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वव

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वव
र द (१/१५४)-ऋषि दीर्घतमा औचथ्य, छन्द षिष्टु प्, दे वता षवष्णु
वव
ऋग्वे
वव


षवष्णोर्ु

वव घ कं वीयाघ षण प्र वोचं यः पाषथघ वाषर् षवममे रजां षस।

- अस्कभायदु त्तरं सधस्थं षवचक्रमाणस्त्रे धोरुगायः॥१॥
यो
वव
ववव
वव

प्र

व तषिष्णु ः स्तवते वीयेण मृ गो र् भीमः कुचरो षगररष्ाः।
वव


वव
यस्योरुिु षििु षवक्रमणेष्वषधषियन्ति भु वर्ाषर् षवश्वा॥२॥
वव

वव
प्र
व षवष्णवे शू िमे तु मन्म षगररषित उरुगायाय वृष्णे।
वव
वव

वव
च इदं दीर्ं प्रयतं सधस्थमे को षवममे षिषभररत्पदे षभः॥३॥
ववय

यस्य
वव िी पूणाघ मधुर्ा पदान्यिीयमाणा स्वधया मदन्ति।



द उ षिधातु पृषथवीमु त द्यामे को दाधार भु वर्ाषर् षवश्वा॥४॥
रव
वव
तदस्य
वव षप्रयमषभ पाथो अश्ां र्रो यि दे वयवो मदन्ति।

वव


उरुक्रमस्य स षि बन्धुररत्था षवष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः॥५॥
(

वव

ता
वववां वास्तून्युश्मषस गमध्यै यि गावो भूररशृङ्गा अयासः।


१अिाि
व तदु रुगायस्य वृष्णः परमं पदमव भाषत भू रर॥६॥
वव

वव
/य

रप



वव
वव
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ववव।

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वव

वव

वव

वव

वव
वव


वव

वव

वव


वव
वव
वव

रय ् (७/९७)-ऋषि-वषसष्ः मैिावरुषणः, छन्द-षिष्टु प्, दे वता षवष्णु-१-३,७, इन्द्राषवष्णू ४-६
वव
ऋक

वव

पु
वरो मािया तन्वा वृधार् र् ते मषित्वमन्वश्नुवन्ति।
वव
उभे
य ते षवद्म रजसी पृषथव्या षवष्णो दे व त्वं परमस्य षवत्से ॥१॥

वव
र्

वव
र्

वव ते षवष्णो जायमार्ो र् जातो दे व मषिम्नः परमिमाप।
वव

उदस्तभ्र्ा
वव र्ाकमृ ष्वं बृििं दधथघ प्राची ककुबं पृषथव्याः॥२॥
वव



वव
इरावती धेर्ुमती षि भू तं सूयवषसर्ी मर्ुिे दशस्या।
वव
वव

ि
व्यस्तभ्र्ा

वव
ि रोदसी षवष्णवेते दाधथघ पृषथवीमषभतो मयूखैः॥३॥

उरु
ववं यज्ञाय चक्रथु रु लोकं जर्यिा सूयघमुिासमषिम् ।
वव



दासस्य

वव षचद् वृिषशप्रस्य माया जघ्नथु र्घरा पृतर्ाज्ये िु॥४॥
वव

इन्द्राषवष्णू दं षिताः शम्बरस्य र्व पुरो र्वषतं च श्नषथष्टम् ।
वव
र्


व वषचघर्ः सिस्रं च साकं िथो अप्र्यसुरस्य वीरार्् ॥५॥
वव
शतं

वव




इयं
त मर्ीिा बृिती बृििोरुक्रमा तवसा वधघयिी।
वव


वव

ररे वां स्तोमं षवदथे िु षवष्णो षपन्वतषमिो वृजर्े न्तष्वन्द्र॥६॥
वव
वव

वव
विट्
वव

य ते षवष्णवास आ कृणोषम तन्मे जु िस्व षशषपषवष्ट िव्यम् ।


म िु त्वा सुष्टु तयो षगरो मे यूयं पात स्वन्तस्तषभः सदा र्ः॥७॥
वधघ
वव

वव


ि ् (७/१००)ऋषि-वषसष्ः मैिावरुषणः, छन्द-षिष्टु प्, दे वता-षवष्णु
ऋक
वव

वव

र्ू
व मतो दयते सषर्ष्यन्यो षवष्णव उरुगायाय दाशत्।


वव

प्र
वव यः सचािा मर्सा यजात एताविं र्यघमाषववासात्॥१॥
वव

वव
रव षवष्णो सुमषतं षवश्वजन्यामप्रयुतामे वयावो मषतं दाः।
त्वं
वव

वव
पचो

द यथा र्ः सुषवतस्य भूरेरश्वावतः पुरुश्चन्द्रस्य रायः॥२॥
वव
वव
षिदे

वव व ः पृषथवीमेि एतां षव चक्रमे शतचघसं मषित्वा।
वव



प्र
व षवष्णु रस्तु तवसस्तवीयान्त्त्वेिं ह्यस्य स्थषवरस्य र्ाम॥३॥
वव
वव

वव
षव
व चक्रमे पृषथवीमे ि एतां िे िाय षवष्णु मघर्ुिे दशस्यर्् ।





ध्रु
वव वासो अस्य कीरयो जर्ास उरुषिषतं सुजषर्मा चकार॥४॥
वव
र्
वव
रप्र तत्ते अद्य षशषपषवष्ट र्ामायघः शं साषम वयुर्ाषर् षविार््।
वव


वव

तं त्वां गृणाषम तवसमतव्यान्त्ियिमस्य रजसः पराके॥५॥


वव
र्

रय
षकषमत्ते षवष्णो पररचक्ष्यं भू त्प्र यिविे षशषपषवष्टो अन्ति।

वव
वव

वव
ि
मा वपो अिदप गृि एतद्यदन्यरूपः सषमथे बभू थ॥६॥
ववव
वव


विट् ते षवष्णवास आ कृणोषम तन्मे जु िस्व षशषपषवष्ट िव्यम् ।

वव
वव




वधघ
रवव ु त्वा सुष्टु तयो षगरो मे यूयं पात स्वन्तस्तषभः सदा र्ः॥७॥
य ि


वव
वव

वव
वव

ववणवव
वव
वव
स दववशवव।

वव

वव
ववव


ववव
वव
वव
वव।

वव
यज्ञो
वव षवष्णु ः स दे वेभ्य इमां षवक्रान्तिं षवचक्रमे यैिाषमयं षवक्रान्तिररदमे व प्रथमे र् पदे र् पस्पाराथे दमिररिं षितीयमेर्

षदवमु त्तमेर्। (शतपथ ब्राह्मण १/९/३/९)
वव
ि
इमे वै लोका षवष्णोषवघक्रमणं षवक्रािं षवष्णोः क्रािम् । (शतपथ ब्राह्मण ५/४/२/६)

वव
स (षवष्णु ः) इमााँ ल्लोकान्तन्वचक्रमे ऽथो वेदार्थो वाचम् (ऐतरे य ब्राह्मण ६/१५)
एतिै
वव दे वा षवष्णु भूघत्वेमााँ ल्लोकार्क्रमि यषिष्णुभूघत्वा क्रमि तिाद् षवष्णु क्रमाः। (शतपथ ब्राह्मण ६/७/२/१०)
तिाऽिोरािे
वव
वव ऽएव षवष्णु क्रमा भवन्ति। (शतपथ ब्राह्मण ६/७/४/१०)
वामर्ो
वव ि षवष्णु रास (शतपथ ब्राह्मण १/२/५/५)

मन्विरे तु सम्प्राप्ते तथा वैवस्वते षिज। वामर्ः कश्पाषिष्णु राषदयां सम्बभू व ि॥

षिषभः क्रमै ररमााँ ल्लोकाषित्वा येर् मिात्मर्ा। पुरन्दराय िै लोक्यं दत्तं षर्ितकण्टकम् ॥ (षवष्णु पुराण ३/१/४२-४३)
वव
व(१) ब्रह्म का षवष्णु रूप-
एकमू
वव षतघस्त्रयो दे वाः, ब्रह्मषवष्णु मिे श्वराः। ियाणामं तरं र्ान्तस्त गुणभे दाः प्रकीषतघताः॥
(स्कन्द
वव पुराण ५अविी खण्ड, रे वा खण्ड १४६/११६, पद्म पुराण, २ भू षम खण्ड ७१/२१)
गायिी

वव मन्त्र के ३ पाद ब्रह्म के ३ रूप वणघर् करते िैं -
प्रथम पाद स्रष्टा रूप ब्रह्मा- तत् सषवतुवघरेण्यम् ।
वव
षितीय पाद षक्रया रूप षवष्णु-भगो दे वस्य धीमषि।


तृतीय पाद ज्ञार् रूप षशव-षधयो यो र्ः प्रचोदयात्।
वव
य ल अथवघ वेद का ियी षवभाजर् भी इसी आधार पर िै , मूल भी बच जाता िै अतः ियी = ४ वेद।
मू
वव
ऋग्भ्यो
वव जातां सवघशो मू षत्तघ माहः, सवाघ गषतयाघ जुिी िै व शश्वत्।

व तेजं सामरूप्यं ि शश्वत्, सवं िे दं ब्रह्मणा िै व सृष्टम् ॥ (तैषत्तरीय ब्राह्मण,३/१२/८/१)
सवं
ब्रह्मा अलग अलग षपण्डों का समू ि िै षजसका वणघर् ऋग्वे द करता िै । षवष्णु गषत रूप िै , उसी गषत में जब चक्रीय
(त
क्रम से उपयोगी वस्तु का उत्पादर् िोता िै तो वि यज्ञ िै । गीता, अध्याय ३-
वव

सियज्ञाः प्रजाः सृष्वा पुरो वाच प्रजापषतः। अर्े र् प्रसषवष्यध्वमेि वोऽन्तिष्टकामधुक्॥१०॥

वव
एवं प्रवषतघतं चक्रं र्ार्ु वतघयतीि यः॥१६॥
अतः
य षवष्णु
ववरत ५/७यज्ञ
०/३)रूप भी िै । (वाजसर्े षय सं. २२/२०)-षवष्णवे स्वािा षवष्णवे षर्भू यपाय स्वािा, षवष्णवे षशषपषवष्टाय
स्वािा, यज्ञो वै षवष्णुः (शतपथ ब्राह्मण १३/१/८/८)। तेज या मषिमा साम वेद िै । षकसी वस्तु के साम (जिां तक उसका
शज या प्रभाव िै ) में रिर्े पर िी उसका ज्ञार् िो सकता िै । अतः भगवार्् र्े वेदों में अपर्े को सामवेद किा िै (गीता
ते
१०/२२) षशव का वेद में रुद्र रूप से वणघर् िै षजसके शाि रूप को षशव किते िैं । या ते रुद्र षशवा तर्ू ः अर्ोरा
वव
पापकाषशर्ी
वव (वाज. सं. १६/२,४९, तैषत्तरीय सं. ४/५/१/१, ४/५/१०/१, मैिायणी सं. १२०/९८, १२७/११, काण्व सं.
१७/११,
वव १६, श्वे ताश्वतर उप. ३/५) अन्य प्रकार से तीर्ों यज्ञ के षवषभन्न क्रम िैं -आरम्भ के षलये पदाथों का संिि ब्रह्मा

व, उसमें पररवतघर् और षक्रया षवष्णु िै , अि में बचा हआ पदाथघ षशव िै । उच्छे िणभागो वै रुद्रः (तैषत्तरीय ब्राह्मण
िै
१/७/८/५) ब्रह्मापघणं ब्रह्म िषवब्रघह्माग्नौ ब्रह्मणा हतम् । ब्रह्मैव तेर् गिव्यं ब्रह्मकमघ समाषधर्ा॥ (गीता, ४/२४)
प्रायः
म षवष्णु या र्ारायण को िी पूणघ ब्रह्म या पुरुि सूक्त का पुरुि किते िैं । षिदण्डी स्वामी षवष्वक्सेर्ाचायघ र्े पुरुि
सूक्त की टीका में पद्म पुराण के श्लोक उद् धृत षकये िैं जो वतघमार् मु षद्रत पद्म पुराण में र्िीं षमलते िैं -
वव
पुं संज्ञे तु शरीरे ऽन्तिर्् शयर्ात् पुरुिो िररः। शकारस्य िकारोऽयं व्यययेर् प्रयुज्यते॥
वव पुरे शरीरे ऽन्तिन्नास्ते स पुरुिो िररः। यषद वा पुरवासीषत पुरुिः प्रोच्यते िररः॥
यिा
यषद
व वा पूवघमेवासषमिे षत पुरुिं षवदु ः। यषद वा बहदार्ािै षवष्णु पुरुि उच्यते॥

