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असाधु यत् तत्र स नः प्रमादो यत्साधु सववः स ऋषषप्रसदः॥
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अ अध्याय १

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स्वामी

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शश रामभद्राचायव कृत ईशावास्योपषनषद् का श्लोक-बद्ध सार-
शश

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शशश

चराचरं पूररतमीश्वरे ण मत्वा प्रसादं तदु पाहृतेन।
शशश
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त ं क्ष्येह मा भू ः परषवत्तगृधनु ः, वेदार्व एष प्रर्मः श्रु तेवै॥१॥
शश

शशश

शश

शश
=प्रर्म
शशश
शश श्रु षत कहती है षक तुम्हारे कमव के अनु सार तुम्हारे षपता परमात्मा ने तुम्हें षजतना षदया है , उसी में सन्तोष
शश

शशश

रशश

मानो,

शशश उससे अषतररक्त धन का लालच मत करो।
शश
शशश

शश

शश
शशश
असक्तबु द्ध्या षवषहतं स्वकमव , षजजीषवषे द्वषव शतं प्रकुववन्।
शश
शश
रम

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श कमवबन्धो भषवता नरे ऽन्यो, मागोऽस्ति वेदार्व इषत षद्वतीयः॥२॥
शश

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शशश

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=
श असक्त बुस्तद्ध से अपना कतवव्य करते हुये ही १०० वषव जीने की इच्छा करे । इससे कमव का बन्धन नहीं होता। षद्वतीय
शश
शशश


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शश
मन्त्र के अनु सार मु स्तक्त का कोई अन्य मागव नहीं है ।
शश



शश


शश
य ये भजन्त्यच्युतपादपल्लवम् , षहं सस्तन्त चात्मानमसत्कृतैश्च ये।
शश


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शशश


असुयवलोकान्प्रषतयास्तन्त ते मृ ताः, मनु तृतीयार्व षममं षवषनषश्चनु ॥३॥
शश

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=जो अच्युत के चरण-कमलों का ध्यान नहीं करते तर्ा आत्मा की षहं सा करते हैं , वे मरने के बाद असुयव लोक
(अन्धकार) में जाते हैं , ऐसा षनश्चय पूववक तृतीय श्रु षत का कर्न है ।
अकम्पमे कं जववत्तरं ह्यदो, नेदं सुराः प्रापुररदं गुणाषतगम् ।
अत्येषत सवाव नषप धावतो बलात्, तस्तिन् षह वातो षवदधाषत जीवनम् ॥४॥
=वह एक अकम्प है षकन्तु सबसे तेज गषत के हैं । ये गुणों से अतीत हैं अतः दे व भी उनको नहीं पा सकते। जो पूरी
शस्तक्त से दौड़ रहे हैं उनसे भी आगे षनकल जाते हैं । वे वायु द्वारा जीवन का धारण करते हैं ।
चलत्यचल एवासौ दू रास्तन्तकतया स्तथर्तः।
अन्तबवषहस्तथर्तश्चाषप भाववैषम्यकारणात्॥५॥
= परब्रह्म परमात्मा चलते भी हैं , नहीं भी चलते। परमे श्वर सबसे दू र भी हैं और षनकट भी, और वही सववसवेश्वर
अन्तयाव मी रूप से सम्पू णव जीवों के अन्तर में , तर्ा काल रूप में सभी जीवों के बाहर भी षवराजते हैं ।
यः सववभूतान्यनु पश्यतीशे भू तेषु सवेषु तर्ा परे शम् ।
ततो न षकषित् षवजु गुप्सतेऽसौ षष्ठश्रु तेरेष उदाहृतोऽर्व ः॥६॥
= जो सभी भू तों को दे खने के बाद उनमें में ईश का अनुभव करता है , तर्ा केवल परमे श्वर का ही अनु भव करता है ,
वह कभी षनन्दनीय कायव नहीं कर सकता-यह छठी श्रु षत में कहा है ।
एकत्वदशी दशलक्षणाढ्यं, षवशु द्धषवज्ञानघनं मु कुन्दम् ।
प्राप्नोषत सम्यक् पररभू य पापं इत्यर्व मेतत् श्रु षतराह सूक्ष्मम् ॥ (श्लोक ७-८)
= एकत्व दशव न करने वाला १० लक्षणों वाले षवषुद्ध षवज्ञान घन मु कुन्द को पा कर सभी पापों से मु क्त हो जाता है -यह
श्रु षत का सूक्ष्म अर्व है (श्लोक ७-८)।
अन्धं तमो यास्तन्त हरे ः पदाब्जं, षवहाय ये काम्यकृतौ प्रसक्ताः।
ततोऽषप ते घोरतरं ब्रजस्तन्त, तत्तत्सुरोपासनबोधषनष्ठाः॥९॥
= जो भगवान् के चरनकमलों को छोड़ कर काम्य कमों में षलप्त हैं वे अन्धकार में जाते हैं । उससे भी घोर अन्धकार
में वे जाते हैं , जो षकसी उद्दे श्य से दे व-षवशे ष की पूजा करते हैं ।
षवद्याश्चाप्यषवद्याया वैलक्ष्ण्यं फले श्रु तम् ।
वयमश्रु ण्म धीरे भ्यो ये व्याचक्षु ः पुरा षहनः॥१०॥
= षवद्या तर्ा अषवद्या दोनों का षवलक्षण फल हमने ऋषष परम्परा से (धीरों से) सुना है षजन्ोंने प्राचीन काल में इसकी
व्याख्या की र्ी।
षवद्याषभधं यो भजतीह बोधम् , तर्ै व कमाव चरतीह्यषवद्याम् ।
अषवद्यया मृ त्युमतीत्य षवद्या-बले न पीयूषजुषो लसस्तन्त॥११॥
=षजसे षवद्या रूप बोध या ज्ञान है तर्ा अषवद्या रूप कमव भी कर रहा है , वह अषवद्या द्वारा मृ त्यु को पार कर जाता है
तर्ा षवद्या-बल से अमृ त फल पाता है ।
असम्भू तेश्चवसम्भतेः सस्तिभाव्य समु च्चयम्।
प्राप्नोषत परमात्मानं तीत्वाव संसारसागरात्॥ (श्लोक १२-१४)
= जो असम्भू षत तर्ा सम्भव दोनों को समझ कर समन्वय करता है , वह संसार सागर को पार कर परमात्मा को पाता
है । (श्लोक १२-१४)
यत्सू यवमण्डलगतं तव सत्यरूपम् , नीलाब्जसस्तितमहो षपषहतं च भानोः।
ज्योषतमव यैश्च षकरणैिदपावृणु त्वम् , दृष्ट्वा यर्ाहमषधयाषम कृतार्व भावम् ॥१५॥
=हे परमात्मा! सूयवमण्डल में स्तथर्त जो तुम्हारा सत्यरूप है वह नील कमल जै सा है और सूयव को समे टे हुए है । आप
षकरणों के आवरण को हटा कर अपना स्वरूप षदखा कर कृतार्व करें ।
षवगमय षनजमाया मोघरश्मीन् रसज्ञ, गमय पुरुषतेजो भृ त्य पूषन् परात्मन् ।
तव जलधरनीलं रूपमालोकयेयं, प्रषततनु कृतवासः शु द्धबुद्धोऽहमात्मा॥१६॥
= आप अपनी माया की मोघ रस्तश्मयों को हटा कर रस रूप का साक्षात् करावें (रसो वै सः), पुरुष रूप अपने तेज से
भक्तों का पोषण करें । आपका मे घ समान नील रूप हर शरीर में है , ऐसी मे री शुद्ध बुस्तद्ध हो।
वायुश्च मे यात्वर्सूक्ष्मवातं, त्वत्तामृ तं भिभवेत् तनु मे।
मां दासरूपेण हरे ! िर त्वं, कृपाषनधे षविर मे ह्यघाषन॥१७॥
=मे रा सूक्ष्म शरीर वायु रूप है , थर्ूल शरीर मरने के बाद भि हो जाता है । मे रे पापों को भू ल कर मु झे दास रूप में
िरण करें ।
जानन्मदीयं दु ररतं हुताशः, स्वाषमन्सु मागेण नयातवबन्धो।
अिच्च पापाषन षवयोजयेर्ाः, भू यो मु हुस्त्ां प्रणमाम राम॥१८॥
= हे दीनबन्धु! मु झे कुमागव तर्ा षनराशा से बचा कर सुमागव से ले चलें । हमें पापों से मुक्त करें । हे राम! आपको बार
बार नमस्कार है ।
अध्याय २

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शशशर या षकसी षपण्ड के भीतर की गषत दीखता नहीं है । वह कृष्ण गषत १७ प्रकार की है , इस अर्व में प्रजापषत या
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पु रुष को १७ प्रकार का कहा गया है । समाज (षवट् = समाज, वैश्य) भी १७ प्रकार है । षवट् सप्तदशः। (ताण्ड्य
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महाब्राह्मण
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श १८/१०/९) षवशः सप्तदशः (ऐतरे य ब्राह्मण, ८/४)


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सप्तदशो

त वै पुरुषो दश प्राणाश्चत्वायवङ्गान्यात्मा पिदशो ग्रीवाः षोडश्च्च्यः षशरः सप्तदशम्। (शतपर् ब्राह्मण, ६/२/२/९)
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ब र ं सप्तदशः। (तैषत्तरीय ब्राह्मण, १/८/८/५)


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र् ः सप्तदशो भवषत। (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १७/९/४)
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सप्तदश एव िोमो भवषत प्रषतष्ठायै प्रजात्यै। (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १२/६/१३)

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य १/३/३/१९, ५/२/४/१८, ६/६/३/७ )

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तिाऽएतिै सप्तदशाय प्रजापतये। एतत् सप्तदशमन्नं समस्कुववन्य एष सौम्योध्वरो ऽर् या अस्य ताः षोडश कला एते
ते षोडशस्तत्ववजः (शतपर् ब्राह्मण, १०/४/१/१९)
अर्ाव त्, व्यस्तक्त, समाज या राष्ट्र के अंगों का आन्तररक समन्वय १७ प्रकार से है जो दीखता नहीं है । वह कृष्ण गषत है ।
एक समतल को षकसी षचह्न (टप्पा) द्वारा १७ प्रकार से भरा जा सकता है । इसे आधुषनक बीजगषणत में समतल

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श रुष सूक्त, वाज. यजु , अध्याय ३१)-

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एतावान् अस्य मषहमा अतो ज्यायां श्च पूरुषः। पादोऽस्य षवश्वा भू ताषन षत्रपादस्यामृ तं षदषव॥३॥
शश





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शश इतनी इसकी (भू त, वतवमान् भषवष्य जगत् रूप पुरुष की) मषहमा है । इससे भी बड़ा या अषधक (ज्यायान् ) पूरुष है।

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अ रा षवश्व और भू त इसका १ ही पाद है , बाकी ३ पाद आकाश में अमृ त (ज्यों का त्यों, अक्षय) है ।

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अ षवराट् अजायत, षवराजो अषध पूरुषः। स जातो अत्यररच्यत पश्चाद् भू षममर्ो पुरः॥५॥

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न उससे (एक पाद षवश्व-रूप पुरुष, अज-एकपाद) षवराट् (षवशे ष राषजत, अव्यक्त तुलना में प्रत्यक्ष) षवश्व उत्पन्न
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हुआ। षवराट् से अषध-पूरुष (इसका आधार) उत्पन्न हुआ।
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सप्तास्यासन्
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रश पररधयः षत्रः सप्त सषमधः कृताः। दे वा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशु म्॥१५॥
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= इसकी ७ पररषध (७ लोकों की सीमा) र्ी तर्ा ३ x ७ सषमधा (षनमाव ण सामग्री, षजसके हवन से नयी विु उत्पन्न
होषत है ) र्ी। दे वों ने पुरुष रूप पशु को ही बान्ध कर षवश्व षनमाव ण यज्ञ आरम्भ षकया। (ब्रह्म ही हषव, षनमाव ण षिया,
षनषमव त पदार्व अषद सब कुछ है -गीता, ४/२४)



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जगशश षिया रूप अव्यक्त षवश्व है । बाहरी षिया दीखती है , जो शु क्ल गषत है । भीतरी षिया नहीं दीखती-वह कृष्ण
गषत है ।
जगदव्यक्त मू षतवना (गीता, ९/४)हे तुनाने न कौन्तेय जगद् षवपररवतवते (पररवतवन होता है )।
जगज्जीवनं जीवनाधार भू तं (नारायण पूववताषपनी उपषनषद् , ४/५०)
शु क्ल कृष्णे गषत ह्येते जगतः शाश्वते मते (गीता, ८/२६)
षत्रषभगुवणमयैभाव वैरेषभः सववषमदं जगत् (गीता, ७/१३)
जगत् प्रहृष्यत्यनु रज्यते च (गीता, ११/३६)-चेतन तत्त्व।
षवश्वनार् = षशव, जगन्नार् = षवष्णु ।
जगत्यां जगत्-जगत्यां जगषत या जगती (स्त्रीषलं ग) का रूप है । जगषत से जगत हुआ है जो कुंए के ऊपर गोलाकार
चबूतरा है षजस पर खड़े हो कर पानी भरते हैं । यह षहन्दी शब्दसागर या मानक षहन्दी कोश में है पर इसका संस्कृत
रूप जगती षकसी संस्कृत कोष में नहीं है । वाज. सं में जगषत का प्रयोग है षजससे पानी षनकालते हैं -
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शशय, ३/१४/१)
कमं ब्रह्मोद्भवं षवस्तद्ध (गीता, ३/१५) यज्ञः कमव समु द्भवः (गीता, ३/१४)
= ब्रह्म से कमव हुआ अर्ाव त् ब्रह्म का अंश कमव है , उसका अंश यज्ञ।
(८) यजुवेद के प्रथम मन्त्र से समन्वय-यजु वेद का प्रर्म मन्त्र उसके पूणव षवषय और उद्दे श्य के षवषय में कहता है -
ॐ इ॒षे त्वोो॑जे त्वाो॑ वा॒यवो॑ थर् दे॒ वो वःो॑ सषव॒ता प्रापवयतु
ो॑ आप्याो॑ यध्व मघ्नन्या॒ इन्द्ाो॑ य भा॒गं प्र॒जावो॑तीरनमी॒वा अो॑य॒क्ष्मा मा वो॑
िे न ई ो॑षत माघशो॑ सो ध्रुवा अ॒स्तिन् गोपो॑तौ स्यात ब॒ह्वीयवजमाो॑ नस्य प॒शून्ाो॑ षह (वा. यजु १/१)
इसमें ईषा (या इषा) का अर्व है रर् का धुरा या हल की लम्बी लकड़ी है । रर् का धुरा गषत का केन्द् है । हल कृषष का
केन्द् है । इस तरह ईश सभी षिया के केन्द् हृदय में है । व्यापक रूप ईशा के कायव से समानता-
१. सन्तुषष्ट्-सषव॒ता प्रापवयतु
ो॑ आप्याो॑ यध्व---
ईशः सववस्य जगतः प्रभु ः प्रीणाषत (महानारायण उपषनषद् , १६/५)
ईशानो भू तभव्यस्य न ततो षवजु गुप्सते। (कठोपषनषद् , ४/१२)
२. इन्द्ाो॑ य भा॒गं-शासक के षलये भाग-
ईशायै मन्युं राजानं बषहवषा दधुररस्तन्द्यं (वाज. यजु, २१/५७) = ऐश्वयव, शासन
३. प्र॒जावो॑ती-ईशा वशस्य या जाया सास्तिन् वणवमाभरत्। (अर्वव ११/८/१७)
४. गो और पशु की वृस्तद्ध-गोपो॑तौ स्यात ब॒ह्वीयवजमाो॑ नस्य प॒शून्ाो॑ षह----
ईशे यो अस्य षद्वपदः चतुष्पदः (मै त्रायणी सं. २/१३/२३, १६८/८, ३/१२/१७, १६५/६, काण्व सं. ४०/१)
ईशे वाजस्य गोमतः (ऋक् ८/२५/२०)
या गौः सा षसनीवाली सो एव जगती। (ऐतरे य ब्राह्मण, ३/४८)
५. मू ल यज्ञ कृषष का साधन ईषा-
ईशे यो वृष्ट्ेः इत उस्तस्त्रयो वृषा (ऋक्, ९/७४/३)
ईशे रायः सुवीयवस्य दातोः। (ऋक् ७/४/६)
ईशे कृष्ट्ीनां नृ तुः (ऋक्, ८/६८/७)
६. रोग और शत्रु का नाश-प्र॒जावो॑तीरनमी॒वा अो॑य॒क्ष्मा मा वो॑ िेन ई ो॑षत माघशो॑ सो--
ईशे महः सौभगस्य (ऋक्, ३/१६/१)
ईशे ररपुरघशं सः। (ऋक्, १०/१८५/२, वाज. सं. ३/३२, काण्व सं. ७/२, मैत्रायणी सं. १/५/४, ७०/१०, शतपर् ब्राह्मण,
२/३/४/३७)
ईशे षवश्वायुर् उषसो व्युष्ट्ौ (ऋक्, १०/६/३)
ईशे षह षपत्वोऽषवषस्य दावने (ऋक्, ८/२५/२०)
ईश्वरी सवव भू तानां त्वाषमहोपह्वये षश्रयम् (श्री सूक्त, ९, ऋक् स्तखल, ५/८७/९)
अध्याय ४. ईशावास्य, मन्त्र २
कुववन्नेवेह कमाव षण षजजीषवषेच्छतं समाः। एवं त्वषय नान्यर्े तोऽस्ति न कमव षलप्यते नरे ॥२॥
कमव को करते हुये ही इस सं सार में १०० वषव जीने की इच्छा करे । एकमात्र यही उपाय है , अन्य नहीं है षजससे मनु ष्य
कमव में षलप्त नहीं होता शश।
वे दमें वववि-वनषेि दोनोों हैं-अर्ाव त् क्या करना चाषहये, क्या नहीं करना चाषहये।
राम भस्तक्त जहं सुरसरर धारा। सरसइ ब्रह्म षवचार प्रचारा॥
षबषध षनषे धमय कषलमल हरनी। करम कर्ा रषबनन्दषन बरनी॥ (रामचररतमानस, बालकाण्ड, १०/९)
यहां श्रे य है रामभस्तक्त रूपी गङ्गा, षलप्त होने वाले कमव या उसके फल सूयवपुत्री यमु ना हैं तर्ा उनके बीच समन्वय
सरस्वती नदी ब्रह्म षवचार रूप है ।
मीमां सा के अनु सार इनकी पररभाषा है-
षवषध-प्रमाणान्तरों से पहले से अज्ञात तर्ा श्रे यस् (लौषकक एवं पारलौषकक अभ्यु दय) के साधन का बोधक वेद वाक्य
है षवषधवाक्य। अन्तः प्रवृषत्त का उत्पादक ’अयम् अत्र प्रवतवताम् ’ इस प्रकार का अषभप्राय ही प्रवतवना पद का वाच्य
अर्व षवषधवाक्य से ज्ञात होत है। षलङ्, ले ट्, लोट् , तव्य तर्ा अनीयर आषद प्रत्ययों से इसका षवधान दीखता है । इसके
४ प्रकार हैं -१. उत्पषत्त षवषध, २. षवषनयोग षवषध, ३. अषधकाररक षवषध तर्ा ४. प्रयोगषवषध।
षनषे ध-षनषे ध के २ भे द हैं -१. पयुवदास और २. प्रसज्य प्रषतषे ध। षिया पद के सार् नञ् का अन्वय होने पर प्रसज्य
प्रषतषे ध होत है और उत्तर पद के सार् नञ् का अन्वय होने से पयुवदास होता है । पयुवदस में पूणव षनषे ध नहीं है , यह
अपवाद बतात है । प्रसह्य में पूणव षनषे ध है ।
इस मन्त्र में कमव बन्धन से मु स्तक्त का उपाय कह है जो षवषध वाक्य है । अगले मन्त्र में षनषे ध है षक आत्महत्या या
अन्धकार से कैसे बचा जाय। उसके बाद दोनों का समन्वय है षक ब्रह्म की प्रास्तप्त कैसे होगी।
गीता में षनष्काम कमव का उपदे श अध्याय २ में है , पर उसे सां ख्य योग कहा है । इसके बाद यज्ञ की पररभाषा अध्याय
३ में है षजसका नाम कमव योग है । अध्याय ४ में यज्ञ के प्रकार हैं षजसका नाम ज्ञान कमव संन्यास योग है । अध्याय ५
कमव संन्यास योग है षजसमें अजुव न के प्रश्न का उत्तर है षक संन्यास और कमव योग में श्रे ष्ठ क्याहै ।

(शश

(शश
)(३

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शश

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शश
शश

१.
शश
शशश



)
शश






शश

शश
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शश कमव क्या है ? और अकमव क्या है ? इस षवषय में कषव अर्ाव त् बड़े षवद्वान् भी मोषहत हो जाते हैं। मैं (भगवान् कृष्ण)
शशश



म कमव और अकमव का तत्त्व तुम्हें खोलकर बता दे ता ह, षजसे जान कर तुम अशुभ अर्ाव त् पाप से या पापयुक्त
उस

शश
शश

म सार से मु क्त हो जाओगे। (१६) कमव का तत्त्व जानने योग्य है और षवकमव अर्ाव त् षनषषद्ध कमव का भी तत्त्व जानने
सं
शश


शश
श है । अकमव अर्ाव त् कमव के अभाव का भी तत्त्व जानने योग्य है । कमव की गषत अर्ाव त् ज्ञान बहुत गहन (गम्भीर)
शश
योग्य
शश

शश

स। (१७) जो कमव में अकमव को दे खे और अकमव में कमव दे खे, वही मनुष्यों में बुस्तद्धमान् है और सच्चा कमव योगी है।
है

शश


वही सब कमों का कत्ताव है अर्ात् सब कमों का फल उसे प्राप्त होता है ।(१८)

शश
क प्रर्म पद्य में ’कमव ’ ’अकमव ’ का उल्लेख हई षकन्तु दू सरे में ’षवकमव ’ का उल्ले ख है । यह मीमां सा की पररभाषा
यहां
शश


शश


जै


शश सा है -अकमव पूणव षनषषद्ध है , दू सरे में षवकल्प है। इनके अषतररक्त षनत्य या नै षमषत्तक कमव ही कमव हैं । केवल षलखा





शश
श षक इनको जानना चाषहये, पर पररभाषा नहीं दी गयी है । इनको षबलकुल अलग नहीं षकया जा सकता। अतः तृतीय
है



शश
शशश
पद्य

च में दोनों को षमला जुला कहा है -कमव के भीतर अकमव तर् अकमव के भीतर कमव है ।

शश
सामान्यतः
शश ३ प्रकार के कमव कहे जाते हैं -



शश

शश

१शश


-शश
रशश
०श
शश

शश

, शश?


षनत्य कमव -दै षनक शरीर शु स्तद्ध, घर की शु स्तद्ध, भोजन, दै षनक पि महायज्ञ आषद।
नै षमषत्तक कमव -षवषशष्ट् षनषमत्त या पवव के षलये। जै से-घर बनाना, अश्वमे ध यज्ञ, व्रत-त्योहार, श्राद्ध आषद।
काम्य कमव -षकसी षवशे ष कामना से जो षकया जाता है। इसमें कामना जु ड़ी है अतः उसकी पूषत्तव होने या नहीं होने से
सुख या दु ःख होता है । सुख दु ःख या अतृस्तप्त का भाव सदा मन में बना रहत है , अतः यह बन्धन कारक है ।
जै सा भगवान् ने कहा है , इस षवषय में कषव भी मोषहत हैं । सबसे पुरानी उपलब्ध टीका शङ्कराचायव की है , उन्ोंने
अपने से भी पुराने मत उद् धृत षकये हैं ।
शङ्कराचायव-दे ह, इस्तन्द्य आषद का कमव षजस समय हो रहा हो, उस समय भी आत्मा में कोई कमव नहीं है । यह द्वा
सुपणव सूक्त के जै सा है , षजसमें एक पक्षी आत्मा षनषलव प्त द्रष्ट्ा है , दू सरा पक्षी जीव कमव में षलप्त है । इस का वणवन
सौन्दयव लहरी श्लोक ३८ में ज्ञान रूपी कमल के २ हं सों के रूप में षकया है -मस्तिष्क के आज्ञा चि के २ दल या
अद्धव -नारीश्वर षशव।
समु न्मीलत् संषवत् कमल मकरन्दै करषसकम् , भजे हं स-द्वन्द्द्वं षकमषप महतां मानस चरम्।
यदालापादष्ट्ादश गुषणत षवद्या पररणषतः, यदादत्ते दोषाद् गुणमस्तखलमद्भ्यः पय इव॥
इसके अनु सार प्रवृषत्त तर्ा षनवृषत्त-दोनों कमव ही हैं । मन या शरीर की स्वाभाषवक षिया को रोकने के षलये भी कमव
करना पड़त है ।
शङ्कराचायव द्वारा उद् धृत प्राचीन मत के अनु सार षमत्य नै षमषत्तक कमों में जो अकमव दे खता है अर्ाव त् षनत्य नै षमषत्तक
कमों का कोई फल नहीं होता अतः वह अकमव ही है । षकन्तु नहीं करने से हाषन या पाप होता है -स्नान भोजन आषद
नहीं करने से बीमार हो सकता है , अतः अकमव में भी कमव है ।
श्री रामानुजाचायव अकमव का अर्व ज्ञान करते हैं और इसका अर्व ज्ञान-कमव समन्वय मानते हैं । कमव के समय जो
अकमव अर्ाव त् ज्ञान का अनु सन्धान करता है तर्ा ज्ञान के समय भी जो कमव करत है वही बुस्तद्धमान् है ।
श्री वल्लभाचायव व्याख्या में षलखा है षक कमव या उसकी सामग्री षवषध आषद में जो अकमव अर्ाव त् ब्रह्म को दे खता है वह
बुस्तद्धमान् है -ब्रह्मापवणं ब्रह्म हषवब्रवह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म कमव समाषधना॥ (गीता, ४/२४)
नीलकण्ठ जी ने शङ्कर भाष्य के अनु सार व्याख्या के बाद अन्य अर्ों का भी समन्वय षकया है । कमव का अर्व तीनों है -
कमव , अकमव , षवकमव। उसमें जो अकमव अर्ाव त् षवरुद्ध दशवन करता है वह अकमव कहा जायेगा, जै से षबना श्रद्धा के
यज्ञ। दम्भ के सार् करने पर वही षवकमव अर्ाव त् पाप जनक होगा।
संकलन-कमव-षिया के कारण गषत। आधुषनक भौषतक षवज्ञान में ; कमव = बल x षवथर्ापन।
अकमव - (१) बल द्वारा कमव नहीं कर सकें। जोर लगाया, पर दीवार नहीं षहला पाये। हवा वृक्ष उखाड़ सकती है पर
पववत पर उसका वेग नहीं चलता। न पादपोन्मू लन शस्तक्तरं हः षशलोच्चये मू च्छवषत मारुतस्य (रघुवंश, २/३४)
(२) हमारे षबना जाने षिया चल रही है -जै से श्वास या रक्तसिार।
(३) कमव हो रहा है पर उस के कारण या फल में आसस्तक्त नहीं है ।
(४) व्यवथर्ा को चलाने के कमव षजससे वह यर्वत् बना रहता है । शरीर का षनत्य कमव , आन्तररक या बाह्य शु स्तद्ध।
दै षनक भोजन, पि महायज्ञ। घर की दै षनक सफाई। षकसी संथर्ा के षनयषमत कायव।
षवकमव -(१) आवश्यक कमव या कत्तव व्य के अषतररक्त कमव (षवकल्प कमव )।
(२) षनषदव ष्ट् षवषध से अलग कमव, षजससे कमव का शून्य या षवपरीत फल हो सकता है ।
(३) अनु त्पादक या हाषनकारक कमव -षबना कारण पैर षहलाना, नख काटना, गाली दे ना, अपने या दू सरे की हाषन के
उद्दे श्य से काम।
कमव में अकमव -(१) केवल कतवव्य मान कर कमव। उससे पाप-पुय की आशा, गवव या षनराशा नहीं।
(२) षनत्य कमव षजससे कोई दृश्य पररवतवन नहीं। पर नहीं करने से व्यवथर्ा नष्ट् हो जायेगी।
(३) समाज के षलये कमव, अपना स्वार्व नहीं।
अकमव में कमव -(१) शान्त षचत्त से रहना षजससे काम यर्ावत चलते रहें ।
(२) व्यवथर्ा के अध्यक्ष रूप में लोगों के काम पर केवल दृषष्ट् रखना, उसमें अनावश्यक बाधा नहीं।
(३) कमव करें पर उससे अनावश्यक हषव , शोक, गवव, षनराशा आषद प्रभाव नहीं हों।
२. शतायु-मनु ष्य शरीर १०० वषव जीने योग्य बनाया गया है । यषद स्वास्थ्य षनयमों के अनु सार षनत्य कमव करें , शास्त्र में
कहे अनु सार यम-षनयम, तप-स्वाध्याय करते रहें तो १०० वषव जी सकते हैं ।
अपना कतवव्य मानकर कमव करें । यह नहीं सोचे षक लक्ष्य षमल गया अब आराम से बै ठें। उससे शरीर और मन
षनस्तिय हो जायेगा तर्ा इसकी षिया में दोष आते जायेंगे षजससे आयु कम हो जायेगी और शरीर अपने को भी नहीं
सम्भाल पायेगा। जै से भगवान् ने अपने बारे में भी कहा है षक उनको और कुछ पाना नहीं है , षफर भी कमव करते हैं ।
नहीं तो उनकी दे खा-दे खी अन्य लोग भी आराम से बैठ जायेंगें।
न मे पार्ाव स्ति कतवव्यं षत्रषु लोकेषु षकिन। नानवाप्तमवाप्तव्यं वतव एव च कमव षण॥ (गीता, ३/२२)
= हे पार्व ! मे रे षलये तीनों लोकों में कुछ भी कत्तव व्य नहीं है और कुछ भी पाना बाकी नहीं है , षफर भी मैं सदा कमव में
लगा रहता ह।
नाहं तन्तुं न षव जानाम्योतुं न यं वयस्तन्त समरे ऽतमानाः। (ऋग्वेद, ६/९/२)
= मैं (ब्रह्म) अपने षलये कमव तन्तु आवश्यक नहीं समझता, तर्ा सकाम कमव के यज्ञों द्वारा जीव जो कमव रूपी वस्त्र
बुनते हैं उसे भी आवश्यक नहीं मानता।
यषद ह्यहं न वतेयं जातु कमव यतस्तन्द्तः। मम वत्माव नुवतवन्ते मनुष्याः पार्व सववसः॥ (गीता, ३/२३)
= हे पार्व ! यषद मैं षबना आलस्य वेद षवषहत षनत्य नै षमषत्तक कमव में न लगा रहं , तो संसार के अन्य लोग भी मे रा
अनु करण कर अपना कमव छोड़ कर आलसी हो जायेंगें।
यस्य प्रयाणमन्वन्य इद्ययुदेवा दे वस्य मषहमानमोजसा।
यः पाषर्व वाषन षवममे स एतशो रजां षस दे वः सषवता मषहत्वना॥ (ऋक्, ५/८१/३)
= इस सषवता दे व के मषहमापूणव मागव का दू सरे दे व अनु करण करते हैं और तेज युक्त होते हैं ।
उत्सीदे युररमे लोका न कुयां कमव चेदहम् । सङ्करस्य च कताव स्यामु पहन्याषममाः प्रजाः॥ (गीता, ३/२४)
= यषद मैं वेद षवषहत कतवव्य कमव न करू तो ये सब प्राणी अर्वा भू भुववः आषद ७ लोक नष्ट् हो जायेंगे और मैं
वणवसंकरों का कताव हो जाऊगा, तर्ा इन प्रजाओं का हनन करूगा।
भद्रषमच्छन्त ऋषयः स्वषववदिपो दीक्षामु पषनषे दुरग्रे।
ततो राष्ट्रं बलमोजश्च जातं तदिै दे वा उपसंनमन्तु॥ (अर्वव वेद, १९/४१/१)
कल्याण कामना करते हुए स्वगव प्रास्तप्त के साधन तर्ा मु स्तक्त सुख की कामना करते हुए सृषष्ट् के आषद में उत्पन्न हुए
ऋषषयों ने तपस्यात्मक षनत्य नैषमषत्तक वैषदक कमव तर्ा दीक्षा दी। उसके बाद
शश
शश
एको हसो भु वनस्यास्य मध्ये स एवाषग्नः सषलले संषनषवष्ट्ः। तमे व षवषदत्वाऽषतमृ त्युमेषत नान्यः पन्था षवद्यतेऽयनाय॥

