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िवकराल रप ले लेगी पानी की समसया

कोयमबटू र

पानी की कीमत का अंदाजा नही लगा पा रहे भारत के लोगो ने अगर पानी का मोल जलद ही नही
समझा तो वषर 2020 तक देश मे जल की समसया िवकराल रप ले सकती है।

देश मे पानी की उपलबधता की खराब होती िसथित गमभीर िचंता का िवषय बनी हुई है और एक
अनुमान के मुतािबक वषर 2020 तक पानी की उपलबधता पित वयिकत एक हजार कयूिबक मीटर से
भी कम रह जाएगी।

तीसरा िवशयुद पानी के िलए लड़े जाने की आशंकाओं के बीच भारत मे जलसोतो का अंधाधुंध दोहन
हो रहा है नतीजतन कई राजय पानी की समसया से जूझ रहे है। पानी के इसतेमाल के पित लोगो की
लापरवाही अगर बरकरार रही तो भिवषय मे इसके गमभीर पिरणाम भुगतने पड़ सकते है।

यहा एक राषटीय संगोषी मे पसतुत िकए गए अधययन पत मे इस िचंता को वयकत करते हुए बताया
गया िक देश मे 85 पितशत पानी का इसतेमाल खेती के िलए, 10 फीसदी जल का पयोग उदोगो मे
तथा पाच पितशत पानी घरेलू कामो मे इसतेमाल िकया जाता है।

िवश बैक के एक अधययन का िजक करते हुए पत मे कहा गया है िक 10 लाख से जयादा आबादी
वाले 27 एिशयाई शहरो मे पानी की उपलबधता के मामले मे सबसे खराब िसथित वाले महानगर है।
इस फेहिरसत मे दस
ू रे सथान पर जबिक कोलकाता चौथी पायदान पर है।
हहहहह हहह ह हहह हहहह हह हहहहहह

देश मे पानी की उपलबधता की खराब होती िसथित गमभीर िचंता का


िवषय बनी हुई है. जैसे जैसे गमी बढाती जा रही है, वैसे वैसे पानी की समसया भी बढाती जा रही है. एक
अनुमान के मुतािबक वषर 2020 तक पानी की उपलबधता पित वयिकत एक हजार कयूिबक मीटर से भी
कम रह जाएगी। पानी की कीमत का अंदाजा नही लगा पा रहे भारत के लोगो ने अगर पानी का मोल
जलद ही नही समझा तो वषर 2020 तक देश मे जल की समसया िवकराल रप ले सकती है। तीसरा
िवशयुद पानी के िलए लड़े जाने की आशंकाओं के बीच भारत मे जलसोतो का अंधाधुंध दोहन हो रहा है
नतीजतन कई राजय पानी की समसया से जूझ रहे है। पानी के इसतेमाल के पित लोगो की लापरवाही
अगर बरकरार रही तो भिवषय मे इसके गमभीर पिरणाम भुगतने पड़ सकते है।देश मे 85 पितशत पानी
का इसतेमाल खेती के िलए, 10 फीसदी जल का पयोग उदोगो मे तथा पाच पितशत पानी घरेलू कामो
मे इसतेमाल िकया जाता है। िवश बैक के एक अधययन मे कहा गया है िक 10 लाख से जयादा आबादी
वाले 27 एिशयाई शहरो मे चेनई और िदलली पानी की उपलबधता के मामले मे सबसे खराब िसथित वाले
महानगर है। इस फेहिरसत मे मुमबई दस ू रे सथान पर जबिक कोलकाता चौथी पायदान पर है।

पानी की समसया तो वाराणसी मे हर जगह पर है लेिकन सबसे जयादा पानी की समसया वाराणसी के
पके महललो और गरीब बिसतयो मे होती है, िजसकी ओर िकसी का धयान नही होता है । उन पके
महललो और गरीब बिसतयो मे पानी के पाईप तो हर जगह पर है पर पानी कही-कही आता है । िजनके
घरो मे पानी नही आता वह दसू रो के घर से पानी भरते है । परंतु कुछ लोग िजनके घरो मे पानी आता है
वह लोग अपना पानी भरने के बाद भी दस ू रो को पानी भरने नही देना चाहते है। पीने के पानी के िलए
लोग दरू -दरू तक जाते है । पानी आते ही लोग इस तरह घर से पानी भरने के िलए भागते है िक कोई
भयानक आदमखोर जानवर आ गया हो । इसका सबसे बुरा असर पड़ता है पढने वाले िवधािथरयो पर।
पानी के अिनयिमत समय और गंदे पानी की आपूितर के कारण कई बार उनहे अपनी पढा़़़ ई़ से
उठना पड़ता है ।
पदेश मे हर वषर हो रही कम वषा की वजह से संरिकत वन केतो मे भी पानी की समसया गहराने लगी है।
कई जगह पानी के सोत सूख चुके है। पानी की तलाश मे वनय पाणी कई बार सड़को व गावो मे पहंच ु
जाते है, िजससे उनके साथ दुघरटनाएं भी हो जाती है।

पयासे को पानी िपलाना लोक-जीवन मे बड़ा पुणय माना जाता है। जल-संगहण ही पकारातर से जल-दान
होगा। हमारे घर के आस-पास और घर पर बरसने वाला पानी वयथर न बहे, इसकी एक-एक बूंद बचाने
का हमे पयास करना होगा। हम जल के इस भाव को सुरिकत रखने का पयास करके ही जल को
सवरसुलभ बना सकते है। इस समबनध मे जन जागृती करना जररी है ।
पसतुतकता - Ravi Srivastava
नगर & पानी की कमी से जूझ रहे पूरे केत के लोगो के सामने पीने के पानी का संकट खड़ा हो
गया। कल सुबह जलदाय िवभाग दारा कसबे के वाडर संखया 18 मे दिू षत पानी की सपलाई की गई।
िजससे लोगो को पानी की बूंद-बूंद के िलए भटकना पड़ा।डीग चुंगी के पास िसथत कॉलोनी के नलो
मे कीचड़ युकत पानी की सपलाई की गई। बदबू के चलते पानी उपयोग के लायक नही था। लोगो ने
जलदाय िवभाग के कमरचारी को गंदे पानी समसया से अवगत कराया है। कालोनीवासी बृजेनद सोनी,
ओमचनद, चंचल शमा, रामदेई, जयदेई व िमशी देवी ने बताया िक नलो मे गंदे पानी की सपलाई िपछले
चार िदनो से आ रही है। जबिक राधा सोनी ने नलो के गंदे पानी से मुंह धोने पर जलन की िशकायत
की है। उनहोने बताया िक पिरजनो ने सपलाई के पानी को पूरी तरह से उपयोग मे लाना बंद कर िदया
है। कालोनीवािसयो को पानी के िलए मंिदर सीताराम अमरदासा के हैणडपंपो का सहारा लेना पड रहा
है।

रही पानी की समसया


शहर मे पेयजल िकललत दूर होने का नाम नही ले रही है। बिल़््
क पानी की समसया िदनोिदन बढती चली जा
रही है। इस बाबत िकतनेही पयास िकए जाने की बात कयो न कही जा रही हो,मगर सभी बाते खोखली नजर आ रही है। शहर मे
जलापूितर सामानय रखना अब िवभाग के िलए टेढी खीर सािबत हो रहा है। भले ही इस ओर कई योजनाएं बनाये गई हो। मगर
सभी पूरी तरह से सफल होती नही िदखाई दे रही है। चाहे गलोगी की ही बात करे तो यहा से िवभाग ने लोगो को जलापूितर तो कर
दी। मगर उसमे भी दूिषत पानी की समसया सामने आने लगी। इसी तरह कई ओवर हैड़ टैक तो बना िदए,मगर टयूबवैल नही
लगाए गए। कुछ टयूबवैल तो चलने से पहले ही धोखा दे गए। जल संसथान की ओर से चाहे िकतनी ही कसरत कर ली गई
हो,मगर सभी आधीअधूरी नजर आ रही है। शहर की पेयजल सपलाई पूरी तरह से नही हो पा रही है। एक तो वैसे ही जररत के
अनुसार शहर मे पूरा पानी नही है और जो है भी वह भी लो पेशर आिद िदकतो के चलते पूरी तरह से लोगो को नही िमल पा रहा
है। गिरमया बढते ही इस तरह की िदकते शुर हो जाती है। इस बार भी शहर मे पानी के िलए तािहतािह मची हुई है। हालािक
इस सबंध मे जल संसथान और जल िनगम के अिधकािरयो का कहना है िक िवभाग अपनी ओर से पूरी कसरत कर रहा है और
जलद ही शहर मे पेयजल संकट दूर हो जाने के िलए कई अनय योजनाएं भी बनाई गई है।
हहह हहहह हहह हह हह हहहहहहह हहहहह
हह. हहहहहहहहहह हहहह*

जल जीवन की गितिविधयो को संचािलत करने वाला एक महतवपूणर पाकृितक कारक है । सामािजक जीवन के अनेक पसंगो को तय करने मे
जल की केनदीय भूिमका को असवीकार नही िकया जा सकता है। । जल की समुपलबधता जहा आिथरक समृिधद की दोतक है, वही वह
सामािजक सरोकारो की समरसता की भी िनयामक है । जल की सामािजक महता का अनुमान इसी आधार पर लगाया जा सकता है िक
सामािजक िवकास ठीक इसके िवपरीत जल की सामािजक मूलयवता का यह भी पमाण है िक वह अनेक सामािजक िवगहो का आधार भी बन
रहा है। दो देशो, दो पातो के बीच जल-िवगह के अनेक पसंगो को हम ऐितहािसक संदभों मे िनरनतर अनुभव कर ही रहे है । आये िदनो शहरो
और गावो मे पानी को लेकर होने वाले वैमनसयपूणर आपसी संघषों के िदल दहलाने वाले िकससे तो हम अखबारो मे पढते ही रहते है ।
शहरीकरण की ओर अगसर हमारे समाज मे िनरनतर जल की माग बढती ज़ा रही है -- यह बढती माग हमारी जीवन शैली मे आये बदलावो के
कारण अभी और बढेग़ी । जल का सीधा संबध ं हमारी सवचछ जीवन पणाली से है । सवचछ जीवन पणाली अनेक रोगो की मुिकत का मागर
पशसत करती है। जल, अनेक सामािजक मयादाओं को भंग करने मे सहयोग भी करता है, तो अनेक सामािजक मयादाओं की सुरका भी
करता है। गामीण शौचालयो के िनमाण की जन-जागित हेतु िजन नारो का इसतेमाल िकया जा रहा है--उनमे यह नारा मैने अनेक जगहो पर
िलखा देखा है -- न बह-ू बेिटयो की लाज बचाने के िलए शौचालयो का िनमाण करे । न यह सलोगन जल से जुड़े अनेक सामािजक संदभों की
ओर इशारा करता है ।

