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आआआआआआआआआ
आआआआ आआआआआआआआआआ की िचनतन-पेरक कृित ‘आआआआ आआआ आआआआ’ अब
‘आआआआआआआ आआआआ’ पकािशत करते हुए सी–डेक, नौएडा अपनी साथरकता का अनुभव
करता है।
आज जागितक सतर पर जीवन की जिटलताओं से मुिकत के िलए एक बेचनी वयापत
है। "और पाने और पाने ....." की होड मे जीवन इतना शुषक और जडवत् बन रहा है िक
उसके अनतपरवाह का सोत ही सूखने लगा है। भौितक उपलिबधयो की िवपुलजाओं के
बावजूद जीवन समाधान के िबनदु से दरू ... बहुत दरू होता जा रहा है। इसके एहसास से
जहा एक ओर जीवन मे नैराशय और पलायन-वृित पनप रही है तो दस
ू री ओर जीवन की
िदशा बदलकर वासतिवक जीवन-रस एंव ऊजा पापत करने की शोधवृित भी बलवती हो रही
है। आआआआआआआ आआआआ (आआआआ आआआ आआआआ) ऐसी जीवन-शोधक-साधक वृित को
पोतसाहन देता है, िदशा देता है; इतना ही नही, कदम-दर-कदम आगे बढने का अभयासकम
भी सुझाता है। जीवन को रसमय बनाने और उसे अननत ऊजा के आनतिरक सतोत से
जोडने के िलए िजजासुजन को पसतुत कृित सपष मागरदशरक पदान करेगी, इसमे कोई
सनदेह नही।
आशा है ततवज शी आआआआआआआआआआ की इस रचना का पाठकगण हािदरक सवागत
करेगे।

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आआ आआ आआआआआ आआआ आ आआआआ, आआआआआ आआआआ ।आआ आआआआआआ
आआआआआ आआ आआआआआआआ आआ,
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आआआआआआआ आआआआ आआ आआआआआ, आआआआ आआ आआआआआ
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--आआआआआआआआ
२९ अगसत, १९८७ ई०

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आआआआआ आआआआआ। आआआआआआआ आआआ
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आआआआ
िकसी पुसतक तथा उसके लेखक का पिरचय उनके साथ तारतमय सथािपत करने
तथा पुसतक की सामगी को सुगाहय बनाने मे सहायक होता है। यही पिरचय का महतव
है।
जीवन अगिणत पहेिलयो से भरी हुई एक अनोखी पहेली है। वैजािनको, दाशरिनको
तथा महापुरषो ने जीवन के आिवभाव, िवकास और िवलोप के रहसयो का उदघाटन करने
का पयत िकया है तथा धमर, दशरन और सािहतय ने जीवन को समृद एंव सुखमय बनाने के
उपायो की िवशद चचा एंव वयाखया की है। िकनतु बडे-बडे िवदान्, लबधपितष, सवोचच
सताधारी तथा शेष पुरष भी सहसा ऐसा कुछ सोच लेते है, ऐसी कुछ बात कह देते है
अथवा ऐसा कुछ कर बैठते है जो उनहे दु :खिनमगन कर देता है। अनेक बार यह िनणरय
लेना असंभव-सा हो जाता है िक जीवन की गहरी माग कया है तथा भला और बुरा कया है।
अिनशय और िदशाहीनता होने पर कष और कलेश महापुरष को भी घेर लेते है। िवडमबना
यह है िक खदिप वतरमान युग मे जान और िवजान मे कलपनातीत पगित हुई है तथा भौितक
समृिद ने सभयता और संसकृित का सवरप ही बदल िदया है, तथािप मानिसक अशािनत,
तनाव और अवसाद ने जीवन को एक दुवरह भार बना िदया है। अलपायु मे ही हदय-रोग से
कालकविलत होनेवाले तथा तुचछ बातो पर पाणोतसगर कर देनेवाले मनुषयो की संखया तेजी
से बढती ही जा रही है। अनयाय, शोषण और िहंसा वयापक हो गए है। कया इसके कुछ
उपाय संभव है? यथासंभव सूकम िनरीकण, िचनतन, तथा पयोगो के वैचािरक िनषकषों ने इस
लघु पुसयतक् का रप ले िलया है। मनुषय ने वैजािनक, िवदान्, समृद तथा सतावान् होकर
भी जीना नही सीखा है तथा वह अशािनत और दु :ख की अंिधयारी गिलयो मे भटक रहा
है। मनुषय बहुत कुछ होकर भी मानव नही बन सका है। वासतव मे जीवन का लकण मात
शास-पिकया और सपनदन नही है बिलक ऊजरिसवता, उतसाह और उमंग है। यदिप इस
पुसतक मे नया कुछ नही है तथा लेखक भी एक साधारण वयिकत है, तथािप यिद कुछ लोग
इससे िदशा-िनदेशन पापत कर सकेगे तो यह पयास साथरक हो जाएगा। हमारा, िवशास है
िक िजनमे वयिकततव के िवकास तथा आननद मे पितिषत होने के िलए अिभरिच है, उनके
िलए यह छोटी सी पुसतक अमृतमय िसद होगी।
इस पुसतक मे कुछ पुनरावृितया है िकनतु सनदभरभेद के कारण वे आवशयक है।
इस पुसतक के कई अंश िविभन पितकाओं मे भी पकािशत हो चुके है।
आआ-आआ-आआआआ
-आआआआआआआआ
गली गीतारसामृत
िवजयनगर,
मेरठ- २५ 000 १

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आआआआआआआ आआआआ
आआआआ – आआआ – आआआ आआआआ –आआआआआ आआ आआआ।
जीवन इस सृिष का सबसे बडा चमतकार है। जीवन पाकर असंखय पकी िवशाल
वयोम मे पंख फैलाकर उडते है और आननदमय होकर कलवर करते है। जीवन का सफृरण
होने पर ही अगिणत पशु वनो मे िवहार करते है। और वन की शोभा बन जाते है। जीवनसफुरण से उललिसत होकर ही कोिट-कोिट जलचर जल मे िवचरण करते है तथा सागरो
की शीवृिद करते है।
जीवन सृिष का सवोतम धन है तथा अनुपम ततव है। यिद जीवनधारी पाणी न हो
तो इस िवशाल सृिष मे जल, थल और नभ की उपादेयता ही कया रहेगी ? सृिष जीवन का
अिसततव होने के कारण ही कृताथर है। जीवन से बढकर कही भी कुछ और गौरवमय नही
है।
सृिष के शृंगारभूत मानव को यह सौभागय िमला है िक जीवन उसके माधयम से ही
चरमोतकषर को पापत हसे सका तथा वह जल, थल और नभ पर शासन करने मे समथर हो
गया। पकृित नटी मानव की रचना दारा कृत-कृतय हुई। मानव ने बुिदमता से पकृित के
मूलभूत ततवो तथा जीवन के रहसयो की खोज मे सलंगन होकर अपनी अिसमता को पितिष
कर िदया। मानव ने बौिदक शिकत के दारा िवजान और दशरन की असीमरािश का संचय
िकया, सौनदयरबोध, संवेदनशीलता और कलपना-शिकत के दारा सािहतय एंव िविवध कलाओं
का सजरन िकया, करणादरता रहसमय िदवय वृित के दारा अनेक धमों को उदभूत िकया।
समसत संसकृित और सभयता का पादुभाव मानव की बुिद के आधार पर ही हुआ है। मानव
ने संसकृित और सभयता के िवकास दारा जीवन मे सौनदयर समावेश कर िदया है।
जीवन एक परम सुनदर एंव परम भवय ततव है। जीवन की संरका तथा जीवन का
सौनदयीकरण करना मानव का न केवल दाियतव है बिलक उसकी एक गहरी माग भी है।
जान, िवजान, दशरन, कला, सािहतय इतयािद िविवध केतो मे जीवन को सुनदर एंव भवय बनाने
का पयत करनेवाले मनुषयो के पित समसत मानव-जाित ऋणी है। अननत है मानव-जीवन
का आकषरण और अननत है उसकी भवयता।
वासतव मे समसत सृिष सौनदयर से पिरपूणर है तथा मानव-जीवन मे आकषरण और
भवयता का कोई अनत नही है। पकृित ने मनुषय को अपना जीवन संवार कर उसे सौनदयर
से भरपूर करने की अननत कमता भी दी है। जीवन अनमोल है और उललासमय एंव भवय
होने की असीम संभावनाओं से भरा पडा है। मनुषय और जन-समाज इस धराधाम को
जीता-जागता सवगर बना सकते है। जीवन एक ऐसा दुलरभ ततव है िक वैजािनको के अथक
पयास होने पर भी उनहे पृथवी के अितिरकत इस िवशाल िवश मे कही िकसी अनय गह पर
जीवन का अिसततव होने के लकण अभी तक नही िमले है। मनुषय को यह िवशेषािधकार
पापत है िक वह जीवन के तथा सृिष के रहसयो की खोज कर जीवन को समृद बना
सकता है।
जीवन सचमुच एक वरदान है, पकृित का अनुपम उपहार है िजसके बुिदसंगत
उपयोग दारा मनुषय उसे साथरक एंव आननदमय बना सकता है। जीवन एक ऐसी िनिध है
िजसका अलप सदुपयोग भी मनुषय को गहन तृिपत देकर धनय बना सकता है िकनतु िकसी
अमूलय हीरे का महतव न समझकार अिववेकी मनुषय दीन और दिरद रहकर दयनीय हो
जाता है। अनएव पथम आवशयकता है इस अपितम जीवनिनिध की महता जानने और
समझने की तथा उसका सममान और सुरका करने की।
इस संसार मे केवल पकृित मे ही आकषरणो और सौनदयर-िबनदुओं का सजरन िकया
है। यिद हम तिनक नेत खोलकर देखे तो चारो ओर अननत िचताकषरक एंव सौनदयरपूणर
दृशयावली की नयनािभराम छटा दृिषगोचर होगी। कही पाकृितक शोभा के भणडार, िवशाल
एंव िवसतीणर पवरतो की धयानािवष-सी शैलमाला है िजनके धवल िहमाचछािदत उचच िशखर
उदीयमान सूयर की पखर रिशमयो के सपशर से उदभािसत होकर सविणरम पतीत होते है।
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कही वनो मे िविवध पकार के बृहदकाय एंव लघुकाय वृक और िविवध सवादयुकत फल,
उपवनो मे िविवध पकार के रंग-िबरंगे पुषपगुचछ, कोमल लताओं के िवसतृत जाल और
मदमत भमरो का मधुर गुंजन तथा कही कलकल िननािदनी पयिसवनी निदया, नद और
िनझरर हमारे िचत का हरण कर लेते है। कही दुगधतुलय शेत फेन से सुशोिभत उताल
तरंगो को असंखय भुजाओं के सदृश िनरनतर उठाते और िगराते हुए अथाह समुदो मे अननत
पकार के जलचर तथा िवलकण रत मन को मुगध कर देते है। उषाकालहन तथा
असतकालीन तामवणर सूयर अतयनत मनोहारी पतीत होता है। नील गगन मे नाना आकृित
धारण िकये हुए शेत और शयाम मेघो की कलाएं अतयनत मनोरम दृशय पसतुत करती है।
राित के िनरभ आकाश मे असंखय तारागण के मधय मे संचरण करता हुआ चार चनद िचत
का हरण कर लेता है।
मनुषय ने भी अपनी सौनदयरिपयता एंव सजरकता से धरती पर अनोखे आशयों का
पणयन िकया है। कही मानविनिमरत गगनचुमबी भवय सौध है, कही िभित, वसत, कागज
इतयािद पर अंिकत िचत-िविचत कला-कृितया है, कही िविवध रसो से िसकत आहादकारी
कावय है, कही संगीत सरोवर की मादक गहराई है, तथा कही िथरकते पैरो का
मनोमुगधकारी नृतय। इितहास केवल रण केत की शौयरपूणर गाथाओं से ही नही बिलक जीवन
के िविवध केतो मे मानव की साहिसक उपलिबधयो से भी भरा पडा है।
हमारे चारो ओर आकषरण ही आकषरण है। पािरवािरक जीवन की रसमयता, घिनष
िमतगण के मधय परसपर सलाप, मनोरंजक हास-पिरहास, कीडामगन बालको की मृगधकारी
िकलकरिरया तथा उनके रिचर हाव-भाव, कीडा पागण मे युवको के सपधापूणर खेल,
शारीिरक करतब और साहिसक कायर, एकानत मे सनेहीजन का परसपर पेमपूणर वातालाप
एंव वयवहार, रमणीय सथलो का पयरटन, पाकृितक सौनदयर का रसासवादन, ऐितहािसक
सथलो का िनरीकण, समाज मे दीन-दुखीजन के दु :ख िनवारण हेतु सेवाकायर, तीथरटन,
भजन-कीतरन, संतसंग इतयािद मन को सुख और शािनत देनेवाले अनेक िकयाकलापा है।
यह सृिष सौनदयर का अननत िनधान है तथा जीवन भवय आकषरणो से पिरपूणर है िकनतु
मनुषय अिववेक के कारण संसार को कषमय तथा जीवन को भारमय मान बैठता है।
अपने जूते मे चुभनेवाले कंकर या काटा होने पर उसे िनकाल फेकने के बजाए मागर को
किठन कहना अपनी ही भूल है।
जीवन के आकषरणपूणर तथा उपलिबधयो एंव अनानद की अननत संभावानओं से
भरपूर होने पर भी अगिधत मनुषय् मानिसक दाब एंव तनाव के कारण हदयघातो से पीिडत
होते है तथा दु :ख एंव आशयर तो यह है िक भयंकर हदयाघातो का िशकार होनेवाले लोगो
मे तीस और चालीस वषर के बीच की आयुवाले तरणो की संखया तेजी से बढती जा रही है
और बडे-बडे निसरग होम और यदिप उनका उपचार ततकाल होना अतयनत आवशयक होता
है। िनतय-पित अगिणत लोग अलपायु मे ही सहसा हदयाघात होने पर सवयं भरपूर जीवन
जीने से वंिचत होकर तथा िमतो एंव कुटुमबीजन को रोता हुआ छोडकर काजकविलत हो
जाते है। अगिणत लोग जीवन की िकसी उलझन और कुचल देनेवाले भयानक बोझ
कहते हुए उतेजनावश जीवनलीला का अनत कर देते है। दु :खपूणर आशयर तो यह है िक
जीवनानत कर देनेवाले ऐसे तरणो की संखया बढती जा रही जो उचच िशका पापत कर चुके
होते है अथवा महतवपूणर वैजािनक खोज मे संलगन होते है।
जीवन एक अनजाने केत मे और अनजानी िदशा मे याता के सदृश है। मनुषय याता
के साधनो को जानकर और उनको समझकर ही उसे सुखमय एंव साथरक बना सकता है।
कुशल याती अपने साधनो, रिच और कमता को तथा याता की संभावनाओं को समझकर
याता को रोमाचकारी और आननदपूणर बना सकता है तथा जान एंव अनुभव से युकत होकर
अनय याितयो के िलए भी पेरणपद एंव उपयोगी हो सकता है।
जीवन मे माधुयर है, सरसता है और आननदमयता है। पकृित ने जीवन की अननत
संभावनाओं को तथा संसार के आकषरणो को सवरसुलभ बनाया है तथा िकसीके िलए भी
िनराश एंव हतोतसाह होने का कारण नही है। मनुषय के जीवन मे इतनी अिधक सामगी
देखने, सुनने, पढने के िलए तथा इतना िवशाल केत कायर
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करने के िलए है िक जीवन की अविध अतयलप एंव अपयापत पतीत होती है। िकनतु खेद
है िक मनुषय भटक जाने के कारण जीवन-वरदान को अिभशाप तथा रमणीक संसार को
भयावह सथल मानकर न केवल अपने छोटे-से जीवन को ही बिलक समाज के जीवन को
भी तानवपूणर बना देता है। वासतव मे आवशयकता है आनतिरक सवभाव एंव वयवहार के
पिरषकार की। िववेकशील वयिकत के िलए यह सरल है तथा िववेकहीन वयिकत के िलए
किठन।
मनुषय न केवल दृशयमान बाहय जगत् मे जीता है, बिलक अपने भीतर सव-रिचत
मनोजगत् मे भी जीता है। वासतव मे मनुषय का सुख और दु :ख इस बिहररजगत् पर िनभरर
नही होता बिलक अपने अनतमरन पर िनभरर होता है। हमारे सुख का कारण संसार के अनय
वयिकत और वसतु नही होते बिलक हमारी वैचािरक और भावानातमक् िकया तथा पितिकया ही
हमारे सुख का कारण होती है। हमारी जीवन-शैली ऐसी िचनतन-शैली के अनुरप होनी
चािहए िक वह हमे भय, िचनता और शोक से मुकत रख सके। अतएव हमे संकलप लेकर
अपने मनोजगत् मे एक सवसथ िचनतन-शैली के िनमाण करने का तथा बिहजरगत् मे उसके
अनुरप वयवहार करने का पयत करना चािहए।
इस युग की िवडमबना यह है िक आधुिनक मानव की दृिष मे पगित एंव उनित का
अथर केवल एक है—धनवान्, समृिदशील, ऐयवयरशाली एंव वैभवशाली होना। आज िवजान
एंव तकनीकी के आधार पर भैितक समृिद होना ही सभयता के िवकास का सूचक बन गया
है। मानव के आनतिरक जीवन का सनतुलन िबगड गया है और फलत: शािनत का अनुभव
दुलरभ हो गया है। जीवन मे जीवनतता िवलुपत् हो गयी है तथा जीवन िदशाहीन, भिमत और
नीरस हो गया है। िकसीभी पकार से धन कमाना, ऐशयर सामगी का संचय करना और
‘बडा आदमी’ बनकर समाज पर छा जाना मानो जीवन का लकय है। िदनचया मे शािनत के
कुछ कण िनकालकर िचनतन करना मनुषय की कलपना से बाहर है। आज के मशीनी
जीवन मे चारो ओर जलदबाजी, परसपर गला काटकर आगे बढने की होड, भौितक समृिद
के िलए अनधी दौड, िनरनतर सवाथरपूणर सिकगयता, भटकन, बेचैनी, दवाब और तनाव के
कारण वयिकत अपने को अकेला मानकर दुखी और परेशान हो रहा है। इस सतही जीवन
मे िवचार और कमर का सामंजसय लुपत हो गया है।
आज मानव को सबसे बढकर शािनत चािहए िजससे वह जीवन की पितषा को
समझकर जीवन का समादा कर सके तथा जीवन के सदुपयोग दारा जीवन को उदात,
सौनदयरपूणर और आननदमय बना सके। मनुषय तथा समाज के जीवन को शािनतमय और
साथरक बनाने के िलए गहन िचनतन की आवशयकता सपष है। िवचारपूणर िचनतन का
समावेश होने पर ही मनुषय तथा समाज का जीवन आकषरणपूणर एंव सुनदर हो सकेगा। मन
की भूिम पर वसनत की पसथापना होने पर बिहजरगत् मे भी वसत छा जायगा। आज
भौितक केत मे पगित के साथ ही मनुषय के सवाथर, संकीणरता, भोगिलपसा, वैर और वैमनसय
का भी िवसतार हो गया है तथा जीवन-वािटका मे असमय ही पतझड के घुस जाने से सारा
संसार दुरह एंव भयावह मरसथल पतीत होता है।
मनुषय के िचनतन का सीधा पभाव सवरपथम मिसतषक तथा हदय पर होता है।
सवसथ िचनतन से मिसतषक मे ऊजा, उतसाह और उमंग उतपन होते है। मनुषय का
मुखमंडल चमक उठता है और नेतो मे उललास एंव जीवनतता छलकने लगते है। इसके
िवपिरत दिू षत िचनतन से मनुषय के मिसतषक मे ऊजा का कय होने लगता है, जीवन मे
नीरसता आ जाती है, तनाव उतपन हो जाता है, मुखमणडल तेजहीन हो जाता है और नेतो
मे उदासी और िनजीवता छा जाती है। यह दोषमय िचनतन का ही पिरणाम है िक अवसाद
और अशािनत संकामक रोग की भाित फैल रहे है तथा अगिणत तरणी और तरण घर और
पिरवार मे सब सुख होते हुए भी असहाय-से होकर, मानिसक उचचाटन और बेचैनी के
कारण जीवन को कलेशपद बोझ मानकर उतेजना के कणो मे अपना पाणानत ही कर देते है
तथा अपना उपवन सवयं ही उजाडकर पिरवार और िमतगण के िलए भी घोर दु :ख का
कारण बन जाते है। वासतव मे दवाब (सटेस) तथा अवसाद (िडपेशन) कोई असाधय रोग
नही है बिलक तुिटपूणर िचनतन का सीधा दुषपिरणाम है िजनहे िववेक दारा अवशय ही सदा
के िलए दरू िकया जा सकता है। हमे अपने दु :ख, परेशानी और झुझ
ं लाहट के कारणो को
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अपनी िचनतन-शैली एंव जीवन-शैली मे ही खोजकर धैयरपूवरक उनका उपाय करना चािहए।
हम पाय: महतवहीन बातो को महतव देकर और महतवपूणर बातो की उपेका करके झंझट
मोल ले लेते है। कया हो गया और कया होना चािहए था, इस पर पछताते रहने के बजाए
हम इस पर धयान दे िक हमे कया बनना है और कया करना है।
×

×

×

मानिसक तनाव एंव अवसाद से जुडा हुआ ही हदय-रोग है जो आज मनुषय-जाित
के सवािधक पाणलेवा रोगो मे पमुख है। िचिकतसा-वैजािनको का मत है िक हदय-रोग के
कारणो के िनवारण दारा इसकी रोकथाम करना अतयनत सरल है। यदिप दोषपूणर भोजनिविध, मदपान, धूमपान, मादक पदाथों का सेवन तथा िवशामरिहत पिरशम इतयािद हदयरोग के कारणो के िनदान एंव जीवन-शैली मे पिरवतरन लाने की आवशयकता पमुख तथा
पथम है कयोिक िचनतन दारा ही जीवन-शैली मे पिरवरतन लाना और आदतो का िनयंतण
करना संभव हो सकता है।
मनुषय िचनतन एंव अभयास दारा अपने मन की उतेजना तथा िवचारो के वेग को
िनयंितत करके अपने मन को िसथर, सम और शानत कर सकता है। जो मनुषय खाते-पीते,
बोलते-बैठते-उठते, मल-मूत िवसजरन करते अथवा कुछ भी करते हुए िचनतन को सवसथ
िदशा देने का पयत करता रहता है, उसका िनरनतर सुधार भी अवशय होता रहता है और
वह मानिसक उलझनो से मुकत होकर शािनत पापत करने की िदशा मे बढता ही रहता है।
मानिसक शािनत सदैव सवसथ िचनतन, िववेकपूणर आचरण एंव िनरंनतर सजगता का
पितफल होती है। अपने िचनतन और जीवन-पदितको सीधे रासते पर लगाकर अपने को
संभालना और सुपसन रहना न केवल अपनी सचची सेवा है, बिलक संसार का भी उपकार
है। हमे इसके िलए कृतसंकलप होकर आज और अभी से पसन करना चािहए। जीवन को
सवारंने के िलए अभी देर नही हुई है। िचनतन-शैली एंव जीवन-शैली के पिरवतरन दारा
जयो-जयो मानिसक शािनत पापत करने मे सफलता िमलेगी, तयो-तयो आतमिवशास बढेगा,
दृढता आयेगी, वयिकततव मे आकषरण उतपन होगा और मनुषय का चतुिदरक पभाव बढेगा।
मनुषय के सामने ऐसी पिरिसथित पाय: आती ही रहती है, जब उसका जीवन संकट
मे होता है तथा मानिसक दवाब (सटेस) के अितरेक के कारण उसे यह िनणरय लेना होता है
िक वह डटकर संघषर करे अथवा चुपके से भागकर कही मुंह िछपा ले। संकटमय
पिरिसथित मे मनुषय का समपूणर देह-यनत अपने अिसततव की रका के िलए सिकया हो जाता
है। पकृित देहधारी पाणी को आतमरका के िलए पेिरत करती है। आतमरका करना
जीवनमात का नैसिगरक सवभाव है तथा आतमपीडन सवभाव-पितकूल है। वैजािनको का मत
है िक हमारे सवसथ िचनतन तथा आशा और िवशास को जगाने से हमारी भवय कलपनाओं के
दारा देह मे पबल जैिवक रासयिनक पिकयाएं पारमभ हो जाती है जो मिसतषक तथा देह की
समपूणर कोिशकाओं को जुझार बनाकर पितरका करने मे सिकय कर देती है। अतएव
आवशयकता है सवसथ िचनतन, धैयर तथा इचछा-शिकत की। मनुषय समसत पािणयो मे
अगणी है, कयोिक वह तकरशिकत से युकत बुिद का धारक है। वह बुिद के सदुपयोग दारा
न केवल सवयं सुरिकत एंव सुखी रह सकता है बिलक समसत जल-समाज को भी सुरिकत
एंव सुखी कर सकता है।
यदिप नई-नई पिरिसथितयो के उतपन होते रहने के कारण मानिसक दवाब का भी
होते रहना जीवन का अपिरहायर अंग है, मनुषय बुिद के दारा अवशय की उसका िनराकरण
कर सकता है तथा िनरनतर उंमग और उतसाह से पिरपूणर होकर जीवन को आहादमय बना
सकता है। आधुिनक सभयता का यह अिभशाप है िक मनुषय के जीवन मे केवल बाहय
पिरिसथित ही दवाब उतपन करके नही करती बिलक वह सवयं भी कालपिनक एंव िमथया
दवाब उतपन करके अपने को अकारण ही पीिडत करने लगता है। मनुषय िववेकपूणर और
िनरनतर सजगता से िनशय ही उमंग भरा जीवन िबता सकता है।
जब मानव मिसतषक को कोई उतेजनापूणर सनदेश िमलता है, कुछ गिनथयो मे
ततकाल साव पारमभ हो जाता है िजसके पभाव से सारे देह यनत मे िवशेषत: हदय तथा
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रकत-संचार मे एक उथल-पुथल-सी मच जाती है िजसका आभास नाडी के भडकने से होने
लगता है। हदय शरीर का अतयनत संवेदनशील अंग है तथा सारे जीवन िबना कणभर
िवशाम िकए हुए ही िनरनतर सिकय रहकर समसत अवयवो को रकत तथा पोषक ततवो की
आपूितर करता है। मिसतषक का अतयािधक दवाब हदय मे इतनी धडकन उतपन कर देता
है िक उसे सहसा आघात (हाटर एटैक) हो जाता है।
यदिप हदय आघात के कारण अनेक है तथािप दवाब ही आघात का पमुख कारण
है। पुिषपद भोजन लेते रहने पर भी मानिसक दवाब हदय को आहत कर देता है।
दीघरकाल तक मानिसक दवाब एंव तनाव के रहने पर पेट मे वरण (पेिपटक अलसर),
भयानक िसरददर (माइगेन), अमलिपत (हाइपर एिसिडिट), तवचा-रोग इतयािद भी उतपन हो
जाते है।
मनुषयो मे वयिकतगत भेद होते है तथा बाहय पिरिसथितयो को ही सारा दोष देना
उिचत नही है। कुछ लोग अनयनत िवषम पिरिसथित मे भी पयापत सीमा तक सम और
शानत रहते है तथा कुछ अनय साधारण-सी िवषमता मे भी अशानत हो जाने के कारण
सहसा भीषण हदय-रोग से आहत हो जाते है। अतएव यह सपष है िक मनुषय का दोषपूणर
सवभाव अथवा दोषपूणर िचनतन ही हदयघात का पमुख कारण है। कुछ लोगो के सवभाव मे
बहुत जलदबाजी होती है। वे घर मे हो अथवा कायालय मे हो अथवा िपकिनक सपाट पर
कही मनोरंजन हेतु गए हो, उनहे जलदबाजी लगी रहती है और वे बार-बार घडी को देखकर
समय का िहसाब लगाते हुए मानिसक तनाव मे ही जाते है। उनहे छोटी-छोटी बातो पर
झुंझलाहट हो जाती है तथा वे थोडी-सी पितकूलता मे उतेिजत, उिदगन ओर िनराश हो
जाते है। वे अपने पिरवार अथवा पडोस के साथ िमलकर रहने के बजाए िनतय-नई
समसयाएं उतपन करते रहते है। वे बहुत तेजी से और जोर से बाते करते है तथा
मनोरंजन अथवा िकसी पकार के मानिसक िशथलीकरण मे रिच न लेकर तनावगसत् ही
बने रहते है। िकनतु इसके िवपिरत कुछ ऐसे लोग होते है जो अपने कतरवय-पालन मे
ततपर एंव सावधान रहकर भी न कोई जलदबाजी करते है और न बात-बात मे अधीर एंव
िनराश होते है। ये अपने भीतर आशसत होकर सहजभाव मे वयवहार करते है तथा कभी
उिदगन होकर भडकते नही है। ऐसे लोग मानिसक दवाब, दवाब से उतपन तनाव और
हदयाघात से मुकत रहते है। वासतव मे मानिसक दवाब होना ही बुिद की हार है, िचनतन
की हार है तथा अिववेक है िजसे छोडकर मनुषय को हठ खडा होना चािहए।
हमे यह समझ लेना चािहए िक पाय: मानिसक दवाब बाहय पिरिसथित की पितिकया
होता है िकनतु पतयेक वयिकत की मानिसक पितिकया बौिदक-शिकत के भेद के कारण िभन
होतर है। अतएव पतयेक वयिकत को जीवन मे अपनी िचनतन-शिकत एंव संकलप-शिकत के
जगाते रहने का पतयन िनरनतर करना चािहए तथा अपने सवाभाव एंव सामथयर तथा
पिरिसथितयो के अनुसार ही वयवहार करना चािहए।
पतयेक मनुषय को अपने मानिसक दबाव और उससे उतपन् तनाव के मूल कारण
को अपने भीतर ही अथात अपनी िचनतन-शैली एंव सवभाव के भीतर ही खोजकर उसके
समाधान का बुिदमतापूणर उपाय करना चािहए। अतएव यह अतयनत आवशयक है िक हम
अपने िवचारो और सवभाव को पूरी तरह से जाने िजससे िक हम िववेक के सदुपयोग दारा
अपने मानिसक दबावो का िनयनतण एंव िनराकरण कर सके। हमे आतम-िवशलेषण दारा
अपने गुण, अपने दोष, अपने िवशास, अपनी आसथाएं, मानयताएं, अपने भय और िचनताएं,
अपनी दुबरलताएं, हीनताएं, अपनी समसयाएं, अपने दाियतव, अपनी अिभरिच, सामथयर और
सीमाएं और सीमाएं जानकर अपने िचनतन, सवाभाव एंव जीवन-शैली मे आवशयक पिरवरतन
लाने का पयत करना चािहए। िनशय ही हम अपनी बुिद के उपयोग से अपने िचनतन,
सवभाव एंव कायर-शैली मे सवसथे पिरवतरन लाकर न केवल तनाव-मुकत एंव सुखमय हो
सकते है बिलक अपने जीवन मे िदशा-बोध होने पर अपने जीवन को आननदपूणर एंव कृताथर
कर सकते है।
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×

पिरवतरन पकृित का िनयम है। िवश के कण-कण मे पितकण िनरनतर पिरवतरन
होता रहता है तथा सवरत उतपित, िवकास और िवनाश का कम अबाध गित से चलता रहता
है। मनुषय के शरीर मे भीतर तो िनरनतर पिरवरतन होता ही रहता है, बाहय जगत् मे भी
पिरिसथितयो मे पिरवतरन चलता रहता है। यदिप पिरवतरन होना पकृित का एक अपिरहायर
िनयम है, मनुषय को उतम पिरवतरन मे भी मानिसक दबाव का अनुभव होता है। मनुषय नए
अचछे पद पर, नए अचछे मकान मे जाते समय अथवा असाधारण सतकार पाकर पसन होते
हुए भी मानिसक दबाव का अनुभव करता है तथा पिरिसथित के दु :खद पिरवतरन
(िवफलता, आिथरक हािन, अपमान, िपयजन की मृतयु इतयािद) होने पर तो भयानक मानिसक
दबाव का सामना करता है।
पाय: असाधारण मानिसक दबाव के कारण होते है : अपने िवभाग मे उचचसथ
अिधकारी का रष हो जाना, मुकदमा होना, अकसमात् धन-हािन होना, अपने पुत, पुती,
िमत आिद िकसी िपयजन का िवयोग होना, िकसी घिनष वयिकत की मृतयु होना, अपने पित
िकसी महतवपूणर वयिकत के वयवहार मे रकता अथवा कटुता हो जाना, जीिवका का साधन
न होना, सेवा-िनवृित होना, नौकरी छू ट जाना, बेसहारा हो जाना, रोगगसत् हो जाना, अपने
पिरवार मे पित-पती, भाई-बहन, भाई-भाई, िपता-पुत आिद मे परसपर मनमुटाव महो जाना,
पेम-पसंग का सहसा टू ट जाना, आशा भंग होना, िवशासघात होना, िवफलता होना, भिवषय
अंधकारमय दीखना, उपेका अथवा अपमान होना, कोईबडी भूल अथवा तुिट होना इतयािद।
िववेक दारा इनका समाधान करना बुिद की पराजय है।
आधुिनक युग मे िनरनतर अित वयसत रहनेवाला मनुषय पिरशम और िवशाम का सही
सनतुलन सथािपत न करने के कारण हदयाघात को सहज ही आंमितत कर लेता है।
पिरशम करना मनुषय के सवासथय, सुख और शािनत के िलए आवशयक होता है िकनतु
थककर भी पिरशम करने रहना अपने साथ अनयाय एंव अतयाचार करना है। मनुषय को
थकान होने पर तुरनतकाम करना बनद करके िशिशलन, कायर-पिरवतरन अथवा मनोरंजन
दारा िवशाम कर लेना चािहए। कभी-कभी िनधािरत समय के भीतर ही कायर को िनपटाना
होता है िकनतु ऐसी िसथित मे भी बीच-बीच मे िशिशलन दारा िवशाम कर लेना अतयनत
आशवशयक होता है। अथक पिरशम दारा पदोनित अथवा समृिद-पािपत की जलदबाजी मे
अगिणत युवक हदयघात के िशकार हो जाते है। कमता से अिधक कायरभार वहन करते
रहना घातक िसद होता है। पशु-पकी भी िशिशलन एंव िवशाम करना जानते है। कुते और
िबलली लमबी-सी अगंडाई लेकर फैलते और िसकुडते हुए, गधे िमटी मे लेटका बार-बार
करवट लेते हुए तथा बनदर नेत मूंदकर बैठे हुए मानो मनुषय को िशिशलन की िशका देते
है।
कायर को िनपटाते समय बीच-बीच मे पाच-सात-िमनट के िलए अलप िनदा (झपकी)
का अभयास होना अतयनत लाभकारी होता है। िशिशलन के अभयास से मानिसक दबाव,
रकतचाप-वृिद इतयािद से तो मुिकत िमलती ही है, मनुषय की कायर-दकता भी बढती है।
िवशाम खोयी हुई ऊजा को वािपस लाकर मनुषय का तुरनत ताजा बना देता है। मनुषय यह
अभयास कर सकता है िक जब भी उसे आवशयकता हो, वह िशिशलन दारा लघु-िवशाम
करके अपने मिसतषक को सचेतन बनाकर शरीर पर पूणर िनयनतण कर ले। लघु िवशाम
की अनेक िविध है तथा मनुषय िकसी भी उपयुकत िविध का अभयास कर सकता है।
उदाहरणाथर हम थकान का संकेत होने पर अलप काल के िलए कात रोककर बैठे हुए ही
शरीर को पयापत िवशाम दे सकते है। लघु-िवशाम का दस
ू रा पकार यह हो सकता है िक
हम कुसी अथवा सोफा पर ही सुखद मुदा मे पीछे सहारा लेते हुए बैठे जाये , नेत बनदकर
िकसी सुनदर पाकृितक दृशय की कलपना दारा अपने मन तथा सारे देह मे शािनत-संचार का
अनुभव करे और आठ-दस िमिनट बाद धीरे-धीरे नेत खोल ले। थकान का अनुभव होते ही
िकसी भी समय हम ऐसे लघु-िवशाम दारा देह मे ऊजा का संचार तथा मन मे शािनत का
अनुभव कर सकते है।
िनतय-पित िशिशलन पिकया का पात: तथा साय अभयास करने से मनुषय मानिसक
दबाव एंव तनाव से मुकत रह सकता है।
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1.
2.

3.