वव


पूणघत्वात् पुरुिो षवष्णु ः पुराणत्वाच्च शाषङ्गघणः। पुराण भजर्ाच्चाषप षवष्णु ः पुरुि ईयते।
यिा पुरुि शब्दोऽयं रूढ्या वन्तक्त जर्ादघ र्म् ।
पन्तण्डत मधुसूदर् ओझा र्े भी यिी वणघर् अपर्े ब्रह्म षसद्धाि (बर्ारस षिन्त्दू षवश्वषवद्यालय, १९६३) के अध्याय ११ के
श्लोक १७२-१७४ में षकया िै -
पुरु व्यवस्यर्् पुरुधा स्यषत स्वतस्ततः स उक्तः पुरुिश्च पूरुिः।
पुरा स रुष्ययथ पूिुघ रुष्यते स पूरुिो वा पुरुिस्तदु च्यते॥
धी प्राणभू तस्य पुरे न्तस्थतस्य सवघस्य सवाघ र्षप पाप्मर्ः खे।
यत्सवघतोऽिादषप पूवघ औित् स पूरुिस्ते र् मतोऽयमात्मा॥
स व्यक्तभू ते वसषत प्रभू ते शरीरभू ते पुरुिस्ततोऽसौ।
पुरे षर्वासाद्दिराषदके वा वसययं ब्रह्मपुरे ततो७षस॥
अथाघ त् पुरुि शब्द की वैषदक षर्रुन्तक्तयां -
(१) पुरुधा + स्यषत = सवघप्रथम िै तथा सृषष्ट षक्रया में षलप्त िै। िो धातु का अथघ िै व्यवसाय करर्ा। इसमें षव तथा अव्
उपसगघ लगर्े से स्यषत िोता िै। यि पुरुि या पूरुि भी किा जात िै ।
(२) पुरुधा + स्यषत = पुरुि-अथाघ त् वि स्वयं कई रूपों का िो जाता िै ।
(३) पुरा + रुष्यषत = पुरुि। रुि = मारर्ा, र्ष्ट करर्ा, क्रोध करर्ा। अर्ि रस को सीमा के षभतर रकर्ा इसको
मारर्ा िै । सृषष्ट इसी प्रषक्रया से िोती िै ।
(५) पुरु + रुष्यते = यि पुरों को अपर्े भीतर र्ेरता िै , अति् यि पुर + रुि = पुरुि हआ।
(६) पुरा + औित् = यि पर्े भीतर माया का आवरण र्ष्ट करता िै ।
(७) पुरे + वसषत = पुरुि (व का उ िो जाता िै ), अथाघ त् वि पुर में षर्वास करता िै । यि सबसे प्रचषलत षर्रुन्तक्त िै ।
(८) पुर दश् जगत् िै , तथा रस भी (षवश्व का मूल समरूप पदाथघ ) िै । यि ब्रह्म का पुर या स्थर् िै । चेतर्ा का षर्वास
दिर िै । यि षवन्त्दु माि या षवस्तृ त आकाश भी िो सकता िै ।
गीता में भी भगवार्् की स्तुषत में अजुघ र् र्े किा िै - त्वमाषददे वः पुरुिः पुराणः त्वमस्य षवश्वस्य परं षर्धार्ः॥ (११/३८)
(२) आकाश में षवष्णु रूप-सभी षक्रया के षलये ऊजाघ का स्रोत सूयघ िी षवष्णु का प्रयि रूप िै । सूयघ को २ प्रकार से
दे खते िैं -परमे ष्ी (ब्रह्माण्ड के १०० अरब तारा में एक) जो उसके केन्द्र से आकषिघ त िो कर चक्कर लगा रिा िै । यि
अपेिाकृत स्थायी िै अतः इसे अमृ त या पुराण में अकृतक किते िैं । दू सरा रूप िै षक वि ििों को अपर्े आकिघ ण
से किा में रखे हये िै । इर्में मध्य ताप िे ि में पृथ्वी पर जीवों का जीवर् मरण िोता रिता िै अतः यि मयघ या
अकृतक िै ।
आ कृष्णे र् रजसा वतघमार्ो षर्वेशयर्् अमृ तं मयं च।
षिरण्ययेर् सषवता रथे र्ा दे वो याषत भु वर्ाषर् पश्र्् ॥
(ऋग्वे द १/३५/२, वाज. सं. ३३/४३, ३४/३१, तैषत्तरीय सं. (कृष्णे र् के बदले सयेर्) ३/४/११/२, मै िायणी सं. १९६/१६,
२२४/१)
रजसा = गषतशील, रज या तारा रूप कणों का समू ि। आ कृष्णे र् -चारों तरफ के किघ ण (गुरुत्वाकिघ ण) से गषतशील
न्तस्थषत में । षर्वेशयर्् -उसके भीतर मयघ और अमृ त दोर्ों िैं । षिरण्ययेर् रथे र्-सूयघ षिरण्य या तेज रूप िै । वि
षिरण्मय िै । उससे उसका रथ या सौरमण्डल चल रिा िै , वि षिरण्य-येर् िै । सषवता= सौर मण्डल के ििों तथा
जीवर् का जन्मदाता (सव या प्रसव = जन्म दे र्ा)। गायिी मन्त्र का तत् सषवता = इस सषवता का भी सषवता परमे ष्ी
और उसका भी अन्तिम सषवता अव्यक्त ब्रह्म िै । भु वर्ाषर् पश्र्् = परमे ष्ी के तारा समू ि को पररक्रमा क्रम में
दे खता िै । अपर्े िे ि या मण्डल के ििों का दे खभाल भी करता िै ।
षवष्णु पुराण (२/७)-िैलोक्यमेतत् कृतकं मै िेय पररपठ्यते। जर्स्तपस्तथा सयषमषत चाकृतकं ियम् ॥१९॥ = पूवघ
वषणघत ३ लोक-भू (पृथ्वी िि), भु वः (िि िे ि), स्वः (सौरमण्डल)-कृतक िैं । जर्ः (परमे ष्ी), तपः (दश् जगत्), सय-ये
अकृतक िैं ।
इर्के बीच में मिलोक िै जो आकाश की सपाघ कार भु जा (शे िर्ाग) की मोटाई के बराबर गोला िै षजसमें सूयघ न्तस्थत
िै । इसके १००० तारा शे ि के १००० षसर िैं । अषिररव भोगैः पयेषत बाहं ज्याया िे षत पररबाधमार्ः (ऋग्वे द ६/७५/१४,
वाज. सं. २२/१५, तैषत्तरीय सं. ४/६/६/५) अब्जामु क्ैःअषि गृणीिे बुध्ने र्दीर्ां रजः सु िीदर्् ॥ (ऋग्वे द ७/३४/१६) =
अब्ज = अप् (परमे ष्ी का जल जै सा फैला पदाथघ) से उत्पन्न। उक् = षर्कला हआ। अषि = सपघ। बुध्न = बाढ़ (जिां
जल सर्र् िै )। र्दीर्ां (परमे ष्ी का केन्द्रीय चक्र जो आकाशगंगा रूपी र्दी िै ) रजःसु = लोकों में । िीदर्् = रिता िै ।
गृणीिे षर्कले हए षवद् युत् कणों की तरि।
३. षवष्णु के पद-सूयघ रूपी षवष्णु के ३ पद सौर मण्डल के भीतर िैं , चतुथघ पद उसके प्रकाश की सीमा िै जिां तक
वि षवन्त्दु रूप में दीखता िै ।
इदं षवष्णुषवघचक्रमे िे धा षर्दधे पदम् । समू ळ्िमस्य पां सुरे॥ (ऋक् १/२२/१७) इदं षवष्णु = यि सौर मण्डल। तद्
षवष्णोः परमं पदं = उस षवष्णु का परम पद। इस सौर मण्डल में सूयघ के ३ पद िैं । अस्य पां सुरे (इस लोक = सौर
मण्डल) का यि मूल िै ।
तद्यदे ताँ शतशीिाघ णाँ रुद्रमे तेर्ाशमयंस्तिाच्छतशीिघ रुद्र शमर्ीयाँ शतशीिघ रुद्र शमर्ीयाँ ि वै तच्छत रुषद्रयषमयाचिते
परोऽिम् । (शतपथ ब्राह्मण ९/१/१/७)
शतयोजर्े ि वा एि (आषदयः) इतस्तपषत। (कौिीतषक ब्राह्मण उपषर्िद् ८/३)
स एि (आषदयः) एकशतषवधस्तस्य रश्मयः शतं षवधा एि एवैकशततमो य एि तपषत। (शतपथ ब्राह्मण १०/२/४/३)
युक्ताह्यस्य (इन्द्रस्य) िरयः शतादशे षत। (ऋक् ६/४७/१८)
सिस्रं िै त आषदयस्य रश्मयः (िरयः = रश्मयः)। (जै षमर्ीय उपषर्िद् ब्राह्मण १/४४/५)
असौ यस्ताम्रो अरुण उत बभ्ु ः सुमङ्गलः।
ये चैर्ं रुद्रा अषभतो षदिु षिताः सिस्रशो िे ड ईमिे ॥ (वाजसर्े यी संषिता १६/६)
िे सूयघ सिस्रां शो तेजो राषश जगत्पते (स्तोि)
भू मेयोजर्लिे तु सौरं मैिेय मण्डलम्। लिाषद्दवाकरस्याषप मण्डलः शषशर्ः न्तस्थतम् ॥५॥
पूणे शतसिस्रे तु योजर्ार्ां षर्शाकरात्। र्ििमण्डलं कृत्स्नमु पररष्टात् प्रकाश्ते॥६॥ (षवष्णु पुराण २/७)
भू षम के योजर् (भू व्यास का १००० भाग) से सूयघ का षपण्ड १ लाख योजर् (पृथ्वी व्यास का प्रायः १०० गुणा दू र) िै ।
सूयघ से १ लाख योजर् (सौर मण्डल के षलये योजर् = सूयघ व्यास) शषश मण्डल (जिां उसका तेज चन्द्र जै सा िै ) िै ।
उसके बाद र्िि मण्डल का िी प्रकाश िै ।
आकाश में िर धाम षपछले धाम का २ गुणा िै , षजर्की माप अिः में िै । पृथ्वी के भीतर ३ तथा बािर ३० धाम िैं ।
षिं शद् धाम षव राजषत वाक् पतङ्गाय धीयते। प्रषत वस्तो रिद् युषभः॥ (ऋक् १०/१८९/३)
िाषिशतं वै दे वरथाि्न्यन्ययं लोकस्ताँ समिं पृषथवी षिस्तावत्पयेषत तां समिं पृषथवीं षिस्तावत्समु द्रः पयेषत.....
(बृिदारण्यक उपषर्िद् ३/३/२)
तद् षवष्णोः परमं पदं सदा पश्न्ति सूरयः। षदवीव चिु राततम् ॥ (ऋक् १/२२/२०)
= उस षवष्णु (सूयघ सीमा ब्रह्माण्ड) का परम पद सूयों के समू ि रूप में दीखता िै । यि सूयघ रूपी चिु का चारों ओर
षवस्तार िै । सूरयः = सूयों का समू ि। ब्रह्माण्ड में षजतर्े सूयघ िैं (१०० अरब) उतर्े िी मर्ु ष्य मन्तस्तष्क में कण िैं
(शतपथ ब्राह्मण १०/४/४/२,१२/३/२/५) । अतः सूरयः का अथघ षविार्् भी िै ।
इस परम पद को िी सूयघ षसद्धाि में वि िेि किा िै जिां तक सूयघ षकरणों का प्रसार िै , अथाघ त् वि षवन्त्दुमाि
दीखता िै । चन्द्रकिा का कल्प (ब्रह्मा का षदर् = ४३२ कोषट विघ ) में षजतर्ा भगण (पररक्रमा) िोती िै , किा पररषध में
उतर्े से गुणा करर्े पर ब्रह्माण्ड की किा िोती िै । इसका मार् प्रायः १.८७ x १० र्ात १७ योजर् िै जिां भ-योजर् का
प्रयोग िै । भ= र्िि, २७। सूयघ षसद्धाि में भू योजर् = पृथ्वी व्यास का १६०० भाग = प्रायः ८ षमलोमीटर। भ-योजर्
= २७ भू योजर् = प्रायः २१४ षक.मी.।
कल्पोक्त चन्द्रभगणा गुषणताः शषशकिया। आकाशकिा सा ज्ञे या करव्यान्तप्तस्तथा रवेः॥८१॥
ख व्योम ख-िय ख-सागर िट् क र्ाग व्योमाष्ट शून्य यम-रूप र्गाष्ट चन्द्राः।
ब्रह्माण्ड सम्पु टपररभ्मणं समिादभ्यिरा षदर्करस्य कर प्रसाराः॥ (सूयघ षसद्धाि १२/८१, ९०)
मर्ु िृषत में इसी को अषग्न, वायु रषव किा िै -
अषग्न वायु रषवभ्यस्तु ियं ब्रह्म सर्ातर्म् । दु दोि यज्ञषसद्ध्यथघमृग्यजु ः साम लिणम् ॥ (मर्ुिृषत, १/२३)
वायवस्थ ऊजाघ को ईिादण्ड किा गया िै । षवष्णु पुराण में उसकी पररषध १८००० योजर् अथाघ त् षिज्या ३००० योजर्
(सूयघ से३००० व्यास दू र यूरेर्स किा तक) किा िै ।
इिे त्वा ऊजे त्वा वायवस्थः (वाजसर्े षय यजु का प्रथम मन्त्र)
योजर्ार्ां सिस्राणी भास्करस्य रथो र्व। ईिादण्डस्तथै वास्य षिगुणो मु षर्सत्तम॥ (षवष्णु पुराण २/८/२)
