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इल्हाम....

(नाटक दो स्थानों में । एक पाकक की बेंच और एक मध्यमवर्गीय पररवार के


ड्राइंर्ग रूम में घटटत हो रहा है ।)

(लाईट आती है । एक आदमी की धंधली आकृतत बेंच में बैठी टदखती है । म्यूजिक
शरु होता है ।)

(आदमी अकेला बेंच के अर्गल-बर्गल खेल रहा है ।)

(वो सो रहा है ।)

(आदमी नाच रहा है ।)

सीन १

(पूनम तोहफे, र्गलदस्ते और दस


ू रे सामान उठा रही है और शक्ला मेहमानों को
दरवािे तक छोडने र्गया है और बाहर से उसकी आवाि आती है )

शक्ला:- अच्छा ततवारी िी फफर आना… हााँ.. हााँ… मैं भर्गवान को बता दाँ र्ग
ू ा…
अच्छा भाभी िी, नमस्कार।

(शक्ला अंदर आता है , शक्ला और पूनम काफी परे शान हैं और अचानक शक्ला
हाँसने लर्गता है )

पूनम:- तम हाँस क्यों रहे हो?

शकला:- भाभी सोचो, टदन भर फकतनी मेहनत की हमने, साले के बैंक के सारे
दोस्तों को चोरी से िमा फकया फक सरप्राइि दें र्गे…… साले ने हमें ही
सरप्राइि दे टदया… आया ही नहीं।

पूनम:- कहााँ होंर्गे वो?

शक्ला:- हााँ, कहााँ र्गया होर्गा? सारे दोस्त तो यहीं थे। क्या भाभी कोई
चक्कर तो नहीं है ?

पूनम:- अरे नहीं, उनको नोट गर्गनने से फसकत ममले तब ना। रात में सोते
वक्त भी उनकी उं र्गमलयां चलती रहती हैं। थक
ू लर्गाते हैं, नोट गर्गनते हैं।
मैंने कहा अब तो नोट गर्गनने की मशीन भी लर्ग र्गयी है … तो कहते हैं अर्गर नोट
मशीन गर्गनेर्गी, तो मैं क्या करूंर्गा? िब तक नोट नहीं गर्गन लेते तब तक लर्गता है
नहीं कछ फकया है …… आि आपका टदन भी परू ा बबाकद हो र्गया…।
शक्ला:- एक टदन अपने दोस्त के मलये क्या टदक्कत है ।

पूनम:- आपको भी दे र हो रही होर्गी… अब तो आते ही होंर्गें …

शक्ला:- अपना कौन इंतिार कर रहा है । नीचे िाऊाँर्गा, दकान का शटर उठाऊाँर्गा
फैल के सो िाऊाँर्गा। भाभी मझे थोडी गचंता हो रही है । काफी समय हो र्गया है …
साला अपने ही िन्मटदन में र्गायब है । मझे तो याद नहीं पहले भी कभी उसने
ऎसा फकया हो?
पन
ू म:- अभी पपछले कछ महीनों से थोडा दे र से घर आने लर्गे हैं पर इतनी दे र
कभी नहीं हई… मझे तो लर्गता था फक नीचे आपकी दकान में बैठ िाते होंर्गें ,
पर कहने लर्गे फक ऑफफस के पास एक पाकक है , वहीं थोडी दे र िाकर बैठ िाता
हूाँ, अच्छा लर्गता है ।

शक्ला:- अिीब बात है । मझे नहीं बताया साले ने।

पूनम:- बजकक पपछले कछ टदनों से ज्यादा ही खश टदखते हैं।

शक्ला:- ये दे खो… ये लाया था… साले के मलये… पवदे शी। सोचा था साथ में
पीयेंर्गे… अपने सनहरे भपवष्य के बारे में र्गपशप करें र्गे… चलता हूाँ भाभी…
अकेले ही पीयूंर्गा अब… एक गर्गलास दे दीजिये…

(भर्गवान अंदर आता है )

भर्गवान:- अबे गर्गलास भी यहीं से लेर्गा तो यहीं पी ले ना।

शक्ला:- अबे साले… कहााँ था बे भर्गवान… अभी पााँच ममनट पहले तेरा बथक डे
तनकला… पर कोई बात नहीं है प्पी बथक डे, फकतनी गचंता हो रही थी तेरी।

भर्गवान:- कहााँ है माल?

शक्ला:- माल तो है , पहले अपनी बीवी से तो ममल ले… बहत नाराि है वो।

(भर्गवान पूनम के पास िाता है । पूनम डडब्बा खोलने की कोमशश करती है , डडब्बा
नहीं खलता)

भर्गवान:- अरे खल नही रहा है ?

पूनम:- पता है आपको फकतने लोर्ग आये थे। आपका पूरा बैंक यहीं पर था। फकसी
ने कछ नहीं खाया। पूरा खाना बचा हआ है … अब पूरे हफ़्ते वही र्गमक करके
खखलाऊाँर्गी।

भर्गवान:- अरे इतने लोर्ग थे तो मझे पहले बताना चाटहये था ना।

शक्ला:- सरप्राइि का मतलब िानता है त?



(अचानक डडब्बा खल िाता है )

भर्गवान:- अरे खद ही खल र्गया। पपंकी कहााँ है ?

पन
ू म:- सबह कॉलेि है उसका… इंतिार करते-करते सो र्गई। पता है फकतना समय हआ है ?

भर्गवान:- अरे बाप रे … मझे तो पता ही नहीं चला।

पन
ू म:- कहााँ थे आप, पछ
ू सकती हूाँ?

भर्गवान:- अरे मैं… वो पाकक र्गया था। मझे पता ही नहीं चला फक इतना टाईम हो
र्गया… अरे हााँ पता है आि पाकक में …

पन
ू म:- मझे नहीं सनना पाकक में क्या हआ था। मैं थक र्गई हूाँ। भाई साहब,
अंदर पानी, सोडा सब रखा है , तनकाल लीजियेर्गा। मैं सोने िा रही हूाँ।
(पन
ू म िाती है । भर्गवान, शक्ला से गर्गलास लेने के मलए आर्गे बढता ही है फक
पन
ू म वापपस आती है । भर्गवान िकदी से गर्गलास वापपस करता है ।)

पूनम:- वो मैं कहना भूल र्गयी थी… िन्मटदन की हाटदक क शभकामनायें… ।

भर्गवान:- अरे नाराि हो?

पूनम:- आपको फकक पडता है ? (पूनम चली िाती है )

भर्गवान:- हा…हा…शक्ला… आि मैं बहत खश हूाँ। मैंने ऎसा िन्मटदन कभी नहीं मनाया।

शक्ला:- ये ले… गचयसक। पता है भाभी ने आि फकतनी मेहनत की… मैंने भी आि


दकान अपने नौकरों के हवाले कर दी… तेरे सारे दोस्तों के घर र्गया… उन्हें
खबर की फक आि पाटी है … सब बबचारे आ भी र्गए…… और एक तू ही र्गायब।

भर्गवान:- अच्छा, तभी मैं कहूाँ फक उन्हें खबर कैसे लर्गई?

शक्ला:- मैंने कहा ना मैंने ही सबको बताया।

भर्गवान:- नहीं…… वो बच्चों को?

शक्ला:- बच्चे… फकसके?

भर्गवान:- पाकक… पाकक के बच्चे…

शक्ला:- ये पाकक का क्या चक्कर है ?

भर्गवान:- वहीं ऑफफस के पास एक पाकक है ना… छोटा सा। वहीं शाम को कछ
बच्चे खेलने आते हैं। उन्हें खेलता दे खना…… परू ी थकान ममट िाती है । मेरी
तो बच्चों से दोस्ती भी हो र्गई है । मैंने उन्हें वो सारे खेल मसखाये िो
मैं बचपन में खेला करता था और आि तो उन्होने मेरा िन्मटदन भी मनाया। मैं
पछ
ू ता रहा – तम्हें कैसे पता चला… पर फकसी ने कछ नहीं बताया।

शक्ला:- फकसके बच्चे हैं वो?

भर्गवान:- पता नहीं… अरे हााँ आि चाचा भी आये थे ममलने।

शक्ला:- चाचा… तेरा कोई चाचा भी है यहााँ?