दैिनक अभयास के िलए मनुषय को एक नीरव एंव शानत सथान पर नेत
बनदकर िवशाम की मुदा मे बैठना चािहए तथा लगभग पनदह िमिनट तक पतयेक
लमबे शास के साथ, शास पर धयान रखते हुए, एक से दस तक िगनना चािहए।
अथवा नेत मूंदकर लेटे पैर से िसर तक सब अंगो को मन से देखते हुए
िशिशल करके लगभग पनदह िमिनट तक िकसी सुनदर दृशय की अथवा िकसी
महान् सनत के शानत सपरप की कलपना करनी चािहए और शािनत का अनुभव
करते हुए, कभी-कभी मन मे ही सवयं से कहना चािहए, "मै िचनता िवमुकत हो गया
हूं, मुझे गहन शािनत िमल गई है, मैने शािनत पापत करेन की िविध जान ली है।
"ऐसा करते समय अलप िनदा आ सकती है जो मनुषय को बहुत ताजगी दे सकती
है।
अथवा पनदह-बीस िमिनट तक शव की भाित िनससपनद लेटकर मन को
िवचारो से िरकत करके चारो ओर पकाश देखने की कलपना करते रहना चािहए
तथा यिद अलप िनदा आ जाए तो उसका सवागत करना चािहए। अलप िनदा के
उपरानत धीरे-धीरे नेत खोलते हुए और ताजगी का अनुभव करते हुए मनुषय को
कुछ उतम आशाजनक कलपना करती चािहए।
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गहन मानिसक शािनत पापत करने के िलए ‘धयान’ पिकया का अभयास ही शेष है।
संसार मे पगितशील देशो के सभी हदय-रोग िवशेषज एकमत है िक िनतय-पित दो बार
धयान का अभयास करना मनुषय को न कवल मानिसक तनाव से मुकत करके मिसतषक को
शानत एंव सशकत बनाता है तथा हदय को रोग-मुकत एंव सवसथ कर देता है बिलक जीवन
मे एक अिनवरचनीय रसमयता का संचार भी कर देता है तथा मनुषय का जीवन उंमग और
उलसाह से भर जाता है। धयान का अभयास करनेवाला मनुषय अपनी सभी समसयाओं का
समाधान करने मे सकम हो जाता है। वह कभी उतेिजत एंव उिदगन नही होता तथा किठन
पिरिसथितयो के साथ घोर संघषर करने के िलए तैयार रहता है। वह दस
ू रो के साथ
वयवहार करने मे झुंझलाता नही है तथा ककिठन दाियतव से भी नही घबराता है। वह सवयं
को कभी अकेला और असहाय नही करता तथा उतसाहपूणर रहता है।
िवकास कम के अनतगरत मानव-बुिद का पादुभाव एंव िवकास एक जिटल पिकया से
ह ुआ
ा है। मानव का मिसतषक पशुओं की मिसतषक की अपेका अिधक बडा होता है िताा
उसका ढाचा भी िभन है। शिकत होना है। मानव-मिसतषक का नेतो से िवशेष समबनध होता
है तथा उसके िकयाकलापो का पभाव हदय पर ततकाल होता है। भवय पाकृितक दृशयो,
सनतो एंव िपयजन का दशरन, िचनतन तथा धयान मिसतषक एंव हदय की संजीवनी होता है।
हमारे देश मे धयान की अगिणत पदितया पचिलत है तथा सभी उपयोगी है िकनतु
कुछ पदितया अतयनत सुगम और सरल है सभी का उदेशय अपने भीतर जागरण, आतमिवशास एंव दृढता की िसथित उतपन करना है। यदिप धयान-पिकया सीखने के िलए एक
कुशल िशकक की सहायता लेना लाभकारी हाता तथािप मनुषय सवयं भी अभयास के दारा
धयान की एक उतम अवसथा पापत कर सकता है। धयान-पिकया का अभयास मानवमिसतषक की परमौषिध है तथा इसके पिरणाम कलपनातीत है। धयान के अभयास से मनुषय
की िजजीिवषा (जीने की इचछा जो संकलप-शिकत अथवा इचछा-शिकत के साथ जुडी होती
है) का समबनध अपने भीतर गहरे सतर पर ऊजा क अकय एंव अजसत सतोत से हो जाता
है जो मनुषय के सवागीण िवकास एंव आननद का एकमात रहसय है। िकसी आधयाितमक
गुर का समाशय पापत करना तो घोर आतप मे महान् वट वृक की सुशीतल छाया मे बैठने
के सदृश होता है। ‘धयान’ के महतव को सभी महान् धमों ने अपने -अपने ढंग से
सवीाकर
ाा
ि
क या है। सारे संसार मे धयान की अगिणत पदिनयो का पचलन होने से
धयान काक महतव िनिवरवाद है। बौद गनथो मे धयान की िवपशयना पदित का िवसतृत
िववरण है तथा उसके कुशल पिशकक उसके पचार मे जुटे हुए है। जैन सनतो दारा
पचािरत पेकाधयान पदित भी अतयनत उपयोगी िसद हुई है। यह सुखद आशयर है िक
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आिसतक धमाचायों की भाित ही अनेक घोर नािसतक िवदान भी अपने -अपने ढंग से धयान
की उपादेयता को सवीकार करके उसका उपदेश कर रहे है।
धयान का अभयास मनुषय के शारीिरक एंव मानिसक सवासथय के िलए िनदा की
भाित अनयनत महतवपूणर एंव आवशयक है। पगाढ िनदा के सदृश धयान के दारा मनुषय सब
कुछ भूलकर तथा िवचारशूनय होकर िवशाम का लाभ उठाता है। िकनतु वासतव मे धयान
का अथर िरकतता अथवा शूनयता नही है तथा उसका उदेशय गहन िवशाम पापत करना भी
नही है बिलक मन की बाहर की ओर दौडने की िकया को िवपिरत िदशा मे लाकर उसे
भीतर ही िदवय चैतनयामृत अथवा िवचारो के आननदमय मूल सतोत से जोडना है। मनुषय
का मन अवचेतन सतर से भी परे शुद चेतना के सागर का संसपशर करके जीवन की
भवयता के दशरन से संतृपत हो जाता है। धयान िचत की एकागता भी नही है बिलक बौिदक
जतश से परे उसका गहन आनतिरक चेतना से जुड जाना है। धयान-पिकया मे मन कुछ
समय के िलए सम, िसथर और सुशानत हो जाता है िजसकी उपमा वायुरिहत सथान मे सम,
िसथर और पशानत से दी गई है। धयान-पिकया मे मनुषय आनतिरक करता है।
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धयान का पथम चरण मौन है। धयान के पिरपेकय् मे मौन का अथर केवल वाणी का
मौन ही नही है बिलक बाहर से मन को हटाकर भीतर अपने िवचारो और भावो का तटसथ
दशरन करना भी है। आधुिनक युग मे खाद-पदाथों के पदषू ण के अितिरकत वायु पदषू ण
और धविन पदषू ण मानव के िलए अिभशाप बन गए है। सडको पर कार आिद वाहनो के
हानर तथा सथान-सथान पर धविन िवसतार (लाउडसपीकर) का पयोग वातावरण को
अनावशयक शोर से भर देता है। मनोवैजािनक धविन पदषू ण के बढते हुए खतरो से हमे
सावधान कर रहे है। धविन िवसतारको के अित पयोग के कारण अनेक धररमसथल भी
अशािनत सथल हो गए है। वैजािनक हमे धविन पदषू ण के दुषपिरणामो के पित सचेत कर
रहे है। तीवर रकत धमिनयो को कठोर और संकरा बना देती है तथा सनायिवक िवकार
उतपन करती है। धविन पदषू ण का कुपभाव यकृत और पाचन िकया पर भी पडता है।
तीवर धविन शोर से कायरकमता तथा एकागता भी नष होती है। बाहय शोर अथवा शािनत
का मन की अवसथा पर गहन पभाव होता है। मानिसक शािनत की कामना करनेवाल
वयिकत को पाय: कुछ समय तक एकानत मे मौन होकर बैठना चािहए। अनेक महापुरष
सपताह मे एक िदन मौन का अभयास करते है। मन पर िनयंतण रखने के िलए मौन का
अभयास करना अतयनत आवशयक है।
धयान की सहज, सरल और सुगम िविध यह है िक मनुषय को पात: तथा साय एक
शानत सथान पर शरीर को ढीला करके संिवधाजनक मुदा मे बीस-पचचीस िमिनट तक
सुखद आसन पर नेत मूंदकर सीधा बैठना चािहए। पैरो को मोडकर सीधा बैठने से शुद
रकत का पवाह मिसतषक की ओर अिधक हो जाता है। मन को अनतमुरखी करने के िलए
नेतो का मूंदना आवशयक होता होता है कयोिक नेतो के खुले रहने से मन बाहय जगत् की
ओर सहज ही दौडता है तथा अनतमुरखी नही हो सकता है। नेत मूंदे हुए ही पिहले मन मे
यह कामना करनी चािहए िक पतयेक अंग िशिथल हो सकता है। ततपशात् अपने भीतर ही
मन को केिनदत करके ॐ (अथवा िकसी लघु मंत) का समान गित से धीरे-धीरे मानिसक
उचचारण करते हुए भीतर ही उसे सुनने का पतयत करना चािहए। ॐ के उचचारण मे लय
होना अनयनत महतवपूणर होता है। मिसतषक के िलए लयपूणर मनद धविन सवासथयपद एंव
शािनतपद होती है। धयान के समय जब कभी मन उचचारण (जपत् से हटकर िवचार मे
लग जाए, उसे पुन: मानिसक उचचारण एंव शवण मे ही लगा देना चािहए। पारमभ मे अनेक
बार मन को इधर-उधर दौडने से वािपस लाकर ॐ के उचचारण एंव शवण मे लगाना होता
है, िकनतु धैयरपूवरक इसका अभयास करते रहने पर कालानतर मे उचचारण और शवण सहज
एंव िनबाध हो जाता है।
पाय: सभी की िशकायत होती है िक धयान के अभयास मे मन इधर-उधर भागता
रहता है तथा िसथर नही होता। वासतव मे धयान (मेडीटशन) हमारे अवधान (एटेनशन) की
मात एकागता (कानसेटेशन) ही नही होता। नेत मूंदकर धयान मे बैठने पर मन, चेतन सतर
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पर चचंल रहते हुए भी, अवचेतन सतर शािनत की िदशा मे अगसर हो जाता है। धयान के
ं मे उतेजना का कय होने
समय जो भी भाव अथवा िवचार उभर कर आता है, उसके संबध
लगता है तथा अनासिकत का उदय हो जाता है। धयान के समय बार-बार मंत पर लौटते
हुए सूकम सतर पर जाते हुए मंत और िवचार दोनो लुपत होने लगते है। मन की उछलकूद
बनद होने पर मन िनशल हो जाता है तथा मानो वह बैठने लगता है। सतबधता की अवसथा
मे शरीर भी मन के साथ ही तनावरिहत और ढीला होने लगता है ताााा
परम
ााा
िवशाम की अवसथा मे भीतर शािनत का मीठा आभास होने लगता है।
पयापत काल तक िनतय-पित धयान का िनयिमत अभयास करने से चेतन सतर पर
मन को िदवय शािनत का अनुभव होने लगता है। धयान के काल मे ऐसे अमृतमय कण आते
है ॐ के उचचारण और शवण का सहसा लोप हो जाने पर मनुषय का िनिवरचार मन
अिनवरचनीय आननद के सागर मे िनमगन हो जाने पर मनुषय को चैतनय सता के अमृतमय
संसपशर की गहन आननदनुभूित के अितिरकत अनय कोई बोध नही होता। अमृतमय कणो
का यह अनुभव मनुषय को कुणठा, िनराशा, आकोश एंव उतेजना से उनमुकत कर देता है
तथा मन मे साितवक ओज का संचार हो जाता है। पिरणामत: मनुषय जीवन की संकरी
डगर पर डगमगाता नही है और साहसपूणर सीधा चल सकता है। धयान के अभयास से
कालानतर मे मन को दिू षत करनेवाले काम, ईषया, देष,् घृणा, कोध, लोभ, मोह, िनराशा,
िचनता, भय इतयािद िवकारो का शमन होने पर मनुषय सनतुिलत, सम और शानत हो जाता है
तथा िचत की एकागता-शिकत बढ जाती है। पुरानी भूलो तथा शोक, हािन और अपमान
की दु :खद घटनाओं के कलेशपद संसकार िनषपभाव हो जाते है तथा मनुषय उनका समरण
होने पर उिदगन नही होता। उतेजना और भय शानत हो जाते है तथा कोध की अिगन भी
शानत हो जाती है।
धयान का अभयास करने से मनुषय को अगिणत लाभ होते है। धयान के अभयास
दारा हाइपोथेलमस गंिथ के सिकय हो जाने से नािडयो की उतेजना शानत हो जाती हे तथा
पीयूष गंिथ (िपटयुटरी गंिथ) के सिकय हो जाने से नािडयो की कायरकमता बढ जाती है
िजससे अनेक रोग दरू हो जाते है। धयान का अभयास मनुषयकी षबराहट, अकेलानप,
भिवषय का भय, िचडिचडापन, वयाकुलता और तनाव को दरू देता है तथा मन शानत, सम
और सनतुिलत हो जाता है। धयान का ततकाल फल यह होता है िक मनुषय देर तक
ताजगी का ऐसे ही अनुभव करता है जैसे जल मे डबकी लगाने से देर तक शीतलता का
अनुभव होता है। पात: काल धयान करने से मानो िदनभर के िकयाकलापो के िलए तैयार
हो जाता है। यथासंभव धयान का अभयास खालीपेट करना चािहए। धयान का अभयास
करने पर मनुषय मे आतम-सुधार एंव आतम-िनमाण के िलए आनतिरक उतसाह उतपन हो
जाता है।
मौन धयान का आवशयक तथा महतवपूणर पूरक है िजसका अभयास धयान से पूवर
अथवा कभी-कभी सवतंत रप से एकानत मे सीधा बैठकर तथा नेत मूंदकर कुछ िमिनटो
तक करना मन को सनतुिलत, सम और शानत करने के िलए अतयनत सहायक होता है।
मौन का एक उदेशय अपने िवचारो और उदेगो का तटसथ होकर देखना है तथा कभी-कभी
आतमिनरीकण दारा अपने िवचारो, उदेगो को समझकर उनहे िदशा भी देना है। िवचारो और
उदेगो के समाधान दारा ही मन का िनयनतण भी िवचारो से ही हो सकता है। अतएंव मन
को सनतुिलत, सम, शानत तथा सशकत करने के िलए एकानत मे िवचारो को सुलझाना ही
युिकतयुकत है। मनुषय अपने िवचार, सवभाव, गुण, दोष, सामथयर, कमता आिद को भली
पकार जानकर ही अपने वयिकततव मे आवशयक पिरवतरन ला सकता है। अपने -आप जानना
सारे संसार को जान लेने की अपेका आवशयक एंव उपयोगी है।
अपने मन को िनयिनतत कर लेना मनुषय की एक महान् उपलिबध होती है। मन
को िनयिनतत एंव एकाग करने का गुण जीवन के समसत केतो मे सफलता पापत करने का
सशकत मनत है। मन कया है ? वासतव मे िवचारो का िनरनतर पवाह ही मन है। पाय:
िवचारो का जनम जानेिनदयो (नेत, नािसका, कणर, िजहा और तवचा) के साथ संसार के
बाहय पदाथो का संसपशर होने पर मिसतषक मे होता है। इसके अितिरकत मिसतषक के
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अवचेतन सतर से बुलबुलो अथवा लहरो के सपशर नए-नण् िवचार उठकर भी चेतन सतर
पर आते रहते है।
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मनुषय के िचनतन के दो पक होते है—िवचारातमक् तथा भावातमक। यदिप केवल
मिसतषक ही िवचार और भावनाओं का केनद है, पाय: भावना को हदय से समबद िकया जाता
है कयोिक भावना का सीधा पभाव हदय पर ततकाल होता है। वासतव मे भावना भी िवचार
का ही अंश होती है िकनतु वह उसकी अपेका अिधक सूकम होती है। भावना के कायर के
पृष मे उसे करने का भावातमक पक सिनिहत होता है। भावना के िबना कमर िनषपाण एंव
नीरस होता है। भावना का अितरेक भावुकता का रप लेकर मनुषय को भटका देता है।
भावना ही उदेग को जनम देती है। मनुषय भावना के सदोष हो जाने एंव भावुकता के पबल
होने को अपने िववेक दारा िनयंितत कर सकता है जो पकाश की भाित मनुषय के जीवनपथ को आलोिकत कर देता है तथा उिचत एंव अनुिचत, नयाय एंव अनयाय, पुणय एंव पाप
और धमर एंव अधमर को सपष करके ठीक िनणरय लेने मे सहायक होता है। िववेक को
िनरसकार करेन पर मनुषय चालाक लोगो की कठपुतली हो जाता है। िववेक का तयाग
करने पर मनुषय धमानधता, अंधिवशास, रिढवािदता ओर कटरता के कुचक मे फंसकर
पशुवत् आचरण करने लगता है।
मनुषय अपने िकसी िवचार से पेिरत होकर ही उतम अथवा अधम िचनतन तथा
सतकमर करने मे पवृत होता है। अतएव मनुषय पयापत सीमा तक अपने सारे सुख और
दु :ख, उनित और अवनित, समिद और दिरदता तथा यश और अपयश के िलए सवयं ही
उतदरदायी होता है। सुख और दु :ख के कारण हमारे भीतर ही होते है। कभी हम कोध
से उतेिजत होकर, कटुता उतपन करके वयथर ही दस
ू रो को शतु बना लेते है, और िफर
पछताते है, कभी हम भय और िचनता से गसत होकर पौरषहीन एंव दयनीय बन जाते है ,
कभी िववेक खोकर अनुिचत वयवहार कर देते है और कभी शोकािद के आवेश मे
भावुकतावश अपने जीवन को एक बोझ बना लेते है, कभी सममान एंव सता की भूख और
आलोचना से परेशान हो जाते है, कभी सहसा धनपित हो जाने की उतकणठा से उिदगन हो
जाते है तथा जीवन-याता मे संभलकर आगे बढने के बजाए अकारणद ही संसार और
भगवान् को दोष देने लगते है। अपने दु :ख और दोषो के िलए भागय को अथवा दस
ू रो को
दोष देना मनुषय को यथाथर िचनतन तथा संघषर से हटाकर िनकममा बना देता है। मनुषय
िचनतन दारा ही िचनतन को सवसथ िदशा मे मोड सकता है तथा धयान दारा शानत और
सबल और बना सकता है। मनुषय का साधारण-सा पेरक िवचार भी समग चेतना को
पभािवत कर देता है।
धयान से पूवर तटसथ िचनतन करने के समय कुछ िमिनटो तक अपने िवचार-जगत्
को देखने और समझने के िलए धैयर होना अतयावशयक है। तटसथ िचनतन का अथर है
अपने ही िवचारो भावनाओं, इचछाओं, कलपनाओं और उदेगो को एक दशरक की भाितं उनमे
िलपत हुए िबना ही देखना। अनेक बार मनुषय अपने ही िपचारो एंव भीषण कलपनाओं से
भयभीत हो जाता है तथा अपने मन को उनकी ओर से ततकालल मोड लेना चाहता है।
उसके िचत मे अपने िवषय मे अनेक पकार की आशाकाएं आने लगती है—कयो मै एक
अभागा वयिकत हूं, कया मेरी समसयाओं का कोई समाधान नही है, कया मै दोषो से भरा हुआ
अधम पापी हूं, कया मेरा भिवषय अनधकारमय है, कया मै शोचनीय िदशा मे जा रहा हूं, कया
मेरा अनत खराब है। तटसथ िचनतन मे कलेशपद एंव उतेजनापद िवचारो की ओर
उपेकाभाव रखने से वे ऐसे ही चले जायेगे जैसे सवागत न होने पर िबना बुनाए हुए अभद
अितिथ, िकनतु रिचकर पूवरक धयान देने से वे सबल करने से भयपद आंशका तथा िवचार
कीण होकर िनषपभाव हो जाएंगे।
इसके अितिरकत भी हमे कभी-कभी एकानत मे बैठकर िववेपूवरक आतमवलोकन
करना चािहए अथात् अपने िवचारो और आचरण का धैयरपूवरक िनरीकण करना चािहए िक
कया गहय ओर कया तयाजय है। वासतव के संसार के पतयेक मनुषय मे कुछ दुबरलता और
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दोष होते है तथा पतयेक मनुषय मे संकलप-शिकत एंव पयत दारा उनसे ऊपर उठने की
अथात उनसे मुकत होने की कमता अवशय होती है।
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अपने जीवन मे आतमसुधार दारा अकय सुख एंव शािनत की पसथापना का यत
करनेवाले मनुषय को सवरपथम अपने-आप को जयो का तयो सहषर सवीकार करना चािहए।
"मै जैसा भी हूं, वैसा हूं। संसार मे सभी मनुषयो मे गुण और दोष होते है, मुझमे भी गुण और
दोष है। पूणर कोई नही है, "ऐसा सोचकर अपने को यथावत् सवीकार करना चािहए। अपने
िकसी दोष पर बल देकर अतयािधक लिजजत होना तथा अपने -आप को बुरा या पापी
कहकर कोसना अथवा अपनी िकसी भूल पर अतयािधक बल देकर अपने -आप को मूखर
मानते हुए िधकार करना घोर अिववेक है। अपने -आप को बुरा अथवा मूखर मानकर अपने
िवषय मे िनकृष धारणा बनाना आतमिवशास को कीण करता है। िजस पकार अपने दोषो
के कारण अपने से घृणा करना अिववेक है। वासतव मे मनुषय को अपने समग सवरप को
अथात् शािररीक रचना, सवसथय इतयािद बाहय सपरप को तथा गुण, दोष, समथरता,
दुबरलता, सवभाव इतयािद आनतिरक सवरप को यथावत सवीकार कर लेना चािहए। अपने
से धुणा करने तथा अपनी कोरी आलोचना करने के बजाए हम िजस पर है , उसे सहषर
सवीकार करके अपने से सहयोग करके, वहा से ही आगे बढने का पयत करना चािहए।
मनुषय सवयं से घृणा और शतुता करके कभी न पसन रह सकता है आैाा
रन ज ीवन मे
आगे बढ सकता है। मनुषय का कतरवय है िक वह सदा भिवषयोनमुखी होकर आगे ही बढता
रहे।
आतम-िनरीकण के दारा मनुषय अपने समग सवरप को समझ लेता है तथा वज
संकलप लेकर पयत दारा धीरे-धीरे गुणो का िवकास तथा दोषो का तयाग करते हुए आतमकलयाण की ओर बढ सकता है। जीवन को खणडो मे िवभािजत नही िकया जा सकता
तथा जीवन की समगता सवीकार करके ही वयिकततव का िवकास हो सकता है। भीतर
अनतराल मे अपिरिमत शिकत का भणडार पसुपत् अथवा अवयकत पडा है तथा मानव की
मानिसक एंव आधयाितमक उनित की कोई सीमा नही है।
वासतव मे यह महतवपूणर नही है िक हममे अभी िकतने दोष है तथा हमने िकतनी
सफलता पापत की है अथवा हम ऊपर उठने मे िकतनी बार िवफल हुए है, बिलक महतवपूणर
यह है िक हमने बार बार पयत िकया है। पूणरता तो एक आदशर है, एक सवप है जा कभी
पापत् नही होता िकनतु उसकी ओर बढते रहने मे ही जीवन की कृताथरता है।
धयान तथा मौन की साधना मानव के िदवय अनततरम के संसपशर दारा उसे पूणरता
की ओर िनरनतर बढने के िलए पेिरत करती है। धयान का कोई तातकािलक चमतकार
लिकत नही होता। िकनतु धैयूरपवरक तथा िनयिमत रप से िनतय-पित पात: तथा साय धयान
के अभयास का पिरणाम चमतकारपूणर अवशय होता है। धयान का िनयिमत अभयास करने
से जीवन मे सजरनातमकता, बुिदबल और आनतिरक ऊजा का िवकास होने लगता है तथा
मन भीतर अतल गहराइयो मे पहंुचकर अननत शािनत की अनुभूित कर लेता है। मनुषय का
मन चेतना के सूकम सतरो को पार करके उस आननदावसथा को पापत कर लेता है जो मन
का परम गनतवय एंव पापतवय है। वही चेतना का शुद रप अथवा मूल रप अथवा
सवाभािवक रप है। मन अपनी वािछत िनिध को पाकर तृपत एंव कृतकृतय हो जाता है।
धयान मनुषय को भौितक धरातल से ऊपर उठाकर आधयाितमकता की ओर उनमुख
कर देता है। धयान का अभयास मनुषय को वयवहार-जगत् मे अिधक सिकय, संघषरशील,
िसथरमित, धैयरपूणर, साहसी और दृढ बना देता है। जीवन मे सवोचच आननद की अनुभूित
पापत करने के िलए, सघषर के समय भी मानिसक सनतुलन एंव शािनत अनाये रखने के िलए
तथा पतयेक अवसथजज मे िनरनतर शानत और सुपसन रहने के िलए, धयान का अभयास न
केवल सवयं शानत और सुपसन रहता है बिलक अपने चारो ओर वातावरण मे शािनत और
पसनता का पसारण करता है। िजस पाकर नयूटन इतयािद वैजािनको ने भौितक केत मे
असाधारण िसदानतो की खोज करके मानवता िक िहत िकया है, उसी भारतीय ऋिषयो ने
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आधयाितमक केत मे धयान की महतवपूणर पिकया का अनवेषण करके मानवता के कलयाण का
मागर पशसत िकया है।
धयान का िनयिमत अभयास करने से मन की अनतमुरखी याता का पारमभ हो जाता है
तथा जीवन की िदशा ऊधवरमुखी हो जाती है। चेतना के सूकमतम सतर को पापत करके
मनुषय अकलपनीय शानत एंव अिनररवचनीय आननद के संसपशर दारा कृताथर हो जाता है।
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पकृित ने मिसतषक और शरीर के पूणर के िलए िनदा का िवधान िकया है। िनदा ऐसी
िवलकण जादगू रनी है िक शानत, कलानत शोकाकुल, वयाकुल, िनराश्-हताश और दु :खी
मनुषय उसकी गोद मे जाकर सब कष भूल जाता है और जगाने पर एक ताजगी भरा
जीवन पा लेता है। मानव के िलए िनदा पकॄित का अनूठा वरदान है। िनदा माता और िमत
की भाित सदा ही सवागत के िलए हाथ पसारे हुए आमंितत करती है िकनतु आधुिनक मानव
पकृित से इतना दरू चला गया हे िक वह िनदामाता की अमृतमय गोद मे भी सहज ही नही
जा पाता। संसार मे िनदा का कोई िवकलप नही है। भागयशाली है वे लोग जो पकृित के
इस अदभूत वरदान का महतव समझते है तथा दया के पात है वे अभागे लोग जो अपने
अिववेक के कारण िनदादेवी की ममतामयी छतचछाया मे नही जा पाते। िनदा हमारे
मिसतषक और शरीर की माग है िजसकी पूितर न करना अथवा िजसमे कटौती करना
मानिसक एंव शारीिरक सवासथय के िलए घातक होता है। समसत मानिसक एंव शािररीक
रोगो की िचकतसा के िलए िनदा परमावशयक होती है। अनेक आधुिनक मनिशिकतसक
िनदा तथा उसकी औषिध भी। हा, अिधक सोने की आदत के िलए हािनकार होती है।
पकृित ने राित का िवधान िदन के पिरशम की थकान को दरू करके पुन: ताजा हो
जाने के िलए िकया है। मनुषय को राित मे िकतनी देर तक सोना चािहए, यह वयिकत की
आयु और उसकी शारीिरक एंव मानिसक अवसथा पर िनभरर होता है। मनुषय के िलए
औसतन आठ या सात घणटे की नीद पयापत होती है। राित मे देर तक जागकर िनदा मे
कटौती करना अथवा पात: सूयोदय के बाद तक सोते रहना पकृितक िनयम के पितकूल
है। यथासमभव िनयिमत समय पर सोना तथा जागना चािहए। िजनका मन िवदेष, िचनता
एंव भय से िवमुकत होता है, उनहे शारीिरक कष होने पर भी नीद आने मे कोई किठनाई
नही होती िकनतु िजनके मन मे िवदेष, िचनता अथवा भय भरा रहता है, उनहे िनदा न आने मे
कोई किठनाई नही होती है। िनदा की आवशयकता होते हुए भी िनदा न आने से मन मे
वयाकुलता छा जाती है जो समसया बन जाती है। नीद लाने की गोिलयं कभी आवशयक भी
हो सकती है िकनतु उनकी आदत डालना एक नयी मुसीबत मोल लेना है तथा उनके
िनरनतर उपयोग से सवासथय को अतयािधक हािन होती है।
िनदा के समय ढीले वसत पहनना चािहए तथा िबसतर न अतयािधक कठोर होना
चािहए, न अतयािधक लचीला ही। कमरे मे सवचछ वायु का पवेश एंव संचार होना सदैव
उपयोगी होता है। यिद िनदा न आ रही हो तो नीद लाने की इचछा छोडकर, मन को िदन
िचनताओं से िरकत करने कके िलए कोई मनोरंजक पुसतक पढना पारमभ कर सकते है
अथवा अपने घर मे ही थोडी देर तक टहलते हुए खेले आकाश के नीचे सवचद वायु मे
गहरे शास ले सकते है। िनदा लाने के िलए हमे लेटकर पैरो से िसर तक धीरे-धीरे ऐसा
महसूस करना चािहए मानो सारा देह चेतनाशूनय हो रहा है अथवा लमबे और गहरे शास
लेना चािहए। शास लेते समय मन मे ही एक से दस तक बार-बार िगनती िगनने से नीद
आने लगती है। भगवान् की शिकत और कृपा मे िवशास करनेवाला वयिकत िचनता छोडकर
भगवान् के समरण अथवा जप दारा मन को शानत कर लेता है। राित मे अपनी शयया के
समीप मेज या सटू ल पर कागज, कलम और पीने के िलए पानी रखकर लेटना चािहए।
यिद िनदा के िलए लेटने पर िचनता िनवारण-समबनधी िकसी आवशयक कायर का समरण हो
रहा हो तो उसे कागज पर िलखकर मन को िरकत कर लेना चािहए। थोडा-सा जल पीने
से भी मन शानत होता है। मन के िकसी महातमा अथवा संत के शानत सवरप का समरण
करने से अथवा नदी-तट, उपवन आिद िकसी शानत सथल की कलपना करने से भी िनदा
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आ जाती है। बौिदक शम करनेवाले लोगो के िलए िदन मे शारीिरक वयायाम अथवा िकसी
पकार का शम करना राित मे िनदा लाने मे सहायक होता है।
मनोवैजािनको के अनुसार िदन मे कायरवयसतता के बीच अलप िवशाम के रप मं दो
बार थोडी देर तक लघु िनदा अथवा झपकी लेना न केवल सवाभािवक है, बिलक आवशयक
भी है। मधयाह मे भोजन अथवा अलप भोजन लेने के पशात् लगभग पचचीस-तीस िमिनट
तक लेटकर िनदामय िवशाम अतयनत सफितरदायक होता है तथा कायर-कुशलता मे वृिद
करता है। समय की बचत की दृिष से िवशाम की कटौती करना घातक िसद होता है।
मनुषय के िकया-कलापो का पारमभ िवचार से ही होता है तथा िवचार ही मनुषय की
समसत समसयाओं के समाधान के िलए अपिरहायर साधन है िकनतु हमारे िलए िवचार और
िचनतन-पिकया को ठीक पकार से जानना और समझना भी आवशयक है। िवचार और
िचनतन ही भावो एंव उदेगो को िनयंितत रखकर मानिसक सनतुलन और शािनत को सुरिकत
रखते है। इस पकार मनुषय के िवकास और िवनाश, उनित और अवनित, सुख और दु :ख
मूलत: िचनतन पर ही आधािरत होते है।
कुछ लोग सवाभाव से ही उदास और दु :खी रहते है, कुछ अशानत और उिदगन रहते है,
कुछ भय और िचनता से गसत रहते है तथा कुछ मसत और पसन रहते है। वासतव मे
सवभाव के पृष मे घटनाओं का एक इितहास होता है। िनशय ही मनुषय गहन आत् िवशलेषण दारा अपने सवभाव को जान और समझ सकता है तथा िचनतन एंव िवचार और
धयान के अभयास से अपने मन को सवसथ करने मे पूणर सकम होता है। आवशयकता है
अपनी उिदगनता एंव दु :ख के कारणो को जानने , अपनी कामनाओं और कुणठाओं को
पहचानने तथा उनके समाधान का उपाय सोचने तथा संकलपपूवरक पयत करने की।
पुरषाथर के साथ ही िचनतन-पक को सवसथ एंव सशकत रखना जीवन मे दृढता एव
सफलता पापत् करने के िलए परमावशयक है। वासतव मे मन की शिकतयो की कोई सीमा
नही है तथा मनोतगत् के चमतकारो की उपेका कही अिधक िवलकण होते है िकनतु मन के
सागर मे पवेश करके उसके तल पर बैठकर ही ऐसे भवय रतो को पापत करना समभव है
िजनकी तुलना मे संसार के अनय सारे रत तुचछ एंव कािनतहीन पतीत होते है।
हम जीवन की चुनौितयो का समाधान करने मे इस कारण अकम होते है िक हमने
आधारभूत मानिसक पिकयाओं को ठीक पकार नही समझा है। मानव-मन दरू दशरन की
भाित है िजसमे िचत को िविभन आयामो अथवा पिरणामो मे पसतुत िकया जा सकता है
तथा िचत के िवकृत होने पर असपषता, संभम एंव वयाकुलता उतपन हो सकते है। अनेक
बार परमपरागत िमथया मानयताएं, रिढगत सामािजक आदरश, पूवागह, आसथाएं, धारणाएं और
िवचार मन मे ऐसी गूढता से रमे हुए होते है िक उनको पहचानना भी किठन होता है। उनसे
असपषता, संभव एंव वयाकुलता उतपन होना सवाभाविक होता है और उनके कारणो का
अनुसंधान करना किठन हो जाता है िकनतु िचनतन और धयान से मानिसक समसयाओं का
समाधान हो जाता है।
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िचनतनशील मनुषय का अपने साथ ईमानदार होना चािहए तथा सब कुछ देखते और
सुनते हुए भी उसे वह सवीकार नही करना चािहए जो समझ मे न आता हो। मन की
ईमानदारी और सादगी मनुषय को सतय एंव शािनत के दार पर खडा कर देती है। सतय का
अनवेषक िकसी आत को केवल इस कारण सवीकार नही कर लेता िक वह परमपरागत है
अथवा उसने कही पढा है या सुना है। वह पतयेक बात की सतयता को अपने िवचार और
अनुभव की कसौटी पर परखता है। िकनतु वह दंभपूवरक दस
ू रो को मूखर िसद करने मे
शिकत का कय भी नही करता है। आतम-अवलोकन या आतम-िनरीकण मनुषय को सतय की
गहराइयो तक ले जाता है। आततम िनरीकण के कणो मे मानिसक अथवा शारीिरक तनाव
होना केवल यह संकेत करता है िक िनरीकणो मे कही तुिट है तथा तनाव का अभाव सपष
करता है िक आतम-िनरीकण मे पगित हो रही है।
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मनुषय जयो-जयो सतयानवेकण के मागर पर आगे बढता है, उसकी चेतना मे सवत:
सवसथ पिरवतरन दारा अदृशय रपानतरण होने लगता है तथा मनुषय का पुराना सपरप िमट
जाता है। िकसी तथय को ठीक पाकर से समझ लेना ही सवसथ पिरवतरन की पिकया का
सवत: पारमभ है। िमथया िवशासो के जंजाल से मुकत होने पर, मन की परम शानत अवसथा
मे आनतिरक चेतना का िवकास एंव िवसतार होता है तथा वयिकत को िवश के समसत जीवन
के साथ अपनी एकातमता के शािनतदायक समबनध को बोध होने लगता है। यही िवशचेतना का अनुभव है।
जीवन इस सृिष का महानतम रहसय है। कोई गनथ अथवा गुर जीवन के पूणर
सतय का कथन करेन मे समथर नही है। मनुषय जीवन के यथाथर से पलायन करके
शािनतमयी चेतना को कदािप पापत नही कर सकता तथा दाियतवो के पित नही कर सकमा
तथा दाियतवो के पित सजग रहकर जीवन की समसयाओं के साथ जूझने पर ही वह एक
अनत:सथ पशानत चेतना का संदशरन कर सकता है।
मनुषय दस
ू रो से परेणा ले सकता है िकनतु िकसीका अनधनुकरण करने से उसकी
आंखे कभी नही खुल सकती। अपना िवचार और अनुभव ही मनुषय मे सचचे आतमिवशास
को जगा सकता है।
मन को अशाित देनेवाले समसत जंजाल से मुकत होने के िलए मनुषय का अपने
भूतकाल के पभाव से मुकत होना एक अपिरहायर आवशयकता है। आतमिवशलेषण की पिकया
से अपने समसत भूतकाल एंव समग वयिकततव को पूणरत: समझने पर मनुषय अपने शोक,
भम, कलेश कुणठा, भय, वयाकुलता और िचनता से िवमुकत हो जाता है। अपने वयिकततव का
समपूणर संदशरन करना रपानतरण की पिकया का समारमभ है।
हमारे गहन भय के मूल मे कही भूतकाल की दु :खद घटनाओं के संसकार दबे हुए
होते पर उसे उदीपत एंव उग कर देते होते है जो वतरमान मे छोटी-सी घटना होने पर उसे
उदीपत एंव उग कर देते है। गहन आतम-िनरीकण एंव आतम-िवशलेषण दारा भय की पुरानी
गाठो को खोलकर उनसे उनमुकत होना िनतानत संभव है। मनुषय भतकाल की घटनाओं को
िनिलरपत एंव तटसथ होकर देखने और समझने के दारा तथा िववेक एंव पसुपत शिकतयो के
जागरण दारा उनसे सवरथा उनमुकत होकर एक नया भयरिहत पारमभ कर सकता है।
यदिप वतरमान मे िकसी िवषम पिरिसथित अथवा संकट को देखकर भय उतपन
होना एक साधारण मानिसक पितिकया है तथािप िववेक दारा न केवल ततकाल ही भय का
िनराकरण करना सभंव है, बिलक िनभरयता को सथायी सवभाव अना लेना भी पूणरत: संभव
है। िववेक क अितिरकत केवल धैयर होना चािहए। भूतकाल के बनधन से मुकत होने पर
मनुषय पूणर आतम-िनयंतण पापत रक लेता है तथा अननत शािनत के पथ पर पर आरढ हो
जाता है। वासतव मे जीवन की कोई भी समसया िनतानत वयिकतगत एंव िवलकण नही होती
तथा पतयेक समसया मानवीय भी होती है िजसका समाधान होना अवशय संभव होता है।
सतय के अनवेषक एंव शोधक के िलए भूतकाल के बनधन से सवरथा मुकत होकर वतरमान
को ही सत् मानना चािहए। भूनकाल तो असत् है, वह िवनष होकर अननत मे िवलीन हो
चुका तथा भिवषय ने जनम ही नही िलया तथा वह अभी िनमाणाधीन है। िववेकशील मनुषय
भूनकाल के दु :ख, शोक, हािन, अपमान और अपमान और पराजय एंव हताश नही होता
तथा वह िमथया कलपनाओं के दारा भिवषय को भयावह मानकर वयथर ही िचिनतत भी नही
होता। हा, भूतकाल से िशका ली जा सकती है तथा उजजवल भिवषय की योजना बनाकर
उसके िलए पयत करना भी िववेक-सममत है। भूतकाल के दु :खो का समरण करके तथा
भिवषय की भयावह कलपना करके वतरमान को दु :खमय बनाना अिववेक है। कभी-कभी
भूतकाल के दु :खो का समरण न करने पर भी सवत: उनका समरण हो जाता है िकनतु
उसको िवगत मानकर उससे मुकत हो जाना ही िववेक है। कुशल धावक कभी पीछे
मुडकर नही देखमा तथा आगे ही बढता रहता है। आगे बढते ही रहना जीवन है।
हमने भूतकाल मे भी भूले की है, उनके समरण दारा अपने को बुरा मानकर कलेश
करते रहना भी एक बडी भूल है। तुचछ बातो मे भी पाप की कलपना करके अपने पापी
मानना महापाप है। भूल को समझकर उसे भूल मान लेना ही भूल का अनत करना है।
िवचारपूणर पायिशत अथवा करना पुरानी भूल को दुगध कर देता है िकनतु पायिशत अथवा
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पशाताप करते ही रहना मूखरता का लकण है। कोई भी िवचार अथवा कमर जो मनुषय
कोसते ही रहना और आतमगलािन मे डू बकर तथा अपने को पापी मानकर कोसते ही रहना
मूखरता का लकण है। कोई भी िवचार अथवा कमर जो मनुषय के मन मे बनधन अथवा कुणठा
बनकर आगे बढने मे बाधा डालता हो, सवरथा तयाजय है। भूल करना मानवीय सवभाव है।
भूल िकससे नही होती ? भावुकतापूवरक भूल का समरण करते रहना अनधकार मे भटकना
है तथा यथाथर से दरू टकर जीवन के पित अनयाय करना है।
वासतव मे मनुषय िचरकाल तक भूल का समरण करके मन मे भूल के संसकार को
पगाढ बनाकर भूल को सवभाव ही बना लेता है। संसार मे पाप के भय ने िजतना पाप रोका
है, उससे अिधक उसने मानव-मन को कुिणठत एंव दुबरल िकया है। तथा मनुषय को दयनीय
बना देती है। यिद भूल हुई है तो उसे िववेकपूणर पशाताप से दगध करके, उसकी पुनरावृित