(श्वे ताश्वतर उपषनषद् , ६/१५) न षह कषश्चत्क्षणमषप जातु षतष्ठत्यकमव कृत्।

कायवते ह्यवशः कमव सववः प्रकृषतजै गुवणैः॥ (गीता, ३/५)
शश
(१) कमव येवाषधकारिे मा फले षु कदाचन। मा कमव फलहेतुभूवमाव ते सङ्गोस्त्कमव षण॥ (गीता, २/४७)
शश
कामान् यः कामयते मन्यमानः स कामषभजाव यते तत्र तत्र।

पयाव प्त कामस्य कृतात्मनस्तस्त्है व सवे प्रषवलीयस्तन्त कामाः॥ (मु ण्डक उपषनषद् , २/२/२)

शश
शश
शश महान्तमाषदत्यवणं तमसः परिात्। तमे व षवषदत्वाऽषतमृत्युमेषत नान्यः पन्था षवद्यतेऽयनाय॥ (श्वे ताश्वतर उपषनषद् ,
३/८)
= षवषयों की कामना करने वाला षजन-षजन कामनाओं को चाहता है , उन्ीं-उन्ीं कामनाओं के अनु सार वहां -वहां
जाकर जन्म ले ता है । परन्तु जो सवव प्रकार से आप्तकाम है , अर्ाव त् षजसकी सारी कामनायें भगवत्स्वरूप में पूरी हो
चुकी हैं , तर्ा जो सवव प्रकार से कृतकृत्य है , उसकी सारी कामनायें यहीं नष्ट् हो जाती हैं ।
भू तानां प्राषणनः श्रे ष्ठाः प्राषणनां बुस्तद्धजीषवनः। बुस्तद्धमत्सु नराः श्रे ष्ठा नरे षु ब्राह्मणाः िृताः॥
ब्राह्मणेषु च षवद्वां सः षवद्वत्सु कृतबुद्धयः। कृतबुस्तद्धषु कताव रः, कतृवषु ब्रह्मवाषदनः॥ (मनु िृषत, १/९६-९७)
ऐसा ही महाभारत (उद्योग पवव, ६/१-२) में भी है ।
= इस सृषष्ट् में जड़ पदार्ों में से चैतन्य अर्ाव त् प्राण वाले श्रेष्ठ हैं । उन प्राषणयों में बुस्तद्धपूववक जीवन षनबाहने वाले श्रे ष्ठ
हैं । बुस्तद्धवालों में भी मनु ष्य श्रेष्ठ हैं । मनु ष्यों में ब्राह्मण श्रे ष्ठ कहे गये हैं । ब्राह्मणों में भी षवद्वान् , तर्ा षवद्वानों में भी
कृतबुस्तद्ध (षनश्चयास्तत्मका बुस्तद्ध वाले ) श्रे ष्ठ हैं । षनश्चयास्तत्मका बुस्तद्ध वालों में भी षनत्य नै षमषत्तक कमव करने वाले श्रे ष्ठ हैं।
उनमें भी कमव फलों को भगवदपवण कर के केवल भगवत् स्वरूप की प्रास्तप्त करने वाले श्रे ष्ठ हैं ।
न जातु कामः कामानामु पभोगेन शाम्यषत। हषवषा कृष्णवत्मेव भू य एवाषभवधवते। (मनु िृषत, २/९४)
= कमों के फल स्वगव तर्ा सुन्दर रमणी आषद नाना प्रकार के भोग हैं । उन कामनाओं के भोगने से कभी तृस्तप्त नहीं
होती। जै से अषग्न में घृत डालने से अषग्न की ज्वाला उत्तरोत्तर बढ़ती रहती है ।
(२) योगथर्ः कुरु कमाव षण सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। षसद्ध्यषसद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥ (गीता, २/४८)
सक्तु षमव षततउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमित।
अत्रा सखायः सख्याषन जानते भद्रै षां लक्ष्मीषनव षहताषध वाषच॥ (ऋग्वे द, १०/७१/२)
वेद में १०० वषव की आयु तर्ा उसकी षवषध अने क थर्ानों पर वषणवत है -
शतायुवै पुरुषः (कौषीतषक उपषनषद् ब्राह्मण, ११/७, तैषत्तरीय ब्राह्मण ३/८/५/१५/३, ताण्ड्य महाब्राह्मण, ५/६/१३,
ऐतरे य ब्राह्मन, २/१७, ४/१९)
पश्ये म शरदः शतं जीवेम शरदः शतं शृणुयाम शरदः शतम् ।
प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतम् ॥ (वाज् . यजु . ३६/२४)
शतायुषः पुत्रपौत्रान्वृ णीह्व बहन्शू न्स्तिषहरयमश्वान् ।
भू मेमवहदायतनं वृणीश्व स्वयं च जीव सरदो यावषदच्छषस॥ (कठोपषनषद् , १/२४)
शतायुधाय शतवीयाव य (तैषत्तरीय संषहता, ५/७/२/३, काण्व संषहता, १३/१५)
शतायुषं कृणुषह चीयमानः (वाज. यजु . १३/४१)
शतायुष हषवशाहाषव म् एनं (ऋक्, १०/१६१/३, अर्वव, ३/११/३, २०/१६/९)
३. कमम में विप्त होना-वािषवक षवश्व में कई षवरोधी बातें एक सार् ठीक होती हैं । षकन्तु वेदान्त सबमें समन्वय
करता है । काम करने के षलये उसे पूरी षनष्ठा या मन लगा कर करना है। उसके सार् ही कहते हैं षक उसमें षलप्त
नहीं रहो। यह कैसे सम्भव है ? क्या षबना उद्दे श्य कमव षकया जाय? इसमें दो षवरोधी बातें माधवीय शं कर षदस्तग्वजय में
मण्डन षमश्र के सन्दभव में कही हैं । वहां ऐसा शास्त्रार्व होता रहता र्ा अतः सुग्गे भी यही कहते र्े -
फलप्रदं कमव फलप्रदोऽजः, कीराङ्गना यत्र षगरो षगरस्तन्त। द्वारथर् नीडान्तर सषन्नरुद्धा जानीषह तन्मण्डन पस्तण्डतौकः॥
(शङ्कर षदस्तग्वजय, २/७)
कमव उद्दे श्य के षलये षकया जाता है अतः उसे पूरी सावधानी और षनष्ठा से करना चाषहये। फल उसी पर षनभव र है । पर
कुछ बाह्य पररस्तथर्षत भी प्रभाषवत करती है । हमने समय पर खे ती की। पर वषाव समय पर नहीं हुयी या जमीन खराब
षनकली। तो उसी पररश्रम का फल कम षमले गा। इस अर्व में फल की प्रास्तप्त अज = अव्यय पुरुष पर षनभव र है । एक
पूणव व्यवथर् अव्यय है , षजसमें योग समान बना रहता है -एक थर्ान पर कमी होने पर अन्य थर्न में उतनी वृस्तद्ध हो
जाती है ।
अजोऽषप सन्नव्ययात्मा (गीता, ४/६) अजो षनत्यं शाश्वतोऽयं पुराणो (गीता, २/२०)
काम करने के पहले दो प्रकार के षचन्तन हैं । पहले तो सभी षवकल्प और षवषध दे ख कर उपयुक्त षवषध चुनें। षवकल्प
दे खना षवपश्यषत है । जो एक ही मागव दे खता है , वह अषवपषश्चत् = मू खव है ।
याषममां पुषषतां वाचं प्रवदन्त्यषवपषश्चताः। वेदवादरताः पार्व नान्यदिीषत वाषदनः॥ (गीता, २/४२)
वेद में सभी का समन्वय है , अतः केवल एक ही वाद को मानना उसके अषधकां श अर्ों का षवरोध है , अतः न अन्यत्
अस्ति (मे रे मत के अषतररक्त अन्य कुछ नहीं है ) कहने वाला नास्तिक है ।
षकन्तु काम आरम्भ करने के समय एक ही मागव चुनना है तर्ा उस पर लगे रहना है । बार बार सन्दे ह और मागव
बदलने से कुछ नहीं हो पायेगा।
व्यवसायास्तत्मका बुस्तद्धरे केह कुरुनन्दन। बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसाषयनाम् ॥ (गीता, २/४१)
मागव चुनने के बाद जब कमव आरम्भ हो गया तो केवल वतवमान कमव पर ध्यान रहे । यषद काम करते समय भू त
पररस्तथर्षत या भावी फल के बारे में सोचने लगें तो काम नहीं हो पायेगा।
कमव येवाषधकारिे मा फले षु कदाचन। मा कमव फल हे तुभूवमाव ते सङ्गोऽस्त्कमवषण॥ (गीता, २/४७)
मन और वतवमान कमव का षमलन ही कमव योग है । इसके सार् अन्य षवषयों या भावी षसस्तद्ध-अषसस्तद्ध के षवषय में
षचन्ता नहीं करें ।
योगथर्ः कुरु कमाव षण सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। षसद्ध्यषसद्ध्योः समो भू त्वा समत्वं योग उच्यते॥ (गीता, २/४८)
इस योग से कमव में कुशलता होती है ।
बुस्तद्धयुक्तो जहातीह उभे सुकृतदु ष्कृते। तिाद्योगाय युज्यस्व योगः कमव सु कौशलम् ॥ (गीता, २/५०)
४. ववरोि का समािान-कमव में मन लगायें, पर उस समय काम की षवषध के अषतररक्त अन्य षवषयों में षलप्त नहीं
हों। ये कमव में बाधा हैं -
-षपछली बार कमव ठीक से नहीं हो पाया।
-षजस व्यस्तक्त ने काम षबगाड़ा र्ा उससे बदला ले ना है ।
-षकतनी सुन्दर हवा चल रही है , सुगन्ध आ रही है । अभी बषढ़या भोजन करना चाषहये आषद अन्य षवषय।
-पता नहीं काम सफल होगा या नहीं।
-दू सरे तरीके से काम करना चाषहये र्ा।
-सफल होने के बाद पैसा षमले गा तो घर बनायेंगे, उसमें क्या क्या सामान इकट्ठा करें गे।
इनसे सम्बस्तन्धत गीता के श्लोक ऊपर षदये जा चुके हैं ।
५. मन विप्त होने से कैसे बचायें-मन कभी खाली नहीं रह सकता। उसको षलप्त होने से बचाने की षवषधयां हैं -
(१) आसस्तक्त का त्याग-पूवव कमव , वतवमान के अन्य षवषय या फल तर्ा उसके बाद कमव की कल्पनायें आषद छोड़ दें ।
ऊपर वषणवत।
(२) अहं भाव का त्याग-मैं यह नहीं कर रहा हं । कोई भी रहता तो इस पररस्तथर्षत में वही करता। या घटना िम में
यही होना र्ा, मैं तो केवल षनषमत्त मात्र ह। षनषमत्त रूप में भी मे रा योग नगय है , प्रकृषत के गुणों द्वारा ऐसा ही होता
है ।
यतो यतो षनश्चरषत मनश्चिलमस्तथर्रम्। ततितो षनयम्यै तदात्मन्ये व वशं नयेत्॥ (गीता, ६/२६)
चिलं षह मनः कृष्ण प्रमार्ी बलवद् दृढम् । तस्याहं षनग्रहं मन्ये वायोररव सुदुष्करम् ॥ (गीता, २/३४)
असंशयं महाबाहो मनो दु षनव ग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्ये ण च गृह्यते॥ (२/३५)
इन श्लोकों में मन को ही प्रभावी कहा है , अतः यह यह पुस्तल्लङ्ग है । कमव -ज्ञान इस्तन्द्यों दोनों में षगनती होने के समय
यह नपुंसक होता है ।
मयैवैते षनहताः पूववमेव षनषमत्तमात्रं भव सव्यसाषचन्। (गीता, ११/३३)-अभी शत्रु ओं का मरना बाकी है , पर यह षनषश्चत
हो चुका है , अतः इसे भू तकाल में कहा है ।
प्रकृतेः षियमाणाषन गुणैः कमाव षण सववशः। अहङ्कार षवमू ढात्मा कताव हषमषत मन्यते॥ (गीता, ३/२७)
(३) भगवद् भस्तक्त-भगवान् ने इसी काम के षलये मु झे जन्म षदया है । यह भाव आने पर स्वतः शस्तक्त तर्ा षवश्वास आ
जाता है । जन्म के सार् हमारा कतवव्य षनयत है , जन्म और कमव ये सभी प्रकृषत द्वारा हो रहे हैं -
कायवकारणकतृवत्वे हे तुः प्रकृषतच्यवते। पुरुषः सुखदु ःखानां भोक्तृ त्वे हे तुरुच्यते॥२०॥
पुरुषः प्रकृषतथर्ो षह भुङ्क्ते प्रकृषतजान्द्गुणान्। कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योषनजन्मसु॥२१॥
उपद्रष्ट्ानु मन्ता च भताव भोक्ता महे श्वरः। परमात्मेषत चाप्युक्तो दे हेऽस्तिन्ु रुषः परः॥२२॥ (गीता, अध्याय, १३)
इस भाव के प्रकट रूप भक्तराज हनु मान् हैं । जब तक अपने को सामान्य व्यस्तक्त समझ रहे र्े तब तक उनमें डर
तर्ा असस्तक्त र्ी। जै से ही उनको लगा षक उनका जन्म ही भगवान् के काम के षलये हुआ है , उनमें सभी शस्तक्त आ
गयी और पववताकार हो गये।
कहइ रीछपषत सुनु हनु माना। का चुप साषध रहे उ बलवाना॥
पवन तनय बल पवन समाना। बुषध षववेक षवज्ञान षनधाना॥
कवन सो काज कषठन जग माहीं। जो नषहं होइ तात तुम्ह पाहीं॥
राम काज लषग तव अवतारा। सुनतषहं भयउ पववताकारा॥
कनक बरन तन तेज षबराजा। मानहु अपर षगररन् कर राजा॥
षसंहनाद करर बारषहं बारा। लीलहीं नाषउ जलषनषध खारा॥
सषहत सहाय रावनषह मारी। आनउ इहा षत्रकूट उपारी॥
(रामचररतमानस. षकस्तष्कन्धा काण्ड, २९)
अध्यात्म रामायण, षकस्तष्कन्धा काण्ड, सगव ९ में भी यही कहा है -
इत्युक्त्वा जाम्बवान्प्राह हनू मन्तमवस्तथर्तम्। हनू मस्तकं रहिूष्णीं थर्ीयते कायवगौरवे॥१६॥
प्राप्ते ऽज्ञे नेव सामर्थ्यं दशव याद्य महाबल। त्वं साक्षाद्वायुतनयो वायुतुल्य परािमः॥१७॥
रामकायाव र्वमेव त्वं जषनतोऽषस महात्मना।


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३ I OR AN EPITOME OF MEGASTHENES (36.) The inhabitants, in like manner,

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१. स्वायम्भु व मण्डल- १०० अरब ब्रह्माण्डों का समू ह
२. परमे ष्ठी मण्डल-सबसे बड़ी रचना। षवश्व रूपी ब्रह्म का अण्ड होने से ब्रह्माण्ड।
३. सौरमण्डल-जहां तक सूयव का प्रकाश ब्रह्माण्ड के तारा समू ह से अषधक है , वहां तक इसका द् यु (आकाश) है।
जहां तक के षपण्ड इसकी कक्षा में रह सकते हैं वह सौर पृषर्वी है ।
४. चान्द् मण्डल-चन्द् कक्षा का गोल। जहां तक के षपण्ड पृथ्वी कक्षा में रह सकते हैं , वह आकाश का जम्बू द्वीप है
(५०,००० योजन षत्रज्या, योजन = पृथ्वी व्यास का १००० भाग)
५. भू -मण्डल-पृथ्वी ग्रह।
इसी को ७ लोकों में षवभाषजत षकया है -
१. भू लोक-पृथ्वी ग्रह।
२. भु वः लोक-ने पचून तक ग्रह कक्षा। १०० कोषट योजन की चिाकार पृथ्वी। इस के भीतरी ५० कोषट योजन भाग में
अषधक प्रकाश है , अतः इसे लोक भाग कहते हैं । इसमें पृथ्वी के चारों तरफ ग्रह गषत से बनने वाला वृत्त या वलय
आकार के क्षे त्र द्वीप कहे गये हैं षजनके नाम पृथ्वी के द्वीपों जै से ही हैं । बाहरी भाग अलोक भाग है ।
३. स्वः लोक-सौर मण्डल की पृथ्वी। यह सूयव प्रकाश का क्षेत्र होने से इन्द् स्वगव है । इस गोले का ऊपरी षवन्द्दु नाक
(स्वगव) है ।
४. महः लोक-ब्रह्माण्ड के केन्द् (कृष्ण) जो सपाव कार भु जा षनकली है , वह वेद के अनु सार अषहबुवध्न्य (अषह = सपव, बुध्न्य
= समु द्र, बाढ़) तर्ा पुराणों के अनु सार शे षनाग है । इसमें सूयव जहां स्तथर्त है उस केन्द् से भु जा की मोटाई के व्यास
का गोला महलोक है । इसमें १००० तारा हैं षजनको शेषनाग के १००० षसर कहते हैं ।
५. जनः लोक-ब्रह्माण्ड। इसका केन्द्ीय चिाकार भाग आकाश गङ्गा है । जनः को अरबी में जन्नत कहते हैं यह असुरों
का वरुण स्वगव है ।
६. तपः लोक-जहां तक का ताप हमारे तक पहुं च सकता है , वह तपः लोक है । भौषतक षवज्ञान में इसे दृश्य जगत्
कहते हैं ।
७. सत्य लोक-पूणव अनन्त षवश्व जो हर थर्ान, हर षदशा तर्ा हर समय एक जै सा रहने के कारण सत्य लोक है ।
षवष्णु पुराण (२/७/३-४) के अनु सार सूयव-चन्द् से प्रकाषशत भाग ३ प्रकार की पृथ्वी है -पृथ्वी ग्रह दोनों से प्रकाषशत,
सौर मण्डल सूयव प्रकाश का क्षे त्र (इसमें षवष्णु के ३ पद ताप, तेज, प्रकाश क्षे त्र हैं ), ब्रह्माण्ड षजसकी सीमा तक सूयव
षवन्द्दुमात्र दीखता है । हर पृथ्वी में पृथ्वी ग्रह जै से नदी, पववत, द्वीपों आषद के नाम हैं । हर पृ थ्वी के षलये उसका आकाश
उतना ही बड़ा है षजतना मनुष्य से पृथ्वी ग्रह। अर्ाव त् मनुष्य की लम्बाई-चौड़ाई से आरम्भ कर १-१ कोषट से गुणा
षकया जाय तो पृथ्वी, सौर मण्डल, ब्रह्माण्ड, पूणव षवश्व का व्यास आयेगा। लोकों के माप हैं -सौरमण्डल के ३ क्षे त्र-११,
२२, ३३ अहगवण (धाम संख्या), महलोक ४३ धाम (पृथ्वी व्यास x २ घात ४०), जनः लोक ४९ धाम, तपः लोक पृथ्वी
व्यास x २ घात ६४ (६३.५), सत्य लोक पृथ्वी व्यास x २ घात ७२।
रषव चन्द्मसोयाव वन्मयूखैरवभास्यते । स समु द्र सररच्छै ला पृषर्वी तावती िृता ॥
यावत्प्रमाणा पृषर्वी षविार पररमण्डलात् ।
नभिावत्प्रमाणं वै व्यास मण्डलतो षद्वज ॥ (षवष्णु पुराण २/७/३-४)
वेद में आकाश की माप के षलये पृथ्वी को ही मापदण्ड माना गया है । पृथ्वी के भीतर ३ धाम (क्षे त्र) है । पृथ्वी से बाहर
के धाम िमशः २ गुणे होते गये हैं । (बृहदारयक उपषनषद् ३/३/२)
कठोपषनषद् के अनु सार छोटी गुहा (मस्तिष्क) का जीव अन्त में परम गु हा परमे ष्ठी में पहुं चता है षजसकी पररषध पराधव
(१ पर १७ शू न्य) योजन है । उषा वणवन में षवषु व वृत्त के ७२० भाग = ५५.५ षक.मी. को १ योजन कहा गया है । गणना
करने पर इसका व्यास ९७००० योजन आता है । नासा का अनु मान १९९० में १ लाख तर्ा २००८ में ९५००० योजन है ।
इसके मागव में छाया और आतप (धूप) के क्षे त्र हैं । छाया वाले क्षे त्रों को ही असुयव या असुर का क्षे त्र कहा है ।
ऋतं षपबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रषवष्ट्ौ परमे पराधे ।
छायातपौ ब्रह्मषवदो वदस्तन्त पिाग्नयो ये च षत्रणाषचकेताः ॥ (कठोपषनषद् १/३/१)
शरीर का सम्बन्ध षवश्व की आत्मा सूयव से प्रकाश गषत के अनु सार है । हृदय से ब्रह्म-रन्ध्र तक अणु पर् तर्ा वहां से
सूयव तक महापर् है (बृहदारयक उपषनषद् ४/४/८,९, छान्दोग्य उपषनषद् ८/६/१,२,५, ब्रह्मसूत्र, ४/२/१७-२०)। यह
सम्बन्ध १ मु हतव में ३ बार जा कर लौट आता है ।
रूपं रूपं मघवाबोभवीषत मायाः कृण्वानिन्वं परर स्वाम् ।
षत्रयवषद्दवः पररमु हत्तव मागात् स्वैमवन्त्रैरनृ तुपा ऋतावा॥(ऋग्वे द ३/५३/८)
इसी प्रकाश सम्बन्ध पर चन्द् तर्ा शषन तक के ग्रहों के प्रभाव से रं ग, षदशा आषद में पररवतवन होता है षजसके कारण
जन्म समय तर्ा उसके बाद जीवन बर ग्रहों का प्रभाव पड़ता है (वाज. यजु . १५/१५-१९, १७/५८, १८/४०, कूमव पुराण,
४१/२-८, मत्स्य पुराण, १२८/२९-३३, ब्रह्माण्ड पुराण, २४/६५-७३ आषद॥ वेद तर्ा पुराणों में एक ही वणवन उन्ीं
शब्दों में है ।
पृथ्वी पर मनु ष्य जन्म चन्द् की १० पररिमा (२७३ षदन) में होता है । प्रेत शरीर चान्द् मण्डल का है , उसका षनमाव ण
पृथ्वी के १० अक्ष भ्रमण (१० षदन) में होता है । इसी िम में षवश्व की सृषष्ट् भी १० षदन में कही गयी है -षजनमें १ अव्यक्त
सगव (मू ल स्रोत) तर्ा ९ व्यक्त सगव है ।
अर् यद्दशममहरुपयस्तन्त (शतपर् ब्राह्मण, १२/१/३/१७), षवराड् वा एषा समृ द्धा यद्दशाहाषन। (ताण्ड्य महाब्राह्मण,
४/८/६) श्रीवै दशममहः (ऐतरे य ब्राह्मण, ५/२२)
पृथ्वी पर बना प्रेत शरीर धीरे धीरे १२ मास में चान्द् मण्डल तक पहुं चता है , षजसके षलये माषसक श्राद्ध होता है ।
पहुं चने के बाद वह पृथ्वी-चन्द् के सार् सूयव की वाषषव क पररिमा करता है , षजसके षलये वाषषव क श्राद्ध होता है । उसी
चान्द् आत्मा का एक भाग सूयव षकरणों (गौ) के दबाव से शषन ग्रह तक जाता है । मागव में मङ्गल के २ उपग्रह षमलते हैं
षजनको २ श्वान कहा गया है । अन्त में शषन कक्षा में पहुं चते हैं , षजसके वलयों को ३ भाग में बां टा गया है । शषन सतह
से आरम्भ कर इनके नाम हैं -पीलु मती, उदन्वती, प्रद्यौ (Paradise)। अर्वव वेद काण्ड १८ के सभी ४ सूक्तों के २८३
मन्त्रों में इसका षविार से वणवन है । अध्याय २ के उदाहरण-
सूयव चक्षु षा गच्छ वातमात्मना (सौर वायु से) षसवं च गच्छ पृषर्वीं च धमव षभः। अपो (चान्द् मण्डल) वा गच्छ यषद तत्र ते
षहतमोषधीषु प्रषतषतष्ठा शरीरे ः॥ (अर्वव, १८/२/७)
अषत द्रव श्वानौ सारमे यौ चतुरक्षौ शबलौ साधुना पर्ा।
अधा षपतॄन् सुषवदत्रा अपीषह यमे न ये सधमादं मदस्तन्त॥ (अर्वव, १८/२/११)
ये षनखाता ये परोप्ता ये दग्धा ये चोस्तद्धता।
सवां िानग्न आ वह षपतॄन् हषवषे अत्तवे॥ (अर्वव, १८/२/३४)
= ४ प्रकार से मृ तक संस्कार-भू षम में गाड़े गये, जल में फेंके गये, अषग्न से जलाये हुए, ऊपर हवा में रखे हुए-इन सभी
के भोजन के षलये अषग्न हषव का वहन करें ।
उदन्वती द्यौरवमा पीलु मतीषत मध्यमा। तृतीया ह प्रद्यौररषत यस्यां षपतर आसते॥ (अर्वव, १८/२/४८)
= षपतर गमन थर्ान शषन में नीचे से आरम्भ कर उदन्वती, पीलु मती तर्ा प्रद्यौ हैं ।
ऋग्वे द, मण्डल १० का १४ वां सूक्त यम सूक्त तर्ा अगला १५वां षपतर सूक्त है । उनके ३० मन्त्रों में भी प्रायः यही
वणवन अन्य प्रकार से है ।
षवष्णु का वाहन छन्द रूपी गरुड़ है । गजे न्द् मोक्ष में -छन्दोमयेन गरुड़े न समु ह्यमानः (भागवत पुराण, ८/३/३१)। वयः
= बुनना, आयु, पक्षी। मू धाव वयः = पषक्षयों में मू धवन्य गरुड़। मूधाव वयः छन्दों का वणवन वाज. यजु वेद (१४/८-१०, १८-१९)
तर्ा (१५/४-५) में है ।
मनु ष्य की आत्मा परमात्मा का ही रूप है, अतः वेद वषणवत आत्मगषत की लौषकक व्याख्या गरुड़ पुराण में है । इसके
उत्तर खण्ड (प्रेत कल्प) में ३५ अध्याय हैं ।
सौर मण्डल में षवष्णु के ३ पदों को अषग्न, वायु, रषव क्षे त्र की सीमा कहा गया है । वेद के अनु सार ये ११, २२, ३३
अहगवण तक हैं , अर्ाव त् पृथ्वी षत्रज्या की २ घात ८, १९, ३० दू री तक। वायु भाग को इषादण्ड कहा गया है और उसकी
दू री सूयव से ३००० योजन कही गयी है (यहां योजन = सूयव व्यास)। यह यूरेनस कक्षा तक आता है षजसका पता २००८
में नासा के काषसनी यान से चला। इससे पहले पृथ्वी कक्षा तक ही सौर वायु मानते र्े। (यजु वेद प्रर्म श्लोक में इषा
को वायवथर् ऊजाव कहा है । सूयव की वायवथर् ऊजाव उसका ईशादण्ड है षजसकी पररषध १८००० योजन कही गयी है
(षवष्णु पुराण, २/८/२)
मापों के षलये षविार से सां ख्य षसद्धान्त, अध्याय ३ दे खें।
शषन का प्रकाषशत भाग धमव तर्ा अन्धकार भाग यम कहा है । अन्य मत से शषन को धमव तर्ा अलोक भाग में ने पचून
को यम कहा है । पर ग्रह वलय के ३ स्पष्ट् भाग शषन में ही हैं ।
पररव्राजक संन्यासी या सिुख युद्ध में मरने वाले सूयव लोक की सीमा पार कर जनः लोक (जन्नत) में जाते हैं तर्ा वहां
कल्प भर (कयामत तक) रहते हैं ।
ध्रुवादू ध्वं महलोको यत्र ते कल्पवाषसनः। एकयोजनकोषटिु यत्र ते कल्पवाषसनः॥१२॥
द्वे कोटी तु जनो लोको यत्र ते ब्रह्मणः सुताः। सनन्दनाद्याः प्रषर्ता मै त्रेयामलचेतसः॥१३॥(षवष्णु पुराण २/७)
द्वाषवमौ पुरुषौ लोके सूयवमण्डल भे षदनौ। पररव्राट् योगयुक्तो वा रणे चाषभमुखं हतम् ॥ (शु ि नीषत, ४/४८)
(षवदु र गीता, महाभारत, उद्योग पवव ३३/६१-द्वाषवमौ पुरुषव्याघ्र--)
ऊध्वव मेकस्तथर्तिेषां यो षभत्वा सूर्य्वमण्डलम् ।
ब्रह्मलोकमषतिम्य तेन याषत परां गषतम् ॥ (मै त्रायणी उपषनषद् , ६/३०)
मनु ष्य की कमव के अनु सार २ प्रकार की गषत कही गयी है -
द्वे स्रु ती अशृणवं षपतॄणामहं दे वानामु तमत्याव नाम् ।
ताभ्याषमदं षवश्वमेजत् समे षत यदन्तरा षपतरं मातरि॥ (ऋक्, १०/८८/१५)
अषग्नज्योषतरहः शु क्लः षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छस्तन्त ब्रह्म ब्रह्मषवदो जनाः॥२४॥
धूमो राषत्रिर्ा कृष्ण षण्मासा दषक्षणायनम्। तत्र चान्द्मसं ज्योषतयोगी प्राप्य षनवतवते॥२५॥
शु क्ल कृष्णे गषतह्येते जगतः शाश्वते मते। एकया यात्यनावृषत्तमन्ययाऽऽवतवते पुनः॥२६॥ (गीता, अध्याय ८)
छन्दां षस वै दे वयानः पन्थाः-गायत्री, षत्रष्ट्टुप्, जगती। ज्योषतवै गायत्री, गौस्तस्त्रष्ट्टुप्, आयुजवगती।
यदे ते िोमा भवस्तन्त, दे वयानेनैव तत् पर्ायस्तन्त॥ (तैषत्तरीय संषहता, ७/५/१)
नागवीर्थ्युत्तरं यच्च सप्तषषव भ्यश्च दषक्षणम् । उत्तरः सषवतुः पन्था दे वयान इषत िृतः॥२१७॥
उत्तरं यदगस्त्यस्य अजवीर्थ्याश्च दषक्षणम् । षपतृयाणः स वै पन्था वैश्वानरपर्ाद् बषहः॥२०९॥ (वायु पुराण, अध्याय ५०)
या षवष्णु पुराण (२/८/८७, ९२)
पृथ्वी से दे खने पर सूयव इसकी सतह पर दै षनक पररिमा करता है षजसे गषणत भाषा में अहोरात्र वृत्त (Diurnal
circle) कहते हैं । पृथ्वी का अक्ष इसकी कक्षा अर झुका हुआ है षजसका कोण २२.५ अंश से २५.५ अंश तक होता
है । अभी यह २३.५ अंश से र्ोड़ा कम है। मध्य मान २४ अंश ले ते हैं । पृथ्वी सतह पर सूयव की सबसे उत्तरी थर्ान
षवषु व से २४ अंश उत्तर होगा षजस समय सूयव ककव राषश में रहता है (पृथ्वी केन्द् से ककव राषश की षदशा में )। अतः
सबसे उत्तरी वृत्त ककव रे खा तर्ा षवषुव से २४ अंश दषक्षण मकर रे खा है । मकर से ककव की उत्तर षदशा में सूयव की
गषत उत्तरायण है षजसमें ६ मास लगते हैं जै सा गीता का श्लोक उद् धृत है। प्रत्येक मागव में १-१ मास तक सूयव के
भ्रमण का क्षेत्र १-१ वीर्ी है । षवषु वत से उत्तर ०-१२, १२-२०, २०-२४ अंश तक ३ वीर्ी हैं -ऐरावत, गज, नाग। दषक्षण
में िमशः वृषभ, जरद्गव, अज वीर्ी हैं । उत्तर मागव पर षदनमान बड़ा होता है , सबसे छोटा षदन २४ अंश दषक्षण में
होगा। उस अक्षां श वृत्त को सबसे छोटा गायत्री छन्द (६ x ४ =२४ अक्षर) कहा गया है । उसके उत्तर मागों के िमशः
बड़े छन्द हैं -२० अंश दषक्षण-उस्तष्णक् ७ x ४= २८), १२ अंश दषक्षण-अनु ष्ट्टुप् (८ x ४ = ३२), ० अंश षवषु व वृत्त-बृहती
(९ x ४ = ३६), १२ अंश उत्तर-पङ्स्तक्त (१० x ४ = ४०), २० अंश उत्तर-षत्रष्ट्टुप् (११ x ४ = ४४), २४ अंश उत्तर जगती
(१२ x ४ = ४८)। गायत्री से जगती में २ गुणे अषधक अक्षर हैं इसषलये षलखा है षक जब सूयव जगती पर होते हैं तब
षदन मान राषत्र से १.५ गुणा होता है , अर्ाव त् ३० मु हतव के षदन में १८ मु हतव का षदन तर्ा १२ मु हतव की राषत्र (यर्ा षवष्णु
पुराण, २/८/३९)
नाग वीर्ी से उत्तर और सप्तषषव ( से दषक्षण दे वयान मागव है षजससे षसद्ध लोग जाते हैं (मृत्यु के बाद)। अज वीर्ी से
दषक्षण तर्ा अगस्त्य से उत्तर षपतृयान मागव है षजससे काम्य यज्ञ करने वाले जाते हैं तर्ा पुनजव न्म में यज्ञ मागव की पुनः
प्रषतष्ठा करते हैं (षवष्णु पुराण, २/८७-८८, ९२-९४)