भर्गवान:- नहीं, मेरे चाचा नहीं…… वो चाचा हैं… पर वो कैसे आ सकते हैं?

शक्ला:- सन भाई मझे थोडी चढ र्गई है । तेरी कोई बात मेरी समझ में नहीं आ
रही है … कौन चाचा… कौन से बच्चे… अभी ये सब छोड, दे ख हर साल की तरह इस
साल भी मैं दारू लाया… लाया फक नहीं…?

भर्गवान:- हााँ, लाया।

शक्ला:- और हर साल की तरह इस साल भी हम लोर्ग अपने खब


ू सूरत भपवष्य की
बातें करें र्गें… करें र्गें फक नहीं?

भर्गवान:- हााँ, करें र्गें…… लेफकन इस बार पहले तू शरु करे र्गा।

शक्ला:- अरे , मैं क्या बोलर्ग


ूं ा…… अरे यार तू ना फंसा दे ता है … मैं… नहीं यार…

भर्गवान:- शक्ला… बदबद नहीं। शरु कर।

शक्ला:- चल ठीक है , मैं ही शरु करता हूाँ… वो दे ख… दकान… है फक नहीं।

भर्गवान:- हााँ, दकान।

शक्ला:- फफर… दो दकान।

भर्गवान:- दो दकान। फफर?

शक्ला:- फफर तीन दकान।

भर्गवान:- हााँ तीन। फफर?

शक्ला:- हा… हा… । फफर क्या? अपना भपवष्य तो सीधा है । अभी थोडे कपडे
बेचता हूाँ, बाद में बहत कपडे बेचाँर्ग
ू ा। चल मेरा हो र्गया अब तू शरु कर… और
हााँ पपंकी की शादी से शरु करना… मिा आएर्गा।

भर्गवान:- नहीं… उसके भी पहले से घर से शरु करता हूाँ। ये घर दो साल में


अपना हो िायेर्गा।

शक्ला:- अपना हो र्गया।

भर्गवान:- फफर पपंकी की शादी।


शक्ला:- हो र्गयी… मिा आ र्गया। फफर?

भर्गवान:- बबकलू कछ साल में इंिीतनयर बन चका होर्गा।

शक्ला:- वो बबजकडंर्ग बना रहा है , पल बना रहा है ।

भर्गवान:- फफर उसकी शादी।

शक्ला:- धम
ू धाम से।

भर्गवान:- तब तक पपंकी के बच्चे हो र्गए होंर्गे।

शक्ला:- बहत सारे ।

भर्गवान:- फफर बबकलू के बच्चे।

शक्ला:- मिा आ र्गया।

भर्गवान:- फफर हम उन्हें बडा करें र्गे… और अर्गर ज ंदा रहे तो उन्हें बहत
प्यार भी करें र्गे और उनकी भी शादी करें र्गे…

शक्ला:- करें र्गे… भर्गवान करें र्गें।

भर्गवान:- और फफर भी अर्गर बचे रहे तो उनके बच्चों का भी सख भोर्गें र्गे… और फफर…

शक्ला:- हााँ… फफर?

भर्गवान:- फफर… फफर क्या… और क्या?

शक्ला:- फफर मिा। बहत सारा मिा…… क्या हआ आि तूने मन से नहीं सनाया,
पपछली बार फकतना म ा आया था याद है ? क्या हआ भर्गवान…?

भर्गवान:- कछ नहीं… शक्ला। आि एक अिीब सी बात याद आई… मेरा स्कूल नदी के
उस पार था, रोि छोटी सी नाव में उस पार िाना पडता था। िो नाव चलाता था
उससे मेरी अच्छी दोस्ती थी। एक टदन हम नाव में स्कूल िा रहे थे, तभी हमने
दे खा फक मकलाह नाव चलाने के बिाए अपने डंडे से गचडडया को उडा रहा है पर
गचडडया बार-बार उडकर वापस वहीं बैठ िाती है । मकलाह का र्गस्सा बढता िा
रहा है । हम सब डर र्गए क्योंफक नाव नाव बरी तरह टहल रही थी। मैंने कहा-
’अरे क्या कर रहे हो? नाव डबाओर्गे क्या?’ तो उसने कहा – ’अरे साहब, इसे
मफ़्त में नदी पार करने की आदत पड र्गई है ।’ हम सभी हाँ स टदये। इसके काफी
टदनों बाद हमने दे खा, मकलाह और गचडडया एक दस
ू रे से माँह फेरकर बैठे
हैं, मानो एक दस
ू रे से नाराि हों। फफर कछ टदनों बाद दे खा मकलाह गचडडया
से बातें कर रहा है लर्गातार… कभी हाँसता है … कभी गचकलाता है । सभी कहने लर्गे
ये पार्गल हो र्गया है । मझसे रहा नहीं र्गया, मैंने उससे पूछ मलया- ’क्या कर
रहे हो? पार्गल हो र्गये हो क्या, एक गचडडया से बात कर रहे हो?’ तो वो कहने
लर्गा-’ मझे तो लर्गता है आप सब लोर्ग पार्गल हैं, अरे ये तो आप सब से बात करना
चाहती है , आप लोर्ग इससे बात क्यों नहीं करते?’ हम उसे पार्गल समझ रहे थे और
वो हम सबको।
शक्ला:- फफर वो मकलाह का क्या हआ?

भर्गवान:- िब बात फैल र्गई तो सबने उसकी नाव में िाना बंद कर टदया, कछ समय
तक वो अकेले ही नाव चलाता रहा। बाद में मैंने सना था फक लोर्गों ने उसे
पत्थर मार-मारकर र्गााँव से भर्गा टदया।

शक्ला:- बस…

भर्गवान:- हााँ, बस।

शक्ला:- अरे ये तो एकदम अिीब सी बात हई?

भर्गवान:- ये ही सब चीिें मझे याद आती हैं, िब मैं पाकक की उस बेंच पर


बैठता हूाँ और फफर वो बच्चे आ िाते हैं। लेफकन शक्ला, आि तेरे को पता
नहीं फकतने सालों बाद मैं नाचा…

शक्ला:- तू नाचा…… ?

भर्गवान:- अरे हााँ… बहत मिा आया… क्या धन थी वो… (भर्गवान माँह से अिीब सी
धन तनकालता है और नाचना शरु कर दे ता है । पहले शक्ला को ठीक लर्गता है
फफर वो परे शान हो िाता है । डर िाता है )

शक्ला:- अरे वाह… मिा आ र्गया… चल आ िा… सन आ िा यार… बहत हो र्गया…


भर्गवान… बैठ ना। क्या कर रहा है … सन… बस बहत हो र्गया यार…… ओ बैठ ना………
दे ख मझे ठीक नहीं लर्ग रहा है …… भर्गवान…… भर्गवान…… तू पार्गल हो र्गया है क्या?

Black Out

Scene-2

(भर्गवान पाकक की बेंच पर मानो फकसी से बात कर रहा है )

भर्गवान:- भीतर पानी साफ था… साफ ठं डा पानी… काँ ए की तरह, िब हम पैदा हए
थे…… िैसे-िैसे हम बडे होते र्गए हमने अपने काँ ए में खखलौने फेंके, शब्द
फेंके, फकताबें, लोर्गों की अपेक्षाओं िैसे भारी पत्थर और इंसान िैसा िीने
के ढे रों खांचे और अब िब हमारे काँ ए में पानी की िर्गह नहीं बची है तो हम
कहते हैं…… ये तो सामान्य बात है ।

Scene-3
(पपंकी चाय लेकर आती है । पन
ू म, शक्ला और सौरभ बैठे हए हैं)

पूनम:- लीजिये, चाय पीजिये। माफ कीजियेर्गा िन्मटदन के टदन इन्हें कछ


िरूरी काम आ र्गया था। बहत दे र बाद आये। हम भी परे शान हो र्गये थे, अब सब
ठीक है । ये एकदम ठीक हैं। आपसे भी उस टदन के बाद आि मलाकात हो रही है ।

शक्ला:- भाभी, इन्हें सब पता है । ये आपसे कछ बात करने आये हैं।

सौरभ:- असल में …… (सौरभ, पपंकी की तरफ दे खता है )

पन
ू म:- पपंकी, तम अंदर िाओ…… हााँ, कटहये।

सौरभ:- िी…… सर मेरे सीतनयर हैं। मैं बैंक का ये लेटर लाया हूाँ। अकेले
आने की टहम्मत नहीं थी, इसमलये शक्ला िी से ररक्वेस्ट की फक साथ चलें …
सर को सस्पें ड कर टदया र्गया है ……

पन
ू म:- क्यों…? क्यों सस्पेंड कर टदया वो तो रोि काम पर िाते हैं। इतने
साल उन्होंने बैंक को टदये हैं और आप एकदम……

सौरभ:- वो करीब एक महीने से बैंक नहीं आ रहे हैं…… इसमलये ये लेटर मझे
खद ही लाना पडा।

पन
ू म:- पर वो तो रोि सबह…… मैं टटफफन……… पर क्यों तनकाल टदया?

