कािलदास का काल तथा उनक वै दक धारणाय

-अ ण कु मार उपा याय, बी-९, सीबी-९, कै टोनमे ट रोड, कटक-७५३००१
१. भूिमका- यहां कािलदास के काल म कई ाि तयां ह। मु य है क ३ कािलदास थे तथा दो अ य भी थे िजनका उपनाम
कािलदास था। दू सरी यह क भारतीय इितहास को न करने के िलये अं ेज ने मौयकाल को १३०० वष पीछे कर उसे िसक दर
के आ मण से जोड़ दया। इसके िलये उ ह ने उन सभी राजा को का पिनक माना िज ह ने अपना शक आर भ कया था। इसी
कार वेद के अथ म भी कई िववाद ह। कौ स के अनुसार तो वेद म
के स देह कये ह, िजनका समाधान िन
इसका समाधान मनु मृित म है-

िनरथक ही ह (िन

१/१५) कौ स ने वेदाथ म ७ कार

म है। इनके अनुकरण म कई पा ा य समथक वेद म

ा ने वेद श द के आधार पर अलग-अलग सं थाय बनाय । िन

का मनमाना अथ करते ह।
म श द के ४

ोत ह-

नाम, आ यात, उपसग, िनपाततद् यािन च वा र पदजातािन नामा याते चोपसग िनपाता

तानीमािन भवि त। (िन

इतीमािन च वा र पदजाता यनु ा तािन। नामा याते चोपसग-िनपाता
यहां िनपात क उपमा अथ म

(िन

१/१)

१/१२)

ा या है-अथ िनपाता उ ावचे वथषु िनपति त। अ पमाथ। अिपकम पसं हाथः। अिप

पादपूरणः। तेषामेते च वार उपमाथ भवि त॥ (िन

१/४)

सवषां तु स नामािन कमािण च पृथक् पृथक् । वेद श दे य एवादौ पृथक् सं था

िनममे॥(मनु मृित १/२१)

या स सं था या एवैता स हो ाः ाचीवषट् कु वि त ता एव ताः। (जैिमनीय ा ण उपिनषद् १/२१/४)
छ दांिस वाऽअ य स धाम ि यािण । स योनी रित िचितरेतदाह ।
(शतपथ ा ण ९/२/३/४४, यजु १७/७९)
इन सं था

का मु य िवभाजन है-आिधभौितक (पृ वी पर) श द मूल थे। इनके सम प अथ ह-आ ददैिवक (आकाश म,

योितषीय, दैवी), आ याि मक (शरीर के भीतर-योग, आयुवद)। आिधभौितक के ५ कार ह-िलिप (६ कार के दशन के समान
६ दश-वाक् या िलिप), भाषा (एक ही िलिप कई भाषा
ोत तथा ७ सं था

ारा यु ), िव ान के िवषय, इितहास या पर परा तथा भूगोल। ४

के कारण ४ x ७ = २८ कार के श द ह, इतने ही कार क बुि

कही गयी है, जो वा य ारा कट

होती है।
अ या ममिधभूतमिधदैवं च (त व समास ७)
क तद्
अ रं

कम या मं क कम पु षो म। अिधभूतं च क ो मिधदैवं कमु यते॥१॥
परमं वभावोऽ या म उ यते। भूतभावो व करो िवसगः कम संि तः॥३॥

अिधभूतं रो भावः पु ष यािधदैवतम्। (गीता, अ याय ८)
अ ा वशितधा अशि ः (त व-समास, १३) अशि र ा वशितधा (सां य सू ३/२८)
िव क कोई ऐसी भाषा नह है िजस म श द के अथ संग के अनुसार नही बदलते। िव ान के िवषय के अनुसार भी श द क
प रभाषा बदलती है। इन संशा का ७ लोक या छ द के अनुसार ७ कार से िवभाजन कया गया है। भाषा के मूल नाम
भौितक व तु

के थे। उसी के अनु प आकाश के तथा आ त रक (शरीर के भीतर) व तु

के नाम रखे गये। अतः आकाश के

(दैव) अथ भौितक अथ के ही अनु प ह। कािलदास ने दैव अथ क भौितक अथ से कई कार से समानता दखायी है, अतः
उनक उपमा े कही जाती हैउपमा कािलदास य भारवेरथ-गौरवम्। दि डनः पद-लािल यं माघे सि त यो गुणाः॥
२. किलयुग क वष गणनाय- (१) युिधि र शक १७-१२-३१३९ ईसा पूव, उसके ५ दन बाद उ रायण के आर भ के दन
भी म िपतामह ने देह याग कया। ३६ वष शासन के बाद १७-२-३१०२ ईसा पूव को भगवान्

ीकृ ण ने देह याग कया उस

दन किलयुग का आर भ आ। उसके २५ वष बाद युिधि र ने देह याग कया तब क मीर म लौ कक वष आर भ आ-

कलैगतैः सायकने (२५) वषः युिधि रा ाः ि दवं याताः।
(राजतरि गणी-यह ोक बु लर ने हटा कर महाभारत को किल वष ६५३ म कर दया)
प स ित वषािण ाक् कलेः स ते ि जाः। मघाखासन् महाराजे शास युव युिधि रे॥
प वशित वषषु गते वथ कलौ युगे। समा िय य या ेषां मुनय ते शतं समाः॥
तदैव धमपु ोऽिप महा थानमाि थतः। भुवं प र म

ते वगमारो यित ुवम्॥ (किलयुग राजवृ ा त ३/३)

(२) जैन युिधि र शक २६३४ ईसा पूव (िजनिवजय महाका )-यह पा नाथ के सं यास या िनवाण क ितिथ है। उनका पूवा म
का नाम युिधि र हो सकता है या उनको युिधि र जैसा धमराज माना गया है। युिधि र क ८ व पीढ़ी म िनच ु के शासन म
हि तनापुर डू ब गया था- यह सर वती नदी के सूखने का प रणाम था। उस समय १०० वष क अनावृि कही गयी है जब दु भ
रोकने के िलये शता ी या शाक भरी अवतार आ।
दु गा-स शती (११/४६-४९)भूय शतवा ष यामनावृ ामन भिस। मुिनिभः सं तुता भूमौ स भिव या ययोिनजा॥४६॥
ततः शतेन ने ाणां िनरीि यािम य मुनीन्। क तिय यि त मनुजाः शता ीिमित मां ततः॥४७॥
ततोऽहमिखलं लोकमा मदेहसमु वैः। भ र यािम सुराः शाकै रावृ े ः ाणधारकै ः॥४८॥
शाक भरीित िव या त तदा या या यहं भुिव। त ैव च विध यािम दु गमा यं महासुरम्॥४९॥
िव णु पुराण (४/२१)-अतः परं भिव यानहं भूपाला क तिय यािम॥१॥ योऽयं सा तमवनीपितः परीि
ुतसेनो- सेन-भीमसेन
कृ पाद ा यवा य

यािप जनमेजय-

वारः पु ाः भिव यि त॥२॥ जनमेजय यािप शतानीको भिव यित॥३॥ योऽसौ या व या े दमधी य

िवषम-िवषय-िवर -िच वृि

शौनकोपदेशादा म- ान- वीणः

परं

िनवाणमवा यित॥४॥

शतानीकाद मेधद ो भिवता॥५॥ त माद यिधसीमकृ णः॥६॥ अिधसीमकृ णाि च ुः॥७॥ यो ग गयाप ते हि तनापुरे
कौशा यां िनव यित॥८॥
उसक दो पीढ़ी बाद वाराणसी के राजप रवार म पा नाथ जी का ज म आ। दु भ म कई वै ािनक तथा अ य शा न हो
गये।
(३) िस ाथ बु - २७ -३-१८८७ ईसा पूव,
(४) न द शक-१६३४ ईसा पूव-परीि त के ज म से १५०४ (१५००) वष बाद िजसे पा जटर तथा िविलयम जो स ने १०५०
वष कर दया।
िव णुपुराण (४/२४/१०४)-यावत् परीि तो ज म यावत् न दािभषेचनम्। एतद् वषसह ं तु ेयं प शतो रम्॥
(५) शू क शक - ७५६ ईसा पूव- का चुय लाय भ - योितष दपण-प क २२ (अनूप सं कृ त लाइ ेरी, अजमेर एम्.एस नं
४६७७)-बाणाि ध गुणद ोना (२३४५) शू का दा कलेगताः॥७१॥ गुणाि ध

ोम रामोना (३०४३) िव मा दा कलेगताः॥ इस

समय असुर (असी रया के नबोनासर आ द) आ मण को रोकने के िलये ४ मुख राजवंश का संघ आबू पवत पर िव णु अवतार
बु

ेरणा से बना। इन राजा

को अ णी होने के कारण अि वंशी कहा गया-परमार, ितहार, चालु य तथा चाहमान।

भिव य पुराण, ितसग पव (१/६)एति म ेवकाले तु का यकु जो ि जो मः। अबुदं िशखरं ा य
होममथाकरोत्॥४५॥
वेदम
भावा जाता वा र ि याः। मर सामवेदी च चपहािनयजु वदः॥४६॥
ि वेदी च तथा शु लोऽथवा स प रहारकः॥४७॥ अव ते मरो भूप तुय जन िव तृता।।४९॥
ितसग (१/७)-िच कू टिग रदशे प रहारो महीपितः। का लजर पुरं र यम ोशायतनं मृतम्॥१॥
राजपु ा यदेशे च चपहािनमहीपितः॥२॥ अजमेरपुरं र यं िविधशोभा समि वतम्॥३॥
शु लो नाम महीपालो गत आनतम डले। ारकां नाम नगरीम या य सुिखनोऽभवत्॥४॥
४ राजा

का संघ होने के कारण यह कृ त संवत् भी कहा जाता है तथा इ ाणीगु को स मान के िलये शू क कहा गया-शू ४

जाितय का सेवक है।

(६) द ली कॆ चाहमान राजा ने ६१२ ईसा पूव म असी रया क राजधानी िननेवे को पूरी तरह व त कर दया, िजसका उ लेख
बाइिबल म कई थान पर है। इसके न क ा को िस धु पूव के मधेस (म यदेश, िव य तथा िहमालय के बीच) का शासक कहा
गया है।
http://bible.tmtm.com/wiki/NINEVEH_%28Jewish_Encyclopedia%29The Aryan Medes, who had attained to organized power east and northeast of Nineveh, repeatedly
invaded Assyria proper, and in 607 succeeded in destroying the city
Media-From BibleWiki (Redirected from Medes)-They appear to have been a branch of the Aryans,
who came from the east bank of the Indus, …
इस समय जो शक आर भ आ उसका उ लेख वराहिमिहर क बृहत् संिहता म है तथा कािलदास,

गु ने भी इसी का पालन

कया है। वराहिमिहर-बृहत् संिहता (१३/३)आसन् मघासु मुनयः शासित पृ व युिधि रे नृपतौ। षड् -ि क-प -ि (२५२६) युतः शककाल त य रा

य॥ (७) ीहष शक

(४५६ ईसा पूव)-इसका उ लेख अलब िन ने कया है। शू क के बाद ३०० वष तक मालवगण चला-िजसे मेग थनीज ने ३००
वष का गणरा य कहा है। िल छवी तथा गु राजा

ने इसका योग कया है पर इसे िनर र इितहासकार ने हषवधन (

६०५-६४६ इ वी) से जोड़ दया है।
(८) िव म संवत्-५७ ईसा पूव म उ ैन के परमार वंशी राजा िव मा द य (८२ ईसा पूव-१९ ई वी) ने आर भ कया। उनका
रा य (परो तः) अरब तक था तथा जुिलअस सीजर के रा य म भी उनके संवत् के ही अनुसार सीजर के आदेश के ७ दन बाद
िव म वष १० के पौष कृ ण मास के साथ वष का आर भ आ।
History of the Calendar, by M.N. Saha and N. C. Lahiri (part C of the Report of The Calendar Reforms
Committee under Prof. M. N. Saha with Sri N.C. Lahiri as secretary in November 1952-Published by Council of
Scientific & Industrial Research, Rafi Marg, New Delhi-110001, 1955, Second Edition 1992.
Page, 168-last para-“Caesar wanted to start the new year on the 25th December, the winter solstice day. But
people resisted that choice because a new moon was due on January 1, 45 BC. And some people considered
that the new moon was lucky. Caesar had to go along with them in their desire to start the new reckoning on a
traditional lunar landmark.”

