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अघोर आकस्मिक धन प्रास्ि प्रयोग (Aghor Aakashmik Dhan
Prapti Prayog)

धर्म अर्म कार् और र्ोक्ष जीवन के चार र्ुख्य स्तंभ है. इन सभी
पक्षों र्े व्यक्ति पूर्मता प्राप्त करे यही उद्देश्य साधना जगत का भी है.
इसी क्तिए व्यक्ति के गृहस्र् और आध्याक्तमर्क दोनों पक्ष के सबंध र्े
साधनाओ का अक्तस्तमव बराबर रहा है. हर्ारे ऋक्ति र्ुक्तन जहा एक
और आध्यार् र्े पूर्मता प्राप्त र्े वही भौक्ततक पक्ष र्े भी वह पूर्म
रूप से सक्षर् र्े. साधना के सभी र्ागो र्े इन र्ुख्य स्तंभों के
अनुरूप साधनाऐ क्तवद्यर्ान है ही. इस प्रकार अघोर साधनाओ र्े
भी गृहस्र् सर्स्याओ सबंक्तधत क्तनराकरर् को प्राप्त करने के क्तिए
कई साधना क्तवद्यर्ान है. इन साधनाओ का प्रभाव अमयक्तधक तीक्ष्र्
होता है, तर्ा व्यक्ति को अल्प काि र्े ही साधना का पररर्ार्
तीव्र ही क्तर्ि जाता है. धन का क्तनरं तर प्रवाह आज के युग र्े ज़रुरी
है. साधक के क्तिए यह एक क्तनतांत समय है की सभी पक्षों र्े पूर्मता
प्राप्त करनी चाक्तहए. जब तक व्यक्ति भोग को नहीं जानेगा तब तक

वह र्ोक्ष को भी के से जान पाएगा. इस र्ुख्य चचतन के सार् हर
एक प्रकार की साधना का अपना ही एक अिग स्र्ान है. व्यक्ति
चाहे ककतना भी पररश्रर् करे िेककन भाग्य सार् ना दे तो सफिता
क्तर्िना सहज नहीं है. ऐसे सर्य पर व्यक्ति को साधनाओ का
सहारा िेना चाक्तहए तर्ा अपने कायों की क्तसक्ति के क्तिए देवमव का
सहारा िेना चाक्तहए. पूर्मता प्राप्त करना हर्ारा हक़ है और
साधनाओ के र्ाध्यर् से यह संभव है. ककसी भी कायम के क्तिए
व्यक्ति को आज के युग र्े पग पग पर धन की आवश्यकता होती है.
हर व्यक्ति का सपना होता हे की वह श्रीसम्प्पन हो. िक्ष्र्ी से
सबंक्तधत कई प्रयोग अघोर र्ागम र्े क्तनक्तहत है िेककन जब बात तीव्र
धन प्राक्तप्त की हो तो अघोर र्ागम की साधनाए िाजवाब है.
अघोररयो के प्रयोग अमयक्तधक मवररत गक्तत से कायम करते है तर्ा
इच्छापूर्तत करते है. आकक्तस्र्क रूप से धन की प्राक्तप्त करने के क्तिए
जो क्तवधान है उसके र्ाध्यर् से व्यक्ति को ककसी न ककसी रूप र्े
धन की प्राक्तप्त होती है तर्ा मवररत गक्तत से होती है. इस र्हमवपूर्म
और गुप्त क्तवधान को साधक सम्प्पन करे तब चाहे ककतने भी भाग्य
रूठे हुए हो या कफर पररश्रर् सार्मक नहीं हो रहे हो, व्यक्ति को
क्तनक्तित रूप से धन की प्राक्तप्त होती ही है.
साधक अष्टर्ी या अर्ावस्या की राक्ति को स्र्नान र्े जाए तर्ा
तेि का दीपक िगाये. अपने सार्ने िाि वस्त्र क्तबछा कर ५ सफे द
हकीक पमर्र रखे तर्ा उस पर कुं कु र् की चबदी िगाये. साधक के

वस्त्र िाि रहे. तर्ा कदना उत्तर या पूवम. उसके बाद साधक सफे द
हकीक र्ािा से क्तनम्न र्ंि की २१ र्ािा जाप करे .
ॐ शीघ्र सर्व लक्ष्मी र्श्यमे अघोरे श्वराय फट
साधक को यह क्रर् ५ कदन तक करना चाक्तहए. ५ वे कदन उन
हककक पथ्र्रो को उसी िाि कपडे र्े पोटिी बना कर अपनी
क्ततजोरी या धन रखने के स्र्ान र्े रख दे.
अघोरेश्वर प्रत्यक्षीकरण साबर प्रयोग (AGHORESHWAR
PRATYAKSHIKARAN SAABAR PRAYOG)

साबर साधनाओ के अद्बुध कररश्र्ो के बारे र्े तो सब पररक्तचत ही
है. अघोर र्ागम का उिार करने वािे भगवान श्री दत्तािेय और
साबर र्ंिो का सबंध अपने आप र्े अटूट है. श्री दत्तभगवान की
प्रेरर्ा तर्ा आनीवमचन से नार् योक्तगयो द्वारा साबर र्ंिो का
प्रचार प्रसार हुआ र्ा. इस प्रकार अघोर साधनाओ र्े भी साबर

र्ंिो का प्रयोग प्रचुरर्ािा र्े होने िगा र्ा. अघोरी के क्तिए
भगवान अघोरे श्वर र्ुख्य देव है, क्तजनके र्ुख से सर्स्त तन्त्िो का
सार क्तनकिता रहता है. जो क्तनवतमव को अपने अंदर स्र्ाक्तपत कर
सदा क्तनव आनंद से युि हो कर अपने आप र्े ही क्तिन रहता है
वही अघोरी है. क्तसि अघोरी की यही पहचान है जो अघोरे श्वर की
तरह ही क्तनर्तिप्त रहता है सर्स्त क्तवकारों भेदभाव तर्ा पानो के
बंदन से छू ट गया है. ज़रुरी नहीं की वह स्र्नान भष्र् से युि हो,
नग्न रहे या घृर्ा पर क्तवजय होने का प्रदनमन करे . जो इन सब से
ऊपर उठ चूका हो, क्तजसके क्तिए ये भेद ही न हो, वही तो है
अघोरी. ककसी सर्य र्े इनका घर र्े आना, स्वयं क्तनव के आने
क्तजतना सौभाग्यदायक र्ाना जाता र्ा िेककन कु छ स्वार्मपरस्तो ने
तो कु छ हर्ारी अविेहना भ्रर् और कु तकम ने इस र्ागम का ग्रास कर
उसे भय का रूप दे कदया. खेर, अघोरी के क्तिए यह ज़रुरी है की वह
अघोरे श्वर के चचतन र्े क्तिन रहे. भगवान अघोरे श्वर स्र्नान र्े
क्तबराजर्ान है, सपो से क्तिप्त वह स्र्नान भस्र् को धारर् ककये हुए
है. क्तजनके चेहरे पर आनंद ही है तर्ा और कोई भाव हे ही नहीं.
ऐसे अघोरे श्वर के श्रेष्ठ रूप का ध्यान करना साधक के क्तिए उत्तर्
है. प्रस्तुत साधना भगवान अघोरेश्वर के इसी रूप के दनमन प्राप्त
करने की साधना है. वस्तुतः यह अपने आप र्े अमयक्तधक र्हमवपूर्म
साधना है क्तजसको करने के बाद साधक का क्तचत हर्ेना क्तनर्मि

रहता है, भेद से र्ुक्ति क्तर्िती है तर्ा सवमसवाममर्क भाव का उसर्े
उदय होता है. सार् ही सार् अघोरे श्वर के वरदान से साधक
अष्टपानो से र्ुि होने िगता है. इस प्रकार की भावभूक्तर् प्राप्त होते
साधक को क्तवक्तवध प्रकार की साधनाओ र्े सफिता प्राप्त होने
िगती है. वैसे भी अघोरी के क्तिए यह एक अमयक्तधक र्हमवपूर्म क्रर्
है की साधनार्ागम के इष्ट के दनमन कर उनके आनीवामद प्राप्त करना.
साधक को चाक्तहए की वह इस साधना को स्र्नान र्े ही सम्प्पन
करे . रािी र्े ११:३० के बाद इस साधना को नुरू करना चाक्तहए.
साधना को सोर्वार से नुरू करे . साधक को स्नान कर अघोर गुरु
पूजन सम्प्पन कर क्तवनेि नाबर र्न्त्ि का ५१ र्ािा जाप करना
चाक्तहए. र्ंि जाप के क्तिए साधक को रुद्राक्ष र्ािा का प्रयोग करना
चाक्तहए. आसान तर्ा वस्त्र कािे हो. आसान के क्तनचे क्तचता भष्र्
को क्तबछा देना चाक्तहए. इस क्रर् को ११ कदन तक करने पर क्तवक्तवध
अनुभूक्ततया होने िगती है, साधक जब इसे २१ कदन कर िेता है
तब उसे भगवान अघोरे श्वर के दनमन होते है.
ॐ अघोर अघोर प्रमयक्ष वाचा गुरु की अघोरनार् दनमय दनमय आर्
क्तसिनार् की
साधक को भयभीत ना हो कर वीर भाव से यह साधना करनी
चाक्तहए.
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TEEVRA AGHOR VASHIKARAN SADHNA

अभी महर्षि
अंदर

दे व दत्त

और में एक र्वशाल गफ
ु ा के

बैठे हुए हैं, जहााँ पर मैं एक उजाि के एक उच्च

और र्वशाल स्त्रोत

का अहसास कर पा रहा हाँ. एक ऐसी

प्राकर्तिक

स्त्वतः बनी हुए गफ
ु ा, जजसमे स्त्वतः

रूप से

की प्रकाश की प्राकर्तिक व्यवस्त्था हैं
अंत्यत

स्त्वच्छ

साफ जल

और इसमें एक

से भरा छोटा सा ताल

हैं | .पास की एक र्वशाल चट्टान रूपी
संत

पद्मासन

मुद्रा

ध्यानस्त्थ

अवस्त्था

,

अत्याकषिक

चेहरा ,गले में सुशोभभत रुद्राक्ष माला ,सुंदर

ललाट

बैठे

दीवाल पर एक

की

बभलष्ठता

में

भी

पर

हुए

हैं

त्ररपुंड

.

पर्ितः

सश
ु ोभभत,

युक्त शरीर ,और लहराते हुए केश राभश

की चट्टान से नीचे

जो

तक पहुच रही हैं. इसमें कोई भी

संदेह नहीं र्नश्चय ही वे एक उच्च संत हैं

न ये ही वह प्रथम व्यजक्त हैं जजन्होंने भगवान ् भशव से सीधे ही दीक्षा प्राप्त की उन्होंने कुल १०८ प्रकार की हैं.भलंग र्पंड प्रचभलत हैं . मैं अवाक् सा खड़ा रह गया . पर में दे खा की उनके केश राभश की लाबी ५ फीट से कम तो नहीं होगी | मैंने महर्षि की और आश्चयिचककत दृष्टी से दे खा . अघोर दीक्षा .पर कभी भी ये .पर उनका पहला केश ऋर्ष हैं.जजसका शाजददक अथि तो ये हैं की वो जो अपने केश को मुडडत करता हो . मुंड केश .कक यह तथ्य तो मैं भी नहीं जनता था कक १०८ प्रकार कक अघोर दीक्षा हैं . क्या तुम उन्हें जानना चाहोगे महर्षि दे वदत्त ने कहा नाम मुंड दीक्षा कैसे प्राप्त हुए.महर्षि दे वदत्त ने कहा की उनका नाम ऋर्ष मंड ु केश . भगवान ् भशव से सीधे ही प्राप्त की हैं.आज कुछ ही अघोर दीक्षा भी होती जैसे कक मुंड स्त्थापन.उन्होंने मुस्त्कुराते हुए कहा कक उनके १०८ नाम हैं .दं ड दीक्षा .

"१००० से भी अधधक र्वभभन्न शाश्रों के रधचयता हैं ये.इन्होने भगवान ् भशव से ही सीधे ही सब ज्ञान प्राप्त ककया हैं और . मैं इन महान व्यजक्त के बारे मैं सम्पर्िता से जानना चाहता था . न केबल यही बजकक . दे वदत्त कहते गए".तुमने एक बार पछा एक उच्च योगी र्पछले जन्म में था ककरावर् र्नश्चय ही रहा होगा ..." और क्या . महान संत के दशिन मैं करके ..ककस प्रकार से संभव होती हैं उनके बारे में कभी भी र्ववरर् नहीं एक ऐसे भमलता हैं. शायद तुमने तंरश े और साबरी दपिर् के बारे मैं सुना हो .तो ..रसायन शाश्र के भी ये पर्ि ज्ञाता और भसद्ध हस्त्त हैं. ये दोनों ग्रन्थ भी इन्ही के द्वारा भलखे गए हैं.| दे वदत्त कहते गए . मैं बेहद प्रसन्न हुआ .तुमने रावन के बारे मैं सुना ही हैं .

..तो उन्होंने कहा कक मेरे र्प्रय भमर . यह साधना वशीकरर् माध्यम ला कर बहुत ही उच्च कोदट की साधना हैं की.मैंने झुक कर को प्रर्ाम ककया. तंरश े अब केबल भसद्धाश्रम में ही उपलदध हैं . में आश्चयिचककत ..जजसके से आप ककसी को अनक ु ल मैंने महर्षि दे वदत्त को इतने उच्च भी अपने र्नयंरर् बना सकते कोदट की में हैं. साधना .येतम् ु हारे भलए उत्तर कक यही हैं वह महान संत .ककसी तरह से मैंने दो साधनाए भलख पाया ..उन मेंसे एक " अघोर वशीकरर् साधना " हैं .यद्दर्प में नहीं चाहता था.जजन्होंने रावर् के रूप में जन्म भलया था . पर मरे पास इस साधनाए महान ग्रन्थ कक कुछ हैं यदद तुम चाहो तो इन्हें भलख सकते हो . इनके उपलजदधयां अनधगनत हैं .. इसमें कोई दो मत हैं ही नहीं .. और ग्रन्थ के बारे हम लौट इस महान संत आये | जब मैंने तंरश े में दे वदत्त जी से पछा .

प्रदान करने के भलए धन्यवाद ददया इस साधना को ककसी भी सोमबार की रात्रर ११ बजे के बाद प्रारं भ ककया जा सकता हैं .तो कोई भी नया कपडे का टुकड़ा उस परी प्लेट पर त्रबछा दें . भलखे (काजल को इस प्रकार से हटा हैं की ) " ॐ अघोरे भ्यों घोरे भ्यों नमः " उस प्लेट के उपर जजस व्यजक्त का वशीकरर् करना हैं उसका एक वस्त्र का टुकड़ा र्वछा दें | यदद ये ककसी भी प्रकार से संभव न हो तो .जो लोहे या स्त्टील की बनी हो . |उस के ऊपर उस व्यजक्त का नाम भलख दे .| अंदर परी तरह काजल और र्नम्नाककत मंर लगा दे . जजस पर ये प्रयोग करना हैं नाम लेखन की प्रकिया ..साधना में प्रारं भ करने से पवि स्त्नान करके लाल वस्त्र धारर् करले .भसन्दर से ही की जाना चादहए | ये .वह भी इस महान संत की . कोई एक प्लेट इसके ले .

शिवे वश्ये श्ये हुं वश्ये वश््मे वश््मे अमक वश्ये वश््मे हुं वश्ये शिवे व फट इस मंर में अमक ु की जगह उस व्यजक्त का नाम उच्चाररत करें जजसे आपको वश में करना हैं . अपने सामने भगवान ् भशव का कोई भी धचर जो भी आपके पास हो और उस व्यजक्त का भी (जजस पर ये प्रयोग ककया जाना हैं ) रखे. काली हकीक या रुद्राक्ष माला से ५१ माला र्नम्नाककत मंर जप करें . पर इनसे न परे शान . इसके बाद पर्ि मनोयोग से उसी रात्रर में .. साधना काल के दौरान आपको कुछ आश्चयि जनक अनुभव हो सकते हैं. जब ये मंर जप पर्ि हो आप भगवान ् अघोरे श्वर से ऋर्ष मंड ु केश और इस साधना में सफलता के भलए प्राथना करें .

ये तो साधना सफलता के लक्षर् हैं . भय िस्ु ि भैरव साधना “भयमजु क्त भैरव प्रयोग” येन-येन दह रुपेर् साधकः संस्त्मरे त सदा | तस्त्य तन्मयतां यार्त धचंतामार्नररवेश्वर: || .या त्रबचभलत न हो .

साधक उसके जजस जजस स्त्वरूप का धचंतन करता है उसी स्त्वरुप की प्राजप्त उसे होती है | सदगरु ु दे व ने कहा है कक परु ु ष की शोभा उसकी प्रचंडता में होती है और उसके ह्रदय की कोमलता से उसके व्यजक्तत्व का पररचय| जजसका साक्षात ्. समजन्वत रूप ही भैरव हैं. अतः कोई भी साधक इनका पजन. और भगवन भैरव शददमय हैं क्योंकक भशव शददमय हैं और भैरव उनका अंश. भगवान भशव की ही भांर्त अर्त अकप पजन से ही प्रसन्न होने वाले हैं.. . जो कक एक ओर सब कुछ पल भर में र्वध्वंश करने वाला स्त्वरुप तो दसरी ओर साधक को सब कुछ प्रदान करने वाला .. ऐंसे ही एक छोटा ककन्तु अत्यंत तीव्र प्रयोग जो अभय के साथ रक्षा भी प्रदान करता है ... जप आदद ककसी डर के कर सकता है ..अथाित ईश्वर धचंतामणर् के सद्रश हैं.

अब प्रश्न ये कक.भैरव पर्ि रूपां दह शंकरस्त्य परात्मनः ---अतः हे महादे व. या कफर सभी के घर भशवभलंग तो होगा ही अतः भशवभलंग को ही स्त्थार्पत कर दें . ये कहााँ से प्राप्त होगी तो मेरे ख्याल से अनेक लोगों के पास ये गुदटका हो सकती है क्योंकक अनेक लोगों मैंने ही ये उपलदध करवाया है . हे भैरव हमारी रक्षा करें ककसी भी मंगलवार को रात्रर में एक प्रहर के बाद ककसी ताम्र पार में कुमकुम से रं गे चावलों की ढे री बना लें और उस पर एक भैरव गदु टका. या स्त्वर्ािकषिर् गदु टका या भशवभलंग स्त्थार्पत कर दें | अब प्रश्न ये है की ये कौन सी गट ु ीकाएं हैं ये भैरव मन्र से अभभमंत्ररत स्त्वयम भैरव ् के प्रतीक स्त्वरुप हैं चाँकक हम सभी प्रतीक स्त्वरूप की ही पजा अचिना या साधना करते हैं.

कफर रुद्राक्ष माला से ११ माला र्नम्न मन्र की करें ---मन्र – || || ॐ ह्रीं भैरव भयंकर हर मां रक्ष-रक्ष हं फट स्त्वाहा मन्र— || ॐ HREEM BHAIRV BHAYANKAR HAR MA AM RAKSHA-RAKSHA HUM FATTA SWAHA || प्रयोग संपन्न करें और ररजकट स्त्वयम दे खें | . तथा लोबान धुप तथा र्तल के तेल का दीपक लगाएं.तथा उनका कुमकुम अक्षत भसंदर और लाल पष्ु प से पजन करें .

. जो स्त्वयम साधना करके दे खते हैं उन्हें सत्यता का बोध होता ही होता है ककन्तु भसफि बातें करने से कुछ भी हाभसल नहीं होता------ अतः ककसी भी मंर को ककये बगैर उसमें नक् ु स र्नकालने से अच्छा है उसे कर के दे खा जाये. और यही इसकी र्वशेषता है .. अतः साधना करें त्रबना ककसी के बातों में आये. ककसी को सलाह दे ना बुरा नहीं है ककन्तु ददग्भ्भ्रभमत करना गलत है .... हैं ना ..एक बात का सदै व ध्यान रखें कक और अपने ईष्ट के प्रर्त श्रद्धा ही आपको ककसी भी साधना में सफल करती मैं आजकल हमारे ग्रप ु पर बहुत ज्यादा वैचाररक र्वषमता दे ख रही हाँ जो की नए साधकों को भ्रभमत कर रही है . प्राथिना है कक पहले संपन्न करें कफर ---- और जी हााँ र्नणखल-अककेमी पर मन्र ददए जाते हैं साधना दी जाती है और इसी वजह से आप और हम जुड़े हैं.

सभी स्वरुप अपने आप में ननराले तथा नवलक्षण. कापानलक. तंत्र के क्षेत्र में भैरव के यूूँ तो ५२ रूप प्रचनलत है लेनकन ८ रूप मख्ु यरूप से ज्ञात है.*** रजनी र्नणखल *** KRODH BHAIRAV SADHNA ========================================== तंत्र के क्षेत्र में भगवान भैरव का स्थान तो अपने आप में ननराला है. इनको संयक्त ु रूप से अष्ट भैरव के नाम से जाना जाता है. नाथ. यह देव अपने साधकोको शीघ्र नसनि एवं कल्याण प्रदान करने के कारण सनदयों से महत्वपूणण उपास्य देव रहे है. तंत्र में जहां एक और गणपनत को नवघ्न ननवारक के रूप में पूजन करना अननवायण ्रमम है तो साथ ही साथ नसिो के मत से नकसी भी साधना के नलए भैरव पूजन भी एक अननवायण ्रमम है क्यों की यह रक्षात्मक देव है जो की साधक तथा साधक के साधना ्रमम की सभी रूप . वस्ततु ः भगवान भैरव से सबंनधत कई कई प्रकार की तांनत्रक साधना नवनवध मत के अंतगण त होती आई है. अघोर इत्यानद साधना मत में तो भगवान भैरव का स्थान बहोत ही उच्चतम माना गया है. भगवान नशव के स्वरुपसमही उनके ये नवनवध रूप.

