कठोपिनष - द यामृत

िशवान द

वषय-सूची
पृ
वेश

िनवेद न

११

थम अ याय

थम व ली

१८

थम अ याय

तीय व ली

४१

थम अ याय तृतीय व ली

७४

तीय अ याय

थम व ली

९२

तीय अ याय

तीय व ली

१०९

तीय अ याय तृतीय व ली

१२४

वेश
भारत क एक

मुख

ू िच तन-पर परा है ।
वशेषता उसक अटट

भारत के मनी षय ने ब हमुखी जीवन के
को हटाकर, अ तमुखी

वृ

को

लोभनो एवं आकषण से मन

य दे कर तथा त व- ज ासा से

होकर,जीवन के चरम ल य पर गहन िच

े रत

कया। जीवन,जगत ् और

आ मा के रह य क खोज म उ होने अनेक दशन-प ितय का सृजन
कया। ‘दशन’ का अथ ‘दे खना’ है , न क मा

अनुमान पर आधा रत

वचार करना। इसी कारण भारत म दशन धम

एवं जनजीवन का अंग

बन गया, जब क अ य दे श म वह वा वलास के

प म कुछ िच तक

तक ह सीिमत रहा। वा तव म , स य का अ वेषण करना धम का
ल ण

मुख

है ।
भारत क सम त वै दक एवं अवै दक दशन-प ितय के मूलसू

पर पर जुडे हए
ु ह और सबका ल य परम त व क खोज तथा जीवन म
द:ु ख का िनराकरण एवं
बा

थायी सुख-शा त क

थापना करना रहा है ।

प म विभ न होते हए
ु भी उनम ल स क एकता

अ त:करण क प व ता को
संसार के

है । सभी

वा वेषण के िलए मह वूपण मानते ह।

ाचीनतम

ान- थ
ं वेद ह तथा उपिनष

उनके वैचा रक

िशखर ह।१ वै दक ऋ षय ने धम(स य) का सा ा कार (अनुभव) कया,

‘सा ा कृ त- धमाणो ऋषयो बभूवु:’ ऋ षय ने मं ो के अ तिन हत स य ्
का दशन ् ( प

अनुभव) कया। ऋषयो म

ार:। वा तव म उपिनष

ऋ षय के अनुभव-ज य ् उदगार के भ डार ह , ज ह मं
ित त कया गया है और वे मा
उपिनषद वेदो के

के

प म

वचार अथवा मत नह ं ह।

ानभाग ह तथा उनम कमका ड क उपे ा क

गयी है । य प वेद मे अ तम स य को एक ह घो षत कया गया,
उसको अनेक नाम दे
दया। वेद ने जन
१.

दये गये। उपिनषद ने उसे ‘

के उ र नह ं दए, उपिनषद ने उनके भी उ र

उपिनषद के मह व एवं

वषयव तु क पया ् चचा हम ‘ईशावा य- द यामृत’ के

‘ वे श’ म कर चुके ह तथा यहां उसक पुनरावृ
हमारा अनुरोध है क वे पृ भूि म के
अ तगत

’ (बड़ा) नाम दे

प म उसे

त ् करना अनाव यक है । सुधी पाठक से

यानपूवक् अव य पढ ल।(हमार योजना के

मुख उपिनषद क सरल ट काओं के अित र ’अ ाव गीतारसामृत’का

‘सू म जगत ् म
ववेकान छ एवं

वेश : मन के उस ओर’ इ या द क

णयन तथा

रचना करना भी है ।)

वामी

ी अर व द क रचनाएं उपिनषद को समझने के िलए अ य त उपयोगी ह।

डॉ० राधाकृ णन क रचनाएं भी भारतीय दशन को समझने म अ य त सहायक ह।

दे

दए। उपिनषद परमा मा, जीवा मा सृ

करते ह , क तु एक अ तीय

है ।

वषय

को अ तम स ा के

करते ह। यह एक आ य है
एक ह

आद

क सभी उपिनष

प म

का सा ा कार ह जीवन का परम ल य है ।

ह है ।५
क ठन है ।
मु डक् ,

कार से
तारत य
है ,१ म

ान

है ,४ ये चार महावा य ह। सब कुछ

ान है , अन त है ।६

स य है ,

उपिनषद

ितपा दत

िभ न-िभ न

का िनवचन करते ह तथा उपिनषद म एक

हँू ,२ वह तू है ,३ यह आ मा

का िन पण

के रचना-काल तथा उनक

मुख उपिनष
मा डू य ्,ऐतरे य,

सं या का िनणय करना

यारह कहे गए ह – ईश, केन, कठ,
तै र य,

ेता तर,

बृहदार यक

,
तथा

छा दो य।श कराचाय ने इन सब पर भा य िलख है , य प कुछ
व ान

ने

ेता तर उपिनषद के भा य को श कराचाय- णीत नह ं

माना है । कौषीतक तथा नृिसंहता पनी उपिनषद को स मिलत करने
पर

मुख उपिनषदो क

शाखाएं, ा ण-

सं या तेरह हो जाती है । अग णत वेद-

थ,आर यक और उपिनषद

वलु

हो चुके ह। हम

ऋ वेद के दस,कृ ण यजुवद के ब ीस, सामवेद के सोलह, अथववेद के
इकतीस उपिनषद उपल ध ह। वेद पर आधा रत

चचा है तथा उनसे स ब

उप द

हए
ु ।

ाय:

उपिनषद ह।

ा ण-

ा ण-

थ म य

आर यक ह , जो अर य

(वन ) म

थ एवं आर यक के सू म िच

पूण अंश

थ और आर यक को

जाता है तथा उपिनषद

ा ण-

धानत: कमका ड

हा

ानका ड ह। उपिनषद वै दक-वा मय का

नवनीत ह।
उपिनषद मे

ितपा दत

एक और अ तीय है । वह

है । वह िन य ् और शा त है , अचल है ।

िन वशे ष अथवा िनगुण है । उसे िनषेध

ारा िनगुण

प म व णत कया

जाता है - नेित नेित (यह भी नह ं, यह भी नह ं)।

बणन सेपरे है ।

है । उपिनषद म ‘आ मा’ परमा मा अथवा

‘स एष नेित नेित आ मा’ (बृहद० उप०, ४.४.२२)।

१.
२.

ानं
अहं

(ऐतरे य उप०, ३.१.३)
म ( बृह द० उप०, १.४.१० )

३.

त वमिस (छा दो य उप०, ६.१५ )

५.

सव ख वदं

४.

अयमा मा

(मा डू य उप०, २)
(छा दो य उप०, ३.१४.१ )

ै तर हत

क एक मा

स ा

का पयायवाची है ।

६.

स यं

ानं अन तं

(तै र य उप०, २.१ )

वेद पर आधा रत छह दशनशा

सोपाना

क् ह। मीमांसा म ई र

ित ा नह ं ह, य प वह वेद पर ह आधा रत है । सां य,योग, याय

और वैशे षक

वतं

ह।वेदा त छह शा

उपिनषद ह वेदा त ् अथात वेद का

के सापान मे सव प र है ।

ितपा

अ तम

ान-भाग ह।

उपिनषद म वेदा त ्-दशन स न हत है , अतएव दोन पया वाची हो गए
ह। वेदा त ् का अथ है -वेद

का अ त , येय, अथात

ितपा

अथवा

सारत व।

मनु य म अपने भीतर गहरे

वेश एवं सू म अनुभव

सम त रह य का उ ाटन करने क साम य है ।१ पर
छ न श
वशु

ारा व

परमा मा क

माया है । वेदा त के अनुसार मायार हत

िनगुण अथवा

है तथा मायास हत (अथवा मायोपािध विश )

, अपर

अथवा ई र है, जो सृ

के

ह सगुण

क रचना करता है , कमफल दे त ा

है और भ

का उपा य है । वह अ तयामी है । वा तव म दोन पर

और अपर

त वत: एक ह है ।

भी वा तव म माया से मु

ा णय के दे ह मे रहनेवाला जीवा मा

होने पर आ मा ह है ।

स य है अथात

िन य, शा त त व है और जगत ् िम या अथात
न र है तथा जीवा मा अपने शु
जग म या जीव
है ।

ह एक मा
उपिनषद

प म आ मा ह


ै नापर:। संसार क

त व- वचार से एक
को

व नवत ् असत ् एवं
है ।

स यं

यावहा रक स ा

है , क तु

क ह वा त वक स ा अथात पारमािथक स ा
स य अथात शा त त व है ।
वशेष

मह व

दे कर

काश

लाने

का

काय

श कराचाय (६५५ ई० से ६८८ ई० अथवा ७८८ ई० से ८२० ई०) ने
कया। श कराचाय ने
क सारगिभत

मुख

याहर उपिनषद

सू

( जसम उपिनषद

चचा क गई है ।) तथा भगव ता पर अ त
ु भा य िलखे

और सारे भारत म अ ैत-दशन क

थापना क । श कराचाय ने बौ

आचाय को शा ाथ म यु

ारा परा जत

१.

पूण तक

“ But if it seems strange to you that the old indian philosophers should have known
more about the soul than Greek or medieval or modren philosophers, let us remember
that however much the telescopes for observing the stars of heaven have been improved,
the observatories of the soul have remained much the same .” Max Muller : Three
lectures on the Vedanta Philosophy, London.
भारतीय दाशिनक आ मा के स ब ध म यूनानी,म यकालीन अथवा आधुिनक दाशिनको
से अिधक जानते थे। दरबीन
म कतना भी सुधार हआ
हो, आ मा क वेधशाला तो वह


है ।

करके वै दक सं कृित को पुन

जी वत

कया।

वामी

ववेकान द (१२

जनवर १८६३-४ जुलाई १९०२) ने भी वह काय वदे श म जाकर कया।
भारतीय सं कृ ित को व -सं कृित के
काय श कराचाय

प म

वामी दयान द और

आधार पर कया । कदािचत बु

ित त करने का अदभुत

वामी

ववेकान द ने तक के

खरता एवं मौिलकता लगभग २०

वष क आयु से ४० वष तक स वशे ष रहती है , य प पया

परप वता

लगभग ४० वष से ५० वष तक आ लेती है तथा तदन तर िच
अिभ य

ान के शा त

एवं

मता बढती रहती है । तक तथा अनुभव पर आधा रत
काश से प रपूण होने के कारण कालजयी उपिनषद क

उपे ा होना असंभव है , य प उनके स दे श को आ मसात ् करने के िलए
आ या मक साधना करना िनता त आव यक है ।
ता वक
के

से यह सब

जगत

तर पर जैसा द खता है , वह सब कोरा

कृ ित) है तथा चेतना अथवा
के


ान के

शा त केवल

के

ान तक पहंु चते ह।

् है । हम इ

म नह ं है , माया (अथवा

तर पर सव

तर पर यह जगत ् यथाथ है , आ मा के

असत ् है ।

ह है ।१ संसार इ
ह है । इ

तर पर यह मा

य- तर के

ान सोपाना मक ह।

माया है ,

ान से ह चेतना- तर
सत ् अथात स य का

भी स य है ।२ पदाथ और चेतना म मूलत: भेद नह ं है । वे पर पर
प रवतनीय ह , य प अनुभव के

तर पर वे िभ न-िभ न

यह जगत ् एक ह चेतन-त व से ओत ोत है ।३ वह सव

तीत होते ह।
है , वह इसका

आधार है ।
उपिनषद

मुख

वशेषता स य क साहसपूण खोज है तथा

उसम िनभ कता,बौ कता एवं ता ककता का पुट है । संसार के कसी भी
अ य

ान

थ म

ऐसी मीमांसा तथा गंभीर अ वेषण का त व नह ं ह।

संवाद म पर पर आदर-स मान

दया जाता है तथा कह ं

वचार को

थोपा नह ं जाता। वादे वादे जायते त वबोध: अथात बौ क
संवार से त य का िनणय ् होता है ।

आ तर क अनुभिू त पर बल दया जाता है ,
१.

ैवेदं व िमदं व र म ्। (मु डक उप०, २.२.११)

इदं सव यदयम ् आ मा। ( बृहद० उप०, २.४.६ )।

२. स य य स यम ् (बृहद० उप०, २.१.२: २.३.६)
३. तदोतं च

ोतं चेित (बृह

० उप०, ३.८.४)।

तर पर

गत अनुभव एवं रह यमय
यो क

वानुभव का

माण

सव प र होता है । धम के त व पर भी
स दे ह के समाधान का ऐसा

िच ह लगाकर, ज ासा एवं
कह ं अ य

दे खा नह ं जाता।

उपिनषद के रोचक संवाद म सावभौिमक स य का िन पण कया गया
है तथा वे कसी भी

चिलत धम के अनुपालन म बाधक नह ं हो सकते।

स य के अ वेषक एवं अनुस धाताओं के िलए उपिनषद अमृतमय िस
होते ह। उपिनषद श

अभय उ मु ता और आन द का स दे श दे ते ह।

कठोपिनषद का एक मं

गजन करता है-उठो जाग

करो। ‘उ त त जा त

१.३.१४)। उपिनषद ऐसे
घृणा और शोषण का
आ या मक

ा य वरान ् िनबोधत’

व धम के आधार ह, जहां

थान लेकर शा त क

पु ष से बोध
(कठ० उप०,
ेम और सदभाव

थापना कर दगे तथा जहां

काश म जीना संभव हो सकेगा।

संसार के कसी धम

थ अथवा दशन-

थ म परमा मा का ऐसा

ता वक वणन उपल ध नह ं है , जैसा उपिनषद म है । संसार म केवल
उपिनषद ह आ मा परमा मा जगत और जीवन के रह य क खोज म
पूणत:

संल न है । उनम कुछ भी ववादा पद नह ं है तथा मा

क ह चचा है ।

व ा

और स चदान द है । वह सत है िन य एवं शा त है

तथा चैत य व प

काश व प और आन द व प है । वह अमृतमय है ,

अन त और अिनवचनीय है । य प वह बु
अ तरा मा म उसक

नह ं है , तथा प वशु

द यानुभिू त अव य हो सकती है । उसक

ाि

के

िलए कह जाना नह ं है तथा वह अपने भीतर ह सुलभ है । वा तव म
हमारा जीवा मा परमा मा का अंश है तथा अपने शु
परमा मा ह

है । गु

करता है -‘अहं
नह ं हो सकती।

कहता है -‘तत ्

वयं

वम ् अिस’ और साधक अनुभव

अ म।’ जीवन म इससे बढकर अ य कोई उपल ध

१. इह चेदवेद थ स यम त ने चे दहावेद महती वन
भूतेषु भूतेषु विच य धीरा :

- जसने इस मानव दे ह म पर
पर

प म वह

:।

े या मा लोकादमृता भव त।।(केन उप०, २.५)

को नह ं जाना, वह घोर

को जान िलया, वह कुशल है । य द इस दे ह म रहते हए

वनाश है । बु मान लोग

दे खकरइस लोक से जाते ह, वे अमर हो जाते ह।

ा णमा

म पर

को

य वा एतद ंर गा य व द वाऽ मा लोकात ् ैित स कृपणोऽथ।
य एतद ंर गािग

-या व

व द वाऽ मा लोकात ् ैित

य ने कहा-हे गािग जो इस संसार से

(अभागा) है । जो इसे जानकर जाता है , वह

ा ण : ॥

(बृह० उप०, ३.८.१०)

को जाने बना ह जाता है , वह कृपण

ा ण है ।

उपिनषद क चचा करते हए
ु भगव ता का उ लेख करना अ य त

ासंिगक है । भगव ता को भी उपिनषद क सं ा द गई है । भगव ता
का कठोपिनष

के साथ घिन

संबंध है । उसके अनेक

पर आधा रत है । यहां उसक
संसार म जब मानव सब
को

व तारपूवक् चचा

य , वृ

करना अनभी

ओर बढे गा और मानवमा

म ह नह ं

और सम त वन पितय म भी चैत य-त व का

दशन करे गा, तब उपिनषद का अ या म ् एक क याणकार नई
का आधार बन जाएगा तथा मानव
सकेगा। भौितक
आ या मक

है ।

कार क संक णता,अस ह णुता और क टरता

यागकर आ या मकता क

ब क पशु-प

थल कठोपिनषद

तर पर

तर पर ह

यव था

ेमपूण सह-अ त व का पाठ सीख

वषमता कभी समा

नह ं हो सकती तथा

स ची समता और शा त क

थापना हो

सकती है । उपिनषद वै दक मनीषा का एक आलोक- त भ है जो सारे
संसार को

काश दे ता है ।

जो मनु य स पूण
सब

ा णय को परमा मा म िनर तर दे खता है और

ा णय म परमा मा को दे खता है , वह कसी से घृणा नह ं करता।

जब परमा मा को जानने पर सब

ाणी परमा म व प ह द खते ह , तब

एक व को दे खनेवाले पु ष के िलए मोह और शोक नह ं रहते तथा वह
आन द से प रपूण हो जाता है ।१ भौितक

तर पर ह रहने से य

समा म कभी सा य और शा त क

थापना नह ं हो सकती तथा

आ या मकता को

मुख एवं भौितकता को गौण मानकर और उनका

समुिचत सम वय होने पर ह
सुख को

एवं

एवं समाज के जीवन म शा त और

ित त कया जा सकता है ।

उपासना क प ितय क िभ नता को

वीकार करने पर सबका

ग त य एक ह परमा मा को मानने पर पर पर ववाद और संघष समा

ा य वह एक है ।२ माग अनेक ह,

हो सकते ह। सब धम का सा य एवं
ल य एक ह है ।
१. य तु

सवभूतेषु

सवा ण

चा मानं

भूता या म येवानुप यित।
ततो

न वजुगु सते ॥६॥

य मन ् सवा ण भूता या मैवाभू जानत:।

२.

को मोह: क: शोक एक वमनुप यत:।।७।।

चीनां वैिच या

नृणामेको ग य

ऋजुकु टलनानापथजुषां

वमिस पयसामणव इव।

-ईशा० उप०
(िशवम ह न

तो )

- िचय के भेद के कारण सीधे , टे ढ़े आ द अनेक पथ पर चलते हए
ु मनु य का एक
तू ह ल य है , जैसे न दय का ल य समु

ये यथा मां

ते तां तथैव

जा यहम।।

होता है ।

- जो परमा मा को जैसे भी भजता है , परमा मा उसे वैसे ह

-गीता,४.११
वीकार लेता है

भारतीय धम के स दभ म यह कहना आव यक
चावाक-दशन जडत व के अितर

चेतनत व को

तीत होता है क

वीकार नह करता,

क तु, जैन-दशन और बौ -दशन चेतनत व (आ मत व) के अ त व
को अपने- अपने ढं ग से

वीकार करते है , य प वे अवै दक ह, और

‘ना तको वेदिन दक:’ के आधार पर उ ह ना तक कहा जाता है । वे वेद
के

ारा

ऐसा

ितपा दत
तीत होता है

भगवान ् बु ) ने

अथवा ई र क मा यता को
क उनके मूल

व ाओं (भगवान ् महावीर और

वयं ई र के अ त व को अमा य नह ं कया तथा

क पशु- हं सा आ द दोष का िनषेध करने म उ हे ई र-त व क

उपे ा करनी पड़ । उ होने ‘वै दक

हं सा न भवित’ के कु चार कर उिचत

वरोध कया। उनके परवत आचाय ने अपनी बु
प ितय और शा

वीकार नह ं करते।

के अनुसार दशन-

क रचना कर द । काला तर म भेद बढते गये और

दाय का उदय हो गया। हम
गत रखकर, उनके

वतक क जन-क याण क भवना को

ारा चेतनत व

वीकृित के आधार पर पर पर

सम वय एवं मौिलक एकता पर बल दे ना चा हए। वघटनकार शा ाथर ्
के युग बीत चुके ह। बु

क अ हं सा, क णा और मै ी सदै व

ासंिगक

रहे गी।
अनेक पा ा य व ान का
के मूल उपिनषद

मत है क भारत के सम त धम

से जुड़े हए
ु ह। यह सव व दत है

डायसन, मे समूलर१ , ह सले, वल डु रा ट२ आ द अग णत
ने उपिनषद

मु क ठ से

शंसा क

क शापनहावर,
यात व ान

है । भारत के भ व य क

वलता तथ व -क याण क आशा उपिन द पर आधा रत है । उनम

सावभौिमकता है तथा कह ं

संक णता एवं क टरता का पुट नह ं है । इस

त य को जान लेने और उपिनषद के

काश का

सार कर लेने मे ह

कृ ताथता है ।


1. “ It is surely astounding that such a system as the Vendanta should have been slowly
elaborated by the indefatigable and intrepid thinkers of India thousands of years ago, a system
that even now makes us feel giddy, as in mounting the last steps of the swaying spire of a
Gothic Cathedral. None of our philosophers, not expecting Heraclitus,Plato , Kant or Hegel
has ventured to erect such a spire never frightened by storms or lightthings. Stone after
regular succession after once the frist step has been made, after once it has been clearly seen
that in the beginning there can have been but one, as there will be but one in the end, Whether
We call it Atman or Brahman.” (Six Systems of Indian Philosophy-Max-Muller)

कठोपिनष

म अनेक

थल

पर अनेक

यागकर अथात ् सम त भय को

आ ान कया गया है ।उ
कठोपिनष

कार से मृ यु के भय को

यागकर, अजेय एवं अभय होने का

त जा त- उठो, जागो।

का िनयिमत पाठ िन य ह

क याण के माग को

श त कर दे ता है ।

यह आ यजनक है क यूरोप के महान िच तक ने ऐसा दशन नह ं दया ,जैसा भारत ने।
भारत के वे दा त का एक ह आधार है , एक ह िशखर है -आ मा अथवा

न ्।

2. “It is true that even across the Himalayan barrier, India has sent to us such questionable
gifts as grammar and logic,philosophy and fables, hypnotism and chess, and above all, our
numerals and our decimal system. But these are not the assence of her spirit; they are trifels
compared to what qe may learn from her in the future.As invention , industry and trade bind
the continents together,or as they fling us in to conflict with Asia We shall study its
civilisation more closely and shall absorb, even in enmity, some of its ways and ahoughts.
Perhaps, in return for conquest , arrogance and spoliaton, India will teach us the tolerance and
gentleness of the mature mnd, the quit content of the unacquisitive soul, the calm of the
understanding spirit, and a unifying, pacifying love for all living things .” Will Durant : The
Story of Civilisation
भारत ने व को एक अदभुत वचार-कोश एवं जीवन-दशन दया।
कठोपिनष

के कुछ मं , या यास हत, वशेष पठनीय एवं मननीय ह-

१.१.२ , १.२.२ , १.२.९ , १.२.१२ , १.२.१३ , १.२.२० , १.२.२३ , १.२.२४ १.३.३४, १.३.१२ , १.३.१४
, २.१.१ , २.१.११ , २.१.१३ , २.१.१४ , २.१.१५ , २.२.१ , २.२.१२ , २.२.१३ , २.२.१५
२.३.१३ , २.३.१४-१५ , २.३.१६ , २.३.१७।

२.३.१०-११ ,

िनवेदन
येक युग क अपनी कुछ वशेषताएं और अपनी कुछ पहचान होती
ह।

वाधीनता

भारत क

होने उपरा त लगभग पांच दशक के कालख ड म

अनेक

गित हई
ु तथा स पूण समाज म एक

सामा जक एवं राजनीितक चेतना क लहर का आ वभाव हआ
और व

म भारत को एक स मानपूण

थान भी

हुआ क तु दे श दशाह न

होकर अपनी सां कृित मूलधारा से भटक गया तथा
अराजकताके कगार पर पहंु च गया। राजनीितक

वघटन एवं
वचार

ता

,मू यह नता,िस ा तह नता,कु टलता और चा र क संकट का वातावरण
या

हो गया। मू य

ष यं

और िस ा त

का

थान अवसरवा दता और

ने ले िलया। ‘स यमेव जयते’ का उदघोष अथह न हो गया।

राजनेताओं

ारा पो षत संर

और अपहरण क
अ त य त

त एवं समाि त अपराधी त व ने हं सा

घटनाआं को सामा य बना

हो गया और सार

मान उलट िगनती
सामा जक

दया तथा जनजीवन

यव था लड़खड़ा गई। इस कालख ड मे

ारं भ होने लगी।

याय तथा सामा जक समरस ा के नए-नए लुभावने मं

दे नेवाले चतुर नेताओ

ने स ा को पकड़े रहने के ऐसे

समीकरण बनाए और ऐसी छलपूण रचना क

वभाजनकार

जस समाज को

वाधीनता सं ाम के आ मबिलदानी नेताओं ने एकता और अख डता के
सू

िथत कया था , उसम धम, स

आधार पर वषमता और वघटन ती

दाय, जाित, भाषा और

के

हो गए। रा ीय भावना वलु

होने

लगी और पर पर घृणा एवं व े ष ने सामा जक जीवन को वषा

कर

दया। सामा जक

याय क अवण सवण आ द क

अमानवीय है तथा भारतीय सं कृ ित के

य के पास धन-स प

वभेदकार प रक पना

ितकूल है । एक ओर कुछ

और वलािसता क साम ी के अक पनीय

अ बार लग गए तथा दसर
ओर गर बी क रे खा से नीचे के चालीस

ितशत से अिधक द न-ह न जन क ददशा
म कोई सुधार नह ं हआ

ु ।

नगर मे कूड़े के ग दे ढे र पर जहां एक ओर गौ, ान,शूकर आ द भूखे

पशु भोजन क खोज करते ह, वहां उनके पास ह अनेक बालक-बािलकाएं
तथा वृ -वृ ाएं भी ग दे और फटे चीथड़ो से कसी

कार तन को ढॉपे

हए
ु , कागज प नी आ द बटोरने के िलए मानो अिभश

ह। अग णत

वेरोजगार युवक अवसाद और आ म लािन के कारण मृ यु-आिलंगन के

िलए ववश हो जाते ह और अग णत वेसहारा युवितय क , अपना तन
और ईमान वेचने एवं अक पनीय सं ास को मूकवत ् भोगने क मान

िनयित ह है । संवेद शीलता और मानवीयता श दकोश से के ऐसे श द है
, जनका भरपूर द ु पयोग होता है । तथा

याय के भाषणपटु

व ा यथाथ

भूिम से बहत

ु दरू ह। हम इस स दभ म अदरदश

दरदशन
के

है ।गर ब के नए मसीहा तथा सामा जक

जनका अथ लु ् हो गया

कामवासना एवं हं सा के उ ेजक काय म के द ु
बना नह ं रह सकते मीठा

भाव का उ लेख कए

वषपान सामा य जनजीवन को दगित

ओर जे जा रहा है तथा कामुकता एवं हं सा क घटनाओं म बृ

हो रह

है । यह हमारे िनता त भौितकवाद एवं भोगवाद युग का यथाथ।
इस अ धकार और भटकाव के युग म

वा याय ,िच तन

वचार का संकट सवािधक शोचनीय है । गंभीर सा ह य ् क◌े
् िलए

और अवकाश न होना
है । उदा

और
िच

एवं समाज के िलए गहन िच ता का वषय

सा ह य ् के सृजन तथा पठन-पाठन म

ास होता जा रहा है ।

वा तव म कसी समाज म

गित क पहचान उसक ना रय ब च और

मूक पशु- प

यवहार से , द न जन के अ यूदय के िलए

य के

िश ा आ द क

ित

यव था होने से तथा उसके सा ह य के

है । यह भी एक त य है
उ थान के

तर से होती

क राजनेताओं का दािय व सम

ित होता है , न

क कुछ

वशेष बग

के

समाज के

ित ह । उनके

गत जीवन म सादगी स चाई और ईमानदार होने पर ह वे

भावी

हो सकते ह। जब बड़े नेता रोग क िच क सा के िलए बार-बार वदे श
जाते हो तथा सामा य जन को िच क सा-सु वधा उपल ध न होती हो ,
नेताओं के घर म वलािसता हो तथा सामा य जन मा जीवन-र ा के
िलए भी संघष करते ह ,नेताओं क र ा के िलए वशेष सुर ा- यव था
हो तथा सामा य जन को अपराधी दन-रात उ पी डत करते ह , तो
वह

स चा लोकतं

या

हो सकता है ? एक ओर जहां जनसं या के अनुपात

के अनुसार शासन म भागीदार और नौक रय म वर यता द जाती हो,
वहां रा ीयता का

या मह व है ? इस युग म नेताओं का ऐसा आतंक है

तथा सामा यजन इतने भी

हो गए ह क स य को कहना ह नह ं,सुनना

भी द ु ार हो गया है । ‘अिभ य

वतं ता’ मा

सारह न श द ह।

राजनेता कानून क तोड़-मरोड स ा को पकड़े रहने क

से कर दे ते

ह तथा साधारण नागर क बेबस हो गया है । यह लोकतं

का द ु पयोग है ।

जब भीड़ म सब अपनी अपनी

वाथपूित और सुर ा का ह य

करते ह

तो दशा कौन दे गा ?
धम र ा करता है तथा जनसमाज को पर पर जोड़ता है । इस युग
म ध

के

म धमगु ओं और

वचन क मान बाढ ह आ गयी है

बाढ म

व छ जल नह ं आता। ववेक जन गंगा के

आचमन भी नह ं करते। इस अ धकार युग म
पहचान उनके तप सा वकता और अ त:

वयंभ ू

बोध एवं

द ू षत जल का
धमगु ओं क

द यानुभिू त से न

होकर उनके वा जाल दे श वदे श म फैले हए
वशल आ म और िश य

एवं अनुयाियय क सं या से हो रह है । भारत म वतमान युग म छ

अवतार क क भगवान जगदगु ओं चम कार योिगय एवं तथाकिथत
िस पु ष क सं या इतनी अिधक हो गई है क उनक गणना करना भी
संभव नह ं है । उनम तप तेज

वा याय साधना और अ त:

िनता त अभाव है तथा उ होने

यवसाियय क भांित कु डिलनी-जागरण

इ या द के

पंच आ◌ैर

चार का सहारा ले िलया है । वड़े -बड़े नेत ा और

उधोगपित उ ह महानता का
अपराध म िल

माण प ् दे दे ते है । उनम से अनेक

हो रहे है । इसके

स मोहन म कुशल ता
धन तथा स ा को

अित र

वा पटु भ व यव ाओं और

को के धंधे भी पया

कसी

कार

रहना युगधम हो गय है तथा यह
अराजकता का

धान कारण है । लोकतं

पनप रहे ह। इस युग म

करना तथा उ ह बलपूवक् पकड़े

सम त भटकाव अशा त और

का अथ लूटतं

हो गया है ।

क तु सा वकता एवं आ या मकता क धारा
सदै व अ ु ण रहती है । स चे साधक
पर परा कभी

वलु

बोध का

नह ं होती।

िस पु ष

ीण होने पर भी

सदगु ओं क

पं च और पाख ड से दरू रहकर, वे

काशद प को कभी बुझने नह ं दे ते तथा उसे सदा

विलत रखते ह। वे

कसी पर िनभर नह ं होते तथा िनभय रहते ह। उनका न कोई िसंहासन
(ग ) होता है , न वे
आ या मक

कसी को उसे स पकर जाते है । अपने भीतर

काश का अनुभव करना तथा सहजभाव से उसका

करना ह उनका एक मा
कमल क भांित िनिल
वा

सार

उ े य होता है । वे संसार म रहकर जल म

रहते ह।

व म स य ् ह धम होता है । स य सव प र होता है तथा वह

व वध धम क सीमा म बांधा नह जा सकता। जो धमगु

संबाद को

यागकर दरा
ु हकरते है । , वे स य से दरू रहते ह। जो धमगु

यह कहते ह क केवल उनके धम के अनुयायी ह
शेष नह ं, वे स य के
परमा मा क ओर

वृ

वरोधी ह। एक ओर

बलपूवक

वग के अिधकार ह,
धमगु

करते ह तथा दसर
ओर वे लोक म

मनु य को

जीवन-

यापन क कला िसखाते ह। धम का उ े य एक ह होता है -परमा मा क
ाि

तथा स चाई और

ेम से समाज मे साथक जीवन-यापन क

ेरणा

दे ना। धम के वे अंश, जो पर पर घृणा और हं सा (पशुबिल, वधम का

नाश) क िश ा दे ते ह , या य ह। दरा
ु ह से

त होना तथा अपनी

े ता के दं भ के कारण भेदभाव और घृणा िसखाना एक दोष है ।

परमा मा क

ाि

के अनेक माग होते ह। तथा उपासना प ितयां भी

िभ न हो सकती ह, ऐसा

वीकार करने पर ह सवधम-समभाव संभव हो

सकता है । पर पर संवाद

ारा सह-अ त व एवं शा त का माग

श त

हो सकता है ।
हम यह भी

मरण रखना चा हए

क धम और

व ान पर पर

वरोधी नह ं ह, ब क पर पर पूरक ह। दोन का उ े य स य क खोज
करना है , क तु व ान भौितक जगत क भौितक सीमाओं सेपरे नह ं
जा सकता तथा उ म धम भौितक जगत क सीमाओं को पार करके
सू म जगत म

वेश

ारा सृ

के मूल रह य क खोज कर सकता है ।

धम एकांगी नह ं होता, उसम सम ता होती है, प रपूणता होती है ।सच तो
यह है क जहां व ान क सीमा समा

हो जाती है , धम का

ारं भ

होता है ।
धम का

येय स य क उपल ध एवं अनुभिू त कराना होता है । जो

आ था स य पर आधा रत नह ं होती, वह दोषपूण होती है । स य क
खोज करनेवाले अथवा स यिन
जोड़ता, तोड़ता नह ं है ।धािमक

पु ष कदा प दरा
ु ह नह ं करते। धम

आ या मक अथात आ मा क ओर

अिभमुख होते ह वे अनेकता मे एकता का अनुभव करते ह तथा

ेम

सहयोग एवं सेवा के आदश का अनुपालन भी करते ह। वा तव म कोई
भी धम घृणा एवं वैर क

िश ा नह ं दे ता, क तु क टर पंथी लोग

संक णता के कारण घृणा और वैर का
लेकर कसी

या वग को महान

कया जा सकता। सभी परमा मा तथा

चार करते ह। प व ता क आड़
थ तथा
ान क

ाि

ान से वंिचत नह ं
के िलए समान

से अिधकार ह।
इस स दभ म यह
सां कृ ितक वरासत

मह वपूण है क भारत क आ या मक एवं

या है ? भारतीय सं कृ ित के मूलत व

क र ा करने से ह स पूण वृ

या है ? मूल

क तथा उसके अंग (पु प , फ

इ या द) क सुर ा होना संभव होता है । अत: मह वपूण

और समाज के क याण का माग कैसे
काल का

होती है ।

श त हो सकता है ।

वाह अन त होता है तथा वकास क

या भी अन त

एंव समाज के दोष तथा अपराध और अ ान

या क गित को सदा के िलए अव

है

ै।

नह ं कर सकते।

सू म एवं द य स ा से संचािलत होने के कारण,

वकासकृ ित एक

ात एवं अ ात बल

के

ारा

एवं समाज को एक उ चतर दशा म मानो धकेलती रहती

है ।

कृ ित अस य से स य क ओर अंधकर से

जाती है । जलरािश के म य म
से आनेवाला
वकास-

बल

या म

काश क ओर बरबस ले

थत भंवर म फंसी हई
ु व तु को , पीछे

वाह बाहर िनकालकर आगे क ओर बढा दे ता है
थायी

प से पीछे क ओर जाना संभव नह ं होता।

ल बी दौड़ म धावक पीछे दरू तक जाकर ह ती

गित से आगे क ओर

दौड़ता है । वनाश भी नवसृजन एवं वकास का आधार होता है । घोर –
अंधकार

काश क गित को कदा प अप

नह कर सकता। हम पुन:

उठने और आगे बढने के िलए ह िगरते ह। हमार संघषशीलता कभी
वलु

नह ं होती। वचारो का वरोध एवं टकराहट भी

के िलए आव यक भूिमका बन जाते ह।
सम वय एवं
का

गित क

या को ती

ोत अ धकार के ग ठर से

से आशा क
क वह

योित

वरोध के

दशा म

बढने

वर भी अ तत:

कर दे ते है । घृणा के म य से

काश क

फु टत होते ह।

करण और िनराशा के तल

बु मान मनु य ् का

कृित के ससा वक बलो के साथ ववेकपूण संब

कत य है
होकर तथा

अपनी साम य के अनुसार यथासंभव योगदान दे कर जीवन को कृताथ कर
ले
जो ववेकशील पु ष ऋ षय के कालजयी त व-िच तन क पर परा
के साथ अ ततमनाता

था पत कर लेता है और स त ्-महा माओं के

स दे श एवं मनी षय के म त य से अवगत हो जाता है तथा लोक म

जन-जीन को भी संबेदनशील होकर जान लेता है,वह भारत क आ मा को
समझसकता है तथा वह व

के क या का माग

श त करने म स म

हो जाता है और उसका जीवन भी ध य हो जाता है ।१
आ य मक

ान एवं मीमांसा क

सव च

थ ह। हमारा

सुबोध,बु

ह। सुधीजन

क प सभी

एवं व ानस मत
चार- सार म यथाश

से उपिनष

संसार के

मुख उपिनषद

के सरल,

या या मक भा य क रचना करना
सहयोग दे कर पु य के भागी हो

सकते ह। (हमारे श दाथ, अ वय और भावाथ सुिच तत एवं सुिन
और हमारा अनेक

त ह

थान पर अनेक या याताओं से मतै य ् नह ं है ।

१. इसी उ े य से एक भारतीय धम,दशन,सं कृ ित शोध-सं थान क

थापना होना आव यक

है , जहां भारतीय मूल के धम क पुन या या हो सके तथा उनक एकता के सू

क खोज हो

सके और संसार के सभी अ य धम के साथ सम वय होना भी संभव होसके, जससे भारत के
ेम एंव शा त के क याणकार स दे श को व

सा रत कया जा सके।

एक

या याता ने अं ज
े ी भाषा म

मं

को

कह

वचन करते हए
ु कठोपिनष

दया, जब

के कुछ

क पू य शं कराचाय से लेकर

ववेकान द आ द तक सबने उ ह मा य कया है । यह उपहसनीय ह है ।
हम आशा करते ह क सुधी पाठक उदारतापूवक

तुत रचना का

वागत

करगे।
िशवान द
वजय नगर, मेरठ, उ०

०-250 001

(फोन 0121-642041)

कठोपिनष - द यामृत
शा तपाठ
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुन ु । सह वीय करवावहै ।
तेज व नावधीतम तु। मा व षावहै ।
ॐ शा त: शा त: शा त:
श दाथ : ॐ =परमा मा का
(गु

तीका मक नाम ; नौ =हम दोन

और िश य) को ; सह = साथ-साथ ; भुन ु = पाल, पो षत कर ;

सह =साथ-साथ ; वीय = श

को ; करवावहै =

कर ; नौ = हम

दोन को ; अवधीतम ् =पढ हई
ु व ा ; तेज व =तेजोमयी ; अ तु =हो ;
मा व षावहै = (हम दोन ) पर पर
अथ :

े ष न कर।

हे परमा मन ् आप हम दोन गु

और िश य क साथ-

साथ र ा कर , हम दोन का पालन-पोषण कर , हम दोन साथ-साथ

कर,हमार

कर, पर पर

क हई
व ा तेज द हो, हम पर पर

नेह कर। हे परमा मन ्

वध ताप क

आ या मक ताप (मन के द:ु ख) क , अिधभौितक ताप (द ु
हं सक

ा णय से तथा दघटना
आ द से

शा त हो।
जन और

द :ु ख) क शा त हो।

ा वा िशवं शा तम य तमेित ( ेत उप० ४.१४)।
शरणं

ेष न

शा त म

- ॐ

वधतापहरणं ॐ शा त: शा त: शा त:।
कठोपिनष

(अथवा कठोपिनषद )उपिनष - ेिमय का क ठहार है ।

यह कृ ण यजुवद क कठ शाखा के अ तगत है । इसम दो अ याय ह
तथा

येक अ याय म तीन व ली ह। इस उपिनषद म निचकेता और

यम का संवाद ह, जसम यम ने परमा म-त व का रोचक एवं
वणन कया है । यह उपिनष
; ठ= िन ा ; कठ =

कठ ऋ ष के नाम से जुड़ा हआ
है ।

म िन ा उ प न करनेवाला उपिनष ।

वशद
क=

थम अ याय
थम व ली
कठोपिनष
उपा यान के

(काठकोपिनष ) के

थम अ याय क

थम व ली

प म यम-निचकेता के गूढ आ म ान-संवाद क

मा

भूिमका है ।
मह ष अ ण (अथवा वाज वा) के पु

आ ण (अथवा वा वस ्)ह

गौतमवंशीय उ ालक थे। आ ण उ ालक ने
उ ालक का पु

जत य

कया।

(वाज वा का पौ ) निचकेता अ य त बु मान एवं

सा वक था।
ॐ अशन ् ह वै वाज वस: सववेदसं ददौ।
त य ह

निचकेता नाम पु

आस ॥१॥

श दाथ : ॐ = स चदान द परमा मा का नाम है , जो मंगलकारक
एवं अिन िनवारक है ;ह वै = िस

है

क ;उशन ्= य

इ छावाले ; वाज वस: =वाज वा के पु
=( व

जत ् य

वाज वस ् उ ालक ने ; सववेदसं

म) सारा धन ;ददौ =दे दया ; त य निचकेता नाम ह

पु : आस =उसका निचकेता नाम से

िस

पु

वचनामृत : वाज वस ्(उ ालक) ने य

हए
ु (व

के फल क

जत य

के फल क कामना रकते

म) अपना सब धन दान दे

निचकेता नाम से

यात एक पु

या या :

था।

था

ाची काल म य

करना और द

दे ना एक पु यकृ य माना जाता था। व
सारा धन दान दे कर

दया। उ ालक का
णा आ द म दान

जत एक महान य

था जसम

हो जाना गौरवमय माना जाता था। मह ष

उ ालक ने व

जत य

कया और सव व दान करके र

उनका एक पु

निचकेता सब कुछ दे ख रहा था। अिधकांश ऋ षगण

गृह थ होते थे तथा वन म रहते थे।

हो गये।

ाय: गौएं ह उनक धन-स पित

होती थी।
तं ह कुमारं स तं द
श दाथ : द

णासु नीयमानसु

ा आ ववेश सोऽम यत ॥२॥

णासु नीयमानासु =द

णा के

प म दे ने के िलए

गौओं को ले जाते समय म ; कुमारम ् स तम ् =छोटा बालक होते हए
ु भी
; तम ् ह

ा आ ववेश =उस (निचकेता) पर

ाभाव (प व भाव , ान-

चेतना) का आवेश हो गया। स: अम यत = उसने वचार कया।

वचनामृत : जस समय द

णा के िलए गौओं को ले जाया जा

रहा था, तब छोटा बालक होते हए
ु भी उस निचकेता म
चेतना, सा वक-भाव) उ प न हो गया

ाभाव ( ान-

तथा उसने िच तन-मनन

ारं भ

कर दया।
निचकेता म
या या :

ान

करने क पा ता थी।

कृ ित ने मनु य को िच तन मनन क श

को नह ं। मनन करने से ह

वह मनु य होता है , अ यथा मानव क

आकृ ित म वह पशु ह होता है । िच तन के
व ान म

द है , पशु

गित क है तथा िच तन के

ारा ह मनु य ने

ारा ह मनु य उिचत-अनुिचत

धम-अधम ,पु य-पाप आ द का िनणय करता है । िच तन के
ववेक उ प न होता है तथा वह
सकता है । िच तन को

ारा ह

मृित क पना आ द का सदपयोग
कर

व थ दशा दे ना

पीतोदका

ान-

ज धतृणा

पु ष का ल ण होता है ।

द ु धदोहा

िन र

या:।

अन दा नाम ते लोका तान ् स ग छित ता ददत ् ॥३॥

श दाथ : पीतोदका: जो (अ तम बार) जल पी चुक ह; ज धतृणा
: =जो ितनके (घास )खा चुक ह ;द ु धदोहा: = जनका दध
ू (अ तम बार
)दहा
ु जा चुका है ; िन र

या: = जनक इ

यां सश

नह ं रह ह

,िशिथल हो चक ह ; ता: ददत ्= उ ह दे नव
े ाला ; अन दा नाम ते लोका

:= आन द-र हत जो वे लोक ह ; स तान ् ग छित= वह उन लोको को
जाता है ।

वचनामृत: (ऐसी गौएं) जो (अ तम बार)जल पी चुक ह , जो घास
खा चुक ह, जनका दध
ू दहा
ु जा चुक ा है , जो मानोज इ
है , उनको दे नवाला उन लोको को

यर हत हो गयी

होता है , जो आन दशू य ह।

या या : निचकेता ने सोचा क दान म द जानेवाली अिधकाशं
गौढं मरणास न ह , वे पानी पीने म तथा घास खाने म भी असमथ ह,
और वे अब दध
ू दे ने अथवा कुछ लाभ दे ने म भी असमथ ह ,उनका दध

दहा
ु जा चुका है और वे अब दध
ू दे ने के यो य नह ं रह ।ं जन गौओं क

यां िशिथल हो चुक ह, उनको दान म दे नवाला मनु य पाप का भागी

होता है तथा उन लोक को

होता है , जो सब

ह। कुमर निचकेता म उ म उ कृ

और िनकृ

कार से सुख से शू य
तथा स य और अस य

का ववेक था, जो आ या मक साधना के िलए मह वपूण होता है ।
स होवाच पतरं तत

क मै मां दा यतीित।

तीयं तृतीयं तं होवाच मृ यवे

वा ददामीित॥४॥

श दाथ : स ह पतरं उवाच =वह (यह सोचकर) पता से बोला ;

तत (तात)= हे
?

य पता ; मां क मै दा यित इित = मुझे कसको दगे

तीयं तृतीयं तं ह उवाच = दसर
ू ,तीसर बार (कहने पर) उससे ( पता

ने) कहा ;

वा मृ यवे ददािम इित =तुझे म मृ यु को दे ता हंू ।

वचनामृत : वह ( निचकेता) ऐसा

वचार कर

पता से बोला-हे

तात, आप मुझे कसको दगे? दसर
ू ,तीसर बार (यी कहने पर )उससे पता
ने कहा-तुझे म मृ यु को दे ता हंू ।

या या : कुमार निचकेता म एक उदा

सा वक का उदय हो गया

था। उसने वचार कय क उपयोगी व तु को दान न केवल िनरथक है ,
ब क क
तो पु

द लोक को

भी करा दे ता है । सव व दान के अ तगत

का दान भी होना चा हए।

पता से कहा –हे

ाभाव से

े रत होकर निचकेता

ने

पताजी, म भी तो आपका धन हंू । आप मुझे कसको

दगे? उसके दो तीन बार पता से ऐसा कहने पर, आवेश म आकर पता
ने कहा-म तुझे मृ यु को दे ता हंू ।
बहनामे
िम

कं

थम

बहनामे
िम

व म य कत यं य मया

श दाथ : बहनां

म यम :।

क र यित ॥५॥

थमो एिम = बहत
ु से (िश य )म तो

थम

चलता आ रहा हंू ;बहनां
म यम: एिम =बहत

ु से (िश य मे) म यम
ेणी के अ तगत चलता आ रहा हंू ;यम य =यम का ;

कम ्

वत ्

कत य ् = (यम का) कौन-सा काय हो सकता है ; यत ् अ = जसे आज
;मया क र यित =( पताजी) मेरे
वचनामृत: ( य
अधम अथवा
थम

ारा (मुझे दे कर) करगे।

य क तीन

े णयां होती ह-उ म,म यम और

थम , तीय,और तृतीय) म बहत
ु से (िश य एवं पु

ेणी म आ रहा हंू ,बहत
ु से मे

कौन सा ऐसा काय है , जसे पताजी मेरे

तीय

थम

ेणी मे रहा हंू तथा कभी तृतीय

म यम को ट


े ी म रहा हंू । यम का

ारा (मुझे दे कर)करगे ?

