-ाऄरुण कु मार ाईपाध्याय, ०९४३७०३४१७२/०९५८३४९२३८७, ०६७४-२५९११७२
सी/४७, पलासपल्ली (एयरपोर्ट के िनकर्), भुवनेश्वर-७५१०२०
<arunupadhyay30@yahoo.in>, www.scribd.com/Arunupadhyay
१.

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२ .भारत कह्ळ मानिसक दासता--भारत िवश्व का एकमात्र ऐसा देश है जहाां ाऄपने देश तथा परम्परा कह्ळ झूठी िनन्दा ही
ज्ञान का लक्षण माना जाता है। ाऄन्य सभी देशों के लोग दूसरों कह्ळ तुलना में ाऄपने को श्रेष्ठ िसद्ध करने के िलये ाआितहास में
तोड़ाअरम्भ ह्लकये मरोड़ करते रहते ह।। िजन राजार ने शक-, ाईन सभी को काल्पिनक घोिषत ह्लकया गया है। पूरे जीवन
ाईनका ही सािहत्य पढ़ने के बाद लोग कहते ह। ह्लक ाईनके बारे में कोाइ ाईल्लेख नहीं है। ाऄभी ाईपलब्ध सािहत्य में ९० %
िवक्रमाह्लदत्य के नवरत्नों का ही हैधन्वन्तह्ऱराः क्षपणकामरह्ऴसह शङ्कु वेतालभट्ट घर्खपटर कािलदासााः।
ख्यातो वराहिमिहरो नृपतेाः सभायाां रत्नािन वै वररुिचनटव िवक्रमस्य॥ (कािलदास कृ त ज्योितर्ववदाभरण, २२/१०)
धन्वन्तह्ऱर का सुश्रुत-सांिहता, क्षपणक के जैन सािहत्य के ाऄितह्ऱरक्त कोाइ जैन-ाअगम ाऄभी ाईपलब्ध नहीं है, ाऄमरह्ऴसह का
ाऄमरकोष, घर्खपटर का तन्त्र-सािहत्य, कािलदास के ३ महाकाव्य तथा ज्योितर्ववदाभरण, वराहिमिहर का बृहत्-सांिहता
तथा पञ्चिसद्धािन्तका, वररुिच का वार्विक तथा वाक्य-करण, बेताल भट्ट द्वारा पुराणों का सम्पादन, शङ्कु द्वारा भारत
का मान-िचत्र िजसके ाअधार पर जमीन का पट्टा ह्लदया जाता है तथा सभी पुराणों में भारत का ाअकार ितयटक्-याम कहा
गया है (दिक्षण में ितरछा तथा ाईिर में चौड़ा)। सभी ग्रीक लेखकों ने भारत का ाअकार ाअयताकार िलखा है। ाआसके
ाऄितह्ऱरक्त शूद्रक (७५६ ाइसा पूवट) का मृच्छकह्ऱर्कम्, ाऄविन्त-सुन्दरीकथा, श्री-हषट का नैषध-चह्ऱरत पढ़ने के बाद ाआन्हें
काल्पिनक कहा गया है। ाआनकह्ळ के वल ाआतनी ही भूल थी ह्लक ाआन्होंने शक ाअरम्भ ह्लकया, तथा ाआितहास का ितिथ-िनणटय में
एक ह्लदन कह्ळ भी भूल नहीं हो सकतीहै। ाआसके बाद शािलवाहन को काल्पिनक मान कर ाईसके शक (७८ ाआसवी) को शक
जाित का मान कर ाईसे कश्मीर के प्राचीन राजा किनष्क (१२९२ ाइसा पूवट) से जोड़ ह्लदया गया है। यहाां शक शब्द का ाऄथट
है, वषट-गणना के ाअरम्भ से ह्लदन-सांख्या या ाऄहगटण िजससे ग्रह-गित कह्ळ गणना होतीहै। सांवत् द्वारा चान्द्र ितिथ ाऄनुसार

पवट िनधाटरण होता है। ाऄांग्रेजों का मुख्य ाईद्देश्य ाआितहास को नष्ट कर ाऄपना शासन दृढ़ करना था जो ाईनकह्ळ घोषणा थी
तथा यही ाईनके ाऄनुयायी भारतीय करते ाअ रहे ह।।
३.