इसी नलए भयवश भी इनकी साधना साधक नहीं करते है. यह स्वरुप ्रमोध का ही साक्षात स्वरुप है अथाण त पूणण तमस भाव से यक्त ु स्वरुप. यह स्वरुप पूणण तमस को धारण करने के कारण साधक को अत्यनधक तीव्र रूप से तथा तत्काल पररणाम की प्रानि होती है. वस्ततु ः इनकी साधना इतनी प्रचनलत नहीं है इसके पीछे भी कई कारण है. यूूँ तो भगवान भैरव से सबंनधत कई कई प्रकार के प्रयोग साधको के मध्य है ही तथा इसमें भी बटुकभैरव एवं कालभैरव स्वरुप तो तंत्र साधको के नप्रय रहे है लेनकन साथ ही साथ भैरव के अन्य स्वरुप भी अपनी एक अलग ही नवलक्षणता को नलए हुवे है. इस नलए उग्र प्रयोग होने के कारण भी इस प्रयोग को यहाूँ पर प्रस्ततु नकया जा रहा है नजससे की आवश्यकता पड़ने पर साधक अपने जीवन की तथा अपने पररवार की गररमा को रख सके तथा पूणण सरु क्षा को प्राि कर सके . साक्षात् तमस का रूप होने के कारण इनके प्रयोग असहज भी है तथा थोड़े कनिन भी. यह प्रयोग भी नसर्ण नसिो के मध्य ही प्रचनलत रहा है क्यों की भले ही यह प्रयोग उग्र है लेनकन इसमें ज्यादा समय नहीं लगता है तथा एक बार साधना सम्प्पन कर लेने पर साधक उससे जीवन भर लाभ उिा सकता है. .में रक्षा करते है. इनकी उपासना शत्रओ ु के मारण. शत्रु के परु े घर पररवार को भी तहस महस कर सकता है. भगवान ्रमोध भैरव के सबंध में भी ऐसा ही है. वस्ततु ः भैरव को संहारात्मक देवता के रूप में प्रस्ततु कर नदया गया है नजसके कारण सामान्य जनमानस के मध्य इनको भय की द्रनष्ट से देखा जाता है लेनकन इनकी संहारात्मक प्रकृनत साधक के नलए नहीं वरन साधक के शत्रु तथा कष्टों के नलए होती है तथा इसी तथ्य का अनभु व तो कई महानसिो ने अपने जीवन में नकया है. खास कर इनकी संहारात्मक प्रकृनत. आज के यगु में जहां एक तरर् असरु क्षा सदैव ही साधक पर हावी रहती है तथा पग पग पर ज्ञात अज्ञात शत्रओ ु का जमावडा लगा हुआ है तब एसी नस्थनत में इस प्रकार के प्रयोग अननवायण ही है. सेना मारण आनद अनत तीक्ष्ण न्रमयाओं के नलए होती आई है. आनद शंकराचायण गोरखनाथ से ले कर सभी अवाण चीन प्राचीन नसिोने एक मत में भगवान भैरव की साधना को अननवायण तथा जीवन का एक अनत आवश्यक ्रमम माना है. प्रस्ततु साधना भगवान के इसी स्वरुप की साधना है नजसको पूणण कर लेने पर साधक इसका प्रयोग अपने नकसी भी शत्रु पर कर उसको जमींन चटा सकता है. उच्चाटन.

समय रानत्र में १० बजे के बाद का रहे साधक काले रंग के वस्त्र को धारण करे तथा काले रंग के आसन पर बैिे. जाप के बाद साधक न्यास करे. साधक को नकसी पात्र में मनदरा भी अनपण त करनी चानहए. साधक लाल रंग के पष्ु प का प्रयोग करे. इसके बाद साधक को गरुु मंत्र का जाप करना चानहए. साधक का मख ु दनक्षण नदशा की तरर् होना चानहए. करन्यास भ्ाां अङ्गष्ठु ाभयाां नमः भ्ीं तर्जनीभयाां नमः भ्रां मध्यमाभयाां नमः भ्ैं अनाममकाभयाां नमः भ्ौं कमनष्टकाभयाां नमः . साधक को इस प्रयोग को रक्षात्मक रूप से लेना चानहए तथा अपनी तथा घर पररवार की सरु क्षा के नलए साधक यह प्रयोग कर सकता है.यह प्रयोग अत्यनधक तीव्र प्रयोग है अतः साधक अपनी नववेक बनु ि के अनस ु ार स्वयं की नहम्पमत आनद के बारे में सोच कर ही प्रयोग करे. साधक अपने सामने भैरव का कोई नवग्रह या नचत्र स्थानपत करे. उस पर नसन्दूर अनपण त करे. साधक को अगर कोई व्यनक्त अत्यनधक परेशान कर रहा हो तथा नबना कारण अनहत नकये जा रहा हो तब यह प्रयोग करना उनचत है लेनकन नसर्ण नकसी को बेवजह परेशान करने के उद्देश्यआनद को मन में रख कर यह प्रयोग नहीं करना चानहए वरना साधक को इसका पररणाम भगु तना पड़ सकता है. प्रयोग के मध्य साधक को तीव्र अनभु व हो सकते है. साधक गरुु पूजन कर नचत्र या नवग्रह का पूजन करे. यह प्रयोग साधक नकसी भी अमावस्या या कृष्ण पक्ष अष्टमी को स्मशान में या ननजण न स्थान में करे.

भ्ः करतल करपष्ठृ ाभयाां नमः हृदयामदन्यास भ्ाां हृदयाय नमः भ्ीं मिरसे स्वाहा भ्रां मिखायै वषट् भ्ैं कवचाय हां भ्ौं नेत्रत्रयाय वौषट् भ्ः अस्त्राय फट् न्यास के बाद साधक रुद्राक्ष माला से ननम्पन मन्त्र की ५१ माला मन्त्र जाप करे. अगर साधक प्रयोग की आहुनत देने के बाद ननमाण ल्य या भष्म को उिा . मन्त्र में अमक ु ं की जगह सबंनधत व्यनक्त या शत्रक ु ा नाम लेना चानहए नजसके ऊपर प्रयोग नकया जा रहा हो. इस प्रकार करने से उस व्यनक्त का उच्चाटन हो जाता है तथा वह साधक के जीवन में कभी परेशानी नहीं डालता. ॐ भ्ां भ्ां भ्ां क्रोधभैरवाय अमक ु ां उच्चाटय भ्ां भ्ां भ्ां फट् (OM BHRAM BHRAM BHRAM KRODHBHAIRAVAAY AMUKAM UCCHAATAY BHRAM BHRAM BHRAM PHAT) मन्त्र जाप पूणण होने पर साधक वही ूँ पर नकसी पात्र में आग प्रज्वनलत कर के १०८आहुनत बकरे के मांस में शराब को नमला कर अनपण त करे. दस ू रे नदन नकसी श्वान को दहीं या कुछ भी अन्य खाध्य प्रदाथण नखलाएं. भोग के नलए अनपण त की गई मनदरा वही ूँ छोड़ दे. इसके बाद साधक को जब भी प्रयोग करना हो तो साधक को रात्री काल में १० बजे के बाद उपरोक्त न्रमयाओं अनस ु ार ही पूजन आनद न्रमया कर इसी मन्त्र की १ माला मन्त्र का जाप कर १०१ आहुनत शराब तथा बकरे के मांस को नमला कर देनी चानहए.

FEBRUARY 28. THURSDAY. .कर शत्रु के घर के अंदर दाल देता है तो शत्रु का पूरा घर परेशान हो जाता है. घर के सभी सदस्यों को दःु ख एवं कष्ट का सामना करना पड़ता है तथा शत्रु पूणण घर पररवार सनहत बरबाद हो जाता है. 2013 MAHARSHI KAALAAGNI RUDRA PRANEET MAAHAAKAAL BATUK BHAIRAV SADHNA PRAYOG जय सगुरुदेव.

पं पं पं पापनानर् प्रर्र्त सततं भैरवं क्षेिपािर् || सदगुरुदेव ने भैरव उपासना के अनेक आयार् न के वि बताए हैं अक्तपतु अनेक साधकों को इसर्ें क्तनपुर् भी ककया है उनका कहना र्ा कक प्रमयेक साधक को साधना क्षेि र्ें उतरने से पहिे भैरव साधना अवश्य कारर् चाक्तहए.यं यं यं यक्ष रूपर् दनकदनीवदनं भूक्तर्कम्पपयर्ानं | सं सं सं संहारर्ूती नुभर्ुकुट जटानेखरं चंद्रक्तबम्पबर् || दं दं दं दीघमकायं क्तवकृ तनख र्ुख चौध्वमरोयर् करािं. भगवान भैरव को नब्दर्य रूप र्ें वर्तर्त करने का कारर् क्तसफम इतना है कक अन्त्य देव कक अपेक्षा पूरे ब्रहांड र्ें सवमि क्तवद्दर्ान हैं. उनकी इसी नक्ति को साधक अनेक रूपों वर्तर्त कर साधनाओं के द्वारा प्राप्त कर अपने जीवन के दुःख और कष्टों से र्ुक्ति प्राप्त करते . क्तजस प्रकार नब्द को ककसी भी प्रकार के बंधन र्ें नहीं बााँधा जा सकता उसी प्रकार भैरव भी ककसी भी क्तवघ्न या बाधा को सहन नहीं कर पाते और उसे क्तवध्वंन कर साधक को पूर्म अभय प्रदान करते हैं. क्योंकक इससे ना के वि साधना र्ें आने वािे क्तवघ्न दूर होते हैं बक्तल्क भगवान भैरव कक कृ पा भी प्राप्त होती है.

. इस साधना की क्तवनेिता है की ये भगवान् र्हाकाि भैरव के तीक्ष्र् स्वरुप के बटुक रूप की साधना है जो तीव्रता के सार् साधक को सौम्पयता का भी अनुभव कराती है और जीवन के सभी अभाव...र्नोकार्ना पूती और भगवान् भैरव की कृ पा प्राक्तप्त.गुप्त निु. गुरुदेव ने इन्त्हीं भ्रांक्ततयों को दूर करने के क्तिए "भैरव् साधना" नार्क पुस्तक भी प्रकाक्तनत की ताकक िोग इसकी समयता को सर्झें और िाभाक्तन्त्वत हों सकें .इस १ कदवसीय साधना प्रयोग से संभव है. वस्तुतः भैरव साधना भगवान क्तनव कक ही साधना है क्योंकक भैरव तो क्तनव का ही स्वरुप है उनका ही एक नतमननीि स्वरुप.प्रकट वा गुप्त निुओं का सर्ूि क्तनवारर् करती है.हैं.ऋर्. इसके बाद भी सर्ाज र्ें भैरव के नार् का इतना भय कक नार् सुनकर ही िोग कााँप जाते हैं. एक तरफ अमयक्तधक प्रचंड स्वरूप जो पि भर र्ें प्रिय िा दे और एक तरफ इतने दयािु की आपने भि को सब कु छ दे डािे...क्तवपन्नता. बहुधा हर् प्रयोग की तीव्रता को तब तक नहीं . भैरव की उन अनेक साधनाओं र्ें एक साधना है र्हर्ति कािाक्तग्न रूद्र प्रर्ीत"र्हाकाि बटुक भैरव" साधना. भैरव भी क्तनव की ही तरह अमयन्त्त भोिे हैं. उससे तंि र्न्त्ि या जादू टोने से जोड़ने िगते हैं.

ये प्रयोग रक्तववार की र्ध्य राक्ति को संपन्न करना होता है.पूजन र्ें नैवेद्य उड़द के बड़े और दही का अर्तपत करना है .सर्झ पाते हैं जब तक की स्वयं उसे संपन्न ना कर िें. अस्य र्हाकाि वटुक भैरव र्ंिस्य कािाक्तग्न रूद्र ऋक्तिः अनुष्टुप छंद आपदुिारक देव बटुकेश्वर देवता ह्रीं बीजं भैरवी वल्िभ नक्तिः दण्डपाक्तर् कीिक सवामभीष्ट प्राप्तयर्े सर्स्तापक्तन्नवारार्ार्े जपे क्तवक्तनयोगः इसके बाद न्त्यास क्रर् को संपन्न करें .पुष्प गेंदे के या रि वर्ीय हो तो बेहतर है.क्तजस के ऊपर काजि और कु र्कु र् क्तर्क्तश्रत कर ऊपर क्तचि र्ें कदया यन्त्ि बनाना है और यन्त्ि के र्ध्य र्ें कािे क्ततिों की ढेरी बनाकर चौर्ुहा दीपक प्रज्वक्तित कर उसका पंचोपचार पूजन करना है.और उसके बाद क्तवक्तनयोग करें .इस प्रयोग को आप कररए और पररर्ार् बताइयेगा.अब अपनी र्नोकार्ना पूती का संकल्प िें.स्नान आकद कृ मय से क्तनवृत्त्य होकर पीिे वस्त्र धारर् कर दक्तक्षर् र्ुख होकर बैठ जाएाँ. ऋष्याकदन्त्यास – .सदगुरुदेव और भगवान् गर्पक्तत का पंचोपचार पूजन और र्ंि का सार्थ्यामनुसार जप कर िें तमपिात सार्ने बाजोट पर पीिा वस्त्र क्तबछा िें.

कािाक्तग्न रूद्र ऋिये नर्ः क्तनरक्तस अनुष्टुप छन्त्दसे नर्ः र्ुखे आपदुिारक देव बटुकेश्वर देवताये नर्ः हृदये ह्रीं बीजाय नर्ः गुह्ये भैरवी वल्िभ निये नर्ः पादयो सवामभीष्ट प्राप्तयर्े सर्स्तापक्तन्नवारार्ार्े जपे क्तवक्तनयोगाय नर्ः सवाांगे करन्त्यास ह्रां अङ्गुष्ठाभयां नर्ः ह्रीं तजमनीभयां नर्ः ह्ूं र्ध्यर्ाभयां नर्ः ह्रैं अनाक्तर्काभयां नर्ः ह्रौं कक्तनष्टकाभयां नर्ः ह्रः करति करपृष्ठाभयां नर्ः .

र्ूग ं ा या कािे हकीक र्ािा से ११ र्ािा जप करें ॐ ह्रीं वटुकाय क्ष्रौं क्ष्रौं आपदुिारर्ाय कु रु कु रु वटुकाय ह्रीं वटुकाय . नीि जीर्ूत संकानो जरटिो रि िोचनः दंष्ट्रा कराि वदन: सपम यज्ञोपवीतवान | दंष्ट्रायुधािंकृति कपाि स्रग क्तवभूक्तितः हस्त न्त्यस्त ककरीटीको भस्र् भूक्तित क्तवग्रह: || इसके बाद क्तनम्न र्ूि र्ंि की रुद्राक्ष.अङ्गन्त्यासह्रां हृदयाय नर्ः ह्रीं क्तनरसे स्वाहा ह्ूं क्तनखायै विट् ह्रैं कवचाय हूर् ह्रौं नेिियाय वौिट् ह्रः अस्त्राय फट् अब हार् र्ें कु र्कु र् क्तर्क्तश्रत अक्षत िेकर क्तनम्न र्ंि का ११ बार उच्चारर् करते हुए ध्यान करें और उन अक्षतों को दीप के सर्क्ष अर्तपत कर दें.

आपको क्या अनुभव होंगे ये आप खुद बताइयेगा. तमव क्तवनेि के कारर् हर व्यक्ति का नुभव दूसरे से प्रर्क होता है.र्ैंने उसे यहााँ नहीं क्तिखा है. सदगुरुदेव आपको सफिता दें और आप इन प्रयोगों की र्हत्ता सर्झ कर क्तगडक्तगडाहट भरा जीवन छोड़कर अपना सवमस्व पायें यही कार्ना र्ैं करती हूाँ.पीिा कपडा और दीपक को ककसी सुनसान जगह पर रख दें और उसके चारो और िोटे से पानी का गोि घेरा बनाकर और प्रर्ार् कर वापस िौट जाएाँ तर्ा र्ुड़कर ना देख.RUDRA PRAYOG .स्वाहा|| Om hreeng vatukaay kshroum kshroum aapduddhaarnaay kuru kuru vatukaay hreeng vatukaay swaha || प्रयोग सर्ाप्त होने पर दूसरे कदन आप नैवद्य े . “क्तनक्तखि प्रर्ार्” ITARYONI BADHA SE MUKTI HETU .ें ये प्रयोग अनुभत ू है.

राक्षश.===================================== यह अनंत ब्रह्माण्ड में हम अके ले नहीं है इस तथ्य को अब विज्ञान भी स्िीकार करने लगा है. वपशाच. गान्धिि आवद मख्ु य है. िेसे की भतु योनी से ज्यादा प्रेत योनी वहन् है. वितनी ही ज्यादा िासना प्रबल होगी मनष्ु य की योनी इतनी ही ज्यादा वहन् होती िायेगी. अब यहााँ पर बात करते है मनष्ु य के ही दसू रे स्िरुप की. िब मनष्ु य की मवृ यु अवयवधक िासनाओ के साथ हुई है तब मवृ यु के बाद उसको सक्ष्ू म की िगह िासना शरीर की प्रावि होती है क्यों की मवृ यु के समय विि या आवमा उसी शरीर में वस्थत थी. िस्ततु ः प्रेत. मख्ु य रूप से सभी महवर्षियों ने स्िीकार वकया था की ब्रह्माण्ड में मात्र मनष्ु य योनी नहीं है. मनष्ु य के अलािा भी कई प्रकार के विि इस ब्रहमाड में मौिदू है. इसके अलािा लोक लोकान्तरो में भी अनेक प्रकार के विि का अवस्तवि हमारे आवद ग्रन्थ स्िीकार करते है विनमे यक्ष. आवद मनष्ु य के ही आवम तवि के साथ लेवकन िासना और दसू रे शरीरों से िीवित है. वनश्चय ही मनष्ु य से तावविक द्रवि में अथाित शरीर के तविों के बंधारण में ये वभन्न है लेवकन इनका अवस्तवि बराबर बना रहता है. आधवु नक विज्ञान का विकास और परीक्षण अभी कुछ िर्षों की ही देन है लेवकन इस वदशा में हमारे ऋवर्ष मवु नयों ने सेंकडो िर्षों तक कई प्रकार के शोध और पररक्षण वकये थे तथा सबने अपने अपने विचार प्रस्ततु वकये थे. यह विर्षय अवयतं िहृ द है लेवकन यहााँ पर विर्षय को इतना समिना अवनिायि है. आधवु नक विज्ञान में भी कई प्रकार के परीक्षण इससे सबंवधत होने लगे है तथा एसी कई शवियां है विनके बारे में विज्ञान आि भी मौन हो िाता है क्यों की विज्ञान की समि के सीमा के दायरे के बाहर िह कुछ है. विद्याधर. खेर. इसी क्रम में मनष्ु य के अदं र के आवम तवि िब मवृ यु के समय स्थल ू शरीर को छोड़ कर दसू रा शरीर धारण कर लेता है तो िह भी मनष्ु य से अलग हो िाता है. भतू . अब इन्ही िासनाओ की पवू ति के वलए या अपनी अधरू ी इच्छाओ की पवू ति के वलए ये ये विि एक वनवश्चत समय तक एक वनवश्चत शरीर में घमू ते .

वनश्चय ही इनकी प्रिवृ त और मल ू स्िभाि हीनता से यि ु होता है और इसी वलए उनको यह योनी भी प्राि होती है. यह प्रयोग साधक वकसी भी सोमिार को कर सकता है. . कई बार यह अपने िीिन काल के दरवमयााँ िो भी कायिक्षेत्र या वनिास स्थान रहा हो उसके आसपास भटकते रहते है. साधक का मख ु उत्तर की तरि हो. कई िीिो में यह सामथ्यि भी होता है की िह दसू रों के शरीर में प्रिेश कर अपनी िासनाओ की पवू ति करे . कई बार ये अपने परु ाने शत्रु या विविध लोगो को वकसी न वकसी प्रकार से प्रतावडत करने के वलए कायि करते रहते है. इस वलए पारद वशिवलंग विशद्ध ु पारद से वनवमित हो तथा उस पर पणू ि तत्रं ोि प्रवक्रया से प्राणप्रवतष्ठा और चैतन्यकरण प्रवक्रया की गई हो यह वनतांत आिश्यक है.रहते है. साधक स्नान आवद से वनितृ हो कर लाल िस्त्रों को धारण करे तथा लाल आसान पर बैठ िाए. िैसे अगर रात्री में करना संभि न हो तो इस प्रयोग को वदन में भी वकया िा सकता है. इन इतरयोनी से सरु क्षा प्रािी हेतु तत्रं में भी कई प्रकार के विधान है लेवकन साधक को इस हेतु कई बात विविध प्रकार की वक्रया करनी पड़ती है िो की असहि होती है. यह पारदवशिवलंग से सबंवधत भगिान रूद्र का साधना प्रयोग है. साथ ही साथ ऐसे प्रयोग के वलए स्थान िेसे की स्मशान या अरण्य या विर मध्य रात्री का समय आवद आि के यगु में सहि संभि नहीं हो पता. इनमे भवू म तथा िल तवि अल्प होता है इस वलए मानिो से ज्यादा शवि इसमें होती है. प्रस्ततु विधान एक दवक्षणमागी लेवकन तीव्र विधान है विसे व्यवि सहि ही सम्प्पन कर सकता है तथा अपने और अपने घर पररिार के सभी सदस्यों को इस प्रकार की समस्या से मवु ि वदला सकता है तथा अगर समस्या न भी हो तो भी उससे सरु क्षा प्रदान कर सकता है. अशद्ध ु और अचेतन पारद वशिवलंग पर वकसी भी प्रकार की कोई भी साधना सिलता नहीं दे सकती है. इस प्रकार के कई कई वकस्से आये वदन हमारे सामने आते ही रहते है. साधक रात्रीकाल में यह प्रयोग करे तो ज्यादा उत्तम है. मल ू तः इसमेंपारद वशिवलंग ही आधार है परु े प्रयोग का.