सौरभ:- सर असल में पैसे बााँटने लर्गे थे।

शक्ला:- मतलब बााँटने नहीं लर्गा था… मसफक एक को………

पूनम:- फकसको…… ?

सौरभ:- भर्गवान सर……?

पूनम:- वो घर पर नहीं हैं… आप कटहए…

सौरभ:- एक बटढया हर महीने पें शन लेने आती थी, भर्गवान सर पता नहीं क्यों
उसे पााँच सौ रुपये ज्यादा दे ने लर्गे। मैनेिर साहब ने पछ
ू ा- ये र्गलती कैसे
हई। तो सर कहने लर्गे- ये र्गलती नहीं है , मैंने िानबझ
ू कर टदये हैं। मैनेिर
साहब ने पूछा- क्या मााँर्गे थे उसने? सर ने कहा – नहीं। फफर उनकी बहत तेि
बहस हई। हम लोर्गों ने भी बाद में सर को समझाया तो सर कहने लर्गे फक मैंने
उसकी ’आह’ सनी है । (सौरभ को हाँसी आने लर्गती है वो हाँ सी दबाता है ) सॉरी……
और फफर सर पता नहीं क्या पार्गलों िैसे बातें करने लर्गे…… मेरा मतलब…… मैं
नहीं, ऎसा बैंक वाले लोर्ग कहते हैं फक फकसी को भी पैसे बााँट दे ना… पार्गलपन
ही हआ न……

पूनम:- पार्गल नहीं हैं वो…………।


Black Out

Scene-4

भर्गवान:-

आदतन… अपना भपवष्य मैं अपने हाथों की

रे खाओं में टटोलता हूाँ……

’कहीं कछ छपा हआ है ’ – सा चमत्कार

एक छोटे बादल िैसा हमेशा साथ चलता है ।

तेि धप
ू में इस बादल से हमें कोई सहायता नहीं ममलती…

वो हथेली में एक ततल की तरह… बस पडा रहता है ।

ततल का होना शभ है …

और इससे लाभ होर्गा…

इसमलये इस छोटे बादल को संभालकर रखता हूाँ।

फफर इच्छा होती है …… फक वहााँ चला िाऊाँ……

िहााँ बाररश पैदा होती है …

बादल बाँट रहे होते हैं……

पर शायद दे र हो चकी है ।

अब मेरी आस्था का अाँर्गठ


ू ा इतना कडक हो चका है

फक वो फकसी के पवश्वास में झकता ही नहीं है ।

फफर मैं उन रे खाओं के बारे में सोचता हूाँ……

िो बीच में ही कहीं र्गायब हो र्गयीं थीं……

’ये एक टदन मेरी तनयतत िीयेर्गा’ – की आशा में ……

िो बहत समय तक मेरी हथेली में पडी रहीं……

क्या थी उनकी तनयतत?


कौन सी दतनया इंतिार कर रही थी……

इन दरवािों के उस तरफ……

जिन्हें मैं कभी खोल नहीं पाया……।

तभी मैंने एक अिीब सी चीि दे खी……

मैंने दे खा… मेरे माथे पर कछ रे खायें बढ र्गई हैं…… अचानक।

अब – ये रे खायें क्या हैं।

क्या इनकी भी कोई तनयतत है …? अपने दरवािे हैं?

नहीं – इनका कछ नहीं है ।

बहत बाद में पता चला इनका कछ भी नहीं है ।

ये मौन की रे खाये हैं।

मौन – उन रे खाओं का िो मेरे हाथों में उभरी थीं।

पर मैं उनके दरवािे कभी खोल ही नहीं पाया।

सच मैंने दे खा है -

िब भी कोई रे खा मेरे हाथों से र्गायब हई है …

मैंने उसका मौन अपने माथे पर महसूस फकया है ।

मझे लर्गता है - यही मौन है – िो हमें बूढा बनाते हैं।

जिस टदन माथे पर िर्गह खत्म हो िायेर्गी……

ये मौन चेहरे पर उतर आयेर्गा………

और हम बूढे हो िायेंर्गें।

Fade Out

Scene-5

(पपंकी बाहर बैठी हई है । शक्ला भीतर से बाहर आता है )

शक्ला:- सो रहा है । भाभी कहााँ है ?

पपंकी:- फोन करने र्गई हैं। पापा एक हफ़्ते से कहााँ थे… कहााँ ममले?
शक्ला:- एक हफ़्ते से कहााँ था ये तो पता नहीं…… पर अभी पाकक में ममला,
सो रहा था बेंच पर।

पपंकी:- मतलब…… एक हफ़्ते से पाकक में ही थे?

शक्ला:- नहीं, मैं पहले भी र्गया था वहााँ। पता नहीं इतने टदन कहााँ था ये……
बेटा पानी दे ना।

पपंकी:- मैंने मााँ को कभी नहीं बताया, नहीं तो वो बहत घबरा िातीं……
अंकल, पापा मझसे बहत बातें करते थे……

शक्ला:- क्या… क्या बातें करते थे?

पपंकी:- कछ भी, फकस्से, घटनायें। मझे ज्यादा समझ में नहीं आतीं थीं। पर
मझे उनकी बातें सनना बहत अच्छा लर्गता था। वो कछ डरे हए थे…… मैंने
उनसे पछ
ू ा फक उन्हें क्या हआ है तो कहने लर्गे मझे इकहाम हआ है ।

शक्ला:- इकहाम…… वो क्या होता है ?

पपंकी:- पता नहीं… फफर कहने लर्गे – मझे हर चीि एकदम नई सी लर्गती है … धली
हई। मैं सब कछ फफर से एक बच्चे की तरह िी रहा हूाँ। मैं बच्चा होने
वाला हूाँ। तो मैंने उनसे पछ
ू ा – अभी आप क्या हैं? तो वो कहने लर्गे – ’अभी
मैं शेर हूाँ और इसके पहले मैं ऊाँट था’

शक्ला:- क्या हो र्गया है इसे…… कैसा हो र्गया है ये…… उसने बताया क्यों वो
इतना परे शान है ?

पपंकी:- वो परे शान नहीं हैं, वो बस डरे हए हैं………… उन्हें डर है ……… और


शायद इसीमलए वो इतने टदन घर नहीं आये।

शक्ला:- ये सब तम्हें पहले बताना चाटहये था, क्या डर……… फकसका डर?

पपंकी:- तजृ प्त का डर…

शक्ला:- तजृ प्त …?

पपंकी:- हााँ तप्ृ त हो िाने का डर…… पापा कह रहे थे उन्हें लर्गता है फक वो


तप्ृ त हैं। जिसमें सारी विह, इच्छाएाँ खत्म हो िाती हैं। वो कह रहे थे…
कोई भी विह नहीं बची है , मसवाए एक विह के… एक इच्छा के…… फक मझे वापपस
इस घर में आना है …… रोि…… अपने पररवार…… अपनी बेटी के पास…… और उन्हें ये
विह भी खो िाने का डर है ।

शक्ला:- मेरी कछ समझ में नहीं आ रहा है … और… और क्या कह रहा था?
पपंकी:- और वो फकस्से सनाते थे…… बचपन के, इधर-उधर के, चाचा के……

शक्ला:- ये… ये चाचा कौन है ? वो कह रहा था फक चाचा उससे ममलने आए थे।


कहााँ रहते हैं वो कछ पता है ?

