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शकुन शास्त्र से सं गृहीत कुछ रोचक व ज्ञान वर्द्ध क जानकाररयां (1)---

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प्राचीन समय के ऋषियों मुषनयों ने अपने शोध में बताया था की प्रत्येक प्राषियों के षवषचत्र व्यवहार एवं
हरकतों का कुछ न कुछ प्रभाव अवश्य होता है । इस के सं बंध में अनेको बाते हमारे पुरािों एवं ग्रं थो में भी
षवस्तार से बतलाई गई है ।।

हमारे सनातन धमध में माता के रूप में पूजनीय गाय के सं बंध में तो बहुत सी बाते हम लोग जानते ही होंगे,
परन्तु आज कुछ अलग घरे लू जैसे प्राषियों के सं बंध में पुरािों से ली गई कुछ ऐसी बातो के बारे में
आलोकपात करें गे , जो बहुत लोग पहले कभी सायद षकसी से नही ं सु नी होगी। प्राषियों से जुड़े रहस्ों के
सं बंध में पुरािों में बहुत ही षवषचत्र बाते बतलाई गई, जो षकसी को आश्चयध में डाल सकती है ।।

।।कौए का रहस्।।

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कौए के सं बंध में पुरािों में बहुत ही षवषचत्र बाते बतलाई गई है । मान्यता है की कौआ अषतषथ आगमन का
सू चक एवं षपतरो का आश्रम स्थल माना जाता है । कौए के षभनध षभनध ध्वषन यु क्त बोली से अथध षनकालने के
षलए एक स्वतं त्र सं स्कृत ग्रन्थ भी कंहा कंहा उपलब्ध है ।।

हमारे धमध ग्रन्थ की एक कथा के अनुसार इस पक्षी ने दे वताओ और राक्षसों के द्वारा समुद्र मंथन से प्राप्त
अमृत का रस चख षलया था। यही कारि है की कौआ की कभी भी स्वाभाषवक मृत्यु नही ं होती। यह पक्षी
कभी षकसी षबमारी अथवा अपने वृ र्द्ा अवस्था के कारि मृत्यु को प्राप्त नही ं होता। इसकी मृत्यु अनजान
कारि वशः आकस्मिक रूप से होती है ।।

यह बहुत ही रोचक है की षजस षदन कौए की मृत्यु होती है , उस षदन उसका साथी भोजन ग्रहि नही ं
करता। यह बात गौर दे ने वाली है की कौआ कभी भी अकेले में भोजन ग्रहि नही ं करता। यह पक्षी षकसी
साथी के साथ षमलकर ही भोजन करता है ।।

कौआ की लम्बाई करीब 20 इं च होता है , तथा यह गहरे काले रं ग का पक्षी है । षजनमे मदध और मादा--
दोनों एक समान ही षदखाई दे ते है । यह बगै र थके, षमलो उड़ सकता है । कौए के बारे में पुराि में बतलाया
गया है की षकसी भषवष्य में होने वाली घटनाओं का आभास उनको पहले ही हो जाता है ।।

षपतरो का आश्रय स्थल :--


श्रार्द् पक्ष में कौए का महत्व बहुत ही अषधक माना गया है । इस पक्ष में यषद कोई भी व्यस्मक्त कौआ को
भोजन कराता है , तो यह भोजन कौआ के माध्यम से उसके पीतर ग्रहि करते है । शास्त्रों में यह बात स्पष्ट
बतलाई गई है की-- कोई भी क्षमतावान आत्मा कौए के शरीर में षवचरि कर सकती है ।।

भादौ महीने के 16 षदन कौआ हर घर की छत का मेहमान बनता है । ये 16 षदन श्रार्द् पक्ष के षदन माने
जाते हैं । कौए एवं पीपल को षपतृ प्रतीक माना जाता है । इन षदनों कौए को खाना स्मखलाकर एवं पीपल को
पानी षपलाकर षपतरों को तृप्त षकया जाता है ।।

कौवे से जुड़े शकुन और अपशकुन--

(1) यषद हम शषनदे व को प्रसन्न करना चाहते है , कौआ को भोजन कराना चाषहए।।

(2) यषद आपके मुंडेर पर कोई कौआ बोले तो मेहमान अवश्य आते है ।।

(3)यषद कौआ षकसी घर की उत्तर षदशा से बोले तो समझे जल्द ही गृ हस्थ पर लक्ष्मी की कृपा होने वाली
है ।।

