँह सुर नर नाह आिन दास अांगद कीतजये॥2॥
भावाथम:-हे नाथ! अब मुझ िर दयादृतष्ट कीतजए और मैं जो वर माँगता
हँ उसे दीतजए। मैं कममवश तजस योतन में जन्म लूँ, वहीं श्री रामजी
(आि) के चरणों में प्रेम करूँ! हे कल्याणप्रद प्रभो! यह मेरा िुत्र अांगद
तवनय और बल में मेरे ही समान है, इसे स्वीकार कीतजए और हे देवता
और मनुकयों के नाथ! बाँह िकड़कर इसे अिना दास बनाइए ॥2॥
दोहा :
* राम चरन दृढ प्रीतत करर बातल कीन्ह तनु त्याग।
सुमन माल तजतम कां ठ ते तगरत न जानइ नाग॥10॥
भावाथम:-श्री रामजी के चरणों में दृढ प्रीतत करके बातल ने शरीर को वैसे
ही (आसानी से) त्याग कदया जैसे हाथी अिने गले से िू लों की माला का
तगरना न जाने॥10॥
चौिाई :

28

* राम बातल तनज धाम िठावा। नगर लोग सब व्याकु ल धावा॥
नाना तबतध तबलाि कर तारा। छू टे के स न देह सँभारा॥1॥
भावाथम:-श्री रामचांद्रजी ने बातल को अिने िरम धाम भेज कदया। नगर
के सब लोग व्याकु ल होकर दौड़े। बातल की स्त्री तारा अनेकों प्रकार से
तवलाि करने लगी। उसके बाल तबखरे हुए हैं और देह की सँभाल नहीं
है॥1॥

तारा को श्री रामजी द्वारा उिदेश और सुग्रीव का राज्यातभषेक तथा
अांगद को युवराज िद
* तारा तबकल देतख रघुराया। दीन्ह ग्यान हरर लीन्ही माया॥
तछतत जल िावक गगन समीरा। िांच रतचत अतत अधम सरीरा॥2॥
भावाथम:-तारा को व्याकु ल देखकर श्री रघुनाथजी ने उसे ज्ञान कदया और
उसकी माया (अज्ञान) हर ली। (उन्होंने कहा-) िृथ्वी, जल, अति,
आकाश और वायु- इन िाँच तत्वों से यह अत्यांत अधम शरीर रचा गया
है॥2॥
* प्रगट सो तनु तव आगे सोवा। जीव तनत्य के तह लतग तुम्ह रोवा॥
उिजा ग्यान चरन तब लागी। लीन्हेतस िरम भगतत बर मागी॥3॥

29

भावाथम:-वह शरीर तो प्रत्यक्ष तुम्हारे सामने सोया हुआ है, और जीव
तनत्य है। किर तुम ककसके तलए रो रही हो? जब ज्ञान उत्िन्न हो गया,
तब वह भगवान् के चरणों लगी और उसने िरम भति का वर माँग
तलया॥3॥
* उमा दारु जोतषत की ना। । सबतह नचावत रामु गोसा। ॥
तब सुग्रीवतह आयसु दीन्हा। मृतक कमम तबतधवत सब कीन्हा॥4॥
भावाथम:-(तशवजी कहते हैं-) हे उमा! स्वामी श्री रामजी सबको
कठिुतली की तरह नचाते हैं। तदनन्तर श्री रामजी ने सुग्रीव को आज्ञा
दी और सुग्रीव ने तवतधिूवमक बातल का सब मृतक कमम ककया॥4॥
* राम कहा अनुजतह समुझाई। राज देहु सुग्रीवतह जाई॥
रघुितत चरन नाइ करर माथा। चले सकल प्रेररत रघुनाथा॥5॥
भावाथम:-तब श्री रामचांद्रजी ने छोटे भाई लक्ष्मण को समझाकर कहा कक
तुम जाकर सुग्रीव को राज्य दे दो। श्री रघुनाथजी की प्रेरणा (आज्ञा) से
सब लोग श्री रघुनाथजी के चरणों में मस्तक नवाकर चले॥5॥
दोहा :
* लतछमन तुरत बोलाए िुरजन तबप्र समाज।
राजु दीन्ह सुग्रीव कहँ अांगद कहँ जुबराज॥11॥

30

भावाथम:-लक्ष्मणजी ने तुरांत ही सब नगरवातसयों को और ब्राह्मणों के
समाज को बुला तलया और (उनके सामने) सुग्रीव को राज्य और अांगद
को युवराज िद कदया॥11॥
चौिाई :
* उमा राम सम हत जग माहीं। गुरु तितु मातु बांधु प्रभु नाहीं॥
सुर नर मुतन सब कै यह रीती। स्वारथ लातग करष्ह सब प्रीतत॥1॥
भावाथम:-हे िावमती! जगत में श्री रामजी के समान तहत करने वाला गुरु,
तिता, माता, बांधु और स्वामी कोई नहीं है। देवता, मनुकय और मुतन
सबकी यह रीतत है कक स्वाथम के तलए ही सब प्रीतत करते हैं॥1॥
* बातल त्रास ब्याकु ल कदन राती। तन बहु ब्रन ष्चताँ जर छाती॥
सोइ सुग्रीव कीन्ह कति राऊ। अतत कृ िाल रघुबीर सुभाऊ॥2॥
भावाथम:-जो सुग्रीव कदन-रात बातल के भय से व्याकु ल रहता था, तजसके
शरीर में बहुत से घाव हो गए थे और तजसकी छाती ष्चता के मारे जला
करती थी, उसी सुग्रीव को उन्होंने वानरों का राजा बना कदया। श्री
रामचांद्रजी का स्वभाव अत्यांत ही कृ िालु है॥2॥
* जानतहँ अस प्रभु िररहरहीं। काहे न तबितत जाल नर िरहीं॥
िुतन सुग्रीवतह लीन्ह बोलाई। बहु प्रकार नृिनीतत तसखाई॥3॥

31

भावाथम:-जो लोग जानते हुए भी ऐसे प्रभु को त्याग देते हैं, वे क्यों न
तविति के जाल में िँ सें? किर श्री रामजी ने सुग्रीव को बुला तलया और
बहुत प्रकार से उन्हें राजनीतत की तशक्षा दी॥3॥
* कह प्रभु सुनु सुग्रीव हरीसा। िुर न जाउँ दस चारर बरीसा॥
गत ग्रीषम बरषा ररतु आई। रतहहउँ तनकट सैल िर छाई॥4॥
भावाथम:-किर प्रभु ने कहा- हे वानरितत सुग्रीव! सुनो, मैं चौदह वषम तक
गाँव (बस्ती) में नहीं जाऊँगा। ग्रीकमऋतु बीतकर वषामऋतु आ गई। अतः
मैं यहाँ िास ही िवमत िर रटक रहँगा॥4॥
* अांगद सतहत करहु तुम्ह राजू। सांतत हृदयँ धरे हु मम काजू॥
जब सुग्रीव भवन किरर आए। रामु प्रबरषन तगरर िर छाए॥5॥
भावाथम:-तुम अांगद सतहत राज्य करो। मेरे काम का हृदय में सदा ध्यान
रखना। तदनन्तर जब सुग्रीवजी घर लौट आए, तब श्री रामजी प्रवषमण
िवमत िर जा रटके ॥5॥

वषाम ऋतु वणमन
दोहा :
* प्रथमष्ह देवन्ह तगरर गुहा राखेउ रुतचर बनाइ।

32

राम कृ िातनतध कछु कदन बास करष्हगे आइ॥12॥
भावाथम:-देवताओं ने िहले से ही उस िवमत की एक गुिा को सुांदर बना
(सजा) रखा था। उन्होंने सोच रखा था कक कृ िा की खान श्री रामजी
कु छ कदन यहाँ आकर तनवास करें गे॥12॥
चौिाई :
* सुांदर बन कु सुतमत अतत सोभा। गुांजत मधुि तनकर मधु लोभा॥
कां द मूल िल ित्र सुहाए। भए बहुत जब ते प्रभु आए॥1॥
भावाथम:-सुांदर वन िू ला हुआ अत्यांत सुशोतभत है। मधु के लोभ से भौंरों
के समूह गुांजार कर रहे हैं। जब से प्रभु आए, तब से वन में सुांदर कन्द,
मूल, िल और ििों की बहुतायत हो गई॥1॥
* देतख मनोहर सैल अनूिा। रहे तहँ अनुज सतहत सुरभूिा॥
मधुकर खग मृग तनु धरर देवा। करष्ह तसद्ध मुतन प्रभु कै सेवा॥2॥
भावाथम:-मनोहर और अनुिम िवमत को देखकर देवताओं के सम्राट् श्री
रामजी छोटे भाई सतहत वहाँ रह गए। देवता, तसद्ध और मुतन भौंरों,
ितक्षयों और िशुओं के शरीर धारण करके प्रभु की सेवा करने लगे॥2॥
* मांगलरूि भयउ बन तब ते। कीन्ह तनवास रमाितत जब ते॥
िरटक तसला अतत सुभ्र सुहाई। सुख आसीन तहाँ द्वौ भाई॥3॥

