भारतीय पञ्चाङ

-अरुण कुमार उपाध्याय, बी-९, सीबी-९, कैण्टोन्मेन्ट रोड, कटक-७५३००१, (मो) ९४३७०३४१७२
arunupadhyay30@yahoo.in, www.scribd.com/Aruupadhyay
भरतीय इतितहास तथा सिहत्य के ज्ञान के िलिये पञ्चाङ की परम्परा जानना आवश्यक है। अतः गत ३२ हजार वषो ं की
पञ्चाङ परम्परा दी जाती है। कालि के ४ प्रकार, सृष्टिष्टि के ९ सगो ं के अनुसर ९ कालि-मान, ७ युग तथा उसके अनुसार गत
६२ हजार वषो ं का युग-चक्र मेरी पुस्तक-िसद्धान्त दपर ण के भूमिमका खण्ड मे देखा जा सकता है http://www.scribd.com/doc/110979374/िसद्धान्त दपर ण-भूमिमका खण्ड
(१) स्वायम्भुव मनु कालि-स्वायम्भुव मनु कालि मे सम्भवतः आज के ज्योितषीय युग नहीं थे। यह व्यवस्था वैवस्वत मनु
के कालि से आरम्भ हु यी अतः उनसे सत्ययुग का आरम्भ हु आ। यिद ब्रह्मा से आरम्भ होता तो ब्रह्मा आद्य त्रेता मे नहीं, सत्य
युग के आरम्भ मे होते। अथवा सत्ययुग पहलिे आरम्भ हो गया, पर सभ्यता का िवकास कालि त्रेता कहा गया। ब्रह्मा की युग
व्यवस्था मे युग पाद समान कालि के थे जैसा ऐतरेय ब्राह्मण के ४ वषीय गोपद युग मे या स्वायम्भुव परम्परा के आयर भट का
युग है। वषर का आरम्भ अिभिजत् नक्षत्र से होता था, िजसे बाद मे काित्रकेय ने धनिनष्ठा नक्षत्र से आरम्भ िकया। काित्रकेय
कालि मे (१५८०० ई.पूम.) यह वषार कालि था। स्वायम्भुव मनु कालि मे यह उत्रायण का आरम्भ था। िकन्तु दोनो
व्यवस्थाओं मे माघ मास से ही वषर का आरम्भ होता था। मासो का नाम पूमिणर मा के िदन चन्द्रमा के नक्षत्र से था, जो आज
भी चलि रहा है। मास का आरम्भ दोनो प्रकार से था-अमावास्या से या पूमिणर मा से। यह अयन गित के अन्तर के कारण
बदलिता होगा जैसा िवक्रमािदत्य ने महाभारत के ३००० वषर बाद शुक्लि पक्ष के बदलिे कृष्टष्ण पक्ष से मासारम्भ कर िदया।
िदन का आरम्भ भी कई प्रकार से था जैसा आज है। कई बार िलिखा है िक वषर की प्रथम राित्र कब थी।
कई प्रकार के वषर आरम्भ-शतं जीव शरदो वधनर मानः शतं हेमन्तांछतमुवसन्तान्॥ (ऋक १०/१६१/४, अथवर २०/९६/९)
एष ह संवत्सरस्य प्रथमा राित्रयार फाल्गुनी पूमणरमासी॥ (शतपथ ब्राह्मण ६/२/२/१८)-राित्र. फाल्गुन, पूमणरमासी से वषर का
आरम्भ।
फाल्गुन्यां पौर्णरमास्यां चातुमारस्यािन प्रयुञ्जीत। मुखं वा एतत् संवत्सरस्य यत् फाल्गुनी पौर्णरमासी। (गोपथ ब्राह्मण ६/१९)
अमावास्यया मासान्संपाद्याहरुत्सृष्टजि अन्त अमावास्या िह मासान् संपश्यित पौर्णरमास्या मासान्संपाद्यहरुत्सृष्टजि अन्त पौर्णरमास्या िह
मासान् संपश्यित। (तैित्रीय संिहता ७/५/६/१)
ब्रह्मा के कालि मे सौर्र ऋतु वषर की भी गणना थी। इतसमे सूमयर की उत्रायण-दिक्षणायन गितयो के योग से वषर होता था। िवषुव
के उत्र तथा दिक्षण ३-३ वीिथयो मे सूमयर १-१ मास रहता था। िवशुव के उत्र तथा दिक्षन मे १२, २०, २४ अंश के

अक्षांश वृष्टत्ो से ये वीिथयां बनती थीं। ३४ उत्र अक्षांश का िदनमान सूमयर की इतन रेखाओं पर ि अस्थित के अनुसार ८ से १६
घण्टा तक होगा। अतः दिक्षण से इतन वृष्टत्ो को गायत्री (६ x ४ अक्षर) से जगती छन्द (१२ x ४ अक्षर) तक का नाम िदया
गया।

यह नीचे के िचत्र से स्पष्टि है। इतसकी चचार ऋग्वेद (१/१६४/१-३, १२, १३, १/११५/३, ७/५३/२,

१०/१३०/४), अथवर वेद (८/५/१९-२०), वायु पुराण, अध्याय २, ब्रह्माण्ड पुराण अ. (१/२२), िवष्णु पुराण (अ. २/८१०) आिद मे है। इतनके आधनार पर पं . मधनुसूमदन ओझा ने आवरणवाद मे इतसकी व्याख्या की है (श्लिोक १२३-१३२)।
बाइतिबलि के इतिथओिपयन संस्करण मे इतनोक की पुस्तक के अध्याय ४ मे भी यही वणर न है।