यहां िबना गणना के मान िलया गया है क वष आर भ के दन शु ल प का आर भ था, पर वह िव म स वत् के पौष मास का
आर भ था। के वल िव म वष म ही चा

मास का आर भ कृ ण प से होता है. बाक सभी शु ल प से आर भ होते ह। इसी

िव मा द य के दरबार म कािलदास, वराहिमिहर आ द ९ र िव यात थे।
(९) शािलवाहन शक-िव मा द य के देहा त के बाद ५० वष तक भारत िवदेशी आ मण का िशकार रहा। तब उनके पौ
शािलवाहन ने उनको परािजत कर िस धु के पि म भगा दया। उनके काल म ाकृ त भाषा

का योग राजकाय म आर भ

आ। इनके काल मॆ ईसा मसीह ने क मीर म शरण िलया (हजरत बाल) ।
(१०) कलचु र या चे द शक (२४६ इसवी),
(११) वलभी भंग (३१९ ई वी)-गु राजा

क परव

शाखा गुजरात के वलभी म शासन कर रही थी िजसका अ त इस समय

आ। िनर र इितहासकार इसके १ वष बाद गु काल का आर भ कहते ह।
मु य राजा

का काल-युिधि र-१७-१२-३१३९ ईसा पूव से २२-८-३१०२ ईसा पूव तक, १७/१८-२-३१०२ ऊ ैन

म यराि से किल का आर भ, ३०७६ ईसा पूव से लौ कक वष (स ष मघा से आ ेषा म)

मगध म बाह थ वंश के २२ राजा-३१३८-२१३२ ईसा पूव (१००६ वष)-इसम सर वती लोप के बाद पा नाथ का सं यास
२६३४ ईसा पूव, उसके बाद के राजा-(१२) अणु त (२६४८-२५८४ ईसा पूव), (१३) धमने (२५८४-२५४९ ईसा पूव),
(१४) िनवृि (२५४९-२४९१ ईसा पूव), (१५) सु त (२४९१-२४५३ ईसा पूव)।
ोत वंश के ५ राजा १३८ वष-(२१३२-१९९४ ईसा पूव)। थम राजा

ोत (२१३२-२१०९ ईसा पूव) च ड महासेन नाम

से िस था िजसने व सराज उदयन को धोखे से परािजत कर दया था। इस क चचा भास के नाटक व वासवद ा तथा
कािलदास के मेघदू त म है।
िशशुनाग वंश के १० राजा ३६० वष तक (१९९४-१६३४ ईसा पूव)। िस ाथ बु

इसी काल म ये (३१-३-१८८७ से २७-३-

१८०७ ईसा पूव) यह िबि बसार (शासन १८५२-१८१४ ईसा पूव) से ५ वष छोटे थे तथा उसके पु अजातश ु शासन
(१८१४-१७८७ ईसा पूव) के ८व वष म मृ यु ई। अजातश ु के पौ उदािय (१७५२-१७१९ ईसा पूव) के चतुथ वष म गङा के
दि ण तट पर पाटिलपु बना। उसके पूव वह के वल िश ा सं थान के

प म कु सुमपुर था। भगवान् महावीर िस ाथ बु

वष बड़े थे (ज म ११-३-१९०५ ईसा पूव, चै शु ल १३) तथा िनवाण बु

से १८

के १२ वष बाद १७९५ ईसा पूव म)।

न द वंश १०० वष (१६३४-१५३४ ईसा पूव)-महाप न द ८८ वष, उसके ८ पु १२ वष।
मौय वंश के १२ राजा ३१६ वष (१५३४-१२१८ ईसा पूव)-च गु (१५३४-१५००), िब दु सार (१५००-१४७२) अशोक
(१५७२-१४३६ ईसा पूव) इसका समकालीन क मीर का राजा अशोक (गोन द वंश का ४३वां राजा, १४४८-१४०० ईसा पूव)
बौ

हो गया था िजसके कारण म य एिसआ के बौ

ने उसका रा य न कर दया।

शुंग वंश के १० राजा ३०० वष (१२१८-९१८ ईसा पूव), पु यिम (१२१८-११५८) अि िम (११५८-११०८ ईसा पूव)
क व वंश के ४ राजा ८५ वष (९१८-८३३ ईसा पूव)

वंश के ३३ राजा ५०६ वष (८३३-३०७ ईसा पूव) ३२व राजा च

ी का सेनापित घटो कच गु ने उसे मारकर उसके

पु पुलोमािव को नाममा का राजा बनाया तथा अपने पु च गु को गु वंश का थम राजा (३२७-३२० ईसा पूव) बनाया।
इसके काल म िसक दर का आ मण आ। उसके बाद समु गु (३२०-२६९), च गु -२ (२६९-२३३ ईसा पूव) थे। गु काल
के अ त ८२ ईसा पूव के बाद उ ैन म परमार वंशी िव मा द य का शासन १०० वष (१९ ईसवी तक) रहा। नेपाल राजा
अवि तवमन (१०३-३३ ईसा पूव) के काल म पशुपितनाथ म ५७ ईसा पूव म िव म संवत् आर भ कया। उसी वष का
म सोमनाथ म का

का द संवत् आर भ आ। गु

क मास

के वंशज गुजरात के वलभी म शासन करते रहे िजनके अ त के बाद ३१९

ईसवी म वलभी-भंग शक आ।
शािलवाहन (७८-१३८ ईसवी) ने शक को परिजत कर ७८ ईसवी म शक चलाया। उसके १०व पीढ़ी के भोजराज के काल म
तृतीय कािलदास पैग बर मुह मद के समकालीन थे।
३. कािलदास यी- एकोऽिप जीयते ह त कािलदासो न के निचत्। शृ गारे लिलतो ारे कािलदास यी कमु॥
(राजशेखर का ोक-ज हण क सूि

मु ावली तथा ह र किव क सुभािषतावली म)

इनम थम नाटककार कािलदास थे जो अि िम या उसके कु छ बाद शू क के समय ये। ि तीय महाकिव कािलदस थे, जो
उ ैन के परमार राजा िव मा द य के राजकिव थे। इ ह ने रघुवंश, मेघदू त तथा कु मारस भव-ये ३ महाका
योित वदाभरण नामक योितष

िलखकर

थ िलखा। इसम िव मा द य तथा उनके समकालीन सभी िव ान का वणन है। अि तम

कािलदास िव मा द य के ११ पीढ़ी बाद के भोजराज के समय थे तथा आशुकिव और ताि क थे-इनक िच गन चि का है
तथा कािलदास और भोज के नाम से िव यात का

इनके ह। इनका प रचय तथा उ लेख इस कार ह-

(१) कािलदास थम- इनक मालिवकाि िम म् नाटक के अि तम भरतवा य के अनुसार यह शु ग वंशी राजा अि िम
(११५८-११०८ ईसा पूव) के काल म या उसके कू छ बाद थे-

मालिवकाि िम म्-भरतवा य-आशा यमीितिवगम भृित जानां स प यते न कलु गो र नाि िम े॥
= हम यह आशा कर क र क अि िम नह रहने पर भी जा इसी कार ईित, िवगम आ द (६ आपि य ) से मु
क तु गु राजा समु गु (३२०-२६९ ईसा पूव) के कृ ण च रत (युिधि र मीमांसक का

ाकरण शा

रहे।

का इितहास, प रिश

७ म) इनको शू क (७५६ ईसा पूव) काल का कहा है, जो अस भव नह हैसमु गु का कृ ण च रत-मुिन कवयः
वर िचः का यायनः-यः वगारोहणं कृ वा वगमानीतवान् भुिव।
का ेन िचरेणैव यातो वर िचः किवः।।१४॥
न के वलं ाकरणं पुपोष दा ीसुत ये रतवा कै यः।
का ेऽिप भूयोऽनुचकार तं वं का यायनोऽसौ किव कमद ः॥१५॥
अथ राज कवयः
पुर दरबलो िव ः शू कः शा श िवत्। धनुवद चौरशा ं पके े तथाकरोत्॥६॥
स िवप िवजेताभू छा ैः श
क तये॥ बुि वीयना य वरे सौगता
सेिहरे॥७॥
स त तारा रसै य य देहख डै रणे महीम्। धमाय रा यं कृ तवान् तपि व तमाचरन्॥८॥
श ा जतमयं रा यं े णाऽकृ त िनजं गृहम्। एवं तत त य तदा सा ा यं धमशािसतम्॥९॥
कािलदास-त याभव रपतेः किवरा वणः, ी कािलदास इित योऽ ितम भावः।
दु य त भूपितकथां णय ित ां र यािभनेय भ रतां सरसां चकार॥१५॥
शाकु तलेन स किवनाटके ना वान् यशः। व तुर यं दशयि त ी य यािन लघूिन च॥१६॥
(िव मोवशीयम्, मालिवकाि िम म्, तृतीय उपल ध नह )
मातृगु -मातृगु ो जयित यः किवराजो न के वलम्। क मीरराजोऽ यभवत् सर व याः सादतः॥२१॥
िवधाय शू कजयं सगा तान दम भुतम्। यदशयद् वीररसं किवरावि तकः कृ ितः॥२२॥
ह रषेणः-तु गं

मा यपदमा यशः िस ं भु वा िचरं िपतु रहाि त सु ममायम्।

स धौ च िव हकृ तौ च महािधकारी, िव ः कु मार सिचवो नृपनीित द ः॥२३॥
का ेन सोऽघ रघुकार इित िस ो, यः कािलदास इित महाहनामा।
ामा यमा वचन य च त य ध य,
च वाय यािन का ािन

वम वरिवधौ मम सवदैव॥२४॥

दधा लघूिन यः। ाभावय मां क ु कृ ण य च रतं शुभम्॥२५॥

यहां २ अ य किवय के बारे म भी कहा गया है िजनका उपनाम कािलदास था-(१) ह रषेण कािलदास-यह राज प रवार के थे
िजनका उ लेख भ ार ह र

के

प म काद बरी म है। इ ह ने रघुकथा िलखी थी (रघुकार) िजसको महाका

पम

कािलदास ने बाद म िलखा। (२) मातृगु कािलदास-यह ीहष िव मा द य (४५६ ईसा पूव) के समय थे िजनको कु छ काल के
िलये क मीर का शासक बनाया गया था (राजतरंिगणी)। इनका महाका

है शू कजय (उपल ध नह )।

शू क िव मा द य काल के कािलदास ारा अिभ ान शाकु तलम् नाटक होने का िनदश उसी

थ म है-

ना दीपाठ-सू धार-आय! इयं िह रसभाविवशेषदी ागुरो व मा द य य (अ य पाठ म िवशेष-साहसा क य) अिभ प भूिय े यं
प रषत्। अ या

कािलदास यु े नािभ ानशकु तलेन नवेन नाटके नोप थात

मािभः॥

शू क के बाद िव मा द य तथा उनके एक वंशज को भी साहसा क कहा गया है-यह स भवतः शकक ा राजा

के िलये कहा

गया है।
भरतवा य-भवतु तव िवडौजाः ा यवृि ः जासु वमिप िवततय ो वि णं भावयेथाः।
गणशत प रवतरेवम यो यकृ यै नयतमुभयलोकानु ह ाघनीयैः॥
यहां भी मालवगण के सं थापक शू क को १०० गण का शासक कहा गया है। उनके आबू पवत के य का भी िनदश है िजसम ४
अि वंशी राजा का संघ बना। अि िम या परमार िव मा द य गण के शासक नह थे।

इस कािलदास के अिभ ान शाकु तलम् नाटक का एक ोक कु मा रल भ (५५७-४९३ ईसा पूव-िजनिवजय महाका ) ने त
वा

क म उ धृत कया है-

सतां िह स देहपदेषुव तुष,ु माणम तःकरण वृ यः। (१/२१)
कािलदास के नाटक म सामा य लोग ाकृ त भाषा बोलते ह, तथा मुिन, राज अिधकारी आ द सं कृ त बोलते ह। रामायण युग म
भी सं कृ त स पक तथा राजक य भाषा थी। अतः हनुमान् ने अशोकवा टका म सीता से सं कृ त म बात नह क , य क वे उनको
रावण का

ि

समझत । अतः हनुमान् ने अयो या िमिथला के बीच क भाषा का योग कया (आजकल इसे भोजपुरी कहते

ह)य द वा यं दा यािम ि जाित रव सं कृ ताम्। रावणं म यमाना मां सीता भीता भिव यित॥१८॥
अव यमेव व
ं मानुषं वा यमथवत्। मया सा वियतुं श या ना यथेयमिनि दता॥१९॥
(वा मी क रामायण, सु दरका ड, अ याय ३०, म हनुमान् का िच तन)
िव मा द य काल तक सं कृ त राजक य भाषा बनी रही। उसके बाद भारत कई भाषा

म खि डत हो गया। शािलवाहन ारा

राजनैितक िवजय करने के बाद भी हर े म सरकारी काय म ाकृ त का योग होने लगाके ऽभूव ा

राज य रा ये सं कृ तभािषणः। काले ी साहसा क य के न सं कृ तवा दनः॥

(भोजराज का सर वतीक ठाभरणम्, २/१५) आ

राज = शािलवाहन, साहसा क = िव मा द य।

यही वणन भिव य पुराण म शािलवाहन काल के िवषय म है (अगले प र छेद म)।
(२) कािलदास ि तीय-यह उ ैन के च वत परमार राजा िव मा द य (८२ ईसा पूव-१९ ई वी) के दरबार म थे, तथा उनके
िवषय म तथा अ य समकालीन िव ान का उ लेख योित वदाभरण म कया है। िव मा द य का स वत् (५७ ईसा पूव से) अभी
भी चल रहा है।
कािलदास- योित वदाभरण-अ याय२२- था यायिन पणम्ोकै तुदशशतै सिजनैमयैव योित वदाभरण का

