अपने चारो ओर के पिरवे श को हमने

इस कदर छे ड़ा है िक बात अगर पयारव रण की उठती है तो पद ू ष ण का सवाल
अपने आप ही आगे आ जाता है । हर ओर सुन ी जाने वाली यह ऐसी 'बे त ाल–
पचीशी' है िजसमे लाशो को ढोने व ाला कोई एक िवकम नही बिलक हम सभी
है और सही उतर की पतीका मे बे त ाल साथ–साथ चल रहा है । बात पद ूष ण
की उठे , तो लोग सांस कृ ितक या भाषायी पद ूष ण की बात भी करते है ।
सामािजक मानयताओं को झकझोड़ने वाली वयवहािरक पद ू ष ण के दायरो का
तो कोई आकलन नही िकं तु पयारव रण पद ूष ण का के त आज बढता ही जा रहा
है । मानव एवं सभी पकार के जीवन को ढ़ोने वाली पािरिसथितकी–तं त मे
हलचल मचाने व ाली समसया और पद ू ष ण के वयापक पभाव वाले के त
िनमनिलिखत है (क) िवलुप पाय जं त ुओ ं का सं क ट
(ख) जल पद ूष ण
(ग) वायु पद ूष ण
(घ) सथल एवं मृद ा पद ूष ण
(ड•) धविन पद ूष ण
जलीय, सथलीय एवं आकाशीय के त मे िनवास करने व ाले जै व तथा पादप
समुद ाय और िनजीव वातावरण के बीच सथािपत परसपर सं बं ध को
पािरिसथितकी तं त कहा जाता है । समूचे पािरिसथितकी तं त मे िविभन ततवो
के बीच अ पािरसथितकी तं त मे गहरी छे ड़छाड़ की है । जीव–जं त ुओ ं की कई
पजाितयां आज या तो लुप हो गई है या लुप पाय है ।
नािद काल से एक पकार का सं त ुल न सथािपत है और जब भी यह सं त ुल न
िबगड़ा है तो िवनाश की िसथित सामने आयी है । "अिसततव के िलए सं घ षर —
सवोतम का चुन ाव" के िसदांत पर ही पकृ ित का सारा खे ल िटका है ।
जै ि वक सं स ार मे होने व ाली सवभािवक सता सं घ षर के अितिरक मानव जाित
ने आज अपनी आवशयकताओं, वै ज ािनक खोजो या मनोरं ज न के िलए
"रे ड बुक ऑफ वाइलड" के अनुस ार 1600 ई 0 से 1990 ई 0 के बीच 36
सतनधािरयो और 94 पिकयो की पजाितयां लुप हो गई है जबिक