छन्दो की अक्षर संख्या-गायत्री ६ x ४, उि अष्णक् ७ x ४, अनुष्टिुप् ८ x ४, बृष्टहती ९ x ४, पंिक्ति १० x ४, ित्रष्टिुप् ११ x
४, जगती १२ x ४
(२) ध्रुव पञ्चाङ-ध्रुव को स्वायम्भुव मनु का पौर्त्र कहा गया है , िकन्तु उनमे कुछ अिधनक अन्तर होगा। भागवत, िवष्णु
पुराणो के अनुसार ध्रुव को परम पद िमलिा तथा उनके चारो तरफ सप्तर्षिषर भ्रमण से कालि गणना शुरु हु ई। उस कालि से
८१०० वषर का ध्रुव संवत्सर शुरु हु आ िजसका तीसरा चक्र ३०७६ ई.पूम. मे पूमणर हु आ। ध्रुव कालि ३ x ८१०० + ३०७६
= २७,३७६ ई.पूम हु आ। कंु वरलिालि जैन ने अपूमणर वंशावलिी के आधनार पर पृष्टथु तक की कालि गणना की है। संवत्सरो के
अनुसार इतसके २ आधनार हो सकतेहै-स्वायम्भुव से वैवस्वत मनु तक के कालि को ६ भाग मे बांटने पर १-१ मन्वन्तर का
कालि आयेगा। यह प्रायः १५,२००/६ = २५३४ वषर होगा। यह सप्तर्षिषर वत्सर के िनकट है, अतः २७०० वषर का सप्तर्षिषर
चक्र तथा उसका ३ गुणा ध्रुव वषर लिेना अिधनक उिचत है। ध्रुव कालि के वणर न मे प्रायः २७०० वषर का लिघु -मन्वन्तर तथा
८१०० वषर का कल्प हो सकता है। १९२७६ ई.पूम. मे क्रौर्ञ्च द्वीप का प्रभुत्व था िजसपर बाद मे काित्रकेय ने आक्रमण
िकया।
(३) कश्यप-१७५०० ई.पूम. मे देव-असुरो की सभ्यता आरम्भ हु ई। तथा राजा पृष्टथु कालि मे पवर तीय क्षेत्रो को समतलि बना
कर खेती, नगर िनमारण आिद हु ये। खिनजो का दोहन हु आ। इतन कालिो मे नया युग आरम्भ हु आ पर उनका पञ्चाङ स्पष्टि
नहीं है।
(४) काित्रके य पञ्चाङ-पृष्टथ्वी के उत्र ध्रुव की िदशा अिभिजत् से हट गयी थी, अतः १५,८०० ई.पूम. मे काित्रकेय ने बह्मा
की सलिाह से धनिनष्ठा से वषर आरम्भ िकया जो वेदाङ ज्योितष मे चलिता है।
ऋग् ज्योितष (३२, ५,६) याजुष ज्योितष (५-७)
माघशुक्लि प्रपन्नस्य पौर्षकृष्टष्ण समािपनः। युगस्य पञ्चवषर स्य कालिज्ञानं प्रचक्षते॥५॥
स्वराक्रमेते सोमाकौ यदा साकं सवासवौर्। स्यात्दािद युगं माघः तपः शुक्लिोऽयनं हुदक्॥६॥
प्रपद्येते श्रविवष्ठादौर् सूमयारचन्द्रमसावुदक्। सापारधने दिक्षणाकरस्तु माघश्रववणयोः सदा॥७॥