िवधानमेतत् ॥ᅠ२२.६ᅠ॥

िव माकवणनम्-वष ुित मृित िवचार िववेक र ये ीभारते खधृितसि मतदेशपीठे ।
म ोऽधुना कृ ित रयं सित मालवे े ीिव माक नृपराजवरे समासीत् ॥ᅠ२२.७ᅠ॥
नृपसभायां पि डतवगा-शङ् कु सुवा वर िचमिणरङ् गुद ो िज णुि लोचनहरो घटखपरा य।
अ येऽिप सि त कवयोऽमर सहपूवा य यैव िव मनृप य सभासदोऽमो ॥ᅠ२२.८ᅠ॥
स यो वराहिमिहर ुतसेननामा ीबादरायणमिण थकु मार सहा।
ीिव माकनृपसंस द सि त चैते ीकालत कवय वपरे मदा ा ॥ᅠ२२.९ᅠ॥
नवर ािन-ध व त र पणकामर सहशङ् कु वतालभट् ट घटखपर कािलदासा।
यातो वराहिमिहरो नृपते सभायां र ािन वै वर िचनव िव म य ॥ᅠ२२.१०ᅠ॥
यो मदेशािधप त शके रं िज वा गृही वो ियन महाहवे।
आनीय स ा य मुमोच य वहो स िव माकः समस िव मः ॥ २२.१७ ॥
ति मन् सदािव ममे दनीशे िवराजमाने समवि तकायाम्।
सव जा मङ् गल सौ य स पद् बभूव सव च वेदकम ॥ २२.१८ ॥
शङ् ा द पि डतवराः कवय वनेके योित वदः सभमवं वराहपूवाः।
ीिव माकनृपसंस द मा यबुि त ा यहं नृपसखा कल कािलदासः ॥ २२.१९ ॥
का
यं सुमितकृ घुवंशपूव पूव ततो ननु कय ितकमवादः।
योित वदाभरणकालिवधानशा ं ीकािलदासकिवतो िह ततो बभूव ॥ २२.२० ॥
वषः िस धुरदशना बरगुणै (३०६८) याते कलौ सि मते, मासे माधवसंि के च िविहतो

थ योप मः।

नानाकाल िवधानशा

ग दत ानं िवलो यादरा-दू ज

थ समाि र िविहता योित वदां ीतये ॥ २२.२१ ॥

योित वदाभरण क रचना ३०६८ किल वष (िव म संवत् २४) या ईसा पूव ३३ म यी। िव म स वत् के भाव से उसके १०
पूण वष के पौष मास से जुिलअस सीजर ारा कै ले डर आर भ आ, य िप उसे ७ दन पूव आर भ करने का आदेश था।
िव मा द य ने रोम के इस शकक ा को ब दी बनाकर उ ैन म भी घुमाया था (७८ इसा पूव म) तथा बाद म छोड़ दया।। इसे
रोमन लेखक ने ब त घुमा फराकर जलद यु

ारा अपहरण बताया है तथा उसम भी सीजर का गौरव दखाया है क वह

अपना अपहरण मू य बढ़ाना चाहता था। इसी कार िसक दर क पोरस (पु वंशी राजा) ारा पराजय को भी ीक लेखक ने
उसक जीत बताकर उसे मादान के प म दखाया है।
http://en.wikipedia.org/wiki/Julius_Caesar
Gaius Julius Caesar (13 July 100 BC – 15 March 44 BC) --- In 78 BC, --- On the way across the
Aegean Sea, Caesar was kidnapped by pirates and held prisoner. He maintained an attitude of
superiority throughout his captivity. When the pirates thought to demand a ransom of twenty talents of
silver, he insisted they ask for fifty. After the ransom was paid, Caesar raised a fleet, pursued and
captured the pirates, and imprisoned them. He had them crucified on his own authority.
Quoted from History of the Calendar, by M.N. Saha and N. C. Lahiri (part C of the Report of The
Calendar Reforms Committee under Prof. M. N. Saha with Sri N.C. Lahiri as secretary in November
1952-Published by Council of Scientific & Industrial Research, Rafi Marg, New Delhi-110001, 1955,
Second Edition 1992.
Page, 168-last para-“Caesar wanted to start the new year on the 25th December, the winter solstice
day. But people resisted that choice because a new moon was due on January 1, 45 BC. And some
people considered that the new moon was lucky. Caesar had to go along with them in their desire to
start the new reckoning on a traditional lunar landmark.”
योित वदाभरण क कहानी ठीक होने के कई अ य माण ह-िसक दर के बाद से युकस्, एि टओकस् आ द ने म य एिसआ म
अपना भाव बढ़ाने क ब त कोिशश क , पर सीजर के ब दी होने के बाद रोमन लोग भारत ही नह , इरान, इराक तथा अरब
देश का भी नाम लेने का साहस नह कये। के वल सी रया तथा िम का ही उ लेख कर संतु हो गये। यहां तक क सी रया से
पूव के कसी राजा के नाम का उ लेख भी नह है। बाइिबल म िलखा है क उनके ज म के समय मगध के २ योितषी गये थे
िज ह ने ईसा के महापु ष होने क भिव यवाणी क थी। सीजर के रा य म भी िव मा द य के योितिषय क बात ामािणक
मानी गयी। वराहिमिहर ने भी बृह ातक स मोऽ याय- आयुदाय म समकालीन िव ान का उ लेख कया हैिव णु (िज णु) गु ोऽिप चैवं देव वामी िस सेन

च े |

दोष ैषां जायते अ ाव र ं िह वा नायु वशतेः याद् अध तात् || ७||
कािलदास के कालामृत

थ म भी िव मा द य का उ लेख है- उ रकालामृतम्-

ीम
चतु या युत हर वणायका ैः सुरैः कायार भ िवधौ सम चत पद
ं ि पे ाननम्।
पाशा ायु ल डु क िवलस तै तु भयुतं ीमि म सूय पालनपरं व दे भवानी सुतम्॥१॥
कामेश य सुवामभाग िनलयां भ ािखले ाथदां श खं च मथाभयं च वरदं ह तैदधानां िशवाम्।
सह थां शिशख ड मौिल लिसतां देव ि ने ो वलां ीमि म सूय पालनपरां व दे महाकािलकाम्॥२॥
ागेवा दले सम त मु दतं सं ा दकं िव तराद् ेयं जातकप त बुधमुदेऽथ ाि कं च मात्।
प ं सू मतरं ि काल फलदं शादू लवृि ि तं स प यकरं वि म ब धा कालामृतेतू रे॥३॥
३ महाका
बुि मान और

क जन ुित- एक जन ुित के अनुसार कािलदास पहले महामूख थे। मालव रा य क राजकु मारी िव ो मा अ यंत
पवती थी। उसने यह ण िलया था क वह उसी युवक से िववाह करेगी जो उसे शा ाथ म हरा देगा। िव ो मा

से िववाह क इ छा अपने मन म िलए अनेक िव ान् दू र-दू र से आये ले कन कोई भी उसे शा ाथ म हरा न सका। उनम से कु छ ने
अपमान और लािन के वशीभूत होकर राजकु मारी से बदला लेने के िलए एक चाल चली। उ ह ने एक मूख युवक क खोज ारंभ
क । एक जंगल म उ ह ने एक युवक को देखा जो उसी डाल को काट रहा था िजसपर वह बैठा आ था। िव ान को अपनी हार
का बदला लेने के िलए आदश युवक िमल गया। उ ह ने उससे कहा – “य द तुम मौन रह सकोगे तो तु हारा िववाह एक
राजकु मारी से हो जायेगा”। उ ह ने युवक को सु दर व

पहनाये और उसे शा ाथ के िलए िव ो मा के पास ले गए। िव ो मा

से कहा गया क युवक मौन साधना म रत होने के कारण संकेत म शा ाथ करेगा। िव ो मा मान गई और शा ाथ-सभा शु
ई। िव ो मा ने एक उँ गली उठाई। उसका ता पय था, ‘ई र एक है। अ ै त ही ई र व है।’ युवक क समझ म आया, ‘यह
हमारी एक आँख फोड़ना चाहती है।’ अतः उ ह ने त

ण दो उँ गिलयाँ ऊपर कर द । अथात् ‘तुम तो एक आँख फोड़ने क बात

कर रही हो, म तु हारी दोन आँख फोड़कर अंधी बना दू ँगा।’ पंिडत ने
और िव

के

प म वही अ य

ताली बजाकर पंिडत मंडली क

ा या क , ‘ई र एक है। आपने ठीक कहा, पर कृ ित

प धारण करता है। अतः पु ष और कृ ित, परमा मा और आ मा दो-दो शा त ह।’ ोता

ने

ा या का समथन कर दया। फर िव ो मा ने हथेली उठाई। पाँच उँ गिलयाँ ऊपर क ओर

उठी थ । उनका ता पय था, ‘आप िजस कृ ित, जगत् जीव या माया के

प म ै तवाद को थािपत कर रहे ह, उसक रचना

पंच व से होती है। ये पंचत व ह- पृ वी, पानी, पवन, अि और आकाश। ये सभी त व िभ और अलग ह, इनसे सृि कै से हो
सकती है ?’ युवक क अ ल म समझ आई, ‘यह युवती अब मुझे थ पड़ मारना चाहती है। इसीिलए हाथ उठाया है और थ पड़
दखा रही है। ‘अ छा, कोई बात नह । म अभी तुझे मजा चखाता ँ।’ यह सोचकर उसने उँ गिलय को समेटकर कड़ी मु ी बाँध
ली और िव ो मा क ओर मु ी वाला हाथ आगे फै ला दया। पंिडत ने

ा या क , ‘जब तक पंचत व अलग-अलग रहगे, सृि

नह होगी। पंचत व करतल क पंचांगुिल है। सृि तो मुि वत् है। मु ी म सभी िमल जाते ह तो सृि हो जाती है। यही ता पय है,
हमारे युवा महापंिडत का।’ सभा-मंडप क दशक दीघा से फर तािलयाँ बज । िव ान ने युवक के मूखतापूण सके त क ऐसी
ा या क क िव ो मा को अंततः अपनी हार माननी पड़ी और उसने युवक से िववाह कर िलया। उसी रात ऊँट को देखकर
प ी ारा ’ किमदम् ?’ पूछने पर कािलदास ने अशु

उ ारण ’उ ’ कया। िव ो मा पि डत के षड़य

को जान गयी और

ोिधत होकर उसने कािलदास को िध ारा और यह कह कर घर से िनकाल दया क स े पंिडत बने िबना घर वािपस नह
आना। कािलदास ने स े मन से काली देवी क आराधना क और उनके आशीवाद से वे ानी बन गए। शा िन णात होकर
वािपस प नी के पास आकर ब द दरवाजा देखकर ’अनावृ कपाटं ारं देिह’ ऐसा कहा। िव ो मा को आ चय आ और उसने
पूछा – ’अि त कि द् वाि वशेष:’। प नी के इन तीन पद से उसने ’अि त’ पद से ’अ यु र यां दिश देवता मा’ यह
’कु मारस भव’ महाका , ’ कि द्’ पद से ’ कि
संपृ ौ’ यह ’रघुवंश’ महाका

का तािवरहगु णा’ यह ’मेघदू त’ ख डका , ’ वाग्’ इस पद से ’वागथािवव

रच डाला।

(३) कािलदास तृतीय- िव मा द य के मरने पर उनका रा य खि डत हो गया तथा चार तरफ से चीन, तातार के शक, रोम
तथा खुरज (कु द, तुक के वृष पवत क पादभूिम) के शठ (दु ), बा लीक, काम प (कामभोज-इरान के उ र पि म- का
मेिडया) के ले छ,

ण ने आ मण कर

ापक लूटपाट, अपहरण, बला कार आ द कया। ायः ६० वष म इनका िनराकरण

कर िव मा द य के पौ शािलवाहन ने सभी को दि डत कया तथा िस दु नदी के पि म खदेड़ दया, िजसे उन लोग ने भारत
क सीमा वीकार क । उस समय ७८ इ वी म शािलवाहन शक आर भ आ। उस काल म भारत शाि त और समृि का े
होने के कारण ईसा मसीह ने भी क मीर म शरण िलया। शािलवाहन के ५० वष शासन के १० पीढ़ी या ५०० वष बाद भोजराज
१०,००० सेना के साथ ब ख गये थे, उनके साथ कािलदास (तृतीय) थे। वहां से आगे उ ह ने म े र महादेव क पूजा क । वहां
ले छ धम के व क मुह मद (महामद) ने उनसे सहायता मांगी तथा कहा क महादेव अब उनके अधीन ह। कािलदास ने अपने

ारा उनका मोहन दू र कया। पर कई लोग ने मुह मद क सहायता क । इनको इ लाम म मोहयाली कहा गया।

