श्री दु र्गासप्तशती अनुष्ठगन पूर्ा विवि । चण्डी कग अवत र्ुप्त रहस्य कग िर्ान

COMPLETE DURGA SAPTSHATI CHANDI PATH

श्री दु र्गासप्तशती के अनुष्ठगन की पूर्ा विवि
COMPLETE DURGA SAPTSHATI CHANDI PATH

दु र्गा सप्तशती के पगठ कग महत्व

म ाँ दु र् ा की आर धन और उनकी कृप प्र प्त करने के लिए दु र् ा सप्तशती क प ठ सर्वोत्तम है . . भुर्वनेश्वरी संलहत में कह
र्य है - लिस प्रक र से ''र्वे द'' अन लद है , उसी प्रक र ''सप्तशती'' भी अन लद है

दु र् ा सप्तशती के 700 श्लोकों में दे र्वी-चररत्र क र्वर्ान है . दु र् ा सप्तशती में कुि 13 अध्य य हैं . . दु र् ा सप्तशती के सभी
ते रह अध्य य अिर् अिर् इच्छित मनोक मन की सहर्ा ही पूलता करते है

प्रथम अध्य य: - इसके प ठ से सभी प्रक र की लचं त दू र होती है एर्वं शच्छिश िी से शच्छिश िी शत्रु क भी भय दू र होत है
शत्रुओं क न श होत है

लितीय अध्य य:- इसके प ठ से बिर्व न शत्रु ि र घर एर्वं भूलम पर अलधक र करने एर्वं लकसी भी प्रक र के र्व द लर्वर्व द आलद
में लर्विय प्र प्त होती है

तृ तीय अध्य य: - तृ तीय अध्य य के प ठ से यु द्ध एर्वं मुक़दमे में लर्विय, शत्रुओं से छु टक र लमित है

चतुथा अध्य य: - इस अध्य य के प ठ से धन, सुन्दर िीर्वन स थी एर्वं म ाँ की भच्छि की प्र च्छप्त होती है

पंचम अध्य य: - पंचम अध्य य के प ठ से भच्छि लमिती है , भय, बु रे स्वप्ों और भूत प्रेत ब ध ओं क लनर करर् होत है

छठ अध्य य: - इस अध्य य के प ठ से समस्त ब ध एं दू र होती है और समस्त मनर्व ाँ लछत फिो की प्र च्छप्त होती है

स तर्व ाँ अध्य य: - इस अध्य य के प ठ से ह्रदय की समस्त क मन अथर्व लकसी लर्वशे र् र्ु प्त क मन की पूलता होती है

आठर्व ाँ अध्य य: - अष्टम अध्य य के प ठ से धन ि भ के स थ र्वशीकरर् प्रबि होत है

नौर्व ं अध्य य:- नर्वम अध्य य के प ठ से खोये हुए की ति श में सफित लमिती है , संपलत्त एर्वं धन क ि भ भी प्र प्त होत
है

दसर्व ाँ अध्य य:- इस अध्य य के प ठ से र्ु मशुद की ति श होती है , शच्छि और संत न क सुख भी प्र प्त होत है

ग्य रहर्व ाँ अध्य य:- ग्य रहर्वें अध्य य के प ठ से लकसी भी प्रक र की लचंत से मुच्छि , व्य प र में सफित एर्वं सुख-संपलत्त की
प्र च्छप्त होती है

ब रहर्व ाँ अध्य य:- इस अध्य य के प ठ से रोर्ो से छु टक र , लनभायत की प्र च्छप्त होती है एर्वं सम ि में म न-सम्म न लमित है

ते रहर्व ं अध्य य:- ते रहर्वें अध्य य के प ठ से म त की भच्छि एर्वं सभी इच्छित र्वस्तु ओं की प्र च्छप्त होती है
मनुष्य की इि एं अनंत है और इन्ही की पूलता के लिए दु र् ा सप्तशती से सुर्म और कोई भी म र्ा नहीं है . . इसीलिए नर्वर त्र
में लर्वशे र् रूप से दु र् ा सप्तशती के ते रह अध्य यों क प ठ करने क लर्वध न है

(नोट) वमत्रो श्री दु र्गासप्तशती शगवपत और कीवित है इसविए सिाप्रथम
इसके उत्कीिन एिं शगप विमोचन की विवि को पढ़ें उसके पश्चगत ही इसकग अनुष्ठगन करें

दुर्गा सप्तशती पगठ विवि
पूिनकत ा स्न न करके, आसन शुच्छद्ध की लिय सम्पन्न करके, शुद्ध
आसन पर बैठ ि एाँ । म थे पर अपनी पसंद के अनुस र भस्म, चंदन
अथर्व रोिी िर् िें, लशख ब ाँ ध िें, लफर पूर्व ा लभमुख होकर तत्त्व शुच्छद्ध
के लिए च र ब र आचमन करें । इस समय लनम्न मंत्रों को बोिें-
ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधय लम नमः स्व ह ।
ॐ ह्रीं लर्वद्य तत्त्वं शोधय लम नमः स्व ह ॥
ॐ क्ीं लशर्वतत्त्वं शोधय लम नमः स्व ह ।
ॐ ऐं ह्रीं क्ीं सर्वातत्त्वं शोधय लम नमः स्व ह ॥
तत्पश्च त प्र र् य म करके र्र्ेश आलद दे र्वत ओं एर्वं र्ुरुिनों को प्रर् म
करें , लफर ‘पलर्वत्रेस्थो र्वैष्णव्यौ’ इत्य लद मन्त्र से कुश की पलर्वत्री ध रर्
करके ह थ में ि ि फूि, अक्षत और िि िेकर लनम्न ं लकत रूप से
संकल्प करें –
ॐ लर्वष्णुलर्वाष्णुलर्वाष्णुः। ॐ नमः परम त्मने, श्रीपुर र्पुरुर्ोत्तमस्य
श्रीलर्वष्णोर ज्ञय प्रर्वताम नस्य द्य श्रीब्रह्मर्ो लितीयपर द्धे श्रीश्वेतर्व र हकल्पे
र्वैर्वस्वतमन्वन्तरे ऽष्ट लर्वंशलततमे कलियुर्े प्रथमचरर्े िम्बू िीपे भ रतर्वर्े
भरतखण्डे आय ा र्वत ा न्तर्ा तब्रह्म र्वतैकदे शे पुण्यप्रदे शे बौद्ध र्वत रे र्वताम ने
यथ न मसंर्वत्सरे अमुक यने मह म ं र्ल्यप्रदे म स न म् उत्तमे अमुकम से
अमुकपक्षे अमुकलतथौ अमुकर्व सर च्छन्वत य म् अमुकनक्षत्रे
अमुकर लशच्छस्थते सूये अमुक मुकर लशच्छस्थतेर्ु
चन्द्रभौमबुधर्ु रुशुिशलनर्ु सत्सु शुभे योर्े शुभकरर्े एर्वं
र्ु र्लर्वशेर्र्लर्वलशष्ट य ं शुभ पुण्यलतथौ सकिश स्त्र श्रुलत स्मृलत पुर र्ोि
फिप्र च्छप्तक मः अमुकर्ोत्रोत्पन्नः अमुक न म अहं मम त्मनः
सपुत्रस्त्रीब न्धर्वस्य श्रीनर्वदु र् ा नुग्रहतो ग्रहकृतर िकृतसर्वा-
लर्वधपीड लनर्वृलत्तपू र्वाकं नैरुज्यदीघ ा युः पुलष्टधनध न्यसमृद्ध्यथं श्री
नर्वदु र् ा प्रस दे न सर्व ा पलन्नर्वृलत्तसर्व ा भीष्टफि र्व च्छप्तधम ा था-
क ममोक्षचतुलर्वाधपुरुर् था लसच्छद्धि र श्रीमह क िी-
मह िक्ष्मीमह सरस्वतीदे र्वत प्रीत्यथं श पोद्ध रपुरस्सरं
कर्वच र्ा ि कीिकप ठ- र्वेदतन्त्रोि र लत्रसूि प ठ दे व्यथर्वाशीर्ा
प ठन्य स लर्वलध सलहत नर्व र्ािप सप्तशतीन्य स-
धन्य नसलहतचररत्रसम्बच्छन्धलर्वलनयोर्न्य सध्य नपूर्वाकं च ‘म काण्डे य
उर्व च॥ स र्वलर्ाः सूयातनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः।’ इत्य द्य रभ्य
‘स र्वलर्ाभालर्वत मनुः’ इत्यन्तं दु र् ा सप्तशतीप ठं तदन्ते
न्य सलर्वलधसलहतनर्व र्ामन्त्रिपं र्वेदतन्त्रोिदे र्वीसूिप ठं रहस्यत्रयपठनं
श पोद्ध र लदकं च कररष्ये/कररष्य लम।
इस प्रक र प्रलतज्ञ (संकल्प) करके दे र्वी क ध्य न करते हुए पंचोपच र
की लर्वलध से पुस्तक की पूि करें ,
(पुस्तक पूि क मन्त्रः- “ॐ नमो दे व्यै मह दे व्यै लशर्व यै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्र यै लनयत ः प्रर्त ः स्म त म्।।” (र्व र हीतन्त्र तथ
लचदम्बरसंलहत ))। योलनमुद्र क प्रदशान करके भर्र्वती को प्रर् म करें ,
लफर मूि नर्व र्ा मन्त्र से पीठ आलद में आध रशच्छि की स्थ पन करके
उसके ऊपर पुस्तक को लर्वर िम न करें । इसके ब द श पोद्ध र करन
च लहए। इसके अनेक प्रक र हैं ।
‘ॐ ह्रीं क्ीं श्रीं ि ं िीं चच्छण्डक दे व्यै श पन श र्ु ग्रहं कुरु कुरु स्व ह ’
इस मंत्र क आलद और अन्त में स त ब र िप करें । यह “श पोद्ध र मंत्र”
कहि त है । इसके अनन्तर उत्कीिन मन्त्र क ि प लकय ि त है ।
इसक िप आलद और अन्त में इक्कीस-इक्कीस ब र होत है । यह मन्त्र
इस प्रक र है - ‘ॐ श्रीं क्ीं ह्रीं सप्तशलत चच्छण्डके उत्कीिनं कुरु कुरु
स्व ह ।’ इसके िप के पश्च त् आलद और अन्त में स त-स त ब र
मृतसंिीर्वनी लर्वद्य क ि प करन च लहए, िो इस प्रक र है -

‘ॐ ह्रीं ह्रीं र्वं र्वं ऐं ऐं मृतसंिीर्वलन लर्वद्ये मृतमुत्थ पयोत्थ पय िीं ह्रीं ह्रीं र्वं
स्व ह ।’
म रीचकल्प के अनुस र सप्तशती-श पलर्वमोचन क मन्त्र यह है -
‘ॐ श्रीं श्रीं क्ीं हं ॐ ऐं क्षोभय मोहय उत्कीिय उत्कीिय उत्कीिय ठं
ठं ।’
इस मन्त्र क आरं भ में ही एक सौ आठ ब र ि प करन च लहए, प ठ के
अन्त में नहीं। अथर्व रुद्रय मि मह तन्त्र के अंतर्ा त दु र् ा कल्प में कहे
हुए चच्छण्डक श प लर्वमोचन मन्त्र क आरं भ में ही प ठ करन च लहए। र्वे
मन्त्र इस प्रक र हैं -
ॐ अस्य श्रीचच्छण्डक य ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश पलर्वमोचनमन्त्रस्य र्वलसष्ठ-
न रदसंर्व दस मर्वे द लधपलतब्रह्म र् ऋर्यः सर्वैश्वयाक ररर्ी श्रीदु र् ा दे र्वत
चररत्रत्रयं बीिं ह्री शच्छिः लत्रर्ु र् त्मस्वरूपचच्छण्डक श पलर्वमुिौ मम
संकच्छल्पतक यालसद्ध् यथे िपे लर्वलनयोर्ः।
ॐ (ह्रीं) रीं रे तःस्वरूलपण्यै मधुकैटभमलदा न्यै
ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥1॥
ॐ श्रीं बुच्छद्धस्वरूलपण्यै मलहर् सुरसैन्यन लशन्यै
ब्रह्मर्वलसष्ठ लर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥2॥
ॐ रं रिस्वरूलपण्यै मलहर् सुरमलदा न्यै
ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥3॥
ॐ क्षुं क्षु ध स्वरूलपण्यै दे र्वर्वच्छन्दत यै
ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥4॥
ॐ छ ं छ य स्वरूलपण्यै दू तसंर्व लदन्यै
ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥5॥
ॐ शं शच्छिस्वरूलपण्यै धूम्रिोचनघ लतन्यै
ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥6॥
ॐ तृं तृर् स्वरूलपण्यै चण्डमुण्डर्वधक ररण्यै
ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्र श प द् लर्वमुि भर्व॥7॥
ॐ क्ष ं क्ष च्छन्तस्वरूलपण्यै रिबीिर्वधक ररण्यै
ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥8॥
ॐ ि ं ि लतस्वरूलपण्यै लनशुम्भर्वधक ररण्यै
ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥9॥
ॐ िं िज्ज स्वरूलपण्यै शुम्भर्वधक ररण्यै
ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥10॥
ॐ श ं श च्छन्तस्वरूलपण्यै दे र्वस्तुत्यै
ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥11॥
ॐ श्रं श्रद्ध स्वरूलपण्यै सकिफिद त्र्यै
ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥12॥
ॐ क ं क च्छन्तस्वरूलपण्यै र िर्वरप्रद यै
ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥13॥
ॐ म ं म तृस्वरूलपण्यै अनर्ा िमलहमसलहत यै
ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥14॥
ॐ ह्रीं श्रीं दुं दु र् ा यै सं सर्वैश्वयाक ररण्यै
ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥15॥
ॐ ऐं ह्रीं क्ीं नमः लशर्व यै अभे द्यकर्वचस्वरूलपण्यै
ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥16॥
ॐ िीं क ल्यै क लि ह्रीं फट् स्व ह यै ऋग्वेदस्वरूलपण्यै
ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥17॥
ॐ ऐं ह्री क्ीं मह क िीमह िक्ष्मी-
मह सरस्वतीस्वरूलपण्यै लत्रर्ु र् च्छत्मक यै दु र् ा देव्यै नमः॥18॥
इत्येर्वं लह मह मन्त्र न् पलठत्व परमेश्वर।
चण्डीप ठं लदर्व र त्रौ कुय ा देर्व न संशयः॥19॥
एर्वं मन्त्रं न ि न लत चण्डीप ठं करोलत यः।
आत्म नं चैर्व द त रं क्षीर्ं कुय ा न्न संशयः॥20॥
इस प्रक र श पोद्ध र करने के अनन्तर अन्तम ा तृक बलहम ा तृक आलद न्य स करें , लफर श्रीदे र्वी क ध्य न
करके रहस्य में बत ए अनुस र नौ कोष्ठों र्व िे यन्त्र में मह िक्ष्मी आलद क पूिन करें , इसके ब द छ: अंर्ों
सलहत दु र् ा सप्तशती क प ठ आरं भ लकय ि त है ।
कर्वच, अर्ाि , कीिक और तीनों रहस्य- ये ही सप्तशती के छ: अंर् म ने र्ए हैं । इनके िम में भी मतभेद
हैं । लचदम्बरसंलहत में पहिे अर्ाि , लफर कीिक तथ अन्त में कर्वच पढ़ने क लर्वध न है , लकन्तु योर्रत्न र्विी
में प ठ क िम इससे लभन्न है । उसमें कर्वच को बीि, अर्ाि को शच्छि तथ कीिक को कीिक संज्ञ दी
र्ई है ।
लिस प्रक र सब मंत्रों में पहिे बीि क , लफर शच्छि क तथ अन्त में कीिक क उच्च रर् होत है , उसी
प्रक र यह ाँ भी पहिे कर्वच रूप बीि क , लफर अर्ाि रूप शच्छि क तथ अन्त में कीिक रूप कीिक
क िमशः प ठ होन च लहए। यह ाँ इसी िम क अनुसरर् लकय र्य है ।

"कगम्य - दु र्गा - सप्तशवत - चंडीपगठ" हे तु प्रयोर् क्रम
१).मह लर्वद्य िम :- सर्वाक मन हे तु.
?【प्रथम, मध्यम और उत्तर चररत्र.】
२).मह तंत्री िम:- शत्रुन श,िक्ष्मी प्र च्छप्त.
?【उत्तर, प्रथम, मध्यम चररत्र.】
३).चंडी तंत्र िम :- शत्रुन श हे तु.
?【उत्तर, मध्यम, प्रथम चररत्र.】
४).मह चंडी िम :- शत्रुन श,िक्ष्मी प्र च्छप्त.
?【उत्तर, प्रथम, मध्यम चररत्र.】
५).सप्तशती िम :- ज्ञ न और िक्ष्मी प्र च्छप्त.
?【मध्यम, प्रथम , उत्तर चररत्र.】
६).मृतसंिीर्वनी िम :- आरोग्य ि भ हे तु.
?【मध्यम, उत्तर, प्रथम चररत्र.】
७).रूपदीलपक िम :- लर्विय र्व आरोग्य ि भ हे तु (रूपम दे ही ियं दे ही से सं पुलटत).
?【प्रथम, उत्तर, मध्यम चररत्र.】
८).लनकुम्भि :- रक्ष र्व लर्विय हे तु.(शू िेन प ही नो से संपुलटत).
?【मध्यम, प्रथम, उत्तर चररत्र.】
९).योलर्नी िम :- ब िोपद्रर्व श ं न्ती हे तु.
(प्रत्येक चररत्र से पहिे योलर्लनयों क प ठ एर्वम् प्रत्येक मंत्र " शं .र्ं ." से पुलटत.)
?【योलर्नी िम के लिए कोई लर्वशेर् चररत्र िम क उल्लेख मुझे नहीं लमि पर मेरे मत अनुस र
मृतसंिीर्वनी िम िेन ि भप्रद होर् य नी मध्यम, उत्तर, प्रथम चररत्र िम.】
१०).अक्षरसः लर्विोम िम :- सर्वा क मन लसद्धी हे तु.
?【त्रयोदश अध्य य से प्रथम अध्य य तक लर्विोम प ठ.】
? लर्वशेर् ब तें :- ?
?"र्ढ़र्व ि क्षेत्र एर्वम् अन्य संप्रद यों" में प्रत्येक प ठ, प्रत्येक चररत्र य प्रत्येक अध्य य से पहिे "भैरर्व
न म र्विी प ठ" क भी लर्वध न है .
?सप्तशती को ब हर के मन्त्रों से संपुलटत करने के लर्वर्य में लर्वि नों में शंक है , लकन्तु "योलर्नी िम" से यह
स्पष्ट होत है लक अन्य मंत्रों क संपुट भी िर् सकते हैं .
?दु र् ा सप्तशती में दशमह लर्वद्य ओं के मंत्र, र् यत्री मंत्र, मृत्युंिय मंत्र, श्रीमद् भ र्र्वत के मंत्र र्व अन्य मंत्रों
क संपुट भी िर् य ि सकत है .("दु र् ा चानसृलतः,अनु ष्ठ न प्रक शः" में भी इस हे तु लिख है .)
?र र्वर् भी "लनकुम्भि " क उप सक थ और शूिेन प ही नो क संपुट िर् त थ .
?कुछ लर्वि नों के अनुभर्व से म ध्यम,प्रथम,उत्तर चररत्र िम के प ठ से अलधक सफित लमिती है ,क्ोंलक
इससे प ठ क "उत्कीिन" भी हो ि त है .
?दु र् ा स धन तंत्र न मक एक पुस्तक में प्रथम अध्य य में १४६, लितीय में १४० श्लोक है ।
नमस्तस्ये क पूर एक ही मन्त्र है ।
कहीं मलहर् उर्व च, मंत्री उर्व च,शुम्भ उर्व च, लनशुम्भ उर्व च भी है .
?दलक्षर् में ९४० मन्त्रों की दु र् ा सप्तशती भी कहीं कहीं है ,
?नेप ि से प्र प्त संपूर्ा दु र् ा सप्तशती में भी प ठ र्व् श्लोक संख्य में कहीं कहीं भेद है .

