वसॊत ऩॊचभी (ददन ॊक – २८ जनवयी २०१२

)
वसन्त ऩंचमी
वसॊत ऩॊचभी की ऩज
ू के लरए तैम य एक सयस्वती प्रततभ वसॊत ऩॊचभी एक ब यतीम त्मोह य है , इस ददन ववद्म की

दे वी सयस्वती की ऩज
की ज ती है। मह ऩज
ऩव


ू ी ब यत भें फडे उल्र स से भन मी ज ती है। इस ददन स्त्स्िम ॉ ऩीरे
वस्ि ध यण कयती हैं।

प्र चीन ब यत भें ऩूये स र को स्त्जन छह भौसभों भें फ ॉट ज त थ उनभें वसॊत रोगों क सफसे भनच ह भौसभ

थ ।जफ पूरों ऩय फह य आ ज ती, खेतों भे सयसों क सोन चभकने रगत , जौ औय गेहूॉ की फ लरम ॉ खखरने रगतीॊ,

आभों के ऩेडों ऩय फौय आ ज त औय हय तयफ़ यॊ ग-बफयॊ गी तततलरम ॉ भॉडय ने रगतीॊ। वसॊत ऋतु क स्व गत कयने के
लरए भ घ भहीने के ऩ ॉचवे ददन एक फड जश्न भन म ज त थ स्त्जसभें ववष्णु औय क भदे व की ऩूज होती, मह

वसॊत ऩॊचभी क त्मौह य कहर त थ । श स्िों भें फसॊत ऩॊचभी को ऋवष ऩॊचभी से उल्रेखखत ककम गम है, तो ऩुय णोंश स्िों तथ अनेक क व्मग्रॊथों भें बी अरग-अरग ढॊ ग से इसक चचिण लभरत है।
बसन्त ऩंचमी कथा
सस्त्ृ ष्ट के प्र यॊ लबक क र भें बगव न ववष्णु की आऻ से ब्रह्भ ने जीवों, ख सतौय ऩय भनुष्म मोतन की यचन की।

अऩनी सजजन से वे सॊतुष्ट नहीॊ थे। उन्हें रगत थ कक कुछ कभी यह गई है स्त्जसके क यण च यों आ॓ य भौन छ म
यहत है। ववष्णु से अनुभतत रेकय ब्रह्भ ने अऩने कभण्डर से जर तछडक , ऩथ्
ृ वी ऩय जरकण बफखयते ही उसभें

कॊऩन होने रग । इसके फ द वऺ
ुज ी सुॊदय
ृ ों के फीच से एक अद्भत
ु शस्त्तत क प्र कट्म हुआ। मह प्र कट्म एक चतुबज

स्िी क थ स्त्जसके एक ह थ भें वीण तथ दस
ू य ह थ वय भुद्र भें थ । अन्म दोनों ह थों भें ऩुस्तक एवॊ भ र थी।

ब्रह्भ ने दे वी से वीण फज ने क अनुयोध ककम । जैसे ही दे वी ने वीण क भधुयन द ककम , सॊस य के सभस्त जीवजन्तुओॊ को व णी प्र प्त हो गई। जरध य भें कोर हर व्म प्त हो गम । ऩवन चरने से सयसय हट होने रगी। तफ

ब्रह्भ ने उस दे वी को व णी की दे वी सयस्वती कह । सयस्वती को फ गीश्वयी, बगवती, श यद , वीण व दनी औय व ग्दे वी
सदहत अनेक न भों से ऩूज ज त है। मे ववद्म औय फुवि प्रद त हैं। सॊगीत की उत्ऩस्त्त्त कयने के क यण मे सॊगीत

की दे वी बी हैं। फसन्त ऩॊचभी के ददन को इनके जन्भोत्सव के रूऩ भें बी भन ते हैं। ऋग्वेद भें बगवती सयस्वती क
वणजन कयते हुए कह गम है - प्रणो दे वी सयस्वती व जेलबवजस्त्जनीवती धीन भखणिमवतु। अथ जत मे ऩयभ चेतन हैं।
सयस्वती के रूऩ भें मे हभ यी फुवि, प्रऻ तथ भनोवस्त्ृ त्तमों की सॊयक्षऺक हैं। हभभें जो आच य औय भेध है उसक