न करने का संकलप लेकर आगे बढने से पुरानी भूल हईु है तो उसे िववेकपूणर पशाताप से
दगध करके, उसकी पुनरावृित न करने का संकलप लेकर बढने से पुरानी भूले जीवन-पथ मे
पकाश-दीप बन जाती है। बार-बार िगरकर सभंलने , उठ जाने तथा आगे बढने से मनुषय
ठीक पकार चलना सीख लेता है तथा उसका अनुभव आतमिवशास को बढा देता है।
उतम पुरष बार-बार िगरकर भी गेद की भाित ऊपर उठ जाता है िकनतु अधम वयिकत
िगरकर िमटी के ढेले के सदृश िबखर ही जाता है।
×
×
×
पसननता ही मन की सहज पवृित है तथा मन दबी हुई समसत अपसनता के पसंगो
को चेतन सतर पर लाकर उनहे कीण कर देने का पयत करता रहता है। िकसी कारण मन
मे सुख, उतसाह और आशा के साथ ही दुःख, उदासी और िनराशा के असथायी मनोभाव
(मूड) भी यदाकदा चक की भाित आते रहते है। मनुषय को दुःख, उदासी और िनराशा के
असथायी मनोभाव आने पर िवचार दारा उनहे कीण करने का पयत करना चािहए तथा उनमे
से धैयरपूवर गुजरना चािहए। संकट मे से गुजरने का अनुभव मनुषय मे साहस और
आतमिवशास जगा देता है तथा िववेकशील वयिकत संकट से नही डरतात।
कभी-कभी िकसी कारण अतयिधक उतेजना हो जाने से अथवा अकसमात् भयपद
एवं िचनतापद एवं िचनतापद पिरिसथित उपिसथत होने से वयाकुलता उतपन होने पर भी मन
मे दबे हुए भय के पुराने संसकार जाग जाते है तथा मन तीवर गित से काम करने लगता है
और मनुषय उिदगन एवं अशानत हो जाता है। कभी-कभी कुछ देर तक अतयनत तीवर गकी
से िवचार आते है तथा मनुषय को आशंका होने लगती है िक कया ये िवचार असंबद है, कया
मेरी िवचार-पिकया मे दोष आ गया है, कया मेरा भिवषय कषमय है? िकनतु वासतव मे यह
िसथित किणक एवं असथायी होती है तथा इसका कारण मन मे कोई दबा हुआ भय होता है
जो थोडी देर तक बनदर की भाित मन मे कोई दबा हुआ भय होता है जो थोडी देर तक
बनदर की भाित उछल-कूदकर शानत हो जाता है। मनुषय सवयं को समझा सकता है िक
मैने अपनी बुिद की कुशलता, साहस तथा धैयर से इससे पूवर भी अनेक बार भय के उदेक
पर िवजय पायी है। मुझे अनुभव है िक यह भय िमथया और किणक है। मै पहले कगी
अपेका अिधक अनुभवी, िववेकशील और धैयरपूणर हूँ तथा मै जीवन मे सभी समसयाओं का
समाधान करके बुिदबल, धैयर और शिकत के होने का पचरय दे रहा हूँ, मै अब पिरपकव और
समथर हूँ, मेरे शानत रहने का साधारण-सा पयत करने पर यह किणक अवसथा सरलता से
पार हो जाएगी, मुझे जीवन मे सभी बहुत कुछ करना है, मुझे अनेक दाियतवो का िनवाह
करना है, मेरा जीवन मूलयवान एवं महतवपूणर है।
ऐसे अवसर पर जब मनुषय का मन भीतर ही भीतर उलझाकर छटपटा रहा हो
तथा कदरपितता गौ की भाित मुकत होने का पयत करने पर भी असहाय होकर अंधकार मे
डू बता ही जा रहा हो, उसे ततकाल अपने से दरू हटकर (अथात् अपने िवषय मे सोचना
छोडकर) बिहजरगत् मे पािरवािरक जन एवं िमत-मंडली की संगित, सवाधयाय, धयान
मनोरंजन, कीडा, भमण, पकृित-दशरन, सेवा सहायता-कायर अथवा िकसी िचताकषरक
उपयोगी कायर मे वयसत हो जाना चािहए। अपने िपयजन का पयार और पशंसा पाकर मनुषय
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का मन उमंग से भर जाता है। मनुषय को अपना मन सचेतन करके तथा आतमिवशास को
जगाकर उिदगन एवं वयाकुलता के दबाव को शानत कर लेना चािहए। नील गगन,
नदी,समुद, पवरतो के धवल िशखर, हरे-भरे मैदान, पुषप आिद को देखने से मन को न केवल
िवशाम िमलता है बिलक गहन तृिपत भी होती है। मनुषय घबराकर िसथित को सवयं ही
िवषय बना लेता है और समझदारी से िवषय िसथित को सुगमतापूवरक पार कर लेता है।
थोडी-सी समझदारी सता तथा जान के बल से भी बढकर होती है।
×
××
संसार मे पायः कोई मनुषय भी पूणरतः कुणठामुकत नही होता तथा लगभग सभी के
मन मे बालयकाल की अनेक अपराध-बोध की भावनाएँ पलती रहती है जो मनुषय की
अशािनत का पमुख कारण होती है। अलपायु मे िकसी भूल के हो जाने के कारण
आतमगलािन से िघरने पर 'मै अपराधी हूँ, मै बुरा हूँ, मुझे, दणड िमलना चािहए' ऐसी धारणा
उतपन हो जाती है तथा दणड िमलने की आशंका मन मे गहरे सतर पर बैठ जाती है और
वयिकत अपने को दुखी करते रहने मे, अकारण ही अपने को दिणडत करने मे, सुख का
अनुभव करने लगता है। कभी-कभी बडी अवसथा मे भी िकसी घोर अपराध के होने पर
ऐसी ही कलेशपद धारणा घर कर लेती है। अलपायु मे िनधरनता, अभाव और हीनता से गसत
होने पर भी मन मे हीनता की गिनथ बन जाती है। बालयकाल की कुणठाएँ सवभाव का अंग
बनकर जीवनभर आननद और उमंग के अवसर करती रहती है तथा मनुषय को वयथर ही
दुघरटना एवं आपित की आशंका सताने लगती है। िविवध पिरिसथितयो मे मन पर पडे हुए
िविवध पकार के भयदायक संसकार कालानतर मे पगाढ हो जाते है िकनतु पयत दारा उनको
समापत िकया जा सकता है। वासतव मे समाज एवं पिरवार की दोषपूणर मानयताओं तथा
दुवयरवहार के कारण मन मे गिनथया बनती है िजनहे जान के पकाश से खोला जाता है।
कभी-कभी मन मे झूठी धविन होती है िक इतने िदन मे या इस माह मे अथवा उस
समय िवपित आएगी। िकनतु आशंिकत समय पर कुछ िवपित न आने पर भी और धविन के
झूठी िसद होने पर भी पुनः कोई नई आशंका उतपन हो जाती है तथा वह िबलकुल सचची
पतीत होने लगती है। अबोध अवसथा मे बनी हुई अपराधभाव की गंिथयो के कारण पायः
वयिकत के मन मे यह भावना उतपन हो जाती है िक "मै अपराधी हूँ, मै पापी हूँ, मै बुरा हूँ,
मुझे दणड अवशय िमलेगा"तथा वह न केवल अकारण ही अनेक पकार से दणड िमलने की
आशंका करने लगता है, बिलक दणड की पचछन इचछा भी करन लगता है। वह अपराधगिनथ के कारण वयथर ही सवयं को पीडा देने मे एक मूखरतापूणर सुख का अनुभव करने
लगता है तथा मन ऐसी आदत पड जाने पर अनेक बार अकारण ही वह िकसी अशुभ होने
की आशंका करने लगता है। वह तीथर आिद पिवत सथल पर जाकर अथवा िकसी सनत से
आशीवाद लेकर उसे तो भूल जाता है तथा भिवषय मे िवपित आने की िकसी िमथया कलपना
को सतय मानकर उसका समरण करके अपने को पीडा देने लगता है। आतम िवशलेषण
दारा गिनथ के खुल जाने पर पभावहीन होकर धीरे-धीरे पूणरतः िवलुपत हो जाती है।
कभी-कभी मनुषय वयथर ही िकसी िवशेष ितिथ, िदन अथवा संखया को अशुभ मानने
लगता है। शुभ और अशुभ के अंधिवशास के मूल मे कोई भी दबा हुआ भय ही होता है।
िववेकशील वयिकत कभी समय अथवा सथान को अशुभ नही मानता। संसार मे ससमय
अथवा सथान को अशुभ नही मानता। संसार मे सभी के साथ िपय और अिपय घटनाएँ तो
होती ही रहती है। शुभ और अशुभ की िचनता करने लगता है। भय ही समसत
अंधिवशास का मूल कुणठा से पभािवत होने पर अनेक बार मन की आवाज भमकारी हो
जाती है तथा उसे होने पर अनेक बार मन की आवाज भमकारी हो जाती है तथा उसे
अनतरातमा की धविन कुणठा से पभािवत होने पर सवप भी कभी-कभी दुससवप हो जाते है
तथा उनको भिवषय मे िकसी अिनष का सूचक मान लेना मूखरतापूणर अंधिवशास होता है।
अिगणत लोग सवप को सचचा मानकर सवयं ही िवपित को िनंतणण दे देते है। सवप का
कभी सतय होना मात संयोग होता है।
िनशय ही िचनतन, आतम-िवशलेषण, िववेक तथा धयान के अभयास से धीरे-धीरे
मनुषय का रपानतरण हो जाता है तथा जीवन मे ओज एवं आतमिवशाश का भरपूर संचार
होने लगता है। वासतव मे मनुषय का पतयेक िववेकपूणर िवचार, संकलप और कमर अदृशय
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रपानतरण दारा उसे पहले की अपेका अिधक सम, िसथर और शानत करता रहता है और
मनुषय िनशय ही कुणठिवमुकत, भयिवमुकत हो उतसाहपूणर होकर उमंगभरा जीवन वयतीत कर
सकता है। यही यथाथर और उतसाहपूणर होकर उमंगभरा जीवन वयतीत कर सकता है।
यही यथाथर पुनजरनम है।
इस संसार मे पतयेक कण सवरत गितशीलता एवं पिरवतरनशीलता है तथा हमारे
बाहर और भीतर भी गित भी िनरनतर पिरवतरन का आधार होती है। हम पिरवतरन को
सूकमता के कारण देख नही पाते िकनतु शैशव, बालय, यौवन और वृदता का चक िनरनतर
चलता ही चलता है। हमारे मन मे भी िवचार नदी के जल की धारा के सदृशय िनरनतर
पवािहत होते ही रहते है। यह गितशील पवाह ही जल की भाित िवचारो की िनमरलता एवं
रहते है। यह गितशील पवाह के बाधक पूवागह, अंधिवशास, संकीणरता, कुदता, छल-कपट,
धमानधता, मदानधता, भय, िचनता, भावकुता, कोध इतयािद दोषो का िनराकरण (अथात्
शमन) करने पर ही मनुषय सतय का संदशरन कर सकता है। िववेकपूणर िचनतन मन को
िनबरनध, उनमुकत, सहज और सरल बनाकर मनुषय के जीवन को आननदरस और ओज से
पिरपूणर कर सकता है।
आतमिवशलेषण के पारिमभक कम मे मनुषय को अपने मानिसक दबावो की डायरी
बनाकर इतयािद का उललेख कर लेना चािहए। मनुषय अपने मानिसक दबावो को
पहचानकर उनके शमन का उपाय सवयं ही खोज सकता है। अपने दोषो और दुबरलताओं
को जानना उन पर िवजय पाने का पारिमभकग पग है। दोषो और दुबरलताओं को जानने मे
संकोच नही होना चािहए कयोिक हम सभी मे दोष और दुबरलता होते है।
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यिद हम शीघ ही एक गहरा िवशाम पाने मे सफल न रहो रहे हो तो िचनता नही करना
चािहए तथा िवशाम-अवसथा को सवयं आने देना चािहए। जब उिदगन एवं अशानत करनेवाले
अनाशयक िवचार आ रहे हो तो उनकी उपेका कर देना ही उिचत होता है। मन मे गहरे
सतर पर दबे हुए भय, िचनता घृणा, िहंसा, िनराशा इतयािद के संसकार िविवध कलपनाओं के
रप मे उभरकर आते रहते है िकनतु उनहे महततव न देने से उनका वेग कीण हो जाता है
तथा आशा और उमंग की कलपनाएँ उभरकर मन को आननद से तरंिगत कर देती है।
मनुषय अपने अनुभव दारा खोजे हुए उपायो से सवयं ही मन की शानत अवसथा को अवशय
पापत कर सकता है।
वासतव मे जयोही हम यह समझ लेते है िक भयपूणर िचनता (एंगजाइटी) कालपिनक
है तथा हमारे अजान की ही उपज है तयोही उसका पिरतयाग सवतः हो जाता है। मन के
चेतन-सतर पर भयावह िचनता को मात एक मूखरता मान लेने पर अवचेतन मन की गहरी
परते भी उसे असवीकार कर देती है। अतः आवशयकता है चेतन मन पर िववेकपूणर
िचनतन दारा भय एवं भम के िमथयापन को समझ लेने की। भयपूणर िचनता (एंगजाइटी) के
शारीिरक कारण भी होते है। उदारणतः दीघरकाल तक संगहणी (कोलइिटस) इतयािद होने
पर मन मे कालपिनक भय उतपन होने लगते है। सभी कालपिनक भयो का िववेक के
जागरण के जागरण से दरू करना िनतानत समभव होता है।
िचनता और भय की आदत पड जाने पर, मनुषय को िचनता और भय का तयाग
कर देने पर भी, मन मे िरकतता (खालीपन) का-सा अनुभव होने लगता है कयोिक आदत के
कारण वयथर ही मन पुराने िचनता और भय के संसकारो से िचपटा रहना चाहता है जैसे
िपंजडे छोडने मे किठनाई होती है। वासतव मे मन की जो किठन बेिडया हमे बाधे हुए है , वे
हमारी ही बनाई हुई होती है तथा उनहे हम ही धैयरपूणर पयत से तोड सकते है। उतम कमर ,
मनोरंजन आिद मे वयसत रहकर तथा मसती की आदत डालकर मन की िरकतता की पूितर
की जा सकती है।
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मनुषय पतयेक कण अपने िवचार एवं कमर से अपने भिवषय का िनमाण सवयं करता रहता है।
मनुषय अपने भागय का िनमाता सवयं है। वासतव मे मनुषय के भिवषय का िनमाण िनरनतर
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होता हा रहता है तथा मनुषय अपने िवचार एवं कमर दारा जाने -अनजाने आगे बढता या पीछे
हटता अथवा ऊँचे उठता या नीचे िगरता रहता है। मनुषय अपने िचनतन एवं कमर के
समबनध मे िनरनतर सजग रहकर अपने दोषो और दुबरलताओं एवं कुणठाओं और अतृपत
इचछाओं पर िवजय पाते हुए तथा अपने मानिसक दबावो का शमन करते हुए आतमिवजयी,
आतमिवशासी और आतमसुखी हो सकता है। मनुषय का पतयेक उतम िवचार और पतयेक
उतम कमर उसके वयिकतततव मे पिरषकार करता रहता है तथा मनुषय कालानतर मे वह नही
रहता जो वह कुछ वषर पूवर था। िनरनतर चलते हुए छोटी-सी चीटी मीलो तक चली जाती
है तथा खडा हुआ जेट िवमान भी एक पाग आगे नही बढता। यह आतम-िचिकतसा है। अब
जागा हुआ मनुषय पहले का सोया हुआ मनुषय नही रहा। मनुषय को सवसथ पिरवतरन का
अनुभव सवयं हो जाता है िक पहले जैसे कष पुनः हो सकेगा। उतम िचिकतसा होने पर
रोग की पुनरावृित कभी नही होती तथा केवल समृित शेष रह जाती है। िववेकशील वयिकत
पुराने कषो का समरण नही करता तथा सवतः एं पयत दारा अपने भिवषय को उजजवल एवं
आननदमय बना सकता है।
मानव-जीवन का अनतरंग पक है िचनतन, िवचार और सवभाव तथा उनका बिहरंग
पक है वचन और वयवहार। िचनतन और िवचार से सवाभाव के दोषो को दरू िकया जा
सकता है तथा पेम, परोपकार, उदारता, कमा आिद सदगुणो की पसथापना हो सकती है।
सवभाव का अथर है पुरानी आदतो का समुचच। सवभाव के दोष मनुषय के िचनतन एवं िवचार
को आदतो का समुचचय। सवभाव के दोष मनुषय के िचनतन एवं िवचार को गसत करके
सतय-संगदनर के मागर को अवरद कर देते है, िकनतु िचनतन एवं िवचार से ही संकलप-बल
के सहारे सवभाव को दोष-मुकत भी िकया जा सकता है। सवभाव पर िववेक का अंकुश
लगाकर उस पर िनयंतण करना समसत पगित के िलए आवशयक है।
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मानव-सवभाव के पमुख दोष है-भय एवं िचनता तथा कोध। भय और िचनता का अिवचछेद
युगम है तथा वे मनुषय के महान् शतु है। भय मनुषय को सतय के संदशरन से दरू हटा देता
है। सतय की साधना के मादर मे भय का िनवारण करना अतयनत आवशयक होता है। भय
मनुषय की बुिद को अनधकार की भाित ढँककर उसे दयनीय बना देता है। वासतव मे
मनुषय भय की काली चादर को सवयं ही ओढता है तथा सवयं ही उसे उतारकर फेकने मे
समथर होता है। भय िकसी िवषम पिरिसथित के समुपिसथत होने पर अिनष की आशंका से
उतपन होता है तथा वह अवेचनन की परतो मे संचयीकृत पुराने संसकरो को उदीपत करके
िमथया कलपनाओं एवं भमो को जनम देकर आतमिवशासो को कीण करने लगता है।
भयगसत मनुषय दयनीय अवसथा को पापत होकर अनावशयक िमथया एवं िचनतापद
कलपनाओं का जाल बुनकर सवयं ही उसमे फँसने लगता है। मन का किलपत िमथया जाल
उसे सचचा पतीत होता है तथा वह सवयं से ही भयभीत हो जाता है। बय के सामने घुटने
टेकने से वह उग हो जाता है तथा उसे िमथया समझ लेने से वह कीण होकर ततकाल लुपत
हो जाता है। भय से मनुषय के सुख और शािनत लुपत हो जाते है और वह सवरिचत िमथया
एवं कालपिनक िचनताओं से िघरकर अकारण दःु खी रहने लगता है। िनशय ही मनुषय
िचनतन के पैनेपन से, िवचार की शिकत से तथा धयान के अभयास दारा चैतनय के पैनेपन
से, िवचार को जगाते रहने और धयान का अबयास रकते रहने की आवशयकता होता है।
सभी पकार के भय हमारे पाले हुए तथा कालपिनक है तथा हम उनसे ततकाल मुकत हो
सकते है। भय और िचनता हमारे सवभाव का अंग नही है तथा वे हमारे दारा ही अपने
ऊपर थोपे हुए है और हम ही उनहे उखाड फेकने मे सकम है। हमे घबराहट से नही,
समझदारी से काम लेना चािहए। िचनतन, िवचार और धयान के अभयास से धीरे-धीरे खोया
हुआ आतमिवशास लौट आता है तथा मनुषय भय पर िवजय पाकर तथा पसन रहकर
उमंगभरा जीवन िबता सकता है।
मनुषय मे बुिदबल सवोपिर है तथा मनुषय अपनी समसत समसयाओं का समाधान
बुिद की पखरता से ही करता है। संसार की िविवध धमरगनथो के शेष मंतो मे बुिद की
शुदता के िलए पाथरना की गई है। मनुषय िचनतन दारा िवचार को शुद एवं सशकत बनाकर
ही अपनी समसत उलझनो से मुकत हो सकता है। धयान के िनयिमत अभयास से िचनतन24

शिकत अतयनत तीवर हो जाती है, िवचार सपष हो जाते है तथा मनुषय मे संकलप (दृढ
िनशय) लेकर कमर मे जुट जाने का सामथयर जाग जाती है। मनुषय सवसथ िचनतन एवं
धयान के अभयास दारा भय, िचनता, कोध, आवेश तथा अनय मानिसक दुबरलताओं और दोषो
से मुकत होकर िवषम पिरिसथितयो को सुगमता से पार कर सकता है। मनुषय मे नई
चेतना, नई सफूितर, नए दृिषकोण और नई जीवन-शैली का अभयुदय होने पर उसका जीवन
आतमिवशास, उमंग और उललास एवं आशा और उतसाह से भरपूर होकर आननदमय हो
जाता है।
संसार मे दुदानत शतुओं पर िवजय पापत करना, इतना किठन नही है िजतना अपने
मन पर िवजय पापत करना, अपने उदेगो को संयत करना अथवा आतम-संयम एवं आतमिनयंतण करना है। अनेक महापुरष मन के दोषो और दुबरलताओं पर िवजय पापत करके
िनभरय, िनदरनद एवं िनबरनध हो जाते है तथा दस
ू रो के पेरणा-सोत बन जाते है। बस, दं ृढ
संकलप करके धैयरपूवरक िचनतन एवं पयत मे जुट जाना है। सफलता का मंत है-जागो,
उठो और आगे बढते रहो।
भय,कोध, शोक, िनराशा इतयािद उदेगो एवं अनय मनोवेगो का पभाव हमारे समसत शरीर पर
ं , पाचनतंत, मिसतषक और हृदय पर पडकर उनहे जजरिरत, कीण एं दुबरल
िवशेषतः सनायुतत
करता रहता है िकनतु हमारी जीवनी-शिकत भी पितरोधातमक संघषर दारा हमारी रका मे
िनरनतर सिकय रहती है। घबरा जाने और उतेिजत होने पर हमारे शरीर और मिसतषक के
एक-एक सेल को अपनी जीवनी-शिकत को दारा लडना पडता है। जीवनी-शिकत के मूल मे
िसथत हमारी िजजीिवषा (जीने की इचछा) िवनाश एवं मृतयु के भय की अपेका अतयिधक
बललतदी होती है। हम अपने भयािद कयकार मनोवेगो को पहचानकर तथा उनके कारणो
को समझकर िचनतन और कमर दारा उन पर िवजय पापत कर सकते है। अपमान का भय,
सुख-सुिवधाओं के छू टने का भय अथवा मृतयु का भय िचनता के साथ जुडकर शिकत को
चाट जाता है तथा आतमिवशास को कीण कर देता है। मनुषय अपनी पचछन अननत शिकत
को पहचानकर तथा उसे जगाकर सहसा बलवान् हो जाता है तथा उसका अनादर करने
पर दीन-हीन हो जाता है। अपने पास रखे हुए हीरे के मूलय को न जानकर तथा उसका
उपयोग न करके राजा भी रंक ही है। पतयेक मनुषय मे िविवध पकार की अननत
समभावनाएँ पसुपत रहती है तथा उनको जगाने पर ही मनुषय िकसी िदशा मे आगे बढने के
िलए संघषर कर सकता है तथा जीवन को साथरक बना सकता है।
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पकृित ने मनुषय को अदुत कलपना-शिकत पदान की है। मनुषय कलपना-शिकत के
सहारे नये अनुसंधान एवं आिवषकार कर सकता है, कला और सािहतय के केत मे सजरन
कर सकता है, भिवषय के िलए उतम योजनाएँ बना सकता है तथा जीवन को नई िदशा दे
सकता है। कलपना भय को भयंकर बना देती है तथा कलपना ही आशा और आतमिवशास
को जगाकर भय को दरू कर सकती है। अतएव हमे िदन् का पारमभ ऐसी अनहोनी कलपना
करके नही करनी चािहए िक हम पर कोई संकट आ रहा है । अपनी शयया से उठने से
पूवर िनराधार भयपद कलपना अथात् िवपित की आशंका करने के बजाए ईशर की पाथरना
के साथ कलयाणपद आशा और िवशास को मन मे पितिषत कर लेना चािहए। ऐसी कलपना
करने से कया लाभ है िक कुछ दुभागयपूणर घटना होनेवाली है जबिक हम अनुभव से यह
जानते है िक इस पकार की कलपना िनतानत िनराधार एवं िमथया होती है तथा उसका सतय
होना समभव नही है। हम ऐसा िवशास कयो न करे िक परमातमा िनरनतर हमारे साथ है तथा
वह पतयेक पग पर हमारी रका करेगा। हम िमथया कलपना एवं िचनता करके अपने सुखमय
कणो को दुःखमय बना देते है तथा अपने को दयनीय बना लेते है। अतएव हमे िमथया
कलपना करने की आदत करने कीआदत को दृढतापूवरक छोड देना चािहए तथा उजजवल
भिवषय की आशा को हृदय मे धारण करते हुए सुखद कलपना करनी चािहए। मनुषय
िदनभर अपने िवचारो के साथ ही िविवध पकार की कलपना भी करता रहता है। हमारे
िचनतन के सवसथ होने पर कलपना बी सवसथ एवं सुखद हो जाती है। कलपना का ऐशयर
मन को समृद कर देता है। कलपना-शिकत का समुिचत िवकास एवं सदुपयोग मनुषय के
अभयुदय मे अतयनत उपयोगी होता है।
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पायः मनुषय भययुकत अथवा भयमुकत, तनावयुकत अथवा तनावमुकत, िचनतायुकत
अथवा िचनतामुकत रहने की आदत बना लेता है। अनेक लोग संकटो मे भी हँसतेमुसकराते हुए मसत रहते है तथा अनेक लोग सुख-सुिवधा मे भी रोते ही रहते है। कोई
सदा आशावादी होकर सुखमय भिवषय की आशा करते है तथा कोई अकारण ही सदा
िनराशावादी होकर दुगरितमय भिवषय की कलपना मे फँसे रहते है। मनुषय िचनतन के पैनेपन
संकलप-शिकत और धैयर से अपनी पुरानी दुःखद आदतो को तोड सकता है और नई सुखद
आदतो को बना सकता है। िजस पकार एक कुशल कृषक खेती से अनावशयक अथवा
हािनकार घास को उखाड फेकता है, एक कुशल वयिकत भी िचनतन दारा अपने मन मे
िवषैले कीटाणु उतपन करने वाले छल,कपट, ईषया-देष, भय, िचनता और तनाव को िनकाल
फेकता है। आतम-कलयाण के िलए जीवन-शैली का बदलना आवशयक ही है। जीवन-कम
तो अबाध गित से चलता ही रहता है और आयु भी कीण होती रहती है, िफर मनुषय कणकण मे तथा बात-बात पर कयो उिदगन और दुखी होता रहे? उमंगभरी आदतो को अपनाने से
जीवन ही उमंगभरा हो जाता है।
यदिप भय होना सवाभािवक है तथा पायः सभी को िविभन अंशो मे और िविभन रपो से
गसत करता है, तथािप भय का एक उतम पक यह और िक भय का पारंिभक रप साहस
का उतपेरक भी होता है। भय मनुषय को िचनतन-मनन और िवचार करने के िलए उतपेिरत
करके तनाव के कारणो को समूल नष करने के िलए साहस और उतसाह से भर देता है।
भय मनुषय को जाग जाने , उठ खडे होने तथा िवषम पिरिसथित मे ऐसे भी बाके है जो हर
वकत भयभीत रहकर पीले पड गए थे। िकनतु जब एक बार भय का सामना करने के िलए
डट गे तो सदा के िलए िनभरय हो गए। कुचल देनेवाला तथा रकतचाप, अमलिपत, उदरवरण,
िशरःशूल, हृदयाघात आिद कषकारक रोद उतपन करनेवाला भय उतपेरक होकर मनुषय
को शूरवीर तथा िवचारशील बना देता है। वासतव मे भय के भीतर घुसकर उसे समझ
लेना ही उसे नष करना है। साहस को जगाते ही भय का भूत गायब हो जाता है।साहस
जीवन का अमूलय रत है। साहसी लोग आतमिवशास के धनी होते है तथा जीवन मे
साहसपूवरक आगे बढते ही रहते है। िजस पकार गहरे कुएँ के जल को बहुत नीचे से ऊपर
खीचने के िलए अितिरकत बल लगाकर पापत िकया जाता है, उसी पकार िनराशा के गडढे
से आशा और िवशास के शीतल जल को अितिरिकत बल लगाकर ही पापत िकया जा
सकता है। साहस को जगाने पर मनुषय िवषम किठनाइयो और अवरोधो से जूझकर पुराने
तारतमय को तोड सकता है तथा पिरिसथितयो पर िवजय पापत कर सकता है।
×
×
×
यिद सममानपूवरक जीना है तथा जीवन मे कुछ करना है तो साहस को जगाकर
तथा भय और िचनता को परासत करके लकय-पािपत के िलए कमर मे जुट जाना चािहए।
साहस एक ऊजा है जो जीवन के रथ को गित पदान करती है। मनुषय साहस और
लगनशीलता के सहारे उनहोने जीवन की िविवध िदशाओं मे महान् चमतकार कर िदखाए।
संसार का इितहास ऐसे असंखय लोगो की महान् सफलताओं से भरा पडा है जो पारमभ मे
दीन-दुःखी और संकटगसत थे िकनतु उनहोने जुझार होकर लकय-पािपत के िलए िदन-रात
संघषर िकया और वे मरकर भी अमर हो गये। उनहोने िकसी जयोितषी से कायर पारमभ
करने के िलए शुभ मुहूतर नही पूछा तथा अपने उतसाह से ही कमर-पेरणा करके ततकाल
पुरषाथररत हो गये।
जो मनुषय जीवन मे कुछ उतम लकय बनाकर उसे पापत करने का पूरा पयत नही करता,
उसकी समसत शिकत सडकर नष हो जाती है तथा वह कुते-िबलली का िघनौना जीवन
िबताकर सदा के िलए िवलुपत हो जाता है। अपनी आनतिरक शिकत के सदुपयोग से ही
मनुषय के पचछन गुण पकट होते है तथा जीवन का पुषप िखलकर चारो ओर सुगिनध को
पसािरत करता है। अपनी शिकतयो का पूणर सदुपयोग करके ही मनुषय अपने जीवन को
साथरक कर सकता है। कमर करने से मनुषय की कायरकुशलता और दकता ही नही, बिलक
आतमिवशास भी बढता है। कमर करते हुए ही मनुषय न केवल सममान और सुयश पापत कर
सकता है, बिलक शािनत भी पापत कर लेता है। सममान, सुयश और शािनत पापत करने का
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मंत पुरषाथर दारा अपनी शिकतयो का सदुपयोग करना है। उतम लकय को सामने रखकर
कमर करते हुए ही शतायु होने की इचचा की जाती है।
जीवन मे पेरणापद आदशों एवं मूलयो की पसथापना करना तथा लकय िनधािरत
करना अतयनत आवशयक होता है कयोिक परेणा के िबना पुरषाथर करना समभव नही होता
तथा लकय के िबना पुरषाथर की िदशा का िनधारण करना समभव नही होता। िकनतु
तनावरिहत और शानत जीवन-यापन करने के िलए यह सावधानता होनी अतयनत आवशयक
है िक हम पूणरता पापत करने की िदशा मे आगे बढते हुए भी मात पूणरतावादी न बने तथा
आदशों से पेरणा लेते हुए अथवा जीवन मे कुछ आदशर होते हुए भी मात आदशरवादी न बने।
इसका सपष कारण यह है िक जीवन मे आकाका तथा उपलिबध का अनतराल तनाव,
िनराशा और अशािनत उतपन करता है। वासतव मे पूणरता मात कलपना है िजसका साकार
होना समभव नही होता। अनेक बार मनुषय आदशरवादी होने की धुन मे अवयावहािरक हो
जाता है। वह पायः असनतुष रहकर िचनता मे घुलने लगता है। मनुषय पतयन कर सकता
है िकनतु फल तो सदैव ईशराधीन होता है। कमर करने मे ही अपना अिधकार मानकर
पुरषाथर के साथ सनतोष का समनवय करना शािनत पापत करने का पधान सूत है।
जो मनुषय जीवन मे कुछ उतम लकय बनाकर उसे पापत करने का पूरा पयत नही
करता, उसकी समसत शिकत सडकर नष हो जाती है तथा वह कुते-िबलली का िघनौना
जीवन िबताकर सदा के िलए िवलुपत हो जाता है। अपनी आनतिरक शिकत के सदुपयोग से
ही मनुषय के पचछन गुण पकट होते है तथा जीवन का पुषप िखलकर चारो ओर सुगिनध को
पसािरत करता है। अपनी शिकतयो का पूणर सदुपयोग करके ही मनुषय अपने जीवन को
साथरक कर सकता है। कमर करने से मनुषय की कायरकुशलता और दकता ही नही, बिलक
आतमिवशास भी बढता है। कमर करते हुए ही मनुषय न केवल सममान और सुयश पापत कर
सकता है, बिलक शािनत भी पापत कर लेता है। सममान, सुयश और शािनत पापत करने का
मंत पुरषाथर दारा अपनी शिकतयो का सदुपयोग करना है। उतम लकय को सामने रखकर
कमर करते हुए ही शतायु होने की इचचा की जाती है।
जीवन मे पेरणापद आदशों एवं मूलयो की पसथापना करना तथा लकय िनधािरत
करना अतयनत आवशयक होता है कयोिक परेणा के िबना पुरषाथर करना समभव नही होता
तथा लकय के िबना पुरषाथर की िदशा का िनधारण करना समभव नही होता। िकनतु
तनावरिहत और शानत जीवन-यापन करने के िलए यह सावधानता होनी अतयनत आवशयक
है िक हम पूणरता पापत करने की िदशा मे आगे बढते हुए भी मात पूणरतावादी न बने तथा
आदशों से पेरणा लेते हुए अथवा जीवन मे कुछ आदशर होते हुए भी मात आदशरवादी न बने।
इसका सपष कारण यह है िक जीवन मे आकाका तथा उपलिबध का अनतराल तनाव,
िनराशा और अशािनत उतपन करता है। वासतव मे पूणरता मात कलपना है िजसका साकार
होना समभव नही होता। अनेक बार मनुषय आदशरवादी होने की धुन मे अवयावहािरक हो
जाता है। वह पायः असनतुष रहकर िचनता मे घुलने लगता है। मनुषय पतयन कर सकता
है िकनतु फल तो सदैव ईशराधीन होता है। कमर करने मे ही अपना अिधकार मानकर
पुरषाथर के साथ सनतोष का समनवय करना शािनत पापत करने का पधान सूत है।
िकसी कायरकेत मे अपनी उपलिबध का मूलयाकन मनुषय सवयं ही कर सकता है।
मनुषय को आतम-मूलयाकन को ही सवािधक महततव देना चािहए तथा दस
ू रो से सिटरफेकेट
और सममान पापत करने की इचछा का िववेकपूवरक शमन कर देना चािहए। पायः दस
ू रे
लोग उपलिबध के महतव को समझते ही नही है अथवा िवदेष के कारण सममान दे तो
उनकी गुणगहाकता और उदारता के िलए उनका कृतज होना चािहए तथा यिद कुछ लोग
अजान अथवा िवदेष के कारण िननदा करे तो उतेिजत न होकर अपने मन मे उनहे कमा
कर देना चािहए।
वासतव मे पयत करना ही अपने मे एक उपलिबधत होती है तथा उदेशय होते हुए भी
उदेशय-पूितर को ही अपने सुख का आधार बनाना अिववेक होता है। िसपाही का काम
कुशलतापूवरक लडना होता है। िवजय एवं पराजय तो अनेक कारणो पर िनभरर होते है।
हमने उदेशय-पूितर के िलए कमर िकया, यह पयापत है तथा हमे इस आतम-सनतोष मे अिवचिल
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रहना चािहए। समिपरत होकर कमर करना सृजन-कायर के सदृशय सवयं मे एक महान् सुख
होता है तथा उसके िलए िकसी से पशंसा की अपेका नही होती।
×
×
×
पायः िजजासा होती है िक हमारे जीवन का पयोजन कया है। अपनी अिसमता को
पहचानकर तथा अपने िचनतन के अनुरप कितपय उदेशयो का िनधारण करके अथवा कुछ
सवप संजोकर, उनकी पूितर के िलए समिपरत होकर कमर करने से जीवन मे रस की िनषपित
हो जाती है और जीवन उमंग से भर जाता है। अपने पापतनय की ओर आगे बढते रहना,
िनरनतर चलते ही रहना, गितमय रहना, जीवन को भरपूर जीना, मानो जीवन का पयोजन
समझना है। जीवन के िविवध केतो मे अपने दाियतवो को समझकर उनका िनवाह करने से
तथा कमर-समपादन मे जीवन के उचच सतरो को छू ने से मनुषय अपने जीवन को रसमय एवं
साथरक बना लेता है। जीवन के पयोजन को न समझने के कारण ही मनुषय संसार को बुरा
कहकर जन-समाज को कोसता है। मनुषय जयो-जयो जीवन के उदेशयो की पूितर करता है,
उसे संसार आकषरक, सुनदर और सुखद पतीत होने लगता है। वासतव मे दोष-सृिष का
नही है, हमारे िचनतन का है।
वसतुतः पेम-रस ही जीवन-रस है। मनुषय पेम के तततव को समझकर तथा उसे
अपने आचरण मे उतारकर, अपने संकीणर सव का िवसतार कर लेता है। मनुषय पेम दारा
वयापक होकर अननत हो जाता है तथा शिकत एवं शािनत का अननत भणडार हो जाता है।
यह िबडमबना है िक पेम-तततव की िवशद वयाखया करते है, पवचन करते है तथा उसकी
मिहमा का गान करते है िकनतु उसे पहचानकर अपने जीवन मे नही उतारते है। पेमरस
का मन को िनमरल, सशकत और शानत कर देता है। पेम-रस जीवन को साथरक कर देता
है। पेमभाव जगत् का देदीपयमान रत है। पेम आतमा का धमर है। पेम का अथर है
परोपकार, सेवा, सहनशीलता, कमा तयाग और समपरण। पेम जीवन के उदेशय को पूणर
करना है। पेम-तततव को जानने से अननत का बोध होता है तथा पेममय होने से मनुषय
अननत हो जाता है। वासतव मे पेम अदैत है। तू और मै दो नही है, एक है। सवरत मै ही मै
हूँ अथवा सवरत तू ही तू है। पािणमात के साथ आतमसात् होना भगवदाव की पराकाषा है,
भगवदाकार अथवा भगवदरप हो जाना जीवन की परमोचच अवसथा है।
पेम अपार करणा के रप मे अिभवयकत होता है तथा पेम का सारतततव करणा है। करणा
गहन संवेदनशील होती है िजसकी कोई सीमा नही होती। करणा की गित िनबाध एवं
अपितहत होती है। केवल मात अपने िनकटवती जन के पित ही करणाभाव होना संकीणर
मोह होता है। करणा के दारा संकीणर आतमीयता एवं ममतव का पिरषकार एवं िवसतार हो
जाता है। करणा मे वयापकता होता है। करणा वणर, जाित, भाषा और भौगोिलक अथवा
राजनीितक सीमाओं के बनधन तोडकर महासागर की पचणड ऊिमर बढती हुई फैलती चली
जाती है। सतय तो यह है िक अमृतमयी करणा संकीणर सव को पार करके पािणमात को
अपने भीतर समेट लेती है।
करणादर वयिकत सचचा मानव अथवा सनत होता है। करणादरता मानव को सवाथर ,
शोषण, घृणा और िहंसा से मुकत करके हृदय को िनमरल कर देती है। करणादर मानव
सवरथा अभय होता है. वह पूणर अिहंसक होता है तथा उसके समपकर मे आनेवाला िहंसक
पाणी भी उसके पभाव से सहज ही िहंसा-भाव का तयाग कर देता है। पेमपूणर एवं करणादर
मानव की करणा मोहजिनत भावुकता से सवरथा िभन होती है तथा वह अपने साितवक
पभाव से दस
ू रो के िवचार और चिरत का रपानतरण करने मे समथर होता है।
िनतानतिनमरलसवानतः करणादर पुरष मानविशरोमिण होता है। यह जीवनमात के कष का
हरण करने वाला तथा समसत जीवन का ताता एवं सुखदाता हो जाता है। जीवन-वेिल को
पेम-रसामृत से सीचकर उसे पुिषपत और पललिवत करना जीवन का पधान उदेशय एवं
पयोजन है। लघु िबनदु से अपार िसनधु हो जाना मानो-जीवन की साथरकता है.
×
×
×
जीवन मे जहा एक ओर कुछ आदशों और मूलयो की पसथापना करके उनसे पेरणा लेते
रहना महतवपूणर है, वहा दस
ू री ओर जन-समाज की गितिविध से अवगत रहकर उस पर
िवचार करना भी आवशयक है कयोिक मनुषय को जीवन के अनत तक जन-समाज मे ही
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जीवन-यापन करना होता है। समाज के िवचारो तथा समाज की घटनाओं का वयिकततव के
जीवन पर सुदरू गामी पभाव होता है। मनुषय सामािजक, धािमरक और राजनीितक घटनाओं
के पतयक अथवा परोक पभाव से अछू ता नही रह सकता। अतएव मनुषय को जन-समाज
की समसत घटनाओं पर िचनतन करते हुए उनके पित अपने दृिषकोण को सपष एवं
सुिनिशत कर लेना चािहए तथा अपने िचनतन, सवभाव, सामथयर, कमता दाियतव और अपनी
पिरिसथितयो पर गंभीरतापूवरक िवचार करके ही पितिकया करना चािहए। मनुषय िजस
सीमा तक सवयं को, जन-समाज को तथा सासािरक घटनाओं को समझ सकेगा, उसी
सीमा तक अपने जीवन मे सनतुलन रख सकेगा तथा समसयाओं का िववेकपूवरक समाधान
कर सकेगा। मनुषय के जीवन के िविवध केतो मे आधुिनकता के लाभ, हािन और पभाव को
समझकर ही आधुिनक युग से ठीक पकार से तालमेल सथािपत कर सकता है। यदिप
पतयेक मनुषय को अपनी सुिवचािरत धारणाओं एवं मानयताओं के अनुरप ही जीवन शैली
अपनाकर साहसपूवरक जीवन-िनवाह करना तथािप िववेकशील पुरष देश, काल और
पिरिसथित को समझकर आचरण करता है। यह जीवन का वयावहािरक पक है।
हम पतयेक कण अपने को सबल एवं सुखी अथवा दुबरल एवं दुखी बनाते रहते है.
