You are on page 1of 5

सूर्यर ग्रहण मे जप करने का सं क ल्प

ॐ िविष्णुिविर ष्णुिविर ष्णुः श्रीमद् भगवितोमहापुरुषस्य िविष्णोराज्ञया प्रवित्रमानस्य अद ब्रह्मणोि दन्ह िद्वितितय पराधे श्रीश्विेतविाराहकल्पे
सप्तमे विैविस्वितमन्विन्तरे अष्टािविंशतित तमे किलियुगे किलिप्रथमचरणे जम्बूर्द्वितीपे भरतखण्डे भारतविषे आर्यारवितैकदेशते िविक्रमनाम संवितरे
अत्राद महामंगल्य फलिप्रद मासोत्मे मासे पुण्यपिवित्र श्राविणमासे शतुभे कृष्ण पक्षे अमाविस्या ितथौ सौम्याविासरे अद श्रीसूर्यरग्रहण
पुण्यकालिे अस्माकं सदगुरुदेविं पादानां परम पूर्ज्य संत श्री आर्सारामजी बापूर्नां पिरविार सिहतानां च आर्युआर्रोग्य ऐश्वियर यशतः कीर्तितर पुिष्ट
विृिद्धिअथे तथा समस्त जगित राजहारे सविर त्र सुखशतांित यशतोिविजय लिाभािद प्राप्तयथे, सविोपद्रवि शतमनाथे, महामृत्युंजय मंत्रस्य तथा ॐ
ह्री, ॐ ह्रूर्ं िविष्णविे नमः, ॐ क्रो ह्री आर्ं विैविस्ताय धमर राजाय भक्तानुग्रह कृते नमः स्विाहा, ॐ ह्रां ह्री ह्रो सः श्री सूर्यारय नमः इत्यािद मंत्राणां
च जपं अहं किरष्ये।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

'आर्िदत्यहृदय स्तोत्र'
िवििनयोग
ॐ अस्य आर्िदत्य हृदयस्तोत्रस्यागस्त्यऋषिषरनुष्टुपछन्दः, आर्िदत्येहृदयभूर्तो
भगविान ब्रह्मा देविता िनरस्ताशतेषिविघ्नतया ब्रह्मिविदािसद्धिौ सविर त्र जयिसद्धिौ च िवििनयोगः।
ऋषष्यािदन्यास
ॐ अगस्त्यऋषषये नमः, िशतरिस। अनुष्टुपछन्दसे नमः, मुखे। आर्िदत्यहृदयभूर्तब्रह्मदेवितायै नमः हृिद।
ॐ बीजाय नमः, गुह्यो। रि दश्ममते शतक्तये नमः, पादयो। ॐ तत्सिवितुिरत्यािदगायत्रीकीर्तलिकाय नमः नाभौ।
करन्यास
ॐ रि दश्ममते अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ समुदते तजर नीभ्यां नमः।
ॐ देविासुरनमस्कृताय मध्यमाभ्यां नमः। ॐ िविविरविते अनािमकाभ्यां नमः।
ॐ भास्कराय किनिष्ठकाभ्यां नमः। ॐ भुविनेश्विराय करतलिकरपृष्ठाभ्यां नमः।
हृदयािद अं ग न्यास
ॐ रि दश्ममते हृदयाय नमः। ॐ समुदते िशतरसे स्विाहा। ॐ देविासुरनमस्कृताय िशतखायै विषट् ।
ॐ िविविस्विते कविचाय हु म्। ॐ भास्कराय नेत्रत्रयाय विौषट् । ॐ भुविनेश्विराय अस्त्राय फट् ।
इस प्रकार न्यास करके िनम्नांिकत मंत्र से भगविान सूर्यर का ध्यान एविं नमस्कार करना चािहएॐ भूर्भर ुविः स्विः तत्सिवितुविररण्े यं भगो देविस्य धीमिह िधयो यो नः प्रचोदयात्।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

आर्िदत्यहृदय स्तोत्र
ततो यु द्धि पिरश्रान्तं समरे िचन्तया ि दस्थतम्।
राविणं चाग्रतो दृष्टविा यु द्धि ाय समुप ि दस्थतम्। ।1।।