33

भावाथम:-जब से रमाितत श्री रामजी ने वहाँ तनवास ककया तब से वन
मांगलस्वरूि हो गया। सुांदर स्िरटक मतण की एक अत्यांत उज्ज्वल तशला
है, उस िर दोनों भाई सुखिूवमक तवराजमान हैं॥3॥
* कहत अनुज सन कथा अनेका। भगतत तबरत नृिनीतत तबबेका॥
बरषा काल मेघ नभ छाए। गरजत लागत िरम सुहाए॥4॥
भावाथम:-श्री राम छोटे भाई लक्ष्मणजी से भति, वैराग्य, राजनीतत और
ज्ञान की अनेकों कथाएँ कहते हैं। वषामकाल में आकाश में छाए हुए बादल
गरजते हुए बहुत ही सुहावने लगते हैं॥4॥
दोहा :
* लतछमन देखु मोर गन नाचत बाररद िेतख।
गृही तबरतत रत हरष जस तबकनुभगत कहुँ देतख॥13॥
भावाथम:-(श्री रामजी कहने लगे-) हे लक्ष्मण! देखो, मोरों के झुांड बादलों
को देखकर नाच रहे हैं जैसे वैराग्य में अनुरि गृहस्थ ककसी तवकणुभि
को देखकर हर्षषत होते हैं॥13॥
चौिाई :
* घन घमांड नभ गरजत घोरा। तप्रया हीन डरित मन मोरा॥
दातमतन दमक रह नघन माहीं। खल कै प्रीतत जथा तथर नाहीं॥1॥

34

भावाथम:-आकाश में बादल घुमड़-घुमड़कर घोर गजमना कर रहे हैं, तप्रया
(सीताजी) के तबना मेरा मन डर रहा है। तबजली की चमक बादलों में
ठहरती नहीं, जैसे दुष्ट की प्रीतत तस्थर नहीं रहती॥1॥
* बरषष्ह जलद भूतम तनअराएँ। जथा नवष्ह बुध तबद्या िाएँ।
बूँद अघात सहष्ह तगरर कै से। खल के बचन सांत सह जैसें॥2॥
भावाथम:-बादल िृथ्वी के समीि आकर (नीचे उतरकर) बरस रहे हैं, जैसे
तवद्या िाकर तवद्वान् नम्र हो जाते हैं। बूँदों की चोट िवमत कै से सहते हैं,
जैसे दुष्टों के वचन सांत सहते हैं॥2॥
* छु द्र नदीं भरर चलीं तोराई। जस थोरे हुँ धन खल इतराई॥
भूतम िरत भा ढाबर िानी। जनु जीवतह माया लिटानी॥3॥
भावाथम:-छोटी नकदयाँ भरकर (ककनारों को) तुड़ाती हुई चलीं, जैसे थोड़े
धन से भी दुष्ट इतरा जाते हैं। (मयामदा का त्याग कर देते हैं)। िृथ्वी िर
िड़ते ही िानी गांदला हो गया है, जैसे शुद्ध जीव के माया तलिट गई
हो॥3॥
* सतमरट सतमरट जल भरष्ह तलावा। तजतम सदगुन सज्जन िष्ह आवा॥
सररता जल जलतनतध महुँ जोई। होइ अचल तजतम तजव हरर िाई॥4॥

35

भावाथम:-जल एकत्र हो-होकर तालाबों में भर रहा है, जैसे सद्गुण (एकएककर) सज्जन के िास चले आते हैं। नदी का जल समुद्र में जाकर वैसे
ही तस्थर हो जाता है, जैसे जीव श्री हरर को िाकर अचल (आवागमन से
मुि) हो जाता है॥4॥
दोहा :
* हररत भूतम तृन सांकुल समुतझ िरष्ह नष्ह िांथ।
तजतम िाखांड बाद तें गुप्त होष्ह सदग्रांथ॥14॥
भावाथम:-िृथ्वी घास से िररिूणम होकर हरी हो गई है, तजससे रास्ते
समझ नहीं िड़ते। जैसे िाखांड मत के प्रचार से सद्ग्रांथ गुप्त (लुप्त) हो जाते
हैं॥14॥
चौिाई :
* दादुर धुतन चहु कदसा सुहाई। बेद िढष्ह जनु बटु समुदाई॥
नव िल्लव भए तबटि अनेका। साधक मन जस तमलें तबबेका॥1॥
भावाथम:-चारों कदशाओं में मेंढकों की ध्वतन ऐसी सुहावनी लगती है,
मानो तवद्यार्षथयों के समुदाय वेद िढ रहे हों। अनेकों वृक्षों में नए ििे आ
गए हैं, तजससे वे ऐसे हरे -भरे एवां सुशोतभत हो गए हैं जैसे साधक का
मन तववेक (ज्ञान) प्राप्त होने िर हो जाता है॥1॥
* अकम जवास िात तबनु भयऊ। जस सुराज खल उद्यम गयऊ॥

36

खोजत कतहुँ तमलइ नष्ह धूरी। करइ क्रोध तजतम धरमतह दूरी॥2॥
भावाथम:-मदार और जवासा तबना ििे के हो गए (उनके ििे झड़ गए)।
जैसे श्रेष्ठ राज्य में दुष्टों का उद्यम जाता रहा (उनकी एक भी नहीं
चलती)। धूल कहीं खोजने िर भी नहीं तमलती, जैसे क्रोध धमम को दूर
कर देता है। (अथामत् क्रोध का आवेश होने िर धमम का ज्ञान नहीं रह
जाता)॥2॥
* सतस सांिन्न सोह मतह कै सी। उिकारी कै सांितत जैसी॥
तनतस तम घन खद्योत तबराजा। जनु दांतभन्ह कर तमला समाजा॥3॥
भावाथम:-अन्न से युि (लहराती हुई खेती से हरी-भरी) िृथ्वी कै सी
शोतभत हो रही है, जैसी उिकारी िुरुष की सांिति। रात के घने अांधकार
में जुगनू शोभा िा रहे हैं, मानो दतम्भयों का समाज आ जुटा हो॥3॥
* महाबृतष्ट चतल िू रट ककआरीं। तजतम सुतांत्र भएँ तबगरष्ह नारीं॥
कृ षी तनरावष्ह चतुर ककसाना। तजतम बुध तजष्ह मोह मद माना॥4॥
भावाथम:-भारी वषाम से खेतों की क्याररयाँ िू ट चली हैं, जैसे स्वतांत्र होने
से तस्त्रयाँ तबगड़ जाती हैं। चतुर ककसान खेतों को तनरा रहे हैं (उनमें से
घास आकद को तनकालकर िें क रहे हैं।) जैसे तवद्वान् लोग मोह, मद और
मान का त्याग कर देते हैं॥4॥
* देतखअत चक्रबाक खग नाहीं। कतलतह िाइ तजतम धमम िराहीं॥

37

ऊषर बरषइ तृन नष्ह जामा। तजतम हररजन तहयँ उिज न कामा॥5॥
भावाथम:-चक्रवाक िक्षी कदखाई नहीं दे रहे हैं, जैसे कतलयुग को िाकर
धमम भाग जाते हैं। ऊसर में वषाम होती है, िर वहाँ घास तक नहीं उगती।
जैसे हररभि के हृदय में काम नहीं उत्िन्न होता॥5॥
* तबतबध जांतु सांकुल मतह भ्राजा। प्रजा बाढ तजतम िाइ सुराजा॥
जहँ तहँ रहे ितथक थकक नाना। तजतम इां कद्रय गन उिजें ग्याना॥6॥
भावाथम:-िृथ्वी अनेक तरह के जीवों से भरी हुई उसी तरह शोभायमान
है, जैसे सुराज्य िाकर प्रजा की वृतद्ध होती है। जहाँ-तहाँ अनेक ितथक
थककर ठहरे हुए हैं, जैसे ज्ञान उत्िन्न होने िर इां कद्रयाँ (तशतथल होकर
तवषयों की ओर जाना छोड़ देती हैं)॥6॥
दोहा :
* कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ तबलाष्ह।
तजतम किूत के उिजें कु ल सद्धमम नसाष्ह॥15 क॥
भावाथम:-कभी-कभी वायु बड़े जोर से चलने लगती है, तजससे बादल
जहाँ-तहाँ गायब हो जाते हैं। जैसे कु िुत्र के उत्िन्न होने से कु ल के उिम
धमम (श्रेष्ठ आचरण) नष्ट हो जाते हैं॥15 (क)॥
* कबहु कदवस महँ तनतबड़ तम कबहुँक प्रगट ितांग।