?कई ग्रंथों में "अस्त्र मंत्र" य "अंर् मंत्र" िैसे चतुथा अध्य य में "शूिेन प लहनो दे र्वी आलद ४ कर्वच मंत्र है "
इन मंत्रों को "मौन रूप" में पढ़कर नर्व र्ा मंत्र से हर्वन करें .

श्री दु र् ा सप्तशती अनुष्ठ न पू र्ा लर्वलध ।
भुर्वनेश्वरी संलहत में कह र्य है - लिस प्रक र से ”र्वेद” अन लद है , उसी प्रक र ”सप्तशती” भी अन लद है । श्री
व्य स िी ि र रलचत मह पु र र्ों में ”म काण्डे य पुर र्” के म ध्यम से म नर्व म त्र के कल्य र् के लिए इसकी
रचन की र्ई है । लिस प्रक र योर् क सर्वोत्तम ग्रंथ र्ीत है उसी प्रक र ”दु र् ा सप्तशती” शच्छि उप सन क
श्रेष्ठ ग्रंथ है
‘दु र् ा सप्तशती’के स त सौ श्लोकों को तीन भ र्ों प्रथम चररत्र (मह क िी), मध्यम चररत्र (मह िक्ष्मी) तथ
उत्तम चररत्र (मह सरस्वती) में लर्वभ लित लकय र्य है । प्रत्येक चररत्र में स त-स त दे लर्वयों क स्तोत्र में
उल्लेख लमित है प्रथम चररत्र में क िी, त र , लछन्नमस्त , सुमुखी, भुर्वनेश्वरी, ब ि , कुब्ज , लितीय चररत्र
मेंिक्ष्मी, िलित , क िी, दु र् ा , र् यत्री, अरुन्धती, सरस्वती तथ तृतीय चररत्र में ब्र ह्मी, म हे श्वरी, कौम री,
र्वैष्णर्वी,र्व र ही, न रलसंही तथ च मुंड (लशर्व ) इस प्रक र कुि 21 दे लर्वयों के मह त्म्य र्व प्रयोर् इन तीन चररत्रों
में लदए र्ये हैं । नन्द , श कम्भरी, भीम ये तीन सप्तशती प ठ की मह शच्छिय ं तथ दु र् ा , रिदच्छन्तक र्व
भ्र मरी को सप्तशती स्तोत्र क बीि कह र्य है । तं त्र में शच्छि के तीन रूप प्रलतम , यंत्र तथ बीि क्षर म ने
र्ए हैं । शच्छि की स धन हे तु इन तीनों रूपों क पद्धलत अनुस र समन्वय आर्वश्यक म न ि त है ।
सप्तशती के स त सौ श्लोकों को तेरह अध्य यों में ब ं ट र्य है प्रथम चररत्र में केर्वि पहि अध्य य, मध्यम
चररत्र में दू सर , तीसर र्व चौथ अध्य य तथ शेर् सभी अध्य य उत्तम चररत्र में रखे र्ये हैं । प्रथम चररत्र में
मह क िी क बीि क्षर रूप ऊाँ ‘एं है । मध्यम चररत्र (मह िक्ष्मी) क बीि क्षर रूप ‘ही’ तथ तीसरे उत्तम
चररत्र मह सरस्वती क बीि क्षर रूप ‘क्ीं’ है । अन्य त ं लत्रक स धन ओं में ‘ऐं’ मंत्र सरस्वती क , ‘हीं’
मह िक्ष्मी क तथ ‘क्ीं’ मह क िी बीि है । तीनों बीि क्षर ऐं ह्रीं क्ीं लकसी भी तंत्र स धन हे तु आर्वश्यक
तथ आध र म ने र्ये हैं । तंत्र मुखयतः र्वेदों से लिय र्य है ऋग्वेद से श ि तंत्र, यिुर्वेद से शैर्व तंत्र तथ
स मर्वेद से र्वैष्णर्व तंत्र क अलर्वभ ा र्व हुआ है यह तीनों र्वेद तीनों मह शच्छियों के स्वरूप हैं तथ यह तीनों तंत्र
दे लर्वयों के तीनों स्वरूप की अलभव्यच्छि हैं ।
भर्र्वती म ं दु र् ा िी की प्रसन्नत के लिए िो अनुष्ठ न लकये ि ते हैं उनमें दु र् ा सप्तशती क अनुष्ठ न लर्वशेर्
कल्य र्क री म न र्य है । इस अनुष्ठ न को ही शच्छि स धन भी कह ि त है । शच्छि म नर्व के दै नच्छन्दन
व्य र्वह ररक िीर्वन की आपद ओं क लनर्व रर् कर ज्ञ न, बि, लिय शच्छि आलद प्रद न कर उसकी धमा -
अथा क ममूिक इि ओं को पूर्ा करती है एर्वं अंत में आिौलकक परम नंद क अलधक री बन कर उसे
मोक्ष प्रद न करती है । दु र् ा सप्तशती एक त ं लत्रक पु स्तक होने क र्ौरर्व भी प्र प्त करती है । भर्र्वती शच्छि
एक होकर भी िोक कल्य र् के लिए अनेक रूपों को ध रर् करती है । श्वेत ं बर उपलनर्द के अनुस र यही
आद्य शच्छि लत्रशच्छि अथ ा त मह क िी, मह िक्ष्मी एर्वं मह सरस्वती के रूप में प्रकट होती है । इस प्रक र
पर शच्छि लत्रशच्छि, नर्वदु र् ा , दश मह लर्वद्य और ऐसे ही अनंत न मों से परम पूज्य है । श्री दु र् ा सप्तशती
न र यर् र्वत र श्री व्य सिी ि र रलचत मह पुर र्ों में म काण्डे यपुर र् से िी र्यी है । इसम स त सौ पद्यों क
सम र्वेश होने के क रर् इसे सप्तशती क न म लदय र्य है । तंत्र श स्त्रों में इसक सर्व ा लधक महत्व
प्रलतप लदत है और त ं लत्रक प्रलिय ओं क इसके प ठ में बहुध उपयोर् होत आय है । पूरे दु र् ा सप्तशती
में360 शच्छियों क र्वर्ान है । इस पुस्तक में तेरह अध्य य हैं । श स्त्रों के अनुस र शच्छि पूिन के स थ भैरर्व
पूिन भी अलनर्व या म न र्य है । अतः अष्टोत्तरशतन म रूप बटु क भैरर्व की न म र्विी क प ठ भी
दु र् ा सप्तशती के अंर्ों में िोड़ लदय ि त है । इसक प्रयोर् तीन प्रक र से होत है ।
‘दु र् ा सप्तशती’ के स त सौ श्लोकों क प्रयोर् लर्वर्वरर् इस प्रक र से है ।
‘प्रयोर् र् ं तु नर्वलत म रर्े मोहनेऽत्र तु।
उच्च टे सतम्भने र्व लप प्रयोर् र् ं शतियम्॥

मध्यमेऽश चररत्रे स्यगतृतीयेऽथ चररत्र के।

लर्वद्धे र्र्वश्ययोश्च त्र प्रयोर्ररकृते मत ः॥
एर्वं सप्तशत च त्र प्रयोर् ः सं प्त- कीलतात ः॥
तत्म त्सप्तशतीत्मेर्व प्रोकं व्य सेन धीमत ॥
अथ ा त इस सप्तशती में म रर् के नब्बे , मोहन के नब्बे , उच्च टन के दो सौ, स्तंभन के दो सौ तथ र्वशीकरर्
और लर्विे र्र् के स ठ प्रयोर् लदए र्ये हैं । इस प्रक र यह कुि 700 श्लोक 700 प्रयोर्ों के सम न म ने र्ये हैं ।
दु र् ा सप्तशती प ठ लर्वलध
दु र् ा सप्तशती को लसद्ध कैसे करें -
स म न्य लर्वलध :
नर्व र्ा मंत्र िप और सप्तशती न्य स के ब द तेरह अध्य यों क िमशः प ठ, प्र चीन क ि में कीिक, कर्वच
और अर्ाि क प ठ भी सप्तशती के मूि मंत्रों के स थ ही लकय ि त रह है । आि इसमें
अथर्वाशीर्ा ,कुंलिक मंत्र, र्वेदोि र लत्र दे र्वी सूि आलद क प ठ भी सम लहत है लिससे स धक एक घंटे में
दे र्वी प ठ करते हैं ।
र्व क र लर्वलध :
यह लर्वलध अत्यंत सरि म नी र्यी है । इस लर्वलध में प्रथम लदन एक प ठ प्रथम अध्य य, दू सरे लदन दो प ठ
लितीय, तृतीय अध्य य, तीसरे लदन एक प ठ चतुथा अध्य य, चौथे लदन च र प ठ पंचम, र्ष्ठ, सप्तम र्व अष्टम
अध्य य, प ं चर्वें लदन दो अध्य यों क प ठ नर्वम, दशम अध्य य, छठे लदन ग्य रहर्व ं अध्य य, स तर्वें लदन दो
प ठ ि दश एर्वं त्रयोदश अध्य य करके एक आर्वृलत सप्तशती की होती है ।
संपुट प ठ लर्वलध :
लकसी लर्वशेर् प्रयोिन हे तु लर्वशेर् मंत्र से एक ब र ऊपर तथ एक नीचे ब ं धन उद हरर् हे तु संपुट मंत्र
मूिमंत्र-1, संपुट मंत्र लफर मूिमंत्र अंत में पुनः संपुट मंत्र आलद इस लर्वलध में समय अलधक िर्त है ।
स धा नर्वचण्डी लर्वलध :
इस लर्वलध में नौ ब्र ह्मर् स ध रर् लर्वलध ि र प ठ करते हैं । एक ब्र ह्मर् सप्तशती क आध प ठ करत है ।
(लिसक अथा है - एक से च र अध्य य क संपूर्ा प ठ, प ं चर्वे अध्य य में ”दे र्व उचुः- नमो दे व्ये मह दे व्यै”से
आरं भ कर ऋलर्रुर्व च तक, एक दश अध्य य क न र यर् स्तुलत, ब रहर्व ं तथ तेरहर्व ं अध्य य संपूर्ा) इस
आधे प ठ को करने से ही सं पूर्ा क या की पू र्ात म नी ि ती है । एक अन्य ब्र ह्मर् ि र र्डं र् रुद्र ष्ट ध्य यी
क प ठ लकय ि त है । इस प्रक र कुि ग्य रह ब्र ह्मर्ों ि र नर्वचण्डी लर्वलध ि र सप्तशती क प ठ होत
है । प ठ पश्च त् उत्तर ं र् करके अलि स्थ पन कर पूर् ा हुलत दे ते हुए हर्वन लकय ि त है लिसमें नर्वग्रह
सलमध ओं से ग्रहयोर्, सप्तशती के पूर्ा मंत्र, श्री सूि र्व हन तथ लशर्वमंत्र ‘सद् सूि क प्रयोर् होत है
लिसके ब द ब्र ह्मर् भोिन,’ कुम री क भोिन आलद लकय ि त है । र्व र ही तंत्र में कह र्य है लक िो
”स धानर्वचण्डी” प्रयोर् को संपन्न करत है र्वह प्र र्मुि होने तक भयमुि रहत है , र ज्य, श्री र्व संपलत्त
प्र प्त करत है ।
शतचण्डी लर्वलध :
म ं की प्रसन्नत हे तु लकसी भी दु र् ा मंलदर के समीप सुंदर मण्डप र्व हर्वन कुंड स्थ लपत करके (पलश्चम य मध्य
भ र् में) दस उत्तम ब्र ह्मर्ों (योग्य) को बुि कर उन सभी के ि र पृथक-पृथक म काण्डे य पुर र्ोि श्री दु र् ा
सप्तशती क दस ब र प ठ करर्व एं । इसके अि र्व प्रत्येक ब्र ह्मर् से एक-एक हि र नर्व र्ा मंत्र भी करर्व ने
च लहए। शच्छि संप्रद य र्व िे शतचण्डी (108) प ठ लर्वलध हे तु अष्टमी, नर्वमी, चतुदाशी तथ पूलर्ाम क लदन
शुभ म नते हैं । इस अनुष्ठ न लर्वलध में नौ कुम ररयों क पू िन करन च लहए िो दो से दस र्वर्ा तक की होनी
च लहए तथ इन कन्य ओं को िमशः कुम री, लत्रमूलता , कल्य र्ी, रोलहर्ी, क लिक , श म्भर्वी, दु र् ा , चंलडक
तथ मुद्र न म मंत्रों से पूिन च लहए। इस कन्य पूिन में संपूर्ा मनोरथ लसच्छद्ध हे तु ब्र ह्मर् कन्य , यश हे तु
क्षलत्रय कन्य , धन के लिए र्वेश्य तथ पुत्र प्र च्छप्त हे तु शूद्र कन्य क पूिन करें । इन सभी कन्य ओं क
आर्व हन प्रत्येक दे र्वी क न म िेकर यथ ”मैं मंत्र क्षरमयी िक्ष्मीरुलपर्ी, म तृरुपध ररर्ी तथ स क्ष त् नर्व
दु र् ा स्वरूलपर्ी कन्य ओं क आर्व हन करत हं तथ प्रत्येक दे र्वी को नमस्क र करत हं ।” इस प्रक र से
प्र थान करनी च लहए। र्वेदी पर सर्वातोभद्र मण्डि बन कर किश स्थ पन कर पूिन करें । शतचण्डी लर्वलध
अनुष्ठ न में यंत्रस्थ किश, श्री र्र्ेश, नर्वग्रह, म तृ क , र्व स्तु , सप्तऋर्ी, सप्तलचरं िीर्व, 64 योलर्नी 50
क्षेत्रप ि तथ अन्य य दे र्वत ओं क र्वैलदक पूिन होत है । लिसके पश्च त् च र लदनों तक पूि सलहत प ठ
करन च लहए। प ं चर्वें लदन हर्वन होत है ।
इन सब लर्वलधयों (अनुष्ठ नों) के अलतररि प्रलतिोम लर्वलध, कृष्ण लर्वलध, चतुदाशीलर्वलध, अष्टमी
लर्वलध,सहस्त्रचण्डी लर्वलध (1008) प ठ, दद लत लर्वलध, प्रलतर्ृहर् लत लर्वलध आलद अत्यंत र्ोपनीय लर्वलधय ं भी हैं
लिनसे स धक इच्छित र्वस्तु ओं की प्र च्छप्त कर सकत है ।

श्री दु र् ा सप्तशती अनुष्ठ न लर्वलध
भर्र्वती म ं दु र् ा िी की प्रसन्नत के लिए िो अनुष्ठ न लकये ि ते हैं उनमें दु र् ा सप्तशती क अनुष्ठ न लर्वशेर्
कल्य र्क री म न र्य है । इस अनुष्ठ न को ही शच्छि स धन भी कह ि त है । शच्छि म नर्व के दै नच्छन्दन
व्य र्वह ररक िीर्वन की आपद ओं क लनर्व रर् कर ज्ञ न, बि, लिय शच्छि आलद प्रद न कर उसकी धमा -
अथा क ममूिक इि ओं को पूर्ा करती है एर्वं अंत में आिौलकक परम नंद क अलधक री बन कर उसे
मोक्ष प्रद न करती है । दु र् ा सप्तशती एक त ं लत्रक पु स्तक होने क र्ौरर्व भी प्र प्त करती है । भर्र्वती शच्छि
एक होकर भी िोक कल्य र् के लिए अनेक रूपों को ध रर् करती है । श्वेत ं बर उपलनर्द के अनुस र यही
आद्य शच्छि लत्रशच्छि अथ ा त मह क िी, मह िक्ष्मी एर्वं मह सरस्वती के रूप में प्रकट होती है । इस प्रक र
पर शच्छि लत्रशच्छि, नर्वदु र् ा , दश मह लर्वद्य और ऐसे ही अनंत न मों से परम पूज्य है । श्री दु र् ा सप्तशती
न र यर् र्वत र श्री व्य सिी ि र रलचत मह पुर र्ों में म काण्डे यपुर र् से िी र्यी है । इसम स त सौ पद्यों क
सम र्वेश होने के क रर् इसे सप्तशती क न म लदय र्य है । तंत्र श स्त्रों में इसक सर्व ा लधक महत्व
प्रलतप लदत है और त ं लत्रक प्रलिय ओं क इसके प ठ में बहुध उपयोर् होत आय है । पूरे दु र् ा सप्तशती
में360 शच्छियों क र्वर्ान है । इस पुस्तक में तेरह अध्य य हैं । श स्त्रों के अनुस र शच्छि पूिन के स थ भैरर्व
पूिन भी अलनर्व या म न र्य है । अतः अष्टोत्तरशतन म रूप बटु क भैरर्व की न म र्विी क प ठ भी
दु र् ा सप्तशती के अंर्ों में िोड़ लदय ि त है । इसक प्रयोर् तीन प्रक र से होत है ।
[ 1.] नर्व र्ा मंत्र के िप से पहिे भैरर्वो भूतन थश्च से प्रभलर्वष्णुररतीर्वररतक य नमोऽत्त न मबिी य भैरर्विी
के मूि मंत्र क 108 ब र िप।
[ 2.] प्रत्येक चररत्र के आद्य न्त में 1-1 प ठ।
[ 3.] प्रत्येक उर्व चमंत्र के आस-प स संपुट दे कर प ठ। नैर्वेद्य क प्रयोर् अपनी क मन पूलता हे तु दै लनक पूि
में लनत्य लकय ि सकत है । यलद म ं दु र् ा िी की प्रलतम क ं से की हो तो लर्वशेर् फिद लयनी होती है ।
दु र् ा सप्तशती की सही पूिन प्रलिय