पृथ्वी पर असुर कोई एक जाषत नहीं र्ी। उनके कई भे द र्े -दै त्य, दानव, मुर, षनऋवषत, कम्बु , िोधवश, पुलोमा,
षनवातकवच, कालक, कालकेय आषद। कुछ थर्ानों के नाम अभी भी प्रचषलत हैं-दै त्यों का पषश्चम यूरोप में डच,
यू ट्श (Dutch, Deutsch), दानवों का डै न्यूब नदी क्षे त्र। मुर लोगों का मोरक्को। दषक्षण अफ्रीका के षनऋवषत ( भारत
से नै ऋवत्य कोण की षदशा)। कालक, कालकेय-कज्जाषकिान, तुषकविान। तारक असुर के क्षे त्र पषश्चम एषशया के
राज्य को असीररया कहते र्े । मय दानव मे स्तिको के र्े । षहरयाक्ष का थर्ान आमे जन नदी तट या रसातल कहा है ।
षहरयकषशपु उत्तर अफ्रीका (षमस्र, षलषबया) का र्ा षजसे तलातल लोक भी कहा है ।
पृथ्वी के २ प्रकार के नकशे र्े-एक में वतवमान द्वीपों और सागरों का मानषचत्र र्ा। ७ महाद्वीप र्े -जम्बू-एषशया, प्लक्ष-
यूरोप, शक-आस्ट्रेषलया, कुश-अफ्रीका (षवषु व के उत्तर), शाल्मषल-दषक्षण अफ्रीका, िौि-उत्तर अमे ररका, पुष्कर-
दषक्षण अमे ररका (ब्रह्मा के पुष्कर बुखारा के षवपरीत षदशा में )। समतल नक्शा बनाने में ध्रुव के षनकट आकार बड़ा
होने लगता है । उत्तरी ध्रुव जल भाग में है , अतः वहां कोई समस्य नहीं र्ी। पर दषक्षणी ध्रुव थर्ल पर है (आयवभटीय,
४/१२)। नक्शा पर अनन्त आकार होने के कारन उसे ८वां अनन्त द्वीप कहते र्े । यह सबसे दषक्षण षदशा में होने से
यम द्वीप है । यमल या यम = जोड़ा, इसमें दो भू खण्ड हैं । ७ सागरों का षनणवय करना कषठन है -क्षार समु द्र, जल
समु द्र, दषध समु द्र, क्षीर सागर, घृत समु द्र, इक्षु रस समु द्र, मद्य समु द्र।
षद्वतीय प्रकार से उत्तरी भाग में ९०-९० अंश के ४ भाग होते र्े जो मे रु के ४ पाश्वव रूप में ४ रं गों में बनते र्े । इनको
भू -पद्म के ४ दल कहा है । उज्जै न से पूवव-पषश्चम दोनों तरफ ४५-४५ अंश तर्ा षवषु व और उत्तर ध्रुव के बीच का क्षे त्र
भारत भाग या दल र्ा। पषश्चम में केतुमाल, पूवव में भद्राश्व, तर्ा षवपरीत षदशा में कुरुवषव र्ा। भारत पद्म के पूवव छोर
पर इन्द् की अमरावती (इण्डोने षसया का सेलेबीज), केन्द् में लं का या उज्जै न, पषश्चम छोर पर यम की संयमनी
(अिान) र्ी। संयमनी से९०अंश पषश्चम सोम की षवभावती (गुयाना, न्यू याकव), अमरावती से ९० अंश पूवव वरुण की
सुखा (फ्रेि पोषलने षसया या हवाई द्वीप) र्ी। उज्जैन से ९० अंश पूवव यमकोषटपत्तन (यमकोषट द्वीप न्यू जीलै ण्ड का
दषक्षण पषश्चम तट), ९० अंश पषश्चम रोमकपत्तन (मोरक्को के पषश्चम का तट) तर्ा षवपरीत षदशा में षसद्धपुर
(कैषलफोषनव य के पूवव) र्े ।
उत्तर में केवल भारत दल में आकाश के ७ लोकों की तरह ७ लोक षवषु व से ध्रुव तक र्े । भारत, चीन, रूस
(ऋषीक)-ये इन्द् के ३ लोक र्े । यही दे व भाग र्ा, बाकी को असुर कह सकते हैं । इनके पु नः षवभाजन से ७ लोक हैं -
षवन्ध्य से दषक्षण-भू, षवन्ध्य षहमालय के बीच भु वः, षहमालय स्वः (षत्रषवष्ट्प् = स्वगव), चीन महः, मं गोषलया जनः,
साइबेररया तपः (तपस् = स्ट्े पीज), ध्रुव वृत्त सत्य लोक है ।
उत्तर के अन्य ३ दल तर्ा इनके षवपरीत दषक्षण के ४ दल-कुल ७ तल कहे हैं जो असुरों के थर्ान र्े । भारत से पषश्चम
अतल (इटली, उसके पषश्चम अतलान्तक समु द्र), पूवव में सुतल तर्ा षवपरीत षदशा में पाताल र्ा। दषक्षण भाग में भारत
के दषक्षण तल या महातल (भारत कुमाररका खण्ड, दषक्षण समु द्र भी कुमाररका खण्ड र्ा), अतल के दषक्षण तलातल,
पाताल के दषक्षण रसातल, सुतल के दषक्षण षवतल र्ा।
३. तमस और अन्ध तमस-तमस में बहुत कम दीखता है । अन्ध तमस में षबल्कुल नहीं दीखता, मनु ष्य अन्ध जै सा हो
जाता है । तमस से स्वयं बाहर षनकल सकता है । अन्ध तमस से षनकलने के षलये अन्य की सहायता चाषहये।
योग सूत्र (२/३) में क्लेश के ५ भे द कहे हैं -अषवद्या, अस्तिता, राग, द्वे ष, अषभषनवेश। इनको ही सां ख्य योग में ५ प्रकार
के तम कहा है -तम, मोह, महामोह, ताषमस्र, अन्ध।
तमो मोहो महामोहिाषमस्रो ह्यन्धसंज्ञकः। अषवद्या पिपवैषा सां ख्यषयगेषु कीषतवता॥ (षवष्णु पुराण, १/५/५)
यहां प्रर्म िर को तम और अस्तन्तम िर को अन्ध-तम कहा है ।
सां ख्यकाररका, श्लोक ४८ में तम और मोह के ८-८ भे द, महामोह १० प्रकार का, ताषमस्र और अन्ध-ताषमस्र के १८-
१८ भे द कहा है ।
यषद अषवद्या का अर्व अपरा षवद्या या षवज्ञान करें तो ये ५ िर षवज्ञान के ५ िम हैं -
१. अषवद्या-षवषयों या तर्थ्यों का षवभाजन।
२. अस्तिता-प्रषत तत्त्व की अलग-अलग पररभाषा तर्ा व्याख्या।
३. राग-अलग अलग तर्थ्यों में समानता खोज कर उनको एक वगव में करना (Generalization)। इसका अस्तन्तम रूप
पराषवद्या या षवद्या होगी, जै से स्वार्व का परम रूप परमार्व।
४. द्वे ष-अन्य वगव के तर्थ्यों से भे द षदखाना।
५. अषभषनवेश-षसद्धान्त स्तथर्र करना षजसके अनु सार नये तर्थ्यों को प्रमाषणत या अप्रमाषणत षकया जा सकता है ।
यही अषवद्या या तम के भी िर हैं -अषवद्या = ज्ञान का अभाव, अस्तिता= स्वार्व के अनु सार सोचना, राग= षकसी के
प्रषत आकषव ण, द्वे ष-षवकषव ण, अषभषनवेश= एक ही मान्यता से बन्ध कर सोचने में असमर्व षजसे अन्ध भस्तक्त कहते हैं ।
मानषसक तम होने पर मरणोपरान्त भी तम मागव से ही गषत होती है ।
४. अववनाशी आत्मा की हत्या-आत्मा के कई िर हैं । एक मत है षक ईशावास्योपषनषद् के १८ श्लोकों के अनु रूप
१८ िर हैं तर्ा उनका मू ल अव्यक्त स्रोत १९वां है । मनु ष्य रूप में हमारा सामाषजक पररचय कई प्रकार का है और
सबका दृश्य प्रभाव होत है -भारतीय, षबहारी, ब्राह्मण, षवज्ञान छात्र, व्यवसाय, संगषत आषद। इसी प्रकार आकाश में
सृषष्ट् के ५ पवों के अनु सार आत्मा के ५ मु ख्य भे द हैं । उनके अवान्तर भे द षमला कर १८ होते हैं -
पवव साक्षी ईश्वर भोक्ता जीव (प्रवग्यव भाग-मूल से षनकला)
षनष्कल गूढोत्मा (ईश्वर अव्यय) १. गूढोत्मा (जीव-अव्यय)
अव्यक्त अव्यक्त २. अव्यक्तात्मा
१. स्वयम्भू (४९ अहगवण+) षचदात्मा ३. शान्तात्मा
२. परमे ष्ठी (४८ िोम) षहरयगभव आत्मा ४ महानात्मा
३. सौर (३३ िोम) सववज्ञ आत्मा ५ षवज्ञानात्मा
४. चान्द् (१५ िोम) महानात्मा ६. प्रज्ञानात्मा
५. भू मषहमा-२१ िोम-सववज्ञात्मा ७. प्राज्ञात्मा
१५ िोम-षहरयगभाव त्मा ८. तैजसात्मा
९ िोम-षवराट् आत्मा ९. वैश्वानर आत्मा
भू वायु-वराह आत्मा १०. हं सात्मा
भू षपण्ड-षचत्यात्मा ११. भू तात्मा
शान्तात्मा-१. अन्तयाव मी, २. सूत्रात्मा, ३. वेदात्मा, ४. षचदात्मा।
महानात्मा (परमे ष्ठी)-१. आकृषत, २. प्रकृषत, ३. अहङ्कृषत, ४. यज्ञ।
षवज्ञानात्मा (सौर)-१. षवज्ञानात्मा, २. दै वात्मा।
इनके उद्धरण मेरी पुिक पुरुष सूक्त, पृष्ठ ७३-७६ में हैं ।
https://www.scribd.com/document/42466007/Purusha-Sukta
या अंग्रेजी सारां श के षलये Vedic View of Ś rī Jagannā tha दे ख सकते हैं ।
https://www.scribd.com/document/11959826/Vedic-View-of-Sri-Jagannath
सभी पुरुष रूपों के एक एक उदाहरण षदये जाते हैं -
०. अखण्ड परात्पर-कल्पना से परे , अषवभक्त-
१. सदे व सोम्ये दमग्र आसीदे कमे वाषद्वतीयम् । (छान्दोग्य उपषनषद् , ६२/१)
यह सदा सोम के सार् र्ा, एक ही र्ा, कोई षद्वतीय नहीं र्ा।
२. यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः। अषवज्ञातं षवजानतां षवज्ञातमषवजानताम् ॥ (केनोपषनषद् , २/३)
जो व्यस्तक्त कहता है षक वह ब्रह्म को नहीं जानता, वह सही कह रहा है । ब्रह्म ज्ञान का गवव करने वाला कुछ नहीं
जानता। अज्ञे य का ज्ञान उसी को है जो ज्ञान का दावा नहीं करता।
३. संषवदस्तन्त न यं वेदा षवष्णु वेद न वा षवषध।
यतो वाचो षनवतवन्ते अप्राप्य मनसा सह॥ (तैषत्तरीय उपषनषद् , २/४/९)
= उसे न वेद जानते हैं , न ब्रह्मा या षवष्णु। वाक् भी वहां जा कर षबना उसे पाये लौट जाती है ।
०. परात्पर-यह माया के सार् है -
यर्ा नद्यः स्यन्दमानाःसमु द्रेऽिं गच्छस्तन्त नामरूपे षवहाय।
तर्ा षवद्वान् नामरूपाद् षवमुक्तः परात्परं पुरुषमु पैषत षदव्यम् । (मु ण्डकोपषनषद् , ३/२/८)
= जै से नषदयां समु द्र में षमलकर अपना नाम रूप खो दे ती हैं , उसी प्रकार षवद्वान् ब्रह्म को पाने के बाद अपने (नाम
रूप) को खो दे ता है ।
१. गूढोत्मा-सबके भीतर षछपा हुआ-
०. एष सवेषु भू तेषु गूढोत्मा न प्रकाशते। दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदषशव षभः। (कठोपषनषद् , १/३/१२)
= यह सभी भू तों में (माया के कारण) षछपा हुआ है । केवल सूक्ष्म दशी इसे सूक्ष्म बुस्तद्ध से दे ख पाते हैं ।
२. अव्यक्त आत्मा-यह षनराकार है ।
य एषोऽनन्तोऽव्यक्त आत्मा (जाबालोपषनषद् ,२)
इस्तन्द्येभ्यः पराह्यर्ाव अर्ेभ्यश्च परं मनः। मनसिु परा बुस्तद्धबुवद्धेरात्मा महान् परः।
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः। (कठोपषनषद् , १/३/१०,११)
= इस्तन्द्यों से परे अर्व (उनके षवषय) हैं , अर्व से परे मन है , मन से परे बुस्तद्ध, बुस्तद्ध के परे महान् आत्मा है । अव्यक्त
महान् से भी परे है , तर्ा पुरुष उससे परे है । पुरुष के परे कुछ भी नहीं है ।
३. शान्तात्मा-नमः शान्तात्मने तुभ्यम् । (मैत्रायणी उपषनषद् , ५/१)
= तुझ शान्तात्मा को नमस्कार।
चतुर्वः शान्त आत्मा प्लुत प्रणव प्रयोगेण समिमोषमषत। (अर्ववषशखोपषनषद् , १)
= सभी कुछ ॐ है , प्लुत् प्रणव (३ मात्रा का) की चतुर्व मात्रा शान्तात्मा है ।
यदा स दे वो जागषत्तव तदे दं चेष्ट्ते जगत्। यदा स्वषपषत शान्तात्मा तदा सवं षनमीलषत॥ (मनुिृषत, १/५२)
= जब वह दे व जागता है , संसार की सभी षियायें होती हैं । जब वह शान्तात्मा सोता है , सभी षियायें बन्द हो जाती हैं ।
(क) अन्तयाव मी (जो सबके भीतर गषत करे )-
यः पृषर्व्या षतष्ठन् , पृषर्व्या अन्तरो , यं पृषर्वी न वेद, यस्य पृषर्वी शरीरं , यः पृषर्वीमन्तरो यमयषत, एष स
आत्माऽन्तयाव म्यमृ तः। (बृहदारयक उपषनषद् , ३/७/३)
= जो पृषर्वी पर स्तथर्त है तर्ा उसके भीतर भी है । उसे पृषर्वी नहीं जानती। षजसका शरीर पृषर्वी है तर्ा जो पृषर्वी
के भीतर रहता या षनयस्तन्त्रत करता है , वही अमृ त आत्मा अन्तयाव मी कहलाता है ।
(ख) सूत्रात्मा (एक षवन्द्दु या षपण्ड का अन्य से सम्बन्ध)-इस सम्बन्ध का सूत्र वायु कहा जाता है । यह भौषतक षवज्ञान में
कई प्रकार के बल हैं ।
वायुवै गौतम! तत् सूत्रम् । वायुना वै गौतम! सूत्रेणायं च लोकः, परश्च लोकः, सवाव षण च भू ताषन संदृब्धाषन भवस्तन्त।
(बृहदारयक उपषनषद् , ३/७/२)
= गौतम ही वायु है , यह योग करने वाला सूत्र है । इस वायु रूपी सूत्र से यह लोक तर्ा वह लोक जु ड़े हैं तर्ा सभी
परस्पर सम्बस्तन्धत हैं ।
(ग) वेदात्मा (अन्य विु ओं का ज्ञान)-
स एव षनत्यकूटथर्ः, स एव वेदपुरुष इषत षवदु षो मन्यन्ते। (परमहं सोपषनषद् , १)
=(सभी भू तों में) जो षनत्य कूटथर् (अदृश्य पररचय) है , वह वेद पुरुष है ।
(घ) षचदात्मा (हर कोष में षवद्यमान)-
अनु ज्ञैकरसो ह्यमात्मा षचद्रूप एव। (नृ षसंह उत्तरताषपनी उपषनषद् , २)
= जो आत्मा एक ही रूप में रहती है , वह सभी षचत् में वतवमान् है ।
४. महान् आत्मा-४ प्रकार का-
स वा एष महानज आत्म, योऽयं षवज्ञनमयः, प्राणेषु य एषोऽन्तहृव दय आकाशिस्तिञ्छे ते, सववस्य वशी, सववस्येशानः,
सववस्याषधपषतः। स न साधुन किवणा भू यान् , नो एवा साधुना कनीयान् । एष सवेश्वरः, एष भू ताषधपषतः, एष भू तपालः,
एष सेतुषववधरण एषां लोकानामसम्भे दाय। (बृहदारयक उपषनषद् , ४/४/२२)
= यह जो महान् से उत्पन्न आत्म है , वह षवज्ञनमय है । वह प्राणों (ऊजाव ) में है तर्ा अन्तहृव दय के आकाश में सोता है ।
वह सबको वस में करने वाला, ईशान (उन्ें चलाने वाला) है तर्ा सभी का अषधपषत (आधार रूप) है । वह सत्कमों से
बड़ा नहीं होता न असाधु कमों से छोटा होता है । वह सबका ईश्वर, भू तों का अषधपषत, भू तों का पालनकत्तव है । वह
संसार के सभी विु ओं के बीच का सेतु (सम्बन्ध) तर्ा आधार है तर्ा सभी लोकों (षवश्व तर्ा व्यस्तक्त) को एक सार्
रखता है ।
(क) आकृषत आत्मा (आकार)-
यत् त्वा दे व प्रषपबस्तन्त तत आ प्यायसे पुनः।
वायुः सोमस्य रषक्षता समानां मास आकृषतः॥ (ऋक्, १०/८५/५)
= तुझ दे व को लोग बार बार पीते हैं तर्ा उसकी प्यास बुझाते हो। वायु सोम का रक्षण करती है तर्ा उससे आकृषत
की माप तर्ा आकार बनाती है ।
(ख) प्रकृषत आत्मा-पदार्व तत्त्व तर्ा उनके गुण-
मा
्ा
तस्यवयव भू तैिु व्याप्तं सववषमदं जगत्॥ (श्वे ताश्वतर उपषनषद् , ४/१०)
यां
=
्ा माया को प्रकृषत समझो तर्ा मायी (उसके षनयन्ता) को महे श्वर। उसी के अवयवों से सभी भू त तर्ा जगत् व्याप्त
है
्ं।
(ग) अहङ्कृषत आत्मा- अलग व्यस्तक्तत्व-
तु ु ष्ठमात्रो रषवतुल्य रूपः सङ्कल्पाहङ्कार समस्तन्वतो यः।
अङ

बुु द्धेगुवणेनात्मगुणेन चैव आराग्र मात्रोऽप्यपरोऽषप दृष्ट्ः॥ (श्वे ताश्वतर उपषनषद् , ५/८)
= यह (आत्मा) अङ्गुष्ठ आकार की तर्ा सूयव के समान प्रकाशमान है । उसमें सङ्कल्प (षियात्मक इच्छा) तर्ा
शश
अहङ्कार (अलग व्यस्तक्त का बोध) है । वह (जीव) सूई की नोक के समान है तर्ा साधक उसका अनु भव बुस्तद्ध तर्ा

आत्मगुण द्वारा करते हैं ।
र यज्ञात्मा-उत्पादक रूप-
(घ)
शश
एष ह वै यजमानस्यामु स्तमल्लोकऽऽआत्मा भवषत, यद् यज्ञः। स ह सवव तनू रेव यजमानोऽमुस्तमल्लोके सम्भवषत, स एव
शशश
षवद्वान्षवद्यान्
षनिीत्यामाषयनं
यजतेतु ।महे श्वरम् ।
= यह यज्ञ (उत्पादन) करने वाले की आत्मा है । यह सभी शरीरों में है । षवद्वान् इसी के द्वारा यज्ञ करते हैं ।
५. षवज्ञान आत्मा-यह सौर मण्डल की प्रषतमा है तर्ा इसके २ रूप हैं ।
षवज्ञानत्मा सह दे वैश्च सवे प्राणा भू ताषन सम्प्रषतष्ठस्तन्त यत्र।
तदक्षरं वेदयते यिु सोम्य! स सववज्ञः सववमेवाषववेश॥ (प्रश्नोपषनषद् , ४/११)
= षवज्ञानात्मा में सभी दे व, प्राण, तर्ा भू त प्रषतषष्ठत रहते हैं । उस अक्षर को जानने वाला सववज्ञ है तर्ा सवव (ब्रह्म,
अल्लाह या अलं = all) में प्रवेश करता है ।
(क) षवज्ञान आत्मा (बुस्तद्ध)
एव षह द्रष्ट्ा, स्प्रष्ट्ा, श्रोता, घ्राता, रसषयता, मन्ता, योद्धा, कत्ताव , षवज्ञानात्मा पुरुषः। स परे ऽक्षरे आत्मषन सम्प्रषतष्ठते।
(प्रश्नोपषनषद् , ४/९)
= वह आत्मा द्रष्ट्ा, श्रोता, घ्राता (सूंघने वाला), रसषयता (रस का स्वाद ले ने वाला), मन्ता (षवचारने वाला), योद्धा, कत्ताव
है -वही षवज्ञानात्मा पुरुष है ।
(ख) दै वत्मा (ऊजाव , षजसका मूल स्रोत सूयव है )-
दै वो वाऽअस्यै ष आत्मा, मानुषोऽयम् । स अन्न न्यञ्ज्ज्यात्, न हैतं दै वात्मानं प्रीणीयात्। अर् यन्न्यनस्तक्त, तर्ो है तं दै वात्मनं
प्रीणाषत। (शतपर् ब्राह्मण, ६/६/४/५)
= मनुष्य की यह आत्मा दै व है । जो इसे अनु भव नहीं करते, वे दै वात्मा द्वारा प्रसन्न नहीं होते। जो इसके सार् चलते हैं ,
दै व उन्ें प्रसन्न रखता है ।
६. प्रज्ञान आत्मा-(मन)-
यत् प्रज्ञानमु त चेतो धृषतश्च यज्ज्योषतरमृ तं प्रजासु।
यिान्न ऋते षकिन कमव षियते तन्मे मनः षशव सङ्कल्पमिु॥ (वाज. यजु . ३४/३)
= जो प्रज्ञान आत्मा है वह चे तना (षचषत या व्यवथर्ा करने में सक्षम), धृषत (सूचना धारण या िरण शस्तक्त) है , प्रजा
(लोगों) की अमृ त ज्योषत (अक्षय शस्तक्त) है । इसके षबना कोई भी काम नहीं हो सकता। ऐसा मेरा मन सदा षशव
सङ्कल्प से युक्त हो।
यदे तत् हृदयं मनश्चै तत् संज्ञानमाज्ञानं षवज्ञानं प्रज्ञानं मे धा दृ(इ)षष्ट्धृवषत-मषतमव नीषा जू षतः िृषतः सङ्कल्पः ितुरसुः कामो
वश-इषत सवाव येवैताषन प्रज्ञानस्य नामधेयाषन भवस्तन्त। सवं तत् प्रज्ञा ने त्रं, प्रज्ञाने प्रषतषष्ठतं प्रज्ञानं ब्रह्म। (ऐतरे य
उपषनषद् , ३/१/२)
= यह हृदय मन भी है। इसमें संज्ञान (बाहर की सूचना ग्रहण), आज्ञान (सङ्कलन), षवज्ञान (ताषकवक षनष्कषव ), प्रज्ञान
(ज्ञान में वृस्तद्ध), मे धा (सोचने की शस्तक्त), दृषष्ट् (दे खना) या इषष्ट् (उपयोगी विु का ज्ञान), धृषत (िरण शस्तक्त), मषत
(सत् असत् षववेक), मनीषा (षचन्तन), जूषत (मन की गषत), िृषत (अनु भव), सङ्कल्प (कायव की योजना), ितु (कायव का
आरम्भ), मानषसक शस्तक्त, काम वासना-ये सभी प्रज्ञान के ही नाम से जाने जाते हैं । ये सभी प्रज्ञा रूपी ने त्र हैं , प्रज्ञान में
प्रषतषष्ठत प्रज्ञान ब्रह्म है ।
७ भू तात्मा-पृथ्वी से षनषमव त। ५ प्रकार का-
अर्ान्यत्राप्युक्तं-संमोहो, भ्रमं , षवषादो, षनद्रा, तन्द्ा, व्रणो, जरा, शोकः, क्षु त्, षपपासा, कापवयं, िोधो, नास्तिक्यं,
अज्ञानं , मात्सयं, वैकारुयं, मूढत्वं , षनव्रीडत्वं , षनकृतत्त्वं , उद्धतत्वं , असमत्वं , इषत तामसास्तन्वतः-तृष्णा, स्नेहो, रागो,
लोभो, षहं सा, रषतः,द् षष्ट्व्यापृतत्वं , ईष्याव , कामं , अवस्तथर्तत्त्वं , चिलत्वं, षजहीषाव , अर्ोपाजवनं, षमत्रानु ग्रहणं,
पररग्रहावलम्बो, ऽषनष्ट्े षु-इस्तन्द्यार्े षु षद्वषष्ट्, ररष्ट्े व-षभषङ्ग-इषत राजसास्तन्वतैः पररपूणवः, एतैरषभभू तः, इत्ययं भू तात्मा।
तिान्नाना रूपायाप्नोषत। (मैत्रायणी उपषनषद् , ३/५)
= इस भू तात्मा के षवषय में अन्यत्र भी कहा गया है । इसके रूप हैं -संमोह, भय, षवषाद, षनद्रा, तन्द्ा (आलस्य), व्रण
(घाव), जरा (बुढ़ापा), शोक, क्षु त् (भू ख), षपपासा (प्यास), कापवय (कंजू सी), िोध, नास्तिक्य (षवश्व के एकत्व में
अषवश्वास), अज्ञान, मात्सयव (दू सरे की बुराई), वैकारुय (दीनता, गरीबी), षनकृतत्व (अकमव यता), उद्धतत्व (रोब दाब),
असमत्व (भे द भाव)-ये सभी तामषसक तत्त्व हैं। तृष्णा (इच्छा), स्नेह (प्रेम), राग (िोध), लोभ, षहं सा, रषत (लगाव),
दृषष्ट्व्यापृतत्व (जो दीखे उसे पाने की इच्छा), ईष्याव (दू सरे की उन्नषत से दु ःखी), षजहीषाव (हत्या की इच्छा), अर्ोपाजव न
(धन कमाना), षमत्रानु ग्रहण (षमत्र की सहायता), पररग्रहावलम्ब (भीख से गुजारा), इस्तन्द्यों के अषनष्ट् से भय, भले फल
की आशा-ये सभी राजस गुणों के पररणाम हैं । इनसे अषभभूत (युक्त) हो कर भू तात्मा कई रूप ले त है ।
(क) प्राज्ञ आत्मा (अनु भव)-वातावरण का ज्ञान-
सुषुप्तः थर्ानः, एकीभू तः, प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभु क्-चेतोमु खः, प्राज्ञिृ तीयः पादः (माण्डूक्योपषनषद् , ४)
= यह सुप्त अवथर्ा जै सा है , एक रूप है , प्रज्ञान से भर है , आनन्दमय है तर्ा आनन्द का उपभोग करता है , चेतना
का आरम्भ है -यह प्राज्ञ तृतीय पाद है ।
(ख) तैजस आत्मा-पृथ्वी के वातावरण की प्रषतमा, उसका तेज-
स्वप्नथर्ानोऽनन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनषवंशषतमुखः प्रषवषवक्तभुक्-तैजसो षद्वतीय पादः। (माण्डूक्योपषनषद् , ४)
= यह स्वप्न अवथर्ा जै सा है , अन्तः चेतना है , ७ अङ्ग हैं , १९ मु ख (स्रोत) हैं , विु ओं में प्रषवष्ट् हो कर भोग करता है -यह
तैजस षद्वतीय पाद है ।
(ग) वैश्वानर-पृथ्वी की मषहमा (प्रभाव क्षे त्र) की प्रषतमा, नर रूप में षवश्व-
जागररतथर्ानो बषहः प्रज्ञः सप्ताङ्गः एकोनषवंशषतमु खः थर्ूलभुक्-वैश्वानरः प्रर्मः पादः। (माण्डूक्योपषनषद् , ३)
= यह जाग्रत अवथर्ा, बाहरी चेतना, ७ अङ्ग का, १९ मु ख का, थर्ूल का भोग करने वाला-वैश्वानर प्रर्म पाद है ।
(घ) हं सात्मा (शरीर के बाहर हं स जै सा षवचरण)-पृथ्वी के वायुमण्डल की प्रषतमा-
नवद्वारे पुरे दे ही हं सो ले लायते बषहः। वशी सववस्य लोकस्य थर्ावरस्य चरस्य च॥ (श्वे ताश्वतर उपषनषद् , ३/१८)
= ९ द्वारों के दे ह का माषलक हं स है , जो बाहर घूमता है । यह स्तथर्र तर्ा चलने वाले सभी का षनयन्त्रण करता है ।
(ङ) भू तात्मा-(थर्ूल शरीर)-पृथ्वी के पदार्ों का सङ्कलन-
आत्मा वै तनू ः। (शतपर् ब्राह्मण, ६/७/२/६)
तिाषदतर आत्मा मे -द्यषत च, कृश्यषत च। (ताण्ड्य महाब्राह्मण, ५/१७)
= यह शरीर ही मेरी आत्मा है ; यह मोटा या दु बला होता है ।
तत् सवव आत्मा (शरीरं ) वाचमप्येषत, वाङ्मयो भवषत। कौषीतषक ब्राह्मण, २/७)
= वह सभी आत्मा (शरीर) वाक् द्वारा पुष्ट् होता है , तर्ा वाक् रूप है ।
सामान्यतः आत्महनः का अर्व यहां होगा षनम्न षवचार या चररत्र द्वारा मन बुस्तद्ध का हनन।
शश
शश