श्रीराम के पास जाकर बोलिे। राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्यं सनातनम्। ये न सविारन रीन् वित्स समरे िविजियष्यसे । ।3।। 'सबके हृदय मे रमण करने विालिे महाबाहो राम ! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो। वित्स ! इसके जप से तुम युद्धि मे अपने समस्त शतत्रुओं पर िविजय पा जाओगे।' आर्िदत्यहृदयं पुण् यं सविर शतत्रुि विनाशतनम्। जयाविहं जपं िनत्यमक्षयं परमं िशतविम्। ।4।। सविर मं ग लिमांग ल्यं सविर पापप्रणाशतनम्। िचन्ताशतोकप्रशतमनमायु विर धै न मुत् मम्। ।5।। 'इस गोपनीय स्तोत्र का नाम है 'आर्िदत्यहृदय'। यह परम पिवित्र और सम्पूर्णर शतत्रुओं का नाशत करने विालिा है। इसके जप से सदा िविजय कीर्त प्रािप्त होती है। यह िनत्य अक्ष्य और परम कल्याणमय स्तोत्र है। सम्पूर्णर मंगलिो का भी मंगलि है। इससे सब पापो का नाशत हो जाता है। यह िचन्ता और शतोक को िमटाने तथा आर्यु को बढ़ाने विालिा उत्म साधन है।' रि दश्ममन्तं समुद न्तं दे वि ासुर नमस्कृ तम्। पूर्ज यस्वि िविविस्विन्तं भास्करं भुवि ने श् विरम्। ।6।। 'भगविान सूर्यर अपनी अनन्त िकरणो से सुशतोिभत (रि दश्ममान्) है। ये िनत्य उदय होने विालिे (समुदन्). विसु. ऋषतुओं को प्रकट करने विालिे तथा प्रभा के पुंज है।' . िविविस्विान् नाम से प्रिसद्धि. प्रभा का िविस्तार करने विालिे (भास्कर) और संसार के स्विामी (भुविनेश्विर) है। तुम इनका (रि दश्ममते नमः. स्कन्द. प्रजापित. िशतवि. कालि. िविविस्विते नमः. अिग. देविासुरनमस्कताय नमः. मरुदगण. प्रजा. समुदते नमः. चन्द्रमा. देविता और असुरो से नमस्कृत. विरूण. अि दश्विनीकुमार. भास्कराय नमः. साध्य. यम. इन्द्र. िविष्णु. भुविनेश्विराय नमः इन नाम मंत्रो के द्वितारा) पूर्जन करो।' सविर दे वि ाात्म को ह्ये ष ते ज स्विी रि दश्मभाविनः। एष दे वि ासुर गणाँल्ल ोकान् पाित गभि दस्तिभः।। 7।। 'सम्पूर्णर देविता इन्ही के स्विरूप है। ये तेज कीर्त रािशत तथा अपनी िकरणो से जगत को सत्ा एविं स्फूर्ितर प्रदान करने विालिे है। ये ही अपनी रि दश्मयो का प्रसार करके देविता और असुरो सिहत सम्पूर्णर लिोको का पालिन करते है।' एष ब्रह्मा च िविष्णु श् च िशतविः स्कन्दः प्रजापितः। महे न् द्रो धनदः कालिो यमः सोमो ह्यपां पितः।।8।। िपतरो विसविः साध्या अि दश्विनौ मरुतो मनुः । विायु विर ि दन्हः प्रजाः प्राण ऋषतुक तार प्रभाकरः।।9।। 'ये ही ब्रह्मा. कुबेर. मनु. िपतर.दै वि तै श् च समागम्य द्रष्टु मभ्यागतो रणम्। उपगम्याब्रविीद् राममगरत्यो भगविांस् तदा।। 2।। उधर श्री रामचन्द्रजी युद्धि से थककर िचन्ता करते हु ए रणभूर्िम मे खड़े थे। इतने मे राविण भी युद्धि के िलिए उनके सामने उपि दस्थत हो गया। यह देख भगविान अगस्त्य मुिन. प्राण. जो देविताओं के साथ युद्धि देखने के िलिए आर्ये थे. विायु.

