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बाल विकास भाग १

विनने तीन लोक त्रैकावलक ,सकल िस्तु को दे ख वलया।


लोकालोक प्रकाशी ज्ञानी, युगपत सबको िान वलया॥
राग द्वे ष िर मरणभयािह , नही विनका संस्पशश करें ।
अक्षय सुख पथ के िे नेता, िग में मंगल सदा करें ॥१॥

चन्द्र वकरण चंदन गंगा िल से भी शीतल िो िाणी।


िन्म मरण भय रोग वनिारण करने में है कुशलानी।
सप्त भंग युत स्यादिाद मय, गंगा िगत पवित्र करे ।
सबकी पाप धूवल को धोकर ,िग में मंगल वनत्य करे ॥ २॥

विषय िासना रवहत वनराम्बर,सकल पररग्रह त्याग वदया।


सब िीिों को अभय दान दे , वनभशय पद को प्राप्त वकया।।
भि समुद्र में पवतत िनों को , सच्चे अिलंबन दाता।
मंगलस्तुवत िे गुरु िर मम हृदय विरािो, सब िन को मंगल दाता ॥ ३॥

अनंत भि के अगवणत दु ुःख से िो िन का उद्धार करे ।


इन्द्रन्द्रय सुख दे कर वशि सुख में ले िाकर िो शीघ्र धरे ।।
धमश िही है तीन रत्न मय वत्रभुिन की सम्पवत दे िे।
उसके आश्रय से सब िन को, भि-भि में मंगल होिे ॥ ४॥

श्री गुरु का उपदे श ग्रहण कर, वनत्य ह्रदय में धारें हम।
क्रोध मान मायावदक छोड़ कर , विद्या का फल पािें हम।।
सबसे मैत्री दया क्षमा हो,सबसे ित्सल भाि रहे ।
सम्यक ज्ञानमती प्रगवित हो अमंगल दू र रहे ॥ ५॥
णमोकार मंत्र

णमो अररहं ताणं अररहं तों को नमस्कार हो

णमो वसद्धाणं वसद्धों को नमस्कार हो

णमो आइररयाणं आचायों को नमस्कार हो

णमो उिज्झायाणं उपाध्यायों को नमस्कार हो

णमो लोए सव्वसाहूणं लोक में सिश साधुओं को नमस्कार हो


णमोकार मंत्र का महात्म्य
िीिं धर कुमार ने मरते हुए कुत्ते को णमोकार मंत्र सु नाया। विसके
प्रभाि से कुत्ता मरकर दे ि गती में सु दशश न यक्षेन्द्र हो गया। उसने
िापस आकर िीिं धर कुमार को नमस्कार वकया और स्तुवत की।

एसो पंच णमोयारो , सव्वपावप्पणासणो।


मंगलाणं च सव्वे ससं , पढमं हवइ मंगलं।

अर्थ- ये पंच नमस्कार मंत्र सब पापों का नाश करने िाला है और सब


मंगलो में पहला मंगल है ।

वशष्य- गु रूिी! क्या हम लोग पां चों परमेष्ठी में से वकसी का पद प्राप्त
कर सकते हैं ॽ
अध्यापक- हााँ आप लोग मनुष्य पयाश य से पााँ चों परमेष्ठी के पद प्राप्त
कर सकते हैं । दे खो ! वदगम्बर मुवनयों के सं घ में आचायश, उपाध्याय
और साधु ये तीनों परमेष्ठी रहते हैं । ये ही मुवन आगे अहं त,वसद्ध भी बन
सकते हैं ।
णमोकार मंत्र के अपमान का कुफल

सिष्य- गुरूिी! यह रािा णमोकार मंत्र पर पैर क्यों रख रहा


है ?