पपंकी:- वो यहााँ रहते हैं? मझे नहीं मालम


ू था। ( पन
ू म अंदर आती है )

पूनम:- अरे कहााँ हैं वो?

शक्ला:- अंदर सो रहा है …… सोने दीजिये… डॉक्टर ने कहा है फक आराम की


सख्त िरूरत है ।

पूनम:- मैं बस दे खकर आती हूाँ। (पूनम भीतर िाती है )

शक्ला:- वो चाचा के बारे में तम्हारी मााँ को कछ पता है ?

पपंकी:- उन्होंने कभी बात नहीं की मझसे। (पूनम आती है )

पन
ू म:- हे भर्गवान, बस इन्हें ठीक कर दे और कछ नहीं चाटहये। ये प्रसाद लो
। मैं मन्नत मााँर्ग के आई हूाँ। सब ठीक हो िायेर्गा। ये खद घर आये ना?

शक्ला:- नहीं…… पाकक में सो रहा था। बहत र्गहरी नींद में । मैंने इतनी
कोमशश की उठाने की… फफर पानी डाला… तब भी नहीं उठा। मैं डर र्गया, कई
लोर्गों की मदद से इसे डॉक्टर के पास लेकर र्गया तब कहीं िाकर इसे होश आया।

पन
ू म:- डॉक्टर… क्या कहा उसने?

शक्ला:- उसने तो डॉक्टर का र्गला ही पकड मलया था और पता नहीं क्या कह रहा
था डॉक्टर से… कछ समझ में नहीं आ रहा था। वापपस इसे बेहोश करके इसके
टे स्ट लेने पडे…… डॉक्टर ने कहा है फक इसे आराम करने दो।

पन
ू म:- मैं भी कल पाकक र्गई थी… इन्हें ढूंढते हए…… ये तो कह रहे थे फक
बहत संदर पाकक है … पर वो तो एकदम खंडहर िैसी िर्गह है । एक बेंच पडी है ।
टूटे -फूटे झूले हैं और बस…।

शक्ला:- और भाभी, जिन लोर्गों ने मेरी मदद की डॉक्टर के पास ले िाने में ,
वो कह रहे थे – ’ये पाकक सालों से बंद पडा है , यहााँ मसफक ये ही िाता
है , बेंच पर बैठा रहता है ।’ लोर्गों ने इसे कभी अकेले बडबडाते दे खा है , तो
कभी नाचते हए……

पूनम:- बच्चे……?

शक्ला:- कभी ऎसे ही अखबार को हवा में घमा रहा है ……

पूनम:- बच्चे…?
शक्ला:- भाभी…… वहााँ कोई बच्चे खेलने नहीं िाते।

पूनम:- हे भर्गवान (आाँखे बंद कर लेती है , एक लंबी सााँस भर के शांत हो िाती


है ।) हम अभी पपछले ही साल घूमने र्गए थे… है ना… पपंकी याद है । वहााँ पहाड
थे, बहत सारी बफक थी। बबकलू भी था वहााँ पर। हमने बफक के चार बडे
बडे र्गोले बनाये, कंचो से उनकी आाँखे बनाईं… एक बबकल,ू एक पपंकी… मैं और…
पपंकी वो फोटो लाना, िो हमने वहााँ खींचे थे।

पपंकी:- मााँ…

पूनम:- फोटो लाओ बेटा आआआ……

शक्ला:- बेटा… िाओ…(पपंकी अंदर िाती है )

भाभी… भाभी… फकसको फोन फकया आपने?

पन
ू म:- हााँ बबकलू को फोन फकया पर उसके पास तो टाईम ही नहीं है । इनके
भाई को भी फोन फकया, मझे लर्गा था ये र्गााँव चले र्गये होंर्गें … इनके भाईसाहब
बता रहे थे, िब ये बारह-तेरह साल के थे तो फकसी बात पर एक टदन इनके
पपतािी ने इन्हें मारा था और ये घर छोडकर चले र्गये थे। दो साल कहााँ थे
फकसी को नहीं पता। फफर िब ममले तो एक साल लर्ग र्गया इनके माँह से पहला शब्द
तनकलवाने में …… मैं बता रही हूाँ। ये सब भूत-प्रेत का चक्कर है ।

शक्ला:- भाभी… ये सब बेकार की बाते हैं। भर्गवान ठीक हो िायेर्गा।

(भीतर से पपंकी के चीखने की आवाि आती है । वो भार्गती हई बाहर आती है ।)

पपंकी:- मम्मी…

पूनम:- क्या हआ……?

पपंकी:- पापा… पापा सो नहीं रहे थे वो बैठे हए थे… मैंने पूछा- ’आप ठीक
तो हैं, क्या हआ?’ तो वो मझपर झपट पडे और मेरे हाथ से फोटो एलबम छीन
मलया और…… (भर्गवान के खांसने की आवाि आती है और वो एलबम दे खता हआ अंदर
आता है … उसका मसर भारी हो रहा है । सभी डरे हए हैं। भर्गवान सीधा पूनम के
पास िाता है )

भर्गवान:- पूनम… कौन सा टदन है … कौन सी तारीख है (पूनम डर के मारे रोने


लर्गती है ) क्या हआ पूनम…… (भर्गवान फफर एलबम को दे खता है और मस्कराने
लर्गता है )

भर्गवान:- संदर है ये सब… फकतना खब


ू सरू त है (एलबम नीचे पटक दे ता है ) पर हम
क्या करें र्गे इतनी खब
ू सरू ती का… मैं कभी कभी अपना सबसे खब
ू सरू त सपना याद
करता हूाँ, मेरा सबसे खब
ू सरू त सपना भी… कभी बहत खब
ू सरू त नहीं था… मेरे
सपने भी थोडी सी खशी में , बहत सारे सख चर्गने िैसे हैं। िैसे कोई
गचडडया अपना खाना चर्गती है … पर िब उसे परू ी रोटी ममलती है तो वो परू ी
रोटी नहीं खाती… वो उस रोटी में से रोटी चर्ग रही होती है । बहत बडे आकाश
में हम भी अपने टहस्से का आकाश चर्ग लेते हैं। दे खने के मलये हम बडा
खब
ू सरू त आसमान दे ख सकते हैं… पर िीने के मलये हम उतना ही आकाश िी
पायेंर्गें, जितने आकाश को हमने अपने घर की खखडकी में से िीना सीखा है ।
(भर्गवान हाँसने लर्गता है )

शक्ला:- भर्गवान…(शक्ला गचकलाता है । पूनम उसे रोकती है ) भाभी… मैं बात


करता हूाँ बहत टदनों से इसका नाटक चल रहा है । (शक्ला भर्गवान के पास आकर
gibberish में बात करता है )

शक्ला:- #$#%$#^%$#$%#%%$%$^^&##!$$#%$^$

भर्गवान:- तम लोर्ग क्या बोल रहे हो…? पपंकी भी अंदर आई तो पता नहीं क्या
बोल रही थी? (शक्ला फफर कछ बोलने की कोमशश करता है , भर्गवान टोक दे ता
है ) क्या…… क्या है ?

