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पाठ 20

यंजनांत नपुंसंक िंलग सं ाएँ और िवशे षण, कमर्वाच्य का कृ त्यय त और कतृर्वाच्य


का कृ त्यय तव , िमतर् को पतर्।
20.1 सं. यंजनांत नपुंसकिंलग सं ाएँऱ िपछले पाठ म हमने दे खा था िक िकस
कार हम यंजनांत पुिंं लग और तर्ीिंलग सं ाओं के केवल पाँच रूप को याद
करके सात िवभि य और तीन वचन म उनके रूप बना सकते ह। परन्तु
यंजनांत नपुस ं किंलग सं ाओं म थोड़ा अंतर होता है। नपुस ं किंलग म ि तीया
िवभि के सभी रूप थमा िवभि के समान होते ह। इसिलए, हम ि तीया के
बहु वचन से अन्य रूप नहीं बना सकते । इसिलए हम यहाँ छह रूप को याद करना
होगा। ये रूप ह 1-1, 1-2, 1-3, 3-1, 3-2 और 7-3। यहाँ ि तीय िविभि ि वचन
के बजाय तृतीया िवभि के एकवचन (3-1) को अलग से याद करके उससे दू सरे
रूप बनाए जा सकते ह। कमर् (कायर्, चे ा) और मन (मन) नपुंसकिंलग सं ाएँ
है। इनके पूरे रूप नीचे िदए ह:
कमर् मन
एकव. ि वचन बहु वचन एकव. ि वचन बहु वचन
थमा कमर् कमर्िण कमार्िण मन: मनसी मनांिस
ि तीया " " " " " "
तृतीया कमर्णा कमर् या कमर्िभ: मनसा मनो या मनोिभ:
चतुथीर् कमर्णे कमर् या कमर् य: मनसे मनो या मनो य:
पंचमी कमर्ण: कमर् या कमर् य: मनस: मनो या मनो य:
ष ी कमर्ण: कमर्णो: कमर्णा मनस: मनसो: मनसा
स मी कमर्िण कमर्णो: कमर्सु मनिस मनसो: मन:सु
मनो या (3.2) और मन:सु (7-3) पर पर संबिं धत है। मनो या म पहले मन
का अंितम िवसगर् म बदल जाता है िफर घोष यंजन से पूवर् िवसगर् ( : ) ओ म
बदल जाता है। मन:सु म मन के अंत वाला िवसगर् म तो बदल जाता है परन्तु आगे
यह ओ म नहीं बदलता क्य िक इसके बाद घोष यंजन नहीं है। इसिलए मन का
स मी के बहु वचन का रूप मन:सु है। यह िनयम समान रूप से सभी सकारान्त
नपुसं किंलग सं ाओं पर लागू होता है। यिद एक बार आप कमर् और मन के पाँच
रूप ( थमा के तीन और तृतीया के एकवचन और ि वचन के दो रूप ) को याद
करल तो आप पुिंं लग और तर्ीिंलग सं ाओं की तरह 3-1 (कमर्णा, मनसा) और 3-2
(कमर् या , मनो या ) की सहायता से अन्य रूप बना सकते ह। यिद आपको संिध के
िनयम नहीं आते तो आपको 7-3 को भी याद करना होगा।
20.2 सं. यंजनांत नपुंसकिंलग िवशे षण ऱ नंपुसकिंलग म यजनांत िवशेषण के
पाठ-20 116