यह वक्रया अदं ाज़े से १० वमवनट करनी चावहए. माला का विसििन करने की आिश्यकता नहीं है. ॐ नमो भगवते रुद्राय भूत वेताल त्रासनाय फट् (OM NAMO BHAGAWATE RUDRAAY BHOOT VETAAL TRAASANAAY PHAT) मंत्र िाप के बाद साधक पारद वशिवलंग को वकसी पात्र में रख कर उस पर पानी का अवभर्षेक उपरोि मत्रं को बोलते हुिे करे . यह िाप रुद्राक्ष माला से करना चावहए.क्यंवू क बहुत से भाइयों को िो यन्त्र अभी भी वकसी अपररहायि कारण से प्राि नहीं हो पाए हैं. साधक गरुु तथा पारद वशिवलगं का पिू न करे तथा गरुु मत्रं का िाप करे और विरं वनम्पन मंत्र की ११ माला मंत्र िाप पारदवशिवलंग के सामने करे . अगर साधक को कोई समस्या नहीं हो तथा मात्र उपरी बाधा से तथा तंत्र प्रयोग से सरु क्षा प्रावि के वलए भी अगर यह प्रयोग करना चाहे तो भी यह प्रयोग वकया िा सकता है.भाइयों और बहनों "वतब्बती साबर लक्ष्मी वशीकरण यन्त्त्र" का अमोघ विधान विसे मैंने २१ निम्पबर को देने को कहा था. इस प्रकार यह वक्रया साधक मात्र ३ वदन करे . ववशेष बात.क्याँू ना हम १ .और मेरा प्रयास मात्र इतना है की सौभाग्य और उन्नवत पर सभी का अवधकार है तो. इसके बाद साधक उस पानी को अपने परु े घर पररिार के सदस्यों पर तथा परु े घर में वछड़क दे. साधक इसका उपयोग कई बार कर सकता है.साधक अपने सामने पारदक्तनवचिग को स्थावपत करे .उसे मात्र अभी इसवलए नहीं वदया है.

.हफ्ते और प्रतीक्षा कर लें.. पर अभी भी वे सारे र्वधान जो अत्यधधक चमकृत करने वाले हैं साध को के सामने आना बाकक हैं ..तावक सबको यन्त्र वमलते ही उस अविय्तीय वक्रया को सपं न्न करने का विधान एक साथ दे दें.इनके यन्र के अनेको त्रबभेद भमलते हैं जो की अपने आप में ही एक अद्भत ु तथ्य हैं . घंटाकर्ि महावीर की उपासना जैन धमि में कहीं अधधक होती हैं .और हर यन्र से संबंधधत एक से एक सरल और उच्च कोदट की साधनाए .और यह अत्यधधक प्रभावशाली दे व माने गए हैं .जजनका अपने आप में कोई सानी नही . .

बहुत बार इन उपद्रवो के होने का कारर् ककसी ककसी व्यजक्त द्वरा हमााँरे ऊपर कोई प्रयोग कराया भी हो सकता और ऐसे कर्तपय ताजन्रको से आज यह समाज भरा पड़ा हैं . कई बार इसकी कोई वजह समझ में आती हैं तो कई बार नही. बस अचानक ही कल तक सब सामान्य था और आज पर क्या हो गया ..कभी कभी ग्रहों के दोष से भी पररवार में अनेको घटनाये होने लगती हैं जजनको कोई सख ु द नही कहा जा सकता हैं ....कभी कभी पररवार में ऐसे उपद्रव प्रारम्भ हो जाते हैं जजसका कोई कारर् ही समझ में नही आता . पर जब भी ऐसी समस्त्या आये तो अपने रक्षाथि यह सरल सा प्रयोग आप करे आप के भलए यह लाभ दायक भसद्ध होगा. और अब सब से तो बच नही जा सकता हैं. ...

ककया कराया..यह सरल प्रयोग हैं कोई ज्यदा ताम झाम भी नही हैं .मंर : ॐ महामाया घुंटाकाररणी महावीरी मम सवव उपद्रव.नािन करु करु स्वाहा || भसद्ध करने की र्वधध भसफि इतनी हैं ही ककसी भी शुभ महति में इस मंर का ११०० बार जप कर ले ककसी भी माला से . बाद में गुगुल की छोटी छोटी गोभलया बना ले उन्हें दे शी घी में अच्छे तरह से डुबो ले कफर उनसे हवन करे . बाद में जब यह भसद्ध करने की प्रकिया परी हो जाए तब जब ये समस्त्याए आये तो र्नत्य १०८बार गगल और घी से हवन करते रहे .चढा चढाया..ग्रह पीडा हवा बयार. वह भी १०८ बार . आसन वस्त्र पीले हो तो ठीक हैं और ददशा पवि या उत्तर की होना चादहए .. यह आपके पररवार में आ रही अनेको वाधाए दर करने में लाभ दायक ही भसद्ध होगा . .

nashan kuru kuru swaha | कुछ अनुभूत टोटके )KUCHH ANUBHOOT TOTKE कौऐ का एक एक पूरा कािा पंख कही से क्तर्ि जाए जो अपने आप ही क्तनकिा हो उसे “ॐ काकभूनड ुं ी नर्ः सवमजन र्ोहय र्ोहय वश्य वश्य कु रु कु रु स्वाहा”इस र्ंि को बोिते जाए और पंख पर फूं क िगाते जाए. इस . grah peeda hawa byaar. कफर उस पंख को आग िगा कर भस्र् कर दे. इस प्रकार १०८ बार करे . kiya karaya .************************************************************ ****** Mantra : om mahamaya ghantakarini mahaviri mam sarv updrav.chadha chadhaya . उस भस्र् को अपने सार्ने रख कर िोबान धुप दे और कफर से १०८ बाद क्तबना ककसी र्ािा के अपने सार्ने रख कर दक्तक्षर् कदना की और र्ुख कर जाप करे .

ऐसा क्तनयक्तर्त रूप से करने से ग्रह बाधा से र्ुक्ति क्तर्िती है धतूरे की जड़ अपने आप र्े र्हमवपूर्म है. इसे अपने घर र्े स्र्ाक्तपत कर के र्हाकािी का पूजन कर “क्रीं” बीज का जाप ककया जाए तो धन सबंधी सर्स्याओ से र्ुक्ति क्तर्िती है अपने घर र्े अपराक्तजता की बेि को उगाए. उसे रोज धुप दे कर “ॐ र्हािक्ष्र्ी वाक्तन्त्छतार्म पूरय पूरय नर्ःका जाप १०८ बार करे तो र्नोकार्ना की पूर्तत होती है . क्ततिक करते सर्य भी र्ंि को ७ बार बोिे. उल्िू का पंख क्तर्िे तो उसे अपने सार्ने रख कर “ॐ उल्िुकाना क्तवद्वेिय फट”का जाप १००० बार कर उसे क्तजस के घर र्े फें क कदया जाए वहा पर क्तवद्वेिर् होता है आक के रुई से दीपक बना कर उसे क्तनव र्ंकदर र्े प्रज्वक्तल्ित करने से क्तनव प्रस्सन होते है.भस्र् का क्ततिक ७ कदन तक करे . ऐसा करने पर सवम जन साधक से र्ोक्तहत होते है र्ोर के पंख को घर के र्ंकदर र्े रखने से सर्ृक्ति की वृक्ति होती है गधे के दांत पर “ॐ नर्ो कािराक्ति सवमनिु नानय नर्ः”का जाप १०८ बार कर के उसे क्तनजमन स्र्ान र्े रािी काि र्े गाड दे तो सवम निुओ से र्ुक्ति क्तर्िती है.

अद्भुत टोटका तंत्र (AMAZING TOTKA TANTRA) पंच तत्व अपने आप मे ही महत्वपर्ि है और यह हमारे आसपास ककसी न ककसी रूप मे होते ही है .क्तनजमन स्र्ान र्े “प्रेत र्ोक्षं प्रदोर्भवः”का ११ बार उच्चारर् कर के खीर तर्ा जि रख कर आ जाए ऐसा ३ कदन करे तो र्नोकार्ना पूर्तत र्े सहायता क्तर्िती है. इससे सभी प्रकारसे उन्नक्तत की प्राक्तप्त होती है. धुप करते सर्य चन्त्दन का टुकड़ा ड़ाि कर धुप करने से ग्रह प्रस्सन रहते है ककसी चेतनावान र्ज़ार पर क्तर्ठाई को बांटना अमयंत ही नुभ र्ाना गया है ऐसा क्तववरर् कई प्राच्य ग्रंर्ो र्े प्राप्त होता है. अतः इन तत्वों की अवलेहना भी कई बार र्वर्वध स्त्वास्त्थ्य सबंधी तथा लक्ष्मी सबंधी समस्त्याओ को आमंरर् दे ता है . लेककन अगर . अक्सर व्यजक्त छोटी चीजों को भल कर र्वर्वध बड़े बड़े अनष्ु ठान करवाने के भलए तैयार हो जाता है .

इस प्रकार जब कोई पौधा घर मे सख ु जाए तो उसे अपनी भमटटी के साथ ही नदी या समद्र ु मे प्रवादहत कर दे . इसके र्नवारर् हे तु साधक को अपने दरवाज़े पर स्त्वाजस्त्तक का धचन्ह बनाना चादहए . इससे भी साधक लक्ष्मी से सबंधधत समस्त्याओ से पीडड़त रह सकता है . यह भभम तत्व से सबंधधत दोष है. · अपने घर के मख् ु य द्वार के पास जस्त्थर पानी नहीं रखना चादहए. यथा संभव मुख्य द्वार के सामने बहार की तरफ भरा हुआ जल स्त्रोत ठीक नहीं है . इससे घर मे लक्ष्मी तथा स्त्वस्त्थ सबंधधत समस्त्याए बढती है . र्नचे र्वर्वध ग्रंथो से संगह ृ ीत तत्वों से सबंधधत कुछ टोटके प्रस्त्तुत ककये जा रहे है. तो बड़ी समस्त्या की पष्ृ ठभभम ही नहीं बनेगी. हमारे वेदों ने जब इन तत्वों को दे वताओं की संज्ञा दी है तब इनका ककसी भी रूप मे अपमान योग्भ्य नहीं है . · घर मे तल ु सी का और यथा संभव ककसी भी प्रकार का पौधा सख ु जाए तो उसे घर मे नहीं रखना चादहए.व्यजक्त छोटी छोटी चीजों पर ही ध्यान दे ना शुरू कर दे .

· घर मे जहा पर भी पानी लीक हो रहा हो उसे तरु ं त ठीक करवा लेना चादहए. · मंददर की ध्वजा की परछाई अगर ककसी घर पर पड़ती हो तो वहा पर पथ् ृ वी दोष लगता है ऐसा र्ववरर् कई ग्रंथो मे है . इसके र्नवारर् हे तु साधक को ३ अंजल ु ी जल सयि को या तल ु सी को चडा कर अजग्भ्न दे व से माफ़ी मांगे तथा मत ृ आत्माओ की मुजक्त के भलए प्राथिना करे · सयि को सयोदय के समय अध्यि दे ना अत्यधधक उत्तम होता है . घर मे पानी का टपकता रहना योग्भ्य नहीं कहा जाता तथा ऐसे घर के सभ्यो मे मानभसक रोग की सम्भावना बढ़ जाती है . व्यजक्त को अपने घर मे क्षेरपाल की स्त्थापना कर रोज गुड का भोग लगाना चादहए · स्त्मशान के पास गह ृ होने पर घर के अंदर से जलती हुई धचता को दे खने से अजग्भ्न तत्व से सबंधधत दोष लगता है . ऐसे घर मे रहने वाले व्यजक्त ककसी न ककसी रूप मे रोग के भशकार होते रहते है . उस समय “ औम घर् ृ ी सयि आददत्याय सवि दोष र्नवारर्ाय नमः” का ११ बार उच्चारर् करने से सभी दोषों से मुजक्त भमलती है .

और रोज “अकलाहु मदद” का यथा संभव जाप करे . रात्रर काल मे उस जल से वही पर नग्भ्न हो कर स्त्नान करे . इसके बाद ककसी दरगाह या मज़ार पर भमठाई का भोग लगा कर एक हरा धागा वहा से उठा ले. जल कुवे का ही होना चादहए और स्त्नान वही पर करना है . . एक हफ्ते की भीतर मदद प्राप्त होती है . उस धागे पर “अकलाहु मदद” का ८८ बार जाप कर के ककसी तावीज़ मे भर कर हाथ या गले मे पहे न ले. एक हफ्ते बाद तावीज़ को उसी मजार पर चडा दे .· संध्या काल मे साधक अगर र्नजिन वातावरर् मे ५ अगरबत्ती पंच तत्वों को याद कर के लगा दे तथा पविजो को मदद के भलए प्राथिना करे तो सवि लक्ष्मी तथा स्त्वास्त्थ्य सबंधधत दोषों की र्नवर्ृ त होती है · सयािस्त्त के समय अपने जल संग्रह स्त्थान के पास एक दीप जलने पर आकाश तथा जल स्त्वास्त्थ्य सबंधधत सवि दोषों की र्नवर्ृ त होती है · लक्ष्मी सबंधधत गेबी मदद प्राप्त करने के भलए कोई कुवां खोजे और सयािस्त्त मे उसमे से जल र्नकाले.

शायद नही न.aapka grahak ho . jaise ki aarogya.सम्िोहन तंत्र जीवन में सफलता पाने की चाह ककसे नही होती. Aap apne sabhi saduddeshya is shakti ke dwara poore kar sakte hain . आख़िर क्य? यूँ ????? सफलता की कीमत क्या है !!! क्या मसर्फ़ धन से. पर क्या सफलता इतने आसानी से ममल पतत है .phir chahe wo aapke office me aapka boss ho.koi neta ho . Kya aapko ye lagta hai ki sirf sammohit karne ka gun hi is shakti ke dwara mil pata hai to ye matr aapki galat-fahmi hai .aapka jeevan sathi ho.सुंदर चेहरे से सफलता ममलती है ??? नही ऐसा नही है !!! आत्मबल ki. aur ye sab prapt hota hai sammohan shakti ke dwara। Yadi aap me Sammohan shakti jagrat hai to safalta aapse door rah hi nahi sakti. aapka pyar ho . Ashtadas siddhiyon me se ek vashitva siddhi ka hi ye ek roop . drin ichchha shakti ki . Shayad aapko pata nahi hoga ki Ruso Rasputin ne isi shakti ke bal par Roos par shasan kiya . dhan aur poornta bhi isi shakti ki anugami upshaktiyan hain. is shakti ke saamne kisi ki bhi daal nahi galti.abhineta ho ya phir koi aam aadmi .ऊूँचे कद से.kyunki is shakti ke vividh aayam hain.ek samanya se charvaahe ne us vishaal rajya ko apna gulam hi bana liya.

Bhale hi aapko ye baaten atishiyokti poorn lage par ye satya hai . क्युंकय क सामान्य त्राटक के क्रम को करते हए सफलता प्राप्त करने के मलए लम्बी अवधध लगती है और सतत अभ्यास िी वाही ताूँता का आश्रय लेने पर ये दल़ि घटना शीघ्र ही आपके साधक जीवन में घटटत होती ही है . lakshmi ho ya anya koi bhi shakti . Sammohan ki uchchavastha me ye prataykshikaran ki ghatna to samanya baat ho jaati hai. Sammohan ke paash me abaddh hokar saamne hath baandh kar khadi hoti hain. Bas sadhna ki satyata par iljaam daal kar aur in sadhnaon ko kapol kalpit kah kar apne kartavya ki iti shri kar lete hain.hai. Yakshini ho. Apara shakti ka ye aadhaar hai.yakshini ki sadhna ki hain. Kyunki aantrik की miya karne ke baad dhatvik की miya to saamanya baat hi rah jati hai। सम्मोहन तुंत्र . saamanya manav ki to baat hi chhod dijiye. is satya ko maine Sadgurudev ke aashirvaad se maine G. phir chahe wo Apsara ho. सामान्य त्राटक अभ्यास से मिन्न ही है . unhe pratayakshikaran to door koi anubhuti bhi nahi hoti kya aapne socha hai ki jo sadhak safal huye hain unme kya visheshta hai. हाूँ इसके मलए एक . shayad aapne kabhi dhyan hi nahi diya hoga. par ye to apni kamiyon ko najar-andaaj hi karma hai . Adhikansh sadhak jinhone apsara.

तिी तो आपकी मनोवाुंतित शस्क्त अपने वरद हथत को आपके शीश पर रख पयर्त ़ ा और सफलता का आशीष दे ते हए आपको धनवान व गौरव प्रदान करती हैं. पहले प्रिम टदन का मुंत्र जप कफर दस य रे टदवस का मुंत्र . हम शायद ये बार बार ियल जाते हैं की हम िी उसी टदव्या िमय म . दस य रे टदन सषम्ना नाडी के जागरर् के मलए आत्म मसवद्ध मुंत्र का जप ककया जाता है . हम सिी में िी वही का बीज बोया गया है . साि ही शरीर मसवद्ध मन्त्र का गरु द्वारा तनदे मशत सुंख्या में जप करना चाटहए . ५० िस्थत्रका का तनत्य अभ्यास आपकी जडता को समाप्त कर शरीर को चैतन्य करता है .प्रिम टदवस यही कक्रयाएूँ होती है . ये सयत्र ककताबों में मलखे हए नही हैं ये तो मसद्धाश्रम की टदव्या चेतना से आप्लाववत टदव्या मुंत्र हैं जो वहाुं के योधगयों के मध्य ही प्रचमलत हैं.उसी परम्परा से जडे हए हैं . अब हम उसेसध्नाओुं द्वारा अुंकररत न करें तो ये हमारी कमी है .ये कक्रया तनत्य होनी ही चाटहए. कल वाला मुंत्र िी इसके साि अतनवाय़ ही है .व्यवस्थित जीवन चया़ का पालन िोडे टदन तो करना ही पडता है और यही साधक जीवन की मया़दा िी है .

चौिे टदन अन्तर साधना मुंत्र का जप ककया जाता पहले के क्रम को सुंयक्त करके. पाूँचवे टदन थवसम्मोहन मसवद्ध मुंत्र का जप अन्य मुंत्रों के साि ककया जाता है .इसके पहले का क्रम वाही रहे गा जो पहले टदन का िा. तब आपके थपश़ मात्र से सामने वाला सम्मोटहत हो जाता है .जप. क्युंकय क शशमना नाडी के िेदन के बाद ही सम्मोहन शस्क्त का प्रथफटन आपमें होता है और आपका चेहरा ओज से आिा से िर जाता है .ये सुंपयऱ् कक्रया २४ टदनों की होती है यटद इस ववश्व में कोई सबसे कटिन काम है तो वो अपने आपको अपने अनकयल बनाना और जैसे ही ये कक्रया होती है . तीसरे टदन चक्र जागरर् साधना सुंपन करनी होती है स्जसके द्वारा सम्मोहन मात्र आपके चेहरे पर न होकर समथत शरीर में प्रसाररत हो जाता है . आपमें टदव्या दृस्टट का उद्भव होता है .आपमें चम्कत्व पैदा होता है अन्य सिी लोहे की िाुंतत आपके आकष़र् िे त्र में .इसके बाद साधक में इतनी सामर्थय़ता आती ही की वो वाुंतित शस्क्त को अपने सम्मोहन बल में बाूँध कर आवाटहत कर सके.

याद रखखये सम्मोहन का अि़ ही होता है ़िद को ही मोटहत करना यातनकी थवयुं की चेतना को आकवष़त कर परम चेतना से ममला दे ना. ये मुंत्र दलि जरूर हैं पर अप्राप्य नही. यटद हम २४ घुंटे चम्बकीय शस्क्त से यक्त रहें गे तो हमसे ममलने वाला कैसा िी व्यस्क्त हो हमारे सद्वाक्यों को किी नही ताल सकता. जब हम टदव्यता को पा सकते है तो कफर धगद्धगदाकर अपने आत्म-सम्मान को .आ ही जाते हैं और आप अपनी कममयों को आत्म-तनदे श दे कर समाप्त कर सकते हैं और अपने गर्ों को और ज्यादा शस्क्तशाली कर सकते हैं.ववधध कहलाती है . यही कक्रया ततब्बत में बोध-सुंवहन. और उच्चावथिा में टदव्या शस्क्तयाुं िी हमारे प्रिाव क्षेत्र में आबद्ध हो जाततयो हैं. यटद आगे इन मुंत्रों को लगातार ककया जाए तो वमशत्व मसवद्ध की प्रास्प्त होती ही है . या ककसी रोगी के कटटों को दरय ककया जा सकता है . कफर हमारे पास यटद ककसी का फोटो िी हो या हमारे मस्श्तटक में ककसी का बबम्ब िी हो तो उस व्यस्क्त या शस्क्त को सम्मोटहत कर अप्नेअनकयल ककया जा सकता है . सद्गरु के चरर्ों में प्राि़ना कर हम पर् य ़ सम्मोहन प्रास्प्त दीक्षा पायें और इन मुंत्रों को प्राप्त कर असुंिव को िी सम्िव कर सकें.