शक्ला:- भाभी, पता नहीं क्या बोल रहा है । कौन सी भाषा… कछ समझ में नहीं
आ रहा है … क्या हो र्गया…… (भर्गवान को खझंझोड दे ता है )

पूनम:- भाई साहब… रुफकए मैं बात करती हूाँ।

#$%#%^%$^$^^$%^$%^$%#%%^&

भर्गवान:- ये सब क्या है … पूनम…

पूनम:- ^$^$$^$^#$%#%%$%$$%$^^ (पूनम बोलते बोलते रोने लर्गती है )

शक्ला:- (शक्ला गचकलाना शरु करता है )

#%$^%&**&^$^#%$^&**^%^&^%&(&*^^%^%$^&

भर्गवान:- पार्गल नहीं हूाँ मैं।

शक्ला:- #$%$^%&*&()*&*%$%^^&*(*)

भर्गवान:- पार्गल नहीं हूाँ मैं।

शक्ला:- %#%%^&*^&*&(^*(&^((*^&*^()*)_+()(*&^

भर्गवान:- पार्गल नहीं हूाँ मैं ऎऎऎऎऎऎऎऎऎऎऎऎ

Black Out

Scene –6
पन
ू म:- नमस्कार डॉक्टर साब! पन
ू म… इनकी पत्नी…। िी, पहले से काफी बेहतर
हैं र्गहरी नींद सोते हैं। िब तक कछ बोलते नहीं हैं, तब तक एकदम ठीक टदखते
हैं पर मैं आपको एक बात बताऊाँ… इन्हें टदमार्गी बखार हो र्गया है या फफर
फकसी का साया है । िी… मैं पवश्वास… करती हूाँ। मैं सब पर पवश्वास करती
हूाँ। अर्गर कोई मझसे कहे र्गा ना फक यहीं सौ बार नाक रर्गडो, तम्हारे पतत ठीक
हो िायेंर्गे तो मैं नाक रर्गडूर्ग
ं ी। एक परू ा साल हो र्गया है एक डॉक्टर से
दस
ू रे डॉक्डर तक िाते िाते… मैं बहत थक र्गई हूाँ। बस बहत हो र्गया… अब सहन
नहीं होता… माफ करना डॉक्टर साब… सब ठीक हो िायेर्गा……।

शक्ला:- नमस्कार… िी मेरा नाम पी.पी.शक्ला। मेरी एक छोटी सी कपडे की


दकान है वहीं इसके घर के नीचे। इससे दोस्ती तो बहत परानी है , शादी से
पहले से िानता हूाँ। क्या हआ… ये तो सर भर्गवान िाने या… भर्गवान िाने। मझे
लर्गा फक कहीं कोई र्गडबड है । एक टदन मेरे पास आया और कहने लर्गा शक्ला एक बात
बता। मैंने कहा पूछ… तो कहने लर्गा गचडडया िब पैदा होती है तो क्या वो अपना
पेड खरीदती है , घोंसला खरीदती है … अपना एक ईश्वर चनती है ? मैंने कहा ऎसा
लर्गता तो नहीं है । तो कहने लर्गा यटद वो इन सबका बोझ उठाती तो उड ही नहीं
पाती और हं सता हआ चला र्गया। अब आप बताइये एक बीवी बच्चों वाला आदमी, बैंक
का कमकचारी उसको ये सब बातें शोभा दे ती हैं। अब तो क्या बोल रहा है ,
क्या नहीं फकसी को कछ समझ नहीं आता।

पपंकी:- मैं पपंकी… मेरे भाई का नाम बबकलू है । पापा मझ्से बहत प्यार
करते थे… मेरा मतलब करते हैं। िी मैंने एक-दो बार कोमशश की उनसे अकेले
में बात करने की… पर… एक बार उन्होंने मझे कछ कार्गि टदये और इशारा फकया
फक पढो। िब मैंने कार्गि खोले तो उसपर गचत्र बने हये थे… अिीब से थे। मझे
डर लर्गता है … मझे अपने ही पापा से डर लर्गता है ।

सौरभ:- िी, मैं ऎसे बहत से पर्गलों को िानता हूाँ। अिी र्गमी में बडे बडे
लोर्ग तनकल लेते हैं। माफ कीजियेर्गा डॉक साब, वैसे आप ज्यादा िानते हैं पर
आप ही बताईये बढापे में बड्ढों के मंह से आह नहीं तनकलेर्गी तो क्या
तनकलेर्गा और ऎसे हर आह पर पैसे बााँटने लर्गे तो बैंक तो दो टदन में खाली हो
िायेर्गा। अिी इन पर्गलों का कोई भरोसा नहीं है । हमारे र्गााँव में एक पार्गल था,
एक बार उसने एक आदमी का सर फोड टदया… बताईये, मैं एक बात बोलंू… डॉक साब
पर्गलों का कोई इलाि नहीं…टॉइम वेस्ट है बस।

Scene –7

(भर्गवान अंदर आता है और उसके पीछे पीछे मोहन(मभखारी) अंदर आते हैं)
भर्गवान:- पूनम… (मोहन से) आ िाओ, अरे अंदर आ िाओ।

मोहन:- क्या भाई… तम्हारा ही घर है ना… नहीं तो दोनों पपटें र्गें।

भर्गवान:- मेरा ही घर है । पूनम… पूनम…

मोहन:- पूनम कौन है ?

भर्गवान:- मेरी पत्नी है … तम्हें बताया था।

मोहन:- नहीं, मैं कह रहा था… पूनम कहााँ है ?

भर्गवान:- हााँ वो कहीं र्गयी होर्गी। अरे तम अंदर आओ ना।

मोहन:- नहीं, मैं मभखारी हूाँ। मझे अपनी औकात पता है , मैं यहीं ठीक हूाँ।

भर्गवान:- अच्छा… ठीक है । मैं भीतर दे खकर आता हूाँ।

(भीतर से भर्गवान की आवाि आती है , िो पपंकी से कछ पूछ रहा है । पपंकी डरी


हई बाहर आती है। भर्गवान पीछे पीछे बाहर आता है )

भर्गवान:- बेटा… तम्हारी मााँ कहााँ है … क्या हआ तम्हें … अच्छा मझे दे खो… मााँ… मााँ।

पपंकी:- #$%^%&^*&%&*^*^%&%^%&^&^$#%

भर्गवान:- बेटा, सनो… क्या कह रही हो?

मोहन:- मै बताऊाँ… मैं बताऊाँ… मााँ फकसी बाबा को लेने र्गई है । मझे बहत डर
लर्ग रहा है … पापा… पापा।

पपंकी:- #$%^*%&^$#%#$%$^$^#$%#^%^^%^$%^&

मोहन:- ये कौन है ? ये तो कोई मभखारी है । पापा आप मभखारी को…

भर्गवान:- ये मेरी बात समझता है । मैं बस इतना बताना चाहता हूाँ फक मैं खद
ठीक हो िाऊाँर्गा। इधर आओ… मोहन तम बताओ इसको फक…

पपंकी:- $#%^$^&^&%$^&%^$%&$&

मोहन:- पापा, आप सच में पार्गल हो र्गये हैं। दरू हटो तम मझसे।

भर्गवान:- बेटा… बेटा मेरी बात सनो… बेटा…

पपंकी:- #%%$^&^%&%^&%&^&%&&*&*&* (पपंकी बाहर भार्ग िाती है )

भर्गवान:- पपंकी कहााँ चली र्गई? क्या कह रही थी वो?


मोहन:- मैं मॉ को लेकर आती हूाँ… मााँ… मााँ।

भर्गवान:- तमने उसे रोका क्यों नहीं

मोहन:-मरे वो इतनी डरी हई थी। (हाँसने लर्गता है )

भर्गवान:- तम हाँस क्यों रहे हो?

मोहन:- तम्हारा तो खेल हो र्गया है दोस्त! मझे लर्गा था तम मझे बेवकूफ


बना रहे हो… अब क्या करोर्गे तम?

भर्गवान:- पता नहीं…… मझे तो बस इतना पता है , मैं वापपस आना चाहता हूाँ

मोहन:- वापपस… तम तो यहीं हो।

भर्गवान:- यही तो मैं अपने पररवार वालों को समझाना चाहता हूाँ फक मैं यहीं
रहने के मलये लड रहा हूाँ और मैं चाहता हूाँ फक िब पूनम आये तो तम उसे एक
बार बता दे ना फक मैं कोमशश कर रहा हूाँ। तमने दे खा ना वो मेरी बात नहीं
समझ पा रहे हैं…… और अर्गर उन्हें ये लर्गता है फक ये बीमारी है तो उसका इलाि
भी मैं ही कर सकता हूाँ।

मोहन:- दे खो। मैं कोमशश करूाँर्गा… पता नहीं फक वो लोर्ग मेरी बात समझेंर्गे फक
नहीं। वैसे क्या हआ है तम्हें … माफ करना मझे हं सी आ रही है , पर मैं
सच में िानना चाहता हूाँ।

भर्गवान:- तम्हें पता है , मैं बचपन में अपने पपतािी के साथ एक आरती र्गाया
करता था। ’ओ शंकर मेरे, कब होंर्गें दशकन तेरे’। मेरे पपतािी बडी तकलीनता
से वो आरती र्गाया करते थे… रोि मझे लर्गा फक अर्गर मैं शंकर होता तो पपतािी
को दशकन िरूर दे ता और तब मेरे पपतािी क्या करते… ये बात मेरे टदमार्ग में
फंस र्गई। सच में मेरे पपतािी क्या करते? ये सोचते हये मैं कई महीनों
अपने पपतािी के साथ घूमता रहा और एक टदन मैंने उनसे पूछ मलया फक – ’आप
क्या करें र्गें?’ उन्होने मेरी बात टाल दी। पर मझे िवाब चाटहये था। सो वो
िब भी मेरे सामने पडते मैं पछ
ू लेता फक – ’आप क्या करें र्गें।’ एक टदन
उन्होने र्गस्से में आकर मझे मार टदया… बहत मारा… पर वो बात वहीं की
वहीं रह र्गई। सो कछ टदनों बाद मैं घर से भार्ग र्गया। फफर मझे याद नहीं फक
क्या हआ था। मेरे घर वाले बताते हैं फक दो साल तक मैं नहीं ममला था फफर
कछ समय मझे में टल हॉजस्पटल में भी रखा र्गया था, तब उनका कहना है फक मैं
सब भल
ू र्गया था मतलब ठीक हो र्गया था।

मोहन:- तम ठीक हो र्गये थे तब…?