38

तबनसइ उिजइ ग्यान तजतम िाइ कु सांग सुसांग॥15ख॥
भावाथम:-कभी (बादलों के कारण) कदन में घोर अांधकार छा जाता है और
कभी सूयम प्रकट हो जाते हैं। जैसे कु सांग िाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और
सुसांग िाकर उत्िन्न हो जाता है॥15 (ख)॥

शरद ऋतु वणमन
चौिाई :
* बरषा तबगत सरद ररतु आई। लछमन देखहु िरम सुहाई॥
िू लें कास सकल मतह छाई। जनु बरषाँ कृ त प्रगट बुढाई॥1॥
भावाथम:-हे लक्ष्मण! देखो, वषाम बीत गई और िरम सुांदर शरद् ऋतु आ
गई। िू ले हुए कास से सारी िृथ्वी छा गई। मानो वषाम ऋतु ने (कास
रूिी सिे द बालों के रूि में) अिना बुढािा प्रकट ककया है॥1॥
* उकदत अगतस्त िांथ जल सोषा। तजतम लोभष्ह सोषइ सांतोषा॥
सररता सर तनममल जल सोहा। सांत हृदय जस गत मद मोहा॥2॥
भावाथम:-अगस्त्य के तारे ने उदय होकर मागम के जल को सोख तलया,
जैसे सांतोष लोभ को सोख लेता है। नकदयों और तालाबों का तनममल जल
ऐसी शोभा िा रहा है जैसे मद और मोह से रतहत सांतों का हृदय!॥2॥

39

* रस रस सूख सररत सर िानी। ममता त्याग करष्ह तजतम ग्यानी॥
जातन सरद ररतु खांजन आए। िाइ समय तजतम सुकृत सुहाए॥3॥
भावाथम:-नदी और तालाबों का जल धीरे -धीरे सूख रहा है। जैसे ज्ञानी
(तववेकी) िुरुष ममता का त्याग करते हैं। शरद ऋतु जानकर खांजन
िक्षी आ गए। जैसे समय िाकर सुांदर सुकृत आ सकते हैं। (िुण्य प्रकट हो
जाते हैं)॥3॥
* िांक न रे नु सोह अतस धरनी। नीतत तनिुन नृि कै जतस करनी॥
जल सांकोच तबकल भइँ मीना। अबुध कु टुांबी तजतम धनहीना॥4॥
भावाथम:-न कीचड़ है न धूल? इससे धरती (तनममल होकर) ऐसी शोभा दे
रही है जैसे नीतततनिुण राजा की करनी! जल के कम हो जाने से
मछतलयाँ व्याकु ल हो रही हैं, जैसे मूखम (तववेक शून्य) कु टु म्बी (गृहस्थ)
धन के तबना व्याकु ल होता है॥4॥
* तबनु घन तनममल सोह अकासा। हररजन इव िररहरर सब आसा॥
कहुँ कहुँ बृतष्ट सारदी थोरी। कोउ एक भाव भगतत तजतम मोरी॥5॥
भावाथम:-तबना बादलों का तनममल आकाश ऐसा शोतभत हो रहा है जैसे
भगवद्भि सब आशाओं को छोड़कर सुशोतभत होते हैं। कहीं-कहीं
(तवरले ही स्थानों में) शरद् ऋतु की थोड़ी-थोड़ी वषाम हो रही है। जैसे
कोई तवरले ही मेरी भति िाते हैं॥5॥

40

दोहा :
* चले हरतष ततज नगर नृि तािस बतनक तभखारर।
तजतम हररभगतत िाइ श्रम तजष्ह आश्रमी चारर॥16॥
भावाथम:-(शरद् ऋतु िाकर) राजा, तिस्वी, व्यािारी और तभखारी
(क्रमशः तवजय, ति, व्यािार और तभक्षा के तलए) हर्षषत होकर नगर
छोड़कर चले। जैसे श्री हरर की भति िाकर चारों आश्रम वाले (नाना
प्रकार के साधन रूिी) श्रमों को त्याग देते हैं॥16॥
चौिाई :
* सुखी मीन जे नीर अगाधा। तजतम हरर सरन न एकऊ बाधा॥
िू लें कमल सोह सर कै सा। तनगुमन ब्रह्म सगुन भएँ जैसा॥1॥
भावाथम:-जो मछतलयाँ अथाह जल में हैं, वे सुखी हैं, जैसे श्री हरर के
शरण में चले जाने िर एक भी बाधा नहीं रहती। कमलों के िू लने से
तालाब कै सी शोभा दे रहा है, जैसे तनगुमण ब्रह्म सगुण होने िर शोतभत
होता है॥1॥
* गुांजत मधुकर मुखर अनूिा। सुांदर खग रव नाना रूिा॥
चक्रबाक मन दुख तनतस िेखी। तजतम दुजमन िर सांितत देखी॥2॥

41

भावाथम:-भौंरे अनुिम शब्द करते हुए गूँज रहे हैं तथा ितक्षयों के नाना
प्रकार के सुांदर शब्द हो रहे हैं। रातत्र देखकर चकवे के मन में वैसे ही
दुःख हो रहा है, जैसे दूसरे की सांिति देखकर दुष्ट को होता है॥2॥
* चातक रटत तृषा अतत ओही। तजतम सुख लहइ न सांकर द्रोही॥
सरदाति तनतस सतस अिहरई। सांत दरस तजतम िातक टरई॥3॥
भावाथम:-ििीहा रट लगाए है, उसको बड़ी प्यास है, जैसे श्री शांकरजी
का द्रोही सुख नहीं िाता (सुख के तलए झीखता रहता है) शरद् ऋतु के
ताि को रात के समय चांद्रमा हर लेता है, जैसे सांतों के दशमन से िाि दूर
हो जाते हैं॥3॥
* देतख इां द ु चकोर समुदाई। तचतवष्ह तजतम हररजन हरर िाई॥
मसक दांस बीते तहम त्रासा। तजतम तद्वज द्रोह ककएँ कु ल नासा॥4॥
भावाथम:-चकोरों के समुदाय चांद्रमा को देखकर इस प्रकार टकटकी
लगाए हैं जैसे भगवद्भि भगवान् को िाकर उनके (तनर्षनमेष नेत्रों से)
दशमन करते हैं। मच्छर और डाँस जाड़े के डर से इस प्रकार नष्ट हो गए
जैसे ब्राह्मण के साथ वैर करने से कु ल का नाश हो जाता है॥4॥
दोहा :
* भूतम जीव सांकुल रहे गए सरद ररतु िाइ।
सदगुर तमलें जाष्ह तजतम सांसय भ्रम समुदाइ॥17॥

42

भावाथम:-(वषाम ऋतु के कारण) िृथ्वी िर जो जीव भर गए थे, वे शरद्
ऋतु को िाकर वैसे ही नष्ट हो गए जैसे सद्गुरु के तमल जाने िर सांदह

और भ्रम के समूह नष्ट हो जाते हैं॥17॥

श्री राम की सुग्रीव िर नाराजी, लक्ष्मणजी का कोि
चौिाई :
* बरषा गत तनममल ररतु आई। सुतध न तात सीता कै िाई॥
एक बार कै सेहुँ सुतध जानौं। कालुह जीतत तनतमष महुँ आनौं॥1॥
भावाथम:-वषाम बीत गई, तनममल शरद्ऋतु आ गई, िरां तु हे तात! सीता
की कोई खबर नहीं तमली। एक बार कै से भी िता िाऊँ तो काल को भी
जीतकर िल भर में जानकी को ले आऊँ॥1॥
* कतहुँ रहउ जौं जीवतत होई। तात जतन करर आनउँ सोई॥
सुग्रीवहुँ सुतध मोरर तबसारी। िावा राज कोस िुर नारी॥2॥
भावाथम:-कहीं भी रहे, यकद जीती होगी तो हे तात! यत्न करके मैं उसे
अवश्य लाऊँगा। राज्य, खजाना, नगर और स्त्री िा गया, इसतलए सुग्रीव
ने भी मेरी सुध भुला दी॥2॥
* जेष्ह सायक मारा मैं बाली। तेष्ह सर हतौं मूढ कहँ काली॥