आध य बगवती सयस्वती ही हैं। इनकी सभवृ ि औय स्वरूऩ क वैबव अद्भत
ु है। ऩुय णों के अनुस य श्रीकृष्ण ने
सयस्वती से खश
ु होकय उन्हें वयद न ददम थ कक वसॊत ऩॊचभी के ददन तम्
ु ह यी बी आय धन की ज एगी औय मॉू

ब यत के कई दहस्सों भें वसॊत ऩॊचभी के ददन ववद्म की दे वी सयस्वती की बी ऩज
होने रगी जो कक आज तक

ज यी है।[१] ऩतॊगफ जी क वसॊत से कोई सीध सॊफध
ॊ नहीॊ है। रेककन ऩतॊग उड ने क रयव ज हज यों स र ऩहरे चीन
भें शरू
ु हुआ औय कपय कोरयम औय ज ऩ न के य स्ते होत हुआ ब यत ऩहुॉच ।
ऋतुराज बसंत के स्वागत का ऩवव बसंत ऩंचमी
फसॊत ऩॊचभी ध लभजक एवॊ नई ऋतु आने क ऩवज है। भ घ भ स के फीस ददन व्मतीत होते-होते शीत क प्रकोऩ क पी

कभ हो ज त है औय लशलशय के ऩश्च त ऋतयु ज फसन्त क आगभन होने रगत है। मद्मवऩ ऩेडों ऩय नमे ऩत्ते औय
फसन्त ऋतु तो चैि -वैश ख भें ही आती है , ऩयन्तु फसन्त ऋतु के स्व गत भें मह त्मोह य भन म ज त है। इसके स थ
ही इसक फहुत अचधक ध लभजक भहत्व बी है। आज बगव न ववष्णु औय भ तेश्वयी सयस्वतीजी की ऩूज तो की ही
ज ती है क भदे व तथ उनकी ऩत्नी यतत की ऩज
क बी ववलशष्ट ववध न है।

आज ववद्म औय कर की अचधष्ठ िी दे वी सयस्वतीजी क जन्भ ददवस है। मही क यण है कक नवय िों भें दग
ु ज ऩूज
के सभ न ही आज फडी धूभध भ से वीण व ददनी सयस्वतीजी की ऩूज की ज ती है। सयस्वती ऩूजन के लरए एक

ददन ऩूवज से ही तनमभऩूवक
ज यहकय, दस
ू ये ददन तनत्म कभों से तनवत्ृ त होकय करश स्थ वऩत कयें । सवजप्रथभ गणेश, सूम,ज
ववष्णु, शॊकय आदद बगव न की ऩूज कयके सयस्वतीजी क ऩूजन कयन च दहए।

सयस्वतीजी की ऩूज भें ऩीरे यॊ ग की वस्तुओॊ औय पूरों के प्रमोग क ववलशष्ट भहत्व है। दे वी के स भने ऩुस्तक

यखकय दक्षऺण अवऩजत कय आयती उत यी ज मे औय व सॊती वस्ि ऩहने ज एॊ। ये वडडमों, केरों, ककसोय इत्म दद क बोग
रग म ज मे। भीठे केसरयम च वर फन मे ज एॊ। बगव न की भूततज तथ दे वी सयस्वती की प्रततभ को केसरयम यॊ ग
के वस्ि ऩहन ने च दहए। मह ऩूज -उत्सव बफह य तथ फॊग र भें फडी धूभध भ से लशऺ सॊस्थ नों तथ घयों भें भन म
ज त है।

भ तेश्वयी सयस्वती औय बगव न ववष्णु के अततरयतत आज क भदे व औय यतत की ऩूज बी होती है। फसन्त क भदे व
क सहचय है इसलरए क भदे व औय यतत की ऩूज कयके उनकी प्रसन्नत प्र प्त कयनी च दहए। आज ऩतत को स्वमॊ
ऩयोसकय ख न अवश्म खखर में। इससे ऩतत के कष्टों क तनव यण होत है औय उसकी आमु भें वस्त्ृ दद होती है।