स बि धत ोक ह- भिव य पुराण, ितसग पव ३, अ याय २-

वगते िव मा द ये राजानो ब धाऽभवन्। तथा ादशरा यािन तेषां नामािन मे शृणु॥९॥
नानाभाषाः ि थता त ब धम वतकाः। एवम दशतं जातं तत ते वै शकादयः॥१४॥
ु वा धमिवनाशं च ब वृ दैः समि वताः। के िच ी वा िस धुनदीमा यदेशं समागताः॥१५॥
िहमपवत मागण िस धुमागण चागमन्। िज वा या लाँठिय वा तान् वदेशं पुनराययुः॥१६॥
गृही वा योिषत तेषां परं हषमुपाययुः। एति म तरे त शािलवाहन भूपितः॥१७॥
िव मा द य पौ
िपतृरा यं गृहीतवान्। िज वा शकान् दु राधषान् चीन तैि र देशजान्॥१८॥
बा लीकान् काम पां रोमजान् खुरजा छठान्। तेषां कोशान् गृही वा च द डयो यानकारयत्॥१९॥
थािपता तेन म यादा ले छायाणां पृथक् पृथक् । िस धु थानिमित ेयं रा मा य य चो मम्॥२०॥
ले छ थानं परं िस धोः कृ तं तेन महा मना। एकदा तु शकाधीशो िहमतुंघं समाययौ॥२१॥
णदेश य म ये वै िग र थं पु षं शुभम्। ददश बलवान् राजा गौरांगं

ेतव कम्॥२॥

को भवािनित तं ाह स होवाच मुदाि वतः। ईशपु ं च मां िवि कु मारीगभ स भवम्॥२३॥
ईशमू त द ा ा िन यशु ा िशवंकरी। ईशामसीह इित च मम नाम िति तम्॥३१॥
इित ु वा स भूपालो न वा तं ले छपूजकम्। थापयामास तं त
वरा यं ा वान् राजा हयमेधमचीकरत्। रा यं कृ वा स ष

ले छ थाने िह दा णे॥३२॥
दं वगलोकमुपाययौ॥३३॥

अ याय ३- शािलवाहन वंशे च राजानो दश चाभवन्। रा यं प शता दं च कृ वा लोका तरं ययुः॥१॥
भूपितदशमो यो वै भोजराज इित मृतः॥दृ वा ीण म यादां बली दि वजयं ययौ॥२॥
सेनया दशसाह या कािलदासेन संयुतः। तथा यै ा णैः सा िस धुपारमुपाययौ॥३॥
िज वा गा धारजान् ले छान् का मीरान् आरवान् शठान्। तेषां ा य महाकोषं द डयो यानकारयत्॥४॥
एति म तरे ले छ आचा यण समि वतः। महामद इित यातः िश य शाखा समि वतः॥५॥
नृप ैव महादेवं म थल िनवािसनम्। च दना दिभर य य तु ाव मनसा हरम्॥६॥
इित ु वा तवं देवः श दमाह नृपाय तम्॥९॥ महामद इित यातः पैशाच कृ ित त परः॥१२॥
इित ु वा नृप ैव वदेशान् पुनरागमत्। महामद तैः सा िस धुतीरमुपाययौ॥१४॥
उवाच भूप त े णा मायामद िवशारदः। तव देवो महाराज मम दास वमागतः॥१५॥

वा कािलदास तु पा ाह महामदम्। माया ते िन मता धूत नृपमोहनहेतवे॥१८॥
हिन यािम दु राचारं वाहीकं पु षाधमम्। इ यु वा स ि जः ीमा वाणजपत परः॥१९॥
पैशाच देहमा थाय भोजराजं िह सोऽ वीत्॥२३॥ ईशा या क र यािम पैशाचं धमदा णम्॥२४॥
लग छेदी िशखाहीनः म ुधारी स दू षकः। उ ालापी सवभ ी भिव यित जनो मम॥२५॥
िवना कौलं च पशव तेषां भ या मता मम। मुसलेनैव सं कारः कु शै रव भिव यित॥२६॥
त मान् मुसलव तो िह जातयो धमदू षकाः। इित पैशाच धम भिव यित मया कृ तः॥२७॥
तृतीय कािलदास क त

पु तक िच गनचि का है, िजसम उ ह ने अपना नाम िलखा है। इसके अित र

किवताय ह, जो भोज-कािलदास चचा
िच गनचि का-इह कािलदासच

के

प म िस

ह।

सूितरानि दनी तुित ाजात्।

िच गनचि का धेः समयतु संसारदावदवथुं वः॥३॥
यः िशवात् भृित सोम पि म व मैकरिसको गु मः।
आनना िमह च भानुतो य वमेतदु भयं वया यया॥३००॥
त दथ पु षो धृत मः ाितभ फु रत द िव हम्।
अ म तव वरं पदं िशवे योऽहम य िवमश ल णः॥३०१॥
ल ण तदनु सू मिम यते योितरा मक मवणमाि थता।
थूलमेतदनुव य ल यते भा तो शमियतुं मनोमया॥३०२॥
त शा तवित पौ षो मल ोमव तमवेदया वया।
िस काय करणं िनरंकुशं िच मरीिचिवसरेण मंगले॥३०३॥
सोमपु मपने य म त व मोऽ

कमिप तुतो मया।

उनक

क ण आशु

तभीषणभवोऽयमि बके व पदा बुज िवमष तेजसा॥३०४॥
मु मेव न मया मयोिचतः े रतोऽि म तव त नी वया।
िस नाथ कृ तत म तुतेः कािलदास रिचतां च पि काम्॥३०५॥
यद् िविन यपद च ते तवं योऽ ब वेद कु त मुखं जगत्।
कािलदास पदव तवाि तः व सादकृ तवाि वजृ भणः॥३०६॥
व गुणा यदहम तु वै जगत् तेन मोहमितर मु यताम्।
पूणपीठमवग य म गले व सादमकृ ते मया कृ तः॥३०७॥
यहां किव ने अपनी पदवी कािलदास कही है तथा साधना थान पूणपीठ (महारा के िवदभ म) कहा है।
४. कािलदास क वै दक धारणाय-इसके कु छ उदाहरण दये जाते ह(१) वागथािवव संपृ ौ वागथ ितप ये। जगतः िपतरौ व दे पावतीपरमे रौ॥ (रघुवंश १/१)
यहां वाक् तथा अथ क

ितपि (सम पता) कही गयी है। इसका आशय वही है जो मनु मृित (१/२१) म कहा है क कम (अथ)

के अनुसार श द बने थे। इनका मूल पं. युिधि र मीमांसक जी के अनुसार हैह रः सृजानः प यामृत येय त वाचम रतेव नावम्।
देवो देवानां गु ािस नामाऽऽिव कृ णोित ब हिष वाचे॥ (ऋक् ९/९५/२)
बृह पते थमं वाचो अ ं यत् ैरत नामधेयं दधानाः।
यदेषां े ं यद र मासीत् ेणा तदेषां गुहािवः॥ (ऋक् १०/७१/१)
कािलदास ने िशव-पावती को वाक् -अथ के समान कहा है, तुलसीदास ने यही राम-सीता के िलये कहा हैिगरा-अरथ जल-बीिच सम किहयत िभ न िभ । व दउँ सीता-राम पद िज ह ह परम ि य िख ॥ (रामच रतमानस,
बालका ड, १८)
वाक् का अथ वाणी या श द है तथा आकाश भी है िजसका गुण श द है। दोन क माप छ द से है-वाक् प रमाणः छ दः। इस छ द
के अनुसार म

के अथ होते ह-तेषामृ य ाथवशेन पाद व था। (मीमांसा सू २/१/३५) । आधुिनक भाषा

म इसका अथ है

क वा य एक घटना (वाकया-फारसी) का वणन करता है, उसका अथ वा यांश (clause) का योग है।
शद् धाम िव-राजित वाक् पत गाय धीयते। ित व तोरह ुिभः॥ (ऋक् १०/१८९/३)
यहाँ वाक् का अथ सूय ( काशमान पत ग) का े है। वहां तक उसका िव (िवशेष) काश (आकाशग गा क तुलना म) है।
उसक माप ३० धाम (पृ वी के आकार को ३० बार दो गुणा करने पर) मानी जाती है। ु (आकाश) म ित वि त (ब ती, े )
को अहः इकाई म मापते ह (यहां ३० इकाई) ।
इसी कार कार पृ वी को गाय ी कहा गया है, अथात् मनु य के आकार को २४ बार २ गुणा करने पर = १ करोड़ गुणा है।
आकाशगङा क माप ४८ है अतः इतने अ र के छ द को जगती कहते ह।
हर व तु एक अथ (पदाथ) है, उसका े या आकाश वि त है। दोन एक ही म िमले ये ह।
(२) वैव वतो मनुनाम माननीयो मनीिषणाम्। आसी महीि तामा ः णव छ दसािमव॥ (रघुवंश १/११)
ॐकार णव है-यह सू म प म यी िव ा (१ मूल तथा ३ शाखाय = ४ वेद) का मूल है अतः वेदम
ह।, य िप इसे प
िस

प म िलखते नह ह। वैव वत मनु के पूव वाय भुव मनु तथा उनके िस

का आर भ इसी से करते

वंशज राजा ुव थे। उसके बाद

राजा पृथु भी उनके पूव थे। पर वतमान म व तर का आर भ इसी मनु से आ, अतः इनको थम राजा कहा गया है।

ॐकार क

ा या ा ण

थ पुराण आ द म है। इसे आ द य तथा िवव वान् भी बताया गया है अतः इसक वैव वत मनु से

उपमा उिचत हैओिम यसौ योऽसौ (सूयः) तपित। (ऐतरेय ा ण ५/३२)
(देवा आ द याः) यं मात डं) उ ह ति च ु ः स िवव वाना द य त येमाः जाः। (शतपथ ा ण ३/१/३/४)

(३) जानामेव भू यथ स ता यो बिलम हीत्। सह गुणमु

ु माद े िह रसं रिवः॥ (रघुवंश १/१८)

इसके मूल वै दक ऋचाय हस ाधगभा भुवन य रेतो िव णोि त ि त

दशा िवधमिण।

ते धीितिभमनसा ते िवपि तः प रभुवः प र भवि त िव तः॥ (ऋक् १/१६४/३६)
सूय क करण ६ मास तक पृ वी को िसि त करने यो य जल को धारण करती ह (मोतीलाल शमा जी स ाधगभा का अथ ६
१/२ मास तक का गभ धारण मानते ह) तथा पृ वी को िसि त करने के समय तक ती ा करते ह।
कृ णं िनयानं हरयः सुपणा आपो वसाना दवमु पति त।
त आववृ न् सदनादृ त या दद घृतेन पृिथवी

ु ते॥ (ऋक् १/१६४/४७)

दि णायन माग (कृ ण िनयान) जल हण कर ऊपर उठते ह (उ र माग पर चलते ह)। वे ऋत (जल) के

ोत से जल लेकर पृ वी

को िसि त करते ह।
समानमेतदु दकमु ै यव चाहिभः। भू म पज या िज वि त दवं िज व य यः॥ (ऋक् १/१६४/५१)
जल समान मा ा म ऊपर जाते ह तथा नीचे आते ह (अपनी ऋतु म)। अि (सूय का ताप) जल को उठाता है तथा पज य उसे
नीचे बरसाता है।
इसी के जैसा पद वा मी क रामायण, अयो या का ड म हैउद ग वा युपावृते परेताच रतां दशम्। आवृ वानाः दशः सवाः ि

धाः ददृ िशरे घनाः॥

(४) दु दोह गां स य ाय स याय मघवा दवम्। स पि िनमयेनोभौ दधतुभुवन यम्॥ (रघुवंश १/२६)
यहां गौ के वल एक पशु नह है। यह य का साधन है। स पूण जगत्

है, उसका एक अंश कम है, िजसम दृ य गित हो रही है।

िजस कम से उपयोगी व तु का उ पादन हो वह य हैसहय ाः जाः सृ वा पुरो वाच जापितः ।
अनेन सिव य वमेष वोऽि व कामधुक् ॥१०॥ (गीता, अ याय ३)
य िश ािशनः स तो मु य ते सव कि बषैः ॥१३॥
एवं व ततं च ं नानुवतयतीह यः । अघायु रि यारामो मोघं पाथ स जीवित ॥१६॥
य सदा च य म म होता है, इसके च

ाकृ ितक च

दन, मास, वष के अनु प ह। हमारा यह क

है क हम इस च

को ब द नह होने द। उससे बचा आ अ (उपयोग क कोई भी व तु) ही उपभोग कर। य का साधन या आधार गौ है। इस प
म पृ वी को भी गौ कहा गया है। राजा ारा उसका उतना ही दोहन होना चािहये िजससे वह सुखी रहे तथा पया उ पादन
करती रहे। राजा जो भी लेता है, उसे पुनः रा य के िवकास और र ा म ही लगाता है।
(५) त य दाि

य ढ़ेन ना ा मगधवंशजा। प ी सुदि णे यासीद वर येव दि णा॥ (रघुवंश १/३१)

य को ठीक से चलाने के िलये

क आव यकता है-वह दि णा है य क उससे द ता होती है।

तं (य )ं देवा दि णािभरद यं त देनं (य )ं दि णािभरद यं त तमा ि णा नाम (शतपथ ा ण २/२/२/२, ४/३/४/२)