(4) पषश्चम षदशा से बोले तो घर में मेहमान आते है ।।

(5) पूवध में बोले तो शुभ समाचार आता है ।।

(6) दषक्षि षदशा से बोले तो बु रा समाचार आता है ।।

(7) कौवे को भोजन कराने से अषनष्ट व शत्रु का नाश होता है ।।

शकुन शास्त्र से सं गृहीत कुछ रोचक व ज्ञान वर्द्ध क जानकाररयां (2)---

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।। चीषटयों का रहस् ।।
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चीषटयों को हम एक तु च्छ एवं छोटा प्रािी समझते है , परन्तु चीषटयां बहुत ही मेहनती और एकता से रहने
वाला जीव है । सामूषहक प्रािी होने के कारि चींटी सभी कायों को बां टकर करती है । षवश्वभर में लगभग
14000 से अषधक प्रजाषत की चीषटयां है ।।

चींटी के बारे में वै ज्ञाषनकों ने कई रहस् उजागर षकए हैं । चींषटयां आपस में बातचीत करती हैं , वे बस्मस्तयां या
नगर बनाती हैं और सं चयशील प्रवृ षत्त में भं डारि की समुषचत व्यवस्था करना जानती हैं । हमारे इं जीषनयरों से
कही ं ज्यादा बे हतर होती हैं चींषटयां । चींषटयों का नेटवकध दु षनया के अन्य ने टवर्क्ध से कही ं बे हतर होता है । ये
षमलकर एक पहाड़ को काटने की क्षमता रखती है ।।

चींषटयां अपने आसपास इलाका को स्वच्छ रखने में महत्वपूिध योगदान दे ती हैं । चींषटयां खुद के वजन से
100 गु ना ज्यादा वजन उठा सकती हैं । ये सब गु ि उनको प्रकृषत प्रदत्त। इसषलए मानव को भी चींषटयों से
बहुत कुछ सीखने की जरूरत है ।।

चीषटयों दो प्रकार की होती है-- लाल चीषटयां एवं काली चीषटयां । शकुन शास्त्रों के अनुसार लाल चीषटयां
को शुभ तथा काली चीषटयों को अशुभ माना गया है । मगर दोनों ही तरह की चींषटयों को आटा डालने की
परं परा प्राचीनकाल से ही षवद्यमान है । श्रर्द्ा के साथ षनयषमत चींषटयों को शकर षमला आटा गु ली डालते
रहने से व्यस्मक्त तरह तरह के बाधा- बं धन से मुक्त हो जाता है , ये एक पारम्पररक षवश्वास है ।।

चीषटयां पंख लगाकर उड़ने लगते हैं तो बाररश के साथ तूफान आने की सू चना षमलती है । मुख में खाद्य
लेकर चीषटयां एक लाइन में दू सरे स्थान को चलने लगते है , तो षशषग्र ही जोरदार या लगातर बाररश होने की
पूवध सू चना षमल जाती है । इसषलए प्राचीन काल से वे दर- फोरकास्मटंग में चींषटयां की अवदान को आजतक
मान्यता है ।।

हजारों चींषटयों को प्रषतषदन भोजन दे ने से वे चींषटयां उक्त व्यस्मक्त को पहचानकर, उसके प्रषत अच्छे भाव
रखने लगती हैं और उसको वे दु आ दे ने लगती हैं । चींषटयों की दु आ का असर व्यस्मक्त को हर सं कट से
बचा सकता है ।।

यषद कोई कजध से परे शान है तो चीषटयों को शक़्कर और आटा डाले। ऐसा करने पर कजध की समास्मप्त
जल्द हो जाती है ।।

जो प्रत्येक षदन चीषटयों को आटा दे ता है , वह अंषतम काल में वै कुंठ धाम को प्राप्त करता है ।।
यषद कोई लाल चीषटयों के मुंह में अंडे दबाए दे खते है , यह शुभ माना जाता है तथा पररवार में सु ख समृस्मर्द्
बढ़ती है ।।