यह माघ से आरंभ वषर ब्रह्मा के समय से था, जब सूमयर का प्रवेश अिभिजत् नक्षत्र मे होता था। स्वायम्भुव मनु कालि मे
अिभिजत् (श्रववण-धनिनष्ठा का मध्य श्रविवष्ठा) से उत्रायण होता था, यह २९१०२ ईसा पूमवर मे था। प्रायः १६००० ईसा पूमवर
मे अिभिजत् नक्षत्र से उत्री ध्रुव दरूम हो गया िजसे उसका पतन कहा गया है। तब इतन्द्र ने काित्रकेय से कहा िक ब्रह्मा से
िवमशर कर कालि िनणर य करेमहाभारत, वन पवर (२३०/८-१०)अिभिजत् स्पधनर माना तु रोिहण्या अनुजा स्वसा। इतच्छन्ती ज्येष्ठतां देवी तपस्तप्तर्षुं वनं गता॥८॥
तत्र मूमढोऽि अस्म भद्रं ते नक्षत्रं गगनाच्युतम्। कालिं ि अत्वमं परं स्कन्द ब्रह्मणा सह िचन्तय॥९॥
धनिनष्ठािदस्तदा कालिो ब्रह्मणा पिरकि अल्पतः। रोिहणी हभवत् पूमवरमेवं संख्या समाभवत्॥१०॥
उस कालि मे धनिनष्ठा मे सूमयर के प्रवेश के समय वषार का आरम्भ होता था, जब दिक्षणायन आरम्भ होता था। काित्रकेय के पूमवर
असुरो का प्रभुत्व था, अतः दिक्षणायन को असुरो का िदन कहा गया हैसूमयर िसद्धान्त, अध्याय १-मासैद्वारदशिभवर षर िदव्यं तदह उच्यते॥१३॥
सुरासुराणामन्योन्यमहोरात्रं िवपयर यात्। षट् षिष्टिसङुणं िदव्यं वषर मासुरमेव च॥१४॥
(५) िववस्वान् पञ्चाङ-यह वैवस्वत मनु के िपता थे अतः इतनका भी कालि १३९०२ ई.पूम. माना जा सकता है, िजसके
बाद १२००० वषर का अवसिपर णी-उत्सिपर णी चक्र तथा चैत्र शुक्लि से वषर आरम्भ हु ये। इतसके बाद सूमयर िसद्धान्त के कई
संशोधनन हु ये। मयासुर का संशोधनन जलि प्रलिय के बाद सत्ययुग समािप्तर्ष के अल्प (१२१ वषर ) बाद रोमकपत्न मे हु आ।
सूमयर िसद्धान्त प्रथम अध्याय-अल्पाविशष्टिे तु कृष्टते मयो नाम महासुरः। रहस्यं परमं पुण्यं िजज्ञासुज्ञारनमुत्मम्॥२॥
वेदाङमग्र्यिखलिं ज्योितषां गितकारणम्। आराधनयि अन्ववस्वन्तं तपस्तेपे सुदष्ु करम्॥३॥
तोिषतस्तपसा तेन प्रीतस्तस्मै वरािथर ने। ग्रहाणां चिरतं प्रादान्मयाय सिवता स्वयम्॥४॥
तस्मात् त्वं स्वां पुरीं गच्छ तत्र ज्ञानम् ददािम ते। रोमके नगरे ब्रह्मशापान् म्लिेच्छावतार धनृष्टक्॥ (पूमना, आनन्दाश्रवम प्रित)
शृण्वैकमनाः पूमवर यदक्ति
ु ं ज्ञानमुत्मम्। युगे युगे महषीणां स्वयमेव िववस्वता॥८॥
शास्त्रमाद्यं तदेवेदं यत्पूमवर प्राह भास्करः। युगानां पिरवतेन कालिभेदोऽत्र केवलिम्॥९॥
नवम श्लिोक की गूमढ़ाथर -प्रकािशका टीका मे रङनाथ जी ने िलिखा है-तथा च कालिवशेन ग्रहचारे िकिञ्चद्वैलिक्ष्यण्यं भवतीित
युगान्तरे तत्दनन्तरं ग्रहचारेषु प्रसाध्य तत्कालिि अस्थत लिोकव्यवहाराथर शास्त्रान्तरिमव कृष्टपालिु रुक्तिवािनिभनान्त शास्त्राणां
वैयथ्यर म्। एवञ्च मया वतर मान युगीय सूमयोक्ति शास्त्र िसद्धग्रहचारमङीकृष्टत्य सूमयोक्ति शास्त्रिसद्धं ग्रहचारं च प्रयोजनाभावादपु ेक्ष्य
तदक्ति
ु मेवत्यां प्रत्य्पिवश्यत इतित भावः। एवञ्च युग मध्येऽप्यवान्तर कालिे ग्रहचारेष्वन्तर दशर ने तत्त्कालिे तदन्तरं असाध्य
ग्रन्थास्तकालि वतर मानािभयुक्तिाः कुवर ि अन्त। तिददमन्तरं पूमवर ग्रन्थे वीजिमत्यामनि अन्त। पूमवरग्रन्थानां लिुप्तर्षत्वात् सूमय्यर िषर
संवादोऽपीदानीं न दृष्यत इतित। तदप्रिसिद्धरागम प्रामाण्याच्च नाशंक्या।
सुरासुराणामन्योन्यमहोरात्रं िवपयर यात्। षट् षिष्टिसंगुणं िदव्यं वषर मासुरमेव च॥१४॥
तद्द्वादशसहस्रािण चतुयर गु मुदाहृतम्। सूमयारब्दसंख्यया िद्वित्रसागरैरयुताहतैः॥१५॥
सन्ध्यासन्ध्यांशसिहतं िवज्ञेयं तच्चतुयर गु म्। कृष्टतादीनां व्यवस्थेयं धनमर पादव्यवस्थया॥१६॥
युगस्य दशमो भागः चतुिस्त्रद्व्य़ेक संगुणः। क्रमात्कृष्टतयुगादीनां षष्ठांऽशः सन्ध्ययोः स्वकः॥१७॥
युगानां सप्तर्षितस्सैका मन्वन्तरिमहोच्यते। कृष्टताब्दसङ्ख्या तस्यान्ते सि अन्धनः प्रोक्तिो जलिप्लिवः॥१८॥
(क) ज्योितष का ज्ञान िववस्वान् ने समय समय पर महिषर यो को िदया था। (श्लिोक ८) यहां प्रत्येक युग के िलिये अलिगअलिग ज्ञान देने की बात है। अतः प्रत्येक युग के िलिये अलिग गणना पद्धित होगी, जो अगलिे श्लिोक ९ मे भी स्पष्टि है। यहां
युग का क्या मान होगा यह िवचारणीय है। सूमयर िसद्धान्त मे १२००० िदव्य वषो ं के युग के अनुसार ग्रहगित की गणना है,
जहां िदव्य वषर = ३६० वषर (श्लिोक १४-१५) । िजस युग मे गणना मे संशोधनन करना है, वह कोई छोटा युग है। एक