ि णािभय ं द यित त मा ि णा नाम (कौषीत क ा ण १५/१)

दि णा वै य ानां पुरोगवी (ऐतरेय ा ण ६/३५)
अधा ह म वै पुरा

णे दि णा नय तीित। अधा इतरे य ऋि व यः । (जैिमनीय उपिनषद् ा ण ३/१७/५)

(६) िवधेः सायंतन या ते स ददश तपोिनिधम्। अ वािसतम ध या वाहयेव हिवभुजम्॥ (रघुवंश १/५६)
विस ऋिष ाण (उजा) ारा जा क उ पि करते ह-यहां यह एक शि

है, मनु य नह , मनु य

पी ऋिष क उपमा इससे

क गयी है। उ पादन का जोड़ा उपभोग करने वाला हिवभुज है िजससे अ धती क उपमा दी गयी है। स ष म डल म एक तारा
भी विस है िजसके िनकट ीण तारा अ धती है। िववाह म इसका दशन कया जाता है, अ छी दृ ि वाले ही इसे देख सकते ह-

विस ऋिषः, जापितगृहीतया वया ाणं गृ ािम जा यः। (वाजसनेयी यजुः १३/५४)
य ै नु े

तेन विस ोऽथो य तृतमो वसित तेनोऽएव विस ः॥ (शतपथ ा ण ८/१/१/६)

विस ो वा एतं अप यत्, स जया पशुिभः ाजायत। (ता

महा ा ण ४/७/३, ८/२/४)

(७) अथाथविनधे त य िविजता रपुरः पुरः। अ यामथपितवाचमाददे ददतां वरः॥ (रघुवंश १/५९)
उपप ननु िशवं स

व गेषु य य मे। दैवीनां मानुषीणां च ितहता वमापदाम्॥ (रघुवंश १/६०)

अथव वेद को रोग तथा िवपि य का िनराकरण करनेवाला कहा गया हैयेऽथवाण तद् भेषजम्। (गोपथ पूव ३/४)
ुतीरथवाि गरसीः कु या द यिवचारयन्। वाक् श ं वै ा ण य तेन ह यादरीन् ि जः॥ (मनु मृित १०/३३)
(८) अस पीडं भगव ृणम य तमवेिह मे। अ तुदिमवालानमिनवाण य दि तनः॥
त मा मु ये यथा तात संिवधातुं तवाहता। इ वाकू णां दु रापेऽथ वदधीना िह िस यः॥ (रघुवंश १/७१-७२)
पुरा श मुप थाय तवोव

ित या यतः। आसी क पत

छायामाि ता सुरिभः पिथ॥ (रघुवंश १/७५)

िपता से स तान म गया त व वेद म ’सह’ ( ोमोजोम, तथा इसी कार के त व) कहा गया है। उनके बीच का स ब ध त तु है,
िनमाण का िव तार वयन (बुनना) है । कोई भी ोत िपता है, उससे िन मत व तु सूनु हैसहोिभ व ं प रच मू रजः पूवा धामा यिमता िवमानाः।
तनूषु िव ा भुवनािन येिमरे ासारय त पु ध जा अनु॥५॥
ि धा सूनवोऽसुरं व वदमा थापय त तृतीयेन क मणा।
वां जां िपतरः िप यं सह आवरे वदधु त तुमाततम्॥६॥ (ऋक् १०/५६)
अव पृिध िपतरं योऽिधिव ान् पु ो य ते सहसः सून ऊहे।
कदाँिच क वो अिभच से नोऽ े कदा ऋतिच ातयांसे॥ (ऋक् ५/३/९)
नाहं त तु न िवजाना योतुं न यं वयि त समरेऽतमानाः।
क य ि वत् पु इह व वािन परो वदा यवरेण िप ा॥ (ऋक् ६/९/२)
स इ तुं िवजाना योतुं स व वा यृतुथा वदाित।
य िचके तदमृत य गोपा अव रन् परो अ येन प यत्॥ (ऋक् ६/९/३)
ये सूनवः वयसः सुदंससो मही ज ुमातरा पूविच ये।
थातु स यं जगत ध मिण पु य पाथः पदम यािवनः॥ (ऋक् १/१५९/३)
ते माियनो मिमरे सु चेतसो जामी स योनी िमथुना समोकसा।

ं त तुमा त वते दिव समु े अ तः कवयः सुदीतयः॥ (ऋक् १/१५९/४)
िवत व ते िधयो अपांिस व ा पु ाय मातरो वयि त।
उप े वृषणे मोदमाना दव पथा व वो य य छ॥ (ऋक् ५/४७/६)

रि त िशशवे म वते उभे यतेते िप े पु ासो अ यवीवत ृतम्।
उभे इद योभय य राजत उभे यतेते उभय य पु यतः॥ (ऋक् १०/१३/५)
िशशु के साथ ७ पीढ़ी तक का स ब ध सह ारा है। अ
से ७ लोक क उ पि इसका दैवी अथ है। शरीर के भीतर योग के
अनुसार ७ कोष ह, या मन क ७ वृि यां ह िजनको अि िज वा कहा गया है –
अि िज वा मनवः सूरच सो िव ेनो देवा अवसा गमि ह। (ऋ वेद १/९८/७, यजुवद २५/२०)
काली कराली च मनोजवा च सुलोिहता या च सुधू वणा।
फु िलि गनी िव ची च देवी लेलायमाना इित स िज वाः॥ (मु डकोपिनषद् १/२/४)
यो य ो िव त त तुिभ तत एकशतं देवक मिभरायतः।
इमे वयि त िपतरो य आययुः वयाप वये यासते सते। (ऋक् १०/१३०/१)

िव

के त तु बने रहने से य चलते रहगे, १०० कार के देवकम ह गे। इ

शत तु ह, इसका एक अथ है मनु य १०० वष तक

उपयोगी जीवन यापन करे। आकाश म १०० कम होने के कारण ित ऊंचे लोक का आन द १०० गुणा बढ़ता है। ज म क
शृ खला म १०० ज म क मृित रह सकती है। इस कार के कई कारण से यजुवद क १०० शाखाय ह। अतः रा य तथा कु ल

व था जारी रखने के िलये राजा ने स तान क कामना क । यह ’सह’ नह होना अस है।
(९) त याः खुर यास पिव पांसुमपांसुलानां धु र क तनीया।
माग मनु ये र धमप ी ुते रवाथ मृितर वग छत्॥ (रघुवंश २/२)
यहां भाव है क वेद से ही सभी ान उ प होते ह-वह वयं िव ान का शा

नह है बि क सभी क

ित ा है। इस कारण वही

मृित वीकाय है जो वेद के अनुसार होा देवानां थमं स बभूव िव

य क ा भुवन य गोता।

िव ा सविव ा ित ा ये ाय पु ाय अथवाय ाह। (मु डक १/१/१)

मनु मृित, अ याय २-वेदोऽिखलो धममूलं मृितशीले च ति दाम्। आचार ैव साधूनामा मन तुि रेव च॥६॥
यः कि त् क यिच म मनुना प रक ततः। स सव िभिहतो वेदे सव ानमयो िह सः॥७॥
सव तु समवे येदं िनिखलं ानच ुषा। िु त ामा यतो िव ान् वधम िनवशेत वै॥८॥
ुित मृ यु दतं धममनुित ि ह मानवः। इह क तमवा ोित े य चानु मं सुखम्॥९॥
ुित तु वेदो िव ेयो धमशा ं तु वै मृितः। ते सवाथ वमीमां ये ता यां धम िह िनबभौ॥१०॥
(१०) िनव य राजा दियतां दयालु तां सौरभेय सुरिभयशोिभः।
पयोधरी भूत चतुःसमु ां जुगोप गो पधरािमवोव म्॥ (रघुवंश २/३)
वेद म गो या गौ श द कई अथ म यु

है। गो का सामा य अथ गाय है िजसके पु

ारा मु य य कृ िष होता है तथा िजसके

दू ध से हमारा शरीर पु होता है। आ याि मक अथ इि य है, िजनके ारा शरीर के सभी काय होते ह। सूय क शि
करण

ारा आती है, िजनसे जीवन का िवकास होता है, अतः यहां गो का अथ करण है। सूय से उसके १००

ताप े (

उसक

ास दू री तक

) है, उसके बाद तेज (अिधक काश) े है उसके बाद सौर म डल क सीमा तक उसका काश आकाशग गा से

अिधक है। इन े

को योित (ती तेज), गौ ( करण), आयु (आयतन) या सूय के ३ मनोता कहा गया है।

िनमाण का आर भ या योिन कू म है जो आकाशग गा का १० गुणा है। यह कम करता है अतः इसे कू म कहते ह। यह करण े है
अतः गोलोक कहा गया है। सभी म सामा य अथ या प रभाषा है क िजस कसी थान म उ पादन या हो वह गो है। हमारे
काम क सभी सृि पृ वी पर हो रही है अतः इसे गो कहा गया है। पुराण म हर थान पर गो पी पृ वी के
ा के पास जाने
क कथा है। ीस म इसे गैया कहते थे। पृ वी क सतह पर ७ ीप तथा ७ समु ह। उसी के अनु प सौर म डल के ह के मण
से पृ वी के चारो तरफ जो े बनते ह उसे ५० को ट योजन के
पृ वी के ीप-समु

ास क च ाकार पृ वी कहा गया है,। इन े

क तरह ह। बाद के संकलन करने वाल ने इनका भेद नह समझा अतः १००० योजन

के नाम भी

ास क पृ वी पर

१६ को ट योजन के पु कर ीप का वणन कया। पृ वी का पु कर दि ण अमे रका तथा आकाश का पु कर यूरेनस क ा है। यहां
तक का े लोक भाग (वेद का गो मनोता) तथा उसका दो गुणा १०० को ट योजन

ास का अलोक भाग नेपचून तक कहा

गया है। िनमाण म के िलये ४ ही समु ह-आकाश म संयती, सर वती, सािव ी, जो मशः वय भू (स पूण िव ), परमे ी
(

ा ड या आकाशग गा), सौर म डल के

े ह। इनके ारा इन म डल का िनमाण आ था अतः ये आ द य कहे गये ह-

अयमा, व ण, िम । सबका मूल रस का समु था जो सवतः सम प है। इसी के अनु प पृ वी

पी गो पर िनमाण के ४ म डल

४ समु ह िजनको आजकल ि फयर (गोला) कहा जाता है (िलथो-, बायो-, हाइ ो-, ऐटमोि फयर)। पृ वी क ठोस बाहरी सतह
थल समु है िजसके म थन (खनन) से र िनकले थे। इसी पृ वी का दोहन (अ वेषण तथा खनन) पृथु ने कया था। कु छ उ रण
दये जाते हित ो वै देवानां मनोताः -- वा वै देवानां मनोता-- गौ ह देवानां मनोता--अि व देवानां मनोता-- (ऐतरेय ा ण २/१०)

यदेवेदं ि तीयमहय तृतीयमेते वा उ गो आयुषी। (कौषीत क ा ण २६/२)
मात

ाणां दु िहता वसूनां वसा आ द यानां अमृत य नािभः। (ऋक् ८/१०१/१५)

गो का य सदा चलता रहता है, अतः यह अमृत क नािभ है। इसका पूव े माता, परव

े दु िहता ह।

(ऋक् १/१५४)- तद् िव णुः तवते वीयण मृगो न भीमो कु चरो िग र ाः।
य यो षु ि षु िव मणे विधि यि त भुवनािन िव ा॥२॥
सूय के ३ िव म ( काश, ताप, आ मा) से ३ कार के जीव पृ वी पर ह िजनके ३ े भूिम, जल, वायु ह।
य य ी पूणा मधुना पदा य ीयमाणा वधया मदि त।
य उ ि धातु पृिथवीमुत ामेको दाधार भुवनािन िव ा॥४॥
सौर म डल म सूय तेज के ३ प मधु ह िजनका उपयोग मधुिव ा कहा गया है। उसके बाहर का समु म
मादकता देता है। सौर े िम है, उसका आवरण आकाशग गा व ण े म म
१९८५ म यह पता चला क आकाशग गा के खाली थान म म

से भरा है जो

है अतः उसे वा णी कहते ह। पहली बार

है। पृ वी के ३ म डल ३ धातु ह- थल, जल, वायु। चतुथ वयं

जीव-समूह है।
तद य ि यमिस पाथो अ यां नरो य देव यवो मदि त।
उ म य स िह ब धु र था िव णोः पदे परमे म व उ सः॥५॥
ता वां वा तू यु मिस गम यै य गावो भू रशृ गा अयासः।
अ ाह तदु गाय य वृ णः परमं पदमव भाित भू र॥६॥
िव णु के परम पद से भू र-शृ ग गाय बनती ह, उसी म परमपद ि थत है (अवभाित)।
यु नो कोरोना (गोलोक) बनता है िजसके भीतर
अ याय ३)। गाय

ा ड (परम-पद) के िव करण से

ा ड पी िवराट् बालक का ज म होता है (

वैव पुराण, कृ ित ख ड,

पी पशु से भी जो बाहर िनकलता है (दू ध, मू ) वही हमारा भोजन है। यहां भू र के दो भाव ह-आव यकता से