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िछित जल पावक गगन समीरा। पञ्च रिचत यह ाऄधम सरीरा॥ (रामचह्ऱरतमानस, ह्लकिष्कन्धाकाण्ड १०/२)
पृथ्वी पर वैह्लदक सभ्यता का िवकास भारत से हुाअ, िजसका के न्द्र काशी था। यहाां ज्ञान रूपी तेज का के न्द्र होने से ाआसे
काशी कहा गया। काश का ाऄथट दीिि है (काशृ दीिौ-पािणनीय धातुपाठ १/४३०, ४/५१) पह्ऱरिध से बाहर जो िनकला वह
प्रकाश है। यह िहरण्य-गभट क्षेत्र होने से ाआसकह्ळ पूवट सीमा कह्ळ नदी का नाम िहरण्य-बाहु (सोन-शोणो िहरण्यबाहुाः स्यात्ाऄमरकोष) है। यहाां भूतों के पित िशव का के न्द्रीय स्थान या ाअम्नाय भी है। यहाां सबसे पहले ज्ञान का समवतटन हुाअ था,
ाऄताः वतटते (बार्े) धातु का प्रयोग यहीं होता है। बाकह्ळ िवश्व में ाऄिस्त का प्रयोग है। पििमी भाग में ाऄिस्त का (ाअहे) तथा
(है) हो गया है। पूवी भाग में यह ाऄिछ हो जाता है। ाऄग्रेजी में यह ाआष्ट (ist) था जो बाद में ाआज (is) हो गया। ाआस किाट
रूपी देवता को हम हिव देते है, ाऄताः बार्े के बदले ’हवन’ भी कहा जाता है। िशवपुराण (रुद्रसांिहता, सती खण्ड, ाऄध्याय
४१) में भी िलखा है ह्लक िशव को ही हवन करने से यज्ञ पूरा होता है। भवन् का भी ाऄपभ्रांश हवन हो सकता है।
भारत के ३ खण्ड ह।-ाईिरी भाग िहमालय साधना कह्ळ भूिम है, जो स्वगट-क्षेत्रहै। ाआसके ३ िवर्प (वृक्ष) ह।, ाऄताः यह ित्रिवष्टप्
(स्वगट का एक नाम-ाऄमरकोष-ितब्बत) है। पििमी भाग िवष्णु-िवर्प है िजसका जल सांिचत हो कर िसन्धु नदी द्वारा
िसन्धु-सागर (ाऄरब सागर) में िमलता है। िसन्धु-तनया लक्ष्मी िवष्णु कह्ळ पत्नी ह। तथा यहाां वैष्णो देवी का क्षेत्र है। मध्य
भाग िशव-िवर्प है िजसकह्ळ जर्ा या पवटत-माला से गङ्गा िनकली ाऄथाटत्, ाआस क्षेत्र का सांिचत जल गङ्गा द्वारा गांगासागर (बांगाल कह्ळ खाड़ी) में िमलता है। पूवी भाग ब्रह्म-िवर्प है, ाआस क्षेत्र का जल ब्रह्मपुत्र नद द्वारा समुद्र में िमलता है।
ाईसका परविी क्षेत्र ब्रह्म देश (बमाट) है। ब्रह्मा देवतार (ाऄमर) में श्रेष्ठ थे, ाऄताः ाआसे महा-ाऄमर या म्याम्मार नाम ह्लदया
गया है। मध्य में िशव-िवर्प का के न्द्र कै लास है, जो ाईिर कह्ळ काशी है।
दिक्षण भारत व्यापार का के न्द्र है, ाऄताः यहाां िहरण्य का ाऄथट स्वणट है। यहाां कह्ळ काशी को काञ्ची (= स्वणट) कहते ह।। मध्य
कह्ळ काशी सभी का ाअधार है। ाअिधभौितक िवश्व के शब्दों के ाअधार पर ही ाअध्याित्मक तथा ाअिधदैिवक शब्द बने ह।।
ाअप ाआव कािशना सांगृभीता ाऄसन्नस्त्वासत ाआन्द्र वक्ता (ाऊक् ७/१०४/८)
हुएनसाांग ने भी भारत के ाआन्दु नाम के ३ ाऄथट बताये ह।-(१) ाईिर से देखने पर यह ाऄधट-चन्द्राकार दीखता है। (२) भारत
चन्द्र के समान पूरे िवश्व को प्रकाश (= काश) देता है। (३) ाईिरी भाग चन्द्र के जैसा ठण्ढा है। ग्रीक लोग ाआन्दु का ठीक
ाईच्चारण नहीं कर पाते तथा ाआसे ाआण्डे (Inde) कहते ह।। ाआसी से ाआिण्डाअ (India) बना है।
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ाईिर भारत में िसन्धु, गांगा, ब्रह्मपुत्र-तीनों के समतल क्षेत्र खेती के िलये ाईपयुक्त ह।। ाईसमें भी बीच का भाग काशी क्षेत्र
सबसे ाऄिधक ाईत्पादक है। प्रयाग में ही पुरुरवा ने सबसे पहले तीन प्रकार के यज्ञ कह्ळ सांस्था बनााइ (िवष्णु पुराण, ४/६/३४)। पुरु में यज्ञ रूपी वृषभ (बसहा) रव करता था, ाऄताः सबसे पहले ाईनको ही सम्मान के िलये रवा (पुरुरवा) कहा गया।
ाईनके ाऄनुकरण से सभी को सम्मान के िलये रवा कहते ह।। ाउपर बताये गये यज्ञ-चक्र के ७ खण्ड यज्ञ-वृषभ के ७ हाथ ह।।