या या : निचकेता मह ष उ ालक का पु
सोचा-मै। बहत
ु क अपे ा

म)

एवं िश य था। उसने

ेणी म तथा बहत
ु क अपे ा

तीय

ेणी मे नह ं रहा। य द म उ म और

म नह ं रहा तो अधम भी नह ं रहा। पताजी मुझे यमराज

को दे कर कौन सा काय पूरा करगे, यमराज के कौनसे

योजन को पूर ा

करगे ?
निचकेता ने यह भी सोचा-कदािचत ् पता ने

ोधावेश म आकर

मुझे यमराज को स पने क बात कह द है और वे अब द:ु खी होकर
प ाताप कर रहे ह अतएव म उ ह न तापूवक सा
वचार निचकेता क

े ता को

वना दं ग
ू ा। यह

मा णत करता है तथा इं िगत करता है

क निचकेता

ान को

के कारण स पा

करने का उ म अिधकार है ,

ामय होने

है ।

अनुप य

यथा

पूव

ितप य

तथापरे ।

स यिमव म य: प यते स यिमवाजायते पुन: ॥६॥
श दाथ : पूव यथा =पूवज जैसे (थे) ; अनुप य = उस पर वचार
क जये ;अपरे (यथा) तथा
जैसे (ह )उस पर भली

ितप य = (वतमान काल म)दसरे
ू ( े जन)

कार

;स यम ् इव =अनाज क

डाल; म य :=मरणधमा मनु य

भांित ; प यते=पकता है ;स यम ् इव पुन:

अजायते =अनाज क भांित ह पुन: उ प न हो जाता है ।
वचनामृत : (आपके) पूवज ने जस
उस पर िच तन क जये, उपर अथात

कार का आचरण कया है ,

वतमान म भी( े

पु ष कैसा

आचरण करते ह) उसको भी भंलीभाित दे खए। मरणधमा मनु य अनाज
क भांित पकता है (वृ

होता और मृ यु को

होता है ), अनाज क

भांित फर उ प न हो जाता है ।
या या : निचकेता ने अपने पता एवं गु
चली आती हई

कय।

आचरण क पर परा पर

उ ालक को पूवज से
पात करने का िनवेददन

पु ष के आचरण म पहले भी स य का आ ह था तथा वह

अब भी ऐसा ह है । मनु य तो अनाज क भांित ज म लेता है ,जीण-शीण
होकर मृ यु को

हो जाता है अनाज क भांित पुन: ज म ले लेता है ।

जीवन अिन य ् होता है , मनु य के सुख भी अिन य होते ह, अत:
णभंगरु सुख के िलए स य के आचरण का प र

ग ् करना ववेकपूण

नह होता।
निचकेता ने अपने पता एवं गु से अनुरोधपूवक् कहा क वह संशय

छोड़कर स याचरण पर

ढ रह तथा स य क र ा के

वचनानुसार मृ यु (यमराज)के पास जाने क
उ ालक ने उसक स यिन ा से

िलए उसे अपने

अनुमित दे द। मह ष

भा वत होकर उसे यमराज के पास जाने

क अनुमित दे द ।
यमराज के भवन म जाकर निचकेता को
बाहर गये ह।निचकेता ने

बना अ न-जल ह

ात हआ

तीन

क वे क ं

दन तक उनक

ती ा क ।यमराज के लौटने पर उनक प ी ने उ ह निचकेता के अ नजल बना ह उनक

ती ा करने का समाचार दया तथा उसका स मान

करने का परामश दया।
वै ानर:

वश यितिथ ा ण

गृहान ्।

त यैतां शा त कुव त हर वैव वतोदकम ् ॥७॥

श दाथ : वैव वत= हे सूयपु
गृहान ्

यमराज ; वै ानर:

ा ण: अितिथ:

ा ण अितिथ के

प म (गृह थ

वशित =वैवानर (अ नदे व)

के) घर म

वेश करते ह (अ वा

ा ण अितिथ अ न क भांित घर म

वेश करते ह );त य= उसक ;एताम ्= ऐसी (पाद

ालन इ या द के

ारा ); शा त कुव त = शा तकरते ह ;उदकं हर = जल ले जाइये।
वचनामृत : हे यमराज,(सा ात)अ नदे व ह
अितिथ के

प म (गृह थ) के घर म

अितिथ घर म अ न क भांित

(तेज वी)

वेश करते ह (अथवा

ा णा ण –

वेश करते ह)। (उ म पु ष) उसक ऐसी

शा त करते ह, आप जल ले जाइये।
या या: यमराज क

प ी निचकेता के तेज वता को दे खकर

यमराज से कहा- वयं अ नदे व ह

तेज वी

ा ण-अितिथ के

गृह थ जन के घर म जाते ह (अथवा तेज वी
घर म

वेश करते ह )। उ म पु ष

ा ण अ न क भांित

वागत करके उनको आदर-स मान

दे ते ह तथा उ ह शा त करते ह। अतएव आप पद
ले जाइये। आपके

प म

ारा स मान एवं सेवा से ह वे

ालन के िलए जल
स न होगे। निचकेता

द य आभा से दे द यमान था।
आशा
एत

वृ

ती े

संगतं

सूनत
ृ ां

े पु ष या पमेधसो

श दाथ : य य गृहे
ा ण

बना भोजन

)म दबु

इ ापूत

पु पशूं

य यान न ् वसित

ा णो गृहे ॥८॥

ा ण: अन न ् वसित =

कये रहता है

पु ष क ; आशा

सवान ्।

जसके घर म

१ अ पमेधस: पु ष य =(उस

ती े =आशा और

ती ा (क पत एवं

इ छत सुखद फल );संगतम ् = उनक पूित से होने वाले सुख (अथवा
स संग –लाभ); इ ापूत च = और इ
सवान ् पु पशून ् = सब पु
दे ता है (अथवा यह सब न

और पशु ; एत

िन

त क आशा) और

उनक पूित से

वृ

े = इनको न

कर

हो जाता है )।

वचनामृत : जसके घर म
रहता है ,(उस) म दबु

एवं आपूत शुभ कम के फल ;

ा ण-अितिथ बना भोजन कये हए

मनु य क नाना

कार क आशा (संभा वत एवं

ती ा (असंभा वत एवं अिन

ती ा) ,

ा ् होनेवाले सुख(अथवा स संग-लाभ) और सु दर वाणी

के फल (अथवा धम-संवाद- वण) तथा य
शुभ कम एवं सब पु

और पशुओं को

दान तथा कूप िनमाण आ द

ा ण का अस कार न

कर दे ता

है ।
या या : यमराज क प ी ने यमराज से कहा क तेज
अितिथ को अपने घर पर क

होने से गृह थ पु ष के पु य

भ्


ीण हो

जाते ह। ऐसे म दबु
लाभ) क

ाि

नह ं होती। उसक वाणी म से स य, सौ दय और माधुय

(अथवा धम-संवाद
आद इ

गृह थ पु ष को अनेक सुख (अथवा स संगवण के लाभ) लु

हो जाते ह तथा उसके य

कम और कूप धमशाला आ द के िनमाण प आपूत

सब शुभ कम भी न

दान

म अथात

हो जाते ह। अपने घर पर धमा मा तेज वी एवं

पू य अितिथ का अस कार पु

एवं पशुओ ं को भी

वन

कर दे त ा

है ।‘अितिथदे वो भव’-अितिथ को दे वतु य मानकर उसका स कार करने क
ाचीन पर परा है ।१

अपनी प ी के बचन सुनकर यमराज अ वल ब निचकेता के गये
और उसक

समुिचत अचना-पूजा क

निचकेता का संवाद

तथा इसके उपरा त ् यमराज-

ारं भ हो गया।

यम-निचकेता-उपा यान
अ येता के मन मे अनेक शंकाएं उ प न होती ह।

या निचकेता

यमलोक म सशर र चला गया ? वह तीन दन तक यम क अनुप थित
म यम-सदन म कैसे रहा ? वा तव म यह एक उपा यान है , जसके
उपदे श एवं

ितपा

वषय-व तु का

आलंका रक

प को

य का

हण करना अभी

य अथवा यथाथमय मानकर क य को

हण नह ं कर सकते। इसके वािचक अथ न
ववेकस मत

है । हम इसके

है । आ याियका-शैली

का

लेकर ला
योजन

णक अथ लेना

उसके त वाथ

को

समझाना है ।
बृहदार यक उपिनष
सृ

(अ याय १, ा ण २, मं

१) मे

कहा है क

से पूव सब कुछ मृ यु से ह आवृत था (मृ युनव
ै ेदमावृतमासीत ्)।

यहां मृ यु का अथ

,

लय है । पुन: (मं

१,२,७) कहा है ई र के

संक प को जाननेवाला उपासक मृ यु को जीत लेता है तथा मृ यु उसे
पकड़ नह ं सकती (पुनमृ युं जयित नैनं मृ युरा नोित )। आगे (मं
१,३,२८)

कहा

है -असतो

मा

गमय

,तमस

मा

योितगमय,

मृ योमाऽमृतं गमयहे

भो, मुझे असत ् से सत ् तम से

योित और मृ यु से अमृत क

ओर ले चलो , मुझे अमृत व प कर दो।

यम-निचकेता का उपा यान ऋ वेद के दसव मंडल म कुछ िभ न
कार से व णत है । वहां निचकेता
जाता है । तै र य

पता क इ छा से यम के समीप

ा ण म यह उपा यान कुछ वकिसत

------------------------------

१. अितिथदे वो भव (तै० उप० १.११.२)

प म

व णत

है , जहां निचकेता को यमराज तीन वरदान दे ता है । कठोपिनष
उपा यान तथा तै र य
तै र य

ा ण के उपा यान म पया

के

समानता है ।

ा ण के उपा यान म यमराज मृ यु पर वजय के िलए कुछ

य ा द का उपाय कहता है , क तु कठोपिनष
ान क मह ा को

कमका ड से ऊपर उठकर

ित त करता है । उपिनषद म कमका ड को

ान क अपे ा अ य त िनकृ

कहा गया है ।

य प यम-निचकेता-संवाद ऋ वेद तथा तै०
क पत उपा यान के
आलंका रक शैली म

प म ह है , कठोपिनष

ा ण म भी एक

के ऋ ष ने इसे एक

तुत करके इस का या मक स दय का रोचक

दे दया है । कठोपिनष

जैसे

ान-

पुट

थ का समारं भ रोचक, दय ाह

एवं सु दर होना उसके अनु प ् ह है । मृ यु के यथाथ को समझाने के
िलए सा ात ् मृ यु के दे वता यमराज को यमाचाय के
करना कठोपिनष
क पनाश

के

के

प म

तुत

णेता का अनुपम नाटक य कौशल है । यह

याग का भ य

व प ् है ।

वैदक-सा ह य म आचाय को ‘मृ यु’ के मह वपूण पद से अलंकृत
कया गया है ।‘आचाय मृ यु :।’आचाय मानो माता क भांित तीन दन
और तीन रात गभ म रखकर नीवन ज म दे ता है । ‘निचकेता’ का अथ
‘न जाननेवाला, ज ासु’ है तथा यमराज यमाचाय है , मृ यु के स श आंखे
खोलनेवाले गु ।
मृ यु ववेकदाियनी गु
मृ यु के

रह य

को

है । जीवन के यथाथ को जानने के िलए

समझना

वाभा वक अवसान मृ यु के

अ याव यक

है

य क

प म होता है । जीवन क

जीवन

का

पहे ली का

समाधान मृ यु के रह य का उदघाटन करने मे स न हत है । जीवन
मान मृ यु क धरोहर है तथा वह इसे चाहे जब वलु
सारे संसार को अपने आतंक से
मनु य

कर सकती है ।

क पत कर दे नेवाले महापरा मी

णभर म सदा के िलए ितरो हत हो जाते ह। जीवन और मृ यु

का रह य अन तकाल से ज ासा का वषय बना हआ
है । धम

तथा मनीषीजन ने इसके अग णत समाधान

थ ने

तुत कये ह, तथा प रह य

का उ ाटन एक गंभीर सम या बना हआ
है । जीवन का उ म कहां से

होता है ,जीवन

या है और मृ यु

या है ? जीवन और मृ यु का यथाथ

जानने पर जीवन एक उ लास तथा मृ यु एक उ सव हो जाते ह। अ ान
के कारण मृ यु एक भय द घटना तथा मृ यु एक उ सव हो जाते ह
अ ान के कारण मृ यु एक भय द घटना तथा जीवन िन उ े य भटकाव
तीत होते ह। सा ात मृ यृदेव (यमराज) से ह जीवन और मृ यु के

रह य को जानने से बढकर अ य

या उपाय हो सकता है ? ज ासु

निचकेता यमराज का शरणागत, भय

अितिथ है और स मानपूवक् उपदे श

हण करता है । यह

म हमा है , जो दाता और गृह ता दोन को प व

नह ं है , ब क पू य ्
ान क

कर दे ता है । कठोपिनष

के ऋ ष का क पना-कौशल तथा िश ण शैली दोन अनुपम ह।
ित ो

रा ीयदवा सीगृहे

नम ते अ तु
श दाथ :

मे

अन न ्

नितिथनम य :।

न ् व त म अ तु त मात ् ित
न ् =हे

ीन ् बरान ् वृण ी व॥९॥

ा ण दे वता ;नम य : अितिथ : =आप

नम कार के यो य अितिथ ह ; ते नम: अ तु =आपको नम कार हो ;
न मे

व त अ तु= हे

ा ण दे वता ,मेरा शुभ हो ; यम ् ित

:

रा ी: मे गृहे अन न ् अवा सी : =(आपने) जो तीन रात मेरे घर म बना
भोजन ह िनवस कया ; त मात ् = अतएव ;

ित

ीन ् वरान ् वृणी

=

येक के िलए आप (कुल) तीन वर मांग ल
वचनामृत : यमराज ने कहा, हे
ह। आपको मेरा नम कार हो। हे
तीन रा यां मेरे घर म
मुझसे

ा ण दे वता,आप व दनीय अितिथ

ा ण दे वता, मेरा शुभ हो। आपने जो

बना भोजन ह

िनवास

कया, इसिलए आप

येक के बदले एक अथात तीन वर मांग ल।
या या :

ान का अिधकार

ज ासु स मान के यो य ् होता

है । स मान पाकर ह वह िनभ क भाव से संवाद कर सकता है । यमराज

निचकेता को नम कार करते ह तथा उिचत स मान दे कर अपने कलयाण
क कामना करते ह।वे अपने घर म तीनरात बना भोजन रहने के दोष
का प रमाजन करने के िलए निचकेता से तीन वर मांगने का

ताव

रखते ह।
शा तसक प: सुमना यथा

सृ ं मािभवदे

या तम युगौतम मािभ मृ यो।

तीत एत

याणां

थमं वरं

वृणे ॥१०॥

श दाथ : मृ यो =हे मृ यु दे व ;यथा गौतम: मा अिभ = जस
कार गौतम वंशीय उ ालक मेरे
यात ् = शा त संक पवाले

तीत : अिभवदे त ् =आपके

हए
ु मेरे साथ
= तीन म

ित ; शा तसंक प: सुमना: वीतम यु:

स निचत

सृ ं मा

ारा भेजा जाने पर वे मुझ पर व ास करते

ेमपूवक बात कर ; एतत ् = यह ;

थम वर मांगता हंू ।

वचनामृत : हे मृ युदेव , जस
उ ालक मेरे

ोधर हत हो जायं ;
याणां

थमं

वरं वृणे

कार भी गौतमवंशीय (मेरे पता)

ित शा त सक पवाले (िच तर हत),

ोधर हत एवं खेदर हत हो जायं , आपके

स निचत और

ारा वापस भेजे जाने पर वे

मेरा व ास करके मेरे साथ
म से

ेमपूवक वातालाप कर ल , (म)

थम वर मांगता हंू ।

या या : निचकेता पता एवं गु
करने को
थम

यह

मांगता

िचनताशू य ्, स निचत
यथा पुर ता

पता

मु

वापस

लौटने

भ वता

पता

नेह कर और

तीत

औ ाल करा णम

वां द िशवा मृ युमुखा

सृ

:।

मु म ् ॥११॥

वां मृ युमुखात ् मु म ् द िशवान ् = तुझे मृ यु के मुख

हआ
दे खने पर ; म

सृ

: आ ण : औ ाल क : = मेरे

े रत , आ ण उ ालक (तु हारा पता); यथा पुर ता
क भांित ह

पर

के प रतोष को मह व दे ता है ।

सुखं रा ी: शियता वीतम यु
श दाथ :

है

स न

े ता का ल ण ह। वह

ोधर हत होकर उससे पूववत ्

संलाप कर। सुयो य पु

से

को अपने आचरण से

ाथिमकता दे ता है । यह निचकेता क

वर

यह तीन

ारा

तीत : = पहले

व ास करके ; वीतम यु: भ वता = ोधर हत एवं द:ु खर हत

हो जायगा ; रा ी :सुखम ् शियता = रा य म सुखपूवक सोयेगा।

वचनामृत : यमराज ने निचकेता से कहा- तुझे मृ यु के मुख से

मु
करके

दे खने पर मेरे

ारा

े रत उ ालक (तु हारा पता) पूववत व ास

ोध एवं द:ु ख से र हत

हो जायगा, (जीवन भर) रा य म

सुखपूवक् सोयेगा।

या या : यमराज ने निचकेता को उसक इ छानुसार वरदान दया

क उसके पता उ ालक उसके मृ यु के
करगे तथा
िन

मु

ोध एवं शेक से र हत होकर शेष जीवन म रा य

त होकर सोयगे,

य क मने तु ह मु

यमदे व क कृ पा से निचकेता मृ यु
वह यमराज के दै वी
के

ान

दे खकर कर पूववत व ास

कर दया है ।
ारा

साद से मृ युभय से वमु

मु

हआ
ु । वा तव म

हो गया। यह निचकेता

ारा मृ यु पर वजय क पूवसूचना भी है ।

वग लोक न भयं क चना त न त
उभे ती वाशनाया पपासे शेकाितगो
श दाथ :

वग लोक

क चत ् भय नह ं है ; त

वं न जरया बभेित।

मोदते

वगलोके ॥१२॥

क चन भयम ् न अ त =

वगलोक म

वं न = वहां आप(मृ यु) भी नह ं ह ; जरया

न बभेित= कोई वृ ाव था से नह ं डरता ;

वगलोके =

(वहां के िनवासी ); अशनाया पपासे = भूख और

वग लोक म

यास ; उभे ती वा =

दोन को पार करके ;शोकाितग : =शोक (द:ु ख) से दरू रहकर ; मोदते =
सुख भोगते ह।

वचनामृत : निचकेता ने कहा- वगलोक म क च मा

भी भय

नह ं है । वहां आप (मृ यु व प) भी नह ं ह। वहां कोई जरा (वृ ाव था)
से नह ं डरता।

वगलोक के िनवासी भूख- यास दोन को पार करके शोक

(द:ु ख) सेदरू रहकर सुख भोगते ह।
या या : निचकेता ने

वग का वणन करते हए
ु कहा- वगलोक

म भय नह ं होता। वहां मृ यु भी नह ं होती। वहां वृ ाव था भी नह ं होती
वहां भूख- यास भी नह ं होते। वहां के िनवासी द:ु ख नह ं भोगते तथा
सुखपूवक रहते ह।
वा तव म
िच ता से मु

वग चेतना क एक उ चाव था है , जब मनु य भय और

रहता है तथा वृ ाव था और मृ यु से पार चला जाता है

और भूख- यास भी नह ं सताते। यह मानवीय चेतना के उ च

तर पर

आन दभाव क एक अव था है ।
ेता तर उपिनष
योगी का पांच

महाभूत

(२.१२) म कहा गया है -अ यास करते हए
ु जब
(िम ट , जल,अ न, वायु और आकाश) पर

अिधकार हो जाता है , तब शर र योगा नमय हो जाता है और हो जाता है
और योगी रोग,वृ ाव था और मृ यु का अित मण कर लेता है । वह
इ छानुसार

ाण याग करता है । ऐसा ह योगदशन (३.४.४४, ४५, ४६) म

भी कहा गया है
न त य रोगो न जरा न मृ यु :

य योगा नमयं शर रम ्

( ेत० उप० २.१२)

आ या मक साधक दे हा यास (म दे ह हंू यह भाव) से मु

ह ‘अहं

होकर

ा म’ क अनुभिू त कर सकता है ।

वम न

व यम ये ष मृ य

वगलोका अमृत वं भज त एत
श दाथ : मृ यो =हे मृ युदे व ;स
वह आप

वग- ाि

धानाय

ूह

वं

तीयेन
वं

धानाय म म।
वृणे वरे ण ॥१३॥

व यम ् अ नं अ ये ष =

के साधन प अ न को जनते ह ;

ू ह =आप मुझ

वं म म

ालु को (उस अ न को) बताय।

वगलोका: अमृत वं भज ते = वगलोक के िनवासी अमर व को
होते ह ; एत

तीयेन वरे ण वृणे =(म) यह दसरा
वर मांगता हंू ।

वचनामृत : हे मृ युदेव , वह आप
को जानते ह।आप मुझ
अतृतभाव को

या या :

ा ्

वग ाि

क साधन प अ न

ालु को उसे बता द।

वगलोक के िनवासी

हो जाते ह। म यह दसरा
वर मांगता हंू ।

निचकेता ने यमराज से

वग के सुख क चचा करते

हए
ु कहा-वहां वृ ाव था ,रोग और मृ यु का भय नह ं है , भूख

यास का

भी नह ं है तथा वहां के िनवासी शोक को पार करके आन द भोगते

ह , क तु

वग ाि

का साधन प अ न- व ान

ालु होने के कारण इस मह वपूण

ान को

या है ? हे दे व, म
करने के िलए स पा

हंू । कृ पया मुझे इसका उपदे श कर। यह म दसरा
वर मांगता हंू ।

वा तव म निचकेता यह मा

ज ासा-संतु

के िलए पूछता है ।

वगा न को जानकर वह इसे अनाव यक कह दे गा, यो क उसक
िच तृतीय वर
ान ाि

ारा आ म ान

करने म है । उपिनष

धान

कमका ड को

क अपे ा तुचछ एवं िन न घो षत करते ह। (मं

१४, १५, १६,

१७, १८ म अ न- व ान क चचा क गयी है ।)
ते

वीिम तद ु मे िनवोध

अन तलोकाि मथो

ित ां व

श दाथ : निचकेत:
वीिम=

वग ाि

व यम नं

निचकेत:

जानन।्

वमेतं िन हतं गुहायाम ् ॥१४॥

= हे निचकेता ;

व यम ् अ नम ् जानन ् ते

क साधन प अ न व ा को भली

कार जाननेवाला

म तु ह इसे बता रहा हंू ;तत ् उ मे िनबोध = उसे भली
जान लो ;

कार मुझसे

वं एतम ् =तुम इसे ;अन तलोकाि म ् = अन तलोक क

करानेवाली ;

िन हतम ् = बु

ित ाम ् =उसक
पी गुहा म

=समझो।

वचनामृत : हे निचकेता

ाि

आधार पा ; अथो = तथा ;गुहायाम ्

थत (अथवा रह यमय एवं गूझ ् ); व

वग दा अ न व ा को जाननेवाला म

तु हारे िलए भलीभांित समझाता हंू । (तुम) इसे मुझसे जान लो। तुम इस
व ा को अन लोक क

ाि

करानेवाली ,उसक आधार पा और गुहा मे

थत समझो।
या या : यमराज अ न व ा के
इसे यथाथ
को

ाता ह और वे

निचकेता को

प म समझाने का आ ासन दे ते ह। यह व ा अन तलोक

करा दे ती है तथा

त वं िन हतं गुहायाम ्।
उपिनष

दय –गुहा म ह स न हत रहता है । धम य

कमका ड तथा

अ त:करण क

शु

वग आ द को मह व नह ं दे ते तथा

कमका ड का उ े य होता है । त व ान ह

सव च है ।
लोका दम नं तमुवाच त मै या इ का यावतीवा यथा वा।
स चा प त

यवद थो मथा य मृ यु: पुनरे वाह तु :॥१५॥

श दाथ : तम ् लोका दम ् अ नम ् त मै उवाच = उस लोका द

( वग-लोक क साधन- पा) अ न व ा को उस (निचकेता )को कह दया
; या वा यावती: इ का : = (उसम कु डिनमाण आ द के िलए )जो-जो

अथवा जतनी- जतनी

ट (आव यक होती ह ); वा यथा

कार(उनका चयन हो;

च स अ प तत ् यथो म ्

= अथवा जस

यवदत ् =और उस

(निचकेता)ने भी उसे जैसा कहा गया था, पुन: सुना दया ; अथ= इसके
बाद ; मृ यु: अ य तु : = यमराज उस पर संतु

होकर ; पुन: एव आह

= पुन: बोले।
वचनामृत : उस लोका द अ न व ा को उसे (निचकेता को )कह
दया। (कु डिनमाण इ या द म) जो–जो अथवा
(आव यक होती ह) अथवा

जस

जतनी- जतनी

कार (उनका चयन हो)। और उस

(निचकेता) ने भी उसे जैसा कहा गया था, पुन: सुना दया। इसके बाद
यमराज उस पर संतु

होकर पुन: बोले।

या या : आचाय प यमदे व ने

वगलोक क साधन पा अ न व ा

गोपनीयता कहकर निचकेता को उसे समझा

दया। यमदे व ने

कु डिनमाण आ द के िलए जस आकर क और जतनी
होती ह तथा उनका जस
निचकेता कुशा बु

ट आव यक

कार चयन होता है , यह सब समझा दया।

था, अतएव उसने जैसा सुना था, वैसा ह सुना दया।

यमाचाय ने उसक बु

वल णता से संतु

होकर उसे इसके

आगे भी कुछ समझाया।
तम वीत

ीयमाणो महा मा वरं तवेहा

ददािम भूय:।

तवैव नामा भ वतायम न : सृ ङां चे मामनेक पां गृहाण ॥१६॥
श दाथ :

ीयमाण: महा मा तम ् अ वीत ् = स न एवं प रतु

महा मा यमराज उससे बोले ;अ

हए

तव इह भूय: वरम ् ददािम = अब (म)

तु ह यहां पुन: (एक अित र )वर दे ता हंू ; अयम ् अ न: तव एव ना ा
भ वता = यह अ न तु हारे ह नाम से (
अनेक पाम ् सृ ङाम ् गृहाण = और इस अनेक
को

यात) होगी ; च इमाम ्

प वाली (र

क )माला

वीकार करो।

वचनामृत : महा मा यमराज

स न एवं प रतु

होकर उससे बोले-

अब म तु ह यहां पुन: एक (अित र ) वर दे ता हंू । यह अ न तु हारे ह
नाम से व यात होगी। और इस अनेक
या या : य द गु

प वाली माला को

िश य के आचरण से

वीकार करो।

स न हो जाता है तो

वह उसे अपना सव व लुटा दे ना चाहता है । आचाय प महा मा यमराज
ने परम

स न एंव प रतु

एक अित र

वर दे

अ न’ के नाम से

दया

होकर निचकेता को बनाउसके मांगे हए
ु ह

क वह वशेष अ न भ व य म ‘नािचकेत

यात होगी। अित स न यमराज ने निचकेता को

एक द य माला (र माला) भी भट कर द ।

णािचकेत

िभरे य स धं

कमकृ त ् तरित ज ममृ यू।

ज । दे वमी यं व द वा िनचा येमां शािनतम य तमेित ॥१७॥
श दाथ :
करनेवाला ;
स ब ध

णािचकेत: =

िभ: स धम ् ए य =तीन (ऋक् , साम, यजु:वेद) के साथ

जोड़कर

अथवा

पतृमान ् आचायवान ्

(य

नािचकेत अ न का तीन बार अनु ान ्

माता, पता,गु

से

स ब


यात
् (बृ० उप० ४.१.२);

होकर

मातृम ान ्

कमकृत = तीन कम

दान तप) को करनेवाला मनु य ;ज ममृ यु तरित= ज म और

मृ यु को पार कर लेता है , ज म और मृ यु के च
ज म् =

;

से उ प न सृ

से ऊपर उठ जाता है

(अथवा अ नदे व) के जानने वाले

;’

ज ’ का अथ अ न भी है , जैसे अ न को जातवेदा भी कहते ह।

ज ’ का एक अथ सव
ज ासौ

=

ेित

भी है "
: सव

हर यगभात ् जातो

ज:,

ह असौ (शंकराचाय)।" ई यम दे वम ्

तवनीय अ नदे व (अथवा ई र) को ; व द वा=जानकर ; िनचा य =

इसका चयन करके इसको भली

कार समझकर दे खकर ; इमाम ्

अ य तम ् शा तम ् एित = इस अ य त शा त को

ा ् हो जाता है ।

वचनामृत :जो भी मनु य इस नािचकेत अ न का तीन बर

अनु ान ् करता है और तीन (ऋक् , साम, यजु:वेद ) से स ब

हो जाता है

तथा तीन कम(य , दान, तप) करता है , वह ज म-मृ यु को पार कर लेता
है । वह

ा से उ प न उपासनीय अ नदे व को जानकर और उसक

अनुभिु त करके परम शा त को
या या :यह मं

कर लेता है ।

गूढ है तथा इसके अनेक अथ

कये गये ह।

नािचकेत अ न का तीन बार अनु ान करनेवाला तथा तीन
(ऋक् , साम, यजु:) से स ब

होनवाला पु ष य

मुख बेद

दान और तप करते

हए
ु ज म ् और मृ यु का अित मण कर लेता है ।

ा से उ प न

अ नदे व को जाननेवाला मनु य उपा य अ न को (अ न- व ान को)
जानकर और उसे समझकर दै वीभाव ( द यता)को
म ‘अ न’ परमा मा का

तीक एवं सूचक है । वह

णािचकेत यमेत

द वा य एवं व ां

स मृ यृपाशानृ पुरत:
चयन

श दाथ : एतत ्
विध)को ;

णो

का ह

व प है ।

नुते नािचकेतम ्।

शोकाितगो मोदते

यम ् = इन तीन ( टो के

व द वा = जानकर ;

कर लेता है । वेद

वगलोके ॥१८॥
व प सं या और

णािचकेत: = तीन बार

नािचकेत अ न का अनु ान करनेवाला ; य एवम ् व ान ् = जो भी इस
कार जाननेवाला

ानी पु ष : नािचकेतम ् िचनुते = नािचकेत अ नका

चयन करता है ; स मृ युपाशान ् पुरत:

णो

=वह मृ यु के पाश को

उपने सामने ह (अपने जीवनकाल म ह )काटकर ;शोकाितग:
मोदते = शोक को पार करके

वगलोके

वग लोक म आन द का अनुभव करता

है । (मृ युं जयित मृ यु जय:)
वचनामृत : इन तीन ( ट के

व प सं या और चयन- विध) को

जानकर तीन बर नािचकेत अ न का अनु ान करनेवाला जो भी व ान
पु ष नािचकेत अ न का चयन करता है, वह (अपने जीवनकाल मे ह )
मृ यु के पाश को अपने सामने ह काटकर, शोक को पार कर , वगलोक
म आन द का अनुभव करता है ।
या या : नािचकेत अ न व ा क म हमा का कथन करते हए

यमराज ने कहा

क जो भी इस

व ा का जाननेवाला

अनु ान करता है , वह अपने जीवनकाल मे ह

व ान इसका

मृ यु से मु

होकर

मृ यु जय हो जाता है । वह शोक को पार कर, चेतना क उ चाव था म
थत हो जाता है और दै वी आन द को भोग लेता है । वह
कर लेता है । वा तव म सारे लोक सू म
एष

तेऽ ननिचकेत:

एतम नं तवैव

व य

प म अपने भीतर भी ह।

यमवृणीथा

तीयेन

वरे ण।

व य त जनास तृतीयं वरं निचकेतो वृ णी व॥१९॥

श दाथ : निचकेत:= हे निचकेता ; एष ते
तुमसे कह हई

वग को

व य: अ न: = यह

वग क साधन पा अ न व ा है ; यम ्

तीयेन वरे ण

अवृणीथा: = जसे तुमने दसरे
वर से मांगा था ; एतम ् अ नम ् =इस

अ नको ;जनास: =लोग ;तव एव

व य त =तु हार ह (तु हारे नाम

से ह ) कहा करगे ;निचकेत = हे निचकेता ; तृतीयम ् वरम ् वृणी व=
तीसरा वर मांग ।
वचनामृत : हे

निचकेता, यह तुमसे कह

हई

वगसाधन पा

अ न वधा है , जसे तुमने दसरे
वर से मांगा था। इस अ न को लोग

तु हारे नाम से कहा करगे। हे निचकेता,तीसरा वर मांग ।

या या : यमराज ने निचकेता को यह कहकर स मान दय क
भ व य म लोग इस अ न को ‘नािचकेत अ न’ कहगे। तदपरा

यमराज ने नािचकेता को तीसरा वर मांगने क अनुमित द । निचकेता के
तीन अभी सत वर मे एक सोपाना मकता है । सबसे अिधक मह वपूण
वर

ाना मक है । आ म ान ह उपिनषद का
येय ं
एत

योजन एवं

ितपा

है ।

ेते विच क सा मनु येऽ ती येके नायम तीित चैके।
ामनुिश

वयाहं

वराणामेष

वर तृतीय : ॥२०॥

श दाथ :

ेते मनु ये या इयं

विच क सा = मृतक मनु य के

संबंध म यह जो संशय है ;एके अयम ् अ त इित = कोई तो (कहते ह)
यह आ मा (मृ यु के बाद) रहता है ;
कोई (कहते ह) नह ं रहता है ;
उप द

च एके न अ त इित = और

वया अनुिश : अहम ् = आपके

म ; एतत ् व ाम ् =इसे भली

ारा

कार जान लूं ; एष वराणाम ्

तृतीय: वर: = यह वर म तीसरा वर है ।

वचनामृत : मृतक मनु य के संबंध म यह जो संशय है क कोई
कहते ह क यह आ मा(मृ यु के प ात) रहता है और कोई कहते ह क
नह ं रहता, आपसे उपदे श पाकर म इसे जान लूं , यह वर मे तीसरा वर
है ।
या या : ज ासा े रत निचकेता पता क प रतु
अ न व ान का वर

करने पर आ मा का यथाथ

का वर और
व प ् समझाने

का तीसरा वर मांगता है । निचकेता कहता है –हे यमराज,मृतक

के

संबंध म कोई कहता है क मृ यु के उपरा त उसके आ मा का अ त व
रहता है और कोई कहता है क नह ं रहता, कृ पया मुझे इसे समझा द।
यह निचकेता का अभी
तै र य
मृ यु)

पर

और

वर है ।

ा ण म निचकेता ने तीसरे वर म पुनमृ यु ( ज मवजय- ाि

पुनमृ योमऽपिचितं

का

साधन

पूछा

है ।

तृतीयं

वृणी वेित।

ू ह।

एक कुमार से ऐसे गूढ

क आशा नह ं क जा सकती। अतएव

यमदे व ने निचकेता के स चा अिधकार अथवा सुपा
यमदे व ने दे र तक उसे टालने का

होने क पर

ा ली।

कया, क तु यह संभव न हो

सका। इससे संवाद म रोचकता आ गयी है ।
दे वैर ा प विच क सतं पुरा न ह सुवे ेयमणुरेष धम :।
अ यं वरं निचकेतो वृणी व मा मोपरो सीरित मा सृजैनम ् ॥२१॥
श दाथ

: निचकेत

विच क सतम ् =यहां (इस
कया गया ;

:= हे

निचकेता ; अ

वषय म) पहले दे वताओं

पुरा दे वै: अ प
ारा भी स दे ह

ह एष: धम: अणु: = यो क यह वषय अ य त सू म है

; न सु व ेयम ् = सरल

कार से जानने के यो य नह ं है ; अ यम ् वरम ्

वृणी व = अ य वर मांग लो; मा मा उपरो सी : मुझ पर दवाव मत
डालो ; एनम ् मा अितसृज = इस (आ म ान-स ब धी वर )को मुझे
छोड़ दो।

वचनामृत : हे निचकेता, इस

वषय म पहले भी दे वताओं

ारा

स दे ह कया गया था , यो क यह वषय अ य त ् सू म है और सुगमता

से जानने यो य ् नह ं है । तुम कोई अ य वर मांग लो। मुझ पर बोझ मत
डालो।इस आ म ान

संबंधी वर को मुझे छोड़ दो।

या या : अ या म व ा द ु व ेय है । अ न व ा आ द कमका ड के

वषय को समझना सरल है , क तु
करना अ य त क ठन

व ा का उपदे श करना और

हण

है । यमदे व ने निचकेता से कहा-यह वषय तो

अ य त गूढ है तथा सुगम नह ं है । अत: तुम कोइर ् अ य वर मांग ल

और इस वर को मुझे ह छोड़ दो। वा तव म यमदे व ने केवल निचकेता
के औ सु य को उ

कर रहे ह और उसक पा ता क पर

, ब क उसके मन म

ान क म हमा को

दे वैर ा प विच क सतं कल
व ा चा य

वं च मृ य य

ा ले रहे ह

ित त भी कर रहे ह।
सु व ेममा थ।

वा ग य न ल यो ना यो वर तु य एत य क

त ् ॥२२॥

श दाथ : मृ य =हे यमराज ; वम ् यत ् आ थ = आपने जो कहा ;

कल दे वै: अ प विच क सतम ् = इस वषय म वा तव म दे वताओं

ारा भी संशय कया गया ; च न सु व ेयम ् = और वह सु व ैय भी

नह ं है ; च अ य व ा = और इसका व ा ;
आपके सृदश अ य कोई

वा क् अ य: ल य: =

नह ं हो सकता ; एत य तु य: अ य:

त ् वर: न =इस (वर) के समान अ य कोई वर नह ं है ।

वचनामृत: निचकेता ने कहा-हे यमराज, आपने जो कहा क इस

वषय म वा तव म दे वताओं

ारा भी संशय कया गया और वह ( वषय)

सुगम भी नह ं है । और, इसका उपदे ा

आपके तु य अ य कोई ल य

नह ं हो सकता। इस (वर) के समान अ य कोई वर नह ं है ।
"व ु मह यशेषेण द या
या या :

ा म वभूतय: " (गीता,१०.१६)

निचकेता अपनी गहन उ सुकता तथा िन य क

का प रचय दे ता है तथा यम

ारा आगृह न करने के परामश

ढता
को

वीकार नह ं करता। वह कहता है -हे यमराज, आपका कथन ठ क है क
दे वता भी आ मत व के वषय म संशय

त ह और िनणय नह ं ले पाते,

क तु आप मृ यु के दे वता ह और आपके समान कोई अ य उपदे ा यह
िन यपूवक

नह ं कह सकता क मृ यु के उपरा त ् आ मा का अ त व

रहता है अथवा नह ं। मेरे

ारा यािचत वरदान के तु य मह वपूण

अ य कुछ भी नह ं हो सकता। यह एक विच
इस वषय का कोई अ य

संयोग है क आके स श

ाता नह ं है और अ या म व ा के वर के

समान अ य कोई वर भी नह ं हो सकता।
शतायुष: पु पौ ान ् वृणी व बहन
ू ् पशून ् ह त हर यम ान।्
भूमेमहदायतनं वृणी व

वयं च जीव शरदो याव द छिस ॥२३॥

श दाथ : शतायुष: =शतायुवाले ; पु पौ ान ् = बेटे पोत को ; बहन

पशून ् = बहत
ु से गौ आ द पशुओं को ; ह त हर यम ् = हाथी और
हर य ( वग)को ;अ ान वृणी व =अ

को मांग लो ; भूम: महत ्

आयतनम ् = भूिम के महान ् व तार को ; वृणी व = मांग लो ;
च = तुम

वयं भी ; यावत ् शरद: इ छिस जीव = जीवन शर

वयम ्

ऋतुओ ं

(वष तक इ छा करो, जी वत रहो।

वचनामृत : शतायु (द घायु )पु -पौध को , बहत
ु से (गौ आ द)

पशुओं को , हाथी-सुवण को, अ ो को मांग लो, भूिम के महान ् व तार को
मांग लो , वयं भी जतने शर

ऋतुओ ं (वष ) तक इ छा हो, जी वत

रहो।
या या : यमराज ने निचकेता को एक कुमार के मन क अव था
के अनु प

धन-धा य मांग लेने के िलए कहा। यमराज ने उसे

द घायुवाले बेटे-पोते, बहत
ु से गौ आ द पशु, गज, अ , भूिम के वशाल
, वयंक भी यथे छा आयु

करने का

लोभन दया और समझाया

क वह आ म व ा को सीखने के िलए उसे ववश न करे ।
एत ु यं य द म यसे वरं वृणी व व ं िचरजी वकां च।
महाभूभौ निचकेत

वमेिध कामानां

वा कामभाजं करोिम॥२४॥

श दाथ : निचकेता:हे निचकेता ;य द

वम ् एतत ् तु यम ् वरम ्

म यसे वृणी व =य द तुम इस आ म ान के समान ( कसी अ य) पर

को मनते हो , मांग लो ; व ं िचरजी वकाम ् = धन को और अन तकाल
तक जीवनयापन के साधन

को ;व महभूमौ =और

;एिध= फलो-फूलो,बढो, शासन करो ;

वशाल भूिम पर

वा कामानाम ् कामभाजम ् करोिम =

तु ह (सम त कामनाओं का उपभोग करनेवाला बना दे ता हँू ।

वचनामृत : हे निचकेता, य द तुम इस आ म ान के समान ( कसी

अ य) वर को मांगते हो, मांग लो –धन, जीवनयापन के साधन को और
वशाल भूिम पर (अिधपित होकर) वृ

करो, शासन करो। तु ह (सम त)

कामनाओं का उपभोग करनेवाला बना दे त ा हँू ।
या या :यमराज निचकेता के मन को

लु ध करने के िलए अनेक

कामोपभोग क गणना करते ह-अपार धन,जीवनयापन के साधन, वशाल
भूिम पर शासन, अन त कानाओं का भोगी। यमराज निचकेता से कहते ह
क वह आ म ान के समान कसी भी अ य वर को मांग ले, जसे वह
उपयु
के
ह।

समझता हो। वा तव म यमाचाय निचकेता के मन मे आ म ान
ित उसक उ सुकता बढा रहे ह और उसक पा ता को परख भी रहे

ये ये कामा दलभा
म यलोके सवान ् कामां छ दत:

इमा रामा : सरथा :
आिभम

सतूया न ह शा

ाथय व।

ल भनीया मनु यै :।

ािभ : प रचारय व ् निचकेतो मरणं मानु ा ी ॥२५॥

श दाथ : ये ये कामा: म यलोके दलभा
: (स त) =जो-जो भोग

मनु यलोक म दलभ
ह ; सवान ् कामान ् छ दत:

ाथय व = उन स पूण

भोगो को इ छानुसार मांग लो ; सरथा: सतूया: इमा: रामा: =रथ स हत,
तूय (वा , वाज )स हत, इन
ह ल भनीया: =मनु य
आिभ: परचारय व = मेरे

वग क अ सराओं को ; मनु यै: ई शा: न
ारा ऐसी
ारा

यॉ

ा य नह ं ह, म

ािभ:

इनसे सेवा कराओ ;निचकेत:= हे

निचकेता ;मरणं मा अनु ा ी:=मरण (के संबंध म

को) मत पूछो।

वचनामृत : हे निचकेता, जो-जो भोग मृ युलोक म दलभ
ह, उन

सबको इ छानुसार मांग लो-रथ स हत, वा स हत इन अ सराओं को (मांग
लो), मनु य

ारा िन य ह ऐसी

यां अल य ह। इनसे अपनी सेवा

कराओ,मृ यु के संबंध म मत पूछो।
या या :यमाचाय अनेक
होने क पर

कार से निचकेता के अिधकार (सुपा )

ा ले रहे ह तथा मानवक पत संपण
ू भोग का

दखा दे ते ह। वे निचकेता से कहते ह क वह
वग य रथ और वा

लोभन

वग क अ सराओं को,

के स हत ले जाए जो मृ यु लोक के मनु य के

िलए अल य ह तथा उनसे सेवा कराए, क तु आ म ान वषयक
पूछे। क तु निचकेता वैरा यस प न और
स चे ज ासु के िलए वैरा यभाव तथा

ढिन यी था। आ मत व के

ढिन य होना आव यक होता है ,

अ यथा वह अपनी साधना म अ डग नह ं रह सकता।
ो भावा म य य यद तकैतत ् सव

याणां जरय त तेज:।

अ प सवम ् जी वतम पेमेव तवैव वाहा तव

नृ यगीते ॥२६॥

श दाथ : अ तक =हे मृ य ; ो भावा := कल तक ह रहनेवाले
अथात न र,

णक, णभंगरु ये भोग ;म य य ् सव

एतत ् जरय त = मरणशील मनु य क सब इ
उसे

अित र

याणाम ् यत ् तेज:

य का जो तेज (है )

ीण कर दे ते ह ; अ प सवम ् जी वतम ् अ पम ् एव = इसके
सम त आयु अ प ह है ; तव वाहा:

यगीते तव एव =

आपके रथा द वाहन, वग के नृ य और संगीत आपके ह (पास) रह।
वचनामृत : हे यमराज,(आपके
(एक ह
तेज को

दन के,

ारा व णत) कल तक ह रहनेवाले

णभंगरु ) भोग मरणधमा मनु य क सब इ

ीण कर दे ते ह। इसके अित र

य के

सम त आयु अ प ह है ।

आपके रथा द वाहन, वग के नृ य और संगीत आपके ह पास रह।

या या :निचकेता ने आ म ान क अपे ा सांसा रक सुखभोगो को
तु छ घो षत कर दया। भौितक सुखभोग इ

य क श

दे ते ह तथा उनसे शा त नह ं होती। इसके अित र
अ प और अिन

त है । अतएव

सा य है एवं

जस

को

ीण कर

मनु य का जीवन

ववेकशील पु ष के िलए स य

ा य है, उसके िलए ये भौितक सुखभोग

निचकेता यमदे व से कह दे ता है क उसे ये न र भोग-पदाथ

या य ह।
लु ध नह ं

करते तथा इ ह वह अपने पास ह रखे।
न व ेन तपणीयो मनु यो ल
जी व यामो यावद िश यिस

यामहे व म ा म चे त ् वा।

वं वर तु मे वरणीय: स एव॥२७॥

श दाथ : मनु य: व न
े तपणीय: न = मनु य धन से कभी तृ
नह ं हो सकता ;चेत ्= य द, जब क ; वा अ ा म =(हमने) आपके दशन
पा िलये ह ; व म ् ल
याव

यामहे = धन को (तो हम) पा ह लगे ; वम ्

ईिश यिस = आप जब तक ईशन(शासन) करते रहगे, जी व याम:=

हम जी वत ह रहगे ;मे वरणीय: वर: तु स एव = मेरे मांगने के यो य
वर तो वह ह है ।
वचनामृत : मनु य धन से तृ

नह ं हो सकता। जब क (हमने)

आपके दशन पा िलये ह, धन तो हम पा ह लगे। आप जब तक शासन
करते रहगे, हम जी वत भी रह सकगे। मेरे मांगने के यो य वर तो वह ह
है ।
या या :निचकेता ने एक परम स य का कथन कया है
से मनु य क

आ य तक तृि

नह

क धन

हो सकती। उसने यमदे व को

स मानदे ते हए
ु कहा-जब क हमने आपके दशन

कर िलए ह, आपक

कृ पा से धन तो हम पा ह लगे तथा आप जब तक शासन करते रहगे,
हम भी तब तक जी वत रह सकगे। अत: धन और द घायु क याचना
करना यथ है ।
कठोपिनष

का पहला उपदे श निचकेता के मुख से िन सृत हआ
है ।

"न व ेन तपणीयो मनु य:" को क ठ थ करके इसके सारत व को
कर लेना च हए। मनु य क आ य तक तृि

कभी धन-स प

हो सकती। मनु य धन से सुख-सु वधा के साधन को
क तु आि क सुख को

से नह ं

ा कर सकता है ,

ाप ् नह ं कर सकता। मनु य के जीवन म धन

बहत
ु कुछ है , क तु सब कुछ नह है ।
इ छाओं क ति

हण

भोग से नह ं होती,जैसे क अ न क शा त घृत

डालने से नह ं होती, ब क वह अिधक उ

हो जाती है ।

न जातू काम: कामानामुपभोगेन शा यित।

ह वषा कृ णव मव

भूय

एवािभवधते ॥ (मनु मृित २.९४)

भोगा न भु ा वयमेव भु ा:
अथात भोग कभी भु

(भतृह र, वैरा यशतक)

नह ं होते, हम भी भु

हो जाते ह।

‘ वषय मोर ह र ली हे उ याना’

(सु ीव क उ

)

‘बुझै न काम अगिन तुलसी कहँु वषय भोग वहु घी ते’

कामा न का शमन ववेकपूण स तोष से ह होना संभव होता है ।
‘ बनु संतोष न काम नसाह ।’
हवर
कमेट

ारा

तुत अमे रका क अथसंबंधी यु ो र अ वेषण

रपोट म पर परागत िस ा त का ह

ितपादन

कया गया

क एक

इ छा को शा त करने पर वह अ य इ छा को ज म दे दे ती है तथा
इ छाओं का म कभी समा नह ं होता।
“The survey has provaed conclusively what has been long held
theoretically to be true that wants are almost insatiable, that one want
makes way for another.” “Wants multiply.”
महा मा ईसा ने कहा था क मनु य एक साथ ह भगवान ् तथा
धन को

ेम नह ं कर सकता (“Ye cannot serve God and a mammon.”)

ऊँट के िलए सुई म से गुजरना धिनक

ारा परमा मा के रा य म

वेश

करने क अपे ा सरल है । “For it is easier for a camel to go through a
needle’s eye than for a richman to enter into the kingdom of God.”
आ ा मक साधक के माग म धन क तृ णा एवं धन का अिभमान
बाधक ह। उसे सादगी और संतोष से जीवन-यापन करना चा हए।
धन क िल सा मनु य को पाप म

वृ

कर दे ती है । धन का

भाव धन के अभाव से अिधक दःखदायक
होता है । धन का लोभ मनु य

को भटकाकर अशा त बना दे ता है तथा धन क

चुरता को मदा ध बना

दे ती है । कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अिधकाय। वह खाये बौराय
जग यह पाये बौराय ( बहार )। धन क

चुरता

ायः मनु य को

वलािसता, द ु यसन, अपराध, हं सा और अशा त क ओर ले जाती है ।
वा तव म धन म दोष नह ं है , धन क िल सा एवं आस

म दोष

होता है । मनु य धन के सदपयोग
से द न दःखी
जन क सेवा आ द


लोक-क याण के काय कर सकता है । अतः हम
चा हए। ईशावा य उपिनष
है तेन
संतोषवृ

म इसी भाव को सू ा मक

य े न भु जीथा मा गृधः क य व

यागपूवक भोग करना

शंसा म कहा थासाँ

प से कहा गया

धनम।् स त कबीर ने

इतना द जये, जाम कुटु ब समाय,

म भी भूखा ना म ँ साधु न भूखा जाय। प र म और स चाई से धन
अ जत करना, जो भी

हो जाय उसम स तोष करना तथा उसका

सदपयोग
करना ववेकस मत है । य

छालाभस तु

(गीता, ४.२२)

यह एक त य है क मनु य सब कुछ यह ं एक त करता है और


सब कुछ यह ं छोड़कर सहसा चला जाता ह। य द सब कुछ छटना
है तो
हम उसे

वयं ह छोड़ द अथात ् उसके मम व, वािम व और आस

भाव को छोड़कर भारयु
‘इदं न मम’

हो जाएँ। सब धन परमा मा का ह है । अतः

(यह मेरा नह ं है ।) क भावना को िशरोधाय करके धन का

उपभोग एवं सदपयोग
करना सब

िन य

बृहदार यक उपिनष

आ म ान

कार से

है ।

अपे ा

म मै ेयी ने या व

धन

अ य त

तु छ

है ।

य ऋ ष से पूछाय द यह धन

से स प न सार पृ वी मेर हो जाये तो
या व

के

या म अमर हो सकती हँू?