अिधक, तथा उसे देकर भरण। इसका मूल है भू +

न् या भृञ् भरणे (पािणिन धातुपाठ १/६३९, ३/५)। नवा बुिभभु र

िवलि बनो घनाः(अिभ ान शाकु तलम् ५/१२)। अतः अपनी आव यकता से अिधक भू र है, उसके वतः दान से भरण होता है।
भूयसी दि णा का यही अथ है। गौ से जो वतः िनकलता है वही उसका भू रशृ ग है। कु रान म यही खाने को कहा गया है तथा
पशु हसा का सवथा िनषेध हैAl-Baquarah-2/23-Who made the earth a bed for you, and the heaven a roof, and caused water to
come down from the clouds and therewith brought forth fruits for your sustenance.
2/62-O Moses, surely we will not remain content with one kind of food; pray, then, to thy Lord for us
that He may bring forth for us of what the earth grows-of its herbs and its cucumbers and its wheat
and its lentils and its onions’ He said, “Would you take in exchange that which is worse for that which
is better?
2/68-Moses said to his people-Allah commands you to slaughter a cow. They said-Do you make ajest
of us?
2/70-He answered-God says, it is cow of dun colour, pure and rich in tone, delighting the beholders.
2/72-God says, it is a cow “not broken to plough the earth or water the tilth; one without blemish; of
one colour. Then they slaughtered her, though they would rather not do it. यहां गाय क पूजा के िवषय म
कहा गया है। बकर का अथ गौ या कोई भी चौपाया है, बकरीद का अथ गाय क पूजा है। यहां उस गाय को मारने के िलये नह

कहा गया है िजसका योग खेत जोतने म होता है (पु ष स तान का)। के वल भूरी गाय (भू रशृ ग= गौ का उ पाद) के उपभोग
क बात कही गयी है।
यो वै स एषां लोकानाम सु िव ानां परा सो ऽ य रत् स एष कू मः॥ (शतपथ ा ण ७/५/१/१)
स यत् कू म नाम। एत ै पं कृ वा जापितः जा असृजत यदसृजताकरो दकरो

मात् कू मः क यपो वै कू म त मादा ः सवाः

जाः का य य इित॥ (शतपथ ा ण ७/५/१/५)
इस म व का उ स या

ोत िव णु का परम पद है ( जहां सूय एक िव दु मा दीखता है-याव नकर य कर साराः-सूय िस ा त

१२/८२)
मानेन त य कू म य कथयािम य तः। श कोः शतसह ािण योजनािन वपुः ि थतम्।
(नरपित जयचया, कू म च )
श कु = १०१३, कू म इसका १०० हजार गुणा अथात् १०१८ योजन है।

ा ड १०१७ योजन अथात् इसका १०वां भाग है।

य ो वै गौः (तैि रीय ा ण ३/९/८/३)
शतयोजने ह वा एष आ द यः) इत तपित। (कौषीत क ा ण ८/३)
स एष (आ द यः) एकशतिवध त य र मयः शतं िवधा एष एवैकशततमो य एष तपित॥ (शतपथ ा ण १०/२/४/३)
सह ं हैत आ द य य र मयः। (जैिमनीय उपिनषद् ा ण १/४४/५)
(११) पुर कृ ता व मिन पा थवेन

यु ता पा थवधमप या।

तद तरे सा िवरराज धेनु दन पाम यगतेव स या॥ (रघुवंश २/२०)
यहां गौ के िलये धेनु श द का योग वै दक है। दन म सूय क जो करण पृ वी पर पड़ती ह वह गौ ह। वह ताप के

प म शोिषत

हो जाती ह तथा उसका एक अंश सायं काल म िनकलता है, वह धेनु है। यहां सायं काल के वणन के कारण धेनु श द का योग हैअ

तं म ये यो वसुः अ तं यं यि त धेनवः॥ (ऋक् ५/६/१)

बड़े मू य क

वण मु ा गौ है, उसका छोटा भाग धेनु है, सबसे छोटी मु ा दीनार (दीनाथ) या िन क (पंजाबी म िन ा, इसक

धातु िनके ल) हैक इमं दशिभमम इ ं

णाित धेनुिभः। यदा वृ ािण ज घनदथैनं मे पुनददत॥ (ऋक् ४/२४/१०)

स भूयसा कनीयो ना रचीद् दीना द ा िव दु हि त वाणम्॥९॥
एवमु ो नरपित ा णैवदपारगैः। गवां शतसह ािण दश ते यो ददौ नृपः॥५०॥
दशको ट सुवण य रजत य चतुगुणम्॥ (रामायण, बाल का ड, अ याय १०)
(१२) इ थं तं धारयतः जाथ समं मिह या महनीय क

ः।

तीयुि गुणािन त य दनािन दीनो रणोिचत य॥ (रघुवंश २/२५)

स तानकामाय तथेित कामं रा े ित ु य पयि वनी सा।
दु वा पयः प पुटे मदीयं पु ोपभु

वेित तमा ददेश॥(रघुवंश २/६५)

रघुवंश का पूरा ि तीय सग पु कामेि य का वणन है, अतः इसम वै दक वणन अिधक ह। पु कामेि य को रामायण म
अ मेध य कहा गया है। अ श द का भौितक अथ घोड़ा है िजसका योग गाड़ी ख चने म होता है। अतः सभी िव म अ
वह शि है िजससे कोई व तु चलती है। ाजाप य काल
ा ड का अ
मण काल है िजसे म व तर कहा गया है। उसे बनाने
वाला जापित अ है। सभी या का िनय क ई र भी अ है। सूय शि का मूल ोत होने से अ है। पृ वी पर समु ी
हवा

से जहाज चलते थे, ये वायु से शि

क याचना करने के कारण याचक (महारा तथा ओिडशा म नािवक क उपािध)

कहलाते थे-इनको आज भी अं ेजी म याच कहते ह। ये समु ी हवाय अ

ह, जहा ये शा त या कम शि

क ह वह भ ा -वष

था (को रआ, जापान)। इसे अं ेजी म (horse latitude) कहते ह, िजसका वही अथ है। रा य के यातायात तथा संचार

व था

अ मेध य है। उसक बाधा राजा ही दू र कर सकता है, अतः यह य राजा का दिय व है। शरीर के भीतर ाण का संचार अ
है, उसक

कावट को दू र करना अ मेध य है। दशरथ को वृ

स ार ठ क करना ज री था, अतः उनके िलये अ मेध य

वयस म स तान उ पि करनी थी अतः उनके शरीर का ाण

आ। य गौ है, उसका उ पाद भू र-शृ ग है, अतः य क ा को

ऋ यशृ ग कहा गया है। रघुवंश म दलीप के पु ज म के िलये अ मेध य
दलीप तु महातेजा य ैब िभ र वान्।
अग वा िन यं राजा तेषामु रणं ित।

आ य क उनको य मा था।

शद् वषसह ािण राजा रा यमकारयत्॥८॥
ािधना नरशादू ल कालधममुपेियवान्॥९॥ (रामायण १/४२)

यहां भगीरथ के िपता का नाम दलीप है।
दलीप, रघु, अज, दशरथ यह म ठीक है क तु उनके बीच कई राजा

को इस का

म छोड़ दया गया है। वा मी क

रामायण, अयो याका ड, अ याय ११० म इनका वणन हैिवव वान् क यपा
े मनुवव वतः वयम्। सतु जापितः पूविम वाकु तु मनोः सुतः॥६॥
इ वाको तु सुतः ीमान् कु ि र येव िव ुतः। कु ेरा मजो वीरो िवकु ि दप त॥८॥
िवकु े तु महातेजा बाणः पु ः तापवान्। बाण य च महाबा रनर यो महातपा॥९॥
अनर या महाराज पृथू राजा बभूव ह। त मात् पृथोमहातेजाि श कु दप त॥११॥
ि श कोरभवत् सूनुधु धुमारो महायशाः॥१२
धु धुमारा महातेजा युवना ो जायत। युवना सुतः ीमान् मा धाता समप त॥१३॥
मा धातु तु महातेजाः सुसि ध दप त। सुस धेरिप पु ौ ौ ुवसि धः सेनिजत्।।१४॥
यश वी ुवस धे तु भरतो रपुसूदनः। भरतात् तु महाबाहोरिसतो नाम जायत॥१५॥
यह अिसत हैहय तथा यवन से परािजत होकर वन म चले गये। पुराण म इनका नाम बा है। वन म इनके पु राजा सगर येअसमञस तु पु ोऽभूत् सागर येित नः ुतम्।।२६॥
अंशुमान तु पु ोऽभूदसम य वीयवान्। दलीप ऽशुमतः पु ो दलीप य भगीरथः॥२७॥
भगीरथा ककु थ ककु था येन तु मृताः। ककु थ य तु पु ोऽभूद ् रघुयन तु राघवाः॥२८॥
रघो तु पु तेज वी वृ ः पु षादकः। क माषपादः सौदास इ येवं िथतो भुिव॥२९॥
क माषपादपु ोऽभू छ खणि वित नः ुतम्॥३०॥
श खण य तु पु ोऽभू छू रः ीमान् सुदशनः। सुदशन याि वण अि वण य शी गः॥३१॥
शी ग य म ः पु ो मरोः पु ः शु ुवः। शु ुव य पु ोऽभूद बरीषो महामितः॥३२।
अ बरीष यपु ोऽभू षः स यिव मः। न ष य च नाभागः पु ः परमधा मकः॥३३॥
अज सु त ैव नाभाग य सुतावुभौ। अज य चैव धमा मा राजा दशरथः सुतः॥३४॥
त य ये ोऽिस दायादो राम इ यिभिव ुतः॥३५॥
िव व के सभी िनमाण ३ कार के ७ ारा ये ह जो मूल वेद अथव क

थम पि

है। इसी का य

प पु ष-सू

म कहा

गया हैये ि ष ाः प रयि त िव ाः॥ (अथव १/१/१)
िव

के १३ तर ह, सभी म ३ कार के ७ त व ह गे। िव

िनमाण का म है-७ लोक, ८ द

सृि , ६ पा थव सृि -अतः

७८६ से काय का आर भ कया जाता है। इसका श द-संकेत िबि म ला है िजसका अथव देश अरब म अिधक योग होता था।
७-७ लोक आकाश म, पृ वी पर तथा शरीर के भीतर ( ७ कोष) ह। पु ष सू

म पु ष पी पशु को ही बा ध कर ३ गुणा ७

सिमधा ारा िनमाण आस ा यासन् प रधयि ः स सिमधः कृ ताः। देवा य

ं त वाना अब न् पु षं पशुम्॥(ऋक् १०/९०/१५)

पु कामेि का अ मेध प म वणनपु ाथ हय (=अ ) मेधेन य यामीित मितमम॥ तदहं य ु िम छािम हयमेधेन कमणा॥ (रामायण १/१२/९)
इसम २१ त भ िविभ ३ कार के का

के बनते ह (रामायण १/१४/२२-२७)-

एक वशित यूपा ते एक वश यर यः। वासोिभरेक वशि रेकैकं समलंकृताः॥२५॥
यहा रघुवंश म २१ दना मक य को ३ गुणा ७ कहा गया है।
वेद तथा क पसू

म ४ पि य के काय कहे गये ह जो व तुतः एक ही प ी के ४ कार कम ह-मिहषी, प रवृ ा, ववाता,

पालागली।
होता वयु तथो ाता ह तेन समयोजयन्। मिह या प रवृ याथ वावातामपरां तथा॥ (रामायण १/१४/३५)
यहां भी प ी के ४ कम दखाये गये ह- सुदि णा ारा ग ध-माला का अपण ( ोक १), गाय के पीछे अनुगमन ( ोक २), लौटने
पर वागत ( ोक २०) तथा अ त म राजा के साथ नि दनी का दु ध पान। अ य अ
अथ योऽसौ (सूयः) तपत एषो अ ः
वा णो

ेतो

तथा अ मेध ह-

पं कृ वा -- (ऐतरेय ा ण ६/३५)

ः। (शतपथ ा ण ७/५/२/१८)

अ ो मनु यान् अवहत्। (शतपथ ा ण १०/६/४/१)
ई रो वा अ ः (तैि रीय ा ण ३/८/९/३ आ द)
रा ं वा अ मेधः। (शतपथ ा ण १३/१/६/३, तैि रीय ा ण ३/८/९/४)
ीव रा म मेधः। (शतपथ ा ण १३/२/९/२, तैि रीय ा ण ३/९/७/१)
यजमानो वा अ मेधः। (शतपथ ा ण १३/२/२/१)
ाणापानौ वा एतौ देवानाम्। यदका मेधौ। (तैि रीय ा ण ३/९/२१/३)
एष (अ मेधः) वै

वचसी नाम य ः। (तैि रीय ा ण ३/९/१९/३)