धाम या अिगघण माप में २७ अिगघण (पृथ्वी षिज्या २ र्ात २४) तक सौर भूषम या मै िेय मण्डल किा िै। ३३ अिगघण
तक सौरमण्डल िै जिां तक सूयघ का प्रकाश अषधक िै ।
ियन्तस्त्रंशो वै स्तोमार्ामषधपषत॥ (ताण्ड्य मिाब्राह्मण ६/२/७)
ज्योषतस्यन्तस्त्रंशः स्तोमार्ाम् । (ताण्ड्य मिाब्राह्मण १३/७/२)
अिो वै ियन्तस्त्रंशः परमो वै ियन्तस्त्रंश स्तोमार्ाम् । (ताण्ड्य मिाब्राह्मण ३/३/२)
संवत्सरो वाव प्रषतष्ा ियन्तस्त्रंशः (वाजसर्े यी १४/२३, शतपथ ब्राह्मण ८/४/१/२२)
वज्रन्तस्त्रणवः। (शतपथ ब्राह्मण ८/४/१/२०, १३/४/४/१,िड् षवंश ब्राह्मण ३/४, ताण्ड्य मिाब्राह्मण ३/१/२)
इमे वै लोकान्तस्त्रणवः। (ताण्ड्य मिाब्राह्मण ६/२/३, १९/१०/९)
षिवृिा अषग्नरङ्गारा अषचघधूघम इषत। (कौिीतषक ब्राह्मण उपषर्िद् २८/५)
= षिवृत् = ३ का वगघ ९ तक अषग्न (अंगार, अषचघ, धूम) िै।
तिात् षिवृत् स्तोमार्ां मु खम् । (ताण्ड्य मिाब्राह्मण१७/३/२)
४. पृथ्वी पर षवष्णु के पद-पृथ्वी पर सूयघ की २ प्रकार गषत दीखती िै । अिभ्मण के कारण षकसी स्थार् पर २४ र्ण्टे
में सूयघ षिषतज के ऊपर और र्ीचे चक्र लगाता िै । या पृथ्वी की पररक्रमा पूवघ-पषश्चम षदशा में करता िै । पृथ्वी
पररक्रमा में प्रायः ३६० अि भ्मण (३६५.२२) िोते िैं । अतः वृत्त को ३६० अंशों में बां टा गया िै । इसमें ६-६ अंश (२४
षमर्ट = १ दण्ड) के अिर पर समय िे ि िैं । ९० अंश के अिर पर षवष्णु के ४ पद िैं । स्वायम्भु व मर्ु काल में
पुराणों के र्गर थे-इन्द्र की अमरावती से ९० अंश पषश्चम यम की संयमर्ी, ९० अंश पूवघ वरुण की सुखा, १८० अंश
पूवघ या पषश्चम सोम की षवभावरी। भारत की पूवघ सीमा पर अमरावती (इण्डोर्े षसया के पूवघ भाग में सुलावेसी, उसके
पूवघ गोरोण्टलो में गरुड़स्थार्) तथा पषश्चम सीम पर संयमर्ी (जौडघ र् के अम्मार् के पषश्चम, मृ त सागर का पूवघ तट) थी।
मध्य में उज्जै र् था जो प्राचीर् काल का शू न्य दे शािर था। िवाई िीप में वरुण की सुखा तथा न्यू याकघ, षटि षर्डाड या
गुयार्ा में सोम की षवभावरी थी। इसी दे शािर पर षविु वत् रे खा (षर्रि = शून्य अिां श) पर लं का था (वतघमार्
लक्कादीव = लं कािीप तथा मालदीव = मालीिीप के बीच)। यिां का समव षवश्व समय था, अतः यिां के राजा को
कुबेर (कु = पृथ्वी, बेर = समय) किते थे । बाद में रावण र्े इस पर अषधकार षकया। षववस्वार्् (सूयघ, वैवस्वत मर्ु के
षपता) के काल में ४ मु ख्य र्गर थे -लं का (उसके डूबर्े के बाद उज्जै र्), ९० अंश पूवघ यमकोषटपत्तर्, ९० अंश पषश्चम
रोमकपत्तर्, १८० अंश पूवघ या पषश्चम षसद्धपुर। उत्तरी गोलाधघ के ४ पादों को भू पद्म के ४ दल किते थे-भारत, पूवघ में
भद्राश्व, पषश्चम में केतुमाल, षवपरीत षदशा में कुरु।
षवष्णु पुराण (२/८)-मार्सोत्तरशै लस्य पूवघतो वासवी पुरी। (वासव = इन्द्र)
दषिणे तु यमस्यान्या प्रतीच्यां वारुणस्य च। उत्तरे ण च सोमस्य तासां र्ामाषर् मे शृणु॥८॥
वस्वौकसारा शक्रस्य याम्या संयमर्ी तथा। पुरी सुखा जले शस्य सोमस्य च षवभावरी।९।
शक्रादीर्ां पुरे षतष्र्् स्पृशयेि पुरियम् । षवकोणौ िौ षवकोणस्थस्त्रीर्् कोणान्त्िे पुरे तथा।॥१६॥
उषदतो वद्धघ मार्ाषभरामध्याह्नात्तपर्् रषवः। ततः परं ह्रसिीषभगोषभरस्तं षर्यच्छषत॥१७॥
(सूयघ षसद्धाि १२/३८-४२)-भूवृत्तपादे पूवघस्यां यमकोटीषत षविु ता। भद्राश्वविे र्गरी स्वणघप्राकारतोरणा॥३८॥
याम्यायां भारते विे लङ्का तिर्् मिापुरी। पषश्चमे केतुमालाख्ये रोमकाख्या प्रकीषतघता॥३९॥
उदक् षसद्धपुरी र्ाम कुरुविे प्रकीषतघता (४०) भू वृत्तपादषववरास्ताश्चान्योन्यं प्रषतषष्ता (४१)
तासामु पररगो याषत षविुवस्थो षदवाकरः। र् तासु षविु वच्छाया र्ािस्योन्नषतररष्यते ॥४२॥
(षवष्णु पुराण २/२)-भद्राश्वं पूवघतो मे रोः केतुमालं च पषश्चमे। विे िे तु मु षर्िे ष् तयोमघ ध्यषमलावृतः॥२४॥
भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा। पिाषण लोकपद्मस्य मयाघ दाशै लबाह्यतः॥४०॥
वाल्मीषक रामायण, षकन्तष्कन्धा काण्ड, अध्याय ४० में किा िै षक जम्बू िीप के पूवघ भाग में इन्द्र र्े षपराषमड (षिषशरा
केतु) बर्ाया था। यिीं पर षिषवक्रम षवष्णु र्े पूवघ षदशा में पद रखा था। यिां गरुड़ का भवर् था
सुवणघ रूप्यकं चैव सुवणाघ करमन्तण्डतम् । यविीपमषतक्रम्य षशषशरो र्ाम पवघतः॥३०॥
गता द्रक्ष्यथ तां चैव बृितीं कूटशाल्मलीम् । गृिं च वैर्तेयस्य र्ार्ारत्नषवभू षितम् ॥३९॥
षिषशराः काञ्चर्ः केतुस्तालस्तस्य मिात्मर्ः। स्थाषपतः पवघतस्यािे षवराजषत सवेषदकः॥५३॥
पूवघस्यां षदषश षर्माघ णं कृतं तन्तरिदशे श्वरै ः। ततः परं िे ममयः िीमार्ु दयपवघतः॥५४॥
(जम्बू िीप = एषसया) की पूवघ षदशा के षलये विां उदय पवघत (पूवघ षदशा में पिले सूयोदय) पर ३ षसर का ताल (स्तम्भ)
इन्द्र का बर्ाया िै । (सम्भवतः ४ षिभु जों से षर्रा षपराषमड, या षिकोणाकार स्तम्भ)
ति योजर् षवस्तारमु न्तच्छितं दशयोजर्म्। शृङ्गं सौमर्सं र्ाम जातरूपमयं ध्रुवम् ॥५७॥
ति पूवघपदं कृत्वा पुरा षवष्णुन्तस्त्रषवक्रमे । षितीयं षशखरे मे रोश्चकार पुरुिोत्तमः॥५८॥
उत्तरे ण पररक्रम्य जम्बू िीपं षदवाकरः। दश्ो भवषत भू षयष्ं षशखरं तन्मिोच्छियम् ॥५९॥
भारत से पूवघ षदशा का जिां अि िोता िै विां ब्रह्मा र्े उसका षचह्न दे र्े के षलये एक िार बर्ाया था-
पूवघमेतत् कृतं िारं पृषथव्या भुवर्स्य च। सूयघस्योदयर्ं चैव पूवाघ ह्येिा षदगुच्यते ॥६४॥
रामे श्वरम् -कालिस्ती-केदारर्ाथ के दे शािर से १८० अंश पूवघ में मे न्तक्सको का सूयघ षपराषमड (षिषशरा िार) िै । उज्जैर्
से १८० अंश पूवघ मे न्तक्सको का गुआडलजरा िै । उस रे खा पर षसद्धपुर था। कषपल को षसद्धों में प्रथम किा िै (गीता
१०/२६) अतः कुछ लोगों का अर्ु मार् िै षक कषपलारण्य से कैषलफोषर्घ या हआ िै ।
उज्जै र् शून्य दे शािर पर िोर्े के कारण यिां के ज्योषतषलघङ्ग को मिाकाल किते िैं । उससे ६ अंश पूवघ कालिस्ती
पिला समय िे ि िै । १२ अंश पूवघ दू सरे समय िे ि पर कोणाकघ सूयघ स्थार् िै । कालषप्रय (कालपी) तथा स्थाण्वीश्वर
(थार्ेश्वर) ० अंश तथा मू लस्थार् (पषश्चमी पंजाब का मुल्तार्) ६ अंश पषश्चम िै । वाराणसी का लोलाकघ ६ अंश पूवघ तथा
पटर्ा के पूवघ पुण्याकघ या उसके दषिण प्राचीर् सूयघ स्थार् दे व (औरं गाबाद) ९ अंश पूवघ िै । पुष्कर (उजबेषकस्तार् का
बुखारा) उज्जैर् से १२ अंश पषश्चम िै (षवष्णु पुराण २/८/२६)। जापार् की पुरार्ी राजधार्ी क्योटो ६० अंश पूवघ िै अतः
विां के राजा भी सूयघवंशी थे । षगजा (षमस्र) का षपराषमड ४५ अंश पषश्चम, पेरु के सूयघवंशी इं का (सूयघ षसद्धाि में इर्ः
= सूयघ) की राजधार्ी १५० अंश पषश्चम िै । इं गलै ण्ड का स्टोर्िे न्त्ज ७८ अंश (१३ िे ि) पषश्चम िै अतः उसे भी लं का
(लं काशायर) किते िैं । फ्ां स न्तस्वट् जरलैण्ड सीमा पर लौडे स (रुद्रे श) ७२ अंश (१२ िे ि) पषश्चम िै । िे लेसेपौण्ट
(िे षलओस = सूयघ), तुकी का इजमीर (मे रु), तथा कर्कले (कोणाकघ) सभी ४२ अंश पषश्चम िैं।
उत्तर दषिण षदशा में सूयघ की गषत उत्तर में ककघ रे खा से दषिण में मकर रे खा तक िै । उत्तरी सीमा (र्े षम) अि
झुकाव में पररवतघर्के कारण बदलती रिती िै । षजस िे ि में इसका समू ि था वि र्ै षमिारण्य िै । इक्ष्वाकु काल में
इर्के पुि षमषथला के राजा थे षजसकी सीमा पर ककघ रे खा थी अतः उर्को षर्षम किते थे। सूयघ रूपी आं ख षविु व पर
बन्द िो जाती िै । षर्षम पर आर्े से पूरी खुल जाती िै। मिाभारत काल में गया ककघ रे खा पर था, अतः उसे षवष्णु पद
तीथघ किते िैं । दषिणी र्े षम पर सूयघ रिर्े पर उत्तरी गोलाधघ में सबसे बड़ी रात तथा शीत िोता िै । इसे अररष्ट-र्े षम
किते िैं ।
उत्तरी गोलाधघ में षविु व से प्रायः २४ अंश (अभी २३.५ अंश) उत्तर ककघ रे खा िै । उत्तरी ध्रुव से उतर्ी दू री पर ध्रुववृत्त
६६ अंश उत्तर िोगा। षवष्णु का तीसरा पद ७२ अंश उत्तर तक जायेगा। अतः ध्रुव िे ि के र्ीचे २ िी पद पूणघ िोते िैं ।
रूस का कुछ भाग षविु व वृत्त में था जो पृथ्वी या उसके शासक राजा बषल का षसर हआ। अतः तीसरा पद बषल के
षसर पर रखा था।
५. षवष्णु के षवक्रम-इसके षलये कई शब्दों का प्रयोग िै ।
यज्ञो षवष्णु ः स दे वेभ्य इमां षवक्रान्तिं षवचक्रमे यैिाषमयं षवक्रान्तिररदमे व प्रथमे र् पदे र् पस्पाराथे दमिररिं षितीयमेर्
षदवमु त्तमेर्। (शतपथ ब्राह्मण १/९/३/९)
इमे वै लोका षवष्णोषवघक्रमणं षवक्रािं षवष्णोः क्रािम्। (शतपथ ब्राह्मण ५/४/२/६)
स (षवष्णु ः) इमााँ ल्लोकान्तन्वचक्रमे ऽथो वेदार्थो वाचम् (ऐतरे य ब्राह्मण ६/१५)