िजस मनुष्य में यह रव कर रहा है, ाईसमें महादेव का ाअवेश है। कोाइ भी कायट करने पर कु छ स्पन्दन या रव होता है, यह
ह्लक्रया का लक्षण है। ऐसा मनुष्य ही सम्माननीय हैचत्वाह्ऱर शृङ्गा त्रयो ाऄस्य पादा द्वे शीषे सि हस्तासो ाऄस्य।
ित्रधा बद्धो वृषभो रोरवीित, महोदेवो मत्याां ाअिववेश॥ (ाऊक् ४/५८/३)
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पुरुरवा बहुत रव करता है-पुरुरवा बहुधा रोरूयते (यास्क का िनरुक्त १०/४६-४७)। वह दस्यु ाअह्लद कह्ळ बाधा दूर कर देश
को रमणीय (रणाय) बनाता है। ाआस महान् कायट के कारण ाईसे पुरुरवा कहा गयामहे यत्त्वा पुरूरवो रणायावधटयन्दस्यु -हत्याय देवााः। (ाऊक् १०/९५/७)
खेती मुख्यताः वृषभ से होती है, ाऄताः यज्ञ-किाट कोवृषभ कहते ह।। जल-प्रलय के बाद सभ्यता का पुनाः ाअरम्भ करने वाले
को भी ाऊषभ-देव ाआसी ाऄथट में कहा गया। ाऄताः यह यज्ञ के देवता िशवका भी वाहन हैयेन कमाटण्यपसो मनीिषणो यज्ञे कृ ण्विन्त िवदथेषु धीरााः।
यदपूवट यक्षमन्ताः प्रजानाां तन्मे मनाः िशवसङ्कल्पमस्तु॥२॥
येन यज्ञस्तायते सि होता (यज्ञ-चक्र के ७ भाग) तन्मे मनाः िशव सङ्कल्पमस्तु॥४॥ (वाजसनेयी यजु, ३४)
यज्ञस्वरूपायजर्ाधराय... (िशवपञ्चाक्षरस्तोत्र)
ाऄताः बड़े व्यिक्त को रवा या राईाअ कहा जाता हैजो रााईर ाऄनुशासन पावौं। कन्दुक ाआव ब्रह्माण्ड ाईठावौं॥ (रामचह्ऱरतमानस, बालकाण्ड)
जो कोाइ भी काम करने लायक नहीं है, ाईसमें कोाइ रव (गितिविध) नहीं है, ाऄताः ाईसे ाऄन-रवा =ाऄनेह्ऱरया (बेकार) कहते
ह।।
यज्ञ-किाट पुरुष िशव है। ाईसका ाईत्पादन या ह्लक्रया शिक्त है। सबसे ाऄिधक खेती का िवकास िमिथला में हुाअ, ाऄताः वहाां के
शासक को जनक (ाईत्पादक, िपता) कहते थे। वह स्वयां भी खेती करते थे। वहाां के वल खेती थी, वन नहीं था। खेती में सभी
वृक्ष घास या दभट ह।, ाऄताः ाआस क्षेत्र को दभटङ्गा कहते ह।। भूिम से ाईत्पाह्लदत वस्तु सीता है, ाऄताः जनक कह्ळ पुत्री को भूिमसुता तथा सीता कहा गया। ाआसका भाग लेकर ाआन्द्र (राजा) प्रजा का पालन तथा रक्षण करता है। ाआसका िवस्तृत वणटन
ाऄथवटवेद के कृ िष (३/१७) तथा दभट (१९/२८-३०,३२-३३) सूक्तों में है-

ाऄथवट (३/१७)-ाआन्द्राः सीताां िनगृह्रातु ताां पूषािभरक्षतु। सा नाः पयस्वती दुहामुिरमुिराां समाम्॥४॥
शुनां सुफाला िवतुदन्तु भूह्ऴम शुनां कह्ळनाशा ाऄनुयन्तु वाहान्।
शुनासीरा (ाआन्द्र) हिवषा तोशमाना सुिपप्पला ओषधीाः कतटमस्मै॥५॥
सीते वन्दामहे त्वावाटची सुभगे भव। यथा नाः सुमना ाऄसो यथा नाः सुफला भवाः॥८॥
घृतेन सीता मधुना समक्ता िवश्वैदेवैरनुमतामरुिभाः।
सा नाः सीता पयसाभ्याववृत्स्वोजटस्वती घृतवित्पन्वमाना॥९॥
ाऄथवट (१९/२८)-घमट (घाम = धूप) ाआवािभ तपन्दभट िद्वषतो िनतपन्मणे।
ाऄथवट (१९/२८)-तीक्ष्णो राजा िवषासही रक्षोहा िवश्व चषटिणाः॥४॥
=राजा रक्षा तथा चषटण (चास =खेती) करता है।
शरीर भी एक क्षेत्र है िजसमें ५२ शिक्त-पीठ ५२ ाऄक्षर ह।। ाईसका ज्ञाता क्षेत्रज्ञ है (गीता, ाऄध्याय १३), ाऄताः वणटमाला के
ाऄन्त में क्ष, त्र, ज्ञ-ये ३ ाऄक्षर जोड़ते ह।। ाऄ से ह तक के ाऄक्षरों से सम्पूणट वाङ्मय बना है ाऄताः ाआसे मातृका कहते ह। तथा
मातृका-पूजा में शरीर में ाआन ाऄक्षरों कह्ळ ही पूजा होती है। ाऄताः स्वयां को ाऄहम् कहते ह। तथा शिक्त-क्षेत्र िमिथला में सम्मान
के िलये ाऄहाां कहते ह।। काशी क्षेत्र में भी ’ाऄपने के ’ कहते ह।। यज्ञ के द्वारा पालन करने वाला िवष्णु है, िजसका क्षेत्र गया हैयहाां सूयट गित कह्ळ ाईिरीसीमा (ककट रे खा) है, ाऄताः यह िवष्णु-पद क्षेत्र है। ाआस कह्ळ भाषा मगही है। भोजपुरी (िशव),