सम्भावना है िक इतस युग मे िदव्य वषर का अथर सौर्र वषर है, िजस चक्र मे बीज संस्कार की चचार ब्रह्मगुप्तर्ष तथा भास्कर-२ ने
की हैखाभ्रखाकै (१२०००) हृताः कल्पयाताः समाः शेषकं भागहारात् पृष्टथक् पातयेत्।
यत्योरल्पकं तद् िद्वशत्या (२००) भजेिलिप्तर्षकाद्यं तत् ित्रिभः सायकैः (५)॥
पञ्च पञ्चभूमिमः (१५) करा (२) भ्यां हतं भानुचन्द्रेज्यशुक्रेन्दत
ु ुङेष्वृष्टणम्।
इतन्दन
ु ा (१) दस्रबाणैः (५२) करा (२)भ्यां कृष्टतभौमसौर्म्येन्दपु ातािकरषु स्वं क्रमात्। (िसद्धान्त िशरोमिण, भूमपिरिधन-७,८)
स्वोपज्ञ भाष्य-अत्रोपलिि अब्धनरेव वासना। यद्वषर सहस्रषटकं यावुपचयस्ततोऽपचय इतत्यत्रागम एव प्रमाणं नान्यत् कारणं वक्तिंु
शक्यत इतत्यथर ः।
ब्रह्मगुप्तर्ष-खखखाकर (१२०००) हृताब्देभ्यो गतगम्याल्पाः खशूमन्ययमलि (२००) हृताः।
लिब्धनं ित्र (३) सायकं (५) हतं कलिािभरनौर् सदाऽकेन्द ूम ॥६०॥
शिशवत् जीवे िद्वहतं चन्द्रोच्चे ितिथ (१५) हतं तु िसतशीघे।
द्वीषु (५२) हतं च बुधनोच्चे िद्व (२) कु (१) वेद हतं च पात कुज शिनषु॥६१॥
(ब्राह्मस्फुट िसद्धान्त, सुधनाकर िद्ववेदी संस्करण, मध्यमािधनकार)
(ख) यह आद्य िसद्धान्त है। इतसके पूमवर ब्रह्मा का िपतामह िसद्धान्त था, वह ब्रह्मा के कालि मे था िकन्तु आकाश के सूमयर की
गित पर ही आधनािरत था, या िजसने इतस िसद्धान्त की व्याख्या की उसे उस युग का सूमयर माना गया, भास्कर =सूमयर,
वराहिमिहर (िमिहर =सूमयर) आिद। यह पूमवरवती िपतामह िसद्धान्त के िवरुद्ध नहीं है, उसी की परम्परा मे है, अतः इतसे आद्य
कहा गया है।
(ग) श्लिोक २ मे कहा है िक सत्ययुग मे अल्प कालि बाकी था। पर श्लिोक २३ मे सत्ययुग के अन्त तक गणना दी गयी है।
इतसका सम्भािवत अथर है िक सत्ययुग से कुछ पूमवर मय असुर ने यह िसद्धान्त िनकालिा पर उसका व्यवहार सत्ययुग की
समािप्तर्ष से हु आ।
(घ) प्रित युग मे महिषर यो को ही सूमयर ज्ञान देते थे, पर इतस बार मय असुर को क्यो ज्ञान िदया? महिषर केवलि भारत या देव
जाित मे ही नही, वरन् असुरो मे भी हो सकते है। प्रहाद तथा िवभीषण को भी परम भागवत कहा गया है। ज्योितष मे िवश्व

के सभी भागो के स्थानो का िववरण है, जो परस्पर ९० अंश देशान्तर पर है। यह भी िदखाता है िक पूमरे िवश्व का सहयोग
तथा मानिचत्र आवश्यक है िजसके िबना चन्द्र तथा अन्य ग्रहो की दरूम ी नहीं ज्ञात हो सकती।
(ङ) पुराणो मे ९०-९० अंश देशान्तर के अन्य स्थानो की चचार है, जो इतससे पूमवर कालि का है।
(च) श्लिोक १८ मे मन्वन्तर की सि अन्धन के बाद जलि-प्लिव िलिखा है। मय असुर ने स्पष्टितः सत्ययुग के अन्त मे इतसका
प्रणयन िकया िजसके पूमवर सत्ययुग के आरम्भ मे जलि प्रलिय हु आ था। आधनुिनक भूमगभर -शास्त्र के अनुसार प्रायः १००००
ईसा पूमवर मे जलि-प्रलिय हु आ था, जो १०००-१५०० वषो ं तक था।
(छ) सृष्टिष्टि िनमारण मे श्लिोक २४ के अनुसार ४७४०० िदव्य वषर लिगे। यह अन्य िसद्धान्त ग्रन्थो ब्राह्म-स्फुट-िसद्धान्त या
िसद्धान्त-िशरोमिण आिद मे विणर त नहीं है। सम्भवतः जलि-प्रलिय के आद गणना को ठीक करने के िलिये मय असुर द्वारा
गिणत सूमत्र के संशोधनन के िलिये है, वास्तिवक सृष्टिष्टि िनमारण कालि नहीं है।
(ज) पूमरे िवश्व मे सवर -सम्मित से सूमयर िसद्धान्त के माप तथा गिणत िविधनयां मानी जाती थीं। मय असुर का संशोधनन भी
रोमक पत्न मे होने के बावजूमद िवश्व मे स्वीकृष्टत हु आ तथा भारत मे अभी भी प्रचिलित है। इतसके िलिये िकसी शिक्तिशालिी
राज्य के नेतृष्टत्व मे िवश्व सम्मेलिन अपेिक्षत है। िवश्व माप के ४ केन्द्र लिंका या उज्जैन, उससे ९० अंश दरूम ी पि अश्चम रोमकपत्न, १८० अंश पि अश्चम या पूमवर िसद्धपुर तथा ९० अंश पूमवर यमकोिटपत्न थे। जलि-प्रलिय के तुरत बाद भारत मे सभ्यता
का पुनः आरम्भ ऋषभदेव जी द्वारा हु आ, जो स्वायम्भुव मनु की तरह आरम्भ कायर करने के कारण उनके वंशज कहे गये है