मोह से दूर वह शनरं तर समाशि रत रहने वाले महेि भी उनका रूप है तथा सती के अशिकं ड मे दाह के बाद ब्रमहांड को कं पाने वाले. एक तरफ वह भोलेपन की सवण उच्चावस्था मे रह कर भोलेनाथ के रूप मे पूशित है वही दूसरी और महाकाल के रूम मे साक्षात प्रलय रुपी भी.क्ययूँ अपने ही पैरों के नीचे कचलें या औरों को क्ययूँ कचलने दे . तिी तो कहते हैं न की स्जद करो और दतनया बदलो। अिोघ स्िव गोरख प्रयोग (AMOGH SHIV GORAKH PRAYOG) भगवान शिव का वर्णन करना भी क्या संभव है. संहार क्रम के देवता होने पर भी अपने मृतयंिय रूप मे भक्तो को हमेिा अभय . शनर्ललप्त स्मिानवासी हो कर भी वह देवताओं मे उच्च है तथा महादेव रूप मे पूशित है. तांडव के माध्यम से तीनों लोक को एक ही बार मे भयभीत करने वाले नटराि भी यही है. तो इस शनर्ललप्तता मे भी सवण कल्यार् की भावना समाशहत हो कर समस्त शिव को बचाने के शलए शवषपान करने वाले नीलकं ठ भी यही है.

नैव साधना और नार्योक्तगयो का सबंध तो अपने आप र्े क्तवख्यात है. क्तनव तो अपने आप र्े तन्त्ि के आकदपुरुि रहे है. वैसे भी यह र्हाराक्ति तंि की द्रक्तष्ट से भी अमयक्तधक र्हमवपूर्म सर्य है. सदाशिव तो हमेिा से सािको के मध्य शप्रय रहे है. िो हमें उनकी तरफ श्रध्िा प्रदर्लित करने के शलए प्रेम से मिबूर ही कर दे.प्रदान करते है. इन साधनाओ का क्तवनेि र्हमव इस क्तिए भी है की क्तसि र्ंि होने के कारर् इन पर देवी देवताओं की क्तवक्तभभन नक्तिया वचन बि हो कर आनीवामद देती ही है सार् ही सार् साधक को नार्क्तसिो का . एक धारर्ा यह है की क्तनव रािी के कदन साधक अगर क्तनव पूजन और र्ंि जाप करे तो भगवान क्तनव साधक के पास जाते ही है. अतयशिक करुर्ामय होने के कारर् सािको की अशभलाषा वह िीघ्राशतशिघ्र पूर्ण करते है. अतयंत ही शवशचत्र तथा शनराला रूप. इस प्रकार उच्च कोरट के नार्योक्तगयो की क्तनव साधना अपने आप र्े अमयक्तधक र्हमवपूर्म रही है. नार्योक्तगयो के गुप्त प्रयोग अपने आप र्े बेजोड होते है. अगर इस सर्य पर क्तनव साधना की जाए तो चेतना की व्यापकता होने के कारर् साधक को सफिता प्राक्तप्त की संभावना तीव्र होती है. भगवान के अघोरे श्वर स्वरुप तर्ा आकदनार् भोिेनार् का स्वरुप अपने आप र्े इन योक्तगयो के र्ध्य क्तवख्यात रहा है. क्तनवरािी तो इन साधको के क्तिए कोई र्हाउमसव से कर् नहीं है. चाहे वह क्तनव साधना से सबंक्तधत हो या नक्ति साधना के सबंध र्े.

क्तनवरािी पर ककये जाने वािे गुप्त प्रयोगों र्े से एक प्रयोग है अर्ोध क्तनव गोरख प्रयोग. साधक र्क जाए तो क्तबच र्े कु छ देर के क्तिए क्तवरार् िे सकता है िेककन आसान से उठे नहीं. रािी काि र्े १० बजे के बाद साधक सवम प्रर्र् गुरु पूजन गर्ेन पूजन सम्प्पन करे तर्ा अपने पास ही सद्गुरु का आसान क्तबछाए और कल्पना करे की वह उस आसान पर क्तवराज र्ान है. यह गुप्त प्रयोग श्री गोरखनार् प्रक्तर्त है.आनीि भी प्राप्त होता है. यह र्ंि जाप ३:३० बजने से पहिे हो जाना चाक्तहए. उसके बाद रुद्राक्ष र्ािा से क्तनम्न र्ंि का ३ घंटे के क्तिए जाप करे . उसके बाद अपने सार्ने पारद क्तनवचिग स्र्ाक्तपत करे अगर पारद क्तनवचिग संभव नहीं है तो ककसी भी प्रकार का क्तनवचिग स्र्ापीत कर उसका पंचोपचार पूजन करे . आओ आओ धूर्ी जर्ाओ क्तनव गोरख नम्पभू क्तसि गुरु का आसन आर् गोरख क्तसि की आदेन आदेन आदेन र्ंि जाप सर्ाप्त होते होते साधक को इस प्रयोग की तीव्रता का अनुभव होगा. वस्त्र आसान सफे द रहे या कफर कािे रं ग के . धतूरे के पुष्प अर्तपत करे . ॐ क्तनव गोरख र्हादेव कै िान से आओ भूत को िाओ पक्तित को िाओ प्रेत को िाओ राक्षस को िाओ. यह प्रयोग अमयक्तधक गुप्त और र्हमवपूर्म है क्यों की . दूध तर्ा फि क्तिए जा सकते है. इस प्रकार ऐसे प्रयोग अपने आप र्े बहोत ही प्रभावकारी है. इसर्ें साधक का र्ुख उत्तर कदना की तरफ होना चाक्तहए. साधक को पुरे कदन क्तनराहार रहना चाक्तहए.

अगर इस प्रयोग र्े साधक की कही चूक भी हो जाए तो भी उसे भगवान क्तनव के साहचयम की अनुभूक्तत क्तनक्तित रूप से होती ही है. एक ही राक्ति र्े साधक भगवान क्तनव का आनीवामद प्राप्त कर सकता है और अपने जीवन को धन्त्य बना सकता है... PAARAD SIDDH SOUNDARYA KANKAN पारद स्सद्ध सौंदयय कंकण ( अप्सरा यस्क्षणी साधना रहमय एवं सत्रू सेिीनार िे उल्लेस्खत .कंकण ) ======================================== ================ . और इस प्रयोग के र्ाध्यर् से र्ंि जाप पूरा होते होते साधक उसी रािी र्े भगवान क्तनव के क्तबम्पबामर्क दनमन कर िेता है.यह क्तसफम र्हाक्तनवरािी पर ककया जाने वािा प्रयोग है.

.उन्होंने स्ियं न के बल लेख वलख कर बवल्क उनके िारा आयोवित वशविरों मे उन्होंने स्ियं प्रायोवगक रूप से इन बातो को समझाया बवल्क कै से संभि हो सकता हैं इनका वनमािण .उसकी पररभार्षा मे सारा विश्व ही आ िाता हैं .. विर उसे िेधन क्षमता यि ु करना पर .पारद मे और विर विवशिं गवु टकाओ मे बदलने की वस्तवथ मे आ पाता हैं.हलावक यह सारा कायि सदगरुु देि िी ने अपनी पवत्रका मंत्र तंत्र यंत्र विज्ञानं के माध्यम से बहुत िर्षों पहले प्रारंभ कर चक ु े हैं.. मात्र िेधन क्षमता प्राि होने से सभी िन सामान्य का कल्याण सभं ि नहीं है. हमने अपने इस ब्लॉग और तंत्र कौमदु ी के माध्यम से साथ ही साथ िे सबक ु के ग्रपु के माध्यम से इस पर अवयतं सरल भार्षा मे अनेको पोस्ट प्रकावशत की हैं . यह कर के वदखाया भी .. िो देिताओ के िारा उपास्य है उसकी उपासना भला मनष्ु य को क्या प्रदान नहीं कर सकती है..और वबना सौंदयि के िीिन का कोई अथि नही .क्योंवकसवयम वशिम सन्ु दरम की धारणा तो भारतीय मानस मे पहले से हैं ..और पारद का संयोग अगर इन . िब बात सौंदयि की हो तो .तो सौंदयि तो िीिन का आधार हैं. इसी वलए सदावशि ने बद्ध पारद को अनंत क्षमता का आशीििचन वदया. बात उठती हैं की पारद एक वदव्यतम धातु हैं. इसी वलए यह देिताओ ं के िारा भी पवू ित है. सकलसरु मवु नदरे िवै द सििउपास्य तः शंभु बीिं सभी ऋवर्षमवु नयों तथा सरु अथाित देिताओ देिगणों के िारा पवू ित यह शंभबु ीि अथाित वशिबीि पारद है. आप मे से अनेको ने यह विवशि गटु ीकाए/विग्रह /कंकण प्राि वकये हैं और इनके लाभों को अपने वदन प्रवतवदन के िीिन मे देख कर आश्चयि चवकत भी हुये हैं ..पारद पर आि हमारे मध्य इतने लेख और पोस्ट आ चक ु े हैं की अब कोई भी इस धातु को िो की िीवित िाग्रत तरल हैं उसके वदव्य गणु ों के प्रवत अवनवभज्ञता नही रख सकता हैं. और उसके क्षमताओ की सीमा ही नही पर कहने की अपेक्षा िब विवशि संस्कार करके वबवभन्न मंत्रावमक और तंत्रावमक प्रवक्रयाओ ं से गिु रने के बाद ही पारा .

आप सभी के वलए अ्सरा यवक्षणी रहस्य खडं वकताब और उस बहु प्रतीवक्षत पणू ि यवक्षणी अ्सरा सायज्ु ज्य र्षष्ठ मंडल यन्त्र का प्राि होना विस यन्त्र पर कोई भी अ्सरा यवक्षणी की साधना के साथ साथ सौंदयि साधना.क्योंवक अगर सच मे सौंदयि को समझना हैं... सदगरुु देि ने ऐसी विविध गवु टकाओ के बारे में विविरण प्रदान वकया तथा उनके .पर पारद का संयोग साधना क्षेत्र के माध्यम से ही इस ओर हो सकता हैं. पर पारद गवु टका/या इस कंकण का इतना महत्त्ि हैं ही क्यों ? रस वसवद्ध के अतं गित पारद के दल ु िभ विग्रह तथा गवु टकाओ कंकण का वििरण तो है लेवकन इनकी प्रावि सहि नहीं है क्योंकी इनके वनमािण से सबंवधत सभी प्रवक्रयाए अवयवधक गढ़ु तथा दस्ु कर रही है.वशि साधना.क्योंवक वकन्ही एक की साधना से हमें िो लाभ प्राि हो सकते हैं शायद उनके अलग अलग अनेको साधनाए करनी पड़े. यवक्षणी.उन्होंने कृपण भाि बनाए रखा .सम्पमोहन साधना.और यह सवय भी तो हैं . उपलब्ध कराया गया .आकर्षिण साधना भी आसानी से समपन्न की िा सकती हैं .उनकी तरि से एक अदव्् तीय उपहार िो इस सेमीनार मे भाग लेने िालों सभी व्यवियों के वलए वनशक्ु ल रहा हैं.पर इन सरल सी लगने िाली साधनाओ मे सिलता बहुत कम को वमली हैं .इसी बात को अपने मन मे रख कर एक . एक वदिसीय अ्सरा यवक्षणी साधना रहस्य एिं सत्रू पर आधाररत सेमीनार का आयोिन वकया गया .. िानना हैं. और अनभु ि करना हैं तो इन साधनाओ को देखना पड़ेगा ही आवमसात करना पड़ेगा ही पर यह अवयन्त सरल सी लगने िाली साधनाए .िास्ति मे इतनी सरल हैं नही . िहााँ बात सौंदयि साधनाओ की आये तब वनश्चय ही िहां पर अ्सरा.कारण हैं की इनके गोपनीय सत्रू ों का साधको मे न िानकारी होना और विनके पास िानकारी भी तो . वकन्नरी आवद का वििरण न आये यह कै से हो सकता हैं .आप सभी के िारा विस उवसाह पिू िक माहौल मे इसका आयोिन हुआ िह तो एक अलग ही तवि हैं .सब बातों मे हो िाए तो विर क्या कहना . तो साधनाओ के प्रवत क्या रुझान रख िाए ... गन्धिि कन्याए .विसका नाम पारद सौंदयि कंकण हैं ..और प्रसन्नता के इन्ही क्षणों मे आररि भाई िी िारा घोवर्षत वकया गया की .कुबेर साधना..

इसी गवु टका कोपारद वसद्ध सौंदयि कंकण.पर उसके लाभ इस कंकण से भी प्राि वकये िा सकते हैं . मोह्येधः परान बद्धो विव्येच््मतृ ः परान मवू च्छि तोबोध्येदन्् यन तं सतु ं कोन सेिते “ िो खदु बद्ध हो कर दसू रो को बााँध देता है अथाित ठोस विग्रह या गवु टका रूप में िो पारद बद्ध हो िाता है. वकसी भी देिी. देिता या देिगण को प्रवयक्ष उपवस्थत कर सकता है.. मवत को रोक कर ठोस रूप बन कर विविध गढ़ु ज्ञान का साधक को प्रदान करता है ऐसे दल ु िभ तथा रहस्यमय पारद की प्रावि कोन ज्ञानी नहीं करना चाहेगा?” इस देि दल ु िभ पारद सौंदयि कंकण के कुछ गणु और लाभ आप सभी के वलए . िो खदु मतृ हो कर दसू रों को िीिन देता है. दसू री गवु टकाओ के मक ु ाबले भले इस गवु टका में लागत कम लगती है लेवकन इसका महत्त्ि और साधनावमक उपयोवगता को ज़रा सा भी कम आाँका नहीं िा सकता. िह दसू रों को बााँध देता है. अथाित भस्म के रूप में या अपने आप की गवत को बद्ध कर स्ियं की उिाि स्ियं के वलए ना उपयोग कर अपने साधक को प्रदान कर नतू न िीिन प्रदान करता है. .हालावक उस गवु टका के अन्य प्रयोग भी हैं ..  उन्होंने इस कंकण की विशेर्षता बताते हुये कहा की सबसे पहले तो यह की तंत्र कौमदु ी मे आये हुये यवक्षणी सायज्ु ज्य गवु टका की िगह इस पारद सौंदयि कंकण का प्रयोग वकया िा सकता हैं . अथाित वकसी को भी सम्पमोवहत करने का. रस वसद्ध सौंदयि कंकण या रसेंद्र सौंदयि कंकण कहा गया है.. िो खदु ही मवू छि त हो कर अथाित अपनी गवत. आकवर्षित करना का..इस प्रकार से हैं . और िब बात सौंदयि तथा श्ंगृ ार की हो तो पारद वसद्ध सौंदयि कंकण का उल्लेख अवनिायि ही है.वनमािण पद्धवत को िनसामान्य के मध्य रखा तथा िे अपने स्ियं के वनदशिन में ऐसी गवु टकाओ तथा विग्रहों का वनमािण कराते थे. िशीभतू करने का गणु धारण कर लेता है.और िह बहुत अवधक मल्ू यिान भी हैं .

यह सही हैं की एक पणू ि पारद वशिवलंग एक पारद वशिवलगं ही हैं .  साथ ही साथ यह अपने आप मे एक पारद वशिवलगं का भी कायि करे गी .सौंदयि का अथि यहााँ पर मात्र व्यवि के सौंदयि से नहीं बवल्क व्यवि के पणू ि िीिन तथा उससे सबंवधत सभी पक्षों के सौंदयि से है तथा आकर्षिण का भी अथि यहााँ पर देह से वनसतृ होने िाले आकर्षिण मात्र से ना हो कर वकसी भी व्यवि या देियोनी के आकर्षिण से भी है. उस पर आकर्षिण होता है तथा मंत्र का प्रभाि कई गनु ा बढ़ िाता है. . अभीि की प्रावि की संभािना अवत तीव्र हो िाती है. साथ ही साथ वकसी भी देिी तथा देिता की साधना में इस गवु टका का होना सौभाग्य सचू क है क्यों की तीव्र आकर्षिण क्षमता के माध्यम से यह वकसी भी देिी तथा देिता का भी यह गवु टका आकर्षिण कर सकती है.  सौंदयि कंकण के बारे में िैसे कहा गया है. काम्पय प्रयोग का अथि ही होता है की गढ़ु शवि का आकर्षिण कर के साधना में अभीि को प्राि करना या मनोकामना को पणू ि करना.  या वकसी भी प्रकार के काम्पय चाहे िह धनप्रावि हो या विर घर में सख ु शांवत से सबंवधत प्रयोग हो. मल ू तः यह सौंदयि तथा आकर्षिण गवु टकाओ के अतं गित है. लेवकन विसके ऊपर कई प्रकार के प्रयोग सम्प्पन वकये िा सकते है. अगर ऐसे वकसी भी प्रकार के काम्पय प्रयोग में इस गवु टका का उपयोग वकया िाए तोअथाित गवु टका को रख कर मत्रं िप वकया िाए तो प्रयोग में विस शवि का प्रभाि है. अतः वकसी भी व्यवि विशेर्ष के आकर्षिण प्रयोग को इस गवु टका के सामने करने पर उसका विशेर्ष प्रभाि होना स्िाभाविक है. िह पणू ि आकर्षिण क्षमता से यि ु होता है. अगर व्यवि अपने िीिन में ऐसी आकर्षिण क्षमता को प्राि कर ले की देिता भी उससे आकवर्षित होने लगे विर िीिन में रस उमगं तथा सख ु भोग होना तो स्िाभाविक है. सौंदयि कंकण पारद गवु टकाओ की श्ेणी में एक अवत विशेर्ष गवु टका है विसका आकार बड़ा नहीं होता है.पर इसका उपयोग भी उस तरह से वकया िा सकता हैं .

. इसी प्रकार वकसी भी िशीकरण साधना में भी इस गवु टका को अपने सामने स्थावपत करने पर साधक को वनश्चय ही लाभ प्रावि की और छलांग लगाता है. अतः मल ू रूप से यह वशि तथा शवि का समवन्ित स्िरुप हीहै इस वलए इस पर वकसी भी प्रकार की कोई भी वशि अथाित कोई भी देिगण या देिता की साधना और कोई भी शवि साधना की िा सकती है.  िैभि प्रावि से सबंवधत विशेर्ष लाभ प्राि करने के वलए विन साधनाओ का उल्लेख होता है िे कुबेर साधना. इसको प्रिावहत या विसविित करने की आिश्यकता नहीं होती. कुण्डवलनी से सबंवधत साधनाओ को इस कंकण के सामने करने से वनश्चय ही कई साधक के लाभों में िवृ द्ध होती ही है. वकन्नरी. इसके अलािा इस गवु टका का सबंध चक्र देिताओ ं के साथ है. अ्सरा. दोनों ही रूप में सौंदयि कंकण साधना.  लेवकन साथ ही साथ एक विशेर्ष तथ्य यह भी है की साधक इसके माध्यम से िीिन भर लाभ उठा सकता है.. साध्य अ्सरा यवक्षणी या दसू री योनी के प्रवयक्ष अप्रवयक्ष रूप से साधक को तीव्रतम रूप से वनकट लाने के वलए कायि करता है. भौवतक उन्नवत को प्राि करना.  इस गवु टका में प्रवतष्ठा तथा स्थापन संस्कार वशि शवि सायज्ु ि मंत्रो के माध्यम से वकया िाता है. गन्धििकन्या आवद की साधना चाहे िह उनके प्रवयक्ष साहचयि के वलए हो या विर उनके माध्यम से अप्रवयक्ष रूप से धन. ऐश्वयि.  वकसी भी प्रकार की सौंदयि साधनाओ में यह देि योनी के साक्षावकार में साधक को पणू ि सहयोग प्रदान करती है. यवक्षणी. या ऐसा .  इस गवु टका की सब से बड़ी विशेर्षता यह भी कही िा सकती है की यह गवु टका साधक को कोई भी देिी देिता से सबंवधत कोई भी प्रयोग को करने पर साधक की सिलता की संभािनाओ ं तीव्रता पिू क ि बढ़ा देता है. इद्रं साधना. अिलक्ष्मी साधना िेसे प्रयोग इस कंकण के सामने करने पर साधक को लाभ तीव्रता से प्राि होता है क्यों की कोर्षाध्यक्ष तथा देिराि स्थापन प्रवक्रया िेसी गढ़ु वक्रयाए इस गवु टका पर प्राणप्रवतष्ठा के समय ही संम्पपन की िा चक ु ी होती है.