दु र् ा सप्तशती म काण्डे य पु र र् क अंश है । इसमें ७०० श्लोक होने के क रर् इसे ‘दु र् ा सप्तशती’ भी कहते
हैं । इसमें सृलष्ट की प्रतीक त्मक व्य ख्य की र्ई है । िर्त की सम्पूर्ा शच्छियों के दो रूप म ने र्ये है –
संलचत और लिय त्मक। नर्वर लत्र के लदनों में इसक प ठ लकय ि त है ।यलद इसक सही तरह उपयोर्
लकय ि य तो समस्त स ं सररक और पर िौलकक उपिच्छिय ाँ प्र प्त की ि सकती है दु र् ा सप्तशती से
क मन पूलता हे तु लनम्नलिच्छखत पूिन प्रलिय अपन इये
– िक्ष्मी, ऐश्वया , धन संबंधी प्रयोर्ों के लिए पीिे रं र् के आसन क प्रयोर् करें ।
– र्वशीकरर्, उच्च टन आलद प्रयोर्ों के लिए क िे रं र् के आसन क प्रयोर् करें ।
बि, शच्छि आलद प्रयोर्ों के लिए ि ि रं र् क आसन प्रयोर् करें ।
– स च्छत्वक स धन ओं, प्रयोर्ों के लिए कुश के बने आसन क प्रयोर् करें ।
र्वस्त्र- िक्ष्मी संबंधी प्रयोर्ों में आप पीिे र्वस्त्रों क ही प्रयोर् करें । यलद पीिे र्वस्त्र न हो तो म त्र धोती पहन िें
एर्वं ऊपर श ि िपेट िें। आप च हे तो धोती को केशर के प नी में लभर्ोंकर पीि भी रं र् सकते हैं ।
हर्वन करने से
ि यफि से कीलता और लकशलमश से क या की लसच्छद्ध होती है ।
आं र्विे से सुख और केिे से आभूर्र् की प्र च्छप्त होती है । इस प्रक र फिों से अध्या दे कर यथ लर्वलध हर्वन
करें ।
ख ं ड, घी, र्ेंह, शहद, िौ, लति, लबल्वपत्र, न ररयि, लकशलमश और कदं ब से हर्वन करें ।
र्ेंहं से होम करने से िक्ष्मी की प्र च्छप्त होती है ।
खीर से पररर्व र, र्वृच्छद्ध, चम्प के पुष्ों से धन और सुख की प्र च्छप्त होती है ।
आर्वंिे से कीलता और केिे से पुत्र प्र च्छप्त होती है ।
कमि से र ि सम्म न और लकशलमश से सुख और संपलत्त की प्र च्छप्त होती है ।
ख ं ड, घी, न ररयि, शहद, िौं और लति इनसे तथ फिों से होम करने से मनर्व ं लछत र्वस्तु की प्र च्छप्त होती
है ।
व्रत करने र्व ि मनुष्य इस लर्वध न से होम कर आच या को अत्यंत नम्रत के स थ प्रम र् करें और यज्ञ की
लसच्छद्ध के लिए उसे दलक्षर् दें । इस मह व्रत को पहिे बत ई हुई लर्वलध के
अनुस र िो कोई करत है उसके सब मनोरथ लसद्ध हो ि ते हैं । नर्वर त्र व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ क फि
लमित है ।
नर्व र्ा मंत्र को मंत्रर ि कह र्य है ।
‘ ऐं ह्री ं क्ीं च मुण्ड यै लर्वच्चे ’
शीघ्र लर्वर्व ह के लिए।
क्ीं ऐं ह्री ं च मुण्ड यै लर्वच्चे।
िक्ष्मी प्र च्छप्त के लिए स्फलटक की म ि पर।
ओंम ऐं ही क्ीं च मुण्ड यै लर्वच्चे।
परे श लनयों के अन्त के लिए।
क्ीं हीं ऐं च मुण्ड यै लर्वच्चे।
दु र् ा सप्तशती के अध्य य से क मन पूलता -
1- प्रथम अध्य य- हर प्रक र की लचंत लमट ने के लिए।
2- लितीय अध्य य- मुकदम झर्ड आलद में लर्विय प ने के लिए।
3- तृतीय अध्य य- शत्रु से छु टक र प ने के लिये।
4- चतुथा अध्य य- भच्छि शच्छि तथ दशान के लिये।
5- पंचम अध्य य- भच्छि शच्छि तथ दशान के लिए।
6- र्ष्ठम अध्य य- डर, शक, ब ध हट ने के लिये।
7- सप्तम अध्य य- हर क मन पूर्ा करने के लिये।
8- अष्टम अध्य य- लमि प र्व र्वशीकरर् के लिये ।
9- नर्वम अध्य य- र्ुमशुद की ति श, हर प्रक र की क मन एर्वं पुत्र आलद के लिये।
10- दशम अध्य य- र्ुमशुद की ति श, हर प्रक र की क मन एर्वं पुत्र आलद के लिये।
11- एक दश अध्य य- व्य प र र्व सुख-संपलत्त की प्र च्छप्त के लिये।
12- ि दश अध्य य- म न-सम्म न तथ ि भ प्र च्छप्त के लिये।
13- त्रयोदश अध्य य- भच्छि प्र च्छप्त के लिये।

र्वैलदक आहुलत की स मग्री—
प्रथम अध्य य-एक प न पर दे शी घी में लभर्ोकर 1 कमिर्ट्ट , 1 सुप री, 2 िौंर्, 2 छोटी इि यची, र्ुग्गुि,
शहद यह सब चीिें सुरर्व में रखकर खडे होकर आहुलत दे न ।
लितीय अध्य य-प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र, र्ुग्गुि लर्वशेर्
तृतीय अध्य य- प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र श्लोक सं . 38 शहद
चतुथा अध्य य-प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र, श्लोक सं .1से 11 लमश्री र्व खीर लर्वशेर्,
चतुथा अध्यगय- के मंत्र संख्यग 24 से 27 तक इन 4 मंत्रों की आहुवत नही ं करनग चगवहए। ऐसग करने से
दे ह नगश होतग है। इस कगरर् इन चगर मंत्रों के स्थगन पर ओंम नमः चण्डण्डकगयै
स्वगहग’ बोिकर आहुवत दे नग तथग मंत्रों कग केिि पगठ करनग चगवहए इनकग पगठ करने से सब प्रकगर
कग भय नष्ट हो जगतग है।
पंचम अध्यय य-प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र, श्लोक सं. 9 मंत्र कपूर, पुष्, र्व ऋतुफि ही है ।
र्ष्टम अध्य य-प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र, श्लोक सं . 23 भोिपत्र।
सप्तम अध्य य-प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र श्लोक सं . 10 दो ि यफि श्लोक संख्य 19 में सफेद
चन्दन श्लोक संख्य 27 में इन्द्र िौं।
अष्टम अध्य य- प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र श्लोक संख्य 54 एर्वं 62 ि ि चं दन।
नर्वम अध्य य-प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र, श्लोक संख्य श्लोक संख्य 37 में 1 बेिफि 40 में र्न्न ।
दशम अध्य य-प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र, श्लोक संख्य 5 में समुन्द्र झ र् 31 में कत्थ ।
एक दश अध्य य- प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र, श्लोक संख्य 2 से 23 तक पुष् र्व खीर श्लोक संख्य
29 में लर्िोय 31 में भोि पत्र39 में पीिी सरसों 42 में म खन लमश्री 44 मे अन र र्व अन र क फूि श्लोक
संख्य 49 में प िक श्लोक संख्य 54 एर्वं 55 मे फूि च र्वि और स मग्री।
ि दश अध्य य- प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र, श्लोक संख्य 10 मे नीबू क टकर रोिी िर् कर और
पेठ श्लोक संख्य 13 में क िी लमचा श्लोक संख्य 16 में ब ि-ख ि श्लोक संख्य 18 में कुश श्लोक संख्य
19 में ि यफि और कमि र्ट्ट श्लोक संख्य 20 में ऋीतु फि, फूि, च र्वि और चन्दन श्लोक संख्य 21
पर हिर्व और पुरी श्लोक संख्य 40 पर कमि र्ट्ट , मख ने और ब द म श्लोक संख्य 41पर इत्र, फूि और
च र्वि
त्रयोदश अध्य य-प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र, श्लोक संख्य 27 से 29 तक फि र्व फूि।
स धक ि नक री के अभ र्व में मन मिी के अनुस र आरती उत रत रहत है
स धक ि नक री के अभ र्व में मन मिी के अनुस र आरती उत रत रहत है िबलक दे र्वत ओं के सम्मुख
चौदह ब र आरती उत रने क लर्वध न है - च र ब र चरर्ों पर से दो ब र न लभे पर से, एक ब र मुख पर से ,
स त ब र पूरे शरीर पर से। इस प्रक र चौदह ब र आरती की ि ती है । िह ं तक हो सके लर्वर्म संख्य
अथ ा त 1, 5, 7 बलत्तय ं बन कर ही आरती की ि नी च लहये।
शैिपुत्री स धन - भौलतक एर्वं आध्य च्छत्मक इि पूलता।
ब्रह र् च ररर्ी स धन - लर्विय एर्वं आरोग्य की प्र च्छप्त।
चंद्रघण्ट स धन - प प-त प र्व ब ध ओं से मुच्छि हे तु।
कूष्म ण्ड स धन - आयु, यश, बि र्व ऐश्वया की प्र च्छप्त।
स्कंद स धन - कुंठ , किह एर्वं िे र् से मुच्छि।
क त्य यनी स धन - धमा, क म एर्वं मोक्ष की प्र च्छप्त तथ भय न शक।
क िर लत्र स धन - व्य प र/रोिर् र/सलर्वास संबधी इि पूलता।
मह र्ौरी स धन - मनपसं द िीर्वन स थी र्व शीघ्र लर्वर्व ह के लिए।
लसच्छद्धद त्री स धन - समस्त स धन ओं में लसद्ध र्व मनोरथ पूलता।
लर्वलभनन मनोक मन ओं के लिए दु र् ा सप्तशती के अिर्-अिर् श्लोक मंत्र रूप में प्रयुि होते हैं लिनक
ज्ञ न लकसी योग्य लर्वि न से पूछकर लकय ि सकत है ।
स्कंद स धन - कुंठ , किह एर्वं िे र् से मुच्छि।
क त्य यनी स धन - धमा, क म एर्वं मोक्ष की प्र च्छप्त तथ भय न शक।
क िर लत्र स धन - व्य प र/रोिर् र/सलर्वास संबधी इि पूलता।
मह र्ौरी स धन - मनपसं द िीर्वन स थी र्व शीघ्र लर्वर्व ह के लिए।
लसच्छद्धद त्री स धन - समस्त स धन ओं में लसद्ध र्व मनोरथ पूलता।

श्री दु र्गा सप्तशवत बीजमंत्रगत्मक सगिनग SHRI DURGA
SAPTSHATI BIJ MANTARA SADHNA
ओम श्री र्र्ेश य नमः।।िय भर्व नी।।
ओम ह्रुं िुं सः लसद्ध र्ुरूर्वे नमः
ओम दु र्े दु र्े रक्षीर्ी ठः ठः स्व हः
लसद्धकुलिक स्तोत्रम
ओम ऐं ह्री ं क्ीं च मण्ड यै लर्वच्चे | ओम ग्ौं हुं क्ीं िूं सः
ज्व िय ज्व िय ज्वि ज्वि प्रज्वि प्रज्वि
ऐं ह्री ं क्ीं च मुण्ड यै लर्वच्चै
ज्वि हं सं िं क्षं फट् स्व ह ||
नमस्ते रुद्ररूलपण्यै नमस्ते मधुमदीलन | नमः कैटभह ररण्यै नमस्ते मलहर् दीलन ||
नमस्ते शुम्भहन्त्र्त्र्यै च लनशुम्भसुरघ लतलन | ि ग्रतं लह मह दे लर्व िपं लसद्धं कुरुष्व मे ||
ऐंक री सृष्टीरूप यै ह्रींक री प्रलतप लिक | क्ींक री क मरूलपण्यै बीिरूपे नमोस्तु ते ||
च मुण्ड चण्डघ ती च यैक री र्वरद लयनी | लर्वच्चे च भयद लनत्यं नमस्ते मन्त्ररूलपलर् ||
ध ं धीं धूं धूिाटेः पत्नी र्व ं र्वी ं र्वूं र्व र्धीश्वरी | ि ं िीं िूं क लिक दे लर्व श ं शीं शूं मे शुंभ कुरू ||
हुं हुं हुं हुं क ररूलपण्यै िं िं िं िम्भन लदनी | भ्र ं भ्री ं भ्रूं भैरर्वी भद्रै भर्व न्यै ते नमो नमः ||
अं कं चं टं तं पं यं शं र्वी ं दुं ऐं र्वी ं हं क्षं | लधि ग्रं लधि ग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्व ह ||
प ं पीं पूं प र्वाती पूर् ा ख ं खीं खूं खेचरी तथ | स ं सीं सूं सप्तशती दे व्य मन्त्रलसच्छद्धं कुरुष्व मे ||
ओम नमश्चच्छण्डक यैः|ओम श्री दु र् ा पार्मस्तु ||

प्रथमचररत्र
ओम अस्य श्री प्रथमचररत्रस्य ब्रह्म रूलर्ः मह क िी दे र्वत र् यत्री छन्दः नन्द शच्छिः रिदच्छन्तक बीिम्
अलिस्तत्त्वम् रूग्वेद स्वरूपम् श्रीमह क िी प्रीत्यथे प्रथमचररत्र िपे लर्वलनयोर्ः|
(१) श्री ं ह्री ं क्ीं श्रीं प्रीं ह्र ं ह्रीं सौं प्रें म्रें ल्हह्रीं म्ीं स्त्रीं ि ं स््ीं िीं च ं भें िीं र्वैं ह्रौं युं िुं हं शं रौं यं लर्वं र्वैं चें ह्री ं िं
सं कं श्री ं त्रों स्त्र ं ज्यैं रौं द्र ं द्रों ह्र ं द्रूं श ं म्रीं श्रौं िूं ल्हह्रूं श्रूं प्रीं रं र्वं व्री ं ब्ूं स्त्रौं ब् ं िूं स ं रौं हसौं िूं शौं श्रौं र्वं त्रूं
िौं क्ूं क्ीं श्रीं व्ूं ठ ं ठ्ीं स्त्र ं स्ूं िैं च् ं फ् ं िीं िूं स्ूं नों स्त्रीं प्रूं स्त्रूं ज् ं र्वौं ओं श्रौं रीं रू ं क्ीं दुं ह्रीं र्ूं ि ं ह्र ं
र्ं ऐं श्रौं िूं डें श्रौं छ् ं क्ीं
|ओम श्री दु र् ा पार्मस्तु |

मध्यमचररत्र
ओम अस्य श्री मध्यमचररत्रस्य लर्वष्णुरू ा लर्ः मह िक्ष्मीदे र्वत उच्छष्णक छन्दः श कम्भरी शच्छिः दु र् ा बीिम्
र्व युस्तत्त्वम् यिुर्वेदः स्वरूपम् श्रीमह िक्ष्मी प्रीत्यथे मध्यमचररत्र िपे लर्वलनयोर्ः
(२) श्रौं श्री ं ह्सूं हौं ह्रीं अं क्ीं च ं मुं ड ं यैं लर्वं च्चें ईं सौं व्र ं त्रौं िूं र्वं ह्र ं िीं सौं यं ऐं मूं सः हं सं सों शं हं ह्रौं म्ीं यूं
त्रूं स्त्रीं आं प्रें शं ह्र ं स्मूं ऊं र्ूं व्र्यूं ह्रूं भैं ह्र ं िूं मूं ल्हह्रीं श्र ं द्रूं द्व्ूं ह्सौं ि ं स्हौं म्ूं श्रीं र्ैं िूं त्रीं क्षफीं क्ीं फ्ों ह्री ं श ं
क्षम्रीं रों डु ं •
|ओम श्री दु र् ा पार्मस्तु |
(३) श्रौं क्ीं स ं त्रों प्रूं ग्ौं िौं व्री ं स्ीं ह्रीं हौं श्र ं ग्रीं िूं िीं य ं द् िूं द्रूं क्षं ह्रीं िौं क्षम््ी ं र्व ं श्रूं ग्ूं ि्ी ं प्रें हं ह्रौं दें नूं
आं फ् ं प्रीं दं फ्ीं ह्रीं र्ूं श्रौं स ं श्रीं िुं हं सं
|ओम श्री दु र् ा पार्मस्तु |
(४) श्रौं सौं दीं प्रें य ं रू ं भं सूं श्र ं औं िूं डूं िूं धूं त्रें ्ीं श्रीं ईं ह्र ं ल्हह्रूं क्ूं ि ं िूं फ्ें िीं म्ूं घ्रें श्रौं ह्रौं व्री ं ह्रीं त्रौं हिौं
र्ीं यूं ्ीं ल्हहं श्रौं ओं अं म्ौं प्रीं
|ओम श्री दु र् ा पार्मस्तु |