तथा जैन धनमर के प्रथम तीथरकर है। वायु, मत्स्य, ब्रह्माण्ड आिद पुराणो मे २८ व्यासो की िगनती मे स्वायम्भुव मनु प्रथम
तथा ऋषभदेव ११वे कहे गये है।
(झ) १ युग = १२००० वषर के बाद पुनः संशोधनन की आवश्यकता होगी। क्या पुनः सूमयर का अवतार होगा? रंगनाथ जी के
अनुसार नहीं। संशोधनन कत्ार ही सूमयर का अवतार है।
(६) इतक्ष्वाकु कालि से भी कालि गणना आरम्भ हु ई थी। महािलिंगम के अनुसार उनका कालि १-११-८५७६ ई.पूम. चैत्र
शुक्लि प्रितपदा से हु आ। यह तंजाउर के मि अन्दरो की गणना के आधनार पर है।
(७) परशुर ाम पञ्चाङ-६१७७ ई.पूम.-परशुराम के िनधनन पर कलिम्ब (कोलम्) सम्वत्। परशुराम १९वे त्रेता मे थे। यहां १
युग खण्ड ३६० वषो ं का है। त्रेता मे १० खण्ड होगे। प्रथम १० खण्ड िववस्वान् के पूमवर बीत गये। उनके बाद के त्रेता मे
११वां खण्ड आरम्भ हु आ, तभी १० से अिधनक खण्ड सम्भव है। दस
ूम रा त्रेता ९१०२ ई.पूम. मे आरम्भ हु आ, उसमे ८ त्रेता
९१०२ - ८ x ३६० = ६२२२ ई.पूम. मे बीते। उससे ३६० वषो ं के भीतर परशुराम का कालि है। सहस्र वषो ं को छोड़ने पर
८२४ ई. मे कोलम सम्वत् आरम्भ हु आ, अतः परशुराम कालि ७०००-८२३ मे होगा (० वषर नहीं िगना जाता है)। इतसका
अन्य प्रमाण है िक मेगास्थनीज ने िसकन्दर से ६४५१ वषर ३ मास पूमवर अथारत् ६७७७ ई.पूम. अप्रैलि मास मे डायोिनसस का
भारत आक्रमण िलिखा है िजसमे पुराणो के अनुसार सूमयरवंशी राजा बाहु मारा गया थ। उससे १५ पीढ़ी बाद हरकुलिस (िवष्णुपृष्टथ्वी को धनरण करने वालिा-पृष्टिथवी त्वया धनृष्टता लिोकाः, देिव त्वं िवष्णुना धनृष्टता) का जन्म हु आ। इतस कालि के िवष्णु अवतार
परशुराम थे। उनका कालि प्रायः ६०० वषर बाद आता है जो १५ पीढ़ी का कालि है। मयासुर के ३०४४ वषर बाद ऋतु १.५
मास पीछे िखसक गया था अतः नये सम्वत् का प्रचलिन हु आ।
(८) किलि के पञ्चाङ-राम का जन्म ११-२-४४३३ ई.पूम. मे हु आ था पर उस कालि के िकसी पञ्चाङ का उलेख नहीं है।
परशुराम के ३००० वषर बाद किलियुग आरम्भ मे ही नये पञ्चाङ की आवश्यकता हु यी। युिधनिष्ठर कालि मे ४ प्रकार के
पञ्चाङ हु ये-(क) युिधनिष्ठर शक-यह उनके राज्यािभषेक के िदन १७-१२-३१३९ ई.पूम. से हु आ। उसके ५ िदन बाद
उत्रायण माघशुक्लि सप्तर्षमी को हु आ। अतः अिभषेक प्रितपदा या िद्वतीया को था। (ख) किलि सम्वत्-शासन के ३६ वषर से
कुछ अिधनक बीतने पर १७-२-३१०२ ई.पूम. उज्जैन मध्यराित्र से किलियुग आरम्भ हु आ जब भगवान् कृष्टष्ण का देहान्त
हु आ। उसके २िदन २-२७-३० घं.िम.से. बाद २०-२-३१०२ ई.पूम २-२७-३० घं.िम.से. से चैत्र शुक्लि प्रितपदा आरम्भ
हु आ। (ग) जयाभ्युदय शक-भगवान् कृष्टष्ण के देहान्त के ६ मास ११ िदन बाद २२-८-३१०२ ई.पूम. को जब िवजय के
बाद जय सम्वत्सर आरम्भ हु आ, तो युिधनिष्ठर ने अभ्युदय के िलिये सन्यास िलिया। यह परीिक्षत शासन से आरम्भ होता है
तथा जनमेजय ने इतसी का प्रयोग अपने दान-पत्रो मे िकया है। (घ) किलि के २५ वषर बीतने पर कश्मीर मे युिधनिष्ठर का
देहान्त हु आ जब सप्तर्षिषर मघा से िनकलिे। उस समय (३०७६ ई.पूम. मेष संक्राि अन्त) से लिौर्िकक या सप्तर्षिषर सम्वत्सर आरम्भ
हु आ जो कश्मीर मे प्रचिलित था तथा राजतरिङणी मे प्रयुक्ति है।
(९) भटाब्द-आयर भट कालि से केरलि मे भटाब्द प्रचिलित था। महाभारत कालि मे २ प्रकार के िसद्धान्त प्रचिलित थे।
पराशर मथ तथा आयर मत। यहां पराशर मत पराशर द्वारा िलििखत िवष्णुपरु ाण मे है जो मैत्रेय ऋिष ने उनको खण्ड १ तथा
२ मे कहा है। यह सूमयर िसद्धान्त की परम्परा मे है, अतः ऋिष को मैत्रेय (िमत्र =सूमयर, सौर्र वषर का प्रथम मास, उत्रायण
से) कहा गया है। िद्वतीय मत आयर मत है जो स्वायम्भुव मनु की परम्परा से था। इतसकी परम्परा मे किलि के कुछ बाद
(३६० वषर ) आयर भट ने आयर भटीय िलिखा। िववस्वान् या सूमयर िपता है, उनके पूमवर के स्वायम्भुव मनु ब्रह्मा या िपतामह है।
आज भी आयर (अजा)का अथर पटना के िनकट तथा ओिडशा आिद मे िपतामह होता है।