एक िफलमी गाना अकसर सुनाई देता है, न मोहे पनघट पर नंदलाल छेड़ गयो री, मोरी नाजुक कलैया मरोर गयो री । न एक जमाने मे
पनघट युवक-युवितयो के िमलन केनद थे । अनेक सामािजक संगितया-िवसंगितया इसी केनद से जनम लेती थी । गाव की िसतयो के दुख-
सुख के आखयानक पनघटो पर ही िवसतािरत होते थे । अब नलो पर बतरनो की लंबी कतार के साथ पंिकतबधद खड़े सती-पुरषो मे होती धका-
मुकी, गाली-गलौज हमारी पिरवितरत सामािजक मानिसकता की पतीक है । इधर इस तरह के समाचारो मे इजाफा हुआ है िक अिधकाश
बलातकार शौच के िलये गाव के बाहर गयी िसतयो के साथ िकये जा रह है । घर-घर मे बनने वाले शौचालयो से ऐसे दुषपसंगो से बचा जा
सकता है। घर मे बनने वाले शौचालय जल की सहज उपलबधता और पचुरता पर ही अिधक िनभरर है। वयावहािरक दृिष से पऊलश
शौचालयो पर हमारे संपूणर उपयोग के पानी की एक चौथाई माता का वयय हो रहा है। इन सामािजक वयवसथाओं मे जो आंतिरग पिरवतरन
पिरलिकत हो रहे है-उनमे जलगत पभावो को अनेदखा नही िकया जा सकता है ।

परंपरागत रप से घर गृहसथी के उपयोग मे लाये जाने वाले जल का भार सती को ही ढोना पड़ता है। गामीण केतो मे सती के िजममे जो
तीन महतवपूणर काम है-- उनमे पानी-पंगल पमुख है । गोबर-पानी, रोटी ये सभी सती जीवन के ितकोणीय शीषर है । सुबह होते ही गौशाला मे
गाय-गोर का चारा-पानी और गोबर करना, िफर पानी ढोना बाद मे रोटी पकाना यही गाव की सती-चया है । कुआं जब तक जल सोतो से
भरपूर रहता है, तब तक िसतयो का काम सीिमत ही रहता है। जैसे ही गाव के कुओं का पानी गया िक िसतयो की बड़ी शम-शिकत का
दुरपयोग होना पारंभ हो जाता है। उनहे गाव से दूर दिसयो िकलोमीटर के फासले पर पानी भरने जाना पड़ता है । इस कायर मे उनहे अितिरकत
शम तो करना ही पड़ता है - घर के दूसरे उतपादक कायों से भी उनकी संलगनता समापत हो जाती है। यह सती शिकत का सामिजक करण ही
है ।

खारे जल के गाव मे लड़की न बयाहने की इचछा अब न केवल एक पािरवािरक समसया है, बिलक यह एक सामािजक समसया भी बन
चुकी है । ऐसे अनेक गाव है, जो पानी की इस समसया से जूझ रहे है । महाराषट के नािसक िजले मे सायंगाव है। यह गाव िपछले पैतीस
वषों से सूखा झेल रहा है । लगातार पड़ने वाले सूखे ने यहा रोजगार के अवसर कम िकये है । कृिष कायर एकदम ठपप है । अनेक आिथरक
समसयाओं से जूझता यह गाव एक अनय समसया से भी गसत है । इस गाव मे कोई भी मा-बाप अपनी लड़की नही बयाहना चाहता है । पानी
की िकललत के चलते यहा के अिधकाश नवयुवक अिववािहत है । चार हजार आबादी का यह गाव कभी इस इलाके का आदशर गाव रहा है ।
पानी के अभाव मे सायंगाव अपने युवको के िलए लड़िकया तलाशने का हक भी खो चुका है । अिववािहत युवको का गाव िकस पकार की
सामािजक और मानिसक िवकृितयो से गसत होगा, इसकी सहज ही कलपना की जा सकती है । केवल सायंगाव ही नही, जो इस तरह की
समसया से गसत है बिलक मधय पदेश और राजसथान मे भी अनेक गाव इस समसया से उतपन अनेक सामािजक िवसंगितयो को झेल रहे है ।

जल से उतपन इस तरह की सामािजक समसयाओं से िवश के अनेक देश दो-चार हो रहे है। बदलती जीवन शैली ने जल को सतरीय
जीवन जीने का कारक बना िदया है । घर मे कूलर, बाथ टब, फुहारा खस की टिटयो का होना घर की हैिसयत का इजाफा करता है ।
िवकासशील देशो मे इस तरह की सुिवधा समपनता घर-गृहसथी के उनत सतर को दशाता है । इन सुिवधाओं का आधार पानी है । अफीका मे
इस तरह की जीवन शैली के पित आकषरण का यह एक उदाहरण है िक जब एक युवती को अपने िववाह की तैयारी के दौरान जात हुआ िक
भावी पित के घर मे बाथरम नही है तो उसने उस जगह िववाह करने के िलए मना कर िदया । अफीका मे शहरी सीमाओं से लगी गामीण
बिसतयो मे बाथरम और शौचालय की उपलबधता रईसी ठाटबाट मे आती है । कमोबेश यही िसथित भारत मे भी है । गावो मे अभी बाथरम
और शौचालयो का पचलन नही है । (नवयुवको की बेरोजगारी के आलम मे शहरी इलाको के युवक कायर संसकृित से िवमुख होते जा रहे है,
िकनतु गामीण पिरवेश मे युवक के पास अभी भी कृिष वयवसाय से संबिं धत काम धंधे सुरिकत है, इस रोजगारपरकता ने शहरी लड़िकयो को
गाव की ससुराल मे खीचना शुर कर िदया है) । अब शहरी मा-बाप अपनी पढी-िलखी लड़की को गावो मे बयाहते है तो उसे वहा पहं ुचते ही
अनेक िदकतो का सामना करना पड़ता है । उसे हैडपंप पर या कुए ं की जगत पर नहाना पड़ता है । यही िसथित खुले मे शौच करने पर होती
है । इन पिरिसथितयो से गुजरती शहरी पढी-िलखी लड़की भीतर ही भीतर घुटती रहती है । पिरणामत: वह िचड़िचड़ी हो जाती है ।
पािरवािरक सतर पर वह संतुलन बनाने मे असमथर होने लगती है ।

यह समय अचछा िदखने का है । अचछे कपड़े और अचछा शरीर ये दोनो वयिकततव को आकषरक बनाते है । अचछे कपड़ो का उनकी
धुलाई-सफाई से संबधं है । एक समय था जब गाव मे पहने जाने वाले कपड़ो की संखया नयून रहती थी । इनकी धुलाई-सफाई महीना-पनदह
िदन मे सोड़ा-साबुन या मजीठा के फलो से की जाती थी । अब कपड़ो की संखया बढ गयी है पाय: रोज ही कपड़े धोने के िलए साबुन की
जररत पड़ने लगी है । कपड़ो मे साबुन लगाने के मायने है िक सामानय से दुगुनी-ितगनी माता मे पानी का वयय करना है । इसी तरह शरीर
की सफाई के िलए पितिदन साबुन का इसतेमाल पानी की बड़ी माता को बहाने वाला है । गाव मे एक बहू ने इसिलए आतमहतया कर ली थी
िक उसकी सास ने उसे इस तरह पानी को बहाने से मना िकया था । गाव से दूर सथित कुए ं से पानी आिखर सास को ही भरना पड़ता था ।
बहू, साबुन का इसतेमाल बंद नही कर सकती थी । इसिलए उसने आतमहतया करना अिधक सरल समझा । पानी का बेजान उपयोग
पािरवािरक और सामािजक कु ंठाओं को जनम दे रहा है । )

िबहार मे िसंचाई के पानी को लेकर एक गाव मे इस तरह का संघषर हुआ िक दोनो पको के दस लोगो की मृतयु हो गयी । नहरो दारा की
जाने वाली िसंचाई मे अकसर अपनी बारी की पितका िकये बगैर पानी काट लेना या दूसरे के खेत मे पानी न पहं ुच सके इसके िलए पानी को
गलत िदशा मे बहा देना पानी जिनत अपराधो की शेणी मे आने वाले अपराध है । अपराध कैसा भी हो, वह सामािजक वैमनसय का जनक तो
बनता ही है । िसंचाई से संबिं धत ऐसे अपराध न केवल िबहार मे बिलक उतर पदेश, मधय पदेश और जरात जैसे पातो मे भी घिटत हो रहे है ।
िसंचाई हेतु पानी की चोरी भी इनहे अपराधो की शेणी मे आती है । टयूब बैल से की जाने वाली िसंचाई मे पाईप की चोरी भी पानी से संबिं धत
अपराध है । इस तरह पानी सामािजक अपराधो को उकसाने मे अपनी भूिमका पसतुत कर रहा है ।

छुआछू त पूणर जाितगत भेदभाव मे पानी के पित जो संवेदनशीलता है वह भी सामािजक अपराधो का आधार बनती है। गाव मे यिद एक ही
कुआं हो तो उससे पानी भरने मे अकसर संघषर की िसथित िनिमरत हो जाती है । लगभग छ: दशको की सवतंतता हमारे समाज मे फैले
छुआछू त के रोग को नही िमटा पायी है । आज भी अनेक जाितयो को असपृशय समझे जाने का घृिणत भाव तथाकिथत उचच जाितयो के मानस
मे घर िकए हुए है । एक ही कुए ं पर एक साथ पानी भरने पर तथा किथत असपृशय वगर की शेणी मे आने वाले लोगो को दिरंदगी का िशकार
होना पड़ता है । पानी जो मैल को साफ करता है, जो गंदगी को बहा ले जाता है, वही सामािजक गंदगी की घृिणत भावना का माधयम बनता है
। आटा तब तक असपृशय नही है, जब तक िक उसमे पानी नही िमलाया गया है जैसे ही उसमे पानी िमला िदया जाता है, वैसे ही उसे कोई छू
न ले- यह भाव आ जाता है। पानी से संबिं धत असपृशयता को केनदीय िवषय बना कर पेमचंद ने ठाकुर का कुआं कहानी िलखी थी। जैसे-जैसे
समाज िशिकत होता जा रहा है - वैसे-वैसे पानी के पित असपृशयता का नजिरया बदलता जा रहा है । रेलवे सटेशन पर सथािपत नल से सभी
पकार के याती पानी पीते है- वहा छुआछू त का िवचार नही िकया जाता है । बावजूद इसके अभी भी गामीण केतो मे छुआछू त का आधार पानी
ही है ।
बिसतयो की बसाहट मे घरो की मोिरयो का अपना महतव है । ये मोिरया जो पानी के असवचछ भाग के िनषकासन के िलए बनाई गई है,
कभी-कभी पड़ोसगत संघषर का कारण बना जाती है । िकसी के नाबदान का पानी यिद िकसी के घर के सामने से इस तरह गुजरने लगे िक
वह घर की देहरी को छू ले तो िफर मोरी को लेकर संषघर िछड़ ही जाता है । पानी का गुण यदिप सौहादर सथािपत करने वाला है । टू टे हएु
अलग-थलग पड़े हुए सूखे हुए के बीच उनहे गीला करके एकरस बनाने का दाियतव जल भली-भाित िनभाता है, िकनतु यह तो मनुषय के भीतर
बैठे राकस का ही सवरप है जो पानी जैसे तरल-सरल चीज को भी खूनी संघषर का पणेता बना देता है ।(पसूका)