सहस्रािचर (हजारो िकरणो से सुशतोिभत). आर्तपी (घाम उत्पन करने विालिे). सिविता (जगत को उत्पन करने विालिे). सूर्यर (सविर व्यापक). तपन (गमी पैदा करने विालिे). पूर्षा (पोषण करने विालिे). मृत्यु (मौत के कारण). रक्त (लिालि रंगविालिे). हिरदश्वि (िदशताओं मे व्यापक अथविा हरे रंग के घोड़े विालिे). शतम्भूर् (कल्याण के उदगमस्थान). िहरण्यगभर (ब्रह्मा). िविश्वि (सविर स्विरूप). नक्षत्र. त्विष्टा (भक्तो का दःु ख दरूर् करने अथविा जगत का संहार करने विालिे).आर्िदत्यः सिविता सूर्यर ः खगः पूर्ष ा गभारि द स्तमान्। सुवि णर सदृशतो भानुि हरण्यरे त ा िदविाकरः।।10।। हिरदश्विः सहस्रािचर ः सप्तसिप्तमर रीिचमान्। ितिमरोन्मथनः शतम्भूर्स् त्ष्टा मातर ण्डकोऽशतुम ान्। ।11।। िहरण्यगभर ः िशतिशतरस्तपनोऽहरकरो रिविः। अिगगभोऽिदते ः पुत्र ः शतं ख ः िशतिशतरनाशतनः।।12।। व्योमनाथस्तमोभे द ी ऋषम्यजुः सामपारगः। घनविृि ष्टरपां िमत्रो िविन्ध्यविीथीप्लिविं ग मः।।13।। आर्तपी मण्डलिी मृत् यु ः िपं ग लिः सविर तापनः। किवििविर श्विो महाते ज ा रक्तः सविर भविोदभविः।।14।। नक्षत्रग्रहताराणामिधपो िविश्विभाविनः। ते ज सामिप ते ज स्विी द्वितादशतात्मन् नमोऽस्तु ते । ।15।। 'इन्ही के नाम आर्िदत्य (अिदितपुत्र). व्योमनाथ (आर्काशत के स्विामी). सुविरणसदृशत. ग्रह और तारो के स्विामी. अिगगभर (अिग को गभर मे धारण करने विालिे). सविर तापन (सबको ताप देने विालिे). अपां िमत्र (जलि को उत्पन करने विालिे). अंशतुमान (िकरण धारण करने विालिे). सविर भविोदभवि (सबकीर्त उत्पित् के कारण). िविश्विभाविन (जगत कीर्त रक्षा करने विालिे). शतंख (आर्नन्दस्विरूप एविं व्यापक). तेजि दस्वियो मे भी अित तेजस्विी तथा द्वितादशतात्मा (बारह स्विरूपो मे अिभव्यक्त) है। (इन सभी नामो से प्रिसद्धि सूर्यरदेवि !) आर्पको नमस्कार है।' नमः पूर्वि ारय िगरये पि दश्चमायाद्रये नमः। ज्योितगर णानां पतये िदनािधपतये नमः।।16।। 'पूर्विरिगरी उदयाचलि तथा पि दश्चमिगिर अस्ताचलि के रूप मे आर्पको नमस्कार है। ज्योितगर णो (ग्रहो और तारो) के स्विामी तथा िदन के अिधपित आर्पको प्रणाम है।' जयाय जयभद्राय हयर श्विाय नमो नमः। . रिवि (सबकीर्त स्तुित के पात्र). गभि दस्तमान् (प्रकाशतमान). यजुः और सामविेद के पारगामी. खग (आर्काशत मे िविचरने विालिे). मण्डलिी (िकरणसमूर्ह को धारण करने विालिे). िशतिशतर (स्विभावि से ही सुख देने विालिे). अिदितपुत्र. िदविाकर (राित्र का अन्धकार दरूर् करके िदन का प्रकाशत फैलिाने विालिे). तमोभेदी (अन्धकार को नष्ट करने विालिे). महातेजस्विी. किवि (ित्रकालिदशती). िविन्ध्यीथीप्लिविंगम (आर्काशत मे तीव्रविेग से चलिने विालिे). ऋषग. अहरकर (िदनकर). िपंगलि (भूर्रे रंग विालिे). ितिमरोन्मथन (अन्धकार का नाशत करने विालिे). िशतिशतरनाशतन (शतीत का नाशत करने विालिे). िहरण्यरेता (ब्रह्माण्ड कीर्त उत्पित् के बीज). भानु (प्रकाशतक). घनविृिष्ट (घनी विृिष्ट के कारण).