(१०) जैन यु ि धनिष्ठर शक-िजनिवजय महाकाव्य का जैन युिधनिष्ठर शक ५०४ युिधनिष्ठर शक (२६३४ ई.पूम.) मे आरम्भ
होता है। इतसके अनुसार कुमािरलि भट का जन्म ५५७ ई.पूम. (२०७७) क्रोधनी सम्वत्सर (सौर्र मत) मे तथा शंकराचायर का
िनवारण ४७७ ई.पूम. (२१५७) राक्षस सम्वत्सर मे कहा हैऋिष(७)वारर (७)स्तथा पूमणर(०) मत्यारक्षौर् (२) वाममेलिनात्. एकीकृष्टत्य लिभेताङ्कख् क्रोधनीस्यात्त्र वत्सरः॥
भटाचायर कुमारस्य कमर काण्डैकवािदनः। ज्ञेयः प्रादभ
ु र वस्ति अस्मन् वषे यौर्िधनिष्ठरे शके॥
ऋिष(७)बारण(५) तथा भूमिम(१)मर त्यारक्षौर् (२) वाममेलिनात्, एकत्वेन लिभेताङ्कस्तम्राक्षास्तत्र वत्सरः॥ (शंकर िनधनन)
यह पाश्वर नाथ का संन्यास या िनधनन कालि है। उनका संन्यास पूमवर नाम युिधनिष्ठर रहा होगा या वे वैसे ही धनमर राज या
तीथर ङ्कर थे। भगवान् महावीर (जन्म ११-३-१९०२ ई.पूम.) मे पाश्वर नाथ का ही शक चलि रहा था। युिधनिष्ठर की ८ वीं पीढ़ी
मे िनचक्षु के शासन मे हि अस्तनापुर डूम ब गया था- यह सरस्वती नदी के सूमखने का पिरणाम था। उस समय १०० वषर की
अनावृष्टिष्टि कही गयी है जब दिु भर क्ष रोकने के िलिये शताक्षी या शाकम्भरी अवतार हु आ।
दगु ार-सप्तर्षशती (११/४६-४९)भूमयश्च शतवािषर क्यामनावृष्टष्ट्यामनम्भिस। मुिनिभः संस्तुता भूममौर् सम्भिवष्याम्ययोिनजा॥४६॥
ततः शतेन नेत्राणां िनरीिक्षष्यािम यन्मुनीन्। कीतर ियष्यि अन्त मनुजाः शताक्षीिमित मां ततः॥४७॥
ततोऽहमिखलिं लिोकमात्मदेहसमुद्भवैः। भिरष्यािम सुराः शाकैरावृष्टष्टिेः प्राणधनारकैः॥४८॥
शाकम्भरीित िवख्याितं तदा यास्याम्यहं भुिव। तत्रैव च विधनष्यािम दगु र माख्यं महासुरम्॥४९॥
िवष्णु पुराण (४/२१)-अतः परं भिवष्यानहं भूमपालिान्कीतर ियष्यािम॥१॥ योऽयं साम्प्रतमवनीपितः परीिक्षत्स्यािप जनमेजयश्रवुतसेनो-ग्रसेन-भीमसेनश्चत्वारः
याज्ञवल्क्याद्वेदमधनीत्य