अध्यापक - यह रािा सुभौम चक्रिती छह खण्ों का स्वामी


है । एक ज्योवतष्क दे ि ने शत्रुता से रािा को मारना चाहा
परन्तु रािा के णमोकार मंत्र िपने से िह मार नहीं सका। तब
उसने छल से कहा वक राजन्! तुम इस मंत्र को वलखकर उस
पर पैर रख दो, तब मैं तुम्हें छोड़ दू ाँ गा। रािा ने िैसा ही वकया।
मंत्र के अपमान से दे ि ने रािा को समुद्र में डु बो वदया। इस
प्रकार िह रािा मरकर सातिें नरक में चला गया।
चौबीस तीर्ंकर
िीि के भेद

संसारी मुक्त

मैं संसारी िीि हूाँ । अनावद काल से संसार में विन्ोंने आठों कमों का नाश कर वदया है , िो
ही घू मकर िन्म-मरण के दु :ख उठा रहा हूाँ । संसार के दु :खों से, िन्म-मरण के चक्कर से
छूि गये हैं , िो लौिकर संसार में कभी नहीं
मेरे साथ आठों कमश लगे हुए हैं , इसवलये मैं आिें गे, िे मुक्त िीि या वसद्ध परमात्मा
संसारी हूाँ । मनुष्य, दे ि, नारकी और वतयंच ये कहलाते हैं ।
सब संसारी िीि हैं ।
सच्चे दे ि, शास्त्र और गुरु

िीतरागी, सिशज्ञ और वहतोपदे शी हैं तथा अहं त, तीथंकर,


विनेन्द्र आवद नामों से िाने िाते हैं , िे सच्चे दे ि कहलाते हैं ।

िो सिशज्ञ दे ि का कहा हुआ है और उन्ीं के िचनों के आधार


पर आचायों द्वारा कहा गया है , िही सच्चा शास्त्र है , उसे
विनिाणी भी कहते हैं ।

िो विषयों की आशा से रवहत हैं , सम्पूणश आरम्भ और पररग्रह


से रवहत हैं , नग्न वदगम्बर मुवन हैं , िे सच्चे गुरू हैं , उन्ें ही
साधु, आचायश, सद् गुरू और तपस्वी कहते हैं ।

मैं प्रवतवदन विनमन्द्रिर में िाकर विनेन्द्रदे ि की प्रवतमा का


दशशन करता हूाँ एिं मुवनयों को नमोस्तु भी करता हूाँ , अब सच्चे
शास्त्रों का स्वाध्याय भी करू ाँ गा।
दे ि भन्द्रक्त का सुफल
एक मेंढक भगिान की भन्द्रक्त में गद्गद होकर कमल
पंखुड़ी को मुख में दबाकर दशशन के वलये चल पड़ा।
मागश में रािा श्रेवणक के हाथी के पैर के नीचे दब गया
और शुभ भािों से मरकर स्वगश में दे ि हो गया। िहााँ से
तत्क्षण ही भगिान के समिसरण में दशशन करने आ
गया। रािा श्रेवणक ने उस दे ि के मुकुि में मेंढक का
वचन् दे खकर श्री गौतम स्वामी से उसका पररचय पूछा।
िहााँ सभी लोग दे ि-दशशन की भािना के फल को सुनकर
बहुत ही प्रसन्न हुए।

दे खो बालकों! भगिान के दशशन की भािना से भी वकतना


पुण्य बन्ध होता है । कभी भी खाली हाथ से भगिान और
गुरू का दशशन नहीं करना चावहए। चािल, लौंग, सुपारी,
फल आवद चढाकर ही दशशन करना चावहये ।
दे व प्रसतमा के अपमान का
कुफल
रानी कनकोदरी ने पट्टरानी पद के अवभमान से अपनी
सौत के ऊपर क्रोध करके उसके चैत्यालय से विन
प्रवतमा को माँगाकर बाहर डलिा वदया, पुन: संयमश्री
आवयशका के समझाने से िापस प्रवतमा को चैत्यालय में
विरािमान करके बहुत प्रकार से पूिा की और
प्रायवित वकया।

