क्या अप ऄपने ऄंदर परम शांति स्थातपि कर ऄपना अध्यातममक
ईमथान पाना चाहिे हैं?

क्या अप एक स्वस्थ, संिुतिि, व्यसनमुक्त एवं िनाव रतहि
जीवन की कामना रखिे हैं?

अआये, सहज योग के द्वारा ऄपने अममसाक्षामकार को
प्राप्त कर खुद को पहचातनये।

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सहज योग ध्यान की एक ऄनुपम पद्धति है तजससे मनुष्य तबना तकसी
व्यायाम के स्वस्थ, अनन्दमय एवं संिुतिि जीवन व्यिीि करने में
सक्षम हो जािा है। ध्यान एक ऐसी तस्थति है जहााँ हमारा तचत्त व
तवचार पूर्ण रुप से शांि होिे हुए भी सचेि रहिा है। यह तस्थति
‘तनतवणचार समातध’ कहलाती है।
युगों-युगों से संिों और ऋतषमुतनयों ने आस तस्थति को ऄनुभव करने का
प्रयास तकया एवं मानव के कल्यार् के तिए आसी तस्थति की बाि कही।
परंिु आस तस्थति की प्रातप्त िब िक ऄसंभव है जब िक मनुष्य की
अममा, परमाममा की दैतवक शतक्त से एकाकाररिा प्राप्त न कर िे। यही
ऄवस्था मनुष्य को भय, क्रोध, तहंसा एवं बेचैनी से मुक्त कर ईसे शांि,
संिुष्ट, सुखी, दयावान और तनभीक बना देती है। यही अन्िररक

संिुिन की तस्थति मानाव ईमथान का चरम िक्ष्य है जो तवश्व के सभी
धमों का सार है। तवश्व के १२० से भी ऄतधक देशों के िोगों ने आस
तस्थति को सहज योग द्वारा तबना तकसी प्रयास के प्राप्त तकया है।
‘सह’ ऄथाणत् ‘अपके साथ’; ‘ज’ ऄथाणत् ‘जन्मी हुइ’ एवं ‘योग’ ऄथाणत्
‘परमाममा की सवणव्यापी शातक्त से साधक की सुप्त शातक्त का तमिन’।
यह एक जीवंि तक्रया है। साधक की शुद्ध आच्छा शातक्त, कु ण्डतिनी के
रुप में, रीढ़ की हड्डी के ऄंि में तस्थि तिकोर्ाकार ऄतस्थ में सुप्त ऄवस्था
में है। तजस प्रकार एक सुप्त बीज ऄनुकूि तस्थति पाकर स्विः ही
ऄंकुररि हो जािा है, ठीक ईसी प्रकार साधक, सहज योग में अने पर,
कु ण्डतिनी का जागरर् ऄनुभव करने लगिा है। आस ऄनुभतू ि से मानव
शारीररक, मानतसक, भौततक और अध्यातममक संिुिन की तस्थति की
ओर ऄग्रसर होिा है।
प्रतितदन आस ध्यान के ऄभ्यास से मनुष्य स्वास््य िाभ के साथ-साथ
िनाव से भी मुक्त हो पािा है। आस प्रकार प्रेम और माधुयण के अधार पर
एक नये ईच्च स्िरीय मानव जीवन की रचना होिी है, जो ऄब
ऄमयावश्यक है। सभी समस्याओं का समाधान, छाि बुतद्ध का प्रखर
तवकास एवं ऄसाध्य व्यातधयों का आिाज, यहााँ सभी संभव है। आस
तस्थति को पाने के तिए ऄपने तनकटिम के न्र से संपकण करें जहााँ अप
ऄपने सभी प्रश्नों का हि खुद ही पा जाएँगे।
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श्री मािाजी का जन्म २१ माचण १९२३ इ॰ में बसंि ऋिु की महातवषुव
संक्रातन्ि के तदन मध्य प्रदेश के तछंदवाडा नामक स्थान में हुअ। श्री
मािाजी ऄपने कॉिेज के तदनों में महाममा गााँधी के संपकण में अई।ं
ईन्होंने आसी समय के दौरान स्विंििा संग्राम में छािों का नेिृमव तकया।
मानव जाति की उन्नतत के तिए ईन्होंने मइ १९७० में सहज योग का
प्रारम्भ तकया तजससे वह सामूतहक िौर पर सभी को अममासाक्षामकार
देने में सफि हूई।ं सहज योग को फै िाने हेिु ईन्होंने ऄनेक देशों की
कतठन यािायें कीं एवं ऄनतगनि िोगों को अममासाक्षामकार प्रदान
तकया।
ईन्हें रोमानीयन तवश्वतवद्यािय से ‘कॉग़्नेतिव सायन्स’ में डॉक्टरेट की
ईपातध दी गइ। डॉ: तनमणिा श्रीवास्िव को ‘पेिोवस्काय एकाडेमी ऑफ़
अटण एण्ड साइन्स’ के सदस्य होने का भी सम्मान प्राप्त है।
ईन्होंने कहा है – ‚ऄपने ऄदंर शांति स्थातपि तकए बगैर तवश्वशांति की

ईपितधध ऄसंभव है।‛
‚ सृजन करनेवािी शातक्त से जुड़े तबना अप ऄपने
जीवन का ऄथण नहीं जान सकिे।”