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इस्लाम में खाललस इन्सानी अधिकार

] हिन्दी & Hindi & ‫[ هندي‬

साइट इस्लाम धमम

संपादनः अताउरर िमान ज़ियाउल्लाि

2014 - 1435

‫﴿حقوق اإلنسان األصيلة يف اإلسالم ﴾‬
‫« باللغة اهلندية »‬

‫موقع دين اإلسالم‬

‫مراجعة‪ :‬عطاء الرمحن ضياء اهلل‬

‫‪2014 - 1435‬‬

‫‪2‬‬


बिस्स्मल्लाहिर्म िमाननर्म िीम
मैं अतत मेिरबान और दयालु अल्लाि के नाम से आरम्भ करता िूँ।

‫ ونعوذ باهلل من‬،‫إن احلمد هلل حنمده ونستعينه ونستغفره‬

‫ ومن‬،‫ من يهده اهلل فال مضل هل‬،‫ وسيئات أعمانلا‬،‫رشور أنفسنا‬

:‫ وبعد‬،‫يضلل فال هادي هل‬

िर् प्रकार् की िम्द व सना (प्रशंसा और् गण
ु गान) केवल
अल्लाि के ललए योग्य िै , िम उसी की प्रशंसा कर्ते िैं, उसी
से मदद मांगते और् उसी से क्षमा याचना कर्ते िैं, तथा िम
अपने नफ्स की िर्ु ाई और् अपने िर्ु े कामों से अल्लाि की
पनाि में आते िैं, स्िसे अल्लाि तआला हिदायत प्रदान कर्
दे उसे कोई पथभ्रष्ट (गम
ु र्ाि) कर्ने वाला निीं, और् स्िसे
गम
ु र्ाि कर् दे उसे कोई हिदायत दे ने वाला निीं। िम्द व
सना के िाद :
3

खाललस इन्सानी-अधिकार
इन्सान की िै लसयत से इन्सान के अधिकार

सिसे पिली चीज़ िो इस मामले में िमें इस्लाम
के अन्दर् लमलती िै , वि यि िै कक इस्लाम
इन्सान की िै लसयत से इन्सान के कुछ िक़ और्
अधधकार् मुक़र्म र् कर्ता िै । दस
ू र्े शब्दों में इसका
मतलि यि िै कक िर् इन्सान चािे , वि िमार्े
अपने दे श और् वतन का िो या ककसी दस
ू र्े दे श
और् वतन का, िमार्ी क़ौम का िो या ककसी दस
ू र्ी
4

क़ौम का, मुसलमान िो या ग़ैर्-मुस्स्लम, ककसी
िंगल का र्िने वाला िो या ककसी र्े धगस्तान में
पाया िाता िो, ििर्िाल लसर्फम इन्सान िोने की
िै लसयत से उसके कुछ िक़ और् अधधकार् िैं
स्िनको एक मुसलमान लास्ज़मी तौर् पर् अदा
कर्े गा और् उसका र्फज़म िै कक वि उन्िें अदा कर्े ।
1. ज़िन्दा रिने का अधिकार
इन में सिसे पिली चीज़ स्ज़न्दा र्िने का अधधकार्
और् इन्सानी िान के आदर् का कतमव्य िै । क़ुर्आन
में र्फर्माया गया िै कक, ‘‘स्िस आदमी ने ककसी
एक इन्सान को क़त्ल ककया, िग़ैर् इसके कक उससे
5

ककसी िान का िदला लेना िो, या वि ज़मीन में
र्फसाद फैलाने का मुिरर्म िो, उसने मानो तमाम
इन्सानों को क़त्ल कर् हदया’’ (5:32)। ििााँ तक
ख़न
ू का िदला लेने या ज़मीन में र्फसाद फैलाने पर्

ै़
सज़ा दे ने का सवाल िै , इसका फैसला एक अदालत
िी कर् सकती िै । या ककसी क़ौम से िंग िो तो
एक िाक़ायदा िुकूमत िी इसका र्फैसला कर् सकती
िै । ििर्िाल ककसी आदमी को व्यस्ततगत रूप से
यि अधधकार् निीं िै कक ख़ून का िदला ले या
ज़मीन में र्फसाद पैलाने की सज़ा दे । इसललए िर्
इन्सान पर् यि वास्िि िै कक वि िर्धगज़ ककसी
इन्सान का क़त्ल न कर्े । अगर् ककसी ने एक
6