43

जासु कृ िाँ छू टष्ह मद मोहा। ता कहुँ उमा कक सिनेहुँ कोहा॥3॥
भावाथम:-तजस बाण से मैंने बातल को मारा था, उसी बाण से कल उस
मूढ को मारूँ! (तशवजी कहते हैं-) हे उमा! तजनकी कृ िा से मद और मोह
छू ट जाते हैं उनको कहीं स्वप्न में भी क्रोध हो सकता है? (यह तो लीला
मात्र है)॥3॥
* जानष्ह यह चररत्र मुतन ग्यानी। तजन्ह रघुबीर चरन रतत मानी॥
लतछमन क्रोधवांत प्रभु जाना। धनुष चढाई गहे कर बाना॥4॥
भावाथम:-ज्ञानी मुतन तजन्होंने श्री रघुनाथजी के चरणों में प्रीतत मान ली
है (जोड़ ली है), वे ही इस चररत्र (लीला रहस्य) को जानते हैं।
लक्ष्मणजी ने जब प्रभु को क्रोधयुि जाना, तब उन्होंने धनुष चढाकर
बाण हाथ में ले तलए॥4॥
दोहा :
* तब अनुजतह समुझावा रघुितत करुना सींव।
भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव॥18॥
भावाथम:-तब दया की सीमा श्री रघुनाथजी ने छोटे भाई लक्ष्मणजी को
समझाया कक हे तात! सखा सुग्रीव को के वल भय कदखलाकर ले आओ
(उसे मारने की बात नहीं है)॥18॥
चौिाई :

44

* इहाँ िवनसुत हृदयँ तबचारा। राम काजु सुग्रीवँ तबसारा॥
तनकट जाइ चरनतन्ह तसरु नावा। चाररहु तबतध तेतह कतह समुझावा॥1॥
भावाथम:-यहाँ (ककतककन्धा नगरी में) िवनकु मार श्री हनुमान्जी ने
तवचार ककया कक सुग्रीव ने श्री रामजी के कायम को भुला कदया। उन्होंने
सुग्रीव के िास जाकर चरणों में तसर नवाया। (साम, दान, दांड, भेद)
चारों प्रकार की नीतत कहकर उन्हें समझाया॥1॥
* सुतन सुग्रीवँ िरम भय माना। तबषयँ मोर हरर लीन्हेउ ग्याना॥
अब मारुतसुत दूत समूहा। िठवहु जहँ तहँ बानर जूहा॥2॥
भावाथम:- हनुमान्जी के वचन सुनकर सुग्रीव ने बहुत ही भय माना।
(और कहा-) तवषयों ने मेरे ज्ञान को हर तलया। अब हे िवनसुत! जहाँतहाँ वानरों के यूथ रहते हैं, वहाँ दूतों के समूहों को भेजो॥2॥
* कहहु िाख महुँ आव न जोई। मोरें कर ता कर बध होई॥
तब हनुमांत बोलाए दूता। सब कर करर सनमान बहता॥3॥
भावाथम:-और कहला दो कक एक िखवाड़े में (िांद्रह कदनों में) जो न आ
जाएगा, उसका मेरे हाथों वध होगा। तब हनुमान्जी ने दूतों को बुलाया
और सबका बहुत सम्मान करके -॥3॥
* भय अरु प्रीतत नीतत देखराई। चले सकल चरनतन्ह तसर नाई॥

45

एतह अवसर लतछमन िुर आए। क्रोध देतख जहँ तहँ कति धाए॥4॥
भावाथम:-सबको भय, प्रीतत और नीतत कदखलाई। सब बांदर चरणों में
तसर नवाकर चले। इसी समय लक्ष्मणजी नगर में आए। उनका क्रोध
देखकर बांदर जहाँ-तहाँ भागे॥4॥
दोहा :
* धनुष चढाइ कहा तब जारर करउँ िुर छार।
ब्याकु ल नगर देतख तब आयउ बातलकु मार॥19॥
भावाथम:-तदनन्तर लक्ष्मणजी ने धनुष चढाकर कहा कक नगर को
जलाकर अभी राख कर दूग
ँ ा। तब नगरभर को व्याकु ल देखकर बातलिुत्र
अांगदजी उनके िास आए॥19॥
चौिाई :
* चर नाइ तसरु तबनती कीन्ही। लतछमन अभय बाँह तेतह दीन्ही॥
क्रोधवांत लतछमन सुतन काना। कह किीस अतत भयँ अकु लाना॥1॥
भावाथम:-अांगद ने उनके चरणों में तसर नवाकर तवनती की (क्षमा-याचना
की) तब लक्ष्मणजी ने उनको अभय बाँह दी (भुजा उठाकर कहा कक डरो
मत)। सुग्रीव ने अिने कानों से लक्ष्मणजी को क्रोधयुि सुनकर भय से
अत्यांत व्याकु ल होकर कहा-॥1॥
* सुनु हनुमांत सांग लै तारा। करर तबनती समुझाउ कु मारा॥

46

तारा सतहत जाइ हनुमाना। चरन बांकद प्रभु सुजस बखाना॥2॥
भावाथम:-हे हनुमान् सुनो, तुम तारा को साथ ले जाकर तवनती करके
राजकु मार को समझाओ (समझा-बुझाकर शाांत करो)। हनुमान्जी ने
तारा सतहत जाकर लक्ष्मणजी के चरणों की वांदना की और प्रभु के सुांदर
यश का बखान ककया॥2॥
* करर तबनती मांकदर लै आए। चरन िखारर िलँग बैठाए॥
तब किीस चरनतन्ह तसरु नावा। गतह भुज लतछमन कां ठ लगावा॥3॥
भावाथम:-वे तवनती करके उन्हें महल में ले आए तथा चरणों को धोकर
उन्हें िलँग िर बैठाया। तब वानरराज सुग्रीव ने उनके चरणों में तसर
नवाया और लक्ष्मणजी ने हाथ िकड़कर उनको गले से लगा तलया॥3॥
* नाथ तवषय सम मद कछु नाहीं। मुतन मन मोह करइ छन माहीं।
सुनत तबनीत बचन सुख िावा। लतछमन तेतह बहु तबतध समुझावा॥4॥
भावाथम:-(सुग्रीव ने कहा-) हे नाथ! तवषय के समान और कोई मद नहीं
है। यह मुतनयों के मन में भी क्षणमात्र में मोह उत्िन्न कर देता है (किर मैं
तो तवषयी जीव ही ठहरा)। सुग्रीव के तवनययुि वचन सुनकर
लक्ष्मणजी ने सुख िाया और उनको बहुत प्रकार से समझाया॥4॥
* िवन तनय सब कथा सुनाई। जेतह तबतध गए दूत समुदाई॥5॥

47

भावाथम:-तब िवनसुत हनुमान्जी ने तजस प्रकार सब कदशाओं में दूतों के
समूह गए थे वह सब हाल सुनाया॥5॥

सुग्रीव-राम सांवाद और सीताजी की खोज के तलए बांदरों का प्रस्थान
दोहा :
* हरतष चले सुग्रीव तब अांगदाकद कति साथ।
रामानुज आगें करर आए जहँ रघुनाथ॥20॥
भावाथम:-तब अांगद आकद वानरों को साथ लेकर और श्री रामजी के छोटे
भाई लक्ष्मणजी को आगे करके (अथामत् उनके िीछे-िीछे) सुग्रीव हर्षषत
होकर चले और जहाँ रघुनाथजी थे वहाँ आए॥20॥
चौिाई :
* नाइ चरन तसरु कह कर जोरी॥ नाथ मोतह कछु नातहन खोरी॥
अततसय प्रबल देव तव माया॥ छू टइ राम करहु जौं दाया॥1॥
भावाथम:-श्री रघुनाथजी के चरणों में तसर नवाकर हाथ जोड़कर सुग्रीव
ने कहा- हे नाथ! मुझे कु छ भी दोष नहीं है। हे देव! आिकी माया अत्यांत
ही प्रबल है। आि जब दया करते हैं, हे राम! तभी यह छू टती है॥1॥
* तबषय बस्य सुर नर मुतन स्वामी॥ मैं िावँर िसु कति अतत कामी॥