एतिै दे वा षवष्णुभूघत्वेमााँ ल्लोकार्क्रमि यषिष्णु भूघत्वा क्रमि तिाद् षवष्णु क्रमाः। (शतपथ ब्राह्मण ६/७/२/१०)
तिाऽिोरािे ऽएव षवष्णु क्रमा भवन्ति। (शतपथ ब्राह्मण ६/७/४/१०)
अथवघ वेद (८/१०) के ६खण्डों में षवराट् (दश् जगत् के षवषभन्न रूप) का वणघर् िै। इसमें षवक्राि (षवभाजर्), उद्
अक्राम (उत्क्राि-बािर षर्कलर्ा) न्यक्रामत् (पररणत िोर्ा) शब्दों के प्रयोग िैं । जै से-
(१०/१)-षवराड् वा इदमि आसीत् (पुरुि सूक्त, वाजसर्े षय ३१/५- ततो षवराड् अजायत, षवराजो अषधपूरुिः। स जातो
अयररच्यत पश्चाद् भू षममथो पुरः। अथवघ १९/६/९)-षवराड् अिे समभवत्----)
स उदक्रामत् सा गािघ पये न्यक्रामत्॥२॥
षवचक्रमाणस्त्रे धोरुगायः (ऋक् १/१५४/१, अथवघ ७/२६/१, वाज.सं. ५/१८, तैषत्तरीय सं. १/२/१३/३, काण्व सं. २/१०,
मै िायणी सं. १/२९/१९/९)
शं र्ो षवष्णु रुरुक्रमः (ऋक् १/९०/९) उरुक्रमः ककुिो यस्य पूवीर्घ मधघन्ति युवतयो जषर्िीः (ऋक् ३/५४/१४) स चक्रमे
मितो षर्रुरुक्रमः समार्िात्सदस एवयामरुत् (५/८७/४) षवश्वेत्ता षवष्णु राभरद् उरुक्रमः त्वेषितः। सतं मषििार््
िीरपाकमोदर्ं एमृिम् ॥ (८/७७/१०) उरुक्रमस्य स षि बन्धुररत्था षवष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः॥ (ऋक् १/१५४/५) इयं
मर्ीिा बृििोरुक्रमा तवसा वधघयिी। (ऋक् ७/९९/६)
(१०/२)-स उदक्रामत् सा अिररिे चतुधाघ षवक्रािा अषतष्त्॥१॥
ऋग्वे द (५/३४/६)-षवत्वत्क्षणः समृ तौ (सं + ऋतौ= ठीक मागघ पर) चक्रमासजो (चक्र को ठीक से चलार्े वाला)।
क्रमु पाद षविे पे (धातुपाठ १/३१९)-१. आक्रमते, क्रम्यते-षर्भघ यता से जार्ा, रिण करर्ा, बढ़र्ा। २. आक्रम-उगर्ा,
उषदत िोर्ा। ३. उपक्रम-आरम्भ करर्ा। ४. षवक्रम-पद षगर्ते जार्ा। ५. व्याक्रम-अषतक्रमण करर्ा, आज्ञा भङ्ग
करर्ा। ६. अषतक्रम-बािर जार्ा। ७. आक्रम-जय पार्ा, अषधक िोर्ा। ८. उत्क्रम-अषतक्रमर् करर्ा, आज्ञा भं ग
करर्ा। ९. उपक्रम-षर्कल जार्ा। १०. षर्ष्क्रम-आगे जार्ा। ११. पराक्रम-वीरता षदखार्ा, अन्य को पार करर्ा। १२.
प्रक्रम-षर्कल जार्ा, समीप आर्ा। १३. पररक्रम-र्ूमर्ा, चक्कर लगार्ा। १४. षवक्रम-जीतर्ा, ऊपर जार्ा। १५.
संक्रम-स्थार्ािर करर्ा, अन्य जगि जार्ा।
षवष्णु के बहत से क्रमों की सूची अथवघवेद (१०/५) में िै।
अथवघ वेद (१०/५/५)-ऋषि २५-३५-कौषशक, दे वता (२५-३५)-षवष्णु क्रम
षवष्णोः क्रमोऽषस सपत्निा पृषथवी संषशतोऽषग्न तेजाः।
पृषथवीमर्ु षव क्रमे ऽिं पृषथव्यास्तं षर्भघजामो योऽिान्त्िेषष्ट यं वयं षिष्मः।
स मा जीवीत्तं प्राणो जिातु॥२५॥
षवष्णोः क्रमोऽषस सपत्निािररि संषशतो वायुतेजाः। अिररिमर्ु षव क्रमे ऽिमिररिात् षर्भघ जामो---॥२६॥
षवष्णोः क्रमोऽषस सपत्निा द्यौसंषशतः सूयघतेजाः। षदवमर्ु षव क्रमे ऽिं षदवस्तं ---॥२७॥
षवष्णोः क्रमोऽषस सपत्निा षदक्संषशतो मर्स्ते जाः। षदशोऽर्ु षवक्रमे ऽिं षदग्भ्यस्तं ---॥२८॥
षवष्णोः क्रमोऽषस सपत्निाशासंषशतो वाततेजाः। आशा अर्ु षव क्रमे ऽिमाशाभ्यस्तं --॥२९॥
षवष्णोः क्रमोऽषस सपत्नि ऋक्संषशतः सामतेजाः। ऋचोऽर्ु षव क्रमे ऽिमृ भ्यस्तं ---॥३०॥
षवष्णोः क्रमोऽषस सपत्निा यज्ञसंषशतो ब्रह्मतेजाः। यज्ञमर्ु षव क्रमे ऽिं यज्ञास्तं ---॥३१॥
षवष्णोः क्रमोऽषस सपत्निौिधीसंषशतः सोमतेजाः। ओिधीरर्ु षव क्रमे ऽिमोिधीभ्यस्तं ---॥३२॥
षवष्णोः क्रमोऽषस सपत्निाऽप्सुसंषशतो वरुणतेजाः। अपोऽर्ु षव क्रमे ऽिमद्भ्यस्तं ---॥३३॥
षवष्णोः क्रमोऽषस सपत्निा कृषिसंषशतो वरुणतेजाः। कृषिमर्ु षव क्रमे ऽिं कृष्यास्तं ---॥३४॥
षवष्णोः क्रमोऽषस सपत्निा प्राणसंषशतः पुरुितेजाः। प्राणमर्ु षव क्रमे ऽिं प्राणात् तं षर्भघजामो योऽिार्् िे षष्ट यं वयं
षिष्मः।
स मा जीवीत् तं प्राणो जिातु॥३५॥
कुछ अन्य क्रम-(१) षिषवक्रम-३ प्रकार के प्रभाव िे ि या साम (षवष्णु सिस्रर्ाम में षिसामा किा िै )। ताप, तेज,
प्रकाश या अषग्न-वायु-रषव (अथवघ ५/१०/२७)
मर्ु ष्य रूप षवष्णु वामर् िारा बषल के प्रषत राजर्ीषत के ३ षर्यमों का प्रयोग। राजर्ीषत के ४ अंग िैं -साम, दाम, दण्ड
भे द। यषद बल िो तो दण्ड षदया जा सकता िै । बल र्िी िै तो अन्य ३ षर्यम िोंगें षजर्को छल (षिषवक्रम = षतकड़म)
किते िैं -साम, दाम, भे द। मर्स्ते ज (अथवघ ५/१०/२८)
(२) उरुक्रम-इसका अथघ सामान्यतः षिषवक्रम करते िैं । उरु = बड़ा। शरीर में सबसे बड़ी िड्डी जं र्ा को भी उरु
किते िै । षवस्तृ त िोर्े के कारण पृथ्वी को उवी (स्त्रीषलङ्ग रूप) किते िैं । क्रम = षडजाइर्, षवशे ि क्रम में स्थाषपत
करर्ा। सबसे बड़ा षर्माघ ण र्गर का िोता िै , अतः र्गर को दषिण भारत में उरु या उर किते िैं , जै से षचत्तूर,
बंगलोर, तंजाउर। मर्ु ष्य षवष्णु र्े षशल्पशास्त्र के अर्ु सार सबसे पिले र्गरों का षर्माघ ण षकया अतः उर्को उरुक्रम
किा गया। बाद में राजा वरुण र्े भी उरु बर्ाये, अतः इराक का सबसे पुरार्ा र्गर उर िै जिां की उवघशी थी।
उरुं षि राजा वरुण श्चकार (ऋग् वेद १/२४/८) शं र्ो षवष्णु रुरुक्रमः (ऋग् वेद १/९०/१)
(४) यज्ञ के ३ सवर्-प्रातः, माधन्तन्दर् और सायं। (अथवघ १०/५/३१)
(४) षदशा के ३ षवक्रम-३ आयामी आकाश में गषत या र्ूणघर् (चक्रम) (अथवघ ५/१०/२८)
(५) औिषध या सोम (अथवघ ५/१०/३२)-रे तः, यश, िद्धा।
रे तो वै सोमः (कौिीतषक ब्राह्मण उप. १३/७, शतपथ ब्राह्मण १/९/२/९, तैषत्तरीय ब्राह्मण २/७/४/२ आषद)
यशो वै सोमः (शतपथ ब्राह्मण ४/२/४/९)
(ऋक् १०/७२/१०)-यशो वै सोमो राजा (ऐतरे य ब्राह्मण १/१३)
िद्धस्य सोम्ये षत स य एिोऽषणमै तदात्म्यषमदं (छान्दोग्य उपषर्िद् ६/१२/३) िद्धा वा आपः (तैषत्तरीय ब्राह्मण ३/२/४/१)
१. रे त परमे ष्ी पदाथघ का कण रूप िै । इसकी सर्र्ता के ३ रूप िैं -सोम द्रव की तरि फैला िै । र्ाभर्े षदष्ट में र्ाषभ
केन्द्र िै पर सीमा र्िीं िै । षिरण्य में केन्द्र और सीमा दोर्ों िैं।
२. यश रे त का प्रभाव िै । इसके ३ स्तर िैं -सुरा (मद्य) मर् का षर्यन्त्रण कम करता िै । पशु = उपभोग की वस्तु । सोम
= अर्ु पयुक्त फैला पदाथघ।
३. िद्धा दो भू तों के बीच का सम्बन्ध िै । िवा (रे खा) + धा (धारण) = दो षपण्डों के बीच १ रे खा में सम्बन्ध। यि सम्बन्ध
३ प्रकार का िै -पत्नी, आपः, तेज। पत्नी बराबर का सम्बन्ध िै । असुर सभ्यता में पत्नी सम्पषत्त िै , भारतमें पत्नी =
स्वाषमर्ी (पषत का स्त्रीषलं ग रूप)-यो मे प्रषतबलो लोके स मे भताघ भषवष्यषत (दु गाघ सप्तशती ५/१२०)। आपः (जल)
सम्बन्ध में दोर्ों एक दू सरे से षमल कर एकाकार िो जाते िैं । तेज में दू र से सम्बन्ध िोता िै -शब्द, स्पशघ , रूप, रस,
गन्ध िारा।
(६) अप् (जल जै सा तत्त्व)-फैला हआ तत्त्व जल िै षजसके षवषभन्न स्तर िै। मू ल षवश्व में रस रूप (सभी षदशा, स्थार्,
काल में समरूप), तरं ग युक्त सररर् या सषलल, ब्रह्माण्ड में अप्, शब्द या तरं ग युक्त अम्भ, अम्भ युक्त षशव साम्ब-
सदाषशव, सौर मण्डल में मर तथा पृथ्वी पर जल। सीमा बद्ध षर्षमघ त पदाथघ भु षम िै । षर्माघ णाधीर् अवस्था दोर्ों का
षमिण वराि (जल-स्थल का प्राणी) या मे र् (वायु+ जल का षमिण) िै । यि षवष्णु के ३ क्रम िैं -अप्, वराि, भू षम।यिै
तत्सु कृतं रसो वै सः । रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽर्न्दी भवषत। (तैषत्तरीय उपषर्िद् २/७)
समु द्राय त्वा वाताय स्वािा, सररराय त्वा वाताय स्वािा । (वा॰ यजु वेद ३८/७)
अयं वै सरररो योऽयं वायुः पवत एतिािै सरररात् सवे दे वाः सवाघ षण भू ताषर् सिे रते (शतपथ ब्राह्मण १४/२/२/३)
वेषदवै सषललम् (शतपथ ब्राह्मण ३/६/२/५)
द्यौवाघ ऽअपां सदर्ं षदषव ह्यापः सन्नाः । (शतपथ ब्राह्मण ७/५/२/५६)
आपो ि वाऽ इदमिे सषललमेवास। ता अकामयि कथं तु प्रजायेमिीषत । (शतपथ ब्राह्मण ११/१/६/१)
आापो वा अम्बयः । (कौिीतषक ब्राह्मण उपषर्िद् १२/२)
अयं वै लोकोऽम्भां षस (तैषत्तरीय ब्राह्मण ३/८/१८/१)
स इमााँ ल्लोकर्सृजत । अम्भो मरीचीमघरमापोऽदोऽम्भः परे ण षदवं द्यौः प्रषतष्ािररिं मरीचयः पृषथवी मरो या
अधस्तात्ता आपः । (ऐतरे य उपषर्िद् १/१/२)
(७) कृषि रूप (अथवघ ५/१०/३४)-यज्ञ, पजघ न्य, अन्न। पजघन्य वरुण तत्त्व िै ।
अन्नाद्भवन्ति भू ताषर् पजघन्यादन्न सम्भवः। यज्ञाद्भवषत पजघन्यो यज्ञः कमघ समु द्भवः॥(गीता ३/१४)
६. आकाश में षवष्णु के अवतार- पप पपपपपपप पपप पप पपपपप पप पपपपपपपप पपपप पप-
पपपपप पपपपप पप पपपपप पपपपपप पपपपप पपपपप प पपपपपप पपप-पपपपपप,
पपपप, पपपपप, पपपप, पपपपप पपपप पपपप पपपपपप (पपप पप पपप
पपपपपपपपपपपपपप) पपपपपपपप पप-
(प) पपपपपप-पपपपपपपप पपपपप पप पपपपप पपप पपप पपप पपप पपप पपप