मैिथली (शिक्त) तथा मगही(िवष्णु) क्षेत्रों का सांगम हह्ऱरहर-क्षेत्र है।
यज्ञ के प्रसांग में ही सिू (सक्तु ) का ाईल्लेख वेद में है। मुम्बाइ, पांजाब ाअह्लद में भोजपुरी क्षेत्र के मजदूरों को ाऄनादर के िलये
सतुाअ कहते ह।। ाअजकल हर स्थान पर सिू का प्रयोग हो रहा है। वेद में कहा है ह्लक जैसे सिू को चलनी से छान कर प्रयोग
करते ह। ाईसी प्रकार िवद्वान् मन द्वारा शुद्ध वाणी बोलता हैसक्तु िमव ितताईना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत। (ाऊक् १०/७१/२)
िववाह के िलये वर को भी बहुतों से चुनते ह।, ाऄताः व्यांग से ाईसे चलनी द्वारा चाला हुाअ कहते ह।चलनी के चालल दुलहा, सूप के फर्कारल हो....।
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य य११४-ाऄथाहां वणटियष्यािम वषेऽिस्मन्भारते प्रजााः। भरणात्प्रजानाां वै मनुभरट त ाईच्यते॥५॥

िनरुक्त वचनाच्चैव वषां तभारतां स्मृतम्। यताः स्वगटि मोक्षि मध्यमिािप िह स्मृताः॥६॥
न खल्वन्यत्र मत्याटनाां भूमौ कमटिविधाः स्मृताः। भारतस्यास्य वषटस्य नव भेदािन्नबोधत॥७॥
ाआन्द्रद्वीपाः कशेरुि ताम्रपणो गभिस्तमान्। नागद्वीपस्तथा सौम्यो गन्धवटस्त्वथ वारुणाः॥८॥
ाऄयां तु नवमस्तेषाां द्वीपाः सागर सांवृताः। योजनानाां सहस्रां तु द्वीपोऽयां दिक्षणोिराः॥९॥
ाअयतस्तु कु मारीतो गङायााः प्रवहाविधाः। ितयटगध्ू वां तु िवस्तीणटाः सहस्रािण दशैव तु॥१०॥
यस्त्वयां मानवो द्वीपाः ितयटग-् यामाः प्रकह्ळर्वतताः। य एनां जयते कृ त्नां स सम्रार्् ाआित कह्ळर्वतताः॥१५॥
ाऄयां लोकस्तु वै सम्रार्् ाऄन्तह्ऱरक्ष िजताां स्मृताः। स्वरार्् ाऄसौ स्मृतो लोकाः पुनवटक्ष्यािम िवस्तरात्॥१६॥
= ाऄब भारत कह्ळ प्रजा का वणटन करता हां। प्रजा के भरण के कारण यहाां का मनु (शासक) भरत कहा जाता है। िनरुक्त कह्ळ
ऐसी पह्ऱरभाषा से भी यह भारत है-जहाां स्वगट, मोक्ष के साथ मध्यम (ाऄथट, काम) िमलता है। पृथ्वी पर ाऄन्य कहीं भी कमट
कह्ळ िविध नहीं है। ाआस भारतवषट के ९ खण्ड ह।-ाआन्द्रद्वीप, कशेरु, ताम्रपणट, गभिस्तमान्, नागद्वीप, सौम्य, गन्धवट, वारुण।
यह नवम (कु माह्ऱरका) सागर से िघरा है जो ाईिर-दिक्षण १००० योजन फै ला है। यह (कन्या-) कु मारी से ाईिर गङ्गा
प्रवाह-क्षेत्र में यह ाअयताकार है। ितरछा तथा ाउपर ाआसकह्ळ सीमा १०, ००० योजन है। यह मनु का द्वीप ितयटक्-याम
ाअकार का िवख्यात है। ाआसको पूरी तरह जीतने वाला सम्रार्् कहा जाता है। ाआसके साथ ाऄन्तह्ऱरक्ष को भी जीतने वाला
स्वरार्् है। ाऄब ाआसका िवस्तार से वणटन करता हां।
पृिथव्यााः सधस्थादह्ऴिं पुरीष्य मिङ्गरस्वदा भराह्ऴिं पुरीष्यमिङ्गरस्वद च्छे दो ऽह्ऴिं पूरीष्यमांिगरस्वभह्ऱरष्यामाः।
(वाजसनेयीयजुवेद११/१६) =पृथ्वी पर ाऄििं सबके ाउपर है। वह ाऄिङ्गरा (बाहर िनकलने वाला पदाथट) से भरण तथा
पूरण करता है। पूरण करने वाला पुरी, भरण करनेवाला = भरत।
ाऄििंवै भरताः। स वै देवेभ्यो हव्यां भरित। (कौषीतह्लकब्राह्मण ाईपिनषद् ३/२) एष (ाऄििंाः) िह देवेभ्यो हव्यां भरित तस्मात्
भरतो ऽििंह्ऱरत्याहुाः। (शतपथ ब्राह्मण १/४/२/२, १/५/१/८, १/५/१९/८)
=ाऄििं देवों का हिव भरता है ाऄताः यह भरत है।
सत्पितिेह्लकतानाः (यजु १५/५१) ाआत्यमििंाः सताां पित िेतयमान ाआत्येतत्। (शतपथ ब्राह्मण ८/६/३/२०) ाऄििंदेवो दैव्यो
होता .... देवान्यक्षिद्वद्वााँििह्लकतवान् .... मनुष्यवभरतवद् ाआित। (शतपथ ब्राह्मण १/५/१/५-७) =यह ाऄििं सत्पुरुषों का