 वनश्चय ही ऐसे कई रहस्यमय पदाथि इस श्वृ ि में है विसके माध्यम से व्यवि अपने िीिन को उध्ििगामी बनाने के प्रयासों में देि बल तथा देि योग को िोड़ कर उसी कायि को तीव्रता के साथ सम्प्पन कर लाभ को प्राि कर सकता है. या देिी देिता की ही साधना इस गवु टका पर हो सकती है. और यह कंकण के बल मात्र उस सेमीनार मे भाग वलए हुये व्यवियों के वलए ही उपलब्ध रही .क्योंवक . सभी को उपलब्ध कराई िा सकती हैं . गहृ स्थ सख ु ..  सौंदयि कंकण के बारे में ऊपर वितने भी तथ्य है िह चनु े हुिे मख्ु य तथ्य ही है. पारद वसद्ध सौंदयि कंकण के बारे में अ्सरा यवक्षणी साधना पर एक वदिसीय सेमीनार में कुछ चचाि हुई थी तथा इसके रहस्यमय तथा गढ़ु पक्ष और क्रम के बारे में कुछ तथ्यों के सभी भाई बवहनों के सामने रखा था. .  अगर साधक यवक्षणी साधना कर रहा है तब भी इस गवु टका का उपयोग िह कई कई बार अलग अलग यवक्षणी साधनाओ के वलए कर सकता है.यह तो अवत विवशि स्तर की गवु टका/कंकण के वलए िब तक सदगरुु देि िी के सन्याशी वशष्य वशष्याओ िारा अनमु वत नही वमल िाये की.भी नहीं है की वकसी एक वनवश्चत योनी.हम कै से अपनी ओर से कुछ भी कह सकते हैं .बाद मे अनेको भाई बवहनों ने इस दल ु िभ सौंदयि कंकण को कै से प्राि वकया िा सकता हैं उसके वलए वलखा पर हमारे िारा इस विर्षय मे मौन ही रखा गया . इसके अलािा भी इसके कई कई लाभ साधक को वनवय िीिन में प्राि होते रहते है. व्यापर आवद में उन्नवत इवयावद कई प्रकार से यह गवु टका साधक को लाभ प्रदान करने में समथि है. पारद से सबंवधत सभी गवु टकाओ की अपनी अपनी विशेर्षता तथा महत्त्ि है हालााँवक उनके महत्त्ि को शब्द के माध्यम से अवभव्यवि वकतनी भी की िाए कम ही पड़ती है. कायि क्षेत्र में अनक ु ू लता.

क्योंवक इस तरह से सस्ं कार यि ु कोई भी पारद विग्रह प्राि करना अपने आप मे भगिान शंकर का मानो घर पर स्थापन और पारद मे स्ित ही लक्ष्मी तवि रहता हैं.उन्हें क्या और वलखा िाए .विनको भी अ्सरा यवक्षणी साधना मे पणू िता प्राि करना हो उसमे यह सहयोगी कारक कंकण .. या सनु ा हैं. अतः अब और अवधक क्या वलखा िाए . प्रज्ञा सम्पपन्न हैं. या िो भी इसको प्राि करना चाहते हैं.और ...िो समझदार हैं .हालावक उन सभी ने यह वलखा था की िे वकसी भी कीमत पर इसको प्राि करना चाहेंगे .उनके वलए यह एक अिसर हैं की इस देि दल ु िभ गवु टका को प्राि कर सकते हैं .यह हमारा सौभाग्य हैं की विन्होंने भी इसके बारे मे पढ़ा हैं..या विनका प्रारंभ होना मानो िीिन मे साधना सिलता के वलए एक िार सा खल ु िाना हैं .और िो भी ऊपर बताये लाभों को प्राि करना चाहते हो उन्हें यह अिसर का लाभ उठाना ही चावहये .. .शेर्ष िो अवतबवु द्धमान हैं . ज्ञानिान हैं.उन्होंने इसमें प्रकावशत होने िाली वकताब “अ्सरा यवक्षणी रहस्य खडं “ को प्राि वकया हैं हम उन्हें भी यह गवु टका उपलब्ध नही करा पाए हैं ...उनके वलए तो इशारा कािी हैं . पर यहााँ बात कीमत की नही बवल्क अनमु वत की हैं . क्योंवक इसके लाभ से आप अिगत हो ही चक ु े हैं . आप मे से विन को भी यह गवु टका प्राि करना हो . समय का मल्ू य िानते हैं. उस लक्ष्मी तवि का आपके घर पर स्थापन हैं और साधना समय मे एक इस तरह के उच्च कोवट का पारद कंकण आपके सामने रहेगा तो स्ित ही आपके अतं : शरीर मे सक्ष्ू म पररितिन प्रारंभ होने लगेग.े िो की .और विन भी भाई बवहनों ने िो इस सेमीनार मे भाग नही ले पाए हैं. यहााँ सौंदयि कंकण की कीमत पारद की अन्य गवु टकाओ की कीमत की तल ु ना मे बहुत कम हैं .वसिि इतना ही की ..यह वसिि इसवलए उपलब्ध हो पा रही हैं की िस् इसे सौभाग्य कहा िा सकता हैं .

पारद सौंदयि कंकण अिश्य वलख दे .. तथा िैन तंत्र पद्धवत में यक्ष तथा यवक्षणी के सबंध में वकस प्रकार अनेको तथ्य है. इसके अलािा भगिान मवणभद्र की साधना का यवक्षणी साधना से क्या सबंध है. .आप मे से िो भी इस गवु टका को प्राि करना चाहे िहnikhilalchemy2@yahoo.com पर इ मेल कर और भी िानकारी ले सकते हैं . अब हम यहााँ पर विशेर्ष चचाि करें गे यक्षमडं ल स्थापन प्रयोग की. क्यों की यह प्रयोग िैन तत्रं पद्धवत का गिु तथा महविपणू ि प्रयोग है. यस्क्षणी साधना के पररपेक्ष िें कुछ आवश्यक तथ्य 5) ===================================== यवक्षणी साधना के पररपेक्ष में अब तक हमने िाना की वकस प्रकार आकाश मडं ल की आिश्यकता क्या है तथा इसमें क्रोध बीि और क्रोध मद्रु ा का वकस प्रकार से संयोग होता है. इस प्रयोग के माध्यम से साधक वनवश्चत रूप से यवक्षणी साधना में सिलता की और अग्रसर हो सकता है.हााँ इ मेल के विर्षय मे ...

और िहां तक बात सेमीनार की है तो कुछ तथ्य वनवश्चत रूप से हरएक व्यवि के सामने रखने के योग्य नहीं होते है. विनका लक्ष्य हो उनके सामने मात्र ही उन तथ्यों को रखा िाए तब . या यु कहे की यह क्रम पणू ि होता है. इसके बाद साधक को यवक्षणी वसवद्ध मत्रं का िाप करना रहता है. यवक्षणी साधना से सबंवधत ऐसे कई दल ु तम विद्धान है विनको अपना कर साधक ु िभ तथा गह्य अपने लक्ष्य की और अपनी पणू ि क्षमता के साथ गवतशील हो सकता है. विनकी रूवच हो. २४ यक्ष विनके बारे में िैन तन्त्रो में उल्लेख है िह सभी यक्ष के बारे में यही धारणा है की उन सभी देिो का यक्षलोक में महविपणू ि स्थान है. इस मंत्र िाप से आकाश मंडल में स्थावपत यक्षमडं ल को साधक की अवभलार्षा का ज्ञान हो िाता है तथा साधक एक रूप से मंत्रो के माध्यम से यवक्षणी वसवद्ध की कामनापवू ति हेतु प्राथिना करता है. यह प्रवक्रया साधक के यवक्षणी साधना के िार खोल देती है. २४ यवक्षणी तथा २४ तीथंकरों का स्थापन यन्त्र में करना रहता है. और यह काम्पय प्रवक्रया है अथाित िब भी कोई भी यवक्षणी साधना करनी हो तो इस आकाशमडं ल के सामने इससे सबंवधत एक विशेर्ष मत्रं का ११ माला उच्चारण कर साधना करने से साधक सबंवधत यवक्षणी का िशीकरण करने में समथि हो िाता है. यही बात २४ यवक्षणी के बारे में भी है. यह स्थापन विशेर्ष मंत्रो के िारा होता है. इसके बाद मवणभद्र देि प्रशन्न प्रयोग तथा अंत में यक्ष मंडल स्थापन प्रयोग वकया िाता है. यह पणू ि यक्ष मंडल है. हमारी सदैि कोवशश रही है की हम वमल कर उस प्रकार के ज्ञान को सब के सामने ला पाए. ऐसे कई विधान िो वसिि गरुु मख ु ी है तथा उनका ज्ञान मात्र गरुु मख ु ी प्रणाली से ही हो सकता है. अतः उनका स्थापन भी वनतांत आिश्यक है ही. इस प्रयोग के अंतगित साधक को सिि प्रथम २४ यक्ष. इसके बाद यक्ष मंडल स्थापन प्रयोग मंत्र का िाप वकया िाता है विसके माध्यम से यन्त्र में स्थावपत देिता को स्थान प्राि होता है तथा यन्त्र पणू ि चैतन्यता को प्राि कर सके .यह प्रयोग भी यवक्षणी साधना संयि ु अथाित क्रोध बीि यि ु िायु मंडल पर वकया िाता है. इस मत्रं िाप के बाद साधक पिू न आवद प्रवक्रयाओ को करता है तथा इस प्रकार यह प्रयोग पणू ि होता है. तथा २४ तीथंकर अथाित िैन धमि के आवद महापरुु र्षों के आशीर्ष के वबना यह कै से संभि हो सकता है. विसमे आकाशमंडल का वनमािण और स्थापन.

ज्ञान प्रावि के तष्ृ णा. और ज्ञान के क्षेत्र में तो अनंत ज्ञान है अतः िो आगे बढ़ कर वितना प्राि करने का प्रयवन करे गा उसको उतना ज्ञान अिश्य रूप से वमलता ही है. MY VIEW. उस साधना की. YAKSHINI SADHNA SATURDAY. AUGUST 4.साधक की . 2012 यस्क्षणी साधना के पररपेक्ष िें कुछ आवश्यक तथ्य 4) . SEMINAAR. और ऐसे साधक को रहस्यों की प्रावि हो िाती है तथा िह अपना नाम सिल साधको की श्ेणी में अवं कत कर लेता है. विसको वितनी ज्यादा ्यास होगी िो उतना ही ज्यादा प्रयवनशील रहता है. विर सदगरुु देि का आशीर्ष तो हम सब पर है ही. क्यों की अगर यह महविपणू ि नहीं होता तो आि कुछ भी गिु होता ही नहीं. ****RAGHUNATH NIKHIL**** ****NPRU**** Posted by Nikhil at 1:27 PM No comments: Labels: APSARA. उस प्रवक्रया की तथा उस गरुु मख ु से प्राि प्रवक्रया से सबंवधत रहस्यिाद की गररमा बनी रह सकती है. और अगर सब कंु िी या गढ़ु प्रवक्रयाए प्रकाश में होती तो िो भी उपेक्षा ग्रस्त हो कर एक सामान्य सी प्रवक्रया मात्र बन िाती तथा उसकी ना कोई महत्ता होती न ही वकसी भी प्रकार गढू ाथि. रहस्यों को प्रकाश में लाना उतना ही ज़रुरी है वितना की उनकी प्रवक्रयाओ को समिना और इन सब के मल ू में होता है योग्य पात्र. लेवकन इन सब के मल ू में भी एक तथ्य है. तो साधनामय बन सिलता को प्राि कर हम उनके अधरों पर एक मस्ु कान का कारण ही बन िाये तो एक वशष्य के वलए उससे बड़ी वसवद्ध हो भी नहीं सकती. विनमे लोलपु ता है िह ज्ञान प्राि करने के वलए वकसी भी विपरीत पररवस्थवत यो में भी कै से भी गवतशील हो कर ज्ञान को अविित करता ही है.

विस तरह आगम शाश्त्रो में सौंदयि साधनाओ का महत्त्ि है उसी प्रकार से दसू रे तंत्र मागि में भी अ्सरा तथा यवक्षणी साधनाओ का भी उतना ही आधार है. इसके अलािा साधक में िीरभाि क्यों होना ज़रुरी है और िीरभाि में क्रोध मद्रु ा का अथि क्या होता है. और िहां पर हम बात यक्ष लोक के सबंध में कर रहे हो तो िैन तंत्र का नाम उल्लेवखत करना आिश्यक ही नहीं अवनिायि कहा िा सकता है. महािीर स्िामी को २४ िे तीथंकर कहा िाता है तथा उनसे पहले के सभी तीथंकर के वलए भी यह बात स्िीकार की िाती है की सभी तीथंकरों के वलए एक यक्ष तथा एक यवक्षणी ने समय समय पर इतं ज़ार वकया .========================================= वपछले लेखो में हमने िाना वकस प्रकार साधना में तविों का महत्त्ि है. चाहे िह बौद्ध धमं से सबंवधत यमारी तत्रं हो या िैन तत्रं शाश्त्र. वकस प्रकार से आकाशतवि की अवनिायिता है उसकी प्रवतकृवत स्िरुप मडं ल क्यों अवनिायि है. सभी में सौंदयि साधनाओ का उल्लेख है तथा सौंदयि साधनाओ का उतना ही महविपणू ि स्थान सभी िगह वनधािररत है. िैन तंत्र पद्धवत अपने आप में दल ु िभ रहस्यमय तथा गढ़ु पद्धवत है. िैन समाि का एक बहोत ही बड़ा योगदान है यक्ष लोक से सपं कि सत्रू स्थावपत करने तथा उससे सबंवधत तथ्यों को सब के सामने रखने का.

िैन मवु नयों तथा तंत्र साधको के बारे में विन्होंने भी िानने की कोवशश की होगी उन्हें यह तथ्य वनवश्चत रूप से ज्ञात होगा की यक्षों के पथ्ृ िी लोक पर िो गिु भिन है उनसे िैन मवु नयों तावन्त्रको का बहोत ही वनकटिती सबंध रहा है. इसके अलािा परु ातन िैन ग्रंथो में कई कई िगह ऐसे उदहारण प्राि होते है विनमे िैन मवु नयों का संपकि यक्ष यवक्षणी तथा यक्ष लोक से रहा है. तो िब इन देिी तथा देिताओ ं की साधना उपासना की िाती है तब इनके वलए यक्ष लोक से सबंध स्थावपत करना उनके वलए सहि हो िाता है. क्यों की यक्षलोक के मख्ु य देिी तथा देिताओ के आशीिािद की प्रावि िह कर लेते है. कुछ सालो पिू ि ही रािस्थान में ऐसे ही एक गिु भिन को एक िैन मवु न ने प्रकाश में लाने का प्रयास वकया था साथ ही साथ उन्होंने सब के सामने उस भिन में प्रिेश कर के िहााँ से अज्ञात धातओ ु की तथा कीमती रवनों की मवु तिया बहार वनकाल कर लोगो के सामने दशिन हेतु २-३ वदन रखी थी. िब िो भिन में कुछ और आगे गए थे तब उनको यक्षों ने नम्र विनंती कर रोक वलया था क्यों की िहााँ से उनके वनगिदिार बने हुिे थे विसके माध्यम से यक्ष लोक में सीधा प्रिेश प्राि वकया िा सकता है. अगर िैन इवतहास को योग्य रूप से िाना िाए तो यह ज्ञात होता है की इन सभी देिी देिताओ का सबंध यक्ष लोक से बताया िाता है.है. इसके पीछे का रहस्य यह है की मवणभद्र साधना करने िाले साधक को यक्ष तथा यवक्षणी अद्रश्य रूप से सहयोग प्रदान करती रहती है. यहााँ पर एक विशेर्ष तथा उल्लेखनीय तथा यह है की मवणभद्र तांवत्रक साधना कई प्रकार से िैन पद्धवत में होती रही है तथा िैन तंत्र साधको के मध्य उनकी साधना उपासना हमेशा ही आकर्षिण का के न्द्र रही है क्यों की भगिान मवणभद्र की साधना तीव्र रूप से िल प्रदान करती है. इसके साथ ही साथ गोपनीय तथ्य यह भी है की भगिान मवणभद्र के साधक को अनायास ही धन की प्रावि होती रहती है. मवणभद्र इवयावद. और ऐसा इस वलए होता है क्यों की यक्षों की सेना के सेनापवत . पद्मािती. सायद यह बात लोगो को कल्पना लग सकती है लेवकन इस घटना के साक्षी सेकडो लोग रहे है तथा ऐसे कई उदहारण है िो की परु ातन नहीं है. पाश्विनाथ. िैन तांवत्रक उपासना पद्धवत में कुछ देिी तथा देिताओ की साधना मख्ु य रूप से होती है. घंटाकणि. यहााँ पे हम यह चचाि इस वलए कर रहे है की यह ज्ञात हो पाए की आवखर िह कोनसा तथ्य विसके माध्यम से उन योवगयो के वलए यह सहि सभं ि हो िाता है.

याँू भगिान मवणभद्र से सबंवधत कई प्रयोग है लेवकन गिु रूप से ऐसे प्रयोग भी प्रचलन में रहे है िो प्रयोग यवक्षणी साधना से सबंवधत है तथा विसके माध्यम से साधक को यवक्षणी साधना में सहयोग वमलता है. क्या है यह प्रयोग इस पर चचाि करें गे अगले लेख में. AUGUST 1.भगिान मवणभद्र को माना गया है और िैन तंत्र की धारणा अनसु ार मवणभद्र देि का इस प्रकार एक अवत महविपणू ि स्थान यक्ष लोक में है. लेवकन क्या िैन तत्रं में यवक्षणी साधना में सिलता के वलए वसिि इतना ही विधान है? ‘यक्ष मंडल स्थापन प्रयोग’ एक ऐसा प्रयोग है विसके माध्यम से व्यवि िैन तंत्र के माध्यम से यवक्षणी साधना में पणू ि सिलता की प्रावि कर सकता है. SEMINAAR. 2012 यस्क्षणी साधना के पररपेक्ष िें कुछ आवश्यक तथ्य 3) . MY VIEW. इस वलए यवक्षणी साधना से पहले अगर मवणभद्र देि से सबंवधत कोई प्रयोग कर वलया िाए तो वनवश्चत रूप से सिलता की संभािना बढ़ िाती है. ऐसा ही प्रयोग मवणभद्र प्रसन्न प्रयोग है विसके माध्यम से साधक न ही वसिि यवक्षणी साधना में सिलता प्राि कर सकता है साथ ही साथ मवणभद्र देि से सबंवधत सभी काम्पय प्रयोग में भी पणू ि सिलता प्राि करता है. ****RAGHUNATH NIKHIL**** ****NPRU**** Posted by Nikhil at 2:15 PM 1 comment: Labels: APSARA. यह प्रयोग मात्र एक ही रावत्र में वसद्ध हो सकता है. YAKSHINI SADHNA WEDNESDAY.

पनुभाव वीरभाव कदव्यभाव इन भावो का अपना अपना क्तवस्तृत अर्म है तर्ा साधक कोई भी साधना इन क्ततन भावो र्ें से ककसी एक भाव से युि हो कर करता है.======================================= पररर्ार् को प्राप्त करने के क्तिए हर् क्तजस प्रकार र्ानक्तसक क्तवचारों का आधार बनाकर साधना नुरू करने के क्तिए क्तजस र्ानक्तसक पृष्ठभूक्तर् का क्तनर्ामर् करते है उसे ही भाव कहा जाता है. . र्ुख्य रूप से तंि र्ें क्ततन भाव के बारे र्ें उल्िेख क्तर्िता है.

यह दोनों को पनुभाव की साधना इस क्तिए कहा गया है क्यों की यह साधना करते वि साधक की र्नःक्तस्र्क्तत पूर्म . वीर भाव र्ें साधक र्ाि नरीर से ही नहीं आतंररक रूप से नक्ति के संचार के क्तिए कायमरत हो जाता है. यहााँ पर हर् प्रर्र् दो भाव की चचाम करें गे. साधक क्रर्नः पहिे पनुभाव तर्ा वीरभाव र्ें पूर्मता प्राप्त करने पर र्ाि ही उसे कदव्यभाव की और अग्रसर ककया जाता है. तंि र्ें कॉि र्ागम की साधनाओ को ही कदव्य भाव से युि साधना कहा गया है या कफर कई बार कॉिर्ागम तर्ा क्तसिंताचार र्ें ही कदव्यभाव का प्रयोग हो सकता है ऐसा क्तववरर् क्तर्िता है. क्तजस साधना र्ें साधक नौयम से पररपूर्म हो नक्ति को प्राप्त करने का भाव रख कर साधना करता है उसे वीर भाव कहा जाता है.इसका सार्ान्त्य अर्म क्तनकािा जाए तो पनु अर्ामत अबोध भाव से या क्तसफम नरीर को ध्यान र्ें रख कर ककसी भी साधना को करना पनुभाव है. कदव्यभाव इन दोनों भाव से ऊपर है. जो व्यक्ति यक्तक्षर्ी तर्ा अ्सरा साधनाओ को नारीररक सुख से सबंध र्ें साधना देखता है उसकी साधना पनुभाव युि हो जाती है या जो व्यक्ति खुद को दारुर् र्ानक्तसकता के सार् या दास हो कर साध्य को सवमश्रेष्ठ र्ानकर भी इस साधना को करता है वह भी पनुभाव युि साधना कही जाती है. यह भाव एकीकरर् का भाव होता है तर्ा साधक और इष्ट र्ें कोई भेद नहीं रहता है.