शश

शश

यशशश पशश = अपशश शशव शश शशशर।

शश

शश



शश


शश



शश




(शशमचशशतशशनस, ७ /५३/६)
शश




रशश

शश

प न तर शशश भवशशगर , नर सशशज अस शशय।

शश

शश


शश


शश

शश

५.
शशप्रे त्य गवत-प्र + इतः = यहां से (इस शरीर से) जो चला गया वह प्रेत है । इसमें दो मत हैं -एक कहता है षक आत्मा



यहीं
शश


भ रह जाती है । दू सरा कहता है षक वह बाहर जाता है ।
शश


ये

शश
ल यं प्रेते षवषचषकत्सा मनुष्यऽअिीत्येके, नायमिीषत चैके (कठोपषनषद् , १/२०)
शश

शशश

शश

रशश
शश
शश




शश
शश

शश
शश


शश

शश
शश
जाने के षवषय के कुछ मत हैं -
भू तेषु भू तेषु षवषचत्यधीराः प्रेत्यािाल्लोकादमृ ता भवस्तन्त। (केनोपषनषद् , २/५)
अर् खलु ितुमयः पुरुषः यर्ा ितुरस्तिंल्लोके पुरुषो भवषत, तर्े तः प्रेत्यः भवषत। (छान्दोग्य उपषनषद् , ३/१४/१)
एष म आत्माऽनन्तहृव दये एतद् ब्रह्म एतषमतः प्रेत्यषभ सम्भषवतास्ति, इषत-यस्यस्यादद्धा, न षवषचषकत्सास्ति इषत ह िाह
शास्तण्डल्यः। (छान्दोग्य उपषनषद् , ३/१४/४)
आत्मा नहीं जाने के मत-
यर्ा सैन्धवस्तखल्य उदके प्राि उदकमे वानु षवलीयते, न हास्योद्ग्रहणयेवास्यात्। यतो यतस्त्ाददीत, लवणमे व। एवं वा
अरे इदं महद् भू तमनन्तमपारं षवज्ञानघन एव एतेभ्यो भूतेभ्यः समु त्थाय तान्ये वाऽनु षवनश्यषत न प्रेत्य संज्ञास्ति।
(बृहदारयक उपषनषद् , २/४/१२)
वायुवै गौतम तत् सूत्रम् । वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः, परश्च लोकः, सवाव षण च भू ताषन संदृब्धाषन भवस्तन्त तिाद्वै
गौतम पुरुषं प्रेतमाहुः-व्यस्रं षषतास्याङ्गाषन, इषत। वायुना षह गौतम सूत्रेण संदृब्धाषन भवस्तन्त। (बृहदारयक उपषनषद् ,
३/७/२)
ये षभन्न षवचार षवरोध में नहीं हैं । कई प्रकार की आत्मा के कारण भ्रम होता है । हर आत्मा की अलग अलग गषत
होती है ।
भौषतक शरीर मृ त्यु के बाद अपने मू ल स्रोत में षमल जाता है षजसे पित्व में षमलना कहते हैं । ५ महाभू तों-भूषम, जल,
वायु, अषग्न और आकाश तत्त्वों से शरीर बना र्ा। षिया बन्द होने पर उसी में षमल जाता है । पाषर्व व शरीर पृथ्वी में
षमल जाता है । इसका पुनजव न्म नहीं होता।
महान् तर्ा प्रज्ञान आत्मा एक सार् चन्द्मा तक पहुं चते हैं । ये चन्द्मा की १ पररिमा में १ पद जाते हैं । १३ पररिमा या
१२ चान्द्मास में चन्द्मा तक पहुं चते हैं । यह प्रे त शरीर है जो चान्द् मण्डल के षवरल पदार्व से बना है । पाषर्व व शरीर
चन्द् की १० पररिमा (२७३ षदन) में बनता है , चान्द् प्रेत शरीर पृथ्वी के १० घूणवन अर्ाव त् १० षदन में बनता है । पुरुष
षवश्व की प्रषतमा है । षवश्व भी १० चि या षदन में बनता है , षजसे सृषष्ट् का १० सगव ( १ अव्यक्त + ९ व्यक्त) कहा गया
है ।
हं सात्मा स्वप्न या ध्यान में शरीर से षनकल कर बाहर घूमता है । षचत्त के परकाया प्रवेश में यह अन्य शरीर में भी प्रवेश
करता है । मरने के बाद षकसी व्यस्तक्त या थर्ान के प्रषत दृढ़ आसस्तक्त के कारण हं सात्मा वहां भी जाता है ।
महान् आत्मा का पूवव तर्ा बाद की पीषढ़यों से ले न दे न का सम्बन्ध है । भौषतक षपण्ड का अंश ७वीं पीढ़ी तक जाता
है । अतः ७ पीढ़ी तक सम्बन्ध होने पर षववाह वषजव त है या ७ पीढ़ी तक श्राद्ध षकया जाता है। आधुषनक जीव षवज्ञान में
मनु ष्य के ४६ िोमोजोम माने गये हैं , जो माता-षपता से आधा-आधा षमलते हैं । प्रषत पीढ़ी का योगदान िमशः आधा
होता है । भौषतक शरीर के अषतररक्त वेद में २ अन्य स्रोत माने गये हैं -इन तीनों (िोमोजोम षमलाकर) को सह कहा
गया है । गभव में चन्द्मा२८ नक्षत्रों के २८ सह दे ता है । यह जन्म काल की पररस्तथर्षत का योगदान है । स्वयं के पूवव जन्म
के संस्कार के १० सह होते हैं । पूवव जन्म की प्रवृषत्त के कारण माता-षपता का चुनाव होता है , तर्ा उनके द्वारा
पररस्तथर्षत बनती है । अतः सभी आनु वंषशक हैं । इस प्रकार ४६ + २८ + १० = ८४ सह मनु ष्य का षनमाव ण करते हैं।
प्रषत पीढ़ी में इनका आधा षवभाजन होने से ७वीं पीढ़ी तक पूणव सह जा सकते हैं -४२, २१, १०, ५, २, १। केवल
िोमोजोम मानने पर भी ७वीं पीढ़ी तक षवभाजन होता है -२३, १२, ६, ३, २, १। थर्ूल तत्त्वों के अषतररक्त सूक्ष्म तत्त्वों
का अषधक षवभाजन सम्भव है । थर्ू ल तत्त्व षपण्ड ७ पीढ़ी तक जाते हैं , उदक् (जल जै सा) १४ पीढ़ी तक जात है , ऋषष
(अदृश्य रस्सी) २१ पीढ़ी तक जाता है ।
महान् आत्मा भाग चन्द् के बाहरी भाग से सूयव षकरणों (गौ) के दबाव से शषन ग्रह तक जाता है , षजसके वलय के ३
भागों को पीलु मती, उदन्वती, प्रद्यौ कहा गया है । इसका प्रकाश भाग धमव तर्ा अन्धकार भाग यम है ।
महान् आत्मा के सार् यज्ञात्मा का जो भाग है , वह सौर मण्डल को पार कर आकाश-गङ्गा तक जाता है । इसके षलये
गया श्राद्ध षकया जाता है । सौर मण्डल से बाहर प्राण की गषत को गय कहा गया है अतः सू यव गषत की उत्तरी सीमा पर
स्तथर्त थर्ान को भी गया कहते हैं । आकाश गङ्गा में आत्मा १ कल्प तक रहती है । उसके बाद सब कुछ समान है ,
षकसी अलग व्यस्तक्त का अस्तित्त्व नहीं है ।

ध्य


शश

या
्ा

शश


शश



शश
(२)
६ मशशजव
शश
- शशव शश पशश।

र्
(३)
-(४)
शश शशव तशश शशर शशम गशश।

(ई
(ह


शश


-शश

शश
)(न
शश
(शश
१श
१शश
शश
शश
))शश

अने
श जत् में मू ल धातु है -एज् कम्पने (पाषणनीय धातु पाठ, १/१४३)-कां पना, र्रर्राना। कम्पन से बदलता भी है षजससे
शश-


अं ग्रेजी में एज (आयु) हुआ है जो सदा बढ़ता रहता है । परब्रह्म सदा एक ही जै सा रहता है , इस अर्व में उसे बाल-







गोपाल भी कहते हैं , जै सा आरम्भ में र्ा वैसा सदा रहता है। उसे ब्रह्मा ने भगवान् कृष्ण् की िु षत में ३ सत्य या ७
शश


शश

शश
सत्य
शश कहा है -
शश
शश
सत्यव्रतं
शश सत्यपरं षत्रसत्यं सत्यस्य योषनं षनषहतं च सत्ये।

शश
शश
शशत
सत्यस्य शशरसत्यंशशम
ऋतसत्यने
शश
शशत
श शशर शशम- ब्रह्म त्रक
ं ेसत्यात्मक
कई रूप ं त्वां
हैं ।शरणं प्रपद्ये
परात्पर । (भागवत
ब्रह्म सदा एकपुरही
ाणजै१०/२/२६)
सा रहता है । इस अर्व में कहते हैं षक उसमें



षत्रसत्य
कम्पन का एक
नहीं अर्व है षक ब्रह्म हर थर्ान, हर समय, हर षदशा में एक जै सा है । सभी २२ प्रकार के आधुषनक सृषष्ट्
होता।

शश
रषवज्ञान के षसद्धान्त इसी मान्यता पर आधाररत हैं षजसे पूणव सृषष्ट् षसद्धान्त कहते हैं (PCP = Perfect Cosmological
शश

शश
शश
Principle)।
श अन्य अर्व हैं षक नाम-रूप-गुण में समानता, या षत्रषवध प्रमाणों के आधार आषद। अतः पूणव षवश्व को सत्य
,लोक कहते हैं ।
शश

शश



आकाश में ३ धाम (पूणव जगत्, ब्रह्माण्ड, सौर मण्डल) हैं । इनमें ३-३ षवभाजन से ७ लोक हैं -बीच के २-२ समान हैं ।

शश


या आकाश, पृथ्वी, मनु ष्य शरीर- इन तीनों थर्ानों में ७-७ लोक हैं ।
शश

शश
शश थर्ानों पर भी ३ और ७ सत्य कहे हैं - सप्तास्यासन् पररधयस्तस्त्रः सप्त सषमधः कृताः। (पुरुष सूक्त, यजु वेद
अन्य
शश

शशर ४-
३१/१५)

शश

शश
त षत्रषप्ताः पररयस्तन्त षवश्वा रूपाषण षबभ्रतः॥१॥ (अर्वव, शौनक संषहता)
ये
शश

ब्रह्म
शश
श को कई थर्ानों पर सत्य कहा है -सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म (तैषत्तरीय उपषनषद् , २/१/१)

तद्
शश यत् सत्यम् । त्रयी सा षवद्या। (शतपर् ब्राह्मण, ९/५/१/१८)
शश
रतदे
शशतत् त्र्यक्षरं सत्यषमषत... प्रर्मोत्तमे अक्षरे सत्यं मध्यतो ऽनृ तम् । (शतपर् ब्राह्मण, १४/८/६/२, बृहदारयक उपषनषद् ,

शश
शश
५/५/१)
शश



तद्वै
श तदे तदे व तदास सत्यमे व स यो है तं मघद्यक्षं प्रर्मजं वेद सत्यं ब्रह्मे षत। (बृहदारयक उपषनषद् , ५/४/१)