पुत्राः

कृष्टपादस्त्राण्यवाप्य

भिवष्यि अन्त॥२॥

जनमेजयस्यािप

िवषम-िवषय-िवरक्ति-िचत्वृष्टित्श्च

शतानीको

भिवष्यित॥३॥

शौर्नकोपदेशादात्म-ज्ञान-प्रवीणः

योऽसौर्
परं

िनवारणमवाप्स्यित॥४॥ शतानीकादश्वमेधनदत्ो भिवता॥५॥ तस्मादप्यिधनसीमकृष्टष्णः॥६॥ अिधनसीमकृष्टष्णािन्नचक्षुः॥७॥ यो
गङयापहृते हि अस्तनापुरे कौर्शाम्ब्यां िनवत्स्यित॥८॥
उसकी दो पीढ़ी बाद वाराणसी के राजपिरवार मे पाश्वर नाथ जी का जन्म हु आ। दिु भर क्ष मे कई वैज्ञािनक तथा अन्य शास्त्र
नष्टि हो गये।
(११) िशशुन ाग कालि-पालि िबगण्डेट की पुस्तक बमार की बौर्द्ध परम्परा मे बुद्ध िनवारण से अजातशत्रु कालि मे एक नये वषर
का आरम्भ कहा गया है (बमी मे इतत्यान = िनवारण)। इतसके १४८ वषर पूमवर अन्य वषर आरम्भ हु आ था िजसे बमी मे
कौर्जाद (िशशुनाग?) कहा है। बुद्ध िनवारण (२७-३-१८०७ ई.पूम.) से १४८ वषर पूमवर १९५४ ई.पूम. मे िशशुनाग का शासन
समाप्तर्ष हु आ।
(१२) नन्द शक-महापद्मनन्द का अिभषेक सभी पुराणो का िवख्यात कालिमान है। यह परीिक्षत जन्म के १५०० (१५०४)
वषर बाद हु आ था। इतसमे १५०० को पािजर टर ने १०५० कर िदया िजससे किलि आरम्भ को बाद का िकया जा सके।
खारावेलि िशलिालिेख मे भी िलिखा है िक नन्द अिभषेक के ित्रवसुशत (८०३) वषर के बाद उसके शासन के ४ वषर पूमणर हु ये
जब उसने प्राची नहर की मरम्मत करायी। यह नन्द कालि मे बनी थी। यहां ’ ित्रवसु शत’ को ’ ित्रवषर शत’ कर इतितहासकारो
ने १०३ या ३००वषर आिद मनमाने अथर िकये है।
यावत् परीिक्षतो जन्म यावत् नन्दािभषेचनम् । तावत् वषर सहस्रं च ज्ञेयं पञ्चशतोत्रम् ॥ (िवष्णु पुराण, ४/२४/१०४) यहां
पञ्चशतोत्रम् (१५००) को पञ्चाशतोत्रम् कर िदया है।

आयर भटीय (१/५)-काहो मनवो ढ, मनुयगु ाः श्ख, गतास्ते च, मनुयगु ाः छ्ना च।
कल्पादेयर गु पादा ग च, गुरु िदवसाच्च, भारतात् पूमवरम्॥
धनूमसीकालि (३१७९)-युतः शाकः कल्यब्द इतित कीितर तः॥ (वाक्यकरण, १/२)
गतवषारन्त कोलिम्बवषारः तरळगा (३९२६) ि अस्थताः।
कल्यब्दा धनीस्थकालिा (३१७९) ढ्याः शकाब्दा वा भवि अन्त ते॥ (पुतुमन सोमयाजी, करण पद्धित)
भागवत पुराण (१२/२/३)-यि अस्मन् कृष्टष्णो िदवं यातस्ति अस्मन्नेव तदाहिन। प्रितपन्नं किलियुगिमित प्राहु ः पुरािवदः॥
(१/१५/३७) यदा मुकुन्दो भगवािनमां महीं जहौर् स्वतन्त्रा श्रववणीय सत्कथः।
तदाहरे वा प्रितबुद्धचेतसामधनमर हेतुः किलिरन्ववतर त॥
लिल-िशष्यधनीवृष्टिद्धदतन्त्र(१/१२)-नवािद्रचन्द्रानलिसंयत
ु ोभवेच्छकिक्षतीशाब्दगणो गतः कलिेः।
िदवाकरघ्नो गतमाससंयत
ु ः कुविह्निनिनघ्नि अस्तिथिभः समि अन्वतः॥
भास्कर-२ (िसद्धान्त िशरोमिण १/२८)-याताः षण्मनवो युगािन भिमतान्यन्यद्युगाि अङ्घत्रयं,
नन्दाद्रीन्दगु ुणा (१३७९) स्तथा शकनृष्टपस्यान्ते कलिेवरत्सराः।
(१३) शूमद्र क शक-यह ७५६ ई.पूम. मे आरम्भ हु आ। जेम्स टाड ने सभी राजपूमत राजाओं को िवदेशी शक मूमलि का िसद्ध
करने के िलिये उनकी बहु त सी वंशाविलियां तथा ताम्रपत्र आिद नष्टि िकये तथा राजस्थान कथा (Annals of
Rajsthan) मे अिग्निवंशी राजाओं का कालि थोड़ा बदलि कर प्रायः ७२५ ई.पूम. कर िदया।
काञ्चुयलायर भट-ज्योितष दपर ण-पत्रक २२ (अनूमप संस्कृष्टत लिाइतब्रेरी, अजमेर एम्.एस नं ४६७७)बाणाि अब्धन गुणदस्रोना (२३४५) शूमद्रकाब्दा कलिेगरताः॥७१॥ गुणाि अब्धन व्योम रामोना (३०४३) िवक्रमाब्दा कलिेगरताः॥
इतस समय असुर (असीिरया के नबोनासर आिद) आक्रमण को रोकने के िलिये ४ प्रमुख राजवंशो का संघ आबूम पवर त पर
िवष्णु अवतार बुद्ध की प्रेरणा से बना। इतन राजाओं को अग्रणी होने के कारण अिग्निवंशी कहा गया-परमार, प्रितहार, चालिुक्य
तथा चाहमान।
भिवष्य पुराण, प्रितसगर पवर (१/६)एति अस्मन्नेवकालिे तु कान्यकुब्जो िद्वजोत्मः। अबुरदं िशखरं प्राप्य ब्रह्महोममथाकरोत्॥४५॥
वेदमन्त्रप्रभावाच्च जाताश्चत्वािर क्षित्रयाः। प्रमरस्सामवेदी च चपहािनयर जुिवर दः॥४६॥
ित्रवेदी च तथा शुक्लिोऽथवार स पिरहारकः॥४७॥ अवन्ते प्रमरो भूमपश्चतुयोजन िवस्तृष्टता।।४९॥
प्रितसगर (१/७)-िचत्रकूमटिगिरदेशे पिरहारो महीपितः। कािलिंजर पुरं रम्यमक्रोशायतनं स्मृष्टतम्॥१॥
राजपुत्राख्यदेशे च चपहािनमर हीपितः॥२॥ अजमेरपुरं रम्यं िविधनशोभा समि अन्वतम्॥३॥
शुक्लिो नाम महीपालिो गत आनतर मण्डलिे। द्वारकां नाम नगरीमध्यास्य सुिखनोऽभवत्॥४॥
४ राजाओं का संघ होने के कारण यह कृष्टत संवत् भी कहा जाता है तथा इतन्द्राणीगुप्तर्ष को सम्मान के िलिये शूमद्रक कहा गयाशूमद्र ४ जाितयो का सेवक है।
(१४) चाहमान शक-िदली कॆ चाहमान राजा ने ६१२ ईसा पूमवर मे असीिरया की राजधनानी िननेवे को पूमरी तरह ध्वस्त कर
िदया, िजसका उलेख बाइतिबलि मे कई स्थानो पर है। इतसके नष्टिकत्ार को िसन्धनु पूमवर के मधनेस (मध्यदेश, िवन्ध्य तथा
िहमालिय के बीच) का शासक कहा गया है।
http://bible.tmtm.com/wiki/NINEVEH_%28Jewish_Encyclopedia%29-