बढती जनसंखया, घटते संसाधन


जनसंखया की लगातार वृिद ने आज िवकास के लकयो को बेअसर कर िदया है। मालथस का िसदानत कहता है िक पृथवी मे पोषण
कमता सीिमत है। अत: पाकृितक पािरिसथितकी के पुनभररण की कमता के मधय इसका सनतुिलत उपभोग करने पर ही पृथवी के
पाकृितक संसाधन तथा पयावरण को लमबे समय तक िटकाऊ रखा जा सकता है अनयथा जनसंखया की बेतहाशा वृिद पकृित के
िवनाश का कारण बन सकती है। आज िवश की बढती हुई आबादी की माग की पूितर के िलए िजस तरह पकृित के िनयमो को दरिकनार
कर तीवर गित के औदोिगकरण, शहरीकरण व मशीनीकरण के माधयम से पाकृितक संसाधनो का अनधाधुनध दोहन हो रहा है उसी का
पिरणाम है िक हमारी सारी निदया सूखती जा रही है। समुद पदूिषत हो रहा है। जल, जंगल और जमीन घटते जा रहे है। कही बाढ तो
कही सूखे का सामना करना पड़ रहा है। जलवायु पिरवतरन जैसे मुदे पर िवशवयापी बहस िछड़ गई है।
िवश की 16.87 पितशत जनसंखया भारतीय भू-भाग पर िनवास करती है। जनसंखया का यह पितशत लगातार बढ रहा है परनतु
दूसरी ओर भूिम का भाग िसथर है। अत: पित वयिकत भूिम की उपलबधता घट रही है।
भारत की लगभग 75 पितशत जनसंखया गावो मे रहती है िजसकी आजीिवका खेती, चारागाह तथा वनोतपादन जैसे पाथिमक वयवसाय
पर िनभरर है। आजादी के बाद सरकार ने पंचवषीय योजनाओं के माधयम से खेती की उनित के कई पयास िकए। िसंचाई के साधनो का
िवकास िकया तथा भूिम सुधार के माधयम से खेती योगय भूिम मे भी िवसतार िकया। फलसवरप सन् 1951 मे जहा देश के कुल
भौगोिलक भू-भाग का 36.20 पितशत भाग खेती के योगय था वह सन् 2001 मे बढकर 43 पितशत हो गया। इसमे िसंिचत केत
जहा 1951 मे 17.75 पितशत था वह सन् 2001 मे 40.52 पितशत हो गया परनतु इस िवकास व िवसतार का अपेिकत लाभ नही
िमला। जनसंखया मे पित वयिकत िहससेदारी मे भूिम मे कमी होती गई। जनसंखया वृिद के कारण गामीण जीवन के जीिवकोपाजरन के
मूलभूत संसाधन घटते चले जा रहे है। यही िसथित जल, ऊजा तथा अनय खिनज संसाधनो की है।
इन सब पयासो के बावजूद भी जनसंखया की पाकृितक वृिद दर अपेका से अिधक ही रही। भिवषय मे भारत मे जनसंखया वृिद की दर
यही रहती है तो वह िदन दूर नही जब आम आदमी के जीवनयापन के िलए नयूनतम साधन उपलबध कराना भी किठन हो जाएगा। जीवन
िनवाह के सभी मूलभूत पाकृितक संसाधन और घट जाएंगे, पयावरण और अिधक पदूिषत हो जाएगा तथा िवजान व पौदोिगकी िवकास
की पूणर कमता होने के बावजूद मनुषय के जीवन पोषण की पािरिसथकी को बचाया नही जा सकेगा। अत: आवशयकता इस बात की है
िक जनसंखया का िनयनतण हो तथा लोगो मे इस बात की िशका का पचार-पसार हो िक हमारे पाकृितक संसाधन जल, भूिम, ऊजा,
खिनज आिद सीिमत है तथा यह असीिमत जनसंखया का पोषण नही कर सकते। साथ ही पाकृितक संसाधन के संवदरन तथा संरकण
की भी ठोस योजना पर कायर होना चािहए।
के.एन.जोशी

शिनवार 11 जुलाई को िवश जनसंखया िदवस है। लगातार बढती जनसंख‍या से भारत को कई बड़ी समस‍याओं का
सामना करना पड़ रहा है। ‘हम दो-हमारे दो’ जैसे नारो के बावजूद भारत मे आबादी थमने का नाम नही ले रही है।

एक अनुमान के अनुसार भारत मे जनसंखया की वृिद दर 2051 मे 1.44 फीसदी से बढकर 164.6 करोड़ तक पहंुच
जाएगी।

भारत मे लगातार बढती जनसंख‍या को दो ततव पभािवत करते है। पहला लोग बीमा यानी इस आशिसत के रप मे
जयादा संतान चाहते है िक उनके पिरवार मे आमदनी करने वाले लोगो की संखया अिधक हो। दूसरा रोजगार सुिनिशत
नही कराने वाली िशका वयवसथा भी इसके िलये िजममेदार है।

भारत मे जनसंखया घनतव मे भी लगातार बढोतरी हो रही है। वषर 1961 मे देश की जनसंखया का घनतव 142 था,
जो 1991 मे बढकर 267 और 2001 मे 324 हो गया।
देश मे राषटीय जनसंखया नीित की घोषणा के बाद सरकार ने आपातकाल के दौर मे जबरन नसबंदी का अिभयान
चलाया। लेिकन बाद मे केद मे सता मे आई जनता पाटी की सरकार ने पूवरवती कागेस सरकार की इस नीित को
बाधयकारी से ऐिचछक नसबंदी कायरकम मे तबदील कर िदया।

संयुकत राषट जनगणना बयूरो के मुतािबक, िवश की जनसंखया अब 6.77 अरब हो गयी है। जनसंखया अनुमानो के
अनुसार वषर 2050 तक िवश जनसंखया मे लगातार बढोतरी दजर की जायेगी। वही, 2040 तक िवश की जनसंखया नौ
अरब तक पहंुचने की उममीद जताई गयी है।
समय रहते जनसंख‍या बढोतरी पर रोक लगानी बेहद जररी है अन‍यथा आने वाला समय तमाम िवश‍व के िलए
अत‍यिधक खतरनाक सािबत होगा।

हहहहहह‍हह हहहह‍हहह: हहहह हहहह हहहह हहहह हह हहहहहह हहहह


हहह हहहह हहहहहह

हह हहहह‍हह. भारत मे आबादी बढने की मौजूदा रफतार जारी रही तो 15 साल मे ही 37 करोड़ और लोग देश के नागिरक
होगे। ऐसे मे लोगो को पानी तक नसीब नही होगा और वे िजंदगी भर कजर मे डू बे रहेगे। केदीय सािखयकी संगठन (सीएसओ) के
अनुमान के मुतािबक िफलहाल हाल यह है िक 115.4 करोड़ की आबादी मे से पत्‍येक पर करीब 38,000 रपये का कजर
है।, यह औसत भारतीय के दस महीने की तनख्‍वाह के बराबर है। मात सात साल पहले (2003-04) यह रकम महज
19,500 रपये थी। जािहर है, भारत मे हर बच्‍चा गभर मे कजर के साथ ही पलता है और मरते वक्‍त तक वह कजर से मुक्‍त
नही हो सकता।

बढती जनसंख्‍या के साथ कजर का बोझ भी लगातार बढ रहा है। बढते कजर के साथ उपलब्‍ध संसाधनो की बढती िकल्‍लत से
िसथित और भयावह होने वाली है। पानी जैसी मूलभूत जररत की बात करे तो भारत मे ताजा पानी की उपलब्‍धता 1955 मे
5277 क्‍यूिबक मीटर पित व्‍यिकत के िहसाब से थी, जो 1990 मे घट कर 2,464 क्‍यूिबक मीटर रह गई। आबादी बढने
की मौजूदा रफतार को देखते हुए 2020 मे पानी की उपलब्‍धता पित व्‍यिकत 1000 क्‍यूिबक मीटर से भी कम रह जाने का
अनुमान है।

स्‍वीडन के इंटरनेशनल वाटर इंस्‍टीटयूट मे पोफेसर एम. फाल्‍केनमाकर के मुतािबक हर आदमी को रोज मरा के बुिनयादी काम
के िलए रोज कम से कम 100 लीटर (36.5 क्‍यूिबक मीटर सालाना) पानी चािहए। भारत के करीब 40 फीसदी घरो मे तो
अभी ही पीने के साफ पानी का इंतजाम नही है।

हहहह हहहहहह, हहहहह हहहहह: बढती हुई जनसंखया का असर िसफर पानी पर नही पड़ेगा बिलक हमारे पाकृितक
संसाधनो पर भी इसका सीधा पभाव पड़ेगा। दुिनया की करीब 16 फीसदी आबादी भारत मे रहती है। जबिक दुिनया की करीब
2.4 फीसदी ज़मीन भारत के िहससे मे है और दुिनया भर मे फैले जंगलो का 1.7 फीसदी भारत मे है। जािहर है बढती आबादी
का सीधा असर ज़मीन की माग पर पड़ेगा। इस माग को पूरा करने के िलए या तो खेती की ज़मीन का िरहायशी मकान बनाने के
िलए इसतेमाल होगा या िफर जंगलो को काटा जाएगा। भारत मे यह अंधाधुंध कटाई जारी है, िजसका सीधा असर पयावरण पर
पड़ रहा है।