शश
शश
शशश


शश
शश


शश
एजषत का एक और अर्व है -प्रकाषशत होना-एजृ दीप्तौ (धातु पाठ १/१०९)। अने जत् = अप्रकाषशत, सबके भीतर
षछपा हुआ।
कम्पन अर्व में एक और शब्द है , र्वव = र्रर्राना। इस का मू ल है -र्ु वी षहं सार्व ः (धातुपाठ, १/३८२)। अर्वव = स्तथर्र,
गषतशू न्य, ब्रह्म। अतः ब्रह्म वेद को अर्वव वेद कहते हैं षजसका आरम्भ षत्र-सप्त से हुआ है । वेद में भी इस अर्व में
अर्वव का प्रयोग है। षनरुक्त (११/१९) में अर्वाव णोऽर्नवन्तः (गषतहीन)। र्ववषतः चरषत कमाव । तत् प्रषतषे धः (चलने का
अभाव)
अषङ्गरसो नः षपतरो नवग्वा अर्वाव णो भृ गवः सोम्यासः। (ऋक्, १०/१४/६, अर्वव, १८/१/५८)
स्तथर्र सोम (जल का षविार) में भृ गु (आकषव ण करने वाले ) अर्ववण हैं । नवग्ग्ग्वा-नव गषत वाले अषङ्गरस (गषत का
आरम्भ) षपतर हैं (अन्य को जन्म दे ने वाले)। आधुषनक षवज्ञान में मस्तिष्क की षियाओं को मन कहा गया है । यह
पररभाषा बृहदारयक उपषनषद् में है -त्रीयात्मने ऽकुरुतेषत मनो वाचं प्राणं तान्यात्मने ऽकुरुतान्यत्र मना अभूवं नादशव
मन्यत्रमना अभू वं नाश्रौषषमषत मनसा ह्येव पश्यषत मनसा शृणोषत। कामः सङ्कल्पो षवषचषकत्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृषतऽधृषत
हीधीभीररषत एतत्सवं मन एव तिादषप पृष्ठत उपस्पृष्ट्ो मनसा षवजानाषत सः कश्च शब्दो वागेव सैषा ह्यन्तमात्तै षाषह न
प्राणोऽपानो व्यान उदानः समानोऽन इत्येतत्सवं प्राण एवैतन्मयो वा अयमात्मा वाङ्मयो मनोमयः प्राणमयः॥ (१/५/३)
(२) मशशजव-वेद में ४ प्रकार की आन्तररक षियाओं में इसे एक माना गया है ।
अन्तःकरण चतुष्ट्य हैं -मन बुस्तद्ध, अहङ्कार, षचत्त।
मन-यह मस्तिष्क के आकाश में अषनयषमत स्पन्दन है जो अनन्त है ।
बुस्तद्ध-षवचारों का िमबद्ध रूप बुस्तद्ध है षजसे शब्द या वाक्य में प्रकट षकया जा सकता है ।
अहङ्कार-सभी कणों का एक व्यस्तक्त के रूप में अनु भव।
षचत्-मन बुस्तद्ध, अहङ्कार का थर्ान। शू न्य से बृहत् आकाश तक षचत्त है ।
मनोबुस्तद्धरहङ्कारषश्चत्तषमत्यन्तःकरणचतुष्ट्यम् । (शारीरकोपषनषद् २)
मनोबुस्तद्धरहङ्कारषश्चत्त चेषत चतुष्ट्यम् । (वराहोपषनषद् १/४)
मनोबुद्ध्योषश्चत्ताहङ्कारौ चान्तभूवतौ।(षत्रषशखब्राह्मणोपषनषद् १/४)
मनः सम्पद्यते लोलं कलनाऽऽकलनोन्मुखम् ।कलयन्ती मनःशस्तक्तरादौ भावयषतक्षणात्॥ (महोपषनषद् , ५/१४६)
बुद्धयो वै षधयिा योऽिाकंप्रचोदयाषदत्याहुमव नीषषणः। (मै त्रायणी उपषनषद् ६/७)
व्यवसायास्तत्मका बुस्तद्धरे केह कुरुनन्दन। बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसाषयनाम् ॥ (गीता, २/४१)
अपररषमततरषमव षह मनः पररषमततरमे व षह वाक्। (शतपर् ब्राह्मण १/४/४/७)
अव्यक्त स्पन्दन या मन परा वाक् है । षवचार रूप में इसका दशव न या अनु भव पश्यन्ती है। भाषा के शब्दों में अनु भव
पश्यन्ती वाक् है । षलख कर या कह कर वाक्य रूप में प्रकट करना वैखरी बुस्तद्ध रूप है ।
चत्वारर वाक् पररषमता पदाषन ताषन षवदु ब्राव ह्मणा ये मनीषषणः।
गुहा त्रीषण षनषहता नेङ्गयस्तन्त तुरीयं वाचो मनु ष्या वदस्तन्त॥ (ऋग्वे द १/१६४/४५)
परायामङ्कुरीभू य पश्यन्त्यां षद्वदलीकृता॥१८॥
मध्यमायां मु कुषलता वैखयाव षवकसीकृता॥ (योगकुण्डली उपषनषद् ३/१८, १९)
शू न्य आकाश षचत् है । अने क षचत् का िम से संयोग षचषत (रूप, आकृषत) है । जो षचषत कर सके वह चेतना है ।
चेतना का थर्ान षचत्त है ।
यच्चेतयमाना अपश्यं ििास्तच्चतयः। (शतपर् ब्राह्मण ६/२/२/९)
तद्यत् पि षचतीषश्चनोत्येताषभरे वैनं तत्तनू षभषश्चनोषत यस्तच्चनोषत तिास्तच्चतयः। (शतपर् ब्राह्मण ६/१/२/१७)
चेतव्यो ह्यासीत्तिास्तच्चत्यः। (शतपर् ब्राह्मण ६/१/२/१६)
बुद्ध्या बुध्यषत, षचत्ते न चेतयत्यहङ्कारे णाहङ्करोषत (नारद पररव्राजक उपषनषद् ६/४)
प्रजापषतवै षचत्पषतः। (शतपर् ब्राह्मण ३/१/३/२२) चेतव्यो ह्यासीत्तिास्तच्चत्यः।(शतपर् ब्राह्मण ६/१/२/१६)
मन का आरम्भ कहां से हुआ। जब कोई सृषष्ट् नहीं र्ी, केवल शू न्य र्ा तब भी मन र्ा षजसने सृषष्ट् का सङ्कल्प षकया।
यह श्वोवसीयस (शून्य में बसने वाला) मन है । दृश्य जगत् में शू न्य कें केवल इन्द् (तेज, या षवषकरण) है, अतः केवल
इन्द् प्रसंग में श्वः शब्द का प्रयोग है (ऋक्, १/१२३/८, ६७१/६ आषद)। इन्द् को शु नः (शून्य में रहने वाला) या राजा
रूप में शू न्य सम्पषत्त का स्वामी है । खाली घर में कुत्ता घुस जाता है अतः उसे भी श्वान कहते हैं
उसके बाद दृश्य जगत् में १०० अरब ब्रह्माण्ड और हमारे ब्रह्माण्ड में १०० अरब तारा हुए। इनकी प्रषतमा रूप में
मनु ष्य मस्तिष्क में १०० अरब कण (कोषषका, न्यू रोन) हैं । शतपर् ब्राह्मण में इसे काल माप के सम्बन्ध में समझाया है ।
सित्सर (३६० षदन) में १०,८०० मु हत्तव हैं (षदन का ३० भाग = ४८ षमनट)। मु हत्तव को ७ बार १५-१५ से भाग दे ने पर १
सेकण्ड का प्रायः ७५,००० भाग होगा। १ संवत्सर में इनकी संख्या षजतनी है , उतनी ही मनु ष्य शरीर में कषलल (Cell)
हैं षजनसे लोम षनकलते हैं । अतः इस काल मान को लोमगत्तव कहा गया है । षजतने लोम गत्तव हैं उतने ही आकाश में
नक्षत्र हैं ।
एभ्यो लोमगत्ते भ्य ऊध्वाव षन ज्योतींष्यान् । तद्याषन ज्योतींषषः एताषन ताषन नक्षत्राषण। यावन्त्ये ताषननक्षत्राषण तावन्तो
लोमगत्ताव ः। (शतपर् ब्राह्मण- १०/४/४/२)
पुरुषो वै सित्सरः। ।१॥ ..दश वै सहस्रायाष्ट्ौ च शताषन सित्सरस्य मु हत्ताव ः। यावन्तो मु हत्ताव िावस्तन्त पिदशकृत्वः
षक्षप्राषण। यावस्तन्त षक्षप्राषण, तावस्तन्त पिदशकृत्वः एतहीषण। याबन्त्ये तहीषण, तावस्तन्त पिदशकृत्व इदानीषन।
यावन्तीदानीषन तावन्तः पिदशकृत्वः प्राणाः। यावन्तः प्राणाः, तावन्तोऽनाः। यावन्तोऽनाः तावन्तो षनमेषाः। यावन्तो
षनमे षाः तावन्तो लोमगत्ताव ः। यावन्तो लोमगत्ताव ः तावस्तन्त स्वेदायनाषन। यावस्तन्त स्वेदायनाषन, तावन्त एते िोका वषव स्तन्त।
(शतपर् ब्राह्मण १२/३/२/१-५)
व्यक्त मन का आरम्भ ब्रह्माण्ड से आरम्भ है । अतः उसके अक्ष घूणवन के समय को मन्वन्तर कहते हैं (प्रायः ३०.६८
कोषट वषव )। आधुषनक षवज्ञान में इस की सटीक माप नहीं हो पाई है । ब्रह्माण्ड केन्द् की सूयव द्वारा पररिमा काल २०-
२५ कोषट वषव अनु माषनत है । हमारे मन पर चन्द् आकषव ण का सबसे अषधक प्रभाव पड़ता है । उसी आकषव ण से पृथ्वी
अक्ष भी शङ्कु आकार में २६,००० वषव में चि लगा रहा है । अतः इसे भी ऐषतहाषसक िन्वन्तर कहा है -स्वायम्भुव
मनु से कषलयुग आरम्भ तक का काल (ब्रह्माण्ड पुराण,१/२/२९/१९)।
हमारे मन का सम्बन्ध सूयव के सार् प्रकाश की गषत से है । व्यस्तक्त के हृदय से ब्रह्मरन्ध्र तक अणु पर् तर्ा वहां से सूयव
तक महापर् है । प्रकाश की गषत से सूयव तक जा कर यह १ मु हत्तव में ३ बार लौट आता है (ऋक् ३/५३/८)। यह सुषुम्ना
पर् है षजस पर चन्द् और अन्य ग्रहों के प्रभाव से हमारा मन प्रभाषवत होता है (बृहदारयक उपषनषद् , ४/४/८-९,
छान्दोग्य उपषनषद् , ८/६/१-५, वाज. यजु . १५/१५-१९, १७/५८, १८/४०, कूमव पुराण, ४१/२-८, मत्स्य पुराण, १२८/२९-
३३, ब्रह्माण्ड पुराण, २/२४/६५-७३ आषद)।
सौर मण्डल के बाहर के षवश्व से हमारा सम्बन्ध मन की गषत से है जो पररभाषषत नहीं है , षकन्तु यह प्रकाश गषत से
बहुत अषधक है , नहीं तो हमारे ऊपर कोई प्रभाव जीवन काल में नहीं पहुं च सकता।
यज्ञ आत्मा का सम्बन्ध परमे ष्ठी (ब्रह्माण्ड) से ऋत-सूत्र द्वारा है। इससे शरीर रचना (समान कण) तर्ा षियायें होती हैं।
स्वयम्भू मण्डल से सत्य सूत्र से सम्बन्ध है , जो आत्मा-परमात्मा का सम्बन्ध है ।
आं ख कान से दे खने सुनने पर भी मनोजव नहीं हो सकता। इसके षलये सभी चिल इस्तन्द्यों को हृदय में समाषहत कर
उसे ऋत्-सत्य सूत्रों द्वारा ब्रह्माण्ड से जोड़ना है -
अक्षण्वन्तःकणववन्तःसखायो मनोजवेष्व समा बभूवुः।
आदध्नास उपकक्षास उत्वे ह्रदा इव स्नात्वा उत्वे ददृशे ॥ (ऋग्वेद १०/७१/७)
हृदा तष्ट्ेषु मनसो जवेषु यद्ब्राह्मणाः संयजन्ते सखायः।
अत्राह त्वं षवजहुवेद्याषभरोह ब्रह्माणो षवचरन्तु त्वे ॥ (ऋग्वे द १०/७१/८)
इस षवषध का सारां श भागवत पुराण के गजे न्द् मोक्ष में है । व्यवषसत (षनश्चयास्तत्मका) बुस्तद्ध से मन को हृदय में स्तथर्र
कर वासुदेव से सम्बन्ध जोड़ें -ॐ नमः वासुदेवाय-परम मन्त्र द्वारा-
श्री शु क उवाच-एवं व्यवषसतो बुद्ध्या समाधाय मनो हृषद। जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनु षशषक्षतम् ।१।
गजे न्द् उवाच-ॐ नमो भगवते तिै यत एतस्तच्चदात्मकम् । पुरुषायाषद बीजाय परे शायाषभ धीमषह।२। (भागवत पुराण
८/३)
सूत्र रूप में पतञ्जषल ने कहा है-ग्रहण स्वरूपास्तितान्वयार्ववत्व संयमाषदस्तन्द्य जयः। (योगसूत्र ३/४७)
ततो मनोजषवत्वं षवकरणभावः प्रधानजयश्च। (योगसूत्र, ३/४८)
ब्रह्म के हनु मान् रूप को स्रष्ट्ा रूप में वृषा-कषप, गषत रूप में मारुषत, तर्ा ज्ञान रूप में मनोजव कहा गया है , जो
गायत्री मन्त्र के ३ पाद हैं ।
३. दे व से परे -दे वों की उत्पषत्त सृषष्ट् के बाद ही हुई। षकन्तु ब्रह्म सृषष्ट् के पहले भी र्ा और उसी के सङ्कल्प से सृषष्ट्
आरम्भ हुई। अतः दे वों को भी अपनी उत्पषत्त के पहले षवश्व कैसा र्ा और ब्रह्म क्या है , इसका पता नहीं है ।
यही नासदीय सूक्त में कहा है -
को अद्धा वेद क इह प्र वोचत् कुत अजाता कुत इयं षवसृषष्ट्ः।
अवाव ग् दे वा अस्य षवसजव नेनाऽर्ा को वेद यत आबभू व॥ (ऋक्, १०/१२९/६, तैषत्तरीय ब्राह्मण, २/८/९/८)
= कौन मनु ष्य जानता है और यहां कौन कहे गा षक यह सृषष्ट् (षवसृषष्ट् = पुराण कषर्त प्रषतसगव) कहां से और कैसे
उत्पन्न हुयी? क्यों षक दे व भी इस सृषष्ट् के बाद ही उत्पन्न हुए। अतः यह सृषष्ट् कहां से हुयी इसे कौन जान सकता है ?
संषवदस्तन्त न यं वेदा षवष्णु वेद न वा षवषधः। यतो वाचो षनवतवन्ते अप्राप्य मनसा सह॥ (तैषत्तरीय उपषनषद् , २/४/९)
= उसे न वेद जानते हैं , न ब्रह्मा या षवष्णु। वाक् भी वहां जा कर षबना उसे पाये लौट आती है ।
न तस्य कायं करणं न षवद्यते, न तत् समश्चाभ्यषधकश्च दृश्यते।
परास्य शस्तक्तषववषवधैव श्रू यते, स्वाभाषवकी ज्ञान बल षिया च॥ (श्वे ताश्वतर उपषनषद् , ६/८)
= उस (परब्रह्म) का न कोई कायव है न करण (उपकरण, या कारण)। उसके समान कोई नहीं है , अषधक कहां से
दीखे गा? उसकी शस्तक्त हमारी कल्पना से परे है । उसका स्वभाव ३ रूपों में सुना जाता है -ज्ञान, बल, षिया।
लौषकक रूप में इस स्वभाव को जगन्नार् (ज्ञान घन), बलभद्र (बल) सुभद्रा (षिया) कहते हैं । कई प्रकार के ३-३ भे द
हैं -सत्-षचत्-आनन्द, सत्-श्री-अकाल, शं कर (शं +कं+रं ब्रह्म) आषद।
४. दे व तथा ब्रह्म गवत-दे व के व्यक्त अव्यक्त कई रूप शरीर के भीतर, पृथ्वी पर तर्ा आकाश में हैं । शस्तक्त का
षियात्मक रूप दे व है ; षजससे कोई षनमाव ण नहीं होता वह असुर है । सौर मण्डल के ३३ क्षे त्रों (धाम) के प्राण ३३ दे व हैं
षजनको अषग्न (८ वसु), वायु (११ रुद्र), रषव (१२ आषदत्य) तर्ा इनकी सस्तन्ध के २ अषश्वन हैं । सौर मण्डल के बाहर
षवश्वे देवा, वैराज दे व आषद हैं । सौर मण्डल के धाम पृथ्वी से आरम्भ होते हैं तर्ा िमशः २-२ गुणा बड़े हैं । सूयव केस्तन्द्त
१ कोषट धाम हैं , सभी की मोटाई समान है। दोनों को षमला कर ३३ कोषट दे व होंगे। आकाश के क्षे त्रों के काल मान के
अनु सार दो प्रकार के षवभाजन होने से ३३३९ दे व भी कहे गये हैं । ३३३९ षतषर्यों के बाद ग्रहण चि पुनः आरम्भ होता
है (राहु पररिमा का अधव चि)।
त्रीषण शताषन त्री सहस्रायषग्नं षत्रं शच्च दे बा नव चा सपयवन्। (ऋक्, ३/९/९, १०/५२/६, वाज् . सं. ३३/७, ब्रह्माण्ड पुराण,
१/२३/६६-६९ आषद)
त्रया दे वा एकादश त्रयस्तस्त्रंशाः सुराधसः। (वाज. सं. २०/११)
अष्ट्ौ वसवः। एकादश रुद्रा द्वादशाषदत्या इमे ऽ एव द्यावापृषर्वी त्र्यस्तस्त्रंश्यौ त्रयस्तस्त्रंशद्वै दे वाः प्रजापषतश्चतुषवंशः।
(शतपर् ब्राह्मण, ४/५/७/२)
महाभारत, अनुशासन पवव, अध्याय १५०-
८ वसु-धरो ध्रुवश्च सोमश्च साषवत्रोऽर्ाषनलोऽनलः। प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्ट्ौ प्रकीषतवताः॥१६॥
(ध्रुवो धरश्च सोमश्च साषवत्रश्चानलोऽषनलः। प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्ट्ौ प्रकीषतवताः॥-भषवष्य पुराण, ब्राह्म पवव, १२५/१०)
११ रुद्र-अजै कपादषहबुवध्न्यः षपनाकी चापराषजतः। ॠतश्च षपतृरूपश्च त्र्यम्बकश्च महे श्वरः॥१२॥
वृषाकषपश्च शम्भु श्च हवनोऽर्ेश्वरिर्ा। एकादशै ते प्रषर्ता रुद्रास्तस्त्रभु वने श्वराः॥१३॥
१२ आषदत्य-अंशो भगश्च षमत्रश्च वरुणश्च जलेश्वरः॥१४॥
तर्ा धातायवमा चैव जयन्तो भास्करिर्ा। त्वष्ट्ा पूषा तर्ैवेन्द्ो द्वादशो षवष्णु रुच्यते॥१५॥
इत्येते द्वादशाषदत्याः काश्यपेया इषत श्रु षतः।
अषश्वनी द्वय-नासत्यश्चाषप दस्रश्च िृतौ द्वावषश्वनावषप॥१७॥
मत्स्य पुराण, अध्याय ५-आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चै वाषनलोऽनलः। प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्ट्ौ प्रकीषतवताः॥२१॥
अजै कपादषहबुवध्न्यो षवरूपाक्षोऽर् रै वतः। हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्च सुरेश्वरः॥२९॥
साषवत्रश्च जयन्तश्च षपनाकी चापराषजतः। एते रुद्राः समाख्याता एकादश गणेश्वराः॥३०॥
अध्याय ६-वैवस्वतेऽन्तरे चैते ह्याषदत्या द्वादश िृताः॥३॥
इन्द्ो धाता भगस्त्ष्ट्ा षमत्रोऽर् वरुणो यमः। षववस्वान् सषवता पूषा अंशुमान् षवष्णु रेव च॥४॥
पृथ्वी केन्द् से आरम्भ कर ३ धाम पृथ्वी सतह तक हैं । उसके बाद ३० धाम िमशः २-२ गुणा बड़े हैं ।
८ अषग्न-अनल, अषनल, धर (धरा पृष्ठ), आप, ध्रुव, प्रत्यूष, प्रभास, सोम। नवम धाम का प्रर्म अषश्वन नासत्य चन्द् कक्षा
को पार करता है । यहां तक पृ थ्वी का आकषव ण क्षे त्र है।
११ रुद्र-षपनाकी, जयन्त, साषवत्र, सुरेश्वर, त्र्यम्बक, बहुरूप, हर, रै वत, षवरूपाक्ष, अषहबुवध्न्य, अजै कपाद। इसके बाद
२१वां धाम दस्र अषश्वन है जो शषन कक्षा को पार करता है । यहां तक वायु क्षे त्र है -सौर वायु यूरेनस तक है ।
१२ आषदत्य-इन्द्, धाता (यहां तक ने पचून है षजनको सूयव ने धारण षकया है ), भग, त्वष्ट्ा, षमत्र, वरुण, यम (यहां तक के
षपण्ड सूयव कक्षा में रह सकते हैं ), षववस्वान्, सषवता, पूषा, अंशुमान् , षवष्णु। यहां ३३ धाम (पृथ्वी के बाहर ३०) पूरे हुए
जहां तक सूयव का प्रकाश ब्रह्माण्ड से अषधक है ।
ब्रह्माण्ड की सीमा तक ४९ मरुत् हैं जो पृथ्वी केन्द् से आरम्भ होते है। सौर मण्डल के बाह्र ब्रह्माण्ड सीमा तक
षवश्वे देव हैं । उसके बाहर वैराज दे व है ।
ये सभी प्राण रूप दे व हैं । सभी षपण्डों में भी दे व स्तथर्त है ।
ब्रह्म की ववशेष गवत-षपण्ड या प्राण रूप जो भी दे व हैं , वे षकसी थर्ान मे सीषमत हैं , अतः वे दू सरे थर्ान पर जाने के
षलये बीच का पूरा रािा तय करते हैं । षकन्तु ब्रह्म हर थर्ान पर है । जहां जाना होता है , वहां तुरत प्रकट हो जाता है।
बीच के रािे पर नहीं जाना पड़ता। ब्रह्म की गषत अषभ गमन है -षहन्दी के अनु सार अभी पहुं च जाता है । बाकी की
संसपव गषत है , सपव की तरह रािे के हर षवन्द्दु पर सरकते हुए जाता है । जै से गजे न्द् मोक्ष में ब्रहा आषद षलङ्ग (शरीर
अषभमानी, शरीरया थर्ान में सीषमत दे वता) अषभमानी दे वों की संसपव गषत षलखी है । ब्रह्म स्वतः प्रकट हो जाता है ।
प्रकट होने के षलये ७ अवयव युक्त सुपणव द्वारा रूप धारण करते हैं ।
एवं गजे न्द्मु पवषणवत षनषववशेषं ब्रह्मादयो षवषवध षलङ्गषभधाषभमानाः।
नै ते यदोप ससृपुः षनस्तखलात्मकत्वात्, तत्राऽस्तखलामरमयो हररराषवरासीत्॥
तङ् तद्वदात्तव मुपलभ्य जगषन्नवासः, िोत्रं षनशम्य षदषवजैः सह संिुवस्तद्भः।
छन्दोमयेन गरुडे न समु ह्यमानः, चिायुधोऽभ्यगमदाशु यतो गजे न्द्ः॥ (भागवत पुराण, ८/३/३०-३१)
५. मातररश्वा द्वारा सृवि और िारण-सृषष्ट् के षलये कई षभन्न विु ओं को षमला कर षहलाना पड़ता है । जै से सब्जी
बनाने केषलये सब्जी के छोटे टु कडों को तेल मसाला आषद के सार् षमलाते है । इसके षलये सभी भागों को लाना और
एक सार् रखना पड़ता है ।षफर गमव करते हैं (आन्तररक आणषवक गषत)। ओषड़या में षमलाना और गमव करना-दोनों
को पकाना कहते है । अतः २ बाह्य और एक आन्तररक गषत (वायु तत्त्व) द्वारा नये पदार्व का जन्म होता है । वायु के
इस िमबद्ध काम को मातररश्वा (माता समान उत्पन्न करने वाल कहते हैं । यह षमश्रण आषद काम अप् में होता है ।
अतः पहले अप् में षमश्रण को धारण करता है , षफर षनषमव त विु ओं को भी धारण करता है -गषत द्वारा वे एक दू सरे से
अलग रहते हैं नहीं तो गु रुत्वाकषव ण के कारण षमल जाते। ब्रह्म के षनमाव ता रूप को सुपणव कहा गया है , षजसके द्वारा
वे प्रकट भी होते हैं । सुपणव में १ षसर है , जो चेतन तत्त्व है । ४ चतुभुवज आकार का शरीर है जो सृषष्ट् के ४ मू ल बल क्षे त्र
हैं -इनके कारण बाह्य और आन्तररक गषत होती है । ये हैं गु रुत्व आकषव ण, षवद् युत् चुम्बकीय बल, परमाणु की नाषभ में
२ प्रकार के बल-प्रबल आकषव ण, धीमा षवकषव ण। २ पक्ष समरूपता हैं (दे श काल की षवषभन्न षदशाओं में समान
प्रभाव)। १ पुच्छ षवषमता या षनषमव त पदार्व है ।
शतपर् ब्राह्मण (६/१/१)-स योऽयं मध्येप्राणः-एष दे वेन्द्ः। ताने ष प्राणान् मध्यत इस्तन्द्येणैन्ध। यदएन्द्द्ध तिाषदन्धः।
इन्धो हवै तषमन्द् इत्याचक्षते॥२॥
तेऽब्रुवन् -न वा इत्थं सन्तः शक्ष्यामः प्रजनषयतुम्, इमान् सप्त पुरुषान्। एकं पुरुषं करवाम इषत। त एतान् सप्त पुरुषान्
एकं पुरुषं अकुववन्। यद् ऊध्वं नाभे ः तौ द्वौ समौब्जन् । यद् अवाङ् नाभे ः तौ द्वौ। पक्षः पुरुषः, पक्षः पुरुषः, प्रषतष्ठा एक
आसीत्॥३॥
अर् यैतेषां सप्तानां पुरुषाणां श्रीः। यो रस आसीत् तमू ध्वं समु दौहन् -तद् अस्य षशरो अभवत्। यत् षश्रयं समु दौहन्
तिात् षशरः। तस्तिन् एतस्तिन् प्राणा अश्रयन्त। तिाद् एव एतत् षशरः। अर् यत् प्राणा अश्रयन्त तिादु प्राणाः षश्रयः।
अर् यत् सववस्तिन् अश्रयन्त तिादु शरीरम् ॥४॥
स एव पुरुषः प्रजापषतः अभवत्। स यः पुरुषः पुरुषः प्रजापषतः अभवत्-अयमे व सः-यो अयं अषग्नः चीयते (चयन, एकत्र
करना)॥५॥
स वै सप्त पुरुषो भवषत। सप्त पुरुषो षह यं पुरुषः-यत् चत्वार आत्मा, त्रयः पक्ष पुच्छाषन। चत्वारो षह तस्य पुरुषस्य
आत्मा, त्रयः पक्ष पुच्छाषन॥६॥
अन्य थर्ानों में भी वणवन है षक एक सुपणव (पक्ष युत या पक्षी) ने समु द्र (अप् का षविार) में प्रवेश षकया। उसने मन से
षवचार कर पाक द्वारा (षमला कर, षहला कर और गमव कर) भू षम (सीमाबद्ध षपण्ड) उत्पन्न षकया। उसने भू षम का
पालन (रे स्तहह) षकया, भूषम ने भी माता समान उसका पालन षकया।
एकः सुपणवः स समु द्रमाषववेश स इदं भु वनं षव चष्ट्े ।
तं पाकेन मनसापश्यमस्तन्ततिं, माता रे स्तहह स उ रे स्तहह मातरम् ॥ (ऋग् वेद १०/११४/४)
भौषतक रूप में भारत के समुद्र तट पर सबसे अषधक कृषष भू षम आन्ध्र प्रदे श में है , अतः वहां के भू षमपषत (कृषक)
को रे ड्डी (रे स्तहह) कहते हैं । नौसेना मु ख्य को भी सुपणव (सुवन्ना) नायक कहते र्े ।
षवष्णु के वीयव (मातररश्वा) द्वारा लोकों का धारण हुआ है -
द्यौः सचन्द्ाकव नक्षत्रा खं षदशो भू मवहोदषधः। वासुदेवस्य वीयेण षवधृताषन महात्मनः॥
(षवष्णु सहस्रनाम, महाभारत, अनु शासन पवव, १४९/१३४)
अध्याय ७-ईशावास्योपवनषद, मन्त्र ५-
तदे जषत तन्नैजषत, तद् दू रे तद्वस्तन्तके। तदन्तस्यव सववस्य, तदु सववस्यास्य बाह्यतः॥५॥
अर्व -(तत्) वह परमात्मा (एजषत) चलते हैं , (तत्) वह (न एजषत) नहीं चलते, (तत्) वह (दू रे ) बहुत दू र है , (तत् तु
अस्तन्तके)। वह षनषश्चत ही षनकट भी है । (तत्) वे (अस्य सववस्य) इन सभी जीवों क्ए (अन्तः) भीतर भी हैं । (तत्) वे (उ)
षनश्चय ही (अस्य सववस्य) इन सभी जीवों के (बाह्यतः) बाहर भी रहते हैं ।
व्याख्या-१. तत्-यह परब्रह्म के षलये प्रयुक्त होता है -
ॐ तत् सत् इषत षनदे शः ब्रह्मणः षत्रषवधः िृतः (गीता, १७/२३)
षकं यत् तत् पदमनु त्तमम् (षवष्णु सहस्रनाम, श्लोक ९१)
२. षवपरीत ६ गुण-ब्रह्म में परस्पर षवपरीत ६ गुण हैं -चलना-स्तथर्र, दू र-षनकट, अन्तः-बाह्य हैं । यह सववव्यापी होने के
कारन परमात्मा में ही हैं , षकसी भी अन्य में नहीं। परमात्मा में ६ ऐश्वयव हैं षजनको भग कहते हैं , अतः उनको भगवान्
कहते हैं -ऐश्वयव, धमव , यश, श्री, ज्ञान, वैराग्य-
ऐश्वयवस्य समग्रस्य धमव स्य यशसः षश्रयः। ज्ञान वैराग्ययोश्चै व ष्ट््ां भग इतीरणा॥ (षवष्णु पुराण, ६/५/७४)
शौनक ने कहा है -
पराङ्मुखा ये गोषवन्दे षवषयासक्त चेतसः। तेषां तत्परमं ब्रह्म दू राद् दू रतरे स्तथर्तम् ॥१॥
तन्मयत्वे न गोषवन्दे ये नरा न्यिचेतसः। षवषयत्याषगनिेषां षवज्ञे यं च तदस्तन्तके॥२॥ (षवष्णु धमव पुराण, ९५/१३-१४)
= जो गोषवन्द से पराङ्मुख (मन हटा कर) षवषयों में आसक्त हैं , उनके षलये परब्रह्म दू र से भी दू र है । षजनकामन
गोषवन्द में ही लगा हुआ है तर्ा षवषयों को छोड़ चुके हैं , उनके हृदय में ही भगवान् हैं ।
उपषनषदों में इसे सभी भू तों के हृदय में कहा है -
आत्मास्य जन्तोषनव षहतं गुहायाम् (कठोपषनषद् , १/२/२०)
एको दे वः सवव भू तेषु गूढ़ः सववव्यापी सववभूतान्तरात्मा (श्वे ताश्वतर उपषनषद् , ५/११)
यः आत्मा सवाव न्तरः (बृहदारयक, ३/४/१)
अन्तबवषहश्च तत् सवं व्याप्य नारायणः स्तथर्तः (महानारायण उपषनषद् , १३/२)
३. समाधान-ब्रह्म सववव्यापी है , अर्ाव त् हर जगह पहले से ही है , जाने का कोई अर्व नहीं है । षनमाव ता के रूप में लगता
है षक वह बाहरी कत्ताव है । पर वह कत्ताव , षिया, उपकरण, सामग्री आषद सब कुछ है, अतः उसके कमव को सुकृत
कहा है ।
तैषत्तरीय उपषनषद् -असद्वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सदजायत।तदात्मान स्वयमकुरुत। तिात् तत् सुकृतमु च्यत इषत।
यद्वै तत् सुकृतं रसो वै सः। (२/७)
असन्नेव स भवषत। असद् ब्रह्मे षत वेद चेत्। अस्ति ब्रह्मे षत चेद्वेद।....... सोऽकामयत्। बहुस्यां प्रजायेयेषत। स
तपोऽतप्यत। स तपिप्त्त्वा इदं सववमसृजत यषददं षकं च। तत् सृष्ट्वा तदे वानु प्राषवशत्। तदनु प्रषवश्य सच्च त्यच्चाभवत्।
षनरुक्तं चाषनरुक्तं च। षनलयनं चाषनलयनं च। षवज्ञानं चाषवज्ञानं च। सत्यं चानृ तं च सत्त्यमभवत्। (२/६)
ब्रह्मापवणं ब्रह्म हषवब्रवह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मै व तेन गन्तव्यं ब्रह्मकमव समाषधना॥ (गीता, ४/२४)
स्रष्ट्ा रूप में सृषष्ट् करने के बाद उसमें पुनः प्रषवष्ट् हो गया। कहीं पदार्ों में षछपा है , कही प्रकट है । अतः उसे सत्-
असत्, षनरुक्त-अषनरुक्त आषद सभी द्वै त कहा है ।
षछपे रूप में षशषपषवष्ट्, प्रकट रूप में प्रकाशन कहा है -
नै करूपो बृहद्रूपो षशषपषवष्ट्ः प्रकाशनः (षवष्णु सहस्रनाम, ४२)
अध्याय ८-ईशावास्योपवनषद, मन्त्र ८
स पयवगाच्छु िमकाय-मव्रणमस्नाषवरं शु द्धमपापषवद्धम् ।
कषवमव नीषी पररभू ः स्वयम्भू याव र्ातर्थ्यतो, ऽर्ाव न् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥८॥
अथम-(स) वह परब्रह्म-यहां कत्ताव रूप (पयवगात्) घेर कर, (शु िं) तेज रूप, (अकायं) षबना शरीर का, (अव्रणं) षबना
षकसी षछद्र के, (अस्नाषवरं ) षबना षकसी जोड़ने वाले तन्तु के, (शु द्धं) षबना षकसी षवकार के, (अपापषवद्धम् ) षबना पाप
द्वारा अलग हुए मू ल स्रोत को (कषवः) स्रष्ट्ा-कवल रूप में अलग अलग कर, (मनीषी) मन से षवचार करने वाला,
(पररभू ः) पररषध रूप बाहर भीतर स्तथर्त, (स्वयम्भू ) स्वयं उत्पन्न, (यार्ातर्थ्यतः) जै सा या षजतना र्ा वैसा ही, (व्यदधात्)
धारण षकया; (शाश्वतीभ्यः) सनातन (समाभ्यः) वषों तक करता रहा।
व्याख्या-
१. परब्रह्म का स्वरूप-परब्रह्म अव्यक्त और कल्पना से परे है । अतः उसको षनषे ध रूप से समझते हैं , षक षजतने
रूप या गुण दीख रहे हैं , वह नहीं है ।
सां ख्य के तत्त्व समास का सूत्र १६ है -दश मौषलकार्ाव ः। इस के अनु सार १० मौषलक अर्व हैं । मू ल विु २ हैं -पुरुष
(ब्रह्म) और मूल प्रकृषत षजसमें ३ गुण परस्पर षमले हुए हैं । सां ख्य सूत्र (१/६७) है -मूले मूलाभावादमू लम् = षजस पदार्व
की उत्पषत्त का मू ल कारण नहीं है , उसे मू ल (प्रकृषत) कहते हैं । मू ल प्रकृषत के गुणों का वणवन होता है , पुरुष में
उसका षनषे ध।
रामचररतमानस में है -षनगम नेषत षशव अन्त न पा वा\ ताषह धरषहं जननी हषठ धावा॥ (बालकाण्ड, २०२/४)
श्रीमद् भागवत पुराण के स्कन्ध १०, अध्याय ९ में भी है -
न चान्तनव बषहयवस्य न पूवं नाषप चापरम् । पूवाव परं बषहश्चान्तजवगतो यो जगच्च यः॥१३॥
तं मत्वात्मजमव्यक्तं मत्यवषलङ्गमधोक्षजम्। गोषपकोलूखले दाम्ना बबन्ध प्राकृतं यर्ा॥१४॥
तद्दाम बध्यमानस्य स्वाभव कस्य कृतागसः। द्व्यङ्गुलोनमभूत्तेन सन्दधेऽन्यच्च गोषपका॥१५॥
यदासीत्तदषप न्यूनं तेनान्यदषप सन्दधे। तदषप द्व्यङ्गुलं न्यूनं यद्यदादत्त बन्धनम् ॥१६।
अव्यक्त और अपररमे य होने के कारण षनषे ध रूप में ही गजे न्द् मोक्ष िु षत में भी वणवन है-
स वै न दे वासुरमत्यवषतयवङ्, न स्त्री न षण्ढो न पुमान्न जन्तुः।
नायं गुणः कमव न सन्न चासषन्नषेधशे षो जयतादशेषः॥ (भागवत पुराण, ८/३/२४)
अव्यक्त को दे ख या अनुभव नहीं कर सक्ते षकन्तु उसे प्रणव (ॐ) से व्यक्त करते हैं । इसके कई अर्व हैं -षजसे दे ख
कर सभी नव (झुक जाते हैं ), सदा नव (सृषष्ट्) करता है , षकन्तु ९ सगों से परे दशम अव्यक्त रूप है ।
२. ब्रह्म के दश ववि वनदे श-संक्षेप में तो ३ प्रकार ही हैं -ॐ तत् सत् इषत षनदे शः ब्रह्मणः षत्रषवधः िृतः। (गीता, ८/१३)
३ के संयोग से १० हो जाते हैं । १०-१० के गुणन से १० (१०८) नाम, सहस्रनाम या लक्ष, कोषट श्लोकों में भी वणवन हैं ।
३ गुणों के १० प्रकार के संयोग होते हैं । यषद इनका षनदे श क, ख, ग से षकया जाय, तो ये संयोग होंगे-
क, ख, ग, कख (क मु ख्य), कग, खग, खक, गक, गख, ककग।
चतुभुवज रूप में या ४ षदशाओं में षविार के िमबद्ध रूप २४ (४x ३x २x १) या २ तक योग रूप १० होंगे-
क, ख, ग, घ, कख, कग, कघ, खग, खघ, गघ।
ब्रह्म के १०षवध षविार के कारण १० प्रकार की शास्तन्त होती है -
ॐ द्यौ: शास्तन्तरन्तररक्ष शास्तन्त: पृषर्वी शास्तन्तराप: शास्तन्तरोषधय: शास्तन्त: । वनस्पतये: शास्तन्तषववश्वे दे वा: शास्तन्तब्रवह्म
शास्तन्त: सवव शास्तन्त: शास्तन्तरे व शास्तन्त: सा मा शास्तन्तरे षध ॥ ॐ शास्तन्त: शास्तन्त: शास्तन्त: ॥
(वाज. संषहता, ३६/१७, अर्वव, १९/९/१४)
धमव के भी १० लक्षण कहे हैं -
धृषत क्षमा दमो िे यं शौचषमस्तन्द्यषनग्रहः। धीषववद्या सत्यमिोधो दशकं धमव लक्षणम् ॥ (मनुिृषत, ६/९२)
या योग अभ्यास के आरम्भ के १० यम-षनयम हैं-
अषहं सा सत्य अिे य ब्रह्मचयव अपररग्रहा यमाः। (योगसूत्र, २/३०)
शौच सन्तोषः तपः स्वाध्यायेश्वरप्रषणधानाषन षनयमाः। (२/३२)
षशव के ५ मु खों की सीमा रूप में १० महाषवद्या हैं । या १० शैवागमों के समान षवचार करने की १० षवषधयां हैं ।
१० मौषलकार्ों की सूची कहीं नहीं है , पर सां ख्य काररका, ७२ की व्याख्या में राजवाषत्तव क के उद्धरण से इनका नाम
षदया गय है -
प्रधानास्तित्त्वमे कत्वमर्व वत्वमर्ान्यता। पारार्थ्यं च तर्ानै क्य षवयोगो योगएव च।
शे षवृषत्तरकतृवत्वं मौषलकार्ाव ः िृता दश॥
यहां शे षवृषत्त को गजे न्द् मोक्ष में षनषे धशेष, अशेष आषद कहा है । कई प्रकार के षवपरीत गुण हैं -एकत्व-नै क्य,
अर्व त्व-पारार्थ्यव , षवयोग-योग।
इस मन्त्र में १० गुण हैं -कषव, मनीषी, पररभू, स्वयम्भू , शु ि, अकाय, अव्रण, अस्नाषवर, शुद्ध, अपापषवद्ध।
३. अथम सृवि-(अर्व -पदार्व )-यह अव्यक्त से व्यक्त का रूपान्तर है । ब्रह्म का षकसी ने षनमाव ण नहीं षकया, वह स्वयम्भू
है । षनमाव ण करने की इच्छा या सङ्कल्प षकया, इस रूप में मनीषी है । पदार्ों को सीमा के भीतर छोटे छोटे खण्डों
(कवल=भोजन का कौर) में बां ट षदया, अतः वह कषव या षनमाव ता है । सीमाबद्ध करना पयवगात् है । अलग अलग
खण्डों में बंटने के बाद ये गुण आ गये-
तम (अन्धकार)-सीमा के भीतर विु प्रायः षछप जाती है , उससे अन्य षपण्ड भी षछप जाते हैं ।
काया-शरीर का रूप, आकार।
व्रण-षछद्र, दोष, असमानता।
स्नायु-एक षपण्ड का अन्य से सम्बन्ध, आकषवण-षवकषव ण आषद।
अशु द्ध-षभन्न प्रकार के अणु तर्ा पदार्ों का षमश्रण।
पापषवद्ध-एक दू सरे से अलग। जब मन में पाप नहीं होता, तो सभी प्राषणयों का एक ही हृदय होता है और एकवचन
का प्रयोग होता है । पाप से षवद्ध या कट जाने के कारण एक व्यस्तक्त का हृदय अन्य से अलग हो जाता है और
बहुवचन में प्रयोग होता है ।
ईश्वरः सववभूतानां हृद्दे शेऽजुव न षतष्ठषत। (गीता, १८/६१)
पापात्मनां कृतषधयां हृदयेषु बुस्तद्धः (दु गाव सप्तशती, ४/५)
यहां कोई अलग से सृषष्ट् नहीं हुयी। पहले जो तत्त्व अव्यक्त रूप में र्ा वही ज्यों का त्यों (यार्ातर्थ्य) व्यक्त रूप में आ
गया। यह िम शाश्वत है ।
४. वाक (शब्द) सृवि-इसी अर्व में कषव शब्द प्रचषलत है। अव्यक्त भाव (परा वाक्) का कोई रूप, रं ग, आकार,
सम्बन्ध आषद नहीं होता। वही षवचार षलस्तखत या कषर्त शब्द में व्यक्त होता है तो ये षिया होती हैं -
पयवगात्-अव्यक्त षवचार के षलये कोई सटीक शब्द नहीं षमलता। उसे ४-५ शब्दों से घेर कर व्यक्त करते हैं ।
तम-मन में जो षवचार हैं, उनको सम्पू णव रूप में व्यक्त करना सम्भव नहीं है । भाषा की अपूणवता या अपने ज्ञान में
कमी के कारण कई बातें षछप जाती हैं । मन के ३ िर गौरी वाक् हैं , बाहर षनकली वैखरी में कुछ षछप जाता है , उसे
तम कहते हैं । गौ (गौरी) तर्ा तम के बीच सम्बन्ध को षदखाने वाला गौतम न्याय है । इसका प्रयोग न्यायालय में होता
है , जहां गौ को तम और तम को गौ करते हैं । प्रकृषत रूप में जब दे वों की सस्तिषलत शस्तक्त र्ीं तो गौरी र्ी। शरीर
रूप में अलग होने पर काली हुयी। दु गाव सप्तशती- (अध्याय, ४)-दे वी दे वशरीरे भ्यो जगत्त्रय षहतैषषणी॥४०॥
पुनश्च गौरी दे हात् सा समु द्भू ता यर्ाभवत्।
(अध्याय, ५)-शरीरकोशाद्यत्तस्याः पाववत्या षनःसृतास्तम्बका। ---
तस्यां षवषनगवतायां तु कृष्णाभू त् साषप पाववती। काषलकेषत समाख्याता षहमाचल कृताश्रया॥८८॥
वाक् रूप में बाहर षनकलने पर गौरी वाक् १,२, ४, ८, ९ तर्ा १००० भागों में खस्तण्डत हो जाती है ।
चत्वारर वाक् पररषमता पदाषन ताषन षवदु ब्राव ह्मणा ये मनीषषणः।
गुहा त्रीषण षनषहता नेङ्गयस्तन्त तुरीया वाचो मनुष्या वदस्तन्त॥ (ऋक्, १/१६४/४५)
गौरीषमव माय सषललाषन तक्षषत एक पदी षद्वपदी सा चतुष्पदी। अष्ट्ापदी नवपदी बभू वुषी सहस्राक्षरा परमे व्योमन्।
(ऋक्, १/१६४/४१)
इस षवभाजन के कारण ६ प्रकार के दशव वाक् (षलषप) हैं षजनमें (१+४) का वगव, (२+४) का वगव, (१+२+४) वगव, ८ वगव,
(८+९) वगव तर्ा सहस्र अक्षर होते हैं । इसके अनु रूप षवश्व की पूणवता ६ दशव नों द्वारा दे खी जाती है ।
व्यक्त वाक् में ये गुण आते हैं जो पहले नहीं र्े-तम-इसकी व्याख्या ऊपर है ।
काया-वणव, अक्षर, शब्द, पद, वाक्य आषद षवषवध रूप।
व्रण-उपसगव प्रत्यय आषद से अर्व में षवकार या पररवतवन।
स्नायु-कारक द्वारा शब्दों में सम्बन्ध।
अशु द्ध-कोई भी शब्द पूणव अर्व नहीं प्रकट कर सकता।
पापषवद्ध-शब्द, पद, वाक्य आषद का अलगाव।
इनके षलये कषव को मनीषी होना पड़ता है । कुछ बातें उसकी कल्पना से आती हैं , वह स्वयम्भू है ।
५. वाक-अथम सम्बन्ध-द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे शब्द ब्रह्म परं च यत्। शाब्दे ब्रह्मषण षनष्णातः परब्रह्माषधगच्छषत॥ (मै त्रायणी
आरयक, ६/११)
यावद् ब्रह्म षवषष्ठतं तावती वाक् (ऋक्, १०/११४/८)
अव्यक्त षवश्व या वाक् व्यक्त षवश्व व्यक्त वाक्
(१). शु ि तम तम
(२). अकाय षपण्ड शब्द आषद
(३). अव्रण षछद्र, दोष अपूणवता, लु प्त शब्द।
(४). अस्नाषवरम् ऋषष (रस्सी) कारक आषद से सम्बन्ध
(५). शु द्ध षमश्रण अपूणव रूप
(६). अपापषवद्ध माया के आवरण शब्द, पद, वाक्य का पार्व क्य
६. शाश्वत विया-सृषष्ट् षनमाव ण का िम शाश्वत है । इसे अषवनाशी अश्वत्थ या अव्यय पुरुष कहा गया है । षनमाव ण िम
रूपी वृक्ष शाश्वत है , उसके पत्ते झड़ते रहते हैं , वे छन्द (सीमा) बद्ध षपण्ड हैं षजनका षनमाव ण-षवनाश होता रहता है ।
सृषष्ट् षनमाव ण का मू ल ऊध्वव या ऊपर कहते हैं , उसके प्रकार शाखायें हैं । मन में भी काम का मू ल सङ्कल्प है , षिया
उसकी शाखा है , पररणाम फल है । उसके बाद नये नये सङ्कल्प होते रहते हैं , कुछ पूरे होते हैं कुछ की वासना रह
जाती है जो आगामी जन्मों में पूरी होती है । इस वृक्ष को काटने से ही जन्म-मनव चि से मु स्तक्त होती है ।
ऊध्वव मूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दां षस यस्य पणाव षन यिं वेद स वेदषवत्॥१॥
अधश्चोध्वं प्रसृतािस्य शाखा गुणप्रवृद्धा षवषयप्रवालाः। अधश्च मू लान्यनु सन्तताषन कमाव नुबन्धीषन मनु ष्यलोके॥२॥
न रूपमस्ये ह तर्ोपलभ्यते, नान्तो न चाषदनव च सम्प्रषतष्ठा। अश्वत्थमे नं सुषवरूढ़मूलमसङ्गशस्त्रे ण दृढ़े न षछत्वा॥३॥
(गीता, अध्याय १५)
७. शाश्वत काव्य-षकसी तात्काषलक घटना का वणवन वाक्य है । उसकी व्यापकता का वणवन काव्य है । शाश्वत होना ही
काव्य का लक्षण है । भगवान् राम द्वारा काम मोषहत रावण को मारने से उनकी ख्याषत षचरथर्ायी है ।वाल्मीषक
रामायण - बालकाण्ड-सगव-२-मा षनषाद प्रषतष्ठां त्वमगमः शाश्वतीं समाः |
यत्क्रौिषमर्ु नादे कमवधीः काममोषहतम् || १४||
िौि वध घटना का शाश्वत रूप में वणवन स्कन्द पुराण में है -
शापोक्या हृषद सन्तप्तं प्राचेतसमकल्मषं । प्रोवाच वचनं ब्रह्मा तत्रागत्य सुसत्कृतः॥
न षनषादः स वै रामो मृ गयां चतुमाव गतः। तस्य संवणवनेन सुश्लोक्यस्त्ं भषवष्यषस॥
इत्युक्त्वा तु जगामाशु ब्रह्मलोकं सनातनः। ततः संवणवयामास राघवं ग्रन्थकोषटषभः॥
(स्कन्द पुराण, पाताल खण्ड, अयोध्यामाहात्म्य)
यहां - मा षनषाद = मायां लक्ष्मीं षनषीदषत, इषत रामः।
िौि षमर्ुन = रावण+ मन्दोदरी। अगमः = आगम + षनगम।
िौि षमर्ु न के समान सभी काममोषहत हो कर ईश्वर से दु ःख-दै न्यं पाते हैं । ऐसा होने से रावण जै सा सववषवजयी भी
नष्ट् हो जाता है । यह गार्ा शाश्वत है ।