इन्सान का क़त्ल ककया तो यि ऐसा िै िैसे उसने
तमाम इन्सानों को क़त्ल कर् हदया। इसी िात को
दस
में इस तर्ि दि
ू र्ी िगि पर् कुर्आन
ु र्ाया गया
ै़
िै —
‘‘ककसी िान को िक़ के िग़ैर् क़त्ल न कर्ो, स्िसे
अल्लाि ने िर्ाम ककया िै ’’ (6:152)। यिााँ भी क़त्ल
की मनािी को ऐसे क़त्ल से अलग ककया गया िै
िो िक़ के साथ िो, और् िक़ का र्फैसला ििर्िाल
कोई अधधकार् र्खने वाली अदालत िी कर्े गी।
अल्लाि के र्सूल (सल्लल्लािु अलैहि व सल्लम) ने
ककसी िान के क़त्ल को लशकम के िाद सिसे िड़ा
गन
ु ाि क़र्ार् हदया िै । ‘‘सिसे िड़ा गन
ु ाि अल्लाि
7

के साथ लशकम और् ककसी इन्सानी िान को क़त्ल
कर्ना िै ।’’ इन तमाम आयतों और् िदीसों में
इन्सानी िान (‘नफ़्स’) का लफ़्ज़ इस्तेमाल ककया
गया िै िो ककसी ख़ास इन्सान के ललए निीं िै कक
उसका मतलि यि ललया िा सके कक अपनी क़ौम
या अपने मुल्क के शिर्ी, या ककसी ख़ास नस्ल,
र्ं ग या वतन, या मज़िि के आदमी को क़त्ल न
ककया िाए। िुतम तमाम इन्सानों के िार्े में िै
और् िर् इन्सानी िान को िलाक कर्ना अपने आप
में िर्ाम ककया गया िै ।

8

2. जीने का अधिकार ‘इन्सान’ को लसर्फर इस्लाम ने
हदया िै :
अि आप दे खखए कक िो लोग मानव-अधधकार्ों का
नाम लेते िैं, उन्िोंने अगर् अपने संववधानों में या
एलानों में किीं मानव-अधधकार्ों का स्ज़क्र ककया िै
तो इसमें यि िात ननहित (Implied) िोती िै कक
यि िक़ या तो उनके अपने नागरर्कों के िैं, या
कफर् वि उनको ककसी एक नस्ल वालों के ललए
ख़ास समझते िैं। स्िस तर्ि आस्रे ललया में इन्सानों
का लशकार् कर्के सर्फेद नस्ल वालों के ललए पर्ु ाने
िालशन्दों से ज़मीन ख़ाली कर्ाई गई और् अमेरर्का
9

में विााँ के पुर्ाने िालशन्दों की नस्लकुशी की गई
और्

िो

लोग

िच

गए

उनको

ख़ास

इलाक़ों

(Reservations) में क़ैद कर् हदया गया और्
अफ़्रीक़ा के ववलभन्न इलाक़ों में घस
ु कर् इन्सानों को
िानवर्ों की तर्ि िलाक ककया गया, यि सार्ी
चीज़ें इस िात को साबित कर्ती िैं कक इन्सानी
िान का ‘‘इन्सान’’ िोने की िै लसयत से कोई आदर्
उनके हदल में निीं िै । अगर् कोई आदर् िै तो
अपनी क़ौम या अपने र्ं ग या अपनी नस्ल की
िुननयाद पर् िै । लेककन इस्लाम तमाम इन्सानों के
ललए इस िक़ को तस्लीम कर्ता िै । अगर् कोई

10

आदमी िंगली क़िीलों से संिंध र्खता िै तो उसको
भी इस्लाम इन्सान िी समझता िै ।
3. जान की हिर्फा़ित का िक़
क़ुर्आन की स्िस आयत का अथम ऊपर् पेश ककया
गया िै उसके र्फौर्न िाद यि र्फर्माया गया िै कक
‘‘और् स्िसने ककसी नफ़्स को िचाया उसने मानो
तमाम

इन्सानों

को

स्ज़न्दगी

िख़्शी।’’

(5:32)।

आदमी को मौत से िचाने की िेशुमार् शतलें िैं।
एक आदमी िीमार् या ज़ख़्मी िै , यि दे खे िग़ैर् कक
वि ककस नस्ल, ककस क़ौम या ककस र्ं ग का िै ,
अगर् वि आप को िीमार्ी की िालत में या ज़ख़्मी
11

िोने की िालत में लमला िै तो आपका काम यि िै
कक उसकी िीमार्ी या उसके ज़ख़्म के इलाि की
कर्फक्र कर्ें । अगर् वि भूख से मर् र्िा िै तो आपका
काम यि िै कक उसको खखलाएाँ ताकक उसकी िान
िच िाए। अगर् वि डूि र्िा िै या और् ककसी तर्ि
से उसकी िान ख़तर्े में िै तो आपका र्फज़म िै कक
उसको िचाएाँ। आपको यि सुनकर् िै र्त िोगी कक
यिूहदयों की मज़ििी ककताि ‘‘तलमूद’’ में िू-ि-िू
इस आयत का मज़मन
ू मौिद
ू िै , मगर् उसके शब्द
ये िैं कक ‘‘स्िस ने इस्राईल की एक िान को िलाक
ककया, अल-ककताि (Scripture) की ननगाि में
उसने मानो सार्ी दनु नया को िलाक कर् हदया और्
12