हहहह हहहहह हह हहह हहहह हह: बढती आबादी का पभाव लाइवसटॉक पॉडकट (दूध, अंडा, मास) की माग पर
पडे़़़
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ा। बढती आबादी की वजह से तेजी से शहरीकरण होगा िजसका सीधा असर लोगो की खाने -पीने की आदत पर
पड़ेगा। जानकारो का मानना है िक जनसंखया बढने के साथ ही शहरी आबादी बढेगी और दूध, अंडे और मास की माग भी
बढेगी।
हहहहह हहहहह हह हहह:
.संसाधनो के अंधाधुंध इसतेमाल के तौरतरीके का सीधा असर जंगलो पर पड़ेगा।
.गंगा के मैदानो मे िपछले 50 सालो मे मौजूद मीठे पानी की झीले और तालाब अपना वजूद खो चुके है।
.50 सालो मे जंगलो की जबदरसत कटाई, मैनगोव एिरया सात लाख हेकटेयर से घटकर 4.53 लाख हेकटेयर हुआ।
.खेती करने योगय ज़मीन जंगलो को खतम कर बढाई जाएगी। कीटनाशको के इसतेमाल का पयावरण पर सीधा असर पड़ेगा।

हहहहहहहह हह हहह हहह हह हहहहहहहह हहहहहहह

हहहहहहह :हहहहहहह, 1 हहहहहह 2010, 804 हहह हहहह हहह

होश संभालने के बाद पहली बार मुंबई जाने पर एक बात ने पहले तो िवशेष रप से
आकिषरत िकया, मगर बाद मे िफर परेशान िकया था। वहा बात-बात पर लाइन लग
जाती। बस पकड़ने के िलए बस-सटाप पर लोग कतार मे खड़े रहते, शौचालय के
बाहर लाइन, हर तरह के िटकटघर की अपनी लाइन, दुकान मे सामान खरीदने वालो
ं एक के पीछे एक हो जाते। यही नही धािमरक सथलो
की भीड़ होने पर खरीदार तुरत
पर अनुयािययो की वयविसथत कतार हर जगह देखी जा सकती थी। वयावसाियक
नज़िरये से देखे तो टैकसी सटैड मे टैकसी भी कतार मे खड़ी होती। पहले पहल तो
यह सब सुिवधापूणर और अनुशािसत लगता। भौितक चकाचौध मोिहत करती। मगर सटेशन पहुँचकर सारा अनुभव कटु सतय मे पिरवितरत हो
जाता, जब लोकल टेन मे चढने -उतरने के दौरान धका-मुकी मे लोग एक-दूसरे को रगड़ कर पीस देते। यह बेरहम भीड़ होती िजसको िज़ंदा
इंसान से कोई सरोकार नही। सेकेड मे लोकल के छू टने का डर आदमी को मशीन बना देता और सारी इंसािनयत भीड़ के पैरो से कुचल दी
जाती। यह पमािणत करता िक अपनी सुिवधानुसार वहा के लोगो ने इस कतार वाली अनुशासन पदित को अपनाया है। समयानुसार यह
उनकी मजबूरी है, चाहत नही। न ही यह उनका सवाभािवक गुण है। तभी तो इंसानो की भीड़ घबराहट पैदा करती। चारो ओर जहा भी नज़र
जाती मानवीय समुद िदखाई देता। दूसरे शहरो से जाने वाले लोगो के िलए इतनी बड़ी जनसंखया मे रह पाना एक समसया होती। हर चीज़ के
िलए वहा संघषर करना पड़ता। ऑिफस और घरो के बीच घंटो के िहसाब से दूरी होती। दाल-रोटी से लेकर रात को फुटपाथ पर सोने के िलए
भी मारामारी करनी पड़ती। चैन कहा ? इसके कारण ही कई लोग घबराकर वापस भाग जाते। और जो नही जा पाते इस भीड़ मे गुम हो
जाते। चमकती दुिनया के सफल िसतारो की एक-दो कहािनयो को यहा पिरकथा मान लेना ही उिचत होगा। वरना आम जीवन यहा कतार मे
अपनी बारी के इंतज़ार मे ही समापत हो जाता। मैने कई बार वहा के सवािदष सथानीय वयंजन, वड़ा-पॉव के िलए भी लंबी लाइन लगते देखी
है। अपना नंबर आते-आते कई बार यह समापत हो जाता िफर भूखे पेट हाथ मलने के अलावा कुछ नही रह जाता। कोई सुनने को तैयार नही
और दूसरी जगह िफर पँिकत मे खड़े हो जाओ। यह दीगर बात है िक लोग इस भीषण मशीनी जीवन के आदी हो जाते। और उसमे ही खुिशया
ढू ँढ लेते। मगर जीवन इसमे होता ही नही। अगर िवशलेषण करे तो सरल शबदो मे इन सब समसयाओं के पीछे मूल कारण उसकी आबादी ही
है।

दो-तीन दशक पूवर, उपरोकत दृशय आम शहरो को छोड़ अनय महानगरो मे भी िदखाई नही देता था। जीवन शात, सरल, सहज और सुलभ
होता था। मगर इस तरह के हालात तकरीबन हर जगह अब बन चुके है। यही नही, िदन-पितिदन िसथित बद से बदतर होती जा रही है।
महानगर िवकराल रप धारण कर चुके है। शहरो मे पहले से रहने वाले, नये आने वालो को दोषी करार देते है। मगर गाव-कसबे मे भी हालात
सामानय नही। िवकिसत राषट भी बाहर से आने वालो के िवरोध मे तीखी िटपपिणया करते देखे जा सकते है। आिथरक व िवकास की
असमानता की बात भी उभरती है। यह एक अलग वाद-िववाद का िवषय हो सकता है मगर इन सबके मूल मे है जनसंखया का बेिहसाब
बढना। िफर चाहे वो दुिनया के िकसी भी भाग मे हो रहा हो, उसका असर िवशसतरीय होता है। दबाव चारो ओर फैलता है। अचानक िपछले
कुछ वषों मे भीड़ इतनी बढ चुकी है िक अब कही भी कतार वाली वो बात नही रही। हर जगह आपाधापी, अवयवसथा, छीना-झपटी आम बात
हो चुकी है। रेलवे िरजवेशन काउंटर से लेकर छोटे बचचो के बालक मंिदर कका मे दािखला कराने के िलए भी िकसी-िकसी सकूलो मे घंटो
लाइनो मे लगना पड़ता है। यहा लाठीचाजर होना अब आम है। पसव के िलए पहले से कई असपतालो मे कमरा आरिकत करवा िलया जाता है।
हालत इतने िबगड़ चुके है िक कई बार अंितम संसकार के िलए शव को भी इंतज़ार करना पड़ता है। और कई बार तो शव-याता मे मृतक के
साथ चलने वाले उसके दोसत-यार पिरवार वालो मे से कई अंितम संसकार के पूवर ही शमशानघाट से वापस चल देते है। अब वो भी कया करे,
अभी उनहे िज़ंदा रहने के िलए हर कदम पर संघषर करना है चूँिक इंसान की भीड़ हर एक को राह मे कुचलने के िलए तैयार खड़ी है।

कहने वाले कह सकते है िक जनसंखया अपनी गित से बढ रही है। यह सब सवाभािवक और पाकृितक है। मगर यहा मृतयु-दर व जनम-दर के
आँकड़ो मे फँसने की आवशयकता नही, जो िदखाई दे रहा है उसे पमाण की ज़ररत है कया? कसबे शहरो मे बदल चुके है और शहर महानगरो
की तरह चारो िदशाओं मे तेजी से फैल रहे है। बस और रेलगाड़ी से सफर के दौरान िकसी भी िदशा मे चले जाएँ खेतो-खिलहानो को मकानो
व कॉलोनी मे पिरवितरत होते देख सकते है। गित इतनी तीवर है िक कुछ वषों मे ही शहर के आसपास के हरे-भरे खेत अचानक काकीट जंगल
मे बदल जाते है। अब जब इंसान का एक बचचा पैदा हो जाता है तो रहने के िलए उसे मकान तो चािहए, चलने -िफरने के िलए सड़क भी
चािहए, तभी तो जहा देखो वहा िनमाण कायर, सड़के चौड़ी की जा रही है, गािड़या बढ रही है। सभी को िशिकत करना है तो सकूल-कॉलेज
की संखया को भी बढाना होगा। बढती भीड़ ही सही मगर सभी को मूलभूत आवशयकताएँ तो मुहैया करवाना ही पड़ेगा तो उतपादन के िलए
कारखानो की ज़ररत भी पड़ेगी। और िफर बेरोज़गारी दूर करने के िलए नौकिरयो की आवशयकता भी होगी। अथात जनसंखया वृिद की तरह
ही उसी गित से नौकरी पैदा करने की समसया िवकराल रप धारण करती जा रही है। फलसवरप बाज़ार की िगरफत मे आकर िवकास और
िवकास दर की बाते की जा रही है। मगर ये भी कब तक और कहा तक? बहरहाल, जंगलो को काटा जा रहा है िजससे िक वहा कारखाने
लगाए जा सके। होटल, असपताल, मॉल और कॉलेज खोले जा सके। िशशु के पैदा होने के बाद उसे िज़ंदा रहने के िलए अभी तक तो हवा
मुफत है, आगे का भरोसा नही, िपछले कुछ वषों मे ही पानी ने कैसे-कैसे रंग बदले है, िकसी से िछपा नही। एक तरफ जनसंखया के तीवर गित
से बढने से आवशयक दैिनक चीज़ो की आवशयकता बढ रही है। दूसरी तरफ पाकृितक संसाधनो की तेज़ी से कमी आती जा रही है। अथात
माग बढ रही है और आपूितर कम हो रही है। तो िफर हा-हाकार तो मचेगा ही। तो कया हुआ, मनोरंजन-मसती के दारा, िककेट-फुटबाल का
तमाशा से लेकर िफलम और फैशन की धुन मे इसको दबा िदया जाएगा। भीड़ को जैसा चाहो इसतेमाल करो। बदले मे उनकी इचछाओं को
जागत कराओ। पिरणामसवरप माग बढेगी और िफर चाहत बढेगी। यही तो बाज़ार को चािहए। जहा तक रही बात वतरमान मे समसया के हल
की तो पकृित का दोहन बढा दो। मगर मुगी सोने का अंडा कब तक देगी? तो िफर कया हुआ, हमे तो आज मे जीना है, कहावत-िकससो का
कया करना, तभी तो एक लोककथा की िशका के िवपरीत सोने का अंडा देने वाली मुगी को काटने से भी लोगो को परहेज़ नही। िफर चाहे
कल भूखा सोना पड़े। है न कमाल का आदमी?!