हर्ारे नरीर तर्ा हर्ारे र्नः दोनों क्तस्र्क्ततयो र्ें हर्ारा ध्यान र्ाि हर्ारी साधना ही हो.रूप से नारीररक धराति पर ही क्तस्र्र है. िेककन सौंदयम साधना वीर भाव की साधना है. र्ूि प्रकृ क्तत की साधना है. अगर साधक को सौंदयम प्राप्त भी हो जाए और उसके घर र्ें दो सर्य रोटी नहीं हो तो क्या अर्म है? साधक के आस पास की . ककस प्रकार आतंररक सौंदयम तर्ा बाह्य सौंदयम का क्तर्िाप योग्य रूप से होना ज़रुरी है. इस क्तिए अगर साधक इसे पनुभाव के सार् सम्प्पन करता है तो सफिता क्तनक्तित रूप से क्तर्ि ही नहीं सकती. और सौंदयम का अर्म र्ाि खूबसूरती नहीं है. और साधक की र्ानक्तसकता क्तसफम नरीर पर ही क्तस्र्र है. यहााँ पर व्यक्ति की दो प्रकार की नक्तियां कायम करती है. कै से? यक्तक्षर्ी र्ाि भोग्या नहीं है. सौंदयम का आधार क्तसफम यहााँ पर नरीर नहीं है. यही बात सदगुरुदेव भी कई बार बता चुके है. और साधना को र्ाि बाह्य रूप से ना देख कर आतंररक रूप से भी देखा तर्ा सर्जा जाए. नारीररक नक्ति तर्ा र्ानक्तसक नक्ति. और सौंदयम साधना र्ूितः सौंदयम तमव की साधना है. इसके बारे र्ें कई बार क्तववेचना दी जा चुकी है. अब यहााँ पर हर् वीरभाव की चचाम करते है की अगर इस साधना को वीर भाव के सार् करना है तो इसका अर्म क्या हुआ. यहााँ पर सौंदयम का आधार है प्रकृ क्तत.

यन्त्ि. नारीररक रूप से आपकी साधना प्रकक्रया होती है. इसके अिावा दृढ . और इस साधना को पनुभाव से नहीं ककया जा सकता इसका कारर् भी यही है की सौंदयम साधना र्ाि नरीर से सबंक्तधत नहीं है. र्ंिजाप. साधना प्रकक्रया तो बहोत बाद की बात है. र्ुद्राप्रदनमन आकद सभी नारीररक रूप से होता है. आपकी र्नः क्तस्र्क्तत इष्ट साध्य तक पहोचाती है और अगर आपका र्नोबि टूट रहा है की र्ें नहीं कर सकता या र्ुझसे तो ये संभव ही नहीं है तो प्रमयक्षीकरर् संभव नहीं है. साधक को कु छ आवश्यक तथ्यों से यहााँ पररक्तचत कराना चाहूाँगा. अगर साधक इन साधनाओ की गंभीरता को सर्ज सकता है तो क्तनक्तित रूप से वह वीरभाव से युि हो कर साधना कर सकता है. अब यह ककस प्रकार से संभव होगा की हर् र्ानक्तसक तर्ा नारीररक दोनों नक्तियों को साधना र्ें जोड़ दे ? सवमप्रर्र् साधक को इस बात से ऊपर उठाना होगा की यह भोग्या की साधना नहीं है.प्रकृ क्तत र्ें साधक को उस सौंदयम का अहेसास हो सके . आपका आसान. र्ानक्तसक रूप से सवम आवश्यक तमव है आपका र्नोबि तर्ा दृढ क्तवश्वास. तृक्तप्त का बोध हो सके .

अगर हर्ने र्ुट्ठी तन कर बैठ भी गए है िेककन र्न र्ें तो यही है की ऐसा होता हे भी की नहीं? तो ये नहीं हो सकता. िेककन इन साधनाओ र्ें तीव्रता के क्तिए एक और क्तनतांत आवश्यक तथ्य सदगुरुदेव ने बताया है. िेककन इसके बारे र्ें र्ोडा सर्जना होगा. इस प्रकार से यह र्ानक्तसक तर्ा उसके अनुरूप नारीरक आचरर् से युि होना ही साधना को वीरभाव से युि हो कर साधना करना है. हर एक बीज र्ंि की सार्थ्यम ककतनी हो सकती है यह कल्पना से . तो उसे वीरभाव से संचाररत करने के क्तिए क्या उसका क्तनर्ामर् कै से हो. इसके क्तिए ज़रुरी है बीज र्ंिो का प्रयोग. वह है क्रोधर्ुद्रा. क्यों की र्ंडि हर्ें उस प्रकार से क्तनर्ामर् करना है क्तजससे की हर्ें यक्तक्षर्ी साधनार्ें सफिता क्तर्िे. क्रोध र्ुद्रा पौरुि का प्रदनमन करती है. र्तिब की क्रोध है ही नहीं और ना ही क्रोध र्ुद्रा है. क्रोध सारी नक्ति को र्न र्ें एकक्तित कर एक ही क्तवचार पर कें कद्रत करने की प्रकक्रया है जहां पर ककसी भी तरह िक्ष्य र्ाि ही सब कु छ हो जाता है और तब र्ुट्ठी बांधने की ज़रूरत नहीं है तब र्ुट्ठी अपने आप तन जाती है. अब हर् वापस अपने कि वािे र्ुद्दे पर आते है.क्तवश्वास की साधना र्ें प्रमयक्षीकरर् होगा ही क्यों की यह आपके र्ंिो की तीव्रता का आधार इस पर ही आधाररत है. जब हर् क्रोध र्ें हो तो र्ानक्तसक धराति से नारीररक धराति का प्रदनमन होता है.

बाहर का क्तविय है िेककन यहााँ पर र्ें उल्िेख करना चाहूाँगा की अगर इस प्रकार का र्ंडि क्तवधान क्रोधबीज से युि हो तो वह साधक र्ें भी वाही भाव का संचार करे गा. MY VIEW. SEMINAAR. 2012 (यस्क्षणी साधना के पररपेक्ष िें कुछ आवश्यक तथ्य २) ============================================ पिछले लेख में हमने जाना की पकस प्रकार आकाशतत्व तथा दूसरे तत्वों में सबंध है तथा आकाशतत्व का साधना से क्या सबंध है. ****RAGHUNATH NIKHIL**** ****NPRU**** Posted by Nikhil at 2:56 PM 2 comments: Labels: APSARA. JULY 30. इस क्तिए इस र्ंडि क्तवधान को क्रोधबीज युि आकानर्ंडि यन्त्ि प्रकक्रया कहा जाता है. पनपित रूि से . YAKSHINI SADHNA MONDAY.

हााँ लेपकन सभी से सबंपधत प्रपियाए अलग अलग है.?? यन्त्र तथा मंडल तांत्ररक पद्धत्रत के दो महत्र्पर् ू व अंग है. सामान्त्यजन को यंरो के बारे में जानकारी भले ही हो लेत्रकन मंडल त्रर्धान की जानकारी बहोत ही कम प्राप्त होती है.आकाशतत्व का सबंध पकसी एक साध्य से नहीं वरन सभी साध्य से है. चाहे वह अप्सरा यपिणी हो या कोई भी देवी देवता हो. यन्त्त्र उजाा को रूिांतररत कर के उसे सबंपधत देवी या देवता तक िहोचाना है जब की मंडल इससे पभन्त्न है. सवा प्रथम हमें ये जानना ज़रुरी है की मंडल का तात्पयव क्या है. उदहारण के पलए एक साधक शत्रु समस्या से मुपि के पलए प्रयोग करता है और उसके सामने शत्रु गपत स्तम्भन यन्त्त्र है तो उसके द्वारा की गयी प्रपिया तथा मंत्रो की उजाा से काया सम्िापदत करने के पलए जो शपि है. यह सामन्त्य भेद है. मंडल का तात्िया एसी आकृपत है जो की इष्ट की प्रपतकृपत हो. यन्त्र एक एसी आकृत्रत होती है त्रजनमे प्रत्रतष्ठा करने पर र्ह आपकी मांत्ररक उजाव को इष्ट तक या अभीष्ट तक पहोचाने का कायव करती है या सबंत्रधत देर्ी देर्ता तक पहोचने का कायव करती है. जो उस काया से सबंपधत देवी या देवता या इष्ट है उन तक यह उजाा िहोचाने का काया यंत्रो के द्वारा होता है. इष्ट साधको के सामने प्रत्यि नहीं है तो साधक उनकी प्रपतकृपत को ही अिने सामने पनमाा ण कर ले और इसके बाद साधक उसमे प्रपतष्ठा कर दे तो वह इष्ट रूि आकृपत मंडल बन जाती है जो की एक साथ अनेक काया कर सकती है या दूसरे शब्दों में मंडल उस इष्ट से सबंपधत सभी कायों को सम्प्िन कर सकता है पजस के पलए उसका पनमाा ण हु आ हो. यहााँ िर हम यपिणी साधना के बारे में चचाा करें गे. लेपकन यह पजतना सामन्त्य पदखता है .

सदगुरुदेव के समय में ऐसे दुलाभ मंडलयन्त्त्र प्रचलन में थे पजनमे वह एक साथ कई देवी तथा देवता का स्थािन सदगुरुदेव खुद ही सम्प्प्न करते थे तथा एक ही ऐसे मंडलयंत्र में कई यन्त्त्र एक साथ होते थे. कई बार सदगुरुदेव ने एक साथ ७ – ८ देवी देवताओ से सबंपधत यन्त्त्र आकृपत का एक िण ू ा मंडल बना कर उसे यंत्रो के स्वरुि में साधको को प्रदान पकया है.उतना ही गुढ़ है और उतना ही रहस्य से िण ू ा है. अब इसको इस प्रकार से समझा जाए की एक सामान्त्य व्यपि के पलए यह कैसे संभव हो . इससे सदगुरुदेव के यंत्रो तथा मंडलों के सबंध में उनके ज्ञान की पवशालता का िररचय होता है तथा हर प्रयोग से िहले वह यंत्रो की महत्ता उनसे सबंपधत प्रपिया तथा प्रपतष्ठा िम के बारे में साधको को बताते थे. कई मंडलों को बनाने में कई महीने तथा कई बार कई साल लग जाते है. मंडलयंत्रो के सन्त्दभा में पकतने ही भेद तथा उिभेद है. इसके बाद इन मंडलों का लाभ कई िीपि उठा सकती है. इन िंपियों की गंभीरता वही समझ सकता है जो ऐसे यंत्रो के सबंध में ज्ञान रखता हो तथा पजन्त्होंने इनकी प्रपतष्ठा होते हु वे देपख हो या खुद कभी पकसी यन्त्त्र की प्रपतष्ठा की हो. पतब्बत के कई बौद्ध मठो में कई सपदयों िुराने मंडलयन्त्त्र पवद्यमान है पजन िर इतने साले से साधनाए होती आई है. मेने कुछ िुराने गुरुभाइयो के िास ऐसे दुलाभ यंत्रो को देखा है तथा उनका कथन भी यही है की ऐसे दुलाभ मंडल की प्रापि पनपितरूि से सवा सफलता की प्रापि है. पनिय ही यह पवद्या एक अमल्ू य पवद्या है तथा इनकी महत्विण ू ा ता को द्रपष्ट में रखे तो मंडलयंत्र दुलाभ ही कहे जा सकते है. उसे बदलने की या पवसपजा त करने की आवश्यकता नहीं होती.

साधको के मध्य िञ्चतत्वों के मंडल की कई पवपध प्रचपलत है. . इसमें भी कई भेद तथा उिभेद है. साधक को आकाशतत्व से सबंपधत मंडल की आकृपत पमल भी जाए लेपकन उसका पवधान नहीं हो तो वह मात्र एक आकृपत ही है. अगर एसी आकृपत का पनमाा ण कर के उसमे सबंपधत देवी देवता या साध्य की प्रपतष्ठा कर दी जाये तथा उनके प्राणों को जोड़ पदया जाये तो वह मंडल इष्ट की प्रपतकृपत बन जाता है. इसी पलए मंडलों तथा यंत्रो से सबंपधत भी कई गुि पवधान प्रचलन में रहे पजसके माध्यम से व्यपि इनका पनमाा ण कुछ समय में ही कर सकता है तथा उसका लाभ प्राि कर सकता है. जेसे की मंडलयंत्रो के बारे में कहा गया है की वे इष्ट की प्रपतकृपत होते है. तथा उसके बाद उससे सबंपधत सभी प्रपियाओ का लाभ प्राि पकया जा सकता है. लेपकन आकाशतत्व तो सवा व्यािी है तो उसे पकसी एक जगह केसे एकपत्रत पकया जाए? ऐसा केसे संभव हो सकता है की हम आकाश तत्व को ही अिने सामने रखे तथा उसके सन्त्दभा लाभों की प्रापि कर सके. पिछले लेख में हमने जाना की अगर हमारा आकाशतत्व से संिका हो जाए तो पनपित रूि से यह संभव है की हम आवाज़ दे तो वह सबंपधत इष्ट तक िहोच जाए क्यों की आकाशतत्व सवा व्यािी है. अगर आकाशतत्व का ही मंडलयन्त्त्र का पनमाा ण कर पलया जाये तो यह संभव हो सकता है.की वह महीनो तक या सालो तक एक मंडल बनाये तथा उसके बाद उस िर साधना करे . अब हम वािस बात करते है आकाशतत्व की. लेपकन आकाशतत्व के मंडल का पवधान गुि रहा है.

अब बात यह आती है की आकाशमंडल चाँपू क सवा व्यािी है तथा हमें उस मंडल से यपिणी से सबंपधत लाभ प्राि करना है तो उसका अंकन केसे पकया जाये तथा उसमे कोन से मंत्र का अंकन पकया जाए. हमने पस्वच बना ली है और पनपित रूि से यह पस्वच पकसी भी िंखे को या बल्ब को या पकसी भी चीज़ को चालू करने में सिम है लेपकन हमें तो इससे िंखा चलाना है तो उसे िंखे के साथ तारों से जोड़ना िड़े गा. तथा इसका पवधान ऐसा हो की सामान्त्य साधक भी सम्प्िन कर सके. ठीक उसी तरह आकाशमंडल का पनमाा ण करना है तो इसके साथ ही साथ उसे यपिणी साधना के प्रयुि करना है. अब वह पकस तरह से होगा? . साधक ऐसे मंडल का पनमाा ण कर एक ही रापत्र में उसमे यपिणी से सबंपधत प्रपतष्ठा भी कर सकता है क्यों की यपिणी वगा के पलए वह पवशेष रूि से काया शील हो सके.अथाा त यहााँ िर यह बात समजी जा सकती है की आकाशमंडल की कई पवपधयां है पजनमे से एक ऐसा पवधान हो जो की समय अनुरूि हो तथा कम समय में मंडल का पनमाा ण हो जाये. क्या ऐसा संभव है? हााँ ऐसा संभव है.

. MY VIEW. YAKSHINI SADHNA THURSDAY. और साधक को इसमें सायद एक घंटे से ज्यादा समय नहीं लगता. SEMINAAR. यह गुि प्रपिया को करने में साधक को आकृपत बना कर मात्र ११ माला जाि करे तो िण ू ा पवधान सम्प्प्न हो जाता है. JULY 26. लेपकन ऐसा पवधान करने में तो बहोत समय लग जायेगा? पबलकुल नहीं.यह होता है मंडल का आधार स्तंभ एक बीज मंत्र बना कर और उसको अंपकत कर उसके अनुरूि मंडल बनाया जाए तथा उसमे प्रपतष्ठा युि संिका मंत्र का जाि करने से. 2012 (अप्सरा यस्क्षणी एक स्दवसीय सेिीनार के बारे िे कुछ तथ्य .भाग -5 ) . Posted by Nikhil at 6:33 PM 3 comments: Labels: APSARA.

और अब आप पर हैं की अभी भी र्ाखौि उडाये और इस अवसर को हार् से जाने दे ...आवनयक होती हैं एक यक्तक्षर्ी साधना र्े ..अब आप इस िेख के पढ़ने के बाद आप सर्झ सकते हैं की ककतने र्हमवपूर्म .तथ्य आपके सार्ने आयेंगे ..======================================== == यह अक्तत दुिमभ िेख आपके क्तिए नीिमक सक्तहत .. क्योंकक कक्ततपय िोग इस बात का र्ाखौि भी उड़ा सकते हैं की यह सारी कक्रयाए तो र्न गढंत हैं और धन कर्ाने के क्तिए .....की यहााँ तक यन्त्ि. ...र्ािा का क्तनर्ामर् भी ककतना करठन हैं . इस अक्तत दुिमभ िेख के र्ाध्यर् से आप सर्झ सकें गे .....और जो र्ैंने कि आपको एक क्तिस्ट आपके सार्ने रखी .एक नया तररका हैं तो आप सभी इस िेख को पढ़े और स्वयर् अनुभव करे की ककतनी कक्रयाए ..आप सभी इस िेख के र्ाध्यर् से सर्झ सकें गे की सच र्े यक्तक्षर्ी साधना करना और उसर्े सफि होना आसान या र्जाक नही हैं.

....रर्ौिी बाबा .ध्यान रखे यह िेख जब सद्गुरु भौक्ततक िीिा काि र्े रहे तब अप्रेि १९८५ र्े र्ंि तंि यन्त्ि पक्तिका र्े प्रकाक्तनत हुआ ...... यक्तक्षर्ी साधना क्तनक्तवर का आयोजन हुआ . ==================================== अब यह दुिमभ िेख आपके क्तिए ====================================== कौन कहता हैं की यक्तक्षर्ी क्तसि नही होती .. इसके बाद हीसदगुरुदेव जी के द्वारा . आप सभी भाई बक्तहन जो सेर्ीनार र्े भाग िे रहे हैं या जो भाग िेने का र्न बना रहे हैं वह....वह सभी .....उन सभी के सार्ने ....आने वािी सेर्ीनार का अर्म सर्झे ...जो उस पक्तिका र्े आया रहा .या वहभी जो र्ाखौि उड़ने की कोक्तनन र्े हैं ...अब यह दुिमभ िेख .

क्योंकक एक तरफ यह सारी साधना जहााँ एक तरफ र्ंिामर्क हैं वही दूसरी ओर कक्रयामर्क .र्ैं पूरी क्षर्ता के सार् धनदा यक्तक्षर्ी की साधना करने के क्तिए तैयार हो गया . इसर्ें कोइ दो राय नही की यक्तक्षर्ी साधना जरटि और पेचीदा होती हैं क्तबना सर्र्म और योग्य गुरू के यह साधना सम्पपन्न नही हो सकती हैं .क्तजसके जीवन र्े सदाचार और नैक्ततकता का बाहुल्य हैं उसे अपने जीबन र्े यक्तक्षर्ी साधना अवश्य करना चक्तहये “ ये पंक्तिया जब गुरू देव ने र्ुझसे कहीं तो र्ेरी सारी क्तहचककचाहट दूर हो गयी और गायिी का उपासक होते हुये भी.देवता गन्त्धवम ककनार र्नुष्य से ऊाँचे स्तर के वगम हैं . यूाँ तो भारतीय र्ंि ग्रंर्ो र्े सैकडो यक्तक्षर्ी साधनाए हैं . इसी प्रकार यक्ष भी देवताओं के सर्कक्ष वगम के हैं . क्तजनका सम्पर्ान क्तजनकी स्तुक्तत और क्तजनकी अभयर्मना हर्ारे पुरार्ों एवं धार्तर्क ग्रंर्ो र्े भरी हुयी हैं .परन्त्तु धनदा यक्तक्षर्ी साधना इससर्े र्हमवपूर्म एवं प्रर्ुख हैं . “यह सौम्पय और सरि साक्तमवक साधना हैं जो साधक गायिी का उपासक हैं .

जबकक धनदा यक्तक्षर्ी का आधार चबदु से होना चक्तहये .व्यवहाररक दृष्टी से इस प्रकार साधना करने से सफिता क्तर्ि नही पाती हैं . ऐसा बताकर उन्त्होंने सवमर्ा नवीन क्तवक्तध . तभी धनदा यक्तक्षर्ी यन्त्ि क्तनर्तर्त होता हैं . पूज्य गुरुदेव जी ने िगभग आठ उल्िेक्तखत धनदा यक्तक्षर्ी साधना का दस क्तववरर् ग्रंर्ो र्े देने के बाद बताया की ये सारे वर्मन क्तववरर् अधूरे और अप्रार्ाक्तर्क हैं . र्ंि की साधना क्तवक्तध र्हार्मव के तीसरे कई खंड ग्रंर्ो र्े जो धनदा यक्तक्षर्ी का क्तवबरर् और यन्त्ि कदया हैं वह प्रार्ाक्तर्क नही ठहरता हैं क्योंकक उसका आधार नून्त्य से हैं .भी इसक्तिए इस साधना र्े र्ंि और कक्रया का परस्पर घक्तनष्ठ सबंध हैं . क्तनव् प्रोि ‘रहस्य साधन “ नार्क ग्रन्त्र् के चौर्े पटि र्े स्पस्ट क्तिखा हैं की धनदा यक्तक्षर्ी यन्त्ि के बाक्तहबामग दस पिामर्क होना चाक्तहए . यो तो धनदा यक्तक्षर्ी र्े प्रकाक्तनत हैं .

यह सर्य होिी सेआठ कदन पहिे र्तिब होिाष्टक र्े ही यह साधना सर्पन्न होना चक्तहये . और दीपाविी की रात को ही धनदा पञ्च दनी र्ंि से ८८ आवृक्तत जाता हैं इस बात युि इस का ध्यान यन्त्ि का क्तनर्ामर् रहे यंि की ककया का र्ध्य चबदु दीपाविी की राक्ति अर्ामत अर्म्पसस्य की अधम राक्ति की क्तनर्तर्त होना चक्तहये . अष्टर्ी से प्रारं भ होने वािे इस प्रयोग र्े अधोर्ुखी और उध्वम र्ुक्षी क्तिकोर् से युि यक्तक्षर्ी यन्त्ि का क्तनर्ामर् दीपाविी की राक्ति को ककया जाता हैं . और धनदा पंचदनी से िोर् क्तबिोर् र्ंिा से सम्पपुरटत हो कर प्रार् प्रक्ततष्ठा युि होना चाक्तहए . तमपिात रे नर् के धागे से ८८ आवृक्तत युि संजीवनी र्ंि प्रयोग यंि पर करते हुये करते हुये उसे प्रार् चैतन्त्य करना चक्तहये क्तजस् से .के द्वारा धनदा यक्तक्षर्ी साधना सम्पपन्न करवाई क्तजससे र्ुझे पहिी बार र्े ही पूर्म सफिता क्तर्ि गयी . साधना सर्य :: विम र्े के बि एक ही बार इस साधना को सर्पन्न ककया जा सकता हैं.