रूप भी सामान्य रूप से नपुंसकिंलग की सं ाओं की तरह चलते ह। हम नीचे


नपुसं किंलग की कुछ सं ाओं और िवशेषण के ऊपर बताए गए सीिमत (पाँच-
पाँच) रूप दे रहे ह। आप उनके पूरे रूप बनाने का अ यास कीिजए:
1.1 1.2 1.3 3.1 3.2
जग (संसार) जग जगती जगिन्त जगता जगद् या
मह (बड़ा, िव.) मह महती महािन्त महता महद् या
धनव (धनी) धनव धनवती धनविन्त धनवता धनवद् या
चमर् (चमड़ी) चमर् चमर्णी चमार्िण चमर्णा चमर् या
( ) णी ािण णा या
नाम (नाम) नाम नामनी नामािन ना ा नाम या
िशर (िसर ) िशर: िशरसी िशरांिस िशरसा िशरो या
वच (श द, कथन) वच: वचसी वचांिस वचसा वचो या
सर (तालाब) सर: सरसी सरांिस सरसा सरो या
यश (यश) यश: यशसी यशांिस यशसा यशो या
तप (तप या) तप: तपसी तपांिस तपसा तपो या
अह (िदन) अह: अहनी अहािन अ ा अहो या
बिल (ताकतवर) बली बिलनी बलीिन बिलना बिल या
िट पणी: नाम सं ा के 1-2, 2-2 और 7-1 म कर्मश: ना ी, ना ी और नामिन
और अह के कर्मश: अ ी, अ ी, अि वैकि पक रूप बनते ह। मह के 1-3 म िदए
अिनयिमत रूप महािन्त पर भी ध्यान द। ऊपर िदए गए िनयम के अनु सार िशर ,
वच , सर , यश और तप के स मी के बहु वचन के रूप कर्मश: िशर:सु, वच:सु,
सर:सु, यश:सु और तप:सु बनगे।
20.3 अ. िन िलिखत वाक्य को पिढ़ए और इनका िहन्दी म अनुवाद कीिजए:
1. स: मनसा वाचा कमर्णा पिवतर्: िव ते । 2. त य मनिस वािच कमर्िण च
एकरूपता वतर्ते। 3. अ मािभ: अि म जगित तदे व कमर् कतर् यं येन सवषां िहतं
भवे । 4. अ य जगत: सव धिननो जना: अिप सदै व सुिखन: न भविन्त। 5. ते ऽिप
बहु धा1 दु :खमनु भविन्त। 6. न िव ोन2 तपर् णीयो3 मनु य:, एत उपिनषदो वच:। 7.
महतां यश:4 सवार्सु िदक्षु सरित5। 8. मनु य: सत्कमर्िभ:6 यशो लभते । 9.
मनसाऽिप िंहसा न कतर् या। 10. सव खलु7 इदं , इित वेदान्त य सूतर् । 11.
अि म जगित य िंकिचदिप दृ यते त सव एव, इित अ य सूतर् य अथर्:। 12.
अयमात्मा , इित अिप वेदान्त य सूतर् । 13. मनु य य अंतरे 8 ि थत: आत्मा
ण: एव अंश:। 14. अयं वेदान्त य िस ान्त:।
(श दाथर्:- 1. ाय:, 2. धन से, 3. संतु करने योग्य, 4. िसि , 5. फैलती है, 6. अच्छे
काम से, 7. िन य से, 8. हृ दय म)
20.4 िकर्. कमर्वाच्य का कृ त्यय त। इससे पहले 16 व, 17 व और 18 व पाठ

संधान सं कृत- वेश


पाठ-20 117

म कृ त्यय त्वा, तु तथा त य, अनीय, य और तु के बारे म पढ़ चुके ह।


आइए, अब कमर्वाच्य के महत्वपूणर् कृ त्यय त के बारे म पढ़। इसकी रचना
धातु के साथ त जोड़कर की जाती है। कहीं-कहीं यह त-ध या न म बदल जाता
है। से धातुओं म त से पहले इ जुड़ता है। चुरािदगण की धातुओं के वर को गुण
और वृि होते ह। त से बनने वाले कृदन्त रूप की रचना त्वा से बने रूप म त्वा
के थान पर त रख कर भी की जा सकती है। त त्यय से बने रूप के कुछ
उदाहरण आगे िदए ह। इनम अिनयिमत रूप को तारांिकत कर िदया गया है: ऱ
क - किथत द - *दग्ध भू्- भूत
कृ्- कृत दा- *द म - *मत
िचन् - िचिन्तत दृ - दृ मुच्- मु
चुर्- चोिरत नी- नीत ल - *ल ध
िछ - *िछ प - पिठत िलख्- िलिखत
ज - *जात प पितत वच्- *उ
त्य - त्य पा- *पीत शर्ु-् शर्ुत
दण् - दिण्डत भक्ष्- भिक्षत सृ - *सृ
कृत त्यय त से बनने वाले श द के रूप अकारान्त पुिंं लग और नपुस ं किंलग
सं ाओं की तरह चलते ह। तर्ीिंलग म इन श द के साथ आ जोड़ िदया जाता है।
तब इनके रूप आकारांत तर्ीिंलग सं ाओं की तरह चलते ह। कृ त्यय त का
योग िवशेषण और समािपका िकर्या दोन रूप म होता है, इसिलए यह सं कृत
याकरण की एक महत्त्वपूणर् संरचना है। इसका योग मुख्यत: िन िलिखत कार
से होता है।
i) िवशेषण के रूप म त त्यय से बने श द की अिन्वित उस सं ा से होती है
िजसकी ये िवशेषता बताते ह:
पिठतं पु तकं र य आसी ऱ (मे रे ारा) पढ़ी गई पु तक सुन्दर थी।
दिण्डता: चौरा: कारागरे सिन्त ऱ सजा पाए हु ए चोर जेल म ह।
ii) सकमर्क िकर्याओं से िनिर्मत यह कृ त्यय कमर्वाच्य म समािपका िकर्या की तरह
यु होता है और इसकी अिन्वित कमर् से होती है जो कतार्कारक म होता है।
कतृर्वाच्य का कतार् यहाँ करण कारक म बदल जाता है:
मया दु ग्धं पीत ऱ मे रे ारा दूध िपया गया।
बािलकािभ: गृहािण भूिषतािन ऱ लड़िकय के ारा घर सजाए गए।
अ अ मािभ: त चलिचतर्ं दृ ऱ आज हमारे ारा वह िफ़ म दे खी गई।
ते न माग एक: सपर् : दृ : ऱ उसने रा ते म एक साँप दे खा।
iii) गत्यथर्क अकमर्क िकर्याओं से िनिर्मत कमर्वाच्य के त कृदन्त का योग कतृर्वाच्य
म समािपका िकर्या की तरह होता है और उसकी अिन्वित कतार् से होती है:

संधान सं कृत- वेश


पाठ-20 118

स: अ वगर्ामं गत: ऱ वह आज अपने गाँव गया।


ते नगरा आगता: ऱ वे शहर से आ गए।
वृक्षे य: सवार्िण पतर्ािण पिततािन ऱ पेड़ से सब प े िगर गए।
अ माकं दे शे बहव: महान्त: राजान: जाता:ऱ हमारे दे श म बहु त-से बड़े राजा हु ए ह।
iv) इस कृदं त की नपुस ं किंलग की थमा िवभि , एकवचन का योग भाववाच्य की
समािपका िकर्या के रूप म होता है, तब कतार् करण कारक म रहता है:
ते न/तया हिसत ऱ वह हू ँसा/हू ँसी।
िशशुना/िशशु िभ: रुिदत ऱ ब े रोए।
v) नपुस ं किंलग एकवचन म त कृदन्त का योग धातु के भाव का बोध कराने वाली
भाववाचक सं ा के रूप म भी होता है:
त य किथतं िव सनीय ऱ उसका कथन िव ास के योग्य है।
त या: हिसतं र य ऱ उसकी हँसी सुद ं र है।
20.5 कतृर्वाच्य का कृत त्यय तव ऱ इस त्यय से बने श द का िनमार्ण त के
थान पर तव रखकर िकया जा सकता है: गत- गतव , पिठत- पिठतव आिद।
इससे हम इस कृदन्त के नपुस ं किंलग रूप िमलते ह। इनके पुिंं लग और तर्ीिंलग
रूप बनाने के िलए व को कर्मश: वा और वती म बदल िदया जाता है, जैसे-
गतव -गतवा -गतवती। इनके रूप उन सं ाओं की तरह चलते ह िजनकी ये
िवशेषताएँ बताते ह जैसेऱ पुिंं लग के रूप (भगवा ) नपुस ं क िंलग के धनव और
तर्ीिंलग के रूप (नदी) सं ाओं की तरह चलते ह। तव से बनने वाले कृदन्त का
योग भी िवशेषण और समािपका िकर्या की तरह होता है।
i) िवशेषणरूप म तव की अिन्वित इसके िवशे य के साथ होती है:
अह आगतवन्त अितिथ अप य ऱ मने आए हु ए मे हमान को दे खा।
गतवती बािलका पुन: आगच्छ ऱ गई हु ई लड़की िफर आ गई।
ii) समािपका िकर्या के रूप म इसका योग अकमर्क और सकमर्क दोन
िकर्याओं के साथ केवल कतृर्वाच्य म होता है और इसकी अिन्वित कतार् के
साथ होती है:
स: बालक: हिसतवा ऱ वह लड़का हँसा।
सा बािलका हिसतवती ऱ वह लड़की हँसी।
ते बालका: हिसतवन्त: ऱ वे लड़के हँसे।
ता: बािलका: हिसतवत्य: ऱ वे लड़िकयाँ हँसीं।
िट पणी: बाद के सं कृत सािहत्य म भूतकाल (लङ्) के ितडन्त धातुरूप की अपेक्षा
कृदन्त रूप का योग समािपका िकर्या के रूप म कहीं अिधक होने लगा। आपको
सं कृत म इनका योग बार-बार िमलेगा। आप भी अपने भूतकाल के वाक्य म कृदन्त
रूप का योग कर सकते ह, इसिलए आप इन पर िवशेष ध्यान द।

