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सर्वप्रथम स्नान आदि से शुद्ध हो कर अपने पूजा गृह में पूर्व या उत्तर की ओर मुह कर आसन पर बैठ जाए|अब सर्व

प्रथम आच
मन – पदर्त्रीकरण करने के बाि गणेश –गुरु तथा अपने इष्ट िे र्/ िे र्ी का पूजन सम्पन्नकर ले| …

मुख शोधन करे :

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“क्ीीं क्ीीं क्ीीं ॐ ॐ ॐ क्ीीं क्ीीं क्ीीं”

इस मींत्र का १० बार जाप करने से मुख शोधन होगा…

स्व–गुरु पूजन :-

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श्रीगुरुनाथ श्री पादु काां पुजयामी । परमगुरु श्री पादु काां पुजयामी । परापरगुरु श्री पादु काां पुजयामी ।परमेष्टिगुरुनाथ श्री
पादु काां पुजयामी ।

गुरुमींत्र का कम से कम एक माला जाप करे और गुरुजी से सफलता हे तु प्राथवना करे ….

दनम्न मींत्र बोलकर गुरुचरनोमे भक्ति–भार् से पुष्प समदपवत कीदजये …

अभीि ष्टिद्धिम मे दे ही शरनागतवस्तले। भक्त्या िमपपये तुभ्यां गुरुपांद्धिप्रपूजनम॥

तत्पश्चात पीपल के 09 पत्तो को भूदम पर अष्टिल कमल की भाती दबछा ले ! एक पत्ता मध्य में तथा शेष आठपत्ते आठ दिशाओ
में रखने से अष्टिल कमल बनेगा ! इन पत्तो के ऊपर आप माला को रख िे ! अब अपनेसमक्ष पींचगव्य तैयार कर के रख ले दक
सी पात्र में और उससे माला को प्रक्षादलत ( धोये ) करे ! गाय सेउत्पन्न िू ध , िही , घी , गोमूत्र , गोबर इन पाीं च र्स्तुओीं को दमला
ने से पींचगव्य बनता है ! पींचगव्य से मालाको स्नान करना है – स्नान करते हुए अीं आीं इत्यादि सीं हीं पयवन्त समस्त स्वर –
व्यींजन का उच्चारण करे ! –
ॐअीं आीं इीं ईीं उीं ऊीं ऋीं ऋृीं लृीं लीं एीं ऐीं ओीं औीं अीं अः कीं खीं गीं घीं ङीं चीं छीं जीं झीं ञीं टीं ठीं डीं ढीं णीं तीं थीं िीं धीं नीं पीं फीं बीं भींमीं यीं रीं लीं र्ीं
शीं षीं सीं हीं क्षीं !! यह उच्चारण करते हुए माला को पींचगव्य से धोले ध्यान रखे इन समस्त स्वर काअनुनादसक उच्चारण होगा !इ
सके बाि माला को जल से धो ले –

ॐ सद्यो जातीं प्रद्यादम सद्यो जाताय र्ै नमो नमः

भर्े भर्े नादत भर्े भर्स्य माीं भर्ोद्भर्ाय नमः !!

अब माला को साफ़ र्स्त्र से पोछे और दनम्न मींत्र बोलते हुए माला के प्रत्येक मनके पर चन्दन– कुमकुमआदि का दतलक करे –

ॐ र्ामिे र्ाय नमः जयेष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कल दर्करणाय नमो बलदर्करणाय नमः !

बलाय नमो बल प्रमथनाय नमः सर्वभूत िमनाय नमो मनोनमनाय नमः !!

अब धूप जला कर माला को धूदपत करे और मींत्र बोले –

ॐ अघोरे भ्योथघोरे भ्यो घोर घोर तरे भ्य: सर्ेभ्य: सर्व शर्ेभया नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्य:
अब माला को अपने हाथ में लेकर िाए हाथ से ढक ले और दनम्न मींत्र का १०८ बार जप कर उसकोअदभमींदत्रत करे –

ॐ ईशानः सर्व दर्द्यानमीश्वर सर्वभूतानाम ब्रह्मादधपदत ब्रह्मणो अदधपदत ब्रह्मा दशर्ो मे अस्तु सिा दशर्ोम !!