भर्गवान:- झाडू लर्गाने के बाद हमको लर्गता है फक घर परू ी तरह साफ हो र्गया है
पर असल में कचरा वहीं घर के बाहर, घर के कोनों में दबका हआ ताक लर्गाये
बैठा रहता है।
मोहन:- सनो भाई… मैं तम्हारे घरवालों को बताने की कोमशश करूाँर्गा िैसा
मैंने दे खा फक तम्हारी बात तो कोई सन ही नहीं रहा है पर मेरी खद समझ
में नहीं आ रहा है फक मैं उन्हें क्या बताऊाँर्गा…… मतलब क्या कहूाँर्गा उन्हें
फक क्या हआ है तम्हें ?

भर्गवान:- “क्या दतनया तम्हारे पास आकर कहती है -दे खो मैं हूाँ?” (रमण
महपषक) ये वाक्य पता नहीं कहााँ, कब सना था… िो घर के कचरे की तरह, मेरे
दरवािे के बाहर ही िाने कब से घात लर्गाये पडा था… एक टदन िब मैं पसीने में
लथपथ बबना कछ सोचे एकदम खाली काँ ए सा अपने घर की ओर िा रहा था… मानो
फकसी ने मझको सन्न कर टदया हो… तब उस क्षण इस वाक्य ने मझे ढर दबोचा।
“क्या दतनया तम्हारे पास आकर कहती है -दे खो मैं हूाँ” तब पहली बार मैं उस
पाकक की बेंच पर िाकर बैठा था। कछ दे र में पसीना आना बंद हो र्गया। मेरे
झके हए कंधे सीधे हो र्गये और मैंने अपने दोनों हाथ खोल टदये… िैसे कोई
बहत पराना बबछडा हआ दोस्त मझे टदखा हो, जिसके मैं र्गले लर्गना चाहता
हूाँ। तभी मझे लर्गा िैसे कोई मेरे बर्गल में आकर बैठ र्गया हो। अचानक वो मेरे
करीब आया और मेरे कान में फसफसाया-“क्या दतनया तम्हारे पास आकर
कहती है -दे खो मैं हूाँ।” और मैंने इसका िवाब दे ना शरु फकया… उस टदन… अर्गले
टदन… हफ़्तों…. महीनों…. और तब मझे हर चीि धली-धली लर्गने लर्गी। िैसे
फकसी ने साबन से रर्गड-रर्गडकर सब कछ धो टदया हो… सडकों को, कूडे के डडब्बे
को, सारे िानवरों को, वो कोने में बैठे मोची को और मोची के आाँखों के नीचे
पडे र्गड्ढों को और… पूरे शहर को, सबको और तब मझे वो रे खायें टदखने लर्गीं।

मोहन:- रे खायें…?

भर्गवान:- रे खायें… िैसे हाथों पर, माथे पर होती हैं, ठीक वैसी ही रे खायें
मीन पर भी पडती हैं। ये एक पर्गडंडी बनने िैसा है ।

मोहन:- मतलब…?

भर्गवान:- िैसे ये घर में , ये रे खायें तम्हें नहीं टदख रहीं ?

मोहन:- नहीं… कहााँ हैं?

भर्गवान:- अभी थोडी बबर्गड र्गयी हैं क्योंफक पपछले कछ समय से मैं अपनी ही
रे खाओं को लांघ रहा हूाँ इसीमलए पूरा घर परे शान है … हमारे िीने की… हमारे
चलने की रे खायें पूरे शहर में फैली होती हैं… िैसे तम्हारी रे खायें…
नहीं मझे तम्हारी रे खायें नहीं टदखीं, मोहन?

मोहन:- नहीं टदखीं… क्योंफक मैं चलता ही नहीं हूाँ… मैं िहााँ धंधा करता
हूाँ वहीं सो िाता हूाँ। हमें तो अपनी िर्गह इतना बैठना पडता है फक लोर्गों को
लर्गने लर्गे फक ये यहीं से उर्गा है और एक टदन यहीं समा िायेर्गा… रुको, तम्हें
कैसे पता फक मेरा नाम मोहन है ? मैंने आितक फकसी को अपना नाम नहीं बताया।
भर्गवान:- मझे तो उस गचडडया का नाम भी पता है िो बाहर चहक रही है । आिकल
मैं उससे थोडा नाराि हूाँ… इसमलये दे खो कैसे मना रही है ।

मोहन:- तम्हारी पत्नी अभी तक आई नहीं ?

भर्गवान:- आती होर्गी।

मोहन:- सनो… मैं काफी समय से एक बात फकसी को नहीं बता पाया, अब तम
मझे सन रहे हो तो तमसे एक बात कहूाँ?

भर्गवान:- हााँ

मोहन:- मैं िो खाना खाता हूाँ ना… कभी लोर्गों का िूठा, कभी कहीं से िर्गाड
फकया हआ। खाते वक्त मैं हमेशा सोचता हूाँ फक िो खाने का स्वाद मझे आ रहा
है क्या वही स्वाद इन सबको भी आ रहा होर्गा या मझे कछ अलर्ग ही स्वाद आता
है । मैं अपना खाना हमेशा चटखारे मारकर खाता हूाँ। दे खो अभी भी माँह में
पानी आ र्गया।

भर्गवान:- क्या तम ठीक ठीक बता सकते हो फक कैसा स्वाद आता है ?

मोहन:- हााँ… ये… ये वाला। ये अभी आया था… रुको… अ… अ… ये… ये आया… अरे …

भर्गवान:- नहीं बता सकते। कोई नहीं बता सकता। मेरी भी यही समस्या है , मझे
अब खाने में िो स्वाद आ रहा है वो मैं फकसी को नहीं बता सकता।

(मोहन र्गाना, र्गाना शरु करता है । पीछे एक बाबा का प्रवेश होता है वो कछ


तछडकता हआ भीतर के कमरे में चला िाता है । पपंकी और पूनम आते हैं।)

पन
ू म:- ये कौन है पपंकी…?