पपपपपपपपपप पपपपपप पप पपप पपप पपप पपपप पपपपपपपप पपपपपपपपपप
पपपपप पपपपपपपपप पपपपपपपपप पपपपपपप पपपपपपपपप पपपपपपप
पपपपपपपपप पपपपपप पपपपपपपप प (पपप. पपप पप/पप)प पपपपपप पपप
पपपपपपप पपपपपपपपपपप पपपप पपपपपपपपप पपपपपप पपपपप (पपप पप/प/प)
पपपप पपपपपपप (drops) पप पपप पप, पपपपपपप पपपपप पपप पपपप
पपपपपपपपपप पपपपपपपपपपप पप, पपपपपपपपपप पपप पपपप पपपपपप पप पप
पपपपप पपपप पपपप पप पपपपपपप पपप पपपपपप पप पपपपपप पपप पपपपपपपपप
पपपपपप पपपपपपपपपपपपपपपप(पपप पप/पप/पप, पपपपप पप/प/पप, पपप. पपप.
पप/प, पपपपपपपपप पप. प/प/प/प, प/प/प/प, पपपपपपपपप पपपपपप प/प/पप, प/प/प,
पपपपप पप. पप/प, पप/पप,पप/प, पपपप पपपप. प/प/प/पप)
(प) पपपप-पपपपपपपपप पपपप पप पपपप पप पपपपपप पपपपपप पपपप पपप
पपपपपपप पपपप पपप पपपपप पपप पपप पप पपपपप पपपपपपपपपपपप पप
पपपपपपप पप पपप, पपपप पपपपपपप पप पपपपप पप पप पपपप पप पप पपपपपपप
पप पपप-पपप पपप पपपप पपप पपप पप पपपप पपपपप पपप
(प) पपपप-पपपप पप पपपप पपप पप पपपप पपपपप पपप पपपपप पप पपप पपपपपप
पप पपपपपप पपपप पपपप पपप पप, पप पप पपप पपप पपपपपपपप पप पपपपप पप
पप पप, पपपपप पपपपपपपपपप पपप पपपप पपपपपपप पपपप पप पपपप पप पपपप,
पपपपपपपपपप पप पपपपपप पपप, पपपपप पपपप पप पपपप पप पपपप पप पपपप,
पपप पपपपप पप पप पपप पपप पप पपपपपपपप पपपपप पपपपपप पपप, पप प पपपप
पप पपप-पपपपपपपपपप= पपपपपपप, पपप पपपपपप=पपपपपपप, पप पपपपप
पपपपपप पपपपप पपपप पपप पप पपपपपप पपपप पपप पपप पप पप पपपप पप पपप
पप पपपपप पप, पपपप पप-पपपप पपपपप पप पपपपपप पप, पपप पप पपपपप पपपप
पपपप पपप पप प पपपप पप पपपपपप पप पपपप पपप पपपपपपपपप पपप पपपपप
पपप-पपपपपपपप पपप पपपपपपपपपपपप पप पपप पप पपप पपप पपप पप पपपपपप
पपपपपप पप, पपपपपपपपपप पपप पपपपप पप पपप पपपप पपपपपप पपपप पप पप
पपपपपपप पपपप (पपपपप पपपपपप) पपप पपप पपपपप पपप पपपपपप पप पपप पप
पपपप पपपपपप पपपपप पपप पपपपप, पपपप, पपपपपप-पप प पपपपपप (पपप पपप)
पपपपप पपपपप पपपपपपपपप पपप पप पप प पपप पपपपपपपप
पपपपपपपपपपपपपप पपपपप (पपपपपपपपप पपपपपपप प/प) पपपपपपपप पपपप
पपपपप पपपपपप, पपपपपप पपपप पपपपप पपपपपप प (पपप पपपपपपपप पप/प)
पपप पप पपपपप पपपपप पपपपप पपप पपपपपपपपपप पपपपपपप पपपपप पपपपप
पपपपपपप पपपपपप पपपपपप (पपपप पपपपपपपप पप/प/प/प)
पपपपपप पपपपप पपपपपपप पपपपपपपपप पपपपपपप पपपपपपप पपपपपप (पपप
पपपपपपपप पप/पप)
पपप प पपप पपपपपपप पपपपपपपपपप (पपपप पपपपपपपप पप/प/प/प)
पपपपपपपपपपपपप पपपप पपपप पपपपपप पपपपपप प (पपपप पपपपपपपप
प/प/प/पप)
पपप प पपप पपपपपपप पपपपपपपपपप पप पपपपपपपप पपप पप पपपपपपपपपपपप
प (पपपप पपपपपपपप पप/प/प/प)
पपपपपपपपपपपप (पपपपपप) पपपपपपप पपपपपप पपपपपपपपपपपपपप पपपपप
पपपपपपप पपपपपपपपपपपपपपपपपपपपपपपपपपपपपपपपप पप प पपपपपपप
पपपपपप पपपप पपपपपप प (पपपप पपपपपपपप पपपपप प/प)
पपपप पप पपपपपप प (पपपपपपप पपपपपपपप पपपपपपप पप/प)
पपप पप पपपपपपपपपपपप (पपपपपपपपप पपपपपपपप प/प/पप/प)
पपप पपप पपप पपपपपपप पपपपपपपपप प (पपपप पपपपपपपप प/प/प/पप)
पप पपपपप पपप पपपपप पपपपपपप पपपपपप पपपपप प (पपपप पपपपपपपप
प/प/प/प)
प पपपपपपपपपपपपपप प पपपपप पपपपपपपपपपपपपपपपपपपपप पपपप पपपप
पपपपप पपपपपपपपपपपपपपपपपप पपपपपप पपपपपप पपप पप पपपपपपपपपप
पपप प (पपपपप पपपपपपप प/प/प)
पपपपपप पपपपपपपपपपपप पपपपपपप पपपपपपपपपपपप पपपपप पपपपप
पपपपपपपपपप प
पपपपपपपपपपप पपप पप पपपपपपप पपपपपपपप पपपप पपपपप पपपप प (पपपपपप
प/पप/प)
पपपप पप प पपपप पपप-(प) पपप पपपप-पपपपप पप पपप पपप पपपपपपप (प) पपपप
पपपप-पपपपपपपपपप पप पपपपपपप-पपपपपपप पपपपपपप पपपपप पप पपपप
पपपप पपपपप पपप (प) पपपपप पपपप-पपप पपपपप पपप पपपपप पपपपपपप पप
पपप पपपपपप पप पपपपपपपप पपपप पपप पप पपपपप पपपप पपपप (प) पपप
पपपपपपप पप पपपपपप पप पपपपपप पपपप पप पपपपपप पपप पप पप पपपप पप,
पपपप पपपप पपपपपप पप पपपपपप पपपप पपपप पप (पपपप पपपपप प/पप पप
पपपपपप पप पपपपप पप पपप पपपप पपपप पप पप पपपप पपपप पपप पपपपपप
पपपपप पपपपप पप पपपप पपप पपप-पपप पपपप पपप पप पपप पपपप पपपप पप
पपपप पपपपप पपपपप पपप पपपपपप पप पपपप प/पपप पपपप पपपप पपप पप
पपपप पप प/पपपप पपप पपपपप (प) पपपपपप पप पपपप पपप पपपपपपपपप पप
पपपप पपपप पपपपपपपपपप पपपपपपप पपपपप पपपपपपपपपपपपपपपपपपपप
पपपपप पपपपपपपप प
पपपपपप पपपपपपप पपपपपपपपपपपपपपप पपपप पपपपपपपपपपपपप पपपपप प
(पपपपपप प/पप/प)
पपपपपपप पप पपपपपपपपप -पपपपपपपपप प पपपपपपप -प पप
पपपपपपपपपपपपपपपपप प पपपप ? पपपपपपपपपपपपपप पपपपपपपप, पपपपपप
पपपपपपप-पपप प पपपपपपपपपप पपपपपप पपपपपपप पपपपपप पपपपपप
पपपपपपप (पपपपपप)- पपपपपपपप पपपपपपप पपपपपपपपपप पपपपपपपपपप
पपपपपपपप पपपपपपपपप प (पपपप पपपपपपपप पप/प/प/प)
प पप पपपपपप पपप प पपपपपपप प (पपपप पपपपपपपप प/प/प/प)
पपप पपपपपपप (पपपपपपपप) पपपपपपपपपपपपपप पपपपपपपपपपप पपपपप पप
पपपपप पपपपपपपपपपपपप-प पपपपपपपपपपप प (पपपप पपपपपपपप प/प/प/पप)
पपप पपपपपपपपपपप पपपपपपपप पपपप पपपपपपप पपपपप पपपपपपप प
पपपपपपपप पपपपपपपपपप पपपपप पपप पपपपप पपपपपपप पपपपप (पपप प/पप/प)
प पपपपपपपप-पप पपपपप पपपप पपपपपप पपपपपपपपपपप प (पपपपपपपपप
पपपपपपपप प/प/प/प)
पपपपप प पप पपपप पपपपपपपपप पपपपपपपपपपपपपपपपपपप पपपपप पपपपपपप
प पपपपपपप पपपपप पपपपपप पपपपपपपप पपपपपपप प पपपपपपप पपपपप पपपप
पपपपपपप प (पपपप पपपपपपपप प/प/प/पप)
पपप पपपपपपपपपपपपपप (पप पपपपप) पपपपपपप-पपपप पपप पपपप पपपपपपप प
पपपपपपपप पपपपपपपपप पपपप पपपपपपपपप प (पपपप पपपपपपपप पप/प/प/पप)
(प) पपपपप-पपपपपपपपपप पप पपपप पपपपप पपप पपपप पप, पपपपपपप पप पपप
पपपप पपप पप पपपपपपपपपप पप पप पपपप पपप पपपपप पपपप पपपपपप पपप
पपप पपपपपपपपपपपपपप पपपपप पपपपपपप पपपप पपपपपप प पपप पपप पपपपप
पप पपपपपपपपपप पप पपपपपपपपप पपप पपपपपप पपपप पपप पपप पपप
प पपप पपपपपप पपप-पपपपपप पपपप पपपपपप पपपपपपपपप पपपपप पपपपप प
पपपपपप-पपपपपप-पपप प पपपपपपप-पपपपपपप पपपपपपप पपपपपप पप
पपपपपप प पपपपपपपपपप-पपपपपप पपपपपप पपपपपपपपप-पपप प (पपपप
पपपपपपपप प/प/प/प)
पपपपप पपपप पपपपपपपप पपपपपप पपपपपपपपप प
पपपपपप पप पपपपपपपप (प पप पप पपपपप) पपपपपपप पपपप पपपपपपप प
(पपपपप पपपपपपप, पपपपपपप, पपपपपपपपप)
पपपपपपपपपप पप पपपप पपपपपपपप (प पप पप पपपपप) पपपप पपप पप-पपप
पपपपपपप पपपपपपपप पपपप पपपपप पपपपपपपपप पपपप पपपपपपप प
पपपपपपप पपपपपपपपपप पपपपपप पपपपपपपपपप पप प पपपपपपपपपपपपप प
(पपपपपपपपप प/प/प)
(प) पपपप-पपप पपपपप पपप पपपपप पप पपपपप पप पपपप पपप पपपपप पप
पपपपपपप पप पपपप पपपपप पप पपपप पप (पपपप = पपप पपपपप) पप पपपपपपप प
पपपप पप पपप पपपप पपप पपप पपप पपप पपपपपप पप पपपपपपप पपपप पपपपप
पप पपप-पपपप पपप पप, पप पपपपप पपपपप पपप पपप पपपपपप पप पपपप पपप
४. ऐषतिाषसक षवष्णु अवतार-
(१) वराि-वराि, र्रषसंि, वामर्, ये ३ अवतार वैवस्वत मर्ु के पूवघ कश्प से १० युगों में हये थे । वराि अवतार चतुथघ
युग में हआ। अतः इसका काल १७५००- ३ x ३६० = १६४२० से १६०६० ई.पू. के बीच िोगा। इस समय तेजस्वी
र्ामक इन्द्र दे वों के राजा थे ।
तेजस्वी र्ाम वै शक्रो षिरण्यािो ररपुः िृतः। ितो वराि रूपेण षिरण्याख्योऽथ षवष्णु र्ा॥ (गरुड़ पुराण, १/८७/३०)
जब षिरण्याि र्े इन्द्र को पराषजत कर प्रायः पूरी पृथ्वी पर अषधकार कर षलया, तब षवष्णु र्े वराि रूप में षिरण्याि
का वध षकया। वि मर्ु ष्य िी थे और िाथों में गदा और चक्र षलये हये थे ।
षर्ष्प्रयत्ने सुरपतौ धषिघ तेिु सुरेिु च। षिरण्याि वधे बुन्तद्धं चक्रे चक्र गदाधरः॥ (िररवंश पुराण ३/३९/१)
पृथ्वी पर एक वराि पवघत िै । पवघत को भी भू धर किते िैं । इसके अषतररक्त आकाश में कई प्रकार के वरािों िारा
पृथ्वी का धारण या षर्माघ ण हआ िै । ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/२०/३४-३६) के अर्ु सार षिरण्याि रसातल में रिता था जो
षक िीप गणर्ा में पुष्कर िीप (वतघमार् दषिण अमे ररका) किा जाता िै । यि ब्रह्मा के पु ष्कर (उज्जै र् से १ मु हूत्तघ =
१२० पषश्चम बुखारा) के ठीक षवपरीत षदशा का िीप िै (षवष्णु पुराण २/४/८५, २/८/२६)। जे न्द अवेस्ता के अर्ु सार
आमे जर् र्दी के षकर्ारे षिरण्याि की राजधार्ी थी। वे लोग षवष्णु की वराि रूप में पूजा करते थे । अतः षवष्णु १८
साषथयों के साथ वराि का मुखौटा पिर् कर षमि रूप में उसकी राजधार्ी में गये। कुछ षदर्ों तक अषतषथ रूप में
स्वागत िोर्े के बाद अचार्क षिरण्याि की िया कर वे लोग विां से षर्कल गये और बाद में सेर्ा सषित आक्रमण