फसन्त ऩॊचभी को प्र त:क र तेर तथ उफटन रग कय स्न न कयन च दहए औय ऩववि वस्ि ध यण कयके बगव न
न य मण क ववचधऩूवक
ज ऩूजन कयन च दहए। इसके फ द वऩत-ृ तऩजण औय ब्र म्हण बोजन क बी ववध न है। भॊददयों भें
बगव न की प्रततभ क व सन्ती वस्िों औय ऩुष्ऩों से श्रॊग
ृ य बी ककम ज त है तथ फड उत्सव भन म ज त है। इस
ऩॊचभी को रोग ऩहरे गुर र उड ते थे औय व सन्ती वस्ि ध यण कय नवीन उत्स ह औय प्रसन्नत के स थ अनेक
प्रक य के भनोववनोद कयते थे। मही क यण है कक फसन्त ऩॊचभी को यॊ ग ऩॊचभी बी कह ज त है।
ऻ न औय कर की दे वी क जन्भददन है वसॊत ऩॊचभी
वसॊत ऋतु आते ही प्रकृतत क कण-कण खखर उठत है। भ नव तो तम ऩश-ु ऩऺी तक उल्र स से बय ज ते हैं। हय
ददन नमी उभॊग से सम
ू ोदम होत है औय नमी चेतन प्रद न कय अगरे ददन कपय आने क आश्व सन दे कय चर
ज त है।

मों तो भ घ क मह ऩयू भ स ही उत्स ह दे ने व र है , ऩय वसॊत ऩॊचभी (भ घ शत
ु र 5) क ऩवज ब यतीम जनजीवन को
अनेक तयह से प्रब ववत कयत है। प्र चीनक र से इसे ऻ न औय कर की दे वी भ ॊ सयस्वती क जन्भददवस भ न

ज त है। जो लशऺ ववद ब यत औय ब यतीमत से प्रेभ कयते हैं, वे इस ददन भ ॊ श यदे की ऩज
कय उनसे औय अचधक

ऻ नव न होने की प्र थजन कयते हैं।

कर क यों क तो कहन ही तम ? जो भहत्व सैतनकों के लरए अऩने शस्िों औय ववजम दशभी क है , जो ववद्व नों के
लरए अऩनी ऩुस्तकों औय व्म स ऩूखणजभ क है, जो व्म ऩ रयमों के लरए अऩने तय जू, फ ट, फहीख तों औय दीऩ वरी क
है, वही भहत्व कर क यों के लरए वसॊत ऩॊचभी क है। च हे वे कवव हों म रेखक, ग मक हों म व दक, न टकक य हों
म नत्ृ मक य, सफ ददन क प्र यम्ब अऩने उऩकयणों की ऩूज औय भ ॊ सयस्वती की वॊदन से कयते हैं।
ऩवव का महत्व
वसॊत ऋतु आते ही प्रकृतत क कण-कण खखर उठत है। भ नव तो तम ऩशु-ऩऺी तक उल्र स से बय ज ते हैं। हय
ददन नमी उभॊग से सम
ू ोदम होत है औय नमी चेतन प्रद न कय अगरे ददन कपय आने क आश्व सन दे कय चर

ज त है। मों तो भ घ क मह ऩूय भ स ही उत्स ह दे ने व र है, ऩय वसॊत ऩॊचभी (भ घ शत
ु र 5) क ऩवज ब यतीम
जनजीवन को अनेक तयह से प्रब ववत कयत है। प्र चीनक र से इसे ऻ न औय कर की दे वी भ ॊ सयस्वती क

जन्भददवस भ न ज त है। जो लशऺ ववद ब यत औय ब यतीमत से प्रेभ कयते हैं, वे इस ददन भ ॊ श यदे की ऩूज कय
उनसे औय अचधक ऻ नव न होने की प्र थजन कयते हैं। कर क यों क तो कहन ही तम ? जो भहत्व सैतनकों के लरए