य ने कह भोगसामि य से स प न मनु य का जैसा जीवन

होता है , वैसा ह तेरा जीवन भी हो जाएगा। धन से अमृत व क तो आशा
ह नह ं। ‘अमृत व य नाशा त व ेन।’ मै ेयी ने कहा जससे म अमृत ा
नह ं हो सकती, उसे लेकर

या क ँ गी? मुझे तो अमृत व का साधन

बतलाएं। ‘येनाहं नामृता यां कमहं तेन कुयाम ् ? यदे व भगवा वेद तदे व मे
ू ह।’ जीवन का उ े य तो अमृत व प आ मा को जानकर अमृत व

करना है । उपिनषद

म अनेक

थल

पर अमृत व क

जीवनकाल म आ मत व को जानकर अमृत व

चचा है ।

करना ह उ म धन

है । यह मानव क सव च उपल ध भी है ।
अजीयताममृतानामुपे य जीयन ् म यः कधः थः

जानन।्

अिभ यायन ् वणरित मोदानद घ जी वते को रमेत ॥२८॥
श दाथः

जीयन ् म यः

=

जीण

होनेवाला

अजीयताम ् अमृतानाम ् = वयोहािन प जीणता को

मरणधमा

न होनेवाले अमृत

(दे वताओं, महा माओं) क स निध म, िनकतटता म; उपे य=
पहँु चकर;

मनु य;

होकर,

जानन ्= आ मत व क

म हमा का जाननेवाला अथवा उन

कधः थः= कधः (कु=पृ वी, अ त र

आ द से अधः, नीचे होने के कारण

(दे वताओं,
पृ वी

महा माओ)

से

होनेवाले

कधः कहलाती है शंकराचाय) म

थत

लाभ

को

जाननेवाला;

कधः थ, नीचे पृ वी पर

थत होकर; कः= कौन; वणरित मोदान ् अिभ यायन ्= प, रित और

भोगसुख का

यान करता हआ
(अथवा उनक

यथता पर वचार करता

हआ
ु ); अितद घ जी वते रमेत=अितद घ काल तक जी वत रहने म
लेगा। (इस

िच

ोक के अनेक अ वय और अथ कए गए ह।

वचनामृतः जीण होनेवाला मरणधमा मनु य, जीणता को

होनेवाले दे वताओं (अथवा महा माओं) के समीप जाकर, आ म व ा से
प रिचत होकर, (अथवा महा माओं से

होनेवाले लाभ को सोचकर)

पृ वी पर

थत होनेवाला, कौन भौितक भोग का

(अथवा उनक

मरण करता हआ

िनरथकता को समझता हआ
ु ) अितद घ जीवन म सुख

मानेगा?

या याः निचकेता कुमाराव था म ह

बु

प रप वता एवं

ज ासा क गहनता का प रचय दे ता है । वह यमदे व से कहता है
जीण हो जानेवाला तथा मृ यु को

होनेवाला, मृ युलोक म रहनेवाला,

कौन मनु य जीण न होनेवाले अमृत व प महा माओं का संग पाकर भी
भौितक भोग का िच तन करते हए
ु द घकाल तक जी वत रहने म

िच

लेगा? यमराज जैसे महा मा का सा न य पाकर भी भोग का िच तन
करने क मूखता कौन ववेकशील मनु य करे गा? मृ युल ोक म रहनेवाले
मरणधमा मनु य के िलए यमराज के सा न य म आकर आ म ान क
ाि

से बढ़कर अ य कौन-सा सौभा य हो सकता है ? निचकेता ने

आ म ान के िलए आव यक वैरा यभाव को
उपदे श का स चा अिधकार िस

दिशत करके

कर दया। यह

वासना और भौितक व तुओं क तृ णा से

िस

वयं को

ह है क वषय-

त मनु य आ म ान क

साधना नह ं कर सकता। निचकेता स य का गंभीर अनुसध
ं ाता है तथा
संसार के सुखभोग को तु छ समझकर उनका प र याग करने पर
वह मा

ढ़ है ।

द घजीवी नह ं, द यजीवी होना चाहता है ।

य म नदं विच क स त मृ यो य सा पराये महित

ू ह न तत।्

योऽयं वरो गूढमनु व ो ना यं त मा निचकेता वृणीते ॥२९॥

श दाथः मृ यो=हे यमराज; य मन ् इदम ् विच क स त=

जस

समय यह विच क सा (स दे ह, ववाद) होती है ; यत ् महित सा पराये =
जो महान ् परलोक- व ान म है ; तत ्=उसे; नः

ू ह=हम बता दो; यः

अयम ् गूढम ् अनु व ः वरः = जो यह वर (अब) गूढ रह यमयता को

वेश कर गया है (अिधक रह यपूण एवं मह वपूण हो गया है ); त मात ्

अ यम ्= इससे अित र

अ य (वर) को; निचकेता न वृणीते= निचकेता

नह ं माँगता।
(इस

ोक के भी अनेक अ वय और अथ कए गए ह।)

वचनामृतः हे यमराज, जस

वषय म स दे ह होता है , जो महान ्

परलोक- व ान म है , उसे हम कहो। जो यह (तृतीय) वह है , (अब) गूढ
रह यमयता म
अित र

वेश कर गया है (अिधक रह यपूण हो गया है )। उसके

अ य (वर को) निचकेता नह ं माँगता।
या याः निचकेता अपने िन य पर

ढ़ है तथा कोई

लोभन उसे

वचिलत नह ं कर सकता। यमराज जैसे उपदे ा के सा न य का

व णम

अवसर
लोभन

करके वह उसे खोना नह ं चाहता। यमराज ने

जतने भी

तुत कए, निचकेता ने उन सबको तु छ एवं हे य कह दया।

आ मत व के

ान से बढ़कर अ य कुछ भी नह ं हो सकता। निचकेता

का तृतीय वर गूढ है और गंभीर ववेचना क अपे ा करता है ।

थम अ याय
तीय व ली
अ य छे योऽ यदतै
ु व
तयोः

ेय ते उभे नानाभ पु षं िसनीतः।

ेय आददान य साधु भवित ह यतेऽथा

श दाथः
उत = तथा;

ेयो वृणीते ॥१॥

ेयः = क याण का साधन; अ यत ् = अलग है , दसरा
है ;

े यः =

तीत होनेवाले भोग का साधन; अ यत ् एव =

अलग ह है , दसरा
ह है ; ते उभे = वे दोन ; नाना अथ = िभ न अथ म,

िभ न
आकृ

योजन म; पु षम ् = पु ष को; िसनीतः = बाँधते ह, अपनी ओर

करते ह; तयोः= उन दोन म;

आददान य=

हण करनेवाले पु ष का; साधु भवित= क याण (शुभ)

होता है ; उ यः = और जो;

े यः वृणीते =

अथात ् = अथ से, यथाथ से; ह यते =
वचनामृतः

िभ न

ेयः = क याण के साधन को;
वीकार करता है ;

हो जाता है ।

ेयस ् अ य है , ेयस ् अ य है । ये दोन पु ष को िभ न-

योजन से आक षत करते ह। उनम

पु ष का क याण होता है और जो
हो जाता है ।
स दभः म
उपदे श का

ेय को


े स ् को

हण करनेवाले

ेयस ् का वरण करता है , वह यथाथ से

१ तथा २ अ य त मह वपूण ह। यहां से

ारं भ हो रहा है ।

द यामृतः संसार म मनु य के िलए दो ह माग हएक
दसरा

व ा के

ेयमाग।

होता है तथा

ेयमाग मनु य के िलए सब

ेयमाग,

कार से क याणकार िस

ेयमाग मनु य को संसार म भटकाकर उसे जीवन के मूल

उ े य से ह हटा दे ता है ।
को परमा मा क

ाि

ेयमाग आ मक याण का माग है तथा मनु य

क ओर उ मुख कर दे ता है ।

ेयमाग सांसा रक

सुखभोग का माग है तथा अ त म वह मनु य के सुख-शा त को वन
कर दे ता है । ये दोन

मनु य को अपनी ओर आक षत करते ह।

मनु य अपने माग का चयन करने और उसका अनुसरण करने म
वत

ह।
कठोपिनष

के

थम अ याय क

भूिमका है तथा यमदे व आचाय के

त हो जाते ह

कमका ड (य
ाि

थम व ली म इस उपिनष
प म निचकेता क पर

क वह आ म ान- ाि

का सुपा

है । यमाचाय

ा लेकर

है । निचकेता

आ द) क सीमा को जानता है तथा वह असीम

के िलए स न

ान क

वयं भी कमका ड को आ या मक

ान क

अपे ा तु छ मानते ह। इस दसर
व ली से

ारं भ होता है ।

ानोपदे श का

व ा का उपदे श उ म अिधकार को ह

दया जा

सकता है, अनिधकार को कदा प नह ं।
ेय

ेय

मनु यमेत तौ स पर य व वन

ेयो ह धीरोऽिभ ेयसो वृणीते
श दाथः

ेय

ेय

ेयो म दो योग ेमा

मनु यम ् एतः= ेय और

होते ह, मनु य के सामने आते ह; धीरः =
पर; स पर य = भली

ेयः ह अिभवृणीते =

= छानबीन करता
े यसः =

ेय क

हण करता है , ेय का ह वरण

करता है ; म दः= म द मनु य; योग ेमात ्= सांसा रक योग (अ ा
ाि ) और

ेम ( ा

क र ा) से;

बु वाला पु ष; तौ = उन

बु वाला पु ष;

ेय को ह

वृणीते ॥२॥

ेय मनु य को

कार वचार करके; व वन

है , पृथक् -पृथक् समझता है ; धीरः=
अपे ा;

धीरः।

ेयः वृणीते =

ेय का वरण करता

है ।
वचनामृतः
े बु स प न

ेय और
पु ष

े बु वाला मनु य

ेय (दोन ) मनु य को

होते

ह।

करके

पृथक् -पृथक्

समझता

है ।

इ छा) से

ेय का

वचार
ेय क

उ ह

अपे ा



को ह

म दबु वाला मनु य लौ कक योग ेम (क

हण करता है ।
हण

करता है ।
स दभः इस मं
भगव

गीता म अनेक

क गयी है । धीर को

को क ठ थ कर लेना चा हए। उपिनषद तथा
थान पर धीरपु ष ( ववेकशील पु ष) क

शंसा

ानी एवं व ान भी कहा गया है ।

द यामृतः संसार म मनु य के सामने जीवन के दो माग होते ह
ेय तथा
है ।

ेय।

ेय मनु य के वकास का माग है तथा

ेय

ास का माग


े से दरगामी
, थायी, सकारा म एवं सारमय फल

होते ह तथा

ेय से त काल कुछ
को शार रक सुख

णक, लौ कक सुख

एवं इ

य-सुख

होते ह।

के आकषण से दरू हटाकर तथा

आ मा क ओर उ मुख कर, उसे जीवन के उ चतर
दे ता है ।


े माग मनु य को इ

तथा जीवन को
सुखभोग म िनम

तर पर

थत कर

य क दासता से ऊपर उठा दे ता है

काशमय बना दे ता है।

ेयमाग मनु य को भौितक

कर उसे अ तह न अ धकार म धकेल दे ता है । म द,

अदरदश
मनु य भौितक सुखभोग के साधन को

उनक सुर ा करने ( ेम) म िच तत एवं
पु ष


े माग मनु य

ेय का तथा म द पु ष

करने (योग) तथा
रहता है ।

ववेकशील

ेय का वरण करते ह। मनु य अपने माग

का चयन करने म

वतं

होता है । मनु य

वयं ह अपने भा य का

िनमाता होता है ।
मनु य को संसार के वषय-सागर को कुशलतापूवक पार करके ह
परमान द क

ाि

हो सकती है । बु मान ् पु ष ववेक

लेता है , क तु म दबु
अ व ा के

इसम डू बकर वन

म ववेक

परमान द

ाि

गंभीरतापूवक
वरण तथा


ेय तथा

ेय का

के

होकर

ेय माग पर गंभीरतापूवक िच तन करके

ेय का

ओर उ मुख हो जाता है । बु मीन ् मनु य को

याग करना चा हए। जैसे हं स नीर- ीर

कार धीर पु ष
(इस मं

करके, व ा के

करता है, अथात ् वषयसुख से िनवृ

िनपुण होता है तथा नीर को
उसी

हो जाता है । बु मान ् पु ष

ारा भोगा द क तृि

होकर आ य तक तृि

ारा इसे पार कर

ेय को

यागकर

ीर (द ु ध) को

यागकर

ववेक म

हण कर लेता है ,

ेय का वरण कर लेता है।

का गूढाथ समझने के िलए भगव

ोक ६४, ६५ तथा अ याय ३ के

गीता के अ याय २

ोक ६, ७ के दे खना चा हए।

योग ेम क चचा गीता-९.२२ तथा तै ० उप०-३.१० म भी है )

वं

यान ्

य पां

कामानिभ याय निचकेतोऽ य ा ीः।

नैत ां सृडकां व मयीमवा ो य यां म ज त बहवो मनु याः ॥३॥
श दाथः निचकेतः = हे निचकेता; स
य पान ् कामान ् =

अिभ यायन ् =

वम ् =वह तुम हो;

य ( तीत होनेवाले) और

सोच-समझकर;

अ य ा ीः

व मयीम ् सृडकाम ् = इस धनस प

अथवा माग) को; न अवा ः =

=

यान ् च

पवाले भोग को;

छोड़

दया;

एताम ्

व प सृडका (र माला एवं ब धन
नह ं कया; य याम ् = जसम; बहवः

मनु याः म ज त = बहत
ु लोग फँस जाते ह, मु ध हो जाते ह। (सृडका
के अ य अथ माग तथा ब धन ह। सृडका अथात ् र माला, धन-लोभ का
माग, धन का ब धन।)

वचनामृतः वह तू है (ऐसे तुम हो क)

तीत होनेवाले और

पवाले (सम त) भोग को सोच-समझकर (तुमने) छोड़ दया, इस

बहमू
ु य र माला को भी

वीकार नह ं कया जसम ( जसके

लोभन म)

अिधकांश लोग फँस जाते ह।
स दभः गु

यमाचाय उपदे श- हण क

निचकेता को पूणतः उ ीण दे खकर उसक
द यामृतः िश ण-काय म कुशल गु
पा ता क पर
उसका

ा लेते ह तथा उसे उ म

पा ता के पर

ण म

शंसा करते ह।
िश य क उपदे श- हण क
व ा का अिधकार दे खकर

ो साहन करते ह। यमाचाय निचकेता से कहते हनिचकेता, तुम

ध य हो। मने पर
आ या मक

ा करके

ान

वयं को स तु

क तुम

करने के िलए स चे अिधकार हो। तुम वैरा य

और ववेक से संप न हो। ववेकशील
णक सुखभोग के

कर िलया है

दरदश
होता है तथा वह

लोभन म नह ं फँसता। तुमने तो बहमू
ु य र माला

के उपहार को (एवं धन के ब धन को) तु छ मानकर ितर कृ त कर
दया। सांसा रक सुखभोग म िल
ववेचन नह ं करता तथा येनकेन

होनेवाला

भले और बुरे को

कारे ण सुखभोग के साधन प धन को

संगह
ृ त करने म जुटा रहता है । धनसंचय के िलए वह कुमाग का
अनुसरण

करने

अ तरा मा क

कंिच मा

भी

संकोच

नह ं

करता।

ारंभ

विन उसे कुमागगामी होने से रोकती है, क तु वह पुनः

पुनः उसक उपे ा कर दे ता है और उसक अनसुनी कर दे ता है तथा वह
म द हो जाती है जैसे अ न राख के ढे र से दबने पर तेज खो दे ती है ।
निचकेता ने

वयं को परमा मत व के

सुयो य अिधकार

मा णत करके गु

वण और

यमाचाय को स तु

दरमे
ू ते वपर त वषूची अ व ा या च व िे त
व ाभी सतं निचकेतसं म ये न

कर दया।

ाता।

वा कामा बहवोऽलोलुप त ॥४॥

श दाथः या अ व ा = जो अ व ा; च
व ा नाम से

हण करने के िलए

ात है ; एते = ये दोन

व ा इित

ाता = और

; दरम
ू ् वपर ते = अ य त

वपर त (ह); वषूची = िभ न-िभ न फल दे नेवाली ह, निचकेतसम ् व ा

अभी सतम ् म ये = (म) निचकेता को व ा क अभी सा (अिभलाषा)
वाला मानता हँू ;

वा = तु ह; बहवः कामाः न अलोलुप त= बहत
ु से भोग

लोलुप (लु ध) न कर सके।

वचनामृतः जो अ व ा और व ा नाम से व यात ह, ये (पर पर)
अ य त वपर त ह। (ये) िभ न-िभ न फल दे नेवाली ह। म तुम निचकेता
को

व ा का अिभलाषी मानता हँू, तु ह बहत
ु से भोग ने

लु ध नह ं

कया।

स दभः यमाचाय निचकेता के पर
द यामृतः व ा
पर पर
पर

ा-प रणाम से

ेयमाग और अ व ा

ेयमाग है तथा दोन माग

तथा िभ न-िभ न फल दे नेवाले ह। गु

ा म निचकेता को धना द के

लोभन के मु

िलए आ था म अ वचल पाकर स तु
सव च अ या म व ा के अिधकार

यमाचाय पा -

और

ान ाि

हो गये। निचकेता ने
के

प म

आ म-क याण के माग पर आ ढ होनेवाला
रहता है तथा

स न ह।

मा णत कर

के

वयं को
दया।

ववेकशील पु ष सावधान

चुर भोगसाम ी को दे खकर भी

वचिलत नह ं होता,

भटकता नह ं है । वह ल य पर अपनी

को

थर रखता है । संसार क

भौितक साम ी का उिचत उपभोग करते हए
ु ल य क ओर बढते रहना
ववेक है तथा उसके

लोभन म फँसकर अ ा

सुर ा अथात ् उसके योग ेम म
िच ता, भय एवं

हए
ु ;

और

लेश म ह जीवन का

अ व ायाम तरे वतमानः

ाि

और

य त रहना और सांसा रक

य कर दे ना अ ववेक है ।

वयं धीराः प डत म यमानाः।

यमाणाः प रय त मूढा अ धेनैव नीयमाना यथा धाः ॥५॥

श दाथः अ व ायाम ् अ तरे वतमानः = अ व ा के भीतर ह रहते
वयं धीराः प डतम ् म यमानाः =

माननेवाले; मूढ़ाः = मूढ जन; द

वयं को धीर और प डत

यमाणाः = टे ढ़े-मेढ़े माग पर चलते

हए
ु , ठोकर खाते हए
ु , भटकते हए
ु ; प रय त = घूमते रहते ह,

थर नह ं

होते; यथा जैसे, अ धे न एव नीयमानाः अ धाः = अ धे से ले जाए हए

अ धे मनु य।

वचनामृतः अ व ा के भीतर ह रहते हए
ु ,

वयं को धीर, प डत

माननेवाले मूढजन, भटकते हए
ु च वत ् घूमते रहते ह, जैसे अ धे से ले
जाते हए
ु अ धे।
मं

स दभः अ व ा म फँसे हए
ु मनु य अधोगित को

मु डक उपिनष
द यामृतः

करनेवाला उ म
करनेवाला िनकृ

होते ह। यह

(१.२.८) म भी है ।

व ा

का

ान है

अथ

आ या मक

को

से मा

भौितक उ नित एवं

ान व ा नह ं होता, वह िनकृ

तर कर

होता है । व ा मनु य को भौितक ब धन (आकषण) से मु
बु मान ् पु ष अ व ा से व ा क ओर चला जाती है ।
माग है तथा

उ प न

तथा अ व ा का अथ अ धकार उ प न

ान है । आ या मक

भौितक सुखभोग-संबंधी

काश

ान

करा दे ती है ।

ेयमाग व ा का

ेयमाग अ व ा का माग है । भौितक सुखभोग को ह जीवन

का उ े य माननेव ाले भौितकतावाद (भोगवाद ) मनु य क श
य हो जाता है और उसके जीवन का सौ दय वन
जीवन म उ च

य का

हो जाता है ।१ वह

तर के लाभ से वंिचत रहता है और पशु- तर पर

भोगरत रहने के कारण उसका आ त रक वकास नह ं होता। भोग क
इ छा मनु य को भटकाकर अ त म उसक दगित
कर दे ती है । इ

——————————————————
१.

यात वै ािनक आर० ए० िमलकन ने भौितक सुखभोग पर के

जीवन-दशन को बु

त भौितकवाद

क म दता का िशखर कहा है तथा डा वन के सहयोगी एवं

महान ् िच तक ट ० एच० ह सले ने भी भौितकता क िन दा क है ।
जीवन के अ त म मा
वंिचत रहना कहा है ।

य-

वयं डा वन ने

भौितकवाद के अनुसरण को जीवन-सौ दय के अनुभव से

सुख क दासता िनकृ

ब धन होती है । जस

पर चलनेवाले अ धे य

नह ं होते, उसी

कार एक अ धे के िनदश

भटकते हए
ु ठोकर खाते रहते ह और ल य को

कार भोग का अनुसरण करनेवाले मनु य भी जीवन

के उ चतर ल य को

नह ं कर सकते। अंधी अंधा ठे िलया दोन कूप

पड़ त।
न सा परायः

ितभाित बालं

मा

तं व मोहे न मूढम।्

अयं लोको ना त पर इित मानी पुनः पुनवशमाप ते मे।। ६।।
श दाथ : व मोहे न मूढम ्

बालम ् =

=

धन के मोह से मो हत;

मा

तम ्

माद करनेवाले अ ानी को; सा परायः= परलोक, लोको र-

अव था, मु

;

ितभाित = नह ं

सूझता; अयं लोक: = यह लोक

(ह स य है ); पर न अ त = इससे परे (कुछ) नह ं है ; इित मानी =
ऐसा माननेवाला, अिभमानी य

; पुनः पुनः = बार-बार; मे वशम ् = मेरे

वश म; आप ते = आ जाता है ।
वचनामृतः धन स प

से मो हत, माद

(अथवा लोको र-अव था) नह ं सूझ ता। यह

त अ ानी को परलोक

द खनेवाला लोक (ह

स य) है , इससे परे (अित र ) कुछ नह ं है , ऐसा माननेवाला अिभमानी
मनु य पुनः पुनः मेरे (यमराज के) वश म आ जाता है ।
स दभः भोगास
द यामृतः
यह

दरदश
नह ं होता।

संसार के

पंच म फँ सा हआ
मनु य समझता है क

द खनेवाला लोक ह सब कुछ है तथा इससे परे कह ं कुछ

नह ं है । धन के मोह से मो हत अ ानी मनु य क दरू
माद (गंभीर िच तन,

वा याय तथा यम-िनयम आ द का पालन न

करना) के कारण इस जग
परे कुछ नह ं सूझता।
इससे सुखभोग
अिभमान

पंच म ऐसा फँसा रहता है क

वह सोचता है

क यह संसार ह स य है और
ानमय उपदे श को नह ं सुनता।

वा तव म मनु य को आ या मक
अनेक

उसे इससे

से बढ़कर कुछ भी नह ं है । ऐसा माननेवाला मनु य

त होता है तथा कसी के

अव था क

नह ं होती। वह

ाि

बोध होने पर लोको र-

अपने भीतर ह हो जाती है । मानव क चेतना के

तर होते ह तथा चेत ना के विभ न

तर पर विभ न

कार क

उ चाव थाओं क अनुभूित हो जाती है । सारा संसार सू म प से अपने
भीतर ह है ।१ मनु य

का आ मा िचदं श अथवा परमा मा

-------------------------------------१.

िच मेव ह संसारः त

—िच

य ेन शोधयेत।् (मै ेयी उप०)

ह संस ार है , उसका शोधन

से करना चा हए।

का ह अंश

होता है ।

वमूढ

भोगास

रहकर चेतना के उ च

तर

अलौ कक आन द से वंिचत रह जाता है । वह पशुओं क

के
भाँित

िन न तर य भोग म रत रहकर जीवन के सौ दय का अनुभव नह ं कर
पाता। मनु य के भीतर भी वह सब कुछ है, जो सम त ब हजगत ् म है ।
वणाया प बहरिभय
न ल यः

ृ व तो· प बहवो यं न व ःु ।

आ य व ा कुशलो· य ल धा·· य
श दाथः यः बहिभः

ाता कुशलानुिश ः।। ७।।

वणाय अ प न ल यः = जो (आ मत व)

बहत
को सनने के िलए भी नह ं िमलता; यम ् बहवः

ृ व तः अ प न

व ःु = जसे बहत
ु से मनु य सुनकर भी नह ं समझ पाते; अ य व ा =

इसका व ा; आ य = आ यमय (है )। ल धा कुशलः = (इसका)
करनवाला

कुशल

(परम

बु मान ्);

उपल ध हो गई है ) से अनुिश

(िश

कुशलानुिश ः
त);

=

कुशल

हण

( जसे

ाता = (आ मत व का)

जाननेवाला; आ यः = आ यमय (है )।
वचनामृतः = जो (आ मत व) बहत
ु से मनु य को सुनने के िलए

भी नह ं िमलता, जसे बहत
ु से मनु य सुनकर भी नह ं
इसका कहनेवाला आ यमय है ,
िश

ाता पु ष आ यमय है ।

समझ पाते,

हण करनेवाला परम बु मान ् है , उससे

स दभः = आ मत व क गूढता का िन पण कया गया है ।
द यामृत : आ मत व अ य त गूढ एवं आ य द है ।१

सुनने म भी

िच लेनेवाले दलभ
होते ह।

इसको

ायः सभी मनु य जग

पंच

म फँसे हए
ु रहते ह तथा आ मक याण क चचा के िलए उनम न

िच

होती है और न इसके िलए अवकाश (फुसत) ह होता है । आ मत व का
वषय इतना गंभीर है क

ायः मनु य उसके ववेचन को सुनकर भी उसे

नह ं समझ पाते। इस गूढ आ मत व का व ा महापु ष आ यमय होता
है । उसक जीवनशैल ी असामा य होती है। मनु य उसे दे खकर आ य
करते ह। आ मत व के ववेचन को समझने और
भी एक दलभ
महापु ष होता है । ऐसे

होते ह।

हण करनेवाला मनु य

ानमाग धीर (परम बु मान ्)

---------------------------------------१.आ यव प यित क
आ ियव चैनम यः

दे नमा यव दित तथैव चा यः।


ृ ोित

ु वा येनं वेद न चैव क

त ्।। (गीता, २.२९)

—कोई आ मा को आ य से दे खता है , कोई अ य आ य से कहता है , कोई आ यच कत
होकर सुनता है और इसे सुनकर भी कोई समझता नह ं है ।

आ मत व को उपल ध करनेवाले कसी महा ानी को गु
उसक कृ पा से आ मत व का

हण करनेवाला पु ष भी आ य ह होता

है ।१ गूढ आ मत व का समथ व ा और ज ासु

ोता तो दलभ
होते ह

ह, आ म ान से म डत आ मदश एवं अनुभवी
िश य भी दलभ
होते ह। ये सभी

अन य ो े गितर

एष सु व ेयो बहधा
िच

अमीयान ्

श दाथ: अवरे ण नरे ण
कहे जाने पर; बहधा
िच

ानी

यमानः।

ो ः = अवर (अ प , तु छ) मनु य से

यमानः = बहुत

कार से िच तन कए जाने
न सु व ेय: =सु व ेय

कार से जानने के यो य) नह ं है ; अन य ो े =

आ म ानी के

और

त यमणु माणात ्।। ८।।

पर (भी); एष = यह आ मा, यह आ मत व;
(भली

ानी गु

महापु ष आ यमय एवं दलभ
होते

ह।

न नरे णावरे ण

मानकर

ारा न बताये जाने पर; अ

न अ त = पहँु च नह ं है ; ह =

कसी अ य

= यहाँ, इस वषय म; गितः

य क, अणु माणात ् = अणु के

माण

से भी; अणीयान ् = छोटा अथात ् अिधक सू म; अत यम ् = तक या
क पना से भी परे ।

वचनामृत : तु छ बु वाले मनु य से कहे जाने पर, बहत

कार से

िच तन करने पर भी, यह आ मत व समझ म नह ं आता। कसी अ य
ानी पु ष के

ारा उपदे श न कये जाने पर इस वषय म

होता, य क यह ( वषय) अणु माण

वेश नह ं

(सू म) से भी अिधक सू म है ,

तक से परे है ।
स दभ : इस मं
(इस मं

म आ मत व क गूढता कह गई है ।

के अनेक अ वय और अथ कए गए ह)।

द यामृत : एक सामा य बु वाले मनु य से बहत
ु समझाये जाने

पर भी आ मत व गूढता के कारण समझ म नह ं आ सकता, भले ह इस
पर बहत

कार से िच तन भी कर

िलया जाए। जब तक इसे कसी ऐसे

------------------------------------

१.

मनु याणां सह ेषु क

यतताम प िस ानां क
—सह

तित िस ये।
मां वे

म कोई एक िस ता के िलए य

भी कोई एक परमा मा को ठ क
नर सह

त वतः।। (गीता, ७.३)
करता है , य

कार से जान पाता है ।

करने वाले िस

महँु सुनहु पुरार , कोउ एक होइ धम तधार ।

धमसील को टक महँ कोई, बषय बमुख बराग रत होई।
को ट बर

म य

िु त कहई, स यक यान सकृ त कोउ लहई।

यानवंत को टक महँ कोऊ, जीवनमु

ित ह सह

सकृ त-जग सोऊ।

महँु सब सुख खानी, दलभ

लीन ब यानी।

(रामच रतमानस, उ रका ड)

ानी पु ष से न समझाया जाए, जो इसे भली
और

कार से जान चुका है

वयं इसका अनुभव कर चुक ा है , इसका

हण नह ं

कया जा

सकता। कारण यह है क यह सू म से अिधक सू म है तथा तक से परे
है ।
आ मत व द ु व ेय और द ु ह है । यह सम त सू म त व से भी

अिधक सू म है ।

खर बु वाला मनु य भी इसे बु

सकता। आ मत व बु

एवं इ

का

ारा समझ नह ं

वषय नह ं है तथा गहन

आ त रक अनुभिू त का वषय है ।
मनु य क

बु

और उसक

मनु य कसी सू मत व को बु
सू माितसू म है । मा

बु

तकश

एक सीमा होती है ।

ारा नह ं समझ सकता। परमा मा तो

का अवल बन लेकर मनु य

ान के

वेश ह नह ं कर सकता। आ मानुभिू तसंप न महापु ष ह एक स चे

ज ासु एवं

ालु अिधकार (स पा ) को इसका

तथा उसका माग-िनदशन कर सकता है ।

हण करा सकता है

ानी महा मा परमा मा तथा

अपने आ मा क एकता क अनुभूित करके परमान द क

ाि

है और तकपूण श द को पीछे छोड़ दे ता है । सा ा कार का
होने

पर

मनु य

आ मत व

का

ितपादन

नह ं

कर लेता
वानुभव न

कर

सकता।

यथाथ ानसंप न महा मा ह अिधकार पु ष को यथाथ ान का स यक्

हण करा सकता है । आ मा अनुभवग य है तथा आ मदश महापु ष

एक साधनस प न सुयो य

को आ म काश का अनुभव सहज ह

सुलभ कर दे ता है । आ मदश त व ानी ह
है , कोई अ य साधारण य
नैषा
यां

तकण

नह ं।

मितरापनेया

वमापः स यधृितबतािस

श दाथः

मित, जसे तुमने

वचन करने म समथ होता

ो ा येनव

सु ानाय

वा क् नो भूया निचकेतः

= हे परम य; एषा मितः याम ्

े ।
ा।।९।।

वम ् आपः =

कया है; तकण न आपनेया = तक से

यह
नह ं

होती; अ येन

ो ा एव सु ानाय = अ य के

(भली

ान ाि ) के िलए; (भवित = होती है); बत = वा तव म

कार

ारा कहे जाने पर सु ान

ह ; निचकेतः स यधृित अिस निचकेता, तुम स यधृित ( े
स य म िन ावाला) हो;
पूछनेवाले हम िमल।
वचनामृत :
से

वा क्

धैयवाला,

ा नः भूयात ् = तु हारे जैसै

हे परम य, यह बु , जसे तुमने

नह ं होती। अ य ( व ान ्) के

कया है , तक

ारा कहे जाने पर भली

कार

समझ म आ सकती है । वा तव म, निचकेता, तुम स यिन

हो (अथवा

स चे िन यवाले हो)। तु हारे स श ज ासु हम िमला कर।
स दभ :

आ म ान बु

तकण मितरापनेया'

य से

नह ं होता। 'नैषा

को क ठ थ कर ल।

द यामृत :
िनमल बु

क तकपूण यु

यमाचाय कहते ह क मा

तक करते रहने से ऐसी

नह ं होती, जो वैरा यपूण हो तथा धन-स प

सांसा रक वैभव के

लोभन से वचिलत न हो। िनमल बु

एवं

मनु य को

व ा का उ म अिधकार बना दे ती है । सांसा रक सुखभोग के आकषण
एवं मोह म फँसी हई
बु

आ या मक

म एका ता

ढ़ता नह ं

होती।

ान अ य त गूढ़ अथात ् रह यपूण होता है तथा स यिन

मनु य उ च तर य चेतना म
अिधकार

एवं

हो सकता है ।

वशु

थत होकर ह

बु

इसे

इसके िलए अपे

करने का

त आव यकता

होती है ।
मा

तक

ारा आ मत व को नह ं समझा जा सकता है । तक क

एक सीमा होती है तथा परमा मा तकातीत (तक से परे ) है । परमा मा
अत य है ।१ वह सू माितसू म है तथा तकपूण यु

अ त व को

हण ह

कया जा

तक से त व क

थापना

मा णत कया जा सकता है , न उसका

सकता है । तक अ ित
करना संभव नह ं है ।२

होता है अथात ् मा

से न उसके

ायः तक म श द क भरमार होती है तथा केवल तक का आधार
ज ासु को त व के
परे है ।

हण से दरू कर दे ता है ।३ परमा म-त व तक से

वह अनुभव और आ त रक अनुभिू त से सहज सुलभ है । अनुमान
और तक

माण के साधारण साधन ह। आ त रक अनुभूित

होती है । गहन आ त रक अनुभूित को िशरोधाय करना चा हए।४

माण

--------------------------१.

राम अत य बु

२. तक · ित ः।

मन बानी, मत हमार अस सुनहु सयानी।

३. श दजालं महार यं िच
अतः

य ात ्

मणकारणम।्

ात यं त व ै त वमा मनः।। ( ववेकचूड ाम ण ६२)

—श कराचाय कहते ह

थ का श दजाल िच

को भटकानेवाला घना जंगल

होता है । अतः मनु य को सबसे दरू हटकर आ मत व को जानने का
चा हए।

४. काल जुंग कहता है क हम आ त रक अनुभूित के मह व को

करना

वीकार करना चा हए।

का ट को Critique of Pure Reason के बाद Critique of Practical Reason िलखना
पड़ा.

वा तव म उिचत तक ह मनु य को तकातीत अव था क ओर ले
जाता है और अनुभव- माण क
सू मबु

अथवा सू म

कर दे ता है ।

होने पर ह सू म त व का अनुभव होना

संभव होता है ।१

जाना यहं शेविध र यिन यं न
ततो मया नािचकेत

सव चता को िस

ुवैः

ा यते ह

तोम गरिन यै

यैः

ुवं तत ्।

ा वान म िन यम ्।।१०।।

श दाथ: अहं जानािम = मै जानता हँू; शे विधः = धनिनिध,

कमफल प

िनिध; अिन यम ् इित = अिन य है ;

य क अ ुव ( वनाशशील) व तुओं से; तत ्

ा यते = िन य ह

मया = मेरे

ह अ ुवःै =

ुवम ् = वह िन य त व; ह

नह ं हो सकता; ततः = अतएव, तथा प;

ारा; अिन यैः

यैः = अिन य पदाथ से; नािचकेतः अ नः

िचतः = नािचकेतना मक अ न का चयन कया गया; (और उसके
िन यम ् ा वान ् अ म =

म िन य को

ारा)

हो गया हँू .

वचनामृत : म जानता हँू क धन अिन य है । िन य ह अिन य

व तुओं से िन य व तु को
अिन य पदाथ

के

नह ं कया जा सकता। तथा प मेरे

ारा नािचकेत अ न का चयन

(उसके बाद) म िन य द को
स दभ : इस मं

कया गया और

है गया हँू ।

के अनेक अथ कये गये ह। मै समूलर और


ू आ द ने तो इसे निचकेता क उ
'िन यम ्

ारा

कह दया, जो अ य त

ा त है ।

ा वान ् अ म' का अथ यह भी कया गया—मने मनु यपद क

अपे ा अिधक िन य दे व वपद को

कर िलया। यह उ

यमाचाय

क ह है ।
द यामृत :

वनाशशील व तुओं तथा धन के आकषण एवं मोह

म फँसकर मनु य िन य त व परमा मा क
दान आ द पु यकम के फल व प

ाि

से वमुख हो जाता है ।

सुख भी

णक अथवा न र ह

होते ह। उनसे भी आ मसा ा कार का लाभ संभव नह ं होता। य ा द के
फल भी अिन य, अ थायी होते ह।
कम

के

दो

अथ

होते

ह—साधारण

कम

तथा

कमका ड। कत य-कम और कमका ड का उ े य िच शु
िच शु

होने पर, बु

आद
होता है ।

के िनमल होने पर, अपने भीतर ह परमा मा

का दशन हो जाता है , जैसे मेघ हटने पर सूय का दशन हो जाता है ।
परमा मा तो हमारे भीतर
१.

िनर तर

सू मया सू मदिशभः। (कठ०, १.३.१२)

काशमान है ,

क तु

अहं कार,

कामना आ द दोष के दरू होने पर अथात ् िच शु
दशन एवं उसक अनुभिू त हो जाते ह। इस
हए
ु कम एवं कमका ड भगव

ाि

होने पर परमा मा का

कार िन काम भाव से कये

के साधन हो जाते ह।१

यमराज ने न र पदाथ से नािचकेत अ न के चयन और य ा द

कए

क तु कत यभावना से तथा िन काम (अनास ) होकर

प रणामतः यमराज ने परमा मा को
से स प न कत यकम

ारा िच शु

कए।

कर िलया। मनु य िन कामभाव
होने पर परमा मा को

जाता है । िन कामभाव से अथवा अनास
क याणकारक हो जाता है । भगव ाव म

हो

होकर कम करने पर वह
थत होकर, अ या मबु

अपने कम का समपण करने से, मनु य मानो कम

से,

ारा भगवान ् क

अचना कर लेता है और उसका भगवान ् के साथ योग हो जाता है ।१
काम याि ं जगतः
योममहद ु गायं

ित ां

ित ां

तोरन

यमभय य पारम।्

वा धृ या धीरो निचकेतो· य ा ीः।। ११।।

श दाथ : निचकेत: = हे निचकेता; काम य आि म ् = भोग-

वलास क

ाि

तो: अन

को; जगत:

यम ् =य

िनभ कता क सीमा को;

ित ाम ् = संसार क

ित ा को, यश को;

के फल क अन तता को; अभय य पारम ् =
तोममहत ् =

तुित के यो य और महान ्;

उ गायम ् = वेद म जसके गुण गाए गए ह; (अथवा,

तोमम ् =

को);

थित;

एवं

तुित

शंसा को; महत ् उ गायम ् = महान ् तुितस हत जयजयकार के गान
ित ाम ् = द घ काल तक

थित,

थर रहने क

दे खकर, सोचकर; धृ या = धृित से धैय से; धीरः =

वा =

ानी तुमने;

अ य ा ीः= छोड़ दया।
वचनामृत ् : हे निचकेता, तुमने भोग-ऐ य क

वग को (अथवा भोग-ऐ य क
फल) से

पराका ावाले

वग को (अथवा य

ाि

को), य

ाि

करानेवाले

क अन तता (अन त

के अन त फल को), िनभ कता क

वग को (अथवा िनभ कता क पराका ा को),

तुित को

-------------------------------------------------

१. कमणैव ह संिस मा थता जनकादयः (गीता, ३.२०)—जनक आ द ने िन काम कम के
मा यम से ह िस ता

क।

२ योिगनः कम कुव त स ग
िन काम होकर, अपनी िच शु

वा मशु ये (गीता, ५.११)—योगी आस

यागकर,

के िलए कम करते ह।

मनः सादे , परमा मदशनम ् ( ववे कचूडाम ण)—मन के िनमल होने पर पमा मा का दशन हो
जाता है ।

मिय सवा ण कमा ण सं य या या मचेतसा (गीता, ३.३०)—भगवान ् को सब कम का अपण
करके अ या मभाव से कत यकम करते रह।

वकमणा तम य य िस ं व दित मानवः (गीता, १८.४६)—अपने कम

से मनु य िस

कर लेता है ।

ारा अचना करने

यो य एवं महान ् और वेद म जसका गुणगान है ऐसे
थितवाले

वग को,

वग को (अथवा लोक ित ा को), धीर होकर, वचार

छोड़ दया है (तुमने

थर
करके

वग का मोह छोड़ दया है )।

स दभ : यमाचाय निचकेता के वैरा यभाव क

शंसा करके से

व ा का उ म अिधकार घो षत करते ह। (इस मं

के अनेक अथ

कए गए ह।)
द यामृत : अिधकांश मनु य अपने सारे जीवनकाल म भोगै य
से

लु ध रहकर भोग- वलास क साम ी के अजन और सं ह म

और य

रहते ह। उनके िलए धन- ाि

मनु य तीन एषणाओं से
संव ृ

से बढ़कर कुछ नह ं होता।

त रहते ह—पु ैषणा अथात ् पु

य त
ायः

र प रवार क

क एषणा (कामना), लोकैषणा अथात ् लोक म पू जत होने क

एषणा, स ा, यश और

ित ा क एषणा तथा व ष
ै णा—धन तथा भोगै य

क साम ी क एषणा। अनेक मनु य अन त फल दे नेवाले अन त य
करते ह। अनेक मनु य िनभयता क सीमा को
करते ह। अभय क सीमा के िलए वे
करते ह।

करने क कामना

वगलोक क

ाि

वगलोक अन त सुखभोग क चरम सीमा के

है तथा अनेक मनु य सदा सुखमय रहने क कामना से
उसक

ाि

के िलए तप, दान और य

करते ह।

क कामना
प म

यात

े रत होकर

ायः मनु य अपने

तुितगान के िलए लालाियत रहते ह तथा अपनी जयजयकार के गान क
कामना करते ह। सभी लोक म अपनी
द घकाल तक

थर

द घ काल तक

थित

ित ा अथात ् स मान तथा

(आधार) क कामना करते ह।

वग को भी

थित का आधार कहा जाता है । भाव यह है क

सभी मनु य सदा सुख और स मान- ाि
भौितक सुखभोग क कामना से

ायः

क कामना करते ह। संसार के

त होने के कारण मनु य जग

म फँसा रहता है तथा अपने भीतर ह

सं थत परमा मा क

पंच
ओर

अिभमुख नह ं होता तथा परमान द क अनुभूित नह ं कर पाता। यह
मनु य का परम दभा
ु य होता है

क वह कामनापूित क मृगतृ णा म

भटकते हए
ु अमू य जीवन को वन

कर दे ता है । ववेक पु ष

णक

एवं तु छ दै हक सुख के कुच

म नह ं फँसते तथा जीवन के उ चतर

उ े य क

याग कर दे ते ह।

ाि

के िलए उनका

निचकेता धीर है अथात ्

ान के

ित उसक स ची िन ा है ।

उसम अद य ज ासा तथा असाधारण वैरा यभाव है , जो
के िलए अ याव यक होते ह। उसने
िलया तथा अपनी

व ा- ाि

वग के वैभव को भी तु छ समझ

ित ा एवं जयजयकार को भी मह वह न एवं हे य मान

िलया। यमाचाय उसक

स पा ता दे खकर च कत हो गए और उ ह ने

उसक अनेक

शंसा क ।

कार से

गु -िश य

म आ त रक

यमाचाय ने उपदे श का
तं

ददश

तारत य

था पत

हो

गया

तथा

ारं भ कर दया।

गूढमनु व ं

गुहा हतं

ग हरे ं

पुराणम।्

अ या मयोगािधगमेन दे वं म वा धीरो हषशोकौ जहाित।। १२।।
श दाथ: तम ् ददशम
् = उस क ठनता से जानने के यो य;

गूढम ्=अ

य , िछपे हए
ु ; अनु व म ् =भीतर

व , सव

व मान,

सव यापी, सबके अ तयामी; गुहा हतम ् = ( दय पी) गुहा म
ग हरे म ् = ग हर मॆ ं रहनेवाला, गहरे

दे श म अथात ्

थत;

दयकमल म

रहनेवाला, अथवा संसार पी ग हर म रहनेव ाला; पुराणम ् = सनातन,
पुरातन; अ या मयोग अिधगमेन = अ या मयोग (आ म ान) क
अथवा उसक
द यगुण

ओर गित होने से, अ तमुखी वृ

से संप न,

समझकर; धीर: =

(िछपे हए
ु , अ

होने से; दे वम ् =

िु तमान ्, परमा मा को; म वा = मनन कर,

ानी,

(सुख-दःख
ु ) को छोड़ दे ता है ।
वचनामृत:

ाि

व ान;् हषशोकौ जहाित = हष और शोक

उस ददश
(दशन म क ठन, जानने म क ठन), गूढ

य), सव

व मान (सव यापी), बु

प गुहा म

थत,

दय प ग हर म (अथवा संसार प गहन ग हर म) रहनेवाले, सनातन

दे व

(परमा मा) को

अ या मयोग

ाि

के

ारा, मनन

कर

(समझकर), धीर पु ष हष और शोक को छोड़ दे ता है ।
स दभ :

इस मं

से यमाचाय के उपदे श का

ारं भ होता है । मं

१२, १३ अ य त मह वपूण ह तथा पर पर जुड़े हए
ु ह।
द यामृत :

कृ ित ने

वकास म म सव च मनु य को बु

दान कर द , जससे वह िच तन-मनन

ारा पु य और पाप, भले और

बुरे, सु दर और बीभ स, स य और अस य का भेद कर सके तथा संसार
म वषयभोग के सागर को ववेकपूवक पार करके और भौितक सुखभोग

णभंगरु ता एवं िन साहस को दे खकर तथा अ तमुखी होकर अपने

भीतर ह

थत परमा मा क

द यानुभूित

कर सकता है ।

ऐसे महापु ष, जो संसार के अनेकानेक आकषण एवं
मु

लोभन से

होकर आ मसा ा कार क राह पर चल पड़ते ह, धीर पु ष कहलाते

ह। उ ालक ऋ ष के पु

निचकेता ने अ पायु म ह भौितक सुख एवं

वैभव क िन सारता को दे ख िलया तथा वह उ कट ज ासा एवं
वैरा यभाव से स प न होकर

व ा- ाि

खर

के िलए त पर हो गया।

निचकेता को

व ा का अिधकार मानकर यमराज ने उसे 'धीर' कह

दया।
व ा तथा

क अनुभिू त के

ार सबके िलए समान

खुले हए
ु ह, क तु अिधकार पु ष ह इस

इसके िलए अद य ज ासा, वैरा यभाव तथा
होती है तथा शा ीय
पर

प से

वेश कर सकत ह।

ा क

मुख आव यकता

ान गौण होता है ।

परमा मा ददश
होता है अथात ् उसका दशन एवं अनुभव

अ यिधक क ठन होता है । वह इ दयगोचर नह ं होता तथा वह बु

ग य

भी नह ं होता। वह सू माितसू म होने के कारण गूढ तथा सव
अनु व

है अथात ् सव यापक है ।

दय पी गुहा म बसता है ।१ वह गहरे

परमा मा मनु य के भीतर

दय के भीतर ह सू म अ तराकाश म अिध त है तथा वहाँ
ाि

का अिध ान है ।

ानी दहर (सू म अ तराकाश) म ह परमा मा

का सा ा कार करते ह।२ वे

यान म

वेश करके दहर म परमा मा क

थत होने पर

दय पी गुहा म

योित का दशन करते ह।

परमा मा सनातन अथात ् अना द, अन त और शा त है । उसे

अ या मयोग से

कया जाना संभव है अथात ् अपने भीतर ह उसका

अनुभव ह सकता है । इ
से और बु

य का संचालन मन से, मन का संचालन बु

का संचालन आ मा से होता है । मनु य अ तमुखी होने पर

अपने भीतर ह आ मा का सा ा कार कर सकता है ।
परमा मा द य है , अलौ कक है, योित: व प है । धीर अथात ्
पु ष उसका मनन करते ह तथा उसका

यान करते ह। परमा मा को

होनेवाला महा मा चेतना के सव च

वह दे ह, मन और बु

तर पर

थत रहता है तथा

के हष-शोक अथात ् सुख-द:ु ख तथा पु य-पाप के

से ऊपर उठ जाता है ।३ ऐसा महापु ष आन दाव था म

१.

िन हतं गुह ायाम ् (मु डक उप०, ३.१.७)

२.

अ मन ्

िन हतं गुह ायाम ् (तै० उप०, २.१.१), गुह ायां िन हतो ( ेत० उप०, ३.२०)

अ वे

सू म

यम ् (छ० उप०, ८.१.१)

आकाश म

पुर म (शर र के भीतर,

है ।

का (अथवा उसक

ाि

द सव य व तम ् (गीता, १३.१७)

सव य चाहं
३.