हम सब अपनी समसयाओं के मूल मे िसथत इस जनसंखया िवसफोट को अचछी तरह से समझते और जानते है। मगर सबकी अपनी-अपनी
सोच है। अिधकाश जानते हुए भी अनजान बने रहते है। इतना सब होने के बावजूद कइयो को अपने समूह, वगर, जाित, धमर और उससे
संबिं धत लोगो के घटते-बढते आँकड़े की िचंता है। बुिदमानी पर तरस तो तब आता है जब इस बढती भीड़ को भिवषय की ऊजा कहा जाता
है। तकर यहा तक िदये जाते है िक अगर िकसी एक देश ने या िकसी िवशेष समूह ने अकेले जनसंखया को िनयंितत िकया तो दूसरा वगर
अपनी जनसंखया बढाकर आप पर हावी हो सकता है। यह सच है िक कोई भी देश-समाज जनसंखया के अकेले िनयंतण से इस समसया से
छुटकारा नही पापत कर सकता। उसकी सीमाओं पर दबाव बढेगा, घुसपैठ बढेगी। सामािजक-आिथरक असंतुलन से दूसरी िदकते पैदा होगी।
अथात संपूणर िवश को एक साथ बैठकर इस पर अमल करना होगा। मगर िजस युग मे एक पिरवार साथ बैठकर िकसी भी मुदे पर एकमत
नही हो पाता वहा यह कलपना हासयासपद लगती है। पूवर मे अिशका इसका कारण बताया जाता था, मगर साकरता के साथ समसया घटने की
बजाय बढ रही है। पढे-िलखे वगर मे समझदारी उतनी ही कम हो रही है। और अंत मे समसया िचंतनीय और आतमघाती बनती जा रही है।

पकृित मे संतुलन की वयवसथा अदुत है। जनन और पजनन मे जानवर भी संतुिलत वयवहार करते हुए देखे जा सकते है। वही जान की बड़ी-
बड़ी बात करने वाले इंसान ने असल मे जानवरो से भी बदतर वयवहािरकता का पदशरन िकया है। उसे इस बात का अहसास नही िक वह
अपने िलये िकतनी बड़ी समसया को हर पल हर समय हर बचचे के साथ पैदा कर रहा है।

बचचे भगवान का रप होते है। मगर उनहे इस दुिनया मे लाने के िलए हम और केवल हम िज़ममेदार है। पूछा जाना चािहए िक हम उनहे
िकसिलए ला रहे है? सहवास मे पकृित ने अलौिकक आनंद भी िदया है। कही हम अपने किणक सुख के िलए एक पूरा कषमय जीवन तो नही
पैदा कर रहे? अगर हमने समय रहते इस समसया का, साहिसक उदाहरण पेश करते हुए, एक समुिचत िनयंितत वयवसथा नही की तो पकृित
अपना पाठ पढाने से बाज नही आएगी। आदमी ने लोककथाएँ बनाई बहुत है तो युगो-युगो से सुनी भी है, मगर उसे कभी अपने जीवन मे
उतारा नही। तभी तो वह िजस डाली पर बैठता है उसी को काटने लग पड़ता है। यही कयूँ, भसमासुर की कहानी लोगो को याद तो होनी ही
चािहए। अपनी शिकत के अहम्‌ का िशकार इस शिकतशाली चिरत को सबक िसखाने मे जयादा वक्त नही लगा था। हम अपने िलए अपना
नकर यही बना रहे है। हमने िवजान के सहारे अपने जीवन को लंबा तो कर िलया मगर जीवन के रस को िनचोड़ िदया। यहा लोगो के िदल तो
धड़क रहे है मगर उसमे जीवन का सपंदन नही। खाद से फूल तो पैदा कर िदए मगर उनमे महक कहा? मन की आवाज़ को सुनने का वक्त
कहा रहा वो तो टैिफक की िचलल-पो और भीड़ की तािलयो मे डू बकर शराब के नशे मे बह चुका है। एक समय ऐसा भी आएगा जब नकली
भोजन, इतनी बड़ी माता मे बनाना, िवजान के िलए भी संभव नही होगा। यह सोचकर िनिषकय नही होना चािहए िक हमारा समय तो गुज़र ही
जाएगा। हम यकीनन िवसफोटक काल मे पवेश कर चुके है। कया यह सच नही िक हमारा वतरमान िकसी भी तरह से मानवीय जीवन-सा नही
रह गया और भिवषय कीड़े-मकोड़े की तरह बनता नज़र आ रहा है। असल मे इस भीड़ और कतार मे हमारी भावना कब समापत हो जाती है
पता ही नही चलता। कभी ठहरकर सोचने की फुसरत ही कहा?

जल ही जीवन है

कहते है " जल ही जीवन है " और " िबन पानी सब सून " यानी जल के िबना हम जीवन की कलपना ही नही कर
सकते और िबना पानी के इस धरती पर कोई रहना ही नही चाहेगा तथा िबना पानी के धरती की सारी हिरयाली
िबलकुल खतम हो जायेगी पानी के िबना साफ - सफाई नही हो पायगी और सारी पृथवी का पयावण पदुिषत हो जाएगा
तथा पृथवी रहने लायक नही रहेगी इस कारणवश पृथवी मानव िवहीन हो जायेगी I
एक कहावत है "घर की मुगी दाल बराबर "यानी हम पानी के सनदभर मे यह कह सकते है की हम पानी की तलाश मे
सौर मंडल के कई सारे गहो पर खाक छान रहे है मगर अपनी धरती पर मौजूद पानी की कद ही नही कर रहे है I

आजकल आधुिनकता के इस दौर मे हर कोई आधुिनक सुख सुिवधाओं से युकत शहरो की तरफ भाग रहा है िजससे
शहरीकरण को बढावा िमल रहा है िजस वजह से नए - नए शहरो का िनमाण हो रहा है तथा धीरे - धीरे शहरो की
संखया बढती जा रही है I

मगर इस आधुिनक सुख सुिवधाओं से युकत शहरो मे िबना पानी के हमारी हालत उस पकी की तरह हो जायेगी
िजसे राजमहल मे ले जाकर तथा सोने के िपंजरे मे बंद करके उसे सारी सुख सुिवधाएँ दी गई मगर खाने िपने के िलए
कुछ नही िदया गया तथा वह पकी िबना खाए िपए तड़प तड़प कर मर गया ठीक उसी तरह हम भी शहरो मे तमाम सुख
सुिवधाओं के होते हएु भी िबना पानी के जी नही पाएंगे I अतः हम कह सकते है की पानी ही जीवन का मूल सोत है I
मै िदलली मे रहता हूँ तथा िदलली से बहुत पयार करता हूँ और एक िजममेदार नागिरक होने के नाते मेरा यह फजर बनता
हे की मै भी िदलली के िलए कुछ करँ इसिलए मै कुछ सुझाव देना चाहता हँू िजससे िदलली मे पानी की समसया काफी
हद तक दूर हो जायेगी मे ये लेख िदलली को आधार मानकर िलख रहा हूँ इसिलए ये सुझाव उन सभी शहरो पर भी
लागु होगे जहा पानी की समसया हे I

आज हमे पानी के िलए दुसरे राजयो के रहमोकरम पर रहना पड़ता है तथा उनके नखरे सहने पड़ते है मगर अब वकत
आ गया है की िदलली पानी के मामले मे आतमिनभरर बने मगर आप सोच रहे होगे की िदलली पानी के मामले मे
आतमिनभरर कैसे बन सकती है ? िदलली मे कोई ऐसी जगह तो हे नही जहा से नदी का उदगम होता हो , और एक यमुना
हे वो भी दुसरे राजयो से होकर आती हे तो इसका जवाब है वषा का पानी जो आज तक िदलली वालो के िलए अिभशाप
बना हुआ है वही पानी आने वाले समय मे िदलली के िलए वरदान बनेगा I

आज जब भी बािरश होती है तो िदलली की सड़के नरक बन जाती है हर तरफ पानी भर जाता है िजससे िदलली का
टेिफक जाम हो जाता है लोग घंटो उस जाम मे फंसे रहते है इस पानी को िनकालने के िलए िदलली सरकार को हर
साल करोड़ो रपये खचर करने पड़ते है िजसकी वजह से पानी नालो के दारा सीधे लबालब भरी यमुना मे िगरता है अब
आप सोच रहे होगे की मै यमुना को लबालब कयो कह रहा हूँ जबिक यमुना तो सूखी रहती है I

अरे भाई मै उस वकत की बात कर रहा हूँ जब देश मे हर जगह मानसून अपनी दसतक दे रहा होता हे और हर जगह
बाढ आ रही होती है और वही राजय जो कल तक िदलली को पानी देने के िलए नखरे िदखा रहे थे वे बाढ का पानी
यमुना के दारा िदलली मे भेज देते है इस वजह से हमारे बरसात का पानी भी लबालब भरी यमुना से होता हुआ िदलली के
बहार चला जाता है और मानसून के समापत होते ही यमुना िफर सूख जाती है िफर चरो तरफ पानी के िलए तािह तािह
मच जाती है I
इन परेशािनयो से बचने के िलए हमे आज से कई साल पहले वाली िदलली की तरफ लौटना पड़ेगा जब यह तालाबो
, बाविडयो तथा झीलो की नगरी हुआ करती थी उस वकत िदलली मे हर तरफ खुली जगह होती थी तथा पकी सड़के
,कंकीट के फशर तथा कंकीट के जंगल रपी इमारते नही होती थी इस वजह से वषा का सारा पानी जमीन के अनदर
समा जाता था िजससे िदलली का भूिमगत जल सतर काफी ऊँचा रहता था इसके कारण उस वकत तालाबो , झीलो
तथा बवािडयो मे हमेशा पानी भरा रहता था I
अब आप सोच रहे होगे की हमे वषा का पानी जमीन के अनदर भेजने के िलए हमे सारी सड़के ,फशर तथा इमारतो को
तोड़ना पड़ेगा अरे नही भाई इसके िलए िदलली सरकार को सबसे पहले पुरानी बवािडयो ,झीलो तथा तालाबो को
दुबारा उपयोग के िलए ठीक करना पड़ेगा तथा कुछ नयी झीलो ,तालाबो तथा बवािडयो का िनमाण करना पड़ेगा और
इन सभी को िदलली के सभी छेतो के साथ जोड़ना पड़ेगा इसके िलए सरकार को पूरी िदलली मे पाईपो का जाल
िबछाना पड़ेगा इसके िलए दो तरह की पईप लाइन िबछानी पड़ेगी पहली सथानीय पईप लाइन जो सभी जगह
की इमारतो तथा सड़को पर जमा बरसात का पानी जमा करेगी और दूसरी मुखय पईप लाइन जो की सथानीय
पईप लाइन का पानी जमा करके तालाबो ,झीलो बवािडयो जो ( जो भी उस जगह के पास हो ) मे डालेगी
इन सथानीय पाइपो तथा मुखय पाइपो के बीच बीच मे मैनहोल बनाना होगा िजस पर छेद वाला ढकन हो तथा
मैनहोल का तल कचचा हो तािक पानी जमीन के अनदर समा सके I
उदहारण के िलए िवकास पुरी मे इमारतो तथा सड़को पर जमा वषा का पानी सीधे सथानीय पाइप लाइन मे
जाएगा तथा यह पानी इन सथानीय पईपो मे जगह जगह बने मेनहोल