स्िसने इस्राईल की एक िान को िचाया अलककताि के नज़दीक उसने मानो सार्ी दनु नया की
हिर्फाज़त की।’’ तलमूद में यि भी सार्फ ललखा िै
ककः अगर् कोई ग़ैर् इस्राईल डूि र्िा िो और् तम
ु ने
उसे िचाने की कोलशश की तो गुनिगार् िोगे। नस्ल
पर्स्ती का करर्श्मा दे खखये। िम िर् इन्सान की
िान िचाने को अपना र्फज़म समझते िैं, तयोंकक
क़ुर्आन ने ऐसा िी िुतम हदया िै । लेककन वि
अगर् िचाना ज़रूर्ी समझते िैं तो लसफम िनीइस्राईल (यिूहदयों) की िान को, िाक़ी र्िे दस
ू र्े
इन्सान, तो यिूदी-दीन में वि इन्सान समझे िी
निीं िाते। उनके यिााँ ‘गोयम’ स्िसके ललए अंग्रेज़ी
13

में (Gentile) और् अर्िी में उम्मी का लफ़्ज़
इस्तेमाल ककया िाता िै , की िै लसयत यि िै कक
उनके कोई इन्सानी अधधकार् निीं िैं। इन्सानी
िुक़ूक़ लसर्फम िनी-इस्राईल के ललए ख़ास िैं। क़ुर्आन
में भी इसका स्ज़क्र आया िै कक यिूदी किते िैं कक
‘‘िमार्े ऊपर् उस्म्मयों के िार्े में (यानी उनका माल
मार् खाने में) कोई पकड़ निीं िै ’’ (3:75)।
4. औरत की आबरू का आदर
तीसर्ी अिम चीज़ इस्लाम के हदए िुए मानवअधधकार्ों में यि िै कक और्त के शील और् उसकी
इज़्ज़त िर् िाल में आदर् के योग्य िै , चािे और्त
14

अपनी क़ौम की िो, या दश्ु मन क़ौम की, िंगल
बियािान में लमले या र्फति ककए िुए शिर् में ,
िमार्ी अपने मज़िि की िो या दस
ू र्े मज़िि की,
या उसका कोई भी मज़िि िो मस
ु लमान ककसी
िाल में भी उस पर् िाथ निीं डाल सकता। उसके
ललए िलात्कार् (स्ज़ना) को िर् िाल में िर्ाम ककया
गया िै चािे यि कुकमम ककसी भी और्त से ककया
िाए। क़ुर्आन के शब्द िैं ‘‘स्ज़ना के क़र्ीि भी न
फटको’’ (17:32)। और् उसके साथ िी यि भी ककया
गया िै कक इस काम की सज़ा मुक़र्म र् कर् दी गई।
यि िुतम ककसी शतम के साथ िंधा िुआ निीं िै ।
और्त के शील और् इज़्ज़त पर् िाथ डालना िर्
15

िालत में मना िै और् अगर् कोई मुसलमान इस
काम को कर्ता िै तो वि इसकी सज़ा से निीं िच
सकता, चािे दनु नया में सज़ा पाए या पर्लोक में।
और्त के सतीत्व के आदर् की यि परर्कल्पना
इस्लाम के लसवा किीं निीं पायी िाती। पाश्चात्य
र्फौिों को तो अपने मुल्क में भी ‘‘काम वासना की
पूनतम’’ के ललए ख़ुद अपनी क़ौम की िेहटयााँ चाहिए
िोती िैं। और् ग़ैर् क़ौम के दे श पर् उनका क़ब्ज़ा िो
िाए तो उस दे श की और्तों की िो दग
म िोती िै ,
ु त
वि ककसी से छुपी िुई निीं िै । लेककन मुसलमानों
का

इनतिास,

व्यस्ततगत

इन्सानी

ग़लनतयों

के

अपवाद (Exceptions) को छोड़कर् इससे ख़ाली
16

र्िी िै कक ककसी दे श को र्फति कर्ने के िाद
उनकी र्फौिें िर् तर्र्फ आम िदकार्ी कर्ती कफर्ी
िों, या उनके अपने दे श में िुकूमत ने उनके ललए
िदकारर्यााँ कर्ने का इस्न्तज़ाम ककया िो। यि भी
एक िड़ी नेमत िै िो मानव-िानत को इस्लाम की
विि से िालसल िुई िै ।
5. िर माूँगने वाले और तंगदस्त का यि िक़ िै
कक उसकी मदद की जाए
क़ुर्आन में यि िुतम हदया गया िै कक ‘‘और्
मुसलमानों के मालों में मदद मााँगने वाले और्
मिरूम र्ि िाने वाले का िक़ िै ’’ (5:19)। पिली
17