दय के अ दर)

का) अिध ान है ।

े श·े जुन ित ित (गीता १८.६१)

तदा व ान ् पु यपापे वधूय

वा स प रगृ

(मु डक उप०, ३.१.३)

म यः

वृ

थत दहरनामक कमल जैसे

दस न व ो (गीता, १५.१५)

ई र: सवभूतानां

एत

थत रहता

पुरे दहरं पु डर कं वे म दहरो· मन ् अ तराकाशः त मन ् यद तः

—इस

ानी

ध यमणुमेतमा य।

स मोदते मोदनीयं ह ल

वा ववृत ं स

निचकेतसं म ये।।१३।।

श दाथ : म य: = मनु य; एतत ् ध यम ्

(उपदे श) को सुनकर; स प रगृि
वृ

= भली

= भली

ु वा = इस धममय

कार से धारण ( हण) करके;

कार वचार करके, ववेचना करके; एतम ् अणुम ् आ य =

इस सू म (आ मत व) को; आ य = जानकर; स: = वह; मोदनीयम ्

वा = आन द व प परमा मा को पाकर; मोदते

ह = िन य ह

आन दम न हो जाता है ; निचकेतसम ् = (तुम) निचकेता के िलए;
ववृतम ् स

म ये =म परमधाम (

वचनामृत :

पुर) का

ार खुला हआ
मानता हँू ।

मरणधमा मनु य इस धममय उपदे श

को सुनकर,

धारण कर (तथा) ववेचना कर (तथा) इस सू म आ मत व को जानकर
(इसका अनुभव कर लेता है ), वह आन द व प पर

परमा मा को

कर िन य ह आन दम न हो जाता है । म निचकेता के (तु हारे ) िलए
परमधाम का
स दभ :

ार खुला हआ
मानता हँू ।

यमाचाय निचकेता को

"स मोदते मोदनीयं ह ल
द यामृत :
कोई

व ा का अिधकार मानते ह।

वा" को क ठ थ कर ल।

व ा का आ या मक उपदे श मननीय होता है ।

ानी एवं अनुभव महापु ष ह परमा मा-संबंधी उपदे श करने का

अिधकार होता है । कुछ

थ का अ ययन करके, बना कुछ

हए
ु ह , उपदे श करना िन

भावी होता है । जस मनु य ने

नह ं कया, वह कसी ज ासु को स तु

हण कये
वयं अनुभव

नह ं कर सकता। अनुभवशू य

ान िनरथक होता है ।
वह

ज ासु आ या मक उपदे श का लाभ उठा सकता है , जसम

उ सुकता, वैरा यभाव,

ा तथा

वन ता हो। आ म ान गुढ तथा


रह यमय होता है । मनु य दे हा याय से छटकर
अथात ् दे ह को आ मा से
पृथक् समझकर तथा दे ह के ब धन से मु
और मु

व प म

थत होने पर परमान द का अनुभव कर लेता है ।

आ मा सू माितसू म है तथा
उसका

द य है । जड इ

हण नह ं कर सकती। स ु

सुनकर, उ म िश य

होकर, आ मा के शु , बु

से सू म आ मत व का उपदे श

उस पर िच तन-मनन करके उसका

है । आ या मक साधना का माग ह परमान द- ाि
तथा

व ा ह मरणधमा मनु य को अमृ व

आन द का
१.

अ य

याँ, मन और बु
हण कर लेता

का एकमा

माग है

दान करने म स म है ।

ोत एवं िनधान मनु य के भीतर उसका आ मा ह है ।१

ाता म ो भवित

त धो भवित आ मारामो भवित। (नारदसू , ६)

धमाद य ाधमाद य ा मा कृ ताकृ तात ्।

अ य

भूता च भ या च य

श दाथ : यत ् तत ् =

अधमात ् अ य

प यिस त द।। १४।।

जस उस (परमा मा) को; धमात ् अ य

= धम से अतीत (परे ), अधम से भी अतीत; च = और;

अ मात ् कृ ताकृ तात ् अ य

=

कारण से भी िभ न, कृ त-

या से संप न, अकृत-

च भूतात ् भ यात ् अ य

इस कृ त और अकृ त से िभ न, काय और
या से संप न न हो;

=और भूत और भ व यत ् अथवा भूत, वतमान

और भ व यत ् तीन काल से भी परे , िभ न अथवा पृथक् ; प यिस =
आप जानते ह; तत ् वद = उसे कह

वचनामृत : (निचकेता ने कहा) आप जस उस आ मत व को धम

और अधम से परे और कृ त और अकृ त से िभ न, भूत और भ व यत ् से
परे जानते ह, उसे कह।

स दभ : निचकेता आ मत व को जानना चाहता है , वह उसक मा
भूिमका और अपनी

शंसा सुनना नह ं चाहता।

द यामृत : निचकेता क उ सुकता आ मा के संबंध म है तथा
उसे अपनी

शंसा सुनने म

िच नह ं है । वह उस परमत व को जानने म

उ सुक और आतुर है जो िन सीम है ।

वह परमा मा, जो धम और अधम

अथवा पु य और पाप से परे है तथा जो काय और कारण के िस ा त से
भी परे है और तीन काल से परे अथात ्
अन त है , ऐसा वह अ त
ु त व

कालाबािधत, अना द और

या है ? यह

पर

परमा मा िन य, शु , बु

और मु

सव

यापक होकर भी इससे परे है । बु

है । वह इस
ारा उसका

ज ासा है ।१

यमान जगत ् म

हण तथा वाणी

ारा उसका वणन करना संभ व नह ं है ।
सव वेदा यत ् पदमामन त तपांिस सवा ण च य
य द छ तो
का

चय चर त त े पदं सं हे ण

वद त।

वी योिम येतत ्।। १५।।

श दाथ : सव वेदा : यत ् पदम ् आमन त = सारे वेद जस पद

ितपादन करते ह, जस ल य क म हमा का गान करते ह; च

सवा ण तपांिस यत ् वद त = और सारे तप जसक घोषणा करते ह, वे
जसक

ाि

के साधन ह; यत ् इ छ त:

इ छा करते हए
ु (साधकगण)

चय चर त =

चय का पालन करते ह; तत ् पदम ् ते

-----------------------— जसे जानकर म

हो जाता है , त ध हो जाता है , अपने भीतर रमण करता है ।

मूक वादनवत ् (नारदसू , ५२)—गूँगे का गुड़ जैसा, अिनवचनीय सुख।
१.अथातो

ज ासा (

सू , १.१.१)

जसक

सं हे ण वीिम = उस पद को तु हारे िलए सं ेप से कहता हँू ; ओम ् इित
एतत ् = ओम ् ऐसा यह (अ र) है ।
वचनामृत : सारे वेद

जस पद का

ितपादन करते ह और सारे तप

जसक घोषणा करते ह, जसक इ छा करते हए
ु (साधकगण)

चय का

पालन करते ह, उस पद को तु हारे िलए सं ेप म कहता हँू , ओम ् ऐसा
यह अ र है ।

स दभ : = ओम ् क म हमा का गान है ।

द यामृत : यमाचाय निचकेता से सं ेप म परमपद का कथन करते ह।

सब वेद जस परमपद का
िलए नाना
है । उसक

ितपादन करते ह और जस पद क

कार के कठोर तप कए जाते ह, वह
ाि

का अथ

के िलए
ाि

के

ा य परमपद एक ह

चय का पालन कया जाता है ।

को ल य मानकर

ाि

चय-पालन

वा याय और आ या मक साधना

करना है ।
वह परमपद ओम ् है । यह अ र
का वाचक अथवा

तथा श द

तीत है । यह तीन मूल

है । यह एक अ ऱ

विनय अ, उ, म ्, का संयोजन

है । नाम तथा नामी म अभेद होता है तथा वे एक होते ह, नाम से नामी
का उ लेख होता है । ओम ्
साधना करने से
णव

है ।१ 'ॐ त सत ्'

ाि

का नाम है , सा ात ्

ह है । ओम ् क

एवं अनुभिू त संभव हो जाती है । ओम
म हमा तथा 'ॐ' क म हमा का गान

भगव ता म भी कया गया है । ओम ् का उ चारण करके य -दान-तप
आ द का

ारं भ कया जाता है ।२ अनेक उपिनषद म अनेक

ओम ् के अ त

भाव क चचा क गयी है ।३ ओंकार पर

थान पर

और अपर

----------------------१.

२.

त य वाचक:

णव: (योगदशन, १.२७)—ॐ परमा मा का वाचक है ।

ॐ त स दित िनदशो
ा णा तेन वेदा

य ा

वधः

व हताः पुरा।। (गीता, १७.२३)

त मादे िम युदाह य य दानतपः
वत ते वधानो ा: सततं

३.

याः।

वा दनाम।।
् (गीता, १७.२४)

ओिम येतद र मु थमुपासीत।

ओिमित ह उ यित त योप या यानम।।
् (छा दो य उप०, १.१.१.)
—ॐ पर

ारंभ

मृतः।

का

तीक है । ॐ कहकर उ ान करता है । उ ाता ॐ इस अ र से

करके उ ान करता है । ॐकार उ थ है । ॐ उ थसं क
.…

परमा मा क अपिचित (उपासना) होती है । तेनेयं रसेन (छा दो य
अचना परमा मा क ह अचना है ।

कृ त अ र है । इससे

उप०, १.१.९)

इसक

है । इसक तीन मा ाओं क उपासना के पृथक् -पृथक् अनेक फल ह।१ ॐ
है , ॐ सम त जगत ् है । ॐ से

को

मरण है ।३ ॐ का उ चारण

ह र: ॐ का उ चारण परमा मा का

करके उपिनषद का

करता है ।२

ारं भ कया जाता है ।

ॐ ऐसा यह अ र है अथात ् अ वनाशी परमा मा है । यह स पूण

जगत ् उसका ह उप या यान अथात ् उसक ह म हमा का गान है । जो
भूत, वतमान, भ व यत ् है , वह सब ओंकार है तथा

कालातीत इसके

कुछ भी नह ं है ।४

अित र

यानयोग म ॐ को धनुष, आ मा को बाम मानकर तथा पर
परमा मा को ल य मानकर वेधन करने अथात ् ॐ के सहारे से आ मा
को परमा मा म िनम न करने का उपदे श कया गया है ।५

य द मनु य अपने जीवन म ॐ का जप तथा उसक
करता है तथा अ तकाल म एका र
ाण वसजन करता है , वह परमगित को
ओम ् क

ॐ का जप करते हए

होता है ।६

लयपूण (आरोह-अवरोह,

वरसं मस हत)

विन के स श होती है तथा वह महा व फोट क
ित विन है , जससे सृ

का

उपासना

विन शंखमहा विन क

ार भ हआ
था तथा उससे असा य रोग

क सफल िच क सा होना संभव है ।७

ीकृ ण के पा चज य शंखनाद क

विन म मेघ क गड़गड़ाहट के समान ऐसा अ त
ु क पन था, जो श -ु

के महारिथय के
स तारक

दय को वद ण कर दे ता था।

विन म भी वह

ीकृ ण क वंशी क

द य आकषण था, जसम वशीकरण क

--------------------------१.

परं चापरं च

यदो कारः।

स य ेक मा मिभ यायीत स तेनैव…संवे दत तूणमेव

जग यामिभसंप ते। तमृचो मनु यलोकमुपनय ते स त
समप नो म हमानमनुभवित। (

चयण

ओिमित

४.

ओिम येतद रिमदं सव त योप या यानं भूतं भवत ् भ व यत ् इित सवमो कार एव।

५.
६.
७.

ह रः ॐ

ैवोपा ोित। (तै ० उप०, १.८)

वा दनो वद त ( ेता तर उप०, १.१)

य चा यत ्

कालातीतं तद यो कार एव। (मा डू य उप०, १)

अ म ेन वे

यं शरव

णवोधनुः शरो

ओिम येका रं
यः
सृ

याित

ा मा

यमु यते ।

मयो भवेत।।
् (मु डक उप०, २.२.4)

याहर मामनु मरन।।

यज दे हं स याित परमां गितम।।
् (गीता, ८.१३)

के आ द के जो भयंकर महा व फोट हआ
ु , उसक लया मक अनुगूँज सृ

सम त गितमयता का आधार है तथा वह सृ

के अ त तक िनर तर

यानयोग म इसका रह यमय अनुभव कया तथा इसको

अनेक सफल

या

ोपिनष , ५)

२.
३.

ओिमतीदं सवम ्

तपसा

योग कए। यह गवेषण का वषय है ।)

वहमान रहे गी। (हमने

हण कर तथा संके

त कर, इसके

अ त

मता थी.
ओम ् का जप, यान और उसक उपासना िन स दे ह

ाि

एवं

ान द क अनुभिू त का उ म साधन है ।
एत े वा रं

एत े वा रं

एत े वा रं

परम।्

ा वा यो य द छित त य तत।।
् १६।।

श दाथ : एतत ् अ रम ् एव ह

पर

= अ र ह तो (िन य प से)

है ; एतत ् अ रम ् एव ह परम = यह
है ;

ह एतत ् एव अ रम ्

अ र ह तो (िन य प से)

ा वा = इसीिलए इसी अ र को

जानकर; य: यत ् इ छित त य तत ् =जो जसक इ छा करता है , उसको
वह (िमल जाता है )।
वचनामृत : यह अ र ह तो

है , यह अ र ह पर

है ।

इसीिलए इसी अ र को जानकर जो जसक इ छा करता है , उसे वह
िमल जाता है ।
स दभ : ॐ क म हमा का गान कया गया है ।
द यामृत : ॐ

है ।१ यह सोपािध

का

वाचक अ वनाशी अ र है तथा

और पर

(अथवा अपर

और

) दोन का

ोतक है । ॐ क उपासना और साधना करके, इसके गूढ (रह यपूण)
व प को समझकर, मनु य िस

पु ष हो जाता है तथा लौ कक

(भौितक) एवं पारलौ कक (आ या मक) संक प को पूित म समथ हो
जाता है । इस महान ् अ र का वणन व
अनेक

कार से कया गया है ।२

के अनेक

एक ह है , वह अ ै त है । क तु दाशिनक
और पर

दो

प ह। मायार हत, शु

को पर

चिलत धम म
से अपर
तथा मायास हत

--------------------------------१.श द और अथ स पृ

होते ह, पृथक् नह ं

कए जा सकते ह। कािलदास कहते ह—

"वागथा वव संप ृ ौ" वाक् और अथ क भाँित संप ृ

(पावती और िशव)।"िगरा अथ जल

वीिच सम क हयत िभ न न िभ न" वाणी और अथ जल और वीिच (लहर) क भाँित
अिभ न (सीता और राम) य प दे खने म िभ न ह। ॐ अपने ल यभूत
है तथा दोन एक ह ह।

से िभ न नह ं

२. “In the beginning was the Word, and the Word was with God, and the Word was God."
(Bible, 1.1)
स त जॉन ने कहा— ' ारंभ म श द था, वह श द परमा मा के साथ था, और वह श द
ह परमा मा था।' यह लौगोस (Logos) अथवा श द है ।

को अपर

कह दया जाता है । ॐ से दोन प रल

एतदाल बनं

े मेतदाल बनं परम।्

एतदाव बनं

ा वा

श दाथ : एतत ्

लोके मह यते।। १७।।

े म ् आल बनम ् = यह

सहारा है ; एतत ् परम ् आल बनम ् = यह
आल बनम ्

त होते ह१

आल बन है, आ य,

सव च आल बन है ;

ा वा = इस आल बन को जानकर;

एतत ्

लोके मह यते =

लोक म म हमा वत होता है ।
वचनामृत : ॐकार ह

आल बन है , ॐकार सव च (अ तम)

आल बन अथवा आ य है । इस आल बन को जानकर मनु य

लोक

म म हमामय होता है ।
स दभ :

ॐकार मनु य का

द यामृत :

आल बन है ।

भारतीय मूल के सम त धम म ॐ को म गलदाता

एवं अम गलहता माना जाता है । यह मनु य क वाणी क
एवं सहज म हमामय व फोट है । यह व
का वाचक अथवा

क सू म एवं द य परमस ा

तीत है । वाचक और वा य अथवा नाम और नामी

एक होते ह। ॐकार भगव
मनु य का

वाभा वक

ाि

का मा यम अथवा सोपान है । यह

आल बन है । वा तव म अपने भीतर सं थत परमा मा

ह मनु य क अ तम तथा सव च आल बन (आ य, सहारा) है ।
को मा यम मानने के कारण ॐ मनु य का

थायी और

तीक

आल बन

है । संसार के सारे अवल बन अ थर और अ थायी होते ह। केवल
परमा मा का सहारा ह स चा सहारा होता है । संसार कमभूिम है तथा
मनु य को पु षाथ भी करना चा हए, क तु

ढ आल बन तो परमा मा

और उसके नाम का ह होता है ।
ॐ क म हमा को जानकर मनु य
सभी उपिनषद म कहा गया है क
अिधकार हो जाता है अथात ्

लोक को

ई र, जीव,

को

कारणशर र, कम, भ
२.

,

का उपासक

ओंकार है । अ उ म ् को

ा, व णु, महे श, तीन वे द (वेद यी),

ान आ द के संयोजन का

ान होने पर

ाि

का उ लेख

कार से कया गया है । उसक गणना करना अ य त क ठन है ।

वेदाहमेतं पु ष महा तमा द यवण तमस: पर तात।्

तमेव व द वाितमृ युमेित ना य: प था व ते अयनाय।। (यजुवद, ३१.१८,

— मनु य परमा मा को जानकर मृ यु को पार कर लेता है ।
लोक का उ लेख भी उपिनषद म अनेक

उसक

थूल, सू म,

तीक भी कहा गया है ।

ा वा अथवा व द वा अथात ् जानने पर अथवा

सभी उपिनषद म अनेक

लोक का

हो जाता है ।२

उप०, ५)—पर और अपर

कृित, स व, रज, तम,

हो जाता है ।

को जानकर मनु य

----------------------------------१. परं चापरं च यदो कार: (

ेत० उप०, ३.८)

कार से तथा अनेक अथ म कया गया है ।

व तृत चचा करना भी अ य त क ठन है ।

लोक क

ाि

का अथ

ाि

के
ल य

योितमय
ाि

का

व प को

होता है । ॐ

तीक है ।

तीकोपासना

मा यम होती है ।

न जायते ि यते वा वप

नायं कुत

न बभूव क

त।्

अजो िन य: शा तोऽयं पुराणो न ह यते ह यमाने शर रे ।। १८।।
श दाथ
परमा मा);

:

वप

त्

=

ान व प

न जायते वा न ि यते =

है ; अयम ् न कुत

आ मा

(आ मा

पर

न ज म लेत ा है और न मरता

त ् बभूत = यह न तो कसी से उ प न हआ
है , न

कसी उपादान कारण से उ प न हआ
ु ; (न) क

कोई उ प न हआ
है ।

(अयम ् न कुत

त ् (बभूत) = (न) इससे

त ् बभूत, क

त ् न बभूत—

यह

न कसी से, कह ं से, उ प न हआ
आ मा का ज म
ु , न यह उ प न हआ।

नह ं हआ
ु , उसे दो

कार से कहा गया तथा यह भी एक अथ कया गया

है ।) अयम ् = यह आ मा; अज: िन य; शा त: पुराण: = अज मा
(ज मर हत), िन य, सदा

एकरस

रहनेवाला, सनातन

(अना द)

है ,

(पुरातन—पुराना होकर भी नया अथात ् सनातन); शर रे ह यमाने न
ह यते = शर र को मार दये जाने पर, न

हो जाने पर, इसक ह या नह ं

होती, इसका नाश नह ं होता।
वचनामृत :

ान व प आ मा न ज म लेता है और न मृ यु को

होता है । यह न

कसी का काय है , न

कसी का कारण है । यह

अज मा, िन यस शा त, पुरातन है । शर र के न

हो जाने पर इसका नाश

नह ं होता।१

स दभ :

आ मा अजर-अमर है । आ मा वकार नह ं है , वह सदा

एकरस है ।

------------------------------------------करना ह
है ।

ववेकस मत है । लो यते

कािशत करने के कारण

काशयते इित लोक:।

वयं भी

भगव ता (२.२०) म भी यह मं

काश करनेवाला लोक कहलाता

लोक है ।

है , क तु वहाँ कुछ िभ न है —

न जायते ि यते वा कदािचत ् नायं भू वा भ वता वा न भूय:।
अजो िन य: शा तोऽयं पुराणो न ह यते ह यमाने शर रे ।।
' वप

त ्' का अथ ववे कशील

ाणी मानने पर कहा गया है क

ानी पु ष

ान

ारा ज म-

मरण से ऊपर उठ जाता है तथा वह आ म व प म सं थत हो जाता है । वह शर र के न
होने पर भी न

नह ं होता। यह 'अहं

अहं कारशू य। क तु ' वप
२.१)

ा म' क

त ्' का अथ आ मा (

थित है ।

) ह

ानी मा

ा नह ं होता है,

कया जाना उिचत है (तै० उप०,

द यामृत : आ मा द य एवं अमूत है । आ मा अज है, िन य और

शा त है तथा अना द है । दे ह म

थत आ मा परम सू म एवं चैत य

व प है तथा वह परमा मा का द य अंश होने के कारण परमा मा ह
है । आ मा को परमा मा भी कहा जाता है । मनु य के दे हनाश होने पर
भी अजर-अमर आ मा न
भीतर का आकाश (घटाकाश)
हो जाता है ।१

दाशिनक

से पर

नह ं होता। घट फूट जाता है तथा उसके
यापक आकाश (महाकाश)
मायार हत, शु

न उसका ज म होता है और न वह
अपर

चैत य व प होता है तथा

कसी को ज म दे ता है , क तु

(ई र) मायास हत होता है तथा

क उ प

संचालन करता है , संहार करता है और वह भ
इसी

कार, दे ह म

के साथ एक

थत आ मा मायार हत, शु

करता है , उसका

का उपा य होता है ।
चैत य व प ह होता है ,

क तु वह मायास हत (माया से आवृत) होने पर जीवा मा कहलाता है ।२

वा तव म शु

और मायास हत

एक ह ह तथा दे ह म

आ मा अथवा जीवा मा भी एक ह ह। जीवो
का जीवा मा त वत: आ मा अथवा


ै नापर:

थत

अथात ् मनु य

है । दाशिनक

के

पा रभा षक भेद केवल कुछ िस ा त को समझाने के िलए ह ह तथा
वा तव म कोई भेद नह ं है ।

एक ह है ।

ह ता चे म यते ह तुं हत े म यते हतम।्

उभौ तौ न वजानीतो नायं ह त न ह यते।। १९।।
श दाथ : चेत ् = य द; ह ता ह तुं म यते = मारनेवाला ( वयं को)
मारने म समथ मानता है ; चेत ् हत: हतम ् म यते = य द मारा जानेवाला
वयं को मारा गया मानता है ; तौ उभौ न

वजानीत:= वे दोन नह ं

जानते; अयम ् न ह त न ह यते = यह (आ मा) न मारता है , न मारा
जाता है ।

--------------------------१. जल म कुंभ कुंभ म जल है , बाहर-भीतर पानी।
फूटा कुंभ जल जल ह समाना, यह तथ क यौ यानी।। (कबीर)

२. भूिम परत भा ढाबर पानी, जिम जीव ह माया लपटानी। — जैसे वषा का शु
पर िगरने से, िम ट से िमलकर कुछ अशु
होकर जीवा मा का
(तप

प ले लेता है । जैसे अशु

ारा) जीवा मा के माया से मु

दोन एक ह ह।

हो जाता है , ऐसे ह शु
जल को पुनः शु

होने पर वह शु

जल भूिम

आ मा माया से आवृत

कया जा सकता है, वैसे ह

चैत य व प आ मा ह होता है ।

वचनामृत : य द कोई मारनेवाला
है और य द मारा जानेवाला

वयं को मारने म समथ मानता

वयं को मारा गया मानता है , वे दोन ह

(स य को) नह ं जानते। यह आ मा न मारता है , न मार दया जाता है ।
स दभ : आ मा अ वनाशी है ।१
द यामृत : मनु य का दे ह

थूल पंचत व (िम ट , जल, अ न,

वायु, आकाश) के संयोग से बनता है तथा वह
वन

हो जाता है । आ मा मूल

ाण के िनगमन होने पर

व प म िन य, शु , बु

और मु

है

तथा सू माितसू म है। वह अजर-अमर है तथा उसका वनाश नह ं होता।
य द कोई

वयं को कसी के मारने म समथ समझता है और य द मारा

जानेवाला

वयं को मारा गया हआ
मानता है तो वे दोन अ ानी ह

ह।

यह आ मा एक शा त द यत व है तथा इसका वनाश संभव नह ं है ।
आ मा चैत य व प है । वह अ वनाशी, अजर और अमर है । जडत व
प रवतनशील और

वनाशशील होता है , क तु चेतनत व प रवतनर हत

और शा त होता है ।
मनु य का दे ह मरणशील है , क तु यह साधना

ारा मो

का

ार

खोल दे ता है । दे ह संर णीय होता है , क तु मनु य भोगै य म फँसकर
इसका द ु पयोग कर लेता है ।२ दे ह का सदपयोग
मनु य को परमा मा क

ाि

करा दे ता है ।

अणोरणीया महतो मह याना मा य ज तोिन हतो गुहायाम।्

तम तु: प यित वीतशोको धातु सादा म हमानमा मन:।। २०।।

श दाथ : अ य ज तो: गुहायाम ् िन हतः आ मा = इस जीवा मा के
(अथवा दे हधार मनु य के)

दय प गुहा म िन हत आ मा (परमा मा);

अणो: अणीयान ् महत: मह यान ् = अणु से सू म, महान ् से भी बड़ा (है );
आ मन: तम ् म हमानम ् = आ मा (परमा मा) क उस म हमा को, उसके

व प को; अ तु: = संक पर हत, कामनार हत; धातु सादात ् = मन तथा
य के

साद अथात ् उनक शु ता होने से; (धाता— वधाता, भगवान ्;

--------------------------

१.भगव ता (२.१९) म यह मं
य एनं वे

इस

कार से है —

ह तारं य न
ै ं म यते हतम।

उभौ तौ न वजानीतो नायं ह त न ह यते।।
If the red slayer thinks he slays
Or if the slain thinks he is slain,
They know not well the subtle ways
I Keep and pass and turn again (Brahma' poem by R. W. Emerson)
२.'साधन' धाम मो कर ारा'
शर रमा ं खलु धमसाधनम ् (कािलदास)—शर र धम का

थम साधन है ।

धातु:

सादात ्— भगवान ् क कृ पा से—यह अ य अथ भी कया गया है ।)

प यित —सा ात ् दे ख लेता है , वयं अनुभव कर लेता है; वीतशोक: =
सम त दःख
से परे चला जाता है , परम सुखी हो जाता है । (अ तु:

वीतशोक: धातु सादात ् प यित—िन काम शोकर हत होकर इ
शु

से अथवा भगवान ् क कृ पा से दे ख लेता है , यह एक िभ न अ वय

तथा अ वयाथ है ।)

वचनामृत : इस जीवा मा क

दय प गुहा म

थत आ मा

(परमा मा) अणु से भी छोटा, महान ् से भी बड़ा है । परमा मा क उस
म हमा को िन काम

मन तथा इ

य क िनमलता होने पर दे ख

लेता है और (सम त) शोक से पार हो जाता है ।
स दभ : यह मं
ेता तर उपिनष

उपिनष - ेिमय

को अ य त

य है । यह

(३.२०) म भी है । 'अणोरणीयान ् महतो मह यान ्' को

क ठ थ कर ल।
द यामृत : परमा मा संसार म छोटे -से-छोटे कण से भी छोटा
तथा बड़ -से-बड़

व तु से भी बड़ा (लघु से भी लघुतर, महान ् से भी

मह र) है । वह सव यापक है तथा सव

समाया हआ
है । वह सम त

स ा का आधार है । उसके बना कसी क स ा नह ं है । वह व

येक व तु म व मान है ।

य , मन और बु

का आ मा जीवा मा के

से यु

तथा माया से आवृत होकर मनु य

प म मानो ब

हो जाता है , क तु वह मु

होकर, माया के आवरण से मु

होकर, अपने मूल

मु

परमा मा है । ब ाव था म आ मा को

होता है । आ मा ह

व प म तो शु , बु ,

जीवा मा कहा जाता है । यहाँ जीवा मा को ज तु कहा गया है । य प वह
पर

पु षो म के समीप ह

थत रहता है , मायामोहवश वह उसे दे खता

नह ं है ।
ान का उदय होने पर,

ान के

काश म, जीवा मा अपने शु

चेतन व प को समझकर, परमा मा क म हमा को जान लेता है और
सदा के िलए सब कार के शोक अथात ् सब
जाता है तथा आन दाव था म

कार के द:ु ख से मु

थत हो जाता है ।१

१. उपिनषद तथा भगव ता म इतने अिधक

हो

थान पर वीतशोक (शोकर हत) होने तथा

अ यसुख पाने क चचा है क उनक गणना करना क ठन है । उपिनषद का उ े य मनु य
को भय, िच ता और शोक से मु
(मु डक उप०, ३.१.२.,

करके आन दाव था म

ेत० उप०, २.१४ तथा ४.७)

था पत करना है । वीतशोक

मनु य इ
पर अथात ् इ

य तथा मन के वषयानुर

य और मन के द ू षत होने पर, स य का दशन एवं

अनुभव नह ं कर पाता। इ

भोगौ य के आकषण से मु
मु

अथवा वषयभोगरत होने

तथा मन के शु

होने पर, काम,

होने पर, मनु य परमा मा क

परमा मा क कृ पा का पा

होने पर अथात ्

ोध और लोभ के

भाव से

म हमा को जान सकता है तथा

हो जाता है । संसार के सुख

भटकानेवाले होते ह, आ या मक सुख

णभंगरु तथा

थायी और स चा होता है ।

आ या मक मनु य अथात ् अ तमुखी होकर परमा मा क ओर अिभमुख
होनेवाला मनु य ह आन द क
दय े

अिध त

होने

ाि

कर सकता है । परमा मा मनु य के

के कारण

समीप

होता

है ,

क तु

वषयानुरागी मनु य उसे नह ं दे खता तथा परमा मा क म हमा को नह ं
जानता। परमा मा के
वीतशोक हो जाता है ।१
आसीनो दरंू

व प को दे खकर अथात ् समझकर मनु य

जित शयानो याित सवत:।

क तं मदामदं दे वं मद यो

ातुमहित।। २१।।

श दाथ : आसीन: = बैठा हआ
ू ् जित = दरू पहँु च जाता है ;
ु ; दरम

शयान:= सोता हआ
ु ; सवत: याित = सब ओर चला जाता है ; तम ्
मदामदम ् दे वम ् = उस मद से यु
मद य: क:

होकर भी अमद (अनु म ) दे व को;

ातुम ् अ हत = मुझसे अित र

वचनामृत :

कौन जानने म समथ है ?

परमा मा बैठा हआ
भी दरू पहँु च जाता है , सोता हआ

भी सब ओर चला जाता है , उस मद से मदा वत न होनेवाले दे व को,
मुझसे अित र

कौन जानने के यो य है ?

स दभ : परमा मा के

ान का उ म अिधकार होना क ठन है ।

द यामृत : परमा मा क श

अिच

य है । उसका वणन पर पर

वरोधी गुण से कया जाता है ।२ परमा मा द ु व े य है । उसे बु

के तक

से नह ं समझा जा सकता। परमा मा िनता त रह यमय, द य स ा है
---------------------------------------------

१ 'प यित' (दे खता है , अथात ् सा ात ् अनुभव करता है ) का
पर है । (मु डक उप०, ३.२
आ प यित

ेत० उप०, ४.७)

योग उपिनषद म अनेक

थान

ित प यित परा प यित प यित,

दवम त र मा

भूिमं सव त

दे व प याित।। (अथव०, ४.२०.१)

—हे द व, तू जसे िमल जाय, वह सब कुछ दरू-दरू तक दे ख लेता है । यह एक
अथववेद के इस मं

के अनेक अथ कए गए ह।

२.ईशावा य उपिनष

के मं

कहा गया है ।

४,५ म भी परमा मा को वरोधी धम से यु

मं

अथात ् अिच

है ।

तथा उसका

ान अ य त गूढ है । िन स दे ह, आ या मक साधना करने

पर अपने भीतर ह उसक अनुभूित होती है । उसका अनुभव करने पर
मनु य आन दमय हो जाता है तथा उस अनुभव का वणन श द
करना संभव नह ं है ।
अनुभव

को

थ से

ारा

ान पथ- दशन कर सकता है तथा

वयं ह करना होता है। या ािच

मागदशन करा दे ते

ह, क तु वे ग त य तक नह ं पहँु चा सकते। िन य ह , ऐसे महापु ष, जो
परमा मा का अनुभव कर चुके ह, अ य त सहायक हो सकते ह।

परमा मा मानो बैठा हआ
दरू पहँु च जाता है , सोता हआ
भी सब

ओर चला जाता है । वह आन द के मद से पूण होकर भी मदो म
होता। स तजन भी अक य श

नह ं

य से भरपूर होकर शा त और सम ह

रहते ह। पर पर वरोधी धमवाले परमा मा क म हमा को

ानी महा मा

ह समझ सकते ह।
यमाचाय िनरहं कार और िनरिभमान होकर, सहज भाव से कहते ह
क उनसे िभ न अ य कोई परमा मा के
नह ं जान सकता, अथात ् परमा मा के

व प और उसक म हमा को

व प और उसक म हमा को नह ं

जान सकता, अथात ् परमा मा को जानना और

होना अ य त क ठन

है । परमा मा द ु व ेय है , क तु वह सू म बु वाले

ानी पु ष के िलए

सु व ेय है ।

अशर रं शर रे वनव थे वव थतम।्

महा तं वभुमा मानं म वा धीरो न शोचित।। २२।।
श दाथ : अनव थेषु शर रे षु =

थर न रहनेवाले अथात ् वन र

शर र म; अशर रम ् = शर रर हत; अव थतम ् =

थत; महा तम ् वभुम ्

= (उस) महान ् सव यापक; आ मानम ् = परमा मा को; म वा = मनन
करके, जानकर; धीर: =
कोई शोक नह ं करता।

ववेकशील पु ष, बु मान ् पु ष; न शोचित =

वचनामृत : अ थर शर रो म सं थत (उस) महान ् सव यापक

परमा मा को जानकर धीर शोक नह ं करता।

स दभ : वह सव यापक परमा मा अपने भीतर ह सं थत है
द यामृत :
को चेतना-श

परमा मा से संचािलत एवं िनयं त

एवं बु

को खोजने और पाने क
के भौितक आकषण से

कृ ित ने मनु य

से संप न करके उसे अपने भीतर ह परमा मा
मता

दान कर द , क तु मनु य बा

जगत ्

लु ध होने के कारण अपने भीतर झाँकने और

परमा मा के अ त व का अनुभव करने म
वभु अथात ् सव यापक है तथा न र शर र

वृ

नह ं होता। परमा मा
म सं थत रहता है ।

बु मान ् मनु य उसे सू म बु
को

से जानकर उ च तर य आन दाव था

कर लेता है तथा सदा के िलए शोकमु

एवं शोक के

हो जाता है ।१

भाव से मु

हो जाता है अथात ् मोह

मनु य के अिन य एवं वन र दे ह म जीवन के
के

प म घटघटवासी परमा मा

होना जीवन क

नायमा मा

ोत एवं आधार

वयं वराजमान रहता है तथा उसे

उपल ध है ।
वचनेन ल यो न मेधया न बहना


ु ेन।

यमेवैष वृणुते तेन ल य त यैष आ मा ववृणुते तनूं
श दाथ : अयम ् आ मा न

ल य: = आ मा न

वाम।।
् २३।।

वचनेन न मेध या न बहना

वचन से, न मेधा (बु ) से, न बहत

ारा ह

वचनामृत : यह पर
वण से ह

है , उसको ह

कर दे ता है ।२

वीकार कर

होता है ; एष: आ मा = यह आ मा; त य

वाम ् तनूम ् ववृणुते = उसके िलए
से, न बहत


ु ेन

वण करने से

होता है ; यम ् एष: वृणुते तेन एव ल य: = जसको यह

लेता है उसके

व- व प को

कट कर दे ता है ।

परमा मा न तो

हो सकता है । यह जसे

वचन से, न बु
वीकार कर लेता

हो सकता है । यह परमा मा उसे अपने

व प को

कट

----------------------------------------------१.

को मोह: क: शोक एक वमनुप यत:। (ईशावा य उप०, ७) नानुशोिचतुमहिस

(गीता, २.२५), नैवं शोिचतुमहिस (२.२६), न

वं शोिचतुमहिस (२.२७, २.३०) 'शोक' का

यापक अथ सम त दःख
ु , भय और िच ता है ।

२.

श कराचायजी इस मं

नायमा मा
बहना

का अ वय और अथ इस

वचनेनानेकवेद वीकरणेन ल यो

कार करते ह —

ेयो ना प मेधया


ु ेन केवलेन। केन त ह ल य इ यु यते—यमेव

थाथधारणश

या। न

वा मानमेष साधको वृणत
ु े

ाथयते

आ मनैवा मा ल यत इ यथ:। कथं ल यत इ यु यते—त या मकाम यैष आ मा

ववृणत
ु े

तेनैवा मना व र ा

वयमा मा ल यो

काशयित पारमािथक ं तनूं

अनेक वेद को
तो फर कस

वां वक यां

वीकार करने से

थाथ-धारण क श

कार

ायत एविम येतत।् िन काम या मानम ् एव

वयाथा

यम ् इ यथ:। यह आ मा

कया जाता है , अथात ् उससे ह 'यह ऐसा है ' इस

क उपल ध होती है । कस

ारा यह आ मा

जस अपने

वयं ह

कार जाना जाता है । ता पय यह है क

ाथना करनेवाले िन काम पु ष को आ मा के

ारा ह आ मा

कार वह उपल ध होता है , इस पर कहते ह—उस आ मकामी के

ित यह आ मा अपने पारमािथक

दे ता है ।

वण करने से ह ;

कया जा सकता है , इस पर कहते ह—यह साधक

आ मा का वरण— ाथना करता है , उस वरण करनेवाले आ मा
केवल आ मलाभ के िलए ह

वचन अथात ्

अथात ् व दत होने यो य नह ं है , न मेधा अथात ्

से ह जाना जा सकता है और न केवल बहत
ु -सा

ाथयत

व प अथात ् अपने याथा

य को ववृत— कािशत कर

स दभ : यह मं

यह मु डक उपिनष
इसक

कठोपिनष

के

मं

म प रग णत होता है ।

(३.२.३) म भी है । इसे क ठ थ कर लेना चा हए।

या या अनेक

कार से क गयी है ।

द यामृत : परमा मा मनु य के भीतर ह

ा य है । बा

साधन

उपयोगी तो होते ह, क तु वे मनु य को सा य तक नह ं पहँु चा सकते।
वचन अथात ् वेदा द का अ ययन और

चचा-प रचचा करना पया

ववेचनापूण

नह ं होता। बु

या यान तथा

ारा परमा म-त व को

जानना संभव नह ं होता, य क परमा मा मा

बु

का वषय नह ं है ।

बौ क तक क एक सीमा होती है तथा परम सू म त व का
कुशा

बु

से भी नह ं हो सकता। तकशील

हण मा

तक- वतक के जाल

म फँसकर उलझे रह जाते ह और कसी िनणय एवं िन य तक नह ं
पहँु च पाते। ती
हो जाता है ।

बु

होने का अहं कार स य क


ु अथात ् व

ा से तथा

ाि

ान

के माग म बाधक

के

वण से भी

थायी लाभ नह ं होता।
परमा मा ह

जसे

वीकार कर लेता है , उसे परमा मा क

जाती है । वा तव म परमा मा

वयं ह

वयं को

परमा मा का दशन एवं अनुभव परमा मा के
से ह होता है ।१

ाि

हो

कट करता है ।

साद से अथवा उसक कृ पा

क तु परमा मा कसी भी उस महा मा के िलए सुलभ

हो जाता है, जो उसका अिधकार अथवा स पा
जानने के िलए तथा उसक
अहं कारशू यता, िच

द यानुभिू त

हो जाता है । परमा मा को
करने के िलए उ कट इ छा,

क िनमलता तथा वैरा यभाव मनु य को भगव कृपा

का अिधकार बना दे ते ह।
सूय का

काश तो हमारे

ार तक

वयं ह आता है , क तु

ार

खोलने पर ह हम उसका दशन कर सकते ह। मन को िनमल करने पर
अथवा मन के

ार खोल दे ने पर परमा मा का द य

जाता है , जो मनु य के

काश

कट हो

दय क गुहा म िनगूढ रहता है तथा जीवन का

ोत एवं आधार होता है ।२

१. सो जानइ जे ह दे हु जनाई, जानत तु ह ह तु ह ह होइ जाई।
२.

ानेन तु तद ानं येषां नािशतमा मन:।

तेषामा द यव

ानं

काशयित त परम।।
् (गीता, ५.१६)

—अ ान का अ धकार िनवृ
परमा मा के
(अनेक

ान सूय के स श परमा मा को

व प का सा ा कार करा दे ता है ।

वचनक ा मा

हए
ु ह , रटकर

होने पर,

मूल

थ एवं

वचन करते ह तथा

है । आ या मक त व को
वचन कर सकता है ।)

या या

वचन को मा

कािशत कर दे ता है ,

थ को पढ़कर, बना उ ह आ मसात ् कए
लौ कक कामनापूित का साधन बना लेते

हण करके ह अनुभवी मनु य सहज भाव से साथक एवं सु दर

पु ष

ाथना और

यान के अ यास से मन को िनमल कर

लेते ह अथात ् उसे राग, े ष आ द
सुरदलभ
द यानुभ ूित

वकार

से मु

कर दे ते ह तथा

कर लेते ह। हमारे अपने भीतर ह आन द का

ोत एवं अ य कोश है तथा वह सबके िलए सदा सुलभ है । मनु य

अपने माग एवं ल य का िनधारण एवं वरण करने म
काश क

वत

है । द य

एक झलक पाकर ह मनु य कृ तकृ य हो जाता है , उसका

जीवन ध य हो जाता है । द यानुभूित होने पर भय और

म िनवृ

हो

जाते ह।
सो े य मौनधारण, जप, िच तन और

ाथना

ारा िच

क िनमलता

होने पर मनु य क चेतना ऊ वमुखी हो जाती है तथा वह
वरा

चेतना म सं थत हो जाता है । ब द ु म िस धु क अनुभिू त होने

पर मनु य को आ य तक तृि

हो जाती है तथा उसका जीवन कृ ताथ हो

जाता है ।
ना वरतो द ु

रता नाशा तो नासमा हत:।

नाशा तमानसो वा प
श दाथ :

ानेनन
ै मा नुयात।।
् २४।।

ानेन अ प = सू म बु

एनम ् = इसे (परमा मा को); न द ु
मनु य

अथात ् िनवृ

रतात ् अ वरत: आ नुयात ् = न वह

कर सकता है , जो कु सत आचरण से (द ु कम से) अ वरल
न हआ
हो; न अशा त: = न अशा त मनु य ( ा

सकता है ); न असमा हत: = न वह
अथात ् एका

से भी, आ म ान से भी;

कर

कर सकता है , जो असमा हत

न हो, असंयत (असंयमी) हो; वा = और; न अशा तमानस:

= न अशा त मनवाला ह (उसे
कर सकता है । (

ानेनन
ै मा नुयात ्—

कर सकता है ); आ नुयात ् =
ान से इसे

कया जा सकता

है , यह एक अ य अथ है ।)

वचनामृत : इसे (परमा मा को) सू म बु
भी न वह मनु य
अशा त य

ह उसे

कर सकता है , जो दराचार
से िनवृ

परमा मा को

कर सकता है ।)

कर सकता है । (एक अ य अथ है क

स दभ : परमा मा क

ाि

यह मं

पूववत मं

नह ं होता। यह मं

ान से ह

के िलए उसका अिधकार

आव यक है । नैितकता अ या म-माग का
कुमागगामी स पा

न हआ
हो; न

कर सकता है , जो असंयत हो और न अशा त

मनवाला ह उसे

अथवा आ म ान से

होना

थम सोपान है । अनैितक एवं

अ य त मह वपूण है । वा तव म

२३ के साथ जुड़ा हआ
अथवा उसका पूरक है ।

द यामृत :मनु य द ु कम म

वृ

रहकर कभी गहन शा त का

अनुभव नह ं कर सकता और जसका मन शा त नह ं है , वह न सांसा रक
सुख का अनुभव कर सकता है और न आ या मक आन द का ह ।
वा तव म अशा त रहनेवाला

जीवन म कोई मह वपूण उपल ध

नह ं कर सकता।
जस मनु य का मन भौितक सुखभोग क वासना तथा सांसा रक
पदाथ क तृ णा से

त रहता है , जसका मन राग और

े ष म फँसा

रहता है और भौितक आकषणो के ब धन म रहता है , वह सदा अशा त
ह रहता है । अशा त के माग पर चलकर मनु य शा त कैसे

कर

सकता है?
वा तव म मनु य के मन और इ

य क चंचलता उसे शा त

नह ं रहने दे ती। जसका मन शा त और समा हत नह ं होता, वह

थर

और एका

भी नह ं हो सकता। ऐसा

करके भी दःखी
रहता है ।

परमा मा मनु य के भीतर

सांसा रक सुखभोग को

दय म ह

वराजमान रहता है , क तु

सदा सुलभ और समीप होने पर भी वह दलभ और दरू रहता है । मनु य
समा हत और शा त होकर अपने भीतर ह उसक

द यता का अनुभव

कर सकता है ।
जस मनु य का मन भोगास
छोड़कर द ु कम म

वृ

के कारण स य के माग को

हो जाता है , वह तीथया ा, त, दान, पूजा-पाठ

आ द करके भी अशा त अथवा उ

न ह रहता है ।

द ु कम (अनैितक कम) मनु य के मन म अपराध-बोध उ प न कर

दे ते ह तथा मनु य अपने भीतर अशा त और द:ु खी रहने लगता है । उसे
जीवन भारमय एवं दःखमय

तीत होने लगता है । चा र क गुण

(स चाई, ईमानदार ) को छोड़ने पर अ य सब उपल धयाँ ( व
धनाजन, स ा और स मान के पद पर आसीन होना इ या द)
अथात ् अशा त य िस

होते ह। चा र क गुण

ा,

वषमय

(नैितक मू य ) क

क मत पर महान ् सफलता अथवा उपल ध भी स चा सुख नह ं दे
सकती। रे त क द वार कदा प
द ु कष म

परमा मा को

वृ

थर नह ं रहती।

रहनेवाला मनु य केवल

ान के मा यम से ह

नह ं कर सकता, य क उसका मन अनेक

वकार , दोष तथा िच ताओं से

कार के

त रहता है और उसम शा त एवं

एका ता नह ं होते। वह अ तमुखी नह ं होता। द ु कम म

वृ , अशा त

मनु य परमा मा को कदा प

का अिधकार नह ं होता।२

ान

नह ं कर सकता।१ अशा त मनु य

मनु य को अपने मन को दशा बदलकर, ढता से भी
द ु कम का

उन सभी

याग कर दे ना चा हए, जो उसे परमा मा से वमुख करते ह

और घोर अशा त एवं द:ु ख उ प न करते ह । साधारण अशा त तो
मानव- वभाव का अंग है तथा केवल योगी ह सदा शा त रहते ह, क तु
द ु कम म रत मनु य अ यिधक अशा त अथवा उ
को

न रहते ह। द ु कम

यागकर परमा मा क शरण म जाने पर मनु य परम शा त हो

जाता है । अ वचल शांित म

थत होकर मनु य स य का संदशन करता

है ।३

आ या मक माग के पिथक को आचरण म उ कृ
तथा द ु कम से वरत होकर, स चे मन से भगव
होना चा हए, य क द ु कम म रत रहकर वह
आ म ान

ाि

खरबु

रहना चा हए
दशा म

वृ

होते हए
ु भी तथा

करके भी परमा मा का अनुभव कदा प नह ं कर सकता।

आचारह न को वेद भी प व

नह ं कर सकते।४

स चे भाव से भगवान ् क शरण म जाने पर घोर पापी भी महा मा

हो जाता है ।५
य य

ं च उभे भवत ओदनः।

मृ युय योपसेचनं क इ था वेद य

सः।। २५।।

श दाथ : य य = जस (परमे र) के;
और

म ् च उभे =

दोन अथात ् बु बल और बाहबल
दोन ; ओदन: भवत: = पके

हए
ु चावल अथात ् भोजन हो जाते ह; मृ यु: य य उपसेच नम ् = मृ यु
-------------------------------------१. न मां दु कृितनो मूढा:

ते नराधमा:। (गीता, ७.१५)

२. ना शा ताय दात यम ् ( ेत० उप०, ६.२२)
—अशा त य

को

ान नह ं दे ना चा हए।

३.आपूयमाणमचल ित ं समु मापः

कामा यं

वश त य त।्

वश त सव स शा तमा नोित न कामकामी।। (गीता, २.७०)

वहाय कामा य: सवा पुमां रित िनः पृह ः।

िनममो िनरह कारः स शा तमिधग छित।। (गीता, २.७१)
—कामना के याग से शा त

होती है ।

४.आचारह नं न पुन त वेदा:।

५. अ प चेत ् सुदराचारो
भजते मामन यभाक्

साधुरेव स म त य: स यक् यविसतो ह स:।। (गीता, ९.३०)
स मुख होइ जीव मो ह जबह ं, ज म को ट अघ नास हं तबह ं।

जसका उपसेचन (भोजन के साथ खाये जानेवाले
इ या द) (भवित—होता है ); स: य

यंजन, चटनी

इ था कः वेद = वह परमे र जहाँ

(या कहाँ), जैसा (या कैसा), कौन जानता है ?
वचनामृत :

जस परमा मा के िलए बु बल और बाहबल
दोन

भोजन हो जाते ह, मृ यु जसका उपसेचन होता है , वह परमा मा जहाँ
कैसा है , कौन जानता है ?
स दभ : परमा मा द ु व े य है ।
द यामृत : मनु य जन श

भी काल प परमे र के सम

य को अ यिधक मह व दे ते ह, वे

तु छ ह। बु बल और बाहबल
तथा उनसे

संप न मनु य काल के िलए मानो मा
मरणमा
है

जसे

से

मनु य

यंजन के

भोजन ह

ह। मृ यु

क पत हो जाते ह, काल के िलए मा

प म भोजन के साथ खाया जाता है ।१

काल का भी काल है , महाकाल है तथा वह
अकाल पु ष है । स पूण

मूढ जाते ह। मूढ जन ऐसा

उपसेचन
परमा मा

वयं काल से अ भा वत

जगत ् काल का एक

मनु य बु बल अथवा बाहबल
पाकर मदो म

जसके

ास ह है । जो

एवं ग वत हो जाते ह, वे

यवहार करते ह मानो वे अमर ह तथा वे

अ तमुखी होकर गंभीर िच तन नह ं करते।
ववेक जन कु सत आचरण को
सुखभोग के आकषण से मु

वरत होकर तथा सांसा रक

रहकर परमा मा को

हो जाते ह तथा

मृ यु को पार कर लेते ह।

-----------------------

१.भूतािन कालः पचतीित वाता—यिध र ने य
एक ( मुख) बात है ।

से कहा, काल

ा णय को खा जाता है , यह

थम अ याय
तृतीय व ली
ऋतं पब तौ सुकृत य लोके गुहां
छायातपौ

व ौ परम पराध।

वदो वद त प चा नयो ये च

णािचकेताः ॥१॥

श दाथः सुकृत य लोके = पु य (शुभकम ) के फल व प लोक म,
मानवदे ह म; परमे पराध = परमे ( े ) पराध ( दय- दे श म) पर
परमो च िनवास ( दय) म; गुहां

व ौ =

दय पी गुहा म

के
व ,

थत; ऋतम ् पब तौ = स य का पान करनेवाले दो; छायातपौ (इव) =

छाया और आतप (धूप) के स श;
ह; च ये = और जो;

वदः =

वे ा; वद त = कहते

णािचकेताः = तीन बार नािचकेत अ न का चयन

करनेवाले; प चा न (वद त) = प चा न य

करनेवाले गृह थ (कहते

ह)।
वचनामृतः सुकृत (शुभकम) के फल का लोक म (दे ह के भीतर)

आ वादन करनेवाले, े

थल

दय दे श, म

दय क गुहा म

थत, ऋत

(स य का) पान करनेवाले दो (जीवा मा और परमा मा) छाया और
आतप ( काश, धूप) के स श रहते ह

ानी ऐसा करते ह और जो

तीन बार नािचकेत अ न का चयन करते ह तथा प चा न य
करनेवाले (कमका ड ) गृह थजन भी ऐसा ह कहते ह।
स दभः परमा मा और जीवा मा का पर पर िन य संबंध कहा गया
है ।
द यामृतः परमा मा और जीवा मा त वतः एक ह, क तु उनम
एक िभ नता है । दोन मानवदे ह के भीतर

दय दे श म

थत रहते ह

और ऋत का पान करते ह।१ वा तव म जीवा मा कमफल का भोग करता

है , परमा मा कोई भोग नह ं करता, क तु दोन के समीप रहने के कारण

याय से दोन को कम के फल का पान अथवा भोग करनेवाला कह

दया गया। एक छतर के नीचे दसरे

के आ जाने पर उसे भी

छतर वाला कह दया जाता है । जीवा मा भो ा होता है , क तु िन पािधक
परमा मा अथवा सोपािधक ई र भी भो ा नह ं होता।
बु

लोक अथात ् मनु य के दे ह म, दयगुहा म बु

काशमान आ मा (परमा मा) का बु

कहलाता है । आ मा

म ह

ब ब है और िनमलत वबु

——————————————————
१.
मु डक उपिनष (३.१.१) म इ ह दो प

य के

(६.३.२) म दोन के साथ रहने का वणन है ।

का सं थान है ।
ित ब ब जीवा मा

म उसका

ित ब ब

प म कहा गया है । छा दो य उप०

जीवा मा है । ये दोन संसार और असंसार होने के कारण छाया और
आतप (धूप, काश) के स श साथ रहते ह। आतप पूण
गुणा मका बु

काश है , क तु

म आकर वह म द अथवा अ प हो जाता है तथा शु

नह ं रहता। आतप ( काश)

वभु (सव यापक) है , छाया सीिमत है ।

जीवा मा म आ मा तथा बु

के गुण का सम वय है । उसम संक प

और अहं कार होते ह।१

वे ा

वानुभव के आधार पर ऐसा कहते ह तथा

तीन बार नािचकेत अ न का चयन करनेवाले और गाहप य इ या द
प चा न क उपासना करनेवाले गृह थजन भी ऐसा ह कहते ह।
जीवा मा तथा परमा मा का अंश और अंशी के
है । माया के आवरण से मु

प म िन य संबध

होने पर जीवा मा परमा मा ह होता है ।२

यः सेतुर जानानाम रं

य परम।्

अभयं िततीषतां पारं नािचकेतं शकेम ह ॥२॥
श दाथः यः ईजानानाम ् सेतुः = जो य

करनेवाल के िलए सेतु है ;

नािचकेतं (अ नम ्) = (उस) नािचकेत अ न को; (नािचकेत अ न
ानका ड के भी अ तगत है । इसका उ े य

ाना न के

करना

होता है ।); पारम ् िततीषताम ् यत ् अभयम ् = पार अथात ् संसार-सागर को

पार करने क इ छावाल के िलए जो अभयपद है ; (तत ्) अ रम ् परम ्
= (उस) अ वनाशी पर

को; शकेम ह = हम जानने एवं

करने

म समथ ह ।
वचनामृतः यमराज परमा मा से

ाथना करता है  हे परमा मन ्,

करनेवाल के िलए जो सेतु के स श है , उस नािचकेत अ न के

(तथा) संसार को पार करने क इ छावाल के िलए जो अभयपद है, उस
अ वनाशी

को जानने म हम समथ ह ।

स दभः यमराज उपदे श करते हए

ान ाि

के िलए

ाथना का

सहारा लेते ह।

द यामृतः आ या मक साधना म

ाथना का अ यिधक मह व है ।

ाथना मनु य को िनरहं कार करके वन

बना दे ती है । वन ता मनु य

को आ या मक उपल ध का अिधकार बना दे ती है । अहं कार अ धकार
क भाँित चेतना को आवृत एवं
परमा मा को

करने का

वकृत कर दे ता है ।

साधन है ।

—————————————————

१.