संधान सं कृत- वेश


पाठ-20 119

20.6 नीचे िलखे वाक्य को पिढ़ए और इनका िहन्दी म अनु वाद कीिजए:
1. मया तािन सवार्िण पु तकािन पिठतािन। 2. अिप त्वया त या: पतर् य उ रं
िलिखत ? 3. न, अहं इदानीं याव 1 न िलिखतवा , िकन्तु अधु ना लेिख यािम। 4. अ
अ माकं कक्षायां बहव: छातर्ा: बहू ा पृ वन्त:। 5. अ माकं िशिक्षका ते षा सवषा
उ रािण द वती। 6. अिप यु माक अितथय: आगता:? 7. आ , ते अ ात:
2
आगतवन्त:। 8. तेनातर् सवार्िण कायार्िण स यक् कृतािन। 9. स: वजीवने वप ीं
कदािप न िनिन्दतवा । 10. सा अिप वपिंत कदािप न िनिन्दतवती। 11. अि म िवषये
भवि : िंक मंितर्त ? 12. वयमि म िवषये िकमिप न मंितर्तवन्त:। 13. बालकै: िक्ष :3
कन्दु क:4 तेषां: गृहे पितत:। 14. बालका: तेषां: गृहं गत्वा क्षमां यािचतवन्त: कन्दु कं च पुन:
आनीतवन्त:। 15. अिप कक्षायां पिठता: पंचदश ोका: यु मािभ: मृता:? 16. वयं दश
ोका मृतवन्त:, अधु ना पंच एव मतर् या:। 17. अ मािभ: खािदतािन सवार्िण फलािन
मधु रािण आस । 18. सा म ं बहू िन पु तकािन ेिषतवती। 19. वयं सवार्: : सायंकाले
त या: नृ त्यं दृ वत्य:। 20. अ सभायां सव: व ृ िभ: त य शंसा कृता।
(श दाथर्: ऱ 1. इदानीं याव ऱ अब तक, 2. अच्छी तरह से, 3. फकी हु ई, 4. गद)
20.7 अ. िमतर्ाय पतर्
ि य िमतर् आिकको,
इदानीं वसन्ते ऋतौ सवर्तर् साकुरापु पािण िवकिसतािन। ऋतु: अयं तव हृ दये अिप
स तां जनये इित ाथर्नां करोिम। अ अह अित स ा अि म। मम स ताया:
कारण अिप अित िवशेष: वतर्ते। अ मया सं कृत य िंवशिततम: पाठ: पिठत:। एष:
अवसर: म ं महा आनन्ददायक:1। पूवर् अहं सं कृतभाषा किठना अि त, इित
िचिन्ततवती। परं शनै:.शनै: मया ातं य सं कृतभाषा अित रुिचरा2 अि त। अधुना
म ं सं कृतं बहु रोचते ।
अ मािभ: सं कृत य अध्ययनं एकवषर्पूवर् एव ार ध 3। सवर् थमं वयं सं कृत य
अध्ययनाय दे वनागरी िलिंप िशिक्षतवत्य:। तदा कर्मश:4 सं कृत य श दा: वाक्यािन च
अ मािभ: िशिक्षतािन। इदानीं याव अ मािभ: सं कृते पंच र या: कथा: पिठता:। तथा च
बहव: ोका: अिप अ मािभ: पिठता:। सं कृत य ोका: म ं भृशं रोचन्ते। सं कृत
कक्षायां वयं सव अित आनन्द अनु भवाम:।
भिव ये अहं सं कृते भगव ीतां, योगसूतर्ं, महायानबौ धमर् य च सूतर्ािण पिठतु
इच्छािम।
इदानी अहं सं कृते सरलािन वाक्यािन लेिखतु अिप समथार्। अत: इदं पतर्ं
सं कृते िलखािम। भवती अिप सं कृतभाषायां व उ रं ेषयतु। भवत्य: पतर्ं सं कृते
ा य अित स ा भिव यािम।
स ेहा भवदीया
तोको
(श दाथर्: ऱ 1. खुशी दे ने वाला, 2. अच्छी लगने वाली, 3. ा र तर् शुरु करना, 4. धीरे -धीरे )