षकया। यिी तरीका बन्तियार न्तखलजी र्े र्षदया के राजा लक्ष्मणसेर् को मारर्े के षलये अपर्ाया था। वि भी १८
र्ुड़सवारों के साथ षमि रूप में दरबार में गया था। यि केतुमाल (भारत से ९०० पषश्चम) के िे ि में आता था जिां
षवष्णु की वराि रूप में पूजा िोती थी-
भद्राश्वे भगवार्् षवष्णु ः आस्ते ियषशरा षिज। वरािः केतुमाले तु भारते कूमघ रूपधृक्॥५०॥
मत्स्यरूपश्च गोषवन्दः कुरुश्वास्ते जर्ादघ र्ः। षवश्वरूपेर् सवघि सवघः सवघिगो िररः॥५१॥ (षवष्णु पुराण २/२/५०-५१)
अन्य स्थार्ों पर वणघर् िै षक षिरण्याि र्े वेदों का अपिरण षकया था षजसका वराि या ियिीव र्े उद्धार षकया।
शौर्क के चरण व्यू ि में कृष्ण यजु वेद की शाखाओं का षवस्तार सभी िीपों में षलखा िै , केवल पुष्कर िीप में र्िीं िै
जिां षिरण्याि का शासर् था। वाल्मीषक रामायण, षकन्तष्कन्धा काण्ड में बाषल पर जब राम र्े बाण चलाया तो उसर्े
किा था षक सीता को खोजर्े के षलये सुिीव से षमिता की कोई जरूरत र्िीं थी। यषद राम उससे किते तो वि सीता
को जिां भी षछपा कर रखा िो उसे खोज कर लाता जै से ियिीव र्े श्वे ताश्वतर िु षत का षिरण्याि से उद्धार षकया था।
कण्ठे बद् ध्वा प्रदद्यां ते षर्ितं रावणं रणे। न्यस्तां सागातोये वा पाताले वाषप मै षथलीम् ॥४९॥
आर्र्े यं तवादे शात् श्वे ताश्वमश्वतरीषमव। युक्तं यत् प्राप्नुयाद् राज्यं सुिीवः स्वगघते मषय॥५०॥
(वाल्मीषक रामायण, षकन्तष्कन्धा काण्ड १७/४९-५०)
(२) र्रषसंि अवतार-यि कश्प के ५वें या छठे युग (१६०६२-१५३४२ई.पू.) में थे । यि भी मर्ु ष्य िी थे, वीरता और
र्े तृत्व गुण के कारण इर्को षसंि किा गया। इसी प्रकार लाङ्गूलोपषर्िद् में रामचन्द्र को भी षसंि किा िै उसके
बाद यि राजाओं की उपाषध िोर्े लगी। षिरण्य-कषशपु को ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/२०/२४-२५) में तलातल (अफ्ीका)
का राजा किा िै (इसके पुि प्रह्लाद के बारे में )। स्पष्टतः इसका काल और स्थार् षिरण्याि से अलग था, पर दे वों के
षवरुद्ध उसी सत्ता दल का िोर्े के कारण इर्को भाई किा िै । र्रषसंि पुराण के अर्ु सार र्रषसंि ८३ िजार सेर्ा
सषित षिरण्यकषशपु की राजधार्ी में पहं चे थे। षिरण्यकषशपु के पास १० लाख से अषधक सेर्ा थी पर राजधार्ी में १०
िजार सैषर्क िी थे । प्रह्लाद के बदले अन्य पुि को राजा बर्ार्ा चािता था, अतः उसकी सिायता से यि सेर्ा धीरे
धीरे राजधार्ी में र्ुस गयी और एक षदर् उर् लोगों र्े षिरण्यकषशपु का वध कर प्रह्लाद को राजा बर्ा षदया। भारत में
र्रषसंि को षसंि मुख के साथ मर्ु ष्य षदखाते िैं । इसका उलटा षमस्र में न्तफंक्स का षसंि शरीर और मर्ु ष्य का मुं ि
षदखाते िैं ।
(३, ४) वामर् और कूमघ अवतार-यि कश्प के ७वें युग (१५३४२-१४९८२ ई.पू.) में हआ। इस अवतार में उर्का
व्यन्तक्तगत र्ाम भी षवष्णु िी था। इस के पूवघ दै यों से पराषजत िोर्े पर कूमघ की सलाि से दे वों र्े सन्तन्ध कर ली और
सन्तम्मषलत रूप से समु द्र मन्थर् अथाघ त् खषर्ज षर्ष्कासर् आरम्भ षकया। भारत के ककघ-खण्ड (छत्तीस-गढ़ के कोरबा
से झारखण्ड के र्ाटषशला) के खषर्ज िे ि में दै यों र्े खुदाई का काम षकया क्योंषक उसमें वे दि थे । इस िे ि का
आकार कूमघ जै सा िै तथा कठोर िेर्ाइट चट्टार् में खषर्ज िोते िैं षजसे कूमघ -पृष् भू षम किा गया िै । इसके उत्तर
मथार्ी के आकार का पवघत गंगा र्दी तक उत्तर चला गया िै षजसके छोर पर वासुषक-र्ाथ तीथघ िै। वासुषक र्ाग
खर्र् का समन्वाय् कर रिे थे । मषििासुर और वासुषक दोर्ों पाताल लोक (उत्तर अमे ररका के थे ) पर वासुषक को
इन्द्र का षमि किा िै (ब्रह्माण्ड पुराण, १/२/२०/३९-४१)। दे व षवरल धातुओं के शोधर् में दि थे अतः वे षजम्बाब्वे की
स्वणघ खार् (जाम्बू र्द स्वणघ) तथा मे न्तक्सको की चान्दी खार् (माषिकः = चान्दी) में गये। असुर मु ख्यतः उत्तर अफ्ीका
तथा पषश्चम एषशया से आये थे । उसी िे ि के यवर्ों र्े बाक्कस के समय ६७७७ ई.पू. में भारत पर आक्रमण षकया था
षजसमें इक्ष्वाकु राजा बाह मारे गये। १५ विघ बाद उर्के पुि सगर र्े यवर्ों को भगा षदया जो िीस चले गये अतः िीस
का र्ाम इयोषर्या (िे रोडोटस के अर्ु सार) या यूर्ार् िो गया। आज भी अरबी षचषकत्सा को यूर्ार्ी िी किते िैं । अतः
खषर्जों के िीक भािा में जो र्ाम िैं , उस िेि से झारखण्ड आये असुरों की उपाषध भी विी िै । कुछ संस्कृत र्ाम भी
िैं । सोर्ा को िीक में औरम किते िैं । अतः सोर्े का शोधर् करर्े वाले को ओराम किते िैं । सोर्े के कण बालू या
चट्टार् की ढे र में षछपे रिते िैं। इर्को षर्कालर्ा वैसा िी िै जै से बालू की ढे र से चीर्ी का कण चींटी षर्कालती िै ।
अतः सोर्े की खु दाई करर्े वालों को कण्डूलर्ा (= चींटी) किते थे । इस र्ाम का अथघ र्िीं जार्र्े के कारण
मे गास्थर्ीज र्े २ अध्याय तथा िे रोडोटस र्े भारत में सोर्े की खु दाई करर्े वाली चींषटयों के बारे में षलखा िै। उर्को
यि र्िीं पता चला षक ये मर्ुष्य िी िैं । खार् को र्क्शे पर खोजर्े वाले को ककघटा (ककघट = कम्पास) किते थे ।
ताम्बा की खु दाई करर्े वाले खालको (ताम्र -गन्धक अयस्क को खालको-पाइराईट किते िैं )। पारा शोधर् कार्े वाले
िे म्ब्रम, टोपाज खु दाई करर्े वाले टोप्पो, षटर् खू दाई करर्े वाले षसंकू (िीक स्टै षर्क) िैं। अयस्क की सफाई करर्े
वाले षमन्त्ज, रासायषर्क शोधर् करर्े वाले िं सदा िैं । लोिे की खु दाई करर्े वाले मु ण्डा (मुण्ड = अयस्क पत्थर, मु र =
अयस्क चूणघ मु रघम् , लोिा), उससे लोिा बर्ार्े वाले षकस्कू (ब्लास्ट फर्े स, षकयोस्क आकार का) िैं ।
पुर्ः खषर्ज सम्पषत्त के बंटवारे के षलये झगड़ा आरम्भ हआ तो काषत्तघ केय र्े क्रौञ्च िीप (उत्तर अमे ररका) पर पिले
शन्तक्त (षमसाइल) से आक्रमण षकया षजसर्े क्रौञ्च पवघत षवदीणघ कर षदया। उसके बाद अपर्ी मयूरी (जल-स्थल
सीर्ा) से क्रौञ्च िीप पर अषधकार षकया। मयूरी सैषर्कों के वंशज आज भी प्रशाि मिासागर के िीपों में िवाई से
न्यू जीलै ण्ड तक फैले हये िैं । मिाभारत, वर् पवघ (२३०/८-१०) के अर्ु सार इस काल में उत्तरी ध्रुव अषभषजत् से दू र िट
गया तथा धषर्ष्ा में सूयघ प्रवेश से विघ और विाघ का आरम्भ हआ। यि १५,८०० ई.पू. में था। अतः मे गास्थर्ीज र्े षलखा
िै षक भारत अन्न तथा सभी चीजों में स्वावलम्बी िोर्े के कारण इसर्े षपछले १५००० विों (३२६ ई.पू. के षसकन्दर
आक्रमण से १५५०० विघ पूवघ) में षकसी दे श पर आक्रमण र्िीं षकया।
इस काल में अषदषत के पुि रूप में षवष्णु र्ाम के वामर् का जन्म हआ। उन्ों र्े बषल के यज्ञ में ३ पग भू षम मां गी।
बषल को दे वों की बढ़ी शन्तक्त का अर्ु मार् था अतः उन्ोंर्े षबर्ा षवरोध के दे वों के ३ लोक लौटा षदये। उत्तर गोलाधघ में
षविु व से उत्तर ध्रुव तक उज्जैर् केन्द्र से ९० अंश दे शािर का िे ि भारत पद्म (उत्तर र्क्शा का चतुथघ भाग) किलाता
था। इसके ३ लोक भारत, चीर्, रूस थे षजर्पर इन्द्र का पुर्ः अषधकार िो गया। यि भाद्र शु क्ल िादशी को हआ
षजसे वामर् िादशी या ओणम किते िैं । इसी काल से राजाओं का राजत्व काल षगर्ा जाता िै जो ओषड़शा में आज
भी प्रचषलत िै (अंक पद्धषत)। भौगोषलक रूप से २ प्रकार षवष्णु पद िैं । सूयघ की उत्तर-दषिण गषत में षविु व से २४
अंश की उत्तर (या दषिण) गषत १ पद िै । तीसरा पद ७२ अं श पूवघ तक जायेगा जो ध्रुव वृ त्त (अथाघ त् बषल के षसर पर)
में िै । सूयघ की पूवघ पषश्चम दै षर्क गषत के अर्ु सार संयमर्ी (यमर्, सर्ा, अम्मार्) से ९० अंश पूवघ षवष्णु का प्रथम पद
(इण्डोर्े षसया का पूवघ भाग) पर गरुड़ का भवर् था। १८० अं श पूवघ मे न्तक्सको में जिां सूयघ षपराषमड िै , विां दू सरा पद
था।
ति पूवघपदं कृत्वा पुरा षवष्णुन्तस्त्रषवक्रमे । षितीयं षशखरे मे रोश्चकार पुरुिोत्तमः॥५८॥
(वाल्मीषक रामायण, षकन्तष्कन्धा काण्ड, अध्याय ४०)
आकाश में सूयघ रूपी षवष्णु के ३ पद िैं -१०० योजर् (सूयघ-व्यास) तक ताप िे ि, १००० योजर् तक तेज (क्रतु, सौर
वायु) िे ि, तथा १ लाख योजर् तक प्रकाश िे ि। परम पद सूयों का समू ि िै षजसके छोर पर सूयघ षवन्त्दुमाि दीखता िै ।
(५) मत्स्य अवतार-वैवस्वत मर्ु के बाद दे वों का वचघस्व था, अतः षवष्णु अवतार की आवश्कता र्िीं पड़ी। वैवस्वत
यम (संयमर्ी, सर्ा, अम्मार्) के बाद प्रायः १०,००० ई.पू (आधुषर्क अर्ु मार्) में जल प्रलय आरम्भ हआ। इस काल में
मत्स्य अवतार हआ। जेन्द अवेस्ता तथा पुरार्े पारसी ले खों के अर्ु सार ९५६४ ई.पू. में जल प्रलय हआ था। षवष्णु