िात तो यि कक इस िुतम में िो शब्द आये िैं वे
सिके ललए िैं, उसमें मदद कर्ने को ककसी धमम
ववशेष के साथ ख़ास निीं ककया गया िै , और् दस
ू र्े
यि कक यि िुतम मतके में हदया गया था, ििााँ
मुस्स्लम समाि का कोई िाक़ायदा अस्स्तत्व िी
निीं था। और् आमतौर् पर् मुसलमानों का वास्ता
ग़ैर्-मुस्स्लम आिादी िी से िोता था। इसललए
क़ुर्आन की उतत आयत का सार्फ मतलि यि िै
कक मस
ु लमान के माल पर् िर् मदद मााँगने वाले
और् िर् तंगदस्त और् मिरूम र्ि िाने वाले
इन्सान का िक़ िै । यि िर्धगज़ निीं दे खा िाएगा
कक वि अपनी क़ौम या अपने दे श का िै या ककसी
18

दस
ू र्े क़ौम, दे श या नस्ल से उसका संिंध िै । आप
िै लसयत और् सामर्थयम र्खते िों और् कोई ज़रूर्तमंद
आप से मदद मााँगे, या आपको मालूम िो िाए कक
वि ज़रूर्तमंद िै तो आप ज़रूर् उसकी मदद कर्ें ।
ख़ुदा ने आप पर् उसका यि िक़ क़ायम कर् हदया
िै ।
6. िर इन्सान की आ़िादी का िक़
इस्लाम में ककसी आज़ाद इन्सान को पकड़ कर्
गलाम
िनाना या उसे िेच डालना बिल्कुल िर्ाम
ु ै़
क़र्ार् हदया गया िै । अल्लाि के र्सूल (सल्लल्लािु
अलैहि व सल्लम) के सार्फ शब्द ये िैं कक तीन
19

कक़स्म के लोग िैं स्िनके खख़लार्फ कक़यामत के हदन
मैं ख़ुद मुक़दमा दायर् करूाँगा। उनमें से एक वि
आदमी िै , िो ककसी आज़ाद इन्सान को पकड़ कर्
िेचे और् उसकी क़ीमत खाए। र्सल
(सल्लल्लािु

अलैहि व सल्लम) के इस र्फर्मान के शब्द भी
आम िैं। उसको ककसी क़ौम या नस्ल या दे श व
वतन के इन्सान के साथ ख़ास निीं ककया गया िै ।
पाश्चात्य लोगों को िड़ा गवम िै कक उन्िोंने गुलामी
ै़
का ख़ात्मा ककया िै । िालांकक उन्िें यि क़दम उठाने
का अवसर् मध्य उन्नीसवीं सदी में लमला िै । उससे
पिले स्िस िड़े पैमाने पर् वे अफ्रीक़ा से आज़ाद
इन्सानों को पकड़-पकड़ कर् अपनी नव-आिाहदयों
20

में ले िाते र्िे िैं और् उनके साथ िानवर्ों से भी
िुर्ा सलूक कर्ते र्िे िैं, इसका वववर्ण उनकी
अपनी िी ललखी िुई ककतािों में मौिूद िै ।
7. पाश्चात्य क़ौमों की गलामसा़िी
ु ु़
अमेरर्का और् हिन्द के पस्श्चमी िज़ीर्ों वग़ैर्ि पर्
इन क़ौमों का क़ब्ज़ा िोने के िाद साढ़े तीन सौ
साल तक गुलामी
की यि ज़ाललमाना नतिार्त िार्ी
ै़
र्िी िै । अफ़्रीक़ा के स्िस तट पर् दे श के अन्दर् से
काले

लोगों

को

पकड़

कर्

लाया

िाता

और्

िन्दर्गािों से उनको आगे भेिा िाता था, इसका
नाम गुलामों
का तट (Slave Coast) पड़ गया
ै़
21

था। लसर्फम एक सदी में (1680 ई॰ से 1786 ई॰ तक)
लसर्फम बिटे न के क़ब्ज़ा ककए िुए इलाक़ों के ललए,
स्ितने आदमी पकड़ कर् ले िाए गए उनकी तादाद
ख़द
ु बिटे न के लेखकों ने दो कर्ोड़ िताई िै । लसर्फम
एक साल के िार्े में ऐसा िताया गया िै (सन ्
1790 ई॰) स्िसमें पचित्तर् िज़ार् अफ़्रीक़ी पकड़े
और् गलाम
िनाए गए। स्िन ििाज़ों में वे लाए
ु ै़
िाते थे, उनमें इन अफ़्रीकक़यों को बिल्कुल िानवर्ों
की तर्ि ठूंस कर् िन्द कर् हदया िाता था और्
ििुतों को ज़ंिीर्ों से िांध हदया िाता था। उनको न
ठीक से खाना हदया िाता था, न िीमार् पड़ने या
ज़ख़्मी िो िाने पर् उनके इलाि की कर्फक्र की
22

