अजकी शुभ तिति– पौष शुक्ल षष्ठी, तव.सं.

–२०६९, गुरुवार

काम-क्रोधसे छू टनेका उपाय
तजिने भी ऄसि् पदािथ ऄिाथि् उत्पति-तवनाशशील वस्िुएँ हैं, उनके दो तवभाग हैं‒(१) शरीर, रुपये, मकान अदद पदािथ और (२) काम, क्रोध, लोभ अदद वृतियाँ । जैसे पदािथ उत्पन्न होिे हैं और तमट जािे हैं, ऐसे ही वृतियाँ भी उत्पन्न होिी हैं और तमट जािी हैं । पदािों और वृतियाँका िो ऄभाव हो जािा है, पर सि् वस्िुका कभी ऄभाव नहीं होिा । हमारा स्वरुप सि् है और उसका ऄभाव कभी हुअ नहीं, है नहीं, होगा नहीं ििा हो सकिा ही नहीं । आसके तवपरीि ऄसि् वस्िुका ऄतस्ित्व कभी हुअ नहीं, है नहीं, होगा नहीं और हो सकिा ही नहीं । ऄिः हम जो यह लोभ करिे हैं दक रुपये बने रहें, शरीर बना रहे, कु टु म्ब बना रहे, यह हम गलिी करिे हैं । ऐसे ही हम जो यह भय करिे हैं दक कामना अ गयी, क्रोध अ गया, लोभ अ गया, तवषमिा अ
स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज

आसतलये आनको बने रहना चातहये । काम. क्रोध अदद हैं. क्रोध अदद वृतियाँके अनेसे साधकको घबराना नहीं चातहये । स्िूलदृतिसे भी देखें िो काम. उसकी सिा ही नहीं है ! ऄसि्की सिा तवद्यमान नहीं है‒‘नासिो तवद्यिे भावः’ (गीिा २/१६) । जो कभी है और कभी नहीं है. स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज . क्रोध अदद नहीं रहें‒आसका ऄिथ यह हुअ दक काम. ये वृतियाँ नहीं रहनी चातहये.गयी. क्रोध अदद हरदम नहीं रहिे । काम पैदा हुअ िो पैदा होिे ही नि होना शुरू हो गया । क्रोध पैदा हुअ िो पैदा होिे ही नि होना शुरू हो गया । मोह पैदा हुअ िो पैदा होिे ही नि होना शुरू हो गया । नि होना क्या शुरू हो गया. आसतलये आनको नहीं रहना चातहये । िात्पयथ यह हुअ दक पदािोंको रखनेकी आच्छा करना और वृतियोंको तमटानेकी आच्छा करना‒दोनों आच्छाएँ ऄसि् वस्िु (पदािथ और वृति) की सिा माननेसे ही पैदा होिी हैं । काम. यह भी हम गलिी करिे हैं । कारण दक तजनका ऄतस्ित्व ही नहीं है. उनके बने रहनेकी आच्छा करना भी गलिी है और उनके न अनेकी आच्छा करना भी गलिी है । पदािथ बने रहें‒आसका ऄिथ यह हुअ दक पदािथ हैं. वह वास्िवमें कभी नहीं है । तजसका कभी भी ऄभाव है.

क्रोध. यही वास्िवमें भूल है । ऄब तजिना ही उनको तमटानेका उद्योग करोगे. प्रत्युि उसको दृढ़ करनेका हो जािा है. न स्वभावमें हैं । (शेष अगेके ब्लॉगमें) ‒‘तनत्ययोगकी प्राति’ पुस्िकसे स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज . क्योंदक सिा मानकर ही तमटाना होिा है । तजन पदािोंको अप रखना चाहिे हैं. क्रोध अदद हमारे में हैं ही नहीं‒ऐसा एक तनश्चय कर लें । जो सच्ची बाि है. उनकी भी सिा नहीं है । मेरेमें काम है. उसका सम्पूणथ पररतस्ितियोंमें ऄभाव है । ऄिः हम काम. लोभ अददसे भयभीि होिे हैं िो यह गलिी है । िो दिर क्या करें ? ये काम.उसका सदा ही ऄभाव है । तजसका दकसी भी जगह ऄभाव है. क्रोध है‒आस िरह अप उनको सिा देिे हैं. उस बािको पकड़ लें । सच्ची बािको पकड़नेका नाम ही साधन है । जो पहलेसे ही तमटा हुअ है. उिना ही वे दृढ़ होंगे । ऄिः मूलमें उनकी सिा ही नहीं है‒आस बािपर दृढ़ रहें ऄिाथि् उनके ऄभावका ऄनुभव करें दक वास्िवमें वे न स्वरूपमें हैं. उसका समपूणथ व्यतियोंमें ऄभाव है । तजसका दकसी भी पररतस्ितिमें ऄभाव है. उसको क्या तमटायें ? तजसका ऄभाव है. उसका सब जगह ही ऄभाव है । तजसका दकसी भी व्यतिमें ऄभाव है. उसकी सिा मानकर अप उसको तमटानेका उद्योग करिे हैं. पर वास्िवमें उद्योग उसको तमटानेका नहीं होिा.

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