उत्तमचररत्र
ओम अस्य श्री उत्तरचररत्रस्य रुद्र रूलर्ः मह सरस्वती दे र्वत अनुष्टु प् छन्दः भीम शच्छिः भ्र मरी बीिम
सूयास्तत्त्वम स मर्वेदः स्वरूपम श्री मह सरस्वती प्रीत्यथे उत्तरचररत्र िपे लर्वलनयोर्ः
(५) श्रौं प्रीं ओं ह्रीं ि्ी ं त्रों िीं ह्ौं ह्रीं श्रीं हं क्ीं रौं स्त्रीं म्ीं प्ूं ह्सौं स्त्रीं ग्ूं व्री ं सौः िूं ल्लूं द्र ं क् ं क्षम्रीं ग्ौं स्कं
त्रूं स्क्ूं िौं ि्ीं म्ूं क्ूं श ं ्ीं स्त्रूं ल्लीं िीं सं िूं हस्त्रूं श्रूं िूं हस््ी ं स्कीं क् ं श्रूं हं ह्ीं क्स्त्ूं द्रौं क्ूं र् ं सं ल्हस्त्र ं
फ्ीं स् ं ल्लूं फ्ें ओं स्म्ीं ह्र ं ऊं ल्हहं हं नं स्त्र ं र्वं मं म्कक्ीं श ं िं भैं ल्लूं हौं ईं चें क््ी ं ल्हह्रीं क्षम््ी ं पूं श्रौं ह्रौं भ्रूं क्स्त्ीं
आं िूं त्रूं डूं ि ं ल्हह्रूं फ्ौं िौं लकं ग्ूं छ्ंक्ीं रं क्ैं स्हुं श्रौं श्रीं ओं िूं ल्हहं ल्लूं स्क्ीं स्स्त्रौं स्भ्रूं क्ष्मक्ीं व्री ं सीं भूं ि ं
श्रौं स्हैं ह्री ं श्री ं फ्ें रू
ं िरं ल्हहं कं द्रें श्रीं स ं ह्रौं ऐं स्कीं
|ओम श्री दु र् ा पार्मस्तु |
(६) श्रौं ओं त्रूं ह्रौं िौं श्रौं त्रीं क्ीं प्रीं ह्रीं ह्रौं श्रौं अरैं अरौं श्रीं ि ं हं छ् ं क्ष्मक््ी ं ल्लुं सौः ह्ौं िूं सौं
|ओम श्री दु र् ा पार्मस्तु |
(७) श्रौं कुं ्ीं ह्रं मूं त्रौं ह्रौं ओं ह्सूं क्ूं िें नें िूं ह्स्ीं प्ूं श ं स्ूं प्ीं प्रें अं औं म््ी ं श्र ं सौं श्रौं प्रीं हस्व्री ं
|ओम श्री दु र् ा पार्मस्तु |
(८) श्रौं म्ि्ी ं प्रूं एं िों ईं एं ि्ी ं फ्ौं म्ूं नों हं फ्ौं ग्ौं स्मौं सौं स्हों श्रीं ख्सें क्षम्ीं ल्ीं ह्रौं र्वी ं िूं व्ीं त्स्त्ों ब्रूं श्कक्ीं
श्रूं ह्री ं शीं क्ीं फ्ूं क्ौं ह्रूं क्ूं तीं म्ूं हं स्ूं औं ्ौं श्ल्ी ं य ं थिीं ्ीं ग्ौं ह्रौं प्र ं िीं क्ीं न्त्र्स्ुं हीं ह्ौं ह्रैं भ्रं सौं श्री ं
प्ूं द्रौं स्स्त्र ं ह्स्ीं स्ल्ल्ी ं
|ओम श्री दु र् ा पार्मस्तु |
(९) रौं क्ीं म्ौं श्रौं ग्ीं ह्रौं ह्सौं ईं ब्रूं श्र ं िूं आं श्रीं िौं प्रूं क्ीं भ्रूं ह्रौं िीं म्ीं ग्ौं ह्सूं प्ीं ह्रौं ह्स्त्र ं स्हौं ल्लूं
क्स्तिीं श्री ं स्तूं च्ें र्वी ं क्षिूं श्लूं िूं ि ं स्क्षिीं भ्रूं ह्रौं ि ं फ्ूं
|ओम श्री दु र् ा पार्मस्तु |
(१०) श्रौं ह्री ं ब्ूं ह्रीं म्ूं ह्रं ह्रीं ग्ीं श्रौं धूं हुं द्रौं श्रीं त्रों व्रूं फ्ें ह्र ं िुं सौः स्ौं प्रें हस्व ं प्रीं फ् ं िीं श्रीं ि ं सः क्ीं व्रें इं
ज्सस्हि्ी ं
|ओम श्री दु र् ा पार्मस्तु |
(११) श्रौं िूं श्रीं ल्लीं प्रें सौः स्हौं श्रूं क्ीं स्क्ीं प्रीं ग्ौं ह्स्ह्रीं स्तौं िीं म्ीं स्तूं ज्सस्ह्रीं फ्ूं िूं ह्रौं ल्लूं क्षम्रीं श्रूं ईं िुं त्रैं द्रूं
ह्रौं क्ीं सूं हौं श्कव्रं ब्रूं स्फ्ूं ह्रीं िं ह्सौं सें ह्रीं ्ीं लर्वं प्ीं क्षम्कक्ीं त्स्त् ं प्रं म्ीं स्त्रूं क्ष्म ं स्तूं स्ह्रीं थप्रीं िौं श्र ं म्ीं
|ओम श्री दु र् ा पार्मस्तु |
(१२) ह्री ं ओं श्रीं ईं क्ीं िूं श्रूं प्र ं स्क्ूं लदं फ्ें हं सः चें सूं प्रीं ब्ूं आं औं ह्रीं िीं द्र ं श्रीं स्ीं क्ीं स्ूं ह्रीं व्ीं ओं त्त्ों
श्रौं ऐं प्रें द्रूं क्ूं औं सूं चें ह्रूं प्ीं क्षी ं
|ओम श्री दु र् ा पार्मस्तु |
(१३) श्रौं व्री ं ओं औं ह्र ं श्रीं श्र ं ओं प्ीं सौं ह्रीं िीं ल्लूं ह्रीं क्ीं प्ीं श्रीं ल्लीं श्रूं ह्रूं ह्रीं त्रूं ऊं सूं प्रीं श्रीं ह्ौं आं ओं ह्री ं
|ओम श्री दु र् ा पार्मस्तु |

दु र् ा दु र्ालता शमनी दु र् ा पलिलनर्व ररर्ी | दु र्ामिे लदनी दु र्ास लधनी दु र्ान लशनी ||
दु र्ातोद्ध ररर्ी दु र्ालनहन्त्री दु र्ाम पह | दु र्ामग्य नद दु र्ादैत्यिोकदर्व नि ||
दु र्ाम दु र्ाम िोक दु र्ाम त्मस्वरूलपर्ी | दु र्ाम र्ाप्रद दु र्ामलर्वद्य दु र्ाम लश्रत ||
दु र्ामग्य नसंस्थ न दु र्ामध्य नभ लसनी | दु र्ामोह दु र्ामर् दु र्ाम थास्वरूलपर्ी ||
दु र्ाम सुरसंहन्त्री दु र्ाम युधध ररर्ी | दु र्ाम ाँ र्ी दु र्ामत दु र्ाम्य दु र्ामेश्वरी ||
दु र्ाभीम दु र्ाभ म दु र्ाभ दु र्ाद ररर्ी ||
|ओम नमश्चच्छण्डक यै ||ओम श्री दु र् ा पार्मस्तु |....

चण्डी हर्वन लर्वलध
चण्डी हिन वकसी भी वदन ि वकसी भी समय संपन्न हो सकतग है । हिन कुण्ड कग पंचभूत संस्कगर करें ।
सिाप्रथम कुश के अग्रभगर् से िेदी को सगफ करें । कुण्ड कग िेपन करें र्ोबर जि आवद से। तृतीय वक्रयग में िेदी के
मध्य बगएं से तीन रे खगएं दविर् से उत्तर की ओर पृथक-पृथक खड़ी खी ंचें, चतुथा में तीनों रे खगओं से यथगक्रम
अनगवमकग ि अंर्ूठे से कुछ वमट्टी हिन कुण्ड से बगहर फेंकें। पंचम संस्कगर में दगवहने हगथ से शुद्ध जि िेदी में
वछड़कें। पंचभूत संस्कगर से आर्े की वक्रयग में अवि प्रज्ववित करके अविदे ि कग पूजन करें ।
इन मंत्रों से शुद्ध घी की आहुवत दें : -

ॐ प्रजगपतये स्वगहग। इदं प्रजगपतये न मम।
ॐ इन्द्रगय स्वगहग। इदं इन्द्रगय न मम।
ॐ अिये स्वगहग। इदं अिये न मम।
ॐ सोमगय स्वगहग। इदं सोमगय न मम।
ॐ भूः स्वगहग। इदं अिेय न मम।
ॐ भुिः स्वगहग। इदं िगयिे न मम।
ॐ स्वः स्वगहग। इदं सूयगाय न मम।
ॐ ब्रह्मर्े स्वगहग। इदं ब्रह्मर्े न मम।
ॐ विष्णिे स्वगहग। इदं विष्णिे न मम।
ॐ वश्रयै स्वगहग। इदं वश्रयै न मम।
ॐ षोडश मगतृभ्यो स्वगहग। इदं मगतृ भ्यः न मम॥

निग्रह के नगम यग मंत्र से आहुवत दें ।
र्र्ेशजी की आहुवत दें ।
सप्तशती यग निगार् मंत्र से जप करें ।
सप्तशती में प्रत्येक मंत्र के पश्चगत स्वगहग कग उच्चगरर् करके आहुवत दें ।
प्रथम से अंत अध्यगय के अंत में पुष्प, सुपगरी, पगन, कमि र्ट्टग, ि ंर् 2 नर्, छोटी इिगयची 2 नर्, र्ूर्ि ि शहद की
आहुवत दें तथग पगंच बगर घी की आहुवत दें । यह सब अध्यगय के अंत की सगमगन्य विवि है ।

तीसरे अध्यगय में र्जा-र्जा िर्ं में शहद से आहुवत दें ।
आठिें अध्यगय में मुखेन कगिी इस श्लोक पर रक्त चंदन की आहुवत दें ।
पूरे ग्यगरहिें अध्यगय की आहुवत खीर से दें ।
इस अध्यगय से सिगाबगिग प्रशमनम् में कगिीवमचा से आहुवत दें ।
निगार् मंत्र से 108 आहुवत दें ।

नर्वर लत्र पर लदव्य चंडी हर्वन (Navratri pe Devi chandi hawan)

सर्वा प्रथम कुश के अग्रभ र् से र्वेदी को स फ करें । िि से कुंड क िे पन करें । तृ तीय लिय में र्वे दी के मध्य ब एं से
तीन रे ख एं दलक्षर् से उत्तर की ओर पृथक-पृथक खड़ी खींचें, चतुथा में तीनों रे ख ओं से यथ िम अन लमक र्व अंर्ूठे से
कुछ लमटटी हर्वन कुण्ड से ब हर फेंकें। पंचम संस्क र में द लहने ह थ से शु द्ध िि र्वेदी में लछड़कें। पंचभूत संस्क र से
आर्े की लिय में अलि प्रज्वलित करके अलिदे र्व क पूिन करें ।

इन मंत्रों से शु द्ध घी की आहुलत दें :—

ॐ प्रि पतये स्व ह । इदं प्रि पतये न मम।
ॐ इन्द्र य स्व ह । इदं इन्द्र य न मम।
ॐ अिये स्व ह । इदं अिये न मम।
ॐ सोम य स्व ह । इदं सोम य न मम।
ॐ भूः स्व ह । इदं अिेय न मम।
ॐ भुर्वः स्व ह । इदं र्व यर्वे न मम।
ॐ ब्रह्मर्े स्व ह । इदं ब्रह्मर्े न मम।
ॐ लर्वष्णर्वे स्व ह । इदं लर्वष्णर्वे न मम।
ॐ लश्रयै स्व ह । इदं लश्रयै न मम।
ॐ र्ोडश म तृभ्यो स्व ह । इदं म तृभ्यः न मम॥

नर्वग्र के मंत्र से आहुलत दें ।

ऊाँ ह् ं ह्ीं ह्ौं सः सूय ाय नमः।।
ऊाँ श्र ं श्रीं श्रौं सः चन्द्र य नमः।।
ऊाँ ि ं िीं िौं सः भौम य नमः।।
ऊाँ ब्र ं ब्रीं ब्रौं सः बु ध य नमः।।
ऊाँ ग्र ं ग्रीं ग्रौं सः र्ु रूर्वे नमः।।
ऊाँ द्र ं द्र ं द्रौं सः शुि य नमः।।
ऊाँ प्र ं प्रीं प्रौं सः शनैश्चर य नमः।।
ऊाँ भ्र ं भीं भौं सः र हर्वे नमः।।
ऊाँ स् ं स्ीं स्ौं सः केतर्वे नमः।।

र्र्ेशिी की आहुलत दें । सप्तशती के आरं लभक मंत्र क िप करें । सप्तशती में प्रत्ये क मंत्र के पश्च त स्व ह क उच्च रर्
करके आहुलत दें । प्रथम से अंत अध्य य के अंत में पुष्, सुप री, प न, कमि र्ट्ट , िौंर् 2 नर्ए छोटी इि यची 2 नर्,
र्ू र्ि र्व शहद की आहुलत दें तथ प ंच ब र घी की आहुलत दें ।

तीसरे अध्य य के इस र्िा -र्िा क्षर्ं मंत्र में शहद से आहुलत दें ।

र्िा र्िा क्षर्ं मूढ मधु य र्वच्छत्पब म्यहम् ।
मय त्वलय हतेऽत्रैर्व र्लिा ष्यन्त्य शु दे र्वत ः ।। ३८।।

भ र्वअथा— ओ मूढ़! मैं िबतक मधु पीती हाँ , तबतक तू क्षर्भरके लिये खूब र्िा िे। मेरे ह थ से यहीं ते री मृत्यु हो ि नेपर
अब शीघ्र ही दे र्वत भी र्िा न करें र्े ।। ३८।।

आठर्वें अध्य य में मुखेन क िी श्लोक पर रि चंदन की आहुलत दें

पूरे ग्य रहर्वें अध्य य की आहुलत खीर से दें ।

।। अथ एक दशोऽध्य यः ।।

धऽय नम्
ॐ ब िरलर्वद् यु लतलमन्त्र्दुलकररट ं तु ङ्गकुच नयनत्रययु ि म्।
स्मेरमुखीं र्वरद ङ् कुशप श भीलतकर ं प्रभिे भुर्वनेशीम्।।

‘ॐ’ ऋलर्रुर्व च ।। १।।

दे व्य हते तत्र मह सुरेन्द्रे
सेन्द्र ः सुर र्वलह्पुरोर्म स्त म् ।
क त्य यनीं तुष्टु र्वुररष्टि भ -
लिक लसर्वक्त्र ब्जलर्वक लशत श ः ।। २।।

दे लर्व प्रपन्न लता हरे प्रसीद
प्रसीद म तिार्तोऽच्छखिस्य ।
प्रसीद लर्वश्वेश्वरर प लह लर्वश्वं
त्वमीश्वरी दे लर्व चर चरस्य ।। ३।।

आध रभूत िर्तस्त्वमेक
महीस्वरूपेर् यतः च्छस्थत लस ।
अप ं स्वरूपच्छस्थतय त्वयैत-
द प्य यते कुत्स्नमिङ्घयर्वीये ।। ४।।

त्वं र्वै ष्णर्वीशच्छिरनन्तर्वीय ा
लर्वश्वस्य बीिं परम लस म य ।
सम्मोलहतं दे लर्व समस्तमेत-
त्वं र्वै प्रसन्न भुलर्व मुच्छिहे तुः ।। ५।।

लर्वद्य ः समस्त स्तर्व दे लर्व भेद ः
च्छस्त्रयः समस्त ः सकि िर्त्सु ।
त्वयै कय पूररतमम्बयै तत्
क ते स्तु लतः स्तव्यपर परोच्छिः ।। ६।।

सर्वा भूत यद दे र्वी भुच्छिमुच्छिप्रद लयनी ।
त्वं स्तु त स्तु तये क र्व भर्वन्तु परमोियः ।। ७।।

सर्वा स्य बु च्छद्धरूपेर् िनस्य हलद संच्छस्थते ।
स्वर् ा पर्वर्ादे दे लर्व न र यलर् नमोऽस्तु ते ।। ८।।

कि क ष्ठ लदरूपेर् पररर् मप्रद लयलन ।
लर्वश्वस्योपरतौ शिे न र यलर् नमोऽस्तु ते ।। ९।।

सर्वा मङ्गिम ङ्गल्ये लशर्वे सर्व ा थस ा लधके ।
शरण्ये त्र्यम्बके र्ौरर न र यलर् नमोऽस्तु ते ।। १०।।

सृलष्टच्छस्थलतलर्वन श न ं शच्छिभूते सन तलन ।
र्ु र् श्रये र्ु र्मये न र यलर् नमोऽस्तु ते ।। ११।।

शरर् र्तदीन तापररत्र र्पर यर्े ।
सर्वा स्य लता हरे दे लर्व न र यलर् नमोऽस्तु ते ।। १२।।

हं सयु िलर्वम नस्थे ब्रह्म र्ीरूपध ररलर् ।
कौश म्भःक्षररके दे लर्व न र यलर् नमोऽस्तु ते ।। १३।।