िाती थी। पाश्चात्य लेखकों का अपना ियान िै कक
गुलाम
िनाने और् ज़िर्दस्ती खख़दमत लेने के ललए
ै़
स्ितने अफ़्रीक़ी पकड़े गए थे, उनमें से 20 प्रनतशत
का र्ास्ते िी में ख़ात्मा िो गया। यि भी अंदाज़ा
ककया िाता िै कक सामूहिक रूप से ववलभन्न
पाश्चात्य क़ौमों ने स्ितने लोगों को पकड़ा था
उनकी तादाद दस कर्ोड़ तक पिुंचती थी। इस
तादाद में तमाम पाश्चात्य क़ौमों की ग़ल
ु ामसाज़ी के
आाँकड़े शालमल िैं। ये िैं वे लोग स्िनका यि मंि
ु िै
कक इस्लाम के अनुयानययों पर् गलामी
को िायज़
ु ै़
र्खने का र्ात-हदन इल्ज़ाम लगाते र्िे िैं। मानो

23

नकटा ककसी नाक वाले को ताना दे र्िा िै कक तेर्ी
नाक छोटी िै ।
8. इस्लाम में गुलामी
की िै लसयत
ु़
यिााँ संक्षेप में समझ लें कक इस्लाम में गलामी
की
ु ै़
िै लसयत तया िै । अर्ि में िो लोग इस्लाम से
पिले के गुलाम
चले आ र्िे थे, उनके मामले को
ै़
इस्लाम ने इस तर्ि िल ककया कक िर् मुमककन
तर्ीक़े से उनको आज़ाद कर्ने की प्रेर्णा दी गई।
लोगों को िुतम हदया गया कक अपने कुछ गन
ु ािों
के प्रायस्श्चत के तौर् पर् उनको आज़ाद कर्ें । अपनी
ख़ुशी से ख़ुद ककसी गुलाम
को आज़ाद कर्ना एक
ै़
24

िड़ी नेकी का काम क़र्ार् हदया गया। यिााँ तक
किा गया कक आज़ाद कर्ने वाले का िर् अंग उस
गुलाम
के िर् अंग के िदले में नर्क से िच
ै़
िाएगा। इसका नतीिा यि िुआ कक खख़लार्फते
र्ालशदा के दौर् तक पिुंचते-पिुंचते अर्ि के तमाम
पुर्ाने गुलाम
आज़ाद िो गए। (पैग़म्िर् मुिम्मद
ै़
(सल्लल्लािु अलैहि व सल्लम) के िाद इस्लामी
लसद्ांतों पर् आधारर्त शासन-प्रणाली एक असे तक
क़ायम र्िी। यिी दौर् खख़लार्फते र्ालशदा का दौर्
किलाता िै ।)
अल्लाि के र्सल
ू (सल्लल्लािु अलैहि व सल्लम) ने
ख़द

63

गुलाम
ै़

आज़ाद
25

ककए।

िज़र्त

आइशा

(र्स्ज़यल्लािु अन्िा) के आज़ाद ककए िुए गलामों
की
ु ै़
तादाद
अन्िुमा)

67
ने

(र्स्ज़यल्लािु

थी।
70,

िज़र्त
िज़र्त

अन्िुमा)

ने

अब्िास

(र्स्ज़यल्लािु

अब्दल्
ु लाि-बिन-उमर्
एक

िज़ार्

और्

अब्दर्ु म िमान-बिन-और्फ (र्स्ज़यल्लािु अन्िु) ने िीस
िज़ार् गुलाम
ख़र्ीद कर् आज़ाद कर् हदए। ऐसे िी
ै़
ििुत से सिािा (र्स्ज़यल्लािु अन्िुम) के िार्े में
रर्वायतों में तर्फसील आई िै कक उन्िोंने ख़ुदा के
ककतने िन्दों को गलामी
से मत
ु ै़
ु त ककया था। इस
तर्ि पुर्ाने दौर् की गुलामी
का मसला िीस-चालीस
ै़
साल में िल कर् हदया गया।