पपंकी:- आपसे कहा था ना फक पापा फकसी मभखारी को ले आये हैं।

भर्गवान:- मोहन मेरी पत्नी आ र्गई… इसे कह दो िो भी मैंने तम्हें बताया है … िकदी।

मोहन:- ठीक है भाई मैं कोमशश करता हूाँ। (मोहन, पूनम के पास िाता है ) आ…आ…आ…

(मोहन भर्गवान के पास आता है ) मैंने कहा था ना ये लोर्ग मेरी बात नहीं समझेंर्गें।

भर्गवान:- क्यों नहीं समझेंर्गें ये लोर्ग… तू बोल ना… तू बोल उनसे।

मोहन:- आ…आ…आ…

बाबा:- बाहर तनकालो इस र्गूंर्गे को। (पूनम और पपंकी मोहन को खींचते हये
बाहर तनकालते हैं और मोहन भार्गकर वापपस आता है । पूनम और पपंकी उसे वापपस
पकडकर बाहर तनकालते हैं। यहााँ भर्गवान और बाबा अकेले रह िाते हैं। भर्गवान डर
के मारे बाबा से दरू भार्गना चाहता है । बाबा उसके बालों को पकड लेता है और
मंत्र पढता हआ भर्गवान को खींचते हये परू े घर का चक्कर लर्गाता है । उसपर
कछ तछड्कता है और बीच स्टे ि पर लाकर चााँटा मारता है , तब तक पपंकी और
पन
ू म अंदर आ िाते हैं।)

पपंकी:- पापा …S…S…S…

(ब्लैक आउट होता है कछ चााँटो की आवाि आती है । फफर लाईट आती है । भर्गवान
सामने बेहोश पडा है । बाबा, पपंकी और पन
ू म पीछे खडे हैं।)

बाबा:- अब इसे रात भर यहीं अकेला रहने दो। बाहर से ताला लर्गा दे ना, ये
सबह तक ठीक हो िायेर्गा। चमलए…।

पन
ू म:- बेटा, चाभी ले आ…।

(पपंकी चाभी लाती है ।स ब तनकल िाते हैं। ब्लैक आउट। फफर लाईट आती है ।
भर्गवान कराहता हआ उठता है और पवंर्ग के पास िाकर बैठ िाता है । अचानक पवंर्ग
से बहत अगधक प्रकाश अंदर आता है भर्गवान के चेहरे पर मानो सूरि उर्ग आया हो।
तभी भर्गवान को चाचा चौधरी आते हए टदखाई दे ते हैं)

भर्गवान:- चाचा… चाचा िी।

चाचा- िो लोर्ग नाच रहे थे वो हमेशा पार्गल समझे र्गये उन लोर्गों के द्वारा
जिन्हें कभी संर्गीत सनाई ही नहीं टदया। (तनत्शे)

भर्गवान:- मैं वापस आना चाहता हूाँ। चाचा… मैं वो नहीं हूाँ… मैं सब कछ नहीं
िानना चाहता… ये पहले सख था अब नहीं… मेरे हाथ से सब कछ छूटता िा रहा
है । मैं ये सहन नहीं कर सकता।

चाचा:- िब तम अपने बाप की मार खाकर अपने घर से भार्ग र्गये थे, तब तम क्या
थे? तब तम ऊाँट थे… ऊाँट… िो एक वीराने में घटनों तक झका हआ अपनी ही
आत्मा का बोझ लादे , बबना कछ िाने-समझे भटक रहा था… अब तक। अभी कायककप
हआ है … ट्ांसफामेशन… और अब तम सीधे खडे हो। अब तम शेर हो… िो अब
उसी वीराने में शासन करना चाहता है । ईश्वर कहता है - तम्हें ये करना
चाटहये। शेर कहता है - मैं नहीं करूाँर्गा। तम्हारे मलये सारे मूकय,
मयाकदायें सब अप्रासांगर्गक हैं। तम सब कछ नया रचना चाहते हो… और यही
नया रचते-रचते बहत िकद फफर एक कायाककप होर्गा और तम एक मशश हो
िाओर्गे…… बच्चे और वो ही िरूरी है , वो ही नयी शरुआत है और यही तो तम
चाहते हो। (तनत्शे)

भर्गवान:- क्या मैं सच में यही पाना चाहता था…? तो क्यों मझे सब लोर्ग रोते
हये और मझे मारते हये टदखाई दे रहे हैं।
चाचा:- अब ये ग्लातन है … िब मकलाह को र्गााँव वाले पत्थर मार-मारकर र्गााँव से
बाहर तनकाल रहे थे तो एक पत्थर तो तम्हारे हाथ में भी था।

भर्गवान:- हााँ… पर मैंने मारा नहीं था।

चाचा:- मारा नहीं… तो बचाया भी नहीं… और अब िब तम खद गचडडया से बातें


कर रहे हो तो उन पत्थरों को कैसे रोक सकते हो िो अब तम्हें दस
ू रों के
हाथों में टदख रहे हैं।

भर्गवान:- क्या मैं ये सब रोक नहीं सकता हूाँ… पर ये सब एकदम से कैसे हो र्गया?

चाचा:- ये सब एकदम से नहीं हआ है … मैं तो तम्हारे साथ बचपन से हूाँ ऐर


तमने कभी सोचा, क्यों तमने अपने बच्चों के नाम बबकलू और पपंकी रखे
हैं। ये तो तम्हारे कॉममक्स के पसंदीदा पात्र हैं ना…?

भर्गवान:- नहीं… मझे सबसे ज्यादा साबू पसंद है । अरे साबू कहााँ है … चाचािी
आप साबू को नहीं लाये ?

चाचा:- लाया हूाँ ना… वो बाहर खडा है ।

भर्गवान:- साबू… साब…


ू (भर्गवान बाहर आता है। दरवाि खोलने की कोमशश करता है
पर बाहर ताला लर्गा है । भर्गवान वापपस आता है ) आप उसे बला लीजिये ना मैं
उससे ममलना चाहता हूाँ।

चाचा:- वो तो खद तमसे ममलना चाहता है । पर क्या करें … तमने अपने घर ही


इतने छोटे बना केर खे हैं फक साबू अंदर आ ही नहीं सकता। पर िैसे ही तम
मशश हो िाओर्गे ना तो वो भीतर आ िायेर्गा, वो ही नहीं सब कछ भीतर आ िायेर्गा।

भर्गवान:- चाचािी… क्या हम दोनों सख एक साथ नहीं ले सकते?

चाचा:- क्या इंसानों िैसी बातें करर हे हो?

भर्गवान:- मझे ऎसा लर्गता है फक मैं नदी के तेि बहाव के पवरुद्ध तैर रहा
हूाँ। तैरता हूाँ, तैरता हूाँ पर कहीं पहाँ चता नहीं हूाँ और अर्गर तैरना बंद कर
दं ू तो डर है फक कहीं ये नदी बहाकर ना ले िाये। क्या करूाँ मैं… ये सब
फकतना कटठन क्यों है …?

चाचा:- ये सब सरल है … इस दतनया में िीना उतना ही सरल है जितनी सरलता से


एक गचडडया िीती है । पर हमने ’कैसे िीना है के’ इतने फकस्से और कहातनयााँ
बना मलये हैं फक अब लर्गता है फक कोई बद्ध ही होर्गा िो ऎसा िी सकता है ।
हमारे बस की बात नहीं है । िबफक एक गचडडया वैसी ही िी रही है िैसे उसे
िीना चाटहये।

भर्गवान:- पर मैं कौन हूाँ… क्या खोि रहा हूाँ ?


चाचा:- तम कछ नहीं खोि रहे हो। तम्हें बस ये पता लर्ग र्गया है फक तम
बबछड र्गये हो…अपने घर से… अपने आप से… खद से… तम बस अपने घर वापस आना
चाहते हो…. और उस ओर चल रहे हो।

भर्गवान:- तमने ईश्वर को दे खा है …?

चाचा:- तम्हें पछ
ू ना चाटहये क्या मैंने ईश्वर को दे खा ? ये तम्हारा
इकहाम है ये सब तम्हें पता है ।

भर्गवान:- क्या मैंने ईश्वर को दे खा है ?

चाचा:- मैंने ईश्वर को नहीं दे खा, पर हााँ मैंने एक सपना दे खा है …

भर्गवान:- हााँ… उस स्वप्न में एक झील टदखाई दी… काई से ढाँ की हयी (रामकृष्ण परमहं स)

चाचा:- तभी हवा का झोंका आया… और धीरे धीरे काई एक और सरकती र्गई।

भर्गवान:- और मझे नीला पानी टदखाई टदया।

चाचा:- तो मैंने सोचा … ये नीला पानी सत्य है … ईश्वर है । तभी हवा का


झोंका दोबारा आया और काई झील पर वापस आ र्गयी।

भर्गवान:- तब मैंने सोचा… ये तो माया है … छलावा।

चाचा:- सत्य भी वही है … माया भी वही है । दोनो एक दस


ू रे के बर्गैर नहीं रह
सकते। हा… हा… हा…

भर्गवान:- हा… हा… हा… चाचािी, चलो पाकक में िाकर बैठेंर्गें । मझे आपसे
बहत बातें करनी हैं।

चाचा:- नहीं… अभी मैं चलता हूाँ। तम आराम करो… तम्हें आराम की िरूरत है ।

भर्गवान:- अब आप मझ्से ममलने कब आयेंर्गें… ?