ध्य


शश
या
्ा
शश



शश॥

शश


शश

शश


व्याख्या-
शशश
शश
र्
१.
-श ववद्या-अववद्या
शश
षवद्या
( षवद् धातु है षजसके ४ अर्व हैं । उसके अनु रूप ४ वेद हैं -मू षत्तव रूप ऋग्वे द, गषत रूप यजु वेद, मषहमा (प्रभाव)
शश

र्
रूप
अ सामवेद तर्ा स्तथर्र आधार या ब्रह्म रूप अर्वव वेद।
-शश
षकसी विु के ज्ञान के षलये ये ४ िम हैं -पहले षकसी विु की मू षत्तव होनी चाषहये (ऋक्), वहां से कुछ सूचना हम तक
(शश
शश
शश
पहुं

शश चे (गषत-यजु ), हम उस विु के प्रभाव सीमा (साम) में हों, तर्ा ये गषत-मू षत्तव-मषहमा स्तथर्र आधार या पररवेश
शश
शश ) से षभन्न हो।
(अर्वव
शश

शश

ऋग्भ्यो जातां सववशो मू षत्तव माहुः, सवाव गषतयाव जुषी है व शश्वत्।
शश
शशश
शशश

सवं तेजं सामरूप्यं ह शश्वत्, सवं हे दं ब्रह्मणा है व सृष्ट्म् ॥ (तैषत्तरीय ब्राह्मण,३/१२/८/१)

शश
शश
तत्त्व
शश वेद षवद् धातु का अर्व पाषणनीय धातुपाठ


मू
शषत्तव ऋक् षवद् सत्तायाम् (स्तथर्षत, ४/६०)

गषत यजु षवद् लृ लाभे (लाभ या प्रास्तप्त, ६/१४१)
शश



मषहमा साम षवद् ज्ञाने (ज्ञान, २/५७)
शश
पररवे
शश श अर्वव षवद् षवचारणे (७/१३) षवद् चेतनाख्यान षनवासेषु (१०/१७७)

शश

षचषकत्सक
श को सबसे अषधक ज्ञानी मानते र्े क्यों षक वह सबसे जषटल मनुष्य शरीर को समझता है । षवद्या होने के
शशश
कारण
शश उसे वैद्य कहते हैं । अंग्रेजी में भी डाक्टर का अर्व षचषकत्सक तर्ा ज्ञानी (शोध कत्ताव ) दोनों होता है ।
शशश

शश
अषवद्या

शश के २ अर्व हैं -अज्ञान या षवद्या का अभाव, अपरा षवद्या (षवद्या का वगीकरण) या षवज्ञान (षवकल्प या षवषशष्ट्
शश
ज्ञान।



शश
ज्ञानं
) तेऽहं सषवज्ञानषमदं वक्ष्याम्यशे षतः। यज्ज्ञात्वा ने ह भू योऽन्यज्ज्ञातव्यमवषशष्यते॥ (गीता, ७/२)
शश

अज्ञान-विु षनकट में है , दे खने समझने की शस्तक्त भी है , षकन्तु माया के आवरण कारण दीख नहीं रहा है । इस अर्व

शश

र) माया या उसके कारण मोह को भी अज्ञान कहा गया है । मोह के कारण बुस्तद्ध काम नहीं करती है ।
में
शश
शश
षत्रषभगु
शश वणमयैभाव वैरेषभः सववषमदं जगत्। मोषहतं नाषभजानषत मामे भ्यः परमव्ययम् ॥ (गीता, ७/१३)


शश

शशमां दु ष्कृषतनो मू ढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः। माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाषश्रताः॥ (गीता, ७/१५)

शश

यदा
श ते मोहकषललं बुस्तद्धं व्यषततररष्यषत। तदा गन्ताषस षनवेदं श्रोतव्यस्य श्रु तस्य च॥ (गीता, २/५२)
शश
षवज्ञान-वगीक ृ त ज्ञान को षवज्ञान कहते हैं । यही अपरा षवद्या है ।
शश


शश
मोक्षे धीज्ञाव नमन्यत्र षवज्ञानं षशल्पशात्रयोः (अमरकोष, १/५/६)

शश
शश षवद्या वगी करण तर्ा परा षवद्या ब्रह्म रूपी एकत्व है -द्वे षवद्ये वेषदतव्ये, इषत ह ि यद् ब्रह्मषवदो वदस्तन्त, परा चैव
अपरा




अपरा च। तत्रापरा ऋग्वे दो यजु वेद:, सामवेदो, अर्वववेद:, षशक्षा, कल्पो, व्याकरणं, षनरुक्तं , छन्दो ज्योषतषषमषत। अर्


रन यया तदक्षरमषधगम्यते। (मु ण्डकोपषनषद् , १/१/४, ५)
परा

अषवद्या
इ की पररभाषा के दोनों अर्व सम्भव हैं। योग सूत्र (२/३) में क्लेश के ५ भे द कहे हैं -अषवद्या, अस्तिता, राग, द्वे ष,


अषभषनवे
शश श। इनको ही सां ख्य योग में ५ प्रकार के तम कहा है -तम, मोह, महामोह, ताषमस्र, अन्ध।

शश


शश
शश
शश
शश
शश

शश

शश


तमो मोहो महामोहिाषमस्रो ह्यन्धसंज्ञकः। अषवद्या पिपवैषा सां ख्यषयगेषु कीषतवता॥ (षवष्णु पुराण, १/५/५)
यषद अषवद्या का अर्व अपरा षवद्या या षवज्ञान करें तो ये ५ िर षवज्ञान के ५ िम हैं-
१. अषवद्या-षवषयों या तर्थ्यों का षवभाजन।
२. अस्तिता-प्रषत तत्त्व की अलग-अलग पररभाषा तर्ा व्याख्या।
३. राग-अलग अलग तर्थ्यों में समानता खोज कर उनको एक वगव में करना (Generalization)। इसका अस्तन्तम रूप
पराषवद्या या षवद्या होगी, जै से स्वार्व का परम रूप परमार्व।
४. द्वे ष-अन्य वगव के तर्थ्यों से भे द षदखाना।
५. अषभषनवेश-षसद्धान्त स्तथर्र करना षजसके अनु सार नये तर्थ्यों को प्रमाषणत या अप्रमाषणत षकया जा सकता है।
यही अषवद्या या तम के भी िर हैं -अषवद्या = ज्ञान का अभाव, अस्तिता = स्वार्व के अनु सार सोचना, राग = षकसी के
प्रषत आकषव ण, द्वे ष-षवकषव ण, अषभषनवेश = एक ही मान्यता से बन्ध कर सोचने में असमर्व षजसे अन्ध भस्तक्त कहते
हैं ।
२. वगीकरण-ऋग्वे द में (१/१८) सूक्त के दे वता ब्रह्मणस्पषत हैं , (१०/७१) भी ज्ञान सूक्त है । इसमें एक मन्त्र को महषषव
दै वरात् ने गायत्री कल्पलता में धी योग का मू ल कहा है , जो गायत्री का तृतीय पाद है -
यिादृते न षसध्यषत यज्ञो षवपषश्चतध्वरम्। स धीनां योगषमन्वषत॥ (ऋक्, १/१८/७)
= षबना परम पुरुष में ध्यान षकये ज्ञाषनयों का भी यज्ञ षसद्ध नहीं होता। उसके एकमात्र लक्ष्य को ध्यान में रख कर मन
का संयोग कर उसकी प्रेरणा से प्रकाषशत करने पर ही उसका स्वरूप प्रकट होता है । यह धी योग है ।
अर्वव वेद शौनक शाखा का प्रर्म मन्त्र के भी वाचस्पषत दे वता हैं । यह ३ तर्ा ७ लोकों के षवभाजन के अनु सार
षवज्ञान में ३ और ७ के मु ख्य षवभाजन कहता है -
अर्वाव ऋषषः, वाचस्पषतदे वता। अनु ष्ट्टुप् छन्दः।
ये षत्रषप्ताः पररयस्तन्त षवश्वा रूपाषण षबभ्रतः। वाचस्पषतबवला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे ॥१॥ (अर्वव, शौनक संषहता)
आकाश में ३ धाम हैं-पूणव षवश्व, परमे ष्ठी, सौर मण्डल। तीनों में ३-३ लोक होने से ७ लोक हैं , बीच के २-२ लोक समान
हैं ।
अवम धाम-भू-पृथ्वी ग्रह
भु वः-ग्रह कक्षा
स्वः-सौर मण्डल
मध्यम धाम-भू -सौर मण्डल
भु वः-महलोक
स्वः-परमे ष्ठी-जनः लोक
परम धाम-भू-परमे ष्ठी
भु वः-तपः लोक
स्वः-स्वयम्भू -सत्य लोक
भागवत पुराण ने अन्य कई भेदों के अध्ययन द्वारा पूणव ज्ञान की प्रास्तप्त कहा है -
नवैकादश पि त्रीन् भावान् भूतेषु येन वै। ईक्षे तार्ै कमप्येषु तज्ञानं मम षनषश्चतम् ॥१४॥
एतदे व षह षवज्ञानं न तर्ै केन येन यत्। स्तथर्त्युत्पषत्तलयान् पश्येद् भावानां षत्रगुणात्मनाम् ॥१५॥
(भागवत पुराण, ११/१९/१४-१५)
अर्ाव त् जगत् का षवज्ञान समझने के षलये ९,११, ५, ३ का वगीकरण करना चाषहये और अन्त में एक ही मू ल तत्त्व को
अनु गत दे खना ज्ञान है ।
एकत्व-यह सभी ज्ञान का आधार है । इसके कई रूप हैं -षवज्ञान के षनयम हर थर्ान, समय एक ही हैं ।
सभी भाषाओं में शब्दों के अर्व सबके षलये समान हैं , नहीं तो कोई षकसी की बात नहीं समझेगा।
सभी प्राणी, या षनजीव भी मू ल तत्त्व के अनु सार एक ही हैं ।
समन्वय् से ही ज्ञान होता है (ब्रह्म सूत्र के प्रर्म ४ सूत्र)।
षद्वत्व-कई युग्ों में अध्ययन होता है -
स्रष्ट्ा-सृषष्ट् (उसमें भी स्रष्ट्ा है ), अषग्न-सोम, पुरुष-प्रकृषत, वृषा-योषा, दे व-दे वी, षवद्या-अषवद्या, सिर-प्रषतसिर आषद।
षत्रत्व-३ गुण, तकव की ३ पद्धषत, ज्ञान-ज्ञे य-पररज्ञाता, ज्ञान-कमव-कताव ।
चतुष्पाद-४ प्रकार के पुरुष-क्षर, अक्षर, अव्यय, परात्पर। इनके ४ प्रकार के काल-षनत्य, जन्य, अक्षय, परात्पर। त्रयी
षवभाजन से ४ वेद= १ मू ल + ३ शाखा।
पि पवव-षवश्व के ५ पवव, ५ यज्ञ, अषवद्या के ५ पवव।
६ दशव न तर्ा ६ दशव वाक्।
७-७ लोक, राज्य के ७ तत्त्व (आधुषनक राजनीषत में कोष, दु गव, पुरोषहत = संषवधान और न्याय) नहीं होने के कारन वे
अपूणव हैं ।
९ द्रव्य वैशेषषक दशव न में ।
१० महाषवद्या, १० आयाम (रे खा, पृष्ट्, आयतन, पदार्व , काल, चेतना, ऋषष, नाग, रन्ध्र, आनन्द)
३. तम और अन्ध तम-मोह के ५ िरों के रूप इनका वणवन षकया गया है । जीवन काल में यह बुस्तद्ध के आवरण हैं
षजनको मोह कहा गया है । तम में र्ोड़ा दीखता है , अन्ध तम में षबल्कुल नहीं दीखता। उससे भी अषधक तम वह है
षजसमें अन्ध तम से बाहर षनकलने का मागव नहीं सूझता। मृ त्यु के बाद आत्मा की गषत भी वैसी ही होती है । जो मोह
या अषवद्या से ग्रषसत हैं , वे अन्धकार में जाते हैं । इनको छाया-आतप (धूप) भी कहा है ।
ऋतं षपबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रषवष्ट्ौ परमे पराधे ।
छायातपौ ब्रह्मषवदो वदस्तन्त पिाग्नयो ये च षत्रणाषचकेताः ॥ (कठोपषनषद् १/३/१)
तम या तामस गुण का अर्व ही अन्धकार है । सत्त्व गुण वाले उत्तम लोकों में जाते हैं । रजोगुण वाले मध्य में जाते हैं
तर्ा तमो गुन वाले षनम्न लोकों में । उसके बाद पुनजव न्म भी मू ढयोषन में ही होता है । गीता, अध्याय १४ में इसका
षविृ त वणवन है।
अप्रकाशोऽप्रवृषत्तश्च प्रमादो मोह एव च। तमस्ये ताषन जायन्ते षववृद्धे कुरुनन्दन॥ (गीता, १४/१३)
ऊध्वं गच्छस्तन्त सत्त्वथर्ा मध्ये षतष्ठस्तन्त राजसाः। जघन्य गुणवृषत्तथर्ा अधो गच्छस्तन्त तामसाः॥ (गीता, १४/१८)
४. मृत्यु और अमृत-संसार में जो भी उत्पन्न हुआ है , उसका नाश होना ही है ।
जातस्य षह ध्रुवोमृव त्युध्रुववं जन्म मृ तस्य च। (गीता, २/२७)
अपेक्षाकृत कम आयु को मृ त्यु तर्ा अषधक आयु की रचना को अमृ त कहते हैं । पूणव अमृ त तो परब्रह्म ही है ।
मनु ष्य की पूणव आयु १०० वषव है यद्यषप कुछ व्यस्तक्त इससे अषधक समय भी जीषवत रहते हैं । अतः १०० वषव तक जीवन
भी अमृ त है ।
य एव शत्ं वषाव षण यो वा भू यां षस जीवषत स है वैतदमृ तमाप्नोषत। (शतपर् ब्राह्मण, १०/२/६/८)
एतद् वाव मनु ष्यस्यामृ तत्वं यत् सववमायुरेषत। (ताण्ड्य महाब्राह्मण, २२/१२/२, २५/१२/३)
आकाश में सौर मण्डल से बड़ी रचना अमृ त है , सौरमण्डल के अंश मत्यव हैं -
आकृष्णे न रजसा वतवमानः षनवेशयन्नमृ तं मत्यं च। षहरययेन सषवता रर्े ना दे वो याषत भु वनाषन पश्यन् ॥
(ऋक्, १/३५/२, वाज. सं. ३३/४३, ३४/३१, तैषत्तरीय सं. ३/४/१/२, मै त्रायणी सं. १९६/१६)
पुराण में सौरमण्डल के भू , भुवः स्वः को कृतक (बनने -षमटने वाले) तर्ा जनः, तपः, सत्य को अकृतक (थर्ायी) कहा
है । बीच में महलोक है ।
पादगम्यन्तु यस्तत्कषिद्वस्त्स्ति पृषर्वीमयम् । स भू लोकः समाख्यातो षविरोऽस्य मयोषदतः॥१६॥
भू षमसूयाव न्तरं यच्च षसद्धाषद मु षनसेषवतम् । भु वलोकिु सोऽप्युक्तो षद्वतीयो मु षनसत्तम॥१७॥
ध्रुवसूयाव न्तरं यच्च षनयुताषन चतुदवश। स्वलोकः सोऽपु गषदतो लोकसम्सथर्ान षचन्तकैः॥१८॥
त्रै लोक्यमे तत् कृतकं मै त्रेय पररपठ्यते। जनिपिर्ा सत्यषमषत चाकृतकं त्रयम् ॥१९॥
कृतकाकृतकयोमव ध्ये महलोक इषत िृतः। शू न्यो भवषत कल्पान्ते योऽत्यन्तं न षवनश्यषत॥२०॥
(षवष्णु पुराण, २/८)
मू ल तत्त्व अप् का षविार य कई िर के समु द्र हैं , षजससे कई िर के लोक बनते और षमटते रहते हैं । अतः अप् को
अमृ त और उससे जो मु क्त हुआ वह मृ त्यु है । अलग होने को मु च्यु कहा है , मु च्यु से मृ त्यु हुआ है -
स समु द्रादमु च्यत स मु च्युरभवत् तं वा एतं मु च्युं सन्तं मृ त्युररत्याचक्षते परोक्षे ण। (गोपर् ब्राह्मण,पूवव, १/७)
जन्म-मरण के चि रूप में सभी प्रकार के संवत्सर भी मृ त्यु हैं -
एष वै मृ त्युयवत् संवत्सरः। एष षह मत्याव नां अहोरात्राभ्यां आयुः षक्षणोत्यर् षियन्ते। (शतपर् ब्राह्मण, १०/४/३/१)
५. मृत्यु पार करना-केवल एकत्व के ज्ञान से जीवन नहीं चलता है । उसके षलये कमव भी करना पड़ता है षजसके षलये
कई प्रकार की अषवद्या जानना जरूरी है । अपनी जरूरत की चीजें यज्ञ द्वारा उत्पादन के षलये प्रजापषत ने कहा र्ा।
कमव नहीं कर दू सरों के उत्पादन पर षनभव र करना एक प्रकार की चोरी है। अतः पूणव ज्ञान होने पर भी दै षनक कतवव्य
करते रहना चाषहये जै सा भगवान् कृष्ण स्वयं करते र्े।
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरो वाच प्रजापषतः। अने न प्रसषवष्यध्वमेष वोऽस्तस्त्ष्ट्कामधुक्॥ (गीता, ३/१०)
नमे पार्ाव स्ति कतवव्यं षत्रषु लोकेषु षकिन। नानवाप्तमवाप्तव्यं वतव एव च कमव षण॥ (गीता, ३/२२)
उत्सीदे युररमे लोका न कुयां कमव चेदहम् (गीता ३/२४)
हमको प्रकृषत तर्ा दे वों से कई चीजें प्राप्त हुयी हैं । उन थर्ायी चीजों को लौटाना धमव है । वैसा नहीं करना चोरी है ।
इष्ट्ान् भोगान् षहवो दे वा दास्यन्ते यज्ञभाषवताः। तैदवत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते तेन एव सः॥ (गीता, ३/१२)
अपने जीवन यापन के अषतररक्त कुछ चीजें भषवष्य के षलये छोड़ दे नी चाषहये जै से हमको षमली र्ी। यह सनातन
ज्ञान षवद्या है षजससे मनुष्य अमर होता है ।

ध्य


शश

या
्ा
शश



शश


शश

र्

-त

शश



शश
-शश
व्याख्या-इसक
र् े पूवव के ३ मन्त्रों में ज्ञान के २ रूपों षवद्या-अषवद्या के समन्वय के बारे में कहा है । यहां कमव के दो रूपों



-श े समन्वय के बारे में कहा है। षवश्व में २ षवपरीत षियाओं के समन्वय के बारे में पस्तण्डत मधुसूदन ओझा ने संशय
शश
शशश
तदु
शशच्छेद वाद के आरम्भ में षलखा है -
शशश
शश
र्
यदस्ति षकषित् तषददं प्रतीमोऽषवचाषल शश्वत्स्र्मनाद्यनन्तम्।
शश
शश
-श
प्रषतक्षणान्याय-षवकार-सृ
शश
श षष्ट्-प्रवाहवत् तद् षद्वषवरुद्धभावम् ॥१॥

शश
षवरुद्धभावद्वयसं
न षनवे श त् सम्भाव्यते षवश्वषमदं षद्वमूलम् ।

आभ्वभ्व
रश

शश
च संज्ञे ि इमे च मूले द्रष्ट्ाभु दृश्यं तु मतं तदभ्वम् ॥२॥
=
शश जो कुछ षवश्व में है वह २ रूपों में प्रतीत होता है -एक स्तथर्र, अनाषद, अनन्त है । दू सरा प्रषतक्षण षवकार और सृषष्ट्


प्रवाह
शश

शश
स में बदल रहा है। २ षवरुद्ध भावों के एक सार् रहने से षवश्व के २ मू ल हैं-एक आभु (षनत्य) तर्ा दू सरा अभ्व

शश
(अषनत्य
शश सृषष्ट् है )।
शश
रश
शश

शश
शश


शश

शश

शश

शशश

शश

शश


कई प्रकार की षवपरीत षियायें या उनके नाम हैं -
१. सृवि-प्रिय-सृषष्ट् के ९ सगव हैं । सबके षनमाव ण-षवनाश के चि अलग अलग अवषध के हैं , षजनसे काल के ९ प्रकार
के मान हैं ।
अव्यक्ताद् व्यक्तयः सवे प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रै वाव्यक्त संज्ञके ॥ (गीता ८/११)
यहां अव्यक्त एक ही है , व्यक्त के ९ सगव हैं ।
इत्येते वै समाख्याता नव सगाव ः प्रजापतेः (षवष्णु पुराण, १/५/२५)
भागवत पुराण (३/१०) में मू ल अव्यक्त को षमला कर १० सगव कहे गयेहैं-
यर्े दानीं तर्ाग्रे च पश्चादप्येतदीदृशम् ॥१२॥ सगो नवषवधिस्य प्राकृतो वैकृतिु यः॥१३॥
दशै ते षवदु राख्याताः सगाव िे षवश्वसृक्कृताः॥२८॥
ब्राह्मं षपत्र्यं तर्ा षदव्यं प्राजापत्यं च गौरवम् । सौरं सावनं चान्द्माक्षं मानाषन वै नव ॥ (सूयव षसद्धान्त १४/१)
२. सम्भूवत-असम्भूवत या षनमाव ण-षवनाश-हर सगव में षनमाव ण-षवनाश सदा चल रहा है । आकाश में कहीं ग्रह-नक्षत्र
बन रहे हैं , कहीं नष्ट् हो रहे हैं । पृथ्वी पर सदा कुछ मनु ष्य जन्म ले रहे हैं , कुछ मर रहे हैं ।
३. सञ्चर-प्रवतसञ्चर-यह सां ख्य दशव न का शब्द है जो तत्त्व समास (६) में है । सिर = गषत, षनमाव ण षदशा। प्रषतसिर
= षवपरीत गषत, षवनाश, प्रलय या मृ त्यु।
सबसे बड़ा चि है , षवश्व की सृषष्ट् प्रलय का चि जो ब्रह्मा का षदन या कल्प कहलाता है । यह १००० युग = ४३२
कोषट वषव का है ।
सहस्र युग पयवन्तं अहयवद् ब्रह्मणो षवदु ः। राषत्रं युग सहस्रान्तां तेऽहोरात्रषवदो जनाः॥ (गीता, ८/१७)
षवश्व की सभी षियायें चि हैं या चिों का समन्वय हैं । शरीर का चि-नाड़ी स्पन्दन, श्वास-प्रश्वास, पाचन कमव
(अपचय), जीवन मरण आषद हैं । हर शस्तक्त थर्ानीय या गषतशील तरं ग का कम्पन है । ताप द्वारा कण अपने ही थर्ान
पर कम्पन करते हैं । शब्द या षवद् युत्-चुम्बकीय तरं ग उद्गम से आगे बढ़ते जाते हैं , षजसके कारण मागव के कण
चिीय गषत करते हैं । षदन-रात भी प्रकाश-अन्धकार (रूप-तन्मात्रा) या सृषष्ट्-प्रलय का चि है । उसके कारण मनु ष्य
में जागरण-षसषु स्तप्त (मन-इस्तन्द्य) का चि है । समय के सभी माप षदन, वषव (ऋतु चि), युग-सभी सृषष्ट्-प्रलय के चि
हैं ।
४. आध्यात्मत्मक अथम-षवनाश या प्रलय अर्व होने से यह नहीं समझना चाषहये षक प्रषतसिर अवाञ्छनीय है । शरीर
की पुषष्ट् के षलये भोजन ले ते हैं। उसका षनष्कासन भी जरूरी है । व्यापक रूप में इसका शरीर के भीतर अर्व है -
अपाने जु ह्वषत प्राणोऽपाने तर्ापरे । प्राणापानगती रुद्धा प्राणायाम परायणाः॥१९॥
अपरे षनयताहाराः प्राणान्ाणेषु जु ह्वषत। सवेप्येते यज्ञषवदो यज्ञक्षषपत कल्मषाः॥२०॥ (गीता, ४/१९-२०)
= अन्य लोग प्राण को अपान में तर्ा अपान को प्राण में हवन करते हैं । कई प्राण या अपान की गषत को षनयस्तन्त्रत
कर प्राणायाम करते हैं । यह सभी यज्ञका ठीक रूप कर रहे हैं , षजससे उनके षवकार नष्ट् हो रहे हैं ।
प्राण ५ (+ २ असत्) प्रकार के हैं , शरीर (कोष) ७ प्रकार के हैं , तर्ा षवकार १६ प्रकार के हैं । इस प्रकार इन यज्ञों के
कई प्रकार के अर्व हैं । अन्नमय कोष के षलये प्राण का अर्व है अन्न से प्राप्त होने वाली शस्तक्त। भोजन के रूप में जो
प्राण आता है , उसका अवषशष्ट् अंश मल के रूप में नष्ट् होता है । इस प्रकार अन्न का षवकार नष्ट् हो गया। अन्नमय
प्राण ग्लूकोज, वसा अषद के रूप में शरीर में सषित रहता है । वह प्राण का अपान में हवन है । जब शरीर की इस्तन्द्यां
काम करती हैं , तो सषित शस्तक्त खचव होती है , जो अपान का प्राण में हवन है । इससे शरीर स्वथर् और षियाशील
रहता है तर्ा कायव का मल काबवन डायिाइड केरूप में बाहर षनकलता है । वसा का कम होना भी मल षनकलना
है ।
५. आविभौवतक अथम-कई प्रकार के यज्ञों से पररवार, समाज तर्ा दे श का षनमाव ण होता है । इससे सबका जीवन
चलता है या पालन होता है । अर्ाव त् सम्भू षत से मृ त्यु को पार करते हैं । पर इसमें जो अवास्तञ्छत पदार्व या मल उत्पन्न
होता है उसे भी नष्ट् करना जरूरी है । इसके अषतररक्त आन्तररक तर्ा बाह्य शत्रु ओं से रक्षा के षलये उनका षवनाश
भी जरूरी है । इसषलये भगवान् ने गीतामें धमव पालन के षलये युद्ध का आदे श षदया र्ा।
६. सम्भूवत में असम्भूवत और असम्भू षत में सम्भू षत-इसी प्रकार गीता में कहा है , कमव में अकमव और अकमव में कमव ।
कमव यकमव यः पश्ये दकमव षण च कमव यः। स बुस्तद्धमान्मनु ष्येषु स युक्तः कृत्स्नकमव कृत्॥ (गीता, ४/१८)
कमव द्वारा विु की स्तथर्षत में पररवतवन होता है । पररवतवन उसी का होगा षजसमें थर्ाषयत्व नहीं है , अर्ाव त् उसका पुनः
पररवतवन हो कर नाश षनषश्चत है । अतः कमव में अकमव या षनमाव ण में षवनाश का बीज षछपा हुआ है । इसी षलये कहा
है -जातस्य षह ध्रुवोमृव त्युध्रुववं जन्म मृ तस्य च। (गीता, २/२७)
ब्रह्म का अकमव रूप सनातन है , कमव रूप मृ त्यु है ।
शरीर नाशवान् है , पर उसके भीतर का द्रष्ट्ा आत्मा अमर है।
इसी प्रकार मृ त्यु में भी चेतन द्रष्ट्ा रूप ब्रह्म षवराजमान है । षवश्व का मूल तत्त्व रस हर थर्ान पर ज्यों कात्यों रहत है ।
रसो वै सः (तैषत्तरीयोपषनषद् , २/७/२)
शतपर् ब्राह्मण इसी यजुवेद की व्याख्या है षजसमें कहा है -
तदे ष श्लोको भवषत। अन्तरं मृ त्योरमृ तम् -इषत। अवरं ह्येतन्मृ त्योरमृ तम् । मृ त्यावमृ तमाषहतम् -इषत। एतस्तिन् षह पुरुष
एतन्मण्डलं प्रषतषष्ठतं तपषत। मृत्युषवववस्वन्तं विे -इषत। (शतपर् ब्राह्मण, १०/५/२/४)
= इसके षवषय में श्लोक है -मृ त्यु के भीतर अमृ त है । मृ त्यु से नीचे अमृ त है (नाशवान् के बाद अमृ त दीखता है )। मृ त्यु
द्वारा अमृ त ढं का हुआ है । उसी के मण्डल में पुरुष तपता है । षववस्वान् (सूयव) में मृ त्यु बसता है ।
अध्याय ११-ईशावास्योपवनषद, मन्त्र १५
शश

शश
व्याख्या-१.