26

मौिूदा ज़माने में इस मसले का िो िल ननस्श्चत
ककया गया िै , वि यि िै कक िंग के िाद दोनों
तर्र्फ के िंगी क़ैहदयों का तिादला कर् ललया िाए।
मस
ु लमान इसके ललए पिले से तैयार् थे, िस्ल्क
ििााँ किीं मुख़ाललर्फ पक्ष ने क़ैहदयों के तिादले को
क़ुिूल ककया, विााँ िग़ैर् खझझक इस िात पर् अमल
ककया गया। लेककन अगर् इस ज़माने की ककसी
लड़ाई में एक िुकूमत पूर्े तौर् पर् िार् खा िाए
और् िीतने वाली ताक़त अपने आदलमयों को छुड़ा
ले और् िार्ी िुई िुकूमत िाक़ी िी न र्िे कक अपने
आदलमयों को छुड़ा सके तो तिुिाम यि िताता िै
कक पर्ास्ित क़ौम के क़ैहदयों को गुलामी
से िदतर्
ै़
27

िालत में र्खा िाता िै । वपछले ववश्व युद् में रूस
ने िममनी और् िापान के िो क़ैदी पकड़े थे, उनका
अंिाम तया िुआ। उनका आि तक हिसाि निीं
लमला िै । कुछ निीं मालम
ू कक ककतने स्ज़न्दा र्िे
और् ककतने मर्-खप गए। उनसे िो खख़दमतें ली
गईं, वे गुलामी
की खख़दमत से िदतर् थीं। शायद
ै़
कर्फर्औन के ज़माने में अिर्ाम (Pyramids) िनाने
के ललए गलामों
से उतनी ज़ाललमाना खख़दमतें न
ु ै़
ली गई िोंगी स्ितनी रूस में साइिेरर्या और् वपछड़े
इलाक़ों को तर्क़्क़ी दे ने के ललए िंगी क़ैहदयों से ली
गयीं।

28

9. िर इन्सान का यि िक़ िै कक उसके साथ
न्याय ककया जाए
यि एक ििुत अिम अधधकार् िै , िो इस्लाम ने
इन्सान को इन्सान िोने की िै लसयत से हदया िै ।
कुर्आन
में आया िै कक ‘‘ककसी धगर्ोि की दश्ु मनी
ै़
तम्
नामुनालसि
ु िें इतना न भड़का दे कक तम

ज़्यादती कर्ने लगो’’ (5:8)। आगे चलकर् इसी
लसललसले में कफर् र्फर्माया, ‘‘और् ककसी धगर्ोि की
दश्ु मनी तुम को इतना उत्तेस्ित न कर् दे कक तुम
इन्सार्फ से िट िाओ, इन्सार्फ कर्ो, यिी धमम
पर्ायणता से क़र्ीितर् िै ’’ (5:8)। एक और् िगि
र्फर्माया गया िै कक ‘‘ऐ लोगो! िो ईमान लाए िो,
29

इन्सार्फ कर्ने वाले और् ख़ुदा के वास्ते गवाि िनो’’
(5:8)। मालूम िुआ कक आम इन्सान िी निीं
दश्ु मनों तक से इन्सार्फ कर्ना चाहिए। दस
ू र्े शब्दों
में इस्लाम स्िस इन्सार्फ की दावत दे ता िै , वि
लसर्फम अपने दे श के र्िने वालों के ललए या अपनी
क़ौम के लोगों के ललए या मुसलमानों के ललए िी
निीं, िस्ल्क दनु नया भर् के सि इन्सानों के ललए
िै । िम ककसी से भी िेइन्सार्फी निीं कर्ते , िमार्ा
िमेशा र्वैया यि िोना चाहिए कक कोई आदमी भी
िम से िेइन्सार्फी का अंदेशा न र्खे और् िम िर्
िगि िर् आदमी के साथ न्याय और् इन्सार्फ का
ख़्याल र्खें।
30

10. इन्सानी बराबरी
इस्लाम न लसर्फम यि कक ककसी र्ं ग व नस्ल के
भेदभाव के िग़ैर् तमाम इन्सानों के िीच िर्ािर्ी
को मानता िै , िस्ल्क इसे एक मित्वपूणम सत्य
ननयम क़र्ार् दे ता िै । क़ुर्आन में अल्लाि ने
र्फर्माया िै कक ‘‘ऐ इन्सानो! िम ने तम
ु को ‘एक’
मां और् एक ‘िाप’ से (अथामत ् आदम और् िव्वा से)
पैदा ककया।’’ दस
ू र्े शब्दों में , इसका मतलि यि
िुआ कक तमाम इन्सान अस्ल में भाई-भाई िैं, एक
िी मां और् एक िी िाप की औलाद िैं। ‘‘और् िमने
तम
ु को क़ौमों और् क़िीलों में िांट हदया, ताकक
तम
एक-दस