लत्रशू िचन्द्र लहधरे मह र्वृ र्भर्व लहलन ।
म हे श्वरीस्वरूपेर् न र यलर् नमोऽस्तु ते ।। १४।।
मयू रकुक्कुटर्वृ ते मह शच्छिधरे ऽनघे ।
कौम रीरूपसंस्थ ने न र यलर् नमोऽस्तु ते ।। १५।।

शङ् खचिर्द श ङ्गार्ृ हीतपरम यु धे ।
प्रसीद र्वै ष्णर्वीरूपे न र यलर् नमोऽस्तु ते ।। १६।।

र्ृ हीतोग्रमह चिे दं ष्ट्ोद् धृ तर्वसुन्धरे ।
र्वर हरूलपलर् लशर्वे न र यलर् नमोऽस्तु ते ।। १७।।

नृलसंहरूपेर्ोग्रे र् हन्तुं दै त्य न् कृतोद्यमे ।
त्रै िोक्त्र र्सलहते न र यलर् नमोऽस्तु ते ।। १८।।

लकरीलटलन मह र्वज् सहस्नयनोज्ज्विे ।
र्वृ त्रप्र र्हरे चै च्छन्द्र न र यलर् नमोऽस्तु ते ।। १९।।

लशर्वदू तीस्वरूपेर् हतदै त्यमह बिे ।
घोररूपे मह र र्वे न र यलर् नमोऽस्तु ते ।। २०।।

दं ष्ट् कर िर्वदने लशरोम ि लर्वभूर्र्े ।
च मुण्डे मुण्डमथने न र यलर् नमोऽस्तु ते ।। २१।।

िच्छक्ष्म िज्जे मह लर्वद्ये श्रद्धे पुलष्ट स्वधे ध्रुर्वे ।
मह र लत्र मह ऽलर्वद्ये न र यलर् नमोऽस्तु ते ।। २२।।

मेधे सरस्वलत र्वरे भूलत ब भ्रलर्व त मलस ।
लनयते त्वं प्रसीदे शे न र यलर् नमोऽस्तुते ।। २३।।

सर्वा स्वरूपे सर्वेशे सर्वे शच्छिसमच्छन्वते ।
भयेभ्यस्त्र लह नो दे लर्व दु र्े दे लर्व नमोऽस्तु ते ।। २४।।

एतत्ते र्वदनं सौम्यं िोचनत्रयभूलर्तम् ।
प तु नः सर्वा भीलतभ्यः क त्य यलन नमोऽस्तु ते ।। २५।।

ज्व ि कर िमत्यु ग्रमशे र् सुरसूदनम् ।
लत्रशू िं प तु नो भीतेभाद्रक लि नमोऽस्तु ते ।। २६।।

लहनच्छस्त दै त्यते ि ंलस स्वनेन पूया य िर्त् ।
स घण्ट प तु नो दे लर्व प पेभ्यो नः सुत लनर्व ।। २७।।

असुर मृग्वस पङ्कचलचं तस्ते करोज्ज्विः ।
शु भ य खड् र्ो भर्वतु चच्छण्डके त्व ं नत र्वयम् ।। २८।।

रोर् नशे र् नपहंलस तु ष्ट
रुष्ट तु क म न् सकि नभीष्ट न् ।
त्व म लश्रत न ं न लर्वपन्नर र् ं
त्व म लश्रत ह्य श्रयत ं प्रय च्छन्त ।। २९।।

एतत्कृतं यत्कदनं त्वय द्य
धमालिर् ं दे लर्व मह सुर र् म् ।
रूपैरनेकैबा हुध त्ममूलताम्
कृत्व च्छम्बके तत्प्रकरोलत क न्य ।। ३०।।

लर्वद्य सु श स्त्रेर्ु लर्वर्वेकदीपे-
ष्व द्ये र्ु र्व क्ेर्ु च क त्वदन्य ।
ममत्वर्तेऽलतमह न्धक रे
लर्वभ्र मयत्ये तदतीर्व लर्वश्वम् ।। ३१।।

रक्ष ं लस यत्रोग्रलर्वर् श्च न र्
यत्र रयो दस्युबि लन यत्र ।
द र्व निो यत्र तथ च्छिमद्ये
तत्र च्छस्थत त्वं पररप लस लर्वश्वम् ।। ३२।।

लर्वश्वेश्वरर त्वं पररप लस लर्वश्वं
लर्वश्व च्छत्मक ध रयसीलत लर्वश्वम् ।
लर्वश्वेशर्वन्त्र्द्य भर्वती भर्वच्छन्त
लर्वश्व श्रय ये त्वलय भच्छिनम्र ः ।। ३३।।

दे लर्व प्रसीद पररप िय नोऽरर-
भीते लनात्यं यथ सुरर्वध दधु नैर्व सद्यः ।
प प लन सर्वा िर्त ं प्रशमं नय शु
उत्प तप किलनत ं श्च महोपसर् ान् ।। ३४।।

प्रर्त न ं प्रसीद त्वं दे लर्व लर्वश्व लताह ररलर् ।
त्रै िोक्र्व लसन मीड्ये िोक न ं र्वरद भर्व ।। ३५।।

दे व्युर्व च ।। ३६।।

र्वरद हं सुरर्र् र्वरं यन्मनसेिथ ।
तं र्वृ र्ुध्वं प्रयि लम िर्त मुपक रकम् ।। ३७।।

दे र्व ऊचुः ।। ३८।।

सर्व ा ब ध प्रशमनं त्रै िोक्स्य च्छखिे श्वरर ।
एर्वमेर्व त्वय क या मस्मिै ररलर्वन शनम् ।। ३९।।

दे व्युर्व च ।। ४०।।

र्वै र्वस्वते ऽन्तरे प्र प्ते अष्ट लर्वंशलतमे यु र्े ।
शु म्भो लनशुम्भश्चैर्व न्य र्वुत्पत्स्येते मह सुरौ ।।४१।।

नन्दर्ोपर्ृहे ि त यशोद र्भासम्भर्व ।
ततस्तौ न शलयष्य लम लर्वन्ध्य चिलनर्व लसनी ।। ४२।।

पुनरप्यलतरौद्रे र् रूपेर् पृलथर्वीतिे ।
अर्वतीया हलनष्य लम र्वैप्रलचत्त ंस्तु द नर्व न् ।। ४३।।
भक्षयन्त्य श्च त नुग्र न् र्वै प्रलचत न् मह सुर न् ।
रि दन्त भलर्वष्यच्छन्त द लडमीकुसुमोपम ः ।। ४४।।

ततो म ं दे र्वत ः स्वर्े मत्यािोके च म नर्व ः ।
स्तु र्वन्तो व्य हररष्यच्छन्त सततं रिदच्छन्तक म् ।। ४५।।

भूयश्च शतर्व लर्ाक् मन र्वृ ष्टय मनम्भलस ।
मुलनलभः संस्तुत भूमौ सम्भलर्वष्य मययोलनि ।। ४६।।

ततः शते न नेत्र र् ं लनरीलक्षष्य लम यन्मुनीन् ।
कीता लयष्यच्छन्त मनुि ः शत क्षीलमलत म ं ततः ।। ४७।।

ततोऽहमच्छखिं िोकम त्मदे हसमुद्भर्वै ः ।
भररष्य लम सुर ः श कैर र्वृ ष्टेः प्र र्ध रकैः ।। ४८।।

श कम्भरीलत लर्वख्य लतं तद य स्य म्यहं भुलर्व ।
तत्रैर्व च र्वलधष्य लम दु र्ाम ख्यं मह सुरम् ।।४९।।

दु र् ादेर्वीलत लर्वख्य तं तन्मे न म भलर्वष्यलत ।
पुनश्च हं यद भीमं रूपं कृत्व लहम चिे ।। ५०।।

रक्ष ं लस क्षयलयष्य लम मुनीन ं त्र र्क रर् त् ।
तद म ं मुनयः सर्वे स्तोष्यन्त्य नम्रमूतायः ।। ५१।।

भीम दे र्वीलत लर्वख्य तं तन्मे न म भलर्वष्यलत ।
यद रुर् ख्यस्त्रैिोक्े मह ब ध ं कररष्यलत ।। ५२।।

तद ऽहं भ्र मरं रूपं कृत्व सङ् खये यर्ट् पदम् ।
त्रै िोक्स्य लहत थ ाय र्वलधष्य लम मह सुरम् ।। ५३।।

भ्र मरीलत च म ं िोक स्तद स्तोष्यच्छन्त सर्वा तः ।
इत्थं यद यद ब ध द नर्वोत्थ भलर्वष्यलत ।। ५४।।

तद तद ऽर्वतीय ा हं कररष्य म्यररसंक्षयम् ।।ॐ।। ५५।।

इलत श्रीम काण्डे यपुर र्े स र्वलर्ाके मन्वन्तरे दे र्वीम ह त्म्ये न र यलर्स्तु लतन ा म एक दशोऽध्य यः ।

सर्व ा ब ध प्रशमनम् मंत्र में क िीलमचा से आहुलत दें । अंत में नर्व ार् मंत्र से 108 हर्वन स मग्री, इि यची और खोपर र्ोि
की आहुलत दें ।
परम र्ोपनीय परमेश्वरी चण्डी क अलत र्ुप्त रहस्य क र्वर्ान
आपिोर् के लिए पहिी ब र परम र्ोपनीय परमेश्वरी चण्डी क अलत र्ु प्त रहस्य क र्वर्ा न करन च हत हाँ िो मुझे र्ु रु कृप
से प्र प्त हुआ है
भर्र्वती दु र् ा के ब रे में हम रे कुछ अर्वर्ा नीय सोच........
भर्र्वती दु र् ा तो लत्रनेत्र हैं ......... इसलिए ये ही शैर्व कुि की परम शच्छि है ........ इनक द लहन नेत्र सू या क , ब य ाँ नेत्र
चन्द्र क और लत्रनेत्र तो अलि क प्रतीक है ........
36 भु र्वनों क लनम ा र् िब पर म्ब ने लकय तब...... इन सभी 36 भु र्वनों की व्यर्वस्थ बन ये रखने हे तु र्वे पर म्ब भर्र्वती
र िर िेश्वरी ने भर्र्वती दु र् ा क स्वरुप ध रर् कर अर्वतररत हुई
परम अद् भु त नर्व र्ा मंत्र स धन
: भर्र्वती के श्री श्री चण्डी स्वरुप क नर्वम आर्वरर् क पुिन लर्वध न अलत र्ोपनीय है ......... क्ोंलक इसमें श्रीचि के िैसे ही
चिों के न म, र्ु र् और मह भीर्र् भै रर्व सलहत श्री चण्डी यं त्रर ि के मध्य लबं दु में लर्वर िती हैं
इस स धन के लिए श्री चण्डी यं त्रर ि य दश मह लर्वद्य यु ि ब्रह्म ं ड श्री यं त्र होन च लहए......
अब पु िन लर्वध न और स धन लर्वध न दे रह हाँ
श्री श्री चण्डी यं त्रर ि में 9 चि होते हैं लिनके न म ये हैं ......... त्रै िोक् मोहन चि, सर्व ा श पररपुरक चि, सर्वा सं क्षोभर्
चि, सर्वा सौभ ग्य द यक चि, सर्व ा था स धक चि, सर्वा रक्ष कर चि, सर्वा रोर्हर चि, सर्वा लसच्छद्धप्रद चि और सर्व ा नन्दमय
चि
पुिन लर्वध न.......

१. ि ि र्वस्त्र ध रर् करके ि ि आसन पर बै ठे और अपन मु ख उत्तर की ओर और यं त्र के स थ दे र्वी की फोटो प टे पर
स्थ लपत करें ....... दे र्वी क मुख पूर्वा लदश की ओर हो........
२. लफर एक ि ि फूि एर्वं अक्षत िेकर र्वं दन करते हुए अलपात करें .......
र्ुं र्ु रुभ्यो नमः l र्ं र्र्े श य नमः l ऊाँ मह क िी मह िक्ष्मी मह सरस्वती दे र्वत भ्यो नमः l
३.लफर र्ु रु स्तु लत करें ........
अखं ड मण्डि क रं व्य प्तं ये न चर चरम् l तत्पदं दलशातं ये न तस्मै श्री र्ु रर्वे नमः l
४. लफर लनम्न मंत्रों से भस्म को िि में घोिकर मस्तक पर िर् ये .......
त्र्यम्बकं यि महे सु र्च्छन्धं पुलष्ट र्वद्धा नम् l उर्व ा रुकलमर्व बन्धन न् मृ त्योमुाक्षीय म मृत त l
लफर र्िे में रुद्र क्ष की म ि र्िे में ध रर् करें
५. लफर लनम्न मंत्रों से आचमन करें ......
ऐं ह्रीं क्ीं आत्मतत्त्वं शोधय लम स्व ह l
ऐं ह्रीं क्ीं लर्वद्य तत्त्वं शोधय लम स्व ह l
ऐं ह्रीं क्ीं लशर्वतत्त्वं शोधय लम स्व ह l
ऐं ह्रीं क्ीं सर्वा तत्त्वं शोधय लम स्व ह l
६. लफर लशख बं धन करें ....... लफर ह थ में िि िेकर ये मंत्र बोिकर िि लर्र दें यं त्र के स मने..........
" अद्येत्य लद मम शेर् दु ररत क्षयपूर्वा कमाभीष्ट फि प्र प्तयथं श्री लत्रशच्छि च मुण्ड प्रीतये स धन ं कररष्ये "
इसके ब द 3 ब र लसर के ऊपर िि लछड़के
७. लफर ब यें प ाँ र्व को ३ ब र पटकते हुए " ऊाँ श्लीं पशु हुं फट् " क र्व चन करें
८. अब िो आपके प स िि क किश है उस पर अपन ह थ रखकर " अमृत म लिन्यै स्व ह " ३ ब र कहें
९. अब पु ि में आने र्व िे फुिों पर िि लछड़कते हुए ये मंत्र बोिें ......
" ऐं ह्रीं क्ीं पुष्केतु र ि हा ते शत य सम्यक् समन्ध य ऐं ह्रीं क्ीं पुष्े पुष्े मह पुष्े सु पुष्े पुष्भू लर्ते पुष्चय र्वकीर्े
हाँ फट् स्व ह "
१०. अब च मु ण्ड क तं त्रोि ध्य न करें ........ य दे लर्व सर्वा भूतेर्ु ......... दु र् ा सप्तशती के पुस्तक र्व िी पुरी स्तु लत
से ........
ध्य न करने के ब द 9 ब र " नमश्चच्छण्डक यै " बोंिे
११. लनम्न मंत्र पढ़ते हुए ि ि पुष् की पंखुलड़य ाँ यं त्र के समीप अलपात करें ........
" ऊाँ ह्रीं क्ीं श्री ं ि ं िी ं चच्छण्डक दे व्यै श प न श नुग्रहं कुरु कुरु स्व ह l ऊाँ
श्री ं क्ीं ह्रीं सप्तशलत चच्छण्डके उत्कीिनं कुरु कुरु स्व ह l ऊाँ ह्रीं ह्रीं र्वं र्वं ऐं ऐं मृत सं िीर्वलन लर्वद्ये मृतमुत्थ प
योत्थ पय िीं ह्री ं ह्री ं र्वं स्व ह l ऊाँ श्री ं श्री ं क्ीं हं ऊाँ ऐं क्षोभय मोहय उत्कीिय उत्कीिय उत्कीिय ठं ठं l "
इसके ब द अब दु र् ा सप्तशती के पुस्तक में लदए हुए पुरे श प लर्वमोचन स्तोत्र क प ठ करें
ये है परम र्ु प्त श प लर्वमोचन लर्वलध
१२. अब इस मंत्रों को पढ़ते हुए यं त्र के द यें , ब यें और ऊपर िमशः िि अलपात करें ........
" ऐं ह्रीं क्ीं भं भद्रक ल्यै नमः ि रस्य दक्ष श ख य ं l ऐं ह्रीं क्ीं भं भै रर्व य नमः ि रस्य र्व म श ख य ं l
ऐं ह्रीं क्ीं िं िंबोदर य नमः ि रस्य ऊध्वा श ख य ं l र्व स्तु पुरुर् य नमः
१३. अब ईश न (उत्तर-पूर्वा ) लदश में कुंकुम से लत्रकोर् बन कर ....... उस पर स ध रर् घी की दीपक स्थ लपत करें ........
इस मंत्र को बोिते हुए दीपक क पुिन करें ....... " ऐं ह्रीं क्ीं रिर्वर्ा ि दश शच्छि सलहत य दीपन थ य नमः "
१४. " ऊाँ ियध्वलन मंत्र म तः स्व ह " बोिते हुए घंट बि ये
१५. अब भै रर्व की मन ध्य न करके प्र थान करें ........
" तीक्षर्दन्त मह क य कल्प न्त दहनोपम l भै रर्व य नमस्तु भ्यं अनुज्ञ ं द तु महा लस "
१६. लफर इस " ऊाँ रक्ष रक्ष हुं फट् " मंत्र से भू लम पर िि लर्र ये ........
लफर आसन के नीचे लत्रकोर् क लनम ा र् करके लत्रकोर् के मध्य िि से " ह्रीं " लिखें......... और लफर "
ऐं ह्रीं क्ीं आध रशक्त्यै नमः " कह कर प्रर् म कर िें ......
अब " र्ं र्र्पतये नमः , सं सरस्वत्यै नमः , दुं दु र् ा यै नमः , क्षं क्षे त्रप ि य नमः " ........ कहकर भी समस्त दे र्वत ओं
को प्रर् म करें ......
अब आसन को स्पशा करते हुए लनम्न मंत्र बोिें..... " ऊाँ पृच्छि त्वय धृ त िोक दे लर्व त्वं लर्वष्णुन धृ त l त्वं च ध रय म ं दे लर्व
पलर्वत्रं कुरु च सनम् "
१७. अब द यें ह थ के तिा नी- अं र्ुठे को लमि कर च रों लदश में घुम यें " ऊाँ नमः सु दाशन य अस्त्र फट् " मंत्र बोिकर.......
१८. अब द यें ह थ में िि, पुष् आलद िेकर सं कल्प करें ........ " ऊाँ तत्सत् अद्य लर्वष्णोः आज्ञय पर्वा तम नस्य भरत खण्डे
अच्छस्मन् प्रदे श न्तर्ा ते अच्छस्मन् पु ण्य स्थ ने शुभ पुण्य लतथौ .....( अपन न म बोिें )........ अहं श्री लत्रशच्छि च मुण्ड यै प्रस द
लसच्छद्धि र मम सर्व ा भीष्ट लसध्यथं श्री सद् र्ु रुदे र्व स लन्नध्ये नर्व र्ा मंत्र स धन हं कररष्ये
ऐस सं कल्प करके िि को यं त्र पर छोड़ दें
१९. अब अपने ब यें तरफ र्ु रुप दु क मंत्र से सं लक्षप्त र्ु रु पुिन करें ........ और द यें तरफ र्र्पलत क पुिन करें
अब र्ु रु मंत्र की २ म ि िप करें और लफर योलन मुद्र को प्रदलशात कर के र्ु रु आलद को प्रर् म करें .......