र आशय- इस का सामान्य अर्व है षक मनुष्य षहरय (स्वणव , धन) के लोभ में पड़ कर सत्य नही ं दे ख पाता। धन रूपी

शश का आवरण हटाने पर ही सत्य दीखता है । कठोपषनषद् में धन तर्ा अन्य षप्रय विु ओं को षवत्त-मयी सृ ङ्का (धन की
माया
शश
श ् खला, बे ड़ी) कहा है -
शृङ

श त्वं षप्रयान् षप्रयरूपाश्च कामा-नषभध्यायिषचकेतोऽत्यस्राक्षीः।

नै
ष ता सृ ङ्कां षवत्तमयीमवाप्तो, यस्यां मज्जस्तन्त बहवो मनुष्याः॥ (कठ उप. २/३)
शश
प्रायः लोग इस अषवद्या के आवरण में रह कर भी अपने को धीर और पस्तण्डत मानते हैं और अपने ज्ञान का प्रचार करते हैं (ढोल
शश

पीटते हैं )। वे चि में घू मते रहते हैं (एक दू सरे को उद् धृ त करते हैं , मूल को नही-ं ऑिफोडव अनुसन्धान की तरह), जैसे एक


अन्ध दू सरे को रािा षदखाता है ।
।अषवद्यायामन्तरे वतव मानाः, स्वयं धीराः पस्तण्डतिन्यमानाः।
शश
दन्द्म्यमानाः पररयस्तन्त मूढ़ा, अन्धे नैव नीयमाना यर्ान्धाः॥

शश
(कठोपषनषद् , २/५, मु ण्डकोपषनषद् , १/२/८)
शश
शश पूषा, सत्य-धमव के कई अर्व हैं ।
षहरय,

२. वहरण्य-रमणीय, षहरम्य से षहरय-यह यम द्वारा कहा षप्रय विु ओं का बन्धन है ।


तद्यस्य
ण (प्रजापते ः) एतस्यां रम्यायां तन्वां दे वा अरमन्त, तिाद् षहरम्य षहरय ह वै तद् षहरयं इत्याचक्षते परोऽक्षम्। (शतपर्
ब्राह्मण, ७/४/१/१६)
शश
आकाश
स में सृ षष्ट् का मू ल षहरय या ते ज पुञ्ज र्ा। उससे जो लोक बने वे रजस् (गषतशील) या रजत (चान्दी)हैं और अस्तन्तम आधार

तम या ताि (ताम्बा है )। अस्तन्तम िर पृथ्वी पर पद रखते हैं , अतः इसे पद से उत्पन्न या पद्म कहा है ।
शश
षहरयगभव ः समवतव ताग्रे भू तस्य जातः पषतरे क आसीत् । स दाधार पृषर्वीं द्यामुतेमां किै दे वाय हषवषा षवधे म॥

(ऋक
शश ् १०/१२१/१, वाजसनेयी यजु वेद १३/४, २३/१, अर्वव ४/२/७)


शश

शश
शश
शश
इमे वै लोका रजां षस। (यजुवेद ११/६, शतपर् ब्राह्मण ६/३/१/१८)
द्यौः वै तृ तीयं रजः। (शतपर् ब्राह्मण ६/७/४/५)
मृत्युः वै तमः। (शतपर् ब्राह्मण १४/४/१/३२, गोपर् ब्राह्मण, उत्तर ५/१)
पररमण्डलः (गोलाकारः) उ वाऽअयं (पृषर्वी) लोकः। (शतपर् ब्राह्मण ७/१/१/३७)
सौर मण्डल में सू यव का ते ज षहरय है , चन्द् से परावषतव त रजस् तर्ा सू यव ते ज की सीमा शषन ताि है जो १००० सू यव व्यास दू री पर
है । अतः सू यव को सहस्रां शु कहते हैं । पृ थ्वी को लौह कहा है । सोना, चान्दी, ताम्बा को रसायन षवज्ञान में उत्तम धातु (Noble
metals) कहते हैं । सू यव के स्वर् लोक जैसा-स्वणव , सोमो राजा जैसा रजत या चन्द् जैसा चान्दी, अयं लोक (पृथ्वी) से अयस् =
लौह।
षदवस्त्ा पातु हररतं मध्यात्त्वा पात्वजुवनम्। भू म्या अयियं पातु प्रागाद्दे वपुरा अयम्॥ (अर्वव , ५/२८/९)
= सु वणव (हररत) ते री द् यु लोक से रक्षा करे , रजत (अजुवन = श्वे त) अन्तररक्ष से रक्षा करे , लोहा (अयस् ) भू षम थर्ान से रक्षा करे ।
चन्द् या मध्य लोक रजत-एतत् (रजतं ) राषत्र रूपम्। (ऐतरे य ब्राह्मण, ७/१२)
अन्तररक्षस्य रजताः (तै षत्तरीय ब्राह्मण, ३/९/६/५)
सोमो राजा चन्द्माः (शतपर् ब्राह्मण, १०/४/२/१, कौषीतषक ब्राह्मण, ४/४/७/१०)
सू यव की १००० रस्तश्म के बाद ताि-
यु क्ता ह्यस्य (इन्द्स्य) हरयः शतादशेषत । सहस्रं है त आषदत्यस्य रश्मयः (इन्द्ः=आषदत्यः)
(जैषमनीय उपषनषद् ब्राह्मण १/४४/५)
असौ यिािो अरुण उत बभ्रु ः सु मङ्गलः । ये चै नं रुद्रा अषभतो षदक्षु षश्रताः सहस्रोऽवै षां हे ड ईमहे ॥ (वा.यजु.१६/६)
लौह पुरी पृथ्वी-
(असु राः) अयियी ं (पुरं) अस्तिन् (पृथ्वी लोके ऽकुवव त)। (कौषीतषक ब्राह्मण ८/८)
ते (असु राः) वा अयियीमेवेमां (पृषर्वी)ं अकुवव त। (ऐतरे य ब्राह्मण १/२३)
अयियी पृषर्वी। (गोपर् ब्राह्मण, उत्तर २/७)
अस्य वै (भू -) लोकस्य रूपमयिर्य्ः (सू च्यः)। (तै षत्तरीय ब्राह्मण ३/९६/५)
पृथ्वी पर भी आकाश के पुरों जै से क्षे त्र हैं । असु रों ने स्वणव -रजत-लौह की ३ पुरी बनायी र्ी। इनका षमलन थर्ान षत्रपुरी (षलषबया
में षत्रपोली) र्ा। भारत में भी इस नाम के कई थर्ान हैं -षत्रपुराराज्य, षत्रपुरी, जबलपुर के १५ षक.मी. पषश्चम ते वर आषद।
साधारणतः षवषुव के षनकट अन्ध या लौह भाग, मध्य में रजत तर्ा उत्तर में स्वणव भाग हैं ।
उत्तर अफ्रीका में मुर-दे श। मुर = लौह अयस्क, मुरवम। मोरक्को के षनवाषसयों को मुर कहते हैं । यहां के राजा को भगवान् कृष्ण
ने मारा र्ा, अतः उनको मुरारर कहते हैं । भारत का दषक्षण भाग आन्ध्र (अन्ध) तषमल (तम) है । ब्राजील का अर्व षहब्रू में लौह होता
है ।
मेस्तिको का सं स्कृत में माषक्षक = रजत होता है । दषक्षण में भी अजेण्टाइना को ग्रीक में रजत (अजे ण्टम) कहते हैं ।
भारत के उत्तर हे मकूट (षहमालय) या जम्बू द्वीप का भी उत्तरी भाग षहरण्वान् है -श्वे तं तदु त्तरं वषं षपत्रा दत्तं षहरण्वते ॥ (षवष्णु पुराण
२/१/२०)
षहम का अर्व बफव है पर है म का अर्व स्वणव भी है ।
यू रोप में भी भू मध्य सागर के षनकट मुर (लौह) क्षे त्र है । मध्य में षश्वत्र (स्तस्वट् जरलै ण्ड) या भु वर् (बवे ररया) है । उत्तर भाग में स्वगव
(स्वीडे न का थर्ानीय नाम) है ।
इन क्षे त्रों या िरों की सीमा में नही ं बन्ध कर अर्ाव त् षबना पक्षपात के मूल सत्य दे खना चाषहये ।
३. पूषा-पूषा का शास्तब्दक अर्व है जो पोषण करे या पुष्ट् करे । इसके षजतने साधन या स्रोत हैं उनको भी पूषा कहा गया है ।
पुषष्ट्वै पूषा (तै षत्तरीय ब्राह्मण, २/७/२/१, शतपर् ब्राह्मण, ३/१/४/९)
इयं वै पृषर्वी पू षा (शतपर् ब्राह्मण, २/५/४/७, ३/२/४/१९)
(वाज. यजु. ३८/३, १५)-अयं वै पूषा योऽयं (वातः) पवतऽ एष हीद सवं पुष्यषत। (शतपर् ब्राह्मण, १४/२/१/९)
पूष्णो रे वती (नक्षत्रम्)। गावः परिाद् वत्सा अविात् । (तै षत्तरीय ब्राह्मण, १/५/१/५)
तस्य (पूष्णः) दन्तान् परोवाप तिाद् आहुः अदन्तकः पूषा करम्भ भाग इषत। (कौषीतषक ब्राह्मण, ६/१३)
यहां सवव ज्ञ (षवश्ववे दा) अर्व में पू षा से प्रार्व ना की गयी है षक वह हमें सत्य धमव षदखायें । स्वस्ति वाचन में इसी पूषा को सम्बोषधत
षकया गया है -स्वस्ति नः पू षा षवश्ववे दा (ऋक्, १/८९/६, वाज. यजु. २५/१९)
षवश्ववे दा जैसे अर्व में यह अस्तन्तम नक्षत्र रे वती का स्वामी है । इस नक्षत्र में ३२ तारा हैं , षजतने मनु ष्य के दां त होते हैं । दक्ष यज्ञ में
वीरभद्र द्वारा दक्ष के दां त तोड़े गये र्े षजसके बाद षशव के आशीवाव द से वे यजमानों के दां त से ही षपष्ट् (पीसा हुआ) अन्न खाते हैं
(भागवत पुराण, ४/५/२१, ४/७/४)
रे वती नक्षत्र में जब सू यव रहता है तब सू यव का नाम पूषा होता है (कूमव पुराण, ४३/१९)। सू यव नमस्कार में भी यह नाम पढ़ा जाता है ।
वामन के षवराट् रूपमें पू षा भ्रू (भौंह) पर है (मत्स्य पुराण, २४६/५८)। यह आवरण हटने पर आं ख से दीखता है ।
४. सत्य-िमम -षहरयगभव ही मूल सत्य है षजससे अन्य सत्य उत्पन्न हुये । इसे सत्यस्य सत्य कहा गया है । एक षत्रसत्य है -नाम, रूप,
गु न से सत्य या प्रत्यक्ष, अनु मान, प्रमाण से सत्य। इसके अषतररक्त ७ प्रकार के सत्य हैं , जो भगवान् कृष्ण के स्वरूप ब्रह्मा द्वारा
कहे गये हैं -
सत्यव्रतं सत्यपरं षत्रसत्यं सत्यस्य योषनं षनषहतं च सत्ये।
सत्यस्य सत्यं ऋत-सत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपद्ये॥ (भागवत पुराण, १०/२/२६)
षहरयगभव रूप आवरण को हटा कर उस परम सत्य रूपी ब्रह्म को दे खना ही चरम लक्ष्य है ।
सत्य के ३ भाग इसके अक्षरों में हैं -पहले सत्ता (स्तथर्षत) दीखती है , वह ’स’ है । उसके बाद पता चलता है षक इसमें क्या नही ं है ,
यह अनृत (ऋत् का अभाव) ’त् ’ (ती) है । दोनों का षवचार करने पर ’य’ पूणव सत्य का ज्ञान है ।
ते दे वाः सत्यमेवोपासते तदे तत् त्र्यक्षर सत्यषमषत स इत्येकमक्षरं तीत्येकमक्षरं यषमत्येकमक्षरं प्रर्मोत्तमे अक्षरे सत्यं मध्यतोऽनृतं
तदे तत् अनृतं उभयतः सत्येन पररगृ हीतं सत्य भू यमेव भवषत नैवं षवद्वासमनृत षहनस्ति॥ (बृ हदारयक उपषनषद् , ५/५/१)
सत्य सत्ता है , धमव धारण करता है (व्यस्तक्त, समाज, दे श को)। दोनों के ज्ञान से पोषण होता है षजसका कत्ताव पू षा है ।
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म (तै षत्तरीय उपषनषद् , २/१/१)
सत्यं षप्रयषहतं च यत् (गीता, १७/१५)
धारणाद्धमवषमत्याहुधव मो धारयते प्रजाः। यत् स्याद् धारणसं युक्तं स धमव इषत षनश्चयः॥ (महाभारत, कणव पवव , ६९/५८, शास्तन्त पवव ,
१०९/११)

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३. यम-सूयव-ये दोनों षवपरीत तत्त्व हैं । सूयव का अर्व जन्म दे ना, उत्पन्न करना। यम का अर्व है मृ त्यु। एक षनमाव ण केन्द्
द, दू सरा लय का केन्द्। इनके बीच का सूत्र एकषषव , पूषा या अषत्र है षजससे सृषष्ट् तर्ा उसका पालन हो रहा है । सृषष्ट्
शशश

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शश


पालन का काम प्रजापषत का है । सूयव स्रष्ट्ा या कत्ताव रूप है, यम षनयमन रूप है । मनु ष्य शरीर में यह आत्मा और
जीव हैं , षजनको २ सुपणव पक्षी कहा गया है । षवराट् सृषष्ट् में भी एक कत्ताव रूप है षजसे क कहते हैं । दू सरा साक्षी रूप

शश



है षजसे वृक्ष कहा है। षनमाव ण के िम रूप में भी यह वृक्ष है ।
शश




लश
रत
त सुपणाव सयुजा सखाया समानं वृक्षं पररषस्वजाते। तयोरन्यः षपप्पलं स्वादु -अषत्त अनश्नन् अन्यो अषभचाकषीषत॥
द्वा

शश


(ऋक
- ् १/१६४/२०, अर्वव ९/९/२०, श्वे ताश्वतर उपषनषद् ४/६, मु ण्डक उपषनषद् ३/१/१)

शश



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शश



य परं नापरमस्ति षकषित्, यिान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कषश्चत्।

ईक्ष इव िब्धो षदषव षतष्ठत्येनेदं पूणं पुरुषे ण सववम्॥ (श्वे ताश्वतर उपषनषद् ३/९)
वृ
शश






किै
शशश

शश
-क


ह दे वाय हषवषा षवधेम (वाज. यजु. १२/१०२) प्रजापषतवै कः (ऐतरे य ब्राह्मण, २/३८)

ख प्राण रूप है -


शशश


त१शश
रव
शशश वाव कः (जै षमनीय उपषनषद् ४/२३/४०)
प्राणो
शश
.श



उसकी
(न
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रशश गषत र् (रषव, अषग्न तत्त्व) से म (लय, तत्त्व) तक, होती है , अतः इसे रं कहते हैं -
रकारं
शश

र।त



म अषग्नबीजं (ध्यानषवन्द्दु उपषनषद् , ९५) मकारे तु लयं प्राप्ते (ध्यानषवन्द्दु उप. १२)
मनु
शशश
रशशय

-न
शशष्य आवरण
में यही)रंशश रूप है , षवराट्
ब्रह्मसशशबशशध पुरुष में इसे सूयव से यम तक गषत वाला पूषा कहते हैं ।
समशश।
१शशश
वश
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४. ववश्व और व्यत्मि पु रुष-दोनों एक नहीं हैं , एक जै से हैं । अतः दोनों को पुरुष ही कहते हैं । पुरुष सूक्त में पुरुष के
सभी िरों का वणवन है ।
(१) पूरुष = ४ पाद का मूल स्वरूप, (२) सहस्रशीषव-उससे १००० प्रकार के सृषष्ट् षवकल्प या धारा, (३) सहस्राक्ष =हर
थर्ान अक्ष या केन्द् मान सकते हैं , (३) सहस्रपाद-३ िरों की अनन्त पृथ्वी, (४) षवराट् पुरुष-दृश्य जगत् षजसमें ४
पाद में १ पाद से ही सृषष्ट् हुई। १ अव्यक्त से ९ प्रकार के व्यक्त हुए षजनके ९ प्रकार के कालमान सूयव षसद्धान्त
(१५/१) में षदये हैं । अतः षवराट् छन्द के हर पाद में ९ अक्षर हैं । (५) अषधपूरुष (६) दे व, साध्य, ऋषष आषद, (६) ७
लोक का षोडषी पुरुष, (७) सववहुत यज्ञ का पशु पुरुष, (८) आरय और ग्राम्य पशु, (९) यज्ञ पुरुष (१०) अन्तयाव मी
आषद।
पुरुष की सभी पररभाषा मधुसूदन ओझा जी ने श्लोकों में दी हैं -
पुरु व्यवस्यन् पुरुधा स्यषत स्वतितः स उक्तः पुरुषश्च पूरुषः।
पुरा स रुष्यत्यर् पूषुवरुच्यते स पूरुषो वा पुरुषिदु च्यते। धी प्राणभू तस्य पुरे स्तथर्तस्य सववस्य सवाव नषप पाप्मनः खे।
यत्सववतोऽिादषप पूवव औषत् स पूरुषिे न मतोऽयमात्मा॥ स व्यक्तभू ते वसषत प्रभू ते शरीरभू ते पुरुषितोऽसौ।
पुरे षनवासाद्दहराषदके वा वसत्यतं ब्रह्मपुरे ततोऽषप॥ (ब्रह्म षसद्धान्त ११/१७२-१७४)
षत्रदण्डी स्वामी की पुरुष सूक्त व्याख्या में पद्म पुराण की पररभाषा उद् धृत है जो अभी उपलब्ध पुराण में नहीं
षमलती-
पुं संज्ञे तु शरीरे ऽस्तिन् शयनात् पुरुषो हररः। शकारस्य षकारोऽयं व्यत्ययेन प्रयुज्यते॥
यद्वा पुरे शरीरे ऽस्तिन्नािे स पुरुषो हररः। यषद वा पुरवासीषत पुरुषः प्रोच्यते हररः॥
यषद वा पूववमेवासषमहे षत पुरुषं षवदु ः। यषद वा बहुदानाद्वै षवष्णु ः पुरुष उच्यते॥
पूणवत्वात् पुरुषो षवष्णुः पुराणत्वाच्च शाषङ्गवणः। पुराणभजनाच्चाषप षवष्णुः पुरुष ईयवते॥
यद्वा पुरुष शब्दोऽयं रूढ्या वस्तक्त जनादव नम्।
पुरुष (षवश्व या व्यस्तक्त या विु ) के ४ रूप कहे गये हैं -बाहरी थर्ूल रूप क्षर है जो दीखता है पर सदा क्षरण होता
रहता है । इसका कूटथर् पररचय प्रायः थर्ायी है पर वह दीखता नहीं है -यह अक्षर पुरुष है । सामान्यतः क्षर-अक्षर दो
ही षवभाग षकये जाते हैं । अक्षर का ही जो रूप कभी नष्ट् नहीं होता वह अव्यय है । इसे षनमाव ण िम या वृक्ष भी कहा
गया है । यह क्षर तर्ा अक्षर दोनों से श्रे ष्ठ होने के कारण पुरुषोत्तम कहा गया है । पुरुषोत्तम रूप में प्रषर्त होने के
कारण १ का षवशे षण प्रर्म होता है । जगन्नार् का पुरुषोत्तम रूप राम है जो प्रषर्त है । अतः धान आषद तौलने के
षलये प्रर्म के बदले राम कहते हैं । कृष्ण मयाव दा पुरुषोत्तम नहीं र्े , उन्ोंने जन्म से ही ऐसे चमत्कार आरम्भ षदखाये
जो मनुष्य के षलये अकल्पनीय है ।
द्वाषवमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च। क्षरः सवाव षण भू ताषन कूटथर्ोऽक्षर उच्यते॥१६॥
उत्तमः पुरुषस्त्न्यः परमात्मेत्युदाहृतः। यो लोकत्रयमाषवश्य षबभत्यवव्यय ईश्वरः॥१७॥
यिात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादषप चोत्तमः। अतोऽस्ति लोके वेदे च प्रषर्तः पुरुषोत्तमः॥१८॥ (गीता, अध्याय १५)
अजोऽषप अन्नव्ययात्मा भू तानामीश्वरोऽषप सन् । (गीता ४/६)

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(४) वाज. संषहता का करपात्र भाष्य-ितु अर्ाव त् यज्ञ द्वारा अन्त काल में िृषत रह जाती है । उस समय ब्रह्म की
प्रार्व ना करता है - मृ त्यु के पश्चात थर्ू ल शरीर भि रूप में समाप्त हो। सूक्ष्म शरीर वायु रूप है , वह सूत्र और
षहरयगभव रूप ब्रह्म की सायुज्य मु स्तक्त पाये। ॐ ब्रह्म का वाचक है । हे सङ्कल्प रूप (ितु) दे व! हमने ब्रह्मचयव आषद
आश्रमों में आपकी उपासना की है । हमारी उपासना का िरण कर सायुज्य प्रदान करें ।
व्याख्या-
(१) मरणोपरान्त गवत-यहां षनषश्चत रूप से मरने के बाद की गषत का वणवन है । अर् इदं भिान्तं शरीरम् = शरीर के
भि होने से शु रु होता है ।
(२) अन्त काि की स्मृवत-जीवन भर मनु ष्य कमव करता है । अन्त में केवल उसकी िृषत बच जाती है । षजन कमों में
हमारी वासना होती है , उनकी ही िृषत बची रहती है षक हमने अच्छे या बुरे कमव षकये हैं । अतः गीता में शु भ और
अशु भ दोनों कमों का त्याग कहा गया है ।
यो न हृष्यषत न द्वे षष्ट् न शोचषत न कां क्षषत। शु भाशु भ पररत्यागी भस्तक्तमान् यः स मे षप्रयः॥ (गीता, १२/१७)
कमव फल के त्याग या उसे भगवान् को अपवण करने से भगवान् की िृषत होती है-
तपस्तस्वनो दानपरा यशस्तस्वनो, मनस्तस्वनो मन्त्रषवदः सुमङ्गलाः।
क्षे मं न षवन्दस्तन्त षवना यदपवणं, तिै सुभद्रश्रवसे नमो नमः॥ (भागवत पुराण, २/४/१७)
शरीर की वासना नष्ट् करने के षलये दाह संस्कार सहायक ह। नहीं तो उसके अवशे ष रहने पर उसके षनकट आत्मा
घूमती रहती है । अतः भिान्तं शरीरम् कहा है । पाषर्व व शरीर षजन ५ तत्त्वों से बना है , वे पुनः उसी में षमल जाते हैं ।४
प्रकार से पाषर्व व शरीर का अपने स्रोतों में अन्त होता है , पर सभी का हषव अषग्न द्वारा ही जाता है -
ये षनखाता ये परोप्ता ये दग्धा ये चोस्तद्धताः। सवां िानग्न आ वह षपतॄन् हषवषे अत्तवे॥ (अर्वव, १८/२/३४)
गीता के अध्याय १५ में उत्क्रास्तन्त (शरीर से आत्मा षनकलना) का वणवन है ।
कमव बन्धन-अधश्चोध्वं प्रसृतािस्य शाखा गुणप्रवृद्धा षवषयप्रवालाः।
अधश्च मू लान्यनु सन्तताषन कमाव नुबन्धीषन मनु ष्यलोके॥ (गीता, १५/२)
बन्धन से मु स्तक्त -न रूपमस्ये ह तर्ोपलभ्यते नान्तो न चाषदनव च सम्प्रषतष्ठा।
अश्वत्थमे नं सुषवरूढमू लमसङ्गशस्त्रे ण दृढे न षछत्त्वा॥ (गीता, १५/३)
आषद पुरुष की शरण-ततः पदं पररमाषगवतव्यं यस्तिन्द्गता न षनवतवस्तन्त भू यः।
तमे व चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृषत्तः प्रसृता पुराणी॥ (गीता, १५/४)
द्वन्द्द्व से मु स्तक्त से ही अव्यय पद-षनमाव नमोहा षजतसङ्गदोषा अध्यात्मषनत्या षवषनवृत्तकामाः।
द्वन्द्द्वैषववमुक्ताः सुखदु ःखसञ्ज्ज्ञै गवच्छन्तय्मू ढाः पदमव्ययं तत्॥ (गीता, १५/५)
अन्य शरीर में गमन-शरीरं यदवाप्नोषत यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।
गृहीत्वै ताषन संयाषत वायुगवन्धाषनवाशयात्॥ (गीता, १५/८)
=जै से वायु गन्ध को एक थर्ान से अन्य थर्ान को ले जाती है , उसी प्रकार ईश्वर (व्यषत रूप में जीव) षजस शरीर को
छोड़ता है, वहां से मन सषहत इस्तन्द्यों को ले कर षजस शरीर में जीव जाता है वहां तक ले जाता है ।
उपषनषद् के इस मन्त्र में उसी वायु रूप आत्मा का उल्ले ख है ।
जीवात्मा अज्ञे य-उत्क्रामन्तं स्तथर्तं वाषप भु ञ्जानं वा गुणास्तन्वतम् ।
षवमू ढा नानु पश्यस्तन्त पश्यस्तन्त ज्ञानचक्षु षः॥ (गीता, १५/१०)
= जीवात्मा केवल ज्ञानचक्षु (तकव) द्वारा दीख सकता है , भौषतक प्रयोग द्वारा नहीं।
केवल योगी द्वारा अन्त काल में ब्रह्म का अनु भव-
यतन्तो योषगनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्तथर्तम् ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नै नं पश्यन्त्यचेतसः॥ (गीता, १५/११)
=अकृतात्मनः, अचेतस नहीं दे ख पाते। अतः ितु, िृषत युक्त बनें ।
(३) ितु-यहां संबोधन कारक में ितो हो गया है । ितु का अर्व , सङ्कल्प तर्ा उसके अनुसार कमव और षनमाव ण (यज्ञ)
तर्ा उसे करने या धारण करने वाला आत्मा भी है ।
ित्तुं ररहस्तन्त मधुनाभ्यञ्जते। (ऋक्, ९/८/४३, अर्वव, १८/३/१८)
ितुं पुष्यषस गा इव (ऋक्, ३/४५/३, साम, २/१०/७०)
कमाव त्मा गा = इस्तन्द्यों का पोषण करता है । या क ब्रह्म गा = पृथ्वी का पोषण करता है । इस पूषन् ब्रह्म का वणवन हो
चुका है ।
गाम् आषवश्य च भू ताषन धारयाम्यम् ओजसा।
पुष्णाषम चौषधीः सवाव ः सोमो भूत्वा रसात्मकः॥ (गीता, १५/१३)
ितुं दषधिा अनु सन्तवीत्वत् (ऋक्, ४/४०/४, वाज. सं. ९/१४, काण्व सं. १०/३/७)
दषधिा-धारण और िमण या गषत करने वाला जै से अश्व, आकाश में सूयव।
यज्ञ- आ नो भद्रा ितवो यन्तु षवश्वतो अदब्धासो अपरीतास उस्तद्भदः (ऋक्, १/८९/१, वाज. सं. २५/१४)
= हमारे भद्र ितु षबना षकसी बाधा षवश्व को पार करावें।
दे वो दे वान् ितुना पयवभूषत् (ऋक्२/१२/१, अर्वव २०/३४/१, तैषत्तरीय सं. १/७/१३/२)
यही भाव गीता में है -
दे वान् भावयताने न ते दे वा भावयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयं परमवाप्त्स्यर्॥ (गीता, ३/११)
जो मन से सोचा (सङ्कल्प) र्ा वही षकया, यह ितु है -
स यदे व मनसा कामयत इदं मे स्याषददं कुवीयेषत स एव ितुः। (शतपर् ब्राह्मण, ४/१/४/१)
मन-कमव में एकता होने से दक्षता होती है -
ितुं दक्षं वरुण संषशशाषध (ऋक्, ८/४२/३) इषत वीयं प्रज्ञानं वरुण संषशशाधीषत (ितुः = वीयं) (ऐतरे य ब्राह्मण, १/१३)
ितु मन से आरम्भ होता है तर्ा मन में उसका भाव बना रहता है , अतः यह मनोजव है -
(वाज. यजु. ४/३१) ितुमवनोजवः (शतपर् ब्राह्मण, ३/३/४/७)
षमत्र एव ितुः (शतपर् ब्राह्मण, ४/१/४/१)
= कमव ही हमारा षमत्र है।
आकाश में सूयव का तेज क्षेत्र षमत्र है , वहीं ितु हो रहा है । जहां तक सूयव की वायु जाती है , वहां तक उसका यज्ञ हो
रह है । उसकी सीमा पर ६०,००० बालस्तखल्य (छोटे आकार के ग्रह) हैं ।
सूयव का रर् १५७ लाख योजन (सूयव व्यास = योजन) तर्ा उसका ईषादण्ड १८,००० योजन या षत्रज्या ३००० योजन है ।
योजनानां सहस्राषण भास्करस्य रर्ो नव। ईषादण्डिर्ै वास्य षद्वगुणो मु षनसत्तम॥२॥
साधवकोषटिर्ा सप्त षनयुतान्यषधकाषन वै। योजनानां तु तस्याक्षित्र चि प्रषतषष्ठतम् ॥३॥ (षवष्णु पुराण २/८/२-३)
सूयव का मै त्रेय मण्डल १ लाख योजन का है , अर्ाव त् षत्रज्या ५०,००० योजन की है -
भू मेयोजन लक्षे तु सौरं मै त्रेय मण्डलम्। (षवष्णु पुराण २/७/५)
यजु वेद प्रर्म श्लोक के अनु सार सौर मण्डल में ऊजाव की वायु (षकरण प्रवाह) ही ईषा है-
ईषे त्वा ऊजे त्वा वायवथर्ः। (वाजसने षय संषहता १/१)
ितु की सीमा के बाद जो है , वह ितु की सन्तषत है । ६०,००० बालस्तखल्य ितु की सन्तषत हैं जो अंगुष्ठ ( १ अंगुल)
आकार के हैं । आकाश मे षलये पृथ्वी मापदण्ड है । मनु ष्य की माप ९६ अंगुल है। पृथ्वी व्यास १२,८०० षक.मी. को ९६
अंगुल ले ने पर अंगुष्ठ = १३५ षक.मी.। अर्ाव त् सूयव से ५०,००० योजन दू री के बाद १३५ षक.मी. या अषधक व्यास के
६०,००० बालस्तखल्य हैं । २००८ में नासा के अनु मान के अनु सार इस दू री पर १०० षकमी से अषधक आकार के ७०,०००
बालस्तखल्य (प्लूटोषनक बडी) हैं।
ितोश्च सन्तषत-भाव याव बालस्तखल्या-नसूयत। षषष्ट्पुत्र सहस्राषण मु नीना-मूध्ववरेतसाम् ॥
अङ्गुष्ठ पवव मात्राणां ज्वलद् भास्कर तेजसाम् । (षवष्णु पुराण १/१०/१०)
तर्ा बालस्तखल्यां ऋषयोऽङ्गुष्ठ पववमात्राः षषष्ट् सहस्राषण पुरतः सूयं सूक्त वाकाय षनयुक्ताः संिुवस्तन्त। (भागवत पुराण
५/२१/१७)
जहां तक ितु है , वहीं तक कमाव त्मा की गषत होती है, जहां वह कमव फल का भोग करता है ।
(४) सूक्ष्म शरीर-इसमें १७ तत्त्वों की षचषत होती है , अतः इसके षवन्द्दुमात्र थर्ान को षचत्त कहते हैं । इसी षचत्त का
परकाया प्रवेश भी होता है -
बन्ध कारण शै षर्ल्यात् प्रचारसंवेदनाच्च षचत्तस्य परशरीरावेशः (पतञ्जषल योगसूत्र, ३/३९)
=बन्धन का कारण षशषर्ल कर जाने का मागव प्रकाषशत करने से षचत्त का अन्य शरीर में आवेश होता है ।
मरने के बाद भी कमव , शरीर आषद का बन्धन हटने से जीवात्मा षनकल कर अन्य शरीर में जाती है ।
प्रजापषत, अन्न, पशु , षवश्व-इन सभी की १७ षचषत होती है -
प्रजापषतवै सप्तदशः (गोपर् ब्राह्मण उत्तर, २/१३, ५/८, तैषत्तरीय ब्राह्मण, १/५/१०/६, ऐतरे य ब्राह्मण, ८/४)
अन्नं वै सप्तदशः (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १/७/७, १७/९/२, शतपर् ब्राह्मण, ८/४/४/७)
षवशः सप्तदशः (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १/७/७, १७/९/२, शतपर् ब्राह्मण, ८/४/४/७)
पशवो सप्तदशः (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १९/१०/७)
पस्तण्डत मधुसूदन ओझा ने ब्रह्म षसद्धान्त (पृष्ठ १०७-११०) में १७ षचषत की सूची दी है -
बीज षचषत-अषवद्या, काम, कमव, वीयव, शु ि --५
दे व षचषत-अषवद्या, वायु, आषदत्य, चन्द्, सोम - ५
भू त षचषत-आकाश, वायु, तेज, अप्, भू षम --५
प्रजा, षवत्त - --२
कुल योग ---१७।
अषवद्या, वायु-दोनों के २-२ रूप हैं ।
शरीर के भीतर वायु का सिार प्राण है, षजसमें ५ प्राण और ५ उपप्राण हैं । शरीर से बाहर जीवात्मा ले जाने के षलये
भी गौतम रूप वायु सूत्र है , षजसे अषनल कहा गया है । गौ = इस्तन्द्य, इसका थर्ू ल या तम रूप शरीर है ।
वायुवाव व गौतम तत् सूत्रं, वायुना गौतम सूत्रेणेद सवव संदृब्धम् (बृहदारयक उप. ३/५/६) (५) ५५५५ ५५ ५५५५-
५५ ५५५५५ ५५५५५५ ५५ ५५५५ ५५५५ ५५५ ५५ ५५५ ५५५५५५५= ५५५५५५ ५५५ ५५
५५ ५५५५ ५५५ ५५५ ५५ ५५५५ ५५५ ५५५५ ५५५५ ५५५५५ ५५५५ ५५ ५५५ ५५५५
५५५ ५५५५५ ५५ ५५५५ ५५, ५५५+ ५५५ = ५५५५ (५५ ५५५५) ५५ ५५५ ५५५५ ५५५५-
५५५५५ ५५ ५५५५५ ५५५५ ५ ५५५५५ = ५५५५५ ५५५५५५ ५५५५५ ५५५५ ५५, ५५
५५५५ ५५५ ५५५५ ५५५ ५५५ ५५ ५५५५५ ५५५५ ५५५५ ५५५५५ ५५५५ ५५ ५५५ ५५५
५५५५ ५५५ ५५५५५ ५५५ ५५ ५५५५ ५५५५ ५५५ ५५५५५ ५५५५ ५५, ५५ ५५५५५५५
५५५५ ५५५ ५५५ ५५५५५ ५५५ ५५५५ ५५५५५५५ ५५५ ५५५५५५ ५५ ५५५५५५५
५५५५५५५ ५५५५ ५५ ५५५५५५५ ५५५५५ ५५५ ५५५५५५५५ ५५ ५५५ ५५५५ ५५ ५५५
५५५ ५५ ५५५५५५५ ५५५ ५५५५५५ ५५५५ ५५५ ५५५५५५ ५५५५५ ५५५५ ५५५ ५५५५
५५५ ५५ ५५५५५५ ५५५५ ५५ ५५५५ ५५५५५ ५५५५५ (५५५ ५५/५५/५) ५५५
५५५५५५५ ५५५५ ५५५ ५५५ ५५५ ५५ ५५ ५५५५५५ ५५५ ५५५५५५५ ५५५५ ५५५
५५५५ ५५५५५५ ५५ ५५५५ ५५ ५५५ ५५ ५५ ५५५५५ ५५५५५५ ५५ ५५ ५५५५५५५ ५५
५५५५ ५५५५५ ५५५ ५५५५५५ ५५५५५ ५५ ५५५५५ ५५, ५५५५ ५५५५५५ ५५५५५५५
५५५५-५५५५ ५५५५५५५ ५५५५५ ५५५५ ५५, ५५५ ५५५५५५५ ५५ ५५५५५५५५ ५५
५५५ ५५५ ५५-
५५५५५५५५५५५ ५५५५५५५५५ ५ ५५५५५५५५५५५५५५५५ ५५५५५५५५५५
५५५५५५५५५ (५५५५५५५५५५५५ ५५५५५ ५/५)
५५ ५५५५५५५५५५५५५५५५ ५५ ५५५५५५५५५५५५५५५५५५५ ५५५५५५५५५
५५५५५५ ५५५५५५ ५५५५५५५ (५५५५ ५५५५५५५५ ५५/५/५/५५)
५५५५५ (५५५५५५५५) ५५५५ ५५५५ ५५५५५५५५५५५५५ ५ ५५५५५५५५५५५५ ... ५५५
५५५५५५ ५५५५५ ५५५५५५-५५५ ५५५५५५५५ (५५५५५५५५५ ५५५५५५५५
५/५/५५/५)
५५५५५५ ५५ ५५५ ५५५५५५५ ५५५५५५५५५५५ (५५५५५५५ ५५५५५५५५५५५ ५/५/५)
५५५ ५ ५५५५५५५५ ५५ ५५५५५५ ५५५५ ५५ ५५५५५५५ ५५५ ५५५५५५५५ ५५५ ५५५
५५५ ५५५५५५ ५५५५५ ५५ ५५५५ ५५ ५५ ५५५५५ ५५५ ५५५५ ५५५ ५५५५ ५५५५५५
५५ ५५५५५ ५५५ ५५५५५५ ५५ ५५५५५५५५ ५५५ (५५.५ ५५५) ५५ ५५५ ५५५ ५५५
५५५ ५५५ ५५५५ ५५५ ५५ ५५५५५५ ५५५५५५५५ ५५५ ५५५ ५५५ ५५५५५५ ५५५५
५५५५ ५५५ ५५५५५५ ५५५५ ५५ ५५५५५५५ ५५५ ५५५५५५ ५५५ ५५५ ५५५५ ५५
(५५५५ ५५५ ५५५५ ५५ ५५५५५५)५ ५५५५५५५ ५५५५५ ५५ ५५५ ५ ५५५५ ५५५
५५५५५५-५५५५५ ५५ ५५५५५५५ ५५५ (५५५५५५५ ५५५५५५५५ ५५५५५५५)५ ५५५५
५५५ (५५/५५/५) ५५५ ५५५५५५५५ ५५५ ५५५ ५५५ ५५ ५५५५५ ५५५५ ५५ ५५५५५५५
५५ ५५ ५५५५५५ ५५५ ५५५५५ ५५५५५५ ५५५५५ ५५ ५५५५ ५५५५५५ ५५ ५५५५-
५५५५५ ५५५ ५५५ ५५, ५५५ ५५ ५५५५५ ५५५ ५५५५५-५५५५ ५५ ५५५५५५५ ५५५५
५५५ ५५५५५५५५ ५५ ५५५५५५५५ ५५५५५ ५५५५५ ५५ ५५५५५ ५५५५५५ ५५ ५५
५५५५५ ५५५