िसं ह पुच छी बं द र.सतनधािरयो की 236 पजाितयां तथा पिकयो की 287 पजाितयां आज लुप होने के कगार पर है । पािरिसथितकी का आधारभूत िसदांत यह है िक यिद पािणयो के 90‰ आवास नष हो जाए तो उनमे बसने व ाली 50‰ जै व पजाितयां सवतः िवलुप हो जाएं गी। इस िसदांत और उषण किटबं ध ीय वनो के िवनाश की दर के आधार पर यह अनुम ान लगाया गया है िक उषण किटबं ध ीय वनो मे िनवास करने व ाली 5–15‰ जीवो की पजाितयां आने व ाले वषो ं मे हमे श ा के िलए गायब हो जाएं गी। सथलीय िविवधता. आिदमानव यु ग से ले क र आज तक भी आिदवासी जीवन का तानाबाना वनसपितयो के साथ जुड़ ा है । ये तो बाजार सं स कृ ित मे जीने व ाले तथाकिथत सभय समाज मे रहने व ाले लोग है . एिशयाई िसं ह . हं ग ुल . लं बे सागर तट तथा अने क समुद ी दीपो के चलते पकृ ित ने जै व और पादप िविवधता के मामले मे भारतीय उपमहादीप को िवशे ष रप से सं व ारा है । धरती के चार जै व भौगोिलक पिरमं ड लो मे से तीन पराधुव तटीय. ते द ुआ . बाघ. हाथी. सफे द पं ख ो वाली जं ग ली बतख आिद आज सं क टगसत जीव जं त ुओ ं की शे ण ी मे है । शे र . सुन हरा लं ग ूर . मृग या कछु ए जै से वनय जीवो के िविभन अं ग ो का अं त राषर ीय बाज़ारो मे ऊं ची कीमत गरीब दे श ो मे अवै ध कारोबार को बढ़ावा दे त ी है । सखत सरकारी कानून ो के अितिरक वन सं प दा के पित हमारी मानवीय चे त ना की जागरकता इस िदशा मे कारगर िसद हो सकती है । वनसपित जगत के िबना पाणी जीवन की कलपना ही सं भ व नही। जं ग ली पशु–पिकयो की तो छोिड़ए. घिड़याल. वाराणसी या पटना जैसी लाखो की आबादी वाले शहर के िनवासी है तो अब भी कया आपका मन गंगा सनान के िलए तरसता है? िदली. अफीकी और इनडो–िहमालयन के त भारत मे पड़ते है । िवशव के िकसी भी राषर मे दो से अिधक पिरमं ड लो के के त नही िमलते । भारतीय भूि म के त मे िनवास करने व ाली जीव–जं त ुओ ं की कु छ शानदार पजाितयां जै से बाघ. जबिक िदली मे िकए गए एक नमूना परीकण के दौरान कई जगहो पर यमुना के जल मे आकसीजन पाया ही नही गया वायुमंडलीय पदषू ण या पवर वतीय पयर टको दारा फैलाई जाने वाली गंदगी का असर यह है िक पितत पावनी गंगा या यमुना नदी का उदगम सथल ही अतयिधक पदिू षत हो चुका है। . सिकय जलवायु . गं गे य डॉलिफन. हाथी. दलदली िहरण. सोन िचिड़या. जं ग ली गदहा. इलाहाबाद. आगरा या मथुरा जैसी जगहो पर अगर यमुना नदी को देख ले तो आप कया िवशवास कर पाएं गे िक पुरान–काल से ही निदयो की पशंसा मे शलोको की रचना करनेवाले भरत–वंिशयो ने ही पावन यमुना की ऐसी ददु र शा की है? िकसी भी जल मे जीवन की संभावना होने के िलए उसमे घुले आकसीजन की कम से कम माता 5 िमलीगाम लीटर होने चािहए. समुदी जल का बहु त बड़ा भाग और िवशव की लगभग सभी निदयां आज जीव संसार के िलए जीवन की तरलता नही बिलक मौत की कठोरता लेकर बह रही है। भारत मे अगर आप कानपुर. शहरी जीवन जीने के पित ललक तथा िवकास के नाम पर जल मे बहाई जानेवाली गंदगी की नािलयो को साफ करने की िजममेदारी सरकार पर छोड़कर िनिशचंत हो लेते है। नतीजतन. जो िदनभर की अपनी िदनचयार मे पयारव रण के िलए ज़हर छोड़ने के बाद शाम को िकसी रे स तरां मे रखे बोसाई ं के बगल मे बै ठ कर कारखानो मे हो रहे उतपादन पर चचार करते है जल पद ूष णः । "जल ही जीवन है" वाली कहावत और इसकी सचचाई मे अगर हम िवशवास करते हो तो जलीय पयारवरण की पिवतता का दाियतव भी हमारा ही है। िपछले दशको मे िवशव की जनसंखया मे हु ई भारी वृिद. िहम ते द ुआ .

िवषैले रसायनो तथा रासायिनक एवं परमाणु कचड़ो के छोड़े जाने से समुद भी अब पदिू षत हो चला है। सागर मे रहने वाली मछिलयां तथा अनय कई दल ु र भ जीवो का जीवन आज संकट की ओर है। समुदी पदषू ण फैलाने मे िवकिसत राषर सबसे अगणी है। भूगभीय जल का अतयिधक दोहन तथा पदषू ण भी िवशव के अिधकांश देशो के िलए एक भयंकर समसया है। पेय जल या िसंचाई के िलए िनकाले गए भूिमगत जल की उचच दर ने भूगभीय जल सतर को काफी नीचे लाकर मरसथलीकरण की संभावना को बढावा िदया है। . नई िदली के पयारवरण वैजािनक पोफेसर सैययद इकबाल हसन के बात पर िवशवास करे तो गंगोती गलेिशयर के लगातार पीछे हटने से अगले 125 वषो ं मे गंगा सूख सकती है। निदयो के सीिमत जल को छोिड़ए.जवाहरलाल नेहर िवशविवदालय. यह आम मानयता है िक अथाह जल रािश के चलते समुदी जल को पदिू षत करना संभव नही है। जबिक हालत यह है िक तैलीय िरसाव.

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