अऩने शस्िों औय ववजम दशभी क है, जो ववद्व नों के लरए अऩनी ऩुस्तकों औय व्म स ऩूखणजभ क है, जो व्म ऩ रयमों
के लरए अऩने तय जू, फ ट, फहीख तों औय दीऩ वरी क है, वही भहत्व कर क यों के लरए वसॊत ऩॊचभी क है। च हे वे
कवव हों म रेखक, ग मक हों म व दक, न टकक य हों म नत्ृ मक य, सफ ददन क प्र यम्ब अऩने उऩकयणों की ऩूज
औय भ ॊ सयस्वती की वॊदन से कयते हैं।
ऩौय खणक भहत्व
इसके स थ ही मह ऩवज हभें अतीत की अनेक प्रेयक घटन ओॊ की बी म द ददर त है। सवजप्रथभ तो मह हभें िेत मुग

से जोडती है। य वण द्व य सीत के हयण के फ द श्रीय भ उसकी खोज भें दक्षऺण की ओय फढे । इसभें स्त्जन स्थ नों ऩय
वे गमे, उनभें दॊ डक यण्म बी थ । महीॊ शफयी न भक बीरनी यहती थी। जफ य भ उसकी कुदटम भें ऩध ये , तो वह सुधफुध खो फैठी औय चख-चखकय भीठे फेय य भ जी को खखर ने रगी। प्रेभ भें ऩगे झूठे फेयों व री इस घटन को

य भकथ के सबी ग मकों ने अऩने-अऩने ढॊ ग से प्रस्तत
ु ककम । दॊ डक यण्म क वह ऺेि इन ददनों गज
ु य त औय भदम
प्रदे श भें पैर है। गज
ु य त के ड ॊग स्त्जरे भें वह स्थ न है जह ॊ शफयी भ ॊ क आश्रभ थ । वसॊत ऩॊचभी के ददन ही

य भचॊद्र जी वह ॊ आमे थे। उस ऺेि के वनव सी आज बी एक लशर को ऩज
ू ते हैं, स्त्जसके फ ये भें उनकी श्रदद है कक
श्रीय भ आकय महीॊ फैठे थे। वह ॊ शफयी भ त क भॊददय बी है।
ऐततहाससक महत्व

वसॊत ऩॊचभी क ददन हभें ऩथ्
ृ वीय ज चौह न की बी म द ददर त है। उन्होंने ववदे शी हभर वय भोहम्भद गौयी को 16
फ य ऩय स्त्जत ककम औय उद यत ददख ते हुए हय फ य जीववत छोड ददम , ऩय जफ सिहवीॊ फ य वे ऩय स्त्जत हुए, तो
भोहम्भद गौयी ने उन्हें नहीॊ छोड । वह उन्हें अऩने स थ अपग तनस्त न रे गम औय उनकी आॊखें पोड दीॊ। इसके
फ द की घटन तो जगप्रलसदद ही है। गौयी ने भत्ृ मद
ु ॊ ड दे ने से ऩूवज उनके शब्दबेदी फ ण क कभ र दे खन च ह ।

ऩथ्
ृ वीय ज के स थी कवव चॊदफयद ई के ऩय भशज ऩय गौयी ने ऊॊचे स्थ न ऩय फैठकय तवे ऩय चोट भ यकय सॊकेत ककम ।
तबी चॊदफयद ई ने ऩथ्
ृ वीय ज को सॊदेश ददम । च य फ ॊस चौफीस गज, अॊगुर अष्ट प्रभ णत ऊऩय सुल्त न है, भत चूको
चौह न॥ ऩथ्
ृ वीय ज चौह न ने इस फ य बूर नहीॊ की। उन्होंने तवे ऩय हुई चोट औय चॊद्रफयद ई के सॊकेत से अनुभ न
रग कय जो फ ण भ य , वह गौयी के सीने भें ज धॊस । इसके फ द चॊदफयद ई औय ऩथ्
ू ये के ऩेट
ृ वीय ज ने बी एक दस

भें छुय बौंककय आत्भफलरद न दे ददम । (1192 ई) मह घटन बी वसॊत ऩॊचभी व रे ददन ही हुई थी। वसॊत ऩॊचभी क
र हौय तनव सी वीय हकीकत से बी गहय सॊफॊध है। एक ददन जफ भुल्र जी ककसी क भ से ववद्म रम छोडकय चरे