यज्ञ और यज्ञो के फलि भी ये ही है। सम्पूर्णर लिोको मे िजतनी िक्रयाएँ होती है. आर्प प्रकाशत से पिरपूर्णर है. आर्पको नमस्कार है।' तप्तचामीकराभाय हस्ये िविश्विकमर णे । नमस्तमोऽिभिनघ्नाय रुचये लिोकसािक्षणे । । 21।। 'आर्पकीर्त प्रभा तपाये हु ए सुविणर के समान है. उन सबका फलि देने मे ये ही पूर्णर समथर है।' एनमापत्सु कृ च्छरे षु कान्तारे ष ु भये ष ु च। कीर्ततर यन् पुरु षः कि दश्चनाविसीदित राघवि।।25।। . यह सूर्यरमण्डलि आर्पका ही तेज है. आर्पको नमस्कार है।' नाशतयत्ये ष विै भूर्तं तमे वि सृज ित प्रभुः । पायत्ये ष तपत्ये ष विषर त्ये ष गभि दस्तिभः।। 22।। 'रघुनन्दन ! ये भगविान सूर्यर ही सम्पूर्णर भूर्तो का संहार.नमो नमः सहस्रांशत ो आर्िदत्याय नमो नमः।।17।। 'आर्प जय स्विरूप तथा िविजय और कल्याण के दाता है। आर्पके रथ मे हरे रंग के घोड़े जुते रहते है। आर्पको बारंबार नमस्कार है। सहस्रो िकरणो से सुशतोिभत भगविान सूर्यर ! आर्पको बारंबार प्रणाम है। आर्प अिदित के पुत्र होने के कारण आर्िदत्य नाम से प्रिसद्धि है. सृिष्ट और पालिन करते है। ये ही अपनी िकरणो से गमी पहु ँचाते और विषार करते है।' एष सुप्त ेष ु जागितर भूर्ते ष ु पिरिनिष्ठतः। एष चै वि ािगहोत्रं च फलिं चै वि ािगहोित्रणाम्। । 23।। 'ये सब भूर्तो मे अन्तयारमीरूप से ि दस्थत होकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते है। ये ही अिगहोत्र तथा अिगहोत्री पुरुषो को िमलिने विालिे फलि है।' दे वि ाश्च क्रतविश्चै वि क्रतूर्न ां फलिमे वि च। यािन कृ त्यािन लिोके षु सविे ष ु परमप्रभुः ।।24।। '(यज्ञ मे भाग ग्रहण करने विालिे) देविता. सबको स्विाहा कर देने विालिा अिग आर्पका ही स्विरूप है. आर्पका स्विरूप अप्रमेय है। आर्प कृतघ्नो का नाशत करने विालिे. आर्प हिर (अज्ञान का हरण करने विालिे) और िविश्विकमार (संसार कीर्त सृिष्ट करने विालिे) है. आर्पको नमस्कार है।' नम उग्राय विीराय सारं ग ाय नमो नमः। नमः पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते । ।18।। '(परात्पर रूप मे) आर्प ब्रह्मा. आर्पको नमस्कार है।' तमोघ्नाय िहमघ्नाय शतत्रुघ् नायािमतात्मने । कृ तघ्नघ्नाय दे वि ाय ज्योितषां पतये नमः।।20।। 'आर्प अज्ञान और अन्धकार के नाशतक. प्रकाशतस्विरूप और जगत के साक्षी है. िशतवि और िविष्णु के भी स्विामी है। सूर्र आर्पकीर्त संज्ञा है. सम्पूर्णर ज्योितयो के स्विामी और देविस्विरूप है. आर्प रौद्ररूप धारण करने विालिे है. तम के नाशतक. जड़ता एविं शतीत के िनविारक तथा शतत्रु का नाशत करने विालिे है.