सडक पाहडकारस वतो यः ( ेत० उप०, ३४, ५.८)

२. जीवो

ौव नापरः  जीवा मा

ह है , अ य नह ं है ।

ाथना परम

सम त वेद म

ाथना के मं

क ण है । वा तव म सभी धम म

ाथना को अितशय मह व दया गया है ।
भाव का मह व अिधक होता है ।

ाथना म श द क अपे ा

ाथना परमा मा के

ित भावपूण

आ मसमपण एवं अ तःकरण क पुकार होती है ।

ाथना एक भावयोग है ,

जो मनु य को परमा मा के साथ जोड़ दे ता है ।

ान के साथ भ

होना अ य त आव यक होता है । भ

शु क

भाव

ान को रसमय बना दे ती

है ।
यमाचाय

ाथना करते हहे परमे र, आप हम ऐसी साम य द जए

क हम उस नािचकेत अ न के रह य के जानकर उसे संप न कर सक,
जो य

करनेवाल के िलए दःख
ु -सागर से पार कर दे ने के िलए सेतु के

स श है । हम उस अभयपद को
पर

कर ल, जो अ वनाशी अ र प है ।

पु षो म संस ार-सागर को पार करने क इ छावाल का एकमा

आ य तथा

हो जाता है ।१

य है । परमा मा को

करके मनु य िनता त अभय

आ मानं रिथनं व

शर रं रथमेव तु।

बु ं तु सारिथं व

मनः

हमेव च ॥३॥

या ण हयानाहु वषयां तेषु गोचरान।्

आ मे

यमनोय ं भो े याहमनी
षणः ॥४॥

श दाथः आ मानम ् = जीवा मा को; रिथनम ् व

= रथ का

वामी समझो; तु = और; शर रम ् एव रथम ् = शर र को ह

(समझो); तु बु म ् सारिथम ्

चलानेवाला) समझो; च मनः एव
(लगाम)।
मनी षणः इ
कहते ह;

= और बु

को सारिथ (रथ

हम ् = और मन को ह

या ण हयान ् आहःु = मनीषीजन इ

य को घोड़े

वषयान ् तेषु गोचरान ् = वषय (भोग के पदाथ ) को उनके

गोचर ( वचरने का माग) (कहते ह); आ मे

रथ

यमनः यु म ्) = शर र, इ

यमनोयु म ् (आ मा

य और मन से यु

(जीवा मा) को;

भो ा इित आहःु = भो ा है , ऐसा कहते ह। (आ मा के कई अथ होते ह।
यहाँ मं

३ म आ मा का अथ जीवा मा तथा मं

म आ मा को शर र के संचालक के
————————
१.
सम त उपिनषद म तथा भगव
गया है क भगवान ् क

ाि

हो जाता है ।

प म जीवा मा कहा गया है तथा

गीता म अग णत

थल पर अनेक

कार से कहा

से मनु य िनता त अभय हो जाता है । उन

उ लेख करना क ठन है । अभयं ह वै
पर

४ म शर र है । मं

थल का

भवित (बृह० उप० ४.४.२५) अभय होने

मं

४ म जीवा मा के यं

शर र को आ मा कहकर, शर र, इ

य, मन

स हत जीवा मा क ह चचा क गयी है ।
वचनामृतः जीवा मा को रथ का
रथ समझो, बु
मनीषीजन इ

वामी समझो और शर र को ह

को सारिथ समझो और मन को ह लगाम समझो।
य को घोड़े कहते ह, वषय को उनको गोचर ( वचरण

का माग) कहते ह। शर र, इ

य, मन से यु

आ मा को (जीवा मा को)

भो ा है , ऐसा कहते ह।
स दभः मं
ह। मं

३ और ४ पर पर जुड़े हए
ु ह। ये अ य त मह वपूण

३ से ९ तक रथ आ द के

पक से आ मा तथा जीवा मा के

व प को कहा गया है ।
ेता र उपिनष

(२.९) म इसी

पक का उपयोग हआ
है ।

द यामृतः मनीषी जन ने मानव-जीवन को या ा क सं ा द है ।१
मनु य एक अ प अविध तक पृ वी पर रहता है तथा अक मात ् यहाँ से
सदा के िलए

बदा हो जाता है ।

ववेकशील पु ष अपने जीवन को

आन दमय बना लेता है तथा ववेकह न मनु य इसे दःखमय
कर लेता

है ।

मनु य के सामने दो माग खुले होते हएक
ेयमाग। मनु य माग का चयन करने म
करने म

वतं

वतं

ेयमाग, दसरा

होता है । मनु य कम

होता है तथा कम के फल का भोग करने म ई र य

वधान से िनयं त होने के कारण परतं

होता है । जो जैसा बोता है, वैसा

काटता है , य प मनु य को इसका बोध नह ं होता।२ मूढ मनु य भगवान ्
और भा य को यथ ह दोष दे ता है ।
धीर अथात ् बु मान ् पु ष

(क याण) माग को

बु वाला मनु य अ ा
व तुओं को सुर

समझकर उसका

ेय पर

त रखने म जुटा रहता है तथा

ेय

ेय अथात ् भोग के
थत कर

ेयमाग को भटकाकर दःख
म डु बो दे ता है ।

वामी जीवा मा

ीकृ ण अजुन के रथ म सारिथ बनकर रथ के पाँच घोड़ो को

ारा चलाते ह मान वे पाँच इ

बौ -सा ह य म भी रथ एवं च

ह (लगाम)

य को अनुशासन म रखकर जीवन-रथ को ह चलाते

ह। लेटो ने भी जीवन-रथ के िलए इस
२. कम

करने म और

ेयमाग मनु य को आन द म

मनु य का शर र एक रथ के स श है, जसका
—————————————
१. भगवान ्

वचार करके,

हण कर लेता है तथा म द

सांसा रक व तुओ ं को

माग का अनुसरण करता है ।
दे ता है तथा


े और

पक का

योग कया है । (Dialogues of Plato)

क प रक पना क गई है ।

धान व व क र राखा, जो जस करइ सो तस फल चाखा।

होता है । चेतन जीवा मा से

वयोग होने पर शर र िन े

एवं जड हो

जाता है । मृ यु का अथ है दे ह से चेतनत व जीवा मा का
जाना। जीवा मा शर र म
ारा मनु य को सचे
मन

थत रहकर बु , मन, इ

एवं स

य रखता है । बु

वयोग हो

य तथा

ाण के

मानो सारिथ है और

ह (लगाम) है । मन संक प, वक प, इ छा करता है तथा बु

मन को िनयं त करती है । इ
भागती ह।

वषय इ

के

जीवा मा दे ह, बु , मन और इ

याँ घोड़

भाँित

वचरण का माग अथवा

ेय अथवा

ओर

होते ह।

य के साथ जुड़कर सुख-दःख
का भोग

करता है । जीवा मा भो ा होता है । वा तव म बु
को िनयं त कर

वषय

ह मन और इ

ेय के माग पर चलाती है । य द बु

पी

सारिथ असावधान हो जाए तथा मन और इ

य को

वतं

छोड़ दे तो

वे जीवा मा को भटकाकर दःखी
बना दे ते ह।

वा तव म दे ह साधन है तथा सा य नह ं है । यह संसार मा

भोगभूिम नह ं है । मनु य परमा मा का
कम

ारा परमा मा को

होकर भी मन और इ

उपकरण बनकर िन काम

कर सकता है , क तु जब जीवा मा

य का दास हो जाता है अथवा उनसे ब

जाता है, तब वह दःख
से

त हो जाता है । यह इस

वामी
हो

पक का

ता पय है ।

व व ानवान ् भव ययु े न मनसा सदा।

त ये

या यव यािन द ु ा ा इव सारथेः ॥५॥

य तु व ानवान ् भवित यु े न मनसा सदा।
त ये

या ण व यािन सद ा इव सारथे ः ॥६॥

श दाथः यः सदा अ व ानवान ् तु अयु े न मनसा भवित = जो

सदा अ व ानवान ् (अ ववेक

बु वाला) और अयु

मनस हत (मनवाला) होता है ; त य इ
उसक इ

याँ सारिथ के द ु

(अवशीभूत, चंचल)

या ण सारथेः द ु ा ाः इव =

घोड़ क भाँित; अव यािन = वश म न

रहनेवाली (हो जाती ह।)
तु यः सदा

व ानवान ् यु े न मनसा भवित = और जो सदा

व ानवान ् ( ववेकशील बु वाला) यु
होता है ; त य इ

(वशीभूत) मनस हत (मनवाला)

या ण सारथेः सद ाः इव = उसक इ

याँ सारिथ के

अ छे घोड़ क भाँित; व यािन = वश म रहनेवाली (होती ह)।
वचनामृतः जो सदा ववेकह न बु वाला और अिनयं त मनवाला
होता है , उसक इ

याँ सारिथ के द ु

घोड़ क भाँित वश म नह ं रहतीं;

और जो सदा

ववेकशील बु वाला, वशीभूत मनवाला होता है , उसक

याँ सारिथ के अ छे घोड़ क भाँित वश म रहती ह।
स दभः दोन मं

पर पर जुड़े ह। बु

और मन मह वपूण होते

ह।
द यामृतः रथ क उपिनषद य प रक पना

ारा मनु य जीवन-या ा

को साथक एवं सुखमय बना सकता है । मानव-दे ह म जीवा मा, जो
परमा मा का द य अंश है तथा त वतः (शु
जीवन-रथ के

वामी के

प म सं थत है । जीवन-रथ मानो चार च

(प हय ) पर चलता है और उनक
सूचक होती है । बु

प म) परमा मा ह है ,

गित चतु दक्

वकास-

या क

सारिथ के स श है तथा वह उिचत-अनुिचत, भले-बुरे

का िनणय करती है । मन
संचालन करता है । इ

ह (लगाम) के तु य है, जो इ

याँ अपने

चलने म आतुर रहती ह। बु

य को

वषय (भो य पदाथ ) के माग पर
जीवा मा से

िनयं त कर सकती है और मन इ

काश लेकर मन को

य को िनयं ण म रखकर, उ ह

वछं द वचरण से रोक सकता है तथा उ म ल य क ओर ले जा सकता
है । मनु य
दसर

ेयमाग से दरू हटकर तथा

ेयमाग पर चलकर अपना तथा

का क याण कर सकता है और

ेयमाग से दरू हटकर तथा

ेयमाग पर चलकर अपना तथा दसर
का अ हत कर लेता है । मानव का

दे ह एक उ म उपकरण है तथा इसके उपयोग अथवा द ु पयोग का
दािय व मनु य क बु
परमा मा से स

पर ह होता है । इसीिलए वेद और उपिनषद म

बु

करने के िलए अग णत

ाथनाएँ क गयी ह।१

य तव व ानवान ् भव यमन कः सदाऽशुिचः।

न स त पदमा नोित संसारं चािधग छित ॥७॥
य तु व ानवान ् भवित समन कः सदासशुिचः।
स तु त पदमा नोित य मा
व ानसारिथय तु मनः
सोऽ वनः पारमा नोित त

भूयो न जायते ॥८॥

हवान ् नरः।

णोः परमं पदम ् ॥९॥

श दाथः यः तु सदा अ व ानवान ् अमन कः अशुिचः भवित = जो
—————————————————
१. वै दक धम

यह

ाथनाएँ क गई ह। उन

वेद के

यात गाय ी मं

वशेषता है

ाथनाओं का संकलन करना क ठन है ।
म परमा मा से बु

ॐ अ ने नय सुपथा (यजु०, ४०.१६)

ॐ व ािन दे व स वतुदु रतािन परासुव, य
ॐ यां मेधां दे वगणाः
३२.१४)

क उनम अिधकतः स
को

े रत करने क

के िलए अग णत

ाथना क गयी है ।

भ ं त न आसुव (यजु०, ३०.३)

पतर ोपासते। तया माम

मेधयाऽ ने मेधा वनं कु

(यजु०,

भी सदा ववेकह न, असंयतमन, अप व

होता है ; स तत ् पदम ् न आ ोित

च संसारम ् अिधग छित = वह उस परमपद को
संसारच

को ह

नह ं करता तथा

होता है ।

तु यः सदा

व ानवान ् समन कः शुिचः भवित = और जो

ववेकशील संयतमन, प व
उस परमपद को

होता है ; स तु तत ् पदम ् आ ोित = वह तो

कर लेता है ; य मात ् भूयः न जायते = जहाँ से

(वह) पुनः (लौटकर) उ प न नह ं होता।
यः

नरः

ववेकशील बु

=

जो

मनु य;

प सारिथ से यु

व ानसारिथः
और मन प

तु

मनः

हवान ् =

हवाला (मन प

को वश म रखनेवाला है ); सः अ वनः पारम ् व णोः तत ् परमं पदम ्
आ ोित = वह माग के पार व णु के उस ( िस ) परम पद को

कर

लेता है ।
वचनामृतः जो भी मनु य सदा ववेकह न, असंयतमन, अप व
है , वह उस परमपद को

नह ं करता तथा संसारच

है । और जो ववेकशील, संयतमन, प व

को ह

होता

होता

होता है , वह उस परमपद को

कर लेता है , जहाँ से लौटकर, वह पुनः उ प न नह ं होता।
जो मनु य ववेकशील, बु

प सारिथ से यु

और मन प

को वश म रखनेवाला है , वह संसारमाग को पार करके व णु (सव यापक
पर

पु षो म) के उस ( िस ) परम पद को
स दभः मं

मं

३ से ९ तक सात मं

७, ८, ९ पर पर जुड़े हए
ु ह।
द यामृतः

पर

परमा मा

जीवनरथ के संबंध म ह तथा

ने

येक

जीवनया ा के िलए एक संपण
ू साधनसंप न शर ररथ
वह

वयं

येक मनु य के भीतर जीवा मा के

गितशीलता एवं

कर लेता है ।

मनु य

को

उसक

दान कया है तथा

प म सं थत होकर उसे

याशीलता क साम य दे दे ता है । जीवा मा के

प म,

वयं परमा मा के वराजमान होने के कारण मनु य का सचेतन शर र
मानो परमा मा का म दर ह होता है । शर र को धम और कम का
उपकरण मानकर उसको

व थ एवं सुर

त रखना अ य त आव यक

होता है ।
चेतना के

वकास म म बु स प न होकर, मनु य सृ

िसरमौर हो गया। बु
आद श

य से यु

का

अथात ् िच तन, मनन, मरण, क पना, तक, िनणय

होकर मनु य ने स यता और सं कृ ित को ज म दे

दया तथा समाज को एक

यव था भी दे द । वकास म म चेतना के

वकास से ह बु

का उदय होता है , क तु बु

सदपयोग
से चेतना-श

का भी अ युदय होता है ।

मानव-जीवन का

क खोज के

के स यक् वकास एवं

धान ल य परमत व क

ारा उसक

ाि

करना है ।

ज ासा एवं परमत व

ववेकशील पु ष कम े

य रहकर भी संसार के पार चले जाते ह और स य का संदशन कर

लेते ह। मनु य अपने भीतर परम शा त रहकर ह स य का संद शन कर
सकता है ।
जगत ्- पंच म फँसा हआ

सदै व अशा त रहता है तथा अनेक

सांसा रक उपल धयाँ होने पर भी वह अशा त, िच ता
रहता है । भौितक सुखभोग मनु य को आ य तक तृि

त एवं दःखी

एवं अ वचल

शा त कभी नह ं दे सकते।
जो

ववेकह न

होता है , उसक

वराजमान परमा मा के द य तेज से

बु

अपने भीतर

काश, ेरणा एवं मागदशन न लेने

के कारण ल य से भटकती रहती है तथा सदा मोह एवं शोक से
रहती है । बु

के भटकने पर उसका मन पर भी िनयं ण नह ं रहता तथा

मन चंचल एवं अ थर हो जाता है । चंचल मन इ
होने से नह ं रोक पाता। इस

कार

य को

वे छाचार

ववेक ह न बु वाले तथा असंयत

मनवाले मनु य क जीवनधारा ह द ू षत हो जाती है तथा वह संसारच
म अथात ् राग- े ष आ द म फँसकर वन

हो जाता है ।

ववेकशील बु वाला मनु य अपने भीतर सं थत परमा मा से

काश एवं

ेरणा पाकर मन को संयत कर लेता है तथा इ

वषयानुगामी नह ं होने दे ता। उसका जीवन प व
संसारच

से मु

होकर परमपद को

य को

हो जाता है तथा वह

कर लेता है ।

ववेकशील मनु य जीवनरथ के सारिथ प बु

ारा मन प

को वश म कर लेत ा है और वह संसार-सागर को पार करके परमा मा के
परमपद को अथात ् परमा मा के स चदान द

व प को

कर लेता

है । उसका जीवन ध य हो जाता है ।

ये यः परा

था अथ य

परं मनः।

मनस तु परा बु बु े रा मा महान ् परः ॥१०॥
श दाथः इ

ये यः पराः ह अथाः = इ

य से अथ (श दा द

वषय) अिधक बलवान ् ह; च अथ यः मनः परम ् = और अथ से मन

अिधक बलवान ् है ; तु मनसः बु ः परा = और मन से भी अिधक
बु

है ; बु े ः = बु

अिधक बलवान ् एवं

बल

से; महान ् आ मा परः = महान ् जीवा मा सबसे
है ।

वचनामृतः इ

य क अपे ा उनके अथ ( वषय) अिधक बलवान ्

ह और अथ क अपे ा मन अिधक बलवान ् है और मन से भी अिधक
बल बु

है । बु

है ।१

से महान ् जीवा मा सबसे परे अथवा उ कृ

स दभः मनु य के भीतर सं थत जीवा मा सव प र है । (इस मं
म ‘महान’् तथा ‘आ मा’ के अनेक अथ कए गए ह।)

द यामृतः मानव-दे ह अपने म पूण होता है । मनु य क इ

याँ

बलवती होती ह, क तु उनक आकषण करनेवाले पदाथ उनक अपे ा
अिधक बलवान ् होते ह। इ

तथा उनके

वषय

अिधक बलवान ् और उ चतर होता है । य द मन

ढ हो तो वह इ

व छ द अथवा उ छंृ खल नह ं होने दे ता। मन इ

को

क ओर आकृ
होती है ,

नह ं होने दे ता। क तु बु

य को वषय

मन क अपे ा अिधक

य क वह वचारपूवक िनणय एवं िन य करती है । बु

परे अथात ् अिधक उ कृ , बलवान ् एवं
रथ का

अपे ा मन

बल
से भी

जीवा मा होता है , जो जीवन-

वामी होता है ।

वा तव म मनु य का जीवा मा अपने मूल व प म शु , बु , मु
आ मा (परमा मा) ह है । जीवा मा क चेतन स ा ह बु
करती है और स पूण दे ह तथा इ

य को सचे

जीवा मा ह मानव-जीवन का आधार एवं

एवं स

को

कािशत

य कर दे ती है ।

ोत होता है ।

महतः परम य म य ात ् पु षः परः।

पु षा न परं क च सा का ा सा परा गितः ॥११॥
श दाथः महतः परम ् अ य म ् = महान ् (जीवा मा) से अिधक
बलवान ् अ य

होता है; अ य ात ् परः पु षः = अ य

से भी

परमपु ष है ; पु षात ् परम ् क चत ् न = परमपु ष से परे अथवा उ च
एवं

कुछ भी नह ं होता। सा का ा = वह परमसीमा अथवा अविध है ;

सा परा गितः = वह परमगित है ।
वचनामृतः (उस) जीवा मा से अिधक बलवान ् अ य

परमा मा क माया-श

होती है। अ य

होता है । परमपु ष परमा मा से परे अथवा
परमसीमा है । वह सव च, े

से भी

परमपु ष परमा मा

कुछ भी नह ं होता। वह

गित है ।

(इस मं के भी अनेक अथ कए गए ह।)
—————————————
१. भगव

गीता म इस

कार है 

या ण परा याहु र

ये यः परं मनः।

मं

१० म ‘आ मा’ का अथ जीवा मा है । (

मनस तु परा बु य बु े ः परत तु सः ॥ (गीता, ३.४२)

अथात ्

सू , १.४.१शाङकरभा य के अनुसार)

स दभः पर
ाि

पु षो म ह सव च है । उसे

होना परमपद क

है ।
द यामृतः मनु य के दे ह म सं थत जीवा मा जीवन का आधार

एवं

ोत होता है तथा अपने वशु

व प म जीवा मा

ह होता है ।

से जगत ् िम या अथात ् न र है ।१

ह स य है तथा ता वक

जीवा मा के माया से आवृत रहने के कारण, भगंवान ् क अ य

जीवा मा से भी अिधक बलवती होती हा। क तु अ

से भी

वयं परमपु ष परमा मा ह

है । पर

माया-

माया-श

परमा मा अथवा

परमपु ष से बढ़कर अथवा उ चतर कुछ भी नह ं होता। परमा मा ह
सबक

परमगित है ।२ परमा मा को

सीमा है तथा वह

परमपद है , जो अ य त दलभ
होकर भी बु

व छता

होना ह

क िनमलता तथा मन क

ारा अपने भीतर ह सदा सुलभ है ।

उपिनषद क
एवं बु

क प व ता
एष

घोषणा है क परमा मा सवसुलभ है तथा मन

ारा सबके िलए वह अपने भीतर ह

सवषु

यते

भूतेषु

गूढ ो मा

ा य है ।

काशते।

व यया बु या सू मया सू मदिशिभः ॥१२॥

श दाथः एषः आ मा = यह आ मा (सबका आ मा परमपु ष);
सवषु भूतेषु गूढः = सब

ा णय म ( थत होकर भी) गूढ (िछपा हआ
ु )

——————————————————————————————

१.

स यं जग म या जीवो

अ य कुछ नह ं।

ौव नापरः अथात ्

२.भगव ता म इसे ८.२०, २१.२२ म

स य है , जीवा मा परमा माह है,

कया है 

पर त मा ुभावोऽ योऽ य ोऽ य ा सनातनः।

यः स सवषु भूतेषु न य सु न वन यित ॥२०॥
अ य ोऽ र इ यु
यं

तमाहःु परमां गितम।्

ा य न िनवत ते त ाम परमं मम ॥२१॥

पु षः स परः पाथ भ

या ल य

वन यया।

य या तः थािन भूतािन येन सविमदं ततम ् ॥२२॥
अवय

अथात ् मूल

होने पर भी न

कभी

कृ ित से भी परे सनातन अवय

नह ं होता तथा शा त है । वह सनातन अवय

परमा मा अ र अथात ्

रण ( वनाश) न होने वाला त व है तथा वह परमगित है , जसे

संसार म नह ं लौटता। वह परमपु ष भ
य प सां यदशन का अपना

सां य-दशन के कुछ अंश
है ) को पु

वेदा त ने मूल
को

परमा मा है , जो न र पदाथ के

से सुलभ है ।

होने पर मनु य

थान है , तथा प वेदा त सां य से िभ न है । वे दा त ने

हण कए ह, क तु वेदा त ने अ ै त त व (अ तम स य केवल

कया है , जब क सां य ने पु ष और
कृ ित अथवा अ य

ित त कया है । ‘पु ष’ व

कृ ित दो त व का

ितपादल कया।

कृ ित से परे परमअवय , परमपु ष, पर

प तथा शु

चैत य व प,

परमा मा

है अथवा सीिमत और

असीम दोन ह है । ‘पु ष एवेदं व म ्’ (मु डक उप०, २.१.१०), आ मैवेदं सवम ् (छा० उप०,
७.२५.२)।

है ; न

काशते =

वाले पु ष के
बु

से;

नह ं होता; तु सू मदिशिभः =

क तु सू म

ारा (ह ) ; सू मया अ यया बु या = सू म, ती ण

यते = दे खा जाता है ।

वचनामृतः यह आ मा (सबका आ मा, जो परमपु ष कहलाता है )
सब

ा णय म िछपा हआ
रहता है ,

पु ष के

ारा सू म, ती ण बु

स दभः परमा मा

नह ं होता। सू म

से (उसे) दे खा जाता है ।

छ न होने पर भी हमारे

दे खा जाता है । यह मं

ारा अपने भीतर ह

यात है ।

द यामृतः व

क परमस ा सू माितसू म है । उसे

दे खना संभव नह ं है । वह अ य त गूढ है और
कािशत नह ं होता।१ आ या मक साधना

भी

वाले

थूल

से

ा णय के भीतर रहते हए

ारा अ तःकरण के शु

हो

जाने पर तथा आ त रक

के सू म और ती ण हो जाने पर मनु य

को अपने भीतर ह उस परम

योित का संदशन हो जाता है । यह मानव-

जीवन क सव च एवं

उपल ध है । पर

का अ त व है य प

उसका संदशन होना क ठन है ।
य छे

ा नसी

छे

ानमा मिन महित िनय छे
श दाथः
आद इ

ा ः =

कृ

ान आ मिन।
छा त आ मिन ॥१३॥

ानी पु ष, बु मान ् मनु य; वाक् = वाक् (वाणी

य को); मनसी = मन म (मनिस म िस को द घ करना

वै दक है ।) य छे त ् = उपसंहार कर दे , िन
उस मन को;

य छे त ् = िन
ान व प बु

ाने आ मिन =

ान थल एवं

काशमय बु

कर दे , वलीन कर दे , उपसंहार कर दे ;
को; महित आ मिन = महत ् त व अथात ् सम

ा ( हर यगभ, अपर
तत ् = उस (सम
बु

कर दे , संयत कर दे ; तत ् =

) म; िनय छे त ् = िन

म ;

ानम ् =
बु

कर दे , वलीन कर दे ;

बु ) को; शा ते आ मिन = शा त, िन वकार, शु ,

आ मा म; य छे त ् = वलीन कर दे ।

वचनामृतः बु मीन पु ष वाणी आ द इ

य को मन म िन

कर दे , उसे मन का

काशमय बु

सम

कर दे , उसे (भी) शा त आ मा म वलीन कर दे ।

बु

म िन

म उपसंहार कर दे ,

ानमय बु

को

——————————————
१. नाहं

काशः सव य योगमायासमावृतः। (गीता, ७.२५)

अथात ् योगमाया से समावृत, िछपा हआ
ु , परमा मा सबके
Browning ने क वता Paracelsus म कुछ इसी

कार से कहा है ।

नह ं होता। Robert

स दभः मं

११ म जस परमगित को

गया था, यहाँ उसे

ान और

करने का िनदश दया

करने क साधना क चचा क गयी है । इस मं

यान का सम वय कया गया है ।

द यामृतः भगवान ् क

ाि

के िलए सोपाना मक साधना को

मह वपूण कहा गया है । साधक आ या मक साधना१ करते हए
ु परमपु ष
को

हो जाता है । वह दे हा यास से (म शर र हँू , मेरा यह नाम और

प है , इस
से) मु

कार मे दे ह और दै हक नाते को ह सब कुछ मानने के भाव

होकर ‘अहं

ा म’ (म

सकता है ।
सव थम साधक अपनी सब इ
और फर मन को बु
को परम शु

सम

अथवा अपर
बु

य को मन के अधीन कर दे ता है

म ( जसे हर यगभ तथा

थम उ प न

भी कहा जाता है ) िनम न कर दे ता है और तदन तर

व छ और शा त अव था (सम

बु ) को अपने भीतर

थत

परमा मा म िनम न अथवा वलीन कर दे ता है तथा

द यानुभिू त

कर लेता है । वा तव म मन, बु

के पार होने का स चदान द व प परमा मा

वयं को

जैसे धीरे -धीरे मेघ का आवरण हटने पर सूय
है अथवा सहज ह

थत हो

ारा िनयं त और संयत कर दे ता है । वह बु
बु

परमशा त पर
उसक

हँू) क उ चाव था म

कट एवं

जा त

और अहं कार
कट कर दे ता है ,

वयं को

कर दे ता

हो जाता है ।

ा य

वरा नबोधत।

रु य धारा िनिशता दरु यया दग
ु पथ त कवयो वद त ॥१४॥

श दाथः उ
वरान ्

त = (हे मनु यो) उठो; जा त = जागो, सचेत हो जाओ;

ा य =

िनबोधत =

ान

पु ष

को

करके,

पु ष के पास जाकर;

करो, परमा मा को जानो; कवयः =

कालदश ,

ानी पु ष; तत ् पथः = उस पथ को, त व ान के माग को;

रु य

ु क ती ण, लॉघने म क ठन,धारा के
िनिशता दरु यया धारा (इव) = छरे
(के स श); दगम
् वद त = (इसी कारण इसे)घोर क ठन कहते ह।

वचनामृत : हे मनु य ) उठो, जागो।

—————————————
१.

( ानी) पु ष को

अ या मयोगािधगमेन दे वं म वा (कठ० उप०, १.२.१२)।ददश
दे व को शु

अ या मयोग

ारा समझता है ।

बु यु

साधक

करके ( े

पु ष

के पास जाकर)

ान

कर ।१ परम ानीपु ष

ु क ती ण (लांघने म क ठन) धारा (के
(त व ान के)उस पथ को छरे
समान) दगम
कहते ह।

स दभ : यह मं

कठोपिनष

के

मं

इसका पुन: पुन: उ रण दया जाता है । इस

म से एक है । य
ेरणा द मं

को क ठ थ

कर लेना चा हए।
द यामृत : गु दे व यमाचाय सम त मनु य का उ ोधन करते ह।
हे मनु यो, अ ान के अ धकार म पड़े हए
ु कब तक द:ु ख म क ण
दन करते रहोगे ? कलेश, भय और िच ता से

असहाय होकर नाना
हो। अपने मूल

कार के संकट को भोगते रहोगे ? तुम अमृतपु

द य

व प को भूलने के कारण भटक रहे हो। तुम

स चदान द व प परमा मा के अंश हो,
सम त

त रहकर कब तक

वयं भी आन द व प हो।

लेश, भय और िच ता को अ ान के कारण ओढे हए
ु हो।

उठो,जागो, सचेत हो जाओ।
फको।यह िम या है , मा

णभर म द :ु ख के आवरण को उतार

म है , अयथाथ है , क पना सूत है । हे मनु यो,

अपने द:ु ख के िलए भगवान और भा य को तथा अ य जन को दोष दे ने
से

या लाभ होगा ? मनु य अपने द:ु ख के िलए

वयं ह उ रदायी होता

है तथा वह अपने भा य और भ व य का िनमाण भी

वयं ह करता है ।

जीवन ह परमा मा क सबसे बड़ दे न है , क तु मनु य अपने
समय और श

य के द ु पयोग से उ ह न केवल न

उ ह भी द:ु ख का कारण बना लेता है ।
मानव-जीवन का ल य

या है और ल य- ाि

कर दे ता है , ब क
का पथ

या है ?

ल य को भूलकर मनु य भटक जाता है तथा शा त के माग को छोड़कर
अशा तक ओर चल पड़ता है ।
हे मनु य , तुम अमृतपु

हो, वयं अमृतमय हो। तुम आन द- ाि

के पूण अिधकार हो।
उठो, जागो। उन महापु ष के पास जाओ, ज होन
१.

वामी ववे कान द ने इस मं

िनकृ

वो

ीकृ ण के

परंतप’ (गीता, २.३) को गीता का

ारा अजुन के उ ोधन ‘शु ं

ितपा

कहा था। हे अजुन,

मानिसक दबलता
को छोड़कर उठ खड़ा हो-यह गीता उ ोधन मानवमा

त माद ु

कौ तेय यु ाय कृ तिन य: (गीता, २.३७)

िछ वैनं संशयं योगमाित ो
त मात ् वं उ

भारत (गीता, ४.४२)

(गीता, ११.३३)

पथ पर

के आधार पर ह स दे श दया था-Arise, awake and

stop not till the goal is reached. उ होन भगव ता म
दयदौब यं

के िलए है ।

चलकर परमत व को

कया है ।१ उनके पास स ची ज ासा और

लेकर जाओं तथा उनसे मागदशन और
पड़ो तथा तब तक न

ेरणा लेकर ल य क ओर चल

को, जब तक ल य- ाि

न कर लो।

उस पथ पर चलना ऐसा ह क ठन है , जैसे तलवार क धार पर
चलना। उसे लांघना अ य त क ठन है । इसी कारण उस पथ को बुधजन
दगम
कहते ह।

वा तव म उस ल य और पथ को उपने भीतर ह खोजना और

करना है । अ तमुखी होकर जीवन के आन दमय

ोत क खोज

अपने भीतर ह करना चा हए। आन द क खोज के िलए ब हजगत ्
भटकने से समय और श

का

य ह होगा।

ब हजगत ् म कम है तथा

यवहार है । जो मनु य मन के

य कोवश म कर लेता है तथा मन को बु

कर लेता है , वह ध य है । वा तव म , बु
काश से


ारा

एवं ववेक से िनयं त
अपने भीतर परमा मा के

कािशत होकर परमा मा म ह

िनम न हो जाती है और

द यहो जाती है ।
हे मनु य , परमदे व से

ाथना करो

क तु हार

हटकर स माग पर चलती रहे और परमा मा क
जाय तथा तु हारे जीवन म अ य आन द क

ाि

हो जाएगा। वा तव म व

और आन दपूण ह है , क तु
है ।२ महापु ष के

दोष

शु

परमा मा से प रपूण
तीत होता
पव

और

हो जाती है और सब कुछ आन दमय हो
के पास

ापूवक जाओ और

कर जीवन को कृ ताथ कर लो, कृतकृ य हो जाओ। दगम

पथ सुगम हो जाएगा तथा ल य सुल
भगव

परमा मा से प रपूण

के कारण द:ु खमय

जाता है । उठो, जागो, अनुभवी महापु ष
ल य को

का उपकरण बन

साद से तथा भगवान क कृपा से बु

ेमपूण हो जाती है ,

कुमाग से

थापना हो जाए। भीतर

काश और आन द क अनुभूित होने पर, यह व
और आन दमय िस

बु

हो जाएगा।

महापु ष अपने अ त:करण म जागरण क अव था म

ह रहते ह। जागरण ह तो जीवन है । जब जागे, तभी सबेरा।
१. त

णपाते न प र

उपदे य त

ते

ानं

ेन सेवया।

ािनन वदिशन:॥ (गीता, ४.३४) अथात

अिभवादन, सेवा और िन कपट

ारा

ान

भली

करो। त वदश उपदे श करगे।

२. नयन दोष जा कहं जब होई, पीत बरन सिस कहंु कह सोई।

कार

ावान ् उसम जागता रहता है ।१

जब सब मोहिनशा म सोते ह,

जागते रहनेवाले महापु ष का ह वेद-ऋचाएं वरण करती ह तथा उसका
गान करती ह।२

अश दम पशम पम ययं तथाऽरसं िन यमग धव च यत ्।
अना न तं महत: परं

ुवं िनचा य त मृ युमुखात ् मु यते ॥१५॥

श दाथ : यत ् =जो ; अश दम ् अ पशम ्, अ पम, अरसम ् च

अग धवत ् (अ त) = श दर हत,

पशर हत,

ग धर हत (है ) ; तथा अ ययम ्

पर हत, रसर हत और

िन यम ् अना द अन तम ् =तथा

अ वनाशी, िन य, अना द, अन त (है ) ;महत: परम ् =मह
अथवा अवय

कृ ित) से भी परे (है ) ;

ुवम ् =

व (सम

बु

ुव त व है ; तत ्

िनचा य = उस (परमा मा) को जानकर ; मृ युमख
ु ात ् =मृ यु के मुख से
;

मु यते = मु

हो जाता है ।

वचनामृत : जो श दर हत,

पशर हत,

पर हत, रसर हत और

ग धर हत है तथा अ वनाशी, िन य, अना द, अन त है , (जो)
(सम

बु

अथवा

त व है , उस पर

मह

कृित) से भी परे अथात उ च एवं सू म है , जो


को जानकर (मनु य)मृ यु के मुख से मु हो जाता है ।

स दभ :पूववत मं
का कारण

१४ म

क सू मता है ।

- ाि
तुत मं

को दगम
कहा है । दगमता

म परमा मा के सू म

व प

ववेचना है ।
१.

या िनशा सवभूतानां त यां जागित संयमी।

य यां जा ित भूतािन सा

िनशा प यतो मुने :॥(गीता, २.६९)

मोह िनसा सबु सोमिनहारा , दे खअ सपन अनेक
ए ह जग जािमिन जाग ह जोगी, परमारथी

कारा।

पंच वयोगी।

जािनय तब हं जीवन जग जागा, जब सब वषय वलास वरागा।
उसे जागा हआ
समझो, जो वषय- वलास म वर

हो।

सु खया सब संसार है , खावै और सोवै। द ु खया दास कबीर है जागै और रौवै॥
(आन द के अ ु बहाता है ।)

नींद िनसानी नीच क , उठो कबीरा जािग।

और रसायन छोड़कर राम रसायन लािग ॥
२.

यो जागार तमृच : कामय ते , यो जागार तमु सामा त गाय त।-ऋ वे द,

५.४४.१४ " ना त जा तो भयम ् " (बु )-जागने वाले को भय नह ं होता।
अब ल नसानी, अब न नसैह ।

रामकृ पा भविनसा िसरनी, जोग फ र न डसैह ( वनयप का)

हे भगवान, अब तक तो जीवन का नाश कया, अब इसका नाश नह ं क ं गा।
भगवानक कृ पा से संसार पी रा
माया के

(अ ान क रा ) बीत गई है । अब जागने पर

बछौने को नह ं बछाऊँगा।

द यामृत : व
है । उसे

क धारक एवं संचालक द य स ा अिनवचनीय

कसी प रभाषा अथवा वणन से सीिमत करना संभव नह ं है ।

वा तव म वह मनु य क अ पबु

से

य का वषय नह ं है तथा इ

नह ं कया जा सकता। वह इ

उसका

हण नह ं कर सकतीं। पांच

का वषय श द है , वक् का वषय
का वषय रस है तथा
मूल

कृ ित से मह


ाने

नह ं है तथा उसे श द म
य के पांच वषय ह।

पश है , च ु का वषय

यां

प है , रसना

ाण का वषय ग ध है । सां य-दशन के अनुसार

व (बु त व) उ प न होता है तथा महत ् त व से

अहं कार और अहं कार से मन, पांच

ाने

त मा ा अथवा सू म महाभूत (श द,

य, पांच कम

पश,

य और पांच

प, रस, ग ध) उ प न होते

ह। परमा मा श दर हत, पशर हत, पर हत, रसर हत और ग धर हत है ।
वह अ वनाशी है तथा िन य ् (सदा रहनेवाला, शा त), अना द और अन त
है । वह महत ्

से परे अथवा अिधक सू म और

कूट थ ( थर )सत ् त व है । उस परमा मा को इ
अ ा , अ वनाशी, िन य, अना द, अन त और

व प को जान लेता है , उसकम
अ ानी मनु य

तथा

ुव अथात

य , मन और बु

से


ु जानकर, मनु यसांसा रक

हो जाता है ।१ त व ानी अपने

वषय के आकषण एवं अ व ा से मु
भीतर िन वक प ् अव था को

है । वह

करके आ मा (परमा मा) के िन वक प
थत हो जाता है ।

न रदे ह के वनाश को अपनी मृ यु मान लेता है

ानी पु ष दे हा यास छोड़कर (म दे ह हंू , यह भाव तथा दे हास

छोड़कर), दे हातीत (दे ह से परे ) हो जाता है तथा मृ यु के भय से मु
जाता है ।मृ यु का भय िम या है । मनु य क श
श ु भय ह है तथा मृ यु का भय तो भयराज है ।
भय

यागकर

कम करते ह तथा

आहित
दे दे ते ह। मृ यु के भय को

का शोषक एवं महान ्

पु ष मृ यु का

आदश के िलए

ाण क

यागकर, मनु य सभी भय से मु

हो जाता है तथा अजेय हो जाता है । मनु य तो अमृतपु
के भय से कायर हो जाता है और

हो

है , क तु मृ यु

आदश एवं जीवन-मू य क

अवहे ना कर दे ता है ।

१.हम न मर, म रहै संसारा, हम कु िमला जयावन हारा-कबीर
बाणभ ट ने अपनी जीवनगाथा म मनु य को या क आहित
बनने तथा माताओं, बहन

बे टय और उ म च र वाले ललनाओं क र ा के िलए यातना सहने तथा
दे ने क

ेरणा द है ।

ाण का बिलदान

उठो, जागो। सम त भय

यागकर, अपने अमृत व प के अनु प

आचरण करने का संक प लो। िन काम एवं िनभय हो जाओ।१
नािचकेतमुपा यानं

वा

ु वा च मेधावी

मृ यु ो ं सनातनम ्।

लोके मह यते॥१६॥

श दाथ : मेधावी =बु मान ् पु ष ; मृ यु ो म ् =मृ यु के दे वता से

कहे हए
ु ; नािचकेतम ् सनातनम ् अपा यानम ् = निचकेता के सनातन
उपा यान को ;उ
=

वा च

ु वा =कहकर और सुनकर ;

लोके मह यते

लोक म म हमा वत होता है ।
वचनामृत :बु मान पु ष मृ यु के दे वता से

उपा यान को कहकर और सुनकर

लोक म म हमा वत होता है ।

स दभ : यह निचकेता-संबंधी उपा यान का माहा
द यामृत :
माहा

कसी

य को उसके पूरक के

प म कहा जाता है ।

को कहा है ।वा तव म वह यमराज के

वयं निचकेता-संबंधी उपा यान

प म यमाचाय का उपदे श ह।

मृ यु पर अथात मृ यु के भय पर आ म ान
ववेकदाियनी गु

य है ।

उपदे श अथवा उपा यान के प ात उसके

सा ात ् मृ यु के दे वता यमराज ने

करानेवाला मान

निचकेता-संबंधी

मृ यु का दे वता

वयं यमराज ह

ारा

वजय

यमाचाय गु

मृ यु ह मानो मृ यु के भय से मु


है ।

का उपदे श दे ने

म स म है ।
यह उपदे श भी नया नह ं है तथा सनातन अथात ् पर परागत है ।

इसे कहने और सुननेवाला मनु य
है ।

लोक है ।२

वयं ह

म हमा वत होना अथवा गौरव
य इमं परमं गु ं
यत:

याय

होना मानो

लोक म

संस द।
याय

लपते।

लपते ॥१७॥

श दाथ : य: =जो ;
=इस परमगु

ित त

करना है ।

ावये

ा काले वा तदान

तदान

लोक म म हमा वत हो जाता

(रह यमय

यत:= शु

संग) को ;

होकर ; इमम ् परमम ् गु म ्
संस द =

१. तं वे ं पु षं वेद यथा मा वो मृ यु: प र यथा इित (

-चचा क सभा म;

उप०, ६.६)

-जानने यो य परमा मा को जानना चा हए, जससे हे मनु य , तु ह मृ यु द:ु खन दे सकेगी।
मृ यु से मत डरो।

भगव ता म मृ यु का भय याग दे ने का अनेकश: उपदे श है ।
२.


ै लोको

बृह वात ्

लोक: (शं कराचाय)

-बृहत ् होने से परमा मा

कहलाता है ।

ावयेत ् =सुनाता है ;वा

है ; तत ् आन
आन

ा काले ( ावयेत ्)= अथवा

ा काल म सुनाता

याय क पते =वह अन त होने म समथ होता है । तत ्

याय क पते =वह अन त होने म समथ होता है ।

वचनामृत :जो मनु य शु
क सभा म सुनाता है अथवा

होकर इस परमगु

संग को

ानी जन

ा काल म सुनाता है , वह अन त होने म

समथ हो जाता है , वह अन त होने म समथ हो जाता है ।
स दभ : कठोपिनष
पुन: कहा गया है । मं
अ याय क समाि

के

थम अ याय के अ त म माहा

के अ त म अ तम श द क पुरनावृ

व ा का उपदे श अमृतमय होता है तथा इस व ा

क चचा केवल ज ासु एवं

ामय सा वक पु ष के म य म, कसी

उ म समागम के अवसर पर ह करनी चा हए,
होकर ह क जानी चा हए। अशु
इसक चचा करना िन ष

ान क चचा शु

होकर अथवा अशु ता

के वातावरण म

है ।

यम- निचकेता उपा यान

को कहना एक पु यकम है । प व

ा काल म इसके कथन एवं

वण का

वशेष मह व होता है । इसके

कहने का तो अन त फल होता ह है , इसका कहनेवाला

वयं भी एत

हो जाता है अथात अमर हो जाता है ।

यह अमृतमय उपा यान परमगृ
अथात स पा

करना

का सूचक होता है ।

द यामृत :

ारा अन त को

य को

को ह इसका

(गोपनीय)है तथा केवल उ म अिधकार

वण कराना चा हए।१ अनिधकार

अथ का अनथ कर दे ते ह तथा उ म व ा को लांिछत एवं िन दत कर
दे ते ह। अिधकार पु ष ह उ म उपदे श को

हण करते ह।२


१. गु ं (कठोप०, २.२.६)


ु ं मे गोपाय (तै० उप०, १.४)

गु , गु तम (गीता, ९.१,१५.२०,१८.६३,६४,६८,७५)
२.