धमोत्तर पुराण (८२/७-८, ८१/२३-२४) के अर्ु सार यि ९५३३ ई.पू. में हआ था। मत्स्य तथा राम जन्म दोर्ों विों में
प्रभव विघ था। गुरु के ६० विों के चक्र की २ प्रकार से गणर्ा िोती िै । षपतामि षसद्धाि में सौर विघ को िी गुरु विघ
मार्ते िैं । षववस्वार्् (सूयघ षसद्धाि) मत से मध्यम गुरु की १ राषश में गषत ३६१ षदर् ४ र्ण्टा को गुरु विघ मार्ते िैं ।
इस पद्धषत में ८५ सौर विघ में ८६ गुरु विघ िोते िैं । दोर्ों चक्र ८५ x ६० = ५१०० विघ में पूणघ िोते िैं । रामजन्म के विघ
४४३३ ई.पू. में दोर्ों मत से प्रभव विघ था। उसके ५१०० विघ पूवघ भी वैसा िी था जब मत्स्य अवतार हआ। इसके बाद
११वें व्यास ऋिभ दे व (प्रथम जै र् तीथं कर) र्े उसी प्रकार सभ्यता का पुर्ः आरम षकया जै से ३१००० ई.पू. के जल
प्रलय के बाद २९१०० ई.पू. में स्वायम्भु व मर्ु र्े षकया था। अतः इर्को स्वायम्भु व मर्ु का वंशज किा िै । इर्के कुछ
बाद १-११-८४७५ ई.पू. (एर्ी बेसन्ट के अर्ु सार तन्त्जौर मन्तन्दर का लेख) को इक्ष्वाकु का राज्य आरम्भ हआ। इन्ोंर्े
वैवस्वत मर्ु की पद्धषत पुर्ः स्थाषपत की अतः इर्को वैवस्वत मर्ु का पुि किा िै , यद्यषप इर्के कालों में प्रायः ५४२६
विघ का अिर था। ऋिभ और इक्ष्वाकु के बीच में इन्द्रद् युम्न भी सूयघ वंश के ५वें राजा किे गये िैं षजर्के काल में
जगन्नाथ की दारु मू षत्तघ की प्रषतष्ा हयी। इर्के अषधकार के पूवघ समु द्र के िीप को इन्द्रद् यु म्न (अण्डमार्) किते िैं ।
स्कन्द पुराण, वैष्णव, उत्कल खण्ड, अध्याय ७-आसीत् कृतयुगे षवप्रा इन्द्रद् युम्नो मिार्ृ पः। सूयघवंशे स धमाघ त्मा स्रष्टु ः
पञ्चमपुरुिः॥६॥= इन्द्रद् युम्न कृत युग अथाघ त् १३९०२-९१०२ ई.पू. में थे ।
(६) परशु राम अवतार-इर्का जन्म १९वें िे ता में हआ, अथाघ त् २८ युग समान्तप्त (३१०२ ई.पू.) के १० युग पूवघ से
=६७०२-६३४२ ई.पू. तक था। इर्के दे िाि के बाद ६१७७ ई.पू. में परशु राम या कलम्ब (केरल का कोल्लम) सम्वत्
आरम्भ हआ। मे गास्थर्ीज र्े इर्को (षवष्णु अवतार) को बाक्कस (६७७७ ई.पू. में भारत पर आक्रमण) के १५ पीढ़ी
बाद किा िै । ६०० विघ का अिर प्रायः १५ पीढ़ी का िोगा। िै िय राजाओं र्े बाक्कस की सिायता की थी, अतः पिले
उर्का वध षकया। परशु राम र्े २१ बार प्रजातन्त्र स्थाषपत षकया षजसे िीक ले खकों र्े १२० विघ का प्रथम प्रजातन्त्र
काल किा िै । इर्को कई जाषतयों र्े सिायता की षजर्में खस (असम की खासी), उडि (उत्तर ओषडशा मे अर्ोरर्ाथ
- र्ोर्रर्ाथ केन्द्र से), खुरद (तुकी-इराक के कुद्दघ ) आषद थे (ब्रह्मवैवतघ पुराण, ३/२४/५९-६४, वाल्मीषक रामायण,
बालकाण्ड, ५४/१८-२३, ५५/२-३)। अि में मालाबार के पषश्चम तट पर समु द्र के भीतर २००, षफर ४०० योजर्
(ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/५८/१७, ३२) या ३० योजर् (र्ारद पुराण, २/७/४/४) गोकणघ के षर्कट शू पाघ रक (सोपार् ) र्गर
बसाया। समु द्र के भीतर जल को बािर करर्े के षलये या जिाज रुकर्े के स्थार् के षलये सूप (शू पघ) आकार की
सीमाबर्ाते िैं । अतः शू पाघ रक र्ाम हआ। यिां २ प्रकार के योजर् िैं । रामेश्वरम के षर्कट २२ षकमी के रामसेतु को
१०० योजर् किा िै । अतः २०० योजर् = प्रायः ४४ षकमी। मालाबार तट पर समु द्र के भीतर प्रायः ३० षकमी. लम्बी
दीवार षमली िै , जो ४४ षक.मी. की सीमा का भाग िै । इसे ८००० विघ पुरार्ा अर्ु मार् षकया गया िै । इर्के १२० विघ के
प्रजातन्त्र का षिसाब िै -आरम्भ में ८ x ४ विघ युद्ध, ६ x ४ विघ तप, २१ बार िषिय र्ाश (प्रजातन्त्र) में प्रयेक में २-२
विघ = ७८ विघ लगे। बाकी शान्तिपूणघ प्रजातन्त्र तथा शू पाघ रक षर्माघ ण की अवषध िैं (ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/४६)।
(७) राम अवतार-राम २४वें िेता में थे , अथाघ त् ३१०२ से १४४० विघ पूवघ ४५४२ ई.पू. में पूरा हआ। दोर्ों प्रकार से प्रभव
विघ ४४३३ ई.पू. में था। वाल्मीषक रामायण, बालकाण्ड सगघ १८ में राम जन्म समय की िि न्तस्थषत दी िै -
ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतूर्ां िट् समययुः। ततश्च िादशे मासे चैिे र्ावषमके षतथौ॥८॥
र्ििे ऽषदषतदै वये स्वोच्चसंस्थेिु पञ्चसु। ििे िु ककघटे लग्ने वाक्पताषवन्त्दुर्ा सि॥९॥
प्रोद्यमार्े जगन्नाथं सवघलोकर्मस्कृतम् । कौशल्याजर्यद् रामं सवघलिण संयुतम् ॥१०॥
= (पुि कामे षष्ट= अश्वमे ध) यज्ञ के ६ ऋतु बाद १२वें मास में चैि र्वमी षतषथ को पुर्वघसु र्िि (षजसका दे वता अषदषत
िै ) में जन्म हआ जब ५ िि स्व (स्थार्) या उच्च के थे । जब ककघ लग्न, बृिस्पषत और चन्द्र का एक साथ उदय िो रिा
था, सभी लोकों से वन्तन्दत जगन्नाथ का भी उदय हआ तथा कौशल्या र्े सभी लिणों से युक्त राम को जन्म षदया।
अगले षदर् पुष्य र्िि, मीर् लग्न में भरत का तथा उसी षदर् अश्लेिा र्िि में लक्ष्मण-शिु घ्न का जन्म हआ जब सूयघ
उच्च (१००) पर थे -
पुष्यो जातस्तु भरतो मीर्लग्ने प्रसन्नधीः। सापे जातो तु सौषमिी कुलीरे ऽभ्यु षदते रवौ॥१५॥
अतः राम जन्म के समय सूयघ ९० अंश पर, चन्द्र, गुरु, लग्न ९०००’१", तथा चैि र्वमी (सौर मास की) थी। गुरु और सूयघ
प्रायः उच्च पर थे (इर्का उच्च १००, ९५० िैं ), अन्य ५ िि पूणघ उच्च के थे -मं गल २९८०, शु क्र ३५७०, शषर् २०००।
चन्द्र का उच्च ५८० िै पर उसका स्थार् ९०० षदया िै जो उसका अपर्ा स्थार् िै । िै । बुध का उच्च १६५० िै पर यि
सूयघ से २८० से अषधक दू र र्िीं िो सकता। अतः बुध राह-केतु की गणर्ा करर्ी िोगी। राम की ४७ पीढ़ी बाद
बृिद्बल मिाभारत में मारा गया। अतः राम का काल मिाभारत (३१३८ ई.पू.) से प्रायः १३०० विघ पूवघ िोगा। ३५०१-
४७०० ई.पू. के सभी विों की गणर्ा करर्े पर केवल ४४३३ ई.पू. में िी अयोध्या की सूयोदय कालीर् षतषथ र्वमी थी
(चैि शु क्ल) जो अगले सूयोदय तक थी। इस गणर्ा से राम का जन्म ११-२-४४३३ ई.पू., रषववार, १०-४७-४८ स्थार्ीय
समय पर हआ। सूयोदय ५-३५-४८, सूयाघ स्त १८-२८-४८ था। अयर्ां श १९-५७-५४, प्रभव विघ था। अन्य िि बुध २१०,
राह १२०४’४६"। िी र्रषसंि राव की पुस्तक- Date of Sri Rama, १९९०, १०२ माउण्ट रोड, मद्रास के अर्ु सार अन्य
८८ षतषथयां दी िैं ।
(८) कृष्ण अवतार वसुदेव और दे वकी के पुि के रूप में भगवार्् कृष्ण का जन्म भाद्र शुक्ल अष्टमी को मथु रा में कंस
के कारागार में हआ। यि पूषणघमाि मास की षतषथ िै , अमाि मास में यि िावण कृष्ण अष्टमी िै । १२५ विघ की आयु
पूणघ िोर्े के बाद जब उन्ोंर्े इस लोक का याग षकया तो कषलयुग का आरम्भ १७-२-३१०२ ई.पू. को हआ। इसके
अर्ु सार भगवार्् कृष्ण का जन्म १९-७-३२२८ ई.पू. मथु रा मध्यराषि को हआ। रोषिणी र्िि तृतीय चरण में जन्म िोर्े
से मिषिघ गगघ र्े उर्का राषशर्ाम षवष्वक्सेर् रखा। जन्म समय की िि न्तस्थषत थी-मथु रा (२७°२५’ उत्तर, ७७°४१’ पूवघ)
में मध्यराषि, सूयघ १३९°४८’, चन्द्र ४७°४२’, मं गल ९१°६’, बुध १५२°४८’, गुरु १४८°५४’, शु क्र १०२°५४’, शषर्
२२४°४२’, राह १०६°२४’, लग्न ५०°।
(९) बुद्ध अवतार-बौद्ध इषतिासकारों र्े बुद्ध की मिार्ता षदखार्े के षलये कई बुद्धों को एक साथ षमला षदया िै ।
सबसे प्रमु ख बुद्ध इक्ष्वाकु वंश के कषल में २४में राजा शुद्धोदर् के पुि थे षजर्का जन्म का र्ाम षसद्धाथघ था। ज्ञार्
प्रान्तप्त के बाद ये बुद्ध हये। पू री जीवर्ी में यि किीं र्िीं षलखा िै षक वे बीच में गौतम कब हये। वस्तु तः गौतम बुद्ध
उर्के प्रायः १३०० विघ बाद हये। बौद्ध िन्थों (स्तू प = थू प वंश) में २८ बुद्धों की सूची दी िै । बुद्धवंश में २८ बुद्धों की
सूची के बाद षसद्धाथघ बुद्ध की प्रशं सा की िै षक उन्ोंर्े अपर्े उपदे श षलन्तखत रूप में रखे अतः वे सुरषित रिे -
अतीत बुद्धार्ं षजर्ार्ं दे षसतं। षर्कीषलतं बुद्ध परम्परागतं। पुब्बे षर्वासा षर्गताय बुन्तद्धया। पकासमी लोकषितं
सदे वके॥
अन्य ४ बुद्ध थे -षवपन्तश्, षशन्तख, षवश्वभू , षतष्य-षजर्की षशिा षलन्तखत उपदे श के अभाव में र्ष्ट िो गयी। अश्वर्ोि के
बुद्ध चररत (२३/४३,४४) में भी कई बुद्धों का उल्ले ख िै । यि पुस्तक षपछले १०० विों से अषधकां श षवश्वषवद्यालयों की
पाठ्य पुस्तक िै , तथाषप अंिेजी आज्ञा-पालर् के कारण केवल षसद्धाथघ को बुद्ध मार्ते िैं -
अन्ये ये चाषप सम्बुद्धा लोकं षवद्योयधीन्तत्विा। दीप इव गतस्नेि षर्वाघ णं समु पागताः॥
भषवष्यन्ति च ये बुद्धा भषवष्यन्ति तपन्तस्वर्ः। ज्वषलत्वाऽिं प्रयास्यन्ति दग्धेन्धर् कृशार्ु वत्॥
चीर्ी यािी फा-षियार् र्े ४ बुद्धों के जन्म स्थार् का वणघर् षकया िै -क्रकुच्छन्द बुद्ध िावस्ती से १०० षक.मी दषिण-