गमे, तो सफ फच्चे खेरने रगे, ऩय वह ऩढत यह । जफ अन्म फच्चों ने उसे छे ड , तो दग
ु ज भ ॊ की सौगॊध दी। भुस्त्स्रभ
फ रकों ने दग
ु ज भ ॊ की हॊसी उड ई। हकीकत ने कह कक मदद भें तुम्ह यी फीफी प ततभ के फ ये भें कुछ कहूॊ, तो तुम्हें
कैस रगेग ? फस कपय तम थ , भल्
ु र जी के आते ही उन शय यती छ िों ने लशक मत कय दी कक इसने फीफी प ततभ
को ग री दी है। कपय तो फ त फढते हुए क जी तक ज ऩहुॊची। भस्त्ु स्रभ श सन भें वही तनणजम हुआ, स्त्जसकी अऩेऺ
थी। आदे श हो गम कक म तो हकीकत भस
ु रभ न फन ज मे, अन्मथ उसे भत्ृ मद
ु ॊ ड ददम ज मेग । हकीकत ने मह

स्वीक य नहीॊ ककम । ऩरयण भत: उसे तरव य के घ ट उत यने क पयभ न ज यी हो गम । कहते हैं उसके बोरे भख
ु को
दे खकय जल्र द के ह थ से तरव य चगय गमी। हकीकत ने तरव य उसके ह थ भें दी औय कह कक जफ भैं फच्च

होकय अऩने धभज क ऩ रन कय यह हूॊ, तो तभ
ु फडे होकय अऩने धभज से तमों ववभख
ु हो यहे हो? इस ऩय जल्र द ने
ददर भजफूत कय तरव य चर दी, ऩय उस वीय क शीश धयती ऩय नहीॊ चगय । वह आक शभ गज से सीध स्वगज चर
गम । मह घटन वसॊत ऩॊचभी (23.2.1734) को ही हुई थी। ऩ ककस्त न मद्मवऩ भस्त्ु स्रभ दे श है, ऩय हकीकत के
आक शग भी शीश की म द भें वह ॊ वसॊत ऩॊचभी ऩय ऩतॊगें उड ई ज ती है। हकीकत र हौय क तनव सी थ । अत:

ऩतॊगफ जी क सव जचधक जोय र हौय भें यहत है। वसॊत ऩॊचभी हभें गुरू य भलसॊह कूक की बी म द ददर ती है। उनक

जन्भ 1816 ई. भें वसॊत ऩॊचभी ऩय रुचधम न के बैणी ग्र भ भें हुआ थ । कुछ सभम वे यणजीत लसॊह की सेन भें यहे ,
कपय घय आकय खेतीफ डी भें रग गमे, ऩय आदम स्त्त्भक प्रवस्त्ष्त्त होने के क यण इनके प्रवचन सुनने रोग आने रगे।
धीये -धीये इनके लशश्मों क एक अरग ऩॊथ ही फन गम , जो कूक ऩॊथ कहर म । गुरू य भलसॊह गोयऺ , स्वदे शी, न यी
उदद य, अॊतयज तीम ववव ह, स भूदहक ववव ह आदद ऩय फहुत जोय दे ते थे। उन्होंने बी सवजप्रथभ अॊग्रेजी श सन क
फदहश्क य कय अऩनी स्वतॊि ड क औय प्रश सन व्मवस्थ चर मी थी। प्रततवषज भकय सॊक् ॊतत ऩय बैणी ग व
ॊ भें भेर

रगत थ । 1872 भें भेरे भें आते सभम उनके एक लशष्म को भुसरभ नों ने घेय लरम । उन्होंने उसे ऩीट औय गोवध
कय उसके भुॊह भें गोभ स
ॊ ठूॊस ददम । मह सुनकय गुरू य भलसॊह के लशष्म बडक गमे। उन्होंने उस ग ॊव ऩय हभर

फोर ददम , ऩय दस
ू यी ओय से अॊग्रेज सेन आ गमी। अत: मुदद क ऩ स ऩरट गम । इस सॊघषज भें अनेक कूक वीय

शहीद हुए औय 68 ऩकड लरमे गमे। इनभें से 50 को सिह जनवयी 1872 को भरेयकोटर भें तोऩ के स भने खड कय

