सदा – ए – स का तरीका

हमारे मुको िह द व पाक मे सदा ए स का जो तरीका है वो ये है िक
आखरी रकअत मे तशहदू मे अतिहयात व दू द के बाद एक तरफ सलाम फे रकर
िफर दो सदे िकये जाते है,िफर अतिहयात दु%द व दुआ के बाद दोनो तरफ
सलाम फे रकर नमाज़ से फा(रग ह*आ जाता है । क् या ये तरीका सु नत से सािबत
है? जी हां ये तरीका सु नत से सािबत नह. है । आईये देखते है इंसािनयत के
िनजात दिह दा सरवरे कायनात मुह1मद सलालाह* अलैिह वसलम ने सदे स
के मसले पर अपने कौल व अमल से 3या हल बताया है :मुतफकु न अलैिह हदीसे (यािन बुखारी व मुि7लम) क9 हदीसो से सािबत है
िक सदे स जब नमाज़ मे शक पड़ जाये उस व3त िकया जाता है और उसका
तरीका ये है िक आिखरी तश=दुद मे अ>िहयात, दु द, दुआ के बाद दो सदे
स?व के िकये जाये और िफर सलाम फे र िदया जाये । आईये दलील के तौर पर
हदीसे देखे :-

हदीस नं0 1
हज़रत अबू सईद खुदरी रिज0 ने कहा िक नबी करीम सलालाह* अलैिह
वसलम ने फरमाया ‘’अगर तुम मे से िकसी को रकअतो क9 तदाद के बारे मे शक
पैदा हो जाये िक तीन पढ़ी या चार ? तो शक को छोड़ कर यक9न पर भरोसा करे ।
िफर सलाम फे रने से पहले दो सदे करे । अगर उस ने पांच रकअते पढ़ी थी तो यह
सदे उस क9 नमाज़ क9 रकअतो को ताक बना देगे । और अगर उसने पूरी चार
रकअत पढ़ी थी तो सदे शैतान के िलये ि़जJत का सबब हKगे । (सहीह मुि7लम,

िकताबुल मसािजद, हदीस नं0 571)

हदीस नं0 2
‘’िजसको नमाज़ मे यह शक हो जाये िक उसने एक रकअत पढ़ी है या दो ?
तो वह उस को एक रकअत यक9न करे । और िजसको यह शक हो िक उसने दो
पढ़ी या तीन ? तो वह उसको दो रकअत यक9न करे । और िफर आिखरी कादे मे
सलाम फे रने से पहले स के दो सदे करे । (सुनन ितिमOजी, िकताबु7सलात हदीस
नं0 398, इSने माजा हदीस नं0 1209)
सदे स का तरीका यह है िक आिखरी कादे मे तश=ह*द दु द और दुआ
पढ़ने के बाद अलाह* अकबर कह कर सदे मे जाये िफर उठ कर जसे मे बैठ कर
दुसरा सदा करे और िफर उठ कर सलाम फे र कर नमाज़ से फा(रग हो । ऊपर
बयान क9 गई हदीस मे सलाम फे रने से पहले सद – ए – सव का ह*3म है,
इसिलये स के दो सदे सलाम फे रने से पहले करने चािहये ।

पहले कादा के तकO पर सदा
हज़रत अSदुलाह िबन बुजैना रिज0 से (रवायत है िक नबी करीम
सलालाह* अलैिह वसलम ने सहाबा को जुहर क9 नमाज़ पढ़ाई तो पहली दो
रकअते पढ़ कर खड़े हो गये (यािन कादा मे भुल कर नह. बैठे) तो लोग भी नबी
करीम सलालाह* अलैिह वसलम के साथ खड़े हो गये, यहां तक िक जब नमाज़
पढ़ चुके (और आिखरी कादे मे सलाम फे रने का व3त आया) और लोग सलाम

फे रने का इि तज़ार करने लगे तो नबी करीम सलालाह* अलैिह वसलम ने तकबीर
कही जबिक आप बैठे ह*ये थे । सलाम फे रने से पहले दो सदे िकये िफर सलाम
फे रा।‘’ (सहीह बुखारी, िसफित7सलात, हदीस नं0 829, 830, 1224, 1225,
1230, सहीह मुि7लम हदीस नं0 570)
लेहाज़ा नबी करीम सलालाह* अलैिह वसलम के इस अमल से सािबत ह*आ
िक सद –ए-स?व सलाम फे रने से पहले करना चािहये ।
मुहिसो का उसूल है िक हदीसे तीन तरह क9 होती है यािन फे अली, कौली,
और तकरीरी(यािन मुह1मद सलालाह* अलैिह वसलम के सामने कोई काम िकया
जाये और ह*जुर सलालाह* अलैिह वसलम अगर खामोश रहे तो यह जायज़ होगी
वरना आप सलाह* अलैिह वसलम उस काम से रोक देग)े इन हदीसो मे कौली
हदीसे सबसे यादा ह*जत होती है अगरचे फे अली हदीसे इसके िखलाफ ही 3यो न
हो । यहां फे अल और कौल दोनो सलाम फे रने से पहले सदे स करने को ह*जत
करार दे रहा है । लेहाजा़ ज री है िक इस अमल पर नबी करीम सलालाह*
अलैिह वसलम क9 ही इतआत क9 जाये ।