२०. अब हदय पर दोनों ह थ रखकर लत्रशच्छि म ाँ चण्डी क ध्य न करें इस मंत्र से ......
" ऊाँ शू िं कृप र्ं नृलशरः कप िं दधती ं करै ः l मुण्ड स्त्रर्् मच्छण्डत ध्य ये च मुण्ड ं रि लर्वग्रह म् "
२१. अब हदय पर द य ाँ ह थ रखकर लत्रशच्छि म ाँ चण्डी क हदय में प्र र् प्रलतष्ठ करें इस मंत्र से ......
" ह्रीं आं ह्रीं िों यं रं िं र्वं शं र्ं सं हं ळं क्षं सोहं मम प्र र् ः इह प्र र् ः l
ह्रीं आं ह्रीं िों यं रं िं र्वं शं र्ं सं हं ळं क्षं सोहं हं सः मम िीर्व इह िीर्वः च्छस्थतः l
ह्रीं आं ह्रीं िों यं रं िं र्वं शं र्ं सं हं ळं क्षं सोहं हं सः मम सर्वे च्छन्द्रय लर् इह च्छस्थत लन l "
अब ३ ब र " ह्री ं " से प्र र् य म करें
२२. भू तशुच्छद्ध पुर पढ़े ...... ये स्तोत्र नही ं पुर क पुर परम र्ुप्त मंत्र है ये ........ इससे आपके शरीर के सं मस्त 7 चि
ि लग्रत हो ि ते हैं
" मूि ध र च्छस्थत ं स्वेष्ट दे र्वी रुप ं लर्वसतन्तु लनभ ं लर्वद् यु त प्रभ पुंि भ सु र ं कुण्डलिनीं ध्य त्व , उत्थ य हत्कमिे सं र्त ं सु र्ुम्कर्
र्वत्मान , प्रदीपकलिक क र ं िीर्वकि म द य , ब्रह्मरन्ध्र र्त ं स्मरे त् l
ऊाँ हं सः सोहं इलत मंत्रेर् िीर्व ब्रह्मलर् सं योज्य तत्स्तथ न च्छस्थत भू त लन प्रलर्वि पये त् l ऊाँ भु र्वं ििे प्रलर्वि पय लम
ििं अिौ, अलिं र्व यौ, र्व यु म् आक शे , आक शं अहं क रे , अहं क रं महत्ततत्त्वे ,
महत्ततत्त्वं प्रकृतौ, प्रकृलतं आत्मलन, आत्म नं च शु द्ध सच्छच्चद नन्द रुपोहलमलत भ र्वये त् l ततः प प पुरुर्ं लर्वलचन्त्य, र्व म
न सय यं बीिेन र्ोडश
र्व रम पूया रं बीिेन चतु ःर्लष्ठ र्व रं कुभलयत्व , पुनः यं बीिे न ि लत्रं शद् र्व रं रे चकेन भस्मीभू तं प पपुरुर्ं बलहः लनस्स या ,
पु नः र्ोडशर्व रं र्व यु म पूया तद् भस्म अमृत ध रय प् व्य, िं बीिेन चतु र्लष्ट र्व रं कुंभकेन
घनीकृत्य पुनः ईाँ बीिेन ि लत्रं शद् र्व रं रे चकेन प्र र् द् उत्प द्य कुण्डलिनी शच्छिं, सोहं इलत मं त्रेर्
परम त्मनः सक श द् अमृतमय िीर्वम द य हत्कमिे सम र्त ं , तत्र िीर्वं सं स्थ प्य सु र्ुम्न म र्े र् मूि ध र र्त ं लचन्तये त् "
२३. अब नर्व र्ा मंत्र स धन की न्य स आलद करें र्े
लर्वलनयोर्
" ऊाँ अस्य श्रीनर्व र्ा मंत्रस्य ब्रह्मलर्वष्णु महे श्वर ऋर्यः ........ र् यत्री उच्छष्णक अनुष्टु भः छन्द ं लस ......... मह क िी
मह िक्ष्मी मह सरस्वत्यो दे र्वत ः .......... नन्दि श कम्भरी भीम ः शियः .......... रिदच्छन्तक दु र् ा भ्र मयो
बीि लन.......... ह्री ं कीिकम् ........ अलिर्व यु ः सू य ा ः तत्त्व लन ......... सर्व ा भीष्ट मनोक मन लसद्धथे िपे लर्वलनयोर्ः "
िि लर्र ये
२४. ऋष्य लदन्य सः
" ऊाँ ब्रह्मलर्वष्णु महे श्वर ऋलर्भ्यो नमः लशरलस ........ र् यत्री उच्छष्णक अनुष्टु प् छन्दोभ्यो नमः मुखे......... मह क िी
मह िक्ष्मी मह सरस्वती दे र्वत भ्यो नमः हलद .......... नन्दि श कम्भरी भीम शच्छिभ्यो नमः दलक्षर् स्तने ..........
रिदच्छन्तक दु र् ा भ्र मरी बीिेभ्यो नमः र्व म स्तने .......... ह्रीं कीिक य नमः न भौ........ अलिर्व यु सू या तत्वे भ्यो
नमः हलद......... लर्वलनयोर् य नमः सर्व ं र्े "
२५. करन्य स
" ऊाँ ऐं ह्रीं क्ीं अंर्ुष्ठ भ्य ं नमः ......... ऊाँ ऐं ह्रीं क्ीं तिानीभ्य ं नमः .......... ऊाँ ऐं ह्रीं क्ीं मध्यम भ्य ं नमः
....... ऊाँ ऐं ह्री ं क्ीं अन लमक भ्य ं नमः ......... ऊाँ ऐं ह्रीं क्ीं कलनलष्ठक भ्य ं नमः .........
ऊाँ ऐं ह्रीं क्ीं करतिकर पृष्ठ भ्य ं नमः l "
२६. हदय लद र्डं न्य सः
" ऊाँ ऐं ह्रीं क्ीं हदय य नमः ......... ऊाँ ऐं ह्रीं क्ीं लशरसे स्व ह .......... ऊाँ ऐं ह्रीं क्ीं लशख यै र्वर्ट् .......
ऊाँ ऐं ह्रीं क्ीं कर्वच य हुाँ ......... ऊाँ ऐं ह्री ं क्ीं नेत्रत्रय य र्वौर्ट् ......... ऊाँ ऐं ह्रीं क्ीं अस्त्र य फट् l "
२७. अब इतन करने के ब द पू ि पीठ पर अपने ब यें भ र् में ये मंत्र
" मत्स्य मुद्र प्रदशाय लत्रकोर् र्वृ त चतु रस्त्र त्मकं मण्डिं कृत्व तदु परर किश स्थ पनं कररष्ये "
कहते हुए िि से एक triangle बन कर उस पर एक त ं बे क भर हुआ किश स्थ लपत करें और किश के ऊपर
एक न ररयि रखें .......
लफर ये मंत्र बोिकर अक्षत पुष् किश पर छोड़े ...... " ऐं ह्रीं क्ीं च ं मुण्ड यै लर्वच्चे किशमण्डि य नमः "
२८. लफर किश के िि में सु र्ंलधत द्रव्य तथ र्ं ध पुष् ड िकर प्र थान करें
" किशस्य मुखे लर्वष्णुः कण्ठे रुद्रः सम लश्रतः l मूिे तत्र च्छस्थतो ब्रह्म मध्ये म तृ र्र् ः स्मृत ः ll
कुक्षौ तु स र्र ः सर्वे सप्तिीप र्वसु न्धर l ऋग्वे दोथ यिुर्वेदः स मर्वे दोप्यथर्वा र्ः ll
अंर्ैश्च सलहत ः सर्वे किश म्बु सम लश्रत ः l सर्वे समुद्र ः सररतस्तीथ ा लन च नद ह्रद ः lआय न्तु दे र्वपूि थं दु ररतक्षय क रक ः ll
र्ं र्े च यमुने चैर्व र्ोद र्वरर सरस्वलत l नमादे लसन्धु क र्वे रर ििेच्छस्मन् सलन्नलधं कुरु ll "
लफर ह थ में थोड़ िि िे कर 8 ब र मूिमंत्र ( ऐं ह्रीं क्ीं च मुण्ड यै लर्वच्चे ) बोिकर र्वो िि पु िन स म ग्री पर
लछड़क दें
+9अब तक न्य स ,किश स्थ पन आलद हो र्यी .........
अब आर्े बढ़त हाँ
२९.
र्ोडशोपच र पुिन

सबसे पहिे यं त्र पर लनम्न मंत्र पढ़ते हुए च मु ण्ड क आह्व हन करें और एक आचमनी िि यं त्र पर अपार् करें ............
" ऊाँ शू ि कृप र्ं नृलशरः कप िं दधती ं करै ः l मुण्ड स्त्रर्् मच्छण्डत ध्य ये च मुण्ड ं रि लर्वग्रह म् ll
ऊाँ भू भुार्वः स्वः श्री लत्रशच्छि च मुण्ड यै आह्व हय लम मम यं त्रे स्थ पय लम "
इसके ब द र्ोडशोपच र प्र रं भ करें
३०. अब िो िो बोि ि रह है मंत्र में र्वो यं त्र पर अलपात करते ि यें ........ िो स म ग्री न हो उसके िर्ह पर िि य ि ि
अक्षत अलपात करें
" ऊाँ भू भुार्वः स्वः श्री लत्रशच्छि च मुण्ड यै नमः ........ आर्व हन थे पुष्ं समपाय लम....... आसन थे अक्षत लन
समपाय लम......... प दयोः प द्यं समपाय लम......... हस्तयोः अर्घ्यं समपाय लम......... आचमनीयं समपाय लम......... स्न नीयं
ििं समपाय लम......... सु र्ंलधत तै ल्य स्न नं समपाय लम......... पंच मृत स्न नं समपाय लम......... र्ं धोदक स्न नं
समपाय लम.........
आचमनीयं समपाय लम......... र्वस्त्रोपर्वस्त्रं समपाय लम......... आचमनीयं समपाय लम......... यज्ञोपर्वीतं समपाय लम...
...... चंदनं समपाय लम......... सौभ ग्य सू त्रं समपाय लम......... अक्षत न् समपाय लम......... हररद्र चूर्ं
समपाय लम......... कुंकुमं समपाय लम......... लसन्त्र्दुरं समपाय लम......... लबल्व पत्र लर्
समपाय लम......... पुष्म ि समपाय लम......... धू पं आघ्रय लम.......... दीपं दशाय लम,
नैर्वेद्यं समपाय लम......... ऋतु फिं समपाय लम......... त म्बु िं समपाय लम......... दलक्षर् ं समपाय लम......... आर लत्रा कं
समपाय लम......... प्रदलक्षर् ं समपाय लम......... "

३१. अब लनम्न श्लोको से क्षम प्र थान करें ......
" एर् भक्त्य तर्व लर्वरलचत य मय दे लर्व पुि l स्वीकृत्यैन ं सपलद सकि न् मेपर ध न् क्षमस्व l
अनय पूिय भर्र्वलत श्री लत्रशच्छि च मुण्ड यै प्रीयत म् ll "
िि लर्र दें
३२. अब लिस म ि (रुद्र क्ष य मूंर् म ि ) से आपको मंत्र ि प करन है उसे प्रर् म करके लर्वलधर्वत मंत्र ि प करन शुरु
करें .........
मंत्र ि प खत्म होने के ब द िप भर्र्वती को अपुात करें ........
नर्व र्ा स धन क मूिमंत्र है
" ऐं ह्रीं क्ीं च मु ण्ड यै लर्वच्चे "
कुि मंत्र ि प 1200 म ि ( 1,25,000 मंत्र सं ख्य )
प्रत्येक लदन ि प की सं ख्य बर बर हो तो अि रहे र्
लिसने दीक्ष िे रखी है र्वो लबन ऊाँ िर् ये ही ि प कर सकते है और लिनकी दीक्ष नही ं हुई र्वो " ऊाँ " िर् कर ही ि प
करें
३३. िब िप खत्म हो ि ये तो ये मंत्र पढकर िप को पूर्ा रुप से स्वयं को और मंत्र को भी अलपात करें ..........
" ऊाँ ऐं ह्री ं क्ीं च मुण्ड यै लर्वच्चे नमः ...... समस्त आर्वरर् दे र्वत भ्यो नमः ......... मनस पररकल्पय पंचोपच र पूिनं
समपाय लम
ऊाँ ऐं ह्री ं क्ीं अभीष्ट लसच्छद्धं मे दे लह शरर् र्त र्वत्सिे l भक्त्य समपाये तु भ्यं समस्त आर्वरर् अचानम् ll
ऊाँ सम्पूलित ः सन्तलपात ः सन्तु "
िि यं त्र पर अपार् करें
३४. अब मह आरती करें और प्रस द ग्रहर् करें
और आसन से उठने से पहिे आसन के थोड़ िि ड िकर प्रर् म करके उठे ?
इस प्रक र आपको प्रलतलदन करन है िब तक लक आपक सर्व ि ख पूर्ा न हो ि यें .........
३५. िब सर्व ि ख मंत्र पुर हो ि ये तो दश ं श हर्वन, तपा न, म िान, ब्र ह्मर् य र्रीब भोिन........
इस प्रक र ये स धन सं पन्न हु

दु र्गा सप्तशती के पगठ। की सँ ख्यग और कगमनग
श्री दु र् ा िी की दु र् ा सप्तशती के प ठ की साँख्य और होने र्व ि फि .
श्री दु र् ा सप्तशती मह न ताँ त्र ग्राँ थ है , हर एक श्लोक भोलतक और अध्य च्छत्मक सफित दे सकती है . इसमे म रर् मोहन
,र्वशीकरर् और उच्च टन सभी प्रयोर् क सफि ि भ लिय ि सकत है ,इस के दिा नो प्रयोर् है , इसक प ठ दिा नो
तरीको से होत है , िो मै आप तक भेित रहुाँर् , यह बहुत बड क्षेत्र है ,
प ठ की साँख्य 1 से 1 000 तक हो सकती है , 101 प ठ क लर्वध न शतच्र्डी क है , िो र्व ाँलछत क मन पुरी को पुरी
करने के लिए 101 प ठ करनी च लहए, एक सम्पु ट प ठ क भी लर्वध न है , इसमे एक ही माँत्र को 1400 ब र बोिन
पडत है और 700 श्लोक भी है , इसक दाँ श श हर्वन , तपार् , म िा र् , कन्य पुिन , भण्ड र और ब्रह्मर् की पुर्ा
साँतुष्टी के ब द ही सफित लमिती है ,
श ाँ लत क या ##%%%-------प ठ की साँख्य
श ाँ लत हे तु 3
ग्रह दोर्। 5
उत्प त से बचने हे तु 7
मह म री की श ाँलत 9
र्वशीकरर्/ ऐश्वया । 11
शत्रु न श / र्ु प्त क म। 12
शत्रु / पत्नी र्वश हेतु 14
सुख समृच्छद्ध / िक्ष्मी हे तु 15
पुत्र पोत्र। / धन र्व हन। 16
शत्रु उच्च टन ... 18
िे ि और र्वेि आलद ..... 25
अनेक ि भ.... 50
अस ध्य रोर्, र िकीय ..... 101

दु र्गा सप्तशती पगठ में रखें इन बगतों कग ध्यगन
-पहिे , र्र्ेश पूिन, किश पूिन,,नर्वग्रह पूिन और ज्योलत पूिन करें ।
-श्रीदु र् ा सप्तशती की पुस्तक शुद्ध आसन पर ि ि कपड़ लबछ कर रखें।
-म थे पर भस्म, चंदन य रोिी िर् कर पूर्व ा लभमुख होकर तत्व शु च्छद्ध के लिये 4 ब र आचमन करें ।
-श्री दु र् ा सप्तशलत के प ठ में कर्वच, अर्ाि और कीिक के प ठ से पहिे श पोद्ध र करन ज़रूरी है ।
-दु र् ा सप्तशलत क हर मंत्र, ब्रह्म ,र्वलशष्ठ,लर्वश्व लमत्र ने श लपत लकय है ।
-श पोद्ध र के लबन , प ठ क फि नहीं लमित ।
-एक लदन में पूर प ठ न कर सकें, तो एक लदन केर्वि मध्यम चररत्र क और दू सरे लदन शे र् 2 चररत्र क प ठ करे ।
-दू सर लर्वकल्प यह है लक एक लदन में अर्र प ठ न हो सके, तो एक, दो, एक च र, दो एक और दो अध्य यों को िम से
स त लदन में पूर करें ।
-श्रीदु र् ा सप्तशती में श्रीदे व्यथर्वाशीर्ाम स्ोत क लनत्य प ठ करने से र्व क लसच्छद्ध और मृत्यु पर लर्विय।
-श्रीदु र् ा सप्तशती के प ठ से पहिे और ब द में नर्व रर् मंत्र ओं ऐं ह्रीं क्ीं च मुण्ड ये लर्वच्चे क प ठ करन अलनर्व या है।
-संस्कृत में श्रीदु र् ा सप्तशती न पढ़ प यें तो लहं दी में करें प ठ।
-श्रीदु र् ा सप्तशती क प ठ स्पष्ट उच्च रर् में करें िे लकन िोो़र से न पढ़ें और उत र्विे न हों।
-प ठ लनत्य के ब द कन्य पूिन करन अलनर्व या है ।
-श्रीदु र् ा सप्तशलत क प ठ में कर्वच, अर्ाि , कीिक और तीन रहस्यों को भी सच्छम्मित करन च लहये । दु र् ा सप्तशलत के -
प ठ के ब द क्षम प्र थान ज़रुर करन च लहये
-श्रीदु र् ा सप्तशती के प्रथम,मध्यम और उत्तर चररत्र क िम से प ठ करने से, सभी मनोक मन पूरी होती है । इसे
मह लर्वद्य िम कहते हैं ।
-दु र् ा सप्तशती के उत्तर,प्रथम और मध्य चररत्र के िम नुस र प ठ करने से, शत्रु न श और िक्ष्मी की प्र च्छप्त होती है । इसे
मह तंत्री िम कहते हैं ।
-दे र्वी पुर र् में प्र तक ि पूिन और प्र त में लर्वसिा न करने को कह र्य है । र लत्र में घट स्थ पन र्वलिात है ।