अब साधक माला की प्राण – प्रदतष्ठा हे तु अपने िाय हाथ में जल लेकर दर्दनयोग करे –

ॐ अस्य श्री प्राण प्रदतष्ठा मींत्रस्य ब्रह्मा दर्ष्णु रुद्रा ऋषय: ऋग्यजु:सामादन छन्दाीं दस प्राणशक्तििे र्ता आीं बीजींह्ीीं शक्ति क्ोीं कील
कम अक्तिन माले प्राणप्रदतष्ठापने दर्दनयोगः !!

अब माला को बाएीं हाथ में लेकर िायें हाथ से ढक ले और दनम्न मींत्र बोलते हुए ऐसी भार्ना करे दक यह मालापूणव चैतन्य र् श
क्ति सींपन्न हो रही है !

ॐ आीं ह्ी ीं क्ोीं यीं रीं लीं र्ीं शीं षीं सीं होीं ॐ क्षीं सीं सः ह्ीीं ॐ आीं ह्ीीं क्ोीं अस्य मालाम प्राणा इह प्राणाः ! ॐ आीं ह्ीीं क्ोींयीं रीं लीं र्ीं शीं षीं सीं
होीं ॐ क्षीं सीं हीं सः ह्ी ीं ॐ आीं ह्ीीं क्ोीं अस्य मालाम जीर् इह क्तथथतः ! ॐ आीं ह्ीीं क्ोीं यीं रीं लीं र्ीं शींषीं सीं होीं ॐ क्षीं सीं हीं सः ह्ी ीं ॐ आीं
ह्ी ीं क्ोीं अस्य मालाम सर्ेन्द्रयाणी र्ाङ् मनसत्वक चक्षुः श्रोत्र दजह्वा घ्राणप्राणा इहागत्य इहै र् सुखीं दतष्ठन्तु स्वाहा !

ॐ मनो जूदतजुषवतामाज्यस्य बृहस्पदतरयज्ञदममन्तनो त्वररष्टीं यज्ञीं सदममीं िधातु दर्श्वे िे र्ास इह माियन्ताम्ॐ प्रदतष्ठ !!

२४ बार गायत्री मींत्र बोलकर माला पर जल चढाये , दजससे माला का शुक्तद्धकरण हो जाये और मींत्र जाप मेदकसी भी प्रकार का
िोष नहीीं लगे. .माला का गन्ध अक्षत और पुष्प से पूजन करके प्राथवना करे …

ॐ माले माले महामाले, सर्व शक्तिस्वरूदपणी । चतुर्वगवस्त्वदयन्यस्तस्तिात्वीं दसक्तद्धिा भर्॥

माला को चैतन्य करने के ललये चेतना बीज मंत्रोसे माला के हर मलि को कुंकुम का लबंदी लगाये

चेतना बीज मींत्र :- “क्ीीं श्रीीं ह्ीीं फट”

अब माला का स्तुलत करते हुये माला को दालहने हाथ से ग्रहि करे

ॐ अलिघ्नंकुरु माले त्वं जपकाले सदा मम। त्वं माले सिवमन्त्रानामभीष्टलसद्धिकरी भि ॥

आप दजस प्रकार का माला चाहते है जैसे गुरुमींत्र जाप माला, िशमहादर्द्या, महामृत्युींजय,

नर्ग्रह माला, तो इस के दलये आप सींबक्तन्धत िे र्ी/ िे र्ता काआर्ाहन माला मे करे या इष्ट से प्राथवना करे केउनके प्रसन्नता प्राप्त
करने हे तु “अमुक मींत्र जाप हे तु माला मे अमुक शक्ति की थथापना हो “और अपने इष्टका आज्ञा चक् मे ध्यान करे …

कुल्लुका मींत्र का करमाला (उीं गली से ) से दशर पर १० बार जाप करे

“क्ीीं हुीं स्त्रीीं ह्ी ीं फट”

अब माला को हाथ मे लेकर लनम्न मंत्र का आिश्यक संख्या मे जाप प्रारम्भ करे

तान्त्रोि माला मींत्र :-

ॐ ऐीं श्री ीं सर्व माला मदण माला दसक्तद्धप्रिायत्री शक्तिरूपीन्यै श्रीीं ऐीं नम:

मींत्र जाप के बाि माला को दशर पर रखे और प्राथवना करे …


माले त्वं सिवदेिानां प्रीलतदा शुभदा भि ।

शुभं कुरुष्व मे दे िी यशोिीयव ददस्व मे ॥

माला को दशर से उतारकर पुष्प समदपवत कर िे ॰ सिगुरुजी भगर्ान को सर्व दर्दध–


दर्धान हाथ मे जललेकर जल के रूप मे समदपवत कर िीदजये और क्षमा प्राथवना भी करनी है |