The Aryan Medes, who had attained to organized power east and northeast of
Nineveh, repeatedly invaded Assyria proper, and in 607 succeeded in destroying
the city
Media-From BibleWiki (Redirected from Medes)-They appear to have been a branch
of the Aryans, who came from the east bank of the Indus, …
इतस समय जो शक आरम्भ हु आ उसका उलेख वराहिमिहर की बृष्टहत् संिहता मे है तथा कािलिदास, ब्रह्मगुप्तर्ष ने भी इतसी का
पालिन िकया है। वराहिमिहर-बृष्टहत् संिहता (१३/३)आसन् मघासु मुनयः शासित पृष्टथ्वीं युिधनिष्ठरे नृष्टपतौर्। षड् -िद्वक-पञ्च-िद्व (२५२६) युतः शककालिस्तस्य राज्ञस्य॥
(१५) श्रवीहषर शक (४५६ ईसा पूमवर)-इतसका उलेख अलिबरिन ने िकया है। शूमद्रक के बाद ३०० वषर तक मालिवगण चलिािजसे मेगस्थनीज ने ३०० वषो ं का गणराज्य कहा है। िलिच्छवी तथा गुप्तर्ष राजाओं ने इतसका प्रयोग िकया है पर इतसे िनरक्षर
इतितहासकारो ने हषर वधनर न (६०५-६४६ इतस्वी) से जोड़ िदया है।
(१६) िवक्रम सं व त्-५७ ईसा पूमवर मे उज्जैन के परमार वंशी राजा िवक्रमािदत्य (८२ ईसा पूमवर-१९ ईस्वी) ने आरम्भ
िकया। उनका राज्य (परोक्षतः) अरब तक था तथा जुिलिअस सीजर के राज्य मे भी उनके संवत् के ही अनुसार सीजर के
आदेश के ७ िदन बाद िवक्रम वषर १० के पौर्ष कृष्टष्ण मास के साथ वषर का आरम्भ हु आ।
History of the Calendar, by M.N. Saha and N. C. Lahiri (part C of the Report of The
Calendar Reforms Committee under Prof. M. N. Saha with Sri N.C. Lahiri as secretary
in November 1952-Published by Council of Scientific & Industrial Research, Rafi
Marg, New Delhi-110001, 1955, Second Edition 1992.
Page, 168-last para-“Caesar wanted to start the new year on the 25th December,
the winter solstice day. But people resisted that choice because a new moon was
due on January 1, 45 BC. And some people considered that the new moon was
lucky. Caesar had to go along with them in their desire to start the new reckoning
on a traditional lunar landmark.”
यहां िबना गणना के मान िलिया गया है िक वषर आरम्भ के िदन शुक्लि पक्ष का आरम्भ था, पर वह िवक्रम सम्वत् के पौर्ष
मास का आरम्भ था। केवलि िवक्रम वषर मे ही चान्द्र मास का आरम्भ कृष्टष्ण पक्ष से होता है. बाकी सभी शुक्लि पक्ष से
आरम्भ होते है। इतसी िवक्रमािदत्य के दरबार मे कािलिदास, वराहिमिहर आिद ९ रत्न िवख्यात थे।
(१७) शािलिवाहन शक-िवक्रमािदत्य के देहान्त के बाद ५० वषर तक भारत िवदेशी आक्रमणो का िशकार रहा। तब उनके
पौर्त्र शािलिवाहन ने उनको परािजत कर िसन्धनु के पि अश्चम भगा िदया। उनके कालि मे प्राकृष्टत भाषाओं का प्रयोग राजकायर मे
आरम्भ हु आ। इतनके कालि मॆ ईसा मसीह ने कश्मीर मे शरण िलिया (हजरत बालि) ।
(१८) कलिचुि र या चेिद शक (२४६ इतसवी),
(१९) वलिभी भं ग (३१९ ईस्वी)-गुप्तर्ष राजाओं की परवत्ी शाखा गुजरात के वलिभी मे शासन कर रही थी िजसका अन्त
इतस समय हु आ। िनरक्षर इतितहासकार इतसके १ वषर बाद गुप्तर्ष कालि का आरम्भ कहते है।

Sign up to vote on this title
UsefulNot useful