व ा ह वै

ा णमाजगाम गोपाय मा शेविध ेऽहम म। असूयकायानृजवे ऽयताय न मा

ूया: वीयवती तथा

याम।् (िन

, २.१.४)

- व ा ने पुकारकर कहा-अनािधकार पु ष को मुझे मत दे दे ना, जससे म श
अिधकार पु ष-गीता (१८.६७), मु डक उप० (१.२.१२, ३.२.१०) इ या द।

शाली बनी रहँू ।

शा तो दा त उपरत तित ु : समा हतो भू वाऽऽ म येवा मानं प यित
अिधकार तु िनता तिनमल वा त: साधनचपु यस प न:

(सुबाल उप० , ९.१४)

माता-वेदा तसार

तीय अ याय
थम व ली
परा च खािन यतृणत ् वयंभू त मा परा

ार:

ना तरा मन ्।

यगा मानमै दावृ च रु मृत विम छन ् ॥१॥

श दाथ :

वयंभू: = वयं

ारा को, इ
परा च=

प यित

बाहर

कट होनवाले परमे र ; खािन =सम त

को, (ख-िछ

अथात उनसे उपल

जानेवाले, ब हमुखी ;

यां);

त मात ् =इसीिलए ;(मनु य:

परा प यित = (मनु य) बाहर दे खता है ; अ तरा मन ् न = अ तरा मा
को नह ं (दे खता) ; अमृत वम ् इ छन ् क

त ् धीर: =अमृत व (अमरपद)

क इ छा करता हआ
कोई धीर (बु मान ् पु ष); आवृ च ु: = अपने

च ु आद इ

य को बा

वषय से लौटाकर, रोककर ;

यग ् (स पूण वषय को जाननेवाला) आ मा ;

यगा मानम ् ऐ त ् =

अ त: थ आ मा को दे ख पाता है ।
वचनामृत :

वयं

यगा मा =

कट होनेवाले परमे र ने सम त इ

य को

बाहर ( वषय क ओर) जानेवाली बनाया है । इसीिलए (मनु य) बाहर क
ओर दे खता है, अ तरा मा को नह ं दे खता। अमृत व क इ छा करनेवाला
कोई एक धीर अपने च ु आ द इ

य को बा

वषय से लौटाकर

अ त: थ आ मा को दे ख पाता है ।
स दभ : यह कठोपिनष
द यामृत

:

मनु य

का सवािधक
मूलत:

द य

िस
है

मं
तथा

है ।
उसका

जीवा मा

आन द व प परमा मा का अंश है । अंशी और अंश एक ह होते ह, जैसे
जल और जलकण अथवा िस धु और ब द।ु परमा मा मनु य के भीतर

दय े

म सू म

प से

वराजमान है । वह जीवन का

आधार है । मनु य आन दमय होने का पूण अिधकार
डसक अवहे लना करके संसारच
मनु य क

क ओर दे खते ह।१

ाने
ाने

है ।

ोत एवं

क त्

म फंसा रहता है तथा दखी
रहता है ।

यां दे ह के ऐसे िछ

अथवा

ार ह , जो बाहर

यां संसार के भोगपदाथ अथवा अपने वषय

क ओर दौडती ह तथा वे मन को भी बरबस उधर ह ले जाती ह।
ववेकशील मनु य को बु

अपने भीतर ह सं थत परमा मा

एवं मागदशन लेकर मन को िनगृह त कर लेती
१.

‘इ

ार झरोखा नाना’

है और मन इ

से

काश
य को

वश म कर लेता है ।१
धीर पु ष अमृत व अथात द य आन द क इ छा से
ाने

को

वषय

े रत होकर

से लौटाकर अथवा उ ह रोककर अपने

यग

आ मा को अथात अपने अ त: थ आ मा को दे ख पाता है और
आन दम न हो जाता है । वह
करता है । वह बु


े माग का अनुसरण

ारा भले और बुरे, उिचत और अनुिचत तथा िन य

और अिन य पर
क याण द माग

ेयमाग को छोड़कर

वचार करता है तथा
का आ य

ववेक

ारा िनणय करके

ले लेता है तथा आन द

कर लेता है ।

पराच: कामाननुय त बाला ते मृ योय त वत य पाशम ्।
अथ धीरा अमृत वं व द वा

ुवम ुवे वह न

ाथय ते ।।२।।

श दाथ : बाला: मूखजन; पराच: कामान ् अनुय त = बा

भोगपदाथ का अनुसरण करते ह ; ते =वे ;
य त = सव

वतत य मृ यो: पाशम ्

व तृत मृ यु ( वनाश) के ब धन को

हो जाते ह,

ब धन म पडृ जाते ह ; अथ =तथा, क तु ; धीरा: = ववेकशील पु ष;
ुवम ् अमृत वम ् व द वा =

ुव (िन य, शा त) अमृत व (अमरपद,

आन दपूणता) को जानकर ; इह अ ुवेषु न

ाथय ते = यहां (इस संसार

म) अिन य भोग म से ( कसी भोग क भी)

ाथना अथवा कामना नह ं

करते।
वचनामृत : अ ववेक जन बा
सव

भोग

का अनुसरण करते ह। वे

व तीण मृ यु के ब धन म पड़ जाते ह, क तु धीर पु ष

ुव

अमृतपद को जानकर इस जगत ् म अ व
ु (अिन य, न र) भोग मसे
कसी को भी (भोग क ) कामना नह ं करते।
स दभ : धीर पु ष परमा मा को जानकर भोग म िल
यह मं

थम मं

नह ं होते।

का पूरक है ।

द यामृत : अ ववेक मनु य ब हमुख इ
रहकर ब हजगत ् के भोग क

ाि

म ह

े ष से उ प न िच ता और भय से

रहते ह वे मान सव

य एवं मन के वशीभूत

य शील रहते ह तथा वे रागत रहकर सदा अशा त एवं दखी

व तीण मृ यु के ब धन म पड़ जाते है।

ववेक धीर पु ष अ तमुख होकर तथा अपने भीतर सं थत द य
स ा को जानकर

अमृतपद क ह कामना करते ह वे न र पदाथ

क िन सारता को समझकर उनके आकषण म नह ं फंसते।
धीर पु ष उ चतर जीवन क ओर अ सर रहने म अपनी कृ ताथता
का

अनुभव करते
१. हो बु

तथा

अ पबु

मनु य

ज परम सयानी, ित ह तन िचतव न अन हत जानी।

य के वषय का

अनुसरण करते रहने म श

का

य कर दे ते ह और उ चतर जीवन के

आन द से वंिचत रह जाते है ।
ववेकशील पु ष बा
होता तथा उसक

जगत ् के िम या आकषण से

ल य पर

थर रहती है । वह भोगनद

कुशलतापूवक पार कर लेता है तथा उसम िनम न
दै हक भोग

म िल

रहना बु

लु ध नह ं
को

नह ं हो जाता। मा

शू य पशु का ल ण होता है ।

सू मबु स प न पु ष िच तनशील होता है । वह भोग के म य म रहकर
भी उनम िल
के उ चतर
को

नह ं होता तथा शनै: शनै: भोगवृ

से िनवृ

होकर जीवन

तर क ओर बढता ह रहता है । वह अपने भीतर द यभाव

करके कृताथ हो जाता है । ल य पर

थर रखनेवाला

मनु य कभी भटकता नह ं है ।
येन

पं रसं

ग धं

एतेनव
ै वजानाित कम

श दा

पशा

मैथुनान ्।

प रिश यते।। एत

वै तत ्।।३।।

श दाथ :येन = जससे ; श दान ्

पशान ्

मैथुनान ् =श द , पश , प , रस, ग ध और

पम ् रसम ् ग धम ् च

ी- संग को अथात इनके

सुखो को ; वजानाित= जानता है , अनुभव करता है ; एतेन एव = इसी
से (इसी के

ताप से) ह (जानता है ) ; अ

कम प रिश यते = कौन सा

ऐसा पदाथ जो यहां (इस जगत म) अविश

रह जाता है ।( जसे आ मा

से नह ं जाना जा सकता है ) , (अथवा, आ मा को जाने पर
शेष रह जाता है ?) एत

या जानना

वै तत ् = यह तो वह है ।

वचनामृत : (मनु य) जस (आ मा) से श द, पश, रस, ग ध और
ी- संग (के सुख को) जानता है , (वह) इसी (आ मा) से ह तो जानता
है । इस जगत ् म कौन सा पदाथ शे ष रह जाता है ( जसे आ मा नह ं
जानता ?)

यह तो वह है ( जसे तुमने पूछा है )।

स दभ : इस मं

म तथा आगामी मं

म ‘एत

गया है । इनम परमा मा के अनेक वणन ह। ये सब मं
ह। वा तव म अ याय २ क संपण

वै तत ्’ कहा

पर पर जुड़े हए

थम व ली एक ह सू

थत

है ।
द यामृत : मनु य के भीतर सं थत आ मा ( जसे समीपता के
कारण और भीतर होने के कारण
१. ‘ कम

यगा मा भी कहते ह) परमा मा का

प रिश यते’ का अथ है - परमा मा को जानने पर जगत ् म

या शेष रहा जाता है,

अथात जगत ् के अिध ान परमा मा को जानने पर कुछ जानना शेष नह ं रहता। एत

ेयं

िन यमेवा मसं थं नात: परं वे दत यं ह क चत ् ( ेत० उप०, १.१२) अथात यह परमा मा ह
एक

ेय है , जो हमारे भीतर सं थत है । इससे बढकर जानने यो य त व कुछ भी नह ं है -ऐसा

अनेक उपिनषद म कहा गया है ।
स वा अयमा मा

(बृ० उप०, ४.४.५)

ह अंश है तथा अंशी और अंशु के िस धु और ब द ु के स श एक होने
के कारण, वह
दे ह, इ

वयं परमा मा ह है । उसके दे ह म वराजमान होने पर

याँ, मन और बु

जड एवं िन

य होते ह तथा उसके िनगत होने पर दे ह

य हो जाता है । मनु य आ मा के दे ह म सं थत होने के

कारण, इ

य के

वषय- हण

ारा श द सुनता है ,

करता है ,

प को दे खता है , रस का और ग ध का अनुभव करता है ।

मनु य आ मा के अ त व के कारण

ाने

पश का अनुभव

य और कम

य के सुख

को जानता है । इस आ मा से जगत ् म कौन से पदाथ को जाना नह ं जा
सकता ? सभी कुछ आ मा से ह जाना जा सकता है । (अथवा परमा मा
को जान लेने पर जगत ् म

या अ य जानना शेष रह जाता है , य क

वह जगत ् का अिध ान है ?)

यमाचाय निचकेता से कहते ह—यह

जानना चाहते हो। सव थम

ाने

वह आ मा है , जसे तुम

य क श

के

ोत के

प म

समझो।
व ना तं जाग रता तं चोभौ येनानुप यित।
महा तं वभुमा मानं म वा धीरो न शोचित।। ४।।
श दाथ :

व ना तम ् =

व न के म य म (

और; जाग रता तम ् = जा त ्-अव था म (

य को); च =

य को); (वै दक सा ह य म

'अ त' का अथ अ तम छोर नह ,ं अव था है । बृहद० उप० म भी
व ना त का यह अथ है )। उभौ = दोन (दोन के

य को); येन =

जससे; अनुप यित = पुनः पुनः दे खता है ; महा तम वभुम ् आ मानम ्
म वा = महान ् सव यापक आ मा को जानकर;

वभु एकदे शीय नह ,ं

सव यापी होता है , दे श और काल से प र छ न नह ं होता है । धीर: न
शोचित = धीर (बु मान ् पु ष)

शोक (भय, िच ता, लेश) नह ं करता

है ।

वचनामृत : मनु य
अव थाओं म

जसके

व न के म य म, जा त-अव था म, इन दोन
ताप से (

को) दे खता है , (उस) महान ्

सव यापी आ मा (परमा मा) को जानकर धीर (बु मान ् पु ष) शोक
(िच ता आ द) नह ं करता।

स दभ : परमा मा को जानकर मनु य शोक अथात ् दःख
से मु

हो जाता है ।

द यामृत :
जा त ्-अव था म

परमा मा क स ा का अनुभव मनु य को
य पर गहन वचार के

व न और

ारा हो सकता है। सुषुि

क लयाव था होती है ।१

तो जीवा मा तथा मन एवं बु

व न और

जा त-अव था म मनु य अपने भीतर सं थत सचेतन आ मा के कारण
ह अनेक

य को दे खता है । वा तव म मनु य के भीतर सा

वराजमान आ मा सव े

प म

एवं सव यापी परमा मा ह है । उसे जानकर

धीर (बु मान ् पु ष, जो आ मा पर

थर रखता है तथा जग

म नह ं फँसता) संसार के सुख और दःख
से मु

प च

हो जाता है अथात ्

उनसे ऊपर उठ जाता है । वह िनर तर आन दाव था म रहता है । वह

कार का शोक (अथात ् दःख
ु , भय और िच ता) नह ं करता।

कसी

ब धनमु
म िल

पु ष भोगास

नह ं होता तथा संसार के भौितक

पंच

नह ं होता। वह अ तमुखी रहकर ल य व प आ मा पर

थर रखता है तथा िन कामभाव से अ तः ेरणा के अनुसार कम करता
है । वा तव म कतृ व के अहं कार (म क ा हँू , अहं कार) से मु
परम बु मान ् पु ष

रहनेवाला

कम करके भी ऐसा कुछ नह ं करता। उसका कम

कमाभास होता है, कम नह ं होता। अतएव वह पु य-पाप, सुख-दःख
ु , हषसे ऊपर उठ जाता है । यह द य जीवन होता है ।३

शोक के

य इमं म वदं वेद आ मानं जीवम तकात।्
ईशान भूतभ य य

न ततो वजुगु सते।। एत

वै तत।।
् ५।।

श दाथ : य: = जो; म वदम ् = कमफलभो ा; मधु अदम ् =

अमृतभोगी

(आन द

का

भो ा);

जीवम४् =

ाणा द

के

धारियता

(परमा मा) को; अ तकात ् = उसके समीप म रहने से, समीप से, भली
कार; भूतभ य य ईशानम ् = भूत, भ व यत ् (और वतमान) के शासक के

प म; इमम ् आ मानम ् = इस परमा मा को; वेद = जानता है ; ततः न

वजुगु सते = फर, ऐसा जानने के बाद भय, घृणा नह ं करता; एत

वै

तत ् = िन य ह यह आ मत व है ।
---------------------------------------------

१. मा डू य आ द अनेक उपिनषद म जा त, व न और सुषुि
है ।

२. सम त उपिनषद तथा भगव ता म अनेक

वशद ववेचना क गई

थल पर धीर के िलए 'वीतशोक', 'न शोचित',

'मा शुच:' आ द कहा गया है । उनक गणना करना क ठन है । 'धीर' श द का उपयोग भी
अग णत

थान पर कया गया है ।

३. तरित शोकं आ म वत ् (छा० उप०, ७.१.३)—आ मा को जाननेवाला शोक को पार कर लेता
है । अ य उपिनषद से भी इसे अनेक
भाव क

कार से कहा गया है । केन उपिनष

(१.२) म भी इसी

ववेचना है ।

४.'जीव' यहाँ जीवा मा का सूचक नह ं है , परमा मा का ह सूचक है , य क परमा मा ह भूत,
भ व य का शासक होता है । यहाँ
का शा करभा य)

करण भी आ मा (परमा मा) का ह है । (

सू , १.३.२४

वचनामृत
अमृतभोगी),

:

जो

मनु य

म वद

(कमफलभो ा, आन दभो ा,

ाणा द के धारियता जीव (जीवन के

समीप से (भली

ोत परमा मा) को

कार) भूत, भ व यत ् के शासन करनेवाले को, इस

परमा मा को, जान लेता है , वह ऐसा जानने के प ात ् भय, घृणा नह ं
करता। िन य ह यह तो वह आ मत व है ( जसे तुम जानना चाहते
हो)।
स दभ : इस द ु ह मं

क चचा कई

कार से क गयी है ।

द यामृत : स पूण
परमा मा ह
ित ब बत

के अनेक अथ कए गए ह। इसम आ मा

को संचालक एवं धारक स ा एक

है । मनु य के दे ह के भीतर िनमल बु
प को जीवा मा कहते ह। परमा मा

तथा कमफलदाता है तथा जीवा मा के
मूल

व प म जीवा मा भी शु , बु

वयं ह अमृतभोगी

प म वह कमफलभोगी है । अपने
परमा मा ह है ।

परमा मा मायोपािधस हत ई र के

प म भूत, भ व यत ् और

वतमान का शासन करनेवाला है । जो अपने भीतर ह
रहनेवाले आ मा को भली
आ मा को भली

म उसके

अपने समीप

कार जान लेता है , उसे भय नह ं रहता। अपने

कार से जानने पर मनु य कसी से भय नह ं मानता।

आ मा क स ा बु

और मन के मा यम से दे ह और इ

कर दे ती है । आ मा अपने भीतर

य को सचे

थत है और स नकट है ।

आ मा अमृतभोगी है , जीवन का धारक है , सदा ह स नकट है और
भूत एवं भ व यत ् का

वामी है तथा उसे जाननेवाला न घृणा करता है

और न भय मानता है ।
यह तो वह आ मा है , जसे निचकेता जानना चाहता है ।
य: पूव तपसो जातम य: पूवमजायत।
गुहां

व य ित

तं यो भूतेिभ यप यत।। एत

वै तत ्।। ६।।

श दाथ : य: = जो मनु य; अ य: पूवम ् अजायत = (उसे) जो

जल से पूव

कट हआ
था; य: तपस: पूवम ् जातम ् = जो तप से पूव

कट हआ
था; गुहाम ्

(सह) ित

व य =

तम ् = भूत के साथ

तत ् = यह ह वह आ मा है ।

दय प गुहा म
थत;

वेश करके; भूतेिभ:

यप यत = दे खता है; एत

वचनामृत : जो मनु य सव थम तप से उ प न हर यगभ

सम
स हत

(

वै
ा,

बु ) क , जो क जल आ द (भूत ) से पूव उ प न हआ
ु , भूत के

दय प गुहा म सं थत दे खता है , वह उसे दे खता है । यह तो

आ मा है ।

स दभ : आ मा के य

को भी

ानी पु ष

ारा विभ न

वणन हए
ु ह, उन अनेक वणन को इन मं ो म कहा गया है
आ मा है । इस मं

के अ वय और अथ अनेक

कार से कए गए ह।

द यामृत : यमाचाय निचकेता से कह रहे ह क
एक ह आ मा को अनेक
होना

चा हए,

क यह

ानी पु ष ने

कार से समझाया है तथा उसे

ा त नह ं

य क वे एक ह

आ मा के अनेक वणन ह। जो

ववेकशील पु ष है वह जानात है क

दयगुहा म सं थत आ मा एक ह

है , य प उसे समझाने के िलए वणन ह। अपने तप अथात ् संक प से
सृ

के

ारं भ म परमा मा, जल आ द महाभूत से भी पूव ह , हर यगभ

ा के

प म

कट हआ
ु , जससे सृ

जो अपने संक प से हर यगभ के
हआ
ु , ा णय के

प म, प चमहाभूत से भी पूव,

दय प गुहा म इ

हो गया। मन, बु , इ

का उ व हआ
है । वह परमा मा

कट

य आ द भूत (अ तःकरण) स हत

याँ भी भूत से ह बनी ह।

जो मनु य अपने आ मा को इस

कार से

जानता है , वह वा तव म ठ क जानता है । सबके

दय-गुहा म

दय म वराजमान,

सबका अ तयामी परमा मा एक ह है । यह अ तः व

आ मा ह तो है ,

जसे निचकेता जानना चाहता है ।
या

ाणेन संभव य दितदवतामयी।

गुहां

व य ित

तीं या भूतेिभ यजायत।। एत

वै तत।।
् ७।।

श दाथ : या दे वतामयी अ दित: (अदनात ् अ दित:)

= जो दे वतामयी अ दित (खानेवाली श
है ; या भूितिभ: यजायत = जो
व य ित

तीम ् =

)

ाणेन संभवित

ाण के साथ उ प न होती

ा णय के स हत उ प न हई
ु है ; गुहाम ्

दय पी गुहा म

होकर सं थत को (जो

ानी जानता है , वह यथाथ जानता है ); एत

वै तत ् = यह ह वह है

( जसे तुम जानना चाहते हो)।
वचनामृत : जो सवदे वतामयी अ दितदे वी
होती है , जो
होकर

ा णय के स हत उ प न हई
ु , जो

थत रहती है , (उसे जो

ाण के साथ उ प न
दय पी गुहा म

ानी पु ष दे खता है , वह यथाथ दे खता

है )। यह ह वह है ( जसे तुम जानना चाहते हो)।
स दभ : यहाँ अ य

कार से आ मत व का वणन कया जा रहा

है ।
---------------------------------------१.

आ मा के

होने के संबंध म उपिनषद म अनेक मं

ह।

इस मं

के अनेक अथ कए गए ह। 'अ दित' क

कार से क गई
द यामृत

है ।

:

यमाचाय

निचकेता

को

पुन या या करते हए
ु समझाते ह क अनेक
उसी एक परम स ा क
द य श

के

या या अनेक

चिलत

धारणाओं

कार से व णत सभी श

याँ

ोतक ह। अ दित दे वताओं क माता अथात ् एक

प म व णत ह।१ उसे आ द य

माता अथात ्

व पा भी कहा गया है ।
सवदे व व पा अथात ् द य श

हर यगभ से उ प न होती है ।
सृ

हर यगभ (

है , जसे जीवा माओं क सम

के स

ा) परमा मा क

थम

भी कहा गया है । अ दित बु

व न-अव था म बु

य रहती है तथा

य होने पर भूख- यास लगते ह। अ दित मानो वषय (श द,

पश, प, रस, ग ध) का अदन (भ ण, भोग
बु

कट होती है अथात ्

होती है ।
मनु य क जा त ् और

बु

ाण से

हण) करती है । सुषुि

य नह ं रहती तथा भूख- यास नह ं रहते और वषय का भोग

( हण) नह ं होता, दय-गुहा म

थत बु

म रहनेवाली तथा पंचभूत

(पृ वी, जल, अ न, वायु, आकाश) के स हत अथवा उनसे सम वत होकर
कट होनेवाली अ दितनामक श
स पूण श

य का के

क ह

अथवा आ द

य श

है तथा परमा मा से

वयं को अपनी परा श

कट करता है । सब श

हो तो

ोत है ।

अ दित परमा मा क ह एक अिच
िभ न नह ं है । परमा मा

तीक है ।

अ दित के

प म भी

य का उ म परमा मा ह है । यह तो परमा मा

ह , जसे निचकेता ने पूछा है ।
अर योिन हतो जातवेदा गभ इव सुभत
ृ ो गिभणीिभः।
दवे दवे ईडयो जागृव

हव म

मनु येिभर नः।। एत

श दाथ : जातवेदाः अ न: = सव
गभ: इव = गिभणी
भाँित; अर यो:
हव म

िन हत:

ारा उ म
=

अ नदे व; गिभणीिभ: सुभत
ृ :

कार से धारण कये हए
ु गभ क

दो अर णय

िन हत

है ;

जागृव

:

: मनु येिभ: दवे दवे ईडय: = जा त ् (सावधान, सचेत) हवन

करने यो य सामि य से मनु य
एत

वै तत ्।।८।।

ारा

ित दन

तुित करने के यो य है ;

वै तत ् = यह है वह।

----------------------------------१. दे वताओं तथा द य

ा णय को अ दितन दन कहा जाता है । दित रा स और दै य क

माता का नाम है । रा स को दिततनय कहा जाता है ।

वचनामृत : (जो) सव

गिभणी

ारा भली

कार से सुर

क भाँित दो अर णय म िन हत है , (वह) सावधान रहकर य
मनु य

ारा

ित दन

त गभ
करनेवाले

तुित करने यो य (अ न) है , यह है वह।

स दभ: अ न परमा मा का वाचक होने के कारण उपासनीय है ।
द यामृत :
कारण इ दय से
और अिच

परमा मा श द, पश,

प, रस, ग ध से परे होने के

चेतना है , जो अ

नह ं है । वह वरा

य है तथा वह प रभाषाओं से परे है ।१ अनेक

स अ ा

तीक से उसका

संकेत दया जाता है । अ न परमा मा क सचेतन स ा क वाचक है ।
वह मन, ाण आ द म अ तिन हत रहकर ऊपर क ओर आरोहण करती
है । अ न क अिच (लौ, लपट) ऊ वगामी होती है तथा वह चेतना के
ऊ वगमन का

तीक होती है ।

म अ न दो अर णय (उ रार ण तथा अधरार ण, ऊपर क

अर ण तथा नीचे क अर ण) के म थन से

विलत होती है ।

अर ण के भीतर अ न ऐसे ह िछपी हई
ु तथा सुर

जैसे क गिभणी

ी के उदर म िशशु िछपा हआ
तथा सुर

अ न सावधान रहकर य
जो य

त रहती है ,

त रहता है ।२

करनेवाले मनु य के िलए अचनीय होती है ।

क अ न है वह आ म योित क

तीक है । आ म योित ह तो

वह परमत व है , जसे निचकेता जानना चाहता है ।
यत ोदे ित सूय ऽ तं य

च ग छित।

तं दे वा: सव अ पता तद ु ना येित क न।। एत

वै तत ्।। ९।।

श दाथ : यत: च सूय: उदे ित = जहाँ से सूय उदय होता है ; च य
अ तम ् ग छित = तथा जहाँ अ त भी होता है ; सव दे वा: तम ् अ पता:
= सब दे व उसे सम पत ह अथवा उसम

ित त ह; तत ् उ क न न

अ येित = उस परमा मा को िन य ह कोई भी नह ं लाँघ सकता है ;
एत

वै तत ् = यह तो वह है ।
वचनामृत :

जससे सूय उ दत होता है , जसम अ त होता है , सब

दे व उसे अ पत ह। उस परमा मा को िन य ह

कोई भी नह ं लाँघ

सकता है । यह तो वह है ।
---------------------------------------१. नेित नेित (बृहदार यक उप०, ४.४.२२)
२.ितलेषु तैलं दधनीव स परापः

ोतः वीरणीषु चा नः ( ेत उप०, १.१५)

—जैसे ितल म तेल , दह म घी,
परमा मा

दय म िछपा हआ
है ।

स दभः

ोत म जल, अर णय म अ न िछपे हए
ु ह , ऐसे ह

यमाचाय निचकेता को अनेक

कार से बता रहे ह क

परमा मा एक ह है , जसे वह जानना चाहता है ।

द यामृत

:

परमा मा

सव च

स ा

है ।

यह

योित मान ् महान ् सूय उसी द य स ा के कारण उ दत होता है , संचरण

करता है और अ त होता है । वा तव म सूय परमा मा से ह उ दत होता
है तथा उसी म वलीन होता है ।१ सूय, वायु, अ न आ द सभी परमा मा के
शासन म

थत रहते ह।

प रपूण परमा मा का

हण अ पबु

असीम और अन त है तथा मनु य क
सू मबु
होना

से उसका

ारा नह ं हो सकता। वह
बु

सीिमत और सा त है ।

हण करने और उसका वणन करने म व वधता

वाभा वक ह है ।
इदम ् इ थम ् (यह ऐसा ह है ) परमा मा के संबध
ं म इस

कोई भी नह ं कह सकता। जसे उसक जैसी भी अिभ य
वानुभव हआ
हो, वह उसके िलए अ तम

कार

हई
ु हो अथवा

माण है । ववेकशील पु ष

व वधताओं के मूल म एकता का दशन करता है ।२

वणन क

यह सारा जगत ् उसी से

कट होता है तथा उसी म लीन होता है ।

सूय भी उसी से उ दत होकर उसी म अ त होता है । सारे दे व उसी म
ित त ह तथा वह उनका आधार है । वह सत ् है तथा शेष सब असत ्

अथात ् न र है ।

व वध

क मूल एवं ता वक चैत य स ा एक ह है । परमा मा क

काशमय, तेजो प श

परमा मा

क श

क संचालक श

य के अनेक

तीका मक नाम ह। दे व म

ओत ोत होती है । इसके अित र

याँ भी दे वता कहलाती ह। ने

सम त श

पाँच

ाने

का दे वता सूय है ।

का आ य परमा मा ह

है तथा कोई भी

परमा मा का उ लंघन नह ं कर सकता। वह सवश

मान ् परमा मा ह

तो निचकेता का पूछा हआ
परमत व है , जसका अनुभव और वणन अनेक

कार से कया जाता है ।

-------------------------------------------१.

ोपिनष

केनोिनष

(४.१) म

५ तथा ६ म इसक चचा क गई है ।

क श

को दे व क श

का आधार एवं

ोत कहा गया है ।

स य ायं पु षे य ासावा द ये स एकः (तै० उप०, २.८)—पु ष म और सूय म एक ह
परमा मा है ।
आ द यो
२.

(छा० उप०, ३.१९.१)—सूय मानो

सम वय

है — एकं स

है ।

व ा बहधा
वद त (ऋ वे द, १.१६४.४६)

—परमा मा एक ह है, उसके वणन अनेक ह।
दे व एक: (अथव०, १३.२.२६)

यदे वेह तदमु

यदमु

तद वह।

मृ योः स मृ युमा ोित य इह नानेव प यित।। १०।।
अमु

श दाथ : यत ् इह = जो पर
= वह वहाँ (है ); यत ् अमु

परमा मा यहाँ

(है ); तत ् एव

= जो वहाँ (है ); तत ् अनु इह = वह

यहाँ (है ); स मृ यो: मृ युम ् आ नोित = वह मृ यु से मृ यु को

होता

है ; य: इह नाना इव प यित = जो यहां (परमा मा को) अनेक क भाँित
दे खता है ।
वचनामृत : जो यहाँ (इस लोक म) है , वह वहाँ (उस लोक म) है ।
जो वहाँ (परलोक म) है , वह यहाँ (इस लोक म) है । जो परमा मा को
अनेक क भाँित दे खता है , वह मृ यु से मृ यु को
स दभ : मं

करता है ।

१०, ११ पर पर जुड़े हए
ु ह। नाना व (अनेकता) दे खना

अ ान है । नाना व के पृ

म एक ह त व है ।

द यामृत : परमा मा एक ह है , क तु मन क चंचलता के कारण
तथा अ व ा अथात ् अ ान के कारण वह नाना (अनेक)

तीत होता है ।

व न म भी नाना व का अनुभव होता है । गाढ िन ा (सुषुि ), समािध

तथा

ान क अव था म नाना व नह ं रहता। सव

कूट थ ( थर)

म नाना व नह ं है तथा मन म नाना व है ।

होने पर एक ह च
पर,

ान म

मा अनेक

थत होने पर, बु

इस नाना व के पृ

तीत होता है । अ ान क िनवृ

म एक ह परमत व है ।

व ा अथात ्

या

ान


ारा

एक व है ।१

मान ्, सव प पर

एक ह चैत य त व क

ह सत ् है । वह यहाँ पृ वीलोक म तथा

वहाँ अ य लोक म है अथवा वहाँ और यहाँ भी है । वह अ खल

होने

तीत होती है ) का िनराकरण हो जाता है

तथा माया का आवरण हट जाने पर सव
अनुभिू त हो जाती है । सव

दोष

वीकार कर लेती है क सारे व

अ यास (जो व तु नह ं है तथा

सवश

वह एक रहता है ।

ा ड

है । यह स पूण जगत ् एक ह परमत व से प रपूण है तथा वह

सबका आ य, आ द, म य और अ त है ।

जो मनु य इस जगत ् म एक परमा मा को अनेक क भाँित दे खता

है , वह अ ान अ धकार म ह भटकता रहता है ।
----------------------------------------१.

वामनाि

एक भावे न प य त योिगनो

वा दनः।

य व ा मन ् न योगी मामुपै यित।।

ानी योगी इस जगत ् को तथा

उपिनषद म परमा मा के एक व का

(कमपुराण, १.९.८६)

ा- व णु-महे श को एक भाव से दे खते ह। सम त

ितपादन कया गया है ।

मनसैवेदमा

यं नेह नाना त कंचन।

मृ यो: स मृ युं ग छित य इह नानेव प यित।। ११।।
श दाथ : मनसा एव = ( वशु

यम ् = यह परमा मत व

एवं सू म) मन से ह ; इदम ्

करने यो य है ; इह नाना कंचन न

अ त = यहाँ जगत ् म अनेक (िभ न व) कुछ भी नह ं है ; य: इह नाना

इव प यित स: मृ यो: मृ युम ् ग छित = जो मनु य यहां (इस जगत ्
म) अनेक क भाँित दे खता है (मानता है ), वह मृ यु से मृ यु को

होता है ।
वाचनामृत : परमा म-त व का

हण ( वशु

एवं सू म) मन से

ह करना चा हए। यहाँ (जगत ् म) िभ न व है ह नह ं। जो मनु य यहाँ
अनेक (िभ न-िभ न) क भाँित दे खता है , वह मृ यु से मृ यु को

होता है ।
स दभ : यह मं

अ य त

िस

है । इसम

ान-

क चचा क

गयी है ।
द यामृत : इस जगत ् म नाना व के पृ

केवल बा

तर पर है तथा आ त रक

तर पर नह ं है । समु

तरं ग , फेन, बुदबुद आ द के िभ न व के पृ
समु

क एकता ह होती है ।

संदशन संभव होता है ।

थूल

होने पर ह सू म त व का
होने पर ह

सारा जगत ् एक ह सू म एवं द य त व से
वह इसम ओत ोत है ।
म एक ह पर

का

ान-

िभ न

सब कुछ दे ख

कट हआ
है तथा

होने पर मन अथात ् बु

जगत ् के पृ

हण हो जाता है ।२ इस जगत ् म परमा मा से

िभ न कुछ नह ं है । भेद केवल नाम और
है , जैसे

क चंचल

म अथवा उससे परे सम

ानी सू म

(समझ) लेता है ।१

म एक व है । िभ नता

वणाभूषण म एक ह

तीत होता है ।३ जो

प म अथात ् बा

वण नाम और
ानी पु ष सृ

तर पर ह

प के कारण िभ न-

म परमा मा के एक व को

जान लेता है, वह मृ यु से परे चला जाता है तथा अमरपद को

हो

जाता है ।
--------------------------------------१. आ प यित

ित प यित परा प यित प यित (अथव०, ४.२०.१)

२. बृहदार यक उपिनष
थान पर 'मनसैवानु

३. स यथेमा न :
समु

इ येवं

(४.४.१९) म भी लगभग यह मं

यं' है तथा 'मृ युं ग छित' के

य दमाना: समु ायणा: समु ं

ो यते।

ह तथा उनका नाम और

(

ोप०, ६.५)—न दयाँ समु

प का भेद नह ं रहता।

है, क तु वहां 'मनसैवेदमा

थान पर 'मृ युमा नोित' है ।

यं के

ा या तं ग छ त िभ ेते तासां नाम पे

होकर एक समु

ह हो जाती

ानी पु ष

ै त (म और जगत ् िभ न ह) से परे जाकर अपने

भीतर अ ै त (म और यह जगत ्
कुछ पर

ह है) म सं थत हो जाता है । सब

परमा मा ह तो है । जड और चेतन म एक ह चैत य स ा

ओत ोत है तथा वह स य है ।
अ गु मा : पु षो म य आ मिन ित ित।
ईशानो भूतभ य य न ततो वजुगु सते।। एत

वै तत ्।। १२ ।।

श दाथ : अ गु मा ः पु षः आ मिन म ये ित ित = अ गु मा
(अँगठ
ू े के प रमाणवाला) पु ष शर र के म यभाग

दयाकाश म

थत है ;

(आ मािन = दे ह म; यहाँ 'आ मा' का अथ दे ह है ) भूतभ य य ईशान: =
भूत और भ व यत ् का शासन करनेवाला; तत: न वजुगु सते = उसे जान
लेने के प ात ् जुगु सा (घृणा, े ष, भय आ द) नह ं करता; एत
यह ह तो वह है ।

वचनामृत : अ गु मा

वै तत ् =

पु ष दे ह के म यभाग ( दयाकाश) म

थत रहता है । वह भूत और भ व यत ् का शासन करनेवाला है । उसके

जाने लेने पर मनु य घृणा, भय, आ द नह ं करता। यह ह तो वह है ।
स दभ : मं

१२, १३ पर पर जुड़े हए
ु ह।

द यामृत : यमाचाय आ म व क
ह। मनु य के भीतर ह

अ गु

थत रहता है । पु ष का अथ
जीवा मा ( दय े

के भीतर बु

या या अनेक

के प रमाणवाला पु ष

कार से करते
दयाकाश म

योित- व प आ मा (परमा मा) तथा
म आ मा का

ित ब ब अथवा बु

ित ब बत आ मा) दोन ह होते ह। वा तव म आ मा और जीवा मा
त वत: एक ह होते ह।

ा णय म

होता है तथा पु ष का प रमाण भी
छोटा होता है । मनु य का
कारण

दय कमल का आकार िभ न-िभ न
दय-कमल के अनुसार बड़ा अथवा

दय-कमल अँगठ
ू े के प रमाणवाला होने के

योितः व प आ मा का प रमाण भी अ गु ाकार ह होता है ।

परमा मा ह भूत, भ व यत ् और वतमान का अथवा काल का शासक होता
है ।१

य प परमा मा समान भाव से सव

उसका वशे ष

प रपूण होता है, तथा प

थान कहा जाता है । मनु य

अनुभव करता है तथा योगी

यान के समय

दय

दय म ह उसका

दयकमल म

योितः व प

परमा मा का अनुभव करके आन दत होते ह।
-----------------------------१.

ई र: सवभूतानां

े शेऽजुन ित ित (गीता, १८.६१)—हे अजुन, ई र

म रहता है । जीवा मा ई र के अधीन होता है ।

ा णय के

दय

परमा मा को जानकर

पु ष घृणा और भय

ानी पु ष घृणा और भय नह ं करता।

यागकर ह कत यकम करते ह।

यह तो वह परमा मा है , जसे निचकेता जानना चाहता है ।
अ गु मा ः पु षो

योित रवाधूमकः।

ईशानो भूतभ य य स एवा

स उ

ः।। एत

वै तत ्।। १३।।

श दाथ : अ गु मा : पु षो = अँगठ
ू े के प रमाणवाला पु ष;
अधूमक:

योित: इव = धूमर हत

योित के तु य है ; भूतभ य य

ईशान: = भूत और भ व य का शासक; स एव अ
स:

: = और वह ह कल (है ); एत
वचनामृत : अ गु मा

= वह ह आज है ; उ

वै तत ् = यह है वह परमा मा।

पु ष धूमर हत

योित क भाँित है । भूत

और भ व यत ् का (अथात ् काल का) शासक है । वह ह आज है और वह
ह कल है (अथात ् सदा रहनेवाला, सनातन है )। यह है वह।
स दभ :
मं

दयकमल म परमा मा का अनुभव कैसा होता है ? यह

यानयोिगय के िलए अ य त मह वूपण
ू है ।
द यामृत : परमा मा परमपु ष है । वह सनातन एवं िन य है । वह

कल भी था, आज भी है और कल भी होगा अथात ् अप रवतनीय एवं
शा त है । वह कूट थ है । परमा मा चैत य व प है,

योितः व प है ।

क परम चेतना सवथा द य है तथा योिगय को उसका अनुभव

अपने भीतर ह
पर
भीतर

दयकमल म होता है ।
परमा मा के

द य

काश का

ित ब ब

थत अ तःकरण (अथवा बु ) म जीवा मा के

जस

कार आकाश तो सव

जल म होता है , उसी

है , क तु उसका

कार पर

दयकमल के
प म होता है ।

ित ब ब (छाया)

परमा मा के द य

व छ

काश का आभास

(िचदा यास) िनमल बु त व म होता है ।१ जीवा मा को अ तःकरण विश

चैत य कह सकते ह। जीवा मा प र छ न तथा परमा मा अप र छ न
है । परमा मा सारे जगत ् को तथा जीवा मा अ तःकरणस हत दे ह को

कािशत करता है । वा तव म जीवा मा परमा मा का ह अंश है तथा

त वत: शु , बु , िन य परमा मा ह है ।
भौितक

योित धूमस हत होती है , क तु द य

योित धूमर हत

अथात ् शु होती है । आ म योित िनधूम, द य एवं अख ड होती है तथा
योितय क भी मूल

१. आभासा एव च (
२.

योितषां

योितषां

योित होती है ।२

सू , २.३.५०)

योितरे कम ् (यजुवद, ३४.१)

योित: (मु डक उप०, २.२.९)

आ मैव अ य

योितः (बृ० उप०, ४.३.६)—आ मा ह पु ष क

योित है ।

यमाचाय निचकेता से कहते ह क यह वह परमा मा है जसे वह
पूछ रहा है ।
यथोदकं दग
ु वृ ं पवतेषु वधावित।

एवं धमान ् पृथक् प यं तानेवानु वधावित।। १४।।
श दाथ : यथा दग
ु वृ म ् उदकम ् पवतुषु वधावित = जस

कार

दग
जल पवत म इधर-उधर दौड़ता है ;
ु (उ च िशखर) पर बरसा हआ

एवम ् धमान ् = इसी

कार धम

को; (धम- वभाव) पृथक् प यन ् =

पृथक् दे खकर; तान ् एव अनु वधावित = उ ह ं के पीछे दौड़ता है ।
वचनामृत : जस

बह जाता है , उसी

कार उ च िशखर पर बरसा हआ
जल पवत म

कार शर रभेद

अथवा

वभाव

को पृथक् -पृथक्

दे खनेवाला मनु य उ ह ं का अनुसरण करता है ।
स दभ : अ ववेक मनु य ल य
इस सु दर मं
िन न

के अनेक अथ कए गए ह।

द यामृत : पवत के उ च िशखर पर बरसा हआ

थल पर पहँु चकर य

है । बखराव से श

होकर भटकता ह रहता है ।

का

बखर जाता है तथा अ व छ हो जाता

य हो जाता है । यह िस ा त जीवन के

म च रताथ होता है । श

का बखराव मन के ल य

ल य से भटक जाने के कारण होता है । जब मन क श
अनुसरण न करने के कारण एका
ास

नह ं होती, श

आ मसंयम के अ यास से मन म
होने पर, बु

शी

येक

होने अथात ्
ल य का

का बखराव और

ारं भ हो जाता है तथा काला तर म मनु य वन

स निच

व छ जल

हो जाता है ।१

साद (प व ता, स नता) आने पर,

थर और शा त हो जाती है । २

जो मनु य परमा मा म नाना व दे खता है अथात ् सारे जगत ् म

ओत ोत एक ह

द य स ा को नह ं दे खता तथा िभ न-िभ न पदाथ को

दे खकर जगत ् म नाना व (िभ न व) को ह दे खता है , वह उसे नह ं जान
सकता और मन क श
परमा मा को
म वभ

य का बखराव और भटकाव होने के कारण वह

नह ं कर सकता। वह एक ह जल को अनेक धाराओं

दे खकर तथा जल के एक व को न दे खकर

संसार म

ा णय और पदाथ क अनेकता के पृ

िमत हो जाता है ।
म द य त व क

एकता है । अनेकता के पीछे भागनेवाला मनु य कभी एक व का अनुभव
नह ं करता।
---------------------------------१. बु नासा
२.

ण यित (गीता, २.६३)

स नचेतसो

ाशु बु : पयवित ते (गीता, २.६५)

ववेकशील

पु ष संसार के

विभ न पदाथ

और

ा णय

अनु यूत एक ह चैत य व प परमा मा का संदशन एवं अनुभव करता
है । शर र

िभ नता होने पर भी

ा णय

म एक ह

अिभ न

चैत यत व सं थत है । शर रभेद को ह मह व दे नव
े ाला मनु य शर रभेद
का अनुसरण करनेवाल क भाँित ह ल य

हो जाता है । भेद को ह

मह व दे नेवाले लोग पर पर टकराते हए
ु न

हो जाते ह। परमा मा से

उ प न, विभ न

वभाववाले, भले-बुरे, ऊँच-नीच आ द कोई

पृथक् नह ं ह। संसार के सम त भेद बा

ाणी उससे

ह तथा उनके भीतर

द य

चैत य का एक व है ।

उ म पु ष कसी से घृणा और
एवं आ मक याण क
यवहार करते

े ष नह ं करता तथा लोकक याण

से, ववेकानुसार िभ न-िभ न

कार से

हए
भी सबम परमा मा का दशन करता है । वह

सवभूत हतरत होता है ।१ यह आ या मक वृ

है तथा यह समदशन है ।२

यथोदकं शु ेशु मािस ं ता गेव भवित।
एवं मुने वजानत आ मा भवित गौतम।। १५।।
श दाथ : गौतम = हे गौतमवंशीय निचकेता; यथा = जस
शु े आिस मम शु म ् उदकम ् = शु

(जल म) बरसाया हआ
शु

ता क् एव = वैसा ह ; भवित = हो जाता है ; एवम ् = उसी

कार;
जल;
कार;

वजानत: मुने; = ववेकशील मुिन का; आ मा भवित = आ मा हो जाता

है ।
वचनामृत :

हे निचकेता, जस

जल वैसा ह हो जाता है , उसी
स दभ :

ानी पु ष शु

कार

कार शु

जल म बरसा हआ
शु

ानी पु ष का आ मा हो जाता है ।

जीवन होने पर आ मा और परमा मा के

योग का अनुभव करता है ।
द यामृत : शु

अथात ् िनमल और

अनोखा सुख दे ता है । य द मनु य

व छ जीवन मनु य को एक

व छ

थान म बैठकर, व छ व

--------------------------------१.