अब माला को अपने मस्तक से लगा कर पूरे सम्मान सदहत थथान िे ! इतने सींस्कार करने के बाि माला जपकरने योग्य शुद्ध त
था दसक्तद्धिायक होती है ! दनत्य जप करने से पूर्व माला का सींदक्षप्त पूजन दनम्न मींत्र सेकरने के उपरान्त जप प्रारम्भ करे –

ॐ अक्षमालादधपतये सुदसक्तद्धीं िे दह िे दह सर्व मींत्राथव सादधनी साधय–


साधय सर्व दसक्तद्धीं पररकल्पय मे स्वाहा !ऐीं ह्ीीं अक्षमादलकायै नमः !

जप करते समय माला पर दकसी दक दृदष्ट नहीीं पड़नी चादहए ! गोमुख रूपी थैली ( गोमुखी ) में माला रखकरइसी थैले में हाथ
डालकर जप दकया जाना चादहए अथर्ा र्स्त्र आदि से माला आच्छादित कर ले अन्यथा जपदनष्फल होता है !

यह एक सामान्य प्रदक्या है जो सामान्य साधक उपयोग में ले सकते हैं |इस सम्बन्ध में योग्य जानकार सेपरामशव लें और मींत्रािी
की शुक्तद्ध जाींच लें …………………………………………………हर–हर महािे र्

जप िाधना हे तु माला का ष्टनमापण, प्रष्टतष्ठा व पू जन ष्टवष्टध !

माला िांस्कार ष्टवष्टध इि प्रकार है :- साधक सिवप्रथम स्नान आलद से शुि हो कर अपने पूजा गृह में पूिव या उत्तर की ओर
मुह कर आसन पर बैठ जाए अब सिव प्रथम आचमन, पलित्रीकरि आलद करने के बाद गिेश, गुरु तथा अपने इष्ट दे ि/
दे िी का पूजन सम्पन्न कर लें !
तत्पश्चात पीपल के 9 पत्तो को भूष्टम पर अष्टदल कमल की भाती लबछा लें, एक पत्ता मध्य में तथा शेष आठ पत्ते आठ
लदशाओ में रखने से अष्टदल कमल बनेगा, इन पत्तो के ऊपर आप माला को रख दें !
अब गाय का दू ध , दही , घी , गोमूत्र , गोबर से बने पंचगव्य से लकसी पात्र में माला को प्रक्षाललत करें ! ओर पंचगव्य से
माला को स्नान कराते हुए !! ॐ अां आां इां ईां उां ऊां ऋां ऋां लां लां एां ऐां ओां औां अां अः कां खां गां घां ङां चां छां जां झां ञां टां ठां डां ढां
णां तां थां दां धां नां पां फां बां भां मां यां रां लां वां शां षां िां हां क्षां !! इस समस्त स्वर ियंजन का अनुनालसक उच्चारि करें !
माला को पंचगव्य से स्नान कराने के बाद माला को जल से स्नान कराएं !

माला को ष्टनम्न मांत्र बोलते हुए गौदु ग्ध िे स्नान कराने के बाद जल िे स्नान कराएं !
ॐ िद्यो जातां प्रद्याष्टम िद्यो जाताय वै नमो नमः ! भवे भवे नाष्टत भवे भवस्य माां भवोद्भवाय नमः !!

माला को लनम्न मंत्र बोलते हुए दही िे स्नान कराने के बाद जल से स्नान कराएं !
ॐ वामदे वाय नमः जयेष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमः रुद्राय नमः कालाय नमः कल ष्टवकरणाय नमः बलाय नमः !
बल प्रमथनाय नमः बलष्टवकरणाय नमः िवपभूत दमनाय नमः मनोनमनाय नमः !!

माला को लनम्न मंत्र बोलते हुए गौघत िे स्नान कराने के बाद जल से स्नान कराएं !
ॐ अघोरे भ्योथघोरे भ्यो घोर घोर तरे भ्य: िवेभ्य: िवप शवेभया नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्य: !!