उड ददम गम । शेष 18 को अगरे ददन प ॊसी दी गमी। दो ददन फ द गरू
ु य भलसॊह को बी ऩकडकय फभ ज की भ ॊडरे
जेर भें बेज ददम गम । 14 स र तक वह ॊ कठोय अत्म च य सहकय 1885 ई. भें उन्होंने अऩन शयीय त्म ग ददम ।
जन्म ददवस
वसॊत ऩॊचभी दहन्दी स दहत्म की अभय ववबूतत भह कवव सूमक
ज ॊत बिऩ ठी 'तनय र ' क जन्भददवस (28.02.1899) बी है।

तनय र जी के भन भें तनधजनों के प्रतत अऩ य प्रेभ औय ऩीड थी। वे अऩने ऩैसे औय वस्ि खुरे भन से तनधजनों को दे
ड रते थे। इस क यण रोग उन्हें 'भह प्र ण' कहते थे। एक फ य नेहरूजी ने श सन की ओय से कुछ सहमोग क प्रफॊध

ककम , ऩय वह य लश उन्होंने भह दे वी वभ ज को लबजव ई। उन्हें बम थ कक मदद वह य लश तनय र जी को लभरी, तो वे
उसे बी तनधजनों भें फ ॊट दें गे। जह ॊ एक ओय वसॊत ऋतु हभ ये भन भें उल्र स क सॊच य कयती है, वहीॊ दस
ू यी ओय मह
हभें उन वीयों क बी स्भयण कय ती है , स्त्जन्होंने दे श औय धभज के लरए अऩने प्र णों की फलर दे दी।

अन्य ऩवव सम्बंधधत जानकाररयां
वसॊत ऩॊचभी क ददन भ ॊ सयस्वती के जन्भ उत्सव के रूऩ भें भन म ज त है। स थ-स थ इस ददन को अफूझ भुहूतज
के न भ से बी ज न ज त है।फसॊत ऩॊचभी के ददन कोई बी नम क भ प्र यम्ब कयन शब
ु भ न ज त है। इसी
क यण ऋवषमों ने वसन्त ऩॊचभी के ददन सयस्वती ऩज
की प्रथ चरी आ यही है। ककसी बी कर औय सॊगीत कक

लशऺ प्र यम्ब कयने से ऩव
ू ज भ त सयस्वती क ऩज
ू न कयन शब
ु होत है।

जो छ ि भेहनत के स थ भ त सयस्वती की आय धन कयते है। उन्हें ऻ न के स थ स थ सम्भ न की प्र स्त्प्त बी होती
है। वसॊत ऩॊचभी के ददन सफसे ऩहरे श्री गणेश क ऩूजन ककम ज त है। श्री गणेश के फ द भ ॊ सयस्वती क ऩूजन
ककम ज त है। लशऺ , चतुयत के ऊऩय वववेक क अॊकुश रग ती है।वसॊत ऩॊचभी के ददन भ ॊ सयस्वती के बोग भें
ववशेष रूऩ से च वर क बोग रग म ज त है।

इसक क यण मह है कक भ ॊ सयस्वती को श्वेत यॊ ग फहुत वप्रम है स थ ही च वर को सक य त्भक ऊज ज क प्रतीक
भ न ज त है। ऐसी भ न्मत है कक च वर क बोग रग ने से घय के सबी सदस्मों को भ ॊ सयस्वती के आशीव द के
स थ सक य त्भक फुवि की बी प्र स्त्प्त होती है।

मह ऩूज ऩूवी ब यत भें फडे उल्र स से भन ई ज ती है. इस ददन स्त्स्िम ॊ ऩीरे वस्ि ध यण कयती हैं.
प्र चीन ब यत भें ऩूये स र को स्त्जन छह भौसभों भें फ ॉट ज त थ उनभें वसॊत रोगों क सफसे भनच ह भौसभ

थ .इस ऋतु भें भन भें उल्र स औय भस्ती छ ज ती है तथ उभॊग बय दे ने व रे कई तयह के ऩरयवतजन दे खने को
लभरते हैं.