पित है, देवों का यज्ञ पूणट करताहै, यह मनुष्य तथा भरत है।
स यदस्य सवटस्याग्रमसृज्यत तस्मादिग्राः ाऄिग्राः ह वै तम् ाऄििंाः ाआित ाअचक्षते परोऽक्षम्। (शतपथ ब्राह्मण ६/१/१/११) =
ाआसका सृजन सबसे पहले होने के कारण ाआसे ाऄिग्र कहा गया, िजसे परोक्ष में ाऄििं कहा जाता है।
ाऄिंेमटहााँ ब्राह्मण भारतेित। एष िह देवेभ्य हव्यां भरित। (तैििरीय सांिहता २/५/९/१, तैििरीय ब्राह्मण ३/५/३/१, शतपथ
ब्राह्मण १/४/१/१) =ब्रह्मा ने ाऄििं को महान् तथा भारत कहा क्योंह्लक यह देवों का हव्य (भोजन) भरता है।

त्वामीळे ाऄध िद्वता भरतो वािजिभाः शुनम्। ाइजे यज्ञेषु यिज्ञयम्॥ (ाऊक़् ६/१६/४) =वािज (वाहन ाअह्लद) तथा धन से
सम्पन्न करने वाले भरत ाऄििं कह्ळ पूजा करता हां। यज्ञ का साधन यही है।
िवश्व भरण पोषण कर जोाइ। ताकर नाम भरत ाऄस होाइ।
(तुलसीदास कृ त रामचह्ऱरतमानस, बालकाण्ड १९६/४)
भारत के सभी भोजपुर में सबसे ाऄिधक ाऄन्न ाईत्पादन करनेवाला क्षेत्र काशी है ाऄताः यहााँ कह्ळ भाषा भोजपुरी कही जाती
है। हनुमान् भी जब सीता से िमले थे तो ाईन्होंने िमिथला तथा ाऄयोध्या के मध्य कह्ळ भाषा (भोजपुरी) में सीता से बात कह्ळ।
सांस्कृ त में बोलने पर सीता ाईनको रावण का ाअदमी समझतीं क्योंह्लक सांस्कृ त िवश्व कह्ळ सम्पकट भाषा थी।
वाल्मीह्लक रामायण, सुन्दरकाण्ड, ाऄध्याय ३०यह्लद वाचां प्रदास्यािम िद्वजाितह्ऱरव सांस्कृ ताम्। रावणां मन्यमाना माां सीता भीता भिवष्यित॥१८॥
ाऄवश्यमेव वक्तव्यां मानुषां वाक्य मथटवत्। मया सान्त्वियतुां शक्यानान्यथेयमिनिन्दता॥१९॥
पुराणों में ५ यादव कु लों में १ भोज कहा गया है। ाआनके नाम काइ प्रकार से ह।-(१) ाईिर-पििमी सीमा पर कु क्कु र (रक्षक,
ाअज के खोखर), (२) राजस्थान-गुजरात के सात्वत, (३) मध्य-भारत के भोज (यहाां के राजा भी भोज कहे जाते थे), (४)
दिक्षण-पूवट के ाऄन्धक, क्योंह्लक यहाां से समुद्री चक्रवात (ाअांधी) ाअती है। ाआनका क्षेत्र ाअन्र है। (५) ाईिर तथा पूवट भारत के
वृिष्ण (वषाटक्षेत्र) िजसमें भगवान् श्री कृ ष्ण का जन्म हुाअ था। यह कृ िष के कारण सम्पन्न था ाऄताः यहाां सोने-चान्दी के कक्ष
थे। कां स कह्ळ भी भोजराज के रूप में प्रशांसा कह्ळ गयी है भागवत पुराण, स्कन्ध १०, ाऄध्याय १-श्लाघ्नीय गुणाः शूरैभटवान्भोजयशस्कराः॥३७॥
ाईग्रसेनां च िपतरां यदु-भोजान्धकािधपम्॥६९॥
स्कन्ध ११, ाऄध्याय ३०-दाशाहट-वृष्ण्य-न्धक-भोज-सात्वता मध्वबुटदा-माथु-रशूरसेनााः॥
िवसजटनााः कु कु रााः कु न्तयि िमथस्ततस्तेऽििवसृज्यसौ हृदम्॥१८॥
ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/१६)-ाआत्येते ाऄपरान्ताि शृणुध्वां िवन्ध्यवािसनाः॥६३॥
ाईिमानाां दशाणाटि भोजााः ह्लकिष्कन्धकै ाः सह॥६४॥
(२/३/६१)-कृ ताां द्वारावतीं नाम बहु द्वाराां मनोरमाम्। भोज वृष्ण्यन्धकै गुटिाां वसुदेव पुरोगमैाः॥२३॥
(२/३/६९)-जयध्वजस्य पुत्रस्तु तालजांघाः प्रतापवान्॥५१॥
तेषाां पञ्च गणााः ख्याता हैहयानाां महात्मनाम्। वीितहोत्राि सांजाता भोजािावन्तयस्तथा।।५२॥
तुिण्डके राि िवक्रान्तास्तालजांघास्तथैव च॥५३॥
(२/३/७१)-सत्यकात्कािश दुिहता लेभे या चतुराः सुतान्। कु कु रां भजमानां च शुह्ऴचकम्बल बर्वहषम्॥११६॥
पूवटस्याां ह्लदिश नागानाां भोजस्यत्वित भावयन्। रूप्य काञ्चन कक्षाणाां सहस्राण्येक ह्ऴवशिताः॥१२६॥
ाऄनपत्योऽभवच्यामाः शमीकस्तु वनां ययौ। जुगुप्समानो भोजत्वां राजर्वषत्वमवािवान्॥१९४॥