अतएव यह जान लेना आवशयक है िक िकन गुणो से हमारी शिकत और शािनत का पोषण हो
रहा है तथा िकन दोषो से उनका हास हो रहा है। यह जानकर हम अपने समबनध मे कुछ
िनणरय और िनशय कर सकते है।
जीवन को उललासमय बनाने के िलए हमे ऐसी जीवन-शैली को अपनाना चािहए
िजसमे िववेक की पधानता हो तथा हमारे कायर-कलाप से जीवन मे रसमयता का समावेश
हो जाए। िववेक का अथर है िचनतन और अनुभव पर आधिरत हमारी समझदारी अथवा
सूझ-बूझ। केवल बुिद होना तथा अधययन करना पयापत नही होता। िववेक बुिद का
जागरण है अथवा एक ऐसा पकाश है जो भय, भम, संशया, िचनता आिद के अनधकार को
दरू करके हमे आगे बढने की कमता पदान करता है। अतएव हमारे िलए िचनतन को
तकरपूणर िवचार पिकया से पैना करते रहना िनतानत आवशयक है। जीवन के पतयेक
महततवपूणर है। उिचत िदशा मे पुरषाथर एवं कमर करने के िलए तथा उमंगभरा जीवन िबताने
के िलए मानव के जीवन मे िचनतन की पधानता एवं पमुखता िनिवरवाद है। िचनतनरिहत
पुरषाथर करनेवाला मनुषय न केवल पग-पग पर ठोकरे खाता है, बिलक दुखी भी रहता है
तथा िचनतनसिहत पुरषाथर करनेवाला मनुषय न केवल कुछ ठोस उपलिबध पापत कर लेता
है, बिलक सदा सुखी भी रहता है।
×
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िचनतन की िदशा कया होनी चािहए? िचनतन का पमुख उदेशय सतय की खोज होना
चािहए। जीवन की पतयेक िदशा मे हमे सवयं सतय की खोज करनी चािहए तथा यह िनशय
करने का पतयन करना चािहए िक सतय कया है और उिचत कया है तथा िमथया कया है और
अनुिचत कया है। हमारी कथनी और करनी मे िकतना सतय होगा, यह महतवपूणर है िकनतु
सवािधक महततवपूणर तो सतय को जानना और सवीकार करना है। पिवत गनथो मे कया
उललेख है, िवदानो ने कया कहा है, अथवा पुसतको मे कया िलखा है उसे आदर देना चािहए
िकनतु उसे जयो-का-तयो सवीकार करके गहण कर लेना हमारे आनतिरक िवकास को रोक
देगा तथा हम उसे कदािप अपना नही कह सकते। अपने िचनतन और अनुभव की कसौटी
पर खरा िसद होने पर ही हम उसे अपना कह सकते । अपने िचनतन और अनुभव की
कसौटी पर खरा िसद होने पर ही हम उसे अपना कह सकते है। यह आवशयक नही है
िक हम िकसी पिवत गनथ, पुसतक अथवा िवदान् के समग कथन को सवीकार कर ले।
हम उसका ितरसकार न करे िकनतु केवल उतना ही अंश गहण करे िजतने से हमारी
बौिदक सहमित होती रहै।
हमारी बुिद की िनिषकयता होने पर थोपे हुए 'जान' की मौन सवीकृित का आधार
िसथर और दृढ नही हो सकता। जान के गहण मे बौिदक सचेषता एवं सिकयता होना
मानवीय पितषा के अनुरप है। समसत पितपािदत जान, भूले ही वह महान् गनथो मे
सिनिहत हो अथवा महापुरषो दारा किथत हो, सतय होना आवशयक नही है। यिद िकसी
महापुरष ने सतय का संदशरन िकया है तो वह आदरणीय है िकनतु सतय िकसीका
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एकािधकार नही हो सकता तता सतय के िनणरय एवं संदशरन का मागर सभी के िलए समान
रप से खुला हुआ है। पिवतता की आड मे सतय को आलोचना से परे िछपाकर रखनेवाले
अनधानुयायी मानवता के घोर शतु होते है। सतय-गहण के समबनध मे भी हम सवावलमबी
हो। सतय ही मनुषयतव का िनमाण करता है। सतय शेष पकाश होता है जो मनुषय के
िववेक को आलोिकत करके उसका जागरण कर देता है।
सतय का संदशरन मनुषयको अकलपनीय तृिपत करता है। सतय का गहण मनुषय को
सथायी शिकत पदान करता है तथा कभी िनबरल नही कर सकता है, भले ही वह पारमभ मे
आशयरचिकत करके पकिमपत कर दे। सतय मनुषय को नया उतसाह और नया जीवन पदान
कर देता है। सतय शेष पकाश है जो मनुषय को भटकने से बचाता है। बुिदमान् मनुषय
को सतय को गहण और असतय के तयाग के िलए सदैव तैयार रहना चािहए। असतय
भमातमक होता है तथा मीठे िवष की भाित घातक िसद होता है। सतय जीवनत होता है
तथा जीवनतता पदान करता है और िमथया िनषपाण होता है तथा मनुषय को दुबरल बनाकर
भम एवं भय से भर देता है। सतय को समयक् पकार से सवीकार करना ही सतय के गहण
का समारमभ है। सतय का िववेकपूवरक गहण सतय की गिरमा को पितिषत करता है।
सतय को समयक् पकार से सवीकार करना ही सतय के गहण का समारमभ है। सतय का
िववेकपूवरक गहण सतय की गिरमा को पितिषत करता है। सतय का गहण होने पर असतय
मनुषय के जीवन से इसी पकार छू टने लगता है जैसे वसनत ऋतु मे नई कोपल आने पर
पुराने पते सूखकर सवयं झडने लगते है। दुरागह और अनधानुकरण सतय की पािपत मे
अवरोधक होते है। तथा सतय का अनुसंधाता सदैव गहणशील और िवनम होता है।
िकसी पिवत गनथ, िकसी पखयात पुसतक अथवा िकसी महापुरष दारा पदत जानसामगी को िवचार एवं अनुभव की कसौटी पर कसने के हेतु सतय के अनवेषक के िलए
िवसतृत सवाधयाय एवं िचनतन करना आवशयक होता है। मनुषय गहन सवाधयाय एवं िवचारमनथन दारा जान-सामगी का तुलनातम अधययन करके ही सतय का अनुसंधान कर सकता
है। सतय कलयाणकारी होता है तथा सतय का गहण मानव के जीवन को उदात बना देता
है।
िविवध धमों का उदेिषत उदेशय जीवन को उदात बनाना अथवा जनकलयाण करना है
िकनतु सतय का अनवेषक धमर को भी िवचारहीन होकर सवीकार नही करता तथा वह धमर
को भी िवचारहीन होकर सवीकार नही करता तथा वह धमर को भी िवचारहीन होकर
सवीकार नही करता तथा वह धमर के उन अंशो को ही सवीकार करता है जो सतय एवं
अनुभव की कसौटी पर खरे उतरते है। वसतुतः धमा का उदय भी सतय के अनवेषण एवं
पोषण के िलए ही हुआ तथा कोई सतय-िवरोधी तततव कदािप मानय नही हो सकता है।
सतय की उपासना मानव का परम धमर से परे कुछ नही है।
धमर की आड मे धमानधता, संकीणरता, घृणा, िवदेष, अनयाय, अतयाचार, शोषण,
उतपीडन, कटरता और िहंसा के ताणडेव ने तथा भीषण युदो ने धमा के वतरमान सवरप की
उपादेयता पर एक िवशाल पशिचह लगा िदया है। वासतव मे सभी धमों का सवरमानय मूल
तततव एक ही है-ईशर का िचनतन करना तथा उससे पेिरत होकर मानवमात का ही नही,
बिलक जीवनमात का कलयाण करना , पेम, परोपकार और सेवा मे रत रहना। िकनतु
आधयाितमक सामपदाियकता के दायरे खीचना, अपने धमर एवं समपदाय को शेष एवं िवशेष
मानकर उनकी पहचान के िलए अलगाव एवं बँटवारे की दीवारे खडी करना, बहशी
मारकाट के दारा इंसािनयत के सथान पर हैवािनयत को लादना, अनय मतावलिमबयो को
आतंिकत करना िनशय ही धमर की िवकृित है। जब धमरगुर आधयाितमकता तथा पेम,
परोपकार और सेवा को छोडकर, राजनीित के केत मे घुसकर तथा सता की राजनीित मे
फँसकर घृणा और िहंसा का पाठ िसखाते है, वे धमर को खतरे मे िदखाकर और शदालु
अनुयािययो को भटकाकर जन-समाज का अिहत करते है। धमर समपदाय नही होता तथा
समपदावाद मे फँसकर धमर िवकृत हो जाता है। धमर मनुषय को सतय की साधना मे लगाता
है तथा आचरण मे पकट होता है।
अनेक धमरगुर धमरसथलो को शैतानी के अडडे बनाकर तथा धमर के अथर का
अनथर करके अपने अनुयािययो को धमर के उदेशय से भटका देते है। िजस धमर, गनथ,
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गुर और सनत का उपदेश सतय का पेरक न हो, सतय पर िटका हुआ न हो तथा
संकीणरता, सवाथर, अनधिवशास, भय, शोषण और उतपीडन को पोतसािहत करता हो, वह
तयाजय है। जो उपदेश सारे समाज के िहत मे नही है तथा और संकीणरता, अलगाव, और
तोडफोड को पोतसािहत करता है, वह वयिकत के िहत मे भी नही हो सकता। धमर वयिकत
को आनतिरक आननद देता है तथा सवाथर से परमाथर की ओर पवृत करके समाज को
जोडता है। धमर मनुषय को पशु-सतर से ऊँचे उठाकर करके समाज को जोडता है। धमर
मनुषय को पशु-सतर से ऊँचे उठाकर आधयाितमक सतर तक अथवा अंधकार से आलोक
तक ले जाता है। धमर कोिट-कोिट दीन, दुखी, िनराश, शोकिनमगन, वृद, रगण और
असहाय लोगो के जीवन का सहारा बनकर, सनतोष, शािनत संबल, साहस और धैयर पदान
करता है। पतयेक वयिकत के जीवन के कुछ अनतराल(गैप) होते है िजनका समाधान केवल
धमर दारा ही होता है।
धमर वयिकततव को टू टने और िबखरने से बचा देता है तथा मानव-कलयाण का महान्
साधन होता है। धमर मनुषय का शेष िमत है िकनतु सतय का उपासक धमर के िवषय मे भी
सावधान रहता है, समझ-समझ-कर धमानुसरण करता है तथा धमर के िवकृत सवरप को
िववेकपूवरक तयाग देता है।
धमर के केत मे शदा का िवशेष महततव है। शदा का अथर है सतय एवं सतयिनष
पुरषो के पित आदरभाव होना। शदा मनुषय को सतय के अपनाने के िलए गहणशील बना
देती है, िकनतु िवकृत होने पर अनधिवशास और आडमबर का रप लेकर वयिकत तथा
समाज के पतनकारक हो जाती है। मनुषय को िववेक दारा सतय और असतय तथा उिचत
और अनुिचत का िनणरय पग-पग पर रखना चािहए। तथा अपने भीतर िनरनतर जागरण की
अवसथा बनाए रखना चािहए। जब धमर बौिदकता एवं िवचार-शिकत को कुिणठत करने
लगात है, वह भयाकन हो जाता है।
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यदिप परमातमा अनुभूित का िवषय है तथा तकर से परमातमा के अिसततव को
पमािणक नही िकया जा सकता तथािप यह महतवपूणर है िक मनुषय परमातमा के समबनध मे
कैसी धारणा बनाता है। परमातमा एक है यदिप उसे अनेक रपो मे पूजा जाता है। वह
नयायकारी और दयामय है। उसके नयाय मे दया है। वह एक सवरवयापक सूकम शिकत है
तथा वह पतयेक पाणी के भीतर रमा हुआ है वह मानव के हृदय मे शिकत के सोत तथा
पथ-पदशरक एवं पेरक पकाश के रप मे बसा हुआ है। धयान तथा पाथरना के दारा मनुषय
अपने भीतर िछपी हुई ईशरीय सता से समबनध जोडकर शािनत और शिकत पापत कर
सकता है। िकनतु कोई मनुषय िकतना भी पूजा-पाठ करता हो, यिद वह अपने सवभाव को
नही सुधारता और मन को अहंकार, देष घृणा, कोध, पलोभन और भय से मुकत नही करता
तथा पेम, परोपकार, कमा आिद मानवीय गुणो से युकत नही होती, वह अपना अथवा भीतर
अतीिनदय चेतना का िवकास करना, कमरिनष होना तथा िनससवाथर भाव से पािणमात को
सुख और शािनत देने का पयत करना।
पायः परमातमा के समबनध मे यह कलपना की जाती है िक वह एक खुशामदपसनद
और खौफनाक बादशाह की तरह हुकूमत करता है, उसे इनसान का हँसना, खेलना पसनद
नही और उससे हर विकत डरते रहना चािहए। यह हासयासपद है। परमातमा मनुषय का
िहतैषी, बनधु, सहायक,रकक और सतकमर-पेरक है। वह भयकता और मंगलकता और
मंगलकता है तथा िवघिवनाशक है। वह मनुषय को सुख पापत करते हुए देखकर उससरे
देष नही करता। परमातमा मे हमारा िवशास तभी साथरक है जब हम उसके साथ आतमीयता
का एक वयिकतगत नाता मानकर उसे अपने मन-मिनदर मे आसीन कर ले तथा आवशयकता
होने पर उससे पेरणा और सहायता ले सके। परमातमा के समबनध मे पतयेक मनुषय की
धारणा उसके आनतिरक िवकास िवचार, और अनुभव पर आधािरत होती है। वह अनाम,
अरप होकर भी िनरनतर रका करने के िलए तैयार है।
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जीवन मे अनधिवशास पायः अजान तथा भय के कारण पनपते है। मनुषय
अनधिवशास को मन मे पालकर यथाथर से दरू हो जाता है तथा पुरषाथर को छोडकर
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िनरथरक भटकने लगता है। अनधिवशास को पालने का अथर है अंिधयारी गली मे घुसकर
वहा पकाश की आशा करके बाहर िनकलने का रासता ढू ँढना। अनधिवशासी वयिकत अपने
समय और शिकत का कय़ का कय करके अपने दुःख को बढा लेता है। रोग होने पर
िचिकतसा का मागर छोडकर सवासथय-पािपत के िलए अथवा िनधरनता होने पर पुरषाथर का
मागर छोडकर धन-पािपत के िलए मृतक लोगो ने दफनाये हुए सथानो पर उनकी पाथरना
करना भटकना ही है। असत् भूत-पेतो को पसन करना बौिदकता का अपमान है। हमारे
मन के पुराने संसकार और िवशास ही भय का भूत बना देते है। अनेक लोग ईशर तथा
देवी-देवताओं को पसन करने के िलए िनरीह, मूक और असहाय पशुओं का वध करके
धािमरक उतसव मनाते है तथा उसे पुणय-कायर समझते है। िजन लोगो मे पशु-बध एक
पिवत धािमरक परमपरा हो तथा िजनहे पशुवध के िलए बबररता, िनदरयता एवं कूरता की दीका
दी जाए उनसे सदावना, करणादरता एवं मानवता का आशा कैसे की जा सकती है ? िनरीह
पशु-पिकयो की हतया करने एवं मासाहार करने से मनुषय की संवेदनशील नष हो जाती है
तथा मनुषय िनषकरण एवं कठोर हो जाता है। सभय समाज के िलए िनदरयता को पिवत
िसद करना अशोभनीय है। अनधिवशास के कुचक मे फँसे हुए कुछ लोग िजहा आिद
काटकर देवता को पसन करने का यत करते है और अनधिवशास के कारण उनहे सचचा
कर देने मे अपतयक सहयोग देने लगते है तथा अपने भागय को दोष देने लगते है।
अगिणत लोग 'होनी' मे िवशास करके पुरषाथर का पिरतयाग कर देते है तथा ईशर को दोष
देते है।
मानव-जीवन मे कमर की पधानता है तथा कतरवय-पालन अथवा पुरषाथर का िवकलप
पूजा-पाठ भी नही है। संसार के समसत मनीषीगण ने बार-बार कहा है िक मनुषय अपने
भागय का िनमाता सवयं है। इितहास साकी है िक भागयवाद ने अगिणत वयिकतयो और राषटो
की दुगरित कर दी तथा दृढ संकलप एवं पुरषाथर के सहारे असंखय वीर पुरषो ने जीवन के
िविवध केतो मे साहसपूणर चमतकार कर िदखाये।
संसार के इितहास मे सैकडो उदाहरण है िक थोडे-से लोगो ने बुिदबल और
पराकम का कोई िवकलप नही है। मानिसक वयिकत से दस
ू रे के मन की बात का जान कर
लेना समभव है तथा बुिदमान् वयिकत का अनुमान भी संयोग से कभी ठीक हो सता है िकनतु
भिवषय िनमाणाधीन होने के कारण अजात होता है। मानव के िवचार और कमर पर गहो के
पभाव को सवीकार करना बुिद की पराजय है।
परमातमा की गित और परमातमा के िवधान को कुछ सूतो की पिरिध मे नही बाधा
जा सकता है। िवधाता सवयं ही अपने िवधान को जानता हूं, कोई अनय नही। उसके
िवधान की वयाखया तुचछ गह नही कर सकते । सूयर तथा उसके गहो का अिसततव इस
अननत बहणड के नगणय है तथा मनुषय के िवचार एवं कमर पर उनका पभाव सवीकार
करना बुिद की हार है। पायः जयोितषी की भिवषयवाणी उसके मनोभाव (मूड) पर िनभरर
होती है तथा िकसी भिवषयवकता को जयोितिषयो को अपने भिवषय का जान नही होता।
कायर वयिकत अपने भिवषय को जयोितिषयो के हाथ मे तथा बलवान् पुरष अपने भिवषय
को अपने ही हाथ मे सफल मानते है, उनमे कुछ गुण होते है, िजनहे भागय के कारण जीवन
मे सफल मानते है, उनमे कुछ गुण होते हे, िजनहे हम अनदेखा कर देते है। हम िजनहे
भागयहीनता के कारण जीवन मे िवफल अनदेखा कर देते है। हम िजनहे भागयहीनता के
कारण जीवन मे िवफल मानते है, उनमे कुछ दोष होते है जो उनहे आगे बढने नही देते।
मनुषय की हाथो और मसतक की रेखाएँ बदलती रहती है तथा वे कभी भिवषय की िनिशत
सूचना नही दे सकती। गह और रेखाएँ जीवन की वयाखया नही कर सकते तथा हमे
समसत समाधान अपने भीतर ही टटोलना चािहए। अनेक बार मनुषय सवयं ही िकसी
पचछन अपराध-बोध अथवा कुणठा के कारण अपने िलए अशुभ की आशंका करने लगता है
जो वासतव मे िनराधार एवं िमथया होती है।
सभी पकार के अनधिवशासो के मूल मे अजान और भय होते है। सवाधयाय, िचनतन
और मनन से अजान का िनराकरण करना चािहए तथा िववेक दारा भय का शमन करना
चािहए। वासतव मे हम भय को अपने से िचपटाते है और उसे छोडते नही है तथा मानते है
िक भय ने हमे जकड रखा है। हम अपने मन के सवामी सवयं है िकनतु हमने ही इसे बाहरी
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दुिनया के पलोभन और भय से गसत कर िलया है तथा हम ही उसे उनसे कणभर मे मुकत
कर सकते है। बस, एक बार, दृढ संकलप करके मन की कमजोिरयो के मन से िनकाल
फेकना है और अपने भीतर िनरनतर जागरण की अवसथा बनाए रखना है।
हमे दृढ संकलप लेना चािहए िक िजन बातो से मानिसक अथवा शारीिरक दुबरलता
होती हो, हमे उनको सदा दरू ही रखना है। बुिद की िवशलेषण-शिकत को छोडने पर हम
सवयं को दुबरल बना देते है। सतय का अवलमबन हमे अनधिवशासो तथा भयो से मुकत
करके सवाधीन और सुखी बना देता है। हम अनधिवशासो और भयो को छोडकर
शिकतशाली बने और बनधनमुकत होकर जीवन मे आगे बढते ही जाये। मनुषय अपने भिवषय
का िनमाण करने मे सकम है, बस, बढते ही जाये। मनुषय अपने भिवषय का िनमाण करने मे
सकम है, बस, िववेक का िनरनतर जागरण तथा सतय का अवलमबन होना चािहए। सतय
को अपनाने से हमारे भीतर ऊजा का अवलमबन होना चािहए। सतय को अपनाने से हमारे
भीतर ऊजा जागकर जीवन-चक को तीवरगामी बना देगी । यिद हम भय तयागकर समसत
संकट का सामना करेगे तो सफलतापूवरक पार कर लेगे। अतएव सवरपथम मन को सबल
और सशकत करने का सचचा पयत करना चािहए। िनशय ही, धयानयोगी तथा सचचे सनत
मे अकलपनीय शिकत होती है और उनके आशीवाद से कष िनवारण भी संभव हो जाता है।
धमर का उदेशय उतम होने पर भी धमरकेत मे अनेक जंजाल आ गे है। समाज की
वयवसथा के िहत मे कुछ मूलयो को पुणय की तथा उनके उललंघन को पाप की संजा दी गई
िकनतु कालानतर मे पिरिसथितयो के पिरवतरन तथा वैजािनक तथयो की बाढ आ जाने के
कारण जन-समाज मे मूलय ही बदल गए है और पुराने मूलयो को जयो-का-तयो मानने की
उपयोिगता एवं उपदेयता पर पश िचनह लग गया है। इसके अितिरकत पाप का भय िववेक
को धवसत कर देता है। बालयकाल से ही बालक के कोमल मन पर बय के संसकार डाल
देना िववेकसममत नही है। मनुषय बुिदमान पाणी है तथा मनुषय को समाज-िवरोधी आचरण
से रोकने के िलए उिचत िशका दी जानी चािहए। पारलौिकक दणड के भय ने मनुषय को
अवािछत आचरण से उतना नही रोका िजतना उसने मनुषय को कुणठागसत करके पंगु ही
बना िदया।
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िववेक का जागरण ही मनुषय को सतकमर मे पवृित करता है तथा कुकमर से रोकता
है। िववेक मनुषय का आनतिरक िमत और सदगुर है। िकसी अनय वयिकत की सहायता भी
िनषफल रहती है यिद मनुषय का िववेक का पकाशदीप पजविलत न हो। अतएव
आवशयकता यह है िक मनुषय सवयं ही तथयो को समझकर अपने पैरो पर उठ खडा हो।
धमर के केत मे घुसकर भी बुिद के दार खोले रखने से ही मनुषय को लाभ हो सकता है
तथा बुिद के दार बनद कर देने से वयिकत का िवकास अवरद हो जाने के कारण घोर हािन
हो जाित है। कही-कही तो संगीत को भी गुनाह बता िदया गया है। मिदरापान, धूमपान
आिद वयसनो तथा यौन की भटकनो को भी मनुषय के भीतर समझदारी और सकंलप-शिकत
को जगाकर रोका जाना पाप-बय िदखाने की अपेका अिधक पभावी िसद होता है। यदिप
यौनाचार का िनयंतण होना िनिशत ही वयिकत तथा समाज के िहत मे होता है, उस पर पाप
के बय दारा बरबस अंकुश लगाने से दुःखदायी कुणठाओं का जनम हो जाता है। पायः सभी
धमा ने मनुषय यंतणाओं का िवशद िचतण एवं वणरन िकया है िजससे मानव के िहत की
अपेका अिहत अिधक हुआ है।
काम एक ऊजा है तथा उसे िववेक दारा िदशा िदया जाना ही सवसथ हो सता है .
यौन एक नैसिगरक पवृित है िकनतु इसे दोषमय एवं लजजासपद मानकर तथा पाप की संजा
देकर वयिकततव के िवकास पर घोस कुठाराघात िकया जाता है। यह एकतथय है िक मनुषय
िजतेिनदय होकर ही जीवन मे कुछ उपलिबध कर सकता है िकनतु यौन को पापमय कहकर
तथा मनुषय को नरक आिद के दणड भोगने का भय िदखाकर उस पर बरबस अंकुश
लगाना बौिदकता पर पहार करना तथा उसे कुिणठत करना है। यौन जीवन का अतयनत
महततवपूणर पक है िकनतु समसत चािरितक गुणो को केवल यौन-पक मे ही समेटकर तथा
यौन-पक को ही नैितकता का एकमात आधार मानकर, िकसी वयिकत को भला या बुरा
घोिषत कर देना अनुदारता है। यह एक तथय है िक अनेक तरण और तरणी मात दैिहक
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आकषरण मे फँसकर मनोपीडा के कारण यौन-हताश मे भटक जाते है तथा बहुमूलय जीवन
को नष कर देते है और अनेक नासमझ लोग वैवािहक सूतो मे बँधकर भी कही जाल मं
फँसकर गलािनपूणर िसथित को पापत हो जात है तथा कभी-कभी पेम-ितकोण के कारण
िनलरजज अपराधी हो जाते है। मनुषय को िववेक के जागरण दारा िचनतन और आचरण को
मयािदत करना चािहए।
अवैध यौनाचार का चसका पडने पर पुरष को अपनी पती ही नही पिरवार भी
बादक पतीत होने लगता है तथा मनुषय नए-नए जालो मे सवयं ही फँसने लगात है िकनतु
िववेकशील पुरष मयादा के अितकमण को भटकना मानकर वासना-जाल से दरू ही रहता
है। िववाह-पदित मानव-सभयता की एक उपलिबध है तथा उसकी िनधािरत मयादा का
पालन-वयिकत के िवकास एवं समाज की वयवसथा के िहत मे होता है िकनतु िववेकशील
मनुषय िनयमो का पालन आतमानुशासनकी दृिष से करता है, भयभीत होकर नही।
वासनामय आकषरण पतनकाल दोष होता है िकनतु गुणसममान होकर नही। वासनामय
आकषरण पतनकारक दोष होता है िकनतु गुणसममान के आधार पर मैतीपूणर िनशछल नाते
कभी कलेशपद नही होते।
मनुषय से भूल होना सवाभािवक है। संसार मे िकससे भूल नही होती ? कौन
अनतिवररोधो, कुणठाओं और भयो से पूणरतः मुकत है? कौन पूणर है? अनतिवररोधो, कुणठाओं
और भयो से पूणरतः मुकत है? कौन पूणर है? भूल को पाप मानकर मन को कुणठागसत करने
से मनुषय का आनतिरक िवकास अवरद हो जाता है। िववेकशील वयिकत अपनी भूल को
सवीकार कर लेता है तथा भूल की पुनरावृित न करने का पयत करता है। भूल को
सवीकार करने पर भी यिद भूल की पुनरावृित होती है तो भी भूल को सवीकार करने के
कारण उसका वेग कम हो जाता है तथा धीरे-धीरे भूल समापत हो जाती है। िववेख दारा
भूल के समापत होने से इचछाशिकत दृढ होती है तथा आतमिवशास बढता है। जब भूल
िचनतन को झकझोर देती है, वह िववेक की उतपेरक तथा उपयोगी हो जाती है। यह भूल
का उतम पक है।
कभी-कभी हम अपने सवाभािवक िवचारो से ही चौक जाते है। ये किणक िवचार
अथवा कलपना िनतानत सामानय और सवाभािवक होते है। िकनतु हम भय के कारण
असामानय मानकर उनहे अनावशयक महततव दे देते है तथा भानत एवं िचिनतत हो जाते है।
वासतव मे मन का सवभाव कही-से-कही पहुँच जाना है तथा कलपनाकम पारंभ होते ही मन
वायु मे उडते हुए पते की भाित आशयरजनक सथलो तक पहुँच जाता है िजसका उपयोग
करने मे कलपनाशील लेखक पसनता का अनुभव करते है िकनतु हम वयथर ही उनेह ं
दोषपूणर मानकर भानत एवं भयभीत हो जाते है। हमं िनराधार आशंकाओं को महततव नही
देना चािहए। अिववेक के कारण मनुषय राई को पहाड बना देता है। कभी-कभी कलपना के
पंख मनुषय को िवचार-शृंखला के पारमभिबनदु से इतनी दरू ले जाते है िक वह उसे भूल
जाता है तथा सवयं से पूछता है-मै कया करह रहा था? यह सब सवाभािवक है। हमे उनके
घबराना नही चािहए और शानत होकर िवचारो के पवाह को देखना चािहए। वासतव मे
चेतन-सतर पर हमारी बुिद सुधार की दृिष से जागत् एवं सिकय रहती है। अनेक बार हम
िकसी वयिकत अथवा घटना के िवषय मे पुरानी आदत के कारण ऐसी कलपना कर लेते है
जो हमारे वैचािरक-सतर एवं नैितक-सतर के अनुरप नही होती िकनतु अभद िवचार चेतनसतर पर पोतसाहन न पाकर सवयं ही कीण हो जाते है। वासतव मे पतयेक वयिकत के मन मे
ईषया-देष, वासना आिद अनेक पकार के िवकार और अनेक पकार भय रहते है िजनको
मनुषय देखना भी नही चाहता। यिद मुख पर कोई कािलख लग गयी है तो दपरण मे देखकर
उसे िमटाना चािहए। यह एक तथय है िक दोषो का उनमूलन उन पर दृिष जमाए रखने से
नही, बिलक गुणो की अिभवृिद करने के सवयं हो जाता है।
हमे अपने भीतर झाककर मन के दपरण को देखने का साहस करना चािहए तथा
िवकारो को सवािभक मानकर समझदारी और धैयर से उनका धीरे-धीरे शमन करने का यत
करना चािहए। सभी दोष मानवीय होते है तथा पूणर िनदोषता मात एक आदशर है। दोषो से
िनदोषता, अपूणरता से पूणरता की ओर बढते रहने मे जीवन की साथरकता है। मन मे सदाव
आते ही हमे उनका सदुपयोग करना चािहए तथा ईषया-देष, भय आिद िवकारो के साथ सीधे
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न लडकर सदावो और सतकमों दारा उनहे कीण करना चािहए। मानव सुलभ दोषो को
देखकर चौकने के बजाए धैयरपूवरक उनका, शोधन करना चािहए। पश है िक मैने िकतना
सीखा तथा मैने कल की अपेका आज िकतना अिधक पयत िकया। सचचा पुरषाथर कभी
िनषफल नही होता। गितशील रहना, आगे बढते रहना ही तो जीवन है। बस, चलते रहो,
रको मत। पयत करने मे पसनता सिनिहत है। मुसािफर के िलए हर कदम एक मंिजल
है। जीवन की साथरकता जीवनतता बनाए रखने मे है। जो गनथ, गुर, दशरन और उपदेश
मनुषय को भीतर उतसाह और आननद भरकर आगे बढने की पेरणा दे, वह सराहनीय है।
जीवन को एक मधुरसंगीत बनाने के िलए कुछ गुणो की पसथापना तथा दोषो का
िनमूरलन करना िनतानत आवशयक है। यह कहना तकर संगत नही है िक गुणो की पसथापना
से पूवर दोषो को िनमूरल कर मन को िरकत कर लेना चािहए। वासतव मे िचनतन, पेम और
परमाथर (परोपकार) इतयिद गुणो की पसथापना दारा समसत दोषो का शमन सवतः ही हो
जाता है जैसे पकाश की िकरणो से अनधकार की शिकतया सवयं धवसत हो जाती है। गुणो
के िवकास एवं दोषो के उनमूलन की दोनो पिकया साथ ही चलती है। यदिप हमारे िलए
अपने मानवीय दोषो को जान लेना और उनहे पहचान लेना आवशयक है, तथािप दोषो पर
अतयिधक धयान केिनदत करने से वे दृढ हो जाते है। वासतव मे िचनतन, पेम, परमाथर और
पुरषाथर दारा जीवन-सतर ही ऊँचा हो जाता है तथा सब दोषो का शमन सवतः हो जाता
है।
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पतयेक मनुषय पशु-सतर(दैिहक अथवा भौितक-सतर) पर कुधा अथवा जठरािगन की
तृिपत भोजन दारा करता है, नेत, रसना, नािसका, कणर और वचा की तृिपत यौन दारा करता
है तथा िनदा दारा समसत देह को िवशाम देता है। िकनतु आनतिरक िवकास होने पर मनुषय
यह समझ लेता है िक पशुसतर अथवा भौितक धरातल पर मात दैिहक सुखभोग करना
जीव का लकय कदािप नही हो सकता। मनुषय यह भी समझ लेता है िक इिनदया-सतर पर
भोगो के पीछे भटकते रहने से गहन तृिपत देकर मनुषय को बौिदक, नैितक एवं आधयाितमक
िदशा की ओर उनमुख कर देता है। भोग-वृित का िनयंतण एवं उसका शमन िववेकपूणर
भोग दारा ही संभव होता है, दमन से कुणठा उतपन होकर िवकास को अवरद कर देती है।
यदिप मनुषय को जीवन-पयरनत िकसी अंश मे भौितक-सतर अथवा पशु-सतर पर भी
रहना पडता है और भौितक-सतर की उपेका करना घातक िसद हो सकता है तथािप
आनतिरक िवकास होने पर िववेखशील पुरष का िचनतन और आचरण ऊधवरमुखी हो जाता
है। जीवन मे समगता का अथर यह कदािप नही हो सकता है िक पशु-सतर तथा
आधयाितमकसतर समान है। िविभन सतरो मे परसपर तारतमय एवं सनतुलन रहना ही जीवन
की समगता है।
मनुषय सवधयाय, िशका, जानसंचय और िचनतन-मनन के दारा पशु-सतर से ऊपर
उठकर बौिदक धरातल पर जीने लगता है तथा उसे बौिदक सुख की अपेका इिनदय-सुख
तुचछ पतीत होने लगते है। पेम और परोपकार मनुषय को नैितक आधार देकर अधयातम
का मागर पशसत कर देते है तथा आधयाितमक-सतर पर मनुषय धयान आिद के दारा अपने
भीतर ही िदवय आलोक एवं शुद आननद को पापत करके कृताथर हो जाता है।
सवाधयाय, जानसंचय और िशका को िचनतन-मनन के दारा ही आतमसात् िकया जा
सकता है। सतय तो यह है िक समसत सवाधयय, जान-संचय और िशका का उदेशय भी
मनुषय मे िचनतन को जगाकर जीवन के पित एक सवसथ दृिषकोण एवं िववेक को उतपन
करना है। िशका एवं सवाधयाय का उदेशय मात जान-संचय नही है, बिलक अपने भीतर
पकाश एवं जागरण की अवसथा उतपन करना है। सवाधयाय एक सतसंग है। िववेकशील
पुरष जीवनभर सवाधयाय करता है। सवाधयाय मे कभी-कभी थोडे-से ही ऐसे शबद िमल
जाते है जो जीवन मे कािनतकारी पिरवतरन ला देते है तथा जीवन का धरातल की ऊँचा
कर देते है। पकाश की एक ही िकरण समसत घनीभूत अनधकार को कणभर मे धवसत
कर देती है।
वासतव मे मात सवाधयाय, जान-संचय और िशका एक भयावह बोझ है यिद मनुषय
िचनतन-मनन दारा उनहे सवीकार करके अपने जीवन का अंग नही बना लेता। वासतिवक
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िशका वही है जो मनुषय सोच-समझकर सवयं को देता है। अनुशासन और संयम जो बाहर
से थोपा जाता है, वह पायः वयिकततव मे िवदोह-भावना और कुणठाएँ उतपन कर देता है।
अनुशासन और संयम का महततव समझकर आतमानुशासन और आतमसंयम का पालन
करना वयिकततव का िनमाण कर देता है। मन िजसे सवीकार कर लेता है, वही उसका
सवरप हो जाता है। सवानुभूित का पकाश सचचा पथ-पदशरक होता है।
गमभीर िचनतन मनुषय को सतय की ओर उनमुख कर देता है तथा सतय और पेम
एक िबनदु पर िमल जाते है। सतय का सिकय रप पेम है। सतय का उपासक वयवहार मे
पेम को धारण कर लेता है। वासतव मे सतय और पेम एक ही तततव के दो पक होते है।
पेम जीवन को रसमय बना देता है। पेम मनुषय को वयापक बना देता है। पेम िनबरनध होता
है। पेम की गित कभी अवरद अथवा पितहत नही होती। पेम असीम और अननत होता
है।पेम मनुषय को िनमरल बनाकर वयिकततव का पिरषकार कर देता है। पेम मनुषय कोसरल
और सहृदय बना देता है। पेम के िबना आतमसंयम भी मात दमन है। पेम मधुरामृतहोता
है। पेम भौितक पलोभन तथा भय को िनमूरल कर देता है। पेम का अथर है भलाईमे अटू ट
िवशास होना तथा दस
ू रो के िलए सवाथर छोडकर जीना। सतय और पेम धमहै। जो धमर ,
गनथ और गुर सतय और पेम को समपदाय की संकुिचत सीमाओं मेबाधते है, वे सतय और
पेम के तततव को नही जानते। पेम पिवत, पावन औरवयापक होता है। पेम का मोती
साितवकता की शुिकत (सीप) मे उतपन होता औरिवकिसत होता है। केसर की खेती