दु र्गा सप्तशती पगठ और रगवश से अरगिनग
दु र् ा सप्तशती के रहस्य
सन तन धमा में मुख्यत: प ंच उप स्य-दे र्व म ने र्ए हैं - सूया, र्र्ेश, दु र् ा, शं कर और लर्वष्णु, परं तु कलियुर् में दु र् ा और र्र्ेश
क लर्वशे र् महत्व है , ‘किौ चण्डी लर्वन यकै।’ म ं दु र् ा परमेश्वर की उन प्रध न शच्छियों में से एक हैं लिनको आर्वश्यकत नुस र
उन्होंने समय-समय पर प्रकट लकय है ।

उसी दु र् ा शच्छि की उत्पलत्त तथ उनके चररत्रों क र्वर्ान म काण्डे य पुर र् ं तर्ा त दे र्वी म ह त्म्य में है । यह दे र्वी म ह त्म्य 700
श्लोकों में र्वलर्ात है । यह म ह त्म्य ‘दु र् ा सप्तशती’ के न म से ि न ि त है ।

म ं आलदशच्छि प्रकृलत स्वरूप भी हैं । पुर ने समय से ही प्रकृलतिलनत ब ध ओं से भयभीत होकर मनुष्य ने म ं की आर धन
की है । हर यु र् में शच्छि स्वरूप न री, पररर्व र और सम ि क केन्द्र रही है । समय-समय पर सम ि की सुरक्ष और समृच्छद्ध
को सुलनलश्चत करने क क या न री ने लकय है। दु र् ा सप्तशती कीआर धन और प ठ के ब रे में बत रहे हैं ।

आलदशच्छि क स्मरर् आते ही ‘म ं ’ शब्द अपने आप ही अंत:करर् पर आ ि त है । म ं आलदशच्छि की आर धन की चच ा
ही ‘दु र् ा सप्तशती’ से प्र रम्भ होती है। ‘दु र् ा सप्तशती’ में स त सौ श्लोक हैं , लिन्हें मूित: तीन चररत्र, प्रथम, मध्यम और उत्तम
चररत्र में लर्वभ लित लकय र्य है।

मह क िी के आर धन यु ि प्रथम चररत्र में केर्वि पहि अध्य य, मध्यम चररत्र में दू सरे से चौथ य नी तीन अध्य य हैं । इसमें
म ं िक्ष्मी के स्वरूप क र्वर्ान है, िबलक उत्तम चररत्र में म ं सरस्वती की आर धन के प ंच से तेरह य नी नौ अध्य य हैं । दु र् ा
सप्तशती में प्र रम्भ और अंत में र्वलर्ात दे र्वी कर्वच, अर्ाि , कीिक तथ लसद्ध कुंलिक स्तोत्र के स थ ही स थ र लश के अनुस र
एक अध्य य क भी पठन नर्वर त्र के नौ लदनों में लकय ि ए तो िीर्वन में मंर्ि होत है।

मेर्: आप मंर्ि प्रध न हैं । केतु , शु ि और सूया से भी प्रभ लर्वत हैं । आपको दु र् ा सप्तशती के पहिे अध्य य के पठन से िोध
और अर्वस द से मुच्छि लमिर्ी। धन ि भ भी होर् ।
र्वृ र्भ: आप शु ि प्रध न हैं । सूया,चन्द्र और मंर्ि से प्रभ लर्वत होने के क रर् बु च्छद्ध और भ र्वन ओं के स मंिस्य में त्रु लट कर
बै ठती हैं । आपको दु र् ा सप्तशती के लितीय अध्य य क पठन पूरे नौ लदन करन च लहये । अर्ाि स्तोत्र क भी प ठ करें ।

लमथुन: आप बुध प्रध न हैं और मंर्ि, र हु और र्ुरु से प्रभ लर्वत भी। आप महत्व क ंक्षी तो है , पर आपसे आपके अलधक री
प्रसन्न नहीं रहते। अपनी समस्य के हि हे तु नौ लदन दु र् ा सप्तशती के स तर्वें अध्य य क प ठ करें , ि भ होर् ।

कका: आप चन्द्र प्रध न हैं और र्ुरु, शलन और बुध ग्रहों से प्रभ लर्वत हैं । आप अपनी र्व र्ी और भ र्वन त्मक आर्वेर् पर लनयंत्रर्
कर िीर्वन में सफि हो सकती हैं । दु र् ा सप्तशती के प ंचर्वें अध्य य क नौ लदन प ठ करें , यश बढ़े र् ।

लसंह: आप सूया प्रध न हैं । केतु र्व शु ि भी आपको प्रभ लर्वत करते हैं । लनर्ाय िे ने में हुई त्रु लट क आपके िीर्वन पर र्हर प्रभ र्व
पड़त रह है । प ररर्व ररक श ं लत के लिये प्रय स करें । दु र् ा सप्तशती के तृतीय अध्य य क प ठ नौ लदन करें ।

कन्य : आपक बुध प्रध न होन आपको लनर्ाय िे ने की अद् भुत योग्यत दे त है। आप सूया, चन्द्र और मंर्ि ग्रह से प्रभ लर्वत
हैं । नौ लदन दु र् ा सप्तशती के दसर्वें अध्य य क प ठ करें । आप भयमुि और लचंत रलहत होंर्ी।

तु ि : आप शुि ग्रह से प्रभ लर्वत हैं । मंर्ि, र हु और र्ुरु भी आपके व्यच्छित्व पर प्रभ र्व ड िते हैं । दु र् ा सप्तशती के छठे
अध्य य क प ठ करने से ऐश्वया और म नलसक श ं लत लमिेर्ी।

र्वृ लश्चक: आपकी र लश क स्व मी मंर्ि है । र्ु रु, शलन र्व बुध से भी प्रभ लर्वत हैं । आपको अपनी व्य र्वह ररक कुशित को बन ये
रखन होर् और र्व र्ी में मधु रत ि नी होर्ी। दु र् ा सप्तशती के आठर्वें अध्य य क लनरं तर प ठ करें ।

धनु: र्ु रु के स थ आपको केतु , शु ि और सूया प्रभ लर्वत करते हैं। दु र् ा सप्तशती के ग्य रहर्वें अध्य य के पठन से पद- प्रलतष्ठ
और श ं लत प्र प्त होर्ी। पूरे नौ लदन र लत्र सूि क भी पठन करें ।

मकर: आप शलन प्रध न हैं , स थ ही सूया, चन्द्र और मंर्ि से प्रभ लर्वत भी। न्य य की आस में आपक िीर्वन र्ुिरत है । न्य य
की प्र च्छप्त और िीर्वन में अतुिनीय प्रर्लत के लिये दु र् ा सप्तशती के आठर्वें अध्य य क पठन करें ।

कुम्भ: शलन प्रध न होने के क रर् आप हठी हैं। मंर्ि, र हु और र्ुरु से प्रभ लर्वत होने के क रर् दय िु भी हैं । अच्छस्थर रहती
हैं । दु र् ा सप्तशती के चतुथा अध्य य क प ठ पूरे नौ लदन करें ।

मीन: आप र्ुरु प्रध न हैं और शलन तथ बुध से प्रभ लर्वत। र्वैच ररक स मंिस्य ठीक न होने से लचंलतत रहती हैं । व्यर्वस य और
लर्वर्व ह संबंधी समस्य एं हो सकती हैं । दु र् ा सप्तशती के नर्वम अध्य य के प ठ से ि भ होर् ।