ू र्े की पिचान कर् सको’’ (49:13)।
31

यानी क़ौमों और् क़िीलों में यि तक़्सीम पिचान के
ललए िै । इसललए िै कक एक क़िीले या एक क़ौम
के लोग आपस में एक-दस
ू र्े से परर्धचत िों और्
आपस में सियोग कर् सकें। यि इसललए निीं िै
कक एक क़ौम दस
ू र्ी क़ौम पर् िड़ाई िताए और्
उसके साथ घमंड से पेश आए, उसको कमज़ोर् और्
नीचा समझे और् उसके अधधकार्ों पर् डाके मार्े ।
‘‘िक़ीक़त में तुम में इज़्ज़त वाला वि िै , िो तुम
में सिसे ज़्यादा ख़द
ु ा से डर्ने वाला िै ’’ (49:13)
यानी इन्सान पर् इन्सान की िड़ाई लसर्फम पाकीज़ा
चरर्त्र और् अच्छे आचर्ण की बिना पर् िै , न कक
र्ं ग व नस्ल िुिान
या वतन की बिना पर्। और्
ै़
32

यि िड़ाई भी इस उद्देश्य के ललए निीं िै कक अच्छे
चरर्त्र और् आचर्ण के लोग दस
ू र्े इन्सानों पर्
अपनी िड़ाई िताएं, तयोंकक िड़ाई िताना स्वयं में
एक

िर्ु ाई

िै ,

स्िसको

कोई

धममपर्ायण

और्

पर्िे ज़गार् आदमी निीं कर् सकता और् यि इस
उद्देश्य के ललए भी निीं िै कक नेक आदमी के
अधधकार् िुर्े आदलमयों के अधधकार्ों से िढ़कर् िों,
या उसके अधधकार् उनसे ज़्यादा िों, तयोंकक यि
इन्सानी िर्ािर्ी के खख़लार्फ िै , स्िसको इस आलेख
के शुरू में ननयम के तौर् पर् ियान ककया गया िै ।
यि िड़ाई और् इज़्ज़त अस्ल में इस विि से िै
कक नेकी और् भलाई नैनतक-दृस्ष्ट से िुर्ाई के
33

मुक़ािले में ििर्िाल श्रेष्ठ िै । इस िात को अल्लाि
के र्सूल (सल्लल्लािु अलैहि व सल्लम) ने एक
िदीस में ियान र्फर्माया िै ककः— ‘‘ककसी अर्िी को
ग़ैर्-अर्िी पर् कोई िड़ाई निीं िै , न ग़ैर्-अर्िी को
अर्िी पर् कोई िड़ाई िै । न गोर्े को काले पर् और्
न काले को गोर्े पर् कोई िड़ाई िै । तुम सि आदम
(अलैहिस्सलाम) की औलाद िो और् आदम लमट्टी से
िनाए गए थे।’’ इस तर्ि इस्लाम ने तमाम मानविानत में िर्ािर्ी क़ायम की और् र्ं ग, नस्ल भाषा
और् र्ाष्र के आधार् पर् सार्े भेद-भावों की िड़
काट दी। इस्लाम के नज़दीक यि िक़ इन्सान को
इन्सान िोने की िै लसयत से िालसल िै कक उसके
34

साथ उसकी खाल के र्ं ग या उसकी पैदाइश की
िगि या उसकी िन्म दे ने वाली नस्ल व क़ौम के
आधार् पर् कोई भेदभाव न िर्ता िाए। उसे दस
ू र्े
के मुक़ािले में नीच न ठिर्ाया िाए। और् उसके
अधधकार् दस
ू र्ों से कमतर् न र्खे िाएं। अमेरर्का
के अफ्रीक़ी नस्ल के लोगों का मशिूर् लीडर्
‘मैल्कम एतस’ िो काली नस्ल के िालशन्दों की
हिमायत में सफेद नस्ल वालों के खख़लार्फ सख़्त
कश्मकश कर्ता र्िा था, मस
ु लमान िोने के िाद
िि िि के ललए गया और् विां उसने दे खा कक
एलशया, अफ़्रीक़ा, यूर्ोप, अमेरर्का यानी िर् िगि
के और् िर् र्ं ग व नस्ल के मुसलमान एक िी
35

ललिास में एक ख़ुदा के घर् की तर्र्फ चले िा र्िे
िैं, एक िी घर् की परर्क्रमा कर् र्िे िैं, एक िी
साथ नमाज़ पढ़ र्िे िैं और् उनमें ककसी तर्ि का
भेदभाव निीं िै तो वि पक
ु ार् उठा कक यि िै र्ं ग
और् नस्ल के मसले का िल, न कक वि िो िम
अमेरर्का में अि तक कर्ते र्िे िैं। आि ख़ुद ग़ैर्मुस्स्लम