सवभूत हते रता: (गीता, ५.२५)

२. अ यासयोगयु े न चेतसा ना यगािमना (गीता, ८.८)
प डता: समदिशन: (गीता, ५.१८)
सव

समदशन: (गीता, ६.२९)

समोऽहं सवभूतेषु (गीता, ९.२९)
समं सवषु भूतेषु ित
समं प यन ् ह सव

तं परमे रम ् (गीता, १३.२७)

समव थतमी रम ् (गीता, १३.२८)

पहनकर, व छ वातावरण म रहकर, सुखी हो सकता है तो अपने भीतर

मन और बु
और

के

व छ होने पर, उसका सुख िन स दे ह अ य त गहन

थायी हो सकता है ।
ववेकशील पु ष

व छ वचार और

व छ आचरण का अ यास

करके उ ह जीवन का अंग बना लेता है तथा उसके िलए
सहज हो जाता

है । वह संसार म नाना

भी िनमल रहकर इसी

कार के

मनु य का आ मा तो शु -बु
आ मा का शु

कर सकता है , जैसे शु

क तु शु

जल को शु

िमलकर अशु

इसे ह

जल उसके साथ एक
ह रहता है ,

जल म डाल द तो वह भी अशु

हो जाता है ।

चैत य व प है , क तु वह संसार के अशु

त व म

(मिलन) हो जाता है तथा अपना तेज खो दे ता है ।
को िनमल अथात ् वकार से मु

और परमा मा क एकता क

द यानुभिू त कर सकता है ।१

आ मैक व-दशन कहा जाता है, जो मानव-जीवन क

उपल ध है ।

---------------------------------------

१ जब लग मन ह वकारा, तब लिग न हं छूटे संसारा।

जब मन िनमल क र जाना, तब िनमल मा ह समाना।। (कबीर)
जो चादर सुर नर मुिन ओढ , ओ ढ कै मैली क ह चद रया।
दास कबीर जतन ते ओढ , य क

य धर द ह चद रया।। (कबीर)

मन ऐसो िनमल भयो जस गंगा को नीर।
पाछे -पाछ ह र चल कहत कबीर-कबीर।।

िनमल मन जन सो मो ह पावा, मो ह कपट छल िछ
स त

के शु

परमा मा के साथ एक व का अनुभव

मनु य अपने मन और बु
करके आ मा

सार

जल म ह डाल दे ने पर वह शु

जल को अशु

मूलत: जीवा मा शु

ह है , क तु मन और बु

जल म बरसाया हआ
शु

हो जाता है ।
शु

थत होकर भी, जल से ऊपर

स नतापूवक सुग ध और सौ दय का चतु दक्

करता रहता है ।
होने पर वह शु

लोभन के म य म

कार हँ सता-मु कराता रहता है , जैसे जल के म य

थत होकर भी, जल के म य म

रहनेवाला कमल

व छ जीवन

दय जस िनमल बार ।

न मिलनचेतिस बीज रोहः—मिलन िच

न भावा।

ान का बीज

फु टत नह ं होता।

सव च

अ याय

तीय

व ली

तीय

पुरमेकादश ारमज याव चे तस:
अनु ाय न शोचित वमु
श दाथ

:

अव चे तस:

वमु यते। । एत
अज य

परमा मा का; एकादश ारम ् पुरम ् =

=

यारह

शोचित = (मनु य) अनु ान अथात ्

िन वकार, सरल

होकर

वमु

यान आ द साधना करके शोक

हो जाता है । एत

(परमा मा) है ।
वचनामृत

:

परमा मा) का

अव चेता

यारह

का अनु ान (भगव
रहकर वमु

अज मा

ारवाला पुर (है ); अनु ाय न

(दःख
ु , भय और िच ता) नह ं करता। च = तथा;
वमु

वै तत ्।। १।।

वै तत ्

वमु :

वमु यते =

= यह ह

(िन वकार, सरल), अज

तो वह

(ज मर हत

ारवाला (मनु य-दे ह) िनवास थान है । परमा मा
ाि

यान आ द साधना) करके मनु य वमु

हो जाता है । यह ह हो वह है।

स दभ : यह अ य त
ह। " वमु

यात मं

है । इसके अनेक अथ कए गए

वमु यते" उपिनषद का सारत व है । इसे क ठ थ कर ल।

द यामृत : मनु य का दे ह परमा मा का
स पूण लघु

ा ड है । व

म दर है । यह एक

का संचालन परमा मा करता है तथा दे ह का

संचालन परमा मा का अंश जीवा मा करता है । परमा मा

को

कािशत करता है तथा जीवा मा मावन-दे ह को। जीवा मा अपने शु

म परमा मा ह
वकार से

है । परमा मा िन वकार है तथा जीवा मा अ व ा पी

त है । जीवा मा का शु

व प परमा मा ह है ।

मनु य का दे ह परमा मा का एक अ त
ु सदन है , जसम

ह।१ ववेकशील मनु य दे ह-म दर म वराजमान परमा मा क
साधना

ारा उसे

यारह
ाि

करके कृ तकृ य हो जाता है । परमा मा क

मानव-जीवन क सव च उपल ध है । पशुयोिन के

ाणी बु

ार

ाि

का वकास

------------------------------------१. मानव-दे ह के िछ

मानो इसके

, नािभ, मल- याग क इ

ार ह—दो ने , दो कण, दो नािसकािछ , एक मुख, कपाल म

य, मू - याग क इ

केशा तो ववतते (तै० उप०, १.६)। महान ् योगी
(५.१३) म नािभ और

को छोड़कर नौ

य।

से

भी एक

ार है —य ासौ

ाण- वसजन करते ह। भगव ता

ार कहे गये ह।

ेत० उप० (३.१८) म भी नौ

भागवत पुराण (११.७.२२,२३) म मानव-दे ह को भगवान ् का

य म दर कहा गया है ।

ार कहे गये ह।

छा दो य उप० (८.१.१) म मानव-दे ह को

पुर कहा गया है ।

अ च ा नव ारा दे वानां पूरयो या (अथव०, १०.२.३१)

न होने के कारण इससे वंिचत रहते ह। मूढ मनु य अपने भीतर ह
ित त

परमा मा से

फँसे रहकर प व

वमुख होकर तथा व

दे वम दर को भोगधाम एवं पापधाम बना लेते ह तथा

भय, िच ता और शोक से
मनु य अ ान से मु

त रहकर दःखी
रहते ह।

होकर तथा अपने द य

दे ह के रहते हए
ु ह , पूणमु
व प म

के भौितक आकषण म

अथात ् जीव मु

थत होकर मृ यु पर वजय

अित मण कर दे ता है । वह अभय हो
और शोक से

व प को जानकर,

हो जाता है । वह अपने

कर लेता है अथात ् मृ यु का

जाता है तथा कभी भय, िच ता

त नह ं होता। पूण ब धनमु

होना जीवन क सव े

उपल ध है ।
वा तव म आ मा शु , बु
ब धन होता है और न मो
िम याब धन का

और मु

होता। अ व ा अथवा अ ान

व ा अथवा

कर लेता है ।

मु ाव था को
मनु य

ान

ारा आरो पत


ारा छट
जाता है तथा

ान के

मनु य इस दे ह के रहते हए
ु ह मु

तो ह ह तथा उसका न

होने क

अव था (जीव मु

ारा मनु य का जीवा मा ब ता के

कर लेता है ।

ान से स ःमु

व व प न जानने के कारण ब

और

)

म से मु

हो जाती है ।

व व प जानने से मु

हो जाता है ।

मनु य अ तमुखी होकर, सम त सांसा रक

याकलाप करते

हए
ु ह , जल म कमल क भाँित रहते हए
ु , अपने भीतर सं थत परमा मा

द यानुभूित कर लेते ह।

यानयोगी

दशन करके कृताथ हो जाते ह। यह
हं सः शुिचष
नृष

दयाकाश म परम योित का

ान और

यान क म हमा है ।

वसुर त र स ोता वे दषदितिथदरु ोणसत ्।

वरस तस

योमसद जा गोजा ऋतजा अ जा ऋतं बृहत ्।। २।।

श दाथ : शुिचषत ् = वशु

परमधाम म, शुिच द ि

(शुचौ द ौ सीदित इित शुिचषत ्); हं स: =

म आसीन है ;

वयं काश पु षो म परमा मा

अथवा आ द य; अ त र सत ् वसु: = वासियता वसु, अ त र
करनेवाला दे वता वसु है । क तु वायु भी अ त र
(कुछ भा यकार ने वसु को एक दे वता के
तथा कुछ भा यकार ने वसु का अथ
अथ ठ क ह।) वे दष

को

या

म वचरण करता है ।

प म पृथक् व णत कया है

यापक वायु कर दया है । दोन

होता = य वेद पर

थत अ न तथा अ न म

आहित
दे नेवाला 'होता' ('अ नव होता' इित


ु ेः। वे ां पृिथ यां सीदित

इित वे दषत।्) - होता अ न है तथा पृ वी वेद है ।) ; दरोणसत
् अितिथ:

= घर (दरोण
= घर) म अितिथ के

प म पधारते ह; नृष

वरस

=

मनु य म ( ाण प से)

थत है तथा दे व (जो मनु य से

वराजमान, (वरसत ् = वरणीय

पदाथ

ह) म

वभूित के

प म

वराजमान); ऋतसत ् = ऋत (स य अथवा य ) म उप थत;

योमसत ्

= आकाश म या ; अ जा: = अप ् अथात ् जल म म

य, शु

आ द के

प म उ प न ; ऋतजा: = स य अथवा स कम के फल के
कट; अ जा: = पवत म नाना
ऋतम ् = महान ् स य (

कार से

कट (न दयाँ आ द); बृहत ्

) ह है ।

वचनामृत : शुिच द ि

म आसीन

वयं काश पु षो म परमा मा

(अथवा हं स) है । वह वासियता अथात ् वसु दे वता है , अ त र
य वेद

पर अ न तथा आहित
दे नेवाला होता है , घर

अितिथ है , मनु य म

है , जल म म

पृ वी पर (चतु वध भूत ाम के
कट है , पवत म नाना

म पधारनेवाला

स दभ : वभूितयाँ

य आ द के

प म उ प न है ,

प म) उ प न है , स कम के फल के
कार से (नद, न दय आ द के

कट है , वह महान ् स य (अथवा
द यामृत :

तीका मक होती ह।

सम त

वभूितय

(ग रमापूण भाव

कट होती है ।१

वयं काश पु षो म (अथवा दे द यमान आ द य के
प म वह एक पर

है । वह अ त र

(दे वता) है तथा वह अ त र

या

म वायु है । य वेद

प म पधारनेवाला भी पर

प म

एवं
कट)

रहनेवाला वसु
पर

अ न तथा अ न म आहित
दे नेवाला होता भी वह

अितिथदे व के

प म)

) है ।

पदाथ ) म एक ह परमस ा क म हमा
के

म वायु है ,

थत है तथा दे व म वराजमान है , ऋतु (स य) म

उप थत है , योम म या
प म

प म

थत प व
है । घर

ह है । वह मनु य तथा

दे व म वराजमान है । वह ऋतु (स य अथवा य ) म उप थत है । वह
योम म

या

है । वह जल म म

होता है तथा वह पृ वी पर

य, शु

आ द के

ा णय और पदाथ के नाना

होता है । वह स य अथवा स कम के फल के
पवत से जलधाराओं आ द के

प म

प म

प म उ प न
प म

कट

कट होता है । वह

कट होता है । वह महान ् स य है ,

----------------------------------------१.

गीता (अ याय १०) के वभूितयोग म इस मं

और दै वी श

य क

म व णत अिधकांश मह वपूण व तुओं

वशद चचा है । कदािचत ् वभूितयोग इसी मं

का व तार है ।

स य का भी स य है ।१ सव
ऊ व

वह एक है ।२

ाणमु नय यपानं

यग यित।

म ये वामनमासीनं व ेदेवा उपासते।। ३।।
श दाथ :
दे ता है ;

ाणम ् ऊ वम ् उ नयित =

अपानम ्

ाण को ऊपर क ओर उठा

यक् अ यित = अपान वायु को नीचे क

फकता (ढकेलता) है ; म ये = शर र

के म यभाग

थत; वामनम ् = सू म, सव े

परमा मा को;

ओर

दय म; आसीनम ् =
व ेदेवा उपासते =

( व े = सभी) सभी दे वता पूजते ह।
वचनामृत: (जो)

ाण को ऊपर क ओर उठा दे ता है , अपान वायु

को नीचे क ओर ढकेलता है , दे ह के म यभाग
आसीन है, (उस) सव े

य को वायु को वह एक स

द यामृत : दे ह म

या

जीवन का आधार और
सम त इ

य करता है ।

परमा मा क चेतना श

याँ और वायु आ द स

जीवा मा होता है ,

प से

परमा मा क सभी दे वता उपासना करते ह।

स दभ : दे ह म इ
अ ग, इ

दय म सू म

से दे ह के

य होते ह तथा संचािलत होते ह।

ोत दे ह म सं थत परमा मा का द य अंशा

जो दे ह के म य म,

य के दे व अथात ् इ

य क

दय े

म, वराजमान है ।

याँ उसी क उपासना

करती ह, उसी के अनुशासन म रहकर काय करती ह।
ाणश

एक है , क तु पृथक् -पृथक्

उसे पाँच कहा जाता है ।
मु य

ाण के वभ

वचरण करता हआ
ने

प से काय करने के कारण

ाण, अपान, समान, यान और उदान को एक ह

प कहा जाता है ।
और

ाणवायु मुख और नािसका

ारा

थत रहता है ; अपानवायु नािभ से

नीचे मल ार और मू े

य म

थत होकर मल-मू

है ; समानवायु नािभ म

थत होकर अ ना द के पाचन म सहायता करके

उनके सारत व को शर र के अ गहै ;

यानवायु का बा

भीतर

य ग म समान

प आकाश म

का वसजन करता
प से पहँु चा दे ता

वचरण करता है तथा इसका

प र -संचालन म और ना डय को संचा रत करने म सहायक

होता है ; उदानवायु म उ ण व होता है तथा यह शर र म ऊ मा को
रखता है ।३

थर

--------------------------------------------१. स य य स यम ् (बृ० उप०, २.१.२०)—
२.सव ख वदं
३.

मु य

ोपिनष

ं (छा दो य उप०, ३.१४.१)—सब कुछ

के

ह है ।

३ म इसे व तार से कहा गया है । गीता (१५.८) म कहा गया है क

ाण उदान को साथ लेकर दसरे
शर र म जाता है तथा वह समान आ द अ य वायुओं

को भी, इ
है ।

स य का भी स य, परमस य है ।

य और मन के साथ, ले जाता है । इन सबका

वामी जीवा मा भी साथ ह जाता

ाणवायु, इ

य और मन को स

चैत य द य स ा क सभी दै वी श

म सव च स ा के

य और संचािलत करनेवाली

याँ उपासना करती ह। परमा मा ह

प म सव

सं थत है ।

अ य व स
ं मान य शर र थ य दे हन:।
दे हा मु यमान य कम

प रिश यते।। एत

वै तत ्।। ४।।

श दाथ : अ य शर र थ य व स
ं मान य दे हन: = इस शर र म
थत, शर र से चले जानेवाले, जीवा मा के; दे हात ् वमु यमान य = दे ह

से चले जाने पर; अ
रहता है ? एत

कम ् प रिश यते = यहाँ इस शर र म

वै तत ् = यह ह वह है ।

वचनामृत : इस शर र म

थत, शर र से चले जानेवाले जीवा मा

के दे ह से िनकल जाने पर यहाँ इस शर र म
वह (

)

या शेष

या शेष रहता है ? यह ह

है ।

स दभ :

दे ह म जीवा मा के

प म रहता है तथा दे ह का

संचालन करता है ।
द यामृत : कसी
मृत दे ह के

ाणी क मृ यु होने पर

य के

या होता है ?

य रहने पर भी मृतक

आ द काय नह ं करते। दे ह से
ाणी िन

य एवं िन े

दाशिनक

है , जसका उ र अनेक

हो जाता है ? यह एक मह वपूण
कार से दया जाता है ।

भौितकवाद लोग कहते ह क जस
कार

कार घड़ अथवा कोई यं

ाणी का दे ह भी जजर होने पर

सहसा काय करना ब द कर दे ता है । क तु पुनः
कसने बनाया ? कसने दे ह-यं
भौितकवाद लोग कहते ह क
होता है क

या त व िनगत हो जाता है, जसके

िनगमन से

सहसा ब द हो जाता है, उसी

ाणी के ने ,

होता है क उसे

का िनमाण करके उसे स

य कया ?

कृ ित ने उसका िनमाण कया था। पुनः

कृ ित तो जड है , उसने सृजन कैसे कया ? वा तव म

अणु-परमाणुओं का संयोग करके उ ह स

य करनेवाला एक सू म

चैत य त व है , जो सवश

अथवा परमा मा कहते है ।

मान ् है , जसे

वह सम त जगत ् म ओत ोत है । वह अना द और अन त है । वह सत ् है
अथात ् उसका अ त व है ।

यह जगत ् और दे ह जड-चेतन का एक अ त
ु स म ण ह। जस

कार जगत ् का आधार, आ य और संचालन करनेवाला परमा मा है , उसी
कार दे ह का आधार, आ य और संचालन करनेवाला जीवा मा है ।
जीवा मा के दे ह से िनकल जाने पर दे ह जड एवं िन े

हो जाता है तथा

दे ह के प चत व (पृ वी, जल, अ न, वायु और आकाश) जगत ् के

प चत व म िमल जाते ह। त वत: परमा मा और जीवा मा एक ह ह।
दे ह का

वामी जीवा मा होता है , जसके मा

याँ स

सा न य से मन, बु

और

य होकर काय करते ह।

यमाचाय कहते ह क दे ह म रहनेवाले जस चैत य त व के िनकल
जाने पर दे ह मृत हो जाता है अथात ् जड एवं िन े
चैत य

व प

हो जाता है , वह तो

है ।

ाणेन नापानेन म य जीवित क न।

इतरे ण तु जीव त य म नेतावुपाि तौ।। ५।।
ह तं त इदं

व यािम गु ं

यथा च मरणं

सनातनम।्

ा य आ मा भवित गौतम।। ६।।

श दाथ : क न = कोई भी; म य: न
= मरणशील

ाणी न

ाणेन न अपानेन जीवित

ाण से, न अपान से जी वत रहता है ; तु = क तु;

य मन ् एतौ उपाि तौ

= जसम ये दोन (वा तव म पाँच

ाणवायु)

उपाि त ह; इतरे ण जीव त = अ य से ह जी वत रहते ह;
गौतम = हे गौतमवंशीय निचकेता; गु म ् सनातनम ् = (वह)

रह यमय सनातन;
मरण को

=

; च आ मा मरणम ् ा य = और जीवा मा

करक् ; यथा भवित = जैसे होता है; इदम ् ते ह त

व यािम = यह तु ह िन य ह बताऊँगा।
वचनामृत :

ाणी न

ाण से, न अपान से जी वत रहता

है , क तु जसम ये दोन (अथात ् पाँच

ाणवायु) आि त ह, उस अ य से

कोई भी

( ाणी) जी वत रहते ह। हे गौतमवंशीय निचकेता, (म) उस गु

सनातन

का और मरने का जीवा मा क जो अव था होती है , उसका

अव य कथन क ँ गा।
स दभ : यमाचाय निचकेता को दे ह म
बताकर

त व के कथन का आ ासन दे ते ह।
द यामृत :

के

प मे वभ

का आधार

मु य

ाण ह

है जनमे

विभ न काय के अनुसार पाँच वायुओ ं

ाण और अपान

ाण और अपान से ल

यान उदान ्) ह

नह

है ।

असाधारण मह व है कतु
जीवा मा होता है जस पर

थत जीवा मा क म हमा

ास

मुख है । मनु य के जीवन

त केवल पांच वायु ( ाण अपान ्
ास का जीवन धारण के िलए

ाणी के जीवन का आधार उनसे िभ न उसका
ाण अपान आ द प चवायु रहते है । सम त

यां भी जीवा मा पर ह आि त होती है । जीवा मा के होने से ह

जीवन होता है । जीवा मा के रहने से ह मन बु
काय करते है ।

और इ

यां अपने

दे ह क मृ यु का वशु
होता

चेतना अथवा आ मा पर कोई

आ मा अथवा परमा मा शा त िन य शु

यमाचाय

भाव नह

और मु

त व के कथन का आ ासन दे ते है । उतम गु

है ।

अनाव यक

आ ासन दे कर ज ासु िश य के धैय को टटने

नह दे ते।
योिनम ये

पध ते शर र वाय दे हनः।

थाणुम येऽनुसंय त यथाकम यथा त
ु म ्।।७।।

श दाथः यथाकम यथा त
ु म ् = जैसा

जसका

कसीका कम होता है जैसा

वण होता है , शर र वाय= शर र धारण के िलए, अ ये दे हनः=

अनेक जीवा मा, योिनं
अनुसय

त= अनेक

पघ ते= योिनयो को

होते है , अ ये

थाणुम ्

थाणुभाव का अनुसरण करते है ।

वचनामृतः अपने कम तथा (
अनेक जीवा मा जगम ् योिनयो को

वण कये हुए भाव) के अनुसार
होते है अनेक

थावर हो जाते है ।

स दभः मृ यु के प ात ् जीवा मा क अव था का वणन है ।
द यामृतः पर
संसार मे दो
थान पर
चेतना

सु

सम त अ त वका आधार है तथा वह सव

कार के पदाथ है अचेतन ( जड

थावर, अचर एक ह

थर) तथा चेतन ( चर जी वत जगम ्) अचेतन पदाथ मे

रहती है तथा चेतन पदाथ मे चेतना जा त होती है । वृ

थावर होते है तथा उनमे चेतना अ वकिसत अथवा
अव था मे होती है ।

कंिचत ् जा त

मृ यु के प ात मनु य का जीवा मा अपने कम अथवा

है ।

भाव के अनुसार

थावर वृ ो अथवा चेतन

ा णयो मे

वण

वेश कर

लेता है । अंत मे जैसा मित वैसा गित होता है । चैत य व प
जगत ् का एकमा

ारा

आधार है ।१

य एष सु मेषु जागित कामं कामं पु षो िनिममाणः।
तदे व शु ं त

तदे वामृतमु यते।

त म लोकाः ि ताः सव तद ु ना योित क न।। एत

वै तत ्।। ८।।

श दाथः यः एषः = जो यह कामम ् = ( जीवो के कम के अनुसार)

भोगो का िनिममाणः= िनमाण करनेवाला, पु षः= परमा मा जो परमपु ष
है , सु ेषु= ( सबके) सो जाने पर, ( लयकाल मे भी) जागित= जागता है ,
तत ् शु म ् तत ्

= वह

वशु

अथवा शुभ

योित

व प त व है वह

है , तत ् एंव अमृतम ् = वह अमृत अ वनाशी उ यते= कहा जाता है ,

त मन=् उसीमे, सव लोकाः ि ताः = सारे लोक आि त है , तत ् क न
-------------------------------------------१ भागवत पुराण ( क ध१०) मे यमलाजुन वृ ो क तथा रामायण मे अह या क जड
पाषाण से उ ार को कथा

यात है ।

उ= उसे कोई भी, न अ येित= अित मण नह करता,एत

वै तत ् = यह

तो वह है ।

वचनामृतः जो यह का य भोगो का िनमाण करनेवाला परमपु ष है
सबके सो जाने पर ( भी) जागता रहता है , वह
व प) त व है वह

वशु

( शु

योित

है वह अ वनाशी कहा जाता है । उसीमे सब

लोक आ य पाते है उसका अित मण कोई नह करता ( उससे बढकर
कोई नह है ।) यह तो वह है ( जसे निचकेता पूछ रहा है ।)
द यामृतः

परम महान ् है ।

का संचालन करनेवाली

द य सता

सदै व जा त रहता है तथा

जा त ह रहता है ।

ा णयो मे दे ह

ाणा द के

अथात ्

ा णयो के सोने पर वह
सु

हो जाने पर चैत य

त व जा त ह रहता है । वह िनरं तर जा त है ।
मनु यो के िन ा मे अचेत रहने पर भी परमा मा
मा यम से व

मे नाना

कृित के

कार के का य पदाथ का िनमाण करता रहता

है ।
परमा मा

वशु

अव थाओ का मा
बुरे कम का मा
योित
मन बु
शु

चैत य व प

वप न

सा ी रहता है जैसे

सुषि

मे

इन

काशद प मनु यो के भले और

सा ी रहता है ।

व प परमा मा सबका

और इ

और

काशक है । उसके

यो सचेतन होकर

काश से ह

याशील होते है । यह तेजोमय है

है तथा अमृत व प अथात ् अ वनाशी एंव िन य है । सम त लोक

उस सवश

मान ् परमा मा के आि त रहते है । उस सवसमथ सता का

अित मण अथवा उ लंघन कोई नह कर सकता। उससे बढकर अ य
कुछ भी नह है ।
यमाचाय निचकेता को परमा मा का

ितपादन अनेक

करते हए
ु पुनः पुनः कहते है क यह तो वह

है

कार से

जसे वह जानना

चाहता है ।

अ नयथैको भुवनं

व ो

पं

एक तथा सवभूता तरा मा
वायुयथैको भुवनं

व ो

पं

एक तथा सवभूता तरा मा
जस
उनके
उसी

श दाथः यथा भुवनम ्
कार सारे

ा ड मे

पं

पं

ित पो बभूव।

पं

पं
पं

ित पो ब ह ।। ९।।

ित पो बभूव।
पं

ित पो ब ह ।। १०।।

व ः एकः अ नः

पम ्

ित पः बभूव =

एक ह अ न (तेज) नाना

ित प अथवा अनु प (समान

पो मे

पवाला जैसा) होता है , तथा =

कार, सवभूता तरा मा= सब भूतो ( ा णयो) का अ तरामा

हा,

एकः

पम ्

पम ्

ित पः च ब हः = एक ( ह ) नाना

ित प ( समान

पवाला जैसा) है और उनके बाहर भी है ।

य़था भुवनम ्

कार सारे
(समान
सब

व ः एकः वायुः

ा ड मे

पम ्

पम ्

एक ह वायु नाना

पवाला जैसा) होता है , तथा= उसी

ा णयो का अ तरा मा

नाना

पो मे उ ह के

पो मे उ ह के

, एकः

ित पः बभूव= जस
पो मे उनके

ित प

कार , सवभूता तरा मा=

पम ्

ित पः च ब हः= एक ह

ित प (समान पवाला जैसा) है और उनके बाहर

भी है ।
वचनामृतः जस
नाना

पो मे उनके

कार सारे

ा ड मे

ित प मे उनके

ा णयो का अ तरा मा

एक ह नाना

पो मे उनके

का अ तरा मा

एक ह अ न ( तेज)

ित प होता है उसी

है तथा उनके बाहर भी होता है । जस
ह वायु नाना

पो मे उ ह के
कार सारे

ित प होता है उसी

एक ह नाना

कार सम त
ित प होता

ा ड मे

कार सम त

पो मे उ होने

एक
ा णयो

ित प होता है और

उनके बाहर भी होता है ।
स दभः मं
के

ा त से

९,१० पर पर स ब

है तथा दोनो मे अ न और वायु

यापकता तथा उसक िनिल ता कह गयी है ।

द यामृतः परमा मा अ तीय है । वह एक ह है ।१ परमा मा क

सव यापकता को तथा नाना

पो मे उसके

से कहा जाता है । अ न सू म एंव िनराकार
है कतु

जविलत होने पर साकार

कट होने को अनेक
प से सारे

प मे

ा तो

ा ड मे या

गोचर होता है तथा उसके

ताप का अनुभव होता है । एक ह अ न अपने आधारभूत व तुओं के
आकार के अनु प

पो मे

दखाई दे ता है ।२ वह एक ह

अनु प अथात ् तदाकार एंव त प

तीत होता है । इसी

ा णयो का अ तयामी एक ह परमा मा नाना
पो मे

कट होता है । परमा मा

ा णयो के अनु प नाना

ितपा दत है क परमा मा एक है ।

मे परमा मा के एक ह होने क चचा है ।
योितरे कम ् ( यजुवद, ३.४.१)।

परमा मा के सब
है ।

पं

पं

ा णयो और पदाथ मे अनु व

ित पो बभूव ( बृ० उप० २.५.१९)

बाहर

वधमान ् होकर भी अिल

िन वकार और असंग है । आकाश से वायु वायु से अ न

योितषां

कार सम त

ा णयो के भीतर भी है और सव

भी है । यह परमा मा क म हमा है । वह सव

१ अनेक उपिनषदो मे पुनः पुनः

व तुओ के

अ न से जल

ेत०उप० मे अने क मं ो

होने क तैित रय उप० इ या द मे चचा

और जल पृ वी तथा अ य पदाथ उ प न होते है । जस

अ न सव

अथात ् या

होता है उसी

कार एक ह वायु सव

कार एक ह

है और अपने आधार के अनु प

आधार के अनु प त प
ू अथवा तदाकार होकर

अथात ् या

है और अपने

कट होता है ।

अ न और वायु क भाित परमा मा सभी

अ तिन हत होकर भी उनके अनु प नाना

तीत

ा णयो और पदाथ मे

कार से

सबके भीतर भी है और बाहर भी। परमा मा सव

कट होता है । वह
ओत ोत होकर भी

िनलप िन वकार और असंग है । यह परमा मा क अिनवचनीय म हमा है ।
सूय यथा सवलोक य च न
ु िल यते चा ष
ु ब
ै ा ादोषैः।
एक तथा सवभूता तरा मा न िल यते लोकदःखे
ु न
श दाथः यथा सवलोक य च ःु सूयः = जस
का च ु सूय (

ा ः।। ११।।
कार सम त लोक

काशक सूय) चा ुषै बा दोषैः न िल यते= ( मनु यो के)

ने ो से होनेवाले

दोषो से िल

नह

होता, तथा = उसी

सवभूता तरा मा एकः लोकदखे
ु न न िल यते= सब
एक परमा मा लोक के दख
ु से िल

कार,

ा णयो का अ तरा मा

नह होता, बा ाः = वह सबसे परे

है ।

वचनामृतः जस

कार सारे लोक का

से होने वाले बा ा दोषो से िल

काशक सूय मनु यो के ने ो

नह होता उसी

कार सम त

अ तरा मा एक ( परमा मा) लोक के दखो
से िल

ा णयो का

नह होता। वह तो

सबसे परे है ।

स दभः परमा मा िनलप है ।
द यामृतः व

क अख ड चैत य सता एक पर

है । सू म िन वकार और िनलप है । जस

कार वशाल

परमा मा ह
योम म एक ह

काशक तेजीमय सूय है , जो मनु यो के ने दोष के कारण मिलन अथवा
दोषमय
िल

तीत होने पर उनके ने दोष से कसी

नह होता, उसी

भीतर स थत

योित

कार मनु यो के बु

काऱ भी

भा वत एंव

आ द के दोष होने पर भी

व प परमा मा दोषमय नह हो जाता। परमा मा

मनु यो के शुभाशुभ कम तथा उनसे उ प न सुख दख
से िल

होता।१ वशु

चैत य व प परमा मा स पूण जगत ् मे ओत

भी उससे परे अथात ् अिल

नह

ोत होकर

एंव असग रहता है ।

१ गीता मे यह भाव ५.१५ १३.३१ मे भी य
या या मे ववतवाद का पुट दे दया है ।

कया गया है । श कराचाय ने इस मं

एको वशी सवभूता तरा मा एकं

पं बहधा
यः करोित।

तमा म थं येऽनुप य त धीरा तेषां सुखं शा तं नेतरे षाम ्।। १२।।
श दाथः

यः

सवभूता तरा मा

एकः=

जो

सब

ा णयो

का

अ तरा मा ( भीतर बसनेवाला) एक ( अ तीय) परमा मा, वशी= सबको
िनय

त करनेवाला, एकम ्

पम ् बहधा
करोित = एक

प को बहत

कार से कर लेता है ( बना लेता है ), तम ् आ म थम ् = उस अपने भीतर

सं थत को, ये धीराः अनुप य त= जो

ानी पु ष िनंरतर दे खते है ,

तेषाम ् शा तम ् सुखम ् = उनका शा त सुख( होता है ), इतेरषाम ् न=
अ य का नह ।

वचनामृतः जो सब

ा णयो का अ तरा मा एक ( अ तीय)

परमा मा सबको वश मे रखनेवाला एक ( ह )

प को बहत

बना लेता है उसे अपने भीतर सं थत ( परमा मा) को
िनरं तर दे खते है उनको अख ड सुख
स दभः यह मं

कार से
ानी पु ष

होता है दसरो
को नह ।

अ य त मह वपूण है । मं

९,१०,११,१२,१३ क एक


ं ला है जनमे एक ( अ तीय) परमा मा का वणन है । इन मं ो मे
परमा मा को सवभूता तरा मा कहा गया है । यह मं
के मं

े ता तर उपिनष

६.१२ के समान है ।

द यामृतः परमा मा स चदान व प है । वह सत ् (सदा रहनेवाली)
कालाबािधत

सता)

है

िचत

(चैत य व प)

है

और

आन द

(आन द व प) है । वह स पूण जगत ् का आ य है । परमा मा जीवन का
ोत है तथा जीवन का आधार है । वह अ तीय है तथा सबको िनयं ित

करता है । वह एक ह अपने को अनेक
परमा मा मनु य के भीतर
और पाने के िलए कह अ य
होकर

ान और

पो मे

दयाकाश मे ह स थत है तथा उसे खोजने

नह जाना है ।२ ववेकशील पु ष अ तमुखी

यान से अपने भीतर ह उसे दे खते है अथात ् उसका

सा ात ् अनुभव करते है । जो आ मदश

ानी पु ष अपने भीतर िनर तर

उससे आ त रक संबध बनाए रखते है उससे
िनरं तर िनभयता िन
वपर त

जो

फूत होकर कम करते है वे

तता सुर ा शांित और सुख

ब दु उपिनष

१२) एक ह च

मा जल मे बहत

२ क तूर कु डल बसै मृग ढू ँ ढे बन मा ह,

ऐसे घट घट राम है दिनया
दे खै ना ह।। ( कबीर)

घट ह खोजहु भाई।

करते है । इसके

मूढ जन अपने भीतर सं थत परमा मा से वमुख रहते है

१ एक एव ह भूता मा भूते भूते यव थतः। एकधा बहधा
चैव

(

कट कर दे ता है ।१ वह

कार का

यते जलच

वत ्।

तीत होता है ।

वे सदा भय िचतां आश का अशांित और दख
ु से

त रहते है । आ मदे व

का दशन करनेवाले िन य सुखी रहते है ।

िन यो िन यानां चे तन ेतननामेको बहनां
यो वदधाित कामान ्।

तमाम म थं येऽ नुप य त धीरा तेषां शा तः शा ती नेतरे षाम ्।।१३।।
श दाथः यः िन यानाम ् िन यः चेतनाम ् चेतनः =जो िन यो का भी

िन य चेतनो का भी चेतन है, एक बहनाम
् कामान ् वदधाित= एक ह

सबक

कामनाओ के पूण करता है अथवा जीवो के कमफलभागो का

वधान करता है , तम ् आ म थम ् = उस आ म थत को, ये धीराः

अनुप य त= जो

ानी िनरं तर दे खते है , तेषाम ् शा ती शा तः इतरे षाम ्

न= उनको अख ड शांित ( िमलती है ) दसरो
को नह ।

वचनामृतः जो िन यो का भी िन य चेतनो का भी चेतन है जो एक

ह जीवो के कमफलभोगो का वधान करता है , ( अथवा अन त कामनाओ
को पूण करता है ।) उस आ म थत परमा मा को जो
ह िनरं तर दे खते है उ ह को अख ड शाित
स दभः यह एक अ य
सौ दय है तथा

ान एंव भ

लेना चा हए। इसका पूवा

िस

मं

ानी अपने भीतर

होती है दसरो
को नह ।

है । इसमे उ चको ट का का य

का सुद
ं र सम वय है । इस क ठ थ कर
े त० उप० ६.१३ तथा उतरा

६.१२ मे इसी

कार है ।
द यामृतः ध य है वे

ववेक

पु ष जो संसार के भोगो क

णभंगरु ता और सारह नता को दे खकर अ तमुखी हो जाते है तथा अपने
भीतर

थत द य आ मदे व का सा ात ् अनुभव करके कृ तकृ य हो जाते

है । संसार के भोगो से आ य तक तृि

नह होती तथा उनके

लोभन मे

फँसकर नु य अपनी शांित और श

खो बैठता है । ब हजगत ् के सुख

मृग ृ णा क भाितं मनु य को भटकाते ह रहते है तथा मनु य अंत मे
थककर और िनराश होकर पछताता ह रह जाता है । सता और धन के
लोभन से
स पथ को

त हो जाता है । सता और धन के

लोभन से

त मनु य

यागकर कुकुम करने लगता है तथा भय़ िचतां और

त हो जाता है । यह भौितक पदाथ मे सुख और शांित दे ने क
नह

नह

होती। यह एक


ु स य है

अख ड आन द सदै व अपने भीतर से ह
का

ोत परमा मा अपने भीतर ह

लेश से
मता

क आ य तक सुख अथवा

होता है । अख ड आन द

थत है ।

परमा मा िन य का भी िन य अथात ् परमिन य और चेतन का

भी िचंतन अथात ् परमचेतन है । वह मनु य के कमफल का वधान करता
है । सवश

मान ् परमा मा ह कामना पूित करने मे समथ है । वा तव मे

परमा मा क

ाि

होने पर संसार क कोई कामना शेष नह ं रहती तथा

मनु य आ मतृ
मे

थत बु

हो जाता है । ववेकशील पु ष अपने भीतर ह ( दय े
के भीतर ह ) उस द य सता का सा ा कार करते ह और

अखम ड शांित
द य सता से

कर लेते ह। वे अपने भीतर वराजमान परमा मा क

फूत (अ य

े रत) होकर कत यकम करते ह। कतुं जो

अ ानी आ मदे व से वमुख होकर जग
िचंता
आन द

लेश और दख
से

ाि

पचं मे ह फंसे रहते ह, वे भय

त रहते ह। िन य ह

आ मदश

पु ष

कर लेता है ।

तदे त दित म य तेऽिनद यं परमं सुखम ्।

कथंत ु त जानीयां कम ् भाित वभाित वा।।१४।।

श दाथः तत ् अिनद यम ् परमम ् सुखम ् एतत ् इित म य ते = वह

अिनवचनीय परमसुख यह है ऐसा (
वजानीयम ् = उसे कैसे भली
=

ानीजन) मानते है , तत ् कथम ् तु

कार जानू,ं कमु =

या, भाित वा वभाित

कािशत होता है या अनुभत
ू होता है ।
वचनामृतः निचकेता ने मन मे कहा- यह अिनवचनीय सुख यह है

ऐसा (
वतः

ानीजन) मानते है । उसे कैसे भली
कािशत होता है

उसका अनुभव

या वह अ य के

कार जानू?

ारा

या (त व)

कािशत होता है ? (अथवा

या होता है ?)

स दभः निचकेता क अिनवचनीय शांित के वषय मे ज ासा शेष
है ।
द यामृतः

निचकेता

ने

ानीजन

ारा

परमशाित

का

वणन

यानपूवक सुना, कतुं उसके मन मे यह ज ासा शेष रह गई क वह
वयं उसे कैसे जान ले।

या त व

कािशत होता है तथा उसका अनुभव

कैसा होता है ? परमा मा का सा ा कार कैसा होता है ? वह परमत व यह
है , इसे

कस

कािशत होता है अथवा
त य

या है ?१

कार जाना जाए? अिनद य
कसी अ य के

काश से

या वह

वतः

कािशत होता है ?

या है ? उसका अनुभव कैसा होता है ? निचकेता कुछ अिधक

प ीकरण चाहता है । अनुभाित
न त

सूय भाित न च

या है वभाित

या है ?

तारकं नेमा वधुतो भा त कुतोऽयम नः।

तमेव भा तमनुभाित सव त य भासा सविमदं वभाित।।१५।।
श दाथः त
होता है

न च

न सूयः भाित न च

मा और

१ गीता ( १२.३) अ र

तारकम ् = वहां न सूय

कािशत

तारो का समूह, न इमाः वधुतो भा त= न ये

अिनद य अ य

है ।

वधुत ् ह

कािशत होती है ( न ये बजिलयां चमकती है ), अयम ् अ नः

कुतः = ( लौ कक) अ न कहां ( यह

जविलत होनेवाला अ न कहा है

कैसे चमक सकता है ?) तम भान म ् एव सवम ् अनुभाित = (अनु= पीछे
बाद मे) उसके

कािशत होने पर ह ( उससे

कािशत होता है । ( ये सब
वभाित= उसीके
है ।

कािशत होते है ),त य भासा इदम ् सवम ्

काश से यह सब ( स पूण जगत ्) भी

वचनामृतः वहां न सूय
न ये वधुत ( बजिलयां)
? उसके

कािशत होता है न च

कािशत होता

मा और तारागण

कािशत होती है अ न (तो वहां) कैसे चमकेगा

कािशत होने के बाद ह सब

ह यह सब कुछ

काश लेकर बाद मे) सब

कािशत होता है उसके

कािशत होता है ।

स दभः यह मं

अ य तं मह पूण और

िस

है । इसे अव य

क ठ थ कर लेना चा हए। मु डक उप० ( २.२..१०) तथा
(६.१४) यह पूववत मं

१४ के ‘भांित’ और ‘ वभाित’ क

द यामृतः पर
एवं द य

परमा मा

काश है । परमा मा

अपे ा सूय च

काश से

या या है ।

काश व प है । परमा मा एक सू म
वंय काश है । परमा मा के

तारागण और वधुत का

काश क अपे ा पृ वी पर

ेत० उप०

काश तु छ

काश क

है । उस द य

जविलत होनेवाला यह अ न तो और भी

अिधक तु छ है ।
सू म

द यलोक मे सूय, च

काश का अिस

व ह नह है । आ मा क

तथा सूय आ द क
आ द उसके
जगत ्

, तारागण,

वधुत और अ न के

योित चेतन एंव द य है

योित भौितक होने के कारण जड है । सूय च

काश से ह दे द यमान होते है । उसके

कािशत है अथात ् उसके

भाव से ह

काश से ह यह जड
अ त वान ् है तथा

संचािलत होता है । (यह ‘अनुभाित’ और ‘ वभाित’ का अथ है ।) परमा मा
योितयो क भी

योित अथवा सम त

काश का मूल है ।

परमाणुओ के भीतर और उनके मूल मे ऊजा है तथा ऊजा के
भीतर

और

उसके

मूल

मे

परमा मा को

चैत य व प है । जड पदाथ मे चेनताश
वन पित मे अ प जा त है और चेतन

सु

िचतश

है ।

परमा मा

है तथा वह वृ ो आ द

ा णयो मे

वशेष जा त है ।

चेतना ह सब कुछ है । चैत य व प परमा मा ह जगत ् का आ य है ।
यह सब कुछ उसीमे उ प न होता है उसीसे संचािलत होता है तथा उसीमे
वलीन होता है ।

यानयोग
परमा मा क
मे सं थत

द य

यानयोगी

योित का सा ा कार अपने भीतर करते ह।१ आ मा

आ द के जड

य है तथा

अनुभिू त होती है ।
वरा

है ।

काश द य है ।

सूय च
वह अिच

ानयोग का पूरक है उससे संब

काश से उसे नह समझा जा सकता है ।

यान क उ चाव था मे उस अधूम

द य च ु से ह सा ा कार होता है ।

द य चेतना मे सं थत

योित को

यानयोगी का अंहकार द य हो

जाता है तथा उसक अनुभिू त होती है अहं
ा म एक अनुभूित है मा

ा म (मै

हँू )। अहं

श द कहकर ऐसा मान लेना हा या पद है ।

ध य है वे महापु ष जो अपने भीतर सू म आन दलोक मे रहते है और
द य

योित का दशन करते है ।

यानाव थततदगतेन मनसा प य त यं योिगनः।

योगी

यान मे उसका दशन करते है ।

२ गीता ( ११.१२) मे उस दिनर
य महा काश क चचा है ।

योित रवाधूमकः ( कठ उप० २.१.१३)

४ द यं ददािम ते च ःु ( गीता, ११.८)।

तीय अ याय
तृतीय व ली
ऊ वमूलोऽवा शाखः एषोऽ
तदे व शु ं त

थः सनातनः।

तदे वामृतमु यते।

त मँ लोकाः ि ताः सव तद ु ना येित क न।। एत

वै तत ्।। १।।

श दाथः ऊ वमूलः= ऊ वः ( ऊपर) मूलवाला, अवाकशाखः= नीचे
क ओर शाखावाला, एषः सनातनः अ
का वृ ), तत ् एंव शु म ् = वह ह

थः= यह सनातन अ

वशु

त व है । तत ्

थ (पीपल

= वह

है ,

तत ् एव अमृतम ् उ यते = वह ह अमृत कहलाता है , सव लोकाः त मन
ि ताः = सब लोक उसके आि त है , क न उ तत ् न अ येित= कोई भी
उसका उ लघंन नह कर सकता। एत

वै तत ् = यह तो वह है ।

वचनामृतः ऊपर क ओर मूलवाला और नीचे क ओर शाखावाला
यह सनातन अ

थ वृ

है । वह वशु

तेजोमय त व है वह

है । वह

अमृत कहा जाता है । सम त लोक उसमे आ य लेते है । ( ित त है )।
कोई उसका उ लंघन नह कर सकता है । यह वह है ( जसे तुम खोज रहे
हो)।
स दभः यह एक
श कराचाय ने इसक

यात मं

है । इसके अनेक अथ कये गये है ।

या या अ य त व तार से क है ।

द यामृतः यह संसार एक अ

थ वृ

के स श है

कतुं इसका

मूल ऊपर क ओर तथा शाखाये नीचे क ओर है । यह सनातन है अथात ्
अना दकाल से चला आ रहा है

कतुं िन य (शा त) नह

प रवतनशील है । यह अ यय और अप र छ न
ऐसा नह

है । यह जड अथात ् नाशवान ् ह

संचािलत एंव गितशील होता है । अ
आ या मक या या क जाती है ।

का अथ है आनेवाला कल। अ

थ क

तीत होते है हए
ु भी

है । यह चैत य त व से

थ वृ

यु पित है

है । यह

के

पक से संसार

अथात ् कल ऐसा ह

थत न

रहनेवाला है , िनरं तर प रवतनशील तथा गितशील है । संसरतीित संसार ग छतीित जगत ्।
गीता मे भी संसारवृ

का वणन ( १५.१,२,३,४) कया गया है ।

छा दो य उप० (६.१२.१, २,३) स
बीज से महावृ

ऋ वे द म भी वृ
सा रत होती है ।

होता है ।

से यह सम त व

क चचा है , जसक

ेत० उप० (६.६) म संसार-वृ

उ प न हआ
ु , जैसे

य ोध (बट)

करण क जड़ ऊपर ह तथा करण नीचे क ओर

क चचा है ।

है ।१

संसार को वृ

कहने का आशय यह है क इसका छे दन हो सकता

ानी पु ष वैरा य से इसका उ छे द कर लेते ह।
संसारवृ

म मूल अिधक मह वपूण है ,

परमा मा ह

यो क इसके मूल मे

होती है ।२ मूल के ऊ व होने

थत है , जससे इसक उ प

का भाव यह भी है क वह महान एवं पू य है । मूल का
अथवा परमा मा का

ान होने पर इसके रह य का

ान होने पर

ान हो जता है ।

परमा मा कारण है तथा संसार का काय िछपा हआ
रहता है । सा वक

गुण (स व) के वकास से मनु य ऊ वता क ओर
राजस और तामस गुण (रज, तम) क वृ

वृ

होता है तथा

होने से मनु य अध: (नीचे

क ओर) िगरने लगता है । भौितक वासनाएं मनु य को पतनो मुख कर
दे ती है ।
जस
उसी

कार वृ

म शाखाएं, पण, फल आ द उसका व तार करते है ,

कार लोक, नाना पदाथ और

वा तव म

ह स पूण

ओत ोत है ।
पर


वशु

ाणी संसार का

व तार करते ह।

ा ड का मूल अथात ् कारण है और इसम

ा ड म य

है ।

योित: व प है और उसे अमृत अथात अ वनाशी

एवं आन द व प कहा जाता है । स पूण लोक उसके आि त ह। उस
सवश

मान

का कोई अित मण नह ं कर सकता। यह तो वह है ,

जसे निचकेता जानना चाहता है ।
य ददं कं च जग सव

ाण एजित िन: सृतम ्।

मह यं व मु तं य एत दरमृ
ु ता ते भव त।।२।।

श दाथ : िन: सृतम ्= िनकला हआ
; इदम ् यत ् कं
ु , उ प न हआ

च = यह जो कुछ भी ; सवम ् जगत ् =सारा जगत ् है ;

ाणे एजित=

ाण म चे ा करता है ; एतत ् उ तम ् ब म महत ् भयय ् ये वद:ु = इस

उठे हए
ु व

(के समान) भय प (श

शाली) को जो जानते ह ; ते

अमृता: भव त = वे अमृत हो जाते ह।
वचनामृत : (परमा मा से) िनकला हआ
यह जो कुद भी स पण

जगत ् है ,

ाण( ाण प परमे र) म

इस उठे हए
ु व

चे ा करता है (गितशील होता है )

के समान महान ् भय प परमे र को जानते ह वे अमृत

हो जाते ह।

स दभ :परमा मा सम त गित का कारण है ।
य एत

वदरमृ
ु ता ते भव त (कठोप० , २.३.९ तथा

३.१ और ३.१०) मे भी है ।
१. वृ

नात ् – व छे द होने से वृ

कहलाता है ।

२. व णो: परमं पदम ्-इसका मूल व णु का परमपद है ।

ेत० उप० ,

द यामृत : यह जगत पर

परमा मा से उ प न होता है ।

परमा मा इस जगत ् का िनिम कारण तथा उपादानकारण है ।१ परमा मा
स पूण जगत ् म

या

एवं ओत ोत है । जगत ् क गितशीलता (एजन

अथात क पन गमन चे ा) का आधार परमा मा ह है । जगत
से

ादभू
ु त होकर गितशील होता है । परमा मा क

ाण व प

ाणश

उसम

छ न तथ उससे अिभ न है ।

परमा मा के भय अथात कठोर अनुशासन से जगतच
जैसे

कसी शासक के ऊपर उठाये हए
ु व

कमरत होते ह। परमा मा क

(श ) को दे खकर अनुचर

छ न मायाश

कठोर वधान है , जसे मनु य अपनी अ पबु
जसके

चलात है ,

अथवा

कृित का एक

से नह ं जान पाता तथा

ारा मनु य को उनके कमानुसार सुख और द:ु ख अथवा पुर कार

और द ड

होते ह। परमा मा क

अित मण नह ं हो सकता।२

जो परमे र के तेज और
ानयोग

यव था के िनयम

ताप को भली

का

कार समझ लेते है वे

ारा अमृत अथात सम त भय से मु

तथा आन दमय हो

जाते है ।
भयाद या न तपित भयात ् तपित सूय:।
भया द

वायु

मृ युधावित प चम:।।३।।

श दाथ : अ य भयात ् अ न: तपित =इसके भय से अ न तपता

है ; भयात ् सूय तपित = भय से सूय तपता है ; च भयात ् इ
=और भय से इ

, वायु ;

: वायु:

च प चम: मृ यु: धावित = और पाँचवाँ

मृ युदेवता दौड़ता है अथात काय म

वृ

होता है ।

वचनामृत : इसके भय से अ न तपता है, इसके भय से सूय
तपता है , इसके भय से इ

, वायु और पाँचवाँ मृ युदेवता काय म

वृ

होते ह।
स दभ : परमा मा के तेज का वणन है । इस मं
मं

तै० उप० (२.८) म भी है ।
द यामृत : व

परमा मा ह इस व
साम य से इस

परम स ा एक पर

से िमलता हआ

परमा मा ह

है ।

का धारण, पोषण एवं संचालन करता है । उसके

यव था

होती है । उसके

ताप से अ न म

१. कु भ के िनमाण म कु भकार िनिम कारण तथा िमटट उपादानकारण होती है । परमे र
(मायास हत
वशु

२. कम

चैत य

) इस जगत का िनिम कारण तथा उपादानकारण दोनो ह है । मायार हत ,
कोई रचना नह ं करता।

धान व व क र राखा, जो जस करई सो तस फल जाखा।

दाहकता है तथा सूय म तेज है । इ

य के

विभ न

तीक ह।

मृ यु जो वकराल
के

, वायु, आ द दे व उसक ह

िलए मानो

परमा मा

तीत होती है और

ा णय का

ाण हरण करने

याध क भांित भागकर उनको कविलत कर दे ती है ,

के कठोर

वधान के कारण ह

परमा मा को ह एक वभूित है , मानो
ववेकशील पु ष मृ यु के

वृ

होती है । मृ यु भी

परमा मा का एक

प है ।१ जो

व प को जानकर उसके भय से भयभीत नह ं

होते तथा उसम परमा मा का दशन करते ह , उनके िलए मृ यु एक
महो सव हो जाती है । मृ यु एक ववेक द गु
है , आ मा तो अ वनाशी है । जो

है ।शर र का वनाश होता

वयं को चैत य व प आ मा मानता है ,

उसे मृ यु का भय और शोक नह ं होते। जोएका र
करते हए

(ॐ) का

ाण वसजन करता है , वह परमगित को

अ ानी मृ यु से मृ यु को

मरण

कर लेत ा है ।२

करता रहता है ।३ जड दे ह क मृ यु होने

पर चैत य आ मा शेष रह जाता है , जो अ वनाशी है ।४ आ म ानी मृ यु
के भय का अित मण कर दे ता है तथा सम त भय से मु

होकर अभय

हो जाता है ।
इह चेदशक

बो ं ु

ाक् शर र य

व स:।

तत: सगषु लोकेषु शर र वाय क पते।। ४।।
श दाथ : चेत ्= य द ; शर य

व स:

ाक् = शर र के पतन

( वनाश) से पूव ; इह = यहां इस शर र म ह ; बो म
ु ् अशकत ् = जानने
मे समथ हो सका ;

तत: सगषु लोकेषु = अ यथा सग (क प ) म

लोको म ; शर र वाय क पते = शर रभाव को

करने म ; शर र-

धारण करने म ववश होता है ।


वचनामृत : य द दे ह छटने
से पूव, इस दे ह म ह आ मसा ा कार

होने म समथ हो सका (तो ठ क है , सौभा य है ), अ यथा क प तक
लोक म शर रभाव को

करता रहे गा।

स दभ : इस दे ह के रहते हए
ु ह

आ मसा ा कार कर लेना

चा हए। ‘सग’ के अनेक अथ कये गये ह।

द यामृत : मानव-जीवन क सव च उपल ध यह है क मनु य

जीवनकाल म ह , दे ह के छटने
से पूव, व
१.