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शश

रशश


शश
शश।
(

व्याख्या-यहां सभी अर्व अध्यात्म परक हैं और मरने के बाद सद्गषत की प्रार्व ना करते हैं । पर इसके पूवव के श्लोक में
) भिान्त शरीर के बारे में कहा जा चुका है । २ शब्दों के अर्व आषधभौषतक हैं ।
ही
जु
्ुशश
शश

शशश
शश
्ु
शश
रा
शश

्ा

शपर युयोध्यित् शब्द के सार् रहने के कारण इसकी बाधा रूप में व्याख्या है ।
शश
ण रै - रै या राय शब्द का अर्व भौषतक धन है । अतः दोनों अर्व सम्भव हैं -षपछले मन्त्र के िम में शरीर अन्त होने के बाद


शश
की
-- गषतयों में सद्गषत कैसे पायें इसका वणवन है । आषधभौषतक अर्व है षक यज्ञ सम्बन्धी यजु वेद तर्ा उसके अस्तन्तम
शश

अध्याय
श के षनष्कषव रूप में यज्ञ द्वारा धन तर्ा सुख की प्रास्तप्त कैसे करें उसका सारां श है। अन्त में खं ब्रह्म के उल्ले ख


भौ
(का अर्व है , ब्रह्म के अन्य रूपों के सार् समन्वय।
शश
्ौ
शश

आविदै
शश
षत ववक अथम-१. राम तत्त्व-स्वामी रामभद्राचायव जी ने भगवान् राम को ही परब्रह्म मान कर उनकी उपासना का

अर्व
शश

ष् षकया है । वेद में राम तत्त्व को रं ब्रह्म कहा है ।

,
शश वै रं , प्राणे षह इमाषन सवाव षण भू ताषन रताषन (शतपर् ब्राह्मण, १४/८/१३/३, बृहदारयक उपषनषद् , ५/१२/१)
प्राणो


प्रश्नोपषनषद्
.ह में है षक प्रजापषत ने तप द्वारा रषय-प्राण का जोड़ा उत्पन्न षकया षजससे बहुत सी प्रजा हुई। मू त्तव अमूत्तव
शश
रू
शश
सभी को रषय कहा है , अतः मू षत्तव ही रषय है । उदाहरण के षलये आषदत्य प्राण है (शस्तक्त का स्रोत), चन्द्मा रषय है


्ू
(षनषमव
१शशश त पदार्व-यह अमू त्तव भी हो सकता है )।



तिै
४ स होवाच प्रजाकामो ह वै प्रजापषतः, स तपो अतप्यत, स तपिप्त्त्वा षमर्ु नम् उत्पादयते रषयं च प्राणं च इषत। एतौ
शश
शश
मे
श बहुधा प्रजाः कररष्यत इषत॥४॥
/से


आषदत्यो
् ह वै प्राणो, रषयः एव चन्द्माः। रषयः वा एतत् सवं यत् मू तं च अमू तं च, तिात् मू षत्तव ः एव रषयः॥५॥
।े

रय
(प्रश्नोपषनषद्
) , १/४-५)

शश
२.
शश खों ब्रह्म-आकाश या पृथ्वी पर षनमाव ण के षलये थर्ान या आकाश जरूरी है , षजसे खं ब्रह्म कहा है , उसके बाद रषय
ज्ञ



और प्राण के जोड़े से सृषष्ट् होती है ।
शश
््
रञ अवि- अषग्न के कई अर्व हैं। प्रचषलत अर्व आग है। ताप या ऊजाव हर थर्ान पर है , जहां सघन है , वहां आग जै सा
शश
३.

शश
शश
लगता
- है । इसी प्रकार षवरल पदार्व जब सघन षपण्ड के रूप में दीखता है , तो वह अषग्न है । आकाश में अषग्न के ५

रू

अ हैं -(१) स्वायम्भु व मण्डल-मू ल अव्यक्त रस से षवरल पदार्व बना जो १०० अरब ब्रह्माण्डों में घनीभू त हुआ।, (२)
िर
् ू
,परमे
रशश ष्ठी मण्डल-हर ब्रह्माण्ड का षवरल पदार्व कई थर्ानों पर घना हो कर तारा बने । हमारे ब्रह्माण्ड में इनकी संख्या


१०० अरब है । (३) सौर मण्डल-हमारे सूयव के आकषव ण से षनकटवत्ती पदार्व एकत्र हुआ है । (३) चान्द् मण्डल-
शश
शश
सौरमण्डल
व के फैले पदार्व से गैस तर्ा ठोस ग्रह बने । (५) भू मण्डल-ग्रहों में सबसे घना पृथ्वी है षजसपर सम ताप है
में


तर्ा चन्द् मण्डल से षघरे होने के कारण इस पर जीवन है ।

ह े

्ं ५ अषग्न हैं , षजनमें अस्तन्तम ३का षमला-जु ला प्रभाव है अतः उनको नाषचकेत (षचकेत = अलग अलग स्पष्ट्, नाषचकेत
ये

म षमला हुआ) कहते हैं ।
=



पिाग्नयो
जु
शश ये च षत्रणाषचकेताः (कठोपषनषद् , ३/१/१)
शश

ग ु यव, चन्द् पृथ्वी का अनु भव या ज्ञान होता है अतः इनको षशव के ३ ने त्र भी कहते हैं ।-चन्द्ाकव वैश्वानर लोचनाय, तिै
शश
सू
शश
हु

शश
षशकाराय

श नमः षशवाय (षशव पिाक्षर िोत्र)।

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शश

ररा


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शश
शश
णः


्ः
शश
ये मण्डल पहले (अग्र) उत्पन्न हुए, अतः अषग्न या अषग्र हैं । इन ५ अषग्नयों से पहले भी अव्यक्त र्ाषजसे पुराण-पुरुष
(सब से पहले का पुरुष) भी कहते हैं । यह मू ल अषग्न परब्रह्म है । अषग्न तत्त्व को ही रं (राम) कहा गया है -
र इषत-रञ्जयषत इमाषन भू ताषन (मै त्रायणी उपषनषद् , ६/७)
रकारं अषग्न बीजं च अपानाषदत्य सषन्नभम् (ध्यानषवन्द्दु उपषनषद् , ९५)
रकारो अण्डं षवराट् भवषत (तारसार उपषनषद् , १/४)
रं सु = रं में स्तथर्त। अजु वाव -जु हुराणं = जीणव होना। रं की भास् (तेज) से जीणव भी युवा हो जाता है , अतः राम की प्रार्व ना
होती है -
आ यन्मे अभ्वं वनदः पनन्तः षशग्भ्यो नाषममीत वणवम्।
स षचत्रे ण षचषकते (षवषवध विु ओं में स्पष्ट्ता) रं सु भासा (रं के तेज से) जजु वाव यो मु हुरा (बार बार) युवा भू त्॥ (ऋक्,
२/४/५)
४. दो प्रकार के मागम-मृ त्यु के बाद मनु ष्य की दो प्रकार गषत कही जाती है -एक प्रकाश का है , दू सरा अन्धकार का
है । सुकृत से प्रकाश (आतम= धूप) में गषत होती है -
ऋतं षपबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रषवष्ट्ौ परमे पराधे।
छायातपौ ब्रह्मषवदो वदस्तन्त, पिाग्नयो ये च षत्रणाषचकेताः॥ (कठोपषनषद् , ३/१/१)
संवत्सरो वै प्रजापषतः तस्य आयने दषक्षणं च उत्तरं च। तद् ये ह वै तद् इष्ट्ापूते कृतम् इषत उपासते ते चान्द्मसम् एव
लोकम् अषभजयन्ते त एव पुनरावतवन्ते, तिाद् एक ऋषयः प्रजाकामा दषक्षणां प्रषतपद्यन्ते। एष वै रषयः यः
षपतृयाणः॥९॥
अर् उत्तरे ण तपसा ब्रह्मचयेण श्रद्धया षवद्यया आत्मन् अषनष्यात् आषदत्यं अषभयजन्ते। एतद् वै प्राणानां आयतनं एतद्
अमृ तं अभयमे तय् परायणं एतिात् न पुनरावतवन्त इषत-एष षनरोधः तत् एष श्लोकः॥१०॥
मासो वै प्रजापषतः तस्य कृष्णपक्ष एव रषयः शु क्लपक्षः प्राणः।
तिात् एत ऋषयः शु क्ल इष्ट्ं कुववस्तन्त इतर इतरस्तिन् ॥१२॥
(प्रश्नोपषनषद् , १/९-१२)
गीता, अध्याय ८ में इसकी व्याख्या है -
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तिमाहुः परमां गषतम् । यं प्राप्य न षनवतवन्ते तद्धाम परमं मम॥२१॥
पुरुषः स परः पार्व भक्त्या लभ्यस्त्नन्यया। यस्यान्तःथर्ाषन भू ताषन येन सववषमदं ततम् ॥२२॥
(अन्त में केवल भस्तक्त मागव से ही परम पद षमलता है )
यत्र काले (षजस स्तथर्षत में ) त्वनावृषत्तमावृषत्तं चैव योषगनः। प्रयाता यास्तन्त तं कालं वक्ष्याषम भरतषव भ॥२३॥
अषग्नज्योषतरहः शु क्लः षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छस्तन्त ब्रह्म ब्रह्मषवदो जनाः॥२४॥
धूमो राषत्रिर्ा कृष्णः षण्मासा दषक्षणायनम् । तत्र चान्द्मसं ज्योषतयोगी प्राप्य षनवतवते॥२५॥
शु क्ल कृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते। एकया यात्यनावृषत्तमन्ययावतवते पुनः॥२६॥ आषधभौषतक अर्व -जीवन में यज्ञ
का उद्दे श्य है -भौषतक सम्पषत्त और उसके सदु पयोग द्वारा सुख शास्तन्त, आरोग्य प्रास्तप्त। इसका षनदे श वाजसने षय
संषहताके प्रर्म मन्त्र में ही है -
ॐ इ॒षे त्वोो॑जे त्वाो॑ वा॒यवो॑ थर् दे॒ वो वःो॑ सषव॒ता प्रापवयतु
ो॑ आप्याो॑ यध्व मघ्नन्या॒ इन्द्ाो॑ य भा॒गं प्र॒जावो॑तीरनमी॒वा अो॑य॒क्ष्मा मा वो॑
िे न ई ो॑षत माघशो॑ सो ध्रुवा अ॒स्तिन् गोपो॑तौ स्यात ब॒ह्वीयवजमाो॑ नस्य प॒शून्ाो॑ षह (वा. यजु १/१)
यहां कई चीजें हैं -(१) प्राण ऊजाव से कमव और यज्ञ होते हैं जो वायु रूप और धुरी (इषा) है ।
(२) यज्ञ द्वारा उत्पादन करने पर िे न या चोरी नहीं करनी पड़े गी।
(३) पशु , गो आषद सम्पषत्त, प्रजा आषद इसी से षमलें गे।
(३) षजसके संरक्षण में यज्ञ हो रहा है , उस इन्द् को भाग दे ना है , षजससे हमारी रक्षा होती रहे ।
(४) उत्पादन काया ऊजाव का भी मू ल स्रोत सषवता है , उसी की कृपा से यज्ञ में षनमाव ण होत है ।
(५) पुरुषार्व घ = ४ हैं -धमव , अर्व , काम, मोक्ष। इसे नहीं करना अघ = पाप है , षजससे बचना है ।
(६) ऐसा करने से ही अमीवा (रोगकारक) तर्ा यक्ष्मा (क्षय करने वाले रोग) से बच सकते हैं ।
यज्ञ (जु हुराण) में कई प्रकार की बाधा-शत्रु , षवपषत्त, चोर, प्राकृषतक षवपयवय आषद। इनसे रक्षा के षलये लड़ना पड़त है
षजसमें इन्द् और सषवता की कृपा जरूरी है ।
अषग्न का अर्व यहां अग्रणी या ने ता होगा। भारत का अषग्न (अषग्र या अग्रसेन) षवश्व का भरण पोषण करता र्ा, अतः
उसे भरत कहा गया और इस दे श को भारत।। दे वयुग के बाद ३ भरत और र्े -ऋषभ पुत्र भरत (प्रायः ९५०० ई.पू.),
दु ष्यन्त पुत्र भरत (७५०० ई.पू.) तर्ा राम के भाई भरत षजन्ोंने १४ वषव (४४०८-४३९४ ई.पू.) शासन सम्भाला र्ा।
अषग्न (अग्रणी) अच्चॆ मागव पर ले जाता (नय) र्ा, अतः समु द्र में मागव षदखाने वाले को नायर कहते हैं (केरल में )।
(१) पृषर्व्याः सधथर्ादषग्नं पुरीष्यमषङ्गरस्वदा भराषग्नं पुरीष्यमषङ्गरस्वदच्छे दोऽषग्नंपूरीष्यमं षगरस्वद् भररष्यामः।
(वाजसने यी यजु वेद ११/१६)
=अषग्न पृथ्वी पर सबके ऊपर है , वह अंषगरा के रूप में प्रकाश दे ता है , हमारा भरण तर्ा पूरण करता है । हमें
शस्तक्तशाली अषग्न (अग्रणी) षमले जो हमारे भरण तर्ा उन्नषत में समर्व हो। उसे हम हषव (कर आषद) से भर दें गे।
(२) स यदस्य सववस्याग्र सृजत तिादषग्रहव वै तमषग्नररत्याचक्षते परोक्षम् । शतपर् ब्राह्मण ६/१/१/११)
= सबसे प्रर्म उत्पन्न होने के कारण यह अषग्र (ने ता) हुआ, इसे परोक्ष में अषग्न कहा जाता है ।
(३) तद्वा एनमग्रे दे वानां (प्रजापषतः ) अजनयत । तिादषग्ररषग्रहव वै नामे तद्यषग्नररषत। शतपर् ब्राह्मण २/२/४/२)
= प्रजापषत ने दे वों में इसे ही पहले बनाया, अतः यह अषग्र हुआ, षजसे परोक्ष में अषग्न कहा गया।
(४) षवश्व भरण पोषण कर जोई । ताकर नाम भरत आस होई। (तुलसीदास कृत राम चररत मानस, बालकाण्ड)
= पूरे षवश्व का भरण पोषन करने वाले को भरत कहा जाता है ।
(५) षदवा यास्तन्त मरुतो भूम्याऽषग्नरयं वातो अंतररक्षे ण याषत ।
अस्तद्भयाव षत वरुणः समु द्रैयुवमा इच्छन्तः शवसो नपातः । (ऋक् संषहता १/१६१/१४)
= दे व आकाश की मरुत् अन्तररक्ष की तर्ा अषग्न पृथ्वी की रक्षा करते हैं । वरुण जल के अषधपषत हैं ।
(६) तिा अषग्नभाव रतः शमव यं सज्ज्योक् पश्यात् सूयवमुच्चरन्तम् ।
य इन्द्ाय सुनवामे त्याह नरे नर्य्ाव य नृ तमाय नॄणाम् । (ऋक् संषहता ४/२५/४)
= इन्द् लोगों का कल्याण करता है , ने तृत्व करता है तर्ा सबसे अच्छा ने ता है , दाता अषग्न उनको सुख दे षजससे हम
सदा सूयव का उदय दे खें।
(७) अषग्नवै भरतः । स वै दे वेभ्यो हव्यं भरषत। (कौषीतषक ब्राह्मण उपषनषद् ३/२)
= अषग्न भरत है क्योंषक यह दे वों का भरण करता है (भोजन दे ता है )।
(८) एष (अषग्नः) षह दे वेभ्यो हव्यं भरषत तिात् भरतोऽषग्न ररत्याहुः । (शतपर् ब्राह्मण १/४/२/२, १/५/१/८, १/५/१९/८)
= यह अषग्न दे वों को भोजन दे ता है अतः इसे भरत अषग्न कहते हैं ।
(९) अग्नेमवहा ब्राह्मण भारतेषत । एष षह दे वेभ्य हव्यं भरषत । (तैषत्तरीय संषहता २/५/९/१, तैषत्तरीय ब्राह्मण३/५/३/१,
शतपर् ब्राह्मण १/४/१/१)
= ब्रह्मा ने अषग्न को महान् कहा र्ा क्योंषक यह दे वों को भोजन दे ता है ।
(१०) अषग्नदे वो दै व्यो होता..दे वान् यक्षद् षवद्वाषश्चषकतवान् ...मनुष्यवद् भरत वद् इषत। (शतपर् ब्राह्मण,१/५/१/५-७)
= अषग्न दे वों को भोग दे ता है , यह दे व तर्ा षवद्वानों का पालन करता है , यह मनु ष्य तर्ा भरत के जै सा है ।
(११) अषग्नजाव तो अर्ववणा षवद्वषद्वश्वाषन काव्या ।
भु वद् दू तो षववस्वतो षव वो मदे षप्रयो यमस्य काम्यो षववक्षसे । (ऋिंषहता १०/२१/५)
= यह अषग्न अर्ववण ऋषष से उत्पन्न हुआ, जो षवश्व तर्ा काव्य (रचना) को जानता है । यह दे वों का आवाहन करता है
तर्ा सभी काम्यों को यज्ञ द्वारा उत्पन्न करता है ।
(१२) त्वमग्ने यज्ञानां होता षवश्वेषां षहतः। दे वेषभमाव नुषे जने । (ऋिंषहता ६/१६/१- भरद्वाजो बाहव स्पत्यः)
= हे अषग्न! तुम षवश्व के षहत के षलये यज्ञ करते हो अतः दे वों ने मनु ष्यों के षलये षदया।
(१३) यो अषग्नः सप्त मानु षः षश्रतो षवश्वे षु षसन्धुषु । तमागन्म षत्रपस्त्यं मन्धातुदवस्युहन्तममषग्नं यज्ञे षु पूव्यवम् नभन्तामन्यके
समे । (ऋिंषहता ८/३९/८-नाभाकः काण्वः)
= जो अषग्न ७ मनु ष्यों (होता), सभी समु द्रों ३ लोकों में रहकर उनका पालन करता है , उसे पाकर हम कष्ट् तर्ा शत्रुओं
को नष्ट् करें ।
(१४) त्वां दू तमग्ने अमृ तं युगे युगे हव्यवाहं दषधरे पायुमीयम् ।
दे वासश्च मताव सश्च जागृषवं षवभुं षवश्च्पषतं नमसा षन षे षदरे । (ऋिंषहता ६/१५/८)
= हे अषग्न! दे वों तर्ा मनु ष्यों ने तुमको दू त बनाया है । तुम हव्य का वहन करते हो, सदा सावधान हो तर्ा लोकों का
पालन करते हो, हम तुमको नमस्कार करते हैं ।
(१५) षवभू षन्नग्न उभया अनु व्रता दू तो दे वानां रजसी समीयसे ।
यत् ते धीतीं सुमषतमावृणीमहे ऽध िा नस्तस्त्रवरूर्ः षशवो भव । (ऋिंषहता ६/१५/९)
= हे अषग्न! तुम भू षम तर्ा आकाश में मनु ष्यों तर्ा दे वों का दू त होने से प्रशं सनीय हो\ हमारे मन, बुस्तद्ध, तन की रक्षा
करो तर्ा सुख दो।
(१६) अषग्नहोता गृहपषतः स राजा षवश्वा वेद जषनमा जातवेदाः ।
दे वानामु त यो मत्याव नां यषजष्ठः स प्र यजतामृ तावा ॥ (ऋक़् ६/१५/१३ )
=अषग्न दे वों का होता, तेजस्वी तर्ा गृहपषत है । वह सबको जानता है तर्ा दे व-मनु ष्यों का पूजनीय है । वह दे वों को
यज्ञ द्वारा सन्तुष्ट् करे ।
(१७) आषग्नरगाषम भारतो वृत्रहा पुरुचेतनः । षदवोदासस्य सत्पषतः । (ऋिंषहता ६/१६/१९)
= अषग्न भरतों का रक्षक, वृत्र आषद असुरों का नाशक, षदवोदास (काषशराज) तर्ा सज्जनों का स्वामी है ।
(१८) उदग्ने भारत द् युमदजस्रेण दवीद् युतत् । शोचा षव भाह्यजर । ॥ (ऋक़् ६/१६/४५)
= हे भारत अषग्न। तुम तेजस्वी तर्ा युवक हो, हमारी षचन्ता दू र करो।
(१९) त्वामीळे अध षद्वता भरतो वाषजषभः शु नम् । ईजे यज्ञे षु यषज्ञयम् ॥ (ऋक़् ६/१६/४)
= अषग्न! हम तुम्हारी पूजा करते हैं , क्योंषक तुम भरत हो, पोषण करने वालों में इन्द् तर्ा यज्ञों में यज्ञीय (फल) हो।
(२०) भरणात्प्रजनाच्चैष मनुभवरत उच्यते । एतषन्नरुक्त वचनाद् वषं तद् भारतं िृतम् ।
यस्त्यं मानवो द्वीपस्तियवगग्यामः प्रकीषतवतः । य एनं जयते कृत्स्नं स सिाषडषत कीषतवतः ।
(मत्स्य पुराण ११४/५,६,१५, वायु पुराण ४५/७६, ८६)
= लोकों के भरण तर्ा पालन के कारण इस दे श का मनु (शासक) भरत कहा जाता है। षनरुक्त पररभाषा के अनु सार
भी इस दे श को भारत कहा गया है । मनु का यह षवख्यात दे श दषक्षण में षत्रकोण तर्ा उत्तर में चौड़ा है । जो इस दे श
को पूरी तरह जीत ले ता है , उसे सिाट् कहा जाता है ।
(२१) हमारे दे श के लोगों की इच्छा रहती है षक लोगों का भरण करें , अतः यह दे श भारत है -
दातारो नोषभवधवन्तां वेदाः सन्तषत रे व च । श्रद्धा च नो मा व्यगमत् बहुदे यं च नो स्तस्त्षत। अन्नं च नो बहु भवेदषतर्ीश्च

लभे मषह । याषचताश्च न सन्तु मा च याषचम किन ।
= दाताओं, वेद तर्ा सन्तषत की वृस्तद्ध हो, हमारी श्रद्धा कम नहीं होतर्ा दान के षलये हमारे पास पयाव प्त धन हो।
हमारे पास बहुत अन्न हो तर्ा अषतषर् आवें। दू सरे हमसे मां गें, हमें मां गने की जरूरत नहीं पड़े ।
समन्वय-ईशावास्योपषनषद् के १८८ श्लोक १८ प्रकार की षवश्व आत्मा तर्ा१८ व्यस्तक्त आत्मा के कमव की व्याख्या
करता है । यह गीता के १८ अध्याय या १८ षवद्या का सारां श है । यजु वेद का षनष्कषव तो स्पष्ट् रूप से है ।
यज्ञ या उत्पादक षिया के षलये शास्तन्त चाषहये षजससे षबना षवघ्न के काम होता रहे । यह शं ब्रह्म है (शम या षशव =
कल्याणकारी) षजसके ३ अंग हैं -खं ब्रह्म षजसमें सभी षिया हो रही है । रं ब्रह्म = प्राण या ऊजाव षजससे कमव हो रहा
है । चेतन कत्ताव , ब्रह्म या व्यस्तक्त रूप में यजमान-यह कं ब्रह्म है ।
शं (शं कर) = खं + कं + रं ।
अतः ब्रह्म का ३ प्रकार से षनदे श या ३ बार शास्तन्त की जाती है ।
ॐ तत्सषदषत षनदे शः ब्रह्मणः षत्रषवधः िृतः (गीता १७/२३)
ॐ गषतशील होने पर रं है । व्यस्तक्त का षनदे श (तत्) नाम से होता है अतः व्यस्तक्त के प्राण षनकलने पर उसे ॐ तत्सत्
के थर्ान पर राम (रं )-नाम सत् कहते हैं ।
खं का अर्व आकाश है -
खं मनोबुस्तद्धरे व च (गीता, ७/४)
शं का अर्व शास्तन्तदायक-
शं नो षमत्रं शं वरुणः शं नो भवत्वयवमा। शं न इन्द्ो बृहस्पषतः शं नो षवष्णु रुरुिमः॥ (ऋक्, १/९०/९, अर्वव १९/९/६,
वाज, सं. ३६/११)
क = कताव ब्रह्म या प्रजापषत-
षहरयगभव ः समवतवताग्रे भू तस्य जातः पषतरे क आसीत्। स दाधार पृषर्वीं द्यामु तेमां किै दे वाय हषवषा षवधेम॥
(ऋक् १०/१२१/१, वाजसने यी यजु वेद १३/४, २३/१, अर्वव ४/२/७)
वयुनावन ववद्वान-ऋग्वे द के नासदीय सूक्त (१०/१२९/१-७) में सृषष्ट् षनमाव ण के १० वादों का उल्ले ख है षजसके आधार
पर पस्तण्डत मधुसूदन ओझा ने दशवाद रहस्य तर् अलग अलग १० पुिकें भी षलखीं। इस सूक्त की
पंस्तक्त”षकमावरीवः कुह कस्य शमव न्’ के अनु सार आवरण वाद षलखा। आवरण का अर्व है , पदार्व का बाह्य रूप।
आवरण को वयुन कहा गया है । षवषभन्न तत्त्वों के परस्पर षमलन को वयन (वस्त्र बुनना) कहते हैं -वयां षस तद् व्याकरणं
षवषचत्रं , मनु मवनीषा मनु जो षनवासः। (भागवत पुराण, २/१/३६)। वयुन या आवरण छन्द है -यह दे श-काल की माप है ।
आवरन से ढं का वयोनाध (नध् = बान्धना) है तर्ा उसे बान्धने वाला प्राण वय है (शतपर् ब्राह्मण, ८/२/२/८)। अतः वय
का अर्व आयु भी है । आवरण या छन्द माया है -इससे भीतरी पदार्व षछप जात है , अतः माया का अर्व भ्रम है । माया से
सृषष्ट् होने से यह माता है । आवरण को चमव या शमव भी कहा गया है (शतपर् ब्राह्मण, ३/२/१/८, षवष्णु पुराण, ३/१७/४-
४८, ऋक्, ३/१३/४ आषद)। माया रूपी तम से सृषष्ट्-तम आसीत्तमसा गूहहमग्रे (ऋक्, १०/१२९) अन्य ऋक् (१/१४३/६,
१/५५/८, २/८७/४, ९/७४/२)। मनु िृषत (१/५१) में भी है -आसीषददं तमोभू तमप्रज्ञातमलक्षणम् । अप्रतक्यवमषनदे श्यं
प्रसुप्तषमव सववतः॥ सृषष्ट् में ऋषष (रस्सी) तत्त्व सबको जोड़ता है । सूत्रों का षनमाव ण प्रकृषत का कात्यायनी (सूत कातना)
रूप है । इनको सजा कर व्यवथर्ा करना तार-तम्य (ताना-बाना) है । उसे स्रष्ट्ा ही जान सकता है षजसे ’वयुनाषन
षवद्वान” कहा गया है-को वक्ता तारतम्यस्य तमे कं वेधसं षवना। यही नासदीय सूक्त में है षक सृषष्ट् के समय तो दे वता
भी नहीं र्े वे कैसे इसके बारे में जान सकते हैं ।