ववचार्क

भी,

िो

अंधे

भेदभाव

और्

पक्षपात में ग्रस्त निीं िैं, यि मानते िैं कक इस
मसले को स्िस कालमयािी के साथ इस्लाम ने िल
ककया िै , कोई दस
ू र्ा मज़िि और् तर्ीक़ा िल निीं
कर् सका िै ।

36

11. भलाई के कामों में िर एक से सियोग और
बुराई में ककसी से सियोग निीं
इस्लाम ने एक िड़ा अिम उसूल यि पेश ककया िै
कक ‘‘नेकी और् पर्िे ज़गार्ी में सियोग कर्ो। िदी
और् गुनाि के मामले में सियोग न कर्ो’’ (5:2)।
इसके माने यि िै कक िो आदमी भलाई और्
ईशपर्ायणता का काम कर्े , यि दे खे िग़ैर् कक वि
उत्तर् का र्िने वाला िो या दक्षक्षण का, वि यि
िक़ र्खता िै कक िम उससे सियोग कर्ें गे। इसके
ववपर्ीत िो आदमी िदी और् ज़्यादती का काम
कर्े , चािे वि िमार्ा क़र्ीिी पड़ोसी या रर्श्तेदार् िी
तयों न िो, उसका न यि िक़ िै कक रर्श्तेदार्ी,
37

नस्ल, वतन या भाषा और् िातीयता के नाम पर्
वि िमार्ा सियोग मांगे, न उसे िम से यि
उम्मीद र्खनी चाहिए कक िम उससे सियोग कर्ें गे।
न िमार्े ललए यि िायज़ िै कक ऐसे ककसी काम में
उसके साथ सियोग कर्ें । िदकार् िमार्ा भाई िी
तयों न िो, िमार्ा और् उसका कोई साथ निीं िै ।
नेकी का काम कर्ने वाला चािे िम से कोई रर्श्ता
न र्खता िो, िम उसके साथी और् मददगार् िैं, या
कम से कम ख़ैर्ख़्वाि और् शभ
ु धचंतक तो ज़रूर् िी
िैं।
12.

यद्ध

के

दौरान

दश्ु मनों

अन्तरारष्ट्रीय ‘क़ानन’ की िै लसयत
38

के

अधिकार

के

इससे पिले कक इस्लामी र्ाज्य के नागरर्कों के िक़
और् अधधकार् ियान ककया िाए, यि िताना ज़रूर्ी
िै कक दश्ु मनों के तया अधधकार् इस्लाम ने िताए
िैं। युद् के लशष्टाचार् की कल्पना से दनु नया
बिल्कुल िेख़िर् थी। पस्श्चमी दनु नया इस कल्पना
से पिली िार् सत्रिवीं सदी के ववचार्क ग्रोलशयूस
(Grotius) के ज़रर्ये से परर्धचत िुई। मगर् अमली
तौर् पर् अन्तर्ामष्रीय युद् ननयम उन्नीसवीं सदी के
मध्य में िनाना शरू
ु िुए। इससे पिले युद् के
लशष्टाचार् का कोई ख़्याल पस्श्चम वालों के यिां
निीं पाया िाता था। िंग में िर् तर्ि के िुल्म

ै़
लसतम ककए िाते थे और् ककसी तर्ि के अधधकार्
39

िंग कर्ने वाली क़ौम के निीं माने िाते थे।
उन्नीसवीं सदी में और् उसके िाद से अि तक िो
ननयम भी िनाए गए िैं, उनकी अस्ल िै लसयत
क़ानून की निीं, िस्ल्क संधध की सी िै । उनको
अन्तर्ामष्रीय क़ानून किना िक़ीक़त में ‘क़ानून’ शब्द
का ग़लत इस्तेमाल िै । तयोंकक कोई क़ौम भी िंग
में उस पर् अमल कर्ना अपने ललए ज़रूर्ी निीं
समझती।

लसवाए

इसके

कक

दस
ू र्ा

भी

उसकी

पािन्दी कर्े । दस
ू र्े शब्दों में िंग के इन सभ्य
ननमयों में यि िात मान ली गयी िै कक अगर्
िमार्ा दश्ु मन उनका आदर् कर्े गा तो िम भी कर्ें गे
और् अगर् वि िंग के ज़ाललमाना तर्ीक़ों पर् उतर्
40

आएगा

तो

िम

भी

िे-र्ोक-टोक

विी

तर्ीक़े

इस्तेमाल कर्ें गे। ज़ाहिर् िै कक इस चीज़ को क़ानून
निीं किा िा सकता। यिी विि िै कक िर् िंग में
इन तथाकधथत अन्तर्ामष्रीय क़ायदों और् ननयमों
की धस्ज्ियां उड़ाई गईं और् िर् िार् उन पर्
पुनववमचार् ककया िाता र्िा, और् उन में कमी व
िेशी िोती र्िी।

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