मृ यु: सवहर ाहम ् (गीता, १०.३४)

२.

गीता (८.१३)

४.

कठोपिनष

३.

कठोपिनष

(२.१.२, १०,११)

(२.२.४)

क परम स ा का सा ा कार

कर ले तथा अपने भीतर सं थत िच मय आ मा और परमा मा क
एकता क अनुभिू त कर ले। अनेक ऋ षय ने अनेक
क कृ ताथता कहा है । कोई

ाणी अ य योिन म द यता का ऐसा अनुभव

नह ं कर सकता क तु वकासजीवन म अमृत व क

ाि

कार से इसे जीवन

या के िशखर पर

थत मनु य इसी

कर सकता है । य द मनु य-योिन

वह मु ा मा होने के परम लाभ से वंिचत रह जाता है
है ।१

द यानुभिू त होना जीवन क

परमा मा क
वे ा

ाि
को

करके

तो महान ् वन

साथकता है । य द मनु य

नह ं करता तो वह शर रभाव म भटकता ह रहता है ।
कर लेता है ।२

यथाऽऽदश तथाऽऽ मिन यथा

व ने तथा पतृलोके।

यथा सु पर व द शे तथा ग धवलोके छायातपयो रव

लोके।।५।।

श दाथ : यथा आदश तथा आ मिन = जैसे दपण म, वैसे
अ त:करण म ; यथा

व ने तथा

पतृलोके = जैसे

व न म , वैसे

पतृल ोक म ; यथा अ सु तथा ग धवलोके = जैसे जल म, वैसे
ग धवलोक म ;
इव =

प रद शे इव = द खता-सा है ;

लोके छायातपय :

लोक म छाया और आतप(धूप) क भांित।
वचनामृत : जैसे दपण म ( ित व ब द खता है ), जैसे शु

करण म

(दशन होता है ), जैसे

अ त:

व न म, वैसे पतृलोक म , जैसे

जल म, वैसे ग धवलोक म (परमा मा) द खता-सा है ।

लोक म दाया

और धूप क भांित (पृथक-पृथक द खते ह।)
स दभ :

थानभेद होने पर भी परमा मा के अनुभव

म एक

तारत य है ।
कठोपिनष , म

१.३ म छाया-आतप क चचा है ।

द यामृत : परमा मा का दशन मानव-दे ह के भीतर ह
िनता त संभव है । जस
उसी

कार दपण म

ित ब ब

होना

द ख जाता है ,

कार मनु य के िनमल अ त:करण म भी परमा मा का दशन

संभव हो जाता है । मनु य का अ त:करण काम,

ोध, लोभ, मद, मोह, राग,

े ष, भय, िच ता, आ द वकार से आ छा दत होने पर वह परमा मा का
दशन

अथात

उसका

अनुभव

नह ं

कर

सकता।

शु

और

िनमल

अ त:करण परमा मा का सा ा कार करने म समथ होता है ।
१. केन उपिनष

(२.५) म कहा है क य द मनु य शर र के रहते हए
ु पर

को जान लेता

है तो ध य है , अ यथा महान ् वनाश है । बृह० उप० , ८.१० तथा ४.४.१४ म भी यह कहा
गया है ।
२.

वेद

ैव भवित (मु डक उप० , ३.२.९)-

वदा नोित परम ् (तै० उप० , २.१.१)

को जानकर

हो जाता है ।

जस
क पत

कार

होता है । जस

पतृलोक म

ित ब ब

का दशन अ प

लोक है, जसम आ मा और
जाते ह। वृ

का अ यव थत एवं अ प

कार मिलन एवं चंचल जल म

कार ग धवलोक म

छाया और

कार
दशन

नह ं होता,

होता है ।

लोक

काश क भांित


दख

क छाया अ धकार नह ं होती तथा अ प काश होती है ।

आ मा और

के एक होने पर अलप और पूण का भेद नह ं रहता।

मनु य का दे ह भी एक लोक है तथा इसके भीतर
अनेक

कार के

य दखाई दे ते है , जनम कोई सामंज य नह ं होता, उसी

सकाम कम से
उसी

व न म कामनाओं के अनुसार अनेक

तर ह मानो अनेक लोक ह। मनु य का िच

सा ा कार के
भी एक संसार है ,

जसम मनु य ज म,मरण, पुनज म, लोक-लोका तर का तथा ब धन और
मो

का अनुभव करता है ।१ मनु य अपने भीतर ह चेतना क अनेक

परत म अथवा चेतना के विभ न
करता है तथा अ त म

तर पर

के साथ तादा

क आंिशक अनुभूित

य (त पता
ु , एका मता, एकता)

होने पर दोन का अभेद हो जाता है । वह ‘अहं

ा म’ (म

अिनवचनीय अव था अथवा पूण व क अव था है ।

हंू ) क

लोक है ।

याणां पृथ भावमुदया तमयौ च यत ्।

पृथगु प मानानां म वा धीरो न शोचित।।६।।
हई
ु इ

श दाथ : पृथक् उ प मानानाम ् इ

याणां = पृथक उ प न

य का ;यत ् पृथक् भावम ् = जो पृथक भाव ( व प स ा है ); च

उदया तमयौ (भावम ् )= और (उनका जो) उदय तथा अ त (लय) हो
जाना ( वभाव है ) ; म वा=( उसे)जानकर ; धीर: न शोचित =धीर पु ष
शोक नह ं करता।
वचनामृत: पृथक् -पृथक् भूत से उ प न इ

भाव (पृथक्

य के जो

विभ न

व प )ह तथा उनका जो उदय और अ त होना है , उसे

जानकर बु मान पु ष शोक नह करता।
स दभ : इ
द यामृत :

यां नाशवान ् ह।

ा णय क इ

तथा उनके पृथक् -पृथक्

यां विभ न भूत से उ प न होती ह

योजन होते ह। इ

यां अपने-अपने कारण से

उ प न होती ह तथा वे आ मा से पृथक् होती ह। उनका उदय होता है

तथा अ त होता है क तु चेतन आ मा सदै व एकरस एवं अप रवतनशील
है । बु मान पु ष इ

य को आ मा से पृथक् तथा नाशवान ् जानकर

उनके संबंध म शोकाकुल नह ं होते।
१. िच मेव ह संसार: त

य ेन शोधयेत ् (मै ेयी उपिनष )

सां य-दशन के अनुसार मूल
त व

ह। पु ष तथा

त व सृ

कृ ित अ य

कृ ित और तेईस त व िमलकर कुल प चीस

क रचना के कारण ह।

कृ ित से महत ् त व, महत ् (बु )

त व से अहं कार तथा अहं कार से मन, पांच
(पांच त मा ा) उ प न होते ह।१
ाण (नािसका) पांच
(मल याग
कम

ाने
य)

ाने

यां और पांच सू मभूत

(कान) , वक् च ,ु रसना और

यां ह तथा वाक् (वाणी) पा ण पाद पायु

और

उप थ

(मू

याग

य)

पांच

यां ह। पांच सू मभूत श द, पश, प, रस, ग ध ह तथा आकाश ,

वायु, तेज (अ न), जल और पृ वी पांच
के पृथक् -पृथक् वषय ह , जैसे
पृथक्

है तथा उसके तेईस

योजन ह, जैसे

का

थूलभूत (महाभूत) ह

योजन सुनना है ।

मानो उनका उदय है । मनु य क
यां िन

य स

य रहते ह। यह

व नाव था म मन स

य रहती ह, य प

व न म इ

य रहता है

य क स

तीत होती है । मनु य क सुषु ाव था म मन तथा इ
रहते है । यह मानो उनका अ त होना है । धीर अथात
दे ह,मन और इ

यां िन

बु मान पु ष

व प से पृथक् जानकर शोक, भय और

त नह ं होता।२

ान तथा

क अ त ेतना मन और बु

यता

य को िन य चेत न आ मा से पृथक् जानकर तथा

उनके कायकलाप को अपने
िच ता से

का वषय श द है तथा उनके पृथक् -

मनु य क जा त ्-अव था म मन तथा इ

तथा इ

यान क उ चाव था म मनु य

से भी परे जाकर मा

सा ी हो जाती है ।

ये य: परं मनो मनस: स वमु मम।्

स वादिध महाना मा महतोऽ य मु मम।।७।।

अवय ा ु पर: पु षो यापकोऽिल
यं

एव च।

ा वा मु यते ज तुरमृत वं च ग छित।।८।।

श दाथ : इ

ये य: मन: परम ् =इ

य से मन

सू म (है ) ;मनस: स वम ् उ मम ् = मन से बु
महान ् आ माअिध = बु
अथवा

ऊंचा और

उ म है ;

से महान, आ मा (महत ् त व, सम

स वात ्
बु

हर यगभ) ऊंचा है ; महत: अ य म ् उ मम ् = महान ् आ मा

(महत ् त व, सम
१.ऐतरे य उपिनष
है ।

बु

अथवा हर यगभ) से अ य

(१.१.४, १.२.४,) म इ

य क उ प

२.तरित शोकमा म वत ् (छा० उप० , ७.१.३)
उपिनषद तथा भगव ता
पर तथा अनेक

का वणन

म शोक, भय, िच ता आ द से मु

कार से कया गया है ।

( कृ ित) उ म है ।

कारा तर से कया गया

होने का उपदे श अनेक

थान

तु अ य ात ् यापक: च अिल

अ य

से (भी)

: एव पु ष: पर: = पर तु (तथा)

यापक और अिल

(आकारर हत )पु ष

ा वा ज तु: मु यमे = जसे जानकर जीवा मा मु
अमृत वम ् ग छित= और अमृत व प को
वचनामृत : इ
है , बु

य से मन

से महान ् आ मा (सम
पु ष

है और अमृत व प को

ोक ३.४२ मं

हो जाता है ; च

हो जाता है ।

बु , महत ् त व, अथवा

उ म

हर यगभ)

उ म है । पर तु अ य

से भी

है , जसे जानकर जीवा मा मु

हो जाता

हो जाता है ।

स दभ : सू मता के आधार पर
का

(है ) ;यम ्

अथवा सू म है , मन से बु

उ म है , महान ् (महत ् त व)से अ य
यापक और आिल

े ता का

७ के समान है । इन मं

म व णत है

गीता

के अनेक अथ कये गये

ह।
द यामृत :मनु य क इ
अिधक

ह। इ

अिधक
है ,

थूल शर र क अपे ा सू म तथा

यां मन के वशीभूत एवं अधीन रहती ह, अत: मन

य क अपे ा अिधक सू म और बलवान है । जब मन म ऊहापोह

होता है ,बु
है ।

यां

िनणय करती
बु

( य

है । बु

मन से अिधक सू म

क बु ) क अपे ा सम

बु

होती है । महत ् त व क अपे ा अ य

यो क महत ् त व काय है तथा अवय

चैत य पु ष अ य
त व है ।१ पु ष

आकार नह ं होता। चैत य पु ष ह
जीवा मा िनब ध अथवा मु

और ऊंची

(महत ् त व)

( कृ ित)अिधक

उसका कारण है । पर तु

कृ ित को संचािलत करता है और

यापक होता है तथा उसका

कोई िलं

एवं सनातन

. (िच ह) अथवा

है । उसे जानने पर मनु य का

हो जाता है । मनु य अपने चैत य

अमृत व प को जानकर ध य हो जाता है ।

को जानकर धीर पु ष

ह हो जाता है ।
न सं शे ित ित

प य न च ष
ु ा प यित क नैनम ्।

दा मनीषा मनसािभ लृ ो य एत
श दाथ : अ य

वदरमृ
ु ता ते भव त।।९।।

पम ् सं शे न ित ित = इसका

नह ं

ठहरता; क न एनं च ष
ु ा न प यित = कोई इसे च ु से नह ं दे ख पाता;
मनसा अिभ लृ :

दा मनीषा (

(िनमल) दय से, ( वशु

)बु

यते)= मन से िच तन म लाया हआ

से दे खा जाता है ; ये एत

अमृता: भव त = जो इसे जानते ह , वे अमृत व प हो जाते है ।
वचनामृत : इसका

दे ख पाता। इसे मन (मनन) के
१. गीता (८.२०) म इसक चचा है ।

नह ं ठहरता। कोई इसे ने

ारा गृह त होने पर, (िनमल)

वद:ु ते
से नह ं

दय

ारा

( वशु ) बु

से (अथात

दय म

थत बु

के भीतर) दे खा जाता है ।

जो इसे जानते ह वे अमृत व प हो जाते ह।
स दभ : मं
पूवा

९ से १५ तक सभी मं

ेत० उप० , ४.२० तथा उ रा

पर पर जुड़े ह। मं

४.१७ म इसी

कार है ।

द यामृत :परमा मा सू माितसू म है तथा उसका
है । मनु य क

थूल

परमा मा के

व प का

लेता है , तब वह िनमल
े षर हत िनमल बु

दय के भीतर

म परम

परमा मा को जान लेने

ारा

व प रह यमय

हण नह ं कर सकती।

उसे चम-च ओ
ु ं से दे ख पाना संभव नह ं है । उसक
भीतर ह होती है । जब मनु यय मनन

९ का

द यानुभिू त अपने

ढता से उसे
थत

वशु

गहण कर
अथात राग-

योित का सा ा कार कर लेता है ।

पर अथात अपने भीतर उसका अनुभव होने पर

मनु य अमृत व प हो जाता है ।१
यदा प चावित
बु

ते

ानािन मनसा सह।

न वचे ित तामाहु: परमां गितम ्।।१०।।

तां योगिमित म य ते
अ म

थरािम

तदा भवित योगो ह

यधारणाम ्।

भवा ययौ।।११।।

श दाथ : यदा मनसा सह प च
के स हत पांच

ाने

वचे ित= और बु

कार

ते = जब मन

थत हो जाती ह ; च बु : न

चे ा नह ं करती ; ताम ् परमाम ् गितम ् आहु : = उसे

परमगित कहते ह।
ताम ्

यां भली

ानािन अवित

थराम ् इ

यधारणाम ् योगम ् इित म यते= उस

यधारणा को ‘योग’ मानते ह। ह तदा अ म : भवित=
मादर हत हो जाता है ; योग:

थत

य क तब

भवा ययौ = योग उदय और अ त

होनेवाला है ।
वचनामृत : जब मन के स हत पांचो
हो जाती ह और बु

य क

ाने

यां भली

कार

थर

चे ा नह ं करती, उसे परमगित कहते ह। उन

थरधारणा को योग मानते ह , य क तब

जाता है । योग उदय और अ त होनेवाला है । (योग
अ ययवाला है - इसका एक अ य अथ कया गया है

मादर हत हो
भव

और

क योग शुभ के

उदया और अशुभ के अ तवाला है ।)
स दभ :

यानयोग

वणन कया गया है । इन दोन
१. य एत

ारा परमा मा क

हआ
है ।

के दसरे
साधन का

ोक को क ठ थ कर लेना चा हए।

वद:ु अमृता ते भव त (कठोप०, २.३.२

उप० (३.१.८) म य

ाि


े ० उप०, ३.१ , ३.१०) यह भाव मु डक

द यामृत : परमा मा क
मह वपूण है । ान वना मु
संचालन एवं धारक परमा मा
उसे

करने का

मा

मानिच

ाि

के िलए त व ान सवािधक

नह ं होती।१ यह जगत ् जीवन और उनका
या है ? परमा मा का

या माग है ? यह सब
थ को मा

या है ?

ान के अ तगत है । क तु

दे खने और समझने से ग त य

जाती। आ या मक

व प

थान क

ाि

नह ं हो

पढने और पढाने तथा चचा करने को

यसन कहा गया है तथा जो मनन, अ यास और आचरण करता है , उसे
दलभ
द य

काश सुलभ हो जाता है ।२

संसार म परमा मा ह

य, ोत य म त य और िन द यािसत य

है , य क परमा मा के जानने पर कुछ

ान नह ं है । अ या म व ा परा व ा है ।४

बढकर अ य कोई
यानयोग
नह ं है ।

ात हो जाता है ।३ आ म ान से

ानयोग का अंग अथवा पूरक ह है तथा उससे िभ न

यानयोग क चचा अनेक उपिनषद

चैत य व प आ मा

तथा

थ म क गई है ।५

गुणातीत एवं दे हातीत है । चैत य आ मा के

िचत व प एवं आन द- व प म

थत

होना मनु य

परमाव था अथवा उ चाव था है । यह चैत य भी जा त-अव था है ,
जसम मनु य दे ह, इ

य और मन का अित मण करके सं थत हो

सकता है । योगा न मनु य के दै हक एवं मानिसक वकार को वन
दे ती है तथा मनु य िन

१.ऋते

ाना न मु

कर

, िनभय और आन दमय हो जाता है ।६

:।

२.पठक: पाठक व
ै ये चा ये शा िच तका:।
सव यसिननो मूखा: य:

यावान ् स प डत:।।

-पढने और पढानेवाले तथा अ य शा
प डत है ।

३. आ मा वा अरे
दशनेन

य:

–चचा करनेवाले यसनी मूख ह। जो

यावान ् है , वह

ोत यो म त यो िन द यािसत यो मै ेि य आ मनो वा अरे

वणेन म या व ाने न इदं सव व दतम ्। (बृ० उप० २.४.५)

४. मु डक उप० (१.१.५)
५.

‘ यै िच तायाम ्’।

यानयागे क चचा कठोप० (२.३.१०, ११), मु डक उप० (२.२४ , ३.१८),

ेत० उप० (१.३; १.१०

,१२,१४ तथा २.६ इ या द) तथा भगव ता म है । महाभारत के अ तगत मो धमपव म भी
यान क चचा है ।

पतजिल के योगदशन, घेर ड सं हता आ द म
वशद चचा "जीवन और सुख" के

६.

न त य रोगो न जरा न मृ यु:

यान क

तीय अ याय म है ।

व तृत चचा है ।

यान-

या पर

य योगा नमयं शर रम ् ( ेत० उप० , २.१२)

ान एवं
परम थित
ाने

यान के अ यास से मनु य को परमगित अथवा
हो जाती है ।

यानयोग क सा णना करते हए
ु जब पांच

य और मन शा त और

थर हो जाते ह तथा बु

भी शा त एवं

चे ाशू य हो जाती है , उस अव था परमपद अथवा परमगित कहा जाता
है । ऐसी उ चाव था अ य त दलभ
ु , दु
यह मानव-जीवन क

ा य एवं अिनवचनीय होती है ।

एवं उ चतम उपल ध होती है । इस आ त रक

जागरण क अव था म मनु य न केवल पूण व ा त का ह अनुभव
करता है , ब क परमान द क अनुभूित भी कर लेता है ।१ इसे
के स श मान लेना

अ ववेक है । मनु य परमाव था (समािध )म आ मा

द यानुभूित करके तृ

एंव ध य हो जाता है ।

यान क अव था म मनु य क पांच
िनवृ

ाने

यां अपने वषय से

हो जाती ह तथा मन भी संक प- वक प आ द

हो जाता है । तदन तर िन या मका बु

गाढ िन ा

यापार से िनवृ

भी चे ाशील नह ं रहती।

यान

गाढ अव था ‘समािध’ हो जाती है ।

मनु य

य एवं मन क

थर धारणा को योग कहा जाता है । इसम

मादर हत अथात ् एका

होकर आ मचैत य म सं थत हो जाता

है तथा आन दवषा एवं आन दम ता का अ त
ु अनुभव करता है ।
परमा मा के साथ एक व प योग म उदय और अ त उ प
होते ह। अतएव योगी को अ म
मनु य जब तक इ

यसुखभोग क

अथात ् भौितक आकषण से मु
का

अथात ् सावधान रहना चा हए।२
तृ णा से मु

और लय

नह ं होता

नह ं होता तथा राग- े ष, भय और

ोध

याग नह ं करता, तब तक मन कदा प शा त नह ं होता। अतएव

मनु य को

ववेक

ारा मन क

वासनाओं के शमन एवं संयम का

अ यास करना चा हए।
जब मन इ

य क दासता से अथात ् वषय के आकषण से मु

हो जाता है , तब वह भारर हत और पारदश होकर ऊ वगामी हो जाता है
और आ मािभमुख होकर आ मा क ओर गितमान ् हो जाता है, मानो वह
आ मा के गु

वाकषण से आकृ

हो जाता है । िनमल और सश

मन

आ मा का सा ा कार करा दे ता है । वा तव म मन का आ मचैत य म
१.समा हतो भू वा आ म येवा मानं प यित (बृह ० उप० , ४.४.२३)
-समा हत होकर ह अपने आ मा को दे खता है ।
भगव ता म इ

य तथा मन के संयम तथा

‘गीता-रसामृत’ म अनेक

थल पर

यान क पया

चचा है (६.२७, २८, ३६)

यान पर व तार से चचा क गई है ।

२.यह भाव भगव ता (६.२६) म कहा गया है । पािल म अ माद को अ पमाद कहते ह।

वलय हो जाता है , जसे मन क

मृ यु भी कहते ह तथा केवल

आ मचैत य शे ष रह जाता है । यह आन दाव था होती है ।
बु मान ् पु ष मन और इ

य का दमन नह ं करता, ब क ववेक

ारा उनका शमन करता है । बु मान ् पु ष िच वृ य का शोधन करके
उनका उदा ीकरण कर दे ता है अथात ् उनको उ म दशा
है । परमा मा से

ाथना करना मन को प व

दान कर दे त ा

करने और उसे संबल

दान

करने के िलए आव यक होता है ।
नैव वाचा न मनसा

ा ुं श ये न च ष
ु ा।

अ तीित

कथं तदपल
यते ॥१२॥

ुवतोऽ य

श दाथः न वाचा न मनसा न च ष
ु ा एव
से, न मन से, न च ु से ह

ा ुं श यः = न वाणी

कया जा सकता है ; तत ् अ त = वह

है ; इित


ु तः अ य

कथम, उपल यते = ऐसा कहनेवाले के (कथन के)

अित र

वह कैसे

हो सकता है ?

वचनामतः वह न वाणी से, न मन से, न च ु से ह
सकता है , ‘वह है ’ ऐसा कहनेवाले के (कथन के) अित र
कार

उसे अ य

कया जा

उसे अ य कस

कया जा सकता है ? (अथवा, ‘वह है ’ ऐसा कहने के अित र
कार से कैसे

कया जा सकता है अथात ् उस िन वशे ष

को व ास करने के अित र
इतना व ास ह पया

कहा ह नह ं जा सकता है । बस, वह है ,

है ।)

स दभः परमा मा के अ त व का
द यामृतः सम त
परमा मा का

ान-

माण

थ एक

या है ?

वर से घो षत करते ह

हण न वाणी से, न मन से और न च ु से ह होना संभव

है , तो फर इसके अित र
पु ष अपने
विच

या कोई अ य

माण हो सकता है क आ

ान और अनुभव के आधार पर ऐसा कहते ह? यह एक ऐसा
है, जसम उसका उ र भी िन हत है । परमा मा परमसू म

त व है तथा उसका

हण वाणी, मन और च ु से होना संभव नह ं है ,

तथा प परमा मा के अ त व को आ

पु ष अपने िच तन और अनुभव

से आधार पर

पु ष के आ

मा णत करते ह। आ

वा य िन स दे ह

व सनीय श द माण ह।
यव था को दे खकर

यव थापक, िनयम को दे खकर िनयामक तथा

रचना को दे खकर रचियता का अनुमान
दे खकर अ न का अनुमान

कया

कया जाता है, जैसे धू

जाता है । क तु इससे भी

को

बढ़कर

वानुभव का

माम होता है ।१ सारे संसार म आ

पु ष ने गहन साधना

और िच तन के आधार पर व

म एक सू म, द य स ा क प रक पना

क तथा अपने भीतर उसक

वानुभूित क । य प उस परम स ा के

वणन विभ न ह तथा उसक

ाि

के उपाय भी विभ न ह, तथा प सब

िच तक मनी षय ने स ा के अ त व को अपने-अपने ढं ग से मा य
कया है । िन य ह परमा मा क सू म द य स ा मनु य क बु

सीमी से परे है ।
अ ती येवोपल ध य त वभावेन चोभयोः।
अ ती येवोपल ध य त वभावः

सीदित ॥१३॥

श दाथः अ त = (वह) है ; इित एव उपल ध यः = ऐसा उपल ध
करना चा हए; (तदनु) त वभावेन (अ प उपल ध यः) = (इसके प ात ्)
त वभाव से (भी उपल ध करना चा हए); च उभयोः = और इन दोन

कार से; अ त इित एव उपल ध य (पु ष य) = (वह) है , ऐसी
िन ावाले (पु ष के िलए); त वभावः
ता वक

व प)

वचनामृतः

वह

हो जाता है ।
(परमा मा)

तदन तर उसे त वभाव से भी
से, वह

है ऐसी

(वा त वक)

िन ावाले

व प

सीदित = त वभाव (परमा मा का

है , ऐसा

दयंगम

चा हए।

हण कहना चा हए और इन दोन
पु ष

के

िलए

परमा मा

का

कार

ता वक

(अनुभवग य) हो जाता है ।

स दभः परमा मा के अ त व एवं उसके
मह वपूण मं

करना

हण के संबंध म यह

है । इसे क ठ थ कर लेना चा हए।

द यामृतः परमा मा के अ त व को

वीकार कहनेवाले मनु य

को आ तक तथा अ वीकार करनेवाले मनु य को ना तक कहा जाता
है । परमा मा है , ऐसा तक से

मा णत नह ं हो सकता। वह अनुभवग य

है । जो परमा मा के अ त व के

वीकार करते ह, उनके िलए तक क

आव यकता नह ं है तथा जो उसके अ त व को

वीकार नह ं करते, उनके

िलए सारे तक यथ ह।
स पूण जगत ् का संचालन एक रह यमयी सू म चैत य स ा

होता है , जसे
अथवा

या

(महान ्) कहा जाता है । वह इस जड जगत ् म ओत ोत

है , जैसे ितल म तैल अथवा घृत

अचेतन (जड) पदाथ म मानो
————————————

सु

या

रहता है । चेतन त व

रहता है । वह पशु-प

१.महान ् दाशिनक एवं मनोवै ािनक काल युंग ने गहन आ या मक
कहा है ।

ारा

माण, अनुमान

माण और श द

माण से भी परे

वानुभिू त

य म कुछ

वानुभूित को
माण है ।

माण

जा त ् होता है । वह मनु य म वकास-

या के कारण अ यिधक जा त ्

होता है ।१ मनु य म चेतना के वकास के कारण चैत य त व को खोजने
और उसके साथ तादा

था पत करने क

मता होती है ।

परमा मा है तथा उसे त वभाव से उपल ध करना चा हएइन दोन
भाव को

दयंगम करने पर, ‘वह अव य है’, इस

कार िन य करके

परमा मा क स ा को उपल ध ( वीकृ त) करनेवाले स चे
िलए परमा मा का ता वक (वा त वक िन वशे ष)
भीतर

व प

हो जाता है ।२ जैसे मेघ के हट जाने से सूय

ज ासु के

वयं ह अपने
वतः

हो जाता है , वैसे ह अ व ा (अ ान) के दरू हो जाने पर आ मा

( कट) हो जाता है ।
चेतना को सभी

वीकार करते ह। चेतना जीवन का ल ण है । चेतनाशू य

पदाथ को जड कहा जाता है । चेतना के
हमारे भीतर सं थत होता है ।
आ मा क

ोत एवं के

ान और

के

यान के

द य अनुभिू त अपने भीतर ह

प म आ मा

ारा चैत य व प

होती है ।

ा णय

का

अ तयामी परमा मा और आ मा त वतः एक ह ह। आ मा ह परमा मा
है । एक ह चैत य व प
चैत य व प

आ मा

जगत ् का आ य है तथा सव

द य

अनुभिू त

जीवन

उपल ध आ मा परमाणुओं के पर पर संघात का
सकता। वह तो उनके अ त व एवं स
सव

या

है तथा जड का

पदाथ का आधार

या

सव च

ितफल नह ं हो

यता का आधार है । वा तव म

वतं

अ त व नह ं है । स पूण जड

अथात ् महान चैत यस ा है । वह अ वनाशी है । वह

जड पदाथ क आ त रक गितशीलता का कारण है तथा चेतन

है ।

स पूण गित विध के मूल म सं थत है । वह

ा णय

वन र पदाथ

अ वन र त व है ।

( े , अनुभवी) पु ष ने िच तन और अनुभव के आधार पर

उ ोष कया क एक द य स ा है , जसके अनेक

कार के वणन कये

जाते ह, तथा अनेक नाम ह। उसके सा ा कार अथवा उसक
करने का

ारं भ इस

ढ व ास से होता है क वह है और उसके ता वक

व प क उपल ध होनी चा हए।
—————————————
१. बृहदार यक उपिनष
२. अ त

अ त क

(२.३.१) म

के मू

ेित चेत ् वेद (तै० उप०, २.६.१)

कोई एक

परमा मा सबके िलए सुलभ है ।
और अमू

त ् वयं िन यम ् ( ववेकचूडाम ण, १२७)
वयं फूत िन य त व है ।

अ पवदे व ह त

द यानुभूित

धानात ् (

सू , ३.२.१४)

प क चचा है ।

परमा मा क

ाि

होने पर मनु य पु य-पाप, सुख-दःख
ु , हष-शोक, यश-

अपयश, लाभ-हािन आ द
अव था को

से परे जाकर पूणता क

हो जाता है ।

यदा सव

मु य ते कामायेऽ य दि ताः।

अथ म य ऽमृतो भव य
श दाथः यदा अ य
इसके

अमृतमय

सम ुते ॥१४॥
द ि ताः ये कामाः सव

मु य ते = जब

ू जाती ह; अथ = तब;
थत जो कामनाएँ ह, (वे) सब छट

दय म

म यः अमृतः भवित = मरणधमा मनु य अमृत हो जाता है ; अ
सम त
ु े =

= यह ं;

का रसा वादन कर लेता है ।

वचनामृतः जब इस (मनु य) के

दय म

थत जो कामनाएँ ह, वे

ू जाती ह, तब मरणधमा मनु य अमृत हो जाता है । यह ं
सब छट

का

रसा वादन कर लेता है ।
स दभः यह मं
यह मं

अ य त मह वपूण है ।

बृहदार यक उपिनषद (४.४.७) म भी है । मं

१४, मं

१५

क ठ थ करने के यो य ह।
द यामृतः मनु य को संसार के मोह प च म बाँधनेवाली उसके
दय म
ह, वह ब

थत भौितक कामनाएँ होती ह। जो मनु य कामनाओं से

है और सदा अशा त रहता है तथा जो मनु य कामनाओ के

त नह ं होता, वह मु

ह और शा त रहता है । भौितक कामनाएँ ह

अशा त का मु य कारण होती ह। कामना

त मनु य सदा भटकता ह

रहता है । कामनाओं का अ त नह ं होता। एक कामना दसर
कामना को

उ प न कर दे ती है ।

मनु य भौितक पदाथ क आस

के कारण उ ह

करने क

कामना करता है । य द कामना-पूित न हो तो मन म िनराशा, लािन और
ोध उ प न हो जाते ह। का य व तु के

होने पर मनु य उसे सदा

ू जाने के भय से
अपने वश म रखने क िच ता से तथा उसके छट
रहने लगता है ।१

कामनाएँ मनु य को ऐसे ह
म भूिम म उसक

भटकाती रहती ह, जैसे मृग को

तृ णा भटकाती रहती है । कामना

त मनु य न

जा त ् अव था म शा त रहता है और न िन ाकाल म ह ।
————————————
१. भौितक कामनाओं के

याग का उपदे श भगव ता म (२.५५, २.७०, २.७१ तथा अनेक

थान पर) कया गया है ।

भगव ता ने अनेक

थान पर िन काम कमयोग का उपदे श दया है ।

भौितक वषय क आस

मनु य को ब हमुखी बना दे ती है तथा

वह अ तमुखी होकर आ मा के द य सौ दय क ओर आकृ

नह ं होता।

भौितक कामनाओं क पूित से मनु य को आ य तक तृि

नह ं होती

तथा भोगवाद मनु य को कभी चेतना क उ चाव था एवं
का अनुभव नह ं होता। वा तव म आस
का मूल है । आस

गाढ़ आन द

(भोग म फँसना) ह ब धन

एवं भौितक कामनाएँ चेतना को द ू षत और दब
ु ल

कर दे ती ह।

ववेकशील मनु य कामनाओं का दमन नह ं करता। दिमत कामना
कु ठा का

प ले लेती है तथा वह शा त का हरण कर लेती है । अशा त

मनु य को

चुर सुख-साम ी उपल ध होने पर भी सुख का अनुभव नह ं

हो सकता। ववेकशील मनु य इ छाओं को िनयं त रखता है तथा संयम,
सादगी और स तोष एवं परोपकारवृ

को मह व

ह धन म दोष नह ं होता, ब क धन के
को

लोभन से

दान करता है । िन य

लोभन म दोष होता है । धन

िसत मनु य अ याय के माग पर चल दे ता है तथा

अशा त रहकर दसर
को भी अशा त कर दे ता है ।

वयं

ववेकशील मनु य

कामनाओं का उदा ीकरण कर दे ता है अथात ् उ ह उ म दसा दे दे ता है ।
वह भय, िच ता,

ोध और शोक से मु

भौितक कामनाओं का
होकर चेत ना के उ च

हो जाता है ।

याग कर दे ने से मनु य मान ब धनमु

तर पर

थत हो जाता है तथा मनु य-शर र रहते

हुए ह अमृत व प हो जाता है । वह
करके कृ ताथ हो जाता है ।
एवं

के परमान द का रसा वादन

का रसा वादन

सा ा कार का ल ण

माण है ।
यदा सव

िभ

ते

दय येह

थयः।

अथ म य ऽमृतो भव येताव यनुशासनम ् ॥१५॥
श दाथः यदा
थयाँ भली

दय य सव

थयः

िभ

ते = जब

दय क सब

कार से खुल जाती है ; अथ = तब; म यः इह अमृतः

भवित = परणधमा मनु य इसी दे ह म अमृत हो जाता है ; ह एतावत ्
अनुशासनम ् = िन य ह , इतना ह अनुशासन (उपदे श) है )
वचनामृतः जब

दय क

सम त

थयाँ भली

कार से खुल

जाती ह, तब मरणाधमा मनु य इसी दे ह म (इसी जीवन म) अमृत हो
जाता है (मृ यु को पार कर लेता है )। बस इतना ह उपदे श हा।
स दभः यह मं
चा हए।

अ य त मह वपूण है । इसे क ठ थ कर लेना

द यामृतः मनु य क सम त कामनाएँ कभी पूण नह ं हो सकती
ह। अपूण अथवा अतृ

कामनाएँ मन म कु ठाएँ (

थयाँ) उ प न कर

दे ती ह, जसके कारण मनु य शा त का अनुभव नह ं कर सकता तथा
िच ता, भय और

ोध से अिभभूत होकर दःखी
रहता है । वा तव म

थयाँ अ व ा से ह उ प न होती ह। उ म पु ष अपनी कामनाओं का
दमन नह ं करता, ब क ववेक

दशा

ारा उनका शमन कर दे ता है तथा उ ह

दान कर दे ता है ।

अद य भौितक कामनाओं क
थयाँ मन क शा त को न
अनेक

थय

से मु

अतृि

के कारण उ प न अनेक

कर दे ती ह।

जस मनु य का मन

हो जाता है , वह परमा मा के

द य रस का

आ वादन करके इसी जीवन म अमृत व प हो जाता है । आन द क
परमो च अव था
महा मा बु

करने के िलए यह एकमा

सू

है ।

ने चार आय स य का कथन कया(१) संसार दःख

से प रपूण है । (२) दःख

सकता है । (४) दःख

का कारण भी है । (३) दःख

के अ त होने का एक माग है अ ांिगक माग।

क तु सम त दःख
और सुख से परे आन द क

अव था है , जसक

का अ त हो

ाि

ान और

अमृतमय सा य

यान से अपने भीतर ह हो सकती है

तथा जसका उपदे श उपिनषद म है । (सुखदःुखे समे कृ वा लाभालाभौ

जयाजयौगीता, २.३८) िन य ह इससे बढ़कर कोई अनुशासन अथात ्
अ तम उपदे श नह ं हो सकता।

यह मृ यु पर वजय पाकर अमृत व प होने का माग है । मृ यु के
प ात ्

या होता है , आ या मक पु ष के िलए यह

वह इसी दे ह म


थय से छटकर
जीव मु

हो जाता है १ उपदे श के अ त म अनुशासन

१.योऽकामो िन काम आ काम आ मकामो न त य
(बृ० उप०, ४.४.६)

ाणाः उ

जो अकाम, िन काम, आ काम और आ मकाम होता है , उसके
वह

िभ ते

ह रहकर
दय

थः िछ

को

हो जाता है ।

ते सवसंशयाः।

ीय ते जा य कमा ण त मन ्

परमा मा को जान लेने एवं

े परावरे ॥

मूल

छोरन
छोरत

व प को भूलकर भौितक जगत ् के

कर लेता है तथा

दया जाता है ।२ यह

ाम त
ाण का उ


ै सन ्

ा येित

मण नह ं होता।

(मु डक उप०, २.२.८)

होने पर अ व ा प

जाते ह और सम त शुभ एवं अशुभ कम न

ह िनरथक है ।

थ खुल जाती है , सब संशय िमट

हो जाते ह। अ व ा के कारण जीवा मा अपने

लोभन से

ंिथ पाव ज सोई, तब यह जीव कृ तारथ होई।

त हो जाता है ।

ंिथ जािन खगराया, व न अनेक करइ तब माया॥

२. एतदनुशासनम ् (तै०, उप०, १.११.३)बस, इतना ह अनुशासन (उपदे श का सार, अ तम
आदे श) है ।

यमाचाय

ारा निचकेता को

दया हआ
अनुशासन (उपदे श का सार,

सनातन आदे श) है ।
वा तव म कठोपिनष
यहाँ समा

हई।
मं

शतं चैका च

के अ याय दो क अ तम (तीसर ) व ली

१६, १७, १८ पुन

क भाँित जोड़ दये गये ह।

दय य नाडय तासां मूधानमिभिनःसृतक
ै ा।

तयो वमाय नमृत वमेित व व ड या उ
श दाथः

मणे भव त ॥१६॥

दय य शतम ् च एका च नाडयः =

दय क सौ और

एक ना डयाँ (ह); तासाम ् एका मूध ानम ् अिभिनःसृता = उनम से एक

मूधा (कपाल) क ओर िनकली हई
ु है ; तया ऊ वम ् आयन ् अमृत वं एित
= उसके

ारा ऊपर जाकर अमृतभाव को

मणे व व

हो जाता है ; अ याः

भव त = अ य (सौ) ना डयाँ मरणकाल म (जीवा मा

को) नाना योिनय

म जाने के िलए हे त ु होती ह। ( व व

= नाना

गितवाली)।
वचनामृतः

दय क

सौ और एक ना डयाँ ह। उनम से एक

(सुषु णा) मूधा क ओर िनकली हई
ु है । उसके

ऊपर जाकर (मनु य का जीवा मा) अमृतभाव को

ारा (आरोहण करते हए
ु )

हो जाता है । अ य

(सौ) ना डयाँ मरण-काल म नाना योिनय म जाने के िलए हे तु होती ह।
स दभः मरण के उपरा त

ाण के उ

मण क गित का वणन

है ।
द यामृतः मनु य के

दयकमल से एक सौ एक ना डयाँ िनकलती

ह। इनम से एक सुषु णा नाड (मे द ड के समाना तर नाड ) म त क
थत सह दल कमल क ओर आरोहण करती है ।१ सुषु णा नाड

योितमयी एवं चेतनामयी होती है, अ य ना डयाँ अ धकारमयी होती ह।
म त क के म य म चेतना क

वशेष स

के कपाल के म य लघु ववर म

दय क धड़कन क गूज

दे ती है । मृ यु मा

थत चेतनाके

का िनवास

उसके

के समापन अथवा अवसान से होती है । जीवा मा

दय-कमल के भीतर

से

बु

म होता है , क तु उसी

थान (कायालय) स पूण म त क होता है ।

िनकलते

——————————————
१.

थत शु

योगी अपने जीवनकाल मे जीव मु
ाण मूधा

प तः सुनाई

दय-गित के ब द होने से नह ं होती, ब क म त क

स पूण गित विध का वशेष
िन

यता रहती है । नवजात िशशु

रहता है तथा अ त म

ह, क तु सामा य जन के

ाण अ य

उप० (३.६, ७), छा० उप० (८.६.६) और बृह ० उप० (४.२.३) म ना डय क चचा है ।

माग से िनकलते ह। मृ यु के समय
योग क उ चाव था म
पूणमु

योगी

िन

ाण का

थत होकर करता है । उसे कैव यमु

होती है । यह स ःमु

(त कालमु

ारा कपाल के म य म

थत ववर (

वा छर रा

श दाथ

स न व : =अ डु . मा :
इषीकाम ् इव

दये स न व :।

पु ष:

अ तरा मा

सदा

जनानाम ्

दय म भली

कार

वात ् शर रात ् धैयण

अमृत जान ;

( थत) है ; तम ् मु जात ्

वृहेत ् =उसे मूज
ं से सींक क भांित

शु म ् अमृतम ् व ात ् = वशु

इित= उपसंहार हआ
ु ।

दये

प रमाणवाला पु ष, जो सबका अ तरा मा है ,

अपने शर र से धैयस हत पृथक् कर (दे ख); शु म ् अमृतम ्
= वशु

ाण के

व ा छु ममृतिमित।।१७।।

:अ डु . मा :

सदा मनु य के

ारा

वृहे मु जा दवेषीकां धैयण।

व ा छु ममृतं

तं

ाणश

होता है ।

अ डु . मा : पु षोऽ तरा मा सदा जनानां
तं

िन

) से िनकलती

है और उसका पुनज म नह ं होता। कसी अ य नाड के
िनकलने पर जीवा मा विभ न योिनय को

याग
अथवा

) होती है ।

म वलीन हो जाता है ।१ उसक

ाण याग के प ात ्

सुषु णा के

योगी अपने

व ात ्

अमृत जान ;

वचनामृत :अ डु . मा : पु ष, जो सबका अ तरा मा है , सदा मनु य

के

दय म भली

कार

है । उसे मूंज से सींक क भांित अपने

शर र से धैयस हत पृथक् कर। उसे वशु

अमृत जान , उसे वशु

अमृत

जान।

स दभ :दे ह म

थत चैत य त व को जानने का िनदश है ।

द यामृत : एक ह चैत यस ा सम त
है । वह

ब ब प से आ मा और

म सं थत बु

म आ मा ह

के स व , रज, तम, गुणो से मु
आ मा ह होता है । ब

ा णय म सं थत रहती

ित ब ब प से जीवा मा है ।

दय े

ित ब ब प म जीवा मा कहलाता है । बु
होने पर जीवा मा िन य शु , बु

प म जीवा मा और मु

प म

प म आ मा अथवा

ित ब ब प म जीवा मा और ब ब प म आ मा वा तव म मूल प म
एक ह

ह। पु ष जीवा मा है और पु ष ह

ित ब ब प जीवा मा के ववेजन

आ मा है ।

ारा ब ब प आ मा क ह

ानीजन
थापना

——————————————
१.

भगव ता (८.२४, २५, २६, २७, २८) म मृ यु के प ात ् जीवा मा क गित का वणन है ।
कु डिलनी श

तथा

रसामृत’ म क गई है ।

म-मु

एवं स ःमु

(कैव यमु

) क

वशद या या ‘गीता-

ह है ।१

करते ह। मूल व प म दोन एक ह ह। जीवा मा
मनु य के
है । मनु य के

दयकमल अथव
दय े

दय े

का आकार अ डु .

जीवा मा को अ डु .

दय े

थत

प रमाणवाला कहा जाता है ।

परमा मा सबका अ तरा मा है तथा उसके
पर

है ।२ मनु य ह

म वराजमान पु ष अ डु . मा

जीवा मा को जान सकता है । अत: मनु य के

के समान

परमा मा वशु

दय म वराजमान है ।

चैत य व प है तथा जड दे ह का संचालक है ।

मृ युकाल म चैत यत व के ब हगमन होने पर दे ह जड (चेतनाशू य) हो
जाता है । मनु य का मूल व प

थूल दे ह नह ं है , ब क िन य शु

आ मा है , जससे पृथक् होने दे ह जड हो जाता है ।

चैत य व प आ मा अमृत व प है ।३

वशु

ानी पु ष चैत य

आ मा को जड दे ह से पृथक् मानकर उसी पर मन और बु
कर दे ता है । जस

कार मूज
ं म रहनेवाली सींक को मूज

दया जाता है , उसी पर िच

को एका

जाता है ।४ चैत य आ मा शु
त व ान तथा

बु

को एका
से पृथक् कर

कर दे ता है तथा आन दमय हो

एवं तेजोमय है तथा अमृत व प है ।

यान क उ चाव था म साधकजन शर र, मन, बु

से

ऊपर उठकर इसका अनुभव कर लेते है ।
अ तम वा य क
िस ा त क िन
पर कठोपिनष

पुनरावृ

करके उपिनष

तता क सूचना द जाती है । इस मं
क पूण समाि

समाि

तथा

का अ त होने

क घोषणा क गई है ।

मृ यु ो ां निचकेतोऽथ ल

वा व ामेतां योग विधं च कृ

म ्।

ा ो वरजोऽभू मृ युर योऽ येवं यो वद या ममेव।।१८।।
श दाथ : अथ =इसके प ात ; निचकेत: निचकेता ; मृ यु ो ाम ्

एताम ् व ाम ् च कृ

म ् योग विधम ् ल वा= मृ यु से

को और स पूण योग विध को
१. जीवो


ै नापर: -जीवा मा

ह है ।

करके ; वमृ यु: वरज:
सू

अ य

पु ष-कठ० उप० (२.१.१२ , २.१.१३ , २.३.१७) तथा

ा णय म

मनु य

वेद

ह हो जाता है , जैसे अ न म

का

ह। प चदशी

ेत० उप० (३.१३ , ५.८)।

दय का आकार कह ं बड़ा तथा कह ं छोटा होता है ।

३.उपिनषद म परमा मा को अमृत व प कहा गया है ।

इस व ा
ा :

मे इस संबंध म अनेक सू

म भी इनका ता वक अभेद कहा गया है ।
२. अ डु . मा

(परमा मा) का

अ न हो जाता है ।

ान होने पर


ै भवित (मु डक उप० , ३.२.९)

४.य द दे हं पृथक् कृ वा िचित व ा य ित ित।
अधुनैव सुखी शा त: ब धमु
-य द तू

ान

भ व यिस।। (अ ाव गीता, १.४)

ारा दे ह को पृथक् करके चैत य आ मा म व ाम करके

सुखी और शा त तथा ब धनमु

हो जायगा।

थत हो तो अभी

अभूत ् = मृ यु से र हत, वकार से मु ,
अप

य:

(इदम)्

को

अ या मम ् एवं वत ् =

अ या म व ा को इस

अ य

हो गया ;अ य:
कोई

भी

(इस)

कार से जाननेवाला है ; एव= ऐसा ह (हो जाता

है )।
वचनामृत : इसके (सुनने के) प ात ् निचकेता यम
व ा को और पूर योग विध को

ारा

इस

करके मृ युर हत, वकारमु ,

हो गया। अ य कोई भी इस अ या म व ा को इस

कार से जान लेता

है , वह भी ऐसा ह हो जाता है ।
स दभ : इस मं

म माहा

य-वणन है ।

द यामृत :यमराज मृ यु के दे वता ह।
निचकेता को

ा ान का स पा

स पा

हई

को द

निचकेता को
यानयोग
सा ा कार

प म

व ा का उपदे श

दया।

मानकर

व ा फलीभूत होती है । मृ यु वजेता यमाचाय ने

ान के अित र

यान-

या का भी उपदे श

ानयोग का पूरक होता है । शु

दया।

योित: व प आ मा का

यान क उ चाव था म ह संभव होता है ।

ान तथा
को

वयं यमराज ने गु

यान

हो गया।

ारा वकारमु
को

एंव िनमल होने पर निचकेता

पु ष जीव मु

मृ यु और रोग का अित मण कर िलया।१

हो जाता है । निचकेता ने

ान क अ न कम को भ मसात ् कर दे ती है ।३
ान का

भाव ऐसा है

क कोई भी

हो जाता है ।२

उसे

करके

अमृत व प हो जाता है । वह िन य ह अमृत व प हो जाता है ।
कठोपिनष
इसका

का

द यामृत यमाचाय का क याणकार

साद है ।

ापूवक पारायण करनेवाला सौभा यशाली मनु य आन द को

कर सकता है ।
शा तपाठ
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुन ु । सह वीय

करवावहै ।

तेज वनावधीतम तु। मा व षावहै।
ॐ शा त:! शा त:!! शा त:!!!

१.न त य रोगो न जरा न मृ यु:

य योगा नमयं शर रम ्।(

ेत० उप० , २.१२)

-शर र के योगा नमय होने पर मनु य रोग,वृ ता और मृ यु से परे चला जाता है ।
२.
३.

वेद


ै भवित (मु डक उप०, ३.२.९)

ान न: सवकमा ण भ मसात ् कु ते तथा (गीता, ४.३७)

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