र्गंवार को िाि . और ऐसे ही क्तसि यन्त्ि पर होिी के अवसर पर प्रयोग ककया जा सकता हैं .परन्त्तु इसका भी एक क्तवनेि तरीका हैं दीपाविी की र्ध्य राक्ति को रे नर् या सूती धागे की ८८ आवृक्तत िेकर उसका धागा बनाये और सुर्रु े . इसर्ें आसन का क्तवधान ध्यान देने योग्य हैं .बुध को हरा . प्रर्र् कदन गुरू पूजन क्तवक्तध के सार् कर यंि को प्रार् चैतन्त्य ककया जाता हैं . सोर्वार को सफे द . इसर्ें कु बेर यक्तक्षर्ी आधार बीज का सहारा क्तिया जाता हैं . ऐसा होने पर धनदा यक्तक्षर्ी का साधक से पूर्म तादाम्पय स्र्ाक्तपत हो जाता हैं .की की अनग चबदु और रक्तत योनी का सबंध बन सके और धनद यक्तक्षर्ी का रूप क्तनर्तर्त हो सके .. इसर्ें हककक र्ािा का प्रयोग ककया जाता हैं .फाल्गुि नुक्ि अष्टर्ी को जो वार हो उसी ग्रह का आसन साधक को क्तवछाना चाक्तहए . सार् ही साधक र्े र्नस से सार्ंजस्य स्र्ाक्तपत ककया जाता हैं . नुक्र की स्वेत तर्ा नक्तनवार को कािे रं ग का आसन क्तवछा कर साधना सर्पन्न की जाती हैं . रक्तव को गुिाबी .बृहस्पक्तत की पीिा .

कफर फाल्गुन नुक्ि अष्टर्ी के कदन र्ैंने राक्ति को इसी प्रकार तैयार की हुयी र्ािा से प्रार् चैतन्त्यता प्राप्त की और नारीर की तीनोआवृक्ततयों र्े तीनो र्हानाक्तियों की स्र्ापना की .नारीर र्े अनंग और रक्तत की प्रक्ततष्ठा करते हुये आसन पर बैठ कर दीपक प्रज्ज्वक्तित कर गुरुदेव के बताए हुये तरीके से र्ंि जप प्रारं भ ककया .इसतरह क्तनमय एक र्नका क्तपरोया जाता हैं औरउसके ऊपर एक गाठ िगाई जाती हैं .क्तपरोकर गााँठ िगाये . यह र्ािा साधक या गुरू भाई तैयार् कर सकते हैं . इस तरह यह र्ािा होिी तक जा कर तैयार हो पाती हैं . चबदु और् योनी के नब्द सार्ंजस्य करते हुये गाठ िगा दें.प्रर्र् कदन नरीर र्े गुरू पूजन और यंि स्र्ापन ककया जाता .गाठ िगते सर्य र्हाकािी र्हािक्ष्र्ी र्हासरस्वती का परस्पर िोर् क्तविोर्.तभी इस र्ािा र्े आियम जनकता और प्रार्वत्ता आ जाती हैं . कफर दूसरे कदन् र्ध्य राक्ति को दूसरा हककक पमर्र इसी प्रकार कक कक्रया करते हुये .वार्ी र्े धनदा का सर्ावेन ककया . इसर्ें प्रमयेक कदन अिग अिग क्तवधान संपाकदत ककया जाता हैं .ध्वक्तन अध्वानी.

हैं तो दूसरे कदन स्वर्ाम किमर्भैरव र्ंि को प्रस्फु रटत ककया जाता हैं .और िगभग सभी ग्रंर्ो र्े धनदा यक्तक्षर्ी साधना का सर्ावेन ककया हैं परन्त्तु इन सारे ग्रंर्ो र्े क्तजस प्रकार का प्रयोग कदया हैं. इसकी अपेक्षा पूज्य गुरू .पाचवे कदन भैरब गुरटका पर भैरव र्ंि जप तर्ा छठे कदन भैरवी गुरटका पर भैरवी धनदा को क्तसि ककया जाता हैं .र्ै अनुभव करता हूाँ की यकद कोई भी साधना पूर्म प्रर्ाक्तर्कता के सार् संपन्न की जाए तो क्तनिय की अनुकूिता प्राप्त होती हैं .सातवे कदन सबंक्तधत जप और पुर्ामहुक्तत सर्पन्न की जाती हैं .वे अपूर्म हैं .ऐसा करने पर र्ुझ जैसे अनाडी साधक को जो अनुभव हुये हैं . र्ेरे पास तंि और् र्ंि से सबंक्तधत सैकडो ग्रन्त्र् हैं .तीसरे कदन धनदा पंचदनी र्ंि की जागृक्तत की जाती हैं . उनर्े प्रर्ाक्तर्कता अनुभव नही हुयी .वे अपने आप र्े एक अिग ही कहानी हैं .चौर्े कदन धनदा यक्तक्षर्ी यन्त्ि चैतन्त्य और र्ंि सम्पपुरटत ककया जाता हैं . ये सारे र्ंि गोपनीय और गुरू र्ुख से ही प्राप्त रहे हैं .

इस साधना की सर्ाक्तप्त होिी के कदन होती हैं .देव ने र्ुझे जो क्तवक्तध र्ंि जप बताया उस प्रकार से करने पर प्रमयक्ष साधना क्तसि हुयी . और सफिता पायी हैं .धनदा यक्तक्षर्ी के बीज र्न्त्ि जप से ८८ कर्ि बीजो को जहााँ होिी प्रज्जक्तित होती हैं उसी होिी र्े उन कर्ि बीजो को एक एक करके डािा जाता हैं और र्ंि जप सर्पन्न होता होता हैं .यकद पूर्म प्रार्ाक्तर्कता के सार् साधना की जाए तो क्तनिय ही सफिता प्राप्त होती हैं . और ऐसा करने पर उसी रात र्े अमयंत हो सौम्पय और र्धुर रूप र्े यक्तक्षर्ी प्रमयक्ष हुयी इसके बाद आज तक र्ैं भौक्ततक और आध्याक्तमर्क योग एवं साधना क्षेिर्े क्तजस गक्तत से आगे बढ़ा हूाँ .और र्ैं चैिज ें के सार् आज इस बात को क्तसि करसकता हूाँ. र्ुझे र्ंि तंि यन्त्ि क्तवज्ञानं पक्तिका ने धनदा यक्तक्षर्ी साधना पर कु छ पंक्तिया क्तिखने को कहा र्ा परन्त्तु यह . वह सब कु छ इस साधना की बदौित ही सम्पपन्न हुयी हैं .

क्तविय गोपनीय और गुरू र्ुख गम्पय हैं अतः क्तजतना भी स्पस्ट
कर सकता र्ा र्ैंने इस िेख र्े साधना क्तवक्तध को स्पस्ट ककया ,र्ैं
ऐसा आवश्यकता अनुभव करता हूाँ के र्ंि और साधनाओ से
सबंक्तधत क्तजतने भी ग्रर् प्रकाक्तनत हैं उनका अमयन्त्त ही योग्य
क्तवद्वान से पुनः संपादन होना चक्तहये ,र्ैं चेिज
ें के सार् स्पस्ट
करता हूाँ की कोई भी र्ेरे द्वारा संपाकदत धनदा को स्पस्ट देख
सकता हैं . आर्तर्क वैभव धन यन प्रक्ततष्ठा एवं आगे की सर्स्त
साधनाओ र्े अक्तद्वतीय सफिता के क्तिए यह आधरभूत और
र्हमवपूर्म साधना हैं .
साभार

सक्तहत

..र्ंि तंि यन्त्ि क्तवज्ञानं ..अप्रेि 1985
तो र्ेरे क्तर्िो इस अद्भुत िेख से आप सर्झ सकते हैं की
..यक्तक्षर्ी अ्सरा साधना बहुत

गभीरता का

क्तविय हैं

..और अब आप पर हैं की आप इस अवसर को सर्झे ...
Smile
क्तनक्तखि प्रर्ार्

ITARYONI BADHA SE MUKTI HETU - RUDRA
PRAYOG

NOTE – Brothers and sisters Amogh Vidhaan of “Tibbeti Sabar
Lakshmi Vashikaran Yantra” which I told to give it on 21 November , it
has not been given only because many of our brothers have not yet got that
yantra due to unavoidable reasons and my effort is only this that everyone
has got right of progress and good-fortune. So let’s wait for one more
week so that once all of us get yantra, Vidhaan of this amazing Kriya can
be given to all.
=====================================
यह अनंत ब्रह्माण्ड में हम अके ले नहीं है इस तथ्य को अब विज्ञान भी स्िीकार करने लगा है.
आधवु नक विज्ञान में भी कई प्रकार के परीक्षण इससे सबंवधत होने लगे है तथा एसी कई
शवियां है विनके बारे में विज्ञान आि भी मौन हो िाता है क्यों की विज्ञान की समि के सीमा
के दायरे के बाहर िह कुछ है. खेर, आधवु नक विज्ञान का विकास और परीक्षण अभी कुछ िर्षों
की ही देन है लेवकन इस वदशा में हमारे ऋवर्ष मवु नयों ने सेंकडो िर्षों तक कई प्रकार के शोध

और पररक्षण वकये थे तथा सबने अपने अपने विचार प्रस्ततु वकये थे, मख्ु य रूप से सभी
महवर्षियों ने स्िीकार वकया था की ब्रह्माण्ड में मात्र मनष्ु य योनी नहीं है, मनष्ु य के अलािा भी
कई प्रकार के विि इस ब्रहमाड में मौिदू है, वनश्चय ही मनष्ु य से तावविक द्रवि में अथाित शरीर
के तविों के बंधारण में ये वभन्न है लेवकन इनका अवस्तवि बराबर बना रहता है. इसी क्रम में
मनष्ु य के अंदर के आवम तवि िब मवृ यु के समय स्थल
ू शरीर को छोड़ कर दसू रा शरीर धारण
कर लेता है तो िह भी मनष्ु य से अलग हो िाता है. िस्ततु ः प्रेत, भतू , वपशाच, राक्षश, आवद
मनष्ु य के ही आवम तवि के साथ लेवकन िासना और दसू रे शरीरों से िीवित है. इसके अलािा
लोक लोकान्तरो में भी अनेक प्रकार के विि का अवस्तवि हमारे आवद ग्रन्थ स्िीकार करते है
विनमे यक्ष, विद्याधर, गान्धिि आवद मख्ु य है. अब यहााँ पर बात करते है मनष्ु य के ही दसू रे
स्िरुप की. िब मनष्ु य की मवृ यु अवयवधक िासनाओ के साथ हुई है तब मवृ यु के बाद उसको
सक्ष्ू म की िगह िासना शरीर की प्रावि होती है क्यों की मवृ यु के समय विि या आवमा उसी
शरीर में वस्थत थी. वितनी ही ज्यादा िासना प्रबल होगी मनष्ु य की योनी इतनी ही ज्यादा वहन्
होती िायेगी. िेसे की भतु योनी से ज्यादा प्रेत योनी वहन् है. यह विर्षय अवयतं िहृ द है लेवकन
यहााँ पर विर्षय को इतना समिना अवनिायि है. अब इन्ही िासनाओ की पवू ति के वलए या अपनी
अधरू ी इच्छाओ की पवू ति के वलए ये ये विि एक वनवश्चत समय तक एक वनवश्चत शरीर में घमू ते
रहते है, वनश्चय ही इनकी प्रिवृ त और मल
ू स्िभाि हीनता से यि
ु होता है और इसी वलए उनको
यह योनी भी प्राि होती है. कई बार यह अपने िीिन काल के दरवमयााँ िो भी कायिक्षेत्र या
वनिास स्थान रहा हो उसके आसपास भटकते रहते है, कई बार ये अपने परु ाने शत्रु या विविध
लोगो को वकसी न वकसी प्रकार से प्रतावडत करने के वलए कायि करते रहते है. इनमे भवू म तथा
िल तवि अल्प होता है इस वलए मानिो से ज्यादा शवि इसमें होती है. कई िीिो में यह
सामथ्यि भी होता है की िह दसू रों के शरीर में प्रिेश कर अपनी िासनाओ की पवू ति करे . इस
प्रकार के कई कई वकस्से आये वदन हमारे सामने आते ही रहते है.
इन इतरयोनी से सरु क्षा प्रािी हेतु तंत्र में भी कई प्रकार के विधान है लेवकन साधक को इस हेतु
कई बात विविध प्रकार की वक्रया करनी पड़ती है िो की असहि होती है, साथ ही साथ ऐसे

यह िाप रुद्राक्ष माला से करना चावहए. यह पारदवशिवलंग से सबंवधत भगिान रूद्र का साधना प्रयोग है. िैसे अगर रात्री में करना संभि न हो तो इस प्रयोग को वदन में भी वकया िा सकता है. यह प्रयोग साधक वकसी भी सोमिार को कर सकता है. मल ू तः इसमेंपारद वशिवलंग ही आधार है परु े प्रयोग का. साधक का मख ु उत्तर की तरि हो. साधक स्नान आवद से वनितृ हो कर लाल िस्त्रों को धारण करे तथा लाल आसान पर बैठ िाए. प्रस्ततु विधान एक दवक्षणमागी लेवकन तीव्र विधान है विसे व्यवि सहि ही सम्प्पन कर सकता है तथा अपने और अपने घर पररिार के सभी सदस्यों को इस प्रकार की समस्या से मवु ि वदला सकता है तथा अगर समस्या न भी हो तो भी उससे सरु क्षा प्रदान कर सकता है. साधक अपने सामने पारदक्तनवचिग को स्थावपत करे . साधक रात्रीकाल में यह प्रयोग करे तो ज्यादा उत्तम है. ॐ नमो भगवते रुद्राय भतू वेताल त्रासनाय फट् . साधक गरुु तथा पारद वशिवलंग का पिू न करे तथा गरुु मत्रं का िाप करे और विरं वनम्पन मंत्र की ११ माला मंत्र िाप पारदवशिवलंग के सामने करे .प्रयोग के वलए स्थान िेसे की स्मशान या अरण्य या विर मध्य रात्री का समय आवद आि के यगु में सहि संभि नहीं हो पता. अशद्ध ु और अचेतन पारद वशिवलंग पर वकसी भी प्रकार की कोई भी साधना सिलता नहीं दे सकती है. इस वलए पारद वशिवलंग विशद्ध ु पारद से वनवमित हो तथा उस पर पणू ि तत्रं ोि प्रवक्रया से प्राणप्रवतष्ठा और चैतन्यकरण प्रवक्रया की गई हो यह वनतांत आिश्यक है.

यह वक्रया अंदाज़े से १० वमवनट करनी चावहए. ववशेष बात.क्यंवू क बहुत से भाइयों को िो यन्त्र अभी भी वकसी अपररहायि कारण से प्राि नहीं हो पाए हैं. अगर साधक को कोई समस्या नहीं हो तथा मात्र उपरी बाधा से तथा तत्रं प्रयोग से सरु क्षा प्रावि के वलए भी अगर यह प्रयोग करना चाहे तो भी यह प्रयोग वकया िा सकता है.और मेरा प्रयास मात्र इतना है की सौभाग्य और उन्नवत पर सभी का अवधकार है तो. साधक इसका उपयोग कई बार कर सकता है. इसके बाद साधक उस पानी को अपने परु े घर पररिार के सदस्यों पर तथा परु े घर में वछड़क दे.क्याँू ना हम १ हफ्ते और प्रतीक्षा कर लें.(OM NAMO BHAGAWATE RUDRAAY BHOOT VETAAL TRAASANAAY PHAT) मत्रं िाप के बाद साधक पारद वशिवलंग को वकसी पात्र में रख कर उस पर पानी का अवभर्षेक उपरोि मंत्र को बोलते हुिे करे . ****NPRU**** Posted by Nikhil at 11:17 PM 1 comment: . माला का विसििन करने की आिश्यकता नहीं है.तावक सबको यन्त्र वमलते ही उस अविय्तीय वक्रया को संपन्न करने का विधान एक साथ दे दें. इस प्रकार यह वक्रया साधक मात्र ३ वदन करे .भाइयों और बहनों "वतब्बती साबर लक्ष्मी वशीकरण यन्त्त्र" का अमोघ विधान विसे मैंने २१ निम्पबर को देने को कहा था.उसे मात्र अभी इसवलए नहीं वदया है.

लेवकन आि के आधवु नक यगु में िैज्ञावनक पररक्षण में भी ऐसे कई तथ्य सामने आये है विसके माध्यम से यह वसद्ध होता है की मनष्ु य की गवत वसिि िन्म से ले कर मवृ यु तक की यात्रा मात्र नहीं है िरन मवृ यु तो एक पड़ाि मात्र ही है. OCTOBER 16. bhoot-pret. 2012 BHOOTINI SADHNA ============================================== ============== मनष्ु य की कल्पना का एक वनवश्चत दायरा होता है विसके आगे िह सोच भी नहीं सकता है और तकि बवु द्ध उनको स्ि ज्ञान से आगे कुछ स्िीकार करने के वलए हमेशा रोक लगा देती है. . SHIV SADHNA TUESDAY.Labels: BHAY MUKTI SADHNA. मनष्ु य मवृ यु के समय शरीर वयाग के बाद कोई विविध योनी को धारण करता है विविध नाम और उपनाम वदए िाते है.

यहााँ पर हम चचाि करें गे तंत्र में इन से िडु ी हुई प्रवक्रया की. प्रस्ततु एक वदिसीय प्रयोग एक अचरि पणू ि प्रयोग है. यह . तामवसक साधना में भयक ं र रूप प्रकट होना एक अलग बात है लेवकन सभी साधना में ऐसा ही हो यह ज़रुरी नहीं है. विस प्रकार भतु एक परुु र्षिाचक सज्ञं ा है उसी प्रकार भवु तनी एक स्त्रीिाचक सज्ञं ा है. लेवकन यह साधनाए वदखने में वितनी सहि लगती है उतनी सहि होती नहीं है इस वलए साधक के वलए उत्तम यह भी रहता है की िह इन इतरयोवनयों के सबंध में लघु प्रयोग को सम्प्पन करे . राक्षस या ब्रह्मराक्षस आवद है िो की कमििन्य होते है. विसमे साधनाओ के माध्यम से विविध प्रकार के कायि इन इतरयोवनयो से करिाए िाते है. मनष्ु य के मवृ यु के बाद उसकी वनश्चय ही कावमिक गवत होती है तथा इसी क्रम में विविध प्रकार की योनी उसे प्राि होती है या उसका पनु ििन्म होता है. लेवकन िो प्रचवलत है िह योनी है भतु . वपशाच. िरन सवय तो यह है की भवु तवन का स्िरुप भी उसी प्रकार से होता है विस प्रकार से एक सामान्य लौवकक स्त्री का. साधको के वलए यह प्रयोग एक प्रकार से इस वलए भी महविपणू ि है की इसके माध्यम से व्यवि अपने स्ि्न में भवु तनी से कोई भी प्रश्न का ििाब प्राि कर सकता है. विविध योवनयो से सबंवधत विविध प्रकार के प्रयोग तंत्र में प्राि होते है. विसे सम्प्पन करने पर साधक को भवु तनी को स्ि्न के माध्यम से प्रवयक्ष कर उसे देख सकता है तथा उसके साथ िातािलाप भी कर सकता है. िस्ततु ः यह साधना तथा साध्य के स्िरुप के वचंतन पर उनका रूप हमारे सामने प्रकट होता है. प्रेत. इसके भी कई कई भेद है. यह विर्षय अवयंत ही िहृ द है.भले ही आि का विज्ञान उसके अवस्तवि पर अभी भी शोध कर रहा हो लेवकन हमारे प्राचीन ऋवर्ष मवु नयों ने इस विर्षय पर सेकडो हज़ारो सालो पहले ही अवयंत ही प्रगाढ़ अन्िेर्षण कर के अवयवधक विस्मय यि ु िानकारी िनमानस को प्रदान की थी. िस्ततु ः यह भ्रम ही है की भवु तवनयााँ डरािनी होती है तथा कुरुप होती है. उसमे भी संदु रता तथा माधयु ि होता है.

िैसे यह प्रयोग वकसी भी बधु िार को वकया िा सकता है. यन्त्र बन िाने पर साधक को उस यन्त्र को अपने सामने वकसी पात्र में रख देना है तथा तेल का दीपक लगा कर मंत्र िाप शरू ु करना चावहए.प्रयोग भवु तनी के तामस भाि के साधन का प्रयोग नहीं है. गरुु पिू न तथा गरुु मंत्र का िाप करने के बाद वदए गए यन्त्र को सफ़े द कागज़ पर बनाना चावहए. अतः व्यवि को भवु तनी सौम्पय स्िरुप में ही द्रश्यमान होगी. भ्रं भ्रं भ्रं भतु ेश्वरी भ्रं भ्रं भ्रं फट् (bhram bhram bhram bhuteshwari bhram bhram bhram phat) . साधक को यह प्रयोग रात्री काल में १० बिे के बाद करे . यह प्रयोग साधक वकसी भी अमािस्या को करे तो उत्तम है. साधक िट िक्ष ृ के लकड़ी की कलम का प्रयोग करे . साधक को वनम्पन मंत्र की ११ माला मंत्र िाप करनी है इसके वलए साधक को रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करना चावहए. इसके वलए साधक को के ले के वछलके को वपस कर उसका घोल बना कर उसमे कुमकुम वमला कर उस स्याही का प्रयोग करना चावहए. सिि प्रथम साधक को स्नान आवद से वनितृ हो कर लाल िस्त्र पहेन कर लाल आसान पर बैठ िाए.