चाचा:- िब तम बलाओर्गे।

भर्गवान:- आप मेरे साथ रह क्यों नहीं िाते… यहीं इस घर में ?

चाचा:- मैंने कहा ना िब तम मशश हो िाओर्गे तो मैं ही नहीं सब… परू ी


दतनया तम्हारे साथ रहने लर्गेर्गी। (चाचािी िाने लर्गते हैं) क्या ज ंदर्गी
तम्हारे पास आकर कहती है , दे खो मैं हूाँ?

भर्गवान:- चाचािी… हााँ वो कहती है , पर अब मैं उसे सनना नहीं चाहता। मैं इस
पूरे आकाश का क्या करूाँर्गा जिसमें उडना मैंने सीखा ही नहीं… मैं तो बस
उतना ही आकाश िीना चाहता हूाँ जितने आकाश को मैंने अपने घर की खखडकी में
से िीना सीखा है ।
चाचा:- तो ठीक है … इसे हमारी आखखरी मलाकात ही समझो।

(चाचा चौधरी र्गाना र्गाते हए तनकल िाते हैं और उसी र्गाने के साथ भर्गवान भी
र्गाना शरु करता है और धीरे धीरे नाचना चालू करता है । भर्गवान का र्गाना और
नाचना डरावना होता िाता है और वह भर्गवान की एक चीख के साथ खत्म हो िाता
है ।)

Fade Out

Scene – 8

(भर्गवान पाकक में हारा हआ सा बैठा है )

मैंने सनहरा सोचा था, वो काला तनकला

तभी नींद का एक झोंका आया

मैंने उसे फफर सनहरा कर टदया

अब… सबह होने क भय लेकर

नींद में बैठा हूाँ

या तो उसे उठकर काला पाऊाँ

या हमेशा के मलये उसे सनहरा ही रहने दाँ …


…………… और कभी ना उठूाँ।

Scene-9

(भर्गवान बहत सारे पेपर लेकर कछ काम कर रहा है और उसका व्यवहार अतत
सामान्य है फक सामान्य नहीं लर्ग रहा है । पपंकी तैयार होकर कहीं बाहर िा
रही है ।)

पपंकी:- मााँ, िकदी चलो… मझे कॉलेि के मलये दे र हो रही है … अरे पापा आप
अभी तक र्गये नहीं। शक्ला िी इंतिार करर हे होंर्गें ।

भर्गवान:- मैं उसी की दकान का टहसाब कर रहा था… मझे पता ही नहीं चला फक
इतना टाईम हो र्गया ।

पपंकी:- आप फफर अपनी दवा खाना भल


ू र्गये ?

भर्गवान:- मैं भूल र्गया ?


पपंकी:- दवाई खाई आपने ?

भर्गवान:- बस खाता हूाँ। (पूनम आती है )

पन
ू म:- अरे आप र्गये नहीं अभी तक… ?

भर्गवान:- बस… अभी हो र्गया… हो र्गया।

पपंकी:- मााँ… चलो मझे दे र होर ही है ।

पूनम:- चलो… आप िाते हये दरवािा बंद कर लेना। एक चाभी मेरे पास है । (तभी
बेल बिती है पपंकी दे खने िाती है )

पपंकी:- मााँ…

पूनम:- कौन है …?

पपंकी:- वो…

पूनम:- अरे कौन है …?

पपंकी:- वो मभखारी आया है …

भर्गवान:- कौन… मैं… मैं… उससे ममलना चाहता हूाँ… ममलाँ …


ू अब तो मैं ठीक भी हो र्गया हूाँ।

पूनम:- पर दकान में िकदी िाना… मैं शक्ला िी को बोलकर िाती हूाँ… दवाई
मत भल ू ना। चलो पपंकी।

पपंकी:- मााँ… ?

पूनम:- कछ नहीं होर्गा… तू चल… (दोनो चले िाते हैं) िाईये अंदर बैठे हैं वो।

(मोहन अंदर आता है भर्गवान के र्गले लर्ग िाता है और कछ तोहफा उसे दे ता है )

मोहन:- आ… आ… आ…

भर्गवान:- अब मैं तम्हारी बात नहीं समझ सकता… अब तम मेरे मलये बस एक


र्गूंर्गे मभखारी हो।

मोहन:- आ… आ… आ…

भर्गवान:- नहीं… मोहन… तम्हारा नाम मोहन है ना… ये भी मझे इसीमलये याद है
क्योंफक मैंने अभी तक अपनीद वाई नहीं खाई।

मोहन:- (ये दवाई क्या है ) आ… आ… आ…

भर्गवान:- मैं नहीं िानता। मैंने तमसे कहा था ना फक मैं वापस आना चाहता
हूाँ। बहत कोमशशों के बाद भी िब मैं वापस नहीं आ पाया तो मैंने आसान
रास्ता चन मलया। मैंने सोचा मैं मर िाता हूाँ। बहत मजश्कलों से ये
र्गोमलयां ममलीं। िैसे ही मैंने इसे खाया, मझे नींद आने लर्गी। मेरा ये हाथ
सन्न होने लर्गा, मसर एकदम भारी हो र्गया। तभी फकसी ने आकर मझसे कहा – ’आप
बीच रास्ते में खडे हैं, यहााँ आ िाईये।’… मैंने उसे धन्यवाद टदया। वो कोई
बात नहीं कहकर चला र्गया… और मैंने दे खा मझे सब समझ में आ रहा है … सभी
मेरी बात भी समझ रहे हैं। बस… और बस मैं ठीक हो र्गया। अभी भी मझे ठीक से
नींद नहीं आती है , ये हाथ हकका सा सन्न रहता है , सर भारी बना रहता है ……
ये कहते हैं अब मैं ठीक हो र्गया हूाँ। मैं अब सामान्य हूाँ।

(मोहन दवाईयााँ अपने हाथ में ले लेता है और भर्गवान की तरफ इशारा करता है )

भर्गवान:- ये… ये असल में झाडू है िो मझे अपने घर में रोि लर्गानी पडती है
फक हर आदमी की तरह मेरा भी घर साफ रहे ।

(मोहन, भर्गवान को खींचकर दस


ू री ओर लाने की कोमशश करता है और नाचते हये
इशारा करता है फक उसे इकहाम की ओर चले िाना चाटहये। भर्गवान पीछे हटता है
)

भर्गवान:- इकहाम की मझे क्या िरूरत है … पूरा सच िानकर मैं क्या करूाँर्गा।
अर्गर िीवन के इस तरफ ही रहना है तो हर थोडी चीि से काम चल िाता है … थोडा
सच, थोडी खशी, थोडे सपने। अर्गर पूरा चाटहये तो उस तरफ िाना पडेर्गा… पूरी
तरह। इस तरफ रहकर उस तरफ की बात करना भी झूठ है , अपने आपको बेवकूफ
बनाने िैसा है और मैं… और बेवकूफ नहीं बनना चाहता ।

मोहन:- (मोहन दवाई की शीशी तोडना चाहता है ) आ… आ… आ…

भर्गवान:- नहीं… मैं हाथ िोडता हूाँ…

(मोहन र्गवाई वापस रख दे ता है )

भर्गवान:- मोहन… अब मैं एक इकाई हूाँ… इस पूरी दतनया की नहीं… दतनया से अब


मझे कोई मतलब नहीं । मैं इकाई हूाँ, हमारी बनायी दतनया की, इस समाि की
और मझे इस परू े खाने में हमेशा नमक की मात्रा में रहना है … ना ज्यादा ना
कम । ठीक उतना ही जितने में सभी को ये खाना एक तरह का स्वाद दे ता रहे …
हमेशा ।
(भर्गवान दवाई खाने को होता है , मोहन उसे रोकता है और िाने की
आज्ञा मााँर्गता है … तोहफा टे बल पर रखकर वो वो चला िाता है । भर्गवान दवाई
खाता है । अपने सारे कार्ग उठाकर िाने लर्गता है । तभी उसे गचडडया के चहकने
की आवाि सनाई दे ती है और वो रुककर पीछे मडता है ।)

नाराि हो…… माफ करना । मैं अब तम्हें कभी नहीं समझ पाऊाँर्गा।

Fade Out
The end…….

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