48

नारर नयन सर जातह न लागा। घोर क्रोध तम तनतस जो जागा॥2॥
भावाथम:-हे स्वामी! देवता, मनुकय और मुतन सभी तवषयों के वश में हैं।
किर मैं तो िामर िशु और िशुओं में भी अत्यांत कामी बांदर हँ। स्त्री का
नयन बाण तजसको नहीं लगा, जो भयांकर क्रोध रूिी अँधरे ी रात में भी
जागता रहता है (क्रोधान्ध नहीं होता)॥2॥
* लोभ िाँस जेष्ह गर न बँधाया। सो नर तुम्ह समान रघुराया॥
यह गुन साधन तें नष्ह होई। तुम्हरी कृ िा िाव कोइ कोई॥3॥
भावाथम:-और लोभ की िाँसी से तजसने अिना गला नहीं बँधाया, हे
रघुनाथजी! वह मनुकय आि ही के समान है। ये गुण साधन से नहीं प्राप्त
होते। आिकी कृ िा से ही कोई-कोई इन्हें िाते हैं॥3॥
* तब रघुितत बोले मुसुकाई। तुम्ह तप्रय मोतह भरत तजतम भाई॥
अब सोइ जतनु करह मन लाई। जेतह तबतध सीता कै सुतध िाई॥4॥
भावाथम:-तब श्री रघुनाथजी मुस्कु राकर बोले- हे भाई! तुम मुझे भरत के
समान प्यारे हो। अब मन लगाकर वही उिाय करो तजस उिाय से सीता
की खबर तमले॥4॥
दोहा :
* एतह तबतध होत बतकही आए बानर जूथ।

49

नाना बरन सकल कदतस देतखअ कीस बरूथ॥21॥
भावाथम:-इस प्रकार बातचीत हो रही थी कक वानरों के यूथ (झुांड) आ
गए। अनेक रां गों के वानरों के दल सब कदशाओं में कदखाई देने लगे॥21॥
चौिाई :
* बानर कटक उमा मैं देखा। सो मूरुख जो करन चह लेखा॥
आइ राम िद नावष्ह माथा। तनरतख बदनु सब होष्ह सनाथा॥1॥
भावाथम:-(तशवजी कहते हैं-) हे उमा! वानरों की वह सेना मैंने देखी थी।
उसकी जो तगनती करना चाहे वह महान् मूखम है। सब वानर आ-आकर
श्री रामजी के चरणों में मस्तक नवाते हैं और (सौंदयम-माधुयमतनतध)
श्रीमुख के दशमन करके कृ ताथम होते हैं॥1॥
* अस कति एक न सेना माहीं। राम कु सल जेतह िूछी नाहीं॥
यह कछु नष्ह प्रभु कइ अतधकाई। तबस्वरूि ब्यािक रघुराई॥2॥
भावाथम:-सेना में एक भी वानर ऐसा नहीं था तजससे श्री रामजी ने
कु शल न िूछी हो, प्रभु के तलए यह कोई बड़ी बात नहीं है, क्योंकक श्री
रघुनाथजी तवश्वरूि तथा सवमव्यािक हैं (सारे रूिों और सब स्थानों में
हैं)॥2॥
* ठाढे जहँ तहँ आयसु िाई। कह सुग्रीव सबतह समुझाई॥
राम काजु अरु मोर तनहोरा। बानर जूथ जाहु चहुँ ओरा॥3॥

50

भावाथम:-आज्ञा िाकर सब जहाँ-तहाँ खड़े हो गए। तब सुग्रीव ने सबको
समझाकर कहा कक हे वानरों के समूहों! यह श्री रामचांद्रजी का कायम है
और मेरा तनहोरा (अनुरोध) है, तुम चारों ओर जाओ॥3॥
* जनकसुता कहुँ खोजहु जाई। मास कदवस महँ आएहु भाई॥
अवतध मेरट जो तबनु सुतध िाएँ। आवइ बतनतह सो मोतह मराएँ॥4॥
भावाथम:-और जाकर जानकीजी को खोजो। हे भाई! महीने भर में वािस
आ जाना। जो (महीने भर की) अवतध तबताकर तबना िता लगाए ही
लौट आएगा उसे मेरे द्वारा मरवाते ही बनेगा (अथामत् मुझे उसका वध
करवाना ही िड़ेगा)॥4॥
दोहा :
* बचन सुनत सब बानर जहँ तहँ चले तुरांत।
तब सुग्रीवँ बोलाए अांगद नल हनुमत
ां ॥22॥
भावाथम:-सुग्रीव के वचन सुनते ही सब वानर तुरांत जहाँ-तहाँ (तभन्नतभन्न कदशाओं में) चल कदए। तब सुग्रीव ने अांगद, नल, हनुमान् आकद
प्रधान-प्रधान योद्धाओं को बुलाया (और कहा-)॥22॥
चौिाई :
* सुनहु नील अांगद हनुमाना। जामवांत मततधीर सुजाना॥
सकल सुभट तमतल दतच्छन जाह। सीता सुतध िूँछेहु सब काह॥1॥

51

भावाथम:-हे धीरबुतद्ध और चतुर नील, अांगद, जाम्बवान् और हनुमान!
तुम सब श्रेष्ठ योद्धा तमलकर दतक्षण कदशा को जाओ और सब ककसी से
सीताजी का िता िूछना॥1॥
* मन क्रम बचन सो जतन तबचारे हु। रामचांद्र कर काजु सँवारे हु॥
भानु िीरठ सेइअ उर आगी। स्वातमतह सबम भाव छल त्यागी॥2॥
भावाथम:-मन, वचन तथा कमम से उसी का (सीताजी का िता लगाने का)
उिाय सोचना। श्री रामचांद्रजी का कायम सांिन्न (सिल) करना। सूयम को
िीठ से और अति को हृदय से (सामने से) सेवन करना चातहए, िरां तु
स्वामी की सेवा तो छल छोड़कर सवमभाव से (मन, वचन, कमम से) करनी
चातहए॥2॥
* ततज माया सेइअ िरलोका। तमटष्ह सकल भवसांभव सोका॥
देह धरे कर यह िलु भाई। भतजअ राम सब काम तबहाई॥3॥
भावाथम:-माया (तवषयों की ममता-आसति) को छोड़कर िरलोक का
सेवन (भगवान के कदव्य धाम की प्रातप्त के तलए भगवत्सेवा रूि साधन)
करना चातहए, तजससे भव (जन्म-मरण) से उत्िन्न सारे शोक तमट जाएँ।
हे भाई! देह धारण करने का यही िल है कक सब कामों (कामनाओं) को
छोड़कर श्री रामजी का भजन ही ककया जाए॥3॥
* सोइ गुनग्य सोई बड़भागी। जो रघुबीर चरन अनुरागी॥

52

आयसु मातग चरन तसरु नाई। चले हरतष सुतमरत रघुराई॥4॥
भावाथम:-सद्गुणों को िहचानने वाला (गुणवान) तथा बड़भागी वही है
जो श्री रघुनाथजी के चरणों का प्रेमी है। आज्ञा माँगकर और चरणों में
किर तसर नवाकर श्री रघुनाथजी का स्मरण करते हुए सब हर्षषत होकर
चले॥4॥
* िाछें िवन तनय तसरु नावा। जातन काज प्रभु तनकट बोलावा॥
िरसा सीस सरोरुह िानी। करमुकद्रका दीतन्ह जन जानी॥5॥
भावाथम:-सबके िीछे िवनसुत श्री हनुमान्जी ने तसर नवाया। कायम का
तवचार करके प्रभु ने उन्हें अिने िास बुलाया। उन्होंने अिने करकमल से
उनके तसर का स्िशम ककया तथा अिना सेवक जानकर उन्हें अिने हाथ
की अँगूठी उतारकर दी॥5॥
* बहु प्रकार सीततह समुझाएहु। कतह बल तबरह बेतग तुम्ह आएहु॥
हनुमत जन्म सुिल करर माना। चलेउ हृदयँ धरर कृ िातनधाना॥6॥
भावाथम:-(और कहा-) बहुत प्रकार से सीता को समझाना और मेरा बल
तथा तवरह (प्रेम) कहकर तुम शीघ्र लौट आना। हनुमान्जी ने अिना
जन्म सिल समझा और कृ िातनधान प्रभु को हृदय में धारण करके वे
चले॥6॥
* जद्यति प्रभु जानत सब बाता। राजनीतत राखत सुरत्राता॥7॥