साधारण भूिम मेम नही होती ।
पेम का सारभूत तततव करणा है। करणा मे संवेदनशीलता और सहृदयता अनतिनरिहत होते
है। करणा वयापक तततव है। करणा पािणमात को अपनी पिरिध मे समेट लेती है। कौन
अपना, कौन पराया? परोपकार मे अपना उपकार भी सनिहत होता है। पेम का सार है
करणा, परदुःखकातरता, सेवा, सहनशीलता, उदारता, कमा, तयाग बिलदान। समसत
भेदभाव छोडकर दीन-दुःखी, उपेिकत, पीिडत, शोिषत और असहाय लोगो के आँसू पोछना
और उनहे हृदय लगाकर उनकी सेवा करना धमर है तथा िकसीको रलना, पीडा देना अथवा
िकसीका शोषण करना धमर का िवलोम है। भेदभाव की दीवारे तोडकर सुरका देना धमर है ,
भेदभाव की दीवारो खडी करके दस
ू रो के िहत का हनन करना धमानध है वे लोग जो धमर
की आड मे अधमर का पचार कर रहे है। धमानध है वे लोग जो धमर के सारभूत तततव पेम
को छोडकर धमर के कंकाल को ढो रहे है। तथा सारी धरती पर उसे बलपूवरक तथा
छलपूवरक फैलाने मे जुटे है। करणापूणर पेम से बुदतव का उदय होता है।
पेम और उदारता मनुषय का सवभाव है। घृणा और ईषया-देष पितिकया है जो
वयिकततव को दिू षत करके शिकत को कीण करते है। दस
ू रो की पितषा, समृिद आिद को
देखकर पेरणा लेना और आगे बढने का पयत करना सराहनीय है िकनतु मन को देषािगन मे
जजरिरत करना अिववेक है। वासतव मे सबके केत िभन-िभन है तथा मनुषय को अपने
केत मे ही ऊंचे उठने मे सनतोष करना चािहए। ईषया-देष से शरीर मे ऐसे कारीय एवं
ं को दिू षत और देह को रोगी बना देते
तेजाबी तततवो का साव होने लगता है जो सनायुतभ
है। वासतव मे मनुषय िमथया अहं के कारण समाज मे केिनदय अथवा सममानपूणर सथान
चाहता है िकनतु िववेकशील वयिकत अपने से अिधक दस
ू रो को महततव देकर सममान पा
लेता है। पेमपूणर िवचार मनुषय के मन और शरीर को सवसथ कर देते है।
जीवन मे सतय और पेम को पसथापना के साथ ही घृणा और भय भी सवयं िवलुपत
हो जाते है तथा मनुषय को उसी माता मे आनतिरक शािनत और शिकत पापत हो जाते है
िजस माता मे सतय और पेम की पसथापना होती है। िववेकशील मनुषय अपने आनतिरक
िवकास के अनुरप ही आचरण करता है। मनुषय वयिकतगत मामले मे अिहंसा और िहंसा
का पालन अपनी आनतिरक िनषा के अनुरप कर सकता है िकनतु जब अनय लोगो अथवा
राषट पर आकमण अथवा संकट का पश हो, कोई वयिकत वह िकतना भी महान् हो, अकेला
िनमरय लेने मे सवतंत नही हो सकता। वासतव मे वयिकतगत मामलो मे अिहंसा के पालन का
िनणरय बाह पिरिसथितयो पर इतना िनभरर नही होता िजतना अपने आनतिरक िवकास,
िवशास और िनषा पर होता है।
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जीवन मे सतय और पेम की पसथापना करना एक साधना है िजसमे धैयर, साहस
और संयम की आवशयकता होती है। वासतव मे जीवन के िकसी भी केत मे आगे बढने के
िलए साहस, धैयर और आतम-संयम आवशयक होते है। पतयेक िदशा मे उठकर आगे बढने
के िलए साहस की आवशयकता होती है। साहस के िबना जीवन के िकसी केत मे पगित
नही हो सकती। अनेक िवदान, सशकत और साधारण वयिकत साहस के दारा आगे बढकर
सफलता पापत कर लेते है। अनेक िवदान् और चिरतवान् पुरष उपदेश करते हैिकनतु
साहस का अभाव होने के कारण सवयं उठकर खडे नही हो सकते तथा कायर-केत मे पैर
भी नही रखते। अनेक लोग तो अपने िवचार रखने का भी साहस नही कर पाते। हा,
महान् सनत कतरवय और कमर की सीमा से परे िसथत हो जाते है।
धैयर का अथर है कमर करते समय फल के िलए अधीर न होकर आशा और िवशास
के साथ-पािपत के िलए जुटे रहना। धरती मे बीज बोने पर उसे िवकिसत करने के िलए
पितिदन सीचने और उसकी सुरका करने मे धैयर की आवशयकता होती है। धैयर खोकर
मनुषय भटक जाता है। लकय-पािपत के मागर मे कषो और बाधाओं की परवाह न करते हुए
कतरवय पथ पर डटे रहने की आवशयकता होती है।
संयम का अथर है सवाथर, पलोभन आिद दोषो पर िनयनतण रखते हुए अपने मन के
वेग को िनयिनतत रखना और अित उतसाह एवं िनराशा के वशीभूत न होना तथा मयादा मे
रहना। संयम वही शेष है िजसे मनुषय सोच-समझकर सवयं अपने लागू करता है। मनुषय
साहस होने पर लकय-पािपत के िलए उठ खडा होता है, धैयर होने पर कमर मे जुटा रहता है
तथा संयम होने पर मागर से भटकता नही है। मनुषय को जीवन मे अपना कायर-केत और
लकय सपष कर लेना चािहए।
×
×
×
मानव-जीवन बहुआयामी है तथा उतम पुरष के िलए कही कायर-केत का अभाव
नही है। मनुषय अपने भौितक सवाथर से ऊपर उठकर अपने वयिकततव और पिरिसथितयो के
अनुरप िकसी भी िदशा मे लकय िनधािरत करके उसकी पूितर के िलए कमररत रह सकता
है। मनुषय की शिकतया अपिरसीम है तथा कायर-केत भी िवसतृत और िवशाल है।
उदारपूितर के िलए आजीिवका का साधन होना आवशयक है िकनतु मात पेट भरना और
पिरवार का पालन करना िववेकशील मनुषय को कभी गहन सनतोष एवं तृिपत नही दे
सकता। केवल अपनी दैिहक आवशयकताओं के िलए तो पशु जीते है। मनुषय वह है जो
ऐसा कुछ करके िदखाए िजससे संसार की भलाई हो तथा उसे सवयं को गहन-आतमसनतोष पापत हो। वासतव मे ऐसी महततवकाका कभी सदोष नही हो सकती। दस
ू रो के
कलयाण और अपने कलयाण मे कोई भेद नही होता। जो कमर दस
ू रो के िलए
कलयाणकारक है, वह अपने िलए हािनकारक अथवा दुःखदायक नही हो सकता। मनुषय
जयो-जयो िकसी उतम मागर पर आगे बढता है तथा कुछ उपलिबध होने लगती है, तयो-तयो
उसमे आतमिवशास बढता जाता है िववेकशील पुरष सफलता का अिभमान नही करता।
महान् होकर भी अिभमान के कारण मनुषय का पतन हो जाता है।
िववेकशील पुरष दृढ रहकर भी िवनम रहता है तथा पूवागह एवं दुरागह से मुकत
रहकर दस
ू रो से सीखने के िलए सदैव तैयार रहता है। वयिकततव सबल होकर भी िवनमय
होना चािहए। वासतव मे हम न केवल दस
ू रो के गुणो और सफलताओं से सीखते है, बिलक
दस
ू रो के दोषो और िवफलताओं से भी सीखते है। िववेकशील मनुषय जीवन के अनत तक
सतय के गहण और असतय के तयाग से अपने जीवन को सँवारने मे लगा रहता है।
िववेकशील पुरष अपनी वाहवाही के िलए ससती लोकिपयता के कुचक मे कभी
नही फँसता तथा कही झूठी "हा" "हा" नही करता। वह िनकृष अथवा संिदगध मामलो मे
कभी सहयोग नही देता। जो वयिकत केवल सबको पसन करने की दृिष से सदा ही सब
कुछ करने के िलए तैयार रहता है, वह दुबरल होता है तथा जीवन मे कभी सफल नही
होता। मनुषय को अनुिचत कायर मे सहयोग नही देना चािहए। सोचने , कहने और करने मे
भी एकरपता होने से चािरितक िवकास होता है। कमर की उतकृषता की कसौटी यह है
िक यिद कोई अनय वयिकत मेरे साथ ऐसा ही करता हो तो कया वह मुझे उिचत पतीत होगा
तथा कया ऐसा करनेवाला अनय वयिकत मेरे िलए सममान का पात होगा। उिचत और
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अनुिचत तथा देश,काल और पिरिसथित के अनुसार िकसी कमर की उपदेयता पर िवचार
करना, उसके वयावहािरक पक पर भी िवचार करना तथा अपनी िवचारधारा, सामथयर
ौौर कमता के अनुसार कतरवय कमर करना िववेक तथा समझदारी है।
मनुषय के सभी गुण पुरषाथर-गुण केिबना अधूरे है । अनेक मनुषय संगटगसत
होकर ईशर, भागय और संसार को दोष देते रहते है िकनतु संकट-िनवारण के िलए उपाय
सोचकर पुरषाथर नही करते। संसार मे पुरषाथर का कोई िवकलप नही है। कुछ लोग
भगवान् और भागय के भरोसे िनठलले बैठ जाते और संकट की दलदल मे फँसते चले जाते
है। िवषम पिरिसथितयो एवं किठनाइयो के साथ संघषर करने से मनुषय का आतमिवशास दृढ
हो जाता है तथा सनतोष पापत होता है। किठनाई और संकट की चुनौती सवीकार
करके,जुझार इचछा-शिकत से उसका डटकर मुकाबवा करने पर मनुषय न केवल उस पर
िवजय पा लेता है बिलक जीवन की दौड मे आगे बढना सीख लेता है। सभी महापुरषो की
सफलता के पीछे संघषर का एक इितहास होता है िकनतु मनुषय को लकय पर पूरा धयान
रखकर कमर करते हुए भी कमरफल की िचनता नही करनी चािहए। वीर सैिनक के िलए
रण-केत मे जाकर िवजय हेतु लडना पयापत है कयोिक जीत और हार उसके हाथ मे नही
होते। मनुषय कमर करने का अिधकारी है तथा फल उसके अधीन नही होता। िवदाथी को
परीका मे उतीणर होने के िलए पिरशम करना चािहए िकनतु वह फल के िलए उतरदायी नही
हो सकता। भिवषय मे और अिधक पयत करने का संकलप लेना तो सवरथा उिचत है िकनतु
फल मे सनतोष न मानकर वयाकुल होना अिववेक है। कुछ लोगो का मत है िक असनतोष
दैवी होता है, कयोिक पायः सनतुष वयिकत पिरशम करना छोड देते है तथा असनतुष
वयिकत पिरशम मे जुटे रहते है िकनतु यह तथयातमक नही है। वासतव मे मनुषय को कमर
करने की परेणा अपनी कतरवय-भावना से लेनी चािहए, न िक असनतोष से। असनतोष से
वयाकुलता उतपन होती है तथा आतमिवशास कीण होता है। मनुषय को कमर करने की पेरणा
अपने भीतर से लेनी चािहए तथा लकय िनधािरत करके उसके िलए पुरषाथर भी करना
चािहए िकनतु फल से अितहिषरत अथवा अितिखन होना िववेकपूणर नही होता। केवल फल
पर ही धयान देनेवाले अनेक लोग किठनाई का बहाना लेकर कमर ही नही करते अथवा कमर
को पारमभ करके मधय मे ही छोड देते है िकनतु कमर की पेरणा अपने भीतर से लेनेवाले
लोग कमर मे डटे ही रहते है।
अनेक लोग कमर को बोझ मानकर अपनी सवासथय-हािन के िलए कमर को दोष देते
है। वासतव मे मनुषय को फल की िचनता, भय और िवशाम का अभाव थकाते है। रिच
लेकर कमर करने से कमर रसमय हो जाता है और सुख एवं सवासथय पदान करता है।
जीवन मे िविवध केतो के कतरवय मनुषय को घेर लेते है िकनतु मनुषय को आवशयकता के
अनुसार पाथिमकता देकर कमर को िनपटना चािहए तथा सभी केतो के पित जागरक रहना
चािहए।
कमर जीवन का महान् सतमभ है। मनुषय के िलए कोई बहाना टटोलकर िनिषकय हो
जाना और कमर से दरू हटना सब पकार से घातक होता है। िववेकपूणर मनुषय अपनी
समसत समसयाओं का उपाय खोजकर कमर करता है तथा अपनी किठनाइयो को सुलझा
लेता है। पुरषाथर छोडकर मनुषय न केवल अपनी समसयाओं को अिधक जिटल बना लेता
है, बिलक अपने मन को अशािनत और वयाकुलता से भर लेता है तथा आतमिवशास को कीण
कर लेता है।
जीवन की कोई भी समसया जिटल नही होती। पायः साधारण समसयाएँ भी हमे
अतयिधक जिटल और भयावह पतीत होती है कयोिक हम धैयरपूवरक उनहे पूरी तरह जानने
और समझने का पयत नही करते। िकसी भी समसया के मूल तक पहुँचने तथा उसे
समझने पर ही उसके उपाय सोचे जा सकते है। संकट का सवरप िनकट से देखने पर
भयावह नही रहता। वासतव मे पतयेक समसया पूरी तरह से न देखने और न समझने के
कारण ही जिटल और भयावह पतीत होती है। इसके अितिरकत हमारा भय ही समसया को
भयावह बना देता है। हमारा डर ही संसार को डरावना बना देता है।
यह एक तथय है िक हम अपनी समसयाओं से भयभीत होकर सवयं ही उनहे और अिधक
उलझा देते है। हमे िकसी सुलझे हुए आतमीय वयिकत के साथ िवचार-िवमशर करके तथा
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सवयं सोच-िवचार करके समसयाओं को सुलझाने का पयत करना चािहए। अतएव
आवशयकता है वैजािनको की भाित साहसपूवरक खोजबीन, जाच-पडताल, िवशलेषण और
िचनतन-मनन से समसयाओं को जड तक समझकर धैयरपूवरक उपाय करने की।
समसयाओं के सवरप, आकार और पकार पर िचनतन करने से तथा उनके समाधान
के िलए संघषर करने से धीरे-धीरे मनोबल ऊँचा होने लगता है, आतमिवशास जाग जाता है
तथा अपने भीतर पसनता बनधनो एवं रिढयो आिद के कारण आकोश, पितशोध और
िनराशा के तूफान से िघरकर कुछ वयिकत, अिधकतः तरण और तरिणया, जीवन से ही
ऊब जाते है तथा समसयाओं की अँिधयारी गुफा से बाहर िनकलने के िलए उनहे अपने
जीवन का अनत करने के अितिरकत अनय कोई रासता नही सूझता। िकनतु यह तो
कायरता का रासता होता है। वासतव मे ऐसी छटपटाहट, बेचैनी और बेसबी की घिडया
कभी िटकाऊ नही होती तथा चलती बदिलया की तरह कुछ देर मे खुद ही िनकल जाती
है। यिद थोडी-सी समझदारी से उनहे पार कर ले और एक बार समसयाओं को सुलझाने
के िलए कुछ ठोस कदम उठाने का साहस कर ले तो उनहे भी संसार मे रहकर कुछ कर
िदखाने का अवसर िमल जाए और वे पािरवािरक जन एवं िमतगण को भी शोक मे डू बने से
बचा ले। कायरता को छोडकर िहममत अपनाने से, छटपटाने के बजाए वज संकलप लेने
से और बेबस होने के बजाए कुछ कर िदखाने से, जीवन वीरता की गाथा हो जाता है। मंत
है-"जागो उठो और बढो, जीवन को उमंग से भर लो। िजनदगी िहममत का सौदा है, िहमम
करो।"
साहस के मूल मे मनुषय की इचछाशिकत होती है। मनुषय अपनी इचछा-शिकत से ही
जीवन की समसयाओं के साथ संघषर करता है तथा मनुषय की सफलता के पृष मे इचछाशिकत की आवशयकता होती है। जीवन के िकसी भी केत मे कुछ उपलिबध करने के िलए
इचछा-शिकत की आवशयकता होती है। इचछा-शिकत को अभयास से बढा सकता है।
कभी-कभी सुरिचपूणर भोजन की इचछा होने पर भी तथा उसके सामने आने पर भी जानबूझकर उसका तयाग कर देने से, जाडा-गरमी को यथाशिकत सहन करने से, िवचारपूवरक
उपवास करने से, दान दने से , कुछ देर तक िनशल बैठकर धयान अथवा मंतजप करने से
इचछा-शिकत बढती है और आतमिवशास दृढ होता है। जीवन से भागो मत। जीवन को
एक मधुर संगीत बना लो। जागो, उठो और आगे बढो।
िववेकशील मनुषय अपने समय और शिकत का सदुपयोग करके जीवन को
गिरमामय बना लेता है। मनुषय आलसय अथवा अिववेक के कारण समय एवं शिकत का
उपयोग न करके अथवा िनकृष पलोभन के कारण उनका दुरपयोग करके सवयं अपने
िवनाश को िनमनतण देता है। समय और शिकत का िनरथरक कय करना जीवन को नष
करना है। मनुषय समय और शिकत के सदुपयोग दारा ही जीवन को कृताथर कर सकता
है। देहबल, बुिदबल, जानबल, धनबल इतयािद का सदुपयोग करके ही मनुषय जीवन को
आननदमय बना सकता है। सदुपयोग करने पर ही बुिदबल एवं जानबल का महततव है।
सदुपयोग करने पर ही धनबल का महततव है अनयथा कंकर और पतथर के सदृशय िनरथरक
है। लोक-कलयाण मे आतम-कलयाण भी सिनिहत होता है तथा लोक-कलयाण के िलए
अपने समय और शिकत का सदुपयोग करने से मानव-जीवन का धनय हो जाता है।
मनुषय को अपने वयिकततव की एक नये देश की भाित गहरी खोज करके अपनी
कमताओं को पहचानना चािहए तथा अपने भीतर बैठे हुए वयापारी, वैजािनक, दाशरिनक,
िचनतक, अधयातम-साधक, समाज-सुधारक, राजनीितक, िखलाडी, सैिनक, िचिकतसक,
कलाकार, गायक, किव, वकता, लेखक इतयािद को जगाकर उसी िदशा मे आगे ले जाते हुए
भी, हमे जीवन को एकागी नही बनाना चािहए तथा जीवन के िविवध आयामो मे समनवय
सथािपत करना चािहए। जीवन के आयाम अननत होते है तथा जीवन की समगता ही
जीवन को पूणरता देती है।
समय और शिकत का सदुपयोग तथा वयिकततव का िवकास करने के िलए उपयोगी
एवं रचनातमक कायों मे वयसत रहना अतयनत आवशयक है। खाली िदमाग शैतान का घर
होता है।िजनदगी के मुसािफर के िलए िजसे एक लमबी मंिजल तय करनी है और अभी
बहुत कुछ देखना, समझना और करना है, खोने या खराब करने के िलए वकत कहा है? इस
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जीवन के पूवर कया था अथवा इस जीवन के पशात् कया होगा, यह मात मानयता का
िववादसपद िवषय है िकनतु वतरमान जीवन तो सवरथा सतय है। काल के िवगत होने पर
करोडो-अरबो रपयो से भी जीवन का एक कण वािपस नही लौट सकता। िरकत समय मे
भी कोई जानवधरक पुसतक पढना चािहए, अथवा कोई सवसथ मनोरंजन करना चािहए
अथवा िवशाम करना चािहए। नासमझ लोग तनाव से मुिकत पाने के िलए िरकत समय मे
धूमपान, मिदरा-पान सेवन इतयािद दुवयरसनो मे फँसकर अपनी दुगरित कर लेते है तथा
पिरवार एवं समाज के िलए अिभशाप बन जाते है। मनुषय िरकत समय का सदुपयोग अपनी
रिच के अनुसार सवाधयाय, सािहतय, संगीत, कला, हास-पिरहास, मनोरंजन, एकानत सेवन,
मौन साधना, मंतजप, भजन-कीतरन, तीथरयाता, पयरटन, पाकृितक-सौनदयर-दशरन, समाज
सेवा अथवा िवशाम इतयािद दारा कर सकता है। कभी-कभी महततवकंकासूचक िदवासवप
देखना भी अतयनत सुखदायक एवं सफूितरदायक होता है। हमे यह भली पकार जान लेना
चािहए। िक दुःखी और परेशान रहना हमारी मजबूरी नही है, बिलक एक नासमझी है िजसे
हम उपयोगी कायों मे िनरनतर वयसत रह कर सरलता से दरू कर सकते है। िनशय ही
मनुषय समय और शिकतयो के सदुपयोग से जीवन को गिरमामय बना चाहता है।
मनुषय को वाणी के सदुपयोग पर िवशेष धयान देना चािहए। मनुषय वाणी से दस
ू रो की
अपार सहायता अथवा हािन कर सकता है तथा दस
ू रो को सुख अथवा दुःख दे सकता
है। वासतव मे मनुषय पायः शबद के महततव तथा अिमत पभाव को नही समझते। हमे यह
जानना चािहए िक वाणी का पयोग कहा, िकतना और िकस पकार करना आवशयक है।
अिधक बोलने से शिकत का कय होता है। थोडे शबदो दारा अिधक अिभवयिकत कर देना
एक महततवपूणर गुण है। मनुषय वाणी के सदुपयोग से शतुओं को िमत तथा दुरपयोग से
िमतो का शतु बनाकर अपना ही िहत अथवा अनिहत कर लेता है। कोिकला िकसीको
कया देती है िकनतु वह मधुर धविन से मनुषयो का िचत हरण कर लेती है तथा काक िकसी
का कया लेता है। िकनतु वह ककरश धविन से घृणा उतपन कर देता है। वाणी मे भदता,
सौमयता, शालीनता और शीतलता होनी चािहए। अनेक बार िवनोद (हँसी-मजाक) मे भी
कहे हुए कटु एवं वयंगयातमक शबद शतुता उतपन कर देते है। मनुषय को हास-पिरहास मे
भी सावधान रहकर मयादा का पालन करना चािहए तथा कोई असहनीय शबद कभी नही
कहना चािहए। कम बोलना, धीरे बोलना, पसन मुदा मे मुसकराकर बोलना तथा आतमीयता
से ओत-पोत होकर बोलना जाद ू का –सा पभाव करता है। कटु वाणी सुनने पर भी
अनुतेिजत रहकर मधुर एवं शीतल वाणी बोलना एक तप है। परसपर िवचार-िवमशर करते
हुए भी हमे सावधान रहना चािहए िक िकसी शबद अथवा कथन-शैली से कटुता उतपन न
हो तथा यिद िकसी कारण कटुता झलकने लगे तो तुरनत वातालाप मे युिकतपूवरक
िवषयानतर कर देना चािहए। हम िकसी िसदानत पर दृढ रहकर भी मधुरभाषी रह सकते
है।
उतम पुरषो की सतयिनष एवं पेमपूणर वाणी चेतना का िमलन होती है तथा उसका पभाव
अपिरिमत होता है। वाणी का उदेशय पसनता का वातावरण उतपन करना, वकता और शोता
को एक धरातल पर ला देना तथा हृदयो का जोडना होता है। वासतव मे वातालाप करना
भी एक कला है। "आपका धनयवाद,""मुझे खेद है," "कमा करे," "शुभ िदवस." "शुभ
राित" इतयािद सदावनासूचक शबदो का आदान-पदान परसपर समबनधो मे मधुरता उतपन
करता है। िकसी के उतम कायर अथवा सहयोग के िलए पशंसातमक शबद कहने मे
कृपणता नही होनी चािहए। िकसी अनय वयिकत की कृपापूणर उदारता के िलए कृतजता
पकाशन करना मनुषय की उतमता का तथा कृतघ होना अधमता का उदोष करता है।
मधुर वचन कहने मे भी कैसी दिरदता? िकनतु पशंसातमक शबद सरल और सवाभािवक होने
चािहए। पशंसा मनुषय को भला कायर की पुनरावृित करने के िलए (फीडबैक) पेिरत करती
है। पशंसा की भूख पायः महापुरषो को भी सताती है तथा पशंसा सुनना सभी को सुख
देता है। सदावनापूणर पशंसा करना एक गुण है तथा िमथया पशंसा अथवा चापलूसी करना
पतनकारक दोष होता है। मयािदत पशंसा औषिध की भाित मानिसक ऊजा देती है तथा
आतमिवशास बढाती है। गुणो की पशंसा करना गुणो को पोतसािहत करना है। सहज एवं
सवाभािवक पशंसातमक उदगार मन को तृपत कर देते है। पशंसा के दारा हम अनय वयिकत
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के गुणो को न केवल सवीकार करते है, बिलक उनके पित आदर भी पकट करते है तथा
अपनी उदारता का पिरचय भी देते है। दस
ू री ओर पशंिसत वयिकत अपने गुणो एवं कायों
की उतमता की पुिष से पोतसािहत होता है। िववेकशील वयिकत जानता है िक पशंसा गुणो
की ही की गई है, अतः वह पशंसा सुनकर गवोनमत नही होता, बिलक अिधक गहणशील
और सतकर हो जाता है। पशंसा अमृत है िकनतु िमथयािभमानी के िलए िवष हो जाती है।
समयानुसार उिचत पशंसा का आदान-पदान करना सभय समाज का लकण है।
×
×
×
जीवन की चादर मे गुण-दोष तथा सुख-दुःख के तार ऐसे गुथे हुए है िक उनहे
पृथक् नही िकया जा सकता। यिद जीवन मे दोष न हो तो गुणो का कया महततव है तथा
दुःख न हो तो सुख की कया िवशेषता है? यिद दोष और दुःख न हो तो संघषर िकस उदेशय
के िलए होगा? दोष से िनदोषता की ओर, दुःख से आननद की ओर, अपूणरता से पूणरता की
ओर, मृतयु से अमरता की ओर तथा अंधकार से पकाश की ओर बढते रहना ही जीवन है।
वासतव मे असतय सतय की ओर इिगडग करता है और सतय का पेरक होता है।
मनुषय का भीतर आननद का अकय सोत होता है तथा बिहजरगत् सौनदयर से पिरपूणर
है िकनतु दोषमय िचनतन मन मे कटुता भर देता है तथा बिहजरगत् दुःमय पतीत होने लगता
है। मनुषय जब सतय, पेम और नयाय के मागर को तयागकर तथा पाशिवक कामनाओं के
वशीभूत होकर संसार मे लूट-खसोट, शोषण, उतपीडन, अनयाय तथा पिरगह का मागर
अपना लेता है, वह मन की शािनत खो बैठता है तथा अपने िलए और समाज के िलए
अशािनत का कारण बन जाता है। संसार मे रहकर सासािरक वसतुओं की कामना होना
सवाभािवक है तथा कामना को दोष नही कहा जा सकता, िकनतु भौितक कामना का दास
बनकर संयम खो बैठना अिववेक है।
यदिप िववेकशील पुरष दैिहक आवशयकताओं और मागो के पित जागरक रहता
है, तथािप उसका जीवन ऊधवरगामी होता है तथा बौिदक िचनतन, नैितक कायर एवं
आधयाितमक साधना के दारा उसकी समसत अिभरिच का पिरषकार हो जाता है।
िववेकशील पुरष की कामना का उदातीकरण हो जाता है। उसकी उदात कामना लोकमंगलकारी हो जाती है। मात पशु-सतर पर जीवन-यापन करने वाले मनुषय की कामना
धवंसकारी हो जाती है। मानव-जाती का इितहास ऐसे अनेक लुटेरो के भीषण कृतयो से
भरा पडा है िजनहोने दस
ू रे देशो मे जाकर कतलेआम, लूट-पाट और िवनाशलीला करने मे
अपनी शान समझी अथवा राजय-सता हडपने के िलए िपता और भाइयो का भी वध करने
मे संकोच नही िकया। भौितक वैभव से भरपूर महलो मे रहकर अनैितक िवलािसता मे डू बे
हुए ऐसे लोग मानव-जाित के कलंक ही है। िनरंकु ंश पाशिवक कामना की तृिपत कभी
संभव नही होती तथा अतृिपत और असनतोष के कारण शािनत भी पापत नही होती।
वासतव मे कामना के मूल मे िसथत काम का उदेग एक ऊजा है िजसका सदुपयोग
कलयाणकारी तथा दुरपयोग िवधवंसाकारी होता है। कामना और ऊधरवगामी एवं उदात
होकर मंगलकारी तथा िनमगामी एवं िनकृष होकर िवनाशकारी हो जाते है।
मनुषय िचनतन के अभाव मे कामना के वेग पर िनयनतण अथात् आतमसंयम खो बैठता है
तथा कामानध होकर वह सवयं अपने िवनाश को िनमंतण देता है। कामानध वयिकत िनलरजज
होकर वह सवयं अपने िवनाश को िनमंतण देता है। कानानध नही चाहता। कामानध वयिकत
दुससाहस करता है तथा िववेक-भष हो जाता है। कामानधता के कारण अगिणत अपहरण
तथा हतया आिद होते है। कामानध वयिकत अपराध-जगत् मे कामानधता के कारण दस
ू रो
की दुगरित देखकर भी उनसे सबक नही सीखता तथा अपने पिरवािरक जन और िमतो को
मागर का बाधक तथा शतु मान लेता है। वह कुकृतयो मे ऐसे ही फँसता चला जाता है जैसे
पशु कीचड मे िगरकर धँसता चला जाता है। कामानधता मनुषय को भटकाकर िवनाश के
दार पर खडा कर देती है। कामानध वयिकत मानो आगे से खेलता है तथा अपनी शिकत,
धन और पितषा को खोकर बाद मे पछताता रह जाता है। जो लोग दस
ू रो की मूखरता के
पिरणाम देखकर भी न आँखे खोलते है और न सँभलते, वे शोचनीय होते है। मन की िकसी
कामना का बरबस दमन करना कुणठा उतपन कर देता है और अपनी समसत ऊजा िकसी
सजरनातमक कायर मे लगाकर तथा मन को समझाकर कामना का शमन एवं उदातीकरण
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कर लेता है। कामना का िववेकपूणर शमन करना आतमिवशास को बढाता है तथा वयिकततव
को चमका देता है।
कामना के तृपत अथवा पूणर न होने पर मन मे संबद वयिकत के पित घृणा, वैर और
कोध का भाव उतपन हो जाता है। इसके अितिरकत िकसी से अपनी कोई आशा पूणर न
होने पर भी कोध उतपन हो जाता है। कोध मे अंधकार जाग जाता है तथा कोधानध मनुषय
सतय पेम और नयाय से दरू हटकर िववेकभष हो जाता है। कोधानध मनुषय बबरर, कठोर
और कूर हो जाता है तथा सनतुलन खोकर सवयं भी अशानत एवं वयाकुल हो जाता है।
अदमय उतेजना मनुषय के सनायु-मणडल और मिसतषक मे तूफान की दशा उतपन कर देती
है। कोध के आवेश मे नेत लाल होकर आग बरसाने लगते है, मुख की मुदा भयानक हो
जाती है, हाथ-पैर कापने लगते है और सारा शरीर ओजहीन हो जाता है; कोधानध वयिकत
िहंसा करने पर उतार हो जाता है और कटु वचनो के बाण छोडकर ममाघात कर देता है।
कोधानध वयिकत कटु वाणी से परसपर दरू ी बढाकर समझौते की संभावना को भी समापत
कर देता है तथा पिरिसथित को और अिधक िवषम बना देता है। कोध की जवाला के
कारण सारे देह मे भूकमप की दशा उतपन हो जाती है।
कोधािगन भडकने का अथर है हृदयाघात के घोर संकट को िनमंतण देना। कोध
मनुषय का िवनाश कर देने वाला परम शतु है। मनुषय को आवशयकता होने पर कठोर पग
उठाते हुए भी मन मे कोध नही करना चािहए तथा सदैव शानत और सनतुिलत रहना
चािहए।
कोध करने से मनुषय का कोई काम नही बनता, बिलक और अिधक िबगड जाता
है। मनुषय को िजतनी तेजी से कोध आता है , उसी तेजी से बाद मे उसे पछताना भी
पडता है। अनेक बार ऐसी पिरिसथित होती है िक कोध आने पर मन कहता है िक सामने
खडे वयिकत को िहंसा से िमटा िदया जाए िकनतु िववशता मे िसर झुकाना पड जाता है।
वासतव मे कोध तो सदैव िननदनीय एवं तयाजय है िकनतु अनुिचत बात पर िववेक के
अनुसार यथासंभव सपषतापूवरक अपनी असहमित एवं कोभ पकट कर देने से मन कुिणठत
नही होता। िववेकशील पुरष शालीनता से अपना मतभेद अवशय पकट कर देता है।
मनुषय कोध और कटुता छोडकर भई दृढता से यथाशिकत अनयाय का पितरोध कर सकता
है। अवशय ही, मनुषय अपने भीतर शानत रहकर ही कमर मे दृढ रह सकता है।
िववेकशील पुरष झगडो से बचता है तता वह अपना अमूलय समय और शिकत कुद
बातो मे नष नही करना चाहता। िववेकशील पुरष कभी झगडे मोल नही लेता िकनतु िसर
पर आ पडे तो डटकर सामना करता है। वह िकसी बात को पितषा का पश नही बनाता
तथा सममानजनक समझौते का अवसर आते ही झगडे को िनपटा लेता है। िववेकशील
पुरष उिचत अवसर आने पर कमा पदान कर देता है। कमा करना मनुषय के िलए न केवल
अपनी मानिसक शािनत की दृिष से ही, बिलक सामािजक वयवहार की दृिष से भी
आवशयक होता है। मन की कटुता भूल जाने का पयत करने से दरू नही होती, बिलक कमा
के जल से मन को धोने से दरू होती है। शतुओं की संखया घटाना और िमतो की संखया
बढाना िववेक का पिरचय देना है। मानव-जीवन छोटा-सा है। िववेकशील पुरष समय और
शिकत का सदुपयोग करके जीवन को साथरक करने का पयत करता है।
हमे यह समरण रखना चािहए िक कोध करना मनुषय का सवभाव नही है , बिलक
पितिकया है। मनुषय का सवभाव पेम और कमा है। जब का सवभाव शीतल होता है। जल
अिगन के समपकर मे आकर उषण हो जाता है िकनतु अिगन का समपकर हटते ही पुनः शीतल
हो जाता है। कोध के कारण की िनवृित होने पर मनुषय का मन भी शीतल और शानत हो
जाता है कोध मन की असवाभािवक दशा है। पेमपूणर वयिकत के सािनधय मे आकर िनषुर
और कूर मनुषय भी िनयंितत हो जाते है। िववेकशील पुरष अपने चारो ओर मैतीपूणर
वातावरण का िनमाण कर लेता है तथा सवभावतः पेम, सदावना, कमा, परोपकार और
उतसगर की भावना से ओतपोत होता है। वह शिकतपुंज, िनभीक और साहसी होकर भी
शानत, गंभीर और सौमनसयपूणर होता है।
मनुषय मे धन, समपित , सता कीितर आिद का पलोभन होना सवाभिवक है िकनतु जब
मनुषय लोभानध होकर उनहे पापत करने के िलए अनयायपूणर एवं अनैितक साधनो को अपना
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लेता है, पलोभन एक अिभशाप हो जाता है तथा वह मनुषय को अपराध की ओर पवृत कर
देता है और मन की शािनत का हरण करके वयाकुल बना देता है। लोभानध वयिकत पुरषाथर,
नयाय और नैितकता को दरू रखकर कणभर मे महान् धनपित अथवा सताधारी बन जाने
की उग लालसा के कारण मागर के अवरोधो को षडयंत, छल-कपट और िहंसा से हटा देने
मे भी संकोच नही करता। िववेक-भष वयिकत सब कुछ पाकर भी सब कुछ खो देता है
और वयाकुलता मे छटपटाता रह जाता है।
यदिप जीवन मे सब पकार के बल वयिकत एवं समाज के अभयुदय के िलए उपयोगी
हो सकते है तथािप जन-बल, बाहु-बल, धन-बल, सता-बल इतयािद का मद मनुषय को पायः
उदणड बना देता है तथा मदानध वयिकत दस
ू रे लोगो के सममान और सतकार को सहन नही
करता है। मदानध मनुषय का िमथया अहंकार बुिद के सनतुलन को नष कर देता है तथा
अहंकारजिनत देष की अिगन उसकी मानिसक शािनत को धवसत कर देती है। धीरे-धीरे
वह समाज से हटकर अकेला पड जाता है और धनपित अथवा सताधारी होकर भी
वयाकुल ही रहता है। दुरिभमािनयो के अहंभाव की टकराहट के कारण समाज मे अनेक
बार िवनाशलीला भी हो जाती है।
मनुषय के िलए अपनी सनतान, समपित इतयािद का सरकण करना तो एक कतरवय है
िकनतु मोहानध होने के कारण उनकी िचनता करते रहने से अनेक पकार के भय और
आशंका एवं तनाव और वयाकुलता मनुषय को घेर लेते है। मोहानधता अनेक बार अपने और
पराए का भेदभाव बढाकर मनुषय की नयायवृित को भी धवसत कर देती है। वृदावसथा