संधान सं कृत- वेश


पाठ-20 120

अ यास के उ र
20.3 अ 1. वह मन, वचन और कमर् से पिवतर् है। 2. उसके मन, वचन और कमर् म एकरूपता है। 3.
हम इस संसार म वही काम करना चािहए िजससे सब की भलाई हो। 4. इस संसार के सब धनी
लोग भी हमे शा सुखी नहीं होते। 5. वे भी बहु त बार दु ख का अनु भव करते ह। 6. धन से मनु य की
तृि नहीं होती- यह उपिन का वचन है। 7. महापुरुष का यश सभी िदशाओं म फैलता है। 8.
मनु य अच्छे कम से यश ा करता है। 9. (हम) मन से भी िंहसा नहीं करनी चािहए। 10. 'िन य
ही यह संपूणर् संसार है', यह वेदान्त का सूतर् है। 11. इस दु िनया म जो कुछ भी िदखाई दे ता है
वह सब ही है, यह इस सूतर् का अथर् है। 12. यह आत्मा है यह भी वेदान्त का सूतर् है। 13.
मनु य के हृ दय म ि थत आत्मा का ही अंश है। यह वेदान्त का िस ान्त है।
20.6 मे रे ारा वे सब पु तक पढ़ी गईं । 2 क्या तुमने उसके पतर् का उ र िलख िदया? 3. नहीं,
अभी तक मैने नहीं िलखा परन्तु अब िलखूँगा। 4 आज हमारी कक्षा म बहु त.से छातर् ने बहु त से
पूछे। 5. हमारी अध्यािपका ने उन सबके उ र िदए। 6. क्या आपके अितिथ आ गए? 7. हाँ, वे आज
सुबह आ गए। 8. उसने यहाँ अपने सब काम अच्छी तरह िकए। 9. उसने अपने जीवन म कभी भी
अपनी प ी की िनन्दा नहीं की। 10. उसने भी अपने पित की कभी िनन्दा नहीं की। 11. इस बारे म
आपके ारा क्या सलाह की गई? 12. हमने इस बारे म कुछ भी सलाह नहीं की। 13. लड़क के
ारा फकी हु ई गद उन (दोन ) के घर म िगरी। 14. लड़क ने उनके घर जाकर क्षमा माँगी और गद
िफर ले आए। 15. क्या आपने कक्षा म पढ़े हु ए पन्दर्ह ोक याद कर िलए? 16. हमने दस ोक
याद कर िलए ह, अब पाँच और याद करने ह। 17. हमारे ारा खाए गए सभी फल मीठे थे। 18.
उसने मुझे बहु त.सी पु तक भेजीं। 19. हमने कल शाम को उसका नृत्य दे खा। 20. आज सभा म
सभी व ाओं के ारा उसकी शंसा की गई।
20.7 िमतर् को पतर्
ि य िमतर् आिकको,
अब वसन्त ऋतु म सभी जगह साकुरा के फूल िखले हु ए ह। म ाथर्ना करता हू ँ िक यह ऋतु
तु हारे हृ दय म भी स ता की भावना उत्प करे । आज म बहु त खुश हू ँ। मे री खुशी का एक बहु त
खास कारण है। आज मने सं कृत भाषा का बीसवाँ पाठ पढ़ा। यह मे रे िलए अत्यिधक खुशी का
मौका है। पहले म सोचती थी िक सं कृत भाषा किठन है। परन्तु धीरे -धीरे मुझे मालूम हो गया िक
सं कृत भाषा बहु त रोचक है। अब मुझे सं कृत भाषा बहु त अच्छी लगती है।
हमने एक साल पहले ही सं कृत पढ़ना शुरू िकया था। सबसे पहले हमने सं कृत पढ़ने के िलए
दे वनागरी िलिप सीखी। उसके बाद धीरे -धीरे हमने सं कृत के श द और वाक्य सीखे। अब तक हमने
सं कृत की पाँच सुन्दर कहािनयाँ पढ़ ली ह। इसके साथ हमने सं कृत के बहु त से ोक भी पढ़े
ह। मुझे सं कृत के ोक बहु त पसन्द ह। हम सं कृत की कक्षा म बड़ा मजा आता है।
भिव य म म भगव ीता, योग-सूतर् और बौ धमर् की महायान शाखा के सूतर् सं कृत म पढ़ना
चाहती हू ँ। अब म सं कृत म सरल वाक्य िलख सकती हू ँ इसिलए यह पतर् सं कृत म िलख रही हू ँ।
आप भी अपना उ र सं कृत भाषा म भेज। आपका उ र सं कृत म पाकर मुझे बहु त स ता होगी।
ेह के साथ आपकी
तोको
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संधान सं कृत- वेश