53

भावाथम:-यद्यति देवताओं की रक्षा करने वाले प्रभु सब बात जानते हैं,
तो भी वे राजनीतत की रक्षा कर रहे हैं (नीतत की मयामदा रखने के तलए
सीताजी का िता लगाने को जहाँ-तहाँ वानरों को भेज रहे हैं)॥7॥
दोहा :
* चले सकल बन खोजत सररता सर तगरर खोह।
राम काज लयलीन मन तबसरा तन कर छोह॥23॥
भावाथम:-सब वानर वन, नदी, तालाब, िवमत और िवमतों की कन्दराओं
में खोजते हुए चले जा रहे हैं। मन श्री रामजी के कायम में लवलीन है।
शरीर तक का प्रेम (ममत्व) भूल गया है॥23॥
चौिाई :
* कतहुँ होइ तनतसचर सैं भेटा। प्रान लेष्ह एक एक चिेटा॥
बहु प्रकार तगरर कानन हेरष्ह। कोउ मुतन तमलइ तातह सब घेरष्ह॥1॥
भावाथम:-कहीं ककसी राक्षस से भेंट हो जाती है, तो एक-एक चित में ही
उसके प्राण ले लेते हैं। िवमतों और वनों को बहुत प्रकार से खोज रहे हैं।
कोई मुतन तमल जाता है तो िता िूछने के तलए उसे सब घेर लेते हैं॥1॥

गुिा में तितस्वनी के दशमन, वानरों का समुद्र तट िर आना, सम्िाती से
भेंट और बातचीत

54

* लातग तृषा अततसय अकु लाने। तमलइ न जल घन गहन भुलाने॥
मन हनुमान् कीन्ह अनुमाना। मरन चहत सब तबनु जल िाना॥2॥
भावाथम:-इतने में ही सबको अत्यांत प्यास लगी, तजससे सब अत्यांत ही
व्याकु ल हो गए, ककतु जल कहीं नहीं तमला। घने जांगल में सब भुला गए।
हनुमान्जी ने मन में अनुमान ककया कक जल तिए तबना सब लोग मरना
ही चाहते हैं॥2॥
* चकढ तगरर तसखर चहँ कदतस देखा। भूतम तबबर एक कौतुक िेखा॥
चक्रबाक बक हांस उड़ाहीं। बहुतक खग प्रतबसष्ह तेतह माहीं॥3॥
भावाथम:-उन्होंने िहाड़ की चोटी िर चढकर चारों ओर देखा तो िृथ्वी
के अांदर एक गुिा में उन्हें एक कौतुक (आश्चयम) कदखाई कदया। उसके
ऊिर चकवे, बगुले और हांस उड़ रहे हैं और बहुत से िक्षी उसमें प्रवेश
कर रहे हैं॥3॥
* तगरर ते उतरर िवनसुत आवा। सब कहुँ लै सोइ तबबर देखावा॥
आगें कै हनुमांततह लीन्हा। िैठे तबबर तबलांबु न कीन्हा॥4॥
भावाथम:-िवन कु मार हनुमान्जी िवमत से उतर आए और सबको ले
जाकर उन्होंने वह गुिा कदखलाई। सबने हनुमान्जी को आगे कर तलया
और वे गुिा में घुस गए, देर नहीं की॥4॥
दोहा :

55

* दीख जाइ उिबन बर सर तबगतसत बहु कां ज।
मांकदर एक रुतचर तहँ बैरठ नारर ति िुज
ां ॥24॥
भावाथम:-अांदर जाकर उन्होंने एक उिम उिवन (बगीचा) और तालाब
देखा, तजसमें बहुत से कमल तखले हुए हैं। वहीं एक सुांदर मांकदर है,
तजसमें एक तिोमूर्षत स्त्री बैठी है॥24॥
चौिाई :
* दूरर ते तातह सबतन्ह तसरु नावा। िूछें तनज बृिाांत सुनावा॥
तेष्ह तब कहा करहु जल िाना। खाहु सुरस सुांदर िल नाना॥1॥
भावाथम:-दूर से ही सबने उसे तसर नवाया और िूछने िर अिना सब
वृिाांत कह सुनाया। तब उसने कहा- जलिान करो और भाँतत-भाँतत के
रसीले सुांदर िल खाओ॥1॥
* मज्जनु कीन्ह मधुर िल खाए। तासु तनकट िुतन सब चतल आए॥
तेष्ह सब आितन कथा सुनाई। मैं अब जाब जहाँ रघुराई॥2॥
भावाथम:-(आज्ञा िाकर) सबने स्नान ककया, मीठे िल खाए और किर सब
उसके िास चले आए। तब उसने अिनी सब कथा कह सुनाई (और कहा) मैं अब वहाँ जाऊँगी जहाँ श्री रघुनाथजी हैं॥2॥
* मूदहु नयन तबबर ततज जाह। िैहहु सीततह जतन ितछताह॥

56

नयन मूकद िुतन देखष्ह बीरा। ठाढे सकल ष्सधु कें तीरा॥3॥
भावाथम:-तुम लोग आँखें मूँद लो और गुिा को छोड़कर बाहर जाओ। तुम
सीताजी को िा जाओगे, िछताओ नहीं (तनराश न होओ)। आँखें मूँदकर
किर जब आँखें खोलीं तो सब वीर क्या देखते हैं कक सब समुद्र के तीर
िर खड़े हैं॥3॥
* सो िुतन गई जहाँ रघुनाथा। जाइ कमल िद नाएतस माथा॥
नाना भाँतत तबनय तेष्ह कीन्हीं। अनिायनी भगतत प्रभु दीन्हीं॥4॥
भावाथम:-और वह स्वयां वहाँ गई जहाँ श्री रघुनाथजी थे। उसने जाकर
प्रभु के चरण कमलों में मस्तक नवाया और बहुत प्रकार से तवनती की।
प्रभु ने उसे अिनी अनिातयनी (अचल) भति दी॥4॥
दोहा :
* बदरीबन कहुँ सो गई प्रभु अग्या धरर सीस।
उर धरर राम चरन जुग जे बांदत अज ईस॥25॥
भावाथम:-प्रभु की आज्ञा तसर िर धारण कर और श्री रामजी के युगल
चरणों को, तजनकी ब्रह्मा और महेश भी वांदना करते हैं, हृदय में धारण
कर वह (स्वयांप्रभा) बदररकाश्रम को चली गई॥25॥
चौिाई :
* इहाँ तबचारष्ह कति मन माहीं। बीती अवतध काज कछु नाहीं॥

57

सब तमतल कहष्ह िरस्िर बाता। तबनु सुतध लएँ करब का भ्राता॥1॥
भावाथम:-यहाँ वानरगण मन में तवचार कर रहे हैं कक अवतध तो बीत
गई, िर काम कु छ न हुआ। सब तमलकर आिस में बात करने लगे कक हे
भाई! अब तो सीताजी की खबर तलए तबना लौटकर भी क्या करें गे!॥1॥
* कह अांगद लोचन भरर बारी। दुहुँ प्रकार भइ मृत्यु हमारी॥
इहाँ न सुतध सीता कै िाई। उहाँ गएँ माररतह कतिराई॥2॥
भावाथम:-अांगद ने नेत्रों में जल भरकर कहा कक दोनों ही प्रकार से हमारी
मृत्यु हुई। यहाँ तो सीताजी की सुध नहीं तमली और वहाँ जाने िर
वानरराज सुग्रीव मार डालेंगे॥2॥
* तिता बधे िर मारत मोही। राखा राम तनहोर न ओही॥
िुतन िुतन अांगद कह सब िाहीं। मरन भयउ कछु सांसय नाहीं॥3॥
भावाथम:-वे तो तिता के वध होने िर ही मुझे मार डालते। श्री रामजी ने
ही मेरी रक्षा की, इसमें सुग्रीव का कोई एहसान नहीं है। अांगद बार-बार
सबसे कह रहे हैं कक अब मरण हुआ, इसमें कु छ भी सांदह
े नहीं है॥3॥
* अांगद बचन सुन कति बीरा। बोतल न सकष्ह नयन बह नीरा॥
छन एक सोच मगन होइ रहे। िुतन अस बचन कहत सब भए॥4॥

58

भावाथम:-वानर वीर अांगद के वचन सुनते हैं, ककतु कु छ बोल नहीं सकते।
उनके नेत्रों से जल बह रहा है। एक क्षण के तलए सब सोच में मि हो
रहे। किर सब ऐसा वचन कहने लगे-॥4॥
* हम सीता कै सुतध लीन्हें तबना। नष्ह जैहैं जुबराज प्रबीना॥
अस कतह लवन ष्सधु तट जाई। बैठे कति सब दभम डसाई॥5॥
भावाथम:-हे सुयोग्य युवराज! हम लोग सीताजी की खोज तलए तबना
नहीं लौटेंगे। ऐसा कहकर लवणसागर के तट िर जाकर सब वानर कु श
तबछाकर बैठ गए॥5॥
* जामवांत अांगद दुख देखी। कहीं कथा उिदेस तबसेषी॥
तात राम कहुँ नर जतन मानहु। तनगुमन ब्रह्म अतजत अज जानहु॥6॥
भावाथम:-जाम्बवान् ने अांगद का दुःख देखकर तवशेष उिदेश की कथाएँ
कहीं। (वे बोले-) हे तात! श्री रामजी को मनुकय न मानो, उन्हें तनगुमण
ब्रह्म, अजेय और अजन्मा समझो॥6॥
* हम सब सेवक अतत बड़भागी। सांतत सगुन ब्रह्म अनुरागी॥7॥
भावाथम:-हम सब सेवक अत्यांत बड़भागी हैं, जो तनरां तर सगुण ब्रह्म (श्री
रामजी) में प्रीतत रखते हैं॥7॥
दोहा :