उस समय प्राि ििाब को वलख लेना चावहए अन्यथा भल ू िाने की सभं ािना रहती है. 2012 TANTRA AUR PRET SIDDHI . OCTOBER 11. Posted by Nikhil at 8:32 PM No comments: Labels: bhoot-pret THURSDAY.मंत्र िाप पणू ि होने पर िल रहे दीपक से उस यन्त्र को िला देना है. साधक दीपक को तथा माला को वकसी और साधना में प्रयोग न करे लेवकन इसी साधना को दबु ारा करने के वलए इसका प्रयोग वकया िा सकता है. अगर यन्त्र की राख बची हुई है तो उस राख को तथा विस लकड़ी से यन्त्र का अक ं न वकया गया है उस लकड़ी को भी साधक प्रिावहत कर दे. विस पात्र में यन्त्र रखा गया है उसको धो लेना चावहए. इसके बाद साधक अपने मन में िो भी प्रश्न है उसके मन ही मन ३ बार उच्चारण करे तथा सो िाए. ििाब वमलने पर साधक की नींद खल ु िाती है. साधक दसू रे वदन सबु ह उठ कर उस वतलक को चेहरा धो कर हटा सकता है लेवकन वतलक को सबु ह तक रखना ही ज़रुरी है. साधक को रात्री काल में भवु तनी स्ि्न में दशिन देती है तथा उसके प्रश्न का ििाब देती है. उसका उपयोग वकया िा सकता है. यन्त्र की िो भष्म बनेगी उस भष्म से ललाट पर वतलक करना है तथा वतन बार उपरोि मंत्र का उच्चारण करना है.

ब्रह्मांडीय ज्ञान को हम दो तरह से अविित कर सकते हैं – १) आगम स्तर २) वनगम स्तर !!!! आगम ६४ तरह के तांवत्रक ज्ञान पर आधाररत है और वनगम िेदों पर वनभिर करता है..........खैर वनगम ज्ञान या िेद शास्त्र यहााँ हमारा विर्षय नहीं है तो हम बात करते हैं तंत्र ज्ञान की विसे गहु ा ज्ञान या रहस्यमय ज्ञान भी कहते हैं...वकन्तु यह ग्रथं उस ज्ञान को कुछ हद तक समझने में हमारी सभं ि सहायता िरूर करते हैं. क्योंवक तंत्र कोई वचंतन- .======================================== =========== हमारे चारों ओर िै ला ब्रह्मांड हिा और धएु ं का के न्द्र मात्र नहीं है.. अवपतु इसमें वनवहत है ऐसे रहस्य और ऐसा ज्ञान विसका अगर एक अंश मात्र भी यवद वकसी की भी समझ में आ िाये तो उसकी िीिन धारा ही बदल िाती है!!!! क्योंवक ब्रह्मांडीय ज्ञान कोई कोरी कपोल कल्पना ना हो के इस समस्त चराचर विश्व की उवपवत्त और विध्िसं का करोडों बार साक्षी बन चक ु ा है और िब तक सिृ न और संहार का क्रम चलता रहेगा इस ब्रह्मांडीय ज्ञान में इिािा होता िायेगा.पर यह ज्ञान हम वकताबों से या बड़े बड़े ग्रंथो को पढ़ कर प्राि नहीं कर सकते. परमसत्ता अपना ज्ञान देने में कभी कोई कोतावह नहीं करती पर उसके वलए मात्र एक ही शति है की आप में पात्रता होनी चावहए.

. पर यहााँ हम बात कर रहे हैं प्रेत वसवद्ध की तो िो दसू रे स्तर की अनभु वू त है. इस प्रयोग के विधान को समझने से पहले या ये प्रयोग करने से पहले आपको दो अवत महविपणू ि बातों को अपने ज़हन में रखना होगा – १) यह साधना प्रेत प्रवयक्षीकरण साधना है तो हम ये भी िानते हैं की यवद आपने उसे प्रवयक्ष करके वसद्ध कर वलया तो िो आपके िारा वदए गए हर वनदेश का पालन करे गा वकन्तु उससे यह ..मनन करने िाली विचार प्रणाली नहीं है या याँू कहें की तंत्र कोई दशिन शास्त्र नहीं है यह शत प्रवतशत अनभु वू तयों पर आधाररत है.. २) दसू रे स्तर पर हमें उस दसू रे की अनभु वू त होती है विसे हम वसद्ध कर रहे होते हैं या विसका आिाहन वकया िा रहा होता है. ३) अंवतम अनभु वू त होती है उस अलौवकक. यवद आप सब को याद होगा तो वपछले लेख में हमने पढ़ा था की प्रेत विस लोक में रहते हैं उसे िासना लोक कहते हैं और िासना वितनी गहन होगी उतना ही अवधक समय लगेगा आवमा को प्रेत योवन से मि ु हो के सक्ष्ू म योवन प्राि करने में और साथ ही साथ हमने यह भी समझा था की इन प्रेतों और वपशाचों का भू लोक पर आने िाला मागि महािासना पथ कहलाता है वकसका महावदव्योध मागि से एकीकरण पथ्ृ िी के के न्द्र में होता है. अखडं परम सत्ता की विसे हम समावध की अिस्था कहते हैं... अब िब अनभु वू तयों की बात करते हैं तो एक साधक साधना करते समय तीन तरह की अनभु वू तयों का अनभु ि करता है – १) साधना के प्रथम स्तर पर उसे अपनी इवन्द्रयों का बोध होता है विसे हम ऐसे समझते हैं की हाथ पैर दःु ख रहे हैं...आसन पर बैठा नहीं िाता.. पर हमने तब यह तथ्य नहीं समझा था की पथ्ृ िी के के न्द्र में ही यह दोनों मागि क्यों वमलते हैं कहीं और क्यों नहीं तो इसका एक सीधा सरल उत्तर यह है की भू के गभि में अथाित उसके के न्द्र में ऊिाि का घ्नन्तवि सबसे अवधक मात्रा में होता है या याँू कहें की के न्द्र में कहीं ओर की तल ु ना में गरुु विाकर्षिण की वक्रया सबसे ज्यादा होती है और इसी गरुु विाकर्षिण की शवि के कारण ही प्रेत योवनयााँ भू लोक की तरि खींची चली आती हैं...

.िो विसका कोई अवस्तवि नहीं है उसके अवस्तवि को पहचानते हुए उसकी मल ू पद ध्िवन को सनु ना है. २) हम में से बहुत कम लोग यह बात िानते है की वदन के २४ घटं ों में एक क्षण ऐसा भी होता है िब हमारी देह मवृ यु का आभास करती है अथाित यह क्षण ऐसा होता है िब हमारी सारी इवन्द्रयााँ वशवथल हो िाती है और ह्रदय की गवत रुक िाती है.३० से ३ बिे के मध्य इस साधना को वकया िाना उवचत होगा..और हााँ एक बात और अब चक ंू ी ये योवनयााँ मंत्राकर्षिण की ििह से आपकी तरि आकवर्षित होती है तो यथा सभं ि कोवशश करें की यवद आपने आसन वसद्ध वकया हुआ है तो आप उसी आसन पर बैठ कर इस प्रयोग को करें . िीरासन का प्रयोग कही ज्यादा सिलतादायक है. नैिेद्य में काले वतलों को भनू कर शहद में वमला कर लड्डू िैसा बना लें. दीपक सरसों के तेल का होगा. रोि मरा की वदनचयाि में यह पल कौन सा होता है और कब आता है यह तो बहुत आगे का विधान है पर इस प्रयोग को करते समय यह पल तब आएगा िब आप साधना सम्पपणू िता की कगार पर होंगे तो आपको उस समय खदु के डर पर वनयंत्रण करते हुए उस मक ू संकेत को समझना है.... क्योंवक िहााँ आप कमिोर पड़े आपकी साधना उसी एक क्षण विशेर्ष पर खवम हो िायेगी.सब करिाने के वलए आपको अपने संकल्प के प्रवत दृढ़ता रखनी पड़ेगी अथाित आपको परू े मन. िस्त्र ि आसन का रंग काला होगा.अथाित रावत्र के ११.. विधान – मल ू तः ये साधना वमश्रडामर तंत्र से सम्पबंवधत है....और उस पर वमटटी का पात्र स्थावपत करना है विसमें यन्त्र का वनमािण होगा. अमािस्या की मध्य रावत्र का प्रयोग इसमें होता है.. बािोट पर काला ही िस्त्र वबछे गा. .... वदशा दवक्षण होगी.. क्योंवक िो आसन भू के गरुु वि बल से आपका सम्पपकि तोड़ देता है. िचन और क्रम से ये साधना करनी पड़ेगी.साथ ही उडद के पकौड़े या बड़े की भी व्यिस्था रखें और एक पत्तल के दोनें या वमटटी के दोने में रख दें...

और उस यन्त्र के मध्य में वमटटी या लोहे का तेल भरा दीपक स्थावपत कर प्रज्िवलत कर दें.मंत्र िप में लगभग ३ घंटे लग सकते हैं.एक उदासी सी चा सकती है.गणपवत पिू न.इनटू विचवलत ना हों. अब उपरोि यन्त्र का वनमािण अनावमका ऊाँगली या लोहे की कील से उस वमटटी के पात्र में कर दें और उसके चारों और िल का एक घेरा मल ू मत्रं का उच्चारण करते हुए कर बना दें. रक्षा विधान हेतु सदगुरुदेव के कवच का ११ पाठ अवनिायि रूप से कर लें. क्यंवू क एक बार उठ िाने पर ये साधना सदैि सदैि के वलए खवं डत मानी िाती है और भविष्य में भी ये मत्रं दबु ारा वसद्ध नहीं होगा.वकन्तु साधना में बैठने के बाद िप पणू ि करके ही उठें .और भैरि पिू न संपन्न कर लें. मत्रं िप के मध्य कमरे में सरसराहट हो सकती है.इवयावद सपं न्न कर उठ िाएाँ और दसु रे वदन अपने िस्त्र ि आसन छोड़कर.और तब उसे िो भोग का पात्र देकर उससे िचन लें लें की िो आपके श्ेि कायों में आपका सहयोग ३ सालों तक करे गा.िो आपका कायि पणू ि कर देगा.िो दीपक. मंत्र:- .उबकाई भरा िातािरण हो िाता है.दरिािे या वखडकी पर तीव्र पत्रों के वगरने का स्िर सनु ाई दे सकता है.अब काले हकीक या रुद्राक्ष माला से ५ माला मंत्र िप वनम्पन मंत्र की संपन्न करें . गरुु पिू न.और तब िो अपना कडा या िस्त्र का टुकड़ा आपको देकर अदृश्य हो िाता है.उस ्लेट के सामने रख दें. कमरे को पनु ः स्िच्छ िल से धो दें और वनवखल किच का उच्चारण करते हुए गंगािल वछड़क कर गगू ल धपु वदखा दें.पात्र और बािोट के िस्त्र को विसविित कर दें.और िब भी भाविओश्य में आपको उसे बल ु ाना हो तो आप मल ू मंत्र का उच्चारण ७ बार उस िस्त्र या कड़े को स्पशि कर एकांत में करें .कई बार तीव्र पेट ददि या सर ददि हो िाता है और तीव्र दीघि या लघु शंका का अहसास होता है. िप के मध्य में ही धएु ं की आकृवत आपके आस पास वदखने लगती है.और भोग का पात्र िो दोना इवयावद हो सकता है या वमटटी का पात्र हो सकता है.िप के बाद पनु ः गरुु पिू न.िो िप पणू ि होते ही साक्षात् हो िाती है.अथाित वछड़क दें.रावत्र में स्नान कर साधना कक्ष में आसन पर बैठ िाएाँ. ध्यान रवखये अवहतकर कायों में इसका प्रयोग आप पर विपवत्त ला देगा.

क्तप्रय क्तर्ि .ाँ “वनवखल प्रणाम” ****ROZY NIKHIL**** ****NPRU**** Shamshan sadhana workshop ( A great way to overcome fear /one of among eight pash from life ).कारज मोरो कर रे काली को गण.कारज करे सरल.काला प्रेत रे वचररया.जो कारज ना करें शत्रु ना कांपे तो दुहाई माता कालका की.साधन को साकार कर.काली की आन.काली को गण.इररया रे वचररया.शत्रु डरें कापें थर थर. भय को वयाग कर तीव्रता को आश्य दें. .वदखा अपना रूप.धुंआ सो बनकर आ.यही मैं सदगरुु देि से हम सभी के वलए प्राथना करती ह.हवा के संग संग आ.वपतर की शवि. मझु े आशा है की आप इस अहावनकर प्रयोग के िारा लाभ और वहतकर कारों को सिलता देंगे.

र्ोडा या अक्तधक ये र्हमव की बात नहीं हैं .. र्ााँ के सार् क्तवचरर् करते रहते हैं . जहााँ भगवान् र्हाकाि .भय अष्ट पानों र्ें से एक हैं जो र्ानव को को उसके स्वयं के स्वरुप से पररचय नहीं होने देता . जहााँ इस जीवन से सरे स्वार्मर्य ररश्ते अंत को प्राप्त होते रहते हैं . र्ााँ तो यही कह रही हैं . कोन नहीं होगा जो क्तनभमय होना नहीं चाहेगा वह भी र्ााँ र्हाकािी के अभय से . ये स्र्ान डरने/भय की नहीं बक्तल्क अपने अक्तस्तमव को जानने या पहचानने की जगह हैं तामशसक ही नहीं बशल्क . पक्तवि क्तसिाश्रर् के बाद इस धरती पर सबसे पक्तवि जगह हैं ..हर् र्ें से कोन ऐसा होगा सार् अपने ह्रदय पर के समय कह सके की उसे ककसी भी जो साहस हार् के रख प्रकार का ज्ञात /अज्ञात भय नहीं हैं . पर हर् कहा उनके आनीवामद को प्राप्त कर सकते हैं भिा उनके क्तनवास से ज्यादा अच्छी जगह कहााँ होगी. "र्ा भे " र्ैं अभय देती हूाँ .नर्नान . चरों और एक नीरवता का वातावरर् हर्ेना छाया रहता हैं.

चचक्ततत न हो . या दोनों र्ें होगा .साशतवक सािना भी यहााँ पर संपन्न की िा सकती हैं . या परर्हंस क्तवनुिानंद जी हो या. औघड़ भगवान् रार् हो सभी ने कभ न कभी इस पक्तवि भूक्तर् पर साधन की ही हैं . इस तथ्य को ध्यान र्ें रख कर ही इस कायमनािा का आयोजन करने की योजना बनाये जा रही हैं .ये कायमनािा उनके क्तिए ही के बि नहीं हैं जो भयर्ुि हैं बक्तल्क जो भी अपने भय रूपी पान से र्ुि होना चाहता हैं उनका भी स्वागत हैं .. हर्ें साधना र्ें जल्दी सफिता क्तर्ि जाती हैं. पर क्या यह इतना आसान होगा इसका उत्तर हााँ ओर न . घर पर की गयी साधना की अपेक्षा . तो कु छ तो क्तनिय ही क्तवनेिता होगी ही . परर्हंस क्तनगर्ानंद .अक्तधकांन र्हायोगी चाहे वे वार्क्षेपा हो जी .इस स्र्ान पर प्रार् उजाम इतनी अक्तधक होती हैं इसी कारर् . यकद यह साधना पूर्म की जाये ककसी कु नि र्ागमदनमन र्ें /या क्तनदेनन र्ें तो सफिता का प्रक्ततनत कई गुना ज्यादा होगा.इस स्थान पर पञ्च र्हाभूत पुनः अपने र्ूि स्वरूप र्ैं आ ही जाते हैं .

हर् अपने आप को सुरक्तक्षत करे ? कदग्बन्त्धन. ककस प्रकार की सावधानी अक्तनवायम हैं और कौन कौन सी आवश्यक बस्तु आपके पास हो ? 4. आसन क्तखिना कै से क्या हैं और क्यों इनकी अक्तनवायमता हैं ? 5.1. क्या वहां पर कोई िक्ष्र्ी का स्वरूप भी होता हैं . कै से पहचाने? हर् िमिानाशिपशत िूमल ण ोचन /र्रघटेश्वर को कै से . कै से पूर्म अघोरे श्वर क्तनव पूजन होता हैं ?सदगुरुदेव पूर्म पूजन और नर्नान र्ें कै से उनका आवाहन ककया जाता हैं ?. आसन कीिन.और कै से हो उनका आवाहन और पूजन ?. 3.नर्नान को सुसुप्त कै से करे ? 6. 7. 2. अष्ट भैरव र्ें से हर कदन कोन से भैरव आज जाग्रत होते हैं उन्त्हें पहचानना कै से हो . नर्नान जागरर् तो सीख कर कर क्तिया पर नांत करना न आया तो ? उसे नांत कै से करे .

ओर इस कायमनािा की अवक्तध िगभग ७ से १० कदन ही होगी .. र्ानक्तसक गुरु पूजन जो की सूक्ष्र् नव साधन का ही एक प्रकार हैं कै से करे संपन्न ? इस तरह के अनेकों प्रश्न के उत्तर /रह्नय पहिी बार आपके सम्पर्ुख होंगे . क्या क्या मझे शलखना चाशहए कक यह एक स्वर्तर्र् अवसर होगा क्तजसको खोना नहीं चाक्तहए .8.. ... हर् इस कायमनािा के क्तिए गुरुदेव जी से अनुर्क्तत प्राप्त करने की कोक्तनन र्ें हैं. हर कोई इसकी प्रक्ततना कर रहा हैं पर के बि कु छ ही साधक को चुना जायेगा.क्तवगत पारद कायमनािा कक तरह इसके पुनः होने ही सम्पभावना न के बराबर हैं नहीं ये बार बार ही सकती हैं .. अभी तो यही योजना हैं कक ये कायमनािा 1.. ओर र्ुझे क्या इसकी र्हमवता और क्तिखनी चाक्तहए ? .बस आपके कदर् रुके नहीं .5 र्हीने के अन्त्दर ही हो.उनके चुने जाने कक अक्तनवायम नतों र्ेंसे एक उनकी कु डिी भी एक आधार होगी .

क्तजसे कोई भी खोना नहीं चाहेगा . कहााँ होगी .तो इस संदभम र्ें भी एक कायमनािा करने कक योजना बनाये जा रही हैं . 14 .इससे अक्तधक भाग्य भी क्या कर सकता हैं . 15 वे संस्कार के क्तिए ): क्तवगत दो पारद संस्कार कायमनािा र्ें हर्ने १ से िेकर १२ तक के संस्कार को सर्झा ओर सीखा पर इससे भी आगे हर् बढ़ कर आपको अक्तग्रर् संस्कार से भी पररचय कराने के क्तिए प्रयत्ननीि हैं हर्ने आपके यह वायदा ककया र्ा .कब होगी आप को सूचना दी जाएगी ..पारद संस्कार कायमनािा ( के बि र्ाि 13...एक ऐसा अवसर जो आपके ओर रस क्तसिता को प्राप्त करने कक कदना र्ें एक और कदर् होगा . पहिे दो पारद संस्कार कायमनािा र्ें भाग क्तिए जाने वािे भाग्यनाक्तियों के क्तिए एक स्वर्तर्र् अवसर. अब आगे आप ओर आपका भाग्य . जो भी इसर्ें भाग िेने के क्तिए चुने जायेगे. अभी इस कायणिाला की योिना फरवरी माचण २०११ में हैं ***************************************** .

. अभी इस कायणिाला की योिना माचण अप्रैल २०११ में हैं . हर् एस हेतु गुरुदेव से आज्ञा प्राप्त करने कक कोक्तनन र्ें हैं ..इस क्तवज्ञानं के से धातुक्तवक नहीं संभव हैं र्ाध्यर् पररवतमन से िेकर जो भी आप सोच सकते हैं क्या . अ्पको हर् सूक्तचत करें गे ..क्तजन्त्होंने भी परर्हंस क्तवनुिानंद जी कक जीवनी पढ़ी हो वे ही इसकी अक्तत र्हत्त्व पूर्मता को सर्झ सकते हैं. जैसे ही उनकी अनुर्क्तत क्तर्िेगी .कहााँ पर ? कब ? होगी आपको सूक्तचत कर कदया जायेगा . पारद संस्कार ही नहीं बक्तल्क नव जीवन क्तनर्ामर् से िेकर हर प्रकार कक क्तसक्ति संभव हो सकती हैं . ..सूयम क्तसिान्त्त कायमनािा : हर्ारा जीवन ही नहीं बक्तल्क सारा हर्ारा सौयम चक्र भी पुर्मतः सूयम पर ही क्तनभमर हैं . इस र्ें चुने जाने वािे व्यक्तियों के चुनाव का एक आधार कु डिी भी होगी..िगभग १० कदवसीय इस कायमनािा र्ें हर्ारा उदेश्य आपको इस क्तवज्ञानं के गोपनीय पहिु से भी /रह्नयों से भी पररक्तचत कराते हुए अग्रसर करे . हर् ये दावा तो नहीं करते कक आप आप इस क्तवज्ञानं क्तवनेिज्ञ बन जायेंगे पर प्रायोक्तगक रूप से इस क्तवज्ञानं को सीख और सर्झ सकते हैं ..

... हर् तो प्रतीक्षा करें गे ही आपके क्तिए .अब आप ओर आपका भाग्य . ******************************************** ******* ........