मनुषय की बुिद को गसत कर लेती है। मोहानध लोग मोहवश अपनी संतान को उतम
साहिसक कायर करने से रोक देते है तथा उनके वयिकततव का िवकास अवरद कर देते
है।
धमर का उदेशय है मनुषयो मे सतय और पेम की पसथापना करना तथा भेदभाव और
संकीमरता को िमटाकर मानवता का पसार करना िकनतु धमानधता मनुषय को बबरर , कूर,
िहसंक, अनयायी और आततायी बना देती है। संसार मे धमर के नाम पर िहंसा, कूरता और
बबररता का जैसा ताणडव होता है, उसने धमर के वतरमान सवरप को आलोचना का िवषय
बना िदया है। धमानधता ने सामपदाियक संकीणरता, कटरता, घृणा िवदेष, असहनशीलता
आिद को बढाकर, सतय और पेम को धूिमल करके मानव को दानव ही बना िदया है।
कटरपंथी लोग न केवल अपने मत को सवोपिर िसद करके अनय मतो के सतय को
अनदेखा कर देते है, बिलक उनके घृणा भी करते है तथा िहंसा को अपनाकर धमर के
उदेशय को ही परािजत कर देते है।
धमर के केत मे पनपनेवाले अनधिवशासो और कुरीितयो ने समाज का घोर अिहत
िकया है। धमर की आड मे तथाकिथत भगवानो की भीड हो गई है। वासतव मे िववेक
छोडने पर मनुषय धमर से भी लाभ नही उठा सकता तथा िववेकरिहत धमर-पालन मनुषय को
पशु बना देता है। धमर भर मे वयापत ईशरीय चेतना है, बनधन-मुिकत एवं आननद का पदाता
है। धमर को समकालीन संदभों मे, मानवीय मूलयो के पितपादक के रप मे, पितिषत िकए
जाने की आवशयकता है। धमर से जुडे हुए अनेक िमथक, आखयान, कथाएँ और
अनतकरथाएँ रहसयो मे िलपटे हुए होने के कारण िमथयातव और भय को पितिषत कर रहे
है। आदशों, िसदानतो, िनयमो, आदेशो तथा िनदेशो का उदेशय उतम जीवन-यापन होता है,
िकनतु जब वे अितकठोर हो जाते है तथा समयानुकूल नही रहते, वे वयिकत और समाज को
पीछे ढकेल देते है। पगित के िवरोधी तथा असतय पर आधािरत िनयमो से िचपटा हुआ
कटटपंथी, परमपरवादी अथवा यथािसथितवादी वयिकत जीवन की दौड मे िपछड जाता है।
सामानयतः िकसी आकषरक वसतु को देखकर उसके िलए कामना होना, िकसी की
नीचता एवं दुषता देखकर कोध उतपन होना, सता, धन-समपित आिद का पलोभन होना,
कोधावेश होना, अहंभाव जागना, िपयजन का मोह होना मन की सवाभािवक पितिकया है
िजनहे मूलतः दोष की संजा नही दी जा सकती िकनतु इनका अितरेक दोष हो जाता है।
कोई एक महापुरष ही आनतिरक िवकास दारा कालानतर मे इनसे सवरथा मुकत हो पाता है।
िववेकशील पुरष पिरिसथित के अनुसार अपनी मानिसक पितिकया पर िनयंतण कर लेता
है तथा मयादा मे रहकर िववेकसममत वचन कहता और वयवहार करता है।
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मनुषय के पमुख दोष पलोभन, कोध, भय, आलसय और दुरागह है। मनुषय पलोभन मे
फँसकर भटक जाता है तथा अनैितक कायर करने लगता है। कोधावेश मनुषय को
असनतुिलत एवं मितभष कर देता है। भयवश होकर मनुषय उतम कायर करने का साहस
नही कर पाता तथा अनधिवशास मे फँस जाता है। आलसयवश होकर मनुषय पुरषाथर नही
करता तथा दीनहीन हो जाता है। दुरागहगसत होकर मनुषय कटर हो जाता है तथा अपनी
भूल को सवीकार नही करता । अपनी भूल को सचचाई से सवीकार करने पर ही सुधार
पारमभ हो सकता है और भूल का वेग कीण हो जाता है। वेग के कीण हो जाने के कारण
भूल धीरे-धीरे समापत हो जाती है। िववेकशील पुरष भूल के सुधार का पयत करता है
िकनतु वह आतम-भतसरना नही करता। भूल को पाप की संजा देने से मनुषय अपने जीवन
को भारमय बनाकर पगित के दार बनद कर देता है। पाप और शाप की अवधारणा के भय
से सािततवक िचंतन एवं कमर की पेरणा नही ली जा सकती । मनुषय अपने साथ घृणा
करके तथा आतमािननदा करके िवकास की पिकया को अवरद कर देता है। िववेकशील
पुरष सँभलने का यत करता है तथा आतमगलिन से अपने समय और शिकत को नष नही
करता। िववेकशील पुरष ठोकर खाकर भी उठाकर आगे बढने लगता है तथा भूल िवचारपरेक बनकर मन का जागरण कर देती है।
×
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मनुषय के जीवन मे कुछ पिरिसथित ऐसी भी होती है जहा मनुषय िववशता का
अनुभव करता है तथा जहा पुरषाथर करने का अवसर एवं अवकाश नही दीखता। जो
मनुषय िववशता को समझने का पयत नही करता और उसके िविवध पको पर गमभीर िवचार
नही करता, उसका जीवन-िचनतन अधूरा रहता है। िववशता एक यथाथर है िकनतु अनेक
लोग साधारण-सी िसथित मे पुरषाथर का अवसर और अवकाश होते हुए भी िववशता
मानकर िनिषकय हो जाते है। मनुषय को अनत तक पुरषाथर करते रहना चािहए कयोिक
अनेक बार पुरषाथर करते रहने से असंभव भी संभव हो जाता है। पूणर िववशता की िसथित
मे भी मनुषय को मन की हार नही मानना चािहए तथा िववशता के साथ समझौता करके मन
को संयम और शानत कर लेना चािहए।
संसार मे िकसके साथ कया दुघरटना हो जाए, कब अकसमात् उतसव का आननदमंगल शोक के करण कनदन मे पिरणत हो जाए, कब कया अपतयिशत कित हो जाए, िकस
िपय जन को मृतयु हमसे छीन ले अथवा कब िकसके साथ कया दुघरटना हो जाए, कब
िकसके अरमानो की दुिनया उजड जाए, कोई नही जानता। मृतयु एक िववशता है तथा
अपिरहायर है। मृतयु के कारण िकसी महततवपूणर वयिकत का अथवा िकसी िपयजन का
िचरिवयोग हो जाना मनुषय को सवभावतः शोकिवहल कर देता है। मनुषय शोक और संकट
की िसथित को िचंतन एवं िवचार से ही पार कर सकता है। संसार मे संकट और शोक का
कोई अनत नही है। अगिणत लोग हमारी अपेका कही अिधक संकट और शोक से िघरे हुए
है िकनतु हम अपने संकट और शोक मे डू ब जाते है िक हमे संसार मे अपने से अिधक
दुःखी कोई अनय वयिकत नही दीखता। संकट और शोक के समय दस
ू रो के संकट और
शोक दृिषपात करने से धीरज बँधता है। संसार मे केवल मै ही अकेला संकट का सामना
नही कर रहा हूँ, जीवन मे सभी को बडे-बडे कष उठाने पडते है, भले ही संकटो के
सवरप िभन हो। संकट और शोक जीवन के अिनवायर अंग है।
मृतयु जीवन का एक यथाथर है। मृतयु के पित हमारी धारणा हमारे समसत िचनतन
को पभािवत करती है। मृतयु हमारे मन मे अनेक पश खडे कर देती है तथा मन को गहन
िवषाद के भँवर मे डालकर उसे झकझोर देती है। मृतयु मनुषय के मन मे जीवन और जगत्
के समबनध मे अनेक दाशरिनक िवचारो को उतपन कर देती है। शोक की परछाइया
अतयनत भयावह होती है। िपय वयिकत की मृतयु से शूनयता एवं िरकतता उतपन हो जाती है
िकनतु वह एक ऐसी बेबसी होती है िक कोई भी कुछ सहायता नही कर सकता तथा कुछ
भी उपाय नही होता। शोकिवहल सनेही जन िवमूढ होकर पाण शूनय,िनजीव देह के समक
उसे सजीव समझकर कभी पेमसूचक शबदो से भावपूणर समबोधन करते है तथा सभी उसे
मृतक सवीकार करके हृदय-िवदारक रदन करते है। ऐसे दृशय को देखकर कोई भी
सहृदय वयिकत वयाकुल हुए िबना नही रह सकता। कभी-कभी दुघरटनागसत तरण की
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आकिसमक मृतयु से तो हाहाकार ही मच जाता है। तदननतर धदकती हुई िचता मे रखे
जाने पर परम िपय वयिकत का देह देखते ही देखते थोडी ही देर मे भसमीभूत हो जाता है।
कया शेष बचा? मात समृित जो मन के घाव को कुरेदनकर उसे ताजा करती रहती है और
भीतर जीवन मे कही ऐसी शूनयता एवं िरकतता उतपन कर देती है िजसकी पूितर कभी होती
ही नही। पुरानी घटनाओं के िविवध दृशय िसनेमा की िरल की भाित समृित-पटल पर
उभरकर आते है तथा संयोग और िवयोग की गूढ अनुभूितयो के दारा ममानतक पीडा देते
है। यह जीवन का एक यथाथर है।
साधारणतः लोग िकसीकी मृतयु होने पर उसके गुणो और दोषो की चचा करते है
और कहते है िक "इस दुिनया मे आदमी की भलाई और बुराई ही रह जाती है। आदमी कयो
झूढ-सच बोलकर और दस
ू रो को सताकर धन इकटा करता है? सब कुछ जोडा हुआ तो
यही छू ट जाता है; आदमी को सदा सच बोलना चािहए और भलाई के काम करने चािहए।"
इसे किणक शमशान-वैरागय कहते है। िकनतु पकृित का िवधान िविचत है मनुषय के देह
और इिनदयो की माग तथा उसके दाियतव उसे जगत् के कायों मे वयसत कर देते है और
धीरे-धीरे शोक का आवेग कीण होने लगता है। सासािरक वयसतता के दुःखद घटना
िवसमृत एवं धूिमल होने लगती है तथा मनुषय पुनः संसार के मोहजाल मे फँस जाता है।
वासतव मे, मनुषय शोक से उतपन नीरसता से उकता जाता है तथा शोक की छटपटाहट से
छू ट जाना चाहता है। शोक मन का पगाढ अंधकार होता है जो कुछ समय तक तो अचछा
लगता है िकनतु शीघ ही मनुषय अपने भीतर पचछन गूढ आननदभआव का सहारा लेकर
अनधकार को सरलता से पार कर लेता है। वासतव मे आननद मनुषय का सवभाव है तथा
शोक और दुःख मनुषय का सहज सवभाव कदािप नही है। मनुषय अिधक समय तक शोक
और दुःख के अनधकार मे जीिवत नही रह सकता है। मनुषय सवभावतः अनधकार से
पकाश की ओर, दःु ख से आननद की ओर, अजान से जान की ओर तथा मृतयु से अमरता
की ओर जाने का पयत करता है कयोिक उसके भीतर संिसथत आतमजयोित पकाशसवरप,
आननदसवरप, जान सवरप तथा अमृतसवरप है।
मृतयु जीवन-याता का अपिरहायर अंग है िकनतु मनुषय अपने मन मे मृतयु की
अिनवायरता को सवीकार नही करता। दैिहक मृतयु के यथाथर को सवीकार कर लेने से वह
भयावह पतीत नही होती। मृतयु िववेकदाियनी गुर है। मृतयु मनुषय मे वैरागयभाव जगाकर
मन को िनमरल करती है। मृतयु का भय पायः सब कुछ छू य जाने और नाते टू ट जाने का
भय होता है तथा वयिकतयो एवं वसतुओं के पित हमारी अतयिधक आसिकत ही भय के मूल
मे होती है। मनुषय को याती के सदृशय संसार की वसतुओं के पलोभन से मुकत रहना
चािहए तथा यही छू ट जानेवाली धन-कदािप नही बनाना चािहए। जीवन का उदेशय
िवलािसता मे भटकना कदािप नही हो सकता। सतय की साधना करने से तथा पेम के मागर
को अपनाने से जीवन का लकय सवयं सपष हो जाता है। घोर संकट मे भी मनुषय को
भिवषयोनमुखी होकर साहसपूवरक आगे बढते रहना चािहए तथा जीवन के िविवध केतो मे
अपने दाियतवो के िनवाह के िलए ततपर रहना चािहए। मनुषय को मृतयु से भयभीत नही
होना चािहए तथा पतयेक कण मृतयु के शोक और भय को जान दारा पार करके कालातीत
हो जाते है तथा अमरतव पापत कर लेते है।
×
×
×
यह संसार बडा िविचत है तथा मनसवी पुरष सावधान रहकर ही कतरवयपथ पर आगे बढे सकता है। जन-समाज मे मनुषय के रप मे अथवा आकृित मे अनेक
िवषैले सपर और िबचछू जो अकारण काट लेते है, भेिडये और िसयार जो िहंसा दारा दुबरल
जन को अपा खाद बना लेने की घात मे इधर-उधर धूमते है, गृद और काक जो सदा
परधन पर अपनी कुिटल दृिष लगाए रहते है पग-पग पर िमलते है। रप अथवा आकृित
की समानता होते हुए भी मनुषय और मनुषय के सवभाव मे बहुत अनतर होता है। कुछ लोग
उस सपर के सदृश कृतघ होते है जो दध
ू िपलाने पर िवष उगलता है तथा कुछ अनय उस
गौ की भाित सरल है जो घास खाकर दध
ू देती है। कुछ लोग िसंह के सदृशय साहसी वीर
होते है तथा कुछ लोग शृगाल की भाित कायर और चालाक होते है। इस समाज मे पगपग पर ऐसे लोग िमलते है जो िबना कारण दस
ू रो का अिहत करने मे अपना िहत तथा
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दस
ू रो को दुःख देने मे अपना सुख मानते है। अनेक लोग सवाथर से पेिरत होकर कमर
करते है तथा सफलता होने पर उपकारी जन के पित कृतघ होकर, िनलरजज रप मे सामने
खडे हो जाते है। यदिप सभी मे गुण और दोष होते है तथािप कुछ मनुषयो मे गुण और दोष
की माता मे अतयिधक िवषमता होती है। गुणो के पाधानय के कारण मनुषय उतम अथवा
शेष तथा दोषो के पाधानय होने के कारण अधम अथवा िनकृष कहलाता है। िववेकशील
पुरष संसार को बुरा कहकर नही कोसता तथा िकसी से घृणा अथवा वैर भी नही करता।
वह भी िमल-जुलकर और सभी का सहयोग लेकर जीवन-पथ पर आगे बढता रहता है।
वासतव मे संसार को बदल देने की पिकया का पारमभ भी सवयं को बदलने से होता है।
जीवन की कृताथरता जीवन की रका करने मे तथा चारो ओर आशा और उतसाह का
संचार तथा सुख और शािनत का पसार करने मे है। हँसना और हँसाना िजनदी है, रोना
और रलाना पशुता है। धमर के नाम पर िवधिमरयो को लूटना तथा उनकी मारकाट करना
धमरगुरओं तथा धमरगनथो पर कलंक है। धमर के नाम पर िहंसा भडकानेवाले लोग शैतान
के दत
ू होते हो। िहंसा पितशोध से शानत नही होती। बदला लेने की भावना से पेिरत
होकर िहंसा की होड करने से िहंसा का कम टू टता ही नही तथा िहंसा की आग फैलकर
समूचे समाज को नष कर देती है। शैतान लोग धमर को बचाने के नाम पर धमर की हतया
करते है तथा सारे समाज को ले डू बते है। िववेकशील पुरष सबको भली पकार पहचानता
है िकनतु वह अपने वववहार मे यथासंभल पेम और सदावना का पिरतयाग नही करता। वह
साप और िबचछू की पकृितवाले लोगो को पहचानता है तथा उनसे सावधान बपी रहता है
िकनतु यथासंभव वह वयिकतगत झगडो और मुकदो मे पडकर अपने समय और शिकत का
कय नही करता। वह तुचछ बातो मे िसदात और पितषा का पश बनाकर समसयाओं को
जिटल नही बनाता और सममानजनक समझौते का अवसर आते ही झगडे को िनपटा लेता
है। िमतो की संखया बढाने और शतुओं की संखया घटाने से तथा अपने चारो ओर
सौमनसय और सदावना का वातावरण सृिजत करने से जीवन-रथ िनबाध रप से पगित के
पथ पर आगे बढता रहता है।
िववेकशील पुरष आलोजको और िननदको का भी कृतज होता है कयोिक वे हर
समय पहरेदार बनकर उसे जगाते है और संभािवत खतरो की सूचना देकर सावधान रखते
है। अनिभजता के कारण अथात् तथयो को न जानने के कारण तथा ईषया-देष से पेिरत
आलोजना को भी परखकर उसकी उपयोिगता पर िवचार करना चािहए। िकंतु आलोचना
को शूल मानकर संतास अनुभव करना िववेकहीनता है। समझदार वयिकत िवधवंसातमक
वृितवाले (िनगेिटव) लोगो को भी जानता और पहजानता है जो दस
ू रो को फँसाने के िलए
जाल िबछाने मे ही अपनी कृताथरता समझते है िकनतु कालानतर मे ऐसे लोग सवयं ही अपने
जालो मे फँस जाते है तथा उन गडढो मे िगर जाते है िजनहे वे दस
ू रो के िलए खोदते है।
िववेकशील पुरष न केवल िकया मे उतम होता है बिलक पितिकया मे भी यथासंभव
उतम ही रहता है। यिद कोई झगडा िसर पर थोप ही िदया जाए तदो िववेकशील पुरष
साहसपूवरक पिरिसथित का सामना करता है। वासतव मे िवजय अथवा पराजय होना इतना
महतवपूणर नही है िजतना साहसपूवरक दुषता का पितरोध करना है। िववेकशील पुरष कभी
अपने मन मे पराजय नही करता। मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। पराजय
सवीकार न करके आगे बढते रहनेवाले पराकमी पुरष मानवता के पकाशदीप बन जाते है।
×
×
×
संसार मे मनुषय को पग-पग पर चुनौती िमलती है तथा अनेक बार अिगन-परीका
होती है। जीवन-याता मे मनुषय को सभी कुछ िमलता है-कभी धूप, कभी छाव, कभी सुख,
कभी दुःख, कभी सममान, कभी अपमान, कभी झगडा, कभी शािनत, कभी सफलता, कभी
ठोकर। वासतव मे इनहे जीवन का अिनवायर अंग मान लेने से मन को आघात नही होता।
संकट और िनराशा के कणो मे आशा और िवशास का सहारा लेना ऐसा ही होता है जैसे
अनधकार से िघरने पर पकाश की िकरण की ओर बढना। िववेकशील पुरष आशावान्
होकर तथा आतमिवशास का सहारा लेना ऐसा ही होता है जैसे अनधकार से िघरने पर
पकाश की िकरण की ओर बढना। िववेकशील पुरष आशावान् होकर तथा आतमिवशास
और धैयर को जगाकर संकट को पार कर लेता है।
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जीवनत-याता मे ठोकरो और संकटो के अनुभव िचंतनशील मनुषय को कुिणठत नही
करते बिलक पिरपकव बना देते है। वृक का फल आतप और वषा से पक जाता है और वषा
से पक जाता है और रसीला हो जाता है। पिरपकव होने पर मनुषय को िचंता और भय नही
सताते। वह अनुभवो का धनी होने के कारण संकट से घबरा जाने के बजाए संघषरशील
अथवा जुझार हो जाता है तथा समसया का समाधान करने के िलए उठ खडा होता है।
जो मनुषय जीवन मे अनुभवो के समय अपनी आँखे खोले रखता है अथात्
अपने िचनतन और िवचार को अथवा िववेक को जगाए रखता है, अनुभव उसे पिरपकव बना
देते है। िववेकशील मनुषय अनुभवी अथवा पिरपकव होता है। पिरपकव मनुषय के उदेग
उसके िनयंतण मे होते है तथा वह सहसा आवेश मे आकर संयम नही खोता। यह तथय है
िक आयु भी बुिद को पिरपकव बनाती है। पिरपकवता का पारमभ लगभग अठारह वषर की
आयु से होता है तथा लगभग पैतास वषर की आयु मे पयापत पिरपकवता आ जाती है और
इसके अननतर पिरपकवता बढती रहती है। पिरपकवता मे वृद होने पर पायः मनुषय की
रटने की शिकत तथा पुरानी घटनाओं के अनावशयक एवं महततवहीन िवसतार को समरण
रखने की शिकत कुछ कम होने लगतची है िकनतु समझने की शिकत तीवर हो जाती है तथा
मनुषय मे गमभीरता आ जाती है। पिरपकवता आने पर मनुषय अिधक समझदार, सहनशील,
आतमसंयमी, धैयरवान्, िसथर तथा सम हो जाता है। पिरपकवता का अथर है िसथरता, दृढता
तथा रसमयता। अपिरवकव वयिकत आगे-पीछे नही देखता तथा जलदबाज है । वासतव मे
िचनतनहीन एवं िवचारहीन वयिकत आयु बढने पर भी पिरपकव नही होता। िववेक का
जागरण ही मनुषय को पूणर पिरपकव बनाता है। पिरवकव वयिकत गोपनीय बातो को गोपनीय
रखता है तथा वह जानता है िक कहा िकतना और कया कहना है। वह हषर , शोक, आकोश
आिद के वेग पर िनयंतण कर लेता है तथा सहसा उतेिजत नही होता। वह मयादा मे
रहकर वयवहार करता है। मयादा का अितकमण वयिकत और समाज के िलए घातक होता
है।
मनुषय को िववेक का जागरण होने पलर अपनी अबोधता मे, बुिद की अपिरपकव
अथवा अदरचेतन अवसथा मे, परवशता, उतेजना अथवा भावुकता की अवसथा मे अथात्
असनतुिलत अवसथा मे, िदए हुए अपने अनैितक वचन को अमानय कर देना चािहए। मनुषय
अनेक बार छल-कपट के चक मे फँसकर अथवा आवेशवश अथवा भािनतवश ऐसे वचन
कह देता है जो अनैितकता एवं अनयाय से युकत होते है तथा िजनके मानय होने से भीषण
दुषपिरणाम हो सकते है। यदिप सामानतः वचन का पालन करना चािरितक उतकृषता ही
होती है तथािप घोर दुषपािरणाम होने की संभावना की िवशेष पिरिसथित मे, आवेशपूणर वचन
के बनधन को अमानय करके उससे मुकत हो जाना सवरथा समुिचत होता है। वासतव मे
िववेकशील पुरष कभी उतेजनावश अथवा आवेगवश होकर अनैितकतापूणर एवं अनयायपूणर
पितजा नही करता। वह सोच-समझकर ही कुछ कहता है तथा हािन-लाभ की परवाह न
करके िववेकपूवरक अपने नैितक एवं नयायय वचन का िनवाह भी करता है। नैितक एवं
नयायय उदेशय की पूितर के िलए कष उठाना शेयसकर होता है तथा उस कष मे एक
अिनवरचनीय सुख िछपा रहता है।
×
×
×
कुछ लोग शोकसंिवगन अथवा कोधािभभूत होकर िकसी अनय वयिकत को अकारण अपने
दुःख का पदाता मान लेते है तथा उसके िवनाश के िलए शाप देते है। कौओं के कोसने से
भैसे मर नही जाती। यिद अनजान मे कोई भूल गई है, उसे नैितक दृिष से अपराध नही
कहा जा सकता, िकनतु िकसी को जान-बूझकर जाल मे फँसाना अथवा सताना घोर
नीचता होती है। जान-बूझकर सताने या शोषण करने के कारण दुःखी वयिकत के हृदय से
िनकली हुई आहो का भीषण पभाव होता है। परसपर सहमित औरप सहयोग से समसयाओं
का समाधान होना उतमता का लकण होता है।
यदिप समाज-वयवसथा के िहत मे नीचता दणडनीय होती है तथािप िववेक का
जागरण होने पर तथा सचचा पशाताप करने पर मानिसक अपराध-बोध एवं आतमगलािन
समापत हो जाते है, भले ही सामािजक वयवसथा की दृिष से वह वयिकत दणड का भाजन
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हो। पिरपकव वयिकत अपराध-बोध की कुणठाओं से आतमिवशलेषण, िचनतन, धयान और
सेवाकायर दारा मुकत हो जाता है।
अनुभवो दारा पिरपकव होने पर अथात् िववेक (समझदारी) का जागरण होने पर भय
का वेग कीण हो जाता है। वासतव मे भय होना पािणमात की सवाभािवक पितिकया है। वन
मे िसंह का गजरन सुनकर पशु-पकी भयभीत हो जाते है और पाण-रका चाहते है और पाणसंकट की पिरिसथित मे भय को रप मे पितिकया होने पर यथाशिकत पाण-रका का यत
करते है। अलप भय जागरण की पूवासथा है तथा जागरण का संकेत एवं पेरक है।
िवषयम पिरिसथित के समुतपन होने पर उसे पार कर जाने की उतसुकता के साथ ही
िवफल अथवा परािजत होने की आशंका भी मन को घेर लेती है तथा मनुषय भयभीत हो
जाता है। पितकूल पिरिसथित मे भय उतपन होना तथा मन मे भय के संसकार जागिरत हो
जाना सवाभािवक है। जब िखलाडी खेल के मैदान मे जाता है, उसके मन मे जय और
पराजय के दनद का संघषर होता रहता है तथा अिनशय की अवसथा उसे भानत कर देती
है। पराजय का भय मन मे भम (वहम) उतपन कर देता है तथा मनुषय पराजय के भय एवं
िवजय की कामना के कारण िविवध पकार के िवशासो का सहारा लेने लगता है। िखलाडी
कभी िकसी बैट को अथवा िकसी िवशेष रंग की शटर को भागयपद कहतदा है तथा िकसी
तारीख अथवा िदन को शुभ या अशुभ कहता है। वह अनेक पकार की मनौती करके ही
खेल के मैदान मे उतरता है। परीकाथी परीका-भवन मे पवेश करने से पूर् िवचिलत
अवसथा मे अनेक पकार से अपने मन को िसथर करता है कोई परीकाथी जेब मे "लकी"
िसका रखकर लाता है तथा कोई कुछ अनय उपाय करता है। मुकदमे मे फँसा हुआ
वयिकत अपने भयभीत मन को शानत करने के िलए अनेक यत करता है। संकट-काल मे
अनेक िवशास िमथय होते हुए भी मन को दृढता देने के कारण महततवपूणर होते है तथा
उनका सहसा पिरतयाग करना न उिचत होता हौ और न संभव ही। अलपजान की
अपिरपकवावसथा मे िमथया आसथा और िवशास भी संबल पदान करते है तथा उस अवसथा
मे उनके महततव को नकारा नही जा सकता। जानमिणडत वयिकत अलपज को सहसा
िवचिलत करके िनरालमब नही कर देता तथा धीरे-धीरे ही उसे अजान से उबारता है।
िचनतनशील वयिकत धीरे-धीरे िमथया आसथाओं और टोटको से मुकत होकर अपने मन मे
सतय की पसथापना करके सतय के पित आसथा एवं िववेक को दृढ कर लेता है। मनुषय
सतय और िववेक की पसतापना दारा न केवल भीषण पिरिसथित को साहसपूवरक पार कर
लेता है, बिलक अपने भीतर पैठे हुए भय और उसके गहरे संसकारो पर भी िवजय पापत कर
लेता है। यदिप भय पािणमात की सवाभािवक पवृित है, मनुषय बुिद के सदुपयोग से अवशय
ही भय से मुकत हो सकता है।
पिरपकव होने पर मनुषय पुराने अनुभवो के आधार पर अनेक पकार के भयो के
पभाव से मुकत हो जाता है। िववेकपूणर िचनतन से भय के पुराने संसकार िनषपभाव एवं कीण
हो जाते है। कभी-कभी िकसी कायर को करते समय अथवा िकसी घटना को देखने के
समय सहसा अकारण ही िवचार आता है िक यिद ऐसा होगा तो वह मेरे दुभागय का सूचक
होगा यदिप उसका मनुषय से कोई सीधा समबनध नही होता अथवा कभी कुछ कायर करते
समय अकारण आशंका उतपन होती है िक यिद हम इस समय ऐसा करेगे तो वैसा होगा
यदिप इन दोनो बातो मे कोई तालमेल ही नही होता। बयजिनत अकारण आशंकाओं को
िकसी पुराने अपराध-बोध के संसकार से उतपन मानकर उनकी उपेका कर देनी चािहए।
मनुषय कभी-कभी िचनतन करते समय सहसा िकसी िपयजन के समबनध मे अित मोह के
पभाव से ऐसी कलपना कर बैठता है अथवा ऐसा िवचार करने लगता है जो अभद होने के
कारण मन को चौका देता है और मन घबरा उठता है। पिरपकव वयिकत उसका िमथया एलं
किणक समझकर उस पर धयान नही देता।
मनुषय के मन मे पतयेक पाच-छह सेिकंडो मे नया िवचार आता रहता है तथा िकसी
अभद िवचार के आने पर िवचार-पवाह को रोकना नही चािहए। अभद िवचारो एवं
कलपनाओं की उपेका कर देने से वे सवयं कीण हो जाते है। कभी-कभी िकसी के रोग को
देखकर मनुषय उसके साथ अपनी तुलना करके समान लकणो को ढू ँढने लगता है और
अकारण ही सवयं भी दस
ू रे की भाित रोगी हो जाने की संभावना अथवा भम करने लगात
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है। संसार मे िकसी मनुषय की िकसी अनय से पूणर समानता कदािप नही होती तथा कुछ
िबनदुओं की समानता होने पर भी मनुषय और मनुषय मे महान् अनतर होता है। सभी की
कमता, आनतिरक शिकत और पृषभूिम िभन-िभन होते है. अनेक बार मनुषय वयथर ही अपने
िकसी पुराने रोग के पुनः उतपन हो जाने का बय करने लगात है। कभी-कभी अचेतन मन
कुणठाओं को िनकाल देने के िलए उनहे चेतना-सतर पर ऊपर उभार देता है तथा मनुषय को
समझदारी से काम लेना चािहए तथा घबराना नही चािहए। वासतव मे कालपिनक भय और
िनरथरक आशंका िकसी न िकसी माता मे सभी को सताते है तथा समानय दोष होते है
िकनतु मनुषय अपने भय और आशंका को िवशेष और िवषम मानकर तथा उन पर
अनावशयक धयान देकर सवयं ही उनहे कषदायी बना देता है।
अनुभवो से पिरपकव वयिकत िववेक दारा असथायी अवसाद के कणओं को िकसी
उपयोगी एवं रिचकर कायर, सवाधयाय अथवा मनोरंजन मे वयसत होकर धैयरपूवरक पार कर
लेता है। अपनी कमता और उपलिबधयो का एहसास करना भी आतमिवशास को जगाने मे
सहायता करता है। मनुषय िवगत जीवन मे अपनी बुिदमता को पमािणत करने वाली
उपलिबधयो एव कायरकलाप का समरण करके तथा िवषम पिरिसथितयो मे भी सनतुलन बनाए
रखकर उनका समाधान करने के अनुभवो का समरण करके आतमिवशास को पुष कर
सकता है और भयभीत न होने का वज संकलप ले सकता है। िकनतु वासतव मे एकानत
सथल मे िनससपनद बैठकर िनतय-पित तीस-पैतीस िमिनट तटसथ िचंतन एवं आतमअवलोकन करने से मन की गहरी परतो से भय और शोक के पुराने संसकारो से मुकत हो
जाता है। धयान की साधना इसमे िवशेष सहायक होती है।
पिरपकव वयिकत बात-बात पर िचढता नही है। तुचछ बातो पर उतेिजत होना
अपिरपकवता का लकण है। पिरपकव एवं िववेकशील वयिकत पायः सम और शानत रहता
है। वह आवशयकता होने पर दृढ हो जाता है िकंतु ककरश और कठोर कदािप नही होता।
वह कटु वाणी के आघात से दस
ू रो के मन को पीडा अथवा संतास देने मे सुख का अनुभव
नही करता। िववेकशील वयिकत संवेदनशीलता से पिरपूणर होता है तथा समाज मे चारो ओर
दुःख और पीडा को अनदेखा करके िवलिसता मे रत नही होता तथा उसके जीवन मे
सादगी अनायास ही आ जाती है।
वृदावसथा अिभशाप नही होती तथा वह पिरपकवावसथा होती है। वृद लोग अपने अनुभवो
के पकाश मे युवको का मागरदशरन कर सकते है तथा उतम जीवन के पेरक हो सकते है।
यह िबलकुल आवशयक नही है िक वृदावसथा आने पर सूचना को संसािधत करने की
मिसतषक की कमता कीण हो जाए। वृद होने पर भी मनुषय सवसथ एवं सुपसन रहकरर
सरलता से मिसतषक के कोिशका-कय की पूितर कर लेता है। वासतव मे मिसतषक की
कोिशकाएँ अपनी कित को सवयं पूरा कर लेती है। यदिप वृदावसथा मे रटने की शिकत
कम हो जाती है, समझने की शिकत तीवर हो जाती है। अगिणत वृदा लोग सुपसन रहना
सीखकर जीवन के अनत सुखी और उपयोगी जीवन वयतीत करते है।
×
×
×
िववेकशील पुरष पिरवार एवं पडोस के महततव को जानता है तथा वह पािरवािरक
एवं समीपवती जन के िहतो की उपेका नही करता। मनुषय पिरवार और पडोस को
असनतुष करके तथा उनसे टकराकर अपनी शािनत खौ बैठता है। पिरवार और पडोस के
साथ पेम, कमा, सहनशीलता, सहायता और सहयोग का वयवहार करने पर मनुषय के चारो
ओर सुमधुर वातावरण उतपन हो जाता है। जो वयिकत पिरवार और पडोस को परेशान
करता है, वह सवयं भी परेशान हो जाता है तथा उसे आतम-िनरीकण दारा सवयं मे पिरवतरन
लाने का पयत करना चािहए। सवयं को सुधारना समाज को सुधारने का पथम पग होता
है। दस
ू रो की अकारण आलोचना और िननदा करना तथा अपने वयवहार मे अहंभआव का
पदशरन करना मनुषय को दस
ू रो को साथ िमलने नही देता तथा उनके दरू कर देता है।
वासतव मे यिद दृिष दस
ू रो की बुराई पर होगी तो बुराई के ढेर िदखाई देगे, िकनतु यिद
भलाई पर दृिष होगी तो भलाई का सागर उमडता िमलेगा। यदिप परसपर समबनधो मे
उिचत दरू ी रखना तथा मयादा का पालन करना आवशयक होता है, तथािप दस
ू रो की
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भावनाओं को समझकर दस
ू रो को उिचत महतव देना समबनधो मे माधुयर का समावेश करता
है।
पिरवार और पडोस के साथ मधुर समबनध रखकर ही मनुषय जीवन की याता को भली
पकार समपन कर सकता है। हम दस
ू रो को सहयोग दजेकर उनसे सहयोग लेते है। मन
मं िनःसवाथर पेम एवं सदभाव होने पर परसपर सहयोग का आदान-पदान सुगम हो जाता है।
हमारे पेमपूणर एवं पिवत मन की तरंगे दस
ू रो के मन को छू कर समान पितिकया उतपन कर
देती है। हम िकसी के पास आतमीयता के भाव से (उसे अपना ही मानकर) जाएँगे तो उस
पर हमारी आतमीयता का पभाव पडेगा। अपने सवाथर एवं शोषण-वृित के कारण हमे दस
ू रे
लोग पराए पतीत होते है। हमारी सवाथर और शोषण-वृित ही दस
ू रो के मन मे हमारे पित
घृणा उतपन कर देती है। हम जो कुछ देते है, वही पाते है। कूप मे धविन करने पर उसके
अनुसार ही पितधविन होती है। हम न तो िकसी दस
ू रे पर इतना भार बन जाएँ िक वह
हमसे कतराने वगे तथा दस
ू रो से इतना भी न कट जाएँ िक हम आवशयकता होने पर भी
उनसे कुछ कह न पाऐँ और अपना काम ही िबगाड ले। वयवहार मे मयादा का पालन होने
पर परसपर टकराहट की समभावना नही रहती। अपने कतरवय-पालन तथा दस
ू रो के
अिधकार की रका करने से मनुषय सममान पापत कर लेता है।
इसके अितिरकत हमे यह भी समरण रखना चािहए िक मात उतम भावना होना ही
पयापत नही है। उतम भावना के साथ उतम वयवहार होने पर ही हम दस
ू रो के मन को
जीतकर उनहे बना सकते है।
पिरवार मे सबका अपना सथान होता है तथा सभी का अपना महततव होता है। कुछ
कायर ऐसे होते है िजनहे बडे िसद नही कर सकते तथा छोटे सरलता से िसद कर लेते है.