माला को लनम्न मंत्र बोलते हुए शहद िे स्नान कराने के बाद जल से स्नान कराएं !
ॐ तत्पुरुषाय ष्टवद्महे महादे वाय धीमष्टह तन्नो रुद्रः प्रचोदयात !!
माला को लनम्न मंत्र बोलते हुए शक्कर िे स्नान कराने के बाद जल से स्नान कराएं !
ॐ ईशानः िवप ष्टवद्यानमीश्वर िवपभूतानाम ब्रह्माष्टधपष्टत ब्रह्मणो अष्टधपष्टत ब्रह्मा ष्टशवो मे अस्तु िदा ष्टशवोम !! अब

माला को स्वच्छ वस्त्र से पोंछकर माला को कां से की थाली अथिा लकसी अन्य स्वच्छ थाली या चौकी पर स्थालपत करके

माला की प्राण प्रष्टतष्ठा हेतु अपने दाएं हाथ में जल लेकर ष्टवष्टनयोग करके िह जल भूलम पर छोड़ दें !

ॐ अस्य श्री प्राण प्रष्टतष्ठा मांत्रस्य ब्रह्मा ष्टवष्णु रुद्रा ऋषय: ऋग्यजु:िामाष्टन छन्ाांष्टि प्राणशद्धिदे वता आां बीजां ह्ी ां
शद्धि क्ोां कीलकम अद्धिन माले प्राणप्रष्टतष्ठापने ष्टवष्टनयोगः !!

अब माला को दाएां हाथ िे ढक ले और लनम्न चैतन्य मंत्र बोलते हुए ऐसी भावना करे ष्टक यह माला पूणप चैतन्य ि शद्धि
संपन्न हो रही है !
ॐ ह्ौ ां जूां िः आां ह्ी ां क्ोां यां रां लां वां शां षां िां ह्ौ ां ॐ हां क्षां िोहां हांिः ह्ी ां ॐ आां ह्ी ां क्ोां अस्य मालाम प्राणा इह प्राणाः !
ॐ ह्ौ ां जूां िः आां ह्ी ां क्ोां यां रां लां वां शां षां िां ह्ौ ां ॐ हां क्षां िोहां हांिः ह्ी ां ॐ आां ह्ी ां क्ोां अस्य मालाम जीव इह द्धथथतः !
ॐ ह्ौ ां जूां िः आां ह्ी ां क्ोां यां रां लां वां शां षां िां ह्ौ ां ॐ हां क्षां िोहां हांिः ह्ी ां ॐ आां ह्ी ां क्ोां अस्य मालाम िवेन्द्रयाणी वाङ्
मनित्वक चक्षुः श्रोत्र ष्टजह्वा घ्राण प्राणा इहागत्य इहैव िुखां ष्टतष्ठन्तु स्वाहा !
ॐ मनो जूष्टतजुषपतामाज्यस्य बहस्पष्टतरयज्ञष्टममन्तनो त्वररिां यज्ञां िष्टममां दधातु ष्टवश्वे दे वाि इह मादयन्ताम् ॐ
प्रष्टतष्ठ !!

अब माला का गांध, अक्षत, धूप, दीप, पुष्प आलद से पंचोपचार पूजन कर, उस माला पर लजस मन्त्र की साधना करनी है
उि मन्त्र को मानष्टिक उच्चारण करते हुए माला के प्रत्येक मनके पर रोली िे ष्टतलक लगाएां , अथिा "ॐ अां आां इां
ईां उां ऊां ऋां ऋां लां लां एां ऐां ओां औां अां अः कां खां गां घां ङां चां छां जां झां ञां टां ठां डां ढां णां तां थां दां धां नां पां फां बां भां मां यां रां लां वां
शां षां िां हां क्षां" का अनुनालसक उच्चारि करते हुए माला के प्रत्येक मनके पर रोली से लतलक लगाएं ! तदु परां त माला को
अपने मस्तक से लगा कर पूरे सम्मान सलहत गौमुखी में थथाष्टपत कर दें ! इतने संस्कार करने के बाद माला जप करने
योग्य शुि तथा लसद्धिदायक होती है !

ष्टनत्य जप करने िे पूवप माला का िांष्टक्षप्त पूजन ष्टनम्न मांत्र िे करने के उपरान्त जप प्रारम्भ करें !
ॐ अक्षमालालधपतये सुलसद्धिं दे लह दे लह सिव मंत्राथव सालधनी सिव मन्त्र साधय-साधय सिव लसद्धिं पररकल्पय मे स्वाहा !
ऐं ह्ी ं अक्षमाललकायै नमः !