प्राचीन काल में काशी ही मुख्य भोज क्षेत्र था, जहाां का राजा ह्लदवोदास तथा ाईसका पुत्र सुदास थााआमे भोजा ाऄिङ्गरसो िवरूपा ह्लदवस्पुत्रासो ाऄसुरस्य वीरााः।
िवश्वािमत्राय ददतो मघािन सहस्रसावे प्रितरन्ताअयुाः॥ (ाऊक् ३/ ५३/७)
= ये भोज काइ प्रकार का ाईत्पादन (िवरूपा ाअांिगरस) करते ह।, ये देवपुत्र (ह्लदवोदास) ाऄसुरों को जीतने वाले ह।। ाआन्होंने
िवश्वािमत्र के हजारों यज्ञों के िलये प्रचुर सम्पिि दी।
महााँ ाऊिषदेवजा देवजूतोऽस्तभ्नाित्सन्धुमणटवां नृचक्षााः।
िवश्वािमत्रो यदवहत्सुदासमिपयायत कु िशके िभह्ऱरन्द्राः॥९॥
= महान् देवजूत (देव काम में जुता हुाअ, ह्लदवोदास) तथा ाईनके सहायक िवश्वािमत्र ने िसन्धु तथा ाऄणटव तक लोगों को
गह्ऱठत ह्लकया तथा कािशराज सुदास के यज्ञ में गये। कौिशकों के कायट से ाआन्द्र प्रसन्न हुए।
नभो जामम्रुनटन्यथटमीयुनटह्ऱरष्यिन्त न व्यथन्ते ह भोजााः।

ाआदां यिद्वश्वां भुवनां स्विैतत्सवां दिक्षणैभ्योददाित॥ (ाऊक् १०/१०७/८)
= भोज न मरते ह।, न दह्ऱरद्र होते ह।। न रुसते ह।, न दुखी होते ह।। वे पूरे िवश्व को दिक्षणा तथा सुख देते ह।।
भोजािजगयुाः सुरह्ऴभ योिनमग्रे भोजा िजगयुवटध्वांया सुवासााः।
भोजािजगयुरन्ताः पेयां सुराया भोजािजगयुये ाऄहतााः प्रयिन्त॥९॥
= भोज ही पहले दूध घी देने वाली सुरिभ पाते ह।, सुन्दर वस्त्रों वाली वधू पाते ह।। वे सुरा तथा पेय पाते ह।। जो िबना
कारण ाअक्रमण करते ह।, ाईनको जीत लेते ह।।
भोजायाश्वां सांमृजन्त्याशुां भोजायास्तेकन्या शुम्भमाना।
भोजस्येदां पुष्कह्ऱरणीव वेश्म पह्ऱरष्कृ तां देवमानेव िचत्रम्॥१०॥
=भोज तेज गित वाले घोड़े ाईत्पन्न करते ह।, ाईनकह्ळ कन्यायें सुशोिभत रहती ह।। भोजों का िनवास पुष्कह्ऱरणी के समान
िनमटल तथा देव-मानजैसा सिित होता है।
भोजमश्वााः सुष्ठु-वाहो वहिन्त सुवृद्रथो वतटते दिक्षणायााः।
भोजां देवासो ऽवता भरे षु भोजाः शत्रून्त्समनीके षु जेता॥११॥
= भोजों के ाऄश्व सवारी के िलये ाईिम ह।। ाईनका रथ युद्ध के िलये ाईिम है। भोज भरण से तथा युद्ध जीत कर देवों कह्ळ
रक्षा करते ह।।
यही काशी क्षेत्र भोज कह्ळ पुष्कह्ऱरणी थी तथा यहाां वतटते का प्रयोग था। यहाां खाने-पीने तथा सभी वस्तुर कह्ळ सुिवधा थी।
यह ज्ञान तथा शिक्त का के न्द्र था तथा देवों कह्ळ रक्षा करता था।
महादेव के वृषभ से यज्ञ होता है। ाईस के ाऄन्न से जो क्षेत्र पूणट हो, ाईसे भोजपुरी कहते ह।देवानाां माने (िनमाटण)े प्रथमा ाऄितष्ठन्कृ न्तत्रा (ाऄन्तह्ऱरक्ष, िवकतटन =मेघ) देषामुिरााईदायन्।
त्रयस्तपिन्त (ित्रशूल) पृिथवीमनूपा (िनजटलपृिथवी) द्वा (वायु +ाअह्लदत्य) वृवूकां वहताः पुरीषम् (जल, ाऄन्न सेपूण)ट । (ाऊगवेद
१०/२७/३०)
= यह वाराणसी (ित्रशूल पर िस्थत) देवों कह्ळ प्रथम पुरी है जहाां वषाट, जल, ाऄन्न भरा है। पुरी का ाऄथट है जल, ाऄन्न से भरा
(िनरुक्त २/२२)
७ .तुलसीदास-तुलसीदास का जन्म काशी तथा मगध के बीच या गांगा-कमटनाशा नह्लदर के बीच था ाऄताः ाआसको ाईन्होंने
िवपरीत शब्द िलखा हैकाशी-मग सुरसह्ऱर-क्रमनाशा। मरु-मारव मिहदेव गवासा। (रामचह्ऱरतमानस, बालकाण्ड, ५/४)
बचपन में ाआनका पालन काशी में ही वृद्धा स्त्री के रूप में माता ाऄन्नपूणाट ने ह्लकया था। ाऄताः ाआनका स्थान काशी से ाऄिधक
दूर बान्दा िजले में नहीं हो सकता। ाआनके भााइ नरोिमदास के वांशज ाअज भी डु मरााँव के िनकर् राजापुर गााँव में ह।,
िजनकह्ळ ाईपािध दूबे है। िवख्यात पिण्डत रामगुलाम िद्ववेदी ाआसी पह्ऱरवार में थे। ाऄताः तुलसीदास कह्ळ भाषा में भोजपुरी के
सभी िवशेष शब्द ह।, जैसे-राईाअ, बार्े, ाऄनस, ाऄघााआल।
८.