मे जाएगा िजसके जिरये वषा का पानी जमीन के अनदर जाएगा तथा बाकी बचा पानी जाकर मुखय पईप लाइन मे
िमलेगा यहा भी कुछ पानी जगह जगह बने मेनहोल के जिरये जमीन के अनदर जाएगा तथा बाकी बचा पानी तालाबो
तथा झीलो मे जाकर जमा होगा इसी तरह अनय जगह का पानी भी जमा होकर जमीन के अनदर तथा तालाबो ,झीलो
आिद मे जमा होगा
अरे ..... अरे ..... पढना बंद मत करो भाई आपने सोच की मैने पानी बचाने का तरीका बता िदया तो
कहानी खतम हो गई अरे नही भाई अभी कहानी का अंत तो बाकी है I
अब इन झीलो ,तालाबो तथा बावािडओं को हरे भरे पयरटन छेत के रप मे िवकिसत करे िजससे लोग यहा घूमने
आए इन तालाबो का पयोग नाव चलाने तथा मछली पालन के िलए िकया जाए िजससे लोगो को रोजगार िमले यहा से
िदलली के अनय जगहो पर पानी की आपूितर हो िजससे लोगो की पयास बुझ सके
आप सोच रहे होगे की मैने यह सब िकतनी आसानी से कह िदया जबिक कहने और करने मे फकर होता है मगर
कहते है ना "िहममत - ऐ -मदा तो मदद - ऐ - खुदा " यािन जो िहममत िदखाता है उसकी मदद खुदा भी करता है

हहहहह : हह हह हहहह हह

हहहह हहहहह हहिशपा सनिसटी, जागरण संवाद केद, गािजयाबाद


पानी की बूंद-बूंद कीमती है, पानी को बबाद न करे और िजतना संभव हो जल संचय करे कयोिक जल ही जीवन है..जल की ऐसी ही महता को दशाने के िलए
िशपा सनिसटी आरडबलयूए की ओर से डॉकयूमेटी िफलम बनाई जा रही है। 20 िमनट की इस िफलम की खािसयत यह होगी िक पानी अनमोल है यह बताने के
िलए िफलम मे मनोरंजन जगत से जुड़ी हिसतयो और महानगर की कुछ बड़ी हिसतयो के संदेश शािमल होगे।

िशपा सनिसटी आरडबलयूए के महासिचव संजय िसंह बताते है िक िफलम िसतंबर माह तक बनकर तैयार हो जाएगी। िफलम मे मनोज वाजपेयी और वीरेद
सकसेना(जससी जैसी कोई नही धारावािहक मे जससी के िपता की भूिमका िनभाने वाले)जैसे मनोरंजन जगत से जुड़े बड़े िसतारे के साथ ही िजलािधकारी,
जीडीए, नगर िनगम और पुिलस पशासन के बड़े अिधकािरयो के संदेश भी शािमल होगे।

आरडबलयूए पदािधकािरयो की माने तो इस िफलम को केबल पर चलवाया जाएगा, िजससे घर-घर तक संदेश को पहंुचाया जा सके। बड़ी हिसतयो को िफलम से
जोड़ने के पीछे का मकसद िसफर इतना है िक लोग इनकी बातो को िकसी अनय की तुलना मे जयादा गौर देते है। आरडबलयूए पदािधकािरयो की माने तो भारत
िवश का तीसरा ऐसा देश है जहा पाकृितक रप से सबसे जयादा जल उपलबध रहता है, बावजूद इसके लोगो मे जागरकता न होने के कारण पानी की िकललत
नजर आती है। इसी को देखते हुए आरडबलयूए की ओर से िफलम तैयार की जा रही है। पूरे पॉजेकट को तैयार कर िलया गया है, िफलहाल िफलम अिभनेताओं को
जोड़ने के िलए योजना बनाई जा रही है।

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Author:

जगदीश पसाद रावत

-देश की 24 थालो मे लगभग 1929-87 घन िकलोमीटर जल संसाधन है। िजनमे से लगभग 690 घन िक.मी. सतही जल का ही इसतेमाल िकया जा सकता
है।

-पुनः आपूितर िकये जाने योगय भूिमगत जल सोतो की कमता 432 घन िकलोमीटर है।

-वतरमान मे पयुकत िकये जाने योगय जलसोत 112 घन िकलोमीटर है। िजसमे से िसंचाई के िलये 322 घन िकलोमीटर तथा घरेल,ू औदोिगक एवं अनय कायों
हेतु 71 घन िकलोमीटर है।

-भारत मे जल की उपलबधता पित वयिकत 1947 मे 6000 घन मीटर थी। जो 2001 मे 1829 घन मीटर रह गई। 2017 मे यह घटकर 1600 घन मीटर
रह जायेगी।
-िसंचाई मे सोतो का 45 पितशत जल िरस जाता है, शेष 55 पितशत ही िसंचाई के िलए बचता है।

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- 2010 मे 694-710 घन िकलोमीटर


- 2025 मे 784-850 घन िकलोमीटर
- 2050 मे 973-1180 घन िकलोमीटर

- - 2050 मे गामीण केतो मे 111 घन िकलोमीटर एवं शहरी केतो मे 90 घन िकलोमीटर जल की अितिरकत आवशयकता होगी।

- औदोिगक केत 81 घन िकलोमीटर, ऊजा/िवदुत उतपादन हेतु 63-70 घन िकलोमीटर जल की आवशयकता होगी।

- केवल िसंचाई हेतु 2050 मे कम से कम 628 घन िकलोमीटर तथा अिधक से अिधक 807 घन िकलोमीटर पानी की जररत होगी।

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मेनगोव िवकास पर िवशेष रप से बल िदये जाने के उदेशय से ‘गलोबल एनवायरमेटल पोगाम’ के अनतगरत देश के िविभन बायोजयोगािफक केतो से सघन संरकण
हेतु चार िसंिचत केतो की देश मे पहचान कर ली गई है।

देश मे 90 पितशत जल कुल उतपादन का कृिष कायर के उपयोग मे लाया जाता है। िजसमे खाद उतपादन का पितशत 35 है। चाणकय की पिसद कृित ‘कौिटलय
का अथरशासत’ मे वषा के जल से िसंचाई की िविधयो का उललेख िमलता है। 12 वी शताबदी मे कशमीर के किव कलरण की कृित राजतरंिगणी मे डल झील के
आस-पास एक सुिवकिसत िसंचाई पणाली का िजक िकया गया है। ईसा पूवर पथम शताबदी मे इलाहाबाद के िनकट शृंगवेरपुर नगरी मे गंगा के पानी से जल गहण
पणाली पर पकाश डाला गया है। मौयरकािलन इितहास मे भी िसंचाई पणाली के बारे मे बताया गया है।

छोटी निदयो या नालो से इसके समीप के खेतो मे िबना िवदुत अथवा ईधन के िसंचाई के िलए हाइडोजन जल पमप सुिवधा मे लाये जाते है। छोटी नदी या नाले
पर छोटे बाध से पानी के दबाव मे इस पमप का उपयोग िकया जाता है। मधयपदेश मे 28 से अिधक हाइडोजन पमप सथािपत हो चुके है जो भोपाल, खरगौन और
खणडवा केतो मे लगाये गये है।

तीसरी दुिनया के लोग जल पदूषण और जल चक के िबगड़ने के कारण जयादा परेशान है। िजसका कारण आिथरक िवकास, जनसंखया वृिद और औदोगीकरण
है।

पदूिषत जल मे उपिसथत आसेिनकयुकत जल का पान करने से चमररोग, पेट का रोग, फेफड़े, आँत, अमाशय के कैसर आिद रोग उतपन होते है। देश मे कई
खतरनाक बीमािरयो का एकमात कारण पदूिषत जल का सेवन ही है।

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हहहहहहहहहह के इस दौर मे भारत के गामीण जन
िजन मुखय समसयाओं से र-ब-र होना पड़ रहा है उनमे से एक भूजल सतर का िगरना भी है। जल जीवन की
अिनवायरता है इितहास इस बात का साकी है िक अिधकतर आिद समयताएं िविभन नदी-घािटयो मे जनमी और फली-
फूली है। अनेक महतवपूणर नगर, नदी, झील तालाब आिद िकसी न िकसी जल सोत के िकनारे ही बसे है। शायद इसी
कारण वैजािनक गेटे ने जल को महतवपूणर मानते हुए माना िक ”पतयेक वसतु जल से ही उतपन होती है व जल के दारा
ही पितपािदत होती है। लेिकन अब जल के सोत उनत अवसथा मे नही है। पृथवी पर उपलबध कुल पानी का केवल
0.3 पितशत भाग ही साफ और शुधद होता है।

जल की उपलबधता सुिनिशत करने व िगरते भूजल सतर को धयान मे रखते हुए 1977 मे सयुकत राषट् संघ दारा
आयोिजत सममेलन मे वषर 1981 से 1990 तक के दशक को पेयजल दशक के रप मे मनाने का िनणरय िलया गया
था। पुन: सयुकत राषट संघ ने 2003 को अनतराषटीय सवचछ जल वषर के रप मे मनाया है।

भारत िवश का सबसे बड़ा कृिष पधान देश है यहा की 80 पितशत कृिष, वषा के जल के सहारे होती है। उसी तरह 80
पितशत गामीण जनसंखया अपनी घरेलू जल आपूितर का पबनध सवयं करती है। िवश मे भारत भूजल का सबसे बड़ा
पयोकता है।