िही रानी अगले भि में अंिना हो गई। िहााँ उस पाप


का उदय आ िाने से बाईस िषश तक उसे (अंिना को)
पवत के वियोग का दु :ख सहना पड़ा।

वप्रय बालक-बावलकाओं! तुम्हें विनेन्द्र भगिान की


प्रवतमा का मन-िचन-काय से कभी अपमान नहीं
करना चावहये।
गुरु भन्द्रक्त का सुफल

मौयश सम्राि ‘चन्द्रगुप्त मुवनराि’ श्रुतकेिली श्री भद्रबाहु की


समावध के पिात् स्थावपत गुरूचरण की भन्द्रक्त करते हुए बारह
िषों तक िन में रहे , विसके प्रभाि से दे िों ने िन में ही नगर
बसाकर उनको आहार दान वदया। िब संघ िापस आया तब
उनमें से एक मुवन आहार के बाद कमंडलु भूल आये, सो
मध्यान् में लेने गये, तब िहााँ िन में कमंडलु पेड़ पर लिकता
हुआ दे खा।

इस घिना से यह मालूम हुआ वक चन्द्रगुप्त मुवनराि की गुरू-


भन्द्रक्त से प्रसन्न होकर दे िों ने आहार कराया था। उस समय
चन्द्रगुप्त ने प्रायवित वकया क्योंवक िैन मुवन दे िों के हाथ से
आहार नहीं लेते हैं ।

वप्रय बालकों! िब गुरू-भन्द्रक्त से मुन्द्रक्त तक वमल सकती है


तब दे िता भन्द्रक्त करने लगें, यह कोई बड़ी बात नही ं है ।
गुरु वनिा का कुफल

एक बार चतुविशध संघ (मुवन, आवयशका, श्रािक,


श्राविका) सम्मेद वशखर िाते हुए ‘अंवतक’ नामक ग्राम
से वनकला। उस समय नग्न मुवनयों को दे खकर सब
लोग हाँ सने लगे और वनिा करने लगे। एक कुम्भकार
ने सबको हाँ सी करने से मना वकया और संघ की स्तुवत
की। कदावचत् गााँ ि में आग लगकर साठ हिार लोग
सब एक साथ मरकर मुवनयों की हाँ सी करने के
फलस्वरूप कौड़ी पयाश य (दो इन्द्रन्द्रय) में उत्पन्न हो गये
पुन: मरकर वगिाई हो गये। बहुत भिों तक एक साथ
दु :ख भोगते-भोगते कदावचत् सगर चक्रिती के साठ
हिार पुत्र हो गये।

दे खो बालकों! वकसी की भी हाँ सी और वनिा करना


पाप है वफर मुवनयों की वनिा करना तो महापाप है ।
दे िदशशन विवध
मंवदर के दरिािे में प्रिे श करते ही बोलें -ॐ िय िय िय, वन:सही वन:सही वन:सही। नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु। भगिान के सामने
खड़े होकर दोनों हाथ िोड़कर णमोकार मंत्र पढें । पुन: भगिान की तीन प्रदवक्षणा दे िें। बाँधी मुट्ठी से अाँ गूठा भीतर करके चािल
के पुाँि चढािें ।
भगिान के सामने अररहं त, वसद्ध, आचायश, उपाध्याय, साधु ऐसे पााँ चों पद बोलते हुए क्रम से बीच में, ऊपर, दावहनी तरफ, नीचे
और बाइं तरफ ऐसे पााँ च पुाँि चढािें ।

सरस्वती के सामने प्रथमं करणं चरणं द्रव्यं नम: ऐसे बोलकर क्रम से चार पुाँि लाइन से चढािें । ¯¯¯¯
गु रू के सामने सम्यग्दशश न, सम्यग्ज्ज्ञान, सम्यक्चाररत्र ऐसे बोलकर क्रम से तीन पुाँि लाइन से चढािें । ***
पुन: हाथ िोड़कर वनम्न स्तोत्र बोलें -
हे भगवन्! नेत्रद्वय मेरे, सफल हुये हैं आज अहो।
तव चरणां बुज का दिथन कर, जन्म सफल है आज अहो।।
हे सत्रभुवन के नार्! आपके, दिथन से मालूम होता।
यह संसार जलसि चुल्लू जल, सम हो गया अहो ऐसा।।१।।
अहथ त्सिद्धाचायथ औ, पाठक सािु महान्।
पंच परम गुरू को नमूूँ, भवभव में सुखदान।।२।।

पुन: विवधित् पृथ्वी तल पर मस्तक िे ककर नमस्कार करें ।


धन्यिाद !!