नमाज से फा(रग होकर बात कर चुकने बाद सदा स
हज़रत इमरान िबन ह*सैन रिज0 से (रवायत है िक नबी करीम सलालाह*
अलैिह वसलम ने अX क9 नमाज़ पढ़ाई और तीन रकअत पढ़ कर सलाम फे र
िदया और घर तशरीफ ले गये । एक सहाबी िखरबाक रिज0 उठ कर आप के पास
गये और आप से स का िजZ िकया तो आप तेज़ी के साथ लोगो के पास पह*ंचे
और िखरबाक़ रिज0 के कौल क9 तसदीक चाही, तो लोगो ने कहा िखरबाक़ रिज0

सच कहते है । िफर आप सलालाह* अलैिह वसलम ने एक रकअत पढ़ी िफर
सलाम फे रा और िफर दो सदे िकये िफर सलाम फे रा ।(मुि7लम िकताबुल मसािजद
हदीस नं0 575)

चार क9 जगह पांच रकअत पढ़ने पर सदा
हज़रत अSदुलाह िबन मसऊद रिज0 (रवायत करते है िक नबी करीम
सलालाह* अलैिह वसलम ने जुहर क9 नमाज भुलकर पांच रकअत पढ़ा दी । जब
आप से पूछा गया 3या नमाज़ मे यादती हो गयी है ? तो आप ने फरमाया 3यो ?
सहाबा ने कहा आप ने जुहर क9 पांच रकअते पढ़ाई है । िफर आप ने सलाम के बाद
दो सदे िकये (यािन िसफO सदे िकये, सदे के बाद सलाम नह. फे रा) और
फरमाया ‘’मै भी तु1हारी तरह इंसान ह\ं, मै भी भुलता ह\ं जैसे तुम भूलते हो, इसिलये
जब भूल जाऊं तो मुझे याद िदला िदया करो । (सहीह बुखारी िकताबु7सलात हदीस
नं0 401, सहीह मुि7लम िकताबुल मसािजद हदीस नं0 572)
सद-ए-स सलाम से पहले या बाद करने का िजZ तो अहादीस मे आप
पढ़ चुके है । लेिकन िसफO एक तरफ सलाम फे र कर सदा करना और िफर
अ>िह^यात पढ़ कर सलाम फे रना सु नत से सािबत नह. है ।
अगर इस बाब मे हज़रत जुलयदैन रिज0 क9 हदीस (बुखारी हदीस नं0
1229) को भी शािमल कर िलया जाये तो इन तमाम (रवायतो का िनचोड़ ये
िनकलता है :(1) जब इमाम सदा-ए-स िकये िबना सलाम फे र दे और मुकतदी उसे याद
िदलाये तो वह बाक9 रह गयी रकअतो को पढ़ाएगा और सलाम फे रने के बाद सद-

ए-स करेगा ।
(2) और अगर मु3तदी उसे यह याद िदलाये िक हम ने एक रकअत यादा पढ़ ली
है, तो भी ज़ािहर है िक सलाम तो फे र चुका है, अब उसे िसफO सद-ए-स ही
करना है ।
(3) और अगर रकअतो क9 तादाद मे शक हो जाये, या कादा छु ट जाये, या िफर
कोई अरकान छु ट जाये तो िफर सलाम से पहले सद-ए-स करेगा ।
(4) अगर नमाज़ी को िकसी वजह से यह अहकाम जो बयान िकये गये, या वह
एैसी भूल का िशकार हो गया जो इन अहादीस मे बयान नह. है तो िफर उसे जान
लेना चािहये िक नबी करीम सलालाह* अलैिह वसलम ने सलाम से पहले भी स
के दो सदे िकये है और सलाम फे रने के बाद भी वह िजस सूरत पर भी अमल
करेगा अलाह तआला उसे कु बूल कर लेगा –इंशाअलाह तआला (वलाह\
आलम)
‘’व आख वािन वह1दुिललाहे रSबीअल आ-अलमीन’’

इ7लािमक दावाअ से टर,
रायपुर छतीसगढ़

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