दु र्गा सप्तशती पगठ विवि
– सर्वा प्रथम स धक को स्न न कर शु द्ध हो िन च लहए।
– तत्पश्च त र्वह आसन शु च्छद्ध की लिय कर आसन पर बै ठ ि ए।
– म थे पर अपनी पसंद के अनुस र भस्म, चंदन अथर्व रोिी िर् िें।
– लशख ब ाँ ध िें , लफर पूर्व ा लभमुख होकर चर बर आचमन करें ।
– इसके ब द प्र र् य म करके र्र्ेश आलद दे र्वत ओं एर्वं र्ुरुिनों को प्रर् म करें , लफर पलर्वत्रे स्थो र्वै ष्णव्यौ इत्य लद मन्त्र से
कुश की पलर्वत्री ध रर् करके ह थ में ि ि फूि, अक्षत और िि िे कर दे र्वी को अलपात करें तथ मंत्रों से संकल्प िें ।
– दे र्वी क ध्य न करते हुए पंचोपच र लर्वलध से पुस्तक की पूि करें ।
– लफर मूि नर्व र्ा मन्त्र से पीठ आलद में आध रशच्छि की स्थ पन करके उसके ऊपर पुस्तक को लर्वर िम न करें । इसके
बद श पोद्ध र करन च लहए।
– इसके ब द उत्कीिन मन्त्र क ि प लकय ि त है । इसक िप आलद और अन्त में इक्कीस-इक्कीस ब र होत है ।
-इसके िप के पश्च त् मृतसंिीर्वनी लर्वद्य क िप करन च लहए।
तत्पश्च त पूरे ध्य न के स थ म त दु र् ा क स्मरर् करते हुए दु र् ा सप्तशती प ठ करने से सभी प्रक र की मनोक मन एाँ पूरी हो
ि ती हैं ।
“दु र् ा सप्तशती ” स ि में च र नर्वर त्रें होते हैं , ये श यद बहुत कम िोर्ों को पत्त होत है | सर्वोत्तम म ह मलहन की नर्वर त्री
की म न्यत है | लकन्तु िम इस प्रक र है -चै त्र ,आर् ढ़ ,आलश्वन ,और म ह | प्र यः “उत्तर भ रत” में चैत्र एर्वं आलश्वन की नर्वर त्री
िोर् लर्वशे र् धू म ध म से म नते हैं ,लकन्तु “दलक्षर् भ रत “में आर् ढ़ और म ह की नव्रलत्रय ाँ लर्वशे र् प्रक र से िोर् मन ते हैं | सच
तो यह भी है , लक लिनको पत्त है ,र्वो च रो नर्वर लत्रयों में लर्वशे र् पूिन इत्य लद करते हैं |
दु र् ा अथ ा त दु र्ा शब्द से दु र् ा बन है , दु र्ा =लकि ,स्तंभ , शप्तशती अथ ात स त सौ | लिस ग्रन्थ को स त सौ श्लोकों में सम लहत
लकय र्य हो उसक नम शप्तशती है |
महत्व -िो कोई भी इस ग्रन्थ क अर्विोकन एर्वं प ठ करे र् “म ाँ िर्दम्ब ” की उसके ऊपर असीम कृप होर्ी |
कथ – “सुरथ और “सम धी ” न म के र ि एर्वं र्वै श्य क लमिन लकसी र्वन में होत है ,और र्वे दोनों अपने मन में लर्वच र करते
हैं , लक हमिोर् र ि एर्वं सभी संपद ओं से यु ि होते हुए भी अपनों से लर्वरि हैं ,लकन्तु यह ाँ र्वन में, ऋलर् के आश्रम में, सभी
िीर्व प्रसन्नत पूर्वाक एकस थ रहते हैं | यह आश्चया िर्त है ,लक क् क रर् है ,िो र् य के स थ लसंह भी लनर्व स करत है , और
कोई भय नहीं है ,िब हमें अपनों ने पररत्य र् कर लदए, तो लफर अपनों की य द क्ों आती है |
र्वह ाँ ऋलर् के ि र यह ज्ञ त होत है ,लक यह उसी ” मह म य ” की कृप है ,सो पुनः ये दोनों ” दु र् ा ” की आर धन करते हैं
,और “शप्तशती ” के ब रहर्वे अध्य य में आशीर्व ा द प्र प्त करते हैं ,और अपने पररर्व र से यु ि भी हो ि ते हैं |
भ र्व -िो कोई भी” म ाँ िर्दम्ब “की शरर् िेर् ,उसके ऊपर म ाँ की असीम कृप होर्ी ,संस र की समस्त ब ध क लनर्व रर्
करें र्ीं – अतः सभी को “दु र् ा शप्तशती ” क प ठ तो करने ही च लहए ,और इस ग्रन्थ को अपने कुिपुरोलहत से ि नन भी
च लहए….
दु र् ा सप्तशती के अिर्-अिर् प्रयोर्…/ उप य—-
दु र् ा सप्तशती से क मन पूलता —
– िक्ष्मी, ऐश्वया , धन संबंधी प्रयोर्ों के लिए पीिे रं र् के आसन क प्रयोर् करें ।
– र्वशीकरर्, उच्च टन आलद प्रयोर्ों के लिए क िे रं र् के आसन क प्रयोर् करें ।
बि, शच्छि आलद प्रयोर्ों के लिए िि रं र् क आसन प्रयोर् करें ।
– स च्छत्वक स धन ओं, प्रयोर्ों के लिए कुश के बने आसन क प्रयोर् करें ।
र्वस्त्र- िक्ष्मी संबंधी प्रयोर्ों में आप पीिे र्वस्त्रों क ही प्रयोर् करें । यलद पीिे र्वस्त्र न हो तो म त्र धोती पहन िें एर्वं ऊपर श ि
िपेट िें । आप च हे तो धोती को केशर के प नी में लभर्ोंकर पीि भी रं र् सकते हैं ।
हर्वन करने से
ि यफि से कीलता और लकशलमश से क या की लसच्छद्ध होती है ।
आं र्विे से सुख और केिे से आभूर्र् की प्र च्छप्त होती है। इस प्रक र फिों से अध्या दे कर यथ लर्वलध हर्वन करें ।
ख ं ड, घी, र्ेंह, शहद, िौ, लति, लबल्वपत्र, न ररयि, लकशलमश और कदं ब से हर्वन करें ।
र्ें हं से होम करने से िक्ष्मी की प्र च्छप्त होती है ।
खीर से पररर्व र, र्वृच्छद्ध, चम्प के पुष्ों से धन और सुख की प्र च्छप्त होती है ।
आर्वंिे से कीलता और केिे से पुत्र प्र च्छप्त होती है ।
कमि से रि सम्म न और लकशलमश से सुख और संपलत्त की प्र च्छप्त होती है ।
ख ं ड, घी, न ररयि, शहद, िौं और लति इनसे तथ फिों से होम करने से मनर्व ं लछत र्वस्तु की प्र च्छप्त होती है ।
व्रत करने र्व ि मनुष्य इस लर्वध न से होम कर आच या को अत्यंत नम्रत के स थ प्रम र् करें और यज्ञ की लसच्छद्ध के लिए उसे
दलक्षर् दें । इस मह व्रत को पहिे बत ई हुई लर्वलध के अनुस र िो कोई करत है उसके सब मनोरथ लसद्ध हो ि ते हैं । नर्वर त्र
व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ क फि लमित है ।
नर्व र्ा मंत्र को मंत्रर ि कह र्य है ।
‘ ऐं ह्रीं क्ीं च मुण्ड यै लर्वच्चे’
शीघ्र लर्वर्व ह के लिए।
क्ीं ऐं ह्रीं च मुण्ड यै लर्वच्चे।
िक्ष्मी प्र च्छप्त के लिए स्फलटक की मि पर।
ओंम ऐं ही क्ीं च मुण्ड यै लर्वच्चे।
परे श लनयों के अन्त के लिए।
क्ीं हीं ऐं च मुण्ड यै लर्वच्चे।
दु र् ा सप्तशती के अध्य य से क मन पूलता -
1- प्रथम अध्य य- हर प्रक र की लचं त लमट ने के लिए।
2- लितीय अध्य य- मुकदम झर्ड आलद में लर्विय प ने के लिए।
3- तृ तीय अध्य य- शत्रु से छु टक र प ने के लिये ।
4- चतु था अध्य य- भच्छि शच्छि तथ दशा न के लिये ।
5- पंचम अध्य य- भच्छि शच्छि तथ दशा न के लिए।
6- र्ष्ठम अध्य य- डर, शक, बध ह ट ने के लिये ।
7- सप्तम अध्य य- हर क मन पूर्ा करने के लिये ।
8- अष्टम अध्य य- लमि प र्व र्वशीकरर् के लिये ।
9- नर्वम अध्य य- र्ु मशुद की ति श, हर प्रक र की क मन एर्वं पुत्र आलद के लिये ।
10- दशम अध्य य- र्ु मशु द की ति श, हर प्रक र की क मन एर्वं पुत्र आलद के लिये ।
11- एक दश अध्य य- व्य प र र्व सुख-संपलत्त की प्र च्छप्त के लिये ।
12- ि दश अध्य य- म न-सम्म न तथ िभ प्र च्छप्त के लिये ।
13- त्रयोदश अध्य य- भच्छि प्र च्छप्त के लिये ।
दु र् ा सप्तशती के ि भ–
र्वै लदक आहुलत की स मग्री—
प्रथम अध्य य-एक प न पर दे शी घी में लभर्ोकर 1 कमिर्ट्ट , 1 सुप री, 2 िौंर्, 2 छोटी इि यची, र्ुग्गुि, शहद यह सब चीिें
सुरर्व में रखकर खडे होकर आहुलत दे न ।
लितीय अध्य य-प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र, र्ु ग्गुि लर्वशेर्
तृ तीय अध्य य- प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र श्लोक सं. 38 शहद
चतुथा अध्य य-प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र, श्लोक सं.1से11 लमश्री र्व खीर लर्वशे र्,
चतुथा अध्य य- के मंत्र संख्य 24 से 27 तक इन 4 मंत्रों की आहुलत नहीं करन च लहए। ऐस करने से दे ह न श होत है। इस
क रर् इन च र मंत्रों के स्थ न पर ओंम नमः चच्छण्डक यै स्व ह ’ बोिकर आहुलत दे न तथ मंत्रों क केर्वि प ठ करन च लहए
इनक पठ करने से सब प्रक र क भय नष्ट हो ित है ।
पंचम अध्यय य-प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र, श्लोक सं. 9 मंत्र कपूर, पुष्, र्व ऋतु फि ही है।
र्ष्टम अध्य य-प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र, श्लोक सं. 23 भोिपत्र।
सप्तम अध्य य-प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र श्लोक सं. 10 दो ि यफि श्लोक संख्य 19 में सफेद चन्दन श्लोक संख्य
27 में इन्द्र िौं।
अष्टम अध्य य- प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र श्लोक संख्य 54 एर्वं 62 ि ि चं दन।
नर्वम अध्य य-प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र, श्लोक संख्य श्लोक संख्य 37 में 1 बे िफि 40 में र्न्न ।
दशम अध्य य-प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र, श्लोक संख्य 5 में समुन्द्र झ र् 31 में कत्थ ।
एक दश अध्य य- प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र, श्लोक संख्य 2 से 23 तक पुष् र्व खीर श्लोक संख्य 29 में लर्िोय 31
में भोि पत्र 39 में पीिी सरसों 42 में म खन लमश्री 44 मेेेें अन र र्व अन र क फूि श्लोक संख्य 49 में प िक श्लोक संख्य
54 एर्वं 55 मेेेें फूि च र्वि और स मग्री।
ि दश अध्य य- प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र, श्लोक संख्य 10 मेेेें नीबू क टकर रोिी िर् कर और पेठ श्लोक
संख्य 13 में क िी लमचा श्लोक संख्य 16 में ब ि-ख ि श्लोक संख्य 18 में कुश श्लोक संख्य 19 में ि यफि और कमि
र्ट्ट श्लोक संख्य 20 में ऋीतु फि, फूि, च र्वि और चन्दन श्लोक संख्य 21 पर हिर्व और पुरी श्लोक संख्य 40 पर कमि
र्ट्ट , मख ने और बदम श्लोक संख्य 41 पर इत्र, फूि और च र्वि
त्रयोदश अध्य य-प्रथम अध्य य की स मग्री अनुस र, श्लोक संख्य 27 से 29 तक फि र्व फूि।
स धक ि नक री के अभ र्व में मन मिी के अनुस र आरती उत रत रहत है
स धक ि नक री के अभ र्व में मन मिी के अनुस र आरती उत रत रहत है िबलक दे र्वत ओं के सम्मुख चौदह ब र आरती
उत रने क लर्वध न है - च र ब र चरर्ों पर से दो ब र न लभे पर से, एक ब र मुख पर से, स त ब र पूरे शरीर पर से। इस प्रक र
चौदह ब र आरती की ि ती है । िह ं तक हो सके लर्वर्म संख्य अथ ा त 1, 5, 7 बलत्तय ं बन कर ही आरती की ि नी च लहये ।
शै िपुत्री स धन - भौलतक एर्वं आध्य च्छत्मक इि पूलता ।
ब्रह र् च ररर्ी स धन - लर्विय एर्वं आरोग्य की प्र च्छप्त।
चं द्रघण्ट स धन - प प-त प र्व ब ध ओं से मुच्छि हेतु।
कूष्म ण्ड स धन - आयु , यश, बि र्व ऐश्वया की प्र च्छप्त।
स्कंद स धन - कुंठ , किह एर्वं िे र् से मुच्छि।
क त्य यनी स धन - धमा, कम एर्वं मोक्ष की प्र च्छप्त तथ भय न शक।
क िर लत्र स धन - व्य प र/रोिर् र/सलर्वा स संबधी इि पूलता ।
मह र्ौरी स धन - मनपसंद िीर्वन स थी र्व शीघ्र लर्वर्व ह के लिए।
लसच्छद्धद त्री स धन - समस्त स धन ओं में लसद्ध र्व मनोरथ पूलता ।
लर्वलभनन मनोक मन ओं के लिए दु र् ा सप्तशती के अिर्-अिर् श्लोक मंत्र रूप में प्रयु ि होते हैं लिनक ज्ञ न लकसी योग्य
लर्वि न से पूछकर लकय ि सकत है ।
स्कंद स धन - कुंठ , किह एर्वं िे र् से मुच्छि।
क त्य यनी स धन - धमा, कम एर्वं मोक्ष की प्र च्छप्त तथ भय न शक।
क िर लत्र स धन - व्य प र/रोिर् र/सलर्वा स संबधी इि पूलता ।
मह र्ौरी स धन - मनपसंद िीर्वन स थी र्व शीघ्र लर्वर्व ह के लिए।
लसच्छद्धद त्री स धन - समस्त स धन ओं में लसद्ध र्व मनोरथ पूलता ।
दु र् ा सप्तशती क प ठ, लर्वलध ( प्रयोर् क तरीक )—-
दु र् ा सप्तशती प ठ लर्वलध पूिनकत ा स्न न करके, आसन शु च्छद्ध की लिय सम्पन्न करके, शु द्ध आसन पर बैठ ि एाँ । म थे पर
अपनी पसंद के अनुस र भस्म, चं दन अथर्व रोिी िर् िें , लशख ब ाँध िें , लफर पूर्व ा लभमुख होकर तत्त्व शु च्छद्ध के लिए च र ब र
आचमन करें । इस समय लनम्न मंत्रों को बोिें -
ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधय लम नमः स्व ह ।
ॐ ह्रीं लर्वद्य तत्त्वं शोधय लम नमः स्व ह ॥
ॐ क्ीं लशर्वतत्त्वं शोधय लम नमः स्व ह ।
ॐ ऐं ह्रीं क्ीं सर्वातत्त्वं शोधय लम नमः स्व ह ॥
तत्पश्च त प्र र् य म करके र्र्ेश आलद दे र्वत ओं एर्वं र्ुरुिनों को प्रर् म करें , लफर ‘पलर्वत्रे स्थो र्वैष्णव्यौ’ इत्य लद मन्त्र से कुश
की पलर्वत्री ध रर् करके ह थ में ि ि फूि, अक्षत और िि िेकर लनम्न ं लकत रूप से संकल्प करें -
ॐ लर्वष्णुलर्वा ष्णुलर्वा ष्णुः। ॐ नमः परम त्मने, श्रीपुर र्पुरुर्ोत्तमस्य श्रीलर्वष्णोर ज्ञय प्रर्वता म नस्य द्य श्रीब्रह्मर्ो लितीयपर द्धे
श्रीश्वेतर्व र हकल्पे र्वै र्वस्वतमन्वन्तरे ऽष्ट लर्वंशलततमे कलियुर्े प्रथमचरर्े िम्बूिीपे भ रतर्वर्े भरतखण्डे
आय ार्वत ा न्तर्ा तब्रह्म र्वतै कदे शे पुण्यप्रदे शे बौद्ध र्वत रे र्वता म ने यथ न मसंर्वत्सरे अमुक यने मह म ं र्ल्यप्रदे म स न म् उत्तमे
अमुकम से अमुकपक्षे अमुकलतथौ अमुकर्व सर च्छन्वत य म् अमुकनक्षत्रे अमुकर लशच्छस्थते सूये अमुक मुकर लशच्छस्थते र्ु
चन्द्रभौमबु धर्ु रुशु िशलनर्ु सत्सु शुभे योर्े शु भकरर्े एर्वं र्ुर्लर्वशे र्र्लर्वलशष्ट य ं शु भ पुण्यलतथौ सकिश स्त्र श्रुलत स्मृलत
पुर र्ोि फिप्र च्छप्तक मः अमुकर्ोत्रोत्पन्नः अमुक न म अहं मम त्मनः सपुत्रस्त्रीब न्धर्वस्य श्रीनर्वदु र् ा नुग्रहतो
ग्रहकृतर िकृतसर्वा -लर्वधपीड लनर्वृ लत्तपूर्वाकं नैरुज्यदीघ ायुः पुलष्टधनध न्यसमृद्ध्यथं श्री नर्वदु र् ाप्रस दे न
सर्व ा पलन्नर्वृलत्तसर्व ा भीष्टफि र्व च्छप्तधम ा था- क ममोक्षचतु लर्वाधपुरुर् थालसच्छद्धि र श्रीमह क िी-
मह िक्ष्मीमह सरस्वतीदे र्वत प्रीत्यथं श पोद्ध रपुरस्सरं कर्वच र्ा ि कीिकप ठ- र्वेदतन्त्रोि र लत्रसूि प ठ दे व्यथर्वाशीर्ा
प ठन्य स लर्वलध सलहत नर्व र्ािप सप्तशतीन्य स- धन्य नसलहतचररत्रसम्बच्छन्धलर्वलनयोर्न्य सध्य नपूर्वाकं च ‘म काण्डे य उर्व च॥
स र्वलर्ाः सूयातनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः।’ इत्य द्य रभ्य ‘स र्वलर्ाभालर्वत मनुः’ इत्यन्तं दु र् ा सप्तशतीप ठं तदन्ते
न्य सलर्वलधसलहतनर्व र्ामन्त्रिपं र्वे दतन्त्रोिदे र्वीसूिप ठं रहस्यत्रयपठनं श पोद्ध र लदकं च कररष्ये/कररष्य लम।
इस प्रक र प्रलतज्ञ (संकल्प) करके दे र्वी क ध्य न करते हुए पंचोपच र की लर्वलध से पुस्तक की पूि करें , (पुस्तक पूि क
मन्त्रः- “ॐ नमो दे व्यै मह दे व्यै लशर्व यै सततं नमः। नमः प्रकृत्यै भद्र यै लनयत ः प्रर्त ः स्म त म्।।” (र्व र हीतन्त्र तथ
लचदम्बरसंलहत ))। योलनमुद्र क प्रदशा न करके भर्र्वती को प्रर् म करें , लफर मूि नर्व र्ा मन्त्र से पीठ आलद में आध रशच्छि
की स्थ पन करके उसके ऊपर पुस्तक को लर्वर िम न करें । इसके ब द श पोद्ध र करन च लहए। इसके अनेक प्रक र हैं।
‘ॐ ह्रीं क्ीं श्रीं िं िीं चच्छण्डक दे व्यै श पन श र्ुग्रहं कुरु कुरु स्व ह ’
इस मंत्र क आलद और अन्त में स त ब र िप करें । यह “श पोद्ध र मंत्र” कहि त है । इसके अनन्तर उत्कीिन मन्त्र क ि प
लकय ि त है । इसक िप आलद और अन्त में इक्कीस-इक्कीस ब र होत है । यह मन्त्र इस प्रक र है - ‘ॐ श्रीं क्ीं ह्रीं सप्तशलत
चच्छण्डके उत्कीिनं कुरु कुरु स्व ह ।’ इसके िप के पश्च त् आलद और अन्त में स त-स त ब र मृतसंिीर्वनी लर्वद्य क ि प
करन च लहए, िो इस प्रक र है -
‘ॐ ह्रीं ह्रीं र्वं र्वं ऐं ऐं मृतसंिीर्वलन लर्वद्ये मृतमुत्थ पयोत्थ पय िीं ह्रीं ह्रीं र्वं स्व ह ।’
म रीचकल्प के अनुस र सप्तशती-श पलर्वमोचन क मन्त्र यह है -
‘ॐ श्रीं श्रीं क्ीं हं ॐ ऐं क्षोभय मोहय उत्कीिय उत्कीिय उत्कीिय ठं ठं ।’
इस मन्त्र क आरं भ में ही एक सौ आठ ब र ि प करन च लहए, प ठ के अन्त में नहीं। अथर्व रुद्रय मि मह तन्त्र के अंतर्ात
दु र् ाकल्प में कहे हुए चच्छण्डक श प लर्वमोचन मन्त्र क आरं भ में ही प ठ करन च लहए। र्वे मन्त्र इस प्रक र हैं -
ॐ अस्य श्रीचच्छण्डक य ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश पलर्वमोचनमन्त्रस्य र्वलसष्ठ-न रदसंर्व दस मर्वे द लधपलतब्रह्म र् ऋर्यः
सर्वै श्वयाक ररर्ी श्रीदु र् ा दे र्वत चररत्रत्रयं बीिं ह्री शच्छिः लत्रर्ु र् त्मस्वरूपचच्छण्डक श पलर्वमुिौ मम संकच्छल्पतक या लसद्ध् यथे
िपे लर्वलनयोर्ः।
ॐ (ह्रीं) रीं रे तःस्वरूलपण्यै मधु कैटभमलदा न्यै ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥1॥
ॐ श्रीं बु च्छद्धस्वरूलपण्यै मलहर् सुरसैन्यन लशन्यै ब्रह्मर्वलसष्ठ लर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥2॥
ॐ रं रिस्वरूलपण्यै मलहर् सुरमलदा न्यै ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥3॥
ॐ क्षुं क्षुध स्वरूलपण्यै दे र्वर्वच्छन्दत यै ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥4॥
ॐ छं छ य स्वरूलपण्यै दू तसंर्व लदन्यै ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥5॥
ॐ शं शच्छिस्वरूलपण्यै धू म्रिोचनघ लतन्यै ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥6॥
ॐ तृं तृ र् स्वरूलपण्यै चण्डमुण्डर्वधक ररण्यै ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्र श प द् लर्वमुि भर्व॥7॥
ॐ क्ष ं क्ष च्छन्तस्वरूलपण्यै रिबीिर्वधक ररण्यै ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥8॥
ॐ िं ि लतस्वरूलपण्यै लनशु म्भर्वधक ररण्यै ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥9॥
ॐ िं िज्ज स्वरूलपण्यै शुम्भर्वधक ररण्यै ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥10॥
ॐ शं श च्छन्तस्वरूलपण्यै दे र्वस्तुत्यै ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥11॥
ॐ श्रं श्रद्ध स्वरूलपण्यै सकिफिद त्र्यै ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥12॥
ॐ कं क च्छन्तस्वरूलपण्यै र िर्वरप्रद यै ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥13॥
ॐ मं म तृ स्वरूलपण्यै अनर्ा िमलहमसलहत यै ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥14॥
ॐ ह्रीं श्रीं दुं दु र् ा यै सं सर्वै श्वया क ररण्यै ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥15॥
ॐ ऐं ह्रीं क्ीं नमः लशर्व यै अभेद्यकर्वचस्वरूलपण्यै ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥16॥
ॐ िीं क ल्यै क लि ह्रीं फट् स्व ह यै ऋग्वेदस्वरूलपण्यै ब्रह्मर्वलसष्ठलर्वश्व लमत्रश प द् लर्वमुि भर्व॥17॥
ॐ ऐं ह्री क्ीं मह क िीमह िक्ष्मी- मह सरस्वतीस्वरूलपण्यै लत्रर्ुर् च्छत्मक यै दु र् ा देव्यै नमः॥18॥
इत्येर्वं लह मह मन्त्र न् पलठत्व परमेश्वर। चण्डीप ठं लदर्व र त्रौ कुय ादेर्व न संशयः॥19॥
एर्वं मन्त्रं न ि न लत चण्डीप ठं करोलत यः। आत्म नं चैर्व द त रं क्षीर्ं कुय ा न्न संशयः॥20॥
इस प्रक र श पोद्ध र करने के अनन्तर अन्तम ा तृक बलहम ा तृक आलद न्य स करें , लफर श्रीदे र्वी क ध्य न करके रहस्य में बत ए
अनुस र नौ कोष्ठों र्व िे यन्त्र में मह िक्ष्मी आलद क पूिन करें , इसके ब द छ: अंर्ों सलहत दु र् ा सप्तशती क प ठ आरं भ लकय
ित है ।
कर्वच, अर्ा ि , कीिक और तीनों रहस्य- ये ही सप्तशती के छ: अंर् म ने र्ए हैं । इनके िम में भी मतभेद हैं । लचदम्बरसंलहत
में पहिे अर्ा ि , लफर कीिक तथ अन्त में कर्वच पढ़ने क लर्वध न है , लकन्तु योर्रत्न र्विी में प ठ क िम इससे लभन्न है ।
उसमें कर्वच को बीि, अर्ा ि को शच्छि तथ कीिक को कीिक संज्ञ दी र्ई है ।
लिस प्रक र सब मंत्रों में पहिे बीि क , लफर शच्छि क तथ अन्त में कीिक क उच्च रर् होत है , उसी प्रक र यह ाँ भी पहिे
कर्वच रूप बीि क , लफर अर्ाि रूप शच्छि क तथ अन्त में कीिक रूप कीिक क िमशः प ठ होन च लहए। यह ाँ इसी
िम क अनुसरर् लकय र्य है ।
।। दे र्वी म ह त्म्यम् ।।
।। श्री।।
श्रीचच्छण्डक ध्य नम्
ॐ बन्धू ककुसुम भ स ं पञ्चमुण्ड लधर्व लसनीम् ।
स्फुरच्चन्द्रकि रत्नमुकुट ं मुण्डम लिनीम् ।।
लत्रनेत्र ं रिर्वसन ं पीनोन्नतघटस्तनीम् ।
पुस्तकं च क्षम ि ं च र्वरं च भयकं िम त् ।।
दधतीं संस्मरे लन्नत्यमुत्तर म्न यम लनत म् ।
अथर्व
य चण्डी मधुकैटभ लददै त्यदिनी य म लहर्ोन्मूलिनी
य धूम्रेक्षर्चण्डमुण्डमथनी य रिबीि शनी ।
शच्छिः शु म्भलनशु म्भदै त्यदिनी य लसच्छद्धद त्री पर
स दे र्वी नर्वकोलटमूलता सलहत म ं प तु लर्वश्वेश्वरी ।।