59

* तनज इच्छाँ प्रभु अवतरइ सुर मह गो त द्वज लातग।
सगुन उिासक सांग तहँ रहष्ह मोच्छ सब त्यातग॥26॥
भावाथम:-देवता, िृथ्वी, गो और ब्राह्मणों के तलए प्रभु अिनी इच्छा से
(ककसी कममबांधन से नहीं) अवतार लेते हैं। वहाँ सगुणोिासक (भिगण
सालोक्य, सामीप्य, सारुप्य, सार्षष्ट और सायुज्य) सब प्रकार के मोक्षों
को त्यागकर उनकी सेवा में साथ रहते हैं॥26॥
चौिाई :
* एतह तबतध कथा कहष्ह बहु भाँती। तगरर कां दराँ सुनी सांिाती॥
बाहेर होइ देतख बहु कीसा। मोतह अहार दीन्ह जगदीसा॥1॥
भावाथम:-इस प्रकार जाम्बवान् बहुत प्रकार से कथाएँ कह रहे हैं। इनकी
बातें िवमत की कन्दरा में सम्िाती ने सुनीं। बाहर तनकलकर उसने बहुत
से वानर देख।े (तब वह बोला-) जगदीश्वर ने मुझको घर बैठे बहुत सा
आहार भेज कदया!॥1॥
* आजु सबतह कहँ भच्छन करऊँ। कदन हबु चले अहार तबनु मरऊँ॥
कबहुँ न तमल भरर उदर अहारा। आजु दीन्ह तबतध एकष्ह बारा॥2॥
भावाथम:-आज इन सबको खा जाऊँगा। बहुत कदन बीत गए, भोजन के
तबना मर रहा था। िेटभर भोजन कभी नहीं तमलता। आज तवधाता ने
एक ही बार में बहुत सा भोजन दे कदया॥2॥

60

* डरिे गीध बचन सुतन काना। अब भा मरन सत्य हम जाना॥
कति सब उठे गीध कहँ देखी। जामवांत मन सोच तबसेषी॥3॥
भावाथम:-गीध के वचन कानों से सुनते ही सब डर गए कक अब सचमुच
ही मरना हो गया। यह हमने जान तलया। किर उस गीध (सम्िाती) को
देखकर सब वानर उठ खड़े हुए। जाम्बवान् के मन में तवशेष सोच
हुआ॥3॥
* कह अांगद तबचारर मन माहीं। धन्य जटायू सम कोउ नाहीं॥
राम काज कारन तनु त्यागी। हरर िुर गयउ िरम बड़भागी॥4॥
भावाथम:-अांगद ने मन में तवचार कर कहा- अहा! जटायु के समान धन्य
कोई नहीं है। श्री रामजी के कायम के तलए शरीर छोड़कर वह िरम
बड़भागी भगवान् के िरमधाम को चला गया॥4॥
* सुतन खग हरष सोक जुत बानी। आवा तनकट कतिन्ह भय मानी॥
ततन्हतह अभय करर िूछेतस जाई। कथा सकल ततन्ह तातह सुनाई॥5॥
भावाथम:-हषम और शोक से युि वाणी (समाचार) सुनकर वह िक्षी
(सम्िाती) वानरों के िास आया। वानर डर गए। उनको अभय करके
(अभय वचन देकर) उसने िास जाकर जटायु का वृिाांत िूछा, तब
उन्होंने सारी कथा उसे कह सुनाई॥5॥
* सुतन सांिातत बांधु कै करनी। रघुितत मतहमा बहुतबतध बरनी॥6॥

61

भावाथम:-भाई जटायु की करनी सुनकर सम्िाती ने बहुत प्रकार से श्री
रघुनाथजी की मतहमा वणमन की॥6॥
दोहा :
* मोतह लै जाहु ष्सधुतट देउँ ततलाांजतल तातह।
बचन सहाइ करतब मैं िैहहु खोजहु जातह॥27॥
भावाथम:-(उसने कहा-) मुझे समुद्र के ककनारे ले चलो, मैं जटायु को
ततलाांजतल दे दू।ँ इस सेवा के बदले मैं तुम्हारी वचन से सहायता करूँगा
(अथामत् सीताजी कहाँ हैं सो बतला दूग
ँ ा), तजसे तुम खोज रहे हो उसे िा
जाओगे॥27॥
चौिाई :
* अनुज कक्रया करर सागर तीरा। कतह तनज कथा सुनहु कति बीरा॥
हम द्वौ बांधु प्रथम तरुनाई। गगन गए रतब तनकट उड़ाई॥1॥
भावाथम:-समुद्र के तीर िर छोटे भाई जटायु की कक्रया (श्राद्ध आकद)
करके सम्िाती अिनी कथा कहने लगा- हे वीर वानरों! सुनो, हम दोनों
भाई उठती जवानी में एक बार आकाश में उड़कर सूयम के तनकट चले
गए॥1॥
* तेज न सतह सक सो किरर आवा। मैं अतभमानी रतब तनअरावा॥
जरे िांख अतत तेज अिारा। िरे उँ भूतम करर घोर तचकारा॥2॥

62

भावाथम:-वह (जटायु) तेज नहीं सह सका, इससे लौट आया (ककतु), मैं
अतभमानी था इसतलए सूयम के िास चला गया। अत्यांत अिार तेज से मेरे
िांख जल गए। मैं बड़े जोर से चीख मारकर जमीन िर तगर िड़ा॥2॥
* मुतन एक नाम चांद्रमा ओही। लागी दया देतख करर मोही॥
बहु प्रकार तेष्ह ग्यान सुनावा। देहजतनत अतभमान छु ड़ावा॥3॥
भावाथम:-वहाँ चांद्रमा नाम के एक मुतन थे। मुझे देखकर उन्हें बड़ी दया
लगी। उन्होंने बहुत प्रकार से मुझे ज्ञान सुनाया और मेरे देहजतनत (देह
सांबांधी) अतभमान को छु ड़ा कदया॥3॥
* त्रेताँ ब्रह्म मनुज तनु धररही। तासु नारर तनतसचर ितत हररही॥
तासु खोज िठइतह प्रभु दूता। ततन्हतह तमलें तैं होब िुनीता॥4॥
भावाथम:-(उन्होंने कहा-) त्रेतायुग में साक्षात् िरब्रह्म मनुकय शरीर धारण
करें गे। उनकी स्त्री को राक्षसों का राजा हर ले जाएगा। उसकी खोज में
प्रभु दूत भेजेंगे। उनसे तमलने िर तू ितवत्र हो जाएगा॥4॥
* जतमहष्ह िांख करतस जतन ष्चता। ततन्हतह देखाइ देहस
े ु तैं सीता॥
मुतन कइ तगरा सत्य भइ आजू। सुतन मम बचन करहु प्रभु काजू॥5॥
भावाथम:-और तेरे िांख उग आएँगे, ष्चता न कर। उन्हें तू सीताजी को
कदखा देना। मुतन की वह वाणी आज सत्य हुई। अब मेरे वचन सुनकर
तुम प्रभु का कायम करो॥5॥

63

* तगरर तत्रकू ट ऊिर बस लांका। तहँ रह रावन सहज असांका॥
तहँ असोक उिबन जहँ रहई। सीता बैरठ सोच रत अहई॥6॥
भावाथम:-तत्रकू ट िवमत िर लांका बसी हुई है। वहाँ स्वभाव से ही तनडर
रावण रहता है। वहाँ अशोक नाम का उिवन (बगीचा) है, जहाँ सीताजी
रहती हैं। (इस समय भी) वे सोच में मि बैठी हैं॥6॥

समुद्र लाँघने का िरामशम, जाम्बवन्त का हनुमान्जी को बल याद
कदलाकर उत्सातहत करना, श्री राम-गुण का माहात्म्य
दोहा :
* मैं देखउँ तुम्ह नाहीं गीधतह दृतष्ट अिार।
बूढ भयउँ न त करतेउँ कछु क सहाय तुम्हार॥28॥
भावाथम:-मैं उन्हें देख रहा हँ, तुम नहीं देख सकते, क्योंकक गीध की दृतष्ट
अिार होती है (बहुत दूर तक जाती है)। क्या करूँ? मैं बूढा हो गया,
नहीं तो तुम्हारी कु छ तो सहायता अवश्य करता॥28॥
चौिाई :
* जो नाघइ सत जोजन सागर। करइ सो राम काज मतत आगर॥
मोतह तबलोकक धरहु मन धीरा। राम कृ िाँ कस भयउ सरीरा॥1॥