इससे शयद ऋतु की ववद ई के स थ ही ऩेड ऩौधों औय प्र खणमों भें नवजीवन क सॊच य होत है. प्रकृतत नख से लशख
तक सजी नजय आती है औय तततलरम ॊ तथ बॊवये पूरों ऩय भॊडय कय भस्ती क गॊज
ु न ग न कयते ददख ई दे ते हैं.
हय ओय भ दकत क आरभ यहत है.

आमुवेद भें वसॊत को स्व स्थ्म के लरए दहतकय भ न गम है. ह र ॊकक इस दौय न हव भें उडते ऩय ग कणों से
एरजी ख सकय आॊखों की एरजी से ऩीडडत रोगों की सभस्म फढ बी ज ती है.

वसॊत ऩॊचभी को त्मोह य के रूऩ भें भन ए ज ने के ऩीछे कई तयह की भ न्मत एॊ हैं.
ब यतीम दशजन से जुडे नवग्रह फजयॊ ग अनुॊसध न केंद्र के सॊच रक गोववन्द वत्स क कहन है कक ऐस भ न ज त है
कक वसॊत ऩॊचभी के ददन ही दे वी सयस्वती क अवतयण हुआ थ . इसीलरए इस ददन ववद्म तथ सॊगीत की दे वी की
ऩूज की ज ती है.
उन्होंने कह कक इस ददन ऩीरे यॊ ग के कऩडे ऩहनने क चरन है तमोंकक वसॊत भें सयसों ऩय आने व रे ऩीरे पूरों
से सभूची धयती ऩीरी नजय आती है.

ज्मोततष च मज के.के शभ ज के अनुस य वसॊत ऩॊचभी के ऩीछे एक भ न्मत मह बी है कक इसी ददन ब गीयथ की

तऩस्म के चरते गॊग क अवतयण हुआ थ स्त्जससे सभूची धयती खुशह र हो गई थी. उन्होंने कह कक भ घ भ ह
के शत
ु र ऩऺ भें ऩडने व री ऩॊचभी ऩय गॊग स्न न क क पी भहत्व है.

ऩयु णों के अनस
ु य एक भ न्मत मह बी है कक वसॊत ऩॊचभी के ददन बगव न श्रीकृष्ण ने ऩहरी फ य सयस्वती की
ऩज
की थी औय तफ से वसॊत ऩॊचभी के ददन सयस्वती की ऩज
कयने क ववध न हो गम .

प्र चीन क र भें वसॊत ऩॊचभी क ददन भदनोत्सव औय वसॊतोत्सव के रूऩ भें भन म ज त थ . इस ददन स्त्स्िम ॊ
अऩने ऩतत की ऩूज क भदे व के रूऩ भें कयती थीॊ.
ज्मोततष च मज वीके श स्िी के अनुस य वसॊत ऩॊचभी के ददन ही क भदे व औय यतत ने ऩहरी फ य भ नव रृदम भें प्रेभ
एवॊ आकषजण क सॊच य ककम थ . तबी से मह ददन ‘वसॊतोत्सव’ तथ ‘भदनोत्सव’ के रूऩ भें भन म ज ने रग .

श स्िी ने कह कक वसॊत ऩॊचभी इस फ त क सॊकेत दे ती है कक धयती से अफ शयद की ववद ई हो चुकी है. अफ ऐसी
ऋतु आ चुकी है जो जीव जॊतुओॊ तथ ऩे ड ऩौधों भें नवजीवन क सॊच य कय दे गी.

वसॊत भें भ दकत औय क भुकत सॊफॊधी कई तयह के श यीरयक ऩरयवतजन दे खने को लभरते हैं स्त्जसक आमुवेद भें
व्म ऩक वणजन है.

भहवषजमों-भनीवषमों ने कह है कक वसॊत ऩॊचभी को ऩयू ी श्रि से सयस्वती की ऩज
कयनी च दहए. फच्चों को इस ददन

अऺय ऻ न कय न औय फोरन लसख न शब
ु भ न ज त है.

वसॊत ऩॊचभी को श्री ऩॊचभी बी कह ज त है जो सख
ु -सभवृ ि औय उत्तभ स्व स्थ्म प्रद न कयने क ऩरयच मक है.इस
ददन ऩतॊग उड ने की बी ऩयॊ ऩय है जो भनष्ु म के भन भें बये उल्र स को प्रकट कयने क भ दमभ है.