'राघवि ! िविपित् मे. उसे दःु ख नही भोगना पड़ता।' पूर्ज यस्विै न मे क ाग्रो दे वि दे विं जगत्पितम्। एतत् ित्रगुि णतं जप्तविा यु द्धि ेष ु िविजियि दष्त।।26।। 'इसिलिए तुम एकाग्रिचत होकर इन देविािधदेवि जगदीश्विर कीर्त पूर्जा करो। इस आर्िदत्य हृदय का तीन बार जप करने से तुम युद्धि मे िविजय पाओगे।' अि दस्मन् क्षणे महाबाहो राविणं त्विं जिहष्यिस। एविमुक् त्विा ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्। ।27।। 'महाबाहो ! तुम इसी क्षण राविण का विध कर सकोगे।' यह कहकर अगस्त्य जी जैसे आर्ये थे. कष्ट मे. दगु र म मागर मे तथा और िकसी भय के अविसर पर जो कोई पुरुष इन सूर्यरदेवि का कीर्ततरन करता है. नष्टशतोकोऽभवित् तदा। धारयामास सुप्र ीतो राघविः प्रयतात्मविान्। ।28।। आर्िदत्यं प्रेक्ष् य जप्त्विे दं परं हषर मविाप्तविान्। ित्रराचम्य शतुि चभूर्र त्विा धनुर ादाय विीयर विान्। ।29।। राविणं प्रेक्ष् य हृष्टात्मा जयाथे समुप ागमत्। सविर यत्ने न महता विृत स्तस्य विधे ऽ भवित्। ।30।। उनका उपदेशत सुनकर महातेजस्विी श्रीरामचन्द्रजी का शतोक दरूर् हो गया। उन्होने प्रसन होकर शतुद्धििचत् से आर्िदत्यहृदय को धारण िकया और तीन बार आर्चमन करके शतुद्धि हो भगविान सूर्यर कीर्त ओर देखते हु ए इसका तीन बार जप िकया। इससे उन्हे बड़ा हषर हु आर्। िफर परम पराक्रमी रघुनाथजी ने धनुष उठाकर राविण कीर्त ओर देखा और उत्साहपूर्विरक िविजय पाने के िलिए विे आर्गे बढ़े। उन्होने पूर्रा प्रयत्न करके राविण के विध का िनश्चय िकया। अथ रिविरविदिनरीक्ष्य रामं मुि दतनाः परमं प्रहृष्यमाणः। िनिशतचरपितसं क्ष यं िवििदत्विा सुर गणमध्यगतो विचस्त्विरे ि त।।31।। उस समय देविताओं के मध्य मे खड़े हु ए भगविान सूर्यर ने प्रसन होकर श्रीरामचन्द्रजी कीर्त ओर देखा और िनशताचराज राविण के िविनाशत का समय िनकट जानकर हषर पूर्विरक कहा 'रघुनन्दन ! अब जल्दी करो'। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ इत्याषे श्रीमद्रामायणे विाल्मीकीर्तये आर्िदकाव्ये युद्धिकाण्डे पंचािधकशतततमः सगर ः। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ . उसी प्रकार चलिे गये। एतच्छरु त्विा महाते ज ा.