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-(१)

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ाऄघां स के वलां भुङ्क्ते याः पचत्यात्मकारणात्। (मनु स्मृित ३/११८) = जो के वल ाऄपने िलये भोग करता है वह के वल ाऄघ
का ही भोग करता है।

काण्व सांिहता (१८/३)-यज्ञिशष्टाशनां ह्येतत्सतामन्नां िवधीयते। देवी जोष्ट्री वसुधीती ययोरन्याघा। =यज्ञ से बचा ाऄन्न ही
खाना चािहये। देवी धन-धान्य जुर्ाती ह।, ाईसका भोग यज्ञ के बाद ही होना चािहये, ाऄन्य प्रकार भोग से ाऄघ (पाप) होगा।
(२)

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ाअत्म नाम गुरोनाटम नामाित कृ पणस्य च। श्रेयस्कामो न गृह्रीयात् ज्येष्ठापत्य कलत्रयोाः॥
= ाऄपना (रािश-नाम), गुरु, ाऄित कृ पण, ज्येष्ठ पुत्र, कलत्र (पित या पत्नी) का नाम नहीं लेना चािहये।
यह ित्रदण्डी स्वामी द्वारा गीता (१/८) कह्ळ र्ीका में ाईद्धृत है, ऐसा गौतम स्मृित के गृहस्थ ाअचार वणटन में (६/४) भी हैनावरोऽप्यायटाः शूद्रेण नाम चास्य वजटयेद्राज्ञिा जपाः प्रेष्यो भो भविन्नित वयस्य समाने ऽहिनाः जातो दश वषट वृद्धाः पौराः
पञ्चिभाः कला भराः श्रोित्रय िारण िस्त्रिभाः राजन्यो वैश्य कमट िवद्या हीनो दीिक्षत िप्राक्क्रयात्।

= शूद्र द्वारा श्रेष्ठ का नाम नहीं लेना चािहये, ाआसी प्रकार राजा, वयस्य (सम-वयस्क), ाऄपने से १० वषट बड़ा पुर ाऄिधकारी,
५ वषट बड़ा कलाकार, श्रोित्रय, चारण, ३ वषट बड़ा वैश्य कमट वाला क्षित्रय- ाआनको नाम के बदले भवान् (ाअप, रवा)
कहना चािहये।
ाऊगवेद (२/१२) में १ से १४ सूक्त तक। ाईदाहरणयो जात एव प्रथमो मनस्वान् देवो देवान् क्रतुना पयटभष
ू त्।
यस्य शुष्मा दरोदसी ाऄभ्यसे ताां नृम्णस्य मह्ना स जनास ाआन्द्राः॥१॥
= जो देवों में प्रथम मनस्वान् हुाअ तथा िजसने देवों का क्रतु (ाईत्पादन, यज्ञ) द्वारा पालन ह्लकया। िजसके प्रताप से रोदसी
(सौर-मण्डल, या पृथ्वी पर जहाां तक सूयट का प्रकाश है) काांप गये, तथा सेनािनयों में जो श्रेष्ठ है, वह व्यिक्त ाआन्द्र ही है।
यस्मान्न ाऊते िवजयन्ते जनासो यां युध्यमाना ाऄवसे हवन्ते।
यो िवश्वस्य प्रितमानां बभूव यो ाऄच्युत-च्युत स जनास ाआन्द्राः॥९॥
= िजसके िबना देश युद्ध नहीं जीतते, िजससे युद्ध कर शत्रु परािजत हों, जो िवश्व का प्रितमान (standard) हुाअ तथा
ाऄच्युत को भी च्युत कर दे वह ाआन्द्र ही है। जो ाऄभी तक ह्लकसी से परािजत नहीं हुाअ, वह ाऄच्युत है। ाईसे भी परािजत
करने वाला ाऄच्युत-च्युत है। ाआन्द्र पूवट के लोकपाल थे, ाऄताः पूवट भाग के ाऄसम में राजा को चुितया कहा जाता है।
शिक्तशाली ाऄत्याचार करने लगता है, ाऄताः चुितया गाली हो गया है।
ाऊक् (१०/१०३/१)- ाअशुाः िशशानो वृषभो न भीमो घनाघनाः क्षोभणिषटणीनाम्।
सांक्रन्दनो ऽिनिमष एकवीराः शतां सेना ाऄजयत साकिमन्द्राः॥
= क्षुब्ध शत्रुर से िबना डरे को ाऄिनिमष लगातार बाण वषाट कर १०० को ाऄके ले जीत लेता है, वह ाआन्द्र ही है।
(३४) धसोर = ठे लना, दूर हर्ाना-ाआसका मूल है ध्वस्रा, ध्विस्र, ध्विसरध्वस्रा ाऄिपन्वत्युवतीाः ाऊतज्ञााः (ाऊक् ४/१९/७) = नदी (युवती) ह्लकनारों को ध्वस्त करती है, ाईसे ाआन्द्र ने बान्ध ह्लदया।
ध्वस्रयोाः पुरुषन्तयोाः ाअ सहस्रािण दद्महे। (ाऊक् ९/५८/३, साम २/४०९)
सांभूम्या ाऄन्ताध्विसरा ाऄदृक्षत (ाऊक् ७/८३/३) = भूिम के ाऄन्त तक धसोरा गया दीखता है।
(३५) बढ़नी = झाड़ू। यह बर्वहाः = कु श से बना है, गन्दगी को बिहाः = बाहर करता है। ाआसका काम ’बहारना’ है, बाहर
ह्लकया पदाथट ’बहारन’ है। ाआस ाऄथट में ब्रह्माण्ड (ाअकाश-गांगा) के के न्द्र को मूल-बहटिण (मूल नक्षत्र) कहा जाता है क्योंह्लक
ाआसी मूल से ब्रह्माण्ड का िवस्तार हुाअ है। ाआस नक्षत्र में पैदा हुाअ वांश को बहार कर साफ कर देता है, ाऄताः यह बहटिण =
बढ़नी जैसा है।
सां बर्वहरक्तां हिवषा घृतेन (ाऄथवट ७/९८/१, वाज. सां. २/२२, शतपथ ब्राह्मण १/९/२/३१)
= बर्वह ाअह्लद धान्य से शरीर कह्ळ वृिद्ध।
नवां बर्वह रोदनाय स्तृणीत (ाऄथवट १२/३/३२) = नया कु श भोजन के िलये कार्ो (तृण के जैसा)।
प्राचीनां बर्वहाः प्रह्लदशा पृिथव्यााः (ाऊक् १०/११०/४, ाऄथवट ५/१२/४, वाज.सां. २९/२९, मैत्रायणी सां. ४/१३/३, काण्व सां.