(१३) अथ नयन समु थं योितर े रव ौः सुरस र दव तेजो वि निन

ूतमैशम्।

नरपितकु लभू यै गभमाध रा ी गु िभरिभिनिव ं लोकपालानुभावैः॥ (रघुवंश २/७५)
आकाश म नयन सूय है। उससे िनकला तेज अि गरा है। सूय के आकषण के कारण ह अपनी क ा म रहते ह तथा पदाथ को
हण करते ह। यह भृगु गुण है। भृगु तथा अि गरा-दोन के कारण जीवन च चल रहा है। जहां दोन का सम वय हो रहा वह
वह च

क ा का े है। यहां िमलन होने के कारण यह अि (अ = यहां) है। अथवा भृग,ु अि गरा दोन के ३-३ भाग ह,

स तुलन गुण वाला अि एक ही है। इसके ३ (ि ) भाग नह है, अतः यह अि
ारा च

क उ पि

ई। सूय तेजके

ोत प म वृषा (वषा करने वाला) या पु ष है। आकषण या भृगु ारा यह सुरस र

(आकाशग गा) का पदाथ हण करता है, हण करनेवाला पदाथ या े
माता है। इसी कार ी के गभ म पु ष का शु तथा
समानता दखायी गयी है।
च ोः सूय अजायत (पु ष सू

आ। इस कार आकाश म अि या उनके ने

ी है, च

म डल के के

म ि थत पृ वी इस कार

ी का रज िमलने से पु का ज म होता है। इस कार दोन ज म म

१३, ऋक् १०/९०/१३)

अ गारे योऽि गरसः (समभवन्। (शतपथ ा ण ४/५/१/८)
ता यः ा ता य त ा यः संत ा यो य ेत आसी दभृ यत यदभृ यत त माद् भृगुः समभवत् (गोपथ पूव १/३)
अि ः आ द य-यम-एते अि गरस--- वायुराप

मा इ येते भृगवः। (गोपथ पूव २/९)

त ैत ेवाः। रेतः (वाचः सकाशा पिततं गभ) चम वा यि म वा ब ु त

म पृ छ य ेव या दित ततोऽि ः स बभूव॥ (शतपथ

ा ण १/४/५/१३)
वागेवाि वाचा

म तेऽि ह वै नामैत दि रित। (शतपथ ा ण १४/५/२/२)

ततोऽ च यो भृगुज े अ गारे योऽि गरा ऋिषः॥३॥ जापित सुतौ दृ वा
आ यामृिष तृतीयोऽिप भव व ैव मे सुतः॥४॥ (बृह ेवता)
(१४) अग यिछ ादयनात् समीपं दगु रा भा वित संिनवृ े।

ा वाग यभाषत।

आन दशीतािमव वा पवृ

िहम ु त हैमवत ससज॥ (रघुवंश १६/४४)

अग य क रािश ९०० तथा ाि त ८०० दि ण सूयिस ा त तथा वराहिमिहर ारा कही गयी है।

गु तथा ल ल ने इसक

ि थित ८७० कही है, क तु दि ण ाि त वही कही है।
अग य नामा िमथुन ऽशकै ि िभः--॥७॥ मा छरांशाः खगजाः (ल ल, िश यधीवृि द त

११/७-८)

अशीितभागैया यायामग यो िमथुना तगः॥ (सूयिस ा त ८/१०)
िवि ो दि णत तत् ा तेभागस स या। िमथुन य स वशे भागेऽग यो नतैभागैः॥
( गु - ा
फु ट िस ा त १०/३५)
तािभः ककटका ा ल ं तादृ शे सह ांशौ। या याशाविनतामुखिवशेषितलको मुिनरग यः॥
(वराहिमिहर-प िस ाि तका १४/४)
अग य का उदय तब होता है जब सूय दि ण दशा म हो। सूय माग ाि त-वृ का दि णी भाग दीखने पर वहां ि थत अग य
भी दीखता है। यह अपने थान के अ ांश पर िनभर है। उ र भारत म यह वषा ऋतु समा होने पर दीखता हैउ दत अग य प थ जल शोषा। िजिम लोभिह सोखइ स तोषा॥
(तुलसीदास, रामच रतमानस, कि क धा का ड १५/३)।
ब त उ र के थान म यह नह दीखेगा। क तु यहां अग य क रािश का उ लेख है। जब उसक रािश (िमथुन के अ त या कक
आर भ) म सूय जाता है तो उसक उ रायण गित समा होती है। यह िव मा द य काल म होता था जब अयनांश शू य था।
अतः िमथुन रािश म सूय के मास को अग य मास कहा जा सकता है। य द उ रायण आर भ (सायन मकर सं ािन) से वष
आर भ हो ( द
दन क गणना) तो यह ६ठा मास होगा। िवषुव सं ाि त के चै मास से िगनने पर यह तीसरा मास है। रोम म
थम प ित चली, अतः अग य ६ठा मास था, से टे बर ७वां, अ टोबर आठवां, नव बर नवां, तथा दस बर १०वां था जैसा
उनके नाम से प है। (sept =स , oct = अ , nova = नव, deci = दश)। अतः जुिलअस सीजर के उ रािधकारी औ टेिवओ
का नाम अग तस पड़ा-उसका ज म या अिभषेक वष। असुर वष दि णायन से आर भ होते थे, अतः इसे पिव मानते थे, जैसे
देवता उ रायण आर भ को पिव मानते ह। अतः अग त (august) का अथ यूरोपीय भाषा

म पिव होता है।

(१५) कु मारस भव, ि तीय सगनमि मूतये तु यं ा सृ े ः के वला मने। गुण यिवभागाय प ा े दमुपेयुषे॥४॥
यदमोघमपान त ं बीजमज वया। अत राचरं िव ं भव त य गीयसे॥५॥
ितसृिभ वमव थािभमिहमानमुदीरयन्। लयि थितसगाणामेकः कारणतां गतः॥६॥
ीपुंसावा मभागौ ते िभ मूतः िससृ या। सूितभाजः सग य तावेव िपतरौ मृतौ॥७॥
उ ातः णवो यासां यायैि िभ दीरणम्। कमय ः फलं वग तासां वं भवो िगराम्॥१२॥
वमेव ह ं होता च भो यं भो ा च शा तः। वे ं च वे दता चािस याता येयं च य परम्॥१५॥
पुराण य कवे त य चतुमुखसमी रता। वृि रासी छ दानां च रताथा चतु यी॥१७॥
यहां वै दक सृि िव ान का वणन है। अ
इनके ारा ३ गुण
म क ा, काय,

ारा सृि
या,

के २ भाग होते ह िजनको कृ ित-पु ष, अि -सोम, ाण-रिय आ द कहा गया है।

यी। ३ कार के कम अ

ोत, प रणाम आ द सभी एक ही

क ३ मू

यां ह। लय-ि थित-सग-ये ३ अव थाय ह। सृि िनमाण

ह, अतः इस काय को सुकृत कहते ह-

अस ा इदम आसीत्। ततो वै सदजायत। तदा मानं वयमकु त। त मा

सुकृतमु यते। य ै तत् सुकृतं रसो वै सः। (तैि रीय

उपिनषद् २/७/१)
सुकृित श भु तन िवमल िवभूित। मंजुल मंगल मोद सूित॥ (रामच रतमानस, बालका ड ५/२)
ि धा कृ वा मनो देहम न पु षोऽभवत्। अ न नारी, त यां स िवराजमसृजत् भुः॥ (मनु मृित १/३२)
तद येतत् ऋचो म्-आपो भृ वि गरो

पमापोभृ वि गरोमयम्।

सवमापोमयं भूतं सव भृ वि गरोमयम्॥ अ तरैते यो वेदा भृगूनि गरसः ि ताः॥ (गोपथ पूव १/३९)
अ ीषोमा मकं िव िम यि राच ते। रौ ी घोरा वा तैजसी तनुः। सोमः श यमृतमयः शि करी तनुः॥

---- अतएव हिवः स तम ीषोमा मकं जगत्॥४॥ (बृह ाबालोपिनषद् २/१-८)
िशव-पावती से कु मार क उ पि ऐसी ही है जैसी आकाश के म डल के बनने के बाद पृ वी पर जीव सृि । आधार
माता या गौ है। उसमे तेज

पी बीज डालनेवाला सूय िपता है।

पा पृ वी

ा ड िपतामह है। वय भू म डल िपतामह है। इस म म

सौर म डल के भीतर पृ वी पर सृि को कु मार सृि कहते ह।
कु मारं माता युवितः समु धं गुहां िबभ त न ददाित िप े।
यं कु मारं नवं रथमच ं मनसाकृ णः॥ (ऋक् १०/१३५/३)
सृि के ९ सग ह िजनके अनु प सूय-िस ा त म ९ कार के कालमान कहे गये ह। अि तम नवम सृि कु मार है। अ

प रस

था। उसका

पम

प अप् है। उसका अि -सोम या पदाथ-शि

प म िवभाजन आ। पदाथ का

ा ड का समूह के

घनीभूत आ-यह थम अि (घनीभूत पदाथ या तेज) है जो िपता कहा गया है। इसके बाद इसके ६ और तर ये जो इसक
वंश-पर परा है।
(१)

-अि - ( वाय भुव, स य लोक)-िपता-

यो नः िपता यो जिनता िवधाता धामािन वेद भुवनािन िव ा। (ऋक् १०/८२/३) अि व
यमेवामुं

यै िव ायै तेजोरसं ावृहत्, तेन

ा (ष वश बा ण १/१)

ा भवित। (कौषीत क ा ण ६/११)

(२) देव अि (नारायण अि -सौर)-पु तत् सृ वा तदेव अनु ािवशत्।(तैि रीय उपिनषद् २/६/३)
परो दवा पर एना पृिथ ा परो देवेिभरसुरैयदि त। कं ि व भ द आपो य देवा समप य त िव े॥ (ऋक् १०/८२/५)
तिम भ थमं द आपो य देवा समग छ त िव े॥६॥
आपो नारा इित ो ा आपो वै नरसूनवः। ता यद यायनं पूव तेन नारायणः मृतः॥ (मनु मृित १/१०)
(३) अ ाद अि (वाम अि -पा थव)-पौ
अ य वाम य पिलत य होतुः (ऋक् १/१६४/१)
वामं नो अ वयमन् वामं व ण सं यं। वामं

ावृणीमहे। (ऋक् ८/८३/४)

अि व देवानाम ादः। (तैि रीय ा ण ३/१/४/१)
जापतेया अनादा तनूः तदि ः। (ऐतरेय ा ण ५/२५)
(४) स वसर अि (य अि -३३ देवता)- पौ स व सरो वै य

जापितः। (शतपथ ा ण १/२/५/१२)

स व सरो वै देवानां ज म। (शतपथ ा ण ८/७/३/२१)
(५) कु मार अि (पा थव अि -स व सर का रेत) वृ

पौ -

तानीमािन भूतािन च, भूतानां च पितः-स व सरे उषिस रे तोऽस त्। स व सरे कु मारो ऽजायत। सोऽरोदीत्। यदरोदीत्, त मात्
ः। (शतपथ ा ण ६/१/३/८-१०)
(६) िच अि (पा थव अि -कु मार अि का िवव )-अितवृ
अि व

पौ -

ः (१) आपो वै सवः (२), ओषधया वै पशुपितः (३), वायुवा उ ः (४), िव ु ा अशिनः (५), पज यो वै भवः (६),

जापितव महान् देवः (७) आ द यो वा ईशानः (८) । ता येतािन अ ावि
सोऽयं कु मारो

पािण। कु मारो नवमः।.. एता येवा य पािण,

पा यनु ािवशत्। त य िचत य नाम करोित। ... सवािण िह िच ा यि ः। (शतपथ ा ण ६/१/३/१०)

(७) पाशुकाि (पा थवाि -िच

का योग, पशुसदृ श)-वृ ाितवृ

पौ -

जापितः (स व सरः) अि

पा य य यायत्। स योऽयं कु मारो

पा यनु िव आसीत्, तम वै छत्। सएतान प

पु षं, अ ,ं गां, अ व, अजम्। यदप यत्, त मादेते पशवः। स एतान प

पशूनप यत्-

पशून् ािवशत्। स ऐ त-इमे वा अि ः। (शतपथ

ा ण ६/१/४/१-४)
ऋ वेद के (७/१०१,१०२) सू

म कु मार सृि का वणन है। सभी पुराण इनका वणन करते ह। भागवत पुराण म अ

को

िमलाकर १० सृि कही गयी है। पृ वी का बाहरी आवरण पवत आधार पर होने से यह पावती है। िपता सूय िशव का एक प है
(सूय, च

अि ने ह)- इनसे जो सृि होती है वह पृ वी पर ही रहती है, अथात् माता इसे अपने पास ही िछपा कर रखती है।

६ ऋतुय पा थव सृि क ६ माताय ह। संव सर के ऋतु च का आर भ उस िव दु से होता है जहां ाि तवृ को िवषुव वृ
काटता है-यहां कची क तरह २ शाखाय िनकलती ह अतः इसे कृ ि का (कची) कहते ह। यह से ाि त आ द क गणना होती है।
इसके िवपरीत दशा म जहां दोन शाखाय िमलती ह, वह िवशाखा हैमुखं वा एत

ाणां यत् कृ ि काः। (तैि रीय ा ण १/१/२/१)