वसॊत ऩॊचभी ऩय ही दहन्दी स दहत्म की अभय ववबतू त भह कवव सूमक
ज ॊत बिऩ ठी ‘तनय र ’ क जन्भददवस
(28.02.1899) बी है.

श्रीसरस्वतीदे वीकी व्युत्ऩत्त्त एवं अथव
‘सयस् अवती’, अथ जत ् एक गततभें ऻ न दे नेव री अथ जत ् गततभतत । तनस्त्ष्क्म ब्रह्भ क सकक्म रूऩ; इसीलरए

उन्हें ‘ब्रह्भ -ववष्णु-भहे श’, तीनोंको गतत दे नेव री शस्त्तत कहते हैं ।ऩद्मऩुय णभें वखणजत भ ॊ सयस्वती क रूऩ प्रेयण द मी
है। वे शभ्र
ु वस्िऩहने हैं। उनके च य ह थ हैं, स्त्जनभें वीण , ऩुस्तक औय अऺयभ र है। उनक व हन हॊस है। शभ्र
ु वस्ि

हभें प्रेयण दे ते हैं कक हभ अऩने बीतय सत्म अदहॊस , ऺभ , सहनशीरत , करुण , प्रेभ व ऩयोऩक य आदद सद्गुणों को
फढ एॊ औय क भ, क्ोध, भद, रोब, भोह, अहॊक य आदद दग
ु ण
ुज ों से स्वमॊ को फच एॊ। च य ह थ हभ ये भन, फुवि, चचत्त,

अहॊक य रूऩी अॊत:कयण चतुष्ट्म क प्रतीक हैं। ऩस्
ु तक ऻ न क प्रतीक है , अऺयभ र हभें अदम त्भ की ओय प्रेरयत

कयती है। दो ह थों भें वीण हभें रलरत कर ओॊ भें प्रवीण होने की प्रेयण दे ती है। स्त्जस प्रक य वीण के सबी त यों भें
स भॊजस्म होने से रमफि सॊगीत तनकरत है, उसी प्रक य भनष्ु म अऩने जीवन भें भन व फवु ि क सही त यतम्म
यखे, तो सख
ु , श ॊतत, सभवृ ि व अनेक उऩरस्त्ब्धम ॊ प्र प्त कय सकत है। श्रीसयस्वती भ त क व हन हॊस वववेक क
ऩरयच मक है। वववेक के द्व य ही अच्छ ई-फयु ई भें अॊतय कयके अच्छ ई ग्रहण की ज सकती है।
बसंत ऩंचमीऩर श्रीसरस्वती ऩूजनका शास्रीय आधार क्या है ?
भ ॊ सयस्वती ववद्म , फवु ि, ऻ न व वववेक की अचधष्ठ िी दे वी हैं। उनसे हभ वववेक व फवु ि प्रखय होने , व णी

भधयु व भख
ु य होने औय ऻ न स धन भें उत्तयोत्तय ववृ ि होने की क भन कयते हैं। ऩुय णों के अनस
ु य, वसॊत ऩॊचभी

के ददन ब्रह्भ जी के भख
ु से भ ॊ सयस्वती क प्र कट्म हुआ थ औय जड-चेतन को व णी लभरी थी। इसीलरए वसॊत
ऩॊचभी को ववद्म जमॊती बी कह ज त है औय इस ददन श्रीसयस्वती ऩूज क ववध न है। श्रीभद्भगवद्गीत भें श्रीकृष्ण
ने दसवें अदम म के 35वें श्रोक भें वसॊत ऋतु को अऩनी ववबूतत फत म है। उन्होंने कह है कक वसॊत ऋतु भैं ही हूॊ।
श्री सरस्वतीदे वीको ब्रह्माकी शत्क्त क्यों मानते हैं ?
‘ब्रह्भ की शस्त्तत उसे एकरूऩ ही होती है । आवश्मकत नुस य वह क मजयत होती है ।’ भ नव इस फ तको सभझ

ऩ ए, इसलरए कहते हैं, ‘श्री सयस्वतीदे वी ब्रह्भ की शस्त्तत हैं ।’