पषश्चम, कर्कमु षर् िावस्ती से ८ षक.मी. उत्तर तथा कश्प बु द्ध (षितीय कश्प) िावस्ती से १५ षक.मी. पषश्चम टण्डवा
िाम में हये थे । इर्के पीठ िैं -चम्पा (भागलपुर, षबिार), साकेत (अयोध्या), सारर्ाथ (वाराणसी के षर्कट)। सारर्ाथ
के पास षर्गषलिवा षशलालेख में अशोक र्े षलखा िै षक अपर्े शासर् के १४वें विघ में उसर्े कोणगमर् (कर्कमु षर्)
के स्तू प (सारर्ाथ में ) को दु गुर्ा कर षदया तथा पुर्ः २० वें विघ में विां गया।
(क) षसद्धाथघ बुद्ध-षसद्धाथघ के जन्म की सभी मु ख्य र्टर्ायें वैशाख पूषणघमा (बुद्ध पूषणघमा) को हयीं-
जन्म ३१-३-१८८६ ईसा पूवघ, शुक्रवार, वैशाख शु क्ल १५ (पूषणघमा), ५९-२४ र्टी तक। कषपलवस्तु के षलये प्रस्थार् २९-
५-१८५९ ईसा पूवघ, रषववार, आिाढ़ शुक्ल १५। बुद्धत्व प्रान्तप्त ३-४-१८५१ ईसा पूवघ, वैशाख पूषणघमा सूयोदय से ११ र्टी
पूवघ तक। शुद्धोदर् का दे िाि २५-६-१८४८ ईसा पूवघ, शषर्वार, िावण पूषणघमा। बुद्ध षर्वाघ ण २७-३-१८०७ ईसा पूवघ,
मं गलवार, वैशाख पूषणघमा, सूयोदय से कुछ पूवघ। इर्की जन्म कुण्डली-लग्न ३-१०-२’, सूयघ ०-४०-५४’, चन्द्र ६-२८०-६’,
मं गल ११-२८०-२४’, बुध ११-१००-३०’, गुरु ५-८०-१२’, शु क्र ०-२३०-२४’, शषर् १-१६०-४८’, राह २-१५०-३८’, केतु ८-
१५०-३८’। ये सभी षतषथ-र्िि-वार बुद्ध की जीवर्ी से िैं ।
(ख) गौतम बुद्ध-सामान्यतः ४८३ ईसा पूवघ में षजस बुद्ध का षर्वाघ ण किा जाता िै , वि यिी बुद्ध िैं षजर्का काल कषल
की २७ वीं शताब्दी (५०० ईसा पूवघ से आरम्भ) िै । इन्ोंर्े गौतम के न्याय दशघ र् के तकघ िारा अन्य मतों का खण्डर्
षकया तथा वैषदक मागघ के उन्मू लर् के षलये तीथों में यन्त्र स्थाषपत षकये। गौतम मागघ के कारण इर्को गौतम बुद्ध
किा गया, जो इर्का मू ल र्ाम भी िो सकता िै । स्वयं षसद्धाथघ बुद्ध र्े किा था षक उर्का मागघ १००० विों तक चले गा
पर मठों में न्तस्त्रयों के प्रवेश के बाद किा षक यि ५०० विों तक िी चले गा। आज की धाषमघ क संस्थाओं में भ्ष्टाचार
उर्की र्जर में था। गौतम बुद्ध के काल में मु ख्य धारा से िे ि के कारण तथा षसद्धाथघ िारा दष्ट दु राचारों के कारण
इसका प्रचार शं कराचायघ (५०९-४७६ ईसा पूवघ) में कम िो गया। चीर् में भी इसी काल में कन्त्युशस तथा लाओत्से र्े
सुधार षकये।
(भषवष्य पुराण, प्रषतसगघ पवघ ३, अध्याय २१-सप्तषवंशच्छते भू मौ कलौ सम्वत्सरे गते॥२१॥ शाक्यषसंि गुरुगेयो बह
माया प्रवतघकः॥३॥ स र्ाम्ना गौतमाचायो दै य पिषववधघकः। सवघतीथे िु तेर्ैव यन्त्राषण स्थाषपताषर् वै॥ ३१॥
(ग) षवष्णु अवतार बुद्ध- यि २००० कषल के कुछ बाद मगध (कीकट) में अषजर् ब्राह्मण के पुि रूप में उत्पन्न हये।
दै यों का षवर्ाश इन्ोंर्े िी षकया, षसद्धाथघ तथा गौतम मुख्यतः वेद मागघ के षवर्ाश में तत्पर थे। इसका मु ख्य कारण
था प्रायः ८०० ईसा पूवघ में असीररया में असुर बषर्पाल के र्ेतृत्व में असुर शन्तक्त का उदय। उसके प्रषतकार के षलये
आबू पवघत पर यज्ञ कर ४ शन्तक्तशाली राजाओं का संर् बर्ा। ये राजा दे श-रिा में अिणी या अिी िोर्े के कारण
अषग्नवंशी किे गये-प्रमर (परमार-सामवेदी ब्राह्मण), प्रषतिार (पररिार), चािमार् (चौिार्), चालुक्य (शु क्ल यजु वेदी,
सोलं की, सालुं खे)। इस संर् के र्े ता िोर्े के कारण ब्राह्मण इन्द्राणीगुप्त को सम्मार् के षलये शू द्रक (४ वणों या राजाओं
का समन्वय) किा गया तथा इस समय आरम्भ मालव-गण-सम्वत् (७५६ ईसा पूवघ) को कृत-सम्वत् किा गया। ६१२
ईसा पूवघ में इस संर् के चािमार् र्े असीररया की राजधार्ी षर्र्े वे को पूरी तरि ध्वस्त कर षदया, षजसका उल्लेख
बाइषबल में कई स्थार्ों पर िै । http://bible.tmtm.com/wiki/NINEVEH_%28Jewish_Encyclopedia%29
http://www.biblewiki.be/wiki/Medes
चािमार् को मध्यदे श (मेडेस) का राजा किा गया िै । षवन्ध्य तथा षिमालय के बीच का भाग अभी भी मधेस किा
जाता िै -र्े पाल में मै दार्ी भाग के लोगों को मधेस किते िैं । रर्ुवंश (२/४२) में भी अयोध्या के राजा षदलीप को
मध्यम-लोक-पाल किा गया िै । इस षदर् चािमार् या शाकम्भरी शक आरम्भ हआ, षजसका प्रयोग वरािषमषिर
(बृित् संषिता १३/३) तथा ब्रह्मगुप्त र्े षकया िै । कषलयुग के ८वें पाण्डु वंशी राजा षर्चिु के काल में जब सरस्वती र्दी
सूख गयी तथा िन्तस्तर्ापुर डूब गया, तो शाकम्भरी अवतार हआ था (दु गाघ सप्तशती, अध्याय ११) षजसमें चािमार् वंश
की मु ख्य भू षमका थी।
व्यतीते षिसिस्राब्दे षकषञ्चज्जाते भृ गूत्तम॥१९॥अषग्निारे ण प्रययौ स शु क्लोऽबुघद पवघते।
षजत्वा बौद्धार्् षिजै ः साधं षिषभरन्यै श्च बन्धुषभः॥२०॥(भषवष्य पुराण, प्रषतसगघ पवघ, ३/३)
बौद्धरूपः स्वयं जातः कलौ प्राप्ते भयार्के। अषजर्स्य षिजस्यै व सुतो भूत्वा जर्ादघ र्ः॥२७॥
वेद धमघ परार्् षवप्रार्् मोियामास वीयघवार्् ।॥२८॥
िोडिे च कलौ प्राप्ते बभू वुयघज्ञवषजघ ताः॥२९॥(भषवष्य पुराण, प्रषतसगघ पवघ, ४/१२)
ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोिाय सुरषििाम्। बुद्धो र्ाम्नाषजर्सुतः कीकटे िु भषवष्यषत॥ (भागवत पुराण १/३/२४)
(१०) कन्ति अवतार- यि भषवष्य में िोर्े वाला िै । कई लोग पुराणों की रचर्ा तभी मार्ते िैं जब १२०० ई. में भारत
के सभी प्रमु ख पुस्तकालय इस्लामी आक्रमण में र्ष्ट िो गये । इर्लोगों के मत से अभी सभी पुराण षलखे जार्े बाकी िैं
क्योंषक उर्में वषणघत कन्ति अवतार र्िीं हआ िै । कई मु न्तस्लम लेखकों र्े पैगम्बर मोिम्मद को कन्ति अवतार मार्ा
िै और उसके समथघ र् में भषवष्य पुराण तथा वेदों के उद्धरण खोज कर उसका मर्मार्ा अथघ षर्कालते िैं । पर
भागवत पुराण में इसका षवपरीत षलखा िै षक षलं ग-छे दी दस्यु ओं (खतर्ा करर्े वाले मु न्तस्लम) को मारें गे।
भागवत पुराण, स्कन्ध १२, अध्याय २-
इत्थं कलौ गतप्राये जर्े िु खरधषमघ िु। धमघिाणाय सत्त्वे र् भगवार्वतररष्यषत॥१६॥
चराचरगुरोषवघष्णोरीश्वरस्यान्तखलात्मर्ः। धमघ िाणाय साधूर्ां जन्म कमाघ पर्ु त्तये॥१७॥
शम्भलिाममु ख्यस्य ब्राह्मणस्य मिात्मर्ः। भवर्े षवष्णु यशसः कन्तिः प्रादु भघषवष्यषत॥१८॥
अश्वमाशु गमारुह्य दे वदत्तं जगत्पषतः। अषसर्ासाधुदमर्मष्टैश्वयघगुणान्तन्वतः॥१९॥
षवचरन्नाशु र्ा िौण्यां ियेर्ाप्रषतमद् युषतः। र्ृ पषलङ्गच्छदो दस्यू न्कोषटशो षर्िषर्ष्यषत॥२०॥
यदावतीणो भगवान्कन्तिधघमघपषतिघ ररः। कृतं भषवष्यषत तदा प्रजासूषतश्च सान्तत्त्वकी॥२३॥
यदा चन्द्रश्च सूयघश्च तथा षतष्यबृिस्पती। एकराशौ समे ष्यन्ति भषवष्यषत तदा कृतम् ॥२४॥
इस के अर्ु सार कषल के अि में जब धमघ का र्ाश िोर्े लगेगा तब सम्भल िाम में शम्भल िाम के षवष्णु यश ब्राह्मण
के पुि रूप में कन्ति रूप में षवष्णु जन्म लें गे। वे असाधु दै यों के दमर् के षलये तेज र्ोड़े पर पूरे षवश्व के करोड़ों
दस्यु ओं का वध करें गे। उसके बाद जब एक राषश में पुष्य र्िि में सूयघ, चन्द्र, बृिस्पषत न्तस्थत िोंगे तब सययुग
आरम्भ िोगा। यि न्तस्थषत प्रायः िर १२ विघ बाद आती िै। आगामी १५ जु लाई २०२६ को गुरु, चन्द्र पुष्य में िोंगे, पर
उसके ६ षदर् बाद सूयघ इस र्िि में आयेगा। सूयघषसद्धाि अयर्ां श ले र्े से १९ जुलाई को सूयघ पुष्य में िोगा। थोड़ा
कम अयर्ां श लेर्े से १५-७-२०२५ को तीर्ों िि पुष्य में िोंगे। कुरार् के अर्ु सार २०२२ ई. में १४०० विघ बाद इस्लाम
की समान्तप्त िोगी।
सम्भल िाम के बारे में कई मत िैं । ओषड़शा का सम्बलपुर इन्द्र की सेर्ा का स्थार् था जिां उर्की वज्र शन्तक्त
षछन्नमस्ता की समले श्वरी रूप में प्राचीर् काल से पूजा िो रिी िै । विां इन्द्र-षशव का मन्तन्दर बुढ़ाराजा (स्वन्तस्त र् इन्द्रो
वृद्धिवा) प्राषचर् काल से िै । इसके षर्कट मिे न्द्र पवघत भी िै जिां परशु राम का षर्वास िै और वे इर्को अस्त्र षशिा
दें गे। ओषड़शा में पारम्पररक कन्ति मठ भी िै । कन्ति पुराण अध्याय २ के अर्ु सार वैशाख शु क्ल िादशी के षदर्
कन्ति अवतार िोगा। उर्की माता का र्ाम सुमषत िोगा।
कन्ति पुराण, अध्याय२-शम्भले षवष्णु यससो गृिे प्रादु भघवाम्यिम् । सुमया मातरर षवभो पत्नीयां त्वषन्नदे शतः॥४॥
चतुषभघ भ्ाघ तृषभदे व कररष्याषम कषलियम् ॥५॥ इयं मम षप्रया लक्ष्मीः षसंिले सम्भषवष्यषत।
बृिद्रथस्य भू पस्य कौमुद्या कमले िणा॥ भायाघ या मम भायेिा पद्मा र्ाम्नी जषर्ष्यषत॥६॥
िादश्ां शु क्ल पिस्य माधवे माषस माधवम्। जातं ददशतुः पुिं षपतरौ हृष्टमार्सौ॥१५॥
अध्याय ३-ततो वस्तुं गुरुकुले यािं कन्तिं षर्रीक्ष्य सः। मिेन्द्राषद्र न्तस्थतो रामः समार्ीयािमं प्रभु ः॥१॥