घर के भीतर छोटा-सा दीपक अनधकार को दरू कर देता है, सूयर नही। िजस पिरवार मे
बडो का सतकार होता है और छोटो को पयार िमलता है जहा सभी एक-दस
ू रो के िहत मे
अपने सवाथर का तयाग करने और बिलदान करने मे सहषर ततपर रहते है तथा जहा सबके
सुख मे अपना कुश सनिहत मानते है, वहा पिरवार एक सशकत एवं सुखद संगठन हो जाता
है तथा वहा समृिद, सुख और शािनत का सामाजय छा जाता है। पिरवार मे सभी पकार के
लोग होते है, कुछ िवशेष बुिदमान होते है, कुछ पिरशमी, कुछ सािततवक तथा कुछ
अलपबुिद, कुछ आलसी, कुछ राजिसक अथवा तामिसक होते है, िकनतु सभी एकता के
सूत मे बँधे रहते है तथा िकसी एक की संकट की घडी मे सभी एकजुट होकर उसे पूणर
सुरका देते है। संगिठत बडा पिरवार सुखी पिरवार। पिरवार और पडोस के साथ मधुर
समबनध रखने पर मनुषय अपने को सुरिकत अनुभव करता है।
कभी-कभी पिरवार मे िकसी बाहय कुिटल वयिकत का पवेश तथा पभाव हो जाने से
परसपर सनदेह एवं अिवशसनीयता का वातावरण उतपन हो जाता है तथा उससे पिरवार की
एकता टू ट जाती है। कुिटल वयिकत झूठे िहतैषी बनकर चुगलखोरी दारा तोड-फोड करने
मे एक िविचत रस का अनुभव करते है। िववेकशील पुरष सावधान रहकर कुिटल
वयिकतयो को दरू रखते है तथा उनहे अपने पािरवािरक जीवन मे पभावी नही होने देते।
वासतव मे उतम पुरषो की संगित और सवाधयाय मनुषय का भटकने से बचाकर महान् िहत
करते है तथा अधम मनुषयो की संगित और िनकृष पुसतके मनुषय को भटकाकर िवनष
कर देती है। मनुषय पायः सारे दोष कुसंगित से ही गहण करता है।
पिरवार जीवन-यापन की कला सीखने के िलए मनुषय की सबसे उतम पाठशाला
है। पिरवार मे रहकर वयिकत अनुशासन, संयम, मयादा, नयाय, पेम, सेवा, तयाग, कमा,
सहनशीलता, धैय,र साहस आिद मानवीय मूलयो का पाठ सीखता है। पिरवार मे रहकर ही
सवाभाव को मधुर बनाने का पूणर अवसर होता है। सवभाव मनुषय को सुखी अथवा दुःखी
तथा िपय अथवा उपेिकत बनाने मे िवशेष उतरदायी होता है। िचनतन, आतमवलोकन,
आतमिवशलेषण तथा धयान आिद के अभयास से सवभाव का उदातीकरण हो जाता है।
ईषया-देष मनुषय के सवभाव को कटु बना देते है। देषी मनुषय दस
ू रो को दुखी देखकर सुख
का अनुभव करता है िकनतु यह नही समझता िक देषािगन उसके मन को िवषाकत बनाकर
उसे भी उिदगन एवं अशानत कर देती है। देषी वयिकत को सबसे ही िशकायत रहती है तथा
वह अशािनत का पसार करता रहता है।
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कभी-कभी कोई वयिकत िकसी बात को पितषा का पश बनाकर अपनी हठ पर अड
जाता है तथा वह न केवल दस
ू रो को िवरोधी बना लेता है बिलक अपना काम भी िबगाड
लेता है। जो मनुषय अहंकारवश अपनी बात रखने के िलए हठ करता है तथा हठ के
दुषपिरणाम पर िवचार नही करता, वह िशिकत एवं उचचपदासीन होकर भी अिववेकी ही है।
िकसी िवषम पिरिसथित मे कठोर पग उठाने से पूवर उसके पिरणाम पर धैयरपूवरक
िवचार करना मनुषय को महान् संकट से बचा देता है। जोश मे आकर तथा उतावला
होकर सहसा कुछ भी कह देने या करनेवाले मूखरजन बाद मे हाथ मलते हुए पछताते रह
जाते है। जोश मे होश पिरणाम को सोचकर ही उिचत पग उठाते है। िवचार न करनेवाला
मनुषय पशु ही है।
भूल होना तो सवाभािवक िकनतु उससरे मुकत होने का पयास न करना अिववेक
है। भूल को सवीकार करने से आतम-सुधार की पिकया पारमभ हो जाती है तथा जीवन का
मागर पशसत हो जाता है। यिद अफनी भूल से िकसी को कष पहँुचा हो तो उससे कमा
माग लेने से कटुता समापत हो जाती है और सदाव उतपन हो जाता है। भूल सवीकार कर
लेने से मन िनमरल हो जाता है।
पिरवार-िवघटन के अनेक कारण होते है। कुछ वयिकत उनमुकत यौन के नाम पर
यौनाचार मे अितिलपत हो जाते है तथा कुछ अनय पगितवाद की आड मे नाना पकार की
मादक वसतुओं का सेवन करने लगते है। सवचछनद यौन तथा मिदरा-पान आिद दुवयरसनो ने
अनेक पिरवार-इकाइयो का िवघटन एवं िवनाश कर िदया। पगितशील देश सवचछनद यौन
के दुषपिरणामो से पीिडत होकर परमपरागत मानवीय मूलयो की रका का उपाय कर रहे है।
हा, अनावशयक संदेह और अिवशास करना तथा पितबनध जीवन मे कोई महततवपूणर
उपलिबध नही कर सकता तथा उचचतर सुख से वंिचत रह जाता है। भटके हुए लोग
कुलकलंक होकर पिरवार के िलए अिभशाप बन जाते है। पिरवार मे परसत पेम और तयाग
की भावना होने पर तथा पिरवार का िहत सवोंपिर होने पर मनुषय कुपनथ मे भटकने से बच
जाता है।
िववेकशील वयिकत पेमपूणर होता है तथा िवनाशकारी वयसनो से दरू रहता है। पेम
मन को िनमरल कर देता है तथा मनुषय को सेवाकायर मे पवृत कर देता है। पािरवािरक
जीवन मनुषय को उदार होना िसखाता है िकनतु यिद कोई वयिकत सवाथर, संकीणरता और
दुरागह से गसत होकर पिरवार मे िदन-रात कलह करके वातावरण को िवषाकत करता हो
तो पिरवार मे िदन-रात कलह का वातावरण को िवषाकत करता हो तो पिरवार के िहत मे
उसका पिरवार से पृथक होना समुिचत होता है। अिववेकी लोग अपने बनधु-बानधव को भी
वैरी बना लेते है। लोकोिकत है—राड से बाड भली । गृह मे शािनत होने पर ही पिरवार की
उनित और समृिद हो सकती है।
पिरवार मे वृद जन अनेक बार िवचार और अनुभव मे पिरपकव होकर भी पुरानी
पीढी और नयी पाढी के अनतराल को समझने के कारण नयी पीढी को बुरा कहकर कोसने
लगतचे है तथा सामंजसय सथािपत न होने के कारण पिरवार के िलए तथा अपने िलए
कषकारक हो जाते है। कभी-कभी वे यह भी भूल जाते है िक वृदावसथा मे उनका सुख
पयापत सीमा तक सनतान एवं पिरवार पर िनभरर होता है तथा वे बचचो एवं पिरवार के साथ
िमलकर रहने पर ही अपना सममान सुरिकत रख सकते है। अनेक बार वृद जन मे सममान
पान की लालसा उनके कष का कारण बन जाती है। कभी-कभी तो माता-िपता परसपर
लडकर पिरवार मे एक िविचत िसथित उतपन कर देते है और कोई समझदार बचचा साहस
करके कह भी देता है, "गुससा नही करना चािहए, सारे घर पर असर पडता है। चाहे ठीक
बात पर ही गुससा िकया, िजस पर गुससा िकया, िजनके सामने िकया, सब पर असर पडता
है।" ऐसे अवसर पर बडे आदमी को छोटो के िववेक-सममत सुझाव को िशरोधायरकर
उसका धनयवाद करना चािहए।
पिरवार मे माता-िपता का सनतान के साथ पूणर सामंजसय होना पिरवार की समृिद
एवं शािनत के िलए अनयनत आवशयक होता है। छोटो को पग-पग पर रोकने -टोकने से,
बात-बात मे उपदेश, आदेश और िनदेश देने से तथा उनकी आलोचना, िननदा और भतसरना
करने से उनकी कमता, सवावलमबन-वृित और उनका आतमिवशास आहत हो जाते है।
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छोटो पर अपनी बात लादने अथवा अपना मत थोपने से उनकी िवचारशिकत कुिणठत होती
है। परसपर सनेहपूणर संवाद दारा समझना और समझना तथा परसपर सहमित और
साझेदारी होना पिरवार के वातावरण को िसनगध बना देता है। वासतव मे बचचो का भी
सवतंत अिसततव होता है तथा उिचत अवसर पर उनकी सराहना करना महततवपूणर होता
है। समुिचत पशंसा आतमािवशास को जगा देती है। बडो को चािहए िक वे छोटो को पेम
और सममान दे, उनमे आशा और िवशास जगाएँ तथा उनमे पश् पूछने , काम को सँभालने
और आगे बढने का साहस भर दे। उनहे बात-बात मे आदेश देने के बजाए युिकतपूवरक
पेमपूणर सुझाव दे िजससे उनका सवतंत वयिकततव िवकसीत हो सके। माता-िपता का
कतरवय है िक वे बचचो को किठन पिरिसथित मे दृढ रहना तथा धैयरपूवरक संघषर करना
िसखाने मे न चूके। संकटमय पिरिसथित जीवन मे चुनौती बनकर आती है िकनतु उसे
साहसपूवरक सवीकार करके जूझने पर वह आतमिवशास बढाने और कीितर देने का सुनहला
अवसर हो जाता है।
पिरवार मे बडो का कतरवय है िक वे छोटो को सफलता-िवफलता, लाभ-हािन तथा
जय-पराजय से ऊपर उठकर कमर की पेरणा दे। लकय को सपष िनधािरत करके उसकी
पूितर के िलए योजनापूवरक पयत करना िनतानत समुिचत है िकनतु फल की लालसा अनेक
बार कामना और उपलिबध मे अनतराल होने पर घोर िनराशा उतपन कर देती है। लकय के
िलए पुरषाथर करते हुए संघषर का महततव तथा उसका अफना एक सथान होता है। याता
और लकय, सफर और मंिजल अथवा संघषर और उपलिबध का अपना-अपना पृथक् महततव
होता है। वीर सैिनक कहता है-हमने वीरता से युद िकया, हम खूब लडे। पराकम
वीरतापूवरक युद करने मे िनिहत होता है, फल तो ईशराधीन होता है। परीका मे उतीणर
अथवा अनुतीणर होने की िचनता का तयाग करके पिरशम करना पयापत होना चािहए।
परीका मे वािछत फल ने िमलने पर बचचो को डाटना उनके साहस को तोड देता है।
अनुतीणर अथवा साधारण उतीणर होने पर उनहे भिवषय मे और अिधक पयत करने के िलए
पोतसािहत करना चािहए। वासतव मे संघषर का महततव लकय-पािपत से भी कही अिधक
होता है। बचचो के हृदय मे इस भावना को भर देना चािहए िक वे संकटकाल मे कभी न
घबराएँ और साहसपूवरक उसका सामना करे। आदेश, िनदेश देने और आलोचना करने के
बजाए पेमपूणर सुझाव देना अिधक लाभकारी होता है।
पिरवार मे पेमपूणर पशंसा का आदान-पदान पसनता का वातावरण उतपन कर देता
है तथा वयवहार की रकता िवकोभ एवं आकोश उतपन कर देती है। मुसकराकर मृदु और
मधुर वाणी बोलने से सब ओर सुख उपजता है। दस
ू रो को सुख देनेवाली मीठी वाणी
बोलना भगवान् की पूजा है। भूल होने पर खेद पकट करना, उपकार होने पर धनयावाद
देना तथा मुसकराकर अिभवादन करना एवं शुभकामना करना न केवल िशषाचार है, बिलक
चारो ओर सुख की वषा कर देता है। वाणी का पभाव अतयनत गहन होता है। िववेकशील
पुरष सदैव वाणी मे संयत रहता है तथा सँभलकर और सोच-िवचारकर अपना मत पकट
करता है। कुछ लोग भलाई के कायर करके भी ककरश वाणी बोलकर न केवल िकए हुए
कायर को िमटा देते है, बिलक अकारण ही शतुता मोल ले लेते है। िजन शबदो से दस
ू रो की
भावनाओं को ठेस पहुँचती हो, दस
ू रो को आतम-सममान को चोट लगती हो अथवा दस
ू रो को
आतमिवशास को आघात होता हो, उनहे कदािप नही कहना चािहए। िववेकशील पुरष
परसपर हास-पिरहास और िवनोद मे भी मयादा का समरण रखते है तथा दस
ू रो को शूल की
भाित चुभनेवाले शबद कदािप नही कहते। िववेकशील पुरष समनवयवादी होता है तथा
पिरवार मे मतभेद होने पर बीच का रासता िनकालकर कलह को शानत कर देता है।
सरल, िवनम, मृदभाषी और शालीन वयिकत सवरत सममान पापत कर लेता है तथा दस
ू रो पर
उसका पभाव अतयनत गहन होता है। िकसी िवषय पर चचा करते समय जब कुछ वयिकत
अपनी बात को बडा करने के िलए हठ करने लगे तथा एक-दस
ू रे को नीचा िदखाने लगे,
तब कटुता उतपन होने से पूवर ही उस चचा को बनद करके अनय िवषय पर चचा पारमभ
कर देनी चािहए। पिरवार मे जानवदरन चचा भी यदाकदा अवशय होनी चािहए।
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यदिप समुिचत अवसर पर सहज भाव से पशंसातमक शबद कहना सभी को पसनता देता
है, बचचो के वयिकततव-िनमाण मे पशंसा की िवशेष आवशयकता होती है। पशंसा करने के
उिचत अवसर पर बडो को उदासीन नही रहना चािहए। शबदो मे कृपण होना अिशषता
होती है। बचचे को पेरणा देने के िलए उसकी िकसी दस
ू रे बचचे से तुलना करना वासतव मे
उसे नीचा िदखाकर हतोतसाह करना होता है. हतोतसाह करनेवाले शबदो से उतमता की
पेरणा देना अिविवक है। "आप िजतने बडे हो रहे है, उतने ही बुिद मे िगरते जा रहे है।
आप िनकममे हो गए है तथा जीवन मे कुछ नही कर सकते।" पुरानी अिपय घटनाओं को
कहकर ताने मारने से मन मे कटुता आती है तथा परसपर दरू ी हो जाती है। अपिरपकव
होने के कारण बचचे अपनी बात कहे नही पाते िकनतु उनमे भी िवचार होते है। बात-बात मे
डाटने और दणड देने की धमकी देने से बचचो मे भीतर तीवर पितिकया होती है िकनतु अपने
आकोश को पकट न करने के कारण उनका मन कुिणठत हो जाता है। िववेकशील मातािपता बचचो को पूरी छुट देकर भी उन पर पूरी िनगाह रखते है और आवशयकता होने पर
युिकतपूवरक सुझाव दे देते है। बडो को यह सदैव समरण रखना चािहए िक बचचे अपनी
बौिदक कमता, रिच और सवाभािवक गुणो के अनुरप ही िवकिसत हो सकते है तथा उनहे
बरबस डाकटर, इंजीिनयर इतयािद नही बनाया जा सकता। वासतव मे बडो का कतरवय है
िक वे बचचो को उनकी बौिदक कमता, रिच एवं संभावनाओं के अनुरप िवकिसत होने मे
सहयोग दे। िकसीको कमता और सवभाव के पितकूल चलने के िलए िववश करना उसके
पित अनयाय करना है।
पािरवािरक वातावरण वयिकततव का िनमाण करने मे िवशेष उतरदायी होता है।
कोई वयिकत जनम से ही दीन-हीन अथवा कुिणठत नही होता। वासतव मे िवषम पिरिसथित
को वयिकततव-िनमाण मे बाधक कहना भी उिचत नही है तथा समाज का दुवयरवहार,
िवशेषतः पािरवािरक जन का दुवयरवहार, ही युवको को दुबरलो, िवदोही अथवा अपरादी
बनाता है। पिरवार ही वयिकत को सजजन अथवा शैतान, साहसी अथवा कायर, नयायिपय
अथवा अनयायी, दानी अथवा कृपण, कृपालु अथवा कठोर, शूर अथवा कूर, उदार अथवा
अनुदार, पोषक अथवा शोषक तथा समाजपेमी अथवा समाजदोही बनाता है। पिरवार मे
उपेका होने पर अथवा ितरसकार पाकर बचचा अपने को उपेिकत अथवा ितरसकृत मान
लेता है तथा वह अपने को अरिकत एवं असहाय समझने लगता है। सचचे पेम का वयवहार
ही वयिकत मे वयिकत मे सुरका का भाव जगाकर "आतमिवशास" की पितिषत करता है।
यह बडो का कतरवय है िक वे बचचो को पाशिवक दणड न दे तथा अपने वयवहार से उनके
मन मे यह िवशास उतपन कर दे िक उनकी ताडना उनके िहत मे ही जाती है। अवसर के
अनुसार कभी-कभी सपयोजन कठोरता िदखाना तो उिचत होता है, िकनतु घृणापूणर
दुवयरवहार करने के दुषपिरणाम होते है। घृणा और िवदेष सवरथा तयाजय है। बडो का
वयवहार ऐसा होना चािहए िक िकसी के मन मे यह भाव न खटक सके िक पिरवार मे उनके
गुणो एवं कायर की कोई कद नही होती तथा उसे उसके पेम का जवाब नही िमलवाता।
कभी-कभी बचचो मे माता-िपता के समपूणर पेम को एकािधकार के रप मे पाने के िलए सपधा
हो जान के कारण परसपर ईषया-देष उतपन हो जाता है। िववेकशील माता-िपता को बचचो
की भावना का आदर करते हुए भी उनहे परसपर पेम से रहना िसखाना चािहए। इसके
अितिरकत कभी-कभी बडे और छोटे बचचे के पक मे बडे बचचे को दिणडत कर देते है तथा
नयाय नही करते िजससे उनमे परसपर देष उतपन हो जाता है तथा वह बढता ही रहता है।
िववेकशील माता-िपता युिकतपूवरक उनहे अपने वयवहार से परसपर पेम करना और नयाय का
आदर करना िसखाते है। िववेकशील माता-िपता भूल मे भी अपनी सनतान से घृणा नही
करते तथा अपार सहनशीलता भूल मे भी अपनी सनतान से घृणा नही करते तथा अपार
सहनशीलता का पिरचय देते है। पिरवार अथवा समाज मे दो वयिकतयो पर परसपर िनरोध
होने पर सेतु बनकर एकता सथािपत करना ही कलयाणकारी होता है।
पिरवार मे सबके साथ िमलकर घर को साफ-सुथरा और सुसिजजत रखने से न
केवल सौनदयर-भावना का िवकास होता है, बिलक पिरवार मे उललास का भी उदय होता है।
यिद घर मे पतयेक वसतु अपने िनयम सथान पर हो तथा वसतुएँ इधर-उधर फैली हगुई न
हो तो घर आकषरक पतीत होने लगता है। पिरवार मे अितिथ के आने पर उसे समुिचत
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आदर देने से तथा उसके पित आवशयक धयान देने से पिरवार की पितषा होती है। पिरवार
मे पाथरना, भोजन आिद के समय िदन मे एक बार सबका एकितत होना तथा िकसी के रोग
आिद कष के िनवारण हेतु सहयोग देना पिरवार समाज की महततवपूणर इकाई है तथा
इकाई की उनित एवं समृिद समाज की उनित एवं समृिद का सूत होता है।
पिरवार मे कभी-कभी यह कलेशपद िसथित भी उतपन हो जाती है िक आधुिनकता
के दंभ मे पुत अपने माता-िपता को मूखर िसद करते हुए उनहे िनलरजजता से िझडक देते है
तथा उनके िवचारो और अनुभवो को ितरसकारपूवरक ठुकरा देने मे गौरव समझते है।
अनेक बार उनकी पती भी पदे के पीछे से बाण चला देती है और माता-िपता के िलए जीवन
दुवरह हो जाता है। अपने घर मे अपने ही बचचो से घृिणत एवं अपमािनत होना संतास हो
होता है। िकंतु उतम माता-िपता तथा अनय बडे सहनशीलता, उदारता और कमा से अपने
बडपपन का िनवाह करते है। शेष पुरष िवष पीकर अमृत उगलते है।
पायः बचचे यह भूल जाते है िक वे माता-िपता के ऋणी है तता वे उनकी सेवाओं
का ऋण कदािप चुका नही सकते। माता-िपता तथा अनय बडो के सचचे आशीष मे बहुत
बल होता है तथा वे माता-िपता को कलेश देकर सुखी नही हो सकते। वे उनके शुभाशीवाद
से न केवल घोर संकट को सुगमता से पार कर सकते है बिलक समृिद,सुयश, सुख और
शािनत भी पापत कर सकते है। माता-िपता और गुरजन केवल सममान चाहते है जो िक
उनका अिधकार होता है। उनका आशीवाद कवच बनकर रका कर सकता है। वे पिरवार
धनय है जहा माता-िपता को सनतान से आदर िमलता है तथा सनतान को माता-िपता का
संरकण पापत होता है। माता-िपता संतान के िलए शेष वर देनेवाले पावन तीथर होते है।
िजन लोगो को माता-िपता का सममान एवं सेवा करने से उनका सहज सनेह सुलभ होता है,
उनके मन मे सुरका एवं आतमिवशास की भावना दृढ हो जाती है। माता-िपता सनतान के
िलए पमुख पेरणासोत होते है तथा पतयेक वयिकत जाने -अनजाने सवयं मे माता-िपता की
छिव देखने का पयत करता है यदिप पतयेक मनुषय मे अपने अतयनत िभन वयिकतगत गुण
भी पयापत माता मे होते है। मनुषय को अपने माता-िपता का दोष-दशरन नही करना चािहए।
माता-िपता के गुणो का शदापूवरक समरण करने से मनुषय अपने भीतर गुणो की पसथापना
कर लेता है। मनुषय की पसनता के िलए पिरवार और पडोस के साथ मधुर समबनध रखना
आवशयक होता है।
×
×
×
पतयेक वयिकत को अपने िलए सवतंत िचनतन करना सीखना चािहए िजससे िक वह
अपने भीतर यह देखने की शिकत को िवकिसत कर ले िक जगत् कया है, जीवन कया है,
सतय, िशव और सुनदर कया है, उसके िलए उिचत कया है, नयायसंगत कया है तथा उसे कया
करना चािहए। मनुषय का पथम एवं पमुख कतरवय है िक वह सवयं को िशका दे िक वह पगपग पर सतय को पहचान सके और उसे गहण कर आतमसात् करने का साहस कर सके।
मनुषय सवयं से पश पूछकर तता तकर दारा सतय के अनुसंधान मे गितशील रहकर सतयबोध की िदशा मे पगित कर सकता है। पतयेक वयिकत को अपनी जीवन-याता को सरल,
सुगम और पशसत बनाने के िलए िचनतन, तकर और अनुभव के आधार पर अपने भीतर
अपना एक पकाशदीप पजविलत करना चािहए। अपने से बाते करे, अपने गहरे सतरो पर
जीवन का संगीत सुने। अपने से पूछे, अपने को िमत, बनधु और गुर बनाएँ। मनुषय सवयं
ही अपना, िमत, बनधु और गुर है। सवयं को जगाएं, सवयं को जाने। सृिष का रहसय कया
है, जीवन का पयोजन कया है, इसे कैसे पूरा िकया जा सकता है आिद महापशो के उतर
हमारे भीतर ही है तथा हम उनहे जानने के िलए अपने भीतर िजजासा की हलचल उतपन
करके सवयं को िदशा िदखाएँ और पिरवितरत करते रहे। हम अपने भीतर िनरनतर सजग
रहकर जीवन और जगत् के रहसय का उदघाटन करे। बोध-याता की मंिजल भीतर ही
है। सतयं िशवं सुनदरम् का दशरन तथा पूणरता की अनुमित भीतर ही है। जगत् और जीव
के तादातमय की चेतना एवं बाहर और भीतर की एकरसता की अनुभूित ही जागरण है, जान
की इितशी है, साधना का साधय है तथा सवगर की पािपत है। अपने मन मे शाित, िसथरता
और समता की अनुभूित करना अपने भीतर सवगर को पितिषत करना है। सवगर की
अनुभूित अपने भीतर ही होती है।
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पकृित ने िवकास के कम मे बुदमिणडत मनुषय को अवतीणर करके उसे अपने रहसय
का उदाटन करने तथा पूणरतव को पापत होने पर अवसर दे िदया। मानव-जीवन एक
अवसर है—सतय को जानने-समझने और पापत करने का। सचेतन मनुषय अननत बहाणड
की पूणर इकाई है जो िवयोजय पतीत होकर भी उसका अिवयोजय अंग है। मनुषय अपनी
बौिदक शिकत एवं चेतना के िवकास से न केवल जगत् और जीवन के समसत रहसय को
जान सकता है, बिलक अपने भीतर उनकी सजरनातमकता। मानव-जीवन के इस उदेशय को
समझकर, इसकी पूितर की िदशा मे सवयं सतत सिकय रहकर अनय जन को पेिरकत
करनेवाले वर पुरष मानव-जाित के गौरव होते है।
जो िवचार, जान अथवा कमर मानवीय चेतना के िवकास मे सहायक होता है, मनुषय को
बनधनो से मुकत करता है, अवसाद से आननद की ओर पवृित करता है, अनदकार से पकाश
की ओर ले जाता है, अकरमणयता को सजरनातमकता मे पिरणत कर देता है, वह अमृतमय
है। कलयाणकारी िवचार चेतन मिसतषक मे दीघर समय तक सिकय रहने पर सशकत हो
जाता है तथा जीवन को िदशा दे सकता है। जो िवचार, जान अथवा कमर मनुषय को
रिढवाद, भागयवाद, समपदायवाद, तकरहीनता, दुरागह, असतय एवं अतीत के बनधनो मे
पकड लेता है, वह मृतयुमय है। चेतना की उनमुकतता एवं अननतता ही आननद है।
वासतव मे मनुषय अपनी समसयाओं के जाल मे फँसकर अपने भीतर पचछन अकम आननदसोत को अनदेखा कर देता है तथा उससे असमबद होकर अपनी सवाभािवक आननद-वृित
को िवसमृत कर देता है। पिरणामतः मनुषय भय, िचनता, कलेश तथा वयाकुलता से गसत हो
जाता है। उनमुकत वयिकत सहज ही सतय, पेम और करणा मे पितिषत हो जाता है तथा
पुणय और पाप उसका सपशर नही करते।
िजजीिवषा के मूल मे अखणड आननद की वृित है। आननद ही जीवन की सहज
अिभवयिकत है एवं जीवन का पयाय है। वासतव मे जीवन-संघषर का उदेशय भी आननदपािपत
होता है। अकमरणयता जडता है तथा दुःखरप अवसाद है। संघषर से शािनत और सुख
िनषपन होते है। संघषर के िबना शािनत और सुख की कलपना नही हो सकती। वासतव मे
संघषर के सवरप का उतना महततव नही है िजतना संघषर की िदशा का है। िचनतन और
कमर का महततव भी उनके सवरप पर इतना िनभरर नही है िजतना उनकी िदशा का।
िवकासोनमुखी सजरनातमक िकया वयिकततव को पसफुिटत करके उसे सुंगिधमय बना देती
है।
पश है कया हम वासतव मे अपने संघषर, िचनतन और कमर के पित िनषावान् है? कया
हम अपने भीतर अपने पित सचचे है? मागर पर चलने अथवा हट जाने का इतना महततव
नही है िजतना मागर पर चलने के पुनः-पुनः पयत करने का है। जो वयिकत सजग होकर
िचनतन दारा अपने िवचार और कमर को िवकासोनमुखी करने मे तथा बार-बार िगरकर भी
उठ जाने और आगे बढने मे पतयनशील है, वह जीवन के पयोजन को पूरा करता है तथा
उसकी दुगरित कभी नही हो सकती।
वासतव मे मनुषय जैसा िचंतन करता है वैसा ही बन जाता है। िचंतन दारा मनुषय
जैसे-जैसे उनमुकत होता जाता है, वह वैसे-वैसे अपने भीतर एक पकाश, उतथान और सहज
पसनता का अनुभव करने लगता है तथा कहता है, "मैने जीवन के महततव और पयोजन
को समझ िलया है, समसत शिकतयो का सदुपयोग ही ओज और आननद का कारण है, मै
आशा और उतसाह से िवकासोनमुखी िदशा मे आगे बढता ही रहूँगा।" िचनतन और कमर मे
वयसत रहना ही वयिकत और समाज के दुःख-िनवारण का उपाय है। मानिसक जागरकता
तथा उतसाह होना जीवन का लकण है। िनबरनध होकर अपने भीतर सपष िनदेश लेकर,
िववेकसममत कायर करना ईशरीय जान से काम लेना है।
मनुषय मूलतः एक िवशवयािपनी िदवय सता के साथ जुडा हुआ है। उस ईशरीय सता
से युकत होकर मनुषय शिकत, सुख और शािनत के अजस पवाह की अनुभूित कर लेता है
तथा उससे िवयुकत होकर दीन और दुःखी हो जाता है। मनुषय अपने भीतर अविसथत
अननत ईशरीय शिकत को जगाकर कणभर मे दुःख, भय, िचनता आिद से मुकत हो सकता
है। अनतिनरिहत ईशरीय शिकत के अकय भणडार को पहचानने तथा उसके साथ अिवचछेद
नाता सथािपत करने से मनुषय अपिरसीम शिकत को अपने भीतर समािहत कर लेता है।
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मनुषय अपनी भूलो के कारण भटक जाता है िकनतु ईशवरीय शिकत तो सदैव उसकी
सहायता और रका करने के िलए ततपर रहती है। अनतरातम-सममत िवचार, वचन अथवा
कमर संसार की दृिष मे भूल पमािणत होने पर भी दोषमय नही होता तथा िवकास की ओर
उनमुख कर देता है। ईशरीय शिकत मे िनससीमता होता है तथा उसीके पभाव के कारण
मनुषय पितकण सीमाओं के बनधन तोडकर असीम होने की कामना करता है। वासतव मे
मनुषय की चरन उपलिबध वयापक होकर ईशर-भाव अथवा अननता मे िवलीन हो जाना है।
मनुषय सृिष से पापत समसत वसतुओं और शिकतयो का उपयोग सृिष के िवकास के
िलए करके तथा सतय एवं पेम की पितषा दारा सृिष के साथ आतमसात् होकर कृताथर हो
जाता है। सृिष के पित समपरण-भाव होना तथा सतय और पेम मे पितषत होना
आिसतकता है और मनुषय का सहज धमर है। मनुषय सब कुछ सृिष से पापत करके अनत
मे यही छोड जाता है िकनतु अिववेकी जन सृिष की वसतुओं को लोभ से संिचत करके उन
पर एकािधकार मान लेते है तथा अनावशयक दुःख से िघर जाते है।
पतयेक वयिकत का जीवन जनसमाज से जुडा हुआ होने के कारण उससे पभािवत
होता है तथा परसपर पेम एवं सहृदयता के अभाव मे हम दस
ू रो के िलए किठनाई और कष
को उतपन करके अपना ही जीवन किठन और कषमय बना लेते है। हम इस पाकृितक
िनयम को भूल जाते है िक दस
ू रो को सुख देकर ही हम सुख पापत कर सकते है तथा
कष देकर अपने िवकास के मागर को कंटकाकीणर बना लेते है। भोग से तयाग की ओर
अथवा सवाथर से सेवा की ओर बढना मानो िवकासोनमुख होकर आननद की ओर बढना है।
आनतिरक िनषा दारा परम सता से समबद होने पर मनुषय िनशय ही अपने भागय का
िनमाण सवयं करता है।
X
X
X
हमे यह सदैव समरण रखना चािहए िक मनुषय सवयं ही अपने िवचारो के दारा अपने
मन का िनरनतर िनमाण करता रहता है। हम अपने को िजन िवचारो के वातावरण मे
रखेगे, वैसा ही मन का िनमाण होता रहेगा। शिकत और साहस तथा आशा और िवशास को
ही मन मे दृढता से पितष करना चािहए। पराजय और िनराशा की बाते सोचना तथा
पराजय और िनराशा की बाते कहना िवकासोनमुखी जीवन के लकण नही हो सकते।
उतसाह, आतमिवशास और ओज जीवन के लकण है तथा गितशील होकर िनषापूवरक पयत
करते रहना जीवन है। हमे अपने मन मे उतसाह, आतमिवशास और ओज देनेवाले िवचारो
को एकागता से दोहराकर उनहे दृढ करना चािहए तथा मन को दुबरल कर देनेवाले घृणा,
देष, िहंसा, पितशोध इतयािद के िवचारो को पनपने नही देना चािहए। साहस और सफलता
की घटनाओं से पेरणा लेकर आतमिवशास को दृढ करना चािहए। उतम उदेशयो की पूितर
के िलए उतसाहपूवरक पयतशील रहने से मन पफुलल रहता है। सवाथर, कपट, कृतघता,
िहंसा आिद कयकारक दोषो का पिरतयाग करके सकारातमक बातो को ही सोचना चािहए।
किठनाइयो और रोगो का िचनतन करना तथा िनराश होना पथभष होना है। िचनता, भय
और िनराशा को ईशरीय शिकत से सफूतर आतमिवशास दारा परासत कर देना चािहए। चाह
के होने पर राह सपष एवं सुलभ हो जाता है। जहा चाह वहा राह।
मनुषय मे अननत शिकत तथा संभावनाएँ िछपी पडी है। धन-समपित मनुषय की
सचची पूँजी नही है। किठनाइयो को चुनौती देकर उतसाहपूवरक आगे बढते रहना तथा कभी
न रकना पौरष का सौनदयर है। अपना दृढ िनशय, अदमय उतसाह धैयर और आतमिवशास
मनुषय को जगाने , चमकाने और कीितर देने के िलए एक अवसर होता है। किठनाइयो की
ही बाते सोचना और कहना न केवल कायरता है, बिलक किठनाइयो को अिधक किठन
बना देता है। मनुषय को किठनाइयो को महततव न देकर उतसाहपूवरक आगे बढने का पयत
करते रहना चािहए। जीवन मे बहुत कुछ खो जाने पर भी पुनः पारमभ करने के िलए बहुत
कुछ उतम बचा रहता है। यिद आतमिवशास और उतसाह की संजीवनी शेष है तो जीवन
का कटा हुआर वृक िफर से फूटकर उग आएगा। आशावान् एवं उतसाही मनुषय िवपित
आने पर िवनष नही होते तथा उनमे उठ खडा होकर और आगे बढकर गौरव पाने की
शिकत होती है। मनुषय किठनाइयो के मधय मे िगरते और उठते हुए तथा संभलकर आगे
बढते हुए अपने उतसाह, साहस और आतमिवशास को दृढ बना दोता है। अदमय उतसाह,
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साहस और आतमिवशास सफलता के मूल मनत है। किठन चुनौितयो को सवीकार आकर
वयिकततव को चमका देते है। अपने जीवन मे सवािधक महततवपूणर शिकतयो एवं कमताओं
को पहचानकर उनके अनुरप लकय िनधािरत करके उनकी पूितर के िलए िनरनतर आगे
बढते रहना िवकासोनमुख होकर जीवन के उदेशय को पूणर करना है। वासतव मे मनुषय के
िवचार और कमर ही उसकी पहचान होते है तथा धन-समपित, पदसता और संचय मनुषय
की पहचान नही हो सकते।
जजरर मन का पुनिनरमाण करने के िलए हमे पातः उठने पर तथा राित मे सोने से
पूवर शयया पर ही कुछ िमिनटो तक अपने सवासथय, उनित और उजजवल भिवषय की कलपना
करते हुए उतसाह, साहस और आतमिवशास को पितिषत करना चािहए तथा धैयरपूवरक आगे
बढते रहने का संकलप लेना चािहए। हमे अपनी शिकतयो से सफूितर तथा पूवरकाल की
सफलताओं से पेरणा लेकर जीवन मे कुछ शेष िदखाने का दृढ िनशय करना चािहए।
कटु आलोचना और िननदा से उतेिजत न होने का तथा बाधाओं से िवचिलत न होने का
वज संकलप लेना मनुषय को िवकासोनमुखी बना देता है ईशरीय शिकत का सहारा लेकर
तथा सतय,नयाय और पेम के मागर पर आरढ रहकर मनुषय शिकतशाली होता चला जाता
है। जो ईशरीय शिकत का सहारा लेकर आगे बढने का िनशय कर लेता है, उसे िकसी
अनय सहारे की आवशयकता नही रहती तथा वह सनतुलन, िसथरता, कमता और शािनत को
सुरिकत रख सकता है।
मनुषय के वयिकततव का िनमाण माता-िपता, पिरवार, गुर, िमतगण तथा समजा से
पापत संसकारो के आधार पर तो होता ही है िकनतु मनुषय को चािहए िक वह अपनी तकरशिकत के दारा चले और बुरे का भेद समझकर सवयं को उतम िशका दे तथा अपने
वयिकततव का नव-िनमाण सवयं करे। जान-संचय करना िशका नही होती, बिलक
अनतजागरण करना िशका होती है। मनुषय िववेकपूवरक आतमिनदेश देकर सवयं को शेष
िशका दे सकता है। वासतव मे मनुषय सवयं ही अपना शेष िशकक और पथ-पदशरक है।
मनुषय को बिहजरगत् मे जान और िशका का आदर करते हुए अपने भीतर अपना ही
पकाशदीप पजविलत करना चािहए जो बुिद को आलोिकत कर दे तथा अनेक जानीजन एवं
गुरजन का सममान करते हुए अपने भीतर ही गुर का दशरन करना चािहए जो सवरत और
सवरदा सुलभ है। कोई महान् जानी भी हमे कब तक सहारा दे सकता है? हमे दस
ू रो से
पेरणा और िशका लेकर सवयं िशका देनी चािहए तथा अपने िववेक का जागरण करना
चािहए। िववेक ही वह पकाश-दीप एवं कवच है जो हमे न केवल कटु आलोचना, िमथया
दोषारोपण तथा िनराधार िननदा के पभाव से सुरिकत करता है, बिलक अभद िवचारो,
िनराशा, अवसाद और कलेश से भी मुकत रखता है।
×
×
×
संसार मे पतयेक मनुषय का अपने वयिकततव के अनुशार अपना एक िभन केत होता
है तथा समान पतीत होते हुए भी सभी मनुषय संसकारो की पृषभूिम तथा सवाभाव, कमता,
िशका इतयािद के भेद के कारण िबलकुल िभन होते है। पकृित मे सवरत अननत िभनता है
तथा कोई भी दो मनुषय, दो पशु, दो पकी, दो वृक, दो पते, दो फल, दो पुषप पूणरतः समान
नही होते। मनुषयो मे बुिद-भेद के कारण यह पाकृितक िविभनता और भी अिधक पखर हो
जाती है तथा िकसी वयिकत की िकसी भी अनय वयिकत के साथ पूणर समानता कदािप नही
हो सकती। साधारणतः भी िकसी वयिकत की रिच पढने मे है और िकसी की रिच पयरटन,
खेल, संगीत, नृतय, िचतकाल, कावय सामािजक कायर, िशकण, िवजान, वकतृतव (भाषणकला), नेतृतव िचिकतसा इतयािद मे है। इन भेदो मे भी पभेद है जैसे सािहतय के केत मे
िकसी को धमर, दशरन आिद गभभीर िवषयो मे रिच है अथवा िकसी को उपनयास आिद गलप
मे तथा खेल के केत मे िकसीको िककेट पसनद है अथवा िकसी को हाकी। सभी के
मानिसक सतर, िवचार-सामगी, मानयताओं, मूलयो, अनुभवो, और जीवन-शैली (लाइफ
सटाइल) तथा सोचने, समझने और करने के तरीको मे भी िभनता होती है। गाम मे
अिशिकत जन के मधय मे जीवन-यापन करनेवाला बढई और लुहार अपने मानिसक
संसकारो की पृषभूिम के अनुसार ही सोचता और वयवहार करता है। एक िशिकत एवं
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सभय समाज मे पालन-पोषण और िशका-दीका पापत करने वाले वयिकत का िचनतन िबलकुल
िभन होता है। िशकक,िचिकतसक, सैिनक, िखलाडी, नेता, अिभनेता, शिमक अथवा वयापारी
की िचनतन-शैली िभन होती है िकनतु मनुषय के मानवीय गुण ही उसे मनुषय बनाते है।
वासतव मे वयिकततव मनुषय के गुणो और अवगुणो के समुचचय के आधार पर िनिमरत होता है
तथा मनुषय अपने वयिकततव के िनमाण के िलए पधानतः सवयं उतरदायी होता है।
िववेकशील पुरष बौिदक तथा भावनातमक पको के सामंजसय दारा सुगिठत
वयिकततव का िनमाण कर सकता है। उतम वयिकततव की पमुख िवशेषता संघषर -शिकत,
सवाधीनता, धैय,र सहनशीलता, मैतीभाव तथा कमा होते है। सतयिनषा और पेम उतम
वयिकततव के आधार होते है। सतय का उपसक िकसीका अनधानुकरण नही करता। वह
सब और से सतय के कणो का संचय करके तथा उनहे अपने अनुभव की कसौटी पर
परखकर आतमसात् कर लेता है। सतयिनष पुरष नयायशील होता है। सतय का उपासक
सभी के साथ पेम का नाता सथािपत करता है। वह िकसी को ऊँचा अथवा िकसीको नीचा
मानकर पेम-वयवहार मे भेद नही करता तथा सबके कलयाण की कामना करता है एवं
परोपकाररत रहता है। सतय, पेम और नयाय समसत सदगुणो के मूलभूत तततव है तथा
शाशत मानवीय मूलय है। इनसे िसंिचत होकर वयिकततव पुिषपत, पललिवत और सुरिभत
होता है तथा इनके अभाव मे शुषक, नीरस एवं जजरिरत हो जाता है।
मनुषय अपने वयिकततव के िनमाण के िलए सवयं उतरदायी है। उतम वयिकततव का
िनमाण करने से मनुषय को एक अनोखे ओज और पसनता का अनुभव होता है। यह एक
तथय है िक मनुषय अपनी संकलप-शिकत और आतमिवशास को जगाकर ही अपने वयिकततव
को सुगिठत कर सकता है। वासतव मे पसनता, सुख और शािनत कही बाहर से पापत नही
होते, बिलक अपने िचनतन, िवचार, कमर तथा जीवन-शैली के सहज पिरणाम होते है। अपने
भीतर पसनता जगाने से मनुषय के सब कषो का अनत हो जाता है तथा अवसाद िवलुपत
हो जाता है जैसे पकाश के उदय से ितिमरपुंज धवसत हो जाता है।
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िचनतन और धयान दारा भय, िचनता, िनराशा, आकोश, कलेश, वयाकुलता आिद का
शमन होने पर मनुषय को शािनत पापत हो जाती है। धयानवसथा मे परम शािनत का अनुभव
करने वाले वयिकत को िनरनत शानत रखने का अभयास हो जाता है। शानत रहने का
अभयास करनेवाले वयिकत को शूल भी ितनके जैसा ही पतीत होता है। वह बात-बात मे
नाराज नही होता तथा कमा के जल से मन की कटुता को सरलता से धो देता है। वह
अहंकार को उग नही होने देना तथा हेकडी करने को साहस नही मानता। दस
ू रा वयिकत
ठीक हो अथवा गलत, भडक उठने से तो मनुषय रकतचाप और िसर-ददर से पीिडत हो
जाता है तथा समसय को िवकट बना लेता है। हम शानत,संयत और सनतुिलत होकर ही
उिचत पग उठा सकते है, उतेिजत होकर नही।
शानत रहने का अभयास करने वाले वयिकत के मन मे िवचार सहज भाव से आते है
तथा उतेजना उतपन नही करते। उसे इचछाओं का वेग नही सताता तथा िचनता और भय
पीडा नही देते। दस
ू रो से सममान न िमलने पर उसके मन मे कोभ नही होता तथा देष और
घृणा नही जागते। दस
ू रो की दुषता देखकर उसकी पितिकया िववेकपूणर होती है, कोधपूणर
नही। वह अिधक नही बोलता तथा वाणी और वयवहार मे संयत रहता है। शािनत का
अभयास करने वाले वयिकत का मन कभी-कभी ठहरकर शािनत का अनुभव करता है।
शानत मन ही पसनता और सुख का पूणर अनुभव कर सकता है। शानत मन मे ही पसनता
की लहर बार-बार उठ सकती है। वासतव मे पसनता और शािनत का परसपर गहन
समबनध है। पसनता की पराकाषा अथवा पसनता का घनीभूत रप ही आननद है। आननद
शािनत के सागर का उजजवल रत है, शािनत के दुगधामृत का मधुर नवनीत है, पसनता की