१६/२०, तैििरीय ब्राह्मण ३/६/३/२, िनरुक्त ८/९) = पुराना कु श पृथ्वी पर ाऄनेक ह्लदशा में फै लता है।
याः कृ त्याकृ न्मूल कृ द्यातु धानाः। (ाऄथवट ४/२८/६) = ाऄपनी जड़ स्वयां कार्ने वाला।
मूल बहटणात् पह्ऱरपाह्येनम्। (ाऄथवट ६/११०/२) = जन्म के समय बालक कह्ळ नािभ में लगी नाल को कार्ना।
मूल बहटणी पयाट ह्लक्रयमाणा (ाऄथवट१२/५/३३) = मूल का नाश करने वाली।
(३६) लांगा-भोजपुरी में लांगा शब्द ाऄसभ्य या दुराचारी ाऄथट में प्रयुक्त होता है। यह निं का ाऄपभ्रांश है। निं का सामान्य
ाऄथट है वस्त्र हीन। पर िजसने शास्त्ररूपी वस्त्र नहीं पहना है वह निं है। ाआसके िवपरीत िजसने शास्त्र रूपी चमट या शमट का

ाअवरण धारण ह्लकया है वह शमाट है, जो ब्राह्मणों कह्ळ सामान्य ाईपािध है। ब्रह्मिवद् को भी ब्राह्मण कहते ह।। ब्रह्मिवद् ब्रह्मैव
भवित (मुण्डक ाईपिनषद् ३/२/११-स यो ह वै तत् परमां ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवित, न ाऄस्या ब्रह्मिवत् कु ले भवित)। वाक् या
शास्त्ररूपी वस्त्र के ाईद्धरण नीचे ह्लदये जाते ह।स नाः शमाटिण वीतयेऽििंयटच्छतु शांतमा। यतो नाः प्रुष्णवद्वसु ह्लदिव िक्षितभ्यो ाऄप्स्वा। (ाऊगवेद ३/१३/४)
ऐतरे य ब्राह्मणे व्याख्या-वागवै शमट। ाऄििंवै शमाटण्यन्नाद्यािन यच्छित। (२/४०-४१)
वागेव यस्य रक्षणां करोित स शमाट, न वस्त्रािधक्यां। यस्य ाऄन्तरे ाऄििंाः रक्षित-स ाअिङ्गरसाः। िद्विवधा समाजां बरित स
भरद्वाजाः। ाऄिवद्या (ाऄपरा िवद्या)= िवज्ञान माध्यमेन वेदाध्ययनां भरद्वाजादारभ्य सगोित्रय सायणस्य कह्ळर्विाः।
ाऄिस्मन्नथे पुराण लौह्लकक वचनािन-निंाथटाः-िवष्णु पुराण ३/१७ ाऄध्यायश्री मैत्रेय ाईवाच-को निंाः कक समाचारो निंसांज्ञाां नरो लभेत्। निंस्वरूपिमच्छािम यथावत्किथतां त्वया॥४॥
श्री पराशर ाईवाच-ाऊगयजुस्सामसांज्ञेयां त्रयी वणाटवृितर्वद्वज। एतामुज्झित यो मोहात्स निंाः पातकह्ळ िद्वजाः॥५॥
त्रयी समस्तवणाटनाां िद्वजसांवरणां यताः। निंो भवत्युिज्झतायामतस्तस्याां न सांशयाः॥६॥
ाऄध्याय ३/१८-यस्तु सन्त्यज्य गाहटस्थ्यां वानप्रस्थो न जायते। पह्ऱरव्रार्् चािप मैत्रेयाः स निंाः पापकृ न्नराः॥३८॥
वामन पुराण, ाऄध्याय १४येषाां कु ले न वेदोऽिस्त न शास्त्रां नैव च व्रतम्। ते निंााः कह्ळर्वितााः सिभस्तेषामन्नां िवगर्वहतम्॥९२॥
भतृटहह्ऱर, नीितशतक-के यूरािण न भूषयिन्त पुरुषां हारा न चन्द्रोज्ज्वला, न नानां न िवलेपनां न कु सुमां नालङ्कृ ता मूधटजााः ।
वाण्येका समलङ्करोित पुरुषां या सांस्कृ ता धायटते, क्षीयन्ते खलु भूषणािन सततां वागभूषणां भूषणम् ॥१९॥

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