जल की इस नाजुक हालात और लगातार बढती माग को देखते हुए जहा खेती की िसचाई मे पानी की कटौती की चचा
होने लगी है वही उपलबधता मे भी लगातार कमी की बात कही जा रही है देश के िविभन केतो मे पड़ रहे सूखे और नल
कूपो दारा पानी के अिनयोिजत दोहन के चलते भूगिभरक जल मे लगातार कमी होती जा रही है, िजसके दुषपिरणाम के
रप मे हिरत कािनत के अगुवा पंजाब और हिरयाणा एवं उतर पदेश के कई िजला का भूिमगत पानी खतरनाक हालात
तक नीचे चला गया है।

भारतीय गामो मे उतपन हुई इस जवलंत समसया के पीछे िनम कारक मुखयतया उतरदायी माने जाते है-

1. सवतनतता के बाद देश के िसिचंत भू-भाग मे जबरदसत बढोतरी हुई है 1951 मे 226 लाख हेकटेयर भू-भाग िसंिचत
था वह सन् 2000 तक बढकर 10 हजार करोड़ हेकटेयर से अिधक हो गया है।

2. आज भी अिधकतर भारतीय िकसानो मे फसल के अनुसार जलापूितर की जानकारी का सवरधा अभाव पाया जाता है
अिधकाशं िकसानो मे यह आज भी धारणा है िक अिधक पानी की आपूितर से अिधक उपज भी पािपत होगी। जब िक
इसके िवपरीत वैजािनक तथय यह है िक िसचाई के रप मे फसलो को संतुिलत जल की कुशलता पूवरक आपूितर से
फसलो से उचचतम उतपादन पापत िकया जा सकता है।
3. वतरमान मे िसचाई की पंरपरागत पणाली से हमारे खेतो तक पहुचने वाले पानी का 20 से 25 पितशत तक भाग वयथर
मे चला जाता है। नािलयो के माधयम से होने वाली िसचाई मे फसलो की कयािरयो तक पहुचने के पूवर ढेरो पानी
नािलयो दारा सोख िलया जाता है।

4.सवतनतता पािपत उपरानत भारत मे सावरजिनक केत दारा सवािधक पॅ़़ू ़़


जी का िनवेश जल पर ही िकया गया है।
आज कई बहुराषटीय कंपिनयो िजनमे पमुख रप से कोका कोला, पेपसी, एकवािफना, और िकलने ने बोतल बनद पानी का
धंधा शुर िकया है। देश के िविभन गामीण िहससो मे कोक और पेपसी ने ‘कोलड िड््क़़़
स ’ बनाने के पलाट
लगाए। इससे भी जल का दोहन बड़े पैमाने पर िकया गया। गावो मे जल संकट लगातार कयो बढता जा रहा है, इससे
कई उपयुरकत कारण है। लेिकन उनमे एक पमुख कारण पानी का वयापारीकरण भी है। एक आंकड़ो के अनुसार भारत
मे पितिदन 10 करोड पानी की बोतले िबकी की जाती है। इसी तरह 5 करोड बोतले कोलड िड््ग़़़
स की िबकती
है। इसमे महतवपूणर तथय यह है िक कोलड िड््क़़़
स की एक केन को तैयार करने मे 20 लीटर पानी की
आवशयकता होती है और पेय पीने के बाद शरीर को लगभग 9 गुना अितिरकत पानी की जररत होती है।

इससे अनुमान लगाया जा सकता है िक पितिदन 10 खरब िमली लीटर पानी िविभन जल सोतो और भूजल के दोहन से
िनकाला जा रहा है।

आज समय की आवशयकता है इस अमूलय िनिध को बचाये रखने की। यदिप जल राजय का िवषय है परनतु केनद
सरकार ने जल संसाधन के संरकण हेतु कई महतवपूणर पयास िकये गए है।

दसवी योजना (04-05) मे तविरत गामीण जल आपूितर कायरकम लागू िकया गया एवं 11 वी पंचवषीय योजना मे भी जल
संसाधन के िवकास को उचच पितयोिगता देते हुए उपलबध जल का वषा पोिषत केत मे इषतम उपयोग करने पर िदया
गया है। भूजल के सही ढंग से उपयोग को बढावा देने हेतु ”कृितम भूजल संभरण सलाहकार पिरषद का भी गठन
िकया गया है। वतरमान मे सरकार दारा इस समसया से कुशल तरीको से िनपटने हेतु केदीय जल आयोग का गठन भी
िकया गया।

गामीण जल उपलबधता केनदीय सरकार के ‘भारत िनमाण’ का एक महतवपूणर संघटक है, इसीिलए केनद सरकार तविरत
िसचाई लाभ कायरकम और वषा पोिषत िवकास कायरकम तथा जल संसाधनो के पबनधन और संवरधन मे भारी िनवेश कर
रही है।

भारत के िविभन गामीण केतो मे फैली इस िवशवयापी समसया का हल करने के िलए यिद िनमिलिखत सुझावो पर अमल
िकया जाये ंतो इस भूमंडलीकरण की समसया को िनयंतण मे िकया जा सकता है।

• कृिष के िवकास मे िसचाई की भूिमका तथा हिरत कािनत के दौरान भूजल के अधाधुंध दोहन से भूिमगत जल सतर मे
िगरावट आई। इसके िलए यह आवशयक हो जाता है िक जो पानी कारखानो तथा मल पवाह दारा दूिषत हो जाता है,
उसके पुनरशोधन की वयवसथा पतयेक केत मे की जाय।

• िसचाई दौरान 30 से 40 पितशत जल टू टे फूटे और पुराने नलो से िरस-’िरसकर वयथर मे चला जाता है। कुशल
पबनध एवं वैजािनक पधदित दारा इस हािन को रोका जा सकता है ।

• वषा जल का 90 से 95 पितशत भाग बहकर निदयो के रासते समुद मे चला जाता है आज जररत है िक गॉव के पानी
को गॉव मे ही रोके, खेत के पानी को खेत मे रोके, िमटी को बहने से रोके, यह कायर जन भागीदारी से ही समभव है।

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• जल उपयोग तथा पबनध, समुदाय के सामािजक ढंाचे
ा से जुडा है इसिलए तकनीकी और सामािजक पको के
बीच तालमेल होना आवशयक है ।
• पतयेक राजय दारा जल संरकण कायरकम को गॉव मे राषटीय रोजगार गारनटी योजना मे सवोचच पाथिमकता दी जाय।

• राजयो को भूजल संरकण कानून बनाने पर जोर देना होगा और पित वयिकत को जल की उपलबधता उसकी गुणवकता
और भूजल करण के रोकथाम के बारे मे ठोस कायरवाही करनी होगी। जल सुरका योजना को असली जामा पहनाना
होगा। राजयो को वषा जल संचयन के साथ भूजल के कृितम पुनरभरण समबनधी जागरकता कायरकम और पिशकण
पाठयकमो का आयोजन, वषा जल संचयन सुिवधाओं को बढावा देने हेतु भवन उपिनयमो मे संशोधन, जल संचयन को
पोतसाहन देने वालो को कर छू ट जैसे उपाय भी करने होगे।

भारत को िवश गुर महाशिकत बनने व गामो को सवावलंभी एवं आतमिनभरर बनने के िलए आवशयक है जल के उिचत
संरकण, कुशल पबनध एवं िकफायती उपयोग िकया जाय। अनयथा वह िदन दूर नही, जब पानी की बूंद तेल की बुंद से
अिधक महगी हो जायेगी। इस के िलए आवशयकता इस बात की है िक वैजािनक िविध पर आधािरत बहुपकीय रणनीित
िवकिसत करने मे आम वयिकतयो के पयतो को बढावा िदया जाय और इस कायर मे सयुकत राषट एजेिसयो, सरकार और
सवैिचछक संसथाओं का सहयोग पापत िकया जाए।

हहहहह हहहहह हह हह हह हहहहह हहहह


• सवतंत आवाज़ डॉट कॉम

हह हहहहहह। यदिप वैिशक तपन और जलवायु पिरवतरन के पतयािशत पभावो का अभी भली-भाित अंदाजा नही
लगाया जा सका है, तथािप यह िनिशत मािनए िक भिवषय मे पानी की समसया का एक िवकराल रप सामने आने
वाला है। भारत मे िपछले कुछ दशको मे तेजी से बढती जनसंखया की िनरंतर बढती माग के कारण वैसे भी जल
संसाधनो पर काफी दबाव बढ गया है। एक अरब दस करोड़ की जनसंखया वाला भारत आबादी के िलहाज से िवश
का दूसरा सबसे बड़ा देश है। िवश की कुल भूिम के 2.45 पितशत केत मे बसे इस देश की अथरवयवसथा कृिष पर
िनभरर है। िवश की 16 पितशत जनसंखया वाले भारत मे संसार के कुल जल संसाधनो का 4 पितशत जल उपलबध
है जहा भूजल सतर मे सुधार लाना एक जररत और चुनौती है।
हहहह ने भारत की अथरवयवसथा के िवकास मे उललेखनीय योगदान िदया है और देश के सामािजक-आिथरक
िवकास मे एक पमुख उतपेरक की भूिमका िनभाई है। िवत, िबजली और डीजल, बिढया िकसम के बीज, उवररक
और सरकारी अनुदान की सहज उपलबधता के साथ-साथ तकनीकी रप से वयवहािरक योजना पर िकयानवयन के
कारण भूजल िनकास संरचनाओं के िवकास मे जबदरसत वृिधद हुई है। तीसरी लघु िसंचाई जनगणना के अनुसार
2001 मे भारत मे 1 करोड़ 80 लाख भूजल िवकास संरचनाये थी। अनुमान है िक यह संखया अब बढकर 2
करोड़ तक पहंुच चुकी होगी। सन् 1951 से 2001 के बीच भू-जल िसिचंत केत मे नौ गुनी वृिधद हुई है।