शुिकत का सुनदर मोती है। मनुषय के अनतसतल मे आननद-सोत िनरनत बहता रहता है
िजसका संसपशर मनुषय को आननदपूिरत कर देता है। आननद शािनत के परे अथवा शािनत
की चरमावसथा है।
×
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उतम वयिकततव आकषरक एवं पभावी होता है। वयिकततव-िनमाण के साथ शरीर के
सवासथय का गहन समबनध है। शरीर और वसतो की सवचछता वयिकततव को सँवारती है।
मुखशोधन दारा मुख की दुगरिनध दरू करने का उपाय करना अतयनत आवशयक होता है।
वसत एवं वेशभूषा मनुषय के वयिकततव को मनोहारी बना देती है। मनुषय के सारे पसाधन
मधुर मुसकान के िबना फीके ही नही, भयावह पतीत होते है। िवनमता और मधुरता चिरत
को सुशोिभत कर देते है। उदारता एवं परोपकार-वृित वयिकत को लोकिपय बना देते है।
उनमुकत भाव से हँसना और हँसना वातावरण को सुरमय बना देता है। उनमुकत हँसी मनुषय
की पितरोधक कमता को बढा देती है तथा ऊजा को उतपन करती है। सतय, पेम, करणा,
मुिदता और मैती को पितिषत करने से वयिकततव उदािसत हो जाता है। िववेकशील पुरष
िवचार, वचन और वयवहार से अपने वयिकततव को सँवारने मे सदा पयतशील रहता है। एक
उतफुलल वयिकततव िखले हुए तथा सौरभ िबखेरते हुए पुषप की भाित उतमता का पेरक
होता है।
वयिकततव के िनमाण मे जहा एक ओर सतय पेम, करणा, मुिदता, मैती, साहस, धैय,र
नयाय आिद सदगुणओं एवं मानवीय मूलयो की पसथापना आवशयक है, वहा दस
ू री ओर
िवनमयता (लोच) होना भी अतयनत आवशयक होता है। पायः अनेक लोग िसदानतवादी
बनकर कठोर एवं दुरागही हो जाते है और अपने वयवहार से चारो ओर अनावशयक िवरोध
एवं शतुता का वातावरण उतपन कर लेते है। सतयागह के साथ पेमरस का पुट न होने पर
दुरागह हो जाता है। वयिकत का दुरागह समझौता इतयािद समाधान के दार बनद करके
लकय को ही परासत कर देता है। िसदानतो और िनयमो का उदेशय मानव-कलयाण होता है
िकनतु अनेक मनुषय पायः िसदानतवादी होने का अहंकार करे लगते है तथा अहंकार उनहे
िवनमय नही होने देता। अहंकार मे घृणाभाव अनतिनरिहत रहता है तथा अहंकारगसत वयिकत
दस
ू रो को तुचछ समझने लगता है। िववेकशील पुरष मे चािरितक दृढता के साथ िवनमयता
का सामंजसय होता है। यह एक िनिवरवाद तथय है िक मनुषय पिरवार और पडोस मे
सामंजसय सथािपत करके सवयं भी सामंजसय का पाठ सीख सकता है। पिरवार मे अभी
एक-दस
ू रे के सुख के िलए पयतशील रहकर, अनुशासन, तयाग और सेवा का आदशर पसतुत
करते है। परसपर पेम ही पिरवार मे सुरका और शािनत के वातावरण का िनमाण करता है।
सुगिठत संयुकत पिरवार सभी के िलए एक वरदान होता है। पािरवािरक जीवन वयिकततव मे
िवनमयता का समावेश कर देता है।
वयिकत-िनमाण मे िवनमयता के अितिरकत दस
ू रे के दृिषकोण को समझने की
उदारता, सहृदयता एवं सरनशीलता होना भी आवशयक होता है अनयथा मनुषय बात-बात मे
रष होने एवं िचढने लगता है। िचढने और िचढानेवाला मनुषय काम को िबगाड देने के
अितिरकत सवयं दुखी होकर दस
ू रो को दुखी कर देता है। िचढना और िचढाना भयंकर देष
है। िचढनेवाला वयिकत मूखर तथा िचढानेवाला वयिकत दुष होता है। बात-बात मे मन को
दुखी करनेवाला मनुषय जीवन मे न कोई ठोस उपलिबध कर सकता है और न कभी सुखी
रह सकता है। यह वयिकततव का वयावहािरक पक है।
ं रखना मनुषय के जीवन
पिरवार और पडोस की भाित िमतो के साथ सुमधुर संबध
मे सौखय एवं संबल का समावेश कर देता है। सवाथी एवं कपटी मनुषय की िमतता सहसा
िवलुपत हो जाती है तथा ईषयालुपत हो जाती है तथा ईषयालु एवं अकारण कोधी मनुषय के
साथ मैती िचरसथायी नही होती। सतय और पेम के तततव को समझनेवाले वर पुरष ही
ं का िनवाह कर सकते है। उदार सवभाववाले सिनमत
िमतता के पिवत संबध
फलचछायासमिनवत सुतर के सदृश सदा सुलभ एवं सुखद होते है।
वयिकत मे अभयास दारा आननद-वृित एवं आतममनगता के भाव का िवकास होने पर
वह िनरनतर पसन रहकर अनावशयक तनाव से मुकत रह सकता है। मनुषय कायरभार के
कारण पायः अित गंभीर रहकर वयथर ही जीवन को एक भार बना लेता है। पकृित मनुषय
को सदा सुपसन रहने का संदेश देती है। पुषपो के रस का आसवादन करता हुआ मदमत
भमर संगीतमय गुंजन करता है, उमंगभरा हिरण वन मे िचताकषरक चौकडी मारता है,
आननदमगन मयूर वन मे मनोहरी नृतय करता है, िवनोदकारी िसंहशावक भी कीडामय
िककोल करते है तथा असंखय पकी िवशाल वयोम मे उडते हुए मनोहरी कलरव करते है।
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×
×
×
जीवन एक अदुत याता है तथा बुिदमान मनुषय गंभीर दाियतव का िनवाह करते हुए एवं
संकटो का सामना करते हुए भी जीवन-याता को आननदमय बना सकता है। जीवन को
सुखमय अथवा दुःमय बनाना, मनुषय पर ही िनभरर है। वयिकत दस
ू रो को सुखी बनाने का
दाियतव तो अपने ऊपर नही ले सकता िकनतु वह सवयं आननदरंिजत रहकर दस
ू रो को
पेरणा अवशय दे सकता है। हा, गहन शोक के अवसर पर सहज रप मे पवािहत अशुधारा
भी शोक को धोकर मन को िनमरलता एवं शीतलता पदान करती है। कतरवय-भावना मनुषय
को भिवषयोनमुखी बनाकर एवं शोक को भुलाकर उसे मूल जीवनधारा से जोड देती है।
पकृित िनरनतर संदेश देती है—गितशील होकर कमर करने मे आननदरस की अनुभूित करो
और जीवन-पथ पर आगे बढो।
िववेकशील पुरष यह जानता है िक मनुषय की उतमता भोग से तयाग की ओर तथा
सवाथर से परमाथर की ओर बढने मे है। िचनतनशील पुरष िवकास के कम मे उचचावसथा
को पापत करते हुए, भौितक सुखो से ऊपर उठकर, बौिदक, नैितक, एवं आधयाितमक
आननद की ओर बढता रहता है। मनुषय को िवकास के अनुशार रिच मे पिरषकार तथा
िचनतन-शैली एवं जीवन और जगत् के पित दृिषकोण मे पिरवतरन सवतः होता रहता है।
वासतव मे वयिकत के िवकास एवं हास का कम िनरंतर चलता रहता है।
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यह एक महततवपूणर तथय है िक सृिष के समसत जीवधािरयो को अपने आिसततव की
सरंका के िलए संघषर करना पडता है तथा अनुकूलीकरण दारा योगयतम की उतरजीिवता
सुरिकत हो जाती है। पाकृितक वरण का यह िसदानत केवल पशु-पिकयो पर ही नही,
बिलक मानव-जाित पर भी पभावी होता है। यदिप पकृित संतान-उतपित की पचुर कमता
आिद देकर जीवन-रका मे सहायक होती है तथािप मनुषय िजजीिवषा एवं इचछा शिकत से ही
अिसततव-रका के संघषर मे सफल होता है।
मनुषयो मे अपने वयिकतगत अिसततव की संरका करने के अितिरकत पजाित-पिररकण
की सहज पवृित भी होती है िकनतु आधुिनक युग की याितक सभयता ने 'पगितवादी' मनुषय
को संवेदनहीन बनाकर ऐसी जडता उतपन कर दी है िक वह असभय आिदम मानव की
अपेका भी कही अिधक बबरर और कूर होकर न केवल मानव-जाित का ही, बिलक समसत
पािणजगत् का िवधवंस करने के िलए जान और िवजान का दुरपयोग कर रहा है। िनशय
ही कुछ थोडे से मदोदत राजनेताओं को लाखो वषों के घोर संघषर दारा िवकिसत मानवजीवन एवं सभयता को िवनष कर देने का अिधकार नही िदया जा सकता।
धनय है वे लोग जो जीवन की भवयता एवं गिरमा को समझकर तथा रचनातमक
दृिषकोण अपनाकर, सतय,पेम करणा ओर नयाय की पसथापना दारा सृिष की शीवृिद एवं
जीवन-धारा के पिररकण मे समिपरत भावना से जुटे हुए है। जीवन सृिष की शोभा है तथा
जीवन-समपदा की संरका एवं पोषण करना मानव का पावन कतरवय है। बुिदमािणडत मानव
िवकास-कम के चरमोतकषर का पतीक है तथा उसका उचचतम दाियतव, सवाथर और पमाथर
जीवन का पिररकण करना है। जीवन का पोषण एवं पिररकण सवोचच धमर है तथा उसका
पोषण एवं िवनाश घोर अधमर है। मनुषय की समसत मानयताओं, मूलयो और नैितकता की
कसौटी जीवन का सममान है।
मनुषय अपनी पचछन शिकतयो के उदीपन से आनतिरक ऊजा को िवकिसत कर
सकता है तथा जीवन के पतयेक केत मे अिधकतम उनित कर सकता है। पतयेक मनुषय
मे अपिरमेय मानिसक शिकतया होती है जो पायः दबी हुई पडी रह जाती है। मनुषय
ईशरपदत आनतिरक शिकतयो का सदुपयोग न करने के कारण दीन और दुःखी रहता है।
मनुषय आतमिनदेशन दारा अपनी पचछन शिकतयो को जगाकर न केवल सुखी हो सकता है,
बिलक आनतिरक ऊजा से अकलपनीय कायर भी कर सकता है। मनुषय अपनी िवलकण
शिकतयो को खोजकर तथा उनका सदुपयोग करके चमतकारपूणर कायर कर सकता है।
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×

60

संसार के मनुषय के मिसतषक से बढकर अनय कुछ भी जिटल एवं ऊजामय नही है।
मानव-मिसतषक मे िचनतन और अवधारणा की इकाइयो के रप मे परसपर जुडी हुई तथा
अतयिधक संवेदनशील लगभग दस-बारह अरब कोिशकाएँ है। पतयेक मिसतषक कोिशका
(नयूरोन) मनुषय के तंितका तंत (नवरस िससटम) की एक अतयनत सूकम इकाई होती है
िजसका जिटलता जिटलतम संकलप (कमपूटर ) की अपेका अननतगुणा िवलकण होती है।
पकृित की िवलकणता यह है िक कोई दो नयूरोन समान नही होते तथा पतयेक नयूरोन मे
लगभग दो करोड आर०एन०ए० अणु होते है िजनमे से पतयेक जीवरसायन के चमतकार से
एक लाख पकार के पोटीन बना सकता है। मिसतषक के असंखय नयूरोन मे से कुछ
पितिशत ही जागत् होकर सिकय रहते है तथा अिधकाश पायः सुपतावसथा मे ही रहते है।
कदािचत् धयानयोगी पसुपत नयुरोनो की संखया को जागत् करके असाधारण मानिसक ऊजा
उतपन कर लेते है। यिद सभी पसुपत नयूरोने को िकसी पकार जागत् करके सिकय कर
िदया जाए तो मानव अननत ऊजा का केनद बनकर अनेक सिकय कर िदया जाए तो मानव
अननत ऊजा का केनद बनकर अनेक अिचनतय कायर कर सकता है। जागत् नयूरोन िनरनत
असंखय ऊजा-तरंगो को उतपन एवमं उतसिजरत करते है। मानिसक ऊजा के भणडार ये
नयूरोन सूकम िचनतन, तकर-िवतकर, िनणरय इतयािद करने का िवलकण कायर करते है। नयूरोन
ने केवल ऊजा के सोत है, बिलक तरंगो के रप मे ऊजा का उतसजरन भी करते है तथा
िननतर सिकय रहकर मिसतषक को गितशील रखते है। मनुषय नयूरोनो के रहसय को
जानकर संसार का भी अपार िहत कर सकता है। भय, िचनता और तनाव से गसत होने
पर मनुषय अपने अपार शिकत-सोत पर अनावशयक बोझ डालकर अपना घोर अिहत करता
है। पकृित के महानतम चमतकार मिसतषक मे रोगो को दरू करने , दीघायु होने , समसयाओं
का समाधान करने तथा िवलकण कायर करने की कमता है िकनतु सवरपथम संकलप लेकर
धैयरपूवरक आनतिरक िवकास करने की आवशयकता है ।
मनुषय मानिसक शिकतयो के िवकास दारा पापत अनेक पकार की िसिदयो से तथा
िवश का कलयाण कर सकता है। िकनतु धन, सता, खयाित इतयािद के पलोभन मे फँसकर
उनके दुरपयोग दारा अपना पतन भी कर सकता है। अनेक लोग भगवान् अथवा िसद
पुरष बनने के लोभ मे युिकतपूणर ढंग से िविवध पकार के चमतकार-पदशरन एवं सममोहन
करके शदालुजन की पवंचना करते है तथा अनेक लोग कालाजाद ू आिद टोटको से
अनधिवशास को बढावा देते है। िववेकशील पुरष सूकम िनरीकण दारा लोगो की सािततवक
तथा तामािसक वृित को सुगमता से जान लेते है तथा वे िमथयाचार एवं अनधिवशास को
पोतसािहत नही करते। वासतव मे यह िवषय अतयनत रहसयपूणर है तथा िववेकशील पुरष
को मानिसक शिकत की िसिदयो के केत मे अतयनत सावधानतापूवरक पवेश करना चािहए।
हमे यह भी सपष समझ लेना चािहए िक सामानयतः संसार मे कमर का कोई िवकलप नही
है। यिद कोई रोगी है तो उसके िहत के िलए, िविधवत् िचिकतसा करते हुए, िवकिसत
मानिसक शिकत का भी सदुपयोग िकया जा सकता है। युद की आवशयकता होने पर
युदसथल मे जाकर युद करने का कोई िवकलप नही हो सकता। कमर का पिरतयाग
पतनकारक दोष है। इसी पिरपेकय मे मानिसक शिकतयो के िवकास पर िवचार करना
युिकतसंगत है। यथासंभव आंतिरक शिकतयो के उपयोग को कमर का िवकलप नही बनाना
चािहए।
मानिसक शिकतयो के अनेक पकार है तथा उनका िवकास करने की अनेक पिदित है।
मानिसक शिकत के िवकास की साधना मे सािततवकता, आतम-िवशास, धैय,र लगनशीलता
तथा दृढता की आवशयकता होती है। संशय िचत की एकागता को नष कर देता है। एक
संत पुरष अदर राित मे पूणर शाित के वातावरण मे जागकर चेतनाशिकत दारा दरू ानुभूितसंपेषण के माधयम से सुदरू देशो मे िसथत जीवन से िनराश लोगो की सफल िचिकतसा एवं
रोग-मुिकत करने के िलए पखयात है तथा असंखय लोग मात दरू ानुभूित से किठन रोगो से
सदा के िलए मुकत होने को पमािणत कर चुके है। रोगी से अपेका की जाती है िक वह भी
पूवरिनधािरत समय पर पाथरना करे जब वे पनदह िमिनट तक उसके िलए एकागिचत होकर,
संकलपबल-सिहत, उसका नाम लेते हुए पाथरना करे। वासतव मे केवल भौितक िचिकतसा
करना पयापत नही है कयोिक शरीर से बाहर सचेतन िवराट् तततव का अिसततव भी
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महततवपूणर है। मनुषय को आधयाितमक िचनतन एवं गहन धयान के दारा मन को िवशवयापी
िवराट् चेतना मे िवलीन करने से शारीिरक एवं मानिसक रोग से सथायी मुिकत हो जाती है।
शारीिरक एवं मानिसक वयािधयो का मूल कारण मन एवं इचचा की परतो मे होता है तथा
सतत िचनतन एवं गहन धयान दारा मन के िनमरलीकरण एवं इचछा के उदातीकरण पर बल
िदया जाता है। हमे जो मानिसक समसयाएँ जिटल और भयावह पतीत होती है, उनकी जडे
बहुत साधारण होती है तथा पे न दीखने के कारण ही किठन पतीत होती है। उनके तह
तक पहुँचने के िलए वैजािनक की भाित गहरी खोज तथा िचनतन करना आवशयक होता
है। मन की खोज करने से तथा मन की शिकत जगाने से मनुषय की सभी समसयाओं का
पूणर समाधान हो जाता है। मन की शिकत अपार और अननत है। अनेक धयानयोगी नेत
मूँदकर तथा धयानमगन होकर सपशर दारा रोिगयो के असाधय रोदो का पूणर उपचार कर देते
है। वासतव मे धयानावसथा मे िचत की एकागता होने पर उनके हाथो से एक िविचत ऊजा
का िविकरण होने लगता है तथा रोगी के शरीर और मिसतषक मे िवदुत तरंगे गितशील
होकर चमतकारपूणर कायर करती है। िवशुद आधयाितमक सनतजन मात सपशर, दृिष शबद
अथवा संकलप से अनय वयिकत के चेतना-सतर को ऊँचा उठाकर अकलपनीय शिकत को
जागत् कर देते है तथा इस शिकतपात की िकया दारा वयिकत िदवयता का अनुभव करता
है। सचचे सनत सवभाव से सरल और सािततवक होते है तथा वाणी मे अतत संयिमत होते
है। वे अपनी मानिसक ऊजा की तरंगो से िकसी वयिकत के थके हुए नयूरोनो को
आवेिशत(चाजर) करके पूणर मानिसक सवसथता पदान कर सकते है। अपनी ऊजा-तरंगो से
अनय वयिकत की ऊजा-तरंगो को जागत् िकया जा सकता है जैसे एक दीपक दस
ू रे दीपक
को पजविलत कर देता हरै। सनत पुरष अपने शुद िचत की एकागता दारा दस
ू रो मे चेतना
का पकाश जगाकर मन को सरलता से सवसथ कर देते है जैसे सशकत उतोलक नीचे
िगरी हईु िकसी भारी वसतु को उठाकर ऊँचे धरातल पर रख देता है। सशकत मन की
दुबरल मन पर असाधारण पभाव होता है। पतयेक मनुषय सवयं भी धयानयोग से अपने मन
को ऊँचे सतर तक उठा सकता है। मन के ऊपर उठते ही मन सवसथ, सम और शानत हो
जाता है। धयानयोग कलपवृक की भाित अनुपम, अदुत और अलौिकक है।
×
×
×
पतयेक मनुषय जाने -अनजाने अपनी उतम तथा अधम िवचार-तंरगो का िनरनतर
उतसजरन एवं संपेषण करता रहता है जो िकसी िवशेष वयिकत के पित एकागतदापूवरक
िनिदरष न होने के कारण वातावरण मे यत-तत पवािहत होकर अनय जन को पभािवत
करती रहती है तथा सजातीय (समान) िवचारोवाले िनकटसथ मनुषयो को िवशेषतः पभािवत
करती है। उतम िवचारो के पित गहणशील होने पर मनुषय के मन मे शेष पुरषो की शेष
िवचार-तंरगे सहज ही पिवष हो जाती है तथा उसे सशिकत एवं आननदमय कर देती है।
सतसंगित तथा कुसंगित का पभाव मानिसक तरंगो के कारण भी होता है। दरू सथ मनुषय
िनदेशानुसार (िवशेषतः पूवरिनधािरत समय) िकसी शेष पुरष के तरगङदैघयर (वेव लैगथ) पर
िवचार-संपेषण एवं आननद सनदेश का लाभ उठाकर न केवल अवसादमुकत बिलक
आननदिनमगन भी हो सकता है। हमारा िनगृहीत एवं एकाग मन इचछाशिकत के दारा पशुपिकयो और पौधो को भी संदेश दे सकता है। िनषकपट, सवसथ, मंगलकारी िवचार मे
अपिरिमत शिकत होती है।
िचत की एकागता, इचछा-शिकत एवं संकलप-शिकत का िवकास धैयरपूवरक अभयास करने से
संभव होता है। बीच को मधुर फल और फूल से युकत वृक मे पिरणत करने के िलए
अथक पिरशम एवं धैयर की आवशयकता होती है धैयर करना किठन होता है िकनतु उसके
फल मीठे होते है। एक बार शिकत और सफलता का मागर समझ लेने पर भी धैयरपूवरक उस
पर न चलनेवाला वयिकत िकसी अनय को दोष देने का अिधकारी नही है। जीवन मे सफल
और िवफल वयिकतयो के मधय मे इचछाशिकत का रेखाकन ही होता है। िचित की एकागता
एवं पबल इचछा-शिकत(संकलपबल) के िबना मनुषय जीवन के िकसी केत मे भी सफल नही
हो सकता। चंचल मन को िनयंितत एवं िनिवरकार करने के िलए धयानयोग शेष उपाय है।
धयानयोगी सनत का आकषरण चुमबकीय होता है तथा उसमे मन को पकािशत एवं पभािवत
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करने की अननत कमता होती हो। यह भी तथयातमक अनुभव चहो िक पबल आधयाितमक
शिकत को धारण करने वाले परम सनत के शरदापूकर समरण दारा उसके साथ मानिसक
समबनध हो जाने पर वयिकत की चेतना मे कलपनानीत िदवय शिकत का ततकाल अनुभव होने
लगता है। िजस पकार िवदुत् से आवेिशत पदाथर का समपकर होने पर दस
ू रे पदाथर मे
िवदुत का आवेश हो जाता है, उसी पकार आधयाितमक सनतो का समपकर करने से उनकी
शिकत का लाभ हमे पापत हो जाता है। पशानत मुदा मे िसथत िनमरल िचतवाले सनत के
दशरन मात एवं आशीवाद से ततकाल शािनत का अनुभव होना उनके दारा उतसिजरत ऊजातरंगो के पभाव का पिरमाण होता है। सतत िचनतन एवं गहन धयान के अभयासी तथा
इचछाओं को पूणर िनयंतण मे रखनवाले सुशानत सनतपुरष असाधारणान मानिसक शिकत एवं
इचछा-शिकत के धनी हो जाते है तथा वे िचत की एकागता दारा चमतकारपूणर कायर करने मे
समथर होते है। ऐसे सनत धमर, पिवत गनथ, समपदाय, भाषा, देश आिद की सीमाओं के
बनधन से सवरथा मुकत होते है तथा उनके िलए सभी मनुषय समानिपय होते है। ऐसे सनत
पुरष यश की इचचा तथा पलोभनो के पभाव से सवरथा मुकत होते है। समसत पािणयो का
िहत-िचनतन एवं िहत-समपादन करना उनका सहज सवभाव होता है। वे न कही भवय
आशम बनाते है, न उनकी कोई गदी होती है और न वे चेलो के जाल ही बुनते है।
मानिसक ऊजा िनशय ही याितक ऊजा की अपेका कही अिधक शिकतशाली होती
है। मानिसक ऊजा िवदुत तरंगो को भी उतपन एवं उदीपत कर सकती है। मानिसक
ऊजा की तरंगो को दारा सहसो मील दरू िसथत वयिकत को िवचारो का संपेषण िकया जा
सकता है साधारणतः भी िवचार-संपेषण दारा माता-िपता, भाई-बहन, पित-पती, िमत आिद
के पेमपूणर समरण का आभास दरू िसथत वयिकत को ततकाल हो जाता है। योिगयो दारा
दरू सथ वयिकतयो को रहसयमय ऊजा-तरंगो के कणो से अपनी आकृित का आभास करा
देने का रहसय तथा िसंह आिद के रप मे पकट हो जाने का रहसय कदािचत् ित-आयामी
पकेपण मे िनिहत है। आनतिरक शिकत के िवकास मे मौन एवं मंत-जप का भी िवशेष सथान
है िकंतु मंत-जब की सफलता मंत-शिकत मे िवशास रखना होता है।िजस पकार एक चतुर
महावत शैतान हाथी को सूँड से सँभाले रखने के िलए एक डंडा देकर उसे इधर-उधर
तोड-फोड करने से रोक देता है,उसी पकार एक चतुर मनुषय िनरनतर मंत-जप से अपने
चंचल मन को संयत कर लेता है।
मनुषय िचत की एकागता के अभयास दारा अपनी समरण-शिकत को भी
आशयरजनक बना सकता है। कभी-कभी गमभीर िवषयो पर िचत का एकाग करने से कुछ
सामानय बातो की भूल हो जाती है तथा मनुषय सवयं को भुलकड समझकर अपने ऊपर
तरस खाने लगता है। अितवयसतता के कारण अथवा मन के अनयत केिनदत होने के
कारण सामानय बातो का िवसमरण हो जाना सवाभािवक है। अनेक बार मनुषय चाबी,पसर,
आभूषण, पुसतक इतयािद कही रखकर भूल जाता है तथा वह िकसी सेवक इतयािद अनय
वयिकत पर सनदेह करने लगता है। बहुत समय तक वसतु के न िमलने पर वह सवयं को
वयथर भुलकड कहकर कुिपत हो जाता है। अनेक महान् वैजािनको, िवदानो एवं महापुरषो
की भयंकर भूलो के समबनध मे िविवध पकार की दनतकथाएँ पचिलत है। पकृित का ऐसा
िवधान है िक मनुषय का अचेतन मिसतषक कभी िनिषकय नही रहता तथा सदैव मनुषय की
समसयाओं का समाधान करने मे सिकय रहता है। जब अचेतन मन खोई वसतु के समबनध
मे खोज कर लेता है तब वह सहसा अपने िनणरय का संपेषण चेतन मन को कर देता है।
समरण-शिकत के िवकास को िविशष िकयाओं के अभयास दारा समरण-शिकत के
आशचयरजनक चमतकार िकए जा सकते है।
×
×
×
जीवन का अमृत एवं जीवन का मूलसोत मनुषय के भीतर ही है। मनुषय के भीतर संिसथत
अमृत-कुणड ही मनुषय के अिसततव का आधार एवं केनद है। मनुषय िचनतन के दारा मनथन
करके और धयान-पिकया के दारा भीतर और बाहर की चेतनातमक एकता िसद हो जाती है
तथा चेतना का धरातल ऊँचा हो जाने पर मनुषय भय, िचनता, तनाव, कोप, शोक, दःु ख
आिद से ऊपर उठ जाता है। भय मनुषय का सबसे बडा शतु है तथा वह सतय,पेम और
शािनत की उपलिबध का पमुख बाधक है। मृतयु और िवनाश का भय दरू होने पर समसत
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भय दरू हो जाता है। मनुषय अपने भीतर िसथत अमृत-कुणड का साकातकार करके मृतयु
एवं िवनाश के भय से अथात् समसत भय से सदा के िलए मुकत हो जाता है। पायः लोग
भयवश िवश की चैतनय सता के तता अपने भीतर ईशरीय शिकत के आिसततव को सवीकार
तो कर लेते है िकनतु न उसकी खोज करते है और न उसकी पािपत का पयत करते है।
धयान मनुषय के अिसततव, अमृततव एवं आननद की अनुभूित के मागर की अनतमुरखी याता
है। मनुषय को धयान दारा धैयरपूवरक अपने भीतर आननद की एवं ऊजा के सोत की खोज
मे, उसकी अनुभूित होने तक, अनतयाता करते ही रहना चािहए। मन के िवगिलत होने पर
अथवा मन से परे चले जाने पर मनुषय को अननत आननद एवं ऊजा की सूकम अनुभूित
होती है तथा अपने िदवय सवरप का साकातकार हो जाता है।
धयान की असंखय पिकया है तथा सभी महततवपूणर है। धयान से पूवर अलप भिकतसंगीत की भूिमका भी उपयोगी होती है। धयान मे मन की चंचलता को िनयिनतत करने के
िलए बाह आलमबन का सहारा नही िलया जाता। धयान दारा अभद संसकारो को उखाड
िदया जाता है और नये संसकार नही बनने िदए जाते। मनुषय राग-देष से मुकत हो जाता है
तथा अननत पेम एवं करणा से पिरपूणर हो जाता है। मन का िनमरलीकरण ही मन का
उदातीकरण है। िनमरल एवं उदात होने पर बाधक मन साधक हो जाता है तथा मनुषय
खोए हुए आननद को पापत कर लेता है।
िनशय ही तातकािलक एवं सथायी शािनत और िसथरता पापत करने के िलए धयान दारा अपने
भीतर संिसथत आननद के अमृतमय सोत से जुडना ही सवरशेष उपाय है। मनुषय धयान की
साधना दारा अपने भीतर पचछन िदवय सता एवं िदवय चेतना के साथ संयुकत होकर सहज
ही भय और शोक को पार कर लेता है तथा अननत आननद मे संिसथत हो जाता है। धयान
का सचचा साधक िबनदु मे िसनधु के दशरन एवं पूणरता की सूकम अनुभूित करके कृतकृतय हो
जाता है। लकय के सपष होने पर, भटकता छोडकर, संकलपपूवरक मागर पर चलते रहने
और धैयरपूवरक आगे बढते रहने की आवशयकता होती है। धयान ही आधयाितमक उपलिबधयो
का पमुख एवं शेष साधन है।
मनुषय के मन मे िवचारो तथा उदेगो की िकया एवं पितिकया मनुषय के सुख एवं
दुःख के िलए उतरदायी होती है। िवचार ही भय कोध, शोक, हषर आिद उदेगो को उतपन
करते है तथा उनहे िनयनतण मे भी रख सकते है। िकनतु जब उदेग पबल हो जाते है, वे
िवचारो को ही पभािवत करने लगते है और अशािनत उतपन कर देते है। धयान का अभयास
करने पर उदेगो की तीवरता एवं वेग धीरे-धीरे कीण होकर लुपत हो जाते है तथा िवचार ही
उदेगो को िनयंिनतत करने लगते है। िवचारो दारा उदेगो का िनयंतण होना ही आतमिनयनतण होता है आतम-िनयंतण होने से आतमिवशास बढ जाता है तथा शािनत का अनुभव
सुलभ हो जाता है धयान का अभयास होने पर मनुषय को िननदा और आलोजना की चुभन
नही होती तथा वह दनद से ऊपर उठ जाता है।
मनुषय का मिसतषक सवाभािवक रप से िनरनतर सिकय रहता है। कभी-कभी िवचार सहसा
भीड उमडकर ऊपर आते है तथा वे न केवल बेतुके होते है, बिलक परसपर िबलकुल
असंबद भी होते है। वे पितसपधा मे संलगन धावको की भाित झपटपर तेजी से एक-दस
ू रे
से आगे बढते हुए िनरथरक हलचल उतपन कर देते है। अनेक िवचार पारमभ होते ही
िवलुपत हो जाते है तथा अनेक िवचार िसथर होकर देर तक सामने बने ही रहते है। कभीकभी िवचार बहुत धीरे से आते है। पायः मनुषय के लेटने पर, िवशेषतः िनदालुता का
अवसथा मे, चेतना-सतर पर िसथत सचेतक के िनिषकय हो जाने के कारण अतयनत
िनरथरक, अधूरे, टू ट-े फूटे और असंबद िवचार आने लगते है तथा कभी-कभी िनदालुता के
सहसा भंग होने पर वे अपनी िविचतता के कारण मनुषय को चौका देते है। मनुषय जागत्अवसथा से सवप-अवसथा मे सहसा नही जाता तथा अदर-जागत्-अवसथा मे ही सवपो की
िचत-िविचतता का पारमभ हो जाता है। िकनतु वासतव मे अनतमरन की पतयेक हलचल
पचछन रप से सवासथयपद होती है।
मनुषय का मन एक समुद की भाित होता है िजसमे ऊपर के सतर पर लहरो की
िनरनतर सिकयता रहती है तथा नीचे गहरे सतर पर गमभीर शाित होती है। धयान के
अभयास से मनुषय का मन चेतन तथा अचेतन से परे शुद चेतन का गमभीर दैवी शाित का
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संसपशर करके शात रहना सीख लेता है तथा भय, हषर, शोक, कोध आिद उदेग उसे
िवचिलत नही कर पाते। मनुषय के िलए मानिसक शाित हेतु समसयाओं से दरू हटकर कुछ
अनय रचनातमक िचनतन करना, धयान का अभयास करना, रिचपद मनोरंजन करना तथा
उपयोगी कायर मे वयसत होना आवशयक होता है। धयान के दारा अमृत के आसवादन के पित
उतकट लालसा उदीपत हो जाती है ।
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यह एक िवडमबना है िक मनुषय पायः पौढ होने पर सृिष के पित संवेदनहीन हो जाता है।
तथा मोह-जाल मे फँसकर जीवन का वासतिवक सुख ही खो बैठता है। पौढ होकर मनुषय
पायः भय, िचनता और तनाव से गसत हो जाता है और बाल-सुलभ सरलता, कीडा, उतसाह
और उललास को भूलकर कलह और अशािनत मोल ले लेता है। पौढ मनुषय कभी-कभी
मोहवश कतरवय का िनशय नही कर पाता। ममता और भावना की कतरवय-िनषा से
टकराहट होने पर कतरवय को ही ऊँचा रखना चािहए। यिद मनुषय तटसथ दषा के रप मे
अपने मन की गितिविध को देखना सीख ले तो अनावशयक संघषर समापत हो सकता है और
कमर मे संघषर-वृित के सथान पर सहजता आ जाती है। मनुषय पायः पौढ होकर बीते हुए
कल की भूलो पर पछतावा करता रहता है अथवा आनेवाले कल की िचनता मे फँसा रहता
है। वतरमान ही सतय है। भूत काल का अिसततव ही नही है। वह िवनष हो चुका है , एक
िमथया सवप है। भूतकाल की भूलो और दुःखो का समरण करके उनमे जीना सवप मे जीना
है। भिवषय का अभी जनम ही नही हुआ। अतीत के संसकारो के बनधन से मुकत होकर
तथा भिवषय की िचनता और भय छोडकर वतरमान मे जीना और वतरमान को आननदमय
बनाना िववेक है।
हम िकसी एकानत तथा नीरव सथल मे िबलकुल शानत होकर सीधे बैठे तथा मन के
िकया-कलाप का तटसथ भाव से िनरीकण करे। हमारा मन एक िवचार से दस
ू रे िवचार
तक अथवा एक उदेग से दस
ू रे उदेग तक तेजी से छलाग लगाता है। कभी-कभी तो मन
मे िवचारो की भीड और उनकी तीवर उथल-पुथल मन को वयाकुल कर देती है। तटसथ
िनरीकण के समय हम सजग होकर, शानत भाव से, िवचारो को अिलपत होकर ऐसे ही
देखते रहे जैसे कोई मनुषय नदी के तट पर िसथत होकर नदी मे बहते हुए जल को देखता
है। िजस पकार नदी मे मछली, काष इतयािद बहते रहते है िकनतु जल का पवाह चलता
रहता है, उसी पकार मन मे भी अनेक भले-बुरे िवचार आते रहते है िकनतु मन िनरनतर
गितशील रहता है। मन की गितशीलता उतम िदशा पाकर, िवचारो को पिरषकृत करके मन
को सवासथय पदान करती है। हमारे मन की वयाकुलता भी धनय है यिद वह िचनतन को
जागत् करके, हमे िदशाबोध देकर, हमारे भीतर सृजनातमकता को उतपन कर दे। मन का
तटसथ िनरीकण तथा िचनतन धयान की महततवपूणर भूिमका होती है।
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मनुषय सवभाव से सुख चाहता है िकंतु िववेकहीनता के कारण दुःख की अँिधयारी
गिलयो मे भटक जाता है। िचंतन मनुषय के मन को जागत् कर देता है , धयान मन को
उतेजना से मुकत करके शानत, सम और सुिसथर कर देता है तथा आननद-भाव मनुषय को
सवतःसफूतर अकय उमंग से भर देता है जो िकसी बाह आलमबन पर िनभरर नही होता।
आननद-भाव के सफूतर होने पर मन भय, िचनता, तनाव, घृणा, कोध, अवसाद और शोक से
सवरथा मुकत होकर, ऊजरिसवता और ओज तथा अदमय साहस और उतसाह से भर जाता
है। आननद-भाव मनुषय की चेतना को िनमरल एवं िदवय बना देता है। आननद-भाव की
अनुभूित होने पर मनुषय जीवन और जगत् के रहसय को जान लेता है।
जीवन का पतयेक िदन एक उतसव है। िदवयता के पथ पर चलते हुए मनुषय
िनतानत िनभरय एवं अनतःसफूतर सहज उललास से भरकर सृिष के कण-कण मे सतयं िशवं
सुनदरम् का दशरन करने लगता है तथा अपने भीतर ही पूणरता की अनुभूित करके कृताथर
हो जाता है। सतय और पेम की पसथापना होने से तथा साहस और उतसाह का समावेश
होने से जीवन उमंग से भर जाता है। इस शबदातीत उमंग के पृष मे होती है सतय और
पेम, अभय और उतसाह िववेक और कमर तथा िचनतन और धयान की साधना की गाथा।
उमंगभरा अथवा आननदमय जीवन ही जीवन है, वह सबके िलए सुलभ है तथा उसे पाने के
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िलए अभी देर नही हुई है। जब जागे तभी सवेरा। जागरण होते ही सविणरम पभात की
िदवयता का दशरन हमे गहन तृिपत देकर कृतकृतय कर देगा। जागो, उठो और आगे बढो।

आआआआ-आआआआआआ
मैने जीवन के महतव को समझ िलया है। जीवन सृिष की सवरशेष िनिध है। जीवन मे
अननत सौनदयर है। जीवन एक अनूठा वरदान है। जीवन को सममान देना, जीवन की
संरका करना, जीवन का सबसे बडा मूलय है तथा सवोचच धमर है।
जीवन मेरे सामने िजस रप मे भी आएगा, मै उसका सवागत करँगा, अपे कतरवय
एवं दाियतव का िनवाह करँगा तथा पलायन नही करँगा। जीवन अपने िलए तथा समाज
के िलए बहुत कुछ महततवपूणर करने का एक अवसर है। मै जीवन को सँवारने मे अपनी
शिकत का पूरा सदुपयोग करँगा। संसार को सुधारने की पिकया का पारमभ सवयं के
सुधारने से हरी होता है।
सतय और पेम ही जीवन को साथरक बना सकते है तथा सतय और पेम ही धरती
को सवगर बना सकते है। मै अपने जीवन मे यथासंभव सतय और पेम की पसथापना करँगा
तथा मतानधता, संकीणरता और िवदेष को िनमूरल कर दँग
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मनुषय अपने भागय का िनमाता सवयं है। मनुषय कमर करने मे सवतनत है। कमर सफलता
का दार खोल देता है। मनुषय अपने सुख-दु :ख के िलए सवयं ही उतरदायी है। हम जैसा
िचनतन करते है, वैसा ही हमारा मन बनता है तथा वैसे ही हम हो जाते है। हम जैसा कमर
करते है वैसा ही हमारा भिवषय बन जाता है। हम अपने िवचार और कमर से भिवषय का
िनमाण करते है।
मै अतीत के बनधन से मुकत हो रहा हूं। मनुषय बनधन-मुकत होकर ही जीवन के
सौदयर का मुकत-दशरन कर सकता है तथा जीवन मे आगे बढ सकता है। मैने वतरमान मे
जीना सीख िलया है। केवल वतरमान ही सतय है। भूतकाल का तो अिसततव ही नही है, वह
सपपमात है। भिवषय का अभी िनमाण हा रहा है तथा उसकी िचनता करना अिववेक है।
भूतकाल की भूलो पर पछताव करते ही रहना, भूतकाल के दु :खो का समरण करके अपने
भीतर घुलते ही रहना तथा भिवषय की िचनता होना पुनजरनम एंव नवजीवन का पारमभ है।
पकाश की ओर उनमुख होने पर भी अतीत के अनधकार का समरण करते रहना अिववेक
है। अतीत के बनधन से मुकत होने का अथर है अतीत को अिसततवहीन और िमथया मानकर
उससे भावातमक् समबनध न मानना तथा उसके गितरोधक कुपभाव से मुकत रहना।
बहुत कुछ खोने के बाद भी, पुन: पारमभ कर देने के िलए बहुत कुछ शेष बचा है।
यिद चेतना शेष है तथा आशा और उतसाह की संजीवनी शेष है तो कटा हुआ जीवन-वृक
िफर से फूटकर उग आएगा। उतम पुरष िवपित आने पर िवनष नही होते तथा अपनी
पबल-शिकत से नवचेतना एंव नवजीवन का संचार कर लेते है। िववेकशील पुरष िगर जाने
पर गेद की भाित पतयेक बार उठ जाते है तथा मूखर जन िमटी के ढेले की भाित िगरकर
पडे रह जाते है।
मैने समझ िलया है िक भय एक िमथया कलपना है। हमने िकसी अबोध अवसथा मे
सवये ही भय की काली चादर को ओढा है। हम सवयं ही उसे कणभर मे अभी उताकर
फेक सकते है। पाय: सभी िकसी न िकसी भय से गसत होते है िकनतु यह समझ पाते िक
भय मात दरू कर सकते है। जान की अिगन अजान और मन के पुराने संसकारो को भसम
कर देती है तथा िववेक काक पकाश भय के अंधकार को नष कर देता है। भय िचनता
और शोक मानव की िनयित नही है। िववेक, साहस और धैयर हमारे शेष िमत है।
आननदमय रहना मनुषय का नैसिगरक सवभाव है। आननदमय होना हमारा जनमजात
अिधकार है। अपने भीतर िनरनतर आननद-भाव को जगाकर अभयास दारा सीख िलया है।
हम वयथर ही सवयं को दु :ख देते है। िकसी भी पिरिसथित से घबरा जाना अिववेक है। हमे
घबराकर नही, समझदारी से काम लेना चािहए। हमे डरकर नही, िहममत से काम लेना
चािहए। घबराहट, डर और जलदबाजी से काम िबगड जाते है और हमारा सवरप धूिमल हो
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जाता है। हमे िकसी भी पिरिसथित मे हार न मानकर तथा िनराशा छोडकर, आशापूवरक
आगे बढना चािहए।
मैने अपने जीवन का महतव समझ िलया है। मै संसार का एक महतवपूणर वयिकत हूं। मै
पहले की अपेका अब कही अिधक सम, िसथर और शानत हूं। मेरी इचछा-शिकत दृढ हो गई
है। मै िननदा और आलोचना से उतेिजत नही होता। मै अपनी तुलना िकसी भी अनय से
नही करता। मै दस
ू रो के समान होकर भी उनसे बहुत िभन हूं। मैने साहस और उतसाह
से आगे बढना सीख िलया है, मै िनरनतर आगे बढ रहा हूं।
मैने अपने लकय को िनधािररत कर िलया है तथा अपना रासता भी खोज िलया है।
मैने लकय की ओर बढते रहने का संकलप िलया है। मै अपनी समसयाओं का समाधान
िववेक तथा धैयर से सवयं कर लूंगा। मेरे भीतर अदभुत ईशरीय-शिकत का अननत भणडार
िछपा पडा है, िजसे मैने देख िलया है। मेरी दुगरित नही को सकती। मेरे मन मे जीवन की
ऊचाइयो को छू ने के अरमान है। मुझे लगनपूवरक महतवपूणर एंव उपयोगी कायर मे वयसत
रहकर, अपने जीवन मे बहुत कुछ पापत करना है। मेरा भिवषय उजजवल है। मेरा मन उंमग
से भरा हुआ है।
मैने समझ िलया है िक मनुषय दस
ू रो को शािनत और सुख देकर ही शािनत और
सुख पापत कर सकता है। दस
ू रो की शािनत और सुख छीनकर, मनुषय अपने ही शािनत
और सुख को खो देता है। मनुषय को धन और समपित सुख नही देते, बिलक अपने िवचार
और आचरण सुख देते है। भोग से तयाग की ओर, सवाथर से परमाथर की ओर, शोषण से
सेवा की ओर, संकीणरता से उदारता की ओर, असतय से सतय की ओर, धृणा से पेम की
ओर, कठोरता से करणा की ओर तथा लघुता से िवशालता की ओर बढना, वयापक होकर
िबनदु से िसनधु हो जाना है तथा कृताथर हो जाना है।
सतय और पेम की पसथापना होने पर तथा अपने भीतर ईशरीय सता के साथ जुड
जाने पर, मनुषय अिवचल शािनत, अकलपनीय शिकत और अखणड को पापत कर लेता है।
वे वनदनीय है, वे महातमा है, वे धनय है तथा उनका यश इस संसार मे िसथर है
िजनहोने पकाश-दीप बनकर लोक को आलोिकत िकया।
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