तानीमािन भूतािन (= षडृ तवः) च भूतानां च पितः संव सर ऽउषिस रेतोऽिस न् स संव सरे कु मारो ऽजायत (शतपथ ा ण
६/१/३/८-१०)
संव सर एव कु मार उि
कु मार क ६ माता

ासित (शतपथ ा ण ११/१/६/५)

का नाम कृ ि का के ६ तार से पड़ा है, सातवां तारा म द है।

अ बायै वाहा, दु लायै वाहा। िनत यै वाहाऽ य यै वाहा। मेघय यै वाहा वषय यै वाहा। चुपुणीकायै वाहेित। (तैि रीय
ा ण ३/१/४/१)
अ बा को छोड़कर बाक ६ माताय भौितक प म का
बंगाल, ओिडशा म दु ला का अथ का

के य काल म सेना के ६ े थे। बंगाल, ओिडशा म दु ला के मि दर ह,

के य है। पंजाब म चोपड़ा उपािध है (चुपुणीका) । असम म वषय ती होना चािहये (वषा का

े ) । गुजरात, राज थान म वषा कम होती है क तु मेघानी उपािध ब त है-यह मेघय ती का

े है। अ य ती महारा , आ

हो सकते ह यहां से मेघ का वाह आता है। िनति तिमलनाडु का है।
(१६) मेघदू त-पूवमेघः-आषाढ य थम दवसे मेघमाि

सानुं व

डा प रणतगज े णीयं ददश॥२॥

िस ा त योितष मत से आषाढ़ का थम दवस शु ल ितपदा है। िव म स वत् किलयुग के ३००० वष बाद आर भ आ,
अतः यह ऋतु च से १ १/२ मास पीछे हट गया और इसम मास का आर भ कृ ण प से आ। वष का आर भ चै शु ल
ितपदा से ही रहा। अतः चै मास का थम भाग पूव वष के अ त म आ। इसी के अनुकरण से जुिलअन् कै ले डर म भी जूनो
देवी के नाम पर वष का आर भ आ, िजनका मुंह दोनो तरफ रहता है। वेद म भी अ दित न त्र (पुनवसु) इसी कार थाअ दितजातम दितजिन वम् (ऋक् १/८९/१०)। यहां शु ल प से ही वष आर भ माना गया है। िव मा द य काल म आषाढ़
शु ल प से रामिग र (ओिडशा) म वषा आर भ होती थी, आज २००० वष बाद यह १ मास पीछे ये शु ल प से आर भ
होता है। देव युग म वषा से ही स व सर का आर भ होता था, अतः इसे वष कहते थे। वषार भ के समय रथ या ा होती थी
य क सूय रथ का स व सरच इसी समय आर भ होता था। ितपदा से गिणत अनुसार मास आर भ होने पर भी च

दशन

ि तीया को होता है, अतः आषाढ़ शु ल ि तीया को रथ-या ा होती है। आषाढ़ म वषा होने से बाहरी या ा ब द हो जाती है।
घर के भीतर ही

ड़ा करनी पड़ती है, उस थान को भी आषाढ़ा = अखाड़ा कहते ह। अतः यहां व - ड़ा का वणन है।

(१७) ा याव तीमुदयनकथा कोिवद ामवृ ान्, पूव

ामनुसरपुर

ीिवशालाम् िवशालाम्॥३२॥

उदयन अवि त के

िस

राजा थे िजनको धोखे से च डमहासेन या

ोत (२१३२-२१०९ ईसा पूव) ने ब दी बनाया था। इनक

कथा भास ने व वासवद ा नाटक म िलखी है। शाला का अथ पाठशाला है। जहां उ तम तर के

ान का संकलन तथा पाठन

होता है वह महाशाला है तथा उसका अ य महाशाल हैशौनको ह वै महाशालोऽि गरसं िविधवदु पस ः प

छ। (मु डक उपिनषद्१/१/३)

इसी कार िव मा द य काल म भी पुराण , मृितय का पुनः वैसे ही संकलन आ, अतः उ ैन को भी िवशाला कहा गया।
ब ीिवशाल भी िवशाल है य क नर-नारायण ने

ास

प म यहां अ यापन, लेखन कया था। बाद म शंकराचाय ने यह

सू भा य िलखा। स भवतः िबहार क िवशाला नगरी (वैशाली) म भी िव मा द य काल म यही काय आ, या उसके िनकट
कु सुमपुर म िश ा के

था (आयभट ारा उ लेख) ।भिव य पुराण, ितसग पव ४, अ याय १-

एवं ापरस याया अ ते सूतेन व णतम्।सूयच ा वया यानं त मया किथतम् तव॥१॥
िवशालायां पुनग वा वैतालेन िविन मतम्। कथिय यित सूत तिमितहाससमु यम्॥२॥
त मया किथतं सव षीको म पु यदम्। पुन व मभूपेन भिव यित समा वयः॥३॥
नैिमषार यमासा

ाविय यित वै कथाम्। पुन

ािन या येव पुराणा ादशािन वै।।४॥

तािन चोपपुराणािन भिव यि त कलौ युगे।तेषां चोपपुराणानां ादशा यायमु मम्॥५॥
सारभूत

किथत इितहाससमु यः। य ते मया च किथतो षीको म ते मुदा॥६॥

त कथां भगवान् सूतो नैिमषार यमाि थतः। अ ाशीित सह ािण ाविय यित वै मुनीन्॥८॥
(१८) उ रमेघः-शापा तो मे भुजगशयनादु ि थते शा गपाणौ शेषा मासा गमय चतुरो लोचने मीलिय वा।।५३॥
दन म तृतीय भाग शयन काल माना गया है। इसी कार द

दन या वष म ४ मास िव णु के शयन का काल है। िव णु य या

कम के व प ह, वषा म या ा ब द हो जाती है, अतः यह िव णु का शयन है। सं यासी भी इस काल म एक ही थान पर रहते
ह-िजसे चातुमास कहते ह। इसके आर भ क एकादशी (आषाढ़ मास क ) ह रशयनी तथा अ त म का
एकादशी है। यह कथा देवो थानी एकादशी के माहा य के
महाका

क क देवो थानी

प म पुराण म व णत है॥ क द पुराण म कािलदास के तीन

क कथा है।

(१९) अिभ ानशाकु तलम् (मंगलाचरण)या सृि ः

ु रा ा वहित िविध तं या हिवया च हो ी,

ये े कालं िवध ः ुितिवषयगुणा या ि थता

ा य िव म्।

यामा ः सवबीज कृ ित रित यया ािणनः ाणव तः,
काल

प म तुित यी है। योितष म काल के २

य ािभः प

तनुिभरवतु व तािभर िभरीशः॥१॥ यहां िशव क दो

प माने गये ह-िन य काल जो लोक का रण करता है, अतः अ तक या

मृ यु भी कहा जाता है। ज य काल कलना मक होता है, िजसक गणना होती हैलोकानाम तकृ त् कालः, कालोऽ यः कलना मकः। स ि धा थूलसू म वा मू
भागवत गीता म इसके अित र

२ और काल क प रभाषा दी है-

(१) िन य काल- यह लोक का

रण करता है अतः र िव

ा मू उ यते॥ (सूयिस ा त १/१०)

से स बि धत है-कालोऽि म लोक यकृ

वृ ो (गीता ११/३२) ।

आधुिनक पदाथ िव ान के उ मागितक के ि तीय िनयम के अनुसार कोई भी िप ड या संहित सदा अ व था क तरफ ही गित
करती है। मनु य बालक से बूढ़ा हो सकता है, बूढ़ा कभी ब ा नह हो सकता। एक बार जो ि थित चली गयी, वह वापस नह
आयेगी, अतः इसे मृ यु भी कहते ह।
(२) ज य काल-यह य से स बि धत है जो च य म म इि छत व तु का िनमाण करता है-सहय ाः जाः सृ वा पुरोवाच
जापितः । अनेन सिव य वमेषवोऽि व कामधुक् ॥१०॥ एवं व ततं च ं नानुवतयतीह यः ….॥१६॥ (गीता, ३) । जनन

करने के कारण यह ज य काल है। यह य क ा अ र पु ष या िव

से स बि धत है। ाकृ ितक च

के अनुसार ही मनु य के य

होते ह िजनसे काल क माप होती है। यह प कलना मक है-कालः कलयतामहम् ॥(गीता, १०/३०)। सभी गणना

म यह

दु ब य है अतः यह कृ ण का व प है। याि क म काल तथा गित दशक के सापे होती है, िव ुत्-चु बक य तर ग क गित
दशक िनरपे है। िस ा त प म िभ होते ये भी हम उनको एक मान कर गिणत करते ह-यह भौितक िव ान का अ ात
रह य है।
(३) अ य काल-य द एक पूण संहित का िवचार कर तो उसम मा ा, उजा, आवेग आ द का कु ल योग ि थर रहता है, िव
िनमाण इसी अ य

का

ोत से आ है अतः इसे धाता कहा गया है। यह अ य पु ष का काल है-अहमेवा यः कालो (गीता,

१०/३३)
(४) परा पर काल-िव

का अ

ोत अनुभव से परे है। उस परा पर पु ष का काल भी परा पर है-अ

भव यहरागमे । रा यागमे लीय ते त ैवा

सं के ॥ (गीता, ८/१८) भागवत पुराण म गीतो

यः सव

काल का िव तार से वणन

है।
िशव िन य, ज य काल दोन के व प ह। िव
काल है।

का दृ य प िल ग है, िजसका सदा रण होता है, उस प का काल िन य

प म िशव को संहारक कहा गया है। दृ य मू

य सूय, च

आ द क गित ारा काल क माप होती है, इस प म

वह ज य काल ह। मनु य ारा माप भी १२ अ गुल के श कु ारा होती है जो वायु पुराण म िल ग कहा गया है। इसक छाया
क दो दशा क म य रेखा ारा दशा िनधारण होता है-दो दशाय तथा म य रेखा ि शूल ह। िशविल ग के ऊपर घट रखा
जाता है, िजससे जल िनकलने का समय घटी कहते ह-इससे िह दी म घड़ी श द आ है। यह सांकेितक प म आयु है- कसी भी
संहित क

याशि

जब समा होती है उस काल तक उसक आयु है, यह धीरे धीरे

ीण होती है जैसे कु भ का जल-

पूणः कु भोऽिध काल आिह तं वै प यामो ब धा तु स तः।
स इमा िव ा भुवनािन यङ् कालं तमा ः परमे ोमन्॥ (अथव १९/५३/३)
अथव वेद के (१९/५३-५४) सू काल सू कहे जाते ह।
(२०) िव मोवशीयम्-वेदा तेषु यमा रेकपु षं
अ तय

ा यं ि थतं रोदसी, यि म ी र इ यन तिवषयः श दो यथाथा रः।

मुमु ुिभ नयिमत ाणा दिभमृ यते, स थाणुः ि थरभि योग सुलभो िनः ेयसाया तु वः॥१॥

का पु ष प म वणन पु ष-सू
को संयती कहा है। रोदसी म
िशवतर (१००० से १ लाख

है। सौरम डल को रोदसी कहा गया है, परमे ी म डल (आकाशगंगा)

दसी तथा वय भू

(ताप े ) पृ वी क ा या १०० सूय- ास तक है, उसके बाद िशव (१००-१०००
ास तक), सौरम डल क सीमा १५७ लाख

ास),

ास तक िशवतम े है। उसके बाद सदािशव े

है। श द तथा अ र क तु यता को वाक् -अथ ितपि भी कहा गया है। तत् सृ वा तदेवानु ािवशत् (तैि रीय उपिनषद्
२/६/३)-सृि के बाद वह सबके भीतर वेश करता है। शरीर के भीतर ाणायाम ारा मृगया-पशुभाव का नाश होता हैयोगवािस (१/१६/८)-ह रण क भोग

पी दू वा के अिभलाषी मन से उपमा), ५.५१.३४(स वावबोध का

मृगिशरा न

है, िजसम

के दि ण मृग ाध न

१०/६१/५-९) ऋ वेद के १९/६१-६२ सू

ाध

का

प )। आकाश म

प है। िपता यत् वाम् दु िहतरम् अिध कन् .. (ऋ वेद

आकाश, पृ वी पर तथा मनु य गभम उ पि का वणन करते ह। यही वणन ऐतरेय

ा ण (३/३३) तथा शतपथ ा ण (२/१/२/८) म भी है। सूय िस ा त (८/१०-११) म इसक ि थित िमथुन २० अंश तथा ४०
अंश दि ण है- वशे च िमथुन यांशे मृगवाधः वि थतः। िव ेपः दि णे भागैः खाणवैः यात् अप मत्॥ इतने ही दि ण अ ांश
पर मृग ाध ीप (मृगत कर = मडागा कर) है िजसे ह रण ीप भी कहा गया है-यहां अपा तरतमा ने तप या क थी ( गग
संिहता ६.१४.८) आकाश म थाणु अयमा है जो वाय भुव म डल का आ द य (आ द
(यूप)। मन क शा त ि थित या समािध थाणु है।

प) है। उसका तीक य

त भ है

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