हहहहहहहहह भूजल बोडर ने राजयो के साथ िमलकर सिकय भूजल संसाधनो का जो आकलन लगाया है, उसके
अनुसार वािषरक रप से देश के पुनभररण योगय भूजल संसाधनो के लगभग 50 पितशत का ही वतरमान मे उपयोग हो
रहा है। परनतु, जमीन के नीचे के जल केतो की मौजूदगी और िवतरण को िनयंितत करने वाली अनेक जिटलताओं
के कारण देश के िविभन भागो मे भूजल की उपलबधता और उपयोग मे भारी िभनता है। उदाहरण के िलए, भारत
की गागेय केत और बहपुत के वयापक कछारो की भूगभीय संरचनाओं मे पचुर भूजल संसाधन उपलबध है जबिक
पायदीपीय भारत की चटानी संरचनाओं मे अतयनत सीिमत माता मे कही-कही ही पानी िमलता है।
हहहह के अनुसार, पंजाब, हिरयाणा, राजसथान, िदलली, गुजरात और तिमलनाडु मे भूजल का अचछा िवकास हुआ
है। मगर इन राजयो के अिधकाश केतो मे भूगभीय जल सतर काफी नीचे चला गया है और जल संसाधनो का भी
हास हो रहा है। दूसरी और ओिडशा, पिशम बंगाल, िबहार, उतर पदेश के कुछ भागो मे और असम जैसे पूवी और
पूवोतर के राजयो मे भू-जल का िवकास अभी भी ठीक से नही हुआ है। जल संसाधन मंतालय ने आंध पदेश,
महाराषट, कनाटक, राजसथान, तिमलनाडु, गुजरात और मधय पदेश के सात राजयो के उन सथानो मे खुदे हुए सूखे
कुओं (डग वेल) को िरचाजर करने की योजना शुर की है, जहा पानी का अतयिधक दोहन िकया जाता रहा है और
जहा पानी की गंभीर कमी है। योजना का उदेशय इन सूखे कुओं मे इतना पानी उपलबध कराना है िजससे लंबे समय
तक उनको उपयोग मे लाया जा सके भौगोिलक संरचना, जलवायु, जलिवजान संबध
ं ी और सामािजक आिथरक
बनावटो के कारण भारत के संदभर मे भू-जल का पबंधन एक चुनौती भरा कायर है। भू-जल संसाधनो के वैजािनक
पबंधन के िलए अधययन के साथ-साथ पानी की उपलबधता, आपूितर और जमीन से पानी िनकालने के उपायो के बारे
मे और यह भी देखना होगा िक उपलबध संसाधनो का संरकण, िनयंतण और सुरका कैसे की जा सकती है।
हह-हह के िगरते सतर से जुड़ी समसयाओं से िनपटने के उदेशय से महतवपूणर संसाधन को लंबे समय तक उपयोग
के योगय बनाए रखने के पयासो को केतीय पदशरन, पिरयोजनाओं, िनयामक उपायो आिद मे शेणीबधद िकया गया है।
केतीय पदशरन का उदेशय मुखय रप से भू-जल के कृितम िरचाजर के जिरए जलगाही केतो के िगरते सतर को ऊंचा
उठाना है। केनदीय भू-जल बोडर नौवी योजना की शुरआत से ही देश के िविभन भागो मे िविवध पकार की भू-जल
संरचनाओं के उपयुकत िकफायती िरचाजर तकनीक को लोकिपय बनाने के उदेशय से वषा जल संचय और भू-जल
के कृितम िरचाजर के पदशरन की पिरयोजनाओं पर काम कर रहा है। बताया गया है िक गयारहवी योजना के दौरान
केनद-पवितरत योजना-भू-जल पबंधन एवं िनयमन के तहत एक अरब रपये का पावधान िकया गया है। इस योजना
मे शहरी केतो सिहत उन केतो मे पदशरन कायरकम चलाने पर जोर िदया गया है जहा पानी का आवशयकता से
अिधक दोहन हो रहा होता है।
हह संसाधन मंतालय ने देश के 5000 पदशरन सथलो मे कृषक सहभािगता कायर अनुसंधान कायरकम की भी
सवीकृित दी है, िजस पर 24 करोड़ 46 लाख रपये का खचर िकया जाएगा। यह कायरकम देश के 25 राजयो/केनद
शािसत पदेशो के 375 िजलो मे लागू िकया जा रहा है। इस कायर मे 60 कृिष िवशिवदालयो, भारतीय कृिष
अनुसंधान पिरषद से संबधद संसथाओं, अनतराषटीय अधदर शुषक-उषण किटबंधीय केत फसल अनुसंधान संसथान,
जल एवं भूिम पबंधन संसथान और गैर-सरकारी संगठनो का सहयोग िलया जा रहा है। पतयेक कायरकम देश मे भू-
जल के िवकास और िनयमन हेतु पयावरण (संरकण) अिधिनयम, 1986 के तहत केनदीय भू-जल पािधकरण
(सीजीडबलयूए) का गठन िकया गया है। पािधकरण ने 43 ऐसे केतो को अिधसूिचत िकया है जहा पीने के अलावा
अनय िकसी कायर के िलए पानी िनकालने की संरचना के िनमाण की इजाजत नही है। पीने /घरेलू उपयोग के िलए
पानी िनकालने की अनुमित देने का अिधकार िजला मिजसटेटो को सौपा गया है। सरकार ने भू-जल िवकास और
पबंधन पर िनयंतण के िलए उपयुकत कानून बनाने के िलए सभी राजयो और केनद शािसत पदेशो को िवधेयक का
एक पारप भेजा है। इस पारप िवधेयक मे वषा जल संचय कायरकम पर अमल के िलए पावधान िकया गया है।
गयारह राजयो/केनद शािसत पदेशो ने इस िवधेयक को कानून का रप दे िदया है। अठारह और राजयो/केनद शािसत
पदेशो मे इसे कानून मे बदलने की िदशा मे कदम उठाए गए है। अब तक 18 राजयो और चार केनद शािसत पदेशो
ने भवनो की छतो पर वषा जल संचय को अिनवायर बना िदया है।
हहहहहहहहह भू-जल बोडर ने एक वेब जिनत भू-जल सूचना पणाली (डबलयूईजीडबलयूआईएस) का िवकास िकया
है। इस पणाली से नीित िनमाताओं और िनयोजको को बड़े अथवा छोटे पैमाने पर योजना तैयार करने के िलए सभी
पकार की आवशयक जानकारी िमल रही है। इसमे पानी का सतर, पानी की गुणवता और केत की अनय सामािजक-
आिथरक सूचनाये शािमल है। भू-जल पबंधन के िविभन पहलुओं के िहत गािहयो की कमता का िवकास और जन
चेतना जगाना, मंतालय की पमुख गितिविधयो मे आता है। िजसमे केनद/राजय सरकारो के िविभन िवभागो, गैर-
सरकारी संगठनो, सवयंसेवी संगठनो, िनवासी कलयाण संगठनो, िशका संसथाओं, उदोगो और वयिकतयो की सेवाये भी
ली जा रही है। िविभन सथानो और किठन पिरिसथितयो मे बोडर भू-जल संवधरन के िलए िहत गािहयो को वषा जल
संचय की संरचना िनमाण के बारे मे पिशकण का आयोजन भी करता है। इसके अितिरकत जन चेतना जगाने के
उदेशय से गामीण केतो मे वषा जल संचय, भू-जल पदूषण आिद के बारे मे िफलमो का पदशरन भी िकया जा रहा है।
केनदीय भू-जल बोडर ने वयापक पचार-पसार के िलए संबिं धत िवषयो पर पचार सामगी भी तैयार की है।
हह संसाधन मंती की अधयकता मे 2006 मे भू-जल कृितम िरचाजर सलाहकार पिरषद का गठन इस िदशा मे एक
महतवपूणर पयास है। पिरषद मे केनद/राजय सरकारो के संबिं धत मंतालयो/िवभागो, सावरजिनक उपकमो, िवतीय
संसथाओं और उदोगो, गैर-सरकारी संगठनो और िकसानो के पितिनिधयो के अलावा िवषय िवशेषज सदसय मनोनीत
िकए गए है। पिरषद की अब तक तीन बैठके हो चुकी है। पिरषद की िसफािरशो के अनुसार 2007 और 2010 मे
राषटीय भू-जल कागेस का आयोजन िकया गया। भारत के उथले जलगाही केतो मे भू-जल की गुणवता के बारे मे
केनदीय भू-जल बोडर की िरपोटर का िवमोचन 8 अपैल, 2010 को हुई पिरषद की तीसरी बैठक मे िकया गया।
मंतालय ने सथािपत भूिम-जल संवधरन पुरसकार और राषटीय जल पुरसकार दो बार 2007 और 2010 मे िवतिरत
िकए है।
हहहह मे जल से संबिं धत िजन समसयाओं का सामना करना पड़ रहा है उनहे देखते हुए सतही और भू-जल
संसाधनो के पबंधन के मामले पर समग रप से िवचार करना होगा। यह जररी है कयोिक दोनो िवषय एक दूसरे
पर िनभरर है। जहा तक भू-जल संसाधनो का पश है, कृितम िरचाजर तकनीक के जिरए संसाधनो के संवधरन को,
िवशेषकर अित-दोिहत और गंभीर संकट वाले केतो मे, सवोचच पाथिमकता दी जा रही है। राषटवयापी वषा जल
संचय और कृितम िरचाजर कायरकम से भू-जल के संवधरन को बढावा िमलेगा। इन कायरकमो के जिरए, जल
संसाधनो का बेहतर िवतरण, बाढ िनयंतण, िमटी के कटाव मे कमी, और पानी के भंडारण मे मदद िमलेगी। इसके
िलए वाटरशेड िवकास और वषा जल संचय कायरकमो पर तेजी से अमल करना होगा। शहरी केतो मे वषा जल के
संचय को और जोरदार ढंग से पोतसािहत करना होगा तथा बड़े और िवशालकाय भवनो मे अिनवायर बनाना होगा
इसके अलावा उपलबध जल संसाधनो का संयुकत पबंधन, मूलयिनधारण एवं िनयमन, जल संरकण आिद जैसी
कायरनीितयो पर भी अमल करना होगा।
हहहहहहहहह एकीकृत जल संसाधन िवकास आयोग की िरपोटर (1999) के अनुसार भारत के अनुमािनत 1123
अरब घन मीटर (बीसीएम) उपयोग के योगय जल मे से सतही जल की माता लगभग 690 बीसीएम है और भूगभीय
जल संसाधन 433 बीसीएम का है। इसमे यह भी कहा गया है िक सभी सोतो मे उठती मागो के कारण 2025 मे
लगभग 843 बीसीएम जल की आवशयकता होगी, िजसमे भूजल का योगदान 35.3 पितशत अथवा 298 बीसीएम का
होगा। िजन केतो मे भूजल का योगदान अिधक रहने की संभावना है, वे है-िसंचाई, घरेलू और नगरपािलका
जलापूितर, उदोग एवं िवदुत केत।