64

भावाथम:-जो सौ योजन (चार सौ कोस) समुद्र लाँघ सके गा और
बुतद्धतनधान होगा, वही श्री रामजी का कायम कर सके गा। (तनराश होकर
घबराओ मत) मुझे देखकर मन में धीरज धरो। देखो, श्री रामजी की
कृ िा से (देखते ही देखते) मेरा शरीर कै सा हो गया (तबना िाँख का
बेहाल था, िाँख उगने से सुांदर हो गया) !॥1॥
* िातिउ जाकर नाम सुतमरहीं। अतत अिार भवसागर तरहीं॥
तासु दूत तुम्ह ततज कदराई राम हृदयँ धरर करहु उिाई॥2॥
भावाथम:-िािी भी तजनका नाम स्मरण करके अत्यांत िार भवसागर से
तर जाते हैं। तुम उनके दूत हो, अतः कायरता छोड़कर श्री रामजी को
हृदय में धारण करके उिाय करो॥2॥
* अस कतह गरुड़ गीध जब गयऊ। ततन्ह के मन अतत तबसमय भयऊ॥
तनज तनज बल सब काहँ भाषा। िार जाइ कर सांसय राखा॥3॥
भावाथम:-(काकभुशुतण्डजी कहते हैं-) हे गरुड़जी! इस प्रकार कहकर जब
गीध चला गया, तब उन (वानरों) के मन में अत्यांत तवस्मय हुआ। सब
ककसी ने अिना-अिना बल कहा। िर समुद्र के िार जाने में सभी ने सांदह

प्रकट ककया॥3॥
* जरठ भयउँ अब कहइ ररछेसा। नष्ह तन रहा प्रथम बल लेसा॥
जबष्ह तत्रतबक्रम भए खरारी। तब मैं तरुन रहेउँ बल भारी॥4॥

65

भावाथम:-ऋक्षराज जाम्बवान् कहने लगे- मैं बूढा हो गया। शरीर में
िहले वाले बल का लेश भी नहीं रहा। जब खरारर (खर के शत्रु श्री राम)
वामन बने थे, तब मैं जवान था और मुझ में बड़ा बल था॥4॥
दोहा :
* बतल बाँधत प्रभु बाढेउ सो तनु बरतन न जाइ।
उभय घरी महँ दीन्हीं सात प्रदतच्छन धाइ॥29॥
भावाथम:-बतल के बाँधते समय प्रभु इतने बढे कक उस शरीर का वणमन
नहीं हो सकता, ककतु मैंने दो ही घड़ी में दौड़कर (उस शरीर की) सात
प्रदतक्षणाएँ कर लीं॥29॥
चौिाई :
* अांगद कहइ जाउँ मैं िारा। तजयँ सांसय कछु किरती बारा॥
जामवांत कह तुम्ह सब लायक। िठइअ ककतम सबही कर नायक॥1॥
भावाथम:-अांगद ने कहा- मैं िार तो चला जाऊँगा, िरां तु लौटते समय के
तलए हृदय में कु छ सांदह
े है। जाम्बवान् ने कहा- तुम सब प्रकार से योग्य
हो, िरां तु तुम सबके नेता हो, तुम्हे कै से भेजा जाए?॥1॥
* कहइ रीछितत सुनु हनुमाना। का चुि सातध रहेहु बलवाना॥
िवन तनय बल िवन समाना। बुतध तबबेक तबग्यान तनधाना॥2॥

66

भावाथम:-ऋक्षराज जाम्बवान् ने श्री हनुमानजी से कहा- हे हनुमान्! हे
बलवान्! सुनो, तुमने यह क्या चुि साध रखी है? तुम िवन के िुत्र हो
और बल में िवन के समान हो। तुम बुतद्ध-तववेक और तवज्ञान की खान
हो॥2॥
* कवन सो काज करठन जग माहीं। जो नष्ह होइ तात तुम्ह िाहीं॥
राम काज लतग तव अवतारा। सुनतष्ह भयउ िबमताकारा॥3॥
भावाथम:-जगत् में कौन सा ऐसा करठन काम है जो हे तात! तुमसे न हो
सके । श्री रामजी के कायम के तलए ही तो तुम्हारा अवतार हुआ है। यह
सुनते ही हनुमान्जी िवमत के आकार के (अत्यांत तवशालकाय) हो
गए॥3॥
* कनक बरन तन तेज तबराजा। मानहुँ अिर तगररन्ह कर राजा॥
ष्सहनाद करर बारष्ह बारा। लीलष्ह नाघउँ जलतनतध खारा॥4॥
भावाथम:-उनका सोने का सा रां ग है, शरीर िर तेज सुशोतभत है, मानो
दूसरा िवमतों का राजा सुमेरु हो। हनुमान्जी ने बार-बार ष्सहनाद करके
कहा- मैं इस खारे समुद्र को खेल में ही लाँघ सकता हँ॥4॥
* सतहत सहाय रावनतह मारी। आनउँ इहाँ तत्रकू ट उिारी॥
जामवांत मैं िूँछउँ तोही। उतचत तसखावनु दीजहु मोही॥5॥

67

भावाथम:- और सहायकों सतहत रावण को मारकर तत्रकू ट िवमत को
उखाड़कर यहाँ ला सकता हँ। हे जाम्बवान्! मैं तुमसे िूछता हँ, तुम मुझे
उतचत सीख देना (कक मुझे क्या करना चातहए)॥5॥
* एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीततह देतख कहहु सुतध आई॥
तब तनज भुज बल रातजवनैना। कौतुक लातग सांग कति सेना॥6॥
भावाथम:-(जाम्बवान् ने कहा-) हे तात! तुम जाकर इतना ही करो कक
सीताजी को देखकर लौट आओ और उनकी खबर कह दो। किर
कमलनयन श्री रामजी अिने बाहुबल से (ही राक्षसों का सांहार कर
सीताजी को ले आएँगे, के वल) खेल के तलए ही वे वानरों की सेना साथ
लेंगे॥6॥
छांद :
* कति सेन सांग सँघारर तनतसचर रामु सीततह आतन हैं।
त्रैलोक िावन सुजसु सुर मुतन नारदाकद बखातन हैं॥
जो सुनत गावत कहत समुक्षत िरमिद नर िावई।
रघुबीर िद िाथोज मधुकर दास तुलसी गावई॥
भावाथम:-वानरों की सेना साथ लेकर राक्षसों का सांहार करके श्री रामजी
सीताजी को ले आएँगे। तब देवता और नारदाकद मुतन भगवान् के तीनों
लोकों को ितवत्र करने वाले सुांदर यश का बखान करें ग,े तजसे सुनने,

68

गाने, कहने और समझने से मनुकय िरमिद िाते हैं और तजसे श्री
रघुवीर के चरणकमल का मधुकर (भ्रमर) तुलसीदास गाता है।
दोहा :
* भव भेषज रघुनाथ जसु सुनष्ह जे नर अरु नारर।
ततन्ह कर सकल मनोरथ तसद्ध करष्ह तत्रतसरारर॥30 क॥
भावाथम:-श्री रघुवीर का यश भव (जन्म-मरण) रूिी रोग की (अचूक)
दवा है। जो िुरुष और स्त्री इसे सुनेंगे, तत्रतशरा के शत्रु श्री रामजी उनके
सब मनोरथों को तसद्ध करें गे॥30 (क)॥
सोरठा :
* नीलोत्िल तन स्याम काम कोरट सोभा अतधक।
सुतनअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बतधक॥30 ख॥
भावाथम:-तजनका नीले कमल के समान श्याम शरीर है, तजनकी शोभा
करोड़ों कामदेवों से भी अतधक है और तजनका नाम िािरूिी ितक्षयों
को मारने के तलए बतधक (व्याधा) के समान है, उन श्री राम के गुणों के
समूह (लीला) को अवश्य सुनना चातहए॥30 (ख)॥
मासिरायण, तेईसवाँ तवश्राम
इतत श्रीमद्रामचररतमानसे सकलकतलकलुषतवध्वांसने चतुथम: सोिानः
समाप्त :।

69

कतलयुग के समस्त िािों के नाश करने वाले श्री रामचररत् मानस का
यह चौथा सोिान समाप्त हुआ।

